मण्डलम्

सूक्तम्

अ॒ग्निमी॑ळे पु॒रोहि॑तं य॒ज्ञस्य॑ दे॒वमृ॒त्विज॑म्। होता॑रं रत्न॒धात॑मम्॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार से दो अर्थों का ग्रहण होता है। पिता के समान कृपाकारक परमेश्वर सब जीवों के हित और सब विद्याओं की प्राप्ति के लिये कल्प-कल्प की आदि में वेद का उपदेश करता है। जैसे पिता वा अध्यापक अपने शिष्य वा पुत्र को शिक्षा करता है कि तू ऐसा कर वा ऐसा वचन कह, सत्य वचन बोल, इत्यादि शिक्षा को सुनकर बालक वा शिष्य भी कहता है कि सत्य बोलूँगा, पिता और आचार्य्य की सेवा करूँगा, झूठ न कहूँगा, इस प्रकार जैसे परस्पर शिक्षक लोग शिष्य वा लड़कों को उपदेश करते हैं, वैसे ही ‘अग्निमीळे०’ इत्यादि वेदमन्त्रों में भी जानना चाहिये। क्योंकि ईश्वर ने वेद सब जीवों के उत्तम सुख के लिये प्रकट किया है। इसी वेद के उपदेश का परोपकार फल होने से ‘अग्निमीळे०’ इस मन्त्र में ‘ईडे’ यह उत्तम पुरुष का प्रयोग भी है। (अग्निमीळे०) इस मन्त्र में परमार्थ और व्यवहारविद्या की सिद्धि के लिये अग्नि शब्द करके परमेश्वर और भौतिक ये दोनों अर्थ लिये जाते हैं। जो पहिले समय में आर्य लोगों ने अश्वविद्या के नाम से शीघ्र गमन का हेतु शिल्पविद्या आविष्कृत की थी, वह अग्निविद्या की ही उन्नति थी। परमेश्वर के आप ही आप प्रकाशमान सब का प्रकाशक और अनन्त ज्ञानवान् होने से, तथा भौतिक अग्नि के रूप दाह प्रकाश वेग छेदन आदि गुण और शिल्पविद्या के मुख्य साधक होने से अग्नि शब्द का प्रथम ग्रहण किया है॥१॥

अ॒ग्निः पूर्वे॑भि॒र्ऋषि॑भि॒रीड्यो॒ नूत॑नैरु॒त। स दे॒वाँ एह व॑क्षति॥

जो मनुष्य सब विद्याओं को पढ़के औरों को पढ़ाते हैं तथा अपने उपदेश से सब का उपकार करनेवाले हैं वा हुए हैं वे पूर्व शब्द से, और जो कि अब पढ़नेवाले विद्याग्रहण के लिये अभ्यास करते हैं, वे नूतन शब्द से ग्रहण किये जाते हैं, क्योंकि जो मन्त्रों के अर्थों को जाने हुए धर्म और विद्या के प्रचार, अपने सत्य उपदेश से सब पर कृपा करनेवाले, निष्कपट पुरुषार्थी, धर्म की सिद्धि के लिये ईश्वर की उपासना करनेवाले और कार्य्यों की सिद्धि के लिये भौतिक अग्नि के गुणों को जानकर अपने कर्मों के सिद्ध करनेवाले होते हैं, वे सब पूर्ण विद्वान् शुभ गुण सहित होने पर ऋषि कहाते हैं, तथा प्राचीन और नवीन विद्वानों के तत्त्व जानने के लिये युक्ति प्रमाणों से सिद्ध तर्क और कारण वा कार्य्य जगत् में रहनेवाले जो प्राण हैं, [वे भी ऋषि शब्द से गृहीत होते हैं]। इन सब से ईश्वर स्तुति करने योग्य और भौतिक अग्नि अपने-अपने गुणों के साथ खोज करने योग्य है। और जो सर्वज्ञ परमेश्वर ने पूर्व और वर्त्तमान अर्थात् त्रिकालस्थ ऋषियों को अपने सर्वज्ञपन से जान के इस मन्त्र में परमार्थ और व्यवहार ये दो विद्या दिखलाई हैं, इससे इसमें भूत वा भविष्य काल की बातों के कहने में कोई भी दोष नहीं आ सकता, क्योंकि वेद सर्वज्ञ परमेश्वर का वचन है। वह परमेश्वर उत्तम गुणों को तथा भौतिक अग्नि व्यवहार-कार्यों में संयुक्त किया हुआ उत्तम-उत्तम भोग के पदार्थों का देनेवाला होता है। पुराने की अपेक्षा एक पदार्थ से दूसरा नवीन और नवीन की अपेक्षा पहिला पुराना होता है। देखो, यही अर्थ इस मन्त्र का निरुक्तकार ने भी किया है कि−जो प्राकृत जन अर्थात् अज्ञानी लोगों ने प्रसिद्ध भौतिक अग्नि पाक बनाने आदि कार्य्यों में लिया है, वह इस मन्त्र में नहीं लेना, किन्तु सब का प्रकाश करनेहारा परमेश्वर और सब विद्याओं का हेतु, जिसका नाम विद्युत् है, वही भौतिक अग्नि यहाँ अग्नि शब्द से कहा गया है। (अग्निः पूर्वे०) इस मन्त्र का अर्थ नवीन भाष्यकारों ने कुछ का कुछ ही कर दिया है, जैसे सायणाचार्य ने लिखा है कि−(पुरातनैः०) प्राचीन भृगु, अङ्गिरा आदियों और नवीन अर्थात् हम लोगों को अग्नि की स्तुति करना उचित है। वह देवों को हवि अर्थात् होम में चढ़े हुए पदार्थ उनके खाने के लिये पहुँचाता है। ऐसा ही व्याख्यान यूरोपखण्डवासी और आर्यावर्त्त के नवीन लोगों ने अङ्ग्रेजी भाषा में किया है, तथा कल्पित ग्रन्थों में अब भी होता है। सो यह बड़े आश्चर्य की बात है, जो ईश्वर के प्रकाशित अनादि वेद का ऐसा व्याख्यान, जिसका क्षुद्र आशय और निरुक्त शतपथ आदि सत्य ग्रन्थों से विरुद्ध होवे, वह सत्य कैसे हो सकता है॥२॥

अ॒ग्निना॑ र॒यिम॑श्नव॒त्पोष॑मे॒व दि॒वेदि॑वे। य॒शसं॑ वी॒रव॑त्तमम्॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार से दो अर्थों का ग्रहण है। ईश्वर की आज्ञा में रहने तथा शिल्पविद्यासम्बन्धी कार्य्यों की सिद्धि के लिये भौतिक अग्नि को सिद्ध करनेवाले मनुष्यों को अक्षय अर्थात् जिसका कभी नाश नहीं होता, ऐसा धन प्राप्त होता है, तथा मनुष्य लोग जिस धन से कीर्त्ति की वृद्धि और जिस धन को पाके वीर पुरुषों से युक्त होकर नाना सुखों से युक्त होते हैं, सब को उचित है कि उस धन को अवश्य प्राप्त करें॥३॥

अग्ने॒ यं य॒ज्ञम॑ध्व॒रं वि॒श्वतः॑ परि॒भूरसि॑। स इद्दे॒वेषु॑ गच्छति॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जिस कारण व्यापक परमेश्वर अपनी सत्ता से पूर्वोक्त यज्ञ की निरन्तर रक्षा करता है, इसीसे वह अच्छे-अच्छे गुणों को देने का हेतु होता है। इसी प्रकार ईश्वर ने दिव्य गुणयुक्त अग्नि भी रचा है कि जो उत्तम शिल्पविद्या का उत्पन्न करने वाला है। उन गुणों को केवल धार्मिक उद्योगी और विद्वान् मनुष्य ही प्राप्त होने के योग्य होता है॥४॥

अ॒ग्निर्होता॑ क॒विक्र॑तुः स॒त्यश्चि॒त्रश्र॑वस्तमः। दे॒वो दे॒वेभि॒रा ग॑मत्॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। सब का आधार, सर्वज्ञ, सब का रचनेवाला, विनाशरहित, अनन्त शक्तिमान् और सब का प्रकाशक आदि गुण हेतुओं के पाये जाने से अग्नि शब्द करके परमेश्वर, और आकर्षणादि गुणों से मूर्त्तिमान् पदार्थों का धारण करनेहारादि गुणों के होने से भौतिक अग्नि का भी ग्रहण होता है। सिवाय इसके मनुष्यों को यह भी जानना उचित है कि विद्वानों के समागम और संसारी पदार्थों को उनके गुणसहित विचारने से परम दयालु परमेश्वर अनन्त सुखदाता और भौतिक अग्नि शिल्पविद्या का सिद्ध करनेवाला होता है। सायणाचार्य्य ने ‘गमत्’ इस प्रयोग को लोट् लकार का माना है, सो यह उनका व्याख्यान अशुद्ध है, क्योंकि इस प्रयोग में (छन्दसि लुङ्०) यह सामान्यकाल बतानेवाला सूत्र वर्त्तमान है॥५॥

यद॒ङ्ग दा॒शुषे॒ त्वमग्ने॑ भ॒द्रं क॑रि॒ष्यसि॑। तवेत्तत्स॒त्यम॑ङ्गिरः॥

जो न्याय, दया, कल्याण और सब का मित्रभाव करनेवाला परमेश्वर है, उसी की उपासना करके जीव इस लोक और मोक्ष के सुख को प्राप्त होता है, क्योंकि इस प्रकार सुख देने का स्वभाव और सामर्थ्य केवल परमेश्वर का है, दूसरे का नहीं। जैसे शरीरधारी अपने शरीर को धारण करता है, वैसे ही परमेश्वर सब संसार को धारण करता है, और इसी से इस संसार की यथावत् रक्षा और स्थिति होती है॥६॥

उप॑ त्वाग्ने दि॒वेदि॑वे॒ दोषा॑वस्तर्धि॒या व॒यम्। नमो॒ भर॑न्त॒ एम॑सि॥

हे सब को देखने और सब में व्याप्त होनेवाले उपासना के योग्य परमेश्वर! हम लोग सब कामों के करने में एक क्षण भी आपको नहीं भूलते, इसी से हम लोगों को अधर्म करने में कभी इच्छा भी नहीं होती, क्योंकि जो सर्वज्ञ सब का साक्षी परमेश्वर है, वह हमारे सब कामों को देखता है, इस निश्चय से॥७॥

राज॑न्तमध्व॒राणां॑ गो॒पामृ॒तस्य॒ दीदि॑विम्। वर्ध॑मानं॒ स्वे दमे॑॥

विनाश और अज्ञान आदि दोषरहित परमात्मा अपने अन्तर्यामिरूप से सब जीवों को सत्य का उपदेश तथा श्रेष्ठ विद्वान् और सब जगत् की रक्षा करता हुआ अपनी सत्ता और परम आनन्द में प्रवृत्त हो रहा है। उस परमेश्वर के उपासक हम भी आनन्दित, वृद्धियुक्त विज्ञानवान् होकर विज्ञान में विहार करते हुए परम आनन्दरूप विशेष फलों को प्राप्त होते हैं॥८॥

स नः॑ पि॒तेव॑ सू॒नवेऽग्ने॑ सूपाय॒नो भ॑व। सच॑स्वा नः स्व॒स्तये॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। सब मनुष्यों को उत्तम प्रयत्न और ईश्वर की प्रार्थना इस प्रकार से करनी चाहिये कि-हे भगवन्! जैसे पिता अपने पुत्रों को अच्छी प्रकार पालन करके और उत्तम-उत्तम शिक्षा देकर उनको शुभ गुण और श्रेष्ठ कर्म करने योग्य बना देता है, वैसे ही आप हम लोगों को शुभ गुण और शुभ कर्मों में युक्त सदैव कीजिये॥९॥

वाय॒वा या॑हि दर्शते॒मे सोमा॒ अरं॑कृताः। तेषां॑ पाहि श्रु॒धी हव॑म्॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है।

वाय॑ उ॒क्थेभि॑र्जरन्ते॒ त्वामच्छा॑ जरि॒तारः॑। सु॒तसो॑मा अह॒र्विदः॑॥

यहाँ श्लेषालङ्कार है। इस मन्त्र से जो वेदादि शास्त्रों में कहे हुए स्तुतियों के निमित्त स्तोत्र हैं, उनसे व्यवहार और परमार्थ विद्या की सिद्धि के लिये परमेश्वर और भौतिक वायु के गुणों का प्रकाश किया गया है। इस मन्त्र में वायु शब्द से परमेश्वर और भौतिक वायु के ग्रहण करने के लिये पहिले मन्त्र में कहे हुए प्रमाण ग्रहण करने चाहियें॥२॥

वायो॒ तव॑ प्रपृञ्च॒ती धेना॑ जिगाति दा॒शुषे॑। उ॒रू॒ची सोम॑पीतये॥

यहाँ भी श्लेषालङ्कार है। दूसरे मन्त्र में जिस वेदवाणी से परमेश्वर और भौतिक वायु के गुण प्रकाश किये हैं, उसका फल और प्राप्ति इस मन्त्र में प्रकाशित की है अर्थात् प्रथम अर्थ से वेदविद्या और दूसरे से जीवों की वाणी का फल और उसकी प्राप्ति का निमित्त प्रकाश किया है॥३॥

इन्द्र॑वायू इ॒मे सु॒ता उप॒ प्रयो॑भि॒रा ग॑तम्। इन्द॑वो वामु॒शन्ति॒ हि॥

इस मन्त्र में परमेश्वर ने प्राप्त होने योग्य और प्राप्त करानेवाले इन दो पदार्थों का प्रकाश किया है॥४॥

वाय॒विन्द्र॑श्च चेतथः सु॒तानां॑ वाजिनीवसू। तावा या॑त॒मुप॑ द्र॒वत्॥

यदि परमेश्वर इन सूर्यलोक और वायु को न बनावे, तो ये दोनों अपने कार्य को करने में कैसे समर्थ होवें॥५॥

वाय॒विन्द्र॑श्च सुन्व॒त आ या॑त॒मुप॑ निष्कृ॒तम्। म॒क्ष्वित्था धि॒या न॑रा॥

ब्रह्माण्डस्थ सूर्य्य और वायु सब संसारी पदार्थों को बाहर से तथा जीव और प्राण शरीर के भीतर के अङ्ग आदि को सब प्रकाश और पुष्ट करनेवाले हैं, परन्तु ईश्वर के आधार की अपेक्षा सब स्थानों में रहती है॥६॥

मि॒त्रं हु॑वे पू॒तद॑क्षं॒ वरु॑णं च रि॒शाद॑सम्। धियं॑ घृ॒ताचीं॒ साध॑न्ता॥

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। जैसे समुद्र आदि जलस्थलों से सूर्य्य के आकर्षण से वायु द्वारा जल आकाश में उड़कर वर्षा होने से सब की वृद्धि और रक्षा होती है, वैसे ही प्राण और अपान आदि ही से शरीर की रक्षा और वृद्धि होती है। इसलिये मनुष्यों को प्राण अपान आदि वायु के निमित्त से व्यवहार विद्या की सिद्धि करके सब के साथ उपकार करना उचित है॥७॥

ऋ॒तेन॑ मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा। क्रतुं॑ बृ॒हन्त॑माशाथे॥

परमेश्वर के आश्रय से उक्त मित्र और वरुण ब्रह्मज्ञान के बढ़ानेवाले, जल वर्षानेवाले, सब मूर्त्तिमान् वा अमूर्तिमान् जगत् को व्याप्त होकर उसकी वृद्धि विनाश और व्यवहारों की सिद्धि करने में हेतु होते हैं॥८॥

क॒वी नो॑ मि॒त्रावरु॑णा तुविजा॒ता उ॑रु॒क्षया॑। दक्षं॑ दधाते अ॒पस॑म्॥

जो ब्रह्माण्ड में रहनेवाले बल और कर्म के निमित्त पूर्वोक्त मित्र और वरुण हैं, उनसे क्रिया और विद्याओं की पुष्टि तथा धारणा होती है॥९॥

अश्वि॑ना॒ यज्व॑री॒रिषो॒ द्रव॑त्पाणी॒ शुभ॑स्पती। पुरु॑भुजा चन॒स्यत॑म्॥

इस मन्त्र में ईश्वर ने शिल्पविद्या को सिद्ध करने का उपदेश किया है, जिससे मनुष्य लोग कलायुक्त सवारियों को बनाकर संसार में अपना तथा अन्य लोगों के उपकार से सब सुख पावें॥१॥

अश्वि॑ना॒ पुरु॑दंससा॒ नरा॒ शवी॑रया धि॒या। धिष्ण्या॒ वन॑तं॒ गिरः॑॥

यहाँ भी अग्नि और जल के गुणों को प्रत्यक्ष दिखाने के लिये मध्यम पुरुष का प्रयोग है। इससे सब कारीगरों को चाहिये कि तीव्र वेग देनेवाली कारीगरी और अपने पुरुषार्थ से शिल्पविद्या की सिद्धि के लिये उक्त अश्वियों की अच्छी प्रकार से योजना करें। जो शिल्पविद्या को सिद्ध करने की इच्छा करते हैं, उन पुरुषों को चाहिये कि विद्या और हस्तक्रिया से उक्त अश्वियों को प्रसिद्ध कर के उन से उपयोग लेवें। सायणाचार्य्य आदि तथा विलसन आदि साहबों ने मध्यम पुरुष के विषय में निरुक्तकार के कहे हुए विशेष अभिप्राय को न जान कर इस मन्त्र के अर्थ का वर्णन अन्यथा किया है॥२॥

दस्रा॑ यु॒वाक॑वः सु॒ता नास॑त्या वृ॒क्तब॑र्हिषः। आ या॑तं रुद्रवर्तनी॥

परमेश्वर मनुष्यों को उपदेश करता है कि हे मनुष्य लोगो! तुमको सब सुखों की सिद्धि के लिये तथा दुःखों के विनाश के लिये शिल्पविद्या में अग्नि और जल का यथावत् उपयोग करना चाहिये॥३॥

इन्द्रा या॑हि चित्रभानो सु॒ता इ॒मे त्वा॒यवः॑। अण्वी॑भि॒स्तना॑ पू॒तासः॑॥

यहाँ श्लेषालङ्कार समझना। जो-जो इस मन्त्र में परमेश्वर और सूर्य्य के गुण और कर्म प्रकाशित किये गये हैं, इनसे परमार्थ और व्यवहार की सिद्धि के लिये अच्छी प्रकार उपयोग लेना सब मनुष्यों को योग्य है॥४॥

इन्द्रा या॑हि धि॒येषि॒तो विप्र॑जूतः सु॒ताव॑तः। उप॒ ब्रह्मा॑णि वा॒घतः॑॥

सब मनुष्यों को उचित है कि जो सब कार्य्यजगत् की उत्पत्ति करने में आदिकारण परमेश्वर है, उसको शुद्ध बुद्धि विज्ञान से साक्षात् करना चाहिये॥५॥

इन्द्रा या॑हि॒ तूतु॑जान॒ उप॒ ब्रह्मा॑णि हरिवः। सु॒ते द॑धिष्व न॒श्चनः॑॥

जो शरीरस्थ प्राण है, वह सब क्रिया का निमित्त होकर खाना पीना पकाना ग्रहण करना और त्यागना आदि क्रियाओं से कर्म का कराने तथा शरीर में रुधिर आदि धातुओं के विभागों को जगह-जगह में पहुँचानेवाला है, क्योंकि वही शरीर आदि की पुष्टि वृद्धि और नाश का हेतु है॥६॥

ओमा॑सश्चर्षणीधृतो॒ विश्वे॑ देवास॒ आग॑त। दा॒श्वांसो॑ दा॒शुषः॑ सु॒तम्॥

ईश्वर विद्वानों को आज्ञा देता है कि-तुम लोग एक जगह पाठशाला में अथवा इधर-उधर देशदेशान्तरों में भ्रमते हुए अज्ञानी पुरुषों को विद्यारूपी ज्ञान देके विद्वान् किया करो, कि जिससे सब मनुष्य लोग विद्या धर्म और श्रेष्ठ शिक्षायुक्त होके अच्छे-अच्छे कर्मों से युक्त होकर सदा सुखी रहें॥७॥

विश्वे॑ दे॒वासो॑ अ॒प्तुरः॑ सु॒तमाग॑न्त॒ तूर्ण॑यः। उ॒स्रा इ॑व॒ स्वस॑राणि॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है।

विश्वे॑ दे॒वासो॑ अ॒स्रिध॒ एहि॑मायासो अ॒द्रुहः॑। मेधं॑ जुषन्त॒ वह्न॑यः॥

ईश्वर आज्ञा देता है कि-हे विद्वान् लोगो! तुम दूसरे के विनाश और द्रोह से रहित तथा अच्छी विद्या से क्रियावाले होकर सब मनुष्यों को सदा विद्या से सुख देते रहो॥९॥

पा॒व॒का नः॒ सर॑स्वती॒ वाजे॑भिर्वा॒जिनी॑वती। य॒ज्ञं व॑ष्टु धि॒याव॑सुः॥

सब मनुष्यों को चाहिये कि वे ईश्वर की प्रार्थना और अपने पुरुषार्थ से सत्य विद्या और सत्य वचनयुक्त कामों में कुशल और सब के उपकार करनेवाली वाणी को प्राप्त रहें, यह ईश्वर का उपदेश है॥१०॥

चो॒द॒यि॒त्री सू॒नृता॑नां॒ चेत॑न्ती सुमती॒नाम्। य॒ज्ञं द॑धे॒ सर॑स्वती॥

जो आप्त अर्थात् पूर्ण विद्यायुक्त और छल आदि दोषरहित विद्वान् मनुष्यों की सत्य उपदेश करानेवाली यथार्थ वाणी है, वही सब मनुष्यों के सत्य ज्ञान होने के लिये योग्य होती है, अविद्वानों की नहीं॥११॥

म॒हो अर्णः॒ सर॑स्वती॒ प्र चे॑तयति के॒तुना॑। धियो॒ विश्वा॒ वि रा॑जति॥

इस मन्त्र में वाचकोपमेयलुप्तोपमालङ्कार दिखलाया है। जैसे वायु से तरङ्गयुक्त और सूर्य्य से प्रकाशित समुद्र अपने रत्न और तरङ्गों से युक्त होने के कारण बहुत उत्तम व्यवहार और रत्नादि की प्राप्ति में बड़ा भारी माना जाता है, वैसे ही जो आकाश और वेद का अनेक विद्यादि गुणवाला शब्दरूपी महासागर को प्रकाशित करानेवाली वेदवाणी का उपदेश है, वही साधारण मनुष्यों की यथार्थ बुद्धि का बढ़ानेवाला होता है॥१२॥दो सूक्तों की विद्या का प्रकाश करके इस तृतीय सूक्त से क्रियाओं का हेतु अश्विशब्द का अर्थ और उसके सिद्ध करनेवाले विद्वानों का लक्षण तथा विद्वान् होने का हेतु सरस्वती शब्द से सब विद्याप्राप्ति के निमित्त वाणी के प्रकाश करने से जान लेना चाहिये। दूसरे सूक्त के अर्थ के साथ तीसरे सूक्त के अर्थ की सङ्गति है। इस सूक्त का अर्थ सायणाचार्य्य आदि नवीन पण्डितों ने अशुद्ध प्रकार से वर्णन किया है। उनके व्याख्यानों में पहले सायणाचार्य्य का भ्रम दिखलाते हैं। उन्होंने सरस्वती शब्द के दो अर्थ माने हैं। एक अर्थ से देहवाली देवतारूप और दूसरे से नदीरूप सरस्वती मानी है। तथा उनने यह भी कहा है कि इस सूक्त में पहले दो मन्त्र से शरीरवाली देवरूप सरस्वती का प्रतिपादन किया है, और अब इस मन्त्र से नदीरूप सरस्वती का वर्णन करते हैं। जैसे यह अर्थ उन्होंने अपनी कपोलकल्पना से विपरीत लिखा है, इसी प्रकार अध्यापक विलसन की व्यर्थ कल्पना जाननी चाहिये। क्योंकि जो मनुष्य विद्या के बिना किसी ग्रन्थ की व्याख्या करने को प्रवृत्त होते हैं, उनकी प्रवृत्ति अन्धों के समान होती है॥

सूक्तम्

सु॒रू॒प॒कृ॒त्नुमू॒तये॑ सु॒दुघा॑मिव गो॒दुहे॑। जु॒हू॒मसि॒ द्यवि॑द्यवि॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे मनुष्य गाय के दूध को प्राप्त होके अपने प्रयोजन को सिद्ध करते हैं, वैसे ही विद्वान् धार्मिक पुरुष भी परमेश्वर की उपासना से श्रेष्ठ विद्या आदि गुणों को प्राप्त होकर अपने-अपने कार्य्यों को पूर्ण करते हैं॥१॥

उप॑ नः॒ सव॒ना ग॑हि॒ सोम॑स्य सोमपाः पिब। गो॒दा इद्रे॒वतो॒ मदः॑॥

जिस प्रकार सब जीव सूर्य्य के प्रकाश में अपने-अपने कर्म करने को प्रवृत्त होते हैं, उस प्रकार रात्रि में सुख से नहीं हो सकते॥२॥

अथा॑ ते॒ अन्त॑मानां वि॒द्याम॑ सुमती॒नाम्। मा नो॒ अति॑ ख्य॒ आ ग॑हि॥

जब मनुष्य लोग इन धार्मिक श्रेष्ठ विद्वानों के समागम से शिक्षा और विद्या को प्राप्त होते हैं, तभी पृथिवी से लेकर परमेश्वरपर्य्यन्त पदार्थों के ज्ञान द्वारा नाना प्रकार से सुखी होके फिर वे अन्तर्यामी ईश्वर के उपदेश को छोड़कर कभी इधर-उधर नहीं भ्रमते॥३॥

परे॑हि॒ विग्र॒मस्तृ॑त॒मिन्द्रं॑ पृच्छा विप॒श्चित॑म्। यस्ते॒ सखि॑भ्य॒ आ वर॑म्॥

सब मनुष्यों को यही योग्य है कि प्रथम सत्य का उपदेश करनेहारे वेद पढ़े हुए और परमेश्वर की उपासना करनेवाले विद्वानों को प्राप्त होकर अच्छी प्रकार उनके साथ प्रश्नोत्तर की रीति से अपनी सब शङ्का निवृत्त करें, किन्तु विद्याहीन मूर्ख मनुष्य का सङ्ग वा उनके दिये हुए उत्तरों में विश्वास कभी न करें॥४॥

उ॒त ब्रु॑वन्तु नो॒ निदो॒ निर॒न्यत॑श्चिदारत। दधा॑ना॒ इन्द्र॒ इद्दुवः॑॥

सब मनुष्यों को उचित है कि आप्त धार्मिक विद्वानों का सङ्ग कर और मूर्खों के सङ्ग को सर्वथा छोड़ के ऐसा पुरुषार्थ करना चाहिये कि जिससे सर्वत्र विद्या की वृद्धि, अविद्या की हानि, मानने योग्य श्रेष्ठ पुरुषों का सत्कार दुष्टों को दण्ड, ईश्वर की उपासना आदि शुभ कर्मों की वृद्धि और अशुभ कर्मों का विनाश नित्य होता रहे॥५॥

उ॒त नः॑ सु॒भगाँ॑ अ॒रिर्वो॒चेयु॑र्दस्म कृ॒ष्टयः॑। स्यामेदिन्द्र॑स्य॒ शर्म॑णि॥

जब सब मनुष्य विरोध को छोड़कर सब के उपकार करने में प्रयत्न करते हैं, तब शत्रु भी मित्र हो जाते हैं, जिससे सब मनुष्यों को ईश्वर की कृपा वा निरन्तर उत्तम आनन्द प्राप्त होते हैं॥६॥

एमा॒शुमा॒शवे॑ भर यज्ञ॒श्रियं॑ नृ॒माद॑नम्। प॒त॒यन्म॑न्द॒यत्स॑खम्॥

ईश्वर पुरुषार्थी मनुष्य पर कृपा करता है, आलस करनेवाले पर नहीं, क्योंकि जब तक मनुष्य ठीक-ठीक पुरुषार्थ नहीं करता तब तक ईश्वर की कृपा और अपने किये हुए कर्मों से प्राप्त हुए पदार्थों की रक्षा में समर्थ कभी नहीं हो सकता। इसलिये मनुष्यों को पुरुषार्थी होकर ही ईश्वर की कृपा के भागी होना चाहिये॥७॥

अ॒स्य पी॒त्वा श॑तक्रतो घ॒नो वृ॒त्राणा॑मभवः। प्रावो॒ वाजे॑षु वा॒जिन॑म्॥

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जो मनुष्य दुष्टों के साथ धर्मपूर्वक युद्ध करता है, उसी का ही विजय होता है और का नहीं। तथा परमेश्वर भी धर्मपूर्वक युद्ध करनेवाले मनुष्यों का ही सहाय करनेवाला होता है, औरों का नहीं॥८॥

तं त्वा॒ वाजे॑षु वा॒जिनं॑ वा॒जया॑मः शतक्रतो। धना॑नामिन्द्र सा॒तये॑॥

जो मनुष्य दुष्टों को युद्ध से निर्बल करता तथा जितेन्द्रिय वा विद्वान् होकर जगदीश्वर की आज्ञा का पालन करता है, वही उत्तम धन वा युद्ध में विजय को अर्थात् सब शत्रुओं को जीतनेवाला होता है॥९॥

यो रा॒यो॒३॒॑वनि॑र्म॒हान्त्सु॑पा॒रः सु॑न्व॒तः सखा॑। तस्मा॒ इन्द्रा॑य गायत॥

किसी मनुष्य को केवल परमेश्वर की स्तुतिमात्र ही करने से सन्तोष न करना चाहिये, किन्तु उसकी आज्ञा में रहकर और ऐसा समझ कर कि परमेश्वर मुझको सर्वत्र देखता, है, इसलिये अधर्म से निवृत्त होकर और परमेश्वर के सहाय की इच्छा करके मनुष्य को सदा उद्योग ही में वर्त्तमान रहना चाहिये॥१०॥इस सूक्त की कही हुई विद्या से, धर्मात्मा पुरुषों को परमेश्वर का ज्ञान सिद्ध करना तथा आत्मा और शरीर के स्थिर भाव, आरोग्य की प्राप्ति तथा दुष्टों के विजय और पुरुषार्थ से चक्रवर्त्ति राज्य को प्राप्त होना, इत्यादि अर्थ की तृतीय सूक्त में कहे अर्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये। आर्यावर्त्तवासी सायणाचार्य्य आदि विद्वान् तथा यूरोपखण्डवासी अध्यापक विलसन आदि साहबों ने इस सूक्त की भी व्याख्या ऐसी विरुद्ध की है कि यहाँ उसका लिखना व्यर्थ है॥

आ त्वेता॒ निषी॑द॒तेन्द्र॑म॒भि प्र गा॑यत। सखा॑यः॒ स्तोम॑वाहसः॥

जब तक मनुष्य हठ, छल और अभिमान को छोड़कर सत्य प्रीति के साथ परस्पर मित्रता करके परोपकार करने के लिये तन मन और धन से यत्न नहीं करते, तब तक उनके सुखों और विद्या आदि उत्तम गुणों की उन्नति कभी नहीं हो सकती॥१॥

पु॒रू॒तमं॑ पुरू॒णामीशा॑नं॒ वार्या॑णाम्। इन्द्रं॒ सोमे॒ सचा॑ सु॒ते॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। पीछे के मन्त्र से इस मन्त्र में ‘सखायः; तु; अभिप्रगायत’ इन तीन शब्दों को अर्थ के लिये लेना चाहिये। इस मन्त्र में यथायोग्य व्यवस्था करके उनके किये हुए कर्मों का फल देने से ईश्वर तथा इन कर्मों के फल भोग कराने के कारण वा विद्या और सब क्रियाओं के साधक होने से भौतिक अर्थात् संसारी वायु का ग्रहण किया है॥२॥

स घा॑ नो॒ योग॒ अ भु॑व॒त्स रा॒ये स पुरं॑ध्याम्। गम॒द्वाजे॑भि॒रा स नः॑॥

इस मन्त्र में भी श्लेषालङ्कार है। ईश्वर पुरुषार्थी मनुष्य का सहायकारी होता है, आलसी का नहीं, तथा स्पर्शवान् वायु भी पुरुषार्थ ही से कार्य्यसिद्धि का निमित्त होता है, क्योंकि किसी प्राणी को पुरुषार्थ के विना धन वा बुद्धि का और इन के विना उत्तम सुख का लाभ कभी नहीं हो सकता। इसलिये सब मनुष्यों को उद्योगी अर्थात् पुरुषार्थी आशावाले अवश्य होना चाहिये॥३॥

यस्य॑ सं॒स्थे न वृ॒ण्वते॒ हरी॑ स॒मत्सु॒ शत्र॑वः। तस्मा॒ इन्द्रा॑य गायत॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जब तक मनुष्य लोग परमेश्वर को अपने इष्ट देव समझनेवाले और बलवान् अर्थात् पुरुषार्थी नहीं होते, तब तक उनको दुष्ट शत्रुओं की निर्बलता करने को सामर्थ्य भी नहीं होता॥४॥

सु॒त॒पाव्ने॑ सु॒ता इ॒मे शुच॑यो यन्ति वी॒तये॑। सोमा॑सो॒ दध्या॑शिरः॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ईश्वर ने सब जीवों पर कृपा करके उनके कर्मों के अनुसार यथायोग्य फल देने के लिये सब कार्य्यरूप जगत् को रचा और पवित्र किया है, तथा पवित्र करने करानेवाले सूर्य्य और पवन को रचा है, उसी हेतु से सब जड़ पदार्थ वा जीव पवित्र होते हैं। परन्तु जो मनुष्य पवित्र गुणकर्मों के ग्रहण से पुरुषार्थी होकर संसारी पदार्थों से यथावत् उपयोग लेते तथा सब जीवों को उनके उपयोगी कराते हैं, वे ही मनुष्य पवित्र और सुखी होते हैं॥५॥

त्वं सु॒तस्य॑ पी॒तये॑ स॒द्यो वृ॒द्धो अ॑जायथाः। इन्द्र॒ ज्यैष्ठ्या॑य सुक्रतो॥

ईश्वर जीव के लिये उपदेश करता है कि-हे मनुष्य! तू जबतक विद्या में वृद्ध होकर अच्छी प्रकार परोपकार न करेगा, तब तक तुझको मनुष्यपन और सर्वोत्तम सुख की प्राप्ति कभी न होगी, इससे तू परोपकार करनेवाला सदा हो॥६॥

आ त्वा॑ विशन्त्वा॒शवः॒ सोमा॑स इन्द्र गिर्वणः। शं ते॑ सन्तु॒ प्रचे॑तसे॥

ईश्वर ऐसे मनुष्यों को आशीर्वाद देता है कि जो मनुष्य विद्वान् परोपकारी होकर अच्छी प्रकार नित्य उद्योग करके इन सब पदार्थों से उपकार ग्रहण करके सब प्राणियों को सुखयुक्त करता है, वही सदा सुख को प्राप्त होता है, अन्य कोई नहीं॥७॥

त्वां स्तोमा॑ अवीवृध॒न्त्वामु॒क्था श॑तक्रतो। त्वां व॑र्धन्तु नो॒ गिरः॑॥

जो विश्व में पृथिवी सूर्य्य आदि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रचे हुए पदार्थ हैं, वे सब जगत् की उत्पत्ति करनेवाले तथा धन्यवाद देने के योग्य परमेश्वर ही को प्रसिद्ध करके जनाते हैं, जिससे न्याय और उपकार आदि ईश्वर के गुणों को अच्छी प्रकार जानके विद्वान् भी वैसे ही कर्मों में प्रवृत्त हों॥८॥

अक्षि॑तोतिः सनेदि॒मं वाज॒मिन्द्रः॑ सह॒स्रिण॑म्। यस्मि॒न्विश्वा॑नि॒ पौंस्या॑॥

जिसकी सत्ता से संसार के पदार्थ बलवान् होकर अपने-अपने व्यवहारों में वर्त्तमान हैं, उन सब बल आदि गुणों से उपकार लेकर विश्व के नाना प्रकार के सुख भोगने के लिये हम लोग पूर्ण पुरुषार्थ करें, तथा ईश्वर इस प्रयोजन में हमारा सहाय करे, इसलिये हम लोग ऐसी प्रार्थना करते हैं॥९॥

मा नो॒ मर्ता॑ अ॒भिद्रु॑हन्त॒नूना॑मिन्द्र गिर्वणः। ईशा॑नो यवया व॒धम्॥

कोई मनुष्य अन्याय से किसी प्राणी को मारने की इच्छा न करे, किन्तु परस्पर मित्रभाव से वर्त्तें, क्योंकि जैसे परमेश्वर विना अपराध से किसी का तिरस्कार नहीं करता, वैसे ही सब मनुष्यों को भी करना चाहिये॥१०॥

यु॒ञ्जन्ति॑ ब्र॒ध्नम॑रु॒षं चर॑न्तं॒ परि॑त॒स्थुषः॑। रोच॑न्ते रोच॒ना दि॒वि॥

जो लोग विद्यासम्पादन में निरन्तर उद्योग करनेवाले होते हैं, वे ही सब सुखों को प्राप्त होते हैं। इसलिये विद्वान् को उचित है कि पृथिवी आदि पदार्थों से उपयोग लेकर सब प्राणियों को लाभ पहुँचावें कि जिससे उनको भी सम्पूर्ण सुख मिलें। जो यूरोपदेशवासी मोक्षमूलर साहब आदि ने इस मन्त्र का अर्थ घोड़े को रथ में जोड़ने का लिया है, सो ठीक नहीं। इसका खण्डन भूमिका में लिख दिया है, वहाँ देख लेना चाहिये॥१॥

यु॒ञ्जन्त्य॑स्य॒ काम्या॒ हरी॒ विप॑क्षसा॒ रथे॑। शोणा॑ धृ॒ष्णू नृ॒वाह॑सा॥

ईश्वर उपदेश करता है कि-मनुष्य लोग जब तक भू जल आदि पदार्थों के गुण ज्ञान और उनके उपकार से भू जल और आकाश में जाने आने के लिये अच्छी सवारियों को नहीं बनाते, तब तक उनको उत्तम राज्य और धन आदि उत्तम सुख नहीं मिल सकते। जरमन देश के रहनेवाले मोक्षमूलर साहब ने इस मन्त्र का विपरीत व्याख्यान किया है। सो यह है कि-‘अस्य’ सर्वनामवाची इस शब्द के निर्देश से स्पष्ट मालूम होता है कि इस मन्त्र में इन्द्र देवता का ग्रहण है, क्योंकि लाल रंग के घोड़े इन्द्र ही के हैं। और यहाँ सूर्य्य तथा उषा का ग्रहण नहीं, क्योंकि प्रथम मन्त्र में एक घोड़े का ही ग्रहण किया है। यह उनका अर्थ ठीक नहीं, क्योंकि ‘अस्य’ इस पद से भौतिक जो सूर्य्य और अग्नि हैं, इन्हीं दोनों का ग्रहण है, किसी देहधारी का नहीं। ‘हरी’ इस पद से सूर्य्य के धारण और आकर्षण गुणों का ग्रहण तथा ‘शोणा’ इस शब्द से अग्नि की लाल लपटों के ग्रहण होने से और पूर्व मन्त्र में एक अश्व का ग्रहण जाति के अभिप्राय से अर्थात् एकवचन से ब्रध्न जाति का ग्रहण होता है। और ‘अस्य’ यह शब्द प्रत्यक्ष अर्थ का वाची होने से सूर्य्यादि प्रत्यक्ष पदार्थों का ग्राहक होता है, इत्यादि हेतुओं से मोक्षमूलर साहब का अर्थ सच्चा नहीं॥२॥

के॒तुं कृ॒ण्वन्न॑के॒तवे॒ पेशो॑ मर्या अपे॒शसे॑। समु॒षद्भि॑रजायथाः॥

मनुष्यों को प्रति रात्रि के चौथे प्रहर में आलस्य छोड़कर फुरती से उठ कर अज्ञान और दरिद्रता के विनाश के लिये प्रयत्नवाले होकर तथा परमेश्वर के ज्ञान और संसारी पदार्थों से उपकार लेने के लिये उत्तम उपाय सदा करना चाहिये। ‘यद्यपि मर्य्याः इस पद से किसी का नाम नहीं मालूम होता, तो भी यह निश्चय करके जाना जाता है कि इस मन्त्र में इन्द्र का ही ग्रहण है कि-हे इन्द्र तू वहाँ प्रकाश करनेवाला है कि जहाँ पहिले प्रकाश नहीं था। ’ यह मोक्षमूलरजी का अर्थ असङ्गत है, क्योंकि ‘मर्य्याः’ यह शब्द मनुष्य के नामों में निघण्टु में पढ़ा है, तथा ‘अजायथाः’ यह प्रयोग पुरुषव्यत्यय से प्रथम पुरुष के स्थान में मध्यम पुरुष का प्रयोग किया है॥३॥

आदह॑ स्व॒धामनु॒ पुन॑र्गर्भ॒त्वमे॑रि॒रे। दधा॑ना॒ नाम॑ य॒ज्ञिय॑म्॥

जो जल सूर्य्य वा अग्नि के संयोग से छोटा-छोटा हो जाता है, उसको धारण कर और मेघ के आकार को बना के वायु ही उसे फिर-फिर वर्षाता है, उसी से सब का पालन और सब को सुख होता है। ‘इसके पीछे वायु अपने स्वभाव के अनुकूल बालक के स्वरूप में बन गये और अपना नाम पवित्र रख लिया। ’ देखिये मोक्षमूलर साहब का किया अर्थ मन्त्रार्थ से विरुद्ध है, क्योंकि इस मन्त्र में बालक बनना और अपना पवन नाम रखना, यह बात ही नहीं है। यहाँ इन्द्र नामवाले वायु का ही ग्रहण है, अन्य किसी का नहीं॥४॥

वी॒ळु चि॑दारुज॒त्नुभि॒र्गुहा॑ चिदिन्द्र॒ वह्नि॑भिः। अवि॑न्द उ॒स्रिया॒ अनु॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे बलवान् पवन अपने वेग से भारी-भारी दृढ वृक्षों को तोड़ फोड़ डालते और उनको ऊपर नीचे गिराते रहते हैं, वैसे ही सूर्य्य भी अपनी किरणों से उनका छेदन करता रहता है, इससे वे ऊपर नीचे गिरते रहते हैं। इसी प्रकार ईश्वर के नियम से सब पदार्थ उत्पत्ति और विनाश को भी प्राप्त होते रहते हैं।। ‘हे इन्द्र! तू शीघ्र चलनेवाले वायु के साथ अप्राप्त स्थान में रहनेवाली गौओं को प्राप्त हुआ। ’ यह भी मोक्षमूलर साहब की व्याख्या असङ्गत है, क्योंकि ‘उस्रा’ यह शब्द निघण्टु में रश्मि नाम में पढ़ा है, इससे सूर्य्य की किरणों का ही ग्रहण होना योग्य है। तथा ‘गुहा’ इस शब्द से सबको ढाँपनेवाला होने से अन्तरिक्ष का ग्रहण है॥५॥

दे॒व॒यन्तो॒ यथा॑ म॒तिमच्छा॑ वि॒दद्व॑सुं॒ गिरः॑। म॒हाम॑नूषत श्रु॒तम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को वायु के उत्तम गुणों का ज्ञान, सब का उपकार और विद्या की वृद्धि के लिये प्रयत्न सदा करना चाहिये, जिससे सब व्यवहार सिद्ध हों। ‘गान करनेवाले धर्मात्मा जो वायु हैं, उन्होंने इन्द्र को ऐसी वाणी सुनाई कि तू जीत जीत। ’ यह भी मोक्षमूलर का अर्थ अच्छा नहीं, क्योंकि ‘देवयन्तः’ इस शब्द का अर्थ यह है कि मनुष्य लोग अपने अन्तःकरण से विद्वानों के मिलने की इच्छा रखते हैं। इस अर्थ से मनुष्यों का ग्रहण होता है॥६॥

इन्द्रे॑ण॒ सं हि दृक्ष॑से संजग्मा॒नो अबि॑भ्युषा। म॒न्दू स॑मा॒नव॑र्चसा॥

ईश्वर ने जो अपनी व्याप्ति और सत्ता से सूर्य्य और वायु आदि पदार्थ उत्पन्न करके धारण किये हैं, इन सब पदार्थों के बीच में से सूर्य्य और वायु ये दोनों मुख्य हैं, क्योंकि इन्हीं के धारण आकर्षण और प्रकाश के योग से सब पदार्थ सुशोभित होते हैं। मनुष्यों को चाहिये कि उन्हें पदार्थविद्या से उपकार लेने के लिये युक्त करें। ‘यह बड़ा आश्चर्य्य है कि बहुवचन के स्थान में एकवचन का प्रयोग किया गया, तथा निरुक्तकार ने द्विवचन के स्थान में एकवचन का प्रयोग माना है, सो असङ्गत है। ’ यह भी मोक्षमूलर साहब की कल्पना ठीक नहीं, क्योंकि ‘व्यत्ययो ब०; सुप्तिङुपग्रह०’ व्याकरण के इस प्रमाण से वचनव्यत्यय होता है। तथा निरुक्तकार का व्याख्यान सत्य है, क्योंकि ‘सुपा सु०’ इस सूत्र से ‘मन्दू’ इस शब्द में द्विवचन को पूर्वसवर्ण दीर्घ एकादेश हो गया है॥७॥

अ॒न॒व॒द्यैर॒भिद्यु॑भिर्म॒खः सह॑स्वदर्चति। ग॒णैरिन्द्र॑स्य॒ काम्यैः॑॥

जो शुद्ध अत्युत्तम होम के योग्य पदार्थों के अग्नि में किये हुए होम से किया हुआ यज्ञ है, वह वायु और सूर्य्य की किरणों की शुद्धि के द्वारा रोगनाश करने के हेतु से सब जीवों को सुख देकर बलवान् करता है। ‘यहाँ मखशब्द से यज्ञ करनेवाले का ग्रहण है, तथा देवों के शत्रु का भी ग्रहण है। ’ यह भी मोक्षमूलर साहब का कहना ठीक नहीं, क्योंकि जो मखशब्द यज्ञ का वाची है, वह सूर्य्य की किरणों के सहित अच्छे-अच्छे वायु के गुणों से हवन किये हुए पदार्थों को सर्वत्र पहुँचाता है, तथा वायु और वृष्टिजल की शुद्धि का हेतु होने से सब प्राणियों को सुख देनेवाला होता है। और मख शब्द के उपमावाचक होने से देवों के शत्रु का भी ग्रहण नहीं॥८॥

अतः॑ परिज्म॒न्ना ग॑हि दि॒वो वा॑ रोच॒नादधि॑। सम॑स्मिन्नृञ्जते॒ गिरः॑॥

यह बलवान् वायु अपने गमन आमगन गुण से सब पदार्थों के गमन आगमन धारण तथा शब्दों के उच्चारण और श्रवण का हेतु है। इस मन्त्र में सायणाचार्य्य ने जो उणादिगण में सिद्ध ‘परिज्मन्’ शब्द था, उसे छोड़कर मनिन्प्रत्ययान्त कल्पना किया है, सो केवल उनकी भूल है। ‘हे इधर-उधर विचरनेवाले मनुष्यदेहधारी इन्द्र! तू आगे पीछे और ऊपर से हमारे समीप आ, यह सब गानेवालों की इच्छा है। ’ यह भी उन (मोक्षमूलर साहब) का अर्थ अत्यन्त विपरीत है, क्योंकि इस वायुसमूह में मनुष्यों की वाणी शब्दों के उच्चारणव्यवहार से प्रसिद्ध होने से प्राणरूप वायु का ग्रहण है॥९॥

इ॒तो वा॑ सा॒तिमीम॑हे दि॒वो वा॒ पार्थि॑वा॒दधि॑। इन्द्रं॑ म॒हो वा॒ रज॑सः॥

सूर्य्य की किरण पृथिवी में स्थित हुए जलादि पदार्थों को भिन्न-भिन्न करके बहुत छोटे-छोटे कर देती है, इसी से वे पदार्थ पवन के साथ ऊपर को चढ़ जाते हैं, क्योंकि वह सूर्य्य सब लोकों से बड़ा है। ‘हम लोग आकाश पृथिवी तथा बड़े आकाश से सहाय के लिये इन्द्र की प्रार्थना करते हैं, यह भी डाक्टर मोक्षमूलर साहब की व्याख्या अशुद्ध है, क्योंकि सूर्य्यलोक सब से बड़ा है, और उसका आना-जाना अपने स्थान को छोड़ के नहीं होता, ऐसा हम लोग जानते हैं॥१०॥सूर्य्य और पवन से जैसे पुरुषार्थ की सिद्धि करनी चाहिये तथा वे लोक जगत् में किस प्रकार से वर्त्तते रहते हैं और कैसे उनसे उपकारसिद्धि होती है, इन प्रयोजनों से पाँचवें सूक्त के अर्थ के साथ छठे सूक्तार्थ की सङ्गति जाननी चाहिये। और सायणाचार्य्य आदि तथा यूरोपदेशवासी अङ्गरेज विलसन आदि लोगों ने भी इस सूक्त के मन्त्रों के अर्थ बुरी चाल से वर्णन किये हैं।

इन्द्र॒मिद्गा॒थिनो॑ बृ॒हदिन्द्र॑म॒र्केभि॑र॒र्किणः॑। इन्द्रं॒ वाणी॑रनूषत॥

ईश्वर उपदेश करता है कि मनुष्यों को वेदमन्त्रों के विचार से परमेश्वर सूर्य्य और वायु आदि पदार्थों के गुणों को अच्छी प्रकार जानकर सब के सुख के लिये उनसे प्रयत्न के साथ उपकार लेना चाहिये॥१॥

इन्द्र॒ इद्धर्योः॒ सचा॒ संमि॑श्ल॒ आ व॑चो॒युजा॑। इन्द्रो॑ व॒ज्री हि॑र॒ण्ययः॑॥

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। जैसे वायु के संयोग से वचन, श्रवण आदि व्यवहार तथा सब पदार्थों के गमन, आगमन, धारण और स्पर्श होते हैं, वैसे ही सूर्य्य के योग से पदार्थों के प्रकाश और छेदन भी होते हैं। ‘संमिश्लः’ इस शब्द में सायणाचार्य्य ने लकार का होना छान्दस माना है, सो उनकी भूल है, क्योंकि ‘संज्ञाछन्द०’ इस वार्त्तिक से लकारादेश सिद्ध ही है॥२॥

इन्द्रो॑ दी॒र्घाय॒ चक्ष॑स॒ आ सूर्यं॑ रोहयद्दि॒वि। वि गोभि॒रद्रि॑मैरयत्॥

रचने की इच्छा करनेवाले ईश्वर ने सब लोकों में दर्शन, धारण और आकर्षण आदि प्रयोजनों के लिये प्रकाशरूप सूर्य्यलोक को सब लोकों के बीच में स्थापित किया है, इसी प्रकार यह हर एक ब्रह्माण्ड का नियम है कि वह क्षण-क्षण में जल को ऊपर खींच करके पवन के द्वारा ऊपर स्थापन करके वार-वार संसार में वर्षाता है, इसी से यह वर्षा का कारण है॥३॥

इन्द्र॒ वाजे॑षु नोऽव स॒हस्र॑प्रधनेषु च। उ॒ग्र उ॒ग्राभि॑रू॒तिभिः॑॥

परमेश्वर का यह स्वभाव है कि युद्ध करनेवाले धर्मात्मा पुरुषों पर अपनी कृपा करता है और आलसियों पर नहीं। इसी से जो मनुष्य जितेन्द्रिय विद्वान् पक्षपात को छोड़नेवाले शरीर और आत्मा के बल से अत्यन्त पुरुषार्थी तथा आलस्य को छोड़े हुए धर्म से बड़े-बड़े युद्धों को जीत के प्रजा को निरन्तर पालन करते हैं, वे ही महाभाग्य को प्राप्त होके सुखी रहते हैं॥४॥

इन्द्रं॑ व॒यं म॑हाध॒न इन्द्र॒मर्भे॑ हवामहे। युजं॑ वृ॒त्रेषु॑ व॒ज्रिण॑म्॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जो बड़े-बड़े भारी और छोटे-छोटे संग्रामों में ईश्वर को सर्वव्यापक और रक्षा करनेवाला मान के धर्म और उत्साह के साथ दुष्टों से युद्ध करें तो मनुष्य का अचल विजय होता है। तथा जैसे ईश्वर भी सूर्य्य और पवन के निमित्त से वर्षा आदि के द्वारा संसार का अत्यन्त सुख सिद्ध किया करता है, वैसे मनुष्य लोगों को भी पदार्थों को निमित्त करके कार्य्यसिद्धि करनी चाहिये॥५॥

स नो॑ वृषन्न॒मुं च॒रुं सत्रा॑दाव॒न्नपा॑वृधि। अ॒स्मभ्य॒मप्र॑तिष्कुतः॥

जो मनुष्य अपनी दृढ़ता से सत्यविद्या का अनुष्ठान और नियम से ईश्वर की आज्ञा का पालन करता है, उसके आत्मा में से अविद्यारूपी अन्धकार का नाश अन्तर्य्यामी परमेश्वर कर देता है, जिससे वह पुरुष धर्म और पुरुषार्थ को कभी नहीं छोड़ता॥६॥

तु॒ञ्जेतु॑ञ्जे॒ य उत्त॑रे॒ स्तोमा॒ इन्द्र॑स्य व॒ज्रिणः॑। न वि॑न्धे अस्य सुष्टु॒तिम्॥

ईश्वर ने इस संसार में प्राणियों के सुख के लिये इन पदार्थों में अपनी शक्ति से जितने दृष्टान्त वा उनमें जिस प्रकार की रचना और अलग-अलग उनके गुण तथा उनसे उपकार लेने के लिये रक्खे हैं, उन सबके जानने को मैं अल्पबुद्धि पुरुष होने से समर्थ कभी नहीं हो सकता और न कोई मनुष्य ईश्वर के गुणों की समाप्ति जानने को समर्थ है, क्योंकि जगदीश्वर अनन्त गुण और अनन्त सामर्थ्यवाला है, परन्तु मनुष्य उन पदार्थों से जितना उपकार लेने को समर्थ हों, उतना सब प्रकार से लेना चाहिये॥७॥

वृषा॑ यू॒थेव॒ वंस॑गः कृ॒ष्टीरि॑य॒र्त्योज॑सा। ईशा॑नो॒ अप्र॑तिष्कुतः॥

इस मन्त्र में उपमा और श्लेषालङ्कार है। मनुष्य ही परमेश्वर को प्राप्त हो सकते हैं, क्योंकि वे ज्ञान की वृद्धि करने के स्वभाववाले होते हैं। और धर्मात्मा ज्ञानवाले मनुष्यों का परमेश्वर को प्राप्त होने का स्वभाव है। तथा जो ईश्वर ने रचकर कक्षा में स्थापन किया हुआ सूर्य्य है, वह अपने सामने अर्थात् समीप के लोकों को चुम्बक पत्थर और लोहे के समान खींचने को समर्थ होता है॥८॥

य एक॑श्चर्षणी॒नां वसू॑नामिर॒ज्यति॑। इन्द्रः॒ पञ्च॑ क्षिती॒नाम्॥

जो सब का स्वामी अन्तर्यामी व्यापक और सब ऐश्वर्य्य का देनेवाला, जिसमें कोई दूसरा ईश्वर और जिसको किसी दूसरे की सहाय की इच्छा नहीं है, वही सब मनुष्यों को इष्ट बुद्धि से सेवा करने योग्य है। जो मनुष्य उस परमेश्वर को छोड़ के दूसरे को इष्ट देव मानता है, वह भाग्यहीन बड़े-बड़े घोर दुःखों को सदा प्राप्त होता है॥९॥

इन्द्रं॑ वो वि॒श्वत॒स्परि॒ हवा॑महे॒ जने॑भ्यः। अ॒स्माक॑मस्तु॒ केव॑लः॥

ईश्वर इस मन्त्र में सब मनुष्यों के हित के लिये उपदेश करता है-हे मनुष्यो! तुमको अत्यन्त उचित है कि मुझे छोड़कर उपासना करने योग्य किसी दूसरे देव को कभी मत मानो, क्योंकि एक मुझ को छोड़कर कोई दूसरा ईश्वर नहीं है। जब वेद में ऐसा उपदेश है तो जो मनुष्य अनेक ईश्वर वा उसके अवतार मानता है, वह सब से बड़ा मूढ़ है॥१०॥इस सप्तम सूक्त में जिस ईश्वर ने अपनी रचना के सिद्ध रहने के लिये अन्तरिक्ष में सूर्य्य और वायु स्थापन किये हैं, वही एक सर्वशक्तिमान् सर्वदोषरहित और सब मनुष्यों का पूज्य है। इस व्याख्यान से इस सप्तम सूक्त के अर्थ के साथ छठे सूक्त के अर्थ की सङ्गति जाननी चाहिये। इस सूक्त के मन्त्रों के अर्थ सायणाचार्य्य आदि आर्य्यावर्त्तवासियों और विलसन आदि अङ्गरेज लोगों ने भी उलटे किये हैं॥

सूक्तम्

एन्द्र॑ सान॒सिं र॒यिं स॒जित्वा॑नं सदा॒सह॑म्। वर्षि॑ष्ठमू॒तये॑ भर॥

सब मनुष्यों को सर्वशक्तिमान् अन्तर्यामी ईश्वर का आश्रय लेकर अपने पूर्ण पुरुषार्थ के साथ चक्रवर्त्ति राज्य के आनन्द को बढ़ानेवाली विद्या की उन्नति सुवर्ण आदि धन और सेना आदि बल सब प्रकार से रखना चाहिये, जिससे अपने आप को और सब प्राणियों को सुख हो॥१॥

नि येन॑ मुष्टिह॒त्यया॒ नि वृ॒त्रा रु॒णधा॑महै। त्वोता॑सो॒ न्यर्व॑ता॥

ईश्वर के सेवक मनुष्यों को उचित है कि अपने शरीर और बुद्धिबल को बहुत बढ़ावें, जिससे श्रेष्ठों का पालन और दुष्टों का अपमान सदा होता रहे, और जिससे शत्रुजन उनके मुष्टिप्रहार को न सह सकें, इधर-उधर छिपते-भागते फिरें॥२॥

इन्द्र॒ त्वोता॑स॒ आ व॒यं वज्रं॑ घ॒ना द॑दीमहि। जये॑म॒ सं यु॒धि स्पृधः॑॥

मनुष्यों को उचित है कि धर्म और ईश्वर के आश्रय से शरीर की पुष्टि और विद्या करके आत्मा का बल तथा युद्ध की पूर्ण सामग्री परस्पर अविरोध और उत्साह आदि श्रेष्ठ गुणों का ग्रहण करके दुष्ट शत्रुओं के पराजय करने से अपने और सब प्राणियों के लिये सुख सदा बढ़ाते रहें॥३॥

व॒यं शूरे॑भि॒रस्तृ॑भि॒रिन्द्र॒ त्वया॑ यु॒जा व॒यम्। सा॒स॒ह्याम॑ पृतन्य॒तः॥

शूरता दो प्रकार की होती है, एक तो शरीर की पुष्टि और दूसरी विद्या तथा धर्म से संयुक्त आत्मा की पुष्टि। इन दोनों से परमेश्वर की रचना के कर्मों को जानकर न्याय, धीरजपन, उत्तम स्वभाव और उद्योग आदि से उत्तम-उत्तम गुणों से युक्त होकर सभाप्रबन्ध के साथ राज्य का पालन और दुष्ट शत्रुओं का निरोध अर्थात् उनको सदा कायर करना चाहिये॥४॥

म॒हाँ इन्द्रः॑ प॒रश्च॒ नु म॑हि॒त्वम॑स्तु व॒ज्रिणे॑। द्यौर्न प्र॑थि॒ना शवः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। धार्मिक युद्ध करनेवाले मनुष्यों को उचित है कि जो शूरवीर युद्ध में अति धीर मनुष्यों के साथ होकर दुष्ट शत्रुओं पर अपना विजय हुआ है, उसका धन्यवाद अनन्त शक्तिमान् जगदीश्वर को देना चाहिये कि जिससे निरभिमान होकर मनुष्यों के राज्य की सदैव बढ़ती होती रहे॥५॥

स॒मो॒हे वा॒ य आश॑त॒ नर॑स्तो॒कस्य॒ सनि॑तौ। विप्रा॑सो वा धिया॒यवः॑॥

ईश्वर सब मनुष्यों को आज्ञा देता है कि-इस संसार में मनुष्यों को दो प्रकार का काम करना चाहिये। इनमें से जो विद्वान् हैं, वे अपने शरीर और सेना का बल बढ़ाते और दूसरे उत्तम विद्या की वृद्धि करके शत्रुओं के बल का सदैव तिरस्कार करते रहें। मनुष्यों को जब-जब शत्रुओं के साथ युद्ध करने की इच्छा हो, तब-तब सावधान होके प्रथम उनकी सेना आदि पदार्थों से कम से कम अपना दोगुना बल करके उनके पराजय से प्रजा की रक्षा करनी चाहिये। तथा जो विद्याओं के पढ़ाने की इच्छा करनेवाले हैं, वे शिक्षा देने योग्य पुत्र वा कन्याओं को यथायोग्य विद्वान् करने में अच्छे प्रकार यत्न करें, जिससे शत्रुओं के पराजय और अज्ञान के विनाश से चक्रवर्त्ति राज्य और विद्या की वृद्धि सदैव बनी रहे॥६॥

यः कु॒क्षिः सो॑म॒पात॑मः समु॒द्रइ॑व॒ पिन्व॑ते। उ॒र्वीरापो॒ न का॒कुदः॑॥

इस मन्त्र में दो उपमालङ्कार हैं। ईश्वर ने जैसे जल की स्थिति और वृष्टि का हेतु समुद्र तथा वाणी के व्यवहार का हेतु प्राण बनाया है, वैसे ही सूर्य्यलोक वर्षा होने, पृथिवी के खींचने, प्रकाश और रसविभाग करने का हेतु बनाया है, इसी से सब प्राणियों के अनेक व्यवहार सिद्ध होते हैं॥७॥

ए॒वा ह्य॑स्य सू॒नृता॑ विर॒प्शी गोम॑ती म॒ही। प॒क्वा शाखा॒ न दा॒शुषे॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे विविध प्रकार से फलफूलों से युक्त आम और कटहर आदि वृक्ष नाना प्रकार के फलों के देनेवाले होके सुख देनेहारे होते हैं, वैसे ही ईश्वर से प्रकाश की हुई वेदवाणी बहुत प्रकार की विद्याओं को देनेहारी होकर सब मनुष्यों को परम आनन्द देनेवाली है। जो विद्वान् लोग इसको पढ़ के धर्मात्मा होते हैं, वे ही वेदों का प्रकाश और पृथिवी में राज्य करने को समर्थ होते हैं॥८॥

ए॒वा हि ते॒ विभू॑तय ऊ॒तय॑ इन्द्र॒ माव॑ते। स॒द्यश्चि॒त्सन्ति॑ दा॒शुषे॑॥

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। ईश्वर की आज्ञा का प्रकाश इस रीति से किया है कि-जब मनुष्य पुरुषार्थी होके सब को उपकार करनेवाले और धार्मिक होते हैं, तभी वे पूर्ण ऐश्वर्य्य और ईश्वर की यथायोग्य रक्षा आदि को प्राप्त होके सर्वत्र सत्कार के योग्य होते हैं॥९॥

ए॒वा ह्य॑स्य॒ काम्या॒ स्तोम॑ उ॒क्थं च॒ शंस्या॑। इन्द्रा॑य॒ सोम॑पीतये॥

जैसे इस संसार में अच्छे-अच्छे पदार्थों की रचनाविशेष देखकर उस रचनेवाले की प्रशंसा होती है, वैसे ही संसार के प्रसिद्ध और अप्रसिद्ध अत्युत्तम पदार्थों तथा विशेष रचना को देखकर ईश्वर को ही धन्यवाद दिये जाते हैं। इस कारण से परमेश्वर की स्तुति के समान वा उस से अधिक किसी की स्तुति नहीं हो सकती॥१०॥इस प्रकार जो मनुष्य ईश्वर की उपासना और वेदोक्त कर्मों के करनेवाले हैं, वे ईश्वर के आश्रित होके वेदविद्या से आत्मा के सुख और उत्तम क्रियाओं से शरीर के सुख को प्राप्त होते हैं, वे परमेश्वर ही की प्रशंसा करते रहें। इस अभिप्राय से इस आठवें सूक्त के अर्थ की पूर्वोक्त सातवें सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये। इस सूक्त के मन्त्रों के भी अर्थ सायणाचार्य्य आदि और यूरोपदेशवासी अध्यापक विलसन आदि अङ्गरेज लोगों ने उलटे वर्णन किये हैं॥

इन्द्रेहि॒ मत्स्यन्ध॑सो॒ विश्वे॑भिः सोम॒पर्व॑भिः। म॒हाँ अ॑भि॒ष्टिरोज॑सा॥

इस मन्त्र में श्लेष और लुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे ईश्वर इस संसार के परमाणु-परमाणु में व्याप्त होकर सब की रक्षा निरन्तर करता है, वैसे ही सूर्य्य भी सब लोकों से बड़ा होने से अपने सन्मुख हुए पदार्थों को आकर्षण वा प्रकाश करके अच्छे प्रकार स्थापन करता है॥१॥

एमे॑नं सृजता सु॒ते म॒न्दिमिन्द्रा॑य म॒न्दिने॑। चक्रिं॒ विश्वा॑नि॒ चक्र॑ये॥

विद्वानों को उचित है कि इस संसार में पृथिवी से लेके ईश्वरपर्य्यन्त पदार्थों के विशेषज्ञान उत्तम शिल्प विद्या से सब मनुष्यों को उत्तम-उत्तम क्रिया सिखाकर सब सुखों का प्रकाश करना चाहिये॥२॥

मत्स्वा॑ सुशिप्र म॒न्दिभिः॒ स्तोमे॑भिर्विश्वचर्षणे। सचै॒षु सव॑ने॒ष्वा॥

जिसने संसार के प्रकाश करनेवाले सूर्य्य को उत्पन्न किया है, उसकी स्तुति करने में जो श्रेष्ठ पुरुष एकाग्रचित्त हैं, अथवा सबको देखनेवाले परमेश्वर को जानकर सब प्रकार से धार्मिक और पुरुषार्थी होकर सब ऐश्वर्य्य को उत्पन्न और उस की रक्षा करने में मिलकर रहते हैं, वे ही सब सुखों को प्राप्त होने के योग्य वा औरों को भी उत्तम-उत्तम सुखों के देनेवाले हो सकते हैं॥३॥

असृ॑ग्रमिन्द्र ते॒ गिरः॒ प्रति॒ त्वामुद॑हासत। अजो॑षा वृष॒भं पति॑म्॥

जिस ईश्वर ने प्रकाश किये हुए वेदों से जैसे अपने-अपने स्वभाव गुण और कर्म प्रकट किये हैं, वैसे ही वे सब लोगों को जानने योग्य हैं, क्योंकि ईश्वर के सत्य स्वभाव के साथ अनन्तगुण और कर्म हैं, उनको हम अल्पज्ञ लोग अपने सामर्थ्य से जानने को समर्थ नहीं हो सकते। तथा जैसे हम लोग अपने-अपने स्वभाव गुण और कर्मों को जानते हैं, वैसे औरों को उनका यथावत् जानना कठिन होता है, इसी प्रकार सब विद्वान् मनुष्यों को वेदवाणी के विना ईश्वर आदि पदार्थों को यथावत् जानना कठिन है। इसलिये प्रयत्न से वेदों को जान के उन के द्वारा सब पदार्थों से उपकार लेना तथा उसी ईश्वर को अपना इष्टदेव और पालन करनेहारा मानना चाहिये॥४॥

सं चो॑दय चि॒त्रम॒र्वाग्राध॑ इन्द्र॒ वरे॑ण्यम्। अस॒दित्ते॑ वि॒भु प्र॒भु॥

मनुष्यों को ईश्वर के अनुग्रह और अपने पुरुषार्थ से आत्मा और शरीर के सुख के लिये विद्या और ऐश्वर्य्य की प्राप्ति वा उनकी रक्षा और उन्नति तथा सत्यमार्ग वा उत्तम दानादि धर्म अच्छी प्रकार से सदैव सेवन करना चाहिये, जिससे दारिद्र्य और आलस्य से उत्पन्न होनेवाले दुःखों का नाश होकर अच्छे-अच्छे भोग करने योग्य पदार्थों की वृद्धि होती रहे॥५॥

अ॒स्मान्त्सु तत्र॑ चोद॒येन्द्र॑ रा॒ये रभ॑स्वतः। तुवि॑द्युम्न॒ यश॑स्वतः॥

सब मनुष्यों को उचित है कि इस सृष्टि में परमेश्वर की आज्ञा के अनुकूल वर्तमान तथा पुरुषार्थी और यशस्वी होकर विद्या तथा राज्यलक्ष्मी की प्राप्ति के लिये सदैव उपाय करें। इसी से उक्त गुणवाले पुरुषों ही को लक्ष्मी से सब प्रकार का सुख मिलता है, क्योंकि ईश्वर ने पुरुषार्थी सज्जनों ही के लिये सुख रचे हैं॥६॥

सं गोम॑दिन्द्र॒ वाज॑वद॒स्मे पृ॒थु श्रवो॑ बृ॒हत्। वि॒श्वायु॑र्धे॒ह्यक्षि॑तम्॥

मनुष्यों को चाहिये कि ब्रह्मचर्य्य का धारण, विषयों की लम्पटता का त्याग, भोजन आदि व्यवहारों के श्रेष्ठ नियमों से विद्या और चक्रवर्त्ति राज्य की लक्ष्मी को सिद्ध करके सम्पूर्ण आयु भोगने के लिये पूर्वोक्त धन के जोड़ने की इच्छा अपने पुरुषार्थ द्वारा करें, कि जिससे इस संसार का वा परमार्थ का दृढ़ और विशाल अर्थात् अतिश्रेष्ठ सुख सदैव बना रहे, परन्तु यह उक्त सुख केवल ईश्वर की प्रार्थना से ही नहीं मिल सकता, किन्तु उसकी प्राप्ति के लिये पूर्ण पुरुषार्थ भी करना अवश्य उचित है॥७॥

अ॒स्मे धे॑हि॒ श्रवो॑ बृ॒हद्द्यु॒म्नं स॑हस्र॒सात॑मम्। इन्द्र॒ ता र॒थिनी॒रिषः॑॥

हे जगदीश्वर! आप कृपा करके जो अत्यन्त पुरुषार्थ के साथ जिस धन कर के बहुत से सुखों को सिद्ध करनेवाली सेना प्राप्त होती है, उसको हम लोगों में नित्य स्थापन कीजिये॥८॥

वसो॒रिन्द्रं॒ वसु॑पतिं गी॒र्भिर्गृ॒णन्त॑ ऋ॒ग्मिय॑म्। होम॒ गन्ता॑रमू॒तये॑॥

सब मनुष्यों को उचित है कि जो ईश्वरपन का निमित्त, संसार का स्वामी, सर्वत्र व्यापक इन्द्र परमेश्वर है, उसकी प्रार्थना और ईश्वर के न्याय आदि गुणों की प्रशंसा पुरुषार्थ के साथ सब प्रकार से अतिश्रेष्ठ विद्या राज्यलक्ष्मी आदि पदार्थों को प्राप्त होकर उनकी उन्नति और रक्षा सदा करें॥९॥

सु॒तेसु॑ते॒ न्यो॑कसे बृ॒हद्बृ॑ह॒त एद॒रिः। इन्द्रा॑य शू॒षम॑र्चति॥

जब शत्रु भी मनुष्य सब में व्यापक मङ्गलमय उपमारहित परमेश्वर के प्रति नम्र होता है, तो जो ईश्वर की आज्ञा और उसकी उपासना में वर्त्तमान मनुष्य हैं, वे ईश्वर के लिये नम्र क्यों न हों? जो ऐसे हैं, वे ही बड़े-बड़े गुणों से महात्मा होकर सब से सत्कार किये जाने के योग्य होते, और वे ही विद्या और चक्रवर्त्ति राज्य के आनन्द को प्राप्त होते हैं। जो कि उनसे विपरीत हैं, वे उस आनन्द को कभी नहीं प्राप्त हो सकते॥१०॥इस सूक्त में इन्द्र शब्द के अर्थ के वर्णन, उत्तम-उत्तम धन आदि की प्राप्ति के अर्थ ईश्वर की प्रार्थना और अपने पुरुषार्थ करने की आज्ञा के प्रतिपादन करने से इस नवमे सूक्त के अर्थ की सङ्गति आठवें सूक्त के अर्थ के साथ मिलती है, ऐसा समझना चाहिये। इस सूक्त का भी अर्थ सायणाचार्य्य आदि आर्य्यावर्त्तवासियों तथा विलसन आदि अङ्गरेज लोगों ने सर्वथा मूल से विरुद्ध वर्णन किया है॥

गाय॑न्ति त्वा गाय॒त्रिणोऽर्च॑न्त्य॒र्कम॒र्किणः॑। ब्र॒ह्माण॑स्त्वा शतक्रत॒ उद्वं॒शमि॑व येमिरे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सब मनुष्यों को परमेश्वर ही की पूजा करनी चाहिये अर्थात् उसकी आज्ञा के अनुकूल वेदविद्या को पढ़कर अच्छे-अच्छे गुणों के साथ अपने और अन्यों के वंश को भी पुरुषार्थी करते हैं, वैसे ही अपने आप को भी होना चाहिये। और जो परमेश्वर के सिवाय दूसरे का पूजन करनेवाला पुरुष है, वह कभी उत्तम फल को प्राप्त होने योग्य नहीं हो सकता, क्योंकि न तो ईश्वर की ऐसी आज्ञा ही है, और न ईश्वर के समान कोई दूसरा पदार्थ है कि जिसका उसके स्थान में पूजन किया जावे। इससे सब मनुष्यों को उचित है कि परमेश्वर ही का गान और पूजन करें॥१॥

यत्सानोः॒ सानु॒मारु॑ह॒द्भूर्यस्प॑ष्ट॒ कर्त्व॑म्। तदिन्द्रो॒ अर्थं॑ चेतति यू॒थेन॑ वृ॒ष्णिरे॑जति॥

इस मन्त्र में भी ‘इव’ शब्द की अनुवृत्ति से उपमालङ्कार समझना चाहिये। जैसे सूर्य्य अपने सम्मुख के पदार्थों को वायु के साथ वारंवार क्रम से अच्छी प्रकार आक्रमण, आकर्षण और प्रकाश करके सब पृथिव्यादि लोकों को घुमाता है, वैसे ही जो मनुष्य विद्या से करने योग्य अनेक कर्मों को सिद्ध करने के लिये प्रवृत्त होता है, वही अनेक क्रियाओं से सब कार्य्यों के करने को समर्थ हो सकता तथा ईश्वर की सृष्टि में अनेक सुखों को प्राप्त होता, और उसी मनुष्य को ईश्वर भी अपनी कृपादृष्टि से देखता है, आलसी को नहीं॥२॥

यु॒क्ष्वा हि के॒शिना॒ हरी॒ वृष॑णा कक्ष्य॒प्रा। अथा॑ न इन्द्र सोमपा गि॒रामुप॑श्रुतिं चर॥

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। सब मनुष्यों को सब विद्या पढ़ने के पीछे उत्तम क्रियाओं की कुशलता में प्रवृत्त होना चाहिये। जैसे सूर्य्य का उत्तम प्रकाश संसार में वर्त्तमान है, वैसे ही ईश्वर के गुण और विद्या के प्रकाश का सब में उपयोग करना चाहिये॥३॥

एहि॒ स्तोमाँ॑ अ॒भिस्व॑रा॒भि गृ॑णी॒ह्या रु॑व। ब्रह्म॑ च नो वसो॒ सचेन्द्र॑ य॒ज्ञं च॑ वर्धय॥

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। जो पुरुष वेदविद्या वा सत्य के संयोग से परमेश्वर की स्तुति प्रार्थना और उपासना करते हैं, उनके हृदय में ईश्वर अन्तर्यामि रूप से वेदमन्त्रों के अर्थों को यथावत् प्रकाश करके निरन्तर उनके लिये सुख का प्रकाश करता है, इससे उन पुरुषों में विद्या और पुरुषार्थ कभी नष्ट नहीं होते॥४॥

उ॒क्थमिन्द्रा॑य॒ शंस्यं॒ वर्ध॑नं पुरुनि॒ष्षिधे॑। श॒क्रो यथा॑ सु॒तेषु॑ णो रा॒रण॑त्स॒ख्येषु॑ च॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। इस संसार में जो-जो शोभायुक्त रचना प्रशंसा और धन्यवाद हैं, वे सब परमेश्वर ही की अनन्त शक्ति का प्रकाश करते हैं, क्योंकि जैसे सिद्ध किये हुए पदार्थों में प्रशंसायुक्त रचना के अनेक गुण उन पदार्थों के रचनेवाले की ही प्रशंसा के हेतु हैं, वैसे ही परमेश्वर की प्रशंसा जनाने वा प्रार्थना के लिये हैं। इस कारण जो-जो पदार्थ हम ईश्वर से प्रार्थना के साथ चाहते हैं, सो-सो हमारे अत्यन्त पुरुषार्थ के द्वारा ही प्राप्त होने योग्य हैं, केवल प्रार्थनामात्र से नहीं॥५॥

तमित्स॑खि॒त्व ई॑महे॒ तं रा॒ये तं सु॒वीर्ये॑। स श॒क्र उ॒त नः॑ शक॒दिन्द्रो॒ वसु॒ दय॑मानः॥

सब मनुष्यों को उचित है कि सब सुख और शुभगुणों की प्राप्ति के लिये परमेश्वर ही की प्रार्थना करें, क्योंकि वह अद्वितीय सर्वमित्र परमैश्वर्य्यवाला अनन्त शक्तिमान् ही उक्त पदार्थों के देने में सामर्थ्यवाला है॥६॥

सु॒वि॒वृतं॑ सुनि॒रज॒मिन्द्र॒ त्वादा॑त॒मिद्यशः॑। गवा॒मप॑ व्र॒जं वृ॑धि कृणु॒ष्व राधो॑ अद्रिवः॥

इस मन्त्र में श्लेष और लुप्तोपमालङ्कार हैं। हे परमेश्वर! जैसे आपने सूर्य्यादि जगत् को उत्पन्न करके अपना यश और संसार का सुख प्रसिद्ध किया है, वैसे ही आप की कृपा से हम लोग भी अपने मन आदि इन्द्रियों को शुद्धि के साथ विद्या और धर्म के प्रकाश से युक्त तथा सुखपूर्वक सिद्ध और अपनी कीर्ति, विद्याधन और चक्रवर्त्ति राज्य का प्रकाश करके सब मनुष्यों को निरन्तर आनन्दित और कीर्तिमान् करें॥७॥

न॒हि त्वा॒ रोद॑सी उ॒भे ऋ॑घा॒यमा॑ण॒मिन्व॑तः। जेषः॒ स्व॑र्वतीर॒पः सं गा अ॒स्मभ्यं॑ धूनुहि॥

जब कोई पूछे कि ईश्वर कितना बड़ा है, तो उत्तर यह है कि जिसको सब आकाश आदि बड़े-बड़े पदार्थ भी घेर में नहीं ला सकते, क्योंकि वह अनन्त है। इससे सब मनुष्यों को उचित है कि उसी परमात्मा का सेवन उत्तम-उत्तम कर्म करने और श्रेष्ठ पदार्थों की प्राप्ति के लिये उसी की प्रार्थना करते रहें। जब जिसके गुण और कर्मों की गणना कोई नहीं कर सकता, तो कोई उसके अन्त पाने को समर्थ कैसे हो सकता है?॥८॥

आश्रु॑त्कर्ण श्रु॒धी हवं॒ नूचि॑द्दधिष्व मे॒ गिरः॑। इन्द्र॒ स्तोम॑मि॒मं मम॑ कृ॒ष्वा यु॒जश्चि॒दन्त॑रम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को उचित है कि जो सर्वज्ञ जीवों के किये हुए वाणी के व्यवहारों का यथावत् श्रवण करनेहारा सर्वाधार अन्तर्यामी जीव और अन्तःकरण का यथावत् शुद्धि हेतु तथा सब का मित्र ईश्वर है, वही एक जानने वा प्रार्थना करने योग्य है॥९॥

वि॒द्मा हि त्वा॒ वृष॑न्तमं॒ वाजे॑षु हवन॒श्रुत॑म्। वृष॑न्तमस्य हूमह ऊ॒तिं स॑हस्र॒सात॑माम्॥

मनुष्यों को सब कामों की सिद्धि देने और युद्ध में शत्रुओं के विजय के हेतु परमेश्वर ही देनेवाला है, जिसने इस संसार में सब प्राणियों के सुख के लिये असंख्यात पदार्थ उत्पन्न वा रक्षित किये हैं, तथा उस परमेश्वर वा उस की आज्ञा का आश्रय करके सर्वथा उपाय के साथ अपना वा सब मनुष्यों का सब प्रकार से सुख सिद्ध करना चाहिये॥१०॥

आ तू न॑ इन्द्र कौशिक मन्दसा॒नः सु॒तं पि॑ब। नव्य॒मायुः॒ प्र सू ति॑र कृ॒धी स॑हस्र॒सामृषि॑म्॥

जो मनुष्य अपने प्रेम से विद्या का उपदेश करनेवाला होकर अर्थात् जीवों के लिये सब विद्याओं का प्रकाश सर्वदा शुद्ध परमेश्वर की स्तुति के साथ आश्रय करते हैं, वे सुख और विद्यायुक्त पूर्ण आयु तथा ऋषि भाव को प्राप्त होकर सब विद्या चाहनेवाले मनुष्यों को प्रेम के साथ उत्तम-उत्तम विद्या से विद्वान् करते हैं॥११॥

परि॑ त्वा गिर्वणो॒ गिर॑ इ॒मा भ॑वन्तु वि॒श्वतः॑। वृ॒द्धायु॒मनु॒ वृद्ध॑यो॒ जुष्टा॑ भवन्तु॒ जुष्ट॑यः॥

हे भगवन् परमेश्वर! जो-जो अत्युत्तम प्रशंसा है, सो-सो आपकी ही है, तथा जो-जो सुख और आनन्द की वृद्धि होती है, सो-सो आप ही का सेवन करके विशेष वृद्धि को प्राप्त होती है। इस कारण जो मनुष्य ईश्वर तथा सृष्टि के गुणों का अनुभव करते हैं, वे ही प्रसन्न और विद्या की वृद्धि को प्राप्त होकर संसार में पूज्य होते हैं॥१२॥इस मन्त्र में सायणाचार्य्य ने ‘परिभवन्तु’ इस पद का अर्थ यह किया है कि- ‘सब जगह से प्राप्त हों,’ यह व्याकरण आदि शास्त्रों से अशुद्ध है, क्योंकि ‘परौ भुवोऽवज्ञाने’ व्याकरण के इस सूत्र से परिपूर्वक ‘भू’ धातु का अर्थ तिरस्कार अर्थात् अपमान करना होता है। आर्य्यावर्त्तवासी सायणाचार्य्य आदि तथा यूरोपखण्ड देशवासी साहबों ने इस दशवें सूक्त के अर्थ का अनर्थ किया है। जो लोग क्रम से विद्या आदि शुभगुणों को ग्रहण और ईश्वर की प्रार्थना करके अपने उत्तम पुरुषार्थ का आश्रय लेकर परमेश्वर की प्रशंसा और धन्यवाद करते हैं, वे ही अविद्या आदि दुष्टों गुणों की निवृत्ति से शत्रुओं को जीत कर तथा अधिक अवस्थावाले और विद्वान् होकर सब मनुष्यों को सुख उत्पन्न करके सदा आनन्द में रहते हैं। इस अर्थ से इस दशम सूक्त की सङ्गति नवम सूक्त के साथ जाननी चाहिये॥

इन्द्रं॒ विश्वा॑ अवीवृधन्त्समु॒द्रव्य॑चसं॒ गिरः॑। र॒थीत॑मं र॒थीनां॒ वाजा॑नां॒ सत्प॑तिं॒ पति॑म्॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। सब वेदवाणी परमैश्वयर्युक्त, सब में रहने, सब जगह रमण करने, सत्य स्वभाव, तथा धर्मात्मा सज्जनों को विजय देनेवाले परमेश्वर और धर्म वा बल से दुष्ट मनुष्यों को जीतने तथा धर्मात्मा वा सज्जन पुरुषों की रक्षा करनेवाले मनुष्य का प्रकाश करती हैं। इस प्रकार परमेश्वर वेदवाणी से सब मनुष्यों को आज्ञा देता है॥१॥

स॒ख्ये त॑ इन्द्र वा॒जिनो॒ मा भे॑म शवसस्पते। त्वाम॒भि प्रणो॑नुमो॒ जेता॑र॒मप॑राजितम्॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जो मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा के पालने वा अपने धर्मानुष्ठान से परमात्मा तथा शूरवीर आदि मनुष्यों में मित्रभाव अर्थात् प्रीति रखते हैं, वे बलवाले होकर किसी मनुष्य से पराजय वा भय को प्राप्त कभी नहीं होते॥२॥

पू॒र्वीरिन्द्र॑स्य रा॒तयो॒ न वि द॑स्यन्त्यू॒तयः॑। यदी॒ वाज॑स्य॒ गोम॑तः स्तो॒तृभ्यो॒ मंह॑ते म॒घम्॥

इस मन्त्र में भी श्लेषालङ्कार है। जैसे ईश्वर वा राजा की इस संसार में दान और रक्षा निश्चल न्याययुक्त होती हैं, वैसे अन्य मनुष्यों को भी प्रजा के बीच में विद्या और निर्भयता का निरन्तर विस्तार करना चाहिये। जो ईश्वर न होता तो यह जगत् कैसे उत्पन्न होता? तथा जो ईश्वर सब पदार्थों को उत्पन्न करके सब मनुष्यों के लिये नहीं देता तो मनुष्य लोग कैसे जी सकते? इससे सब कार्य्यों का उत्पन्न करने और सब सुखों का देनेवाला ईश्वर ही है, अन्य कोई नहीं, यह बात सब को माननी चाहिये॥३॥

पु॒रां भि॒न्दुर्युवा॑ क॒विरमि॑तौजा अजायत। इन्द्रो॒ विश्व॑स्य॒ कर्म॑णो ध॒र्ता व॒ज्री पु॑रुष्टु॒तः॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जैसे ईश्वर का रचा और धारण किया हुआ यह सूर्य्यलोक अपने वज्ररूपी किरणों से सब मूर्तिमान् पदार्थों को अलग-अलग करने तथा बहुत से गुणों का हेतु और अपने आकर्षणरूप गुण से पृथिवी आदि लोकों का धारण करनेवाला है, वैसे ही सेनापति को उचित है कि शत्रुओं के बल का छेदन साम, दाम और दण्ड से शत्रुओं को छिन्न-भिन्न करके बहुत उत्तम गुणों को ग्रहण करता हुआ भूमि में अपने राज्य का पालन करे॥४॥

त्वं व॒लस्य॒ गोम॒तोऽपा॑वरद्रिवो॒ बिल॑म्। त्वां दे॒वा अबि॑भ्युषस्तु॒ज्यमा॑नास आविषुः॥

जैसे सूर्य्यलोक अपनी किरणों से मेघ के कठिन-कठिन बद्दलों को छिन्न-भिन्न करके भूमि पर गिराता हुआ जल की वर्षा करता है, क्योंकि यह मेघ उसकी किरणों में ही स्थित रहता, तथा इसके चारों ओर आकर्षण अर्थात् खींचने के गुणों से पृथिवी आदि लोक अपनी-अपनी कक्षा में उत्तम-उत्तम नियम से घूमते हैं, इसी से समय के विभाग जो उत्तरायण, दक्षिणायन तथा ऋतु, मास, पक्ष, दिन, घड़ी, पल आदि हो जाते हैं, वैसे ही गुणवाला सेनापति होना उचित है॥५॥

तवा॒हं शू॑र रा॒तिभिः॒ प्रत्या॑यं॒ सिन्धु॑मा॒वद॑न्। उपा॑तिष्ठन्त गिर्वणो वि॒दुष्टे॒ तस्य॑ का॒रवः॑॥

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। ईश्वर सब मनुष्यों को आज्ञा देता है कि-जैसे मनुष्यों को धार्मिक शूर प्रशंसनीय सभाध्यक्ष वा सेनापति मनुष्यों के अभयदान से निर्भयता को प्राप्त होकर जैसे समुद्र के गुणों को जानते हैं, वैसे ही उक्त पुरुष के आश्रय से अच्छी प्रकार जानकर उनको प्रसिद्ध करना चाहिये तथा दुःखों के निवारण से सब सुखों के लिये परस्पर विचार भी करना चाहिये॥६॥

मा॒याभि॑रिन्द्र मा॒यिनं॒ त्वं शुष्ण॒मवा॑तिरः। वि॒दुष्टे॒ तस्य॒ मेधि॑रा॒स्तेषां॒ श्रवां॒स्युत्ति॑र॥

बुद्धिमान् मनुष्यों को ईश्वर आज्ञा देता है कि-साम, दाम, दण्ड और भेद की युक्ति से दुष्ट और शत्रुजनों की निवृत्ति करके विद्या और चक्रवर्त्ति राज्य की यथावत् उन्नति करनी चाहिये। तथा जैसे इस संसार में कपटी, छली और दुष्ट पुरुष वृद्धि को प्राप्त न हों, वैसा उपाय निरन्तर करना चाहिये॥७॥

इन्द्र॒मीशा॑न॒मोज॑सा॒भि स्तोमा॑ अनूषत। स॒हस्रं॒ यस्य॑ रा॒तय॑ उ॒त वा॒ सन्ति॒ भूय॑सीः॥

जिस दयालु ईश्वर ने प्राणियों के सुख के लिये जगत् में अनेक उत्तम-उत्तम पदार्थ अपने पराक्रम से उत्पन्न करके जीवों को दिये हैं, उसी ब्रह्म के स्तुतिविधायक सब धन्यवाद होते हैं, इसलिये सब मनुष्यों को उसी का आश्रय लेना चाहिये॥८॥इस सू्क्त में इन्द्र शब्द से ईश्वर की स्तुति, निर्भयता-सम्पादन, सूर्य्यलोक के कार्य्य, शूरवीर के गुणों का वर्णन, दुष्ट शत्रुओं का निवारण, प्रजा की रक्षा तथा ईश्वर के अनन्त सामर्थ्य से कारण करके जगत् की उत्पत्ति आदि के विधान से इस ग्यारहवें सूक्त की सङ्गति दशवें सूक्त के अर्थ के साथ जाननी चाहिये। यह भी सूक्त सायणाचार्य्य आदि आर्य्यावर्त्तवासी तथा यूरोपदेशवासी विलसन साहब आदि ने विपरीत अर्थ के साथ वर्णन किया है॥

सूक्तम्

अ॒ग्निं दू॒तं वृ॑णीमहे॒ होता॑रं वि॒श्ववे॑दसम्। अ॒स्य य॒ज्ञस्य॑ सु॒क्रतु॑म्॥

ईश्वर सब मनुष्यों को आज्ञा देता है कि-यह प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष से विद्वानों ने जिसके गुण प्रसिद्ध किये हैं, तथा पदार्थों को ऊपर नीचे पहुँचाने से दूत स्वभाव तथा शिल्पविद्या से जो कलायन्त्र बनते हैं, उनके चलाने में हेतु और विमान आदि यानों में वेग आदि क्रियाओं का देनेवाला भौतिक अग्नि अच्छी प्रकार विद्या से सब सज्जनों के उपकार के लिये निरन्तर ग्रहण करना चाहिये, जिससे सब उत्तम-उत्तम सुख हों॥१॥

अ॒ग्निम॑ग्निं॒ हवी॑मभिः॒ सदा॑ हवन्त वि॒श्पति॑म्। ह॒व्य॒वाहं॑ पुरुप्रि॒यम्॥

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। और पिछले मन्त्र से ‘वृणीमहे’ इस पद की अनुवृत्ति आती है। ईश्वर सब मनुष्यों के लिये उपदेश करता है कि-हे मनुष्यो! तुम लोगों को विद्युत् अर्थात् बिजुलीरूप तथा प्रत्यक्ष भौतिक अग्नि से कलाकौशल आदि सिद्ध करके इष्ट सुख सदैव भोगने और भुगवाने चाहियें॥२॥

अग्ने॑ दे॒वाँ इ॒हाव॑ह जज्ञा॒नो वृ॒क्तब॑र्हिषे। असि॒ होता॑ न॒ ईड्यः॑॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। हे मनुष्य लोगो! जिस प्रत्यक्ष अग्नि में सुगन्धि आदि गुणयुक्त पदार्थों का होम किया करते हैं, जो उन पदार्थों के साथ अन्तरिक्ष में ठहरनेवाले वायु और मेघ के जल को शुद्ध करके इस संसार में दिव्य सुख उत्पन्न करता है, इस कारण हम लोगों को इस अग्नि के गुणों का खोज करना चाहिये, यह ईश्वर की आज्ञा सब को अवश्य माननी योग्य है॥३॥

ताँ उ॑श॒तो वि बो॑धय॒ यद॑ग्ने॒ यासि॑ दू॒त्य॑म्। दे॒वैरास॑त्सि ब॒र्हिषि॑॥

परमेश्वर आज्ञा देता है कि-हे मनुष्यो! यह अग्नि तुम्हारा दूत है, क्योंकि हवन किये हुए परमाणुरूप पदार्थों को अन्तरिक्ष में पहुँचाता और उत्तम-उत्तम भोगों की प्राप्ति का हेतु है। इससे सब मनुष्यों को अग्नि के जो प्रसिद्ध गुण हैं, उनको संसार में अपने कार्य्यों की सिद्धि के किये अवश्य प्रकाशित करना चाहिये॥४॥

घृता॑हवन दीदिवः॒ प्रति॑ ष्म॒ रिष॑तो दह। अग्ने॒ त्वं र॑क्ष॒स्विनः॑॥

जो अग्नि इस प्रकार सुगन्ध्यादि गुणवाले पदार्थों से संयुक्त होकर सब दुर्गन्ध आदि दोषों को निवारण करके सब के लिये सुखदायक होता है, वह अच्छे प्रकार काम में लाना चाहिये। ईश्वर का यह वचन सब मनुष्यों को मानना उचित है॥५॥

अ॒ग्निना॒ग्निः समि॑ध्यते क॒विर्गृ॒हप॑ति॒र्युवा॑। ह॒व्य॒वाड् जु॒ह्वा॑स्यः॥

जो यह सब पदार्थों में मिला हुआ विद्युद्रूप अग्नि कहाता है, उसी में प्रत्यक्ष यह सूर्य्यलोक और भौतिक अग्नि प्रकाशित होते हैं, और फिर जिसमें छिपे हुए विद्युद्रूप हो के रहते हैं, जो इन के गुण और विद्या को ग्रहण करके मनुष्य लोग उपकार करें, तो उन से अनेक व्यवहार सिद्ध होकर उनको अत्यन्त आनन्द की प्राप्ति होती है, यह जगदीश्वर का वचन है॥६॥

क॒विम॒ग्निमुप॑स्तुहि स॒त्यध॑र्माणमध्व॒रे। दे॒वम॑मीव॒चात॑नम्॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को सत्यविद्या से धर्म की प्राप्ति तथा शिल्पविद्या की सिद्धि के लिये ईश्वर और भौतिक अग्नि के गुण अलग-अलग प्रकाशित करने चाहियें। जिससे प्राणियों को रोग आदि के विनाशपूर्वक सब सुखों की प्राप्ति यथावत् हो॥७॥

यस्त्वाम॑ग्ने ह॒विष्प॑तिर्दू॒तं दे॑व सप॒र्यति॑। तस्य॑ स्म प्रावि॒ता भ॑व॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। दूत शब्द का अर्थ दो पक्ष में समझना चाहिये अर्थात् एक इस प्रकार से कि सब मनुष्यों में ज्ञान का पहुँचाना ईश्वर पक्ष में, तथा एकदेश से दूसरे देश में पदार्थों का पहुँचाना भौतिक पक्ष में ग्रहण किया गया है। जो आस्तिक अर्थात् परमेश्वर में विश्वास रखनेवाले मनुष्य अपने हृदय में सर्वसाक्षी का ध्यान करते हैं, वे पुरुष ईश्वर से रक्षा को प्राप्त होकर पापों से बचकर धर्मात्मा हुए अत्यन्त सुख को प्राप्त होते हैं, तथा जो युक्ति से विमान आदि रथों में भौतिक अग्नि को संयुक्त करते हैं, वे भी युद्धादिकों में रक्षा को प्राप्त होकर औरों की रक्षा करनेवाले होते हैं॥८॥

यो अ॒ग्निं दे॒ववी॑तये ह॒विष्माँ॑ आ॒विवा॑सति। तस्मै॑ पावक मृळय॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जो मनुष्य अपने सत्यभाव कर्म और विज्ञान से परमेश्वर का सेवन करते हैं, वे दिव्यगुण पवित्रकर्म और उत्तम-उत्तम सुखों को प्राप्त होते हैं तथा जिससे यह दिव्य गुणों का प्रकाश करनेवाला अग्नि रचा है, उस अग्नि से मनुष्यों को उत्तम-उत्तम उपकार लेने चाहिये, इस प्रकार ईश्वर का उपदेश है॥९॥

स नः॑ पावक दीदि॒वोऽग्ने॑ दे॒वाँ इ॒हा व॑ह। उप॑ य॒ज्ञं ह॒विश्च॑ नः॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जिस प्राणी को किसी पदार्थ की इच्छा उत्पन्न हो, वह अपनी कामसिद्धि के लिये परमेश्वर की प्रार्थना और पुरुषार्थ करे। जैसे इस वेद में जगदीश्वर के गुण, स्वभाव तथा औरों के उत्पन्न किये हुए दृष्टिगोचर होते हैं, वैसे मनुष्यों को उनके अनुकूल कर्म के अनुष्ठान से अग्नि आदि पदार्थों के गुणों को ग्रहण करके अनेक प्रकार व्यवहार की सिद्धि करना चाहिये॥१०॥

स नः॒ स्तवा॑न॒ आ भ॑र गाय॒त्रेण॒ नवी॑यसा। र॒यिं वी॒रव॑ती॒मिष॑म्॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। तथा पहिले मन्त्र से ‘चकार’ की अनुवत्ति की है। हर एक मनुष्य को वेद आदि के नवीन-नवीन अध्ययन से वेद की उच्चारणक्रिया प्राप्त होती है, इस कारण ‘नवीयसा’ इस पद का उच्चारण किया है। जिन धर्मात्मा मनुष्यों ने यथावत् शब्दार्थपूर्वक वेद के पढ़ने और वेदोक्त कर्मों के अनुष्ठान से जगदीश्वर को प्रसन्न किया है, उन मनुष्यों को वह उत्तम-उत्तम विद्या आदि धन तथा शूरता आदि गुणों को उत्पन्न करनेवाली श्रेष्ठ कामना को देता है, क्योंकि जो वेद के पढ़ने और परमेश्वर के सेवन से युक्त मनुष्य हैं, वे अनेक सुखों का प्रकाश करते हैं॥११॥

अग्ने॑ शु॒क्रेण॑ शो॒चिषा॒ विश्वा॑भिर्दे॒वहू॑तिभिः। इ॒मं स्तोमं॑ जुषस्व नः॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। दिव्यविद्याओं के प्रकाश होने से देव शब्द से वेदों का ग्रहण किया है। जब मनुष्य लोग सत्य प्रेम के साथ वेदवाणी से जगदीश्वर की स्तुति करते हैं, तब वह परमेश्वर उन मनुष्यों को विद्यादान से प्रसन्न करता है। वैसे ही यह भौतिक अग्नि भी विद्या से कलाकुशलता में युक्त किया हुआ इन्धन आदि पदार्थों में ठहर कर सब क्रियाकाण्ड का सेवन करता है॥१२॥इस बारहवें सूक्त के अर्थ की अग्निशब्द के अर्थ के योग से ग्यारहवें सूक्त के अर्थ से सङ्गति जाननी चाहिये। यह भी सूक्त सायणाचार्य्य आदि आर्य्यावर्तवासी तथा यूरोपदेशवासी विलसन आदि ने विपरीतता से वर्णन किया है॥

सुस॑मिद्धो न॒ आव॑ह दे॒वाँ अ॑ग्ने ह॒विष्म॑ते। होतः॑ पावक॒ यक्षि॑ च॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जो मनुष्य बहुत प्रकार की सामग्री को ग्रहण करके विमान आदि यानों में सब पदार्थों के प्राप्त करानेवाले अग्नि की अच्छी प्रकार योजना करता है, उस मनुष्य के लिये वह अग्नि नाना प्रकार के सुखों को सिद्धि करानेवाला होता है॥१॥

मधु॑मन्तं तनूनपाद्य॒ज्ञं दे॒वेषु॑ नः कवे। अ॒द्या कृ॑णुहि वी॒तये॑॥

जब अग्नि में सुगन्धि आदि पदार्थों का हवन होता है, तभी वह यज्ञ वायु आदि पदार्थों को शुद्ध तथा शरीर और ओषधि आदि पदार्थों की रक्षा करके अनेक प्रकार के रसों को उत्पन्न करता है, तथा वह यज्ञ उन शुद्ध पदार्थों के भोग से प्राणियों के विद्या ज्ञान और बल की वृद्धि भी होती है॥२॥

नरा॒शंस॑मि॒ह प्रि॒यम॒स्मिन्य॒ज्ञ उप॑ह्वये। मधु॑जिह्वं हवि॒ष्कृत॑म्॥

जो भौतिक अग्नि इस संसार में होम के निमित्त युक्ति से ग्रहण किया हुआ प्राणियों की प्रसन्नता करानेवाला है, उस अग्नि की सात जीभें हैं अर्थात् काली जो कि सुपेद आदि रङ्ग का प्रकाश करनेवाली, कराली-सहने में कठिन, मनोजवा-मन के समान वेगवाली, सुलोहिता-जिसका उत्तम रक्तवर्ण है, सुधूम्रवर्णा-जिसका सुन्दर धुमलासा वर्ण है, स्फुलिङ्गिनी-जिससे बहुत से चिनगे उठतें हों तथा विश्वरूपी-जिसका सब रूप हैं। ये देवी अर्थात् अतिशय करके प्रकाशमान और लेलायमाना-प्रकाश से सब जगह जानेवाली सात प्रकार की जिह्वा हैं अर्थात् सब पदार्थों को ग्रहण करनेवाली होती हैं। इस उक्त सात प्रकार की अग्नि की जीभों से सब पदार्थों में उपकार लेना मनुष्यों को चाहिये॥३॥

अग्ने॑ सु॒खत॑मे॒ रथे॑ दे॒वाँ ई॑ळि॒त आ व॑ह। असि॒ होता॒ मनु॑र्हितः॥

मनुष्यों को बहुत कलाओं से संयुक्त पृथिवी जल और अन्तरिक्ष में गमन का हेतु तथा अग्नि वा जल आदि पदार्थों से संयुक्त तीन प्रकार का रथ कल्याणकारक तथा अत्यन्त सुख देनेवाला होकर बहुत उत्तम-उत्तम कार्य्यों की सिद्धि को प्राप्त करानेवाला होता है॥४॥

स्तृ॒णी॒त ब॒र्हिरा॑नु॒षग्घृ॒तपृ॑ष्ठं मनीषिणः। यत्रा॒मृत॑स्य॒ चक्ष॑णम्॥

विद्वान् लोग अग्नि में जो घृत आदि पदार्थ छोड़ते हैं, वे अन्तरिक्ष को प्राप्त होकर वहाँ के ठहरे हुए जल को शुद्ध करते हैं, और वह शुद्ध हुआ जल सुगन्धि आदि गुणों से सब पदार्थों को आच्छादन करके सब प्राणियों को सुखयुक्त करता है॥५॥

विश्र॑यन्तामृता॒वृधो॒ द्वारो॑ दे॒वीर॑स॒श्चतः॑। अ॒द्या नू॒नं च॒ यष्ट॑वे॥

मनुष्यों को अनेक प्रकार के द्वारों के घर, यज्ञशाला और विमान आदि यानों को बनाकर उनमें स्थिति होम और देशान्तरों में जाना-आना करना चाहिये॥६॥

नक्तो॒षासा॑ सु॒पेश॑सा॒ऽस्मिन्य॒ज्ञ उप॑ ह्वये। इ॒दं नो॑ ब॒र्हिरा॒सदे॑॥

मनुष्यों को उचित है कि इस संसार में विद्या से सदैव उपकार लेवें, क्योंकि रात्रिदिन सब प्राणियों के सुख का हेतु होता है॥७॥

ता सु॑जि॒ह्वा उप॑ह्वये॒ होता॑रा॒ दैव्या॑ क॒वी। य॒ज्ञं नो॑ यक्षतामि॒मम्॥

जैसे एक बिजुली वेग आदि अनेक गुणवाला अग्नि है, इसी प्रकार प्रसिद्ध अग्नि भी है। तथा ये दोनों सकल पदार्थों के देखने में और अच्छे प्रकार क्रियाओं में नियुक्त किये हुए शिल्प आदि अनेक कार्य्यों की सिद्धि के हेतु होते हैं। इसलिये इन्हों से मनुष्यों को सब उपकार लेने चाहियें॥८॥

इळा॒ सर॑स्वती म॒ही ति॒स्रो दे॒वीर्म॑यो॒भुवः॑। ब॒र्हिः सी॑दन्त्व॒स्रिधः॑॥

मनुष्यों को ‘इडा’ जो कि पठनपाठन की प्रेरणा देनेहारी, ‘सरस्वती’ जो उपदेशरूप ज्ञान का प्रकाश करने, और ‘मही’ जो सब प्रकार से प्रशंसा करने योग्य है, ये तीनों वाणी कुतर्क से खण्डन करने योग्य नहीं हैं, तथा सब सुख के लिये तीनों प्रकार की वाणी सदैव स्वीकार करनी चाहिये, जिससे निश्चलता से अविद्या का नाश हो॥९॥

इ॒ह त्वष्टा॑रमग्रि॒यं वि॒श्वरू॑प॒मुप॑ ह्वये। अ॒स्माक॑मस्तु॒ केव॑लः॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को अनन्त सुख देनेवाले ईश्वर ही की उपासना करनी चाहिये तथा जो यह भौतिक अग्नि सब पदार्थों का छेदन करने, सब रूप गुण और पदार्थों का प्रकाश करने, सब से उत्तम और हम लोगों की शिल्पविद्या का अद्वितीय साधन है, उसका उपयोग शिल्पविद्या में यथावत् करना चाहिये॥१०॥

अव॑ सृजा वनस्पते॒ देव॑ दे॒वेभ्यो॑ ह॒विः। प्र दा॒तुर॑स्तु॒ चेत॑नम्॥

मनुष्यों ने पृथिवी तथा सब पदार्थ जलमय युक्ति से क्रियाओं में युक्त किये हुए अग्नि से प्रदीप्त होकर रोगों की निर्मूलता से बुद्धि और बल को देने के कारण ज्ञान के बढ़ाने के हेतु होकर दिव्यगुणों का प्रकाश करते हैं॥११॥

स्वाहा॑ य॒ज्ञं कृ॑णोत॒नेन्द्रा॑य॒ यज्व॑नो गृ॒हे। तत्र॑ दे॒वाँ उप॑ ह्वये॥

मनुष्य लोग विद्या तथा क्रियावान् होकर यथायोग्य बने हुए स्थानों में उत्तम विचार से क्रियासमूह से सिद्ध होनेवाले कर्मकाण्ड को नित्य करते हुए और वहाँ विद्वानों को बुलाकर वा आप ही उनके समीप जाकर उनकी विद्या और क्रिया की चतुराई को ग्रहण करें। हे सज्जन लोगो! तुमको विद्या और क्रिया की कुशलता आलस्य से कभी नहीं छोड़नी चाहिये, क्योंकि ऐसी ही ईश्वर की आज्ञा सब मनुष्यों के लिये है॥१२॥इस तेरहवें सूक्त के अर्थ की अग्नि आदि दिव्य पदार्थों के उपकार लेने के विधान से बारहवें सूक्त के अभिप्राय के साथ सङ्गति जाननी चाहिये। यह भी सूक्त सायणाचार्य्य आदि तथा यूरोपदेशवासी विलसन आदि साहबों ने विपरीत ही वर्णन किया है॥

ऐभि॑रग्ने॒ दुवो॒ गिरो॒ विश्वे॑भिः॒ सोम॑पीतये। दे॒वेभि॑र्याहि॒ यक्षि॑ च॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जिन मनुष्यों को व्यवहार और परमार्थ के सुख की इच्छा हो, वे वायु जल और पृथिवीमयादि यन्त्र तथा विमान आदि रथों के साथ अग्नि को स्वीकार करके उत्तम क्रियाओं को सिद्ध करते और ईश्वर की आज्ञा का सेवन, वेदों का पढ़ना-पढ़ाना और वेदोक्त कर्मों का अनुष्ठान करते रहते हैं, वे ही सब प्रकार से आनन्द भोगते हैं॥१॥

आ त्वा॒ कण्वा॑ अहूषत गृ॒णन्ति॑ विप्र ते॒ धियः॑। दे॒वेभि॑रग्न॒ आ ग॑हि॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को इस संसार में ईश्वर के रचे हुए पदार्थों को देखकर यह कहना चाहिये कि ये सब धन्यवाद और स्तुति ईश्वर ही में घटती हैं॥२॥

इ॒न्द्र॒वा॒यू बृह॒स्पतिं॑ मि॒त्राग्निं॑ पू॒षणं॒ भग॑म्। आ॒दि॒त्यान्मारु॑तं ग॒णम्॥

इस मन्त्र में पूर्व मन्त्र से ‘कण्वाः’ ‘अहूषत’ और ‘गृणन्ति’ इन तीन पदों की अनुवृत्ति आती है। जो मनुष्य ईश्वर के रचे हुए उक्त इन्द्र आदि पदार्थों और उनके गुणों को जानकर क्रियाओं में संयुक्त करते हैं, वे आप सुखी होकर सब प्राणियों को सुखयुक्त सदैव करते हैं॥३॥

प्र वो॑ भ्रियन्त॒ इन्द॑वो मत्स॒रा मा॑दयि॒ष्णवः॑। द्र॒प्सा मध्व॑श्चमू॒षदः॑॥

ईश्वर सब मनुष्यों के प्रति कहता है कि जो मेरे रचे हुए पहिले मन्त्र में प्रकाशित किये बिजुली आदि पदार्थों से ये सब पदार्थ धारण करके मैंने पुष्ट किये हैं, तथा जो मनुष्य इनसे वैद्यक वा शिल्पशास्त्रों की रीति से उत्तम रस के उत्पादन और शिल्प कार्य्यों की सिद्धि के साथ उत्तम सेना के सम्पादन होने से रोगों का नाश तथा विजय की प्राप्ति करते हैं, वे लोग नाना प्रकार के सुख भोगते हैं॥४॥

ईळ॑ते॒ त्वाम॑व॒स्यवः॒ कण्वा॑सो वृ॒क्तब॑र्हिषः। ह॒विष्म॑न्तो अरं॒कृतः॑॥

हे सृष्टि के उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर! जिससे आपने सब प्राणियों के सुख के लिये सब पदार्थों को रचकर धारण किये हैं, इससे हम लोग आप ही की स्तुति, सब की रक्षा की इच्छा, शिक्षा और विद्या से सब मनुष्यों को भूषित करते हुए उत्तम क्रियाओं के लिये निरन्तर अच्छी प्रकार यत्न करते हैं॥५॥

घृ॒तपृ॑ष्ठा मनो॒युजो॒ ये त्वा॒ वह॑न्ति॒ वह्न॑यः। आ दे॒वान्त्सोम॑पीतये॥

जो मेघ आदि पदार्थ हैं, वे ही जल को ऊपर नीचे अर्थात् अन्तरिक्ष को पहुँचाते और वहाँ से वर्षाते हैं, और ताराख्य यन्त्र से चलाई हुई बिजुली मन के वेग के समान वार्त्ताओं को एकदेश से दूसरे देश में प्राप्त करती है। इसी प्रकार सब सुखों को प्राप्त करानेवाले ये ही पदार्थ हैं, ऐसी ईश्वर की आज्ञा है॥६॥

तान्यज॑त्राँ ऋता॒वृधोऽग्ने॒ पत्नी॑वतस्कृधि। मध्वः॑ सुजिह्व पायय॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को अच्छी प्रकार ईश्वर के आराधन और अग्नि की क्रियाकुशलता से रससारादि को रचकर तथा उपकार में लाकर गृहस्थ आश्रम में सब कार्यों को सिद्ध करना चाहिये॥७॥

ये यज॑त्रा॒ य ईड्या॒स्ते ते॑ पिबन्तु जि॒ह्वया॑। मधो॑रग्ने॒ वष॑ट्कृति॥

मनुष्यों को इस जगत् में सब संयुक्त पदार्थों से दो प्रकार का कर्म करना चाहिये अर्थात् एक तो उनके गुणों का जानना, दूसरा उनसे कार्य्य की सिद्धि करना। जो विद्युत् आदि पदार्थ सब मूर्त्तिमान् पदार्थों से रस को ग्रहण करके फिर छोड़ देते हैं, इससे उनकी शुद्धि के लिये सुगन्धि आदि पदार्थों का होम निरन्तर करना चाहिये, जिससे वे सब प्राणियों को सुख सिद्ध करनेवाले हों॥८॥

आकीं॒ सूर्य॑स्य रोच॒नाद्विश्वा॑न्दे॒वाँ उ॑ष॒र्बुधः॑। विप्रो॒ होते॒ह व॑क्षति॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। यदि ईश्वर इन पदार्थों को उत्पन्न नहीं करता, तो कोई पुरुष उपकार लेने को समर्थ भी नहीं हो सकता, और जब मनुष्य निद्रा में स्थित होते हैं, तब कोई मनुष्य किसी भोग करने योग्य पदार्थ को प्राप्त नहीं हो सकता किन्तु जाग्रत् अवस्था को प्राप्त होकर उनके भोग करने को समर्थ होता है। इससे इस मन्त्र में ‘उषर्बुधः’ इस पद का उच्चारण किया है। संसार के इन पदार्थों से बुद्धिमान् मनुष्य ही क्रिया की सिद्धि को कर सकता है, अन्य कोई नहीं॥९॥

विश्वे॑भिः सो॒म्यं मध्वग्न॒ इन्द्रे॑ण वा॒युना॑। पिबा॑ मि॒त्रस्य॒ धाम॑भिः॥

यह विद्युद्रूप अग्नि ब्रह्माण्ड में रहनेवाले पवन तथा शरीर में रहनेवाले प्राणों के साथ वर्त्तमान होकर सब पदार्थों से रस को ग्रहण करके उगलता है, इससे यह मुख्य शिल्पविद्या का साधन है॥१०॥

त्वं होता॒ मनु॑र्हि॒तोऽग्ने॑ य॒ज्ञेषु॑ सीदसि। सेमं नो॑ अध्व॒रं य॑ज॥

जिस ईश्वर ने सब मनुष्यों आदि प्राणियों के शरीर आदि पदार्थों को उत्पन्न करके धारण किये हैं, तथा जो यह सब कर्म उपासना तथा ज्ञानकाण्ड में अतिशय से पूजने के योग्य है, वही इस जगत् रूपी यज्ञ को सिद्ध करके हम लोगों को सुखयुक्त करता है॥११॥

यु॒क्ष्वा ह्यरु॑षी॒ रथे॑ ह॒रितो॑ देव रो॒हितः॑। ताभि॑र्दे॒वाँ इ॒हा व॑ह॥

विद्वानों को कला और विमान आदि यानों में अग्नि आदि पदार्थों को संयुक्त करके इनसे संसार में मनुष्यों के सुख के लिये दिव्य पदार्थों का प्रकाश करना चाहिये॥१२॥सब देवों के गुणों के प्रकाश तथा क्रियाओं के समुदाय से इस चौदहवें सूक्त की सङ्गति पूर्वोक्त तेरहवें सूक्त के अर्थ के साथ जाननी चाहिये। इस सूक्त का अर्थ सायणाचार्य्य आदि विद्वान् तथा यूरोपदेशनिवासी विलसन आदि ने विपरीत ही वर्णन किया है॥

इन्द्र॒ सोमं॒ पिब॑ ऋ॒तुना त्वा॑ विश॒न्त्विन्द॑वः। म॒त्स॒रास॒स्तदोक॑सः॥

यह सूर्य्य वर्ष, उत्तरायण दक्षिणायन, वसन्त आदि ऋतु, चैत्र आदि बारहों महीने, शुक्ल और कृष्णपक्ष, दिन-रात, मुहूर्त जो कि तीस कलाओं का संयोग कला जो ३० (तीस) काष्ठा का संयोग, काष्ठा जो कि अठारह निमेष का संयोग तथा निमेष आदि समय के विभागों को प्रकाशित करता है। जैसे कि मनुजी ने कहा है, और उन्हीं के साथ सब ओषधियों के रस और सब स्थानों से जलों को खींचता है, वे किरणों के साथ अन्तरिक्ष में स्थित होते हैं, तथा वायु के साथ आते-जाते हैं॥१॥

मरु॑तः॒ पिब॑त ऋ॒तुना॑ पो॒त्राद्य॒ज्ञं पु॑नीतन। यू॒यं हि ष्ठा सु॑दानवः॥

ऋतुओं के अनुक्रम से पवनों में भी यथायोग्य गुण उत्पन्न होते हैं, इसीसे वे त्रसरेणु आदि पदार्थों वा क्रियाओं के हेतु होते हैं तथा अग्नि के बीच में सुगन्धित पदार्थों के होमद्वारा वे पवित्र होकर प्राणीमात्र को सुखसंयुक्त करते हैं और वे ही पदार्थों के देने-लेने में हेतु होते हैं॥२॥

अ॒भि य॒ज्ञं गृ॑णीहि नो॒ ग्नावो॒ नेष्टः॒ पिब॑ ऋ॒तुना॑। त्वं हि र॑त्न॒धा असि॑॥

यह जो बिजुली अग्नि की सूक्ष्म अवस्था है, सो सब स्थूल पदार्थों के अवयवों में व्याप्त होकर उनको धारण और छेदन करती है, इसी से यह प्रत्यक्ष अग्नि उत्पन्न होके उसी में विलीन हो जाता है॥३॥

अग्ने॑ दे॒वाँ इ॒हा व॑ह सा॒दया॒ योनि॑षु त्रि॒षु। परि॑ भूष॒ पिब॑ ऋ॒तुना॑॥

दाहगुणयुक्त यह अग्नि अपने रूप के प्रकाश से सब ऊपर नीचे वा मध्य में रहनेवाले पदार्थों को अच्छी प्रकार सुशोभित करता, होम और शिल्पविद्या में संयुक्त किया हुआ दिव्य-दिव्य सुखों का प्रकाश करता है॥४॥

ब्राह्म॑णादिन्द्र॒ राध॑सः॒ पिबा॒ सोम॑मृ॒तूँरनु॑। तवेद्धि स॒ख्यमस्तृ॑तम्॥

मनुष्यों को योग्य है कि जगत् के रचनेवाले परमेश्वर ने जो-जो जिस-जिस वायु आदि पदार्थों में नियम स्थापन किये हैं, उन-उनको जान कर कार्य्यों को सिद्ध करना चाहिये, और उन से सिद्ध किये हुए धन से सब ऋतुओं में सब प्राणियों के अनुकूल हित सम्पादन करना चाहिये, तथा युक्ति के साथ सेवन किये हुए पदार्थ मित्र के समान होते और इससे विपरीत शत्रु के समान होते हैं, ऐसा जानना चाहिये॥५॥

यु॒वं दक्षं॑ धृतव्रत॒ मित्रा॑वरुण दू॒ळभ॑म्। ऋ॒तुना॑ य॒ज्ञमा॑शाथे॥

जो सबका मित्र बाहर आनेवाला प्राण तथा शरीर के भीतर रहनेवाला उदान है, इन्हीं से प्राणी ऋतुओं के साथ सब संसाररूपी यज्ञ और बल को धारण करके व्याप्त होते हैं, जिससे सब व्यवहार सिद्ध होते हैं॥६॥

द्र॒वि॒णो॒दा द्रवि॑णसो॒ ग्राव॑हस्तासो अध्व॒रे। य॒ज्ञेषु॑ दे॒वमी॑ळते॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। सब मनुष्यों को सब कर्म, उपासना तथा ज्ञानकाण्ड यज्ञों में परमेश्वर ही की पूजा तथा भौतिक अग्नि होम वा शिल्पादि कामों में अच्छी प्रकार संयुक्त करने योग्य है॥७॥

द्र॒वि॒णो॒दा द॑दातु नो॒ वसू॑नि॒ यानि॑ शृण्वि॒रे। दे॒वेषु॒ ता व॑नामहे॥

परमेश्वर ने इस संसार में जीवों के लिये जो पदार्थ उत्पन्न किये हैं, उपकार में संयुक्त किये हैं, उन पदार्थों से जितने प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष वस्तु से सुख उत्पन्न होते हैं, वे विद्वानों ही के सङ्ग से सुख देनेवाले होते हैं॥८॥

द्र॒वि॒णो॒दाः पि॑पीषति जु॒होत॒ प्र च॑ तिष्ठत। ने॒ष्ट्रादृ॒तुभि॑रिष्यत॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को अच्छे ही काम सीखने चाहिये, दुष्ट नहीं, और सब ऋतुओं में सब सुखों के लिये यथायोग्य कर्म्म करना चाहिये, तथा जिस ऋतु में जो देश स्थिति करने वा जाने-आने योग्य हो, उसमें उसी समय स्थिति वा जाना तथा उस देश के अनुसार खाना-पीना वस्त्रधारणादि व्यवहार करके सब व्यवहार में सुखों को निरन्तर सेवन करना चाहिये॥९॥

यत्त्वा॑ तु॒रीय॑मृ॒तुभि॒र्द्रवि॑णोदो॒ यजा॑महे। अध॑ स्मा नो द॒दिर्भ॑व॥

परमेश्वर तीन प्रकार के अर्थात् स्थूल, सूक्ष्म और कारणरूप जगत् से अलग होने के कारण चौथा है, जो कि सब मनुष्यों को सर्वव्यापी सब का अन्तर्यामी और आधार नित्य पूजन करने योग्य है, उसको छोड़कर ईश्वरबुद्धि करके किसी दूसरे पदार्थ की उपासना न करनी चाहिये, क्योंकि इससे भिन्न कोई कर्म के अनुसार जीवों को फल देनेवाला नहीं है॥१०॥

अश्वि॑ना॒ पिब॑तं॒ मधु॒ दीद्य॑ग्नी शुचिव्रता। ऋ॒तुना॑ यज्ञवाहसा॥

ईश्वर उपदेश करता है कि मैंने जो सूर्य्य चन्द्रमा तथा इस प्रकार मिले हुए अन्य भी दो-दो पदार्थ कार्यों की सिद्धि के लिये संयुक्त किये हैं, हे मनुष्यो! तुम अच्छी प्रकार सब ऋतुओं के सुख तथा व्यवहार की सिद्धि को प्राप्त करते हो, इनको सब लोग समझें॥११॥

गार्ह॑पत्येन सन्त्य ऋ॒तुना॑ यज्ञ॒नीर॑सि। दे॒वान्दे॑वय॒ते य॑ज॥

जो विद्वानों से सब व्यवहाररूप कामों में ऋतु-ऋतु के प्रति विद्या के साथ अच्छी प्रकार प्रयोग किया हुआ अग्नि है, सो मनुष्य आदि प्राणियों के लिये दिव्य सुखों को प्राप्त कराता है॥१२॥जो सब देवों के अनुयोगी वसन्त आदि ऋतु हैं, उनके यथायोग्य गुणप्रतिपादन से चौदहवें सूक्त के अर्थ के साथ इस पन्द्रहवें सूक्त के अर्थ की सङ्गति जाननी चाहिये। इस सूक्त का भी अर्थ सायणाचार्य्य आदि तथा यूरोपदेशवासी विलसन आदि लोगों ने कुछ का कुछ वर्णन किया है॥

आ त्वा॑ वहन्तु॒ हर॑यो॒ वृष॑णं॒ सोम॑पीतये। इन्द्र॑ त्वा॒ सूर॑चक्षसः॥

जो सूर्य्य की प्रत्यक्ष दीप्ति सब रसों के हरने सबका प्रकाश करने तथा वर्षा करनेवाली हैं, वे यथायोग्य अनुकूलता के साथ सेवन करने से मनुष्यों को उत्तम-उत्तम सुख देती हैं॥१॥

इ॒मा धा॒ना घृ॑त॒स्नुवो॒ हरी॑ इ॒होप॑वक्षतः। इन्द्रं॑ सु॒खत॑मे॒ रथे॑॥

जो इस संसार में रात्रि और दिन शुक्ल तथा कृष्णपक्ष दक्षिणायन और उत्तरायण हरण करनेवाले कहलाते हैं, उनसे सूर्य्यलोक आनन्दरूप व्यवहारों को प्राप्त कराता है॥२॥

इन्द्रं॑ प्रा॒तर्ह॑वामह॒ इन्द्रं॑ प्रय॒त्य॑ध्व॒रे। इन्द्रं॒ सोम॑स्य पी॒तये॑॥

मनुष्यों को परमेश्वर प्रतिदिन उपासना करने योग्य है और उसकी आज्ञा के अनुकूल वर्त्तना चाहिये। बिजुली तथा जो प्राणरूप वायु है, उसकी विद्या से पदार्थों का भोग करना चाहिये॥३॥

उप॑ नः सु॒तमा ग॑हि॒ हरि॑भिरिन्द्र के॒शिभिः॑। सु॒ते हि त्वा॒ हवा॑महे॥

जो पदार्थ हम लोगों को शिल्प आदि व्यवहारों में उपकारयुक्त करने चाहियें, वे अग्नि विद्युत् और सूर्य वायु ही के निमित्त से प्रकाशित होते तथा जाते आते हैं॥४॥

सेमं नः॒ स्तोम॒मा ग॒ह्युपे॒दं सव॑नं सु॒तम्। गौ॒रो न तृ॑षि॒तः पि॑ब॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे अत्यन्त प्यासे मृग आदि पशु और पक्षी वेग से दौड़कर नदी तालाब आदि स्थान को प्राप्त होके जल को पीते हैं, वैसे ही यह सूर्य्यलोक अपनी वेगवती किरणों से ओषधि आदि को प्राप्त होकर उसके रस को पीता है। सो यह विद्या की वृद्धि के लिये मनुष्यों को यथावत् उपयुक्त करना चाहिये॥५॥

इ॒मे सोमा॑स॒ इन्द॑वः सु॒तासो॒ अधि॑ ब॒र्हिषि॑। ताँ इ॑न्द्र॒ सह॑से पिब॥

ईश्वर ने इस संसार में प्राणियों के बल आदि वृद्धि के लिये जितने मूर्तिमान् पदार्थ उत्पन्न किये हैं, सूर्य्य से छिन्न-भिन्न किये हुए उनको पवन अपने निकट करके धारण करता है, उसके संयोग से प्राणी और अप्राणी बल पराक्रमवाले होते हैं॥६॥

अ॒यं ते॒ स्तोमो॑ अग्रि॒यो हृ॑दि॒स्पृग॑स्तु॒ शंत॑मः। अथा॒ सोमं॑ सु॒तं पि॑ब॥

मनुष्यों के लिये उत्तमगुण तथा शुद्ध किया हुआ यह पवन अत्यन्त सुखकारी होता है॥७॥

विश्व॒मित्सव॑नं सु॒तमिन्द्रो॒ मदा॑य गच्छति। वृ॒त्र॒हा सोम॑पीतये॥

वायु आकाश में अपने गमनागमन से सब संसार को प्राप्त होकर मेघ की वृष्टि करने वा सब से वेगवाला होकर सब प्राणियों को सुखयुक्त करता है। इसके विना कोई प्राणी किसी व्यवहार को सिद्धि करने को समर्थ नहीं हो सकता॥८॥

सेमं नः॒ काम॒मा पृ॑ण॒ गोभि॒रश्वैः॑ शतक्रतो। स्तवा॑म त्वा स्वा॒ध्यः॑॥

ईश्वर में यह सामर्थ्य सदैव रहता है कि पुरुषार्थी धर्मात्मा मनुष्यों का उन के कर्मों के अनुसार सब कामनाओं से पूरण करता है तथा जो संसार में परम उत्तम-उत्तम पदार्थों का उत्पादन तथा धारण करके सब प्राणियों को सुखयुक्त करता है, इससे सब मनुष्यों को उसी परमेश्वर की नित्य उपासना करनी चाहिये॥९॥ऋतुओं के सम्पादक जो कि सूर्य्य और वायु आदि पदार्थ हैं, उन के यथायोग्य प्रतिपादन से इस पन्द्रहवें सूक्त के अर्थ के साथ पूर्व सोलहवें सूक्त के अर्थ की सङ्गति समझनी चाहिये। इस सूक्त का भी अर्थ सायणाचार्य्य आदि तथा यूरोपदेशवासी अध्यापक विलसन आदि ने विपरीत वर्णन किया है॥

इन्द्रा॒वरु॑णयोर॒हं स॒म्राजो॒रव॒ आ वृ॑णे। ता नो॑ मृळात ई॒दृशे॑॥

जैसे प्रकाशमान, संसार के उपकार करने, सब सुखों के देने, व्यवहारों के हेतु और चक्रवर्त्ति राजा के समान सब की रक्षा करनेवाले सूर्य्य और चन्द्रमा हैं, वैसे ही हम लोगों को भी होना चाहिये॥१॥

गन्ता॑रा॒ हि स्थोऽव॑से॒ हवं॒ विप्र॑स्य॒ माव॑तः। ध॒र्तारा॑ चर्षणी॒नाम्॥

पूर्वमन्त्र से इस मन्त्र में ‘आवृणे’ इस पद का ग्रहण किया है। विद्वानों से युक्ति के साथ कलायन्त्रों में युक्त किये हुए अग्नि-जल जब कलाओं से बल में आते हैं, तब रथों को शीघ्र चलाने, उनमें बैठे हुए मनुष्य आदि प्राणी पदार्थों के धारण कराने और सबको सुख देनेवाले होते हैं॥२॥

अ॒नु॒का॒मं त॑र्पयेथा॒मिन्द्रा॑वरुण रा॒य आ। ता वां॒ नेदि॑ष्ठमीमहे॥

मनुष्यों को योग्य है कि जिस प्रकार अग्नि और जल के गुणों को जानकर क्रियाकुशलता में संयुक्त किये हुए ये दोनों बहुत उत्तम-उत्तम सुखों को प्राप्त करें, उस युक्ति के साथ कार्य्यों में अच्छी प्रकार इनका प्रयोग करना चाहिये॥३॥

यु॒वाकु॒ हि शची॑नां यु॒वाकु॑ सुमती॒नाम्। भू॒याम॑ वाज॒दाव्ना॑म्॥

मनुष्यों को सदा आलस्य छोड़कर अच्छे कामों का सेवन तथा विद्वानों का समागम नित्य करना चाहिये, जिससे अविद्या और दरिद्रपन जड़-मूल से नष्ट हों॥४॥

इन्द्रः॑ सहस्र॒दाव्नां॒ वरु॑णः॒ शंस्या॑नाम्। क्रतु॑र्भवत्यु॒क्थ्यः॑॥

पहिले मन्त्र से इस मन्त्र में ‘हि’ इस पद की अनुवृत्ति है। जितने पृथिवी आदि वा अन्न आदि पदार्थ दान आदि के साधक हैं, उनमें अग्नि विद्युत् और सूर्य्य मुख्य हैं, इससे सबको चाहिये कि उनके गुणों का उपदेश करके उनकी स्तुति वा उनका उपदेश सुनें और करें, क्योंकि जो पृथिवी आदि पदार्थों में जल वायु और चन्द्रमा अपने-अपने गुणों के साथ प्रशंसा करने और जानने योग्य हैं, वे क्रियाकुशलता में संयुक्त किये हुए उन क्रियाओं की सिद्धि करानेवाले होते हैं॥५॥

तयो॒रिदव॑सा व॒यं स॒नेम॒ नि च॑ धीमहि। स्यादु॒त प्र॒रेच॑नम्॥

मनुष्यों को उचित है कि अग्नि आदि पदार्थों के उपयोग से भरपूर धन को सम्पादन और उसकी रक्षा वा उन्नति करके यथायोग्य खर्च करने से विद्या और राज्य की वृद्धि से सबके हित की उन्नति करनी चाहिये॥६॥

इन्द्रा॑वरुण वाम॒हं हु॒वे चि॒त्राय॒ राध॑से। अ॒स्मान्त्सु जि॒ग्युष॑स्कृतम्॥

जो मनुष्य अच्छी प्रकार साधन किये हुए मित्र और वरुण को कामों में युक्त करते हैं, वे नाना प्रकार के धन आदि पदार्थ वा विजय आदि सुखों को प्राप्त होकर आप सुखसंयुक्त होते तथा औरों को भी सुखसंयुक्त करते हैं॥७॥

इन्द्रा॑वरुण॒ नू नु वां॒ सिषा॑सन्तीषु धी॒ष्वा। अ॒स्मभ्यं॒ शर्म॑ यच्छतम्॥

इस मन्त्र में पूर्व मन्त्र से ‘हुवे’ इस पद का ग्रहण किया है। जो मनुष्य शास्त्र से उत्तमता को प्राप्त हुई बुद्धियों से शिल्प आदि उत्तम व्यवहारों में उक्त इन्द्र और वरुण को अच्छी रीति से युक्त करते हैं, वे ही इस संसार में सुखों को फैलाते हैं॥८॥

प्र वा॑मश्नोतु सुष्टु॒तिरिन्द्रा॑वरुण॒ यां हु॒वे। यामृ॒धाथे॑ स॒धस्तु॑तिम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को जिस पदार्थ के जैसे गुण हैं, उनको वैसे ही जानकर और उनसे सदैव उपकार ग्रहण करना चाहिये, इस प्रकार ईश्वर का उपदेश है॥९॥पूर्वोक्त सोलहवें सूक्त के अनुयोगी मित्र और वरुण के अर्थ का इस सूक्त में प्रतिपादन करने से इस सत्रहवें सूक्त के अर्थ के साथ सोलहवें सूक्त के अर्थ की सङ्गति करनी चाहिये। इस सूक्त का भी अर्थ सायणाचार्य आदि तथा यूरोपदेशवासी विलसन आदि ने कुछ का कुछ ही वर्णन किया है॥

सूक्तम्

सो॒मानं॒ स्वर॑णं कृणु॒हि ब्र॑ह्मणस्पते। क॒क्षीव॑न्तं॒ य औ॑शि॒जः॥

जो कोई विद्या के प्रकाश में प्रसिद्ध मनुष्य है, वही पढ़ानेवाला और सम्पूर्ण शिल्पविद्या के प्रसिद्ध करने योग्य है। क्योंकि ईश्वर भी ऐसे ही मनुष्य को अपने अनुग्रह से चाहता है। इस मन्त्र का अर्थ सायणाचार्य्य ने कल्पित पुराण ग्रन्थ भ्रान्ति से कुछ का कुछ ही वर्णन किया है॥१॥

यो रे॒वान्यो अ॑मीव॒हा व॑सु॒वित्पु॑ष्टि॒वर्ध॑नः। स नः॑ सिषक्तु॒ यस्तु॒रः॥

जो मनुष्य सत्यभाषण आदि नियमों से संयुक्त ईश्वर की आज्ञा का अनुष्ठान करते हैं, वे अविद्या आदि रोगों से रहित और शरीर वा आत्मा की पुष्टिवाले होकर चक्रवर्त्ति राज्य आदि धन तथा सब रोगों की हरनेवाली ओषधियों को प्राप्त होते हैं॥२॥

मा नः॒ शंसो॒ अर॑रुषो धू॒र्तिः प्रण॒ङ्मर्त्य॑स्य। रक्षा॑ णो ब्रह्मणस्पते॥

किसी मनुष्य को धूर्त्त अर्थात् छल कपट करनेवाले मनुष्य का संग न करना तथा अन्याय से किसी की हिंसा न करनी चाहिये, किन्तु सब को सब की न्याय ही से रक्षा करनी चाहिये॥३॥

स घा॑ वी॒रो न रि॑ष्यति॒ यमिन्द्रो॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑। सोमो॑ हि॒नोति॒ मर्त्य॑म्॥

जो मनुष्य वायु, विद्युत्, सूर्य्य और सोम आदि ओषधियों के गुणों को ग्रहण करके अपने कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वे कभी दुखी नहीं होते॥४॥

त्वं तं ब्र॑ह्मणस्पते॒ सोम॒ इन्द्र॑श्च॒ मर्त्य॑म्। दक्षि॑णा पा॒त्वंह॑सः॥

जो मनुष्य अधर्म से दूर रहकर अपने सुखों के बढ़ाने की इच्छा करते हैं, वे ही परमेश्वर के सेवक और उक्त सोम, इन्द्र और दक्षिणा इन पदार्थों को युक्ति के साथ सेवन कर सकते हैं॥५॥

सद॑स॒स्पति॒मद्भु॑तं प्रि॒यमिन्द्र॑स्य॒ काम्य॑म्। स॒निं मे॒धाम॑यासिषम्॥

जो मनुष्य सर्वशक्तिमान् सबके अधिष्ठाता और सब आनन्द के देनेवाले परमेश्वर की उपासना करते और उत्कृष्ट न्यायाधीश को प्राप्त होते हैं, वे ही सब शास्त्रों के बोध से प्रसिद्ध क्रियाओं से युक्त बुद्धियों को प्राप्त और पुरुषार्थी होकर विद्वान् होते हैं॥६॥

यस्मा॑दृ॒ते न सिध्य॑ति य॒ज्ञो वि॑प॒श्चित॑श्च॒न। स धी॒नां योग॑मिन्वति॥

व्यापक सब में रहनेवाले ईश्वर और व्याप्य जगत् का नित्य सम्बन्ध है। वही सब संसार को रचकर तथा धारण करके सब की बुद्धि और कर्मों को अच्छी प्रकार जानकर सब प्राणियों के लिये उनके शुभ अशुभ कर्मों के अनुसार सुख दुःखरूप फल को देता है। कभी ईश्वर को छोड़ के अपने आप स्वभावमात्र से सिद्ध होनेवाला अर्थात् जिसका कोई स्वामी न हो, ऐसा संसार नहीं हो सकता, क्योंकि जड़ पदार्थों के अचेतन होने से यथायोग्य नियम के साथ उत्पन्न होने की योग्यता कभी नहीं होती॥७॥

आदृ॑ध्नोति ह॒विष्कृ॑तिं॒ प्राञ्चं॑ कृणोत्यध्व॒रम्। होत्रा॑ दे॒वेषु॑ गच्छति॥

जिस कारण परमेश्वर सकल संसार को रचता है, इससे सब पदार्थ परस्पर अपने-अपने संयोग में बढ़ते और ये पदार्थ क्रियामययज्ञ और शिल्पविद्या में अच्छी प्रकार संयुक्त किये हुए बड़े-बड़े सुखों को उत्पन्न करते हैं॥८॥

नरा॒शंसं॑ सु॒धृष्ट॑म॒मप॑श्यं स॒प्रथ॑स्तमम्। दि॒वो न सद्म॑मखसम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। इस मन्त्र में सातवें मन्त्र से ‘सदसस्पतिम्’ इस पद की अनुवृत्ति जाननी चाहिये। जैसे मनुष्य सब जगह विस्तृत हुए सूर्य्यादि के प्रकाश को देखता है, वैसे ही सब जगह व्याप्त ज्ञान प्रकाशरूप परमेश्वर को जानकर सुख के विस्तार को प्राप्त होता है॥९॥पूर्व सत्रहवें सूक्त के अर्थ के साथ मित्र और वरुण के साथ अनुयोगी बृहस्पति आदि अर्थों के प्रतिपादन से इस अठारहवें सूक्त के अर्थ की सङ्गति जाननी चाहिये। यह भी सूक्त सायणाचार्य्य आदि और यूरोपदेशवासी विलसन आदि ने कुछ का कुछ ही वर्णन किया है॥

प्रति॒ त्यं चारु॑मध्व॒रं गो॑पी॒थाय॒ प्र हू॑यसे। म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि॥

जो यह भौतिक अग्नि प्रसिद्ध सूर्य्य और विद्युद्रूप करके पवनों के साथ प्रदीप्त होता है, वह विद्वानों की प्रशंसनीय बुद्धि से हर एक क्रिया की सिद्धि वा सबकी रक्षा के लिये गुणों के विज्ञानपूर्वक उपदेश करना वा सुनना चाहिये॥१॥

न॒हि दे॒वो न मर्त्यो॑ म॒हस्तव॒ क्रतुं॑ प॒रः। म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि॥

सर्वोत्तम परमेश्वर की महिमा का कर्म अपार है, इससे उसका पार कोई नहीं पा सकता। किन्तु जिसकी जितनी बुद्धि वा विद्या है, उसके अनुसार समाधियोगयुक्त प्राणायाम के द्वारा अन्तर्यामिरूप से स्थित परमेश्वर को तथा वेद और संसार में परमेश्वर ने अपनी रचना से अपने स्वरूप वा गुण तथा भौतिक अग्नि के स्वरूप वा गुण जितने प्रकाशित किये हैं, उतने ही जान सकता है, अधिक नहीं॥२॥

ये म॒हो रज॑सो वि॒दुर्विश्वे॑ दे॒वासो॑ अ॒द्रुहः॑। म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि॥

जो विद्वान् लोग अग्नि से आकर्षण वा प्रकाश करके तथा पवनों से चेष्टा करके धारण किये हुए लोक हैं, उनको जानकर उनसे कार्य्यों में उपयोग लेने को जानते हैं, वे ही अत्यन्त सुखी होते हैं॥३॥

य उ॒ग्रा अ॒र्कमा॑नृ॒चुरना॑धृष्टास॒ ओज॑सा। म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि॥

जितना बल वर्त्तमान है, उतना वायु और विद्युत् के सकाश से उत्पन्न होता है, ये वायु सब लोकों के धारण करनेवाले हैं, इनके संयोग से बिजुली वा सूर्य्य आदि लोक प्रकाशित होते तथा धारण किये जाते हैं, इससे वायु के गुणों का जानना वा उनसे उपकार ग्रहण करने से अनेक प्रकार के कार्य्य सिद्ध होते हैं॥४॥

ये शु॒भ्रा घो॒रव॑र्पसः सुक्ष॒त्रासो॑ रि॒शाद॑सः। म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि॥

जो यज्ञ के धूम से शोधे हुए पवन हैं, वे अच्छे राज्य के करानेवाले होकर रोग आदि दोषों का नाश करते हैं और जो अशुद्ध अर्थात् दुर्गन्ध आदि दोषों से भरे हुए हैं, वे सुखों का नाश करते हैं। इससे मनुष्यों को चाहिये कि अग्नि में होम द्वारा वायु की शुद्धि से अनेक प्रकार के सुखों को सिद्ध करें॥५॥

ये नाक॒स्याधि॑ रोच॒ने दि॒वि दे॒वास॒ आस॑ते। म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि॥

सब लोक परमेश्वर के प्रकाश से प्रकाशमान हैं, परन्तु उसके रचे हुए सूर्य्यलोक की दीप्ति अर्थात् प्रकाश से पृथिवी और चन्द्रलोक प्रकाशित होते हैं, उन अच्छे-अच्छे गुणवालों के साथ रहनेवाले अग्नि को सब कार्य्यों में संयुक्त करना चाहिये॥६॥

य ई॒ङ्खय॑न्ति॒ पर्व॑तान् ति॒रः स॑मु॒द्रम॑र्ण॒वम्। म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि॥

वायु के संयोग से ही वर्षा होती है और जल के कण वा रेणु अर्थात् सब पदार्थों के अत्यन्त छोटे-छोटे कण पृथिवी से अन्तरिक्ष को जाते तथा वहाँ से पृथिवी को आते हैं, उनके साथ वा उनके निमित्त से बिजुली उत्पन्न होती और बद्दलों में छिप जाती है॥७॥

आ ये त॒न्वन्ति॑ र॒श्मिभि॑स्ति॒रः स॑मु॒द्रमोज॑सा। म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि॥

इन पवनों की व्याप्ति से सब पदार्थ बढ़कर बल देनेवाले होते हैं, इससे मनुष्यों को वायु और अग्नि के योग से अनेक प्रकार कार्य्यों की सिद्धि करनी चाहिये॥८॥

अ॒भि त्वा॑ पू॒र्वपी॑तये सृ॒जामि॑ सो॒म्यं मधु॑। म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि॥

विद्वान् लोग जिन वायु अग्नि आदि पदार्थों के अनुयोग से सब शिल्पक्रियारूपी यज्ञ को सिद्ध करते हैं, उन्हीं पदार्थों से सब मनुष्यों को सब कार्य्य सिद्ध करने चाहियें॥९॥अठाहरवें सूक्त में कहे हुए बृहस्पति आदि पदार्थों के साथ इस सूक्त से जिन अग्नि वा वायु का प्रतिपादन है, उनकी विद्या की एकता होने से इस उन्नीसवें सूक्त की सङ्गति जाननी चाहिये। इस अध्याय में अग्नि और वायु आदि पदार्थों की विद्या के उपयोग के लिये प्रतिपादन और पवनों के साथ रहनेवाले अग्नि का प्रकाश करता हुआ परमेश्वर अध्याय की समाप्ति को प्रकाशित करता है। यह भी सूक्त सायणाचार्य्य आदि तथा यूरोपदेशवासी विलसन आदि ने कुछ का कुछ का वर्णन किया है॥यह प्रथम अष्टक में प्रथम अध्याय, उन्नीसवाँ सूक्त और तेंतीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒यं दे॒वाय॒ जन्म॑ने॒ स्तोमो॒ विप्रे॑भिरास॒या। अका॑रि रत्न॒धात॑मः॥

इस मन्त्र में पुनर्जन्म का विधान जानना चाहिये। मनुष्य जैसे कर्म किया करते हैं, वैसे ही जन्म और भोग उनको प्राप्त होते हैं॥१॥

य इन्द्रा॑य वचो॒युजा॑ तत॒क्षुर्मन॑सा॒ हरी॑। शमी॑भिर्य॒ज्ञमा॑शत॥

जो विद्वान् पदार्थों के संयोग वा वियोग से धारण आकर्षण वा वेगादि गुणों को जानकर क्रियाओं से शिल्पव्यवहार आदि यज्ञ को सिद्ध करते हैं, वे ही उत्तम-उत्तम ऐश्वर्य्य को प्राप्त होते हैं॥२॥

तक्ष॒न्नास॑त्याभ्यां॒ परि॑ज्मानं सु॒खं रथ॑म्। तक्ष॑न्धे॒नुं स॑ब॒र्दुघा॑म्॥

जो मनुष्य अङ्ग, उपाङ्ग और उपवेदों के साथ वेदों को पढ़कर उनसे प्राप्त हुए विज्ञान से अग्नि आदि पदार्थों के गुणों को जानकर कलायन्त्रों से सिद्ध होनेवाले विमान आदि रथों में संयुक्त करके उनको सिद्ध किया करते हैं, वे कभी दुःख और दरिद्रता आदि दोषों को नहीं देखते॥३॥

युवा॑ना पि॒तरा॒ पुनः॑ स॒त्यम॑न्त्रा ऋजू॒यवः॑। ऋ॒भवो॑ वि॒ष्ट्य॑क्रत॥

जो आलस्य को छोड़े हुए सत्य में प्रीति रखने और सरल बुद्धिवाले मनुष्य हैं, वे ही अग्नि और जल आदि पदार्थों से उपकार लेने को समर्थ हो सकते हैं॥४॥

सं वो॒ मदा॑सो अग्म॒तेन्द्रे॑ण च म॒रुत्व॑ता। आ॒दि॒त्येभि॑श्च॒ राज॑भिः॥

जो विद्वान् लोग जब वायु और विद्युत् का आलम्ब लेकर सूर्य्य की किरणों के समान आग्नेयादि अस्त्र, असि आदि शस्त्र और विमान आदि यानों को सिद्ध करते हैं, तब वे शत्रुओं को जीत राजा होकर सुखी होते हैं॥५॥

उ॒त त्यं च॑म॒सं नवं॒ त्वष्टु॑र्दे॒वस्य॒ निष्कृ॑तम्। अक॑र्त च॒तुरः॒ पुनः॑॥

मनुष्य लोग किसी क्रियाकुशल कारीगर के निकट बैठकर उसकी चतुराई को दृष्टिगोचर करके फिर सुख के साथ कारीगरी काम करने को समर्थ हो सकते हैं॥६॥

ते नो॒ रत्ना॑नि धत्तन॒ त्रिरा साप्ता॑नि सुन्व॒ते। एक॑मेकं सुश॒स्तिभिः॑॥

सब मनुष्यों को उचित है कि जो ब्रह्मचारी आदि चार आश्रमों के कर्म तथा यज्ञ के अनुष्ठान आदि तीन प्रकार के हैं, उनको मन, वाणी और शरीर से यथावत् करें। इस प्रकार मिलकर सात कर्म होते हैं, जो मनुष्य इनको किया करते हैं, उनके सङ्ग उपदेश और विद्या से रत्नों को प्राप्त होकर सुखी होते हैं, वे एक-एक कर्म को सिद्ध वा समाप्त करके दूसरे का आरम्भ करें, इस क्रम से शान्ति और पुरुषार्थ से सब कर्मों का सेवन करते रहें॥७॥

अधा॑रयन्त॒ वह्न॒योऽभ॑जन्त सुकृ॒त्यया॑। भा॒गं दे॒वेषु॑ य॒ज्ञिय॑म्॥

मनुष्यों को योग्य है कि अच्छे कर्म वा विद्वानों की सङ्गति तथा पूर्वोक्त यज्ञ के अनुष्ठान से व्यवहारसुख से लेकर मोक्षपर्य्यन्त सुख की प्राप्ति करनी चाहिये॥८॥उन्नीसवें सूक्त में कहे हुए पदार्थों से उपकार लेने को बुद्धिमान् ही समर्थ होते हैं। इस अभिप्राय से इस बीसवें सूक्त के अर्थ का मेल पिछले उन्नीसवें सूक्त के साथ जानना चाहिये। इस सूक्त का भी अर्थ सायणाचार्य्य आदि तथा यूरोपदेशवासी विलसन आदि ने विपरीत वर्णन किया है॥

इ॒हेन्द्रा॒ग्नी उप॑ ह्वये॒ तयो॒रित्स्तोम॑मुश्मसि। ता सोमं॑ सोम॒पात॑मा॥

मनुष्यों को वायु और अग्नि के गुण जानने की इच्छा करनी चाहिये, क्योंकि कोई भी मनुष्य उनके गुणों के उपदेश वा श्रवण के विना उपकार लेने को समर्थ नहीं हो सकते हैं॥१॥

ता य॒ज्ञेषु॒ प्र शं॑सतेन्द्रा॒ग्नी शु॑म्भता नरः। ता गा॑य॒त्रेषु॑ गायत॥

कोई भी मनुष्य अभ्यास के विना वायु और अग्नि के गुणों के जानने वा उनसे उपकार लेने को समर्थ नहीं हो सकते॥२॥

ता मि॒त्रस्य॒ प्रश॑स्तय इन्द्रा॒ग्नी ता ह॑वामहे। सो॒म॒पा सोम॑पीतये॥

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। जब मनुष्य मित्रपन का आश्रय लेकर एक दूसरे के उपकार के लिये विद्या से वायु और अग्नि को कार्य्यों में संयुक्त करके रक्षा के साथ पदार्थ और व्यवहारों की उन्नति करते हैं, तभी वे सुखी होते हैं॥३॥

उ॒ग्रा सन्ता॑ हवामह॒ उपे॒दं सव॑नं सु॒तम्। इ॒न्द्रा॒ग्नी एह ग॑च्छताम्॥

मनुष्यों को जिस कारण ये दृष्टिगोचर हुए तीव्र वेग आदि गुणवाले वायु और अग्नि शिल्पक्रियायुक्त व्यवहार में सम्पूर्ण कार्य्यों के उपयोगी होते हैं, इससे इनको विद्या की सिद्धि के लिये कार्यों में सदा संयुक्त करना चाहिये॥४॥

ता म॒हान्ता॒ सद॒स्पती॒ इन्द्रा॑ग्नी॒ रक्ष॑ उब्जतम्। अप्र॑जाः सन्त्व॒त्रिणः॑॥

विद्वानों को योग्य है कि जो सब पदार्थों के स्वरूप वा गुणों से अधिक वायु और अग्नि हैं, उनको अच्छी प्रकार जानकर क्रियाव्यवहार में संयुक्त करें, तो वे दुःखों को निवारण करके अनेक प्रकार की रक्षा करनेवाले होते हैं॥५॥

तेन॑ स॒त्येन॑ जागृत॒मधि॑ प्रचे॒तुने॑ प॒दे। इन्द्रा॑ग्नी॒ शर्म॑ यच्छतम्॥

जो नित्य पदार्थ हैं, उनके गुण भी नित्य होते हैं, जो शरीर में वा बाहर रहनेवाले प्राणवायु तथा बिजुली हैं, वे अच्छी प्रकार सेवन किये हुए चेतनता करानेवाले होकर सुख देनेवाले होते हैं॥६॥बीसवें सूक्त में कहे हुए बुद्धिमानों की पदार्थविद्या की सिद्धि के वायु और अग्नि मुख्य हेतु होते हैं, इस अभिप्राय के जानने से पूर्वोक्त बीसवें सूक्त के अर्थ के साथ इस इक्कीसवें सूक्त के अर्थ का मेल जानना चाहिये। यह भी सूक्त सायणाचार्य्य आदि तथा यूरोपदेशवासी विलसन आदि ने विरुद्ध अर्थ से वर्णन किया है॥

प्रा॒त॒र्युजा॒ विबो॑धया॒श्विना॒वेह ग॑च्छताम्। अ॒स्य सोम॑स्य पी॒तये॑॥

शिल्प कार्य्यों की सिद्धि करने की इच्छा करनेवाले मनुष्यों को चाहिये कि उसमें भूमि और अग्नि का पहिले ग्रहण करें, क्योंकि इनके विना विमान आदि यानों की सिद्धि वा गमन सम्भव नहीं हो सकता॥१॥

या सु॒रथा॑ र॒थीत॑मो॒भा दे॒वा दि॑वि॒स्पृशा॑। अ॒श्विना॒ ता ह॑वामहे॥

जो मनुष्यों के लिये अत्यन्त सिद्धि करानेवाले अग्नि और जल हैं, वे शिल्पविद्या में संयुक्त किये हुए कार्य्यसिद्धि के हेतु होते हैं॥२॥

या वां॒ कशा॒ मधु॑म॒त्यश्वि॑ना सू॒नृता॑वती। तया॑ य॒ज्ञं मि॑मिक्षतम्॥

उपदेश के विना किसी मनुष्य को ज्ञान की वृद्धि कुछ भी नहीं हो सकती, इससे सब मनुष्यों को उत्तम विद्या का उपदेश तथा श्रवण निरन्तर करना चाहिये॥३॥

न॒हि वा॒मस्ति॑ दूर॒के यत्रा॒ रथे॑न॒ गच्छ॑थः। अश्वि॑ना सो॒मिनो॑ गृ॒हम्॥

हे मनुष्यो! जिस कारण अग्नि और जल के वेग से युक्त किया हुआ रथ अति दूर भी स्थानों को शीघ्र पहुँचाता है, इससे तुम लोगों को भी यह शिल्पविद्या का अनुष्ठान निरन्तर करना चाहिये॥४॥

हिर॑ण्यपाणिमू॒तये॑ सवि॒तार॒मुप॑ ह्वये। स चेत्ता॑ दे॒वता॑ प॒दम्॥

मनुष्यों को जो चेतनमय सब जगह प्राप्त होने और निरन्तर पूजन करने योग्य प्रीति का एक पुञ्ज और ऐश्वर्य्यों का देनेवाला परमेश्वर है, वही निरन्तर उपासना के योग्य है। इस विषय में इसके विना कोई दूसरा पदार्थ उपासना के योग्य नहीं है॥५॥

अ॒पां नपा॑त॒मव॑से सवि॒तार॒मुप॑ स्तुहि। तस्य॑ व्र॒तान्यु॑श्मसि॥

जैसे विद्वान् मनुष्य परमेश्वर की स्तुति करके उसकी आज्ञा का आचरण करता है, वैसे तुम लोगों को भी उचित है कि उस परमेश्वर के रचे हुए संसार में अनेक प्रकार के उपकार ग्रहण करो॥६॥

वि॒भ॒क्तारं॑ हवामहे॒ वसो॑श्चि॒त्रस्य॒ राध॑सः। स॒वि॒तारं॑ नृ॒चक्ष॑सम्॥

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को उचित है कि जिससे परमेश्वर सर्वशक्तिपन वा सर्वज्ञता से सब जगत् की रचना करके सब जीवों को उसके कर्मों के अनुसार सुख दुःखरूप फल को देता और जैसे सूर्य्यलोक अपने ताप वा छेदनशक्ति से मूर्त्तिमान् द्रव्यों का विभाग और प्रकाश करता है, इससे तुम भी सबको न्यायपूर्वक दण्ड वा सुख और यथायोग्य व्यवहार में चला के विद्यादि शुभ गुणों को प्राप्त कराया करो॥७॥

सखा॑य॒ आ निषी॑दत सवि॒ता स्तोम्यो॒ नु नः॑। दाता॒ राधां॑सि शुम्भति॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को परस्पर मित्रभाव के विना कभी सुख नहीं हो सकता। इससे सब मनुष्यों को योग्य है कि एक-दूसरे के साथ होकर जगदीश्वर वा अग्निमय सूर्य्यादि का उपदेश कर वा सुनकर उनसे सुखों के लिये सदा उपकार ग्रहण करें॥८॥

अग्ने॒ पत्नी॑रि॒हाव॑ह दे॒वाना॑मुश॒तीरुप॑। त्वष्टा॑रं॒ सोम॑पीतये॥

विद्वानों को उचित है कि जो बिजुली प्रसिद्ध और सूर्य्यरूप से तीन प्रकार का भौतिक अग्नि शिल्पविद्या की सिद्धि के लिये पृथिवी आदि पदार्थों के सामर्थ्य प्रकाश करने में मुख्य हेतु है, उसी का स्वीकार करें और यह इस शिल्पविद्यारूपी यज्ञ में पृथिवी आदि पदार्थों के सामर्थ्य का पत्नी नाम विधान किया है, उसको जानें॥९॥

आ ग्ना अ॑ग्न इ॒हाव॑से॒ होत्रां॑ यविष्ठ॒ भार॑तीम्। वरू॑त्रीं धि॒षणां॑ वह॥

विद्वानों को इस संसार में मनुष्य जन्म पाकर वेद द्वारा सब विद्या प्रत्यक्ष करनी चाहिये, क्योंकि कोई भी विद्या पदार्थों के गुण और स्वभाव को प्रत्यक्ष किये विना सफल नहीं हो सकती॥१०॥

अ॒भि नो॑ दे॒वीरव॑सा म॒हः शर्म॑णा नृ॒पत्नीः॑। अच्छि॑न्नपत्राः सचन्ताम्॥

जैसी विद्या, गुण, कर्म और स्वभाववाले पुरुष हों, उनकी स्त्री भी वैसे ही होनी ठीक हैं, क्योंकि जैसा तुल्य रूप विद्या गुण कर्म स्वभाववालों को सुख का सम्भव होता है, वैसा अन्य को कभी नहीं हो सकता। इससे स्त्री अपने समान पुरुष वा पुरुष अपने समान स्त्रियों के साथ आपस में प्रसन्न होकर स्वयंवर विधान से विवाह करके सब कर्मों को सिद्ध करें॥११॥

इ॒हेन्द्रा॒णीमुप॑ ह्वये वरुणा॒नीं स्व॒स्तये॑। अ॒ग्नायीं॒ सोम॑पीतये॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा और उपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को उचित है कि ईश्वर के बनाये हुए पदार्थों के आश्रय से अविनाशी निरन्तर सुख की प्राप्ति के लिये उद्योग करके परस्पर प्रसन्नतायुक्त स्त्री और पुरुष का विवाह करें, क्योंकि तुल्य स्त्री पुरुष और पुरुषार्थ के विना किसी मनुष्य को कुछ भी ठीक-ठीक सुख का सम्भव नहीं हो सकता॥१२॥

म॒ही द्यौः पृ॑थि॒वी च॑ न इ॒मं य॒ज्ञं मि॑मिक्षताम्। पि॒पृ॒तां नो॒ भरी॑मभिः॥

‘द्यौः’ यह नाम प्रकाशमान लोकों का उपलक्षण अर्थात् जो जिसका नाम उच्चारण किया हो, वह उसके समतुल्य सब पदार्थों के ग्रहण करने में होता है तथा ‘पृथिवी’ यह विना प्रकाशवाले लोकों का है। मनुष्यों को इन से प्रयत्न के साथ सब उपकारों को ग्रहण करके उत्तम-उत्तम सुखों को सिद्ध करना चाहिये॥१३॥

तयो॒रिद्घृ॒तव॒त्पयो॒ विप्रा॑ रिहन्ति धी॒तिभिः॑। ग॒न्ध॒र्वस्य॑ ध्रु॒वे प॒दे॥

विद्वानों को पृथिवी आदि पदार्थों से विमान आदि यान बनाकर उनकी कलाओं में जल और अग्नि के प्रयोग से भूमि, समुद्र और आकाश में जाना आना चाहिये॥१४॥

स्यो॒ना पृ॑थिवि भवानृक्ष॒रा नि॒वेश॑नी। यच्छा॑ नः॒ शर्म॑ स॒प्रथः॑॥

मनुष्यों को योग्य है, कि यह भूमि ही सब मूर्त्तिमान् पदार्थों के रहने की जगह और अनेक प्रकार के सुखों की करानेवाली और बहुत रत्नों को प्राप्त करानेवाली होती है, ऐसा ज्ञान करें॥१५॥

अतो॑ दे॒वा अ॑वन्तु नो॒ यतो॒ विष्णु॑र्विचक्र॒मे। पृ॒थि॒व्याः स॒प्त धाम॑भिः॥

विद्वानों के उपदेश के विना किसी मनुष्य को यथावत् सृष्टिविद्या का बोध कभी नहीं हो सकता। ईश्वर के उत्पादन करने के विना किसी पदार्थ का साकार होना नहीं बन सकता और इन दोनों कारणों के जाने विना कोई मनुष्य पदार्थों से उपकार लेने को समर्थ नहीं हो सकता। और जो यूरोपदेशवाले विलसन साहिब ने ‘पृथिवी उस खण्ड के अवयव से तथा विष्णु की सहायता से देवता हमारी रक्षा करें’ यह इस मन्त्र का अर्थ अपनी झूँठी कल्पना से वर्णन किया है, सो समझना चाहिये॥१६॥

इ॒दं विष्णु॒र्वि च॑क्रमे त्रे॒धा निद॑धे प॒दम्। समू॑ळ्हमस्य पांसु॒रे॥

परमेश्वर ने इस संसार में तीन प्रकार का जगत् रचा है अर्थात् एक पृथिवीरूप, दूसरा अन्तरिक्ष आकाश में रहनेवाला प्रकृति परमाणुरूप और तीसरा प्रकाशमय सूर्य्य आदि लोक तीन आधाररूप हैं, इनमें से आकाश में वायु के आधार से रहनेवाला जो कारणरूप है, वही पृथिवी और सूर्य्य आदि लोकों का बढ़ानेवाला है और इस जगत् को ईश्वर के विना कोई बनाने को समर्थ नहीं हो सकता, क्योंकि किसी का ऐसा सामर्थ्य ही नहीं॥१७॥

त्रीणि॑ प॒दा वि च॑क्रमे॒ विष्णु॑र्गो॒पा अदा॑भ्यः। अतो॒ धर्मा॑णि धा॒रय॑न्॥

ईश्वर के धारण के विना किसी पदार्थ की स्थिति होने का सम्भव नहीं हो सकता। उसकी रक्षा के विना किसी के व्यवहार की सिद्धि भी नहीं हो सकती॥१८॥

विष्णोः॒ कर्मा॑णि पश्यत॒ यतो॑ व्र॒तानि॑ पस्प॒शे। इन्द्र॑स्य॒ युज्यः॒ सखा॑॥

जिस कारण सब के मित्र जगदीश्वर ने पृथिवी आदि लोक तथा जीवों के साधनसहित शरीर रचे हैं, इसी से सब प्राणी अपने-अपने कार्यों के करने को समर्थ होते हैं॥१९॥

तद्विष्णोः॑ पर॒मं प॒दं सदा॑ पश्यन्ति सू॒रयः॑। दि॒वी॑व॒ चक्षु॒रात॑तम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे प्राणी सूर्य्य के प्रकाश में शुद्ध नेत्रों से मूर्त्तिमान् पदार्थों को देखते हैं, वैसे ही विद्वान् लोग निर्मल विज्ञान से विद्या वा श्रेष्ठ विचारयुक्त शुद्ध अपने आत्मा में जगदीश्वर को सब आनन्दों से युक्त और प्राप्त होने योग्य मोक्ष पद को देखकर प्राप्त होते हैं। इस की प्राप्ति के विना कोई मनुष्य सब सुखों को प्राप्त होने में समर्थ नहीं हो सकता। इस से इसकी प्राप्ति के निमित्त सब मनुष्यों को निरन्तर यत्न करना चाहिये। इस मन्त्र में ‘परमम्’ ‘पदम्’ इन पदों के अर्थ में यूरोपियन विलसन साहब ने कहा है कि इन का अर्थ स्वर्ग नहीं हो सकता, यह उनकी भ्रान्ति है, क्योंकि परमपद का अर्थ स्वर्ग ही है॥२०॥

तद्विप्रा॑सो विप॒न्यवो॑ जागृ॒वांसः॒ समि॑न्धते। विष्णो॒र्यत्प॑र॒मं प॒दम्॥

जो मनुष्य अविद्या और अधर्माचरणरूप नींद को छोड़कर विद्या धर्माचरण में जाग रहे हैं, वे ही सच्चिदानन्दस्वरूप सब प्रकार से उत्तम सबको प्राप्त होने योग्य निरन्तर सर्वव्यापी विष्णु अर्थात् जगदीश्वर को प्राप्त होते हैं॥२१॥पहिले सूक्त में जो दो पदों के अर्थ कहे थे, उनके सहचारि अश्वि, सविता, अग्नि, देवी, इन्द्राणी, वरुणानी, अग्नायी, द्यावापृथिवी, भूमि, विष्णु और इनके अर्थों का प्रकाश इस सूक्त में किया है, इससे पहिले सूक्त के साथ इस सूक्त की सङ्गति जाननी चाहिये। इसके आगे सायण और विलसन आदि विषय में जो यह सूक्त के अन्त में खण्डन द्योतक पङ्क्ति लिखते हैं, सो न लिखी जायेगी, क्योंकि जो सर्वथा अशुद्ध है, उसको बारंबार लिखना पुनरुक्त और निरर्थक है, जहाँ कहीं लिखने योग्य होगा, वहाँ तो लिखा ही जायेगा, परन्तु इतने लेख से यह अवश्य जानना कि ये टीका वेदों की व्याख्या तो नहीं हैं, किन्तु इनको व्यर्थ दूषित करनेहारी हैं॥

ती॒व्राः सोमा॑स॒ आ ग॑ह्या॒शीर्व॑न्तः सु॒ता इ॒मे। वायो॒ तान्प्रस्थि॑तान्पिब॥

प्राणी जिनको प्राप्त होने की इच्छा करते और जिनके मिलने में श्रद्धालु होते हैं, उन सबों को पवन ही प्राप्त करके यथावत् स्थिर करता है, इससे जिन पदार्थों के तीक्ष्ण वा कोमल गुण हैं, उन को यथावत् जानके मनुष्य लोग उन से उपकार लेवें॥१॥

उ॒भा दे॒वा दि॑वि॒स्पृशे॑न्द्रवा॒यू ह॑वामहे। अ॒स्य सोम॑स्य पी॒तये॑॥

जो अग्नि पवन और जो वायु अग्नि से प्रकाशित होता है, जो ये दोनों परस्पर आकाङ्क्षायुक्त अर्थात् सहायकारी हैं, जिनसे सूर्य्य प्रकाशित होता है, मनुष्य लोग जिनको साध और युक्ति के साथ नित्य क्रियाकुशलता में सम्प्रयोग करते हैं, जिनके सिद्ध करने से मनुष्य बहुत से सुखों को प्राप्त होते हैं, उनके जानने की इच्छा क्यों न करनी चाहिये॥२॥

इ॒न्द्र॒वा॒यू म॑नो॒जुवा॒ विप्रा॑ हवन्त ऊ॒तये॑। स॒ह॒स्रा॒क्षा धि॒यस्पती॑॥

विद्वानों को उचित है कि शिल्पविद्या की सिद्धि के लिये असंख्यात व्यवहारों को सिद्ध करानेवाले वेग आदि गुणयुक्त बिजुली और वायु के गुणों की क्रियासिद्धि के लिये अच्छे प्रकार सिद्धि करनी चाहिये॥३॥

मि॒त्रं व॒यं ह॑वामहे॒ वरु॑णं॒ सोम॑पीतये। ज॒ज्ञा॒ना पू॒तद॑क्षसा॥

मनुष्यों को प्राण और उदान वायु के विना सुखों का भोग और बल का सम्भव कभी नहीं हो सकता, इस हेतु से इनके सेवन की विद्या को ठीक-ठीक जानना चाहिये॥४॥

ऋ॒तेन॒ यावृ॑ता॒वृधा॑वृ॒तस्य॒ ज्योति॑ष॒स्पती॑। ता मि॒त्रावरु॑णा हुवे॥

न सूर्य और वायु के विना जल और ज्योति अर्थात् प्रकाश की योग्यता, न ईश्वर के उत्पादन किये विना सूर्य्य और वायु की उत्पत्ति का सम्भव और न इनके विना मनुष्यों के व्यवहारों की सिद्धि हो सकती है॥५॥

वरु॑णः प्रावि॒ता भु॑वन्मि॒त्रो विश्वा॑भिरू॒तिभिः॑। कर॑तां नः सु॒राध॑सः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिसलिये इन उक्त वायु और सूर्य के आश्रय करके सब पदार्थों के रक्षा आदि व्यवहार सिद्ध होते हैं, इसलिये विद्वान् लोग भी इनसे बहुत कार्य्यों को सिद्ध करके उत्तम-उत्तम धनों को प्राप्त होते हैं॥६॥

म॒रुत्व॑न्तं हवामह॒ इन्द्र॒मा सोम॑पीतये। स॒जूर्ग॒णेन॑ तृम्पतु॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि जिस सहायकारी पवन के विना अग्नि कभी प्रज्वलित होने को समर्थ और उक्त प्रकार बिजुली रूप अग्नि के विना किसी पदार्थ की बढ़ती का सम्भव नहीं हो सकता, ऐसा जानें॥७॥

इन्द्र॑ज्येष्ठा॒ मरु॑द्गणा॒ देवा॑सः॒ पूष॑रातयः। विश्वे॒ मम॑ श्रुता॒ हव॑म्॥

कोई भी मनुष्य जिन पवनों के विना कहना, सुनना और पुष्ट होनादि व्यवहारों को प्राप्त होने को समर्थ नहीं हो सकता। जिन के मध्य में सूर्य्य लोक सब से बड़ा विद्यमान, जो इसके प्रदीपन करानेवाले हैं, जो यह सूर्य्य लोक अग्निरूप ही है, जिन और जिस बिजुली के विना कोई भी प्राणी अपनी वाणी के व्यवहार करने को भी समर्थ नहीं हो सकता, इत्यादि इन सब पदार्थों की विद्या को जान के मनुष्यों को सदा सुखी होना चाहिये॥८॥

ह॒त वृ॒त्रं सु॑दानव॒ इन्द्रे॑ण॒ सह॑सा यु॒जा। मा नो॑ दुः॒शंस॑ ईशत॥

हम लोग ठीक पुरुषार्थ और ईश्वर की उपासना करके विद्वानों की प्रार्थना करते हैं कि जिससे हम लोगों को जो पवन, सूर्य्य की किरण वा बिजुली के साथ मेघमण्डल में रहनेवाले जल को छिन्न-भिन्न और वर्षा करके और फिर पृथिवी से जलसमूह को उठाकर ऊपर को प्राप्त करते हैं, उनकी विद्या मनुष्यों को प्रयत्न से अवश्य जाननी चाहिये॥९॥

विश्वा॑न्दे॒वान्ह॑वामहे म॒रुतः॒ सोम॑पीतये। उ॒ग्रा हि पृश्नि॑मातरः॥

जिससे यह वायु आकाश ही से उत्पन्न आकाश में आने-जाने और तेज स्वभाववाले हैं, इसी से विद्वान् लोग कार्य्य के अर्थ इनका स्वीकार करते हैं॥१०॥

जय॑तामिव तन्य॒तुर्म॒रुता॑मेति धृष्णु॒या। यच्छुभं॑ या॒थना॑ नरः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे विद्वान् लोग शूरवीरों को सेना से शत्रुओं के विजय वा जैसे पवनों के घिसने से बिजुली के यन्त्र को चलाकर दूरस्थ देशों को जा वा आग्नेयादि अस्त्रों की सिद्धि को करके सुखों को प्राप्त होते हैं, वैसे ही तुमको भी विज्ञान वा पुरुषार्थ करके इनसे व्यावहारिक और पारमार्थिक सुखों को निरन्तर बढ़ाना चाहिये॥११॥

ह॒स्का॒राद्वि॒द्युत॒स्पर्यतो॑ जा॒ता अ॑वन्तु नः। म॒रुतो॑ मृळयन्तु नः॥

मनुष्य लोग जब पहिले वायु फिर बिजुली के अनन्तर जल पृथिवी और ओषधी की विद्या को जानते हैं, तब अच्छे प्रकार सुखों को प्राप्त होते हैं॥१२॥

आ पू॑षञ्चि॒त्रब॑र्हिष॒माघृ॑णे ध॒रुणं॑ दि॒वः। आजा॑ न॒ष्टं यथा॑ प॒शुम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पशुओं को पालनेवाले अनेक काम करके, गो आदि पशुओं को पुष्ट करके, उनके दुग्ध आदि पदार्थों से मनुष्यों को सुखी करते हैं, वैसे ही यह सूर्य्यलोक चित्र-विचित्र लोकों से युक्त आकाश वा आकाश में रहनेवाले पदार्थों को, अपनी किरण वा आकर्षण शक्ति से पुष्ट करके प्रकाशित करता है॥१३॥

पू॒षा राजा॑न॒माघृ॑णि॒रप॑गूळ्हं॒ गुहा॑ हि॒तम्। अवि॑न्दच्चि॒त्रब॑र्हिषम्॥

जिस कारण जगत् का रचनेवाला ईश्वर सबको पुष्ट करने हारे हृदस्यस्थ प्राण और जीव को जानता है, इससे सबका जाननेवाला है॥१४॥

उ॒तो स मह्य॒मिन्दु॑भिः॒ षड्यु॒क्ताँ अ॑नु॒सेषि॑धत्। गोभि॒र्यवं॒ न च॑र्कृषत्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य वा खेती करनेवाला किरण वा हल आदि से वारंवार भूमि को आकर्षित वा खन, बो और धान्य आदि की प्राप्ति कर सचिक्कनकर पदार्थों के सेवन के साथ वसन्त आदि छः ऋतुओं को सुखों से संयुक्त करता है, वैसे ईश्वर भी समय के अनुकूल सब जीवों को कर्मों के अनुसार रस को उत्पन्न वा ऋतुओं के विभाग से उक्त ऋतुओं को सुख देनेवाली करता है॥१५॥

अ॒म्बयो॑ य॒न्त्यध्व॑भिर्जा॒मयो॑ अध्वरीय॒ताम्। पृ॒ञ्च॒तीर्मधु॑ना॒ पयः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे बन्धुजन अपने भाई को अच्छी प्रकार पुष्ट करके सुख करते हैं, वैसे ये जल ऊपर-नीचे जाते-आते हुए मित्र के समान प्राणियों के सुखों का सम्पादन करते हैं और इनके विना किसी प्राणी वा अप्राणी की उन्नति नहीं हो सकती। इससे ये रस की उत्पत्ति के द्वारा सब प्राणियों को माता पिता के तुल्य पालन करते हैं॥१६॥

अ॒मूर्या उप॒ सूर्ये॒ याभि॑र्वा॒ सूर्यः॑ स॒ह। ता नो॑ हिन्वन्त्वध्व॒रम्॥

जो जल पृथिवी आदि मूर्त्तिमान् पदार्थों से सूर्य्य की किरणों करके छिन्न-भिन्न अर्थात् कण-कण होता हुआ सूर्य के सामने ऊपर को जाता है, वही ऊपर से वृष्टि के द्वारा गिरा हुआ पान आदि व्यवहार वा विमान आदि यानों में अच्छे प्रकार संयुक्त किया हुआ सुख बढ़ाता है॥१७॥

अ॒पो दे॒वीरुप॑ ह्वये॒ यत्र॒ गावः॒ पिब॑न्ति नः। सिन्धु॑भ्यः॒ कर्त्वं॑ ह॒विः॥

सूर्य की किरणें जितना जल छिन्न-भिन्न अर्थात् कण-कण कर वायु के संयोग से खैंचती हैं, उतना ही वहाँ से निवृत्त होकर भूमि और ओषधियों को प्राप्त होता है। विद्वान् लोगों को वह जल, पान, स्नान और शिल्पकार्य आदि में संयुक्त कर नाना प्रकार के सुख सम्पादन करने चाहिये॥१८॥

अ॒प्स्व१॒॑न्तर॒मृत॑म॒प्सु भे॑ष॒जम॒पामु॒त प्रश॑स्तये। देवा॒ भव॑त वा॒जिनः॑॥

हे मनुष्यो तुम अमृतरूपी रस वा ओषधिवाले जलों से शिल्प और वैद्यकशास्त्र की विद्या से उनके गुणों को जानकर कार्य्य की सिद्धि वा सब रोगों की निवृत्ति नित्य करो॥१९॥

अ॒प्सु मे॒ सोमो॑ अब्रवीद॒न्तर्विश्वा॑नि भेष॒जा। अ॒ग्निं च॑ वि॒श्वश॑म्भुव॒माप॑श्च वि॒श्वभे॑षजीः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सब पदार्थ अपने गुणों से अपने-अपने स्वभावों और उनमें ओषधियों की पुष्टि करानेवाला चन्द्रमा और जो ओषधियों में मुख्य सोमलता है, ये दोनों जल के निमित्त और ग्रहण करने योग्य सब ओषधियों का प्रकाश करते हैं, वैसे सब ओषधियों के हेतु जल अपने अन्तर्गत समस्त सुखों का हेतु मेघ का प्रकाश और जो जलों में ओषधियों का निमित्त और जो जल में अग्नि का निमित्त है, ऐसा जानना चाहिये॥२०॥

आपः॑ पृणी॒त भे॑ष॒जं वरू॑थं त॒न्वे॒३॒॑ मम॑। ज्योक् च॒ सूर्यं॑ दृ॒शे॥

प्राणों के विना कोई प्राणी वा वृक्ष आदि पदार्थ बहुत काल शरीर धारण करने को समर्थ नहीं हो सकते, इससे क्षुधा और प्यास आदि रोगों के निवारण के लिये परम अर्थात् उत्तम से उत्तम औषधों को सेवने से योगयुक्ति से प्राणों का सेवन ही परम उत्तम है, ऐसा जानना चाहिये।

इ॒दमा॑पः॒ प्र व॑हत॒ यत्किं च॑ दुरि॒तं मयि॑। यद्वा॒हम॑भिदु॒द्रोह॒ यद्वा॑ शे॒प उ॒तानृ॑तम्॥

मनुष्य लोग जैसा कुछ पाप वा पुण्य करते हैं, सो सो ईश्वर अपनी न्याय व्यवस्था से उनको प्राप्त कराता ही है॥२२॥

आपो॑ अ॒द्यान्व॑चारिषं॒ रसे॑न॒ सम॑गस्महि। पय॑स्वानग्न॒ आ ग॑हि॒ तं मा॒ सं सृ॑ज॒ वर्च॑सा॥

सब प्राणियों को पिछले जन्म में किये हुए पुण्य वा पाप का फल वायु जल और अग्नि आदि पदार्थों के द्वारा इस जन्म वा अगले जन्म में प्राप्त होता ही है॥२३॥

सं मा॑ग्ने॒ वर्च॑सा सृज॒ सं प्र॒जया॒ समायु॑षा। वि॒द्युर्मे॑ अस्य दे॒वा इन्द्रो॑ विद्यात्स॒ह ऋषि॑भिः॥

जब जीव पिछले शरीर को छोड़कर अगले शरीर को प्राप्त होता है, तब उसके साथ जो स्वाभाविक मानस अग्नि जाता है, वही फिर शरीर आदि पदार्थों को प्रकाशित करता है, जो जीवों के पाप-पुण्य और जन्म का कारण है, उसको वे (ऋषि और विद्वान्) ही परमेश्वर के सिवाय जानते हैं, किन्तु परमेश्वर तो निश्चय के साथ यथायोग्य जीवों के पाप वा पुण्य को जानकर, उनके कर्म के अनुसार शरीर देकर, सुख दुःख का भोग कराता ही है॥२४॥पूर्व सूक्त से कहे हुए अश्वि आदि पदार्थों के अनुषङ्गी जो वायु आदि पदार्थ हैं, उनके वर्णन से पिछले बाईसवें सूक्त के अर्थ के साथ इस तेईसवें सूक्त के अर्थ की सङ्गति जाननी चाहिये॥

सूक्तम्

कस्य॑ नू॒नं क॑त॒मस्या॒मृता॑नां॒ मना॑महे॒ चारु॑ दे॒वस्य॒ नाम॑। को नो॑ म॒ह्या अदि॑तये॒ पुन॑र्दात्पि॒तरं॑ च दृ॒शेयं॑ मा॒तरं॑ च॥

इस मन्त्र में प्रश्न का विषय है कौन ऐसा पदार्थ है जो सनातन अर्थात् अविनाशी पदार्थों में भी सनातन अविनाशी है कि जिसका अत्यन्त उत्कर्षयुक्त नाम का स्मरण करें वा जानें? और कौन देव हम लोगों के लिये किस-किस हेतु से एक जन्म से दूसरे जन्म का सम्पादन करता? और अमृत वा आनन्द के करानेवाली मुक्ति को प्राप्त होकर भी फिर हम लोगों को माता-पिता से दूसरे जन्म में शरीर को धारण कराता है॥१॥

अ॒ग्नेर्व॒यं प्र॑थ॒मस्या॒मृता॑नां॒ मना॑महे॒ चारु॑ दे॒वस्य॒ नाम॑। स नो॑ म॒ह्या अदि॑तये॒ पुन॑र्दात्पि॒तरं॑ च दृ॒शेयं॑ मा॒तरं॑ च॥

हे मनुष्यो! हम लोग जिस अनादिस्वरूप सदा अमर रहने वा जो हम सब लोगों के किये हुए पाप और पुण्यों के अनुसार यथायोग्य सुख-दुःख फल देनेवाले जगदीश्वर देव को निश्चय करते और जिसकी न्याययुक्त व्यवस्था से पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं, तुम लोग भी उसी देव को जानो, किन्तु इससे और कोई उक्त कर्म करनेवाला नहीं है, ऐसा निश्चय हम लोगों को है कि वही मोक्षपदवी को पहुँचे हुए जीवों का भी महाकल्प के अन्त में फिर पाप-पुण्य की तुल्यता से पिता-माता और स्त्री आदि के बीच में मनुष्यजन्म धारण कराता है॥२॥

अ॒भि त्वा॑ देव सवित॒रीशा॑नं॒ वार्या॑णाम्। सदा॑वन्भा॒गमी॑महे॥

मनुष्यों को योग्य है कि जो सब का प्रकाशक सकल जगत् को उत्पन्न वा सब की रक्षा करनेवाला जगदीश्वर है, वही सब समय में उपासना करने योग्य है, क्योंकि इसको छोड़ के अन्य किसी की उपासना करके ईश्वर की उपासना का फल चाहे तो कभी नहीं हो सकता, इससे इसकी उपासना के विषय में कोई भी मनुष्य किसी दूसरे पदार्थ का स्थापन कभी न करे॥३॥

यश्चि॒द्धि त॑ इ॒त्था भगः॑ शशमा॒नः पु॒रा नि॒दः। अ॒द्वे॒षो हस्त॑योर्द॒धे॥

यहाँ वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मैं ईश्वर सब के निन्दक मनुष्य के लिये दुःख और स्तुति करनेवाले के लिये सुख देता हूँ, वैसे तुम भी सदा किया करो॥४॥

भग॑भक्तस्य ते व॒यमुद॑शेम॒ तवाव॑सा। मू॒र्धानं॑ रा॒य आ॒रभे॑॥

जो मनुष्य अपने क्रिया कर्म से ईश्वर की आज्ञा में प्राप्त होते हैं, वही उससे रक्षा को सब प्रकार से प्राप्त और सब मनुष्यों में उत्तम ऐश्वर्यवाले होकर प्रशंसा को प्राप्त होते हैं, क्योंकि वही ईश्वर जीवों को उनके कर्मों के अनुसार न्यायव्यवस्था से विभाग कर फल देता है॥५॥

न॒हि ते॑ क्ष॒त्रं न सहो॒ न म॒न्युं वय॑श्च॒नामी प॒तय॑न्त आ॒पुः। नेमा आपो॑ अनिमि॒षं चर॑न्ती॒र्न ये वात॑स्य प्रमि॒नन्त्यभ्व॑म्॥

ईश्वर के अनन्त सामर्थ्य होने से उसका परिमाण वा उसकी बराबरी कोई भी नहीं कर सकता है। ये सब लोक चलते हैं, परन्तु लोकों के चलने से उनमें व्याप्त ईश्वर नहीं चलता, क्योंकि जो सब जगह पूर्ण है, वह कभी चलेगा? इस ईश्वर की उपासना को छोड़ कर किसी जीव का पूर्ण अखण्डित राज्य वा सुख कभी नहीं हो सकता। इससे सब मनुष्यों को प्रमेय वा विनाशरहित परमेश्वर की सदा उपासना करनी योग्य है॥५॥

अ॒बु॒ध्ने राजा॒ वरु॑णो॒ वन॑स्यो॒र्ध्वं स्तूपं॑ ददते पू॒तद॑क्षः। नी॒चीनाः॑ स्थुरु॒परि॑ बु॒ध्न ए॑षाम॒स्मे अ॒न्तर्निहि॑ताः के॒तवः॑ स्युः॥

जिससे यह सूर्य्य रूप के न होने से अन्तरिक्ष का प्रकाश नहीं कर सकता, इससे जो ऊपरली वा बिचली किरणें हैं, वे ही मेघ की निमित्त हैं, जो उनमें जल के परमाणु रहते तो हैं, परन्तु वे अतिसूक्ष्मता के कारण दृष्टिगोचर नहीं होते। इसी प्रकार वायु अग्नि और पृथिवी आदि के भी अतिसूक्ष्म अवयव अन्तरिक्ष में रहते तो अवश्य हैं, परन्तु वे भी दृष्टिगोचर नहीं होते॥७॥

उ॒रुं हि राजा॒ वरु॑णश्च॒कार॒ सूर्या॑य॒ पन्था॒मन्वे॑त॒वा उ॑। अ॒पदे॒ पादा॒ प्रति॑धातवेऽकरु॒ताप॑व॒क्ता हृ॑दया॒विध॑श्चित्॥

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। जिस परमेश्वर ने निश्चय के साथ जिस सब से बड़े सूर्यलोक के लिये बड़ी-सी कक्षा अर्थात् उसके घूमने का मार्ग बनाया है, जो इसको वायुरूपी ईंधन से प्रदीप्त करता और जो सब लोक अन्तरिक्ष में अपनी-अपनी परिधियुक्त हैं कि किसी लोक का किसी लोकान्तर के साथ संग नहीं है, किन्तु सब अन्तरिक्ष में ठहरे हुए अपनी-अपनी परिधि पर चारों और घूमा करते हैं और जो आपस में जिस ईश्वर और वायु के आकर्षण और धारणशक्ति से अपनी-अपनी परिधि को छोड़कर इधर-उधर चलने को समर्थ नहीं हो सकते तथा जिस परमेश्वर और वायु के विना अन्य कोई भी इनका धारण करनेवाला नहीं है, जैसे परमेश्वर मिथ्यावादी अधर्म करनेवाले से पृथक् है, वैसे प्राण भी हृदय के विदीर्ण करनेवाले रोग से अलग है, उसकी उपासना वा कार्य्यों में योजना सब मनुष्य क्यों न करें॥८॥

श॒तं ते॑ राजन्भि॒षजः॑ स॒हस्र॑मु॒र्वी ग॑भी॒रा सु॑म॒तिष्टे॑ अस्तु। बाध॑स्व दू॒रे निर्ऋ॑तिं परा॒चैः कृ॒तं चि॒देनः॒ प्र मु॑मुग्ध्य॒स्मत्॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को जानना चाहिये कि जो सभाध्यक्ष और प्रजा के उत्तम मनुष्य पाप वा सर्वरोग निवारण और पृथिवी के धारण करने, अत्यन्त बुद्धि बल देकर दुष्टों को दण्ड दिलवानेवाले होते हैं, वे ही सेवा के योग्य हैं और यह भी जानना कि किसी का किया हुआ पाप भोग के विना निवृत्त नहीं होता और इसके निवारण के लिये कुछ परमेश्वर की प्रार्थना वा अपना पुरुषार्थ करना भी योग्य ही है, किन्तु यह तो है जो कर्म जीव वर्त्तमान में करता वा करेगा, उसकी निवृत्ति के लिये तो परमेश्वर की प्रार्थना वा उपदेश भी होता है॥९॥

अ॒मी य ऋक्षा॒ निहि॑तास उ॒च्चा नक्तं॒ ददृ॑श्रे॒ कुह॑ चि॒द्दिवे॑युः। अद॑ब्धानि॒ वरु॑णस्य व्र॒तानि॑ वि॒चाक॑शच्च॒न्द्रमा॒ नक्त॑मेति॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है तथा इस मन्त्र के पहिले भाग से प्रश्न और पिछले भाग से उनका उत्तर जानना चाहिये कि जब कोई किसी से पूछे कि ये नक्षत्र लोक अर्थात् तारागण किसने बनाये और किसने धारण किये हैं और रात्रि में दीखते तथा दिन में कहाँ जाते हैं, इनके उत्तर ये हैं कि ये सब ईश्वर ने बनाये और धारण किये हैं, इनमें आप ही प्रकाश नहीं किन्तु सूर्य्य के ही प्रकाश से प्रकाशमान होते हैं और ये कहीं नहीं जाते, किन्तु दिन में ढपे हुए दीखते नहीं और रात्रि में सूर्य की किरणों से प्रकाशमान होकर दीखते हैं, ये सब धन्यवाद देने योग्य ईश्वर के ही कर्म हैं, ऐसा सब सज्जनों को जानना चाहिये॥२०॥

तत्त्वा॑ यामि॒ ब्रह्म॑णा॒ वन्द॑मान॒स्तदा शा॑स्ते॒ यज॑मानो ह॒विर्भिः॑। अहे॑ळमानो वरुणे॒ह बो॒ध्युरु॑शंस॒ मा न॒ आयुः॒ प्र मो॑षीः॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को वेदोक्त रीति से परमेश्वर और सूर्य को जानकर सुखों को प्राप्त होना चाहिये और किसी मनुष्य को परमेश्वर वा सूर्य विद्या का अनादर न करना चाहिये, सर्वदा ईश्वर की आज्ञा का पालन और उसके रचे हुए जो कि सूर्यादिक पदार्थ हैं, उनके गुणों को जानकर उनसे उपकार लेके अपनी उमर निरन्तर बढ़ानी चाहिये॥११॥

तदिन्नक्तं॒ तद्दिवा॒ मह्य॑माहु॒स्तद॒यं केतो॑ हृ॒द आ वि च॑ष्टे। शुनः॒शेपो॒ यमह्व॑द्गृभी॒तः सो अ॒स्मान्राजा॒ वरु॑णो मुमोक्तु॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। सब मनुष्यों को इस प्रकार उपदेश करना तथा मानना चाहिये कि विद्वान् वेद और ईश्वर हमारे लिये जिस ज्ञान का उपदेश करते हैं तथा हम जो अपनी शुद्ध बुद्धि से निश्चय करते हैं, वही मुझ को और हे मनुष्य! तुम सब लोगों को स्वीकार करके पाप अधर्म करने से दूर रक्खा करे॥१२॥

शुनः॒शेपो॒ ह्यह्व॑द्गृभी॒तस्त्रि॒ष्वा॑दि॒त्यं द्रु॑प॒देषु॑ ब॒द्धः। अवै॑नं॒ राजा॒ वरु॑णः ससृज्याद्वि॒द्वाँ अद॑ब्धो॒ वि मु॑मोक्तु॒ पाशा॑न्॥

इस मन्त्र में भी लुप्तोपमा और श्लेषालङ्कार है। परमेश्वर ने जिस-जिस गुणवाले जो-जो पदार्थ बनाये हैं, उन-उन पदार्थों के गुणों को यथावत् जानकर इन-इन को कर्म, उपासना और ज्ञान में नियुक्त करे, जैसे परमेश्वर न्याय अर्थात् न्याययुक्त कर्म करता है, वैसे ही हम लोगों को भी कर्म नियम के साथ नियुक्त कर जो बन्धनों के करनेवाले पापात्मक कर्म हैं, उनको दूर ही से छोड़कर पुण्यरूप कर्मों का सदा सेवन करना चाहिये॥१३॥

अव॑ ते॒ हेळो॑ वरुण॒ नमो॑भि॒रव॑ य॒ज्ञेभि॑रीमहे ह॒विर्भिः॑। क्षय॑न्न॒स्मभ्य॑मसुर प्रचेता॒ राज॒न्नेनां॑सि शिश्रथः कृ॒तानि॑॥

जिन मनुष्यों ने परमेश्वर के रचे हुए संसार में पदार्थ करके प्रकट किये हुए बोध से किये पाप कर्मों को फलों से शिथिल कर दिया, वैसा अनुष्ठान करें। जैसे अज्ञानी पुरुष को पापफल दुःखी करते हैं, वैसे ज्ञानी पुरुष को दुःख नहीं दे सकते॥१४॥

उदु॑त्त॒मं व॑रुण॒ पाश॑म॒स्मदवा॑ध॒मं वि म॑ध्य॒मं श्र॑थाय। अथा॑ व॒यमा॑दित्य व्र॒ते तवाना॑गसो॒ अदि॑तये स्याम॥

जो ईश्वर की आज्ञा को यथावत् नित्य पालन करते हैं, वे ही पवित्र और सब दुःख बन्धनों से अलग होकर सुखों को निरन्तर प्राप्त होते हैं॥१५॥तेईसवें सूक्त के कहे हुए वायु आदि अर्थों के अनुकूल प्रजापति आदि अर्थों के कहने से इस चौबीसवें सूक्त की उक्त सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥

यच्चि॒द्धि ते॒ विशो॑ यथा॒ प्र दे॑व वरुण व्र॒तम्। मि॒नी॒मसि॒ द्यवि॑द्यवि॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे भगवन् जगदीश्वर! जैसे पिता आदि विद्वान् और राजा छोटे-छोटे अल्पबुद्धि उन्मत्त बालकों पर करुणा, न्याय और शिक्षा करते हैं, वैसे ही आप भी प्रतिदिन हमारे न्याय करुणा और शिक्षा करनेवाले हों॥१॥

मा नो॑ व॒धाय॑ ह॒त्नवे॑ जिहीळा॒नस्य॑ रीरधः। मा हृ॑णा॒नस्य॑ म॒न्यवे॑॥

ईश्वर उपदेश करता है कि हे मनुष्यो! जो अल्पबुद्धि अज्ञानीजन अपनी अज्ञानता से तुम्हारा अपराध करें, तुम उसको दण्ड ही देने को मत प्रवृत्त और वैसे ही जो अपराध करके लज्जित हो अर्थात् तुम से क्षमा करवावे तो उस पर क्रोध मत छोड़ो, किन्तु उसका अपराध सहो और उसको यथावत् दण्ड भी दो॥२॥

वि मृ॑ळी॒काय॑ ते॒ मनो॑ र॒थीरश्वं॒ न संदि॑तम्। गी॒र्भिर्व॑रुण सीमहि॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे भगवन् जगदीश्वर! जैसे रथ के स्वामी का भृत्य घोड़े को चारों ओर से बाँधता है, वैसे ही हम लोग आपका जो वेदोक्त ज्ञान है, उसको अपनी बुद्धि के अनुसार मन में दृढ़ करते हैं॥३॥

परा॒ हि मे॒ विम॑न्यवः॒ पत॑न्ति॒ वस्य॑इष्टये। वयो॒ न व॑स॒तीरुप॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे उड़ाये हुए पक्षी दूर जाके बसते हैं, वैसे ही क्रोधी मुझ से दूर बसें और मैं भी उनसे दूर बसूँ, जिससे हमारा उलटा स्वभाव और धर्म की हानि कभी न होवे॥४॥

क॒दा क्ष॑त्र॒श्रियं॒ नर॒मा वरु॑णं करामहे। मृ॒ळी॒कायो॑रु॒चक्ष॑सम्॥

मनुष्यों को परमेश्वर की आज्ञा का यथावत् पालन करके सब सुख और चक्रवर्त्ति राज्य न्याय के साथ सदा सेवन करने चाहियें॥५॥

तदित्स॑मा॒नमा॑शाते॒ वेन॑न्ता॒ न प्र यु॑च्छतः। धृ॒तव्र॑ताय दा॒शुषे॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे अति हर्ष करनेवाले बाजे बजाने में अति कुशल दो पुरुष बाजों को लेकर चलाकर बजाते हैं, वैसे ही सिद्ध किये विद्या के धारण करनेवाले मनुष्य से होम हुए पदार्थों को सूर्य और वायु चालन करके धारण करते हैं॥६॥

वेदा॒ यो वी॒नां प॒दम॒न्तरि॑क्षेण॒ पत॑ताम्। वेद॑ ना॒वः स॑मु॒द्रियः॑॥

जो ईश्वर ने वेदों में अन्तरिक्ष भू और समुद्र में जाने आनेवाले यानों की विद्या का उपदेश किया है, उन को सिद्ध करने को जो पूर्ण विद्या शिक्षा और हस्त क्रियाओं के कलाकौशल में कुशल मनुष्य होता है, वही बनाने में समर्थ हो सकता है॥७॥

वेद॑ मा॒सो धृ॒तव्र॑तो॒ द्वाद॑श प्र॒जाव॑तः। वेदा॒ य उ॑प॒जाय॑ते॥

जैसे परमेश्वर सर्वज्ञ होने से सब लोक वा काल की व्यवस्था को जानता है, वैसे मनुष्यों को सब लोक तथा काल के महिमा की व्यवस्था को जानकर इस को एक क्षण भी व्यर्थ नहीं खोना चाहिये॥८॥

वेद॒ वात॑स्य वर्त॒निमु॒रोर्ऋ॒ष्वस्य॑ बृह॒तः। वेदा॒ ये अ॒ध्यास॑ते॥

जो मनुष्य अग्नि आदि पदार्थों में परिमाण वा गुणों से बड़ा सब मूर्त्तिवाले पदार्थों का धारण करनेवाला वायु है, उसका कारण अर्थात् उत्पत्ति और जाने-आने के मार्ग और जो उसमें स्थूल वा सूक्ष्म पदार्थ ठहरे हैं, उनको भी यथार्थता से जान इनसे अनेक कार्य सिद्ध कर करा के सब प्रयोजनों को सिद्ध कर लेता है, वह विद्वानों में गणनीय विद्वान् होता है॥९॥

नि ष॑साद धृ॒तव्र॑तो॒ वरु॑णः प॒स्त्या३॒॑स्वा। साम्रा॑ज्याय सु॒क्रतुः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे परमेश्वर सब प्राणियों का उत्तम राजा है, वैसे जो ईश्वर की आज्ञा में वर्त्तमान धार्मिक शरीर और बुद्धि बलयुक्त मनुष्य हैं, वे ही उत्तम राज्य करने योग्य होते हैं॥१०॥

अतो॒ विश्वा॒न्यद्भु॑ता चिकि॒त्वाँ अ॒भि प॑श्यति। कृ॒तानि॒ या च॒ कर्त्वा॑॥

जिस प्रकार ईश्वर सब जगह व्याप्त और सर्वशक्तिमान् होने से सृष्टि रचनादि रूपी कर्म और जीवों के तीनों कालों के कर्मों को जानकर इनको उन-उन कर्मों के अनुसार फल देने को योग्य है, इसी प्रकार जो विद्वान् मनुष्य पहिले हो गये उनके कर्मों और आगे अनुष्ठान करने योग्य कर्मों के करने में युक्त होता है, वही सबको देखता हुआ सब के उपकार करनेवाले उत्तम से उत्तम कर्मों को कर सब का न्याय करने को योग्य होता है॥११॥

स नो॑ वि॒श्वाहा॑ सु॒क्रतु॑रादि॒त्यः सु॒पथा॑ करत्। प्र ण॒ आयूं॑षि तारिषत्॥

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। जो मनुष्य ब्रह्मचर्य्य और जितेन्द्रियता आदि से आयु बढ़ाकर धर्ममार्ग में विचरते हैं, उन्हीं को जगदीश्वर अनुगृहीत कर आनन्दयुक्त करता है। जैसे प्राण और सूर्य्य अपने बल और तेज से ऊँचे-नीचे स्थानों को प्रकाशित कर प्राणियों को सुख के मार्ग से युक्त करके उचित समय पर दिन-रात आदि सब कालविभागों को अच्छे प्रकार सिद्ध करते हैं, वैसे ही अपने आत्मा, शरीर और सेना के बल से न्यायाधीश मनुष्य धर्मयुक्त छोटे मध्यम और बड़े कर्मों के प्रचार से अधर्मयुक्त को छुड़ा उत्तम और नीच मनुष्यों का विभाग सदा किया करे॥१२॥

बिभ्र॑द्द्रा॒पिं हि॑र॒ण्ययं॒ वरु॑णो वस्त नि॒र्णिज॑म्। परि॒ स्पशो॒ निषे॑दिरे॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जैसे वायु बल का करने हारा होने से सब अग्नि आदि स्थूल और सूक्ष्म पदार्थों को धरके आकाश में गमन और आगमन करता हुआ चलता और जैसे सूर्य्यलोक भी स्वयं प्रकाशरूप होने से रात्रि को निवारण कर अपने प्रकाश से सबको प्रकाशता है, वैसे विद्वान् लोग भी विद्या और उत्तम शिक्षा के बल से सब मनुष्यों को धारण कर धर्म में चल सब अन्य मनुष्यों को चलाया करें॥१३॥

न यं दिप्स॑न्ति दि॒प्सवो॒ न द्रुह्वा॑णो॒ जना॑नाम्। न दे॒वम॒भिमा॑तयः॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जो हिंसक परद्रोही अभिमानयुक्त जन हैं, वे अज्ञानपन से परमेश्वर वा विद्वानों के गुणों को जान कर उनसे उपकार लेने को समर्थ नहीं हो सकते। इसलिये सब मनुष्यों को योग्य है कि उनके गुण, कर्म और स्वभाव का सदैव ग्रहण करें॥१४॥

उ॒त यो मानु॑षे॒ष्वा यश॑श्च॒क्रे असा॒म्या। अ॒स्माक॑मु॒दरे॒ष्वा॥

जिस सृष्टि करनेवाले अन्तर्यामी जगदीश्वर ने परोपकार वा जीवों को उनके कर्म के अनुसार भोग कराने के लिये सम्पूर्ण जगत् कल्प-कल्प में रचा है, जिसकी सृष्टि में पदार्थों के बाहर-भीतर चलनेवाला वायु सब कर्मों का हेतु है और विद्वान् लोग विद्या का प्रकाश और अविद्या का हनन करनेवाले प्रयत्न कर रहे हैं, इसलिये इस परमेश्वर के धन्यवाद के योग्य कर्म सब मनुष्यों को जानना चाहिये॥१५॥

परा॑ मे यन्ति धी॒तयो॒ गावो॒ न गव्यू॑ती॒रनु॑। इ॒च्छन्ती॑रुरु॒चक्ष॑सम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को ऐसा निश्चय करना चाहिये कि जैसे गौ आदि पशु अपने-अपने वेग के अनुसार दौड़ते हुए चाहे हुए स्थान को पहुँच कर थक जाते हैं, वैसे ही मनुष्य अपनी-अपनी बुद्धि बल के अनुसार परमेश्वर वायु और सूर्य्य आदि पदार्थों के गुणों को जानकर थक जाते हैं। किसी मनुष्य की बुद्धि वा शरीर का वेग ऐसा नहीं हो सकता कि जिस का अन्त न हो सके, जैसे पक्षी अपने-अपने बल के अनुसार आकाश को जाते हुए आकाश का पार कोई भी नहीं पाता, इसी प्रकार कोई मनुष्य विद्या विषय के अन्त को प्राप्त होने को समर्थ नहीं हो सकता है॥१६॥

सं नु वो॑चावहै॒ पुन॒र्यतो॑ मे॒ मध्वाभृ॑तम्। होते॑व॒ क्षद॑से प्रि॒यम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे यज्ञ कराने और करनेवाले प्रीति के साथ मिलकर यज्ञ को सिद्ध कर पूरण करते हैं, वैसे ही गुरु शिष्य मिलकर सब विद्याओं का प्रकाश करें। सब मनुष्यों को इस बात की चाहना निरन्तर रखनी चाहिये कि जिससे हमारी विद्या की वृद्धि प्रतिदिन होती रहे॥१७॥

दर्शं॒ नु वि॒श्वद॑र्शतं॒ दर्शं॒ रथ॒मधि॒ क्षमि॑। ए॒ता जु॑षत मे॒ गिरः॑॥

जिससे क्षमा आदि गुणों से युक्त मनुष्यों को यह जानना योग्य है कि प्रश्न और उत्तर के व्यवहार के किये विना परमेश्वर को जानने और शिल्पविद्या सिद्ध विमानादि रथों को कभी बनाने को शक्य नहीं और जो उनमें गुण हैं, वे भी इससे इनके विज्ञान होने के लिये सदैव प्रयत्न करना चाहिये॥१८॥

इ॒मं मे॑ वरुण श्रुधी॒ हव॑म॒द्या च॑ मृळय। त्वाम॑व॒स्युरा च॑के॥

जैसे परमात्मा जो उपासकों द्वारा निश्चय करके सत्य भाव और प्रेम के साथ की हुई स्तुतियों को अपने सर्वज्ञपन से यथावत् सुन कर उनके अनुकूल स्तुति करनेवालों को सुख देता है, वैसे विद्वान् लोग भी धार्मिक मनुष्यों की योग्य प्रशंसा को सुन सुखयुक्त किया करें॥१९॥

त्वं विश्व॑स्य मेधिर दि॒वश्च॒ ग्मश्च॑ राजसि। स याम॑नि॒ प्रति॑ श्रुधि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे परब्रह्म ने इस सब संसार के दो भेद किये हैं−एक प्रकाशवाला सूर्य्य आदि और दूसरा प्रकाशरहित पृथिवी आदि लोक। जो इनकी उत्पत्ति वा विनाश का निमित्तकारण काल है, उसमें सदा एक-सा रहनेवाला परमेश्वर सब प्राणियों के संकल्प से उत्पन्न हुई बातों का भी श्रवण करता है, इससे कभी अधर्म के अनुष्ठान की कल्पना भी मनुष्यों को नहीं करनी चाहिये, वैसे इस सृष्टिक्रम को जानकर मनुष्यों को ठीक-ठीक वर्त्तना चाहिये॥२०॥

उदु॑त्त॒मं मु॑मुग्धि नो॒ वि पाशं॑ मध्य॒मं चृ॑त। अवा॑ध॒मानि॑ जी॒वसे॑॥

जैसे धार्मिक परोपकारी विद्वान् होकर ईश्वर की प्रार्थना करते हैं, जगदीश्वर उनके सब दुःख बन्धनों को छुड़ाकर सुखयुक्त करता है, वैसे कर्म हम लोगों को क्या न करना चाहिये॥२१॥चौबीसवें सूक्त में कहे हुए प्रजापति आदि अर्थों के बीच जो वरुण शब्द है, उसके अर्थ को इस पच्चीसवें सूक्त में कहने से सूक्त के अर्थ की सङ्गति पहिले सूक्त के अर्थ के साथ जाननी चाहिये॥

वसि॑ष्वा॒ हि मि॑येध्य॒ वस्त्रा॑ण्यूर्जां पते। सेमं नो॑ अध्व॒रं य॑ज॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। यज्ञ करनेवाला विद्वान् हस्तक्रियाओं से बहुत पदार्थों को सिद्ध करनेवाले विद्वानों को स्वीकार और उनका सत्कार कर अनेक कार्य्यों को सिद्ध कर सुख को प्राप्त करे वा करावे। कोई भी मनुष्य उत्तम विद्वान् पुरुषों के प्रसङ्ग किये विना कुछ भी व्यवहार वा परमार्थरूपी कार्य्य को सिद्ध करने को समर्थ नहीं हो सकता है॥१॥

नि नो॒ होता॒ वरे॑ण्यः॒ सदा॑ यविष्ठ॒ मन्म॑भिः। अग्ने॑ दि॒वित्म॑ता॒ वचः॑॥

इस मन्त्र में पूर्व मन्त्र से (यज) इस पद की अनुवृत्ति आती है। मनुष्यों को योग्य है कि सज्जन मनुष्यों के सङ्ग से सकल कामनाओं की सिद्धि करें। इसके विना कोई भी मनुष्य सुखी रहने को समर्थ नहीं हो सकता॥२॥

आ हि ष्मा॑ सू॒नवे॑ पि॒तापिर्यज॑त्या॒पये॑। सखा॒ सख्ये॒ वरे॑ण्यः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अपने लड़कों को सुख सम्पादक उन पर कृपा करनेवाला पिता, स्वमित्रों को सुख देनेवाला मित्र और विद्यार्थियों को विद्या देनेवाला विद्वान् अनुकूल वर्त्तता है, वैसे ही सब मनुष्य सबके उपकार के लिये अच्छे प्रकार निरन्तर यत्न करें, ऐसा ईश्वर का उपदेश है॥३॥

आ नो॑ ब॒र्ही रि॒शाद॑सो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा। सीद॑न्तु॒ मनु॑षो यथा॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सभ्यतापूर्वक सभाचतुर मनुष्य सभा में वर्त्तें, वैसे ही सब मनुष्यों को सब दिन वर्त्तना चाहिये॥४॥

पूर्व्य॑ होतर॒स्य नो॒ मन्द॑स्व स॒ख्यस्य॑ च। इ॒मा उ॒ षु श्रु॑धी॒ गिरः॑॥

मनुष्यों को उचित है कि सब मनुष्यों में मित्रता रखकर उत्तम शिक्षा और विद्या को पढ़ सुन और विचार के विद्वान् होवें॥५॥

यच्चि॒द्धि शश्व॑ता॒ तना॑ दे॒वंदे॑वं॒ यजा॑महे। त्वे इद्धू॑यते ह॒विः॥

यहाँ वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। इस संसार में जितने प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष पदार्थ हैं, वे सब अनादि अति विस्तारवाले कारण से उत्पन्न हैं, ऐसा जानना चाहिये॥६॥

प्रि॒यो नो॑ अस्तु वि॒श्पति॒र्होता॑ म॒न्द्रो वरे॑ण्यः। प्रि॒याः स्व॒ग्नयो॑ व॒यम्॥

जैसे हम लोग सब के साथ मित्रभाव से वर्त्तते और ये सब लोग हम लोगों के साथ मित्रभाव और प्रीति से सब लोग वर्त्तते हैं, वैसे आप लोग भी होवें॥७॥

स्व॒ग्नयो॒ हि वार्यं॑ दे॒वासो॑ दधि॒रे च॑ नः। स्व॒ग्नयो॑ मनामहे॥

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि ईश्वर ने इस संसार में जितने पदार्थ उत्पन्न किये हैं, उनके जानने के लिये विद्याओं का सम्पादन करके कार्यों की सिद्धि करें॥८॥

अथा॑ न उ॒भये॑षा॒ममृ॑त॒ मर्त्या॑नाम्। मि॒थः स॑न्तु॒ प्रश॑स्तयः॥

जब तक मनुष्य लोग राग वा द्वेष को छोड़कर परस्पर उपकार के लिये विद्या शिक्षा और पुरुषार्थ से उत्तम-उत्तम कर्म नहीं करते, तब तक वे सुखों के सम्पादन करने को समर्थ नहीं हो सकते। इसलिये सबको योग्य है कि परमेश्वर की आज्ञा में वर्त्तमान होकर सब का कल्याण करें॥९॥

विश्वे॑भिरग्ने अ॒ग्निभि॑रि॒मं य॒ज्ञमि॒दं वचः॑। चनो॑ धाः सहसो यहो॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि अपने सन्तानों को निम्नलिखित ज्ञानकार्य्य में युक्त करें। जो कारणरूप नित्य अग्नि है, उससे ईश्वर की रचना में बिजुली आदि कार्य्यरूप पदार्थ सिद्ध होते हैं, फिर उनसे जो सब जीवों के अन्न को पचानेवाले अग्नि के समान अनेक पदार्थ उत्पन्न होते हैं, उन सब अग्नियों को कारण रूप ही अग्नि धारण करता है, जितने अग्नि के कार्य हैं, वे वायु के निमित्त ही प्रसिद्ध होते हैं, उन सबको पदार्थ धारण करते हैं, अग्नि और वायु के विना कभी किसी पदार्थ का धारण नहीं हो सकता है इत्यादि॥१०॥पहिले सूक्त में वरुण के अर्थ के अनुषङ्गी अर्थात् सहायक अग्नि शब्द के इस सूक्त में प्रतिपादन करने से पिछले सूक्त के अर्थ के साथ इस छब्बीसवें सूक्त के अर्थ की सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पहिले अष्टक में दूसरे अध्याय में इक्कीसवाँ वर्ग तथा पहिले मण्डल में छठे अनुवाक में छब्बीसवाँ सूक्त समाप्त हुआ॥२६॥पहिले सूक्त में वरुण के अर्थ के अनुषङ्गी अर्थात् सहायक अग्नि शब्द के इस सूक्त में प्रतिपादन करने से पिछले सूक्त के अर्थ के साथ इस छब्बीसवें सूक्त के अर्थ की सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पहिले अष्टक में दूसरे अध्याय में इक्कीसवाँ वर्ग तथा पहिले मण्डल में छठे अनुवाक में छब्बीसवाँ सूक्त समाप्त हुआ॥२६॥

अश्वं॒ न त्वा॒ वार॑वन्तं व॒न्दध्या॑ अ॒ग्निं नमो॑भिः। स॒म्राज॑न्तमध्व॒राणा॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् स्वविद्या के प्रकाश आदि गुणों से अपने राज्य में अविद्या अन्धकार को निवारण कर प्रकाशित होते हैं, वैसे परमेश्वर सर्वज्ञपन आदि से प्रकाशमान है॥१॥

स घा॑ नः सू॒नुः शव॑सा पृ॒थुप्र॑गामा सु॒शेवः॑। मी॒ढ्वाँ अ॒स्माकं॑ बभूयात्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्या सुशिक्षा से धार्म्मिक सुशील पुत्र अनेक अपने कहे के अनुकूल कामों को करके पिता माता आदि के सुखों को नित्य सिद्ध करता है, वैसे ही बहुत गुणवाला यह भौतिक अग्नि विद्या के अनुकूल रीति से सम्प्रयुक्त किया हुआ हम लोगों के सब सुखों को सिद्ध करता है॥२॥

स नो॑ दू॒राच्चा॒साच्च॒ नि मर्त्या॑दघा॒योः। पा॒हि सद॒मिद्वि॒श्वायुः॑॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों से उपासना किया हुआ ईश्वर वा सम्यक् सेवित विद्वान् युद्ध में शत्रुओं से रक्षा करनेवाला वा रक्षा का हेतु होकर शरीर आदि वा विमानादि की रक्षा करके हम लोगों के लिये सब आयु देता है॥३॥

इ॒ममू॒ षु त्वम॒स्माकं॑ स॒निं गा॑य॒त्रं नव्यां॑सम्। अग्ने॑ दे॒वेषु॒ प्र वो॑चः॥

हे जगदीश्वर! आप ने जैसे ब्रह्मा आदि महर्षि धार्मिक विद्वानों के आत्माओं में वेद द्वारा सत्य बोध का प्रकाश कर उनको उत्तम सुख दिया, वैसे ही हम लोगों के आत्माओं में बोध प्रकाशित कीजिये, जिससे हम लोग विद्वान् होकर उत्तम-उत्तम धर्मकार्यों का सदा सेवन करते रहें॥

आ नो॑ भज पर॒मेष्वा वाजे॑षु मध्य॒मेषु॑। शिक्षा॒ वस्वो॒ अन्त॑मस्य॥

इस प्रकार जिन धार्मिक पुरुषार्थी पुरुषों से सेवन किया हुआ विद्वान् सब विद्याओं को प्राप्त कराके उनको सुख युक्त करे तथा इस जगत् में उत्तम, मध्यम और निकृष्ट भेद से तीन प्रकार के भोगलोक और मनुष्य हैं, इन को यथा बुद्धि विद्या देता रहे॥५॥

वि॒भ॒क्तासि॑ चित्रभानो॒ सिन्धो॑रू॒र्मा उ॑पा॒क आ। स॒द्यो दा॒शुषे॑ क्षरसि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे समुद्र के जलकण अलग हुए आकाश को प्राप्त होकर वहाँ इकट्ठे होके वर्षते हैं, वैसे ही विद्वान् अपनी विद्या से सब पदार्थों का विभाग करके उनका बार-बार मनुष्यों के आत्माओं में प्रवेश किया करते हैं॥६॥

यम॑ग्ने पृ॒त्सु मर्त्य॒मवा॒ वाजे॑षु॒ यं जु॒नाः। स यन्ता॒ शश्व॑ती॒रिषः॑॥

जैसे जगदीश्वर जो अनादि काल से वर्त्तमान प्रजा की रक्षा, रचना और व्यवस्था करनेवाला है, वैसे जो मनुष्य इस सर्वव्यापी सब प्रकार की रक्षा करनेवाले परमेश्वर की उपासना कर यथोक्त काम करता है, उसको न कभी पीड़ा वा पराजय होता है॥७॥

नकि॑रस्य सहन्त्य पर्ये॒ता कय॑स्य चित्। वाजो॑ अस्ति श्र॒वाय्यः॑॥

जैसे कोई भी जीव जिस अनन्त शुभ गुणयुक्त परिमाण सहित सब से उत्तम परमेश्वर के गुणों की न्यूनता वा उसका परिमाण करने को योग्य नहीं हो सकता, जिसका सब ज्ञान निर्भ्रम है, वैसे जो मनुष्य वर्त्तता है, वही सब राजकार्यों का स्वामी नियत करना चाहिये॥८॥

स वाजं॑ वि॒श्वच॑र्षणि॒रर्व॑द्भिरस्तु॒ तरु॑ता। विप्रे॑भिरस्तु॒ सनि॑ता॥

जो मनुष्यों को सब दुःखरूपी सागर से पार करने और युद्ध में विजय देनेवाला विद्वान् है, वही अच्छे विद्वानों के समागम से सेना का अधिपति होने योग्य है॥९॥

जरा॑बोध॒ तद्वि॑विड्ढि वि॒शेवि॑शे य॒ज्ञिया॑य। स्तोमं॑ रु॒द्राय॒ दृशी॑कम्॥

इस मन्त्र में पूर्णोपमालङ्कार है। युद्धविद्या के जाननेवाले के गुणों को श्रवण करे विना इस का ज्ञान नहीं होता और जो प्रजा के सुख के लिये अतितीक्ष्ण स्वभाववाले शत्रुओं के बल के नाश करनेहारे भृत्यों को अच्छी शिक्षा दे कर रखता है, वही प्रजापालन में योग्य होता है॥१०॥

स नो॑ म॒हाँ अ॑निमा॒नो धू॒मके॑तुः पुरुश्च॒न्द्रः। धि॒ये वाजा॑य हिन्वतु॥

जो सब प्रकार श्रेष्ठ किसी के छिन्न-भिन्न करने में नहीं आता, सब का आधार, सब आनन्द का देने वा विज्ञानसमूह परमेश्वर है और जिसने महागुणयुक्त भौतिक अग्नि रची है, वही उत्तम कर्म वा शुद्ध विज्ञान में हम लोगों को सदा प्रेरणा करे॥११॥

स रे॒वाँइ॑व वि॒श्पति॒र्दैव्यः॑ के॒तुः शृ॑णोतु नः। उ॒क्थैर॒ग्निर्बृ॒हद्भा॑नुः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पूर्ण धनवाला विद्वान् मनुष्य धन भोगने योग्य पदार्थों से सब मनुष्यों को सुखसंयुक्त करता और सब की वार्त्ताओं को सुनता है, वैसे ही जगदीश्वर सबकी की हुई स्तुति को सुनकर उनको सुखसंयुक्त करता है॥१२॥

नमो॑ म॒हद्भ्यो॒ नमो॑ अर्भ॒केभ्यो॒ नमो॒ युव॑भ्यो॒ नम॑ आशि॒नेभ्यः॑। यजा॑म दे॒वान्यदि॑ श॒क्नवा॑म॒ मा ज्याय॑सः॒ शंस॒मा वृ॑क्षि देवाः॥

इस मन्त्र में ईश्वर का यह उपदेश है कि मनुष्यों को चाहिये अभिमान छोड़कर अन्नादि से सब उत्तम जनों का सत्कार करें अर्थात् जितना धन पदार्थ आदि उत्तम बातों से अपना सामर्थ्य हो उतना उनका संग करके विद्या प्राप्त करें, किन्तु उनकी कभी निन्दा न करें॥१३॥पिछले सूक्त में अग्नि का वर्णन है उसको अच्छे प्रकार जाननेवाले विद्वान् ही होते हैं, उनका यहाँ वर्णन करने से छब्बीसवें सूक्तार्थ के साथ इस सत्ताईसवें सूक्त की सङ्गति जाननी चाहिये। पिछले सूक्त में अग्नि का वर्णन है उसको अच्छे प्रकार जाननेवाले विद्वान् ही होते हैं, उनका यहाँ वर्णन करने से छब्बीसवें सूक्तार्थ के साथ इस सत्ताईसवें सूक्त की सङ्गति जाननी चाहिये।

यत्र॒ ग्रावा॑ पृ॒थुबु॑ध्न ऊ॒र्ध्वो भव॑ति॒ सोत॑वे। उ॒लूख॑लसुताना॒मवेद्वि॑न्द्र जल्गुलः॥

ईश्वर उपदेश करता है कि हे मनुष्यो! तुम यव आदि ओषधियों के असार निकालने और सार लेने के लिये भारी से पत्थर में जैसा चाहिये, वैसा गड्ढा करके उसको भूमि में गाड़ो और वह भूमि से कुछ ऊँचा रहे, जिससे कि अनाज के सार वा असार का निकालना अच्छे प्रकार बने, उसमें यव आदि अन्न स्थापन करके मुसल से उसको कूटो॥१॥

यत्र॒ द्वावि॑व ज॒घना॑धिषव॒ण्या॑ कृ॒ता। उ॒लूख॑लसुताना॒मवेद्वि॑न्द्र जल्गुलः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि जैसे दोनों जांघों के सहाय से मार्ग का चलना-चलाना सिद्ध होता है, वैसे ही एक तो पत्थर की शिला नीचे रक्खें और दूसरा ऊपर से पीसने के लिये बट्टा जिसको हाथ में लेकर पदार्थ पीसे जायें, इनसे औषधि आदि पदार्थों को पीसकर यथावत् भक्ष्य आदि पदार्थों को सिद्ध करके खावें। यह भी दूसरा साधन उखली मुसल के समान बनाना चाहिये॥२॥

यत्र॒ नार्य॑पच्य॒वमु॑पच्य॒वं च॒ शिक्ष॑ते। उ॒लूख॑लसुताना॒मवेद्वि॑न्द्र जल्गुलः॥

यह उलूखलविद्या जो कि भोजनादि के पदार्थ सिद्ध करनेवाली है, गृहसम्बन्धि कार्य करनेवाली होने से यह विद्या स्त्रियों को नित्य ग्रहण करनी और अन्य स्त्रियों को सिखाना भी चाहिये। जहाँ पाक सिद्ध किये जाते हों, वहाँ ये सब उलूखल आदि साधन स्थापन करने चाहिये, क्योंकि इनके विना कूटना-पीसना आदि क्रिया सिद्ध नहीं हो सकती॥३॥

यत्र॒ मन्थां॑ विब॒ध्नते॑ र॒श्मीन्यमि॑त॒वाइ॑व। उ॒लूख॑लसुताना॒मवेद्वि॑न्द्र जल्गुलः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। ईश्वर उपदेश करता है कि हे विद्वानो! जैसे सूर्य्य अपनी किरणों के साथ भूमि को आकर्षण शक्ति से बाँधता और जैसे सारथी रश्मियों से घोड़ों को नियम में रखता है, वैसे ही मथने बाँधने और चलाने की विद्या से दूध आदि वा औषधि आदि पदार्थों से मक्खन आदि पदार्थों को युक्ति के साथ सिद्ध करो॥४॥

यच्चि॒द्धि त्वं गृ॒हेगृ॑ह॒ उलू॑खलक यु॒ज्यसे॑। इ॒ह द्यु॒मत्त॑मं वद॒ जय॑तामिव दुन्दु॒भिः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। सब घरों में उलूखल और मुसल को स्थापन करना चाहिये, जैसे शत्रुओं के जीतनेवाले शूरवीर मनुष्य अपने नगाड़ों को बजा कर युद्ध करते हैं, वैसे ही रस चाहनेवाले मनुष्यों को उलूखल में यव आदि ओषधियों को डालकर मुसल से कूटकर भूसा आदि दूर करके सार-सार लेना चाहिये॥५॥

उ॒त स्म॑ ते वनस्पते॒ वातो॒ विवा॒त्यग्र॒मित्। अथो॒ इन्द्रा॑य॒ पात॑वे सु॒नु सोम॑मुलूखल॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जब पवन सब वनस्पति ओषधियों को अपने वेग से स्पर्श कर बढ़ाता है, तभी प्राणी उनको उलूखल में स्थापन करके उनका सार ले सकते और रस भी पीते हैं। इस वायु के विना किसी पदार्थ की वृद्धि वा पुष्टि होने का सम्भव नहीं हो सकता है॥६॥

आ॒य॒जी वा॑ज॒सात॑मा॒ ता ह्यु१॒॑च्चा वि॑जर्भृ॒तः। हरी॑इ॒वान्धां॑सि॒ बप्स॑ता॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे खानेवाले घोड़े रथ आदि को वहते हैं, वैसे ही मुसल और ऊखरी से पदार्थों को अलग-अलग करने आदि अनेक कार्यों को सिद्ध करते हैं॥७॥

ता नो॑ अ॒द्य व॑नस्पती ऋ॒ष्वावृ॒ष्वेभिः॑ सो॒तृभिः॑। इन्द्रा॑य॒ मधु॑मत्सुतम्॥

जैसे पत्थर के मूसल और उखली होते हैं, वैसे ही काष्ठ, लोहा, पीतल, चाँदी, सोना तथा औरों के भी किये जाते हैं, उन उत्तम उलूखल मुसलों से मनुष्य औषध आदि पदार्थों के अभिषव अर्थात् रस आदि खींचने के व्यवहार करें॥८॥

उच्छि॒ष्टं च॒म्वो॑र्भर॒ सोमं॑ प॒वित्र॒ आ सृ॑ज। नि धे॑हि॒ गोरधि॑ त्व॒चि॥

राजपुरुषों को चाहिये कि दो प्रकार की सेना रक्खें अर्थात् एक तो सवारों की दूसरी पैदलों की, उनके लिये उत्तम रस और शस्त्र आदि सामग्री इकट्ठी करें, अच्छी शिक्षा और औषधि देकर शुद्ध बलयुक्त और नीरोग कर पृथिवी पर एक चक्रराज्य नित्य करें॥९॥सत्ताईसवें सूक्त से अग्नि और विद्वान् जिस-जिस गुण को कहे हैं, वे मूसल और ऊखली आदि साधनों को ग्रहण कर औषध्यादि पदार्थों से संसार के पदार्थों से अनेक प्रकार के उत्तम-उत्तम पदार्थ उत्पन्न करें, इस अर्थ का इस सूक्त में सम्पादन करने से सत्ताईसवें सूक्त के कहे हुए अर्थ के साथ अट्ठाईसवें सूक्त की सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥९॥सत्ताईसवें सूक्त से अग्नि और विद्वान् जिस-जिस गुण को कहे हैं, वे मूसल और ऊखली आदि साधनों को ग्रहण कर औषध्यादि पदार्थों से संसार के पदार्थों से अनेक प्रकार के उत्तम-उत्तम पदार्थ उत्पन्न करें, इस अर्थ का इस सूक्त में सम्पादन करने से सत्ताईसवें सूक्त के कहे हुए अर्थ के साथ अट्ठाईसवें सूक्त की सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥९॥

यच्चि॒द्धि स॑त्य सोमपा अनाश॒स्ताइ॑व॒ स्मसि॑। आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे आलस्य के मारे अश्रेष्ठ अर्थात् कीर्त्तिरहित मनुष्य होते हैं, वैसे हम लोग भी जो कभी हों तो हे न्यायाधीश! हम लोगों को प्रशंसनीय पुरुषार्थ और गुणयुक्त कीजिये, जिससे हम लोग पृथिवी आदि राज्य और बहुत उत्तम-उत्तम हाथी, घोड़े, गौ, बैल आदि पशुओं को प्राप्त होकर उनका पालन वा उनकी वृद्धि करके उनके उपकार से प्रशंसावाले हों॥१॥

शिप्रि॑न्वाजानां पते॒ शची॑व॒स्तव॑ दं॒सना॑। आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ॥

मनुष्यों को इस प्रकार जगदीश्वर की प्रार्थना करनी चाहिये कि हे भगवन्! कृपा करके जैसे न्यायाधीश अत्युत्तम राज्य आदि को प्राप्त कराता है, वैसे हम लोगों को पृथिवी के राज्य सत्य बोलने और शिल्पविद्या आदि व्यवहारों की सिद्धि करने में बुद्धिमान् नित्य कीजिये॥२॥

नि ष्वा॑पया मिथू॒दृशा॑ स॒स्तामबु॑ध्यमाने। आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ॥

मनुष्यों को शरीर और आत्मा से आलस्य को दूर छोड़ के उत्तम कर्मों में नित्य प्रयत्न करना चाहिये॥३॥

स॒सन्तु॒ त्या अरा॑तयो॒ बोध॑न्तु शूर रा॒तयः॑। आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ॥

हम लोगों को अपनी सेना में शूर ही मनुष्य रखकर आनन्दित करने चाहिये, जिससे भय के मारे दुष्ट और शत्रुजन जैसे निद्रा में शान्त होते हैं, वैसे सर्वदा हों, जिससे हम लोग निष्कण्टक अर्थात् बेखटके चक्रवर्त्ति राज्य का सेवन नित्य करें॥४॥

समि॑न्द्र गर्द॒भं मृ॑ण नु॒वन्तं॑ पा॒पया॑मु॒या। आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सभास्वामी न्याय से अपने सिंहासन पर बैठकर जैसे गदहा रूखे और खोटे शब्द के उच्चारण से औरों की निन्दा करते हुए जन को दण्ड दे और जो सत्यवादी धार्मिक जन का सत्कार करे जो अन्याय के साथ औरों के पदार्थ को लेते हैं, उनको दण्ड दे के जिसका जो पदार्थ हो, वह उसको दिला देवे, इस प्रकार सनातन न्याय करनेवालों के धर्म में प्रवृत्त पुरुष का सत्कार हम लोग निरन्तर करें॥५॥

पता॑ति कुण्डृ॒णाच्या॑ दू॒रं वातो॒ वना॒दधि॑। आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को ऐसा जानना चाहिये कि जो यह पवन है, वही सब जगह जाता हुआ अग्नि आदि पदार्थों से अधिक कुटिलता से गमन करने हारा और बहुत से ऐश्वर्य की प्राप्ति तथा पशु वृक्षादि पदार्थों के व्यवहार उनके बढ़ने-घटने और समस्त वाणी के व्यवहार का हेतु है॥६॥

सर्वं॑ परिक्रो॒शं ज॑हि ज॒म्भया॑ कृकदा॒श्व॑म्। आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ॥

मनुष्यों को इस प्रकार जगदीश्वर की प्रार्थना करनी चाहिये कि हे परमात्मन्! आप हम लोगों में जो दुष्ट व्यवहार अर्थात् खोटे चलन तथा जो हमारे शत्रु हैं, उनको दूर कर हम लोगों के लिये सकल ऐश्वर्य दीजिये॥७॥पिछले सूक्त में पदार्थ विद्या और उसके साधन कहे हैं, उनके उपादान अत्यन्त प्रसिद्ध कराने हारे संसार के पदार्थ हैं, जो कि परमेश्वर ने उत्पन्न किये हैं, इस सूक्त में उन पदार्थों से उपकार ले सकनेवाली सभाध्यक्ष सहित सभा होती है, उसके वर्णन करने से पूर्वोक्त अट्ठाईसवें सूक्त के अर्थ के साथ इस उनतीसवें सूक्त के अर्थ की सङ्गति जाननी चाहिये।

आ व॒ इन्द्रं॒ क्रिविं॑ यथा वाज॒यन्तः॑ श॒तक्र॑तुम्। मंहि॑ष्ठं सिञ्च॒ इन्दु॑भिः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे मनुष्य पहिले कुएँ को खोद कर उसके जल से स्नान-पान और खेत बगीचे आदि स्थानों के सींचने से सुखी होते हैं, वैसे ही विद्वान् लोग यथायोग्य कलायन्त्रों में अग्नि को जोड़ के उसकी सहायता से कलों में जल को स्थापन करके उनको चलाने से बहुत कार्य्यों को सिद्ध करके सुखी होते हैं॥१॥

श॒तं वा॒ यः शुची॑नां स॒हस्रं॑ वा॒ समा॑शिराम्। एदु॑ नि॒म्नं न री॑यते॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। यह अग्नि सूर्य और बिजली जो इसके प्रसिद्ध रूप हैं, सैकड़ों पदार्थों की शुद्धि करता है और पकने योग्य पदार्थों में हजारों पदार्थों को अपने वेग से पकाता है, जैसे जल नीची जगह को जाता है, वैसे ही यह अग्नि ऊपर को जाता है। इन अग्नि और जल को लौट-पौट करने अर्थात् अग्नि को नीचे और जल को ऊपर स्थापन करने से वा दोनों के संयोग से वेग आदि गुण उत्पन्न होते हैं॥२॥

सं यन्मदा॑य शु॒ष्मिण॑ ए॒ना ह्य॑स्यो॒दरे॑। स॒मु॒द्रो न व्यचो॑ द॒धे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे समुद्र के मध्य में अनेक गुण, रत्न और जीव-जन्तु और अगाध जल है, वैसे ही अग्नि और जल के सकाश से प्रयत्न के साथ बहुत प्रकार का उपकार लेना चाहिये॥३॥

अ॒यमु॑ ते॒ सम॑तसि क॒पोत॑इव गर्भ॒धिम्। वच॒स्तच्चि॑न्न ओहसे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे कबूतर अपने वेग से कबूतरी को प्राप्त होता है, वैसे ही शिल्पविद्या से सिद्ध किया हुआ अग्नि अनुकूल अर्थात् जैसे चाहिये वैसे गति को प्राप्त होता है। मनुष्य इस विद्या को उपदेश वा श्रवण से पा सकते हैं॥४॥

स्तो॒त्रं रा॑धानां पते॒ गिर्वा॑हो वीर॒ यस्य॑ ते। विभू॑तिरस्तु सू॒नृता॑॥

इस मन्त्र में पिछले तीसरे मन्त्र से (मदाय) (शुष्मिणे) (नः) इन तीन पदों अनुवृत्ति है। हम लोगों को सब का स्वामी जो कि वेदों से परिपूर्ण विज्ञानरत ऐश्वर्य्ययुक्त और यथायोग्य न्याय करनेवाला सभाध्यक्ष वा सेनापति विद्वान् है, उसी को न्यायाधीश मानना चाहिये॥५॥

ऊ॒र्ध्वस्ति॑ष्ठा न ऊ॒तये॒ऽस्मिन्वाजे॑ शतक्रतो। सम॒न्येषु॑ ब्रवावहै॥

सत्य प्रचार के विचारशील पुरुषों को योग्य है कि जो अपने आत्मा में अन्तर्यामी जगदीश्वर है, उसकी आज्ञा से सभापति वा सेनापति के साथ सत्य और मिथ्या करने और न करने योग्य कामों का निश्चय करना चाहिये। इसके विना कभी किसी को विजय या सत्य बोध नहीं हो सकता। जो सर्वव्यापी जगदीश्वर न्यायाधीश को मानकर वा धार्मिक शूरवीर को सेनापति करके शत्रुओं के साथ युद्ध करते हैं, उन्हीं का निश्चय से विजय होता है, औरों का नहीं॥६॥

योगे॑योगे त॒वस्त॑रं॒ वाजे॑वाजे हवामहे। सखा॑य॒ इन्द्र॑मू॒तये॑॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को परस्पर मित्रता सिद्ध कर अलभ्य पदार्थों की रक्षा और सब जगह विजय करना चाहिये तथा परमेश्वर और सेनापति का नित्य आश्रय करना चाहिये और यह भी स्मरण रखना चाहिये कि उक्त आश्रय से ही उत्तम कार्यसिद्धि होने के योग्य हो, सो ही नहीं, किन्तु विद्या और पुरुषार्थ भी उनके लिये करने चाहिये॥७॥

आ घा॑ गम॒द्यदि॒ श्रव॑त्सह॒स्रिणी॑भिरू॒तिभिः॑। वाजे॑भि॒रुप॑ नो॒ हव॑म्॥

जहाँ मनुष्य सभा वा सेना के स्वामी का सेवन करते हैं, वहाँ वह सभाध्यक्ष अपनी सेना के अङ्ग वा अन्नादि पदार्थों के साथ उनके समीप स्थिर होता है। इस की सहायता के विना किसी को सत्य-सत्य सुख वा विजय नहीं होते हैं॥८॥

अनु॑ प्र॒त्नस्यौक॑सो हु॒वे तु॑विप्र॒तिं नर॑म्। यं ते॒ पूर्वं॑ पि॒ता हु॑वे॥

ईश्वर मनुष्यों को उपदेश करता है कि हे मनुष्यो! तुम को औरों के लिये ऐसा उपदेश करना चाहिये कि जो अनादि कारण से अनेक प्रकार के कार्य्यों को उत्पन्न करता है तथा जिस की उपासना पहिले विद्वानों ने की वा अब के करते और अगले करेंगे, उसी की उपासना नित्य करनी चाहिये। इस मन्त्र में ऐसा विषय है कि कोई किसी से पूछे कि तुम किस की उपासना करते हो? उसके लिये ऐसा उत्तर देवे कि जिसकी तुम्हारे पिता वा सब विद्वान् जन करते तथा वेद जिस निराकार, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, अज और अनादि स्वरूप जगदीश्वर का प्रतिपादन करते हैं, उसी की उपासना मैं निरन्तर करता हूँ॥९॥

तं त्वा॑ व॒यं वि॑श्ववा॒रा शा॑स्महे पुरुहूत। सखे॑ वसो जरि॒तृभ्यः॑॥

मनुष्यों को विद्वानों के समागम ही से सब जगत् के रचने, सबके पूजने योग्य, सबके मित्र, सबके आधार, पिछले मन्त्र से प्रतिपादित किये हुए परमेश्वर के विज्ञान वा उपासना की नित्य इच्छा करनी चाहिये, क्योंकि विद्वानों के उपदेश के विना किसी को यथायोग्य विशेष ज्ञान नहीं हो सकता है॥१०॥

अ॒स्माकं॑ शि॒प्रिणी॑नां॒ सोम॑पाः सोम॒पाव्ना॑म्। सखे॑ वज्रि॒न्त्सखी॑नाम्॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है और पूर्व मन्त्र से (त्वा) (वयम्) (आ) (शास्महे) इन चार पदों की अनुवृत्ति है। सब पुरुष वा सब स्त्रियों को परस्पर मित्रभाव का वर्त्ताव कर व्यवहार की सिद्धि के लिये परमेश्वर की प्रार्थना वा आर्य्य राजविद्या और धर्म सभा प्रयत्न के साथ सदा सम्पादन करनी चाहिये॥११॥

तथा॒ तद॑स्तु सोमपाः॒ सखे॑ वज्रि॒न्तथा॑ कृणु। यथा॑ त उ॒श्मसी॒ष्टये॑॥

जैसे सब का हित चाहनेवाला और सकल विद्यायुक्त सभा सेनाध्यक्ष निरन्तर प्रजा की रक्षा करे, वैसे ही प्रजा सेना के मनुष्यों को भी उसकी रक्षा की सम्भावना करनी चाहिये॥१२॥

रे॒वती॑र्नः सध॒माद॒ इन्द्रे॑ सन्तु तु॒विवा॑जाः। क्षु॒मन्तो॒ याभि॒र्मदे॑म॥

यहाँ वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को सभाध्यक्ष सेनाध्यक्ष सहित सभाओं में सब राज्य विद्या और धर्म के प्रचार करनेवाले कार्य स्थापन करके सब सुख भोगना वा भोगाना चाहिये और वेद की आज्ञा से एक से रूप स्वभाव और एकसी विद्या तथा युवा अवस्थावाले स्त्री और पुरुषों की परस्पर इच्छा से स्वयंवर विधान से विवाह होने योग्य हैं और वे अपने घर के कामों में तथा एक-दूसरे के सत्कार में नित्य यत्न करें और वे ईश्वर की उपासना वा उस की आज्ञा तथा सत्पुरुषों की आज्ञा में सदा चित्त देवें, किन्तु उक्त व्यवहार से विरुद्ध व्यवहार में कभी किसी पुरुष वा स्त्री को क्षणभर भी रहना न चाहिये॥१३॥

आ घ॒ त्वावा॒न्त्मना॒प्तः स्तो॒तृभ्यो॑ धृष्णविया॒नः। ऋ॒णोरक्षं॒ न च॒क्र्योः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार और प्रतीपालङ्कार हैं। जैसे पहियों की धुरी रथ को धारण करनेवाली घूमती भी अपने ही में ठहरी सी रहती है और रथ को देशान्तर में प्राप्त करनेवाली होती है, वैसे ही आप राज्य को व्याप्त होकर यथायोग्य नियम में रखते हो॥१४॥

आ यद्दुवः॑ शतक्रत॒वा कामं॑ जरितॄ॒णाम्। ऋ॒णोरक्षं॒ न शची॑भिः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे विद्वानों का सेवन विद्यार्थियों का अभीष्ट अर्थात् उनकी इच्छा के अनुकूल कामों को पूरा करता है, वैसे परमेश्वर का सेवन धार्मिक सज्जन मनुष्यों का अभीष्ट पूरा करता है। इसलिये उनको चाहिये कि परमेश्वर की सेवा नित्य करें॥१५॥

शश्व॒दिन्द्रः॒ पोप्रु॑थद्भिर्जिगाय॒ नान॑दद्भिः॒ शाश्व॑सद्भि॒र्धना॑नि। स नो॑ हिरण्यर॒थं दं॒सना॑वा॒न्त्स नः॑ सनि॒ता स॒नये॒ स नो॑ऽदात्॥

जैसे जगदीश्वर सनातन कारण से चर और अचर कार्यों को उत्पन्न करके इन्हीं से सब जीवों को सुख देता है, वैसे सभा, सेनापति, न्यायाधीश लोग सब सभा, सेना और न्याय के अङ्गों को सिद्ध कर सब प्रजा को निरन्तर आनन्दयुक्त करते हैं, जैसे इससे और कोई संसार का रचने वा कर्म फल का देने और ठीक न्याय से राज्य का पालन करनेवाला नहीं हो सकता, वैसे वे भी सब कार्य्य करें॥१६॥

आश्वि॑ना॒वश्वा॑वत्ये॒षा या॑तं॒ शवी॑रया। गोम॑द्दस्रा॒ हिर॑ण्यवत्॥

पूर्वोक्त अश्वि अर्थात् सूर्य्य और पृथिवी के गुणों से चलाया हुआ रथ शीघ्र गमन से भूमि, जल और अन्तरिक्ष में पदार्थों को प्राप्त करता है, इसलिये इसको शीघ्र साधना चाहिये॥१७॥

स॒मा॒नयो॑जनो॒ हि वां॒ रथो॑ दस्रा॒वम॑र्त्यः। स॒मु॒द्रे अ॑श्वि॒नेय॑ते॥

इस मन्त्र में पूर्व मन्त्र से (अश्वावत्या) (शवीरया) इन दो पदों की अनुवृत्ति है। मनुष्यों की जो अग्नि, वायु और जलयुक्त कलायन्त्रों से सिद्ध की हुई नाव हैं, वे निस्सन्देह समुद्र के अन्त को जल्दी पहुँचाती हैं, ऐसी-ऐसी नावों के विना अभीष्ट समय में चाहे हुए एक स्थान से दूसरे स्थान को जाना नहीं हो सकता है॥१८॥

न्य१॒॑घ्न्यस्य॑ मू॒र्धनि॑ च॒क्रं रथ॑स्य येमथुः। परि॒ द्याम॒न्यदी॑यते॥

शिल्पी विद्वानों को योग्य है कि जो शीघ्र जाने आने के लिये रथ बनाना चाहें तो उसके आगे एक-एक कलायन्त्रयुक्त चक्र तथा सब कलाओं के घूमने के लिये दूसरा चक्र नीचे भाग में रच के उसमें यन्त्र के साथ जल और अग्नि आदि पदार्थों का प्रयोग करें। इस प्रकार रचा हुए यान भारसहित शिल्पी विद्वान् लोगों को भूमि, समुद्र और अन्तरिक्ष मार्ग से सुखपूर्वक देशान्तर को प्राप्त कराता है॥१९॥

कस्त॑ उषः कधप्रिये भु॒जे मर्तो॑ अमर्त्ये। कं न॑क्षसे विभावरि॥

इस मन्त्र में काक्वर्थ है। कौन मनुष्य इस काल की सूक्ष्म गति जो व्यर्थ खोने के अयोग्य है, उसको जाने जो पुरुषार्थ के आरम्भ का आदि समय प्रातःकाल है, उसके निश्चय से प्रातःकाल उठ कर जब तक सोने का समय न हो, एक भी क्षण व्यर्थ न खोवे। इस प्रकार समय के सार्थपन को जानते हुए मनुष्य सब काल सुख भोग सकते हैं, किन्तु आलस्य करनेवाले नहीं॥२०॥

व॒यं हि ते॒ अम॑न्म॒ह्यान्ता॒दा प॑रा॒कात्। अश्वे॒ न चि॑त्रे अरुषि॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान काल का यथायोग्य उपयोग लेने को जानते हैं, उनके पुरुषार्थ से समीप वा दूर के सब कार्य सिद्ध होते हैं। इससे किसी मनुष्य को कभी क्षण भर भी व्यर्थ काल खोना न चाहिये॥२१॥

त्वं त्येभि॒रा ग॑हि॒ वाजे॑भिर्दुहितर्दिवः। अ॒स्मे र॒यिं नि धा॑रय॥

जो मनुष्य कुछ भी व्यर्थ काल नहीं खोते, उन का सब काल सब कामों की सिद्धि का करनेवाला होता है॥२२॥इस मन्त्र में पिछले सूक्त के अनुषङ्गी (इन्द्र) (अश्वि) और (उषा) समय के वर्णन से पिछले सूक्त के अनुषङ्गी अर्थों के साथ इस सूक्त के अर्थ की संगति जाननी चाहिये।

सूक्तम्

त्वम॑ग्ने प्रथ॒मो अङ्गि॑रा॒ ऋषि॑र्दे॒वो दे॒वाना॑मभवः शि॒वः सखा॑। तव॑ व्र॒ते क॒वयो॑ विद्म॒नाप॒सोऽजा॑यन्त म॒रुतो॒ भ्राज॑दृष्टयः॥

जो ईश्वर की आज्ञा पालन धर्म और विद्वानों के संग के सिवाय और कुछ काम नहीं करते हैं, उनकी परमेश्वर के साथ मित्रता होती है, फिर उस मित्रता से उनके आत्मा में सत् विद्या का प्रकाश होता है और वे विद्वान् होकर उत्तम काम का अनुष्ठान करके सब प्राणियों के सुख करने के लिये प्रसिद्ध होते हैं॥१॥

त्वम॑ग्ने प्रथ॒मो अङ्गि॑रस्तमः क॒विर्दे॒वानां॒ परि॑ भूषसि व्र॒तम्। वि॒भुर्विश्व॑स्मै॒ भुव॑नाय॒ मेधि॑रो द्विमा॒ता श॒युः क॑ति॒धा चि॑दा॒यवे॑॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। परमेश्वर वेद द्वारा वा उसके पढ़ाने से विद्वान् मनुष्य के विद्या धर्मरूपी व्रत वा लोकों के नियमरूपी व्रत को सुशोभित करता है, जिस ईश्वर ने सूर्य आदि प्रकाशवान् वा वायु पृथिवी आदि अप्रकाशवान् लोकसमूह रचा है, वह सर्वव्यापी है और ईश्वर की रची हुई सृष्टि से विद्या को प्रकाशित करता है, वह विद्वान् होता है, उस ईश्वर वा विद्वान् के विना कोई पदार्थ विद्या वा कारण से कार्यरूप सब लोकों के रचने धारणे और जानने को समर्थ नहीं हो सकता॥२॥

त्वम॑ग्ने प्रथ॒मो मा॑त॒रिश्व॑न आ॒विर्भ॑व सुक्रतू॒या वि॒वस्व॑ते। अरे॑जेतां॒ रोद॑सी होतृ॒वूर्येऽस॑घ्नोर्भा॒रमय॑जो म॒हो व॑सो॥

कारणरूप अग्नि अपने कारण और वायु के निमित्त से सूर्य रूप से प्रसिद्ध तथा अन्धकार विनाश करके पृथिवी वा प्रकाश का धारण करता है, वह यज्ञ वा शिल्पविद्या के निमित्त से कलायन्त्रों में संयुक्त किया हुआ बड़े-बड़े भारयुक्त विमान आदि यानों को शीघ्र ही देश-देशान्तर में पहुँचाता है॥३॥

त्वम॑ग्ने॒ मन॑वे॒ द्याम॑वाशयः पुरू॒रव॑से सु॒कृते॑ सु॒कृत्त॑रः। श्वा॒त्रेण॒ यत्पि॒त्रोर्मुच्य॑से॒ पर्या त्वा॒ पूर्व॑मनय॒न्नाप॑रं॒ पुनः॑॥

जिस जगदीश्वर ने सूर्य आदि जगत् रचा वा जिस विद्वान् से सुशिक्षा का ग्रहण किया जाता है उस परमेश्वर वा विद्वान् की प्राप्ति अच्छे कर्मों से होती है तथा चक्रवर्त्ति राज्य आदि धन का सुख भी वैसे ही होता है॥४॥

त्वम॑ग्ने वृष॒भः पु॑ष्टि॒वर्ध॑न॒ उद्य॑तस्रुचे भवसि श्र॒वाय्यः॑। य आहु॑तिं॒ परि॒ वेदा॒ वष॑ट्कृति॒मेका॑यु॒रग्रे॒ विश॑ आ॒विवा॑ससि॥

मनुष्यों को उचित है कि पहिले जगत् का कारण ब्रह्मज्ञान और यज्ञ की विद्या में जो क्रिया जिस-जिस प्रकार के होम करने योग्य पदार्थ हैं, उनको अच्छे प्रकार जानकर उनकी यथायोग्य क्रिया जानने से शुद्ध वायु और वर्षा जल की शुद्धि के निमित्त जो पदार्थ हैं, उनका होम अग्नि में करने से इस जगत् में बड़े-बड़े उत्तम-उत्तम सुख बढ़ते हैं और उनसे सब प्रजा आनन्दयुक्त होती है॥५॥

त्वम॑ग्ने वृजि॒नव॑र्तनिं॒ नरं॒ सक्म॑न्पिपर्षि वि॒दथे॑ विचर्षणे। यः शूर॑साता॒ परि॑तक्म्ये॒ धने॑ द॒भ्रेभि॑श्चि॒त्समृ॑ता॒ हंसि॒ भूय॑सः॥

परमेश्वर का यह स्वभाव है कि जो पुरुष अधर्म छोड़ धर्म करने की इच्छा करते हैं, उनको अपनी कृपा से शीघ्र ही धर्म में स्थिर करता है, जो धर्म से युद्ध वा धन को सिद्ध कराना चाहते हैं, उनकी रक्षा कर उनके कर्मों के अनुसार उनके लिये धन देता और जो खोटे आचरण करते हैं, उनको उनके कर्मों के अनुसार दण्ड देता है, जो ईश्वर की आज्ञा में वर्त्तमान धर्मात्मा थोड़े भी युद्ध के पदार्थों से युद्ध करने को प्रवृत्त होते हैं, ईश्वर उन्हीं को विजय देता है, औरों को नहीं॥६॥

त्वं तम॑ग्ने अमृत॒त्व उ॑त्त॒मे मर्तं॑ दधासि॒ श्रव॑से दि॒वेदि॑वे। यस्ता॑तृषा॒ण उ॒भया॑य॒ जन्म॑ने॒ मयः॑ कृ॒णोषि॒ प्रय॒ आ च॑ सू॒रये॑॥

जो ज्ञानी धर्मात्मा मनुष्य मोक्षपद को प्राप्त होते हैं, उनका उस समय ईश्वर ही आधार है, जो जन्म हो गया वह पहिला और जो मृत्यु वा मोक्ष होके होगा वह दूसरा, जो है वह तीसरा और जो विद्या वा आचार्य से होता है वह चौथा जन्म है। ये चार जन्म मिल के जो मोक्ष के पश्चात् होता है वह दूसरा जन्म है। इन दोनों जन्मों के धारण करने के लिये सब जीव प्रवृत्त हो रहे हैं। मोक्षपद से छूट कर संसार की प्राप्ति होती है, यह भी व्यवस्था ईश्वर के आधीन है॥७॥

त्वं नो॑ अग्ने स॒नये॒ धना॑नां य॒शसं॑ का॒रुं कृ॑णुहि॒ स्तवा॑नः। ऋ॒ध्याम॒ कर्मा॒पसा॒ नवे॑न दे॒वैर्द्या॑वापृथिवी॒ प्राव॑तं नः॥

मनुष्यों को परमेश्वर की इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये कि हे परमेश्वर! आप कृपा करके हम लोगों में उत्तम धन देनेवाली सब शिल्पविद्या के जाननेवाले उत्तम विद्वानों को सिद्ध कीजिये, जिससे हम लोग उनके साथ नवीन-नवीन पुरुषार्थ करके पृथिवी के राज्य और सब पदार्थों से यथायोग्य उपकार ग्रहण करें॥८॥

त्वं नो॑ अग्ने पि॒त्रोरु॒पस्थ॒ आ दे॒वो दे॒वेष्व॑नवद्य॒ जागृ॑विः। त॒नू॒कृद्बो॑धि॒ प्रम॑तिश्च का॒रवे॒ त्वं क॑ल्याण॒ वसु॒ विश्व॒मोपि॑षे॥

फिर भी ईश्वर की इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये कि हे भगवन्! जब-जब आप जन्म दें, तब-तब श्रेष्ठ विद्वानों के सम्बन्ध में जन्म दें और वहाँ हम लोगों को सर्व विद्यायुक्त कीजिये, जिससे हम लोग सब धनों को प्राप्त होकर सदा सुखी हों॥९॥

त्वम॑ग्ने॒ प्रम॑ति॒स्त्वं पि॒तासि॑ न॒स्त्वं व॑य॒स्कृत्तव॑ जा॒मयो॑ व॒यम्। सं त्वा॒ रायः॑ श॒तिनः॒ सं स॑ह॒स्रिणः॑ सु॒वीरं॑ यन्ति व्रत॒पाम॑दाभ्य॥

जैसे पिता सन्तानों को मान और सत्कार करने के योग्य है, वैसे प्रजाजनों को सभापति राजा है॥१०॥

त्वाम॑ग्ने प्रथ॒ममा॒युमा॒यवे॑ दे॒वा अ॑कृण्व॒न्नहु॑षस्य वि॒श्पति॑म्। इळा॑मकृण्व॒न्मनु॑षस्य॒ शास॑नीं पि॒तुर्यत्पु॒त्रो मम॑कस्य॒ जाय॑ते॥

ईश्वरोक्त व्यवस्था करनेवाले वेद शास्त्र और राजनीति के विना प्रजा पालनेहारा सभापति राजा प्रजा नहीं पाल सकता है और प्रजा राजा के अज्ञ सन्तान के तुल्य होती है, इससे सभापति राजा पुत्र के समान प्रजा को शिक्षा देवे॥११॥

त्वं नो॑ अग्ने॒ तव॑ देव पा॒युभि॑र्म॒घोनो॑ रक्ष त॒न्व॑श्च वन्द्य। त्रा॒ता तो॒कस्य॒ तन॑ये॒ गवा॑म॒स्यनि॑मेषं॒ रक्ष॑माण॒स्तव॑ व्र॒ते॥

सभापति राजा ईश्वर के जो संसार की धारणा और पालना आदि गुण हैं, उनके तुल्य उत्तम गुणों से अपने राज्य के नियम में प्रवृत्त जनों की निरन्तर रक्षा करे॥१२॥

त्वम॑ग्ने॒ यज्य॑वे पा॒युरन्त॑रोऽनिष॒ङ्गाय॑ चतुर॒क्ष इ॑ध्यसे। यो रा॒तह॑व्योऽवृ॒काय॒ धाय॑से की॒रेश्चि॒न्मन्त्रं॒ मन॑सा व॒नोषि॒ तम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे विद्यार्थी लोग अध्यापक अर्थात् पढ़ानेवालों से उत्तम विचार के साथ उत्तम-उत्तम विद्यार्थियों का सेवन करते हैं, वैसे तू भी धार्मिक विद्वानों के उपदेश के अनुकूल होके राजधर्म का सेवन करता रह॥१३॥

त्वम॑ग्न उरु॒शंसा॑य वा॒घते॑ स्पा॒र्हं यद्रेक्णः॑ पर॒मं व॒नोषि॒ तत्। आ॒ध्रस्य॑ चि॒त्प्रम॑तिरुच्यसे पि॒ता प्र पाकं॒ शास्सि॒ प्र दिशो॑ वि॒दुष्ट॑रः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पिता अपने सन्तानों की पालना वा उनको धन देता वा शिक्षा आदि करता है, वैसे राजा सब प्रजा के धारण करने और सब जीवों को धन के यथायोग्य देने से उनके कर्मों के अनुसार सुख दुःख देता है॥१४॥

त्वम॑ग्ने॒ प्रय॑तदक्षिणं॒ नरं॒ वर्मे॑व स्यू॒तं परि॑ पासि वि॒श्वतः॑। स्वा॒दु॒क्षद्मा॒ यो व॑स॒तौ स्यो॑न॒कृज्जी॑वया॒जं यज॑ते॒ सोप॒मा दि॒वः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सब के सुख करनेवाले पुरुषार्थी मनुष्य यत्न के साथ यज्ञों को करते हैं, वे जैसे सूर्य सबको प्रकाशित करके सुख देता है, वैसे सबको सुख देनेवाले होते हैं। जैसे युद्ध में प्रवृत्त हुए वीरों को शस्त्रों के घाओं से बख्तर बचाता है, वैसे ही सभापति राजा और राजजन सब धार्मिक सज्जनों को सब दुःखों से रक्षा करते रहें॥१५॥

इ॒माम॑ग्ने श॒रणिं॑ मीमृषो न इ॒ममध्वा॑नं॒ यमगा॑म दू॒रात्। आ॒पिः पि॒ता प्रम॑तिः सो॒म्यानां॒ भृमि॑रस्यृषि॒कृन्मर्त्या॑नाम्॥

जब मनुष्य सत्यभाव से अच्छे मार्ग को प्राप्त होना चाहते हैं, तब जगदीश्वर उनको उत्तम ज्ञान का प्रकाश करनेवाले विद्वानों का संग होने के लिये प्रीति और जिज्ञासा अर्थात् उनके उपदेश के जानने की इच्छा उत्पन्न करता है। इससे वे श्रद्धालु हुए अत्यन्त दूर भी बसनेवाले सत्यवादी योगी विद्वानों के समीप जाय, उनका संग कर अभीष्ट बोध को प्राप्त होकर धर्मात्मा होते हैं॥१६॥

म॒नु॒ष्वद॑ग्ने अङ्गिर॒स्वद॑ङ्गिरो ययाति॒वत्सद॑ने पूर्व॒वच्छु॑चे। अच्छ॑ या॒ह्या व॑हा॒ दैव्यं॒ जन॒मा सा॑दय ब॒र्हिषि॒ यक्षि॑ च प्रि॒यम्॥

जिन मनुष्यों ने विद्या धर्मानुष्ठान और प्रेम से सभापति की सेवा की है, वह उनको उत्तम-उत्तम धर्म के कामों में लगाता है॥१७॥

ए॒तेना॑ग्ने॒ ब्रह्म॑णा वावृधस्व॒ शक्ती॑ वा॒ यत्ते॑ चकृ॒मा वि॒दा वा॑। उ॒त प्र णे॑ष्य॒भि वस्यो॑ अ॒स्मान्त्सं नः॑ सृज सुम॒त्या वाज॑वत्या॥

जो मनुष्य वेद की रीति से धर्मयुक्त व्यवहार को करते हैं, वे ज्ञानवान् और श्रेष्ठमतिवाले होकर उत्तम विद्वान् की सेवा करते हैं, वह उनको श्रेष्ठ सामर्थ्य और उत्तम विद्या से संयुक्त करता है॥१८॥इस सूक्त में सभा, सेनापति आदि के अनुयोगी अर्थों के प्रकाश से पिछले सूक्त के साथ इस सूक्त की सङ्गति जाननी चाहिये।

इन्द्र॑स्य॒ नु वी॒र्या॑णि॒ प्र वो॑चं॒ यानि॑ च॒कार॑ प्रथ॒मानि॑ व॒ज्री। अह॒न्नहि॒मन्व॒पस्त॑तर्द॒ प्र व॒क्षणा॑ अभिन॒त्पर्व॑तानाम्॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। ईश्वर का उत्पन्न किया हुआ यह अग्निमय सूर्यलोक जैसे अपने स्वाभाविक गुणों से युक्त अनादि प्रकाश आकर्षण दाह छेदन और वर्षा की उत्पत्ति के निमित्त कामों को दिन-रात करता है वैसे जो प्रजा के पालन में तत्पर राजपुरुष हैं उनको भी नित्य करना चाहिये॥१॥

अह॒न्नहिं॒ पर्व॑ते शिश्रिया॒णं त्वष्टा॑स्मै॒ वज्रं॑ स्व॒र्यं॑ ततक्ष। वा॒श्रा इ॑व धे॒नवः॒ स्यन्द॑माना॒ अञ्जः॑ समु॒द्रमव॑ जग्मु॒रापः॑॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य अपनी किरणों से अन्तरिक्ष में रहनेवाले मेघ को भूमि पर गिराकर जगत् को जिआता है वैसे ही सेनापति किला पर्वत आदि में रहनेवाले भी शत्रु को पृथिवी में गिरा के प्रजा को निरन्तर सुखी करता है॥२॥

वृ॒षा॒यमा॑णोऽवृणीत॒ सोमं॒ त्रिक॑द्रुकेष्वपिबत्सु॒तस्य॑। आ साय॑कं म॒घवा॑दत्त॒ वज्र॒मह॑न्नेनं प्रथम॒जा मही॑नाम्॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे बैल वीर्य को बढ़ा बलवान् हो सुखी होता है वैसे सेनापति दूध आदि पीकर बलवान् हो के सुखी होवे और जैसे सूर्य्य रस को पी अच्छे प्रकार वरसाता है वैसै शत्रुओं के बल कों खींच अपना बल बढ़ा के प्रजा में सुखों की वृष्टि करे॥३॥

यदि॒न्द्राह॑न्प्रथम॒जामही॑ना॒मान्मा॒यिना॒ममि॑नाः॒ प्रोत मा॒याः। आत्सूर्यं॑ ज॒नय॒न्द्यामु॒षासं॑ ता॒दीत्ना॒ शत्रुं॒ न किला॑ विवित्से॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे कोई राजपुरुष अपने वैरियों के बल और छल का निवारण कर और उनको जीत के अपने राज्य में सुख तथा न्याय का प्रकाश करता है वैसे ही सूर्य भी मेघ की घटाओं को घनता और अपने प्रकाश के ढाँपनेवाले मेघ को निवारण कर अपनी किरणों को फैला मेघ को छिन्न-भिन्न और अन्धकार को दूर कर अपनी दीप्ति को प्रसिद्ध करता है॥४॥

अह॑न्वृ॒त्रं वृ॑त्र॒तरं॒ व्यं॑स॒मिन्द्रो॒ वज्रे॑ण मह॒ता व॒धेन॑। स्कन्धां॑सीव॒ कुलि॑शेना॒ विवृ॒क्णाहिः॑ शयत उप॒पृक्पृ॑थि॒व्याः॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमा और उपमालङ्कार हैं। जैसे कोई अतितीक्ष्ण तलवार आदि शस्त्रों से शत्रुओं के शरीर को छेदन कर भूमि में गिरा देता और वह मरा हुआ शत्रु पृथिवी पर निरन्तर सो जाता है वैसे ही यह सूर्य्य और बिजुली मेघ के अङ्गों को छेदन कर भूमि में गिरा देती और वह भूमि में गिरा हुआ होने के समान दीख पड़ता है॥५॥

अ॒यो॒द्धेव॑ दु॒र्मद॒ आ हि जु॒ह्वे म॑हावी॒रं तु॑विबा॒धमृ॑जी॒षम्। नाता॑रीदस्य॒ समृ॑तिं व॒धानां॒ सं रु॒जानाः॑ पिपिष॒ इन्द्र॑शत्रुः॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे मेघ संसार के प्रकाश के लिये वर्त्तमान सूर्य के प्रकाश को अकस्मात् पृथिवी से उठा और रोक कर उसके साथ युद्ध करते हुए के समान वर्त्तता है तो भी वह मेघ सूर्य के सामर्थ्य का पार नहीं पाता जब यह सूर्य मेघ को मारकर भूमि में गिरा देता है तब उसके शरीर के अवयवों से निकले हुए जलों से नदी पूर्ण होकर समुद्र में जा मिलती हैं। वैसे राजा को उचित हैं कि शत्रुओं को मारके निर्मूल करता रहे॥६॥

अ॒पाद॑ह॒स्तो अ॑पृतन्य॒दिन्द्र॒मास्य॒ वज्र॒मधि॒ सानौ॑ जघान। वृष्णो॒ वध्रिः॑ प्रति॒मानं॒ बुभू॑षन्पुरु॒त्रा वृ॒त्रो अ॑शय॒द्व्य॑स्तः॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे कोई निर्बल पुरुष बड़े बलवान् के साथ युद्ध चाहें वैसे ही वृत्र मेघ सूर्य के साथ प्रवृत्त होता है और जैसे अन्त में वह मेघ सूर्य से छिन्न-भिन्न होकर पराजित हुए के समान पृथिवी पर गिर पड़ता है वैसे जो धर्मात्मा बलवान् पुरुष के सङ्ग लड़ाई को प्रवृत्त होता है उसकी भी ऐसी ही दशा होती है॥७॥

न॒दं न भि॒न्नम॑मु॒या शया॑नं॒ मनो॒ रुहा॑णा॒ अति॑ य॒न्त्यापः॑। याश्चि॑द्वृ॒त्रो म॑हि॒ना प॒र्यति॑ष्ठ॒त्तासा॒महिः॑ पत्सुतः॒शीर्ब॑भूव॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमा और उपमालङ्कार हैं। जितना जल सूर्य से छिन्न-भिन्न होकर पवन के साथ मेघमण्डल को जाता है वह सब जल मेघरूप ही हो जाता है जब मेघ के जल का समूह अत्यन्त बढ़ता है तब मेघ घनी-२ घटाओं से घुमड़ि-२ के सूर्य के प्रकाश को ढांप लेता है उसको सूर्य अपनी किरणों से जब छिन्न-भिन्न करता है तब इधर-उधर आए हुए जल बड़े-२ नद ताल और समुद्र आदि स्थानों को प्राप्त होकर सोते हैं वह मेघ भी पृथिवी को प्राप्त होकर जहां तहां सोता है अर्थात् मनुष्य आदि प्राणियों के पैरों में सोता सा मालूम होता है वैसे अधार्मिक मनुष्य भी प्रथम बढ़ के शीघ्र नष्ट हो जाता है॥८॥

नी॒चाव॑या अभवद्वृ॒त्रपु॒त्रेन्द्रो॑ अस्या॒ अव॒ वध॑र्जभार। उत्त॑रा॒ सूरध॑रः पु॒त्र आ॑सी॒द्दानुः॑ शये स॒हव॑त्सा॒ न धे॒नुः॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। मेघ की दो माता हैं एक पृथिवी दूसरी अन्तरिक्ष अर्थात् इन्हीं दोनों से मेघ उत्पन्न होता है जैसे कोई गाय अपने बछड़े के साथ रहती है वैसे ही जब जल का समूह मेघ अन्तरिक्ष में जाकर ठहरता है तब उसकी माता अन्तरिक्ष अपने पुत्र मेघ के साथ और जब वह वर्षा से भूमि को आता है तब भूमि उस अपने पुत्र मेघ के साथ सोती सी दीखती है इस मेघ का उत्पन्न करनेवाला सूर्य है इसलिये वह पिता के स्थान में समझा जाता है उस सूर्य्य की भूमि वा अन्तरिक्ष दो स्त्री के समान हैं वह पदार्थों से जल को वायु के द्वारा खींचकर जब अन्तरिक्ष में चढ़ाता है जब वह पुत्र मेघ प्रमत्त के सदृश बढ़कर उठता और सूर्य के प्रकाश को ढकल्लेता है तब सूर्य्य उसको मारकर भूमि में गिरा देता अर्थात् भूमि में वीर्य छोड़ने के समान जल पहुंचाता है इसी प्रकार यह मेघ कभी ऊपर कभी नीचे होता है वैसे ही राजपुरुषों को उचित है कि कंटकरूप शत्रुओं को इधर-उधर निर्बीज करके प्रजा का पालन करें॥९॥

अति॑ष्ठन्तीनामनिवेश॒नानां॒ काष्ठा॑नां॒ मध्ये॒ निहि॑तं॒ शरी॑रम्। वृ॒त्रस्य॑ नि॒ण्यं वि च॑र॒न्त्यापो॑ दी॒र्घं तम॒ आश॑य॒दिन्द्र॑शत्रुः॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सभापति को योग्य है कि जैसे यह मेघ अन्तरिक्ष में ठहरानेवाले जलों में सूक्ष्मपन में नहीं दीखता फिर जब घन के आकार वर्षा के द्वारा जल का समुदाय रूप होता है तब वह देखने में आता है और जैसे वे जल एक क्षणभर भी स्थिति को नहीं पाते हैं किन्तु सब काल में ऊपर जाना वा नीचे आना इस प्रकार घूमते ही रहते हैं और जो मेघ के शरीर रूप हैं वे अन्तरिक्ष में रहते हुए अति सूक्ष्म होने से नहीं दीख पड़ते वैसे बड़े-२ बलवाले शत्रुओं को भी अल्प बलवाले करके वशीभूत किया करे॥१०॥

दा॒सप॑त्नी॒रहि॑गोपा अतिष्ठ॒न्निरु॑द्धा॒ आपः॑ प॒णिने॑व॒ गावः॑। अ॒पां बिल॒मपि॑हितं॒ यदासी॑द्वृ॒त्रं ज॑घ॒न्वाँ अप॒ तद्व॑वार॥

इस मंत्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे गोपाल अपनी गौओं को अपने अनुकूल स्थान में रोक रखता और फिर उस स्थान का दरवाजा खोल के निकाल देता है और जैसे मेघ अपने मंडल में जलों का द्वार रोक के उन जलों को वश में रखता है वैसे सूर्य्य उस मेघ को ताड़ना देता और उस जल की रुकावट को तोड़ के अच्छे प्रकार उसे बरसाता है वैसे ही राजपुरुषों को चाहिये कि शत्रुओं को रोकेकर प्रजा का यथायोग्य पालन किया करें॥११॥

अश्व्यो॒ वारो॑ अभव॒स्तदि॑न्द्र सृ॒के यत्त्वा॑ प्र॒त्यह॑न्दे॒व एकः॑। अज॑यो॒ गा अज॑यः शूर॒ सोम॒मवा॑सृजः॒ सर्त॑वे स॒प्त सिन्धू॑न्॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे यह मेघ सूर्य के प्रकाश को ढांप देता तब वह सूर्य अपनी किरणों से उसको छिन्न-भिन्न कर भूमि में जल को वर्षाता है इसीसे यह सूर्य उस जल समुदाय को पहुंचाने न पहुंचाने के लिये समुद्रों को रचने का हेतु होता है वैसे प्रजा का रक्षक राजा शत्रुओं को बांध शस्त्रों से काट और नीच गति को प्राप्त करके प्रजा को धर्मयुक्त मार्ग में चलाने का निमित्त होवे॥१२॥

नास्मै॑ वि॒द्युन्न त॑न्य॒तुः सि॑षेध॒ न यां मिह॒मकि॑रद्ध्रा॒दुनिं॑ च। इन्द्र॑श्च॒ यद्यु॑यु॒धाते॒ अहि॑श्चो॒ताप॒रीभ्यो॑ म॒घवा॒ वि जि॑ग्ये॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजपुरुषों को योग्य है कि जैसे वृत्र अर्थात् मेघ के जितने बिजली आदि युद्ध के साधन हैं वे सब सूर्य के आगे क्षुद्र अर्थात् सब प्रकार निर्बल और थोड़े हैं और सूर्य के युद्धसाधन उसकी अपेक्षा से बड़े-२ हैं इसीसे सब समय में सूर्य ही का विजय और मेघ का पराजय होता रहता है वैसे ही धर्म से शत्रुओं को जीतें॥१३॥

अहे॑र्या॒तारं॒ कम॑पश्य इन्द्र हृ॒दि यत्ते॑ ज॒घ्नुषो॒ भीरग॑च्छत्। नव॑ च॒ यन्न॑व॒तिं च॒ स्रव॑न्तीः श्ये॒नो न भी॒तो अत॑रो॒ रजां॑सि॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। राजसेना के वीर पुरुषों को योग्य है कि जैसे किसी से पीड़ा को पाकर डरा हुआ श्येन पक्षी इधर-उधर गिरता पड़ता उड़ता है वा सूर्य से अनेक प्रकार की ताड़ना और खैंच कढ़ेर को प्राप्त होकर मेघ इधर-उधर देशदेशान्तर में अनेक नदी वा नाड़ियों को पूर्ण करता है इस मेघ की उत्पत्ति का सूर्य से भिन्न कोई निमित्त नहीं है। और जैसे अन्धकार में प्राणियों को भय होता है वैसे ही मेघ के बिजली और गर्जना आदि गुणों से भय होता है उस भय का दूर करनेवाला भी सूर्य ही है तथा सब लोकों के व्यवहारों को अपने प्रकाश और आकर्षण आदि गुणों में चलानेवाला है वैसे ही दुष्ट शत्रुओं को जीता करें। इस मंत्र में (नवनवतिम्) यह संख्या का उपलक्षण होने से पद असंख्यात अर्थ में है॥१४॥

इन्द्रो॑ या॒तोऽव॑सितस्य॒ राजा॒ शम॑स्य च शृ॒ङ्गिणो॒ वज्र॑बाहुः। सेदु॒ राजा॑ क्षयति चर्षणी॒नाम॒रान्न ने॒मिः परि॒ ता ब॑भूव॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार और पूर्व मंत्र से (रजांसि) इस पद की अनुवृत्ति आती है। राजा को चाहिये कि जैसे रथ का पहिया धुरियों को चलाता और जैसे यह सूर्य चराचर शांत और अशांत संसार में प्रकाशमान होकर सब लोकों को धारण किये हुए उन सभों को अपनी-२ कक्षा में चलाता है जैसे सूर्य के विना अति निकट मूर्त्तिमान् लोक की धारणा आकर्षण प्रकाश और मेघ की वर्षा आदि काम किसी से नहीं हो सकते हैं। वैसे धर्म से प्रजा को पालन किया करें॥१५॥इस सूक्त में सूर्य और मेघ के युद्ध वर्णन करने से इस सूक्त की पिछले सूक्त में प्रकाशित किये अग्नि शब्द के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह पहिले अष्टक के दूसरे अध्याय में अड़तीसवां वर्ग और पहिले मण्डल के सातवें अनुवाक में बत्तीसवां सूक्त और दूसरा अध्याय भी समाप्त हुआ॥३२॥इति श्रीमत्परिव्राजकाचार्य श्रीविरजानन्दसरस्वतीस्वामिनां शिष्येण दयानन्दसरस्वतीस्वामिनो विरचिते संस्कृतभाषार्य्याभाषाभ्यां विभूषिते सुप्रमाणयुक्ते वेद भाष्ये द्वितीयोऽध्यायः पूर्त्तिमगमत्॥२॥

एताया॒मोप॑ ग॒व्यन्त॒ इन्द्र॑म॒स्माकं॒ सु प्रम॑तिं वावृधाति। अ॒ना॒मृ॒णः कु॒विदाद॒स्य रा॒यो गवां॒ केतं॒ पर॑मा॒वर्ज॑ते नः॥

यहां श्लेषालंकार है। मनुष्यों को योग्य है कि जो पुरुष संसार में अविद्या का नाश तथा विद्या के दान से उत्तम-२ धनों को बढ़ाता है परमेश्वर की आज्ञा का पालन और उपासना करके उसीके शरीर तथा आत्मा का बल नित्य बढ़ावे और इसकी सहायता के विना कोई भी मनुष्य धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष रूपी फल प्राप्त होने को समर्थ नहीं हो सकता॥१॥

उपेद॒हं ध॑न॒दामप्र॑तीतं॒ जुष्टां॒ न श्ये॒नो व॑स॒तिं प॑तामि। इन्द्रं॑ नम॒स्यन्नु॑प॒मेभि॑र॒र्कैर्यः स्तो॒तृभ्यो॒ हव्यो॒ अस्ति॒ याम॑न्॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे श्येन अर्थात् वेगवान् पक्षी अपने पहिले सेवन किये हुए सुख देनेवाले स्थान को स्थानान्तर से चलकर प्राप्त होता है वैसे ही परमेश्वर को नमस्कार करते हुए मनुष्य उसीके बनाये इस संसार में सूर्य आदि लोकों के दृष्टान्तों से ईश्वर का निश्चय करके उसीकी प्राप्ति करें क्योंकि जितने इस संसार में रचे हुए पदार्थ हैं वे सब रचनेवाले का निश्चय कराते हैं और रचनेवाले के विना किसी जड़ पदार्थ की रचना कभी नहीं हो सकती जैसे इस व्यवहार में रचनेवाले के विना कुछ भी पदार्थ नहीं बन सकता वैसे ही ईश्वर की सृष्टि में भी जानना चाहिये, बड़ा आश्चर्य है कि ऐसे निश्चय हो जाने पर भी जो ईश्वर का अनादर करके नास्तिक हो जाते हैं उनको यह बड़ा अज्ञान क्योंकर प्राप्त होता है॥२॥

नि सर्व॑सेन इषु॒धीँर॑सक्त॒ सम॒र्यो गा अ॑जति॒ यस्य॒ वष्टि॑। चो॒ष्कू॒यमा॑ण इन्द्र॒ भूरि॑ वा॒मं मा प॒णिर्भू॑र॒स्मदधि॑ प्रवृद्ध॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजा को चाहिये कि जैसे वैश्य गौओं का पालन तथा चराकर दुग्धादिकों से व्यवहार सिद्ध करता है और जैसे ईश्वर से उत्पन्न हुए सब लोकों में बड़े सूर्यलोक की किरणें बाण के समान छेदन करनेवाली सब पदार्थों को प्रवेश करके वायु से ऊपर नीचे चला कर रस सहित सब पदार्थों करके सब सुख सिद्ध करते हैं इसके समान प्रजा का पालन करे॥३॥

वधी॒र्हि दस्युं॑ ध॒निनं॑ घ॒नेनँ॒ एक॒श्चर॑न्नुपशा॒केभि॑रिन्द्र। धनो॒रधि॑ विषु॒णक्ते व्या॑य॒न्नय॑ज्वानः सन॒काः प्रेति॑मीयुः॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे ईश्वर शत्रुओं से रहित तथा सूर्यलोक भी मेघ से निवृत्त हो जाता है वैसे ही मनुष्यों को चोर, डाकू, वा शत्रुओं को मार और धनवाले धर्मात्माओं की रक्षा करके शत्रुओं से रहित होना अवश्य चाहिये॥४॥

परा॑ चिच्छी॒र्षा व॑वृजु॒स्त इ॒न्द्राय॑ज्वानो॒ यज्व॑भिः॒ स्पर्ध॑मानाः। प्र यद्दि॒वो ह॑रिवः स्थातरुग्र॒ निर॑व्र॒ताँ अ॑धमो॒ रोद॑स्योः॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य दिन और पृथिवी और प्रकाश को धारण तथा मेघ रूप अन्धकार को निवारण करके वृष्टि द्वारा सब प्राणियों को सुख युक्त करता है वैसे ही मनुष्यों को उत्तम-२ गुणों का धारण खोटे गुणों को छोड़ धार्मिकों की रक्षा और अधर्मी दुष्ट मनुष्यों को दंड देकर विद्या उत्तम शिक्षा और धर्मोपदेश की वर्षा से सब प्राणियों को सुख देके सत्य के राज्य का प्रचार करना चाहिये॥५॥

अयु॑युत्सन्ननव॒द्यस्य॒ सेना॒मया॑तयन्त क्षि॒तयो॒ नव॑ग्वाः। वृ॒षा॒युधो॒ न वध्र॑यो॒ निर॑ष्टाः प्र॒वद्भि॒रिन्द्रा॑च्चि॒तय॑न्त आयन्॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य शरीर और आत्मबलवाले शूरवीर धार्मिक मनुष्य को सेनाध्यक्ष और सर्वथा उत्तम सेना को संपादन करके जब दुष्टों के साथ युद्ध करते हैं तभी जैसे सिंह के समीप बकरी और मनुष्य के समीप से भीरु मनुष्य और सूर्य्य के ताप से मेघ के अवयव नष्ट होते हैं वैसे ही उक्त वीरों के समीप से शत्रु लोग सुख से रहित और पीठ दिखाकर इधर-उधर भाग जाते हैं इससे सब मनुष्यों को इस प्रकार का सामर्थ्य संपादन करके राज्य का भोग सदा करना चाहिये॥६॥

त्वमे॒तान्रु॑द॒तो जक्ष॑त॒श्चायो॑धयो॒ रज॑स इन्द्र पा॒रे। अवा॑दहो दि॒व आ दस्यु॑मु॒च्चा प्र सु॑न्व॒तः स्तु॑व॒तः शंस॑मावः॥

मनुष्यों को युद्ध के लिये अनेक प्रकार के कर्म करने अर्थात् पहिले अपनी सेना के मनुष्यों की पुष्टि आनन्द तथा दुष्टों का दुर्बलपन वा उत्साहभंग नित्य करना चाहिये जैसे सूर्य अपनी किरणों से सबको प्रकाशित करके मेघ के अन्धकार निवारण के लिये प्रवृत्त होता है वैसे सब काल में उत्तम कर्म वा गुणों के प्रकाश और दुष्ट कर्म दोषों की निवृत्ति के लिये नित्य यत्न करना चाहिये॥७॥

च॒क्रा॒णासः॑ परी॒णहं॑ पृथि॒व्या हिर॑ण्येन म॒णिना॒ शुम्भ॑मानाः। न हि॑न्वा॒नास॑स्तितिरु॒स्त इन्द्रं॒ परि॒ स्पशो॑ अदधा॒त्सूर्ये॑ण॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे परमेश्वर ने सूर्य के साथ प्रकाश आकर्षणादि कर्मों का निबन्धन किया है वैसे ही विद्या धर्म न्याय शूरवीरों की सेनादि सामग्री को प्राप्त हुए पुरुष के साथ इस पृथिवी के राज्य को नियुक्त किया है॥८॥

परि॒ यदि॑न्द्र॒ रोद॑सी उ॒भे अबु॑भोजीर्महि॒ना वि॒श्वतः॑ सीम्। अम॑न्यमानाँ अ॒भि मन्य॑मानै॒र्निर्ब्र॒ह्मभि॑रधमो॒ दस्यु॑मिन्द्र॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्यलोक सब पृथिव्यादि मूर्त्तिमान् लोकों का प्रकाश आकर्षण से धारण और पालन करनेवाला होकर मेघ और रात्रि के अन्धकार को निवारण करता है वैसे ही हे मनुष्यो आप लोग उत्तम शिक्षित विद्वानों से मूर्खों को मूढ़ेता छुड़ा और दुष्ट शत्रुओं को शिक्षा देकर बड़े राज्य के सुख का भोग नित्य कीजिये॥९॥

न ये दि॒वः पृ॑थि॒व्या अन्त॑मा॒पुर्न मा॒याभि॑र्धन॒दां प॒र्यभू॑वन्। युजं॒ वज्रं॑ वृष॒भश्च॑क्र॒ इन्द्रो॒ निर्ज्योति॑षा॒ तम॑सो॒ गा अ॑दुक्षत्॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि सूर्य के तेजरूप स्वभाव और प्रकाश के सदृश कर्म कर और सब शत्रुओं के अन्यायरूप अंधकार का नाश करके धर्म से राज्य का सेवन करें। क्योंकि छली कपटी लोगों का राज्य स्थिर कभी नहीं होता इससे सबको छलादि दोष रहित विद्वान् होके शत्रुओं की माया में न फँस के राज्य का पालन करने के लिये अवश्य उद्योग करना चाहिये॥१०॥

अनु॑ स्व॒धाम॑क्षर॒न्नापो॑ अ॒स्याव॑र्धत॒ मध्य॒ आ ना॒व्या॑नाम्। स॒ध्री॒चीने॑न॒ मन॑सा॒ तमिन्द्र॒ ओजि॑ष्ठेन॒ हन्म॑नाहन्न॒भि द्यून्॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे बिजुली ने मेघ को मार कर पृथिवी पर गिरी हुई वृष्टि यव आदि अन्न-२ को बढ़ाती और नदी तड़ाग समुद्र के जल को बढ़ाती है वैसे ही मनुष्यों को चाहिये कि सब प्रकार शुभ गुणों की वर्षा से प्रजा सुख शत्रुओं का मारण और विद्या वृद्धि से उत्तम गुणों का प्रकाश करके धर्म का सेवन सदैव करें॥११॥

न्या॑विध्यदिली॒बिश॑स्य दृ॒ळ्हा वि शृ॒ङ्गिण॑मभिन॒च्छुष्ण॒मिन्द्रः॑। याव॒त्तरो॑ मघव॒न्याव॒दोजो॒ वज्रे॑ण॒ शत्रु॑मवधीः पृत॒न्युम्॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे बिजुली मेघ के अवयवों को भिन्न-२ और जल को वर्षा कर सबको सुखयुक्त करती है वैसे ही सब मनुष्यों को उचित है कि उत्तम-२ शिक्षायुक्त सेना से दुष्टगुणवाले दुष्ट मनुष्यों को उपदेश दे और शस्त्र अस्त्र वृष्टि से शत्रुओं को निवारण कर प्रजा में सुखों की वृष्टि निरन्तर किया करें॥१२॥

अ॒भि सि॒ध्मो अ॑जिगादस्य॒ शत्रू॒न्वि ति॒ग्मेन॑ वृष॒भेणा॒ पुरो॑ऽभेत्। सं वज्रे॑णासृजद्वृ॒त्रमिन्द्रः॒ प्र स्वां म॒तिम॑तिर॒च्छाश॑दानः॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे बिजुली मेघ के अवयव बद्दलों को तीक्ष्णवेग से छिन्न-भिन्न और भूमि में गेर कर उसको वश में करती है वैसे ही सभासेनाध्यक्ष को चाहिये कि बुद्धिशरीर बल वा सेना के वेग से शत्रुओं को छिन्न-भिन्न और शस्त्रों के अच्छे प्रकार प्रहार से पृथिवी पर गिरा कर अपनी सम्मति में लावें॥१३॥

आवः॒ कुत्स॑मिन्द्र॒ यस्मि॑ञ्चा॒कन्प्रावो॒ युध्य॑न्तं वृष॒भं दश॑द्युम्। श॒फच्यु॑तो रे॒णुर्न॑क्षत॒ द्यामुच्छ्वै॑त्रे॒यो नृ॒षाह्या॑य तस्थौ॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्यलोक अपनी किरणों से पृथिवी में मेघ को गिराकर सब प्राणियों को सुखयुक्त करता है वैसे ही हे सभाध्यक्ष तूं भी सेना शिक्षा और शस्त्र बल से शत्रुओं को अस्त व्यस्त कर नीचे गिरा के प्रजा की रक्षा निरन्तर किया कर॥१४॥

आवः॒ शमं॑ वृष॒भं तुग्र्या॑सु क्षेत्रजे॒षे म॑घव॒ञ्छ्वित्र्यं॒ गाम्। ज्योक् चि॒दत्र॑ तस्थि॒वांसो॑ अक्रञ्छत्रूय॒तामध॑रा॒ वेद॑नाकः॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य अन्तरिक्ष से मेघ के जल को भूमि पर गिरा के सब प्राणियों के लिये सुख देता है वैसे सेनाध्यक्षादि लोग दुष्ट मनुष्य शत्रुओं को बांधकर धार्मिक मनुष्यों की रक्षा करके सुखों का भोग करें और करावें॥१५॥इस सूक्त में सूर्य मेघ के युद्धार्थ के वर्णन तथा उपमान उपमेय अलंकार वा मनुष्यों के युद्धविद्या के उपदेश करने से पिछले सूक्तार्थ के साथ इस सूक्तार्थ की संगति जाननी चाहिये। यह तीसरा वर्ग ३ तैतीसवां सूक्त समाप्त हुआ॥३३॥

त्रिश्चि॑न्नो अ॒द्या भ॑वतं नवेदसा वि॒भुर्वां॒ याम॑ उ॒त रा॒तिर॑श्विना। यु॒वोर्हि य॒न्त्रं हि॒म्येव॒ वास॑सोऽभ्यायं॒सेन्या॑ भवतं मनी॒षिभिः॑॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये जैसे रात्रि वा दिन को क्रम से संगति होती है वैसे संगति करें जैसे विद्वान् लोग पृथिवी विकारों के यान कला कील और यन्त्रादिकों को रचकर उनके घुमाने और उसमें अग्न्यादि के संयोग से भूमि समुद्र वा आकाश में जाने आने के लिये यानों को सिद्ध करते हैं। वैसे ही मुझको भी विमानादि यान सिद्ध करने चाहिये। क्योंकि इस विद्या के विना किसी के दारिद्र्य का नाश वा लक्ष्मी की वृद्धि कभी नहीं हो सकती इससे विद्या में सब मनुष्यों को अत्यन्त प्रयत्न करना चाहिये जैसे मनुष्य लोग हेमन्त ऋतु में वस्त्रों को अच्छे प्रकार धारण करते हैं वैसे ही सब प्रकार कील कला यंत्रादिकों से यानों को संयुक्त रखना चाहिये॥१॥

त्रयः॑ प॒वयो॑ मधु॒वाह॑ने॒ रथे॒ सोम॑स्य वे॒नामनु॒ विश्व॒ इद्वि॑दुः। त्रयः॑ स्क॒म्भासः॑ स्कभि॒तास॑ आ॒रभे॒ त्रिर्नक्तं॑ या॒थस्त्रिर्व॑श्विना॒ दिवा॑॥

भूमि समुद्र और अन्तरिक्ष में जाने की इच्छा करनेवाले मनुष्यों को योग्य है कि तीन-२ चक्र युक्त अग्नि के घर और स्तंभयुक्त यान को रचकर उसमें बैठ कर एक दिन-रात में भूगोल समुद्र अन्तरिक्ष मार्ग से तीन-२ बार जानेको समर्थ हो सकें उस यान में इस प्रकार के खंभ रचने चाहिये कि जिसमें कलावयव अर्थात् काष्ठ लोष्ठ आदि खंभों के अवयव स्थित हो फिर वहां अग्नि जल का संप्रयोग कर चलावें। क्योंकि इनके विना कोई मनुष्य शीघ्र भूमि समुद्र अन्तरिक्ष में जाने आने को समर्थ नहीं हो सकता इससे इनकी सिद्धि के लिये सब मनुष्यों को बड़े-२ यत्न अवश्य करने चाहियें॥२॥

स॒मा॒ने अह॒न्त्रिर॑वद्यगोहना॒ त्रिर॒द्य य॒ज्ञं मधु॑ना मिमिक्षतम्। त्रिर्वाज॑वती॒रिषो॑ अश्विना यु॒वं दो॒षा अ॒स्मभ्य॑मु॒षस॑श्च पिन्वतम्॥

शिल्पविद्या को जानने और कलायंत्रों से यान को चलानेवाले प्रति दिन शिल्पविद्या से यानों को सिद्ध कर तीन प्रकार अर्थात् शारीरिक आत्मिक और मानसिक सुख के लिये धन आदि अनेक उत्तम-२ पदार्थों को इकट्ठा कर सब प्राणियों को सुखयुक्त करें जिससे दिन-रात में सब लोग अपने पुरुषार्थ से इस विद्या की उन्नति कर और आलस्य को छोड़के उत्साह से उसकी रक्षा में निरन्तर प्रयत्न करें॥३॥

त्रिर्व॒र्तिर्या॑तं॒ त्रिरनु॑व्रते॒ जने॒ त्रिः सु॑प्रा॒व्ये॑ त्रे॒धेव॑ शिक्षतम्। त्रिर्ना॒न्द्यं॑ वहतमश्विना यु॒वं त्रिः पृक्षो॑ अ॒स्मे अ॒क्षरे॑व पिन्वतम्॥

इस मंत्र में दो उपमालङ्कार हैं। शिल्प विद्या के जाननेवाले मनुष्यों को योग्य है कि विद्या की इच्छा करनेवाले अनुकूल बुद्धिमान मनुष्यों को पदार्थ विद्या पढ़ा और उत्तम-२ शिक्षा बार-२ देकर कार्यों को सिद्ध करने में समर्थ करें और उनको भी चाहिये कि इस विद्या को संपादन करके यथावत् चतुराई और पुरुषार्थ से सुखों के उपकारों को ग्रहण करें॥४॥

त्रिर्नो॑ र॒यिं व॑हतमश्विना यु॒वं त्रिर्दे॒वता॑ता॒ त्रिरु॒ताव॑तं॒ धियः॑। त्रिः सौ॑भग॒त्वं त्रिरु॒त श्रवां॑सि नस्त्रि॒ष्ठं वां॒ सूरे॑ दुहि॒ता रु॑ह॒द्रथ॑म्॥

मनुष्यों को उचित है कि अग्नि भूमि के अवलंब से शिल्प कार्यों की सिद्ध और बुद्धि बढ़ाकर सौभाग्य और उत्तम अन्नादि पदार्थों को प्राप्त हो इस सब सामग्री से सिद्ध हुए यानों में बैठ के देश देशान्तरों को जा-आ और व्यवहार द्वारा धन को बढ़ाकर सब काल में आनन्द में रहें॥५॥

त्रिर्नो॑ अश्विना दि॒व्यानि॑ भेष॒जा त्रिः पार्थि॑वानि॒ त्रिरु॑ दत्तम॒द्भ्यः। ओ॒मानं॑ शं॒योर्मम॑काय सू॒नवे॑ त्रि॒धातु॒ शर्म॑ वहतं शुभस्पती॥

मनुष्यों को चाहिये कि जो जल और पृथिवी में उत्पन्न हुई रोग नष्ट करनेवाली औषधी हैं उनका एक दिन में तीन बार भोजन किया करें और अनेक धातुओं से युक्त काष्ठमय घर के समान यान को बना उसमें उत्तम-२ जव आदि औषधी स्थापन अग्नि के घर में अग्नि को काष्ठों से प्रज्वलित जल के घर में जलों को स्थापन भाफ के बल से यानों को चला व्यवहार के लिये देशदेशान्तरों को जा और वहां से आकर जल्दी अपने देश को प्राप्त हों इस प्रकार करने से बड़े-२ सुख प्राप्त होते हैं॥६॥यह चौथा वर्ग समाप्त हुआ॥४॥

त्रिर्नो॑ अश्विना यज॒ता दि॒वेदि॑वे॒ परि॑ त्रि॒धातु॑ पृथि॒वीम॑शायतम्। ति॒स्रो ना॑सत्या रथ्या परा॒वत॑ आ॒त्मेव॒ वातः॒ स्वस॑राणि गच्छतम्॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। संसारसुख की इच्छा करनेवाले पुरुष जैसे जीव अन्तरिक्ष आदि मार्गों से दूसरे शरीरों को शीघ्र प्राप्त होता और जैसे वायु शीघ्र चलता है वैसे ही पृथिव्यादि विकारों से कलायन्त्र युक्त यानों को रच और उनमें अग्नि जल आदि का अच्छे प्रकार प्रयोग करके चाहे हुए दूर देशों को शीघ्र पहुंचा करें इस काम के विना संसारसुख होने को योग्य नहीं है॥७॥

त्रिर॑श्विना॒ सिन्धु॑भिः स॒प्तमा॑तृभि॒स्त्रय॑ आहा॒वास्त्रे॒धा ह॒विष्कृ॒तम्। ति॒स्रः पृ॑थि॒वीरु॒परि॑ प्र॒वा दि॒वो नाकं॑ रक्षेथे॒ द्युभि॑र॒क्तुभि॑र्हि॒तम्॥

मनुष्यों को योग्य है कि जो सूर्य वायु के छेदन आकर्षण और वृष्टि करानेवाले गुणों से नदियाँ चलती तथा हवन किया हुआ द्रव्य दुर्गन्धादि दोषों को निवारण कर सब दुःखों से रहित सुखों को सिद्ध करता है जिससे दिन रात सुख बढ़ता है इसके विना कोई प्राणी जीवने को समर्थ नहीं हो सकता इससे इसकी शुद्धि के लिये यज्ञरूप कर्म नित्य करें॥८॥

क्व १॒॑ त्री च॒क्रा त्रि॒वृतो॒ रथ॑स्य॒ क्व १॒॑ त्रयो॑ व॒न्धुरो॒ ये सनी॑ळाः। क॒दा योगो॑ वा॒जिनो॒ रास॑भस्य॒ येन॑ य॒ज्ञं ना॑सत्योपया॒थः॥

इस मंत्र में कहे हुए तीन प्रश्नों के ये उत्तर जानने चाहिये विभूति की इच्छा रखनेवाले पुरुषों को उचित है कि रथ के आदि, मध्य और अन्त में सब कलाओं के बन्धनों के आधार के लिये तीन बंधन विशेष संपादन करें तथा तीन कला घूमने-घुमाने के लिये संपादन करें एक मनुष्यों के बैठने दूसरी अग्नि को स्थिति और तीसरी जल की स्थिति के लिये करके जब-जब चलने की इच्छा हो तब-२ यथा योग्य जलकाष्ठों को स्थापन, अग्नि को युक्त और कला के वायु से प्रदीप्त करके बाफ के वेग से चलाये हुए यान से शीघ्र दूर स्थान को भी निकट के समान जाने को समर्थ होवें। क्योंकि इस प्रकार किये विना निर्विघ्नता से स्थानान्तर को कोई मनुष्य शीघ्र नहीं जा सकता॥९॥

आ ना॑सत्या॒ गच्छ॑तं हू॒यते॑ ह॒विर्मध्वः॑ पिबतं मधु॒पेभि॑रा॒सभिः॑। यु॒वोर्हि पूर्वं॑ सवि॒तोषसो॒ रथ॑मृ॒ताय॑ चि॒त्रं घृ॒तव॑न्त॒मिष्य॑ति॥

जब यानों में जल और अग्नि को प्रदीप्त करके चलाते हैं तब ये यान और स्थानों को शीघ्र प्राप्त कराते हैं उनमें जल और बाफ के निकलने का एक ऐसा स्थान रच लेवें कि जिसमें होकर बाफ के निकलने से वेग की वृद्धि होवे। इस विद्या का जाननेवाला ही अच्छे प्रकार सुखों को प्राप्त होता है॥१०॥

आ ना॑सत्या त्रि॒भिरे॑काद॒शैरि॒ह दे॒वेभि॑र्यातं मधु॒पेय॑मश्विना। प्रायु॒स्तारि॑ष्टं॒ नी रपां॑सि मृक्षतं॒ सेध॑तं॒ द्वेषो॒ भव॑तं सचा॒भुवा॑॥

जब मनुष्य ऐसे यानों में बैठ और उनको चलाते हैं तब तीन दिन और तीन रात्रियों में सुख से समुद्र के पार तथा ग्यारह दिन और ग्यारह रात्रियों में ब्रह्माण्ड के चारों ओर जाने को समर्थ हो सकते हैं इसी प्रकार करते हुए विद्वान् लोग सुखयुक्त पूर्ण आयु को प्राप्त हो दुःखों को दूर और शत्रुओं को जीतकर चक्रवर्त्तिराज्य भोगनेवाले होते हैं॥११॥

आ नो॑ अश्विना त्रि॒वृता॒ रथे॑ना॒र्वाञ्चं॑ र॒यिं व॑हतं सु॒वीर॑म्। शृ॒ण्वन्ता॑ वा॒मव॑से जोहवीमि वृ॒धे च॑ नो भवतं॒ वाज॑सातौ॥

जल अग्नि से प्रयुक्त किये हुए रथ के विना कोई मनुष्य स्थल जल और अन्तरिक्षमार्गों में शीघ्र जानेको समर्थ नहीं हो सकता। इससे राज्यश्री, उत्तम सेना, और वीर पुरुषों को प्राप्त होके ऐसे विमानादि यानों से युद्ध में विजय को पा सकते हैं। इस कारण इस विद्या में मनुष्य सदा युक्त हों॥१२॥पूर्व सूक्त से इस विद्या के सिद्ध करनेवाले इन्द्र शब्द के अर्थ का प्रतिपादन किया तथा इस सूक्त से इस विद्या के साधक अश्वि अर्थात् द्यावा पृथिवी आदि अर्थ प्रतिपादन किये हैं इससे इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह पांचवां वर्ग और चौतीसवां सूक्त समाप्त हुआ॥३४॥

ह्वया॑म्य॒ग्निं प्र॑थ॒मं स्व॒स्तये॒ ह्वया॑मि मि॒त्रावरु॑णावि॒हाव॑से। ह्वया॑मि॒ रात्रीं॒ जग॑तो नि॒वेश॑नीं॒ ह्वया॑मि दे॒वं स॑वि॒तार॑मू॒तये॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि दिनरात सुख के लिये अग्नि वायु और सूर्य के सकाश से उपकार को ग्रहण करके सब सुखों को प्राप्त होवें क्योंकि इस विद्या के विना कभी किसी पुरुष को पूर्ण सुख का संभव नहीं हो सकता॥१॥

आ कृ॒ष्णेन॒ रज॑सा॒ वर्त॑मानो निवे॒शय॑न्न॒मृतं॒ मर्त्यं॑ च। हि॒र॒ण्यये॑न सवि॒ता रथे॒ना दे॒वो या॑ति॒ भुव॑नानि॒ पश्य॑न्॥

इस मंत्र में श्लेषालंकार है। जैसे सब पृथिवी आदि लोक मनुष्यादि प्राणियों वा सूर्यलोक अपने आकर्षण में पृथिवी आदि लोकों वा ईश्वर अपनी सत्ता से सूर्यादि सब लोकों का धारण करता है ऐसे क्रम से सब लोकों का धारण होता है इसके विना अन्तरिक्ष में किसी अत्यन्त भार युक्त लोक का अपनी परिधि में स्थिति होने का संभव नहीं होता और लोकों के घूमने विना क्षण, मुहूर्त्त, प्रहर, दिन, रात, पक्ष, मास, ऋतु, और संवत्सर आदि कालों के अवयव नहीं उत्पन्न हो सकते हैं॥२॥

याति॑ दे॒वः प्र॒वता॒ यात्यु॒द्वता॒ याति॑ शु॒भ्राभ्यां॑ यज॒तो हरि॑भ्याम्। आ दे॒वो या॑ति सवि॒ता प॑रा॒वतोऽप॒ विश्वा॑ दुरि॒ता बाध॑मानः॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे ईश्वरकी उत्पन्न की हुई सृष्टि में वायु नीचे ऊपर वा समगति से चलता हुआ नीचे के पदार्थों को ऊपर और ऊपर के पदार्थों को नीचे करता है और जैसे दिन रात वा आकर्षण धारण गुणवाले अपने किरण समूह से युक्त सूर्यलोक अन्धकारादिकों के दूर करने से दुःखों का विनाश कर सुख और सुखों का विनाश कर दुःखों को प्रगट करता है वैसे ही सभापति आदि को भी अनुष्ठान करना चाहिये॥३॥

अ॒भीवृ॑तं॒ कृश॑नैर्वि॒श्वरू॑पं॒ हिर॑ण्यशम्यं यज॒तो बृ॒हन्त॑म्। आस्था॒द्रथं॑ सवि॒ता चि॒त्रभा॑नुः कृ॒ष्णा रजां॑सि॒ तवि॑षीं॒ दधा॑नः॥

इस मंत्र में श्लेष और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे सूर्य आदि की उत्पत्ति का निमित्त सूर्य आदि लोक का धारण करनेवाला बलवान् सब लोकों और आकर्षणरूपी बल को धारण करता हुआ वायु विचरता है और जैसे सूर्य्यलोक अपने समीप स्थलोंको धारण और सब रूप विषय को प्रकट करता हुआ बल वा आकर्षण शक्ति से सबको धारण करता है और इन दोनों के विना किसी स्थूल वा सूक्ष्म वस्तु के धारण का संभव नहीं होता वैसे ही राजा को होना चाहिये कि उत्तम गुणों से युक्त होकर राज्य का धारण किया करे॥४॥

वि जना॑ञ्छ्या॒वाः शि॑ति॒पादो॑ अख्य॒न्रथं॒ हिर॑ण्यप्रउगं॒ वह॑न्तः। शश्व॒द्विशः॑ सवि॒तुर्दैव्य॑स्यो॒पस्थे॒ विश्वा॒ भुव॑नानि तस्थुः॥

हे मनुष्यो! तुम जैसे सूर्यलोक के प्रकाश का आकर्षण आदि गुण सब जगत् को धारणपूर्वक यथायोग्य प्रगट करते हैं। और जो सूर्य के समीप लोक हैं वे सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं। जो अनादि रूप प्रजा है उसका भी वायु धारण करता है इस प्रकार होने से सब लोक अपनी-२ परिधि में स्थित होते हैं वैसे तुम सद्गुणों का धारण और अपने-२ अधिकारों में स्थित होकर अन्य सबको न्याय मार्ग में स्थापन किया करो॥५॥

ति॒स्रो द्यावः॑ सवि॒तुर्द्वा उ॒पस्थाँ॒ एका॑ य॒मस्य॒ भुव॑ने विरा॒षाट्। आ॒णिं न रथ्य॑म॒मृताधि॑ तस्थुरि॒ह ब्र॑वीतु॒ य उ॒ तच्चिके॑तत्॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जिस ईश्वर ने अग्निरूप कारण से सूर्य अग्नि और बिजुली रूप तीन प्रकार की दीप्ति रची है जिनके द्वारा सब कार्य सिद्ध होते हैं जब कोई ऐसा पूछे कि जीव अपने शरीरों को छोड़के जिस यम के स्थान को प्राप्त होते हैं वह कौन है तब उत्तर देनेवाला अन्तरिक्ष में रहनेवाले वायु को प्राप्त होते हैं ऐसा कहे जैसे युद्ध में रथ भृत्य आदि सेना के अङ्गों में स्थित होते हैं वैसे मरे और जीते हुए जीव वायु के अवलंब से स्थित होते हैं। पृथिवी चन्द्रमा और नक्षत्रादि लोक सूर्य्य प्रकाश के आश्रय से स्थित होते हैं जो विद्वान् हो वही प्रश्नों के उत्तर कह सकता है, मूर्ख नहीं। इस लिये। मनुष्यों को मूर्ख अर्थात् अनाप्तों के कहने में विश्वास और विद्वानों के कथन में अश्रद्धा कभी न करनी चाहिये॥६॥

वि सु॑प॒र्णो अ॒न्तरि॑क्षाण्यख्यद्गभी॒रवे॑पा॒ असु॑रः सुनी॒थः। क्वे॒३॒॑दानीं॒ सूर्यः॒ कश्चि॑केत कत॒मां द्यां र॒श्मिर॒स्या त॑तान॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है जब यह भूगोल अपने भ्रमण से सूर्य्य के प्रकाश का आच्छादन कर अन्धकार करता है तब साधारण मनुष्य पूंछते है कि अब वह सूर्य कहाँ गया उस प्रश्न का उत्तर से समाधान करे कि पृथिवी के दूसरे पृष्ठ में है जिसका चलना अति सूक्ष्म है वैसे वह मूर्ख मनुष्यों से जाना नहीं जाता वैसे ही महाशय मनुष्यों का आशय भी अविद्वान् लोग नहीं जान सकते॥७॥

अ॒ष्टौ व्य॑ख्यत्क॒कुभः॑ पृथि॒व्यास्त्री धन्व॒ योज॑ना स॒प्त सिन्धू॑न्। हि॒र॒ण्या॒क्षः स॑वि॒ता दे॒व आगा॒द्दध॒द्रत्ना॑ दा॒शुषे॒ वार्या॑णि॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे यह सूर्यलोक सब मूर्त्तिमान् पदार्थो का प्रकाश छेदन वायुद्वारा अन्तरिक्ष में प्राप्त और वहां से नीचे गेर कर सब रमणीय सुखों को जीवों के लिये उत्पन्न करता और पृथिवी में स्थित और उनचास क्रोश पर्यन्त अन्तरिक्ष में स्थूल सूक्ष्म लघु और गुरु रूप से स्थित हुए जलों को अर्थात् जिनका सप्तसिंधु नाम है आकर्षणशक्ति से धारण करता है वैसे सब विद्वान् लोग विद्या और धर्म से सब प्रजा को धारण करके सबको आनन्द में रक्खें॥८॥

हिर॑ण्यपाणिः सवि॒ता विच॑र्षणिरु॒भे द्यावा॑पृथि॒वी अ॒न्तरी॑यते। अपामी॑वां॒ बाध॑ते॒ वेति॒ सूर्य॑म॒भि कृ॒ष्णेन॒ रज॑सा॒ द्यामृ॑णोति॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे सभापते जैसे यह सूर्य्यलोक बहुत लोकों के साथ आकर्षण संबन्ध से वर्त्तमान सब वस्तुमात्र को प्रकाशित करता हुआ प्रकाश तथा पृथिवी लोक का मेल करता है वैसे स्वभावयुक्त आप हूजिये॥९॥

हिर॑ण्यहस्तो॒ असु॑रः सुनी॒थः सु॑मृळी॒कः स्ववाँ॑ यात्व॒र्वाङ्। अ॒प॒सेध॑न्र॒क्षसो॑ यातु॒धाना॒नस्था॑द्दे॒वः प्र॑तिदो॒षं गृ॑णा॒नः॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे सभापति जैसे यह वायु अपने आकर्षण और बल आदि गुणों से सब पदार्थों को व्यवस्था में रखता है और जैसे दिन में चोर प्रबल नहीं होसकते हैं वैसे आप भी हूजिये और तुमको जिस जगदीश्वर ने बहुतगुणयुक्त सुख प्राप्त करनेवाले वायु आदि पदार्थ रचे हैं उसीको सब धन्यवाद देने योग्य हैं॥१०॥

ये ते॒ पन्थाः॑ सवितः पू॒र्व्यासो॑ऽरे॒णवः॒ सुकृ॑ता अ॒न्तरि॑क्षे। तेभि॑र्नो अ॒द्य प॒थिभि॑स्सु॒गेभी॒ रक्षा॑ च नो॒ अधि॑ च ब्रूहि देव॥

हे ईश्वर! आपने जो सूर्य आदि लोकों के घूमने और प्राणियों के सुख के लिये आकाश वा अपने महिमारूप संसार में शुद्ध मार्ग रचे हैं जिनमें सूर्यादि लोक यथा नियम से घूमते और सब प्राणी विचरते हैं उन सब पदार्थों के मार्गों तथा गुणों का उपदेश कीजिये कि जिससे हम लोग इधर-उधर चलायमान न होवें॥११॥इस सूक्त में सूर्यलोक वायु और ईश्वर के गुणों का प्रतिपादन करने से चौतीसवें सूक्त के साथ इस सूक्त की संगति जाननी चाहिये॥यह सातवां वर्ग ७ सातवां अनुवाक ७ और पैंतीसवां सूक्त समाप्त हुआ॥३५॥

सूक्तम्

प्र वो॑ य॒ह्वं पु॑रू॒णां वि॒शां दे॑वय॒तीना॑म्। अ॒ग्निं सू॒क्तेभि॒र्वचो॑भिरीमहे॒ यं सी॒मिद॒न्य ईळ॑ते॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो जैसे तुम लोग पूर्ण विद्यायुक्त विद्वान् लोग प्रजा के सुख की संपत्ति के लिये सर्वव्यापी परमेश्वर का निश्चय तथा उपदेश करके प्रयत्न से जानते हैं वैसे ही हम लोग भी उसके गुण प्रकाशित करें जैसे ईश्वर अग्नि आदि पदार्थों के रचन और पालन से जीवों में सब सुखों को धारण करता है वैसे हम लोग भी सब प्राणियों के लिये सदा सुख वा विद्या को सिद्ध करते रहें ऐसा जानों॥१॥

जना॑सो अ॒ग्निं द॑धिरे सहो॒वृधं॑ ह॒विष्म॑न्तो विधेम ते। स त्वं नो॑ अ॒द्य सु॒मना॑ इ॒हावि॒ता भवा॒ वाजे॑षु सन्त्य॥

मनुष्यों को एक अद्वितीय परमेश्वर की उपासना ही से संतुष्ट रहना चाहिये क्योंकि विद्वान् लोग परमेश्वर के स्थान में अन्य वस्तु को उपासना भाव से स्वीकार कभी नहीं करते इसी कारण उनका युद्ध वा इस संसार में कभी पराजय दीख नहीं पड़ता क्योंकि वे धार्मिक ही होते हैं और इसीसे ईश्वर की उपासना नहीं करनेवाले उनके जीतने को समर्थ नहीं होते, क्योंकि ईश्वर जिनकी रक्षा करनेवाला है उनका कैसे पराजय हो सकता है॥२॥

प्र त्वा॑ दू॒तं वृ॑णीमहे॒ होता॑रं वि॒श्ववे॑दसम्। म॒हस्ते॑ स॒तो वि च॑रन्त्य॒र्चयो॑ दि॒वि स्पृ॑शन्ति भा॒नवः॑॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे अपने काम में प्रवीण राजदूत जैसे सब मनुष्य महाप्रकाशादिगुणयुक्त अग्नि को पदार्थों की प्राप्ति वा अप्राप्ति के कारण दूत के समान जान और शिल्पकार्यों को सिद्ध करके सुखों को स्वीकार करते और जैसे इस बिजुली रूप अग्नि की दीप्ति सब जगह वर्त्तती हैं और प्रसिद्ध अग्नि की दीप्ति छोटी होने तथा वायु के छेदक होने से अवकाश करनेवाली होकर ज्वाला ऊपर जाती है वैसे तूं भी अपने कामों में प्रवृत्त हो॥३॥

दे॒वास॑स्त्वा॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा सं दू॒तं प्र॒त्नमि॑न्धते। विश्वं॒ सो अ॑ग्ने जयति॒ त्वया॒ धनं॒ यस्ते॑ द॒दाश॒ मर्त्यः॑॥

कोई भी मनुष्य सब शास्त्रों में प्रवीण राजधर्म को ठीक-२ जानने, पर अपर इतिहासों के वेत्ता, धर्मात्मा, निर्भयता से सब विषयों के वक्ता, शूरवीर दूतों और उत्तम राजा सहित सभासदों के विना राज्य को पाने, पालने, बढ़ाने और परोपकार में लगाने को समर्थ नहीं हो सकते इससे पूर्वोक्त प्रकार ही से राज्य की प्राप्ति आदि का विधान सब लोग सदा किया करें॥४॥

म॒न्द्रो होता॑ गृ॒हप॑ति॒रग्ने॑ दू॒तो वि॒शाम॑सि। त्वे विश्वा॒ संग॑तानि व्र॒ता ध्रु॒वा यानि॑ दे॒वा अकृ॑ण्वत॥

जो प्रशस्त राजा, दूत और सभासद् होते हैं वे ही राज्य को पालन कर सकते हैं इनसे विपरीत मनुष्य नहीं कर सकते॥५॥

त्वे इद॑ग्ने सु॒भगे॑ यविष्ठ्य॒ विश्व॒माहू॑यते ह॒विः। स त्वं नो॑ अ॒द्य सु॒मना॑ उ॒ताप॒रं यक्षि॑ दे॒वान्त्सु॒वीर्या॑॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् लोग वन्हि में पवित्र होम करके योग्य घृतादि पदार्थों को होम के संसार के लिये सुख उत्पन्न करते हैं वैसे ही# दुष्टों को बन्दीघर में डाल के सज्जनों को आनन्द सदा दिया करें॥६॥#[राजपुरुष। सं०]

तं घे॑मि॒त्था न॑म॒स्विन॒ उप॑ स्व॒राज॑मासते। होत्रा॑भिर॒ग्निं मनु॑षः॒ समि॑न्धते तिति॒र्वांसो॒ अति॒ स्रिधः॑॥

कोई भी मनुष्य सभाध्यक्ष की उपासना करनेवाले भृत्य और सभासदों के विना अपने राज्य की सिद्धि को प्राप्त होकर शत्रुओं से विजय को प्राप्त नहीं हो सकता॥७॥

घ्नन्तो॑ वृ॒त्रम॑तर॒न्रोद॑सी अ॒प उ॒रु क्षया॑य चक्रिरे। भुव॒त्कण्वे॒ वृषा॑ द्यु॒म्न्याहु॑तः॒ क्रन्द॒दश्वो॒ गवि॑ष्टिषु॥

जैसे बिजुली, भौतिक और सूर्य यही तीन प्रकार के अग्नि मेघ को छिन्न-भिन्न कर सब लोकों को जल से पूर्ण करते हैं उनका युद्ध कर्म सब प्राणियों के अधिक निवास के लिये होता है वैसे ही सभाध्यक्षादि राजपुरुषों को चाहिये कि कण्टकरूप शत्रुओं को मारके प्रजा को निरन्तर तृप्त करें॥८॥

सं सी॑दस्व म॒हाँ अ॑सि॒ शोच॑स्व देव॒वीत॑मः। वि धू॒मम॑ग्ने अरु॒षं मि॑येध्य सृ॒ज प्र॑शस्त दर्श॒तम्॥

प्रशंसित बुद्धिमान् राज पुरुषों को चाहिये कि अग्नि समान तेजस्वि और बड़े-२ गुणों से युक्त हों और श्रेष्ठ गुणवाले पृथिवी आदि भूतों के तत्त्व को जानके प्रकाशमान होते हुए निर्मल देखने योग्य स्वरूपयुक्त पदार्थों को उत्पन्न करें॥९॥

यं त्वा॑ दे॒वासो॒ मन॑वे द॒धुरि॒ह यजि॑ष्ठं हव्यवाहन। यं कण्वो॒ मेध्या॑तिथिर्धन॒स्पृतं॒ यं वृषा॒ यमु॑पस्तु॒तः॥

इस सृष्टि में सब मनुष्यों को चाहिये कि विद्वान् और अन्य सबको चतुर पुरुष मिल के जिस विचारशील ग्रहण के योग्य वस्तुओं के प्राप्त करानेवाले शुभ गुणों से भूषित विद्या सुवर्णादिधनयुक्त सभा के योग्य पुरुष को राज्य शिक्षा के लिये नियुक्त करें उसी पिता के तुल्य पालन करनेवाला जन राजा होवे॥१०॥

यम॒ग्निं मेध्या॑तिथिः॒ कण्व॑ ई॒ध ऋ॒तादधि॑। तस्य॒ प्रेषो॑ दीदियु॒स्तमि॒मा ऋच॒स्तम॒ग्निं व॑र्धयामसि॥

सभाध्यक्षादि राजपुरुषों को चाहिये कि होता आदि विद्वान् लोग वायु वृष्टि के शोधक हवन के लिये जिस अग्नि को प्रकाशित करते हैं जिसके किरण ऊपर को प्रकाशित होते और जिसके गुणों को वेदमंत्र कहते हैं उसी अग्नि को राज्य साधक क्रियासिद्धि के लिये बढ़ावें॥११॥

रा॒यस्पू॑र्धि स्वधा॒वोऽस्ति॒ हि तेऽग्ने॑ दे॒वेष्वाप्य॑म्। त्वं वाज॑स्य॒ श्रुत्य॑स्य राजसि॒ स नो॑ मृळ म॒हाँ अ॑सि॥

वेदों को जाननेवाले उत्तम विद्वानों में मित्रता रखते हुए सभाध्यक्षादि राजपुरुषों को उचित है कि अन्नधन आदि पदार्थों के कोशों की निरन्तर भर और प्रसिद्ध डाकुओं के साथ निरन्तर युद्ध करने को समर्थ होके प्रजा के लिये बड़े-२ सुख देनेवाले होवें॥१२॥

ऊ॒र्ध्व ऊ॒ षु ण॑ ऊ॒तये॒ तिष्ठा॑ दे॒वो न स॑वि॒ता। ऊ॒र्ध्वो वाज॑स्य॒ सनि॑ता॒ यद॒ञ्जिभि॑र्वा॒घद्भि॑र्वि॒ह्वया॑महे॥

सूर्य्य के समान अतितेजस्वी सभापति को चाहिये कि संग्राम सेवन से दुष्ट शत्रुओं को हटा के सब प्राणियों की रक्षा के लिये प्रसिद्ध विद्वानों के साथ सभा के बीच में ऊंचे आसन पर बैठे॥१३॥

ऊ॒र्ध्वो नः॑ पा॒ह्यंह॑सो॒ नि के॒तुना॒ विश्वं॒ सम॒त्रिणं॑ दह। कृ॒धी न॑ ऊ॒र्ध्वाञ्च॒रथा॑य जी॒वसे॑ वि॒दा दे॒वेषु॑ नो॒ दुवः॑॥

अच्छे गुण कर्म और स्वभाववाले सभाध्यक्ष राजा को चाहिये कि राज्य की रक्षा नीति और दण्ड के भय से सब मनुष्यों कोपाप से हटा सब शत्रुओं को मार और विद्वानों की सब प्रकार सेवा करके प्रजा में ज्ञान सुख और अवस्था बढ़ाने के लिये सब प्राणियों को शुभगुणयुक्त सदा किया करे॥१४॥

पा॒हि नो॑ अग्ने र॒क्षसः॑ पा॒हि धू॒र्तेररा॑व्णः। पा॒हि रीष॑त उ॒त वा॒ जिघां॑सतो॒ बृह॑द्भानो॒ यवि॑ष्ठ्य॥

सब मनुष्यों को चाहिये कि सब प्रकार रक्षा के लिये सर्वरक्षक धर्मोन्नति की इच्छा करनेवाले सभाध्यक्ष की सर्वदा प्रार्थना करें और अपने आप भी दुष्ट स्वभाववाले मनुष्य आदि प्राणियों और सब पापों से मन वाणी और शरीर से दूर रहें क्योंकि इस प्रकार रहने के विना कोई मनुष्य सर्वदा सुखी नहीं रह सकता॥१५॥

घ॒नेव॒ विष्व॒ग्वि ज॒ह्यरा॑व्ण॒स्तपु॑र्जम्भ॒ यो अ॑स्म॒ध्रुक्। यो मर्त्यः॒ शिशी॑ते॒ अत्य॒क्तुभि॒र्मा नः॒ स रि॒पुरी॑शत॥

इस मंत्र में उपमा अलंकार है। सेनाध्यक्षादि लोग जैसे लोहा के घन से लोहे और पाषाणादिकों को तोड़ते हैं वैसे ही अधर्म्मी दुष्टशत्रुओं के अङ्गों को छिन्न-भिन्न कर दिन रात धर्म्मात्मा प्रजाजनों के पालन में तत्पर हों जिससे शत्रुजन इन प्रजाओं को दुःख देने को समर्थ न हो सकें॥१६॥

अ॒ग्निर्व॑व्ने सु॒वीर्य॑म॒ग्निः कण्वा॑य॒ सौभ॑गम्। अ॒ग्निः प्राव॑न्मि॒त्रोत मेध्या॑तिथिम॒ग्निः सा॒ता उ॑पस्तु॒तम्॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे यह भौतिक अग्नि विद्वानों का ग्रहण किया हुआ उनके लिये बल पराक्रम और सौभाग्य को देकर शिल्पविद्या में प्रवीण और उसके मित्रों की सदा रक्षा करता है वैसे ही प्रजा और सेना के भद्रपुरुषों से प्रार्थना किया हुआ यह सभाध्यक्ष राजा उनके लिये बल पराक्रम उत्साह और ऐश्वर्य्य का सामर्थ्य देकर युद्ध विद्या में प्रवीण और उनके मित्रों को सब प्रकार पाले॥१७॥

अ॒ग्निना॑ तु॒र्वशं॒ यदुं॑ परा॒वत॑ उ॒ग्रादे॑वं हवामहे। अ॒ग्निर्न॑य॒न्नव॑वास्त्वं बृ॒हद्र॑थं तु॒र्वीतिं॒ दस्य॑वे॒ सहः॑॥

सब धार्मिक पुरुषों को चाहिये की तेजस्वी सभाध्यक्ष राजा के साथ मिल के वेग से अन्य के पदार्थों को हरने खोटे स्वभावयुक्त और अपने विजय की इच्छा करनेवाले डाकुओं को बुला उनके पर्वतादि एकान्त स्थानों में बने हुए घरों को खसाकर और बांध के उनको कैद में रक्खें॥१८॥सायणाचार्य ने यह मन्त्र नवीन पुराण मिथ्या ग्रन्थों की रीति के अवलंब से भ्रम के साथ कुछ का कुछ विरुद्ध वर्णन किया है॥

नि त्वाम॑ग्ने॒ मनु॑र्दधे॒ ज्योति॒र्जना॑य॒ शश्व॑ते। दी॒देथ॒ कण्व॑ ऋ॒तजा॑त उक्षि॒तो यं न॑म॒स्यन्ति॑ कृ॒ष्टयः॑॥

सबके पूजने योग्य परमात्मा के कृपाकटाक्ष से प्रजा की रक्षा के लिये राज्य के अधिकारी सब मनुष्यों को योग्य है कि सत्यव्यवहार की प्रसिद्धि से धर्मात्माओं को आनन्द और दुष्टों को ताड़ना देवें॥१९॥

त्वे॒षासो॑ अ॒ग्नेरम॑वन्तो अ॒र्चयो॑ भी॒मासो॒ न प्रती॑तये। र॒क्ष॒स्विनः॒ सद॒मिद्या॑तु॒माव॑तो॒ विश्वं॒ सम॒त्रिणं॑ दह॥

इस मंत्र में सायणाचार्य ने यातु पूर्वपद और भावान् उत्तर पद नहीं जान (यातुमा) इस पूर्वपद से मतुप् प्रत्यय माना है सो पद पाठ से विरुद्ध होने के कारण अशुद्ध है। सभाध्यक्ष आदि राजपुरुषों और प्रजा के मनुष्यों को चाहिये कि जिस प्रकार अग्नि आदि पदार्थ वन आदि को भस्म कर देते हैं वैसे दुःख देनेवाले शत्रु जनों के विनाश के लिये इस प्रकार प्रयत्न करें॥२०॥इस सूक्त में सबकी रक्षा करनेवाले परमेश्वर तथा दूत के दृष्टान्त से भौतिक अग्नि के गुणों का वर्णन दूत के गुणों का उपदेश अग्नि के दृष्टान्त से राजपुरुषों के गुणों का वर्णन सभापति का कृत्य सभापति होने के अधिकारी का कथन अग्नि आदि पदार्थों से उपयोग लेने की रीति मनुष्यों को सभापति से प्रार्थना सब मनुष्यों को सभाध्यक्ष के साथ मिलके दुष्टों का मारना और राजपुरुषों के सहायक जगदीश्वर के उपदेश से इस सूक्त के अर्थ की पूर्वसूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह छत्तीसवां सूक्त और ग्यारहवां वर्ग समाप्त हुआ॥३६॥

क्री॒ळं वः॒ शर्धो॒ मारु॑तमन॒र्वाणं॑ रथे॒शुभ॑म्। कण्वा॑ अ॒भि प्र गा॑यत॥

सायणाचार्य्य ने (मारुतम्) इस पद को पवनों का संबन्धि (तस्येदम्) इस सूक्त से अण् प्रत्यय और व्यत्यय से आद्युदात्त स्वर अशुद्ध व्याख्यान किया है बुद्धिमान् पुरुषों को चाहिये कि जो पवन प्राणियों के चेष्टा, बल, वेग, यान और मंगल आदि व्यवहारों को सिद्ध करते इस से इनके गुणों की परीक्षा करके इन पवनों से यथायोग्य उपकार ग्रहण करें॥१॥मोक्षमूलर साहिब ने अर्व शब्द से अश्व के ग्रहण का निषेध किया है सो भ्रमभूल होने से अशुद्ध ही है और फिर अर्व शब्द से सब जगह अश्व का ग्रहण किया है यह भी प्रमाण के न होने से अशुद्ध ही है। इस मंत्र में अश्वरहित विमान आदि रथ की विवक्षा होने से उन यानों में कलाओं से चलाये हुए पवन तथा अग्नि के प्रकाश और जल की बाफ के वेग से यानों के गमन का संभव है इस से यहां कुछ पशुरूप अश्व नहीं लिये हैं॥१॥

ये पृष॑तीभिर्ऋ॒ष्टिभिः॑ सा॒कं वाशी॑भिर॒ञ्जिभिः॑। अजा॑यन्त॒ स्वभा॑नवः॥

हे विद्वान् मनुष्यो! तुम लोगों को उचित है कि ईश्वर की रची हुई इस कार्य्य सृष्टि में जैसे अपने-२ स्वभाव के प्रकाश करनेवाले वायु के सकाश से जल की वृष्टि चेष्टा का करना अग्नि आदि की प्रसिद्धि और वाणी के व्यवहार अर्थात् कहना सुनना स्पर्श करना आदि सिद्ध होते हैं वैसे ही विद्या और धर्मादि शुभगुणों का प्रचार करो॥२॥मोक्षमूलर साहिब कहते हैं कि जो वे पवन चित्र विचित्र हरिण लोह की शक्ति तथा तलवारों और प्रकाशित आभुषणों के साथ उत्पन्न हुए हैं इति। यह व्याख्या असंभव है क्योंकि पवन निश्चय करके वृष्टि करानेवाली क्रिया तथा स्पर्शादि गुणों के योग और सब चेष्टा के हेतु होने से वाणी और अग्नि के प्रगट करने के हेतु हुए अपने आप प्रकाशवाले हैं और जो उन्होंने कहा हैं कि सायणाचार्य ने वाशी शब्द का व्याख्यान यथार्थ किया है सो भी असंगत है क्योंकि वह भी मंत्र पद और वाक्यार्थ से विरुद्ध है और जो मेरे भाष्य में प्रकरण पद वाक्य और भावार्थ के अनुकूल अर्थ है उसको विद्वान् लोग स्वयं विचार लेंगे कि ठीक है वा नहीं॥२॥

इ॒हेव॑ शृण्व एषां॒ कशा॒ हस्ते॑षु॒ यद्वदा॑न्। नि याम॑ञ्चि॒त्रमृ॑ञ्जते॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। वायु पदार्थ विद्या की इच्छा करनेवाले विद्वानों को चाहिये कि मनुष्य आदि प्राणी जितने कर्म करते हैं उन सभों के हेतु पवन हैं जो वायु न हों तो कोई मनुष्य कुछ भी कर्म करने को समर्थ न हों सके और दूरस्थित मनुष्य ने उच्चारण किये हुए शब्द निकट के उच्चारण के समान वायु की चेष्टा के विना कोई भी कह वा सुन न सके और मनुष्य मार्ग में चलने आदि जितने बल वा पराक्रमयुक्त कर्म करते हैं वे सब वायु ही के योग से होते हैं इससे यह सिद्ध है कि वायु के विना कोई नेत्र के चलाने को भी समर्थ नहीं हो सकता इसलिये इसके शुभगुणों का खोज सर्वदा किया करें॥३॥मोक्षमूलर साहिब कहते हैं कि मैं सारथियों के कशा अर्थात् चावक के शब्दों को सुनता हूँ तथा अति समीप हाथों में उन पवनों को प्रहार करते हैं वे अपने मार्ग में अत्यन्त शोभा को प्राप्त होते हैं और यामन् यह मार्ग का नाम है जिस मार्ग से देव जाते हैं वा जिस मार्ग से बलिदानों को प्राप्त होते हैं जैसे हम लोगों के प्रकरण में मेघ के अवयवों का भी ग्रहण होता हैं। यह सब अशुद्ध हैं क्योंकि इस मंत्र में कशा शब्द से सब क्रिया और यामन् शब्द से मार्ग में सब व्यवहार प्राप्त करनेवाले कर्मों का ग्रहण है॥३॥

प्र वः॒ शर्धा॑य॒ घृष्व॑ये त्वे॒षद्यु॑म्नाय शु॒ष्मिणे॑। दे॒वत्तं॒ ब्रह्म॑ गायत॥

विद्वान् मनुष्यों को चाहिये कि ईश्वर के कहे हुए वेदों को पढ़ वायु के गुणों को जान और यश वा बल के कर्मों का अनुष्ठान करके सब प्राणियों के लिये सुख देवें॥४॥मोक्षमूलर साहिब का अर्थ जिनके घरों में वायु देवता आते हैं हे बुद्धिमान् मनुष्यों तुम उन के आगे उन देवताओं की स्तुति करो तथा देवता कैसे हैं कि उन्मत्त विजय करने वा वेगवाले इस में चौथे मंडल सत्रहवें सूक्त दूसरे मंत्र का प्रमाण है। सो यह अशुद्ध है क्योंकि सब जगह पवनों की स्थिति के जाने आनेवाली क्रिया होने वा उनके सामीप्य के विना वायु के गुणों की स्तुति के संभव होने से और वायु से भिन्न वायु का कोई देवता नहीं है इस से तथा जो मंत्र का प्रमाण दिया है वहां भी उनका अभीष्ट अर्थ इनके अर्थ के साथ नहीं है॥४॥

प्र शं॑सा॒ गोष्वघ्न्यं॑ क्री॒ळं यच्छर्धो॒ मारु॑तम्। जम्भे॒ रस॑स्य वावृधे॥

मनुष्यों को योग्य है कि जो वायुसम्बन्धि शरीर आदि में क्रीड़ा और बल का बढ़ना है उसको नित्य उन्नति देवें और जितना रस आदि प्रतीत होता है वह सब वायु के संयोग से होता है इससे परस्पर इस प्रकार सब शिक्षा करनी चाहिये कि जिससे सब लोगों को वायु के गुणों की विद्या विदित हो होवें॥५॥मोक्षमूलर साहिब का कथन कि यह प्रसिद्ध वायु पवनों के दलों में उपाधि से बढ़ा हुआ जैसे उस पवन ने मेघावयवों को स्वादयुक्त किया है क्योंकि इसने पवनों का आदर किया इससे। सो यह अशुद्ध है कैसे कि जो इस मंत्र में इन्द्रियों के मध्य में पवनों का बल कहा है उसकी प्रशंसा करनी और जो प्राणि लोग मुख से स्वाद लेते हैं वह भी पवनों का बल है और इस शब्द के अर्थ में विलसन और मोक्षमूलर साहिब का वादविवाद निष्फल है॥५॥

को वो॒ वर्षि॑ष्ठ॒ आ न॑रो दि॒वश्च॒ ग्मश्च॑ धूतयः। यत्सी॒मन्तं॒ न धू॑नु॒थ॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। विद्वान् राजपुरुषों को चाहिये कि जैसे कोई बलवान् मनुष्य निर्बल मनुष्य के केशों का ग्रहण करके कम्पाता और जैसे वायु सब लोकों का ग्रहण तथा चलायमान कर के अपनी-२ परिधि में प्राप्त करते हैं वैसे ही सब शत्रुओं को कम्पा और उनके स्थानों से चलायमान कर के प्रजा की रक्षा करें॥६॥मोक्षमूलर साहिब का अर्थ कि हे मनुष्यो तुम्हारे बीच में बड़ा कौन है तथा तुम आकाश वा पृथिवी लोक को कम्पानेवाले हो जब तुम धारण किये हुए वस्त्र का प्रान्त भाग कंपने समान उनको कंपित करते हो। सायणाचार्य के कहे हुए अन्त शब्द के अर्थ को मैं स्वीकार नहीं करता किन्तु विलसन आदि के कहे हुए को स्वीकार करता हूँ। यह अशुद्ध और विपरीत है क्योंकि इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे राजपुरुष शत्रुओं और अन्य मनुष्य तृणकाष्ठ आदि को ग्रहण करके कम्पाते हैं वैसे वायु भी हैं इस अर्थ का विद्वानों के सकाश से निश्चय करना चाहिये इस प्रकार कहे हुए व्याख्यान से। जैसा सायणाचार्य का किया हुआ अर्थ व्यर्थ है वैसा ही मोक्षमूलर साहिब का किया हुआ अर्थ अनर्थ है ऐसा हम सब सज्जन लोग जानते हैं॥६॥

नि वो॒ यामा॑य॒ मानु॑षो द॒ध्र उ॒ग्राय॑ म॒न्यवे॑। जिही॑त॒ पर्व॑तो गि॒रिः॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे प्रजा सेनास्थ मनुष्यों तुम लोगों के सब व्यवहार वायु के समान राजव्यवस्था ही से ठीक-२ चल सकते हैं और जब तुम लोग अपने नियमोपनियमों पर नहीं चलते हो तब तुम को सभाध्यक्ष राजा वायु के समान शीघ्र दण्ड देता है और जिसके भय से वायु से मेघों के समान शत्रुजन पलायमान होते हैं उसको तुम लोग पिता के समान जानो॥७॥मोक्षमूलर कहते हैं कि हे पवनों आपके आने से मनुष्य का पुत्र अपने आपही नम्र होता है तथा तुम्हारे क्रोध से डर के भागता है। यह उनका कथन व्यर्थ हैं, क्योंकि इस मंत्र में गिरि और पर्वत शब्द से मेघ का ग्रहण किया है। तथा मानुष शब्द का अर्थ धारण क्रिया का कर्त्ता है और न इस मंत्र में बालक के शिर के नमन होने का ग्रहण है। जैसा कि सायणाचार्य का अर्थ व्यर्थ है वैसा ही मोक्षमूलर का भी जानना चाहिये। वेद का करनेवाला ईश्वर ही है मनुष्य नहीं इतनी भी परीक्षा मोक्षमूलर साहिब ने नहीं की पुनः वेदार्थज्ञान की तो क्या ही कथा है॥७॥

येषा॒मज्मे॑षु पृथि॒वी जु॑जु॒र्वाँइ॑व वि॒श्पतिः॑। भि॒या यामे॑षु॒ रेज॑ते॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे कोई राजा जीर्ण अवस्था को प्राप्त हुआ रोग वा शत्रुओं के भय से कम्पता है वैसे पवनों से सब प्रकार धारण किये हुए पृथिवी आदि लोक घूंमते हैं। और सूत्र के समान बंधे हुए वायु के विना किसी लोक की स्थिति वा भ्रमण का संभव कभी नहीं हो सकता॥८॥मोक्षमूलर साहिब का कथन कि जिन पवनों के दौड़नें में पृथिवी निर्बल राजा के समान भय से मार्गों में कम्पित होती है। संस्कृत की रीति से यह बड़ा दोष है कि जो स्त्रीलिङ्ग उपमेय के साथ पुल्लिङ्ग वाची उपमान दिया है। सो यह मौक्षमू० का कथन मिथ्या है क्योंकि वायु के योग ही से पृथिवी के धारण वा भ्रमण का संभव होकर वायु के भीषण ही से पृथिवी आदि लोकों के स्वरूप की स्थिति होती है तथा यह लिङ्ग व्यत्यय से उपमालङ्कार में दोष नहीं हो सकता, जैसे मनुष्य के तुल्य वायु और वायु के समान मन चलता है, श्येनपक्षी के समान मेना, स्त्री के समान पुरुष वा पुरुष के समान स्त्री, हाथी के समान भैंसी वा हथिनी के समान, चंद्रमा के समान मुख, सूर्य प्रकाश के समान राजनीति, इस प्रकार उपमालङ्कार में लिङ्ग भेद से कोई भी दोष नहीं आ-सकता॥८॥

स्थि॒रं हि जान॑मेषां॒ वयो॑ मा॒तुर्निरे॑तवे। यत्सी॒मनु॑ द्वि॒ता शवः॑॥

ये कार्यरूप पवन आकाश में उत्पन्न होकर इधर उधर जाते-आते हैं, जहां अवकाश है वहां जिनके सब प्रकार गमन का संभव होता और जिनकी अनुकूलता से सब प्राणी जीवन को प्राप्त होकर बलवाले होते हैं उन को युक्ति के साथ तुम लोग सेवन किया करो॥९॥मोक्षमूलर की उक्ति है कि सत्य ही है कि पवनों की उत्पत्ति बलवाली तथा उनका सामर्थ्य आकाश से आता है उनका सामर्थ्य द्विगुण वा पुष्कल है। सो यह निष्प्रयोजन है क्योंकि सब द्रव्यों की उत्पत्ति अपने-२ कारण के अनुकूल बलवाली होती है उनके कार्यों में कारण के गुण आते ही हैं और वयः शब्द से पक्षियों का ग्रहण है॥९॥

उदु॒ त्ये सू॒नवो॒ गिरः॒ काष्ठा॒ अज्मे॑ष्वत्नत। वा॒श्रा अ॑भि॒ज्ञु यात॑वे॥

इस मंत्र में लुप्तोपमालङ्कार है। राजा और प्रजा के मनुष्यों को चाहिये कि जैसे ये वायु ही वाणी और जलों को चलाकर विस्तृत करके अच्छे प्रकार शब्दों को श्रवण कराते हुए जाना-आना जन्म वृद्धि और नाश के हेतु हैं वैसे ही शुभाशुभ कर्मों का अनुष्ठान सुख-दुःख का निमित्त है॥१०॥मोक्षमूलर की उक्ति है कि जो गान करनेवाले पुत्र अपनी गति में गौओं के स्थानों को विस्तारयुक्त लम्बे करते हैं तथा गौ जांघ के बल से आती हैं। सो यह व्यर्थ है क्योंकि इस मंत्र में ‘सूनु’ शब्द से प्रिय वाणी को उच्चारण करते हुए बालक ग्रहण किये हैं जैसे गौ बछड़ों को चाटने के लिये पृथिवी में जंघाओं को स्थापन करके सुखयुक्त होती है इस प्रकार विवक्षा के होने से॥१०॥यह तेरहवां वर्ग समाप्त हुआ॥१३॥

त्यं चि॑द्घा दी॒र्घं पृ॒थुं मि॒हो नपा॑त॒ममृ॑ध्रम्। प्र च्या॑वयन्ति॒ याम॑भिः॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजपुरुषों को चाहिये कि जैसे पवन ही मेघ के निमित्त बहुत जल को ऊपर पहुंचा कर परस्पर घिसने से बिजुली को उत्पन्न कर उसे न गिरने योग्य तथा न गीला करने और बड़े आकारवाले मेघ को भूमि में गिराते हैं वैसे ही धर्म विरोधी सब व्यवहारों को छोड़ें और छुड़ावें॥११॥मोक्षमूलर की उक्ति है कि वे पवन इस बहुत काल वर्षा कराते हुए अप्रतिबद्ध मेघ# के निमित्त और मार्ग के ऊपर गिराने के लिये हैं यह कुछेक अशुद्ध हैं। क्योंकि (मिहः) यह पद पवनों का विशेषण है और इन्होंने मेघ का विशेषण किया है॥११॥#[सं० भा० के अनुसार-मेघ के मार्ग पर गिराने के निमित्त हैं। सं०]

मरु॑तो॒ यद्ध॑ वो॒ बलं॒ जनाँ॑ अचुच्यवीतन। गि॒रीँर॑चुच्यवीतन॥

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। सभाध्यक्षादि राजपुरुषों को चाहिये कि जैसे वायु मेघों को इधर-उधर घुमा के वर्षाते हैं वैसे ही प्रजा के सब मनुष्यों को न्याय की व्यवस्था से अपने-२ कर्मों में आलस्य छोड़ के सदा नियुक्त करते रहें॥१२॥मोक्षमूलर की उक्ति है। हे पवनो ऐसे बल के साथ जैसी आपकी शक्ति है और तुम पुरुष वा पर्वतों को पतन कराने के निमित्त हो सो यह अशुद्ध है, क्योंकि गिरि शब्द से इस मन्त्र में मेघ का ग्रहण है# और जन* शब्द से सामान्य गति ¤वाले का ग्रहण है पतनमात्र का नहीं है॥१२॥#[सं० उ० के अनुसार ‘पहाड़ों का नही’। इतना और होना चाहिये। सं०] *[अर्थात् घन कर्मक ‘अचुच्यवीतन’ शब्द से। सं०] ¤[वाली क्रिया का। सं०]

यद्ध॒ यान्ति॑ म॒रुतः॒ सं ह॑ ब्रुव॒तेऽध्व॒न्ना। शृ॒णोति॒ कश्चि॑देषाम्॥

इस वायु विद्या को कोई विद्वान् ही ठीक-२ जान सकता है जड़बुद्धि नहीं जान सकता॥१३॥मोक्षमूलर की उक्ति है कि जब निश्चय करके पवन परस्पर साथ-२ जाते वा अपने मार्गों के ऊपर बोलते हैं तब कोई मनुष्य क्या श्रवण करता है अर्थात् नहीं, यह अशुद्ध हैं क्योंकि पवनों का जड़त्व होने से वार्त्ता करना असम्भव है और कहनेवाले चेतन जीवों के बोलने# में हेतु तो होते हैं*॥१३॥#[संस्कृत उक्ति के अनुसार (वचन सुनने के)। सं०] *[अर्थात् (ये पवन)। सं०]

प्र या॑त॒ शीभ॑मा॒शुभिः॒ सन्ति॒ कण्वे॑षु वो॒ दुवः॑। तत्रो॒ षु मा॑दयाध्वै॥

राजा और प्रजा के विद्वानों को चाहिये कि वायु के समान अभीष्ट स्थानों को शीघ्र जाने आने के लिये विमानादि यान बना के अपने कार्यों को निरन्तर सिद्ध करें और धर्मात्माओं की सेवा तथा दुष्टों को ताड़ने में सदैव आनन्दित रहैं॥१४॥मोक्षमूलर की उक्ति है कि तुम तीव्र गतिवाले घोड़ों के ऊपर स्थित होकर जल्दी आओ वहां आपके पुजारी कण्वों के मध्य में हैं तुम उनमें आनन्दित होओ सो यह अशुद्ध है क्योंकि #बड़े-२ वेग आदि गुण ही वायु के हैं, वे गुण उनमें समवाय सम्बन्ध से रहते हैं, उनके ऊपर इन पवनों की स्थिति होने का ही संभव नहीं और कण्व शब्द से विद्वानों का ग्रहण है उनमें निवास करने से विद्या की प्राप्ति और आनन्द का प्रकाश होता है॥१४॥#[सं० उ० के अनुसार ‘महान् वेगादि गुण ही अश्व हैं’। सं० ]

अस्ति॒ हि ष्मा॒ मदा॑य वः॒ स्मसि॑ ष्मा व॒यमे॑षाम्। विश्वं॑ चि॒दायु॑र्जी॒वसे॑॥

जैसे योगाभ्यास करके प्राणविद्या और वायु के विकारों को ठीक-२ जाननेवाले पथ्यकारी विद्वान् लोग आनन्दपूर्वक सब आयु भोगते हैं वैसे अन्य मनुष्यों को भी करनी चाहिये कि उन विद्वानों के सकाश से उस वायु विद्या को जानके संपूर्ण आयु भोगें॥१५॥मोक्षमूलर की उक्ति है कि निश्चय करके यहां तुम्हारी प्रसन्नता पुष्कल है हम लोग सब दिन तुम्हारे भृत्य हैं जो भी हम संपूर्ण आयु भर जीते हैं- यह अशुद्ध है। क्योंकि यहां प्राणरूप वायु से जीवन होता है हम लोग इस विद्या को #जानते हैं इस प्रकार इस मन्त्र का अर्थ है॥१५॥इसी प्रकार कि जैसे यहां मोक्षमूलर साहेब ने अपनी कपोल कल्पना से मंत्रो के अर्थ विरुद्ध वर्णन किये हैं वैसे आगे भी इनकी उक्ति अन्यथा ही है ऐसा सबको जानना चाहिये। जब पक्षपात को छोड़ कर मेरे रचे हुए मन्त्रार्थ भाष्य वा मोक्षमूलरादिकों के कहे हुए की परीक्षा करके विवेचन करेंगे तब इनके किये हुए ग्रन्थों की अशुद्धि जान पड़ेगी बहुत को थोड़े ही लिखने से जान लेवें आगे। आगे अब बहुत लिखने से क्या है। इस सूक्त में अग्नि के प्रकाश करनेवाले सब चेष्टा बल और आयु के निमित्त वायु और उस वायु विद्या को जाननेवाले राज* प्रजा के विद्वानों के गुण वर्णन से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह चौदहवां वर्ग और सैंतीसवां सूक्त समाप्त हुआ॥३७॥#[सं० उ० के अनुसार ‘जाने’। सं०]*[ सं० वा० के अनुसार ‘राजा, प्रजा, अश्वों और विद्वानों। सं०]

कद्ध॑ नू॒नं क॑धप्रियः पि॒ता पु॒त्रं न हस्त॑योः। द॒धि॒ध्वे वृ॑क्तबर्हिषः॥

इस मंत्र में उपमा और वाचक लुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे पिता हाथों से अपने पुत्र को ग्रहण कर शिक्षापूर्वक पालना तथा अच्छे कार्यों में नियुक्त करके सुखी होता और जैसे पवन सब लोकों को धारण करते हैं वैसे* विद्या से यज्ञ का ग्रहण कर युक्ति से अच्छे प्रकार सेवन करते हैं वे ही सुखी होते हैं॥१॥*[सं० भा० के अनुसार यहाँ- ‘जो मनुष्य’ इतना और होना चाहिये। सं०]

क्व॑ नू॒नं कद्वो॒ अर्थं॒ गन्ता॑ दि॒वो न पृ॑थि॒व्याः। क्व॑ वो॒ गावो॒ न र॑ण्यन्ति॥

इस मंत्र में दो उपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो जैसे सूर्य की किरणें पृथिवी में स्थित हुए पदार्थों को प्रकाश करती हैं वैसे तुम भी विद्वानों के समीप जाकर, कहाँ पवनों का नियोग करना चाहिये ऐसा पूछ कर अर्थों को प्रकाश करो और जैसे गौ अपने बछड़ों के प्रति शब्द करके दौड़ती हैं वैसे तुम भी विद्वानों के सङ्ग करने को प्राप्त हो तथा हम लोगों की इन्द्रियाँ वायु के समान कहाँ स्थित होकर अर्थों को प्राप्त होती हैं ऐसा पूछ कर निश्चय करो॥२॥

क्व॑ वः सु॒म्ना नव्यां॑सि॒ मरु॑तः॒ क्व॑ सुवि॒ता। क्वो॒ ३॒॑ विश्वा॑नि॒ सौभ॑गा॥

इस मंत्र में लुप्तोपमालङ्कार है। हे शुभ कर्मों में वायु के समान शीघ्र चलनेवाले मनुष्यों! तुम लोगों को चाहिये कि विद्वानों के प्रति पूछ कर जिस प्रकार नवीन क्रिया की सिद्धि के निमित्त कर्म प्राप्त होवें वैसा अच्छे प्रकार निरन्तर यत्न किया करो॥३॥

यद्यू॒यं पृ॑श्निमातरो॒ मर्ता॑सः॒ स्यात॑न। स्तो॒ता वो॑ अ॒मृतः॑ स्यात्॥

राजा और प्रजा के पुरुषों को उचित है कि आलस्य छोड़ वायु के समान अपने-२ कामों में नियुक्त होवें, जिससे सब का रक्षक सभाध्यक्ष राजा शत्रुओं से मारा नहीं जा सकता+॥४॥+[स० भा० के अनुसार ‘सके’। सं०]

मा वो॑ मृ॒गो न यव॑से जरि॒ता भू॒दजो॑ष्यः। प॒था य॒मस्य॑ गा॒दुप॑॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे हिरन युक्ति से निरन्तर घास खा-कर सुखी होते हैं वैसे प्राण वायु की विद्या को जाननेवाला मनुष्य युक्ति के साथ अहार-विहार कर वायु के ¤मार्ग से अर्थात् मृत्यु को प्राप्त नहीं होता और संपूर्ण अवस्था को भोग के सुख से शरीर को छोड़ता है ¶अर्थात् सदा विद्या पढ़ें पढ़ावें कभी विद्यार्थी और आचार्य वियुक्त न हों और प्रमाद करके अल्पायु में न मर जायें॥५॥¤[सं० भा० के अनुसार ‘मार्ग को’। सं०] ¶[इसमें आगे का भाग संस्कृत भाष्य में नहीं है। सं०]

मो षु णः॒ परा॑परा॒ निर्ऋ॑तिर्दु॒र्हणा॑ वधीत्। प॒दी॒ष्ट तृष्ण॑या स॒ह॥

पवनों की दो प्रकार की गति होती है एक सुख कारक और दूसरी दुःख करनेवाली उनमें से जो उत्तम नियमों से सेवन की हुई रोगों का हनन करती हुई शरीर आदि के सुख का हेतु है वह प्रथम और जो खोटे नियम और प्रमाद से उत्पन्न हुई क्लेश दुःख और रोगों की देनेवाली वह दूसरी इन्हों के मध्य में से मनुष्यों को अति उचित है कि परमेश्वर के अनुग्रह और अपने पुरुषार्थों से पहिली गति को उत्पन्न करके दूसरी गति का नाश करके सुख की उन्नति करनी चाहिये और जो पिपासा आदि धर्म हैं वह वायु के निमित्त से तथा जो लोभ का वेग है वह अज्ञान से ही उत्पन्न होता है॥६॥

स॒त्यं त्वे॒षा अम॑वन्तो॒ धन्व॑ञ्चि॒दा रु॒द्रिया॑सः। मिहं॑ कृण्वन्त्यवा॒ताम्॥

मनुष्यों को चाहिये कि जैसे अन्तरिक्ष में रहने तथा सत्यगुण और स्वभाववाले पवन वृष्टि के हेतु हैं वे ही युक्ति से सेवन किये हुए अनुकूल होकर सुख देते और युक्ति रहित सेवन किये प्रतिकूल होकर दुःखदायक होते हैं वैसे युक्ति से धर्मानुकूल कर्मों का सेवन करें॥७॥

वा॒श्रेव॑ वि॒द्युन्मि॑माति व॒त्सं न मा॒ता सि॑षक्ति। यदे॑षां वृ॒ष्टिरस॑र्जि॥

इस मंत्र में दो उपमालङ्कार है। हे विद्वान् मनुष्यो! तुम लोगों को उचित है कि जैसे अपने-२ बछड़ों को सेवन करने के लिये इच्छा करती हुई गौ और अपने छोटे बालक को सेवने हारी माता ऊंचे स्वर से शब्द करके उनकी ओर दौड़ती हैं वैसे ही बिजुली बड़े-२ शब्दों को करती हुई मेघ के अवयवों के सेवन करने के लिये दौड़ती है॥८॥

दिवा॑ चि॒त्तमः॑ कृण्वन्ति प॒र्जन्ये॑नोदवा॒हेन॑। यत्पृ॑थि॒वीं व्यु॒न्दन्ति॑॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। पवन ही जलों के अवयवों को कठिन# सघनाकार मेघ को उत्पन्न उस बिजुली में उन मेघों के अवयवों को छिन्न-भिन्न और पृथिवी में गेर कर जलों से स्निग्ध करके अनेक औषधी आदि समूहों को उत्पन्न करते हैं उनका उपदेश विद्वान् लोग अन्य मनुष्यों को सदा किया करें॥९॥#[सं० भा० के अनुसार- कठिन कर, सघनाकार मेघ को उत्पन्न करके फिर बिजली को पैदा कर उस०। सं०]

अध॑ स्व॒नान्म॒रुतां॒ विश्व॒मा सद्म॒ पार्थि॑वम्। अरे॑जन्त॒ प्र मानु॑षाः॥

हे ज्योतिष्य शास्त्र के विद्वान लोगो! आप पवनों के योग ही के सब मूर्त्तिमान् द्रव्य चेष्टा को प्राप्त होते प्राणी लोग बिजुली के भयंकर शब्द में भय को प्राप्त होकर कंपित होते और भूगोल आदि प्रतिक्षण भ्रमण किया करते हैं ऐसा निश्चित समझों॥१०॥

मरु॑तो वीळुपा॒णिभि॑श्चि॒त्रा रोध॑स्वती॒रनु॑। या॒तेमखि॑द्रयामभिः॥

पवनों में गमन बल और व्यवहार होने के हेतु स्वाभाविक धर्म हैं और ये निश्चय करके नदियों को चलानेवाले नाड़ियों के मध्य में गमन करते हुए रुधिर रसादि को शरीर के अवयवों में प्राप्त करते हैं इस कारण योगी लोग योगाभ्यास और अन्य मनुष्य बल आदि के साधनरूप वायुओं से बड़े-२ उपकार ग्रहण करें॥११॥

स्थि॒रा वः॑ सन्तु ने॒मयो॒ रथा॒ अश्वा॑स एषाम्। सुसं॑स्कृता अ॒भीश॑वः॥

ईश्वर उपदेश करता है। हे मनुष्यो! तुमको चाहिये कि अनेक प्रकार के कलाचक्र युक्त विमान आदि यानों को रच कर उनमें जल्दी चलनेवाले अग्नि जल के सम्प्रयोग वा पवनों के योग से सुख पूर्वक जाने-आने और शत्रुओं को जीतने आदि सब व्यवहारों को सिद्ध करो॥१२॥

अच्छा॑ वदा॒ तना॑ गि॒रा ज॒रायै॒ ब्रह्म॑ण॒स्पति॑म्। अ॒ग्निं मि॒त्रं न द॑र्श॒तम्॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वान् मनुष्यों! तुम लोगों को चाहिये कि जैसे प्रिय मित्र अपने प्रिय तेजस्वी वेदोपदेशक मित्र को सेवा और गुणों की स्तुति से तृप्त करता है वैसे सब विद्याओं का विस्तार करनेवाली वेद वाणी से विमानादि यानों के रचने की विद्या का उसके गुण ज्ञान के लिये निरंतर उपदेश करो॥१३॥

मि॒मी॒हि श्लोक॑मा॒स्ये॑ प॒र्जन्य॑इव ततनः। गाय॑ गाय॒त्रमु॒क्थ्य॑म्॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वानों से विद्या पढ़े हुए मनुष्यों! तुम लोगों को उचित है कि सब प्रकार प्रयत्न के साथ वेद विद्या से शिक्षा की हुई वेदवाणी से वाणी के वेत्ता के समान वक्ता होकर वायु आदि पदार्थों के गुणों की स्तुति तथा उपदेश किया करो॥१४॥

वन्द॑स्व॒ मारु॑तं ग॒णं त्वे॒षं प॑न॒स्युम॒र्किण॑म्। अ॒स्मे वृ॒द्धा अ॑सन्नि॒ह॥

इस मंत्र में लुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे पवन कार्यों को सिद्ध करने के साधन होने से सुख देनेवाले होते हैं वैसे विद्या और अपने पुरुषार्थ से सुख किया करें॥१५॥इस सूक्त में वायु के दृष्टान्त से विद्वानों के गुण वर्णन करने से पूर्व सूक्त के साथ इस सूक्त की संगति जाननी चाहिये यह सत्रहवां वर्ग और अड़तीसवां सूक्त समाप्त हुआ॥३८॥

प्र यदि॒त्था प॑रा॒वतः॑ शो॒चिर्न मान॒मस्य॑थ। कस्य॒ क्रत्वा॑ मरुतः॒ कस्य॒ वर्प॑सा॒ कं या॑थ॒ कं ह॑ धूतयः॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। सुख की इच्छा करनेवाले विद्वान् पुरुषों को चाहिये कि जैसे सूर्य की किरणें दूर देश से भूमि को प्राप्त होकर पदार्थों को प्रकाश करती हैं वैसे ही अभिमान को दूर से त्याग के सब सुख देनेवाले परमात्मा और भाग्यशाली परमविद्वान्* के गुण, कर्म, स्वभाव और मार्ग को ठीक-२ जानके उन्हीमें रमण करें ये वायु कारण से आते कारणस्वरूप से स्थित और कारण में लीन भी हो जाते हैं॥१॥*[संस्कृत भाष्य के अनुसार-परम विद्वान् से वायु के। सं०]

स्थि॒रा वः॑ स॒न्त्वायु॑धा परा॒णुदे॑ वी॒ळू उ॒त प्र॑ति॒ष्कभे॑। यु॒ष्माक॑मस्तु॒ तवि॑षी॒ पनी॑यसी॒ मा मर्त्य॑स्य मा॒यिनः॑॥

धार्मिक मनुष्य ही परमात्मा के कृपा पात्र होकर सदा विजय को प्राप्त होते हैं दुष्ट नहीं। परमात्मा भी धार्मिक मनुष्यों ही को आशीर्वाद देता है पापियों को नहीं। पुण्यात्मा मनुष्यों को उचित है कि उत्तम-२ शस्त्र-अस्त्र रचकर उनके फेंकने का अभ्यास करके सेना को उत्तम शिक्षा देकर शत्रुओं का निरोध वा पराजय करके न्याय से मनुष्यों की निरन्तर रक्षा करनी चाहिये#॥२॥#[ सं० भा० के अनुसार इसके आगे ‘इन शस्त्रादि पदार्थों को छली मनुष्य नहीं प्राप्त कर सक्ता’ इतना वाक्य और होना चाहिये। सं०]

परा॑ ह॒ यत्स्थि॒रं ह॒थ नरो॑ व॒र्तय॑था गु॒रु। वि या॑थन व॒निनः॑ पृथि॒व्या व्याशाः॒ पर्व॑तानाम्॥

इस मंत्र में वाचक लुप्तोपमालङ्कार है। जैसे वेगयुक्त वायु वृक्षादि को उखाड़ तोड़-झंझोड़ देते और पृथिव्यादि को धरते हैं वैसे धार्मिक न्यायाधीश अधर्माचारों को रोक के धर्मयुक्त न्याय से प्रजा को धारण करें और सेनापति दृढ़ बल युक्त हो उत्तम सेना का धारण शत्रुओं को मार पृथिवी पर चक्रवर्त्ति राज्य का सेवन कर सब दिशाओं में अपनी उत्तम कीर्त्ति का प्रचार करें और जैसे प्राण सबसे अधिक प्रिय होते हैं वैसे राज पुरुष प्रजा को प्रिय हों॥३॥

न॒हि वः॒ शत्रु॑र्विवि॒दे अधि॒ द्यवि॒ न भूम्यां॑ रिशादसः। यु॒ष्माक॑मस्तु॒ तवि॑षी॒ तना॑ यु॒जा रुद्रा॑सो॒ नू चि॑दा॒धृषे॑॥

जैसे पवन आकाश में शत्रु रहित विचरते हैं वैसे मनुष्य विद्या, धर्म, बल, पराक्रमवाले न्यायाधीश हो सबको शिक्षा दे और दुष्ट शत्रुओं को दण्ड देके शत्रुओं से रहित होकर धर्म में वर्त्ते॥४॥

प्र वे॑पयन्ति॒ पर्व॑ता॒न्वि वि॑ञ्चन्ति॒ वन॒स्पती॑न्। प्रो आ॑रत मरुतो दु॒र्मदा॑इव॒ देवा॑सः॒ सर्व॑या वि॒शा॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे राजधर्म में वर्त्तनेवाले विद्वान् लोग दंड से घमंडी डाकुओं को वश में करके धर्मात्मा प्रजाओं का पालन करते हैं वैसे तुम भी अपनी प्रजा का पालन करो और जैसे पवन भूगोल के चारों ओर विचरते हैं वैसे आप लोग सर्वत्र जाओ-आओ। यह अठारवां वर्ग समाप्त हुआ॥५॥

उपो॒ रथे॑षु॒ पृष॑तीरयुग्ध्वं॒ प्रष्टि॑र्वहति॒ रोहि॑तः। आ वो॒ यामा॑य पृथि॒वी चि॑दश्रो॒दबी॑भयन्त॒ मानु॑षाः॥

जो मनुष्य यानों में जल अग्नि और वायु को युक्त कर उनमें बैठ गमनागमन करें तो सुख ही से सर्वत्र जाने-आने को समर्थ हों॥६॥

आ वो॑ म॒क्षू तना॑य॒ कं रुद्रा॒ अवो॑ वृणीमहे। गन्ता॑ नू॒नं नोऽव॑सा॒ यथा॑ पु॒रेत्था कण्वा॑य बि॒भ्युषे॑॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे मेधावी विद्वान् लोग वायु आदि के द्रव्य और गुणों के योग से भय को निवारण करके तुरन्त सुखी होते हैं। वैसे हम लोगों को भी होना चाहिये॥७॥

यु॒ष्मेषि॑तो मरुतो॒ मर्त्ये॑षित॒ आ यो नो॒ अभ्व॒ ईष॑ते। वि तं यु॑योत॒ शव॑सा॒ व्योज॑सा॒ वि यु॒ष्माका॑भिरू॒तिभिः॑॥

मनुष्यों को उचित है कि जो स्वार्थी परोपकार से रहित दूसरे को पीड़ा देने में अत्यन्त प्रसन्न शत्रु हैं उनको विद्या वा शिक्षा के द्वारा खोटे कर्मों से निवृत्त कर वा उत्तम सेना बल को संपादन युद्ध से जीत निवारण करके सबके हित का विस्तार करना चाहिये॥८॥

असा॑मि॒ हि प्र॑यज्यवः॒ कण्वं॑ द॒द प्र॑चेतसः। असा॑मिभिर्मरुत॒ आ न॑ ऊ॒तिभि॒र्गन्ता॑ वृ॒ष्टिं न वि॒द्युतः॑॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे पवन सूर्य बिजुली आदि वर्षा करके सब प्राणियों के सुख के लिये अनेक प्रकार के फल, पत्र, पुष्प, अन्न आदि को उत्पन्न करते हैं वैसे विद्वान् लोग भी सब प्राणीमात्र को वेद विद्या देकर उत्तम-२ सुखों को निरन्तर संपादन करें॥९॥

असा॒म्योजो॑ बिभृथा सुदान॒वोऽसा॑मि धूतयः॒ शवः॑। ऋ॒षि॒द्विषे॑ मरुतः परिम॒न्यव॒ इषुं॒ न सृ॑जत॒ द्विष॑म्॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे धार्मिक शूरवीर मनुष्य क्रोध को उत्पन्न शस्त्रों के प्रहारों से शत्रुओं को जीत निष्कंटक राज्य को प्राप्त होकर प्रजा को सुखी करते हैं वैसे ही सब मनुष्य वेद विद्वान् वा ईश्वर के विरोधियों के प्रति सम्पूर्ण बल पराक्रमों से शस्त्र अस्त्रों को छोड़ उन को जीतकर ईश्वर वेद विद्या और विद्वान् युक्त राज्य को संपादन करें॥१०॥इस सूक्त में वायु और विद्वानों के गुण वर्णन करने से पूर्व सूक्तार्थ के साथ इस सूक्त के अर्थ की संगति जाननी चाहिये। यह उनतालीसवां सूक्त और उन्नीसवां वर्ग समाप्त हुआ॥३९॥१९॥

उत्ति॑ष्ठ ब्रह्मणस्पते देव॒यन्त॑स्त्वेमहे। उप॒ प्र य॑न्तु म॒रुतः॑ सु॒दान॑व॒ इन्द्र॑ प्रा॒शूर्भ॑वा॒ सचा॑॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सब मनुष्य अति पुरुषार्थ से विद्वानों का संग उनकी सेवा विद्या योग धर्म और सबके उपकार करना आदि उपायों से समग्र विद्याओं के अध्येता परमात्मा के विज्ञान और प्राप्ति से सब मनुष्यों को प्राप्त हों और इसीसे अन्य सबको सुखी करें॥१॥

त्वामिद्धि स॑हसस्पुत्र॒ मर्त्य॑ उपब्रू॒ते धने॑ हि॒ते। सु॒वीर्यं॑ मरुत॒ आ स्वश्व्यं॒ दधी॑त॒ यो व॑ आच॒के॥

मनुष्य लोग पढ़ने-पढ़ाने आदि धर्मयुक्त कर्मों ही से एक दूसरे का उपकार करके सुखी हों॥२॥

प्रैतु॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॒ प्र दे॒व्ये॑तु सू॒नृता॑। अच्छा॑ वी॒रं नर्यं॑ प॒ङ्क्तिरा॑धसं दे॒वा य॒ज्ञं न॑यन्तु नः॥

सब मनुष्यों को ऐसी इच्छा करनी चाहिये कि जिससे विद्या की वृद्धि होती जाय॥३॥

यो वा॒घते॒ ददा॑ति सू॒नरं॒ वसु॒ स ध॑त्ते॒ अक्षि॑ति॒ श्रवः॑। तस्मा॒ इळां॑ सु॒वीरा॒ मा य॑जामहे सु॒प्रतू॑र्तिमने॒हस॑म्॥

जो मनुष्य शरीर, वाणी, मन और धन से विद्वानों का सेवन करता है वही अक्षय विद्या को प्राप्त हो और पृथिवी के राज्य को भोग कर मुक्ति को प्राप्त होता है। जो पुरुष वाणी विद्या को प्राप्त होते हैं, वे विद्वान् दूसरे को भी पण्डित कर सकते हैं आलसी अविद्वान् पुरुष नहीं॥४॥

प्र नू॒नं ब्रह्म॑ण॒स्पति॒र्मन्त्रं॑ वदत्यु॒क्थ्य॑म्। यस्मि॒न्निन्द्रो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा दे॒वा ओकां॑सि चक्रिरे॥

मनुष्यों को उचित है कि जिस ईश्वर ने वेदों का उपदेश किया है, जो सब जगत् में व्याप्त होकर स्थित है जिसमें सब पृथिवी आदि लोक रहते और मुक्ति समय में विद्वान् लोग निवास करते हैं; उसी परमेश्वर की उपासना करनी चाहिये इससे भिन्न किसी की नहीं॥५॥

तमिद्वो॑चेमा वि॒दथे॑षु शं॒भुवं॒ मन्त्रं॑ देवा अने॒हस॑म्। इ॒मां च॒ वाचं॑ प्रति॒हर्य॑था नरो॒ विश्वेद्वा॒मा वो॑ अश्नवत्॥

विद्वानों को योग्य है कि विद्या के प्रचार के लिये मनुष्यों को निरन्तर अर्थ अंग उपांग रहस्य स्वर और हस्तक्रिया सहित वेदों को उपदेश करें और ये लोग अर्थात् मनुष्यमात्र इन विद्वानों से सब वेद विद्या को साक्षात् करें जो कोई पुरुष सुख चाहें तो वह विद्वानों के संग से विद्या को प्राप्त करें तथा इस विद्या के विना किसी को सत्य सुख नहीं होता इससे पढ़ने-पढ़ाने वालों को प्रयत्न से सकल विद्याओं को ग्रहण करना वा कराना चाहिये॥६॥

को दे॑व॒यन्त॑मश्नव॒ज्जनं॒ को वृ॒क्तब॑र्हिषम्। प्रप्र॑ दा॒श्वान्प॒स्त्या॑भिरस्थितान्त॒र्वाव॒त्क्षयं॑ दधे॥

सब मनुष्य विद्या प्रचार की कामनावाले उत्तम विद्वान् को नहीं प्राप्त होते और न सब दानशील होकर सब ऋतुओं में सुखरूप घर को धारण कर सकते हैं, किन्तु कोई ही भाग्यशाली विद्वान् मनुष्य इन सबको प्राप्त हो सकता है॥७॥

उप॑ क्ष॒त्रं पृ॑ञ्ची॒त हन्ति॒ राज॑भिर्भ॒ये चि॑त्सुक्षि॒तिं द॑धे। नास्य॑ व॒र्ता न त॑रु॒ता म॑हाध॒ने नार्भे॑ अस्ति व॒ज्रिणः॑॥

जो रजपूत लोग महाधन की प्राप्ति के निमित्त बड़े युद्ध वा थोड़े युद्ध में शत्रुओं को जीत वा बांध के निवारण करने और धर्म से प्रजा का पालन करने को समर्थ होते हैं वे इस संसार में आनन्द को भोग कर परलोक में भी बड़े भारी आनन्द को भोगते हैं॥८॥अब उनतालीसवें सूक्त में कहे हुए विद्वानों के कार्यरूप अर्थ के साथ ब्रह्मणस्पति आदि शब्दों के अर्थों के संबंध से पूर्वसूक्त की संगति जाननी चाहिये॥८॥यह चालीसवां सूक्त और इक्कीसवां वर्ग समाप्त हुआ॥४०। २१॥

यं रक्ष॑न्ति॒ प्रचे॑तसो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा। नू चि॒त्स द॑भ्यते॒ जनः॑॥

मनुष्यों को उचित है कि सबसे उत्कृष्ट सेना सभाध्यक्ष सबका मित्र दूत पढ़ाने वा उपदेश करनेवाले धार्मिक मनुष्य को न्यायाधीश करें; तथा उन विद्वानों के सकाश से रक्षा आदि को प्राप्त हो सब शत्रुओं को शीघ्र मार और चक्रवर्त्तिराज्य का पालन करके सबके हित को संपादन करें किसी को भी मृत्यु से भय करना योग्य नहीं है क्योंकि जिनका जन्म हुआ है उनका मृत्यु अवश्य होता है। इसलिये मृत्यु से डरना मूर्खों का काम है॥१॥

यं बा॒हुते॑व॒ पिप्र॑ति॒ पान्ति॒ मर्त्यं॑ रि॒षः। अरि॑ष्टः॒ सर्व॑ एधते॥

इस मंत्र में उपमालंकार है। जैसे सभा और सेनाध्यक्ष के सहित राजपुरुष बाहुबल वा उपाय के द्वारा शत्रु डांकू चोर आदि और दरिद्रपन को निवारण कर मनुष्यों की अच्छे प्रकार रक्षा पूर्ण सुखों को संपादन सब विघ्नों को दूर पुरुषार्थ में संयुक्त कर ब्रह्मचर्य सेवन वा विषयों की लिप्सा छोड़ने में शरीर की वृद्धि और विद्या वा उत्तम शिक्षा से आत्मा की उन्नति करते हैं; वैसे ही प्रजा जन भी किया करें॥२॥

वि दु॒र्गा वि द्विषः॑ पु॒रो घ्नन्ति॒ राजा॑न एषाम्। नय॑न्ति दुरि॒ता ति॒रः॥

जो अन्याय करनेवाले मनुष्य धार्मिक मनुष्यों को पीड़ा देकर दुर्ग में रहते और फिर आकर दुःखी करते हों उनको नष्ट और श्रेष्ठों के पालन करने के लिये विद्वान् धार्मिक राजा लोगों को चाहिये कि उनके प्रकोट और नगरों का विनाश और शत्रुओं को छिन्न-भिन्न मार और वशीभूत करके धर्म से राज्य का पालन करें॥३॥

सु॒गः पन्था॑ अनृक्ष॒र आदि॑त्यास ऋ॒तं य॒ते। नात्रा॑वखा॒दो अ॑स्ति वः॥

मनुष्यों को भूमि समुद्र अन्तरिक्ष में रथ नौका विमानों के लिये सरल दृढ़ कण्टक चोर डाकू भय आदि दोष रहित मार्गों को संपादन करना चाहिये; जहां किसी को कुछ भी दुःख वा भय न होवे इन सब को सिद्ध करके अखण्ड चक्रवर्ती राज्य को भोग करना वा कराना चाहिये॥४॥

यं य॒ज्ञं नय॑था नर॒ आदि॑त्या ऋ॒जुना॑ प॒था। प्र वः॒ स धी॒तये॑ नशत्॥

इस मन्त्र में पूर्व मंत्र से (न) इस पद की अनुवृत्ति हैं जहां विद्वान् लोग सभा सेनाध्यक्ष सभा में रहनेवाले भृत्य होकर विनयपूर्वक न्याय करते हैं, वहां सुख का नाश कभी नहीं होता॥५॥

स रत्नं॒ मर्त्यो॒ वसु॒ विश्वं॑ तो॒कमु॒त त्मना॑। अच्छा॑ गच्छ॒त्यस्तृ॑तः॥

विद्वान् मनुष्यों से अच्छे प्रकार रक्षा किये हुए मनुष्य आदि प्राणी सब उत्तम से उत्तम पदार्थ और सन्तानों को प्राप्त होते हैं रक्षा के विना किसी पुरुष वा प्राणी की बढ़ती नहीं होती॥६॥

क॒था रा॑धाम सखायः॒ स्तोमं॑ मि॒त्रस्या॑र्य॒म्णः। महि॒ प्सरो॒ वरु॑णस्य॥

जब कोई मनुष्य किसी को पूछे कि हम लोग किस प्रकार से मित्रपन न्याय और उत्तम विद्याओं को प्राप्त होवें वह उनको ऐसा कहे कि परस्पर मित्रता विद्यादान और परोपकार ही से यह सब प्राप्त हो सकता है इसके विना कोई भी मनुष्य किसी सुख को सिद्ध करने को समर्थ नहीं हो सकता॥७॥

मा वो॒ घ्नन्तं॒ मा शप॑न्तं॒ प्रति॑ वोचे देव॒यन्त॑म्। सु॒म्नैरिद्व॒ आ वि॑वासे॥

मनुष्य को योग्य है कि न अपने शत्रु और न मित्र के शत्रु में प्रीति करे मित्र की रक्षा और विद्वानों की प्रियवाक्य, भोजन वस्त्र पान आदि से सेवा सदा करनी चाहिये क्योंकि मित्र रहित पुरुष सुख की वृद्धि नहीं कर सकता; इससे विद्वान् लोग बहुत से धर्मात्माओं को मित्र करें॥८॥

च॒तुर॑श्चि॒द्दद॑मानाद्बिभी॒यादा निधा॑तोः। न दु॑रु॒क्ताय॑ स्पृहयेत्॥

जैसे# मनुष्य को दुष्ट कर्म्म करने वा दुष्ट वचन बोलने वाले मनुष्यों का संग विश्वास और मित्र से द्रोह, दूसरे का अपमान और विश्वासघात आदि कर्म्म कभी न करें॥९॥#[सं० भा० के अनुसार ‘जैसे’ पद नहीं चाहिये। सं०] इस सूक्त में प्रजा की रक्षा शत्रुओं को जीतना, मार्ग का शोधना यान की रचना और उनका चलाना, द्रव्यों की उन्नति करना श्रेष्ठों के साथ मित्रता दुष्टों में विश्वास न करना और अधर्माचरण से नित्य डरना; इस प्रकार कथन से पूर्व सूक्तार्थ के साथ इस सूक्त के अर्थ की सङ्गति जाननी चाहिये। यह पहिले अष्टक के तीसरे अध्याय में तेईसवां वर्ग। २३। और पहिले मण्डल में इकतालीसवां सूक्त समाप्त हुआ॥४१॥

सं पू॑ष॒न्नध्व॑नस्तिर॒ व्यंहो॑ विमुचो नपात्। सक्ष्वा॑ देव॒ प्र ण॑स्पु॒रः॥

मनुष्य, जैसे परमेश्वर की उपासना वा उसकी आज्ञा के पालन से सब दुःखों के पार प्राप्त होकर सब सुखों को प्राप्त करें; इसी प्रकार धर्म्मात्मा सबके मित्र परोपकार करनेवाले विद्वानों के समीप वा उनके उपदेश से अविद्या जालरूपी मार्ग से पार होकर विद्यारूपी सूर्य्य को प्राप्त करें॥१॥

यो नः॑ पूषन्न॒घो वृको॑ दुः॒शेव॑ आ॒दिदे॑शति। अप॑ स्म॒ तं प॒थो ज॑हि॥

मनुष्यों को उचित है कि शिक्षा विद्या तथा सेना के बल से दूसरे के धन को लेने वाले शठ और चोरों को मारना सर्वथा दूर करना निरन्तर बाँध के राजनीति के मार्गों को भय से रहित संपादन करें जैसे जगदीश्वर दुष्टों को उनके कर्मों के अनुसार दण्ड के द्वारा शिक्षा करता है वैसे हम लोग भी दुष्टों को दण्ड द्वारा शिक्षा देकर श्रेष्ठ स्वभावयुक्त करें॥२॥

अप॒ त्यं प॑रिप॒न्थिनं॑ मुषी॒वाणं॑ हुर॒श्चित॑म्। दू॒रमधि॑ स्रु॒तेर॑ज॥

चोर अनेक प्रकार के होते हैं, कोई डांकू कोई कपट से हरने, कोई मोहित करके दूसरे के पदार्थों को ग्रहण करने, कोई रात में सुरंग लगाकर ग्रहण, करने कोई उत्कोचक अर्थात् हाथ से छीन लेने, कोई नाना प्रकार के व्यवहारी दुकानों में बैठ छल से पदार्थों को हरने, कोई शुल्क अर्थात् रिशवत लेने, कोई भृत्य होकर स्वामी के पदार्थों को हरने, कोई छल कपट से ओरों के राज्य को स्वीकार करने, कोई धर्मोपदेश से मनुष्यों को भ्रमाकर गुरु बन शिष्यों के पदार्थों को हरने, कोई प्राड्विवाक अर्थात् वकील होकर मनुष्यों को विवाद में फंसाकर पदार्थों को हरलेने और कोई न्यायासन पर बैठ प्रजा से धन लेके अन्याय करनेवाले इत्यादि हैं, इन सबको चोर जानो, इनको सब उपायों से निकाल कर मनुष्यों को धर्म से राज्य का पालन करना चाहिये॥३॥

त्वं तस्य॑ द्वया॒विनो॒ऽघशं॑सस्य॒ कस्य॑ चित्। प॒दाभि ति॑ष्ठ॒ तपु॑षिम्॥

न्याय करनेवाले मनुष्यों को उचित है कि किसी अपराधी चोर को दण्ड देने विना छोड़ना कभी न चाहिये, नहीं तो, प्रजा पीड़ायुक्त होकर नष्ट भ्रष्ट होने से राज्य का नाश होजाय; इस कारण प्रजा की रक्षा के लिये दुष्ट कर्म करनेवाले अपराध किये हुए माता-पिता, आचार्य्य और मित्र आदि को भी अपराध के योग्य ताड़ना अवश्य देनी चाहिये॥४॥

आ तत्ते॑ दस्र मन्तुमः॒ पूष॒न्नवो॑ वृणीमहे। येन॑ पि॒तॄनचो॑दयः॥

जैसे प्रेम प्रीति के साथ सेचन करने से उत्पन्न करने वा पढ़ानेवाले ज्ञान वा अवस्था से वृद्धों को तृप्त करें वैसे ही सब प्रजाओं के सुख के लिये दुष्ट मनुष्यों को दण्ड दे के धार्मिकों को सदा सुखी रक्खें॥५॥

अधा॑ नो विश्वसौभग॒ हिर॑ण्यवाशीमत्तम। धना॑नि सु॒षणा॑ कृधि॥

ईश्वरे के अनन्त सौभाग्य वा सभासेना न्यायाधीश धार्मिक मनुष्य के चक्रवर्त्ति राज्य आदि सौभाग्य होने से इन दोनों के आश्रय से मनुष्यों को असंख्यात विद्या सुवर्णा आदि धनों की प्राप्ति से अत्यन्त सुखों के भोग को प्राप्त होना वा कराना चाहिये॥६॥

अति॑ नः स॒श्चतो॑ नय सु॒गा नः॑ सु॒पथा॑ कृणु। पूष॑न्नि॒ह क्रतुं॑ विदः॥

इस मंत्र में श्लेषालंकार है। सब मनुष्यों को ईश्वर की प्रार्थना इस प्रकार करनी चाहिये कि हे जगदीश्वर! आप कृपा करके अधर्म मार्ग से हम लोगों को अलग कर धर्म मार्ग में नित्य चलाइये तथा विद्वान् से पूछना वा उसका सेवन करना चाहिये कि हे विद्वान्! आप हम लोगों को शुद्ध सरल वेद विद्या से सिद्ध किये हुए मार्ग में सदा चलाया कीजिये॥७॥

अ॒भि सू॒यव॑सं नय॒ न न॑वज्वा॒रो अध्व॑ने। पूष॑न्नि॒ह क्रतुं॑ विदः॥

हे सभाध्यक्ष! आप अपनी कृपा से श्रेष्ठ देश वा उत्तम गुण हम लोगों को दीजिये और सब दुःखों को निवारण कर सुखों को प्राप्त कीजिये, हे सभासेनाध्यक्ष! विद्वान् लोगों को विनयपूर्वक पालन से विद्या पढ़ाकर इस राज्य में सुख युक्त कीजिये॥८॥

श॒ग्धि पू॒र्धि प्र यं॑सि च शिशी॒हि प्रास्यु॒दर॑म्। पूष॑न्नि॒ह क्रतुं॑ विदः॥

इस मंत्र में श्लेषाऽलंकार है। सभा सेनाध्यक्ष के विना इस संसार में कोई सामर्थ्य को देने वा सुखों से अलंकृत करने पुरुषार्थ को देने चोर डाकुओं से भय निवारण करने सबको उत्तम भोग देने और न्यायविद्या का प्रकाश करनेवाला अन्य नहीं हो सकता; इससे दोनों का आश्रय सब मनुष्य करें॥९॥

न पू॒षणं॑ मेथामसि सू॒क्तैर॒भि गृ॑णीमसि। वसू॑नि द॒स्ममी॑महे॥

इस मंत्र में श्लेषालंकार है। किसी मनुष्य को नास्तिक वा मूर्खपन से सभाध्यक्ष की आज्ञा को छोड़ शत्रु की याचना न करनी चाहिये किन्तु वेदों से राजनीति को जानके इन दोनों के सहाय से शत्रुओं को मार विज्ञान वा सुवर्ण आदि धनों को प्राप्त होकर उत्तम मार्ग में सुपात्रों के लिये दान देकर विद्या का विस्तार करना चाहिये॥१०॥इस सूक्त में पूषन् शब्द का वर्णन शक्ति का बढ़ाना, दुष्ट शत्रुओं का निवारण संपूर्ण ऐश्वर्य्य की प्राप्ति सुमार्ग में चलना, बुद्धि वा कर्म का बढ़ाना कहा है। इससे इस सूक्त के अर्थ के संगति पूर्व सूक्तार्थ के साथ जाननी चाहिये। यह पच्चीसवां वर्ग २५ और बयालीसवां सूक्त समाप्त हुआ॥४२॥

कद्रु॒द्राय॒ प्रचे॑तसे मी॒ळ्हुष्ट॑माय॒ तव्य॑से। वो॒चेम॒ शंत॑मं हृ॒दे॥

रुद्र शब्द से तीन अर्थों का ग्रहण है, परमेश्वर, जीव और वायु उनमें से परमेश्वर अपने सर्वज्ञपन से जिसने जैसा पाप कर्म किया उस कर्म के अनुसार फल देने में उसको रोदन करनेवाले है। जीव निश्चय करके मरने समय अन्य से सम्बन्धियों को इच्छा कराता हुआ शरीर को छोड़ता है, तब अपने आप रोता है और वायु शूल आदि पीड़ा कर्म से रोदन कर्म का निमित्त है; इन तीनों के योग से मनुष्यों को अत्यन्त सुखों को प्राप्त होना चाहिये॥१॥

यथा॑ नो॒ अदि॑तिः॒ कर॒त्पश्वे॒ नृभ्यो॒ यथा॒ गवे॑। यथा॑ तो॒काय॑ रु॒द्रिय॑म्॥

इस मंत्र में उपमाऽलंकार है। जैसे माता-पिता पुत्र के लिये, गोपाल पशुओं के लिये और राजसभा प्रजा के लिये सुखकारी होते हैं वैसे ही सुखों के करने और कराने वाले परमेश्वर और पवन भी हैं॥२॥

यथा॑ नो मि॒त्रो वरु॑णो॒ यथा॑ रु॒द्रश्चिके॑तति। यथा॒ विश्वे॑ स॒जोष॑सः॥

इस मंत्र में उपमालंकार है। जैसे विद्वान् लोग सब मनुष्यों को मित्रपन और उत्तम शील धारण कराकर उनके लिये यथार्थ विद्याओं की प्राप्ति और जैसे परमेश्वर ने वेदद्वारा सब विद्याओं का प्रकाश किया है, वैसे विद्वान् अध्यापकों को भी सब मनुष्यों को विद्यायुक्त करना चाहिये॥३॥

गा॒थप॑तिं मे॒धप॑तिं रु॒द्रं जला॑षभेषजम्। तच्छं॒योः सु॒म्नमी॑महे॥

कोई भी मनुष्य स्तुति यज्ञ वा दुःखों के नाश करनेवाली ओषधियों की प्राप्ति करानेवाले परमेश्वर विद्वान् और प्राणायाम के विना विज्ञान और लौकिक सुख वा मोक्ष सुख प्राप्त होने के योग्य नहीं हो सकता॥४॥

यः शु॒क्रइ॑व॒ सूर्यो॒ हिर॑ण्यमिव॒ रोच॑ते। श्रेष्ठो॑ दे॒वानां॒ वसुः॑॥

इस मंत्र में उपमालंकार है। मनुष्यों को उचित है कि जैसा परमेश्वर सब ज्योतियों का ज्योति आनन्दकारियों का आनन्दकारी श्रेष्ठों का श्रेष्ठ विद्वानों का विद्वान् आधारों का आधार है, वैसे ही जो न्यायकारियों में न्यायकारी आनन्द देने वालों में आनन्द देने वाला श्रेष्ठ स्वभाव वालों में श्रेष्ठ स्वभाववाला विद्वानों में विद्वान् और वास हेतुओं का वासहेतु वीर पुरुष हो उसको सभाध्यक्ष मानना चाहिये॥५॥

शं नः॑ कर॒त्यर्व॑ते सु॒गं मे॒षाय॑ मे॒ष्ये॑। नृभ्यो॒ नारि॑भ्यो॒ गवे॑॥

मनुष्यों को अपने वा पराए पशु, मनुष्यों के लिये परमेश्वर की प्रार्थना, विद्वानों की सहायता, प्राणवायुओं से यथावत् उपयोग और अपना पुरुषार्थ करना चाहिये॥६॥

अ॒स्मे सो॑म॒ श्रिय॒मधि॒ नि धे॑हि श॒तस्य॑ नृ॒णाम्। महि॒ श्रव॑स्तुविनृ॒म्णम्॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। कोई प्राणी परमेश्वर की कृपा सभाध्यक्ष की सहायता वा अपने पुरुषार्थ के विना पूर्ण विद्या पशु चक्रवर्त्ती, राज्य और लक्ष्मी को प्राप्त नहीं हो सकता॥७॥

मा नः॑ सोमपरि॒बाधो॒ मारा॑तयो जुहुरन्त। आ न॑ इन्दो॒ वाजे॑ भज॥

इस मन्त्र में श्लेषालंकार है। मनुष्यों को अत्यन्त उत्तम बल के साहित्य से परमेश्वर वा सभासेनाध्यक्ष के आश्रय वा अपने पुरुषार्थ युक्त युद्ध में सब शत्रुओं को जीतकर न्याययुक्त होके राज्य का पालन करना चाहिये॥८॥

यास्ते॑ प्र॒जा अ॒मृत॑स्य॒ पर॑स्मि॒न्धाम॑न्नृ॒तस्य॑। मू॒र्धा नाभा॑ सोम वेन आ॒भूष॑न्तीः सोम वेदः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जहां मनुष्य ईश्वर ही की उपासना करनेहारे अत्युत्तम सभाध्यक्ष का आश्रय करते हैं वहां वे दुःख के लेश को भी नहीं प्राप्त होते जैसे परमेश्वर और सभाध्यक्ष श्रेष्ठ आचरण करनेवाले मनुष्यों की इच्छा करते हैं वैसे ही प्रजा में रहनेवाले मनुष्य परमेश्वर वा सभाध्यक्ष की नित्य इच्छा करें क्योंकि इसके विना बहुत सुख कभी प्राप्त नहीं हो सकते॥९॥इस सूक्त में रुद्र शब्द के अर्थ का वर्णन सब सुखों का प्रतिपादन मित्रपन का आचरण परमेश्वर वा सभाध्यक्ष के आश्रय से सुखों की प्राप्ति एक ईश्वर ही की उपासना परमसुख की प्राप्ति और सभाध्यक्ष का आश्रय करना कहा है इससे इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह तैंतालीसवां सूक्त और सत्ताईसवां वर्ग समाप्त हुआ॥४३। २७॥

सूक्तम्

अग्ने॒ विव॑स्वदु॒षस॑श्चि॒त्रं राधो॑ अमर्त्य। आ दा॒शुषे॑ जातवेदो वहा॒ त्वम॒द्या दे॒वाँ उ॑ष॒र्बुधः॑॥

मनुष्यों को परमेश्वर की आज्ञा पालन के लिये अपने पुरुषार्थ से परमेश्वर वा आलस्य रहित उत्तम विद्वानों का आश्रय लेकर चक्रवर्त्ति राज्य, विद्या और राजलक्ष्मी का स्वीकार करना चाहिये सब विद्याओं के जाननेवाले विद्वान् लोग जो उत्तम गुण और श्रेष्ठ अपने करने योग्य कर्म हैं उसीको नित्य करें और जो दुष्ट कर्म हैं उसको कभी न करें॥१॥

जुष्टो॒ हि दू॒तो असि॑ हव्य॒वाह॒नोऽग्ने॑ र॒थीर॑ध्व॒राणा॑म्। स॒जूर॒श्विभ्या॑मु॒षसा॑ सु॒वीर्य॑म॒स्मे धे॑हि॒ श्रवो॑ बृ॒हत्॥

कोई मनुष्य विद्वानों के सङ्ग के विना विद्या को प्राप्त, शत्रु को जीतके उत्तम पराक्रम चक्रवर्त्ति राज्य लक्ष्मी के प्राप्त होने को समर्थ नहीं हो सकता और अग्नि जल आदि के योग के विना उत्तम व्यवहार की सिद्धि भी नहीं कर सकता॥२॥

अ॒द्या दू॒तं वृ॑णीमहे॒ वसु॑म॒ग्निं पु॑रुप्रि॒यम्। धू॒मके॑तुं॒ भाऋ॑जीकं॒ व्यु॑ष्टिषु य॒ज्ञाना॑मध्वर॒श्रिय॑म्॥

मनुष्यों को उचित है कि विद्या वा राज्य की प्राप्ति के लिये सब विद्याओं के कथन करने वा सब बातों का उत्तर देनेवाले विद्वान् को दूत करें और बहुत गुणों के योग से बहुत कार्य्यों को प्राप्त करानेवाली बिजुली को स्वीकार करके सब कार्य्यों को सिद्ध करें॥३॥

श्रेष्ठं॒ यवि॑ष्ठ॒मति॑थिं॒ स्वा॑हुतं॒ जुष्टं॒ जना॑य दा॒शुषे॑। दे॒वाँ अच्छा॒ यात॑वे जा॒तवे॑दसम॒ग्निमी॑ळे॒ व्यु॑ष्टिषु॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। मनुष्यों को अति योग्य है कि उत्तम धर्म बल वाले प्रसन्न स्वभाव सहित सब के उपकारक विद्वान् और अतिथियों का सत्कार करें जिससे सब जनों का हित हो॥४॥

स्त॒वि॒ष्यामि॒ त्वाम॒हं विश्व॑स्यामृत भोजन। अग्ने॑ त्रा॒तार॑म॒मृतं॑ मियेध्य॒ यजि॑ष्ठं हव्यवाहन॥

विद्वानों को योग्य है कि इस सब जगत् के रक्षक मोक्ष देने, विद्या काम आनन्द के देने वा वा उपासना करने योग्य परमेश्वर को छोड़ अन्य किसी का भी ईश्वरभाव से आश्रय न करें॥५॥

सु॒शंसो॑ बोधि गृण॒ते य॑विष्ठ्य॒ मधु॑जिह्वः॒ स्वा॑हुतः। प्रस्क॑ण्वस्य प्रति॒रन्नायु॑र्जी॒वसे॑ नम॒स्या दैव्यं॒ जन॑म्॥

सब मनुष्यों को उचित है कि जो सबसे उत्कृष्ट विद्वान् है उसीका सत्कार करें ऐसे ही इसका अच्छे प्रकार आश्रय लेकर सब उमर और विद्या को प्राप्त करें॥६॥

होता॑रं वि॒श्ववे॑दसं॒ सं हि त्वा॒ विश॑ इ॒न्धते॑। स आ व॑ह पुरुहूत॒ प्रचे॑त॒सोऽग्ने॑ दे॒वाँ इ॒ह द्र॒वत्॥

विद्वानों के सहाय के विना प्रजा के सुख को वा दिव्य गुणों की प्राप्ति और शत्रुओं से विजय नहीं हो सकता इससे यह सब मनुष्यों को प्रयत्न के साथ सिद्ध करना चाहिये॥७॥

स॒वि॒तार॑मु॒षस॑म॒श्विना॒ भग॑म॒ग्निं व्यु॑ष्टिषु॒ क्षपः॑। कण्वा॑सस्त्वा सु॒तसो॑मास इन्धते हव्य॒वाहं॑ स्वध्वर॥

मनुष्यों को उचित है कि सब क्रियाओं में दिन-रात प्रयत्न से सूर्य्य आदि पदार्थों को संयुक्त कर वायु वृष्टि की शुद्धि करनेवाले शिल्परूप यज्ञ को प्रकाश करके कार्य्यों को सिद्ध और विद्वानों के संग से इनके गुण जानें॥८॥

पति॒र्ह्य॑ध्व॒राणा॒मग्ने॑ दू॒तो वि॒शामसि॑। उ॒ष॒र्बुध॒ आ व॑ह॒ सोम॑पीतये दे॒वाँ अ॒द्य स्व॒र्दृशः॑॥

सभासेनाध्यक्षादि विद्वान् लोग विद्या पढ़के प्रजा पालनादि यज्ञों की रक्षा के लिये प्रजा में दिव्य गुणों का प्रकाश नित्य किया करें॥९॥

अग्ने॒ पूर्वा॒ अनू॒षसो॑ विभावसो दी॒देथ॑ वि॒श्वद॑र्शतः। असि॒ ग्रामे॑ष्ववि॒ता पु॒रोहि॒तोऽसि॑ य॒ज्ञेषु॒ मानु॑षः॥

विद्वान् सब दिन एक क्षण भी व्यर्थ न खोवे सर्वथा बहुत उत्तम-२ कार्य्यों के अनुष्ठान ही के लिये सब दिनों को जानकर प्रजा की रक्षा वा यज्ञ का अनुष्ठान करनेवाला निरन्तर हो॥१०॥

नि त्वा॑ य॒ज्ञस्य॒ साध॑न॒मग्ने॒ होता॑रमृ॒त्विज॑म्। म॒नु॒ष्वद्दे॑व धीमहि॒ प्रचे॑तसं जी॒रं दू॒तमम॑र्त्यम्॥

इस मंत्र में उपमालंकार है। और आठवें मंत्र से (सुतसोमाः) (कण्वासः) इन दो पदों की अनुवृत्ति है। विद्वान् अग्नि आदि साधन और द्रव्य आदि सामग्री के विना यज्ञ की सिद्धि नहीं कर सकता॥११॥

यद्दे॒वानां॑ मित्रमहः पु॒रोहि॒तोऽन्त॑रो॒ यासि॑ दू॒त्य॑म्। सिन्धो॑रिव॒ प्रस्व॑नितास ऊ॒र्मयो॒ऽग्नेर्भ्रा॑जन्ते अ॒र्चयः॑॥

इस मंत्र में उपमालंकार है। हे मनुष्यो! तुम जैसे परमेश्वर सबका मित्र पूजनीय पुरोहित अन्तर्यामी होकर दूत के समान सत्य असत्य कर्मों का प्रकाश करता है; जैसे ईश्वर की अनन्त दीप्ति विचरती हैं जो ईश्वर सबका धाता, रचने वा पालन करने वा न्यायकारी महाराज सबको उपासने योग्य है, वैसे उत्तम दूत भी राजपुरुषों को माननीय होता है॥१२॥

श्रु॒धि श्रु॑त्कर्ण॒ वह्नि॑भिर्दे॒वैर॑ग्ने स॒याव॑भिः। आ सी॑दन्तु ब॒र्हिषि॑ मि॒त्रो अ॑र्य॒मा प्रा॑त॒र्यावा॑णो अध्व॒रम्॥

मनुष्यों को उचित है कि सब विद्याओं को श्रवण किये हुए धार्मिक मनुष्यों को राज्यव्यवहार में विशेष करके युक्त# विद्वान् लोग शिक्षा से युक्त भृत्यों से सब कार्य्यों को सिद्ध और सर्वदा आलस्य को छोड़ निरन्तर पुरुषार्थ में यत्न करें। निदान इसके विना निश्चय है कि, व्यवहार वा परमार्थ कभी सिद्ध नहीं होते॥१३॥#[ सं० भा० के अनुसार ‘करें, और’। सं०]

शृ॒ण्वन्तु॒ स्तोमं॑ म॒रुतः॑ सु॒दान॑वोऽग्निजि॒ह्वा ऋ॑ता॒वृधः॑। पिब॑तु॒ सोमं॒ वरु॑णो धृ॒तव्र॑तो॒ऽश्विभ्या॑मु॒षसा॑ स॒जूः॥

जो विद्या धर्म वा राजसभाओं से आज्ञा प्रकाशित हो सब मनुष्य उनका श्रवण तथा अनुष्ठान करें, जो सभासद् हों वे भी पक्षपात को छोड़कर प्रतिदिन सबके हित के लिये सब मिलकर जैसे अविद्या, अधर्म, अन्याय को नाश होवे वैसा यत्न करें॥१४॥इस सूक्त में धर्म की प्राप्ति दूत का करना सब विद्याओं का श्रवण उत्तम श्री की प्राप्ति श्रेष्ठ सङ्ग स्तुति और सत्कार पदार्थ विद्याओं सभाध्यक्ष दूत और यज्ञ का अनुष्ठान मित्रादिकों का ग्रहण परस्पर मिलकर सब कार्य्यों की सिद्धि उत्तम व्यवहारों में स्थिति परस्पर विद्या धर्म राजसभाओं को सुनकर अनुष्ठान करना कहा है इससे इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये। यह तीसवां वर्ग और चवालीसवां सूक्त समाप्त हुआ॥३०॥४४॥

त्वम॑ग्ने॒ वसूँ॑रि॒ह रु॒द्राँ आ॑दि॒त्याँ उ॒त। यजा॑ स्वध्व॒रं जनं॒ मनु॑जातं घृत॒प्रुष॑म्॥

मनुष्यों को चाहिये कि अपने पुत्रों को कम से कम चौबीस और अधिक से अधिक अड़तालीस वर्ष तक और कन्याओं को कम से कम सोलह और अधिक से अधिक चौबीस वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य करावें। जिससे संपूर्ण विद्या और सुशिक्षा को पाकर वे परस्पर परीक्षा और अतिप्रीति से विवाह करें जिससे सब सुखी रहें॥१॥

श्रु॒ष्टी॒वानो॒ हि दा॒शुषे॑ दे॒वा अ॑ग्ने॒ विचे॑तसः। तान्रो॑हिदश्व गिर्वण॒स्त्रय॑स्त्रिंशत॒मा व॑ह॥

जब विद्वान् लोग विद्यार्थियों को तैंतीस देव अर्थात् पृथिवी आदि तैंतीस पदार्थों की विद्या को अच्छे प्रकार साक्षात्कार कराते हैं तब वे बिजुली आदि अनेक पदार्थों से उत्तम-२ व्यवहारों की सिद्धि कर सकते हैं॥२॥

प्रि॒य॒मे॒ध॒वद॑त्रि॒वज्जात॑वेदो विरूप॒वत्। अ॒ङ्गि॒र॒स्वन्म॑हिव्रत॒ प्रस्क॑ण्वस्य श्रुधी॒ हव॑म्॥

इस मंत्र में उपमालंकार है। हे मनुष्यो! जैसे सबके प्रिय करनेवाले विद्वान् लोग शरीर, वाणी और मन के दोषों से रहित नानाविद्याओं को प्रत्यक्ष करने और अपने प्राण के समान सबको जानते हुए विद्वान् लोग मनुष्यों के प्रिय कार्य्यों को सिद्ध करते हैं और जैसे पढ़ाये हुए बुद्धिमान् विद्यार्थी भी बहुत उत्तम-२ कार्य्यों को सिद्ध कर सकें वैसे तुम भी किया करो॥३॥

महि॑केरव ऊ॒तये॑ प्रि॒यमे॑धा अहूषत। राज॑न्तमध्व॒राणा॑म॒ग्निं शु॒क्रेण॑ शो॒चिषा॑॥

कोई मनुष्य धार्मिक बुद्धिमानों के सङ्ग के विना उत्तम-२ व्यवहारों की सिद्धि करने को समर्थ नहीं हो सकता इससे सब मनुष्यों को योग्य है कि इनके सङ्ग से इन विद्याओं को साक्षात्कार अवश्य करें॥४॥

घृता॑हवन सन्त्ये॒मा उ॒ षु श्रु॑धी॒ गिरः॑। याभिः॒ कण्व॑स्य सू॒नवो॒ हव॒न्तेऽव॑से त्वा॥

जो मनुष्य इस संसार में विद्वान् माता विद्वान् पिता और सब उत्तर देनेवाले आचार्य्य आदि से शिक्षा वा विद्या को ग्रहण कर परमार्थ और व्यवहार को सिद्ध कर विज्ञान और शिल्प को करने में प्रवृत्त होते हैं वे सब सुखों को प्राप्त होते हैं, आलसी कभी नहीं होते॥५॥

त्वां चि॑त्रश्रवस्तम॒ हव॑न्ते वि॒क्षु ज॒न्तवः॑। शो॒चिष्के॑शं पुरुप्रि॒याग्ने॑ ह॒व्याय॒ वोळ्ह॑वे॥

मनुष्यों को उचित हैं कि अनेक गुणयुक्त अग्नि के समान विद्वान् को प्राप्त होके विद्याओं का ग्रहण करें॥६॥

नि त्वा॒ होता॑रमृ॒त्विजं॑ दधि॒रे व॑सु॒वित्त॑मम्। श्रुत्क॑र्णं स॒प्रथ॑स्तमं॒ विप्रा॑ अग्ने॒ दिवि॑ष्टिषु॥

जो मनुष्य उत्तम कार्य सिद्धि के लिये प्रयत्न करते और चक्रवर्त्ती राज्य श्री और विद्याधन की सिद्धि करने को समर्थ हो सकते हैं वे शोक को प्राप्त नहीं होते॥७॥

आ त्वा॒ विप्रा॑ अचुच्यवुः सु॒तसो॑मा अ॒भि प्रयः॑। बृ॒हद्भा बिभ्र॑तो ह॒विरग्ने॒ मर्ता॑य दा॒शुषे॑॥

विद्वान् मनुष्यों को चाहिये जिस प्रकार उत्तम सुख हों उसको विद्याविशेष परीक्षा से प्रत्यक्ष कर अनुक्रम से सबको ग्रहण करावें जिससे इन लोगों के भी सब काम निश्चय करके सिद्ध होवें॥८॥

प्रा॒त॒र्याव्णः॑ सहस्कृत सोम॒पेया॑य सन्त्य। इ॒हाद्य दैव्यं॒ जनं॑ ब॒र्हिरा सा॑दया वसो॥

जो मनुष्य उत्तम गुण युक्त मनुष्यों ही को उत्तम वस्तु देते हैं ऐसे मनुष्यों ही का संग सब लोग करें कोई भी मनुष्य विद्या वा पुरुषार्थ युक्त मनुष्यों के संग वा उपदेश के विना पवित्र गुण वस्तुओं और सुखों को प्राप्त नहीं हो सकता॥९॥

अ॒र्वाञ्चं॒ दैव्यं॒ जन॒मग्ने॒ यक्ष्व॒ सहू॑तिभिः। अ॒यं सोमः॑ सुदानव॒स्तं पा॑त ति॒रोअ॑ह्न्यम्॥

मनुष्यों को उचित है कि सर्वदा सज्जनों को बुला सत्कार कर सब पदार्थों को विज्ञान शोधन और उनसे उपकार ले और उत्तरोत्तर इसको जानकर इस विद्या का प्रचार किया करें॥१०॥इस सूक्त में वसु, रुद्र और आदित्यों की गति तथा प्रमाण आदि कहा है इससे इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥४५॥यह ४५ सूक्त और ३२ का वर्ग समाप्त हुआ॥

ए॒षो उ॒षा अपू॑र्व्या॒ व्यु॑च्छति प्रि॒या दि॒वः। स्तु॒षे वा॑मश्विना बृ॒हत्॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जो स्त्री लोग सूर्य चन्द्र और उषा के सदृश सब प्राणियों को सुख देती हैं वे आनन्द को प्राप्त होती हैं इनसे विपरीत कभी नहीं हो सकतीं॥१॥

या द॒स्रा सिन्धु॑मातरा मनो॒तरा॑ रयी॒णाम्। धि॒या दे॒वा व॑सु॒विदा॑॥

जैसे कारीगर लोगों ने ठीक-२ युक्त किये हुए अग्नि और जल के यानों को मन के वेग के समान तुरन्त पहुँचाने वा बहुत धन को प्राप्त कराने वाले हैं उसी प्रकार अध्यापक और उपदेशकों को होना चाहिये॥२॥

व॒च्यन्ते॑ वां ककु॒हासो॑ जू॒र्णाया॒मधि॑ वि॒ष्टपि॑। यद्वां॒ रथो॒ विभि॒ष्पता॑त्॥

जो मनुष्य लोग बड़े ज्ञानी के समीप से कारीगरी और शिक्षा को ग्रहण करें तो विमानादि सवारियों को रच के पक्षी के तुल्य आकाश में जाने आने को समर्थ होवें॥३॥

ह॒विषा॑ जा॒रो अ॒पां पिप॑र्ति॒ पपु॑रिर्नरा। पि॒ता कुट॑स्य चर्ष॒णिः॥

मनुष्यों को योग्य है कि जैसे सविता वर्षा के द्वारा जिलाने के योग्य प्राणी और अप्राणियों को पुष्ट करता है वैसे ही सबको पुष्ट करें॥४॥

आ॒दा॒रो वां॑ मती॒नां नास॑त्या मतवचसा। पा॒तं सोम॑स्य धृष्णु॒या॥

राजपुरुषों को चाहिये कि दृढ़ बल युक्त सेना से शत्रुओं को जीत अपनी प्रजा के ऐश्वर्य्य की निरन्तर वृद्धि किया करें॥५॥

या नः॒ पीप॑रदश्विना॒ ज्योति॑ष्मती॒ तम॑स्ति॒रः। ताम॒स्मे रा॑साथा॒मिष॑म्॥

यहां वाचकलुप्तोपमालंकार है। जिस प्रकार सूर्य्य और चन्द्रमा अन्धकार को दूर कर प्राणियों को सुखी करते हैं वैसे ही सभा और सेना के अध्यक्षों को चाहिये कि अन्याय दूर कर प्रजा को सुखी करें॥६॥

आ नो॑ ना॒वा म॑ती॒नां या॒तं पा॒राय॒ गन्त॑वे। यु॒ञ्जाथा॑मश्विना॒ रथ॑म्॥

मनुष्यों को चाहिये कि रथ से स्थल अर्थात् सूखे में नाव से जल में विमान से आकाश में जाया आया करें॥७॥

अ॒रित्रं॑ वां दि॒वस्पृ॒थु ती॒र्थे सिन्धू॑नां॒ रथः॑। धि॒या यु॑युज्र॒ इन्द॑वः॥

कोई भी मनुष्य अग्नि आदि से जलनेवाले यान अर्थात् सवारी के विना पृथिवी समुद्र और अन्तरिक्ष में सुख से आने जाने को समर्थ नहीं हो सकता॥८॥

दि॒वस्क॑ण्वास॒ इन्द॑वो॒ वसु॒ सिन्धू॑नां प॒दे। स्वं व॒व्रिं कुह॑ धित्सथः॥

जो मनुष्य लोग विद्वानों की शिक्षा के अनुकूल अग्नि जल के प्रयोग से युक्त यानों पर स्थित होके राजा प्रजा के व्यवहार की सिद्धि के लिये समुद्रों के अन्त में जावें आवें तो बहुत उत्तमोत्तम धन को प्राप्त होवें॥९॥

अभू॑दु॒ भा उ॑ अं॒शवे॒ हिर॑ण्यं॒ प्रति॒ सूर्यः॑। व्य॑ख्यज्जि॒ह्वयासि॑तः॥

हे सवारी पर चलने वाले मनुष्यो! तुम दिशाओं के जाननेवाले चुम्बक ध्रुव यंत्र और सूर्यादि कारण से दिशाओं को जान; यानों को चलाओ और ठहराया भी करो जिससे भ्रान्ति में पड़कर अन्यत्र गमन न हो, अर्थात् जहां जाना चाहते हो ठीक वहीं पहुँचो भटकना न हो॥१०॥

अभू॑दु पा॒रमेत॑वे॒ पन्था॑ ऋ॒तस्य॑ साधु॒या। अद॑र्शि॒ वि स्रु॒तिर्दि॒वः॥

मनुष्यों को उचित हैं कि सर्वत्र आने जाने के लिये सीधे और शुद्ध मार्गों को रच और विमानादि यानों से इच्छापूर्वक गमन करके नाना प्रकार के सुखों को प्राप्त करें॥११॥

तत्त॒दिद॒श्विनो॒रवो॑ जरि॒ता प्रति॑ भूषति। मदे॒ सोम॑स्य॒ पिप्र॑तोः॥

कोई भी विद्वानों से शिक्षा वा क्रिया को ग्रहण किये विना सब सुखों को प्राप्त नहीं हो सकता इससे उसका खोज नित्य करना चाहिये॥१२॥

वा॒व॒सा॒ना वि॒वस्व॑ति॒ सोम॑स्य पी॒त्या गि॒रा। म॒नु॒ष्वच्छं॑भू॒ आ ग॑तम्॥

हे मनुष्यो! तुम जिस प्रकार परोपकारी मनुष्य प्राणियों के निवास और विद्याप्रकाश के दान से सुखों को प्राप्त कराते हैं वैसे तुम भी उन को प्राप्त कराओ॥१३॥

यु॒वोरु॒षा अनु॒ श्रियं॒ परि॑ज्मनोरु॒पाच॑रत्। ऋ॒ता व॑नथो अ॒क्तुभिः॑॥

राजा और प्रजाजनों को चाहिये कि परस्पर प्रीति से बड़े ऐश्वर्य्य को प्राप्त होकर सदा सबके उपकार में यत्न किया करें॥१४॥

उ॒भा पि॑बतमश्विनो॒भा नः॒ शर्म॑ यच्छतम्। अ॒वि॒द्रि॒याभि॑रू॒तिभिः॑॥

जो सभा और सेनापति आदि राजपुरुष प्रीति और विनय से प्रजा की पालना करें तो प्रजा भी उन की रक्षा अच्छे प्रकार करें॥१५॥इस सूक्त में उषा और अश्वियों का प्रत्यक्षार्थ वर्णन किया है इससे इस सूक्ताऽर्थ के साथ पूर्वसूक्तार्थ की संगति जाननी चाहिये॥यह पैंतीसवां वर्ग ३५ छयालीसवां ४६ सूक्त और ३ तीसरा अध्याय समाप्त हुआ॥४६॥इति श्रीमत्परिव्राजकाचार्य्य महाविद्वान् श्रीयुत स्वामी विरजानन्द सरस्वतीजी के शिष्य दयानन्दसरस्वती स्वामी ने संस्कृत और आर्य्यभाषा से सुशोभित अच्छे प्रमाण सहित ऋग्वेदभाष्य के तीसरे अध्याय को पूर्ण किया॥१५॥

अ॒यं वां॒ मधु॑मत्तमः सु॒तः सोम॑ ऋतावृधा। तम॑श्विना पिबतं ति॒रोअ॑ह्न्यं ध॒त्तं रत्ना॑नि दा॒शुषे॑॥

सभा के मालिक आदि लोग सदा ओषधियों के रसों की सेवा से अच्छे प्रकार बलवान् होकर प्रजा की शोभाओं को बढ़ावें॥१॥

त्रि॒व॒न्धु॒रेण॑ त्रि॒वृता॑ सु॒पेश॑सा॒ रथे॒ना या॑तमश्विना। कण्वा॑सो वां॒ ब्रह्म॑ कृण्वन्त्यध्व॒रे तेषां॒ सु शृ॑णुतं॒ हव॑म्॥

यहां वाचकलुप्तोपमालंकार है। मनुष्यों को योग्य है कि विद्वानों के सङ्ग से पदार्थ विज्ञानपूर्वक यज्ञ और शिल्पविद्या की हस्तक्रिया को साक्षात् करके व्यवहाररूपी कार्यों को सिद्ध करें॥२॥

अश्वि॑ना॒ मधु॑मत्तमं पा॒तं सोम॑मृतावृधा। अथा॒द्य द॑स्रा॒ वसु॒ बिभ्र॑ता॒ रथे॑ दा॒श्वांस॒मुप॑ गच्छतम्॥

यहां वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे वायु से सूर्य्य चन्द्रमा की पुष्टि और अन्धेर का नाश होता है वैसे ही सभा और सेना के पतियों से प्रजास्थ प्राणियों की संतुष्टि दुःखों का नाश और धन की वृद्धि होती है॥३॥

त्रि॒ष॒ध॒स्थे ब॒र्हिषि॑ विश्ववेदसा॒ मध्वा॑ य॒ज्ञं मि॑मिक्षतम्। कण्वा॑सो वां सु॒तसो॑मा अ॒भिद्य॑वो यु॒वां ह॑वन्ते अश्विना॥

जैसे मनुष्य लोग विद्वानों से विद्या सीख यान रच और उसमें जल आदि युक्त करके शीघ्र जाने आने के वास्ते समर्थ होते हैं वैसे अन्य उपाय से नहीं इस लिये उसमें परिश्रम अवश्य करें॥४॥

याभिः॒ कण्व॑म॒भिष्टि॑भिः॒ प्राव॑तं यु॒वम॑श्विना। ताभिः॒ ष्व १॒॑ स्माँ अ॑वतं शुभस्पती पा॒तं सोम॑मृतावृधा॥

सभा और सेना के पति राज पुरुष जैसे अपने ऐश्वर्य्य की रक्षा करें वैसे ही प्रजा और सेनाओं की रक्षा सदा किया करें॥५॥

सु॒दासे॑ दस्रा॒ वसु॒ बिभ्र॑ता॒ रथे॒ पृक्षो॑ वहतमश्विना। र॒यिं स॑मु॒द्रादु॒त वा॑ दि॒वस्पर्य॒स्मे ध॑त्तं पुरु॒स्पृह॑म्॥

राज पुरुषों को योग्य है कि सेना और प्रजा के अर्थ नाना प्रकार का धन और समुद्रादि के पार जाने के लिये विमान आदि यान रचकर सब प्रकार सुख की उन्नति करें॥६॥

यन्ना॑सत्या परा॒वति॒ यद्वा॒ स्थो अधि॑ तु॒र्वशे॑। अतो॒ रथे॑न सु॒वृता॑ न॒ आ ग॑तं सा॒कं सूर्य॑स्य र॒श्मिभिः॑॥

राजसभा के पति जिस सवारी से अन्तरिक्ष मार्ग करके देश देशान्तर जाने को समर्थ होवें उसको प्रयत्न से बनावें॥७॥

अ॒र्वाञ्चा॑ वां॒ सप्त॑योऽध्वर॒श्रियो॒ वह॑न्तु सव॒नेदुप॑। इषं॑ पृ॒ञ्चन्ता॑ सु॒कृते॑ सु॒दान॑व॒ आ ब॒र्हिः सी॑दतं नरा॥

राजा और प्रजाजनों को चाहिये कि आपस में उत्तम पदार्थों को दे-लेकर सुखी हों॥८॥

तेन॑ नास॒त्या ग॑तं॒ रथे॑न॒ सूर्य॑त्वचा। येन॒ शश्व॑दू॒हथु॑र्दा॒शुषे॒ वसु॒ मध्वः॒ सोम॑स्य पी॒तये॑॥

राजपुरुष जैसे अपने हित के लिये प्रयत्न करते हैं उसी प्रकार प्रजा के सुख के लिये भी प्रयत्न करें॥९॥

उ॒क्थेभि॑र॒र्वागव॑से पुरू॒वसू॑ अ॒र्कैश्च॒ नि ह्व॑यामहे। शश्व॒त्कण्वा॑नां॒ सद॑सि प्रि॒ये हि कं॒ सोमं॑ प॒पथु॑रश्विना॥

राजप्रजा जनों को चाहिये कि विद्वानों की सभा में जाकर नित्य उपदेश सुनें जिससे सब करने और न करने योग्य विषयों का बोध हो॥१०॥यहां राजा और प्रजा के धर्म्म का वर्णन होने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगती जाननी चाहिये॥॥यह दूसरा २ वर्ग और सैंतालीसवां ४७ सूक्त समाप्त हुआ॥

स॒ह वा॒मेन॑ न उषो॒ व्यु॑च्छा दुहितर्दिवः। स॒ह द्यु॒म्नेन॑ बृह॒ता वि॑भावरि रा॒या दे॑वि॒ दास्व॑ती॥

यहां वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे कोई स्वामी भृत्य को वा भृत्य स्वामी को सचेत कर व्यवहारों में प्रेरणा करता है और जैसे उषा अर्थात् प्रातःकाल की वेला प्राणियों को पुरुषार्थ युक्त कर बड़े-२ पदार्थसमूह युक्त सुख से आनन्दित कर सायंकाल में सब व्यवहारों से निवृत्त कर आरामस्थ करती है वैसे ही माता-पिता विद्या और अच्छी शिक्षा आदि व्यवहारों में अपनी कन्याओं को प्रेरणा करें॥१॥

अश्वा॑वती॒र्गोम॑तीर्विश्वसु॒विदो॒ भूरि॑ च्यवन्त॒ वस्त॑वे। उदी॑रय॒ प्रति॑ मा सू॒नृता॑ उष॒श्चोद॒ राधो॑ म॒घोना॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे अच्छी शोभित उषा सब प्राणियों को सुख देती है वैसे स्त्रियां अपने पतियों को निरन्तर सुख दिया करें॥२॥

उ॒वासो॒षा उ॒च्छाच्च॒ नु दे॒वी जी॒रा रथा॑नाम्। ये अ॑स्या आ॒चर॑णेषु दध्रि॒रे स॑मु॒द्रे न श्र॑व॒स्यवः॑॥

इस मंत्र में उपमालंकार है। जिसको अपने समान विदुषी पंडिता और सर्वथा अनुकूल स्त्री मिलती है वह सुख को प्राप्त होता है और नहीं॥३॥

उषो॒ ये ते॒ प्र यामे॑षु यु॒ञ्जते॒ मनो॑ दा॒नाय॑ सू॒रयः॑। अत्राह॒ तत्कण्व॑ एषां॒ कण्व॑तमो॒ नाम॑ गृणाति नृ॒णाम्॥

जो मनुष्य एकान्त पवित्र निरुपद्रव देश में स्थिर होकर यमादि संयमान्त उपासना के नव अंगों का अभ्यास करते हैं वे निर्मल आत्मा होकर ज्ञानी श्रेष्ठ सिद्ध होते हैं और जो इनका संग और सेवा करते हैं वे भी शुद्ध अन्तःकरण होके आत्मयोग के जानने के अधिकारी होते हैं॥४॥

आ घा॒ योषे॑व सू॒नर्यु॒षा या॑ति प्रभुञ्ज॒ती। ज॒रय॑न्ती॒ वृज॑नं प॒द्वदी॑यत॒ उत्पा॑तयति प॒क्षिणः॑॥

जैसे प्रातःकाल की वेला सब प्रकार से सुख की देनेवाली योगाभ्यास का कारण है उसी प्रकार स्त्रियों को होना चाहिये॥५॥

वि या सृ॒जति॒ सम॑नं॒ व्य १॒॑ र्थिनः॑ प॒दं न वे॒त्योद॑ती। वयो॒ नकि॑ष्टे पप्ति॒वांस॑ आसते॒ व्यु॑ष्टौ वाजिनीवति॥

इस मंत्र में उपमालंकार है। जैसे स्त्रियां व्यवहार से अपने पदार्थों को प्राप्त होती हैं वैसे उषा अपने प्रकाश से अधिकार को प्राप्त होती हैं जैसे वह दिन को उत्पन्न और सब प्राणियों को उठाकर अपने-२ व्यवहार में प्रवर्त्तमान कर रात्रि को निवृत्त करती और दिन के होने से दाह को भी उत्पन्न करती है वैसे ही सब स्त्री जनों को भी होना चाहिये॥६॥

ए॒षायु॑क्त परा॒वतः॒ सूर्य॑स्यो॒दय॑ना॒दधि॑। श॒तं रथे॑भिः सु॒भगो॒षा इ॒यं वि या॑त्य॒भि मानु॑षान्॥

जैसे पतिव्रता स्त्रियां नियम से अपने पतियों की सेवा करती हैं। जैसे उषा से सब पदार्थों का दूर देश से संयोग होता है वैसे दूरस्थ कन्या पुत्रों का युवाऽवस्था में स्वयंवर विवाह करना चाहिये जिससे दूरदेश में रहनेवाले मनुष्यों से प्रीति बढ़े जैसे निकटस्थों का विवाह दुःखदायक होता है वैसे ही दूरस्थों का विवाह आनन्दप्रद होता है॥७॥

विश्व॑मस्या नानाम॒ चक्ष॑से॒ जग॒ज्ज्योति॑ष्कृणोति सू॒नरी॑। अप॒ द्वेषो॑ म॒घोनी॑ दुहि॒ता दि॒व उ॒षा उ॑च्छ॒दप॒ स्रिधः॑॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे सती स्त्री विघ्नों को दूरकर कर्त्तव्य कर्मो को सिद्ध करती है, वैसे ही उषा डाकू, चोर, शत्रु आदि को दूर कर कार्य्य की सिद्धि कराने वाली होती है॥८॥

उष॒ आ भा॑हि भा॒नुना॑ च॒न्द्रेण॑ दुहितर्दिवः। आ॒वह॑न्ती॒ भूर्य॒स्मभ्यं॒ सौभ॑गं व्यु॒च्छन्ती॒ दिवि॑ष्टिषु॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे विदुषी धार्मिक कन्या दोनों माता और पति के कुलों को उज्ज्वल करती है वैसे उषा दोनों स्थूल सूक्ष्म अर्थात् बड़ी छोटी वस्तुओं को प्रकाशित करती है॥९॥

विश्व॑स्य॒ हि प्राण॑नं॒ जीव॑नं॒ त्वे वि यदु॒च्छसि॑ सूनरि। सा नो॒ रथे॑न बृह॒ता वि॑भावरि श्रु॒धि चि॑त्रामघे॒ हव॑म्॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे उषा से सब प्राणिजात को सुख होता है वैसे ही पतिव्रता स्त्री से प्रसन्न पुरुष को सब आनन्द होते हैं॥१०॥

उषो॒ वाजं॒ हि वंस्व॒ यश्चि॒त्रो मानु॑षे॒ जने॑। तेना व॑ह सु॒कृतो॑ अध्व॒राँ उप॒ ये त्वा॑ गृ॒णन्ति॒ वह्न॑यः॥

जो मनुष्य जैसे सूर्य्य उषा को प्राप्त होके दिन को #कर सबको सुख देता है वैसे अपनी स्त्रियों को भूषित करते हैं उनको स्त्री-जन भी भूषित करती हैं इस प्रकार परस्पर प्रीति उपकार से सदा सुखी रहें॥११॥#[अर्थात् ‘प्रकटकर’। सं०]

विश्वा॑न्दे॒वाँ आ व॑ह॒ सोम॑पीतये॒ऽन्तरि॑क्षादुष॒स्त्वम्। सास्मासु॑ धा॒ गोम॒दश्वा॑वदु॒क्थ्य १॒॑ मुषो॒ वाजं॑ सु॒वीर्य॑म्॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे यह उषा अपने प्रादुर्भाव में शुद्ध वायु जल आदि दिव्य गुणों को प्राप्त कराके दोषों का नाश कर सब उत्तम पदार्थ समूह को प्रकट करती है वैसे उत्तम स्त्री गृह कार्य्य में हो॥१२॥

यस्या॒ रुश॑न्तो अ॒र्चयः॒ प्रति॑ भ॒द्रा अदृ॑क्षत। सा नो॑ र॒यिं वि॒श्ववा॑रं सु॒पेश॑समु॒षा द॑दातु॒ सुग्म्य॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे दिन की निमित्त उषा के विना सुख वा राज्य के कार्य्य सिद्ध नहीं होते और सुरूप की प्राप्ति भी नहीं होती वैसे ही समीचीन स्त्री के विना यह सब नहीं होता॥१३॥

ये चि॒द्धि त्वामृष॑यः॒ पूर्व॑ ऊ॒तये॑ जुहू॒रेऽव॑से महि। सा नः॒ स्तोमाँ॑ अ॒भि गृ॑णीहि॒ राध॒सोषः॑ शु॒क्रेण॑ शो॒चिषा॑॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि जिन्होंने वेदों को अध्ययन किया वे पूर्व ऋषि, और जो वेदों को पढ़ते हों उनको नवीन ऋषि जानें, और जैसे विद्वान् लोग जिन पदार्थों को जानकर उपकार लेवें हों वैसे अन्य पुरुषों को भी करना चाहिये किसी मनुष्य को मूर्खों की चालचलन पर न चलना चाहिये और जैसे विद्वान् लोग अपनी विद्या से पदार्थों के गुणों को प्रकाश कर उपकार करते हैं जैसे यह उषा अपने प्रकाश से सब पदार्थों को प्रकाशित करती है वैसे ही विद्वान् स्त्रियां विश्व को सुभूषित कर देती हैं॥१४॥

उषो॒ यद॒द्य भा॒नुना॒ वि द्वारा॑वृ॒णवो॑ दि॒वः। प्र नो॑ यच्छतादवृ॒कं पृ॒थु च्छ॒र्दिः प्र दे॑वि॒ गोम॑ती॒रिषः॑॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे उषा अपने प्रकाश से अतीत वर्त्तमान और आनेवाले दिनों में सब मार्ग और द्वारों को प्रकाश करती है वैसे ही मनुष्यों को चाहिये कि सब ऋतुओं में सुख देनेवाले घरों को रच उनमें सब भोग्य पदार्थों को स्थापन और वह सब स्त्री के आधीन कर प्रतिदिन सुखी रहैं॥१५॥

सं नो॑ रा॒या बृ॑ह॒ता वि॒श्वपे॑शसा मिमि॒क्ष्वा समिळा॑भि॒रा। सं द्यु॒म्नेन॑ विश्व॒तुरो॑षो महि॒ सं वाजै॑र्वाजिनीवति॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे विद्वानों की विद्या शिक्षा से उषा के गुण का ज्ञान होके उससे पुरुषार्थ सिद्धि फिर उससे सब सुखों की निमित्त विद्या प्राप्त होती है वैसे ही माता की शिक्षा से पुत्र उत्तम होते है और प्रकार से नहीं॥१६॥इस सूक्त में उषा के दृष्टान्त करके कन्या और स्त्रियों के लक्षणों का प्रतिपदान करने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह अड़तालीसवां सूक्त ४८ और पांचवां वर्ग ५ समाप्त हुआ॥

उषो॑ भ॒द्रेभि॒रा ग॑हि दि॒वश्चि॑द्रोच॒नादधि॑। वह॑न्त्वरु॒णप्स॑व॒ उप॑ त्वा सो॒मिनो॑ गृ॒हम्॥

जिस उषा की भूमि संयुक्त सूर्य के प्रकाश से उत्पत्ति है वह दिन रूप परिणाम को प्राप्त होकर पदार्थों को प्रकाशित करती हुई सबको आह्लादित करती है वैसे ही ब्रह्मचर्य विद्या योग से युक्त स्त्री श्रेष्ठ हो॥१॥

सु॒पेश॑सं सु॒खं रथं॒ यम॒ध्यस्था॑ उष॒स्त्वम्। तेना॑ सु॒श्रव॑सं॒ जनं॒ प्रावा॒द्य दु॑हितर्दिवः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। मनुष्य लोग जैसे सूर्य्य के प्रकाश से सुरूप की प्रसिद्धि होती है वैसे ही विदुषी स्त्री से घर का काम और पुत्रों की उत्पत्ति होती है ऐसा जानकर उनसे उपकार लेवें॥२॥

वय॑श्चित्ते पत॒त्रिणो॑ द्वि॒पच्चतु॑ष्पदर्जुनि। उषः॒ प्रार॑न्नृ॒तूँरनु॑ दि॒वो अन्ते॑भ्य॒स्परि॑॥

इस मन्त्र में उपमालंकार है जैसे उषा मुहूर्त्त, प्रहर, दिन, मास, ऋतु, अयन अर्थात् दक्षिणायन और वर्षो का विभाग करती हुई सब प्राणियों के व्यवहार और चेतनता को करती है वैसे ही स्त्री सब गृहकृत्यों को पृथक्-२ करें॥३॥

व्यु॒च्छन्ती॒ हि र॒श्मिभि॒र्विश्व॑मा॒भासि॑ रोच॒नम्। तां त्वामु॑षर्वसू॒यवो॑ गी॒र्भिः कण्वा॑ अहूषत॥

विद्वानों को चाहिये कि उषा के गुणों के तुल्य स्त्री उत्तम होती है इस बात को जानें और सबको उपदेश करें॥४॥इसमें उषा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्वसूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह उनचासवां सूक्त ४९ और छठा वर्ग ६ समाप्त हुआ॥

उदु॒ त्यं जा॒तवे॑दसं दे॒वं व॑हन्ति के॒तवः॑। दृ॒शे विश्वा॑य॒ सूर्य॑म्॥

धार्मिक माता पिता आदि विद्वान् लोग जैसे घोड़े रथ को और किरणें सूर्य्य को प्राप्त करती हैं ऐसे ही विद्या और धर्म के प्रकाशयुक्त अपने तुल्य स्त्रियों से सब पुरुषों का विवाह करावें॥१॥

अप॒ त्ये ता॒यवो॑ यथा॒ नक्ष॑त्रा यन्त्य॒क्तुभिः॑। सूरा॑य वि॒श्वच॑क्षसे॥

इस मन्त्र में उपमालंकार है। जैसे रात्रि में नक्षत्र लोक चन्द्रमा के साथ और प्राण शरीर के साथ वर्त्तते हैं वैसे विवाह करके स्त्री और पुरुष आपस में वर्त्ता करें॥२॥

अदृ॑श्रमस्य के॒तवो॒ वि र॒श्मयो॒ जनाँ॒ अनु॑। भ्राज॑न्तो अ॒ग्नयो॑ यथा॥

इस मन्त्र में उपमालंकार है। जैसे प्रज्वलित हुए अग्नि और सूर्य्यादिक बाहर सब में प्रकाशमान हैं वैसे ही अन्तरात्मा में ईश्वर का प्रकाश वर्त्तमान है इसके जानने के लिये सब मनुष्यों को प्रयत्न करना योग्य है उस परमात्मा की आज्ञा से परस्त्री के साथ पुरुष और परपुरुष के संग स्त्री व्यभिचार को सब प्रकार छोड़ के पाणिगृहीत अपनी-२ स्त्री और अपने-२ पुरुष के साथ ऋतुगामी ही होवें॥३॥

त॒रणि॑र्वि॒श्वद॑र्शतो ज्योति॒ष्कृद॑सि सूर्य। विश्व॒मा भा॑सि रोच॒नम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे सूर्य्य और बिजुली बाहर भीतर रहने वाले सब स्थूल पदार्थों को प्रकाशित करते हैं वैसे ही ईश्वर भी सब वस्तु मात्र को प्रकाशित करता है॥४॥

प्र॒त्यङ् दे॒वानां॒ विशः॑ प्र॒त्यङ्ङुदे॑षि॒ मानु॑षान्। प्र॒त्यङ्विश्वं॒ स्व॑र्दृ॒शे॥

जिससे ईश्वर सब कहीं व्यापक सबके आत्मा का जाननेवाला और सब कर्मों का साक्षी है इसलिये यही सब सज्जन लोगों को नित्य उपासना करने के योग्य है॥५॥

येना॑ पावक॒ चक्ष॑सा भुर॒ण्यन्तं॒ जनाँ॒ अनु॑। त्वं व॑रुण॒ पश्य॑सि॥

परमेश्वर की उपासना के विना किसी मनुष्य को विज्ञान वा पवित्रता होने का संभव नहीं हो सकता इससे सब मनुष्यों को एक पमेश्वर ही की उपासना करनी चाहिये॥६॥

वि द्यामे॑षि॒ रज॑स्पृ॒थ्वहा॒ मिमा॑नो अ॒क्तुभिः॑। पश्य॒ञ्जन्मा॑नि सूर्य॥

जिसने सूर्य्य आदि लोक बनाये और सब जीवों के पाप-पुण्य को देख के ठीक-२ उनके सुख-दुःख रूप फलों को देता है वही सबका सत्य-२ न्यायाकारी राजा हैं ऐसा सब मनुष्य जानें॥७॥

स॒प्त त्वा॑ ह॒रितो॒ रथे॒ वह॑न्ति देव सूर्य। शो॒चिष्के॑शं विचक्षण॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। हे मनुष्यो! जैसे रश्मियों के विना सूर्य्य का दर्शन नहीं हो सकता वैसे ही वेदों को ठीक-२ जाने विना परमेश्वर का दर्शन नहीं हो सकता ऐसा निश्चय जानो॥८॥

अयु॑क्त स॒प्त शु॒न्ध्युवः॒ सूरो॒ रथ॑स्य न॒प्त्यः॑। ताभि॑र्याति॒ स्वयु॑क्तिभिः॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जो सूर्य के समान आपही आपसे प्रकाश स्वरूप आकाश के तुल्य सर्वत्र व्यापक उपासकों को पवित्रकर्त्ता परमात्मा है वही सब मनुष्यों का उपास्यदेव है॥९॥

उद्व॒यं तम॑स॒स्परि॒ ज्योति॒ष्पश्य॑न्त॒ उत्त॑रम्। दे॒वं दे॑व॒त्रा सूर्य॒मग॑न्म॒ ज्योति॑रुत्त॒मम्॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। मनुष्यों को योग्य है कि परमेश्वर के सदृश कोई भी उत्तम पदार्थ नहीं और न इसकी प्राप्ति के विना मुक्ति सुख को प्राप्त होने योग्य कोई भी मनुष्य हो सकता है ऐसा निश्चित जानें॥१०॥

उ॒द्यन्न॒द्य मि॑त्रमह आ॒रोह॒न्नुत्त॑रां॒ दिव॑म्। हृ॒द्रो॒गं मम॑ सूर्य हरि॒माणं॑ च नाशय॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे सूर्य के उदय में अन्धेर और चोरादि निवृत्त हो जाते हैं वैसे उत्तम वैद्य की प्राप्ति से कुपथ्य और रोगों का निवारण हो जाता है॥११॥

शुके॑षु मे हरि॒माणं॑ रोप॒णाका॑सु दध्मसि। अथो॑ हारिद्र॒वेषु॑ मे हरि॒माणं॒ नि द॑ध्मसि॥

मनुष्य लोग लेपनादि क्रियाओं से रोगों का निवारण करके बल को प्राप्त होवें॥१२॥

उद॑गाद॒यमा॑दि॒त्यो विश्वे॑न॒ सह॑सा स॒ह। द्वि॒षन्तं॒ मह्यं॑ र॒न्धय॒न्मो अ॒हं द्वि॑ष॒ते र॑धम्॥

मनुष्यों को उचित है कि अनन्त बल युक्त परमेश्वर के बल के निमित्त प्राण वा बिजुली के दृष्टान्त से वर्त्त के सत्पुरुषों के साथ मित्रता कर सब प्रजाओं का पालन यथावत् किया करें॥१३॥इस सूक्त में परमेश्वर वा अग्नि के कार्य कारण के दृष्टान्त से राजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगती जाननी चाहिये॥यह आठवां ८ वर्ग नवम् ९ अनुवाक और पचासवां ५० सूक्त समाप्त हुआ॥५०॥

सूक्तम्

अ॒भि त्यं मे॒षं पु॑रुहू॒तमृ॒ग्मिय॒मिन्द्रं॑ गी॒र्भिर्म॑दता॒ वस्वो॑ अर्ण॒वम्। यस्य॒ द्यावो॒ न वि॒चर॑न्ति॒ मानु॑षा भु॒जे मंहि॑ष्ठम॒भि विप्र॑मर्चत॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को योग्य है कि जो बहुत गुणों के योग से सूर्य्य के सदृश विद्यायुक्त राजा हो, उसी का सत्कार सदा किया करें॥१॥

अ॒भीम॑वन्वन्त्स्वभि॒ष्टिमू॒तयो॑ऽन्तरिक्ष॒प्रां तवि॑षीभि॒रावृ॑तम्। इन्द्रं॒ दक्षा॑स ऋ॒भवो॑ मद॒च्युतं॑ श॒तक्र॑तुं॒ जव॑नी सू॒नृतारु॑हत्॥

धर्मात्मा बुद्धिमान् लोग जिस का आश्रय करें, उसी का शरण ग्रहण सब मनुष्य करें॥२॥

त्वं गो॒त्रमङ्गि॑रोभ्योऽवृणो॒रपो॒तात्र॑ये श॒तदु॑रेषु गातु॒वित्। स॒सेन॑ चिद्विम॒दाया॑वहो॒ वस्वा॒जावद्रिं॑ वावसा॒नस्य॑ न॒र्तय॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सेनापति आदि जब तक वायु के सकाश से उत्पन्न हुए सूर्य के समान पराक्रमी नहीं होते, तब तक शत्रुओं को नहीं जीत सकते॥३॥

त्वम॒पाम॑पि॒धाना॑वृणो॒रपाधा॑रयः॒ पर्व॑ते॒ दानु॑म॒द्वसु॑। वृ॒त्रं यदि॑न्द्र॒ शव॒साव॑धी॒रहि॒मादित्सूर्यं॑ दि॒व्यारो॑हयो दृ॒शे॥

मनुष्यों को योग्य है कि जो सूर्य मेघ के द्वार का छेदन कर, आकर्षण कर, अन्तरिक्ष में स्थापन, वर्षा और सबको प्रकाशित करके सुखों को देता है, उस सूर्य को ईश्वर ने रच कर स्थापन किया है, ऐसा जानें॥४॥

त्वं मा॒याभि॒रप॑ मा॒यिनो॑ऽधमः स्व॒धाभि॒र्ये अधि॒ शुप्ता॒वजु॑ह्वत। त्वं पिप्रो॑र्नृमणः॒ प्रारु॑जः॒ पुरः॒ प्र ऋ॒जिश्वा॑नं दस्यु॒हत्ये॑ष्वाविथ॥

जो सभाध्यक्ष अपने सत्यरूपी न्याय से उत्तम वा दुष्टकर्मों के करनेवाले मनुष्यों के लिये फलों को देकर दोनों की यथायोग्य रक्षा करता है, वही इस जगत् में सत्कार के योग्य होता है॥५॥

त्वं कुत्सं॑ शुष्ण॒हत्ये॑ष्वावि॒थार॑न्धयोऽतिथि॒ग्वाय॒ शम्ब॑रम्। म॒हान्तं॑ चिदर्बु॒दं नि क्र॑मीः प॒दा स॒नादे॒व द॑स्यु॒हत्या॑य जज्ञिषे॥

सभाध्यक्षादिकों को योग्य है कि जैसे शत्रुओं को मार, श्रेष्ठों की रक्षा, मार्गों को शुद्ध और असंख्यात बल को धारण कर शत्रुओं के मारने के लिये अत्यन्त प्रभाव बढ़ावें॥६॥

त्वे विश्वा॒ तवि॑षी स॒ध्र्य॑ग्घि॒ता तव॒ राधः॑ सोमपी॒थाय॑ हर्षते। तव॒ वज्र॑श्चिकिते बा॒ह्वोर्हि॒तो वृ॒श्चा शत्रो॒रव॒ विश्वा॑नि॒ वृष्ण्या॑॥

जो श्रेष्ठों में बल उत्पन्न हो तो उससे सब मनुष्यों को सुख होवे, जो दुष्टों में बल होवे तो उससे सब मनुष्यों को दुःख होवे, इससे श्रेष्ठों के सुख की वृद्धि और दुष्टों के बल की हानि निरन्तर करनी चाहिये॥७॥

वि जा॑नी॒ह्यार्या॒न्ये च॒ दस्य॑वो ब॒र्हिष्म॑ते रन्धया॒ शास॑दव्र॒तान्। शाकी॑ भव॒ यज॑मानस्य चोदि॒ता विश्वेत्ता ते॑ सध॒मादे॑षु चाकन॥

मनुष्यों को दस्यु अर्थात् दुष्ट स्वभाव को छोड़ कर आर्य्य अर्थात् श्रेष्ठ स्वभावों के आश्रय से वर्त्तना चाहिये। वे ही आर्य हैं कि जो उत्तम विद्यादि के प्रचार से सबके उत्तम भोग की सिद्धि और अधर्मी दुष्टों के निवारण के लिये निरन्तर यत्न करते हैं। निश्चय करके कोई भी मनुष्य आर्य्यों के संग, उनसे अध्ययन वा उपदेशों के विना यथावत् विद्वान्, धर्मात्मा, आर्यस्वभाव युक्त होने को समर्थ नहीं हो सकता। इससे निश्चय करके आर्य के गुण और कर्मों को सेवन कर निरन्तर सुखी रहना चाहिये॥८॥

अनु॑व्रताय र॒न्धय॒न्नप॑व्रताना॒भूभि॒रिन्द्रः॑ श्न॒थय॒न्नना॑भुवः। वृ॒द्धस्य॑ चि॒द्वर्ध॑तो॒ द्यामिन॑क्षतः॒ स्तवा॑नो व॒म्रो वि ज॑घान सं॒दिहः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। सब धार्मिक मनुष्यों को उचित है कि सब मनुष्यों को अविद्या से निवारण और विद्या पढ़ा विद्वान् करके धर्माऽधर्म के विचारपूर्वक निश्चय से धर्म का ग्रहण और अधर्म का त्याग करें। सदैव आर्यों का सङ्ग डाकुओं के सङ्ग का त्याग कर सबसे उत्तम व्यवस्था में वर्त्तें॥९॥

तक्ष॒द्यत्त॑ उ॒शना॒ सह॑सा॒ सहो॒ वि रोद॑सी म॒ज्मना॑ बाधते॒ शवः॑। आ त्वा॒ वात॑स्य नृमणो मनो॒युज॒ आ पूर्य॑माणमवहन्न॒भि श्रवः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वान् सभाध्यक्ष के विना पृथिवी के राज्य की व्यवस्था शत्रुओं के बल की हानि विद्यादि सद्गुणों का प्रकाश और उत्तम अन्नादि की प्राप्ति नहीं होती॥१०॥

मन्दि॑ष्ट॒ यदु॒शने॑ का॒व्ये सचाँ॒ इन्द्रो॑ व॒ङ्कू व॑ङ्कु॒तराधि॑ तिष्ठति। उ॒ग्रो य॒यिं निर॒पः स्रोत॑सासृज॒द्वि शुष्ण॑स्य दृंहि॒ता ऐ॑रय॒त्पुरः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि जो कवि सब शास्त्र का वक्ता, कुटिलता का विनाश करने, दुष्टों में कठोर, श्रेष्ठों में कोमल, सर्वथा बल को बढ़ानेवाला पुरुष है, उसी को सभा आदि के अधिकारों में स्वीकार करें॥११॥

आ स्मा॒ रथं॑ वृष॒पाणे॑षु तिष्ठसि शार्या॒तस्य॒ प्रभृ॑ता॒ येषु॒ मन्द॑से। इन्द्र॒ यथा॑ सु॒तसो॑मेषु चा॒कनो॑ऽन॒र्वाणं॒ श्लोक॒मा रो॑हसे दि॒वि॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। विमानादि यान वा विद्वानों के सङ्ग के विना किसी मनुष्य को सुख नहीं हो सकता। इससे विद्वानों के सभा वा पदार्थों के ज्ञान के उपयोग से सब मनुष्यों को आनन्द में रहना चाहिये॥१२॥

अद॑दा॒ अर्भां॑ मह॒ते व॑च॒स्यवे॑ क॒क्षीव॑ते वृच॒यामि॑न्द्र सुन्व॒ते। मेना॑भवो वृषण॒श्वस्य॑ सुक्रतो॒ विश्वेत्ता ते॒ सव॑नेषु प्र॒वाच्या॑॥

विद्वान् मनुष्यों को अग्नि आदि पदार्थों से विद्यादान करके सब मनुष्यों के लिये हित के काम करने चाहिये॥१३॥

इन्द्रो॑ अश्रायि सु॒ध्यो॑ निरे॒के प॒ज्रेषु॒ स्तोमो॒ दुर्यो॒ न यूपः॑। अ॒श्व॒युर्ग॒व्यू र॑थ॒युर्व॑सू॒युरिन्द्र॒ इद्रा॒यः क्ष॑यति प्रय॒न्ता॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य से बहुत उत्तम-उत्तम कार्य सिद्ध होते हैं, वैसे विद्वान् वा अग्नि जलादि के सकाश से रथ की सिद्धि के द्वारा धन की प्राप्ति होती है॥१४॥

इ॒दं नमो॑ वृष॒भाय॑ स्व॒राजे॑ स॒त्यशु॑ष्माय त॒वसे॑ऽवाचि। अ॒स्मिन्नि॑न्द्र वृ॒जने॒ सर्व॑वीराः॒ स्मत्सू॒रिभि॒स्तव॒ शर्म॑न्त्स्याम॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सब मनुष्यों को विद्वान् के साथ वर्त्तमान रह कर परमेश्वर ही की उपासना, पूर्णप्रीति से विद्वानों का सङ्ग कर परम आनन्द को प्राप्त करना और कराना चाहिये॥१५॥इस सूक्त में सूर्य अग्नि और बिजुली आदि पदार्थों का वर्णन, बलादि की प्राप्ति, अनेक अलङ्कारों के कथन से विविध अर्थों का वर्णन और सभाध्यक्ष तथा परमेश्वर के गुणों का प्रतिपादन किया है। इससे इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये।

त्यं सु मे॒षं म॑हया स्व॒र्विदं॑ श॒तं यस्य॑ सु॒भ्वः॑ सा॒कमीर॑ते। अत्यं॒ न वाजं॑ हवन॒स्यदं॒ रथ॒मेन्द्रं॑ ववृत्या॒मव॑से सुवृ॒क्तिभिः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को जैसे अश्व को युक्त कर रथ आदि को चलाते हैं, वैसे अग्नि आदि से यानों को चला के कार्यों को सिद्ध कर सुखों को प्राप्त होना चाहिये॥१॥

स पर्व॑तो॒ न ध॒रुणे॒ष्वच्यु॑तः स॒हस्र॑मूति॒स्तवि॑षीषु वावृधे। इन्द्रो॒ यद्वृ॒त्रमव॑धीन्नदी॒वृत॑मु॒ब्जन्नर्णां॑सि॒ जर्हृ॑षाणो॒ अन्ध॑सा॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सेना आदि को धारण कर और मेघ के तुल्य अन्नादि सामग्री के साथ वर्त्तमान हो के बलों को बढ़ाता है, वह पर्वत के समान स्थिर सुखी हो शत्रुओं को मार कर राज्य के बढ़ाने में समर्थ होता है॥२॥

स हि द्व॒रो द्व॒रिषु॑ व॒व्र ऊध॑नि च॒न्द्रबु॑ध्नो॒ मद॑वृद्धो मनी॒षिभिः॑। इन्द्रं॒ तम॑ह्वे स्वप॒स्य॑या धि॒या मंहि॑ष्ठरातिं॒ स हि पप्रि॒रन्ध॑सः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जो मेघ के तुल्य प्रजापालन करता है, उस परमैश्वर्य युक्त पुरुष को सभाध्यक्ष का अधिकार देवें॥३॥

आ यं पृ॒णन्ति॑ दि॒वि सद्म॑बर्हिषः समु॒द्रं न सु॒भ्वः१॒॑ स्वा अ॒भिष्ट॑यः। तं वृ॑त्र॒हत्ये॒ अनु॑ तस्थुरू॒तयः॒ शुष्मा॒ इन्द्र॑मवा॒ता अह्रु॑तप्सवः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे नदी समुद्र वा अन्तरिक्ष को प्राप्त होकर स्थिर होती है, वैसे ही सभासदों के सहित विद्वान् को प्राप्त होकर सब प्रजा स्थिर सुखवाली होती हैं॥४॥

अ॒भि स्ववृ॑ष्टिं॒ मदे॑ अस्य॒ युध्य॑तो र॒घ्वीरि॑व प्रव॒णे स॑स्रुरू॒तयः॑। इन्द्रो॒ यद्व॒ज्री धृ॒षमा॑णो॒ अन्ध॑सा भि॒नद्व॒लस्य॑ परि॒धीँरि॑व त्रि॒तः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जल नीचे स्थान को जाते हैं, वैसे सभाध्यक्ष नम्र होकर विनय को प्राप्त होवे॥५॥

परीं॑ घृ॒णा च॑रति तित्वि॒षे शवो॒ऽपो वृ॒त्वी रज॑सो बु॒ध्नमाश॑यत्। वृ॒त्रस्य॒ यत्प्र॑व॒णे दु॒र्गृभि॑श्वनो निज॒घन्थ॒ हन्वो॑रिन्द्र तन्य॒तुम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि सूर्य वा मेघ के समान वर्त्त के विद्या और न्याय की वर्षा का प्रकाश करें॥६॥

ह्र॒दं न हि त्वा॑ न्यृ॒षन्त्यू॒र्मयो॒ ब्रह्मा॑णीन्द्र॒ तव॒ यानि॒ वर्ध॑ना। त्वष्टा॑ चित्ते॒ युज्यं॑ वावृधे॒ शव॑स्त॒तक्ष॒ वज्र॑म॒भिभू॑त्योजसम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जल नीचे स्थानों को जाकर स्थिर वा स्वच्छ होता है, वैसे ही राजपुरुष उत्तम-उत्तम गुणयुक्त तथा विनयवाले पुरुष को प्राप्त होकर स्थिर और शुद्धि करनेवाले होते हैं॥७॥

ज॒घ॒न्वाँ उ॒ हरि॑भिः संभृतक्रत॒विन्द्र॑ वृ॒त्रं मनु॑षे गातु॒यन्न॒पः। अय॑च्छथा बा॒ह्वोर्वज्र॑माय॒समधा॑रयो दि॒व्या सूर्यं॑ दृ॒शे॥

जैसे सूर्यलोक बल और आकर्षण गुणों से सब लोकों के धारण से जल को आकर्षण कर वर्षा से दिव्य सुखों को उत्पन्न करता है, वैसे ही सभा सब गुणों को धर, धनकार्य्य से सुपात्रों को सुमार्ग की प्रवृत्ति के लिये दान देकर प्रजा के लिये आनन्द को प्रकट करे॥८॥

बृ॒हत्स्वश्च॑न्द्र॒मम॑व॒द्यदु॒क्थ्य१॒॑मकृ॑ण्वत भि॒यसा॒ रोह॑णं दि॒वः। यन्मानु॑षप्रधना॒ इन्द्र॑मू॒तयः॒ स्व॑र्नृ॒षाचो॑ म॒रुतोऽम॑द॒न्ननु॑॥

विद्याधन, राज्य, पराक्रम, बल वा पुरुषों की सहायता ये सब जिस धार्मिक विद्वान् मनुष्य को प्राप्त होते हैं, उसको उत्तम सुख उत्पन्न कराते हैं॥९॥

द्यौश्चि॑द॒स्याम॑वाँ॒ अहेः॑ स्व॒नादयो॑यवीद्भि॒यसा॒ वज्र॑ इन्द्र ते। वृ॒त्रस्य॒ यद्ब॑द्बधा॒नस्य॑ रोदसी॒ मदे॑ सु॒तस्य॒ शव॒साभि॑न॒च्छिरः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य के किरण और बिजुली मेघ के साथ प्रवृत्त होती हैं, वैसे ही सेनापति आदि के साथ सेना को होना चाहिये॥१०॥

यदिन्न्वि॑न्द्र पृथि॒वी दश॑भुजि॒रहा॑नि॒ विश्वा॑ त॒तन॑न्त कृ॒ष्टयः॑। अत्राह॑ ते मघव॒न्विश्रु॑तं॒ सहो॒ द्यामनु॒ शव॑सा ब॒र्हणा॑ भुवत्॥

राजपुरुषों को चाहिये कि जैसे अपने राज्य में सुखों की वृद्धि और अनेक प्रकार से गुणों की प्राप्ति हो, वैसा अनुष्ठान करें॥११॥

त्वम॒स्य पा॒रे रज॑सो॒ व्यो॑मनः॒ स्वभू॑त्योजा॒ अव॑से धृषन्मनः। च॒कृ॒षे भूमिं॑ प्रति॒मान॒मोज॑सो॒ऽपः स्वः॑ परि॒भूरे॒ष्या दिव॑म्॥

जैसे परमेश्वर सब से उत्तम, सबसे परे वर्त्तमान होकर सामर्थ्य से लोकों को रच के, उनमें सब प्रकार से व्याप्त हो धारण कर सब को व्यवस्था में युक्त करता हुआ जीवों के पाप-पुण्य की व्यवस्था करने से न्यायाधीश होकर वर्त्तता है, वैसे ही न्यायाधीश भी सब भूमि के राज्य को सम्पादन करता हुआ, सबके लिये सुखों को उत्पन्न करे॥१२॥

त्वं भु॑वः प्रति॒मानं॑ पृथि॒व्या ऋ॒ष्ववी॑रस्य बृह॒तः पति॑र्भूः। विश्व॒माप्रा॑ अ॒न्तरि॑क्षं महि॒त्वा स॒त्यम॒द्धा नकि॑र॒न्यस्त्वावा॑न्॥

जैसे परमेश्वर ही सब जगत् की रचना, परिमाण, व्यापक और सत्य का प्रकाश करनेवाला है, इससे ईश्वर के सदृश कोई भी पदार्थ न हुआ और न होगा, ऐसा समझ के हम लोग उसी की उपासना करें॥१३॥

न यस्य॒ द्यावा॑पृथि॒वी अनु॒ व्यचो॒ न सिन्ध॑वो॒ रज॑सो॒ अन्त॑मान॒शुः। नोत स्ववृ॑ष्टिं॒ मदे॑ अस्य॒ युध्य॑त॒ एको॑ अ॒न्यच्च॑कृषे॒ विश्व॑मानु॒षक्॥

जैसे परमेश्वर के किसी गुण की कोई मनुष्य वा कोई लोक सीमा को ग्रहण नहीं कर सकता और जैसे वह पापयुक्त कर्म करनेवाले मनुष्यों के लिये दुःखरूप फल देने से पीड़ा देता दुष्टों की ताड़ना करता और सूर्य मेघाऽवयवों को विदारण करता और युद्ध करनेवाले मनुष्य के समान वर्त्तता है, वैसे ही सब सज्जन मनुष्यों को वर्त्तना चाहिये॥१४॥

आर्च॒न्नत्र॑ म॒रुतः॒ सस्मि॑न्ना॒जौ विश्वे॑ दे॒वासो॑ अमद॒न्ननु॑ त्वा। वृ॒त्रस्य॒ यद्भृ॑ष्टि॒मता॑ व॒धेन॒ नि त्वमि॑न्द्र॒ प्रत्या॒नं ज॒घन्थ॑॥

जो एक परमेश्वर की उपासना विद्या को ग्रहण और शत्रुओं को ताड़कर प्रजा को निरन्तर आनन्दित करते हैं, वे ही धार्मिक विद्वान् सुखी रहते हैं॥१२॥इस सूक्त में विद्वान्, बिजुली आदि अग्नि और ईश्वर के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥

न्यू॒३॒॑षु वाचं॒ प्र म॒हे भ॑रामहे॒ गिर॒ इन्द्रा॑य॒ सद॑ने वि॒वस्व॑तः। नू चि॒द्धि रत्नं॑ सस॒तामि॒वावि॑द॒न्न दु॑ष्टु॒तिर्द्र॑विणो॒देषु॑ शस्यते॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को जैसे निद्रा में स्थित हुए मनुष्य आराम को प्राप्त होते हैं, वैसे सर्वदा विद्या उत्तम शिक्षाओं से संस्कार की हुई वाणी को स्वीकार प्रशंसनीय कर्म को सेवन और निन्दा को दूरकर स्तुति का प्रकाश होने के लिये अच्छे प्रकार प्रयत्न करना चाहिये॥१॥

दु॒रो अश्व॑स्य दु॒र इ॑न्द्र॒ गोर॑सि दु॒रो यव॑स्य॒ वसु॑न इ॒नस्पतिः॑। शि॒क्षा॒न॒रः प्र॒दिवो॒ अका॑मकर्शनः॒ सखा॒ सखि॑भ्य॒स्तमि॒दं गृ॑णीमसि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। परमेश्वर के तुल्य धार्मिक विद्वान् के विना किसी के लिये सब पदार्थ वा सब सुखों के देनेवाला कोई नहीं है, परन्तु जो निश्चय करके सबके मित्र शिक्षाओं को प्राप्त किये हुए आलस्य को छोड़कर, ईश्वर की उपासना विद्या वा विद्वानों के संग को प्रीति से सेवन करनेवाले मनुष्य हैं, वे ही इन सब सुखों को प्राप्त होते हैं, आलसी मनुष्य नहीं॥२॥

शची॑व इन्द्र पुरुकृद्द्युमत्तम॒ तवेदि॒दम॒भित॑श्चेकिते॒ वसु॑। अतः॑ सं॒गृभ्या॑भिभूत॒ आ भ॑र॒ मा त्वा॑य॒तो ज॑रि॒तुः काम॑मूनयीः॥

निश्चय ही मनुष्यों को परमेश्वर वा विद्वान् मनुष्य के संग के विना कोई भी इष्टसिद्धियों को पूरण कर सकनेवाला नहीं है। इससे इसी की उपासना वा विद्वान् मनुष्य का सत्संग करके इष्टसिद्धि को सम्पादन करना चाहिये॥३॥

ए॒भिर्द्युभिः॑ सु॒मना॑ ए॒भिरिन्दु॑भिर्निरुन्धा॒नो अम॑तिं॒ गोभि॑र॒श्विना॑। इन्द्रे॑ण॒ दस्युं॑ द॒रय॑न्त॒ इन्दु॑भिर्यु॒तद्वे॑षसः॒ समि॒षा र॑भेमहि॥

जो सभाध्यक्ष सब विद्याओं की शिक्षा कर हम लोगों को सुखी करता है, उसका सब मनुष्यों को सेवन करना चाहिये। इस के सहाय के विना कोई भी मनुष्य व्यावहारिक और परमार्थविषयक आनन्द को प्राप्त होने को समर्थ नहीं हो सकता, इससे इसके सहाय से सब धर्मयुक्त कार्यों का आरम्भ वा सुख का सेवन करना चाहिये॥४॥

समि॑न्द्र रा॒या समि॒षा र॑भेमहि॒ सं वाजे॑भिः पुरुश्च॒न्द्रैर॒भिद्यु॑भिः। सं दे॒व्या प्रम॑त्या वी॒रशु॑ष्मया॒ गोअ॑ग्र॒याश्वा॑वत्या रभेमहि॥

कोई भी मनुष्य विद्वान् की सहायता के विना अच्छे प्रकार पुरुषार्थ की सिद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता और निश्चय करके बल, आरोग्य, पूर्ण सामग्री और उत्तम शिक्षा से युक्त धार्मिक, शूरवीर युक्त चतुरङ्गिणी अर्थात् चौतर्फी अङ्ग से युक्त सेना के विना शत्रुओं का पराजय वा विजय के प्राप्त होने को समर्थ नहीं हो सकता, इससे मनुष्यों को इन कार्यों की उन्नति करनी चाहिये॥५॥

ते त्वा॒ मदा॑ अमद॒न्तानि॒ वृष्ण्या॒ ते सोमा॑सो वृत्र॒हत्ये॑षु सत्पते। यत्का॒रवे॒ दश॑ वृ॒त्राण्य॑प्र॒ति ब॒र्हिष्म॑ते॒ नि स॒हस्रा॑णि ब॒र्हयः॑॥

सब मनुष्यों को चाहिये कि सत्पुरुषों के संग से अनेक साधनों को प्राप्त कर आनन्द भोगें॥६॥

यु॒धा युध॒मुप॒ घेदे॑षि धृष्णु॒या पु॒रा पुरं॒ समि॒दं हं॒स्योज॑सा। नम्या॒ यदि॑न्द्र॒ सख्या॑ परा॒वति॑ निब॒र्हयो॒ नमु॑चिं॒ नाम॑ मा॒यिन॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि बहुत उत्तम-उत्तम मित्रों को प्राप्त, दुष्ट शत्रुओं का निवारण, दुष्ट दल वा शत्रुओं के पुरों को विदारण, सब अन्यायकारी मनुष्यों को निरन्तर कैदघर में बाँध, ताड़ना दे और धर्मयुक्त चक्रवर्त्ति राज्य को पालन करके उत्तम ऐश्वर्य को सिद्ध करें॥७॥

त्वं कर॑ञ्जमु॒त प॒र्णयं॑ वधी॒स्तेजि॑ष्ठयातिथि॒ग्वस्य॑ वर्त॒नी। त्वं श॒ता वङ्गृ॑दस्याभिन॒त्पुरो॑ऽनानु॒दः परि॑षूता ऋ॒जिश्व॑ना॥

राजमनुष्यों को दुष्ट शत्रुओं के छेदन से पूर्ण विद्यायुक्त परोपकारी धार्मिक अतिथियों के सत्कार के लिये सब प्राणी वा सब पदार्थों की रक्षा करके धर्मयुक्त राज्य का सेवन करना चाहिये, जैसे कि कुत्ते अपनी स्वामी की रक्षा करते हैं, वैसी अन्य जन्तु रक्षा नहीं कर सकते, इससे इन कुत्तों को सिखा कर और इनकी रक्षा करनी चाहिये॥८॥

त्वमे॒ताञ्ज॑न॒राज्ञो॒ द्विर्दशा॑ब॒न्धुना॑ सु॒श्रव॑सोपज॒ग्मुषः॑। ष॒ष्टिं स॒हस्रा॑ नव॒तिं नव॑ श्रु॒तो नि च॒क्रेण॒ रथ्या॑ दु॒ष्पदा॑वृणक्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। चक्रवर्त्ति राजा को माण्डलिक वा महामाण्डलिक राजा भृत्य गृहस्थ वा विरक्तों को प्रसन्न और शरणागत आये हुए मनुष्य की रक्षा करके धर्मयुक्त सार्वभौम राज्य का यथावत् पालन करना चाहिये और दश आदि सब संख्यावाची शब्द उपलक्षण के लिये हैं, इससे राजपुरुषों को योग्य है कि सब की यथावत् रक्षा वा दुष्टों को दण्ड देवे॥९॥

त्वमा॑विथ सु॒श्रव॑सं॒ तवो॒तिभि॒स्तव॒ त्राम॑भिरिन्द्र॒ तूर्व॑याणम्। त्वम॑स्मै॒ कुत्स॑मतिथि॒ग्वमा॒युं म॒हे राज्ञे॒ यूने॑ अरन्धनायः॥

राजपुरुषों को योग्य है कि शत्रुओं को निवारण कर सब की रक्षा करके सर्वथा उनको सुखयुक्त करें तथा ये निश्चय करके राजोन्नतिरूपी लक्ष्मी से सदा युक्त रहें और विद्याशाला के अध्यक्ष उत्तम शिक्षा से सब शस्त्रास्त्रविद्या में कुशल निपुण विद्वानों को सम्पन्न करके इन से प्रजा की निरन्तर रक्षा करें॥१०॥

य उ॒दृची॑न्द्र दे॒वगो॑पाः॒ सखा॑यस्ते शि॒वत॑मा॒ असा॑म। त्वां स्तो॑षाम॒ त्वया॑ सु॒वीरा॒ द्राघी॑य॒ आयुः॑ प्रत॒रं दधा॑नाः॥

सब मनुष्यों को परस्पर निश्चित मैत्री, सब स्त्री पुरुषों को उत्तम विद्या युक्त जितेन्द्रियपन आदि गुणों को ग्रहण कर और कराके पूर्ण आयु का भोग करना चाहिये॥११॥इस सूक्त में विद्वान् सभाध्यक्ष तथा प्रजा के पुरुषों को परस्पर प्रीति से वर्त्तमान रहकर सुख को प्राप्त करना कहा है। इससे सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥

मा नो॑ अ॒स्मिन्म॑घवन्पृ॒त्स्वंह॑सि न॒हि ते॒ अन्तः॒ शव॑सः परी॒णशे॑। अक्र॑न्दयो न॒द्यो॒३॒॑ रोरु॑व॒द्वना॑ क॒था न क्षो॒णीर्भि॒यसा॒ समा॑रत॥

मनुष्यों को चाहिये कि जो परमेश्वर अनन्त होने से सत्य प्रेम के साथ उसकी उपासना किया हुआ दुःख उत्पन्न करनेवाले अधर्ममार्ग से निवृत्त कर मनुष्यों को सुखी करता है, उसके अनन्त स्वरूप गुण होने से कोई भी अन्त को ग्रहण नहीं कर सकता। इस से उस ईश्वर की उपासना को छोड़ के कौन अभागी पुरुष दूसरे की उपासना करे॥१॥

अर्चा॑ श॒क्राय॑ शा॒किने॒ शची॑वते शृ॒ण्वन्त॒मिन्द्रं॑ म॒हय॑न्न॒भि ष्टु॑हि। यो धृ॒ष्णुना॒ शव॑सा॒ रोद॑सी उ॒भे वृषा॑ वृष॒त्वा वृ॑ष॒भो न्यृ॒ञ्जते॑॥

जो गुणों की अधिकता होने से सार्वभौम सभाध्यक्ष धर्म से सबको शिक्षा देकर धर्म के नियमों में स्थापन करता है, उसी का सब मनुष्यों को सेवन वा आश्रय करना चाहिये॥२॥

अर्चा॑ दि॒वे बृ॑ह॒ते शू॒ष्यं१॒॑ वचः॒ स्वक्ष॑त्रं॒ यस्य॑ धृष॒तो धृ॒षन्मनः॑। बृ॒हच्छ्र॑वा॒ असु॑रो ब॒र्हणा॑ कृ॒तः पु॒रो हरि॑भ्यां वृष॒भो रथो॒ हि षः॥

मनुष्यों को चाहिये कि ईश्वर को इष्ट, सभाध्यक्ष से शासित, एक मनुष्य के प्रशासन से अलग राज्य को सम्पादन करें, जिससे कभी दुःख, अन्याय, आलस्य, अज्ञान और शत्रुओं के परस्पर विरोध से प्रजा पीड़ित न होवे॥३॥

त्वं दि॒वो बृ॑ह॒तः सानु॑ कोप॒योऽव॒ त्मना॑ धृष॒ता शम्ब॑रं भिनत्। यन्मा॒यिनो॑ व्र॒न्दिनो॑ म॒न्दिना॑ धृ॒षच्छि॒तां गभ॑स्तिम॒शनिं॑ पृत॒न्यसि॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जगदीश्वर पापकर्म करनेवाले मनुष्यों के लिये अपने-अपने पाप के अनुसार दुःख के फलों को देकर यथायोग्य पीड़ा देता है, इसी प्रकार सभाध्यक्ष को चाहिये कि शस्त्रों और अस्त्रों की शिक्षा से धार्मिक शूरवीर पुरुषों की सेना को सिद्ध और दुष्ट कर्म करनेवाले मनुष्यों का निवारण करके धर्मयुक्त प्रजा का निरन्तर पालन करे॥४॥

नि यद्वृ॒णक्षि॑ श्वस॒नस्य॑ मू॒र्धनि॒ शुष्ण॑स्य चिद्व्र॒न्दिनो॒ रोरु॑व॒द्वना॑। प्रा॒चीने॑न॒ मन॑सा ब॒र्हणा॑वता॒ यद॒द्या चि॑त्कृ॒णवः॒ कस्त्वा॒ परि॑॥

इस मन्त्र में वाचकलु्प्तोपमालङ्कार है। जैसे परमेश्वर अपने अनादि विज्ञान युक्त न्याय से सबको शिक्षा देता और सूर्य मेघ को काट-काट कर गिराता है, वैसे ही सभापति आदि धर्म से सब की शिक्षा देवें और शत्रुओं को नष्ट-भ्रष्ट करें॥५॥

त्वमा॑विथ॒ नर्यं॑ तु॒र्वशं॒ यदुं॒ त्वं तु॒र्वीतिं॑ व॒य्यं॑ शतक्रतो। त्वं रथ॒मेत॑शं॒ कृत्व्ये॒ धने॒ त्वं पुरो॑ नव॒तिं द॑म्भयो॒ नव॑॥

मनुष्यों को योग्य है कि जो राज्य की रक्षा करने में समर्थ न होवे, उस को राजा कभी न बनावें॥६॥

स घा॒ राजा॒ सत्प॑तिः शूशुव॒ज्जनो॑ रा॒तह॑व्यः॒ प्रति॒ यः शास॒मिन्व॑ति। उ॒क्था वा॒ यो अ॑भिगृ॒णाति॒ राध॑सा॒ दानु॑रस्मा॒ उप॑रा पिन्वते दि॒वः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। कोई भी मनुष्य उत्तम विद्या, विनय, न्याय और वीरपुरुषों की सेना के ग्रहण वा अनुष्ठान के विना राज्य के लिये शिक्षा करने, शत्रुओं को जीतने और सब सुखों को प्राप्त होने को समर्थ नहीं हो सकता, इसलिये सभाध्यक्ष को अवश्य इन बातों का अनुष्ठान करना चाहिये॥७॥

अस॑मं क्ष॒त्रमस॑मा मनी॒षा प्र सो॑म॒पा अप॑सा सन्तु॒ नेमे॑। ये त॑ इन्द्र द॒दुषो॑ व॒र्धय॑न्ति॒ महि॑ क्ष॒त्रं स्थवि॑रं॒ वृष्ण्यं॑ च॥

राजपुरुषों को प्रजा से और प्रजा में रहनेवाले पुरुषों को राजपुरुषों से विरोध कभी न करना चाहिये, किन्तु परस्पर प्रीति वा उपकार बुद्धि के साथ सब राज्य सुखों से बढ़ाना चाहिये, क्योंकि इस प्रकार किये विना राज्यपालन की व्यवस्था निश्चल नहीं हो सकती॥८॥

तुभ्येदे॒ते ब॑हु॒ला अद्रि॑दुग्धाश्चमू॒षद॑श्चम॒सा इ॑न्द्र॒पानाः॑। व्य॑श्नुहि त॒र्पया॒ काम॑मेषा॒मथा॒ मनो॑ वसु॒देया॑य कृष्व॥

सभा आदि के अध्यक्ष उत्तम शिक्षा वा पालन से उत्पादन किये हुए शूरवीरों और प्रजा की निरन्तर पालना करके इनके लिये सब सुखों को देवें और वे प्रजा के पुरुष भी सभाध्यक्षादिकों को निरन्तर सन्तुष्ट रक्खें, जिससे सब कामना पूर्ण होवें॥९॥

अ॒पाम॑तिष्ठद्ध॒रुण॑ह्वरं॒ तमो॒ऽन्तर्वृ॒त्रस्य॑ ज॒ठरे॑षु॒ पर्व॑तः। अ॒भीमिन्द्रो॑ न॒द्यो॑ व॒व्रिणा॑ हि॒ता विश्वा॑ अनु॒ष्ठाः प्र॑व॒णेषु॑ जिघ्नते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य जिस जल को आकर्षण कर अन्तरिक्ष में पहुँचाता और उसको वायु धारण करता है, जब वह जल मिल तथा पर्वताकार होकर सूर्य के प्रकाश का आवरण करता है, उसको बिजुली छेदन करके भूमि में गिरा देती है, उससे उत्पन्न हुई नानारूपयुक्त नीचे चलनेवाली चलती हुई नदियाँ पृथिवी, पर्वत और वृक्षादिकों को छिन्न-भिन्न कर फिर वह जल समुद्र वा अन्तरिक्ष को प्राप्त होकर वार-वार इसी प्रकार वर्षता है, वैसे सभाध्यक्षादिकों को होना चाहिये॥१०॥

स शेवृ॑ध॒मधि॑ धा द्यु॒म्नम॒स्मे महि॑ क्ष॒त्रं ज॑ना॒षाळि॑न्द्र॒ तव्य॑म्। रक्षा॑ च नो म॒घोनः॑ पा॒हि सू॒रीन्रा॒ये च॑ नः स्वप॒त्या इ॒षे धाः॑॥

सभाध्यक्ष को योग्य है कि सब प्रजा की अच्छे प्रकार रक्षा करके और शिक्षा से युक्त विद्वान् करके चक्रवर्त्ती राज्य वा धन की उन्नति करे॥११॥इस सूक्त में सूर्य्य, बिजुली, सभाध्यक्ष, शूरवीर और राज्य की पालना आदि का विधान किया है, इससे इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥

दि॒वश्चि॑दस्य वरि॒मा वि प॑प्रथ॒ इन्द्रं॒ न म॒ह्ना पृ॑थि॒वी च॒न प्रति॑। भी॒मस्तुवि॑ष्माञ्चर्ष॒णिभ्य॑ आत॒पः शिशी॑ते॒ वज्रं॒ तेज॑से॒ न वंस॑गः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्यमण्डल सब लोकों से उत्कृष्ट गुणयुक्त और बड़ा है और जैसे बैल गोसमूहों में उत्तम और महाबलवान् होता है, वैसे ही उत्कृष्ट गुणयुक्त सब से बड़े मनुष्य को सब मनुष्यों को सभा आदि का पति करना चाहिये और वे सभाध्यक्षादि दुष्टों को भय देने और धार्मिकों के लिये आप भी धर्मात्मा हो के सुख देनेवाले सदा होवें॥१॥

सो अ॑र्ण॒वो न न॒द्यः॑ समु॒द्रियः॒ प्रति॑ गृभ्णाति॒ विश्रि॑ता॒ वरी॑मभिः। इन्द्रः॒ सोम॑स्य पी॒तये॑ वृषायते स॒नात्स यु॒ध्म ओज॑सा पनस्यते॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे समुद्र नाना प्रकार के रत्न और नाना प्रकार की नदियों को अपनी महिमा से अपने में रक्षा करता है, वैसे ही सभाध्यक्ष आदि भी अनेक प्रकार के पदार्थ और अनेक प्रकार की सेनाओं को स्वीकार कर दुष्टों को जीत और श्रेष्ठों की रक्षा करके अपनी महिमा फैलावें॥२॥

त्वं तमि॑न्द्र॒ पर्व॑तं॒ न भोज॑से म॒हो नृ॒म्णस्य॒ धर्म॑णामिरज्यसि। प्र वी॒र्ये॑ण दे॒वताऽति॑ चेकिते॒ विश्व॑स्मा उ॒ग्रः कर्म॑णे पु॒रोहि॑तः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य प्रवृत्ति का आश्रय और धन को सम्पादन करके भोगों को प्राप्त करते हैं, वे सभाध्यक्ष के सहित विद्या, बुद्धि, विनय और धर्मयुक्त वीरपुरुषों की सेना को प्राप्त होकर दुष्ट जनों के विषय में तेजधारी और धर्मात्माओं में क्षमायुक्त हों, वे ही सबके हितकारक होते हैं॥३॥

स इद्वने॑ नम॒स्युभि॑र्वचस्यते॒ चारु॒ जने॑षु प्रब्रुवा॒ण इ॑न्द्रि॒यम्। वृषा॒ छन्दु॑र्भवति हर्य॒तो वृषा॒ क्षेमे॑ण॒ धेनां॑ म॒घवा॒ यदिन्व॑ति॥

उत्तम विद्वान् सभाध्यक्ष सब मनुष्यों के लिये सब विद्याओं को प्राप्त करके सबको विद्यायुक्त, बहुश्रुत, रक्षा वा स्वच्छन्दतायुक्त करें कि जिससे सब निस्सन्देह होकर सदा सुखी रहें॥४॥

स इन्म॒हानि॑ समि॒थानि॑ म॒ज्मना॑ कृ॒णोति॑ यु॒ध्म ओज॑सा॒ जने॑भ्यः। अधा॑ च॒न श्रद्द॑धति॒ त्विषी॑मत॒ इन्द्रा॑य॒ वज्रं॑ नि॒घनि॑घ्नते व॒धम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य मेघ को उत्पन्न, काट और वर्षा करके अपने प्रकाश से सब मनुष्यों को आनन्दयुक्त करता है, वैसे ही अध्यापक और उपदेशक लोग विद्या को प्राप्त करा और अविद्या को जीत के अन्धपरम्परा को निवारण कर विद्यान्यायादि का प्रकाश करके सब प्रजा को सुखी करें॥५॥

स हि श्र॑व॒स्युः सद॑नानि कृ॒त्रिमा॑ क्ष्म॒या वृ॑धा॒न ओज॑सा विना॒शय॑न्। ज्योतीं॑षि कृ॒ण्वन्न॑वृ॒काणि॒ यज्य॒वेऽव॑ सु॒क्रतुः॒ सर्त॒वा अ॒पः सृ॑जत्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सब मनुष्य जो सूर्य्य के सदृश विद्या, धर्म और राजनीति का प्रचारकर्त्ता हो के सब मनुष्यों को उत्तम बोधयुक्त करता है, वह मनुष्यादि प्राणियों का कल्याणकारी है, ऐसा निश्चित जानें॥६॥

दा॒नाय॒ मनः॑ सोमपावन्नस्तु ते॒ऽर्वाञ्चा॒ हरी॑ वन्दनश्रु॒दा कृ॑धि। यमि॑ष्ठासः॒ सार॑थयो॒ य इ॑न्द्र ते॒ न त्वा॒ केता॒ आ द॑भ्नुवन्ति॒ भूर्ण॑यः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे उत्तम सारथि लोग घोड़े को अच्छे प्रकार शिक्षा करके नियम में चलाते हैं और जैसे तिरछा चलनेवाला वायु नियन्ता है, वैसे धार्मिक पढ़ाने और उपदेश करनेहारे विद्वान् लोग सत्य विद्या और सत्य उपदेशों से सबको सत्याचार में निश्चित करें, इन दोनों के विना मनुष्यों को धर्मात्मा करने के वास्ते कोई भी समर्थ नहीं हो सकता॥७॥

अप्र॑क्षितं॒ वसु॑ बिभर्षि॒ हस्त॑यो॒रषा॑ळ्हं॒ सह॑स्त॒न्वि॑ श्रु॒तो द॑धे। आवृ॑तासोऽव॒तासो॒ न क॒र्तृभि॑स्त॒नूषु॑ ते॒ क्रत॑व इन्द्र॒ भूर॑यः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सभाध्यक्ष वा सभासद् विद्वान् लोग क्षयरहित विज्ञान, बल, धन, श्रवण और बहुत उत्तम कर्मों को धारण करते हैं, वैसे ही इन सब कामों को सब प्रजा के मनुष्यों को धारण करना चाहिये॥८॥। इस सूक्त में सूर्य्य, प्रजा और सभाध्यक्ष के कृत्य का वर्णन किया है, इसी से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जानना चाहिये॥

ए॒ष प्र पू॒र्वीरव॒ तस्य॑ च॒म्रिषोऽत्यो॒ न योषा॒मुद॑यंस्त भु॒र्वणिः॑। दक्षं॑ म॒हे पा॑ययते हिर॒ण्ययं॒ रथ॑मा॒वृत्या॒ हरि॑योग॒मृभ्व॑सम्॥

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। उपदेशक अपने तुल्य विदुषी स्त्री के साथ विवाह करके जैसे आप पुरुषों को उपदेश और बालकों को पढ़ावे, वैसे उसकी स्त्री स्त्रियों को उपदेश और कन्याओं को पढ़ावें, ऐसे करने से किसी ओर से अविद्या और भय से दुःख नहीं हो सकता॥१॥

तं गू॒र्तयो॑ नेम॒न्निषः॒ परी॑णसः समु॒द्रं न सं॒चर॑णे सनि॒ष्यवः॑। पतिं॒ दक्ष॑स्य वि॒दथ॑स्य॒ नू सहो॑ गि॒रिं न वे॒ना अधि॑ रोह॒ तेज॑सा॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। सब लड़के और लड़कियों को योग्य है कि यथोक्त ब्रह्मचर्य्य के सेवन से सम्पूर्ण विद्याओं को पढ़ के पूर्ण युवावस्था में अपने तुल्य, गुण कर्म और स्वभाववाले परस्पर परीक्षा करके अतीव प्रेम के साथ विवाह कर पुनः जो पूर्ण विद्यावाले हों तो लड़के लड़कियों को पढ़ाया करें, जो क्षत्रिय हों तो राजपालन और न्याय किया करें, जो वैश्य हों तो अपने वर्ण के कर्म और जो शूद्र हों तो अपने कर्म किया करें॥२॥

स तु॒र्वणि॑र्म॒हाँ अ॑रे॒णु पौंस्ये॑ गि॒रेर्भृ॒ष्टिर्न भ्रा॑जते तु॒जा शवः॑। येन॒ शुष्णं॑ मा॒यिन॑माय॒सो मदे॑ दु॒ध्र आ॒भूषु॑ रा॒मय॒न्नि दाम॑नि॥

इस मन्त्र में उपमा वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। अति उत्तम विवाह वह है, जिसमें तुल्य रूप स्वभाव युक्त कन्या और वर का सम्बन्ध होवे, परन्तु कन्या से वर का बल और आयु दूना वा ड्योढ़ा होना चाहिये॥३॥

दे॒वी यदि॒ तवि॑षी॒ त्वावृ॑धो॒तय॒ इन्द्रं॒ सिष॑क्त्यु॒षसं॒ न सूर्यः॑। यो धृ॒ष्णुना॒ शव॑सा॒ बाध॑ते॒ तम॒ इय॑र्ति रे॒णुं बृ॒हद॑र्हरि॒ष्वणिः॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जब स्त्री से प्रसन्न पुरुष और पुरुष से प्रसन्न स्त्री होवे, तभी गृहाश्रम में निरन्तर आनन्द होवे॥४॥

वि यत्ति॒रो ध॒रुण॒मच्यु॑तं॒ रजोऽति॑ष्ठिपो दि॒व आता॑सु ब॒र्हणा॑। स्व॑र्मीळ्हे॒ यन्मद॑ इन्द्र॒ हर्ष्याह॑न्वृ॒त्रं निर॒पामौ॑ब्जो अर्ण॒वम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्यलोक अपने प्रकाश और आकर्षणादि गुणों से सब लोकों को अपनी-अपनी कक्षा में भ्रमण कराता, सब दिशाओं में अपना तेज वा रस को विस्तार और वर्षा को उत्पन्न करता हुआ प्रजा के पालन का हेतु होता है, वैसे स्त्री-पुरुषों को भी वर्त्तना चाहिये॥५॥

त्वं दि॒वो ध॒रुणं॑ धिष॒ ओज॑सा पृथि॒व्या इ॑न्द्र॒ सद॑नेषु॒ माहि॑नः। त्वं सु॒तस्य॒ मदे॑ अरिणा अ॒पो वि वृ॒त्रस्य॑ स॒मया॑ पा॒ष्या॑रुजः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वान् सूर्य्य के समान राज्य को सुप्रकाशित कर शत्रुओं का निवारण करके प्रजा का पालन करते हैं, वैसा ही हम सब लोगों को भी अनुष्ठान करना चाहिये॥६॥इस सूक्त में सूर्य्य वा विद्वान् के गुणवर्णन से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥

प्र मंहि॑ष्ठाय बृह॒ते बृ॒हद्र॑ये स॒त्यशु॑ष्माय त॒वसे॑ म॒तिं भ॑रे। अ॒पामि॑व प्रव॒णे यस्य॑ दु॒र्धरं॒ राधो॑ वि॒श्वायु॒ शव॑से॒ अपा॑वृतम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे जल ऊँचे देश से आकर नीचे देश अर्थात् जलाशय को प्राप्त होके स्वच्छ, स्थिर होता है, वैसे नम्र, बलवान् पुरुषार्थी, धार्मिक, विद्वान् मनुष्य को प्राप्त हुआ विद्यारूप धन निश्चल होता है। जो राज्यलक्ष्मी को प्राप्त हो के सबके हित, न्याय वा विद्या की वृद्धि तथा शरीर, आत्मा के बल की उन्नति के लिये देता है, उसी शूरवीर, विद्यादि देनेवाले सभाशाला सेनापति मनुष्य का हम लोग अभिषेक करें॥१॥

अध॑ ते॒ विश्व॒मनु॑ हासदि॒ष्टय॒ आपो॑ नि॒म्नेव॒ सव॑ना ह॒विष्म॑तः। यत्पर्व॑ते॒ न स॒मशी॑त हर्य॒त इन्द्र॑स्य॒ वज्रः॒ श्नथि॑ता हिर॒ण्ययः॑॥

इस मन्त्र में श्लेष और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे पर्वत वा मेघ का समाश्रय कर सिंह आदि वा जल रक्षा को प्राप्त होकर स्थित होते हैं, जैसे नीचे स्थानों में रहनेवाला जलसमूह सुख देनेवाला होता है, वैसे ही सभाध्यक्ष के आश्रय से प्रजा की रक्षा तथा बिजुली की विद्या से शिल्पविद्या की सिद्धि को प्राप्त होकर सब प्राणी सुखी होवें॥२॥

अ॒स्मै भी॒माय॒ नम॑सा॒ सम॑ध्व॒र उषो॒ न शु॑भ्र॒ आ भ॑रा॒ पनी॑यसे। यस्य॒ धाम॒ श्रव॑से॒ नामे॑न्द्रि॒यं ज्योति॒रका॑रि ह॒रितो॒ नाय॑से॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को समुचित है कि जैसे प्रातःकाल सब अन्धकार का निवारण और सबको प्रकाश से आनन्दित करता है, वैसे ही शत्रुओं को भय करनेवाले मनुष्य को गुणों की अधिकता से स्तुति, सत्कार वा संग्रामादि व्यवहारों में स्थापन करें। जैसे दिशा व्यवहार की जाननेहारी होती है, वैसे ही जो विद्या उत्तम शिक्षा, सेना, विनय, न्यायादि से सबको सुभूषित धन अन्न आदि से संयुक्त कर सुखी करे, उसी को सभा आदि अधिकारों में सब मनुष्यों को अधिकार देवें॥३॥

इ॒मे त॑ इन्द्र॒ ते व॒यं पु॑रुष्टुत॒ ये त्वा॒रभ्य॒ चरा॑मसि प्रभूवसो। न॒हि त्वद॒न्यो गि॑र्वणो॒ गिरः॒ सघ॑त्क्षो॒णीरि॑व॒ प्रति॑ नो हर्य॒ तद्वचः॑॥

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। जैसे शूरवीर शत्रुओं के बलों को निवारण और राज्य को प्राप्त कर सुखों को भोगते हैं, वैसे ही हे जगदीश्वर! हम लोग अद्वितीय आप का आश्रय करके सब प्रकार विजयवाले होकर विद्या की वृद्धि को कराते हुए सुखी होते हैं॥४॥

भूरि॑ त इन्द्र वी॒र्यं१॒॑ तव॑ स्मस्य॒स्य स्तो॒तुर्म॑घव॒न्काम॒मा पृ॑ण। अनु॑ ते॒ द्यौर्बृ॑ह॒ती वी॒र्यं॑ मम इ॒यं च॑ ते पृथि॒वी ने॑म॒ ओज॑से॥

मनुष्यों को योग्य है कि ईश्वर का आश्रय करके सब कामनाओं की सिद्धि वा पृथिवी के राज्य की प्राप्ति करके निरन्तर सुखी रहें॥५॥

त्वं तमि॑न्द्र॒ पर्व॑तं म॒हामु॒रुं वज्रे॑ण वज्रिन्पर्व॒शश्च॑कर्तिथ। अवा॑सृजो॒ निवृ॑ताः॒ सर्त॒वा अ॒पः स॒त्रा विश्वं॑ दधिषे॒ केव॑लं॒ सहः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि जो शत्रुओं के छेदन, प्रजा के पालन में तत्पर, बल और विद्या से युक्त है, उसी को सभा आदि का रक्षक अधिष्ठाता स्वामी बनावें॥६॥इस सूक्त में अग्नि और सभाध्यक्ष आदि के गुणों के वर्णन से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥

सूक्तम्

नू चि॑त्सहो॒जा अ॒मृतो॒ नि तु॑न्दते॒ होता॒ यद्दू॒तो अभ॑वद्वि॒वस्व॑तः। वि साधि॑ष्ठेभिः प॒थिभी॒ रजो॑ मम॒ आ दे॒वता॑ता ह॒विषा॑ विवासति॥

हे मनुष्य लोगो! तुम अनादि अर्थात् उत्पत्तिरहित, सत्यस्वरूप, ज्ञानमय, आनन्दस्वरूप, सर्वशक्तिमान्, स्वप्रकाश, सबको धारण और सबके उत्पादक, देश-काल और वस्तुओं के परिच्छेद से रहित और सर्वत्र व्यापक परमेश्वर में नित्य व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध से जो अनादि, नित्य, चेतन, अल्प, एकदेशस्थ और अल्पज्ञ है, वही जीव है, ऐसा निश्चित जानो॥१॥

आ स्वमद्म॑ यु॒वमा॑नो अ॒जर॑स्तृ॒ष्व॑वि॒ष्यन्न॑त॒सेषु॑ तिष्ठति। अत्यो॒ न पृ॒ष्ठं प्रु॑षि॒तस्य॑ रोचते दि॒वो न सानु॑ स्त॒नय॑न्नचिक्रदत्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो पूर्ण ईश्वर ने धारण किया, आकाशादि तत्त्वों में प्रयत्नकर्त्ता, सब बुद्धि आदि का प्रकाशक, ईश्वर के न्याय-नियम से अपने किये शुभाशुभ कर्म के सुखदुःखरूप फल को भोगता है, सो इस शरीर में स्वतन्त्रकर्ता भोक्ता जीव है, ऐसा सब मनुष्य जानें॥२॥

क्रा॒णा रु॒द्रेभि॒र्वसु॑भिः पु॒रोहि॑तो॒ होता॒ निष॑त्तो रयि॒षाळम॑र्त्यः। रथो॒ न वि॒क्ष्वृ॑ञ्जसा॒न आ॒युषु॒ व्या॑नु॒षग्वार्या॑ दे॒व ऋ॑ण्वति॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो पृथिवी में प्राणों के साथ चेष्टा, मन के अनुकूल, रथ के समान शरीर के साथ क्रीड़ा, श्रेष्ठ वस्तु और सुख की इच्छा करते हैं, वे ही जीव हैं, ऐसा सब लोग जानें॥३॥

वि वात॑जूतो अत॒सेषु॑ तिष्ठते॒ वृथा॑ जु॒हूभिः॒ सृण्या॑ तुवि॒ष्वणिः॑। तृ॒षु यद॑ग्ने व॒निनो॑ वृषा॒यसे॑ कृ॒ष्णं त॒ एम॒ रुश॑दूर्मे अजर॥

सब मनुष्यों को ईश्वर उपदेश करता है कि जैसा मैंने जीव के स्वभाव का उपदेश किया है, वही तुम्हारा स्वरूप है, यह निश्चित जानो॥४॥

तपु॑र्जम्भो॒ वन॒ आ वात॑चोदितो यू॒थे न सा॒ह्वाँ अव॑ वाति॒ वंस॑गः। अ॒भि॒व्रज॒न्नक्षि॑तं॒ पाज॑सा॒ रजः॑ स्था॒तुश्च॒रथं॑ भयते पत॒त्रिणः॑॥

मनुष्यों को योग्य है कि जो अन्तःकरण अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त और अहङ्कार, प्राण अर्थात् प्राणादि दशवायु इन्द्रिय अर्थात् श्रोत्रादि दश इन्द्रियों का प्रेरक, इन का धारक और नियन्ता, स्वामी, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख और ज्ञान आदि गुणवाला है, वह इस देह में जीव है, ऐसा निश्चित जानो॥५॥

द॒धुष्ट्वा॒ भृग॑वो॒ मानु॑षे॒ष्वा र॒यिं न चारुं॑ सु॒हवं॒ जने॑भ्यः। होता॑रमग्ने॒ अति॑थिं॒ वरे॑ण्यं मि॒त्रं न शेवं॑ दि॒व्याय॒ जन्म॑ने॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे मनुष्य विद्या वा लक्ष्मी तथा मित्रों को प्राप्त होकर सुखों को प्राप्त होते हैं, वैसे ही जीव के स्वरूप को जाननेवाले विद्वान् लोग अत्यन्त सुखों को प्राप्त होते हैं॥

होता॑रं स॒प्त जु॒ह्वो॒३॒॑ यजि॑ष्ठं॒ यं वा॒घतो॑ वृ॒णते॑ अध्व॒रेषु॑। अ॒ग्निं विश्वे॑षामर॒तिं वसू॑नां सप॒र्यामि॒ प्रय॑सा॒ यामि॒ रत्न॑म्॥

जो मनुष्य अपने आत्मा को जान के परब्रह्म को जानते हैं, वे ही मोक्ष पाते हैं॥७॥

अच्छि॑द्रा सूनो सहसो नो अ॒द्य स्तो॒तृभ्यो॑ मित्रमहः॒ शर्म॑ यच्छ। अग्ने॑ गृ॒णन्त॒मंह॑स उरु॒ष्योर्जो॑ नपात्पू॒र्भिराय॑सीभिः॥

हे आत्मा और परमात्मा को जाननेवाले योगी लोगो! तुम आत्मा और परमात्मा के उपदेश से सब मनुष्यों को दुःख से दूर करके निरन्तर सुखी किया करो॥८॥

भवा॒ वरू॑थं गृण॒ते वि॑भावो॒ भवा॑ मघवन्म॒घव॑द्भ्यः॒ शर्म॑। उ॒रु॒ष्याग्ने॒ अंह॑सो गृ॒णन्तं॑ प्रा॒तर्म॒क्षू धि॒याव॑सुर्जगम्यात्॥

मनुष्यों को योग्य है कि जो विद्वान् धर्म वा विनय से सब प्रजा को शिक्षा देकर पालना करता है, उसी को सभा आदि का अध्यक्ष करें॥९॥इस सूक्त में अग्नि वा विद्वानों के गुण वर्णन करने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥

व॒या इद॑ग्ने अ॒ग्नय॑स्ते अ॒न्ये त्वे विश्वे॑ अ॒मृता॑ मादयन्ते। वैश्वा॑नर॒ नाभि॑रसि क्षिती॒नां स्थूणे॑व॒ जनाँ॑ उप॒मिद्य॑यन्थ॥

जैसे वृक्ष अपनी शाखा और खंभे गृहों को धारण करके आनन्दित करते हैं, वैसे ही परमेश्वर सबको धारण करके आनन्द देता है॥१॥

मू॒र्धा दि॒वो नाभि॑र॒ग्निः पृ॑थि॒व्या अथा॑भवदर॒ती रोद॑स्योः। तं त्वा॑ दे॒वासो॑ऽजनयन्त दे॒वं वैश्वा॑नर॒ ज्योति॒रिदार्या॑य॥

जिस जगदीश्वर ने आर्य अर्थात् उत्तम मनुष्यों के विज्ञान के लिये सब विद्याओं के प्रकाश करनेवाले वेदों को प्रकाशित किया है तथा जो सब से उत्तम सब का आधार जगदीश्वर है, उस को जानकर मनुष्यों को उसी की उपासना करनी चाहिये॥२॥

आ सूर्ये॒ न र॒श्मयो॑ ध्रु॒वासो॑ वैश्वान॒रे द॑धिरे॒ऽग्ना वसू॑नि। या पर्व॑ते॒ष्वोष॑धीष्व॒प्सु या मानु॑षे॒ष्वसि॒ तस्य॒ राजा॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। तथा पूर्व मन्त्र से (देवासः) इस पद की अनुवृत्ति आती है। मनुष्यों को योग्य है कि जैसे प्राणी लोग प्रकाशमान सूर्य के विद्यमान होने में सब कार्यों को सिद्ध करते हैं, वैसे मनुष्यों को उपासना किये हुए जगदीश्वर में सब कार्यों को सिद्ध करना चाहिये। इसी प्रकार करते हुए मनुष्यों को कभी सुख और धन का नाश होकर दुःख वा दरिद्रता उत्पन्न नहीं होते॥३॥

बृ॒ह॒तीइ॑व सू॒नवे॒ रोद॑सी॒ गिरो॒ होता॑ मनु॒ष्यो॒३॒॑ न दक्षः॑। स्व॑र्वते स॒त्यशु॑ष्माय पू॒र्वीर्वै॑श्वान॒राय॒ नृत॑माय य॒ह्वीः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे भूमि वा सूर्यप्रकाश सबको धारण करके सुखी करते हैं, जैसे पिता वा अध्यापक पुत्र के हित के लिये प्रवृत्त होता है, जैसे परमेश्वर प्रजासुख के वास्ते वर्तता है, वैसे सभापति प्रजा के अर्थ वर्ते, इस प्रकार सब देववाणियाँ प्रतिपादन करती हैं॥४॥

दि॒वश्चि॑त्ते बृह॒तो जा॑तवेदो॒ वैश्वा॑नर॒ प्र रि॑रिचे महि॒त्वम्। राजा॑ कृष्टी॒नाम॑सि॒ मानु॑षीणां यु॒धा दे॒वेभ्यो॒ वरि॑वश्चकर्थ॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। सभा में रहनेवाले मनुष्यों को अनन्त सामर्थ्यवान् होने से, परमेश्वर की सबके अधिष्ठाता होने से उपासना वा महाशुभगुण युक्त होने से, सभा आदि के अध्यक्ष के अधीश का सेवन और युद्ध से दुष्टों को जीत के प्रजा का पालन करके विद्वानों की सेवा तथा सत्सङ्ग को सदा करना चाहिये॥५॥

प्र नू म॑हि॒त्वं वृ॑ष॒भस्य॑ वोचं॒ यं पू॒रवो॑ वृत्र॒हणं॒ सच॑न्ते। वै॒श्वा॒न॒रो दस्यु॑म॒ग्निर्ज॑घ॒न्वाँ अधू॑नो॒त्काष्ठा॒ अव॒ शम्ब॑रं भेत्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिस की महिमा को सब संसार प्रकाशित करता है, वही अनन्त शक्तिमान् परमेश्वर सबको उपासना के योग्य है॥६॥

वै॒श्वा॒न॒रो म॑हि॒म्ना वि॒श्वकृ॑ष्टिर्भ॒रद्वा॑जेषु यज॒तो वि॒भावा॑। शा॒त॒व॒ने॒ये श॒तिनी॑भिर॒ग्निः पु॑रुणी॒थे ज॑रते सू॒नृता॑वान्॥

जो असख्यात पदार्थों में असंख्यात क्रियाओं का हेतु बिजुलीरूप अग्नि के समान ईश्वर है, वही सब जगत् को धारण करता है, उसका पूजन जो मनुष्य करता है, वह सदा महिमा को प्राप्त होता है॥७॥इस सूक्त में वैश्वानर शब्दार्थ वर्णन से इसके अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥

वह्निं॑ य॒शसं॑ वि॒दथ॑स्य के॒तुं सु॑प्रा॒व्यं॑ दू॒तं स॒द्योअ॑र्थम्। द्वि॒जन्मा॑नं र॒यिमि॑व प्रश॒स्तं रा॒तिं भ॑र॒द्भृग॑वे मात॒रिश्वा॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे वायु बिजुली आदि वस्तु का धारण करके सब चराऽचर लोकों का धारण करता है, वैसे राजपुरुष विद्याधर्म धारणपूर्वक प्रजाओं को न्याय में रक्खें॥१॥

अ॒स्य शासु॑रु॒भया॑सः सचन्ते ह॒विष्म॑न्त उ॒शिजो॒ ये च॒ मर्ताः॑। दि॒वश्चि॒त्पूर्वो॒ न्य॑सादि॒ होता॒पृच्छ्यो॑ वि॒श्पति॑र्वि॒क्षु वे॒धाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि जो विद्वान् धर्मात्मा और न्यायाधीशों से प्रशंसा को प्राप्त हों, जिनके शील से सब प्रजा सन्तुष्ट हो, उनकी सेवा पिता के समान सब लोग करें॥२॥

तं नव्य॑सी हृ॒द आ जाय॑मानम॒स्मत्सु॑की॒र्तिर्मधु॑जिह्वमश्याः। यमृ॒त्विजो॑ वृ॒जने॒ मानु॑षासः॒ प्रय॑स्वन्त आ॒यवो॒ जीज॑नन्त॥

मनुष्यों को उचित है कि जो अधर्म को छुड़ा के धर्म का ग्रहण कराते हैं, उन का सब प्रकार से सन्मान किया करें॥३॥

उ॒शिक्पा॑व॒को वसु॒र्मानु॑षेषु॒ वरे॑ण्यो॒ होता॑धायि वि॒क्षु। दमू॑ना गृ॒हप॑ति॒र्दम॒ आँ अ॒ग्निर्भु॑वद्रयि॒पती॑ रयी॒णाम्॥

मनुष्यों को उचित है कि अधर्मी मूर्खजन को राज्य की रक्षा का अधिकार कदापि न देवें॥४॥

तं त्वा॑ व॒यं पति॑मग्ने रयी॒णां प्र शं॑सामो म॒तिभि॒र्गोत॑मासः। आ॒शुं न वा॑जंभ॒रं म॒र्जय॑न्तः प्रा॒तर्म॒क्षू धि॒याव॑सुर्जगम्यात्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे मनुष्य लोग उत्तम यान अर्थात् सवारियों में घोड़ों को जोड़ कर शीघ्र देशान्तर को जाते हैं, वैसे ही विद्वानों के सङ्ग से विद्या के पाराऽवार को प्राप्त होते हैं॥५॥इस सूक्त में शरीर और यान आदि में संयुक्त करने योग्य अग्नि के दृष्टान्त से विद्वानों के गुणवर्णन से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥

अ॒स्मा इदु॒ प्र त॒वसे॑ तु॒राय॒ प्रयो॒ न ह॑र्मि॒ स्तोमं॒ माहि॑नाय। ऋची॑षमा॒याध्रि॑गव॒ ओह॒मिन्द्रा॑य॒ ब्रह्मा॑णि रा॒तत॑मा॥

मनुष्यों को चाहिये कि स्तुति के योग्य पुरुषों को राज्य का अधिकार देकर, उनके लिये यथायोग्य हाथों से प्रयुक्त किये हुए धनों को देकर, उत्तम-उत्तम अन्नादिकों से सदा सत्कार करें और राजपुरुषों को भी चाहिये कि प्रजा के पुरुषों का सत्कार करें॥१॥

अ॒स्मा इदु॒ प्रय॑इव॒ प्र यं॑सि॒ भरा॑म्याङ्गू॒षं बाधे॑ सुवृ॒क्ति। इन्द्रा॑य हृ॒दा मन॑सा मनी॒षा प्र॒त्नाय॒ पत्ये॒ धियो॑ मर्जयन्त॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को उचित है कि पहिले परीक्षा किये पूर्ण विद्यायुक्त धार्मिक सबके उपकार करनेवाले प्राचीन पुरुष को सभा का अधिपति करें तथा इससे विरुद्ध मनुष्य को स्वीकार नहीं करें और सब मनुष्य उसके प्रिय आचरण करें॥२॥

अ॒स्मा इदु॒ त्यमु॑प॒मं स्व॒र्षां भरा॑म्याङ्गू॒षमा॒स्ये॑न। मंहि॑ष्ठ॒मच्छो॑क्तिभिर्मती॒नां सु॑वृ॒क्तिभिः॑ सू॒रिं वा॑वृ॒धध्यै॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्वानों से मनुष्यों के लिये सब से उत्तम उपमारहित यत्न किया जाता है, वैसे इन के सत्कार के वास्ते सब मनुष्य भी प्रयत्न किया करें॥३॥

अ॒स्मा इदु॒ स्तोमं॒ सं हि॑नोमि॒ रथं॒ न तष्टे॑व॒ तत्सि॑नाय। गिर॑श्च॒ गिर्वा॑हसे सुवृ॒क्तीन्द्रा॑य विश्वमि॒न्वं मेधि॑राय॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे रथ का बनानेवाला दृढ़ रथ के बनाने के वास्ते उत्तम बन्धनों के सहित यन्त्रकलाओं को अच्छे प्रकार रच कर अपने प्रयोजनों को सिद्ध करता और सुखपूर्वक जाना-आना करके आनन्दित होता है, वैसे ही मनुष्य विद्वान् का आश्रय लेकर उस के सम्बन्ध से धर्म्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध करके सदा आनन्द में रहें॥४॥

अ॒स्मा इदु॒ सप्ति॑मिव श्रव॒स्येन्द्रा॑या॒र्कं जु॒ह्वा॒३॒॑ सम॑ञ्जे। वी॒रं दा॒नौक॑सं व॒न्दध्यै॑ पु॒रां गू॒र्तश्र॑वसं द॒र्माण॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे मनुष्य लोग रथ में घोड़े को जोड़ उस के ऊपर स्थित होकर जाने-आने से कार्यों को सिद्ध करते हैं, वैसे वर्त्तमान विद्वान् वीर पुरुषों के सङ्ग से सब कार्यों को मनुष्य लोग सिद्ध करें॥५॥

अ॒स्मा इदु॒ त्वष्टा॑ तक्ष॒द्वज्रं॒ स्वप॑स्तमं स्व॒र्यं१॒॑ रणा॑य। वृ॒त्रस्य॑ चिद्वि॒दद्येन॒ मर्म॑ तु॒जन्नीशा॑नस्तुज॒ता कि॑ये॒धाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य अपने प्रताप से मेघ को छिन्न-भिन्न कर भूमि में जल को गिरा के सबको सुखी करता है, वैसे ही सभा आदि का अध्यक्ष विद्या, विनय वा शस्त्र-अस्त्रों के सीखने-सिखाने से युद्धों में कुशल सेना को सिद्ध कर, शत्रुओं को जीत कर, सब प्राणियों को आनन्दित किया करे॥६॥

अ॒स्येदु॑ मा॒तुः सव॑नेषु स॒द्यो म॒हः पि॒तुं प॑पि॒वाञ्चार्वन्ना॑। मु॒षा॒यद्विष्णुः॑ पच॒तं सही॑या॒न्विध्य॑द्वरा॒हं ति॒रो अद्रि॒मस्ता॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य अन्न-जल के रसों को चोर के समान हरता वा रक्षा करता हुआ, अपने किरणों से मेघ को हनन कर प्रकट करता हुआ, छिन्न-भिन्न कर अपने विजय को प्राप्त होता है, वैसे ही सेना आदि के अध्यक्ष के सेना आदि ऐश्वर्यों में स्थित हुए शूरवीर पुरुष शत्रुओं का पराजय करें॥७॥

अ॒स्मा इदु॒ ग्नाश्चि॑द्दे॒वप॑त्नी॒रिन्द्रा॑या॒र्कम॑हि॒हत्य॑ ऊवुः। परि॒ द्यावा॑पृथि॒वी ज॑भ्र उ॒र्वी नास्य॒ ते म॑हि॒मानं॒ परि॑ ष्टः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य के प्रताप और महत्त्व के आगे पृथिवी आदि लोकों की गणना स्वल्प है, वैसे ही पूर्ण विद्यावाले पुरुष के महिमा के आगे मूर्ख की गणना तुच्छ है॥८॥

अ॒स्येदे॒व प्र रि॑रिचे महि॒त्वं दि॒वस्पृ॑थि॒व्याः पर्य॒न्तरि॑क्षात्। स्व॒राळिन्द्रो॒ दम॒ आ वि॒श्वगू॑र्तः स्व॒रिरम॑त्रो ववक्षे॒ रणा॑य॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को जैसे सूर्य, पृथिव्यादिकों से गुण वा परिमाण के द्वारा अधिक है, वैसे ही उत्तम गुण युक्त सभा आदि के अधिपति राजा को अधिकार देकर सब कार्यों की सिद्धि करनी चाहिये॥९॥

अ॒स्येदे॒व शव॑सा शु॒षन्तं॒ वि वृ॑श्च॒द्वज्रे॑ण वृ॒त्रमिन्द्रः॑। गा न व्रा॒णा अ॒वनी॑रमुञ्चद॒भि श्रवो॑ दा॒वने॒ सचे॑ताः॥

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। जैसे बिजुली के सहाय से सूर्य्य वा सूर्य्य के सहाय से बिजुली बढ़ के विश्व को प्रकाशित और मेघ को छिन्न-भिन्न कर भूमि में गिरा देती है, जैसे गौओं का पालनेवाला गौऔं को बन्धन से छोड़कर सुखी करता है, वैसे ही सभा सेना के अध्यक्ष मनुष्य न्याय की रक्षा और शत्रुओं को छिन्न-भिन्न और धार्मिकों को दुःखरूपी बन्धनों से छुड़ाकर सुखी करें॥१०॥

अ॒स्येदु॑ त्वे॒षसा॑ रन्त॒ सिन्ध॑वः॒ परि॒ यद्वज्रे॑ण सी॒मय॑च्छत्। ई॒शा॒न॒कृद्दा॒शुषे॑ दश॒स्यन्तु॒र्वीत॑ये गा॒धं तु॒र्वणिः॑ कः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सभाध्यक्ष वा सूर्य के सहाय से शत्रु वा मेघादिकों को जीत कर पृथिवी राज्य का सेवन कर सुखी और प्रतापी होता है, वह सब शत्रुओं के बिलोड़ने को योग्य है॥११॥

अ॒स्मा इदु॒ प्र भ॑रा॒ तूतु॑जानो वृ॒त्राय॒ वज्र॒मीशा॑नः किये॒धाः। गोर्न पर्व॒ वि र॑दा तिर॒श्चेष्य॒न्नर्णां॑स्य॒पां च॒रध्यै॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे सेनापते! आप जैसे प्राणवायु से तालु आदि स्थानों में जीभ का ताड़न कर भिन्न-भिन्न अक्षर वा पदों के विभाग प्रसिद्ध होते हैं, वैसे ही सभाध्यक्ष शत्रु के बल को छिन्न-भिन्न और अङ्गों को विभागयुक्त करके इसी प्रकार शत्रुओं को जीता करे॥१२॥

अ॒स्येदु॒ प्र ब्रू॑हि पू॒र्व्याणि॑ तु॒रस्य॒ कर्मा॑णि॒ नव्य॑ उ॒क्थैः। यु॒धे यदि॑ष्णा॒न आयु॑धान्यृघा॒यमा॑णो निरि॒णाति॒ शत्रू॑न्॥

मनुष्यों को चाहिये कि सभाध्यक्ष आदि के विद्या, विनय, न्याय और शत्रुओं को जीतना आदि कर्मों की प्रशंसा करके और उत्साह देकर इन का सदा सत्कार करें तथा इन सभाध्यक्ष आदि राजपुरुषों से शस्त्रास्त्र चलाने की शिक्षा और शिल्पविद्या की चतुराई को प्राप्त हुए सेना में रहनेवाले वीर पुरुषों के साथ शत्रुओं को जीत कर प्रजा की निरन्तर रक्षा करें॥१३॥

अ॒स्येदु॑ भि॒या गि॒रय॑श्च दृ॒ळ्हा द्यावा॑ च॒ भूमा॑ ज॒नुष॑स्तुजेते। उपो॑ वे॒नस्य॒ जोगु॑वान ओ॒णिं स॒द्यो भु॑वद्वी॒र्या॑य नो॒धाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। यह सबको निश्चय समझना चाहिये कि विद्या आदि उत्तम गुण तथा ईश्वर से जगत् के उत्पन्न होने विना सभाध्यक्ष आदि प्रजा का पालन करने और जैसे सूर्य सब लोकों को प्रकाशित तथा धारण करने को समर्थ नहीं हो सकता, इसलिये विद्या आदि श्रेष्ठगुणों और परमेश्वर ही की प्रशंसा और स्तुति करना उचित है॥१४॥

अ॒स्मा इदु॒ त्यदनु॑ दाय्येषा॒मेको॒ यद्व॒व्ने भूरे॒रीशा॑नः। प्रैत॑शं॒ सूर्ये॑ पस्पृधा॒नं सौव॑श्व्ये॒ सुष्वि॑माव॒दिन्द्रः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को उचित है कि जो बहुत सुख देने तथा घोड़ों की विद्या को जाननेवाला और उपमारहित पुरुषार्थी विद्वान् मनुष्य है, उसी को प्रजा की रक्षा करने में नियुक्त करें और बिजुली की विद्या का ग्रहण भी अवश्य करें॥१५॥

ए॒वा ते॑ हारियोजना सुवृ॒क्तीन्द्र॒ ब्रह्मा॑णि॒ गोत॑मासो अक्रन्। ऐषु॑ वि॒श्वपे॑शसं॒ धियं॑ धाः प्रा॒तर्म॒क्षू धि॒याव॑सुर्जगम्यात्॥

परोपकारी विद्वानों को उचित है कि नित्य प्रयत्नपूर्वक अच्छी शिक्षा और विद्या के दान से सब मनुष्यों को अच्छी शिक्षा से युक्त विद्वान् करें। तथा इतर मनुष्यों को भी चाहिये कि पढ़ानेवाले विद्वानों को अपने निष्कपट मन, वाणी और कर्मों से प्रसन्न करके ठीक-ठीक पकाए हुए अन्न आदि पदार्थों से नित्य सेवा करें। क्योंकि पढ़ने और पढ़ाने से पृथक् दूसरा कोई उत्तम धर्म नहीं है, इसलिये सब मनुष्यों को परस्पर प्रीतिपूर्वक विद्या की वृद्धि करनी चाहिये॥१६॥इस सूक्त में सभाध्यक्ष आदि का वर्णन और अग्निविद्या का प्रचार करना आदि कहा है, इससे इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये॥इति श्रीयुतपरिव्राजकाचार्य्येण श्रीयुतमहाविदुषां विरजानन्दसरस्वतीस्वामिनां शिष्येण दयानन्दसरस्वतीस्वामिना विरचिते संस्कृतार्य्यभाषाभ्यां विभूषिते सुप्रमाणयुक्ते ऋग्वेदभाष्ये चतुर्थोऽध्यायः समाप्तिमगात्॥

प्र म॑न्महे शवसा॒नाय॑ शू॒षमा॑ङ्गू॒षं गिर्व॑णसे अङ्गिर॒स्वत्। सु॒वृ॒क्तिभिः॑ स्तुव॒त ऋ॑ग्मि॒यायार्चा॑मा॒र्कं नरे॒ विश्रु॑ताय॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना से सुख को प्राप्त होते हैं, वैसे सभाध्यक्ष के आश्रय से व्यवहार और परमार्थ के सुखों को सिद्ध करें॥१॥

प्र वो॑ म॒हे महि॒ नमो॑ भरध्वमाङ्गू॒ष्यं॑ शवसा॒नाय॒ साम॑। येना॑ नः॒ पूर्वे॑ पि॒तरः॑ पद॒ज्ञा अर्च॑न्तो॒ अङ्गि॑रसो॒ गा अवि॑न्दन्॥

हे मनुष्यो! जैसे विद्वान् लोग जिन वेद, सृष्टिक्रम और प्रत्यक्षादि प्रमाणों से कहे हुए धर्मयुक्त मार्ग से चलते हुए सब प्रकार परमेश्वर का पूजन करके सबके हित को धारण करते हैं, वैसे ही तुम लोग भी करो॥२॥

इन्द्र॒स्याङ्गि॑रसां चे॒ष्टौ वि॒दत्स॒रमा॒ तन॑याय धा॒सिम्। बृह॒स्पति॑र्भि॒नदद्रिं॑ विद॒द्गाः समु॒स्रिया॑भिर्वावशन्त॒ नरः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को उचित है कि माता के समान प्रजा में वर्त्त कर, सूर्य के समान विद्यादि उत्तम गुणों का प्रकाश कर, ईश्वर की कही वा विद्वानों से अनुष्ठान की हुई नीति में स्थित हो और सबके उपकार को करते हुए विद्यादि सद्गुणों के आनन्द में सदा मग्न रहें॥३॥

स सु॒ष्टुभा॒ स स्तु॒भा स॒प्त विप्रैः॑ स्व॒रेणाद्रिं॑ स्व॒र्यो॒३॒॑ नव॑ग्वैः। स॒र॒ण्युभिः॑ फलि॒गमि॑न्द्र शक्र व॒लं रवे॑ण दरयो॒ दश॑ग्वैः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे बिजुली उत्तम-उत्तम गुणों से वर्त्तमान हुई जीवन के हेतु मेघ के उत्पन्न करने आदि कार्यों को सिद्ध करती है, वैसे ही सभाध्यक्ष आदि अत्यन्त उत्तम-उत्तम विद्या बल से युक्त पुरुषों के साथ वर्त्त के विद्यारूपी न्याय के प्रकाश से अन्याय वा दुष्टों का निवारण कर चक्रवर्त्ति राज्य का पालन करें॥४॥

गृ॒णा॒नो अङ्गि॑रोभिर्दस्म॒ वि व॑रु॒षसा॒ सूर्ये॑ण॒ गोभि॒रन्धः॑। वि भूम्या॑ अप्रथय इन्द्र॒ सानु॑ दि॒वो रज॒ उप॑रमस्तभायः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को प्रातःकाल सूर्य के किरण और प्राणों के समान उक्त गुणों का प्रकाश करके दुष्टों का निवारण करना चाहिये। जैसे सूर्य प्रकाश को फैला और मेघ को उत्पन्न कर वर्षाता है, वैसे ही सभाध्यक्ष आदि मनुष्यों को प्रजा में उत्तम विद्या उत्पन्न करके सुखों की वर्षा करनी चाहिये॥५॥

तदु॒ प्रय॑क्षतममस्य॒ कर्म॑ द॒स्मस्य॒ चारु॑तममस्ति॒ दंसः॑। उ॒प॒ह्व॒रे यदुप॑रा॒ अपि॑न्व॒न्मध्व॑र्णसो न॒द्य१॒॑श्चत॑स्रः॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि अति उत्तम-उत्तम कर्मों का सेवन, यज्ञ का अनुष्ठान और राज्य का पालन करके सब दिशाओं में कीर्त्ति की वर्षा करें॥६॥

द्वि॒ता वि व॑व्रे स॒नजा॒ सनी॑ळे अ॒यास्यः॒ स्तव॑मानेभिर॒र्कैः। भगो॒ न मेने॑ पर॒मे व्यो॑म॒न्नधा॑रय॒द्रोद॑सी सु॒दंसाः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे सभा आदि का अध्यक्ष ऐश्वर्य को और जैसे सूर्य प्रकाश तथा पृथिवी को धारण करता है, वैसे ही न्याय और विद्या को धारण करें॥७॥

स॒नाद्दिवं॒ परि॒ भूमा॒ विरू॑पे पुन॒र्भुवा॑ युव॒ती स्वेभि॒रेवैः॑। कृ॒ष्णेभि॑र॒क्तोषा रुश॑द्भि॒र्वपु॑र्भि॒रा च॑रतो अ॒न्यान्या॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि जैसे चक्र के समान सर्वदा वर्त्तमान रात्रि-दिन परस्पर संयुक्त वर्त्तते हैं, वैसे विवाहित स्त्री-पुरुष अत्यन्त प्रेम के साथ वर्त्ता करें॥८॥

सने॑मि स॒ख्यं स्व॑प॒स्यमा॑नः सू॒नुर्दा॑धार॒ शव॑सा सु॒दंसाः॑। आ॒मासु॑ चिद्दधिषे प॒क्वम॒न्तः पयः॑ कृ॒ष्णासु॒ रुश॒द्रोहि॑णीषु॥

विद्वानों को जैसे ये दिन-रात कच्चे-पक्के रसों से उत्पन्न करने और उत्पन्न हुए पदार्थों की वृद्धि वा नाश करनेवाले सबों के मित्र के समान वर्त्तमान है, वैसे सब मनुष्यों के साथ वर्त्तना योग्य है॥९॥

स॒नात्सनी॑ळा अ॒वनी॑रवा॒ता व्र॒ता र॑क्षन्ते अ॒मृताः॒ सहो॑भिः। पु॒रू स॒हस्रा॒ जन॑यो॒ न पत्नी॑र्दुव॒स्यन्ति॒ स्वसा॑रो॒ अह्र॑याणम्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे पति लोग अपनी स्त्रियों, बहिनों और भाइयों तथा विद्यार्थी लोग आचार्य्यों की सेवा से सुख और विद्याओं को प्राप्त होते हैं, वैसे धर्मात्मा विद्वान् स्त्री-पुरुष लोग घर में बसते हुए मुक्ति को प्राप्त होते हैं॥१०॥

स॒ना॒युवो॒ नम॑सा॒ नव्यो॑ अ॒र्कैर्व॑सू॒यवो॑ म॒तयो॑ दस्म दद्रुः। पतिं॒ न पत्नी॑रुश॒तीरु॒शन्तं॑ स्पृ॒शन्ति॑ त्वा शवसावन्मनी॒षाः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को समझना चाहिये कि जैसे स्त्री-पुरुषों के साथ वर्त्तमान होने से सन्तानों की उत्पत्ति होती है, वैसे ही रात-दिनों के एक-साथ वर्तमान होने से सब व्यवहार सिद्ध होते हैं। और जैसे सूर्य का प्रकाश और पृथिवी की छाया के विना रात और दिन का सम्भव नहीं होता, वैसे ही स्त्री-पुरुष के विना मैथुनी सृष्टि नहीं हो सकती॥११॥

स॒नादे॒व तव॒ रायो॒ गभ॑स्तौ॒ न क्षीय॑न्ते॒ नोप॑ दस्यन्ति दस्म। द्यु॒माँ अ॑सि॒ क्रतु॑माँ इन्द्र॒ धीरः॒ शिक्षा॑ शचीव॒स्तव॑ नः॒ शची॑भिः॥

मनुष्यो को चाहिये कि जो सनातन वेद के ज्ञान से शिक्षा को और सभापति आदि के अधिकार को प्राप्त होके प्रजा का पालन करे, उसी मनुष्य को धर्मात्मा जानें॥१२॥

स॒ना॒य॒ते गोत॑म इन्द्र॒ नव्य॒मत॑क्ष॒द्ब्रह्म॑ हरि॒योज॑नाय। सु॒नी॒थाय॑ नः शवसान नो॒धाः प्रा॒तर्म॒क्षू धि॒याव॑सुर्जगम्यात्॥

सभापति आदि को चाहिये कि मनुष्यों के हित के लिये प्रतिदिन नवीन-नवीन धन और अन्न को उत्पन्न करें। जैसे प्राणवायु से मनुष्यों को सुख होते हैं, वैसे ही सभाध्यक्ष सबको सुखी करें॥१३॥इस सूक्त में ईश्वर, सभाध्यक्ष, दिन, रात, विद्वान्, सूर्य और वायु के गुणों का वर्णन होने से पूर्व सूक्तार्थ के साथ इस सूक्तार्थ की सङ्गति जाननी चाहिये॥

त्वं म॒हाँ इ॑न्द्र॒ यो ह॒ शुष्मै॒र्द्यावा॑ जज्ञा॒नः पृ॑थि॒वी अमे॑ धाः। यद्ध॑ ते॒ विश्वा॑ गि॒रय॑श्चि॒दभ्वा॑ भि॒या दृ॒ळ्हासः॑ कि॒रणा॒ नैज॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को ऐसा समझना चाहिये कि जो परमेश्वर अपने सामर्थ्य और बल आदि से सब जगत् को रच के दृढ़ता से धारण करता है, उसी की सब काल में उपासना करें तथा जिस सूर्य्यलोक ने अपने आकर्षण आदि गुणों से पृथिवी आदि लोकों को धारण किया है, उसको भी परमेश्वर का बनाया और धारण किया जानें॥१॥

आ यद्धरी॑ इन्द्र॒ विव्र॑ता॒ वेरा ते॒ वज्रं॑ जरि॒ता बा॒ह्वोर्धा॑त्। येना॑विहर्यतक्रतो अ॒मित्रा॒न्पुर॑ इ॒ष्णासि॑ पुरुहूत पू॒र्वीः॥

सभापति आदि को उचित है कि इस प्रकार के उत्तम स्वभाव, गुण और कर्मों को स्वीकार करें कि जिससे सब मनुष्य इस कर्म को देख तथा शिष्ट होकर निष्कण्टक राज्य के सुख को सदा भोगें॥२॥

त्वं स॒त्य इ॑न्द्र धृ॒ष्णुरे॒तान्त्वमृ॑भु॒क्षा नर्य॒स्त्वं षाट्। त्वं शुष्णं॑ वृ॒जने॑ पृ॒क्ष आ॒णौ यूने॒ कुत्सा॑य द्यु॒मते॒ सचा॑हन्॥

सभा और सभापति के विना शत्रुओं का पराजय और राज्य का पालन किसी से नहीं हो सकता। इसलिये श्रेष्ठ गुणवालों की सभा और सभापति से इन सब कार्य्यों को सिद्ध कराना मनुष्यों का मुख्य काम है॥३॥

त्वं ह॒ त्यदि॑न्द्र चोदीः॒ सखा॑ वृ॒त्रं यद्व॑ज्रिन्वृषकर्मन्नु॒भ्नाः। यद्ध॑ शूर वृषमणः परा॒चैर्वि दस्यूँ॒र्योना॒वकृ॑तो वृथा॒षाट्॥

मनुष्यों को चाहिये कि जैसे सूर्य्य अपने प्रकाश से सबको आनन्दित कर तथा मेघ को उत्पन्न करके वर्षाता है और अन्धकार को निवारण करके अपने प्रकाश को फैलाता है, वैसे ही सभाध्यक्ष विद्यादि उत्तम गुणों से सबको सुखी, शरीर वा आत्मा के बल को सिद्ध, धर्म, शिक्षा, अभय आदि की वर्षा, अधर्मरूपी अन्धकार और शत्रुओं का निवारण करके राज्य में प्रकाशित होवे॥४॥

त्वं ह॒ त्यदि॒न्द्रारि॑षण्यन्दृ॒ळ्हस्य॑ चि॒न्मर्ता॑ना॒मजु॑ष्टौ। व्य१॒॑स्मदा काष्ठा॒ अर्व॑ते वर्घ॒नेव॑ वज्रिञ्छ्नथिह्य॒मित्रा॑न्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। सभा सभापति आदि को उचित है कि राज्य तथा सेना में प्रीति उत्पन्न और शत्रुओं में द्वेष करके जैसे सूर्य मेघों का नित्य छेदन करता है, वैसे दुष्ट शत्रुओं का सदैव छेदन किया करें॥५॥

त्वां ह॒ त्यदि॒न्द्रार्ण॑सातौ॒ स्व॑र्मीळ्हे॒ नर॑ आ॒जा ह॑वन्ते। तव॑ स्वधाव इ॒यमा स॑म॒र्य ऊ॒तिर्वाजे॑ष्वत॒साय्या॑ भूत्॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि सब धर्मसम्बन्धी कार्य्यों में ईश्वर वा सभाध्यक्ष का सहाय लेके सम्पूर्ण कार्यों को सिद्ध करें॥६॥

त्वं ह॒ त्यदि॑न्द्र स॒प्त युध्य॒न्पुरो॑ वज्रिन्पुरु॒कुत्सा॑य दर्दः। ब॒र्हिर्न यत्सु॒दासे॒ वृथा॒ वर्गं॒हो रा॑ज॒न्वरि॑वः पू॒रवे॑ कः॥

जैसे सूर्य्य सब जगत् के हित के लिये मेघ को वर्षाता है, वैसे ही सबका स्वामी सभापति सभों का हित सिद्ध करे॥७॥

त्वं त्यां न॑ इन्द्र देव चि॒त्रामिष॒मापो॒ न पी॑पयः॒ परि॑ज्मन्। यया॑ शूर॒ प्रत्य॒स्मभ्यं॒ यंसि॒ त्मन॒मूर्जं॒ न वि॒श्वध॒ क्षर॑ध्यै॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अन्न क्षुधा को और जल तृषा को निवारण करके सब प्राणियों को सुखी करते हैं, वैसे सभापति आदि सबको सुखी करें॥८॥

अका॑रि त इन्द्र॒ गोत॑मेभि॒र्ब्रह्मा॒ण्योक्ता॒ नम॑सा॒ हरि॑भ्याम्। सु॒पेश॑सं॒ वाज॒मा भ॑रा नः प्रा॒तर्म॒क्षू धि॒याव॑सुर्जगम्यात्॥

जैसे बिजुली सूर्य्य आदि रूप से सब जगत् को आनन्दों से पुष्ट करती है, वैसे सभाध्यक्ष आदि भी उत्तम धन और श्रेष्ठ गुणों से प्रजा को पुष्ट करें॥९॥इस सूक्त में ईश्वर, सभाद्यध्यक्ष और अग्नि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये॥

वृष्णे॒ शर्धा॑य॒ सुम॑खाय वे॒धसे॒ नोधः॑ सुवृ॒क्तिं प्र भ॑रा म॒रुद्भ्यः॑। अ॒पो न धीरो॒ मन॑सा सु॒हस्त्यो॒ गिरः॒ सम॑ञ्जे वि॒दथे॑ष्वा॒भुवः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जितनी चेष्टा, भावना, बल, विज्ञान, पुरुषार्थ धारण करना, छोड़ना, कहना, सुनना, बढ़ना, नष्ट होना, भूख, प्यास आदि हैं, वे सब वायु के निमित्त से ही होते हैं। जिस प्रकार कि इस विद्या को मैं जानता हूँ, वैसे ही तू भी ग्रहण कर, ऐसा उपदेश सबको करो॥१॥

ते ज॑ज्ञिरे दि॒व ऋ॒ष्वास॑ उ॒क्षणो॑ रु॒द्रस्य॒ मर्या॒ असु॑रा अरे॒पसः॑। पा॒व॒कासः॒ शुच॑यः॒ सूर्या॑इव॒ सत्वा॑नो॒ न द्र॒प्सिनो॑ घो॒रव॑र्पसः॥

इस मन्त्र में दो उपमालङ्कार हैं। जैसे ईश्वर की सृष्टि में सिंह, हाथी और मनुष्य आदि प्राणी बलवान् होते हैं, वैसे वायु भी है। जैसे सूर्य की किरणें पवित्र करनेवाली हैं, वैसे वायु भी। इन दोनों के बिना, रोग, रोग का नाश, मरण और जन्म आदि व्यवहार नहीं हो सकते। इससे मनुष्यों को चाहिये कि इनके गुणों को जानके सब कार्यों में यथावत् संप्रयोग करें॥२॥

युवा॑नो रु॒द्रा अ॒जरा॑ अभो॒ग्घनो॑ वव॒क्षुरध्रि॑गावः॒ पर्व॑ताइव। दृ॒ळ्हा चि॒द्विश्वा॒ भुव॑नानि॒ पार्थि॑वा॒ प्र च्या॑वयन्ति दि॒व्यानि॑ म॒ज्मना॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को जैसे मेघ जलों के आधार और पर्वत ओषधि आदि के आधार हैं, वैसे ही ये संयोग-वियोग करनेवाले, सबके आधार, सुख-दुःख होने के हेतु, नित्यरूप, गुण से अलग, स्पर्श गुणवाले पवन हैं, ऐसा समझना योग्य है। और इन्हींके विना जल, अग्नि और भूगोल तथा इनके परमाणु भी जान-आने [तथा ठहरने] को समर्थ नहीं हो सकते॥३॥

चि॒त्रैर॒ञ्जिभि॒र्वपु॑षे॒ व्य॑ञ्जते॒ वक्षः॑सु रु॒क्माँ अधि॑ येतिरे शु॒भे। अंसे॑ष्वेषां॒ नि मि॑मृक्षुर्ऋ॒ष्टयः॑ सा॒कं ज॑ज्ञिरे स्व॒धया॑ दि॒वो नरः॑॥

विद्वानों को उचित है कि ऐसे-ऐसे विलक्षण गुणवाले वायुओं को जानकर शुद्ध-शुद्ध सुखों को भोगें॥४॥

ई॒शा॒न॒कृतो॒ धुन॑यो रि॒शाद॑सो॒ वाता॑न्वि॒द्युत॒स्तवि॑षीभिरक्रत। दु॒हन्त्यूध॑र्दि॒व्यानि॒ धूत॑यो॒ भूमिं॑ पिन्वन्ति॒ पय॑सा॒ परि॑ज्रयः॥

हे मनुष्यो! तुम लोगों के लिये परमेश्वर वायु के गुणों का उपदेश करता है कि कहे वा न कहे गुणवाले वायु बिजुली को उत्पन्न करके वर्षा द्वारा भूमि पर ओषधि आदि के सेचन से सब प्राणियों को सुख देनेवाले होते हैं, ऐसा तुम सब लोग जानो॥५॥

पिन्व॑न्त्य॒पो म॒रुतः॑ सु॒दान॑वः॒ पयो॑ घृ॒तव॑द्वि॒दथे॑ष्वा॒भुवः॑। अत्यं॒ न मि॒हे वि न॑यन्ति वा॒जिन॒मुत्सं॑ दुहन्ति स्त॒नय॑न्त॒मक्षि॑तम्॥

इस मन्त्र में उपमा तथा वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे यज्ञ में घृत आदि पदार्थ, क्षेत्र पशु आदि की तृप्ति के लिये कूप तथा घोड़ी की तृप्ति के लिये घोड़ा है, वैसे विद्या से संप्रयोग किये हुए पवन सब कार्यों को सिद्ध करते हैं॥६॥

म॒हि॒षासो॑ मा॒यिन॑श्चि॒त्रभा॑नवो गि॒रयो॒ न स्वत॑वसो रघु॒ष्यदः॑। मृ॒गाइ॑व ह॒स्तिनः॑ खादथा॒ वना॒ यदारु॑णीषु॒ तवि॑षी॒रयु॑ग्ध्वम्॥

इस मन्त्र में दो उपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को चाहिये कि पवनों के विना हमारे चलना, खाना, यान का चलाना आदि काम भी सिद्ध नहीं हो सकते, इससे इन वायुओं को सेना, विमान और नौका आदि यानो में संयुक्त करके अग्नि जलों के संयोग से यानों को शीघ्र चलाया करें॥७॥

सिं॒हाइ॑व नानदति॒ प्रचे॑तसः पि॒शाइ॑व सु॒पिशो॑ वि॒श्ववे॑दसः। क्षपो॒ जिन्व॑न्तः॒ पृष॑तीभिर्ऋ॒ष्टिभिः॒ समित्स॒बाधः॒ शव॒साहि॑मन्यवः॥

इस मन्त्र में दो उपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो! तुम ऐसा जानो कि जितना बल, पराक्रम, जीवन, सुनना, विचारना आदि क्रिया है, वे सब वायु के सकाश से ही होती हैं॥८॥

रोद॑सी॒ आ व॑दता गणश्रियो॒ नृषा॑चः शूराः॒ शव॒साहि॑मन्यवः। आ व॒न्धुरे॑ष्व॒मति॒र्न द॑र्श॒ता वि॒द्युन्न त॑स्थौ मरुतो॒ रथे॑षु वः॥

इस मन्त्र में दो उपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को जानना योग्य है कि सब मूर्तिमान् द्रव्यों के आधार, शूरवीरता के तुल्य तथा शिल्पविद्या और अन्य कार्य्यों के हेतु मुख्य करके पवन ही हैं, अन्य नहीं॥९॥

वि॒श्ववे॑दसो र॒यिभिः॒ समो॑कसः॒ संमि॑श्लास॒स्तवि॑षीभिर्विर॒प्शिनः॑। अस्ता॑र॒ इषुं॑ दधिरे॒ गभ॑स्त्योरन॒न्तशु॑ष्मा॒ वृष॑खादयो॒ नरः॑॥

मनुष्य लोग विद्वान् तथा वायु आदि पदार्थविद्या के विना परलोक और इस लोक के सुखों की सिद्धि कभी नहीं कर सकते॥१०॥

हि॒र॒ण्यये॑भिः प॒विभिः॑ पयो॒वृध॒ उज्जि॑घ्नन्त आप॒थ्यो॒३॒॑ न पर्व॑तान्। म॒खा अ॒यासः॑ स्व॒सृतो॑ ध्रुव॒च्युतो॑ दुध्र॒कृतो॑ म॒रुतो॒ भ्राज॑दृष्टयः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जिन वायुओं से वृष्टि आदि की उत्पत्ति होती है, उनका युक्ति के साथ सेवन किया करें॥११॥

घृषुं॑ पाव॒कं व॒निनं॒ विच॑र्षणिं रु॒द्रस्य॑ सू॒नुं ह॒वसा॑ गृणीमसि। र॒ज॒स्तुरं॑ त॒वसं॒ मारु॑तं ग॒णमृ॑जी॒षिणं॒ वृष॑णं सश्चत श्रि॒ये॥

मनुष्यों को चाहिये कि वायुसमुदाय के विना हमारे कोई काम सिद्ध नहीं हो सकते, ऐसी वायुविद्या का निश्चयतया स्वीकार करके अपने कार्यों की सिद्धि अवश्य करें॥१२॥

प्र नू स मर्तः॒ शव॑सा॒ जनाँ॒ अति॑ त॒स्थौ व॑ ऊ॒ती म॑रुतो॒ यमाव॑त। अर्व॑द्भि॒र्वाजं॑ भरते॒ धना॒ नृभि॑रा॒पृच्छ्यं॒ क्रतु॒मा क्षे॑ति॒ पुष्य॑ति॥

जो मनुष्य प्राणवायु की विद्या को जानकर उपयोग करते हैं, वे बलवान् प्रतिष्ठा को प्राप्त हो और दुःख तथा शत्रुओं को जीत कर उत्तम हाथी, घोड़े, मनुष्य, धन और बुद्धि से युक्त होके सदा सबको पुष्ट करते हैं॥१३॥

च॒र्कृत्यं॑ मरुतः पृ॒त्सु दु॒ष्टरं॑ द्यु॒मन्तं॒ शुष्मं॑ म॒घव॑त्सु धत्तन। ध॒न॒स्पृत॑मु॒क्थ्यं॑ वि॒श्वच॑र्षणिं तो॒कं पु॑ष्येम॒ तन॑यं श॒तं हिमाः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् लोग पवनों के योग से हमारे बिजुली, यन्त्र, बैल, सौ वर्ष पर्य्यन्त जीना और शरीर आदि में पुष्टि का होना ये सब काम होते हैं, इसलिए इन वायुओं की विद्या को युक्ति के साथ जान कर-उपयोग में लिया करते हैं, वैसे अन्य लोग भी आचरण करें॥१४॥

नू ष्ठि॒रं म॑रुतो वी॒रव॑न्तमृती॒षाहं॑ र॒यिम॒स्मासु॑ धत्त। स॒ह॒स्रिणं॑ श॒तिनं॑ शूशु॒वांसं॑ प्रा॒तर्म॒क्षू धि॒याव॑सुर्जगम्यात्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! तुम लोग जैसे अति प्रशंसा करने योग्य, बुद्धिवाला, विद्या, पुरुषार्थों से युक्त विद्वान् जन वायु आदि पदार्थों के सकाश से दृढ़ निश्चल बहुत सुखों को सिद्ध करके आनन्द को प्राप्त होता है, वैसे तुम भी इस विद्या को प्राप्त होकर आनन्द भोगो॥१५॥। इस सूक्त में वायु के गुणों का उपदेश करने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये॥

सूक्तम्

प॒श्वा न ता॒युं गुहा॒ चत॑न्तं॒ नमो॑ युजा॒नं नमो॒ वह॑न्तम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! तुम लोग जैसे वस्तु को चुराए हुए चोर के पाद आदि अङ्ग वा स्वरूप देखने से उसको पकड़कर चोरे हुए पशु आदि पदार्थों का ग्रहण करते हो, वैसे अन्तःकरण में उपदेश करनेवाले, सबके आधार विज्ञान से जानने योग्य परमेश्वर तथा बिजुलीरूप अग्नि को जान और प्राप्त होके सब आनन्द को स्वीकार करो॥१॥

स॒जोषा॒ धीराः॑ प॒दैरनु॑ ग्म॒न्नुप॑ त्वा सीद॒न्विश्वे॒ यज॑त्राः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! तुम लोग जैसे वस्तु को चुराए हुए चोर के पाद आदि अङ्ग वा स्वरूप देखने से उसको पकड़कर चोरे हुए पशु आदि पदार्थों का ग्रहण करते हो, वैसे अन्तःकरण में उपदेश करनेवाले, सबके आधार विज्ञान से जानने योग्य परमेश्वर तथा बिजुलीरूप अग्नि को जान और प्राप्त होके सब आनन्द को स्वीकार करो॥१॥

ऋ॒तस्य॑ दे॒वा अनु॑ व्र॒ता गु॒र्भुव॒त्परि॑ष्टि॒र्द्यौर्न भूम॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सूर्य के प्रकाश से सब पदार्थ दृष्टि में आते हैं, वैसे ही विद्वानों के संग से वेदविद्या के उत्पन्न होने और धर्म्माचरण की प्रवृत्ति में परमेश्वर और बिजुली आदि पदार्थ अपने-अपने गुण, कर्म, स्वभावों से अच्छे प्रकार देखे जाते हैं, ऐसा तुम लोग जान कर अपने विचार से निश्चित करो॥२॥

वर्ध॑न्ती॒मापः॑ प॒न्वा सुशि॑श्विमृ॒तस्य॒ योना॒ गर्भे॒ सुजा॑तम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सूर्य के प्रकाश से सब पदार्थ दृष्टि में आते हैं, वैसे ही विद्वानों के संग से वेदविद्या के उत्पन्न होने और धर्म्माचरण की प्रवृत्ति में परमेश्वर और बिजुली आदि पदार्थ अपने-अपने गुण, कर्म, स्वभावों से अच्छे प्रकार देखे जाते हैं, ऐसा तुम लोग जान कर अपने विचार से निश्चित करो॥२॥

पु॒ष्टिर्न र॒ण्वा क्षि॒तिर्न पृ॒थ्वी गि॒रिर्न भुज्म॒ क्षोदो॒ न शं॒भु॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। कोई विद्वान् मनुष्य परमेश्वर को प्राप्त होके और बिजुलीरूप अग्नि जान के उससे उपकार लेने को समर्थ होता है, जैसे उत्तम पुष्टि, पृथिवी का राज्य, मेघ की वृष्टि, उत्तम जल, उत्तम घोड़े और समुद्र बहुत सुखों को प्राप्त कराते हैं, वैसे ही परमेश्वर और बिजुली भी सब आनन्दों को प्राप्त कराते हैं, परन्तु इन दोनों का जाननेवाला विद्वान् मनुष्य दुर्लभ है॥३॥

अत्यो॒ नाज्म॒न्त्सर्ग॑प्रतक्तः॒ सिन्धु॒र्न क्षोदः॒ क ईं॑ वराते॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। कोई विद्वान् मनुष्य परमेश्वर को प्राप्त होके और बिजुलीरूप अग्नि जान के उससे उपकार लेने को समर्थ होता है, जैसे उत्तम पुष्टि, पृथिवी का राज्य, मेघ की वृष्टि, उत्तम जल, उत्तम घोड़े और समुद्र बहुत सुखों को प्राप्त कराते हैं, वैसे ही परमेश्वर और बिजुली भी सब आनन्दों को प्राप्त कराते हैं, परन्तु इन दोनों का जाननेवाला विद्वान् मनुष्य दुर्लभ है॥३॥

जा॒मिः सिन्धू॑नां॒ भ्राते॑व॒ स्वस्रा॒मिभ्या॒न्न राजा॒ वना॑न्यत्ति॥

इस मन्त्र में दो उपमालङ्कार हैं। जब मनुष्य लोग यानचालन आदि कार्यों में वायु से संयुक्त किये हुए अग्नि को चलाते हैं, तब वह बहुत कार्यों को सिद्ध करता है, ऐसा सब मनुष्यों को जानना चाहिये॥४॥

यद्वात॑जूतो॒ वना॒ व्यस्था॑द॒ग्निर्ह॑ दाति॒ रोमा॑ पृथि॒व्याः॥

इस मन्त्र में दो उपमालङ्कार हैं। जब मनुष्य लोग यानचालन आदि कार्यों में वायु से संयुक्त किये हुए अग्नि को चलाते हैं, तब वह बहुत कार्यों को सिद्ध करता है, ऐसा सब मनुष्यों को जानना चाहिये॥४॥

श्वसि॑त्य॒प्सु हं॒सो न सीद॒न् क्रत्वा॒ चेति॑ष्ठो वि॒शामु॑ष॒र्भुत्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे बिजुली के विना किसी मनुष्य के व्यवहार की सिद्धि नहीं हो सकती। इस अग्निविद्या से परीक्षा करके कार्यों में संयुक्त किया हुआ अग्नि बहुत सुखों को सिद्ध करता है॥५॥इस सूक्त में ईश्वर, अग्निरूप बिजुली के वर्णन से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥

सोमो॒ न वे॒धा ऋ॒तप्र॑जातः प॒शुर्न शिश्वा॑ वि॒भुर्दू॒रेभाः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे बिजुली के विना किसी मनुष्य के व्यवहार की सिद्धि नहीं हो सकती। इस अग्निविद्या से परीक्षा करके कार्यों में संयुक्त किया हुआ अग्नि बहुत सुखों को सिद्ध करता है॥५॥इस सूक्त में ईश्वर, अग्निरूप बिजुली के वर्णन से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥

र॒यिर्न चि॒त्रा सूरो॒ न सं॒दृगायु॒र्न प्रा॒णो नित्यो॒ न सू॒नुः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को उचित है कि जिस ईश्वर ने प्रजा के हित के लिए बहुत गुणवाले अनेक कार्य्यों के उपयोगी सत्य स्वभाववाले इस अग्नि को रचा है, उसी की सदा उपासना करें॥१॥

तक्वा॒ न भूर्णि॒र्वना॑ सिषक्ति॒ पयो॒ न धे॒नुः शुचि॑र्वि॒भावा॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को उचित है कि जिस ईश्वर ने प्रजा के हित के लिए बहुत गुणवाले अनेक कार्य्यों के उपयोगी सत्य स्वभाववाले इस अग्नि को रचा है, उसी की सदा उपासना करें॥१॥

दा॒धार॒ क्षेम॒मोको॒ न र॒ण्वो यवो॒ न प॒क्वो जेता॒ जना॑नाम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य जीवन के निमित्त ब्रह्मचर्य्यादि कर्मों को काम की सिद्धि के लिये अच्छे प्रकार जानके युक्तिपूर्वक आहार और विहार के अर्थ यथायोग्य पदार्थों को धारण करते हैं, वे बहुत काल पर्यन्त जी के सदा सुखी होते हैं॥२॥

ऋषि॒र्न स्तुभ्वा॑ वि॒क्षु प्र॑श॒स्तो वा॒जी न प्री॒तो वयो॑ दधाति॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य जीवन के निमित्त ब्रह्मचर्य्यादि कर्मों को काम की सिद्धि के लिये अच्छे प्रकार जानके युक्तिपूर्वक आहार और विहार के अर्थ यथायोग्य पदार्थों को धारण करते हैं, वे बहुत काल पर्यन्त जी के सदा सुखी होते हैं॥२॥

दु॒रोक॑शोचिः॒ क्रतु॒र्न नित्यो॑ जा॒येव॒ योना॒वरं॒ विश्व॑स्मै॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को जानना चाहिये कि जो ज्ञान और कर्मकाण्ड के समान सदा वर्त्तमान, अनुकूल स्त्री के समान सुखों का निमित्त, सूर्य के समान शुभगुणों को प्रकाश करने, आश्चर्य गुणवाले रथ के समान मोक्ष में प्राप्त करने, वीर के समान युद्धों में विजय करनेवाला हो, वह राज्यलक्ष्मी को प्राप्त होता है॥३॥

चि॒त्रो यदभ्रा॑ट्छ्वे॒तो न वि॒क्षु रथो॒ न रु॒क्मी त्वे॒षः सम॒त्सु॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को जानना चाहिये कि जो ज्ञान और कर्मकाण्ड के समान सदा वर्त्तमान, अनुकूल स्त्री के समान सुखों का निमित्त, सूर्य के समान शुभगुणों को प्रकाश करने, आश्चर्य गुणवाले रथ के समान मोक्ष में प्राप्त करने, वीर के समान युद्धों में विजय करनेवाला हो, वह राज्यलक्ष्मी को प्राप्त होता है॥३॥

सेने॑व सृ॒ष्टामं॑ दधा॒त्यस्तु॒र्न दि॒द्युत्त्वे॒षप्र॑तीका॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि विद्या से अच्छे प्रयत्न द्वारा जैसे की हुई उत्तम शिक्षा से सिद्ध की हुई सेना शत्रुओं को जीत कर विजय करती है, जैसे धनुर्वेद के जाननेवाले विद्वान् लोग शत्रुओं के ऊपर शस्त्र-अस्त्रों को छोड़ उनका छेदन करके भगा देते हैं, वैसे उत्तम सेनापति सब दुःखों का नाश करता है, ऐसा तुम जानो॥४॥

य॒मो ह॑ जा॒तो य॒मो जनि॑त्वं जा॒रः क॒नीनां॒ पति॒र्जनी॑नाम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि विद्या से अच्छे प्रयत्न द्वारा जैसे की हुई उत्तम शिक्षा से सिद्ध की हुई सेना शत्रुओं को जीत कर विजय करती है, जैसे धनुर्वेद के जाननेवाले विद्वान् लोग शत्रुओं के ऊपर शस्त्र-अस्त्रों को छोड़ उनका छेदन करके भगा देते हैं, वैसे उत्तम सेनापति सब दुःखों का नाश करता है, ऐसा तुम जानो॥४॥

तं व॑श्च॒राथा॑ व॒यं व॑स॒त्यास्तं॒ न गावो॒ नक्ष॑न्त इ॒द्धम्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो सभापति आदि इस प्रकार परमेश्वर का सेवन और विद्युत् अग्नि को सिद्ध करते हैं, उनको जैसे गौ, घर और किरण सूर्य को प्राप्त होते हैं और जैसे मनुष्य समुद्र को प्राप्त होके नाना प्रकार के कामों को सुशोभित (सिद्ध) करता है, वैसे ही सज्जन पुरुषों को उचित है कि अन्तर्य्यामी परमेश्वर की उपासना तथा विद्युत् विद्या को यथावत् सिद्ध करके अपनी सब कामनाओं को पूर्ण करें॥५॥इस सूक्त में ईश्वर और अग्नि के गुणों का वर्णन होने इस सूक्त की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥

सिन्धु॒र्न क्षोदः॒ प्र नीची॑रैनो॒न्नव॑न्त॒ गावः॒ स्व१॒॑र्दृशी॑के॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो सभापति आदि इस प्रकार परमेश्वर का सेवन और विद्युत् अग्नि को सिद्ध करते हैं, उनको जैसे गौ, घर और किरण सूर्य को प्राप्त होते हैं और जैसे मनुष्य समुद्र को प्राप्त होके नाना प्रकार के कामों को सुशोभित (सिद्ध) करता है, वैसे ही सज्जन पुरुषों को उचित है कि अन्तर्य्यामी परमेश्वर की उपासना तथा विद्युत् विद्या को यथावत् सिद्ध करके अपनी सब कामनाओं को पूर्ण करें॥५॥इस सूक्त में ईश्वर और अग्नि के गुणों का वर्णन होने इस सूक्त की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥

वने॑षु जा॒युर्मर्ते॑षु मि॒त्रो वृ॑णी॒ते श्रु॒ष्टिं राजे॑वाजु॒र्यम्॥

इस मन्त्रा में उपमा और (वाचकलुप्तोपमालङ्कार) हैं। मनुष्यों को उचित है कि विद्वानों का संग करके सदैव आनन्द भोग करें॥१॥

क्षेमो॒ न सा॒धुः क्रतु॒र्न भ॒द्रो भुव॑त्स्वा॒धीर्होता॑ हव्य॒वाट्॥

इस मन्त्रा में उपमा और (वाचकलुप्तोपमालङ्कार) हैं। मनुष्यों को उचित कि विद्वानों का संग करके सदैव आनन्द भोग करें॥१॥

हस्ते॒ दधा॑नो नृ॒म्णा विश्वा॒न्यमे॑ दे॒वान्धा॒द्गुहा॑ नि॒षीद॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! तुम लोगों को चाहिये कि जो अन्तर्यामी आत्मा में सत्य-झूँठ का उपदेश करता और बाह्य अध्ययन करानेवाला विद्वान् वर्त्तमान है, उसको छोड़ कर किसी की उपासना वा संगत कभी मत करो॥२॥

वि॒दन्ती॒मत्र॒ नरो॑ धियं॒धा हृ॒दा यत्त॒ष्टान्मन्त्राँ॒ अशं॑सन्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! तुम लोगों को चाहिये कि जो अन्तर्यामी आत्मा में सत्य-झूँठ का उपदेश करता और बाह्य अध्ययन करानेवाला विद्वान् वर्त्तमान है, उसको छोड़ कर किसी की उपासना वा संगत कभी मत करो॥२॥

अ॒जो न क्षां दा॒धार॑ पृथि॒वीं त॒स्तम्भ॒ द्यां मन्त्रे॑भिः स॒त्यैः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे परमेश्वर वा जीव कभी उत्पन्न वा नष्ट नहीं होता, वैसे कारण भी विनाश में नहीं आता। जैसे परमेश्वर अपने विज्ञान, बल आदि गुणों से पृथिवी आदि जगत् को रचकर धारण करता है, वैसे सत्य विचारों से सभाध्यक्ष राज्य का धारण करे। जैसे प्रिय मित्र अपने मित्र को दुःख के बन्धों से पृथक् करके उत्तम-उत्तम सुखों को प्राप्त कराता है, वैसे ईश्वर और सूर्य्य भी सब सुखों को प्राप्त कराते हैं। जैसे अन्तर्य्यामि रूप से ईश्वर जीवादि को धारण करके प्रकाश करता है, वैसे सभाध्यक्ष सत्यन्याय से राज्य और सूर्य्य अपने आकर्षणादि गुणों से जगत् को धारण करता है॥३॥

प्रि॒या प॒दानि॑ प॒श्वो नि पा॑हि वि॒श्वायु॑रग्ने गु॒हा गुहं॑ गाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे परमेश्वर वा जीव कभी उत्पन्न वा नष्ट नहीं होता, वैसे कारण भी विनाश में नहीं आता। जैसे परमेश्वर अपने विज्ञान, बल आदि गुणों से पृथिवी आदि जगत् को रचकर धारण करता है, वैसे सत्य विचारों से सभाध्यक्ष राज्य का धारण करे। जैसे प्रिय मित्र अपने मित्र को दुःख के बन्धों से पृथक् करके उत्तम-उत्तम सुखों को प्राप्त कराता है, वैसे ईश्वर और सूर्य्य भी सब सुखों को प्राप्त कराते हैं। जैसे अन्तर्य्यामि रूप से ईश्वर जीवादि को धारण करके प्रकाश करता है, वैसे सभाध्यक्ष सत्यन्याय से राज्य और सूर्य्य अपने आकर्षणादि गुणों से जगत् को धारण करता है॥३॥

य ईं॑ चि॒केत॒ गुहा॒ भव॑न्त॒मा यः स॒साद॒ धारा॑मृ॒तस्य॑॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। किसी मनुष्य को परमेश्वर की उपासना वा विज्ञान, सत्यविद्या और उत्तम आचरणों के विना सुख प्राप्त नहीं हो सकते॥४॥

वि ये चृ॒तन्त्यृ॒ता सप॑न्त॒ आदिद्वसू॑नि॒ प्र व॑वाचास्मै॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। किसी मनुष्य को परमेश्वर की उपासना वा विज्ञान, सत्यविद्या और उत्तम आचरणों के विना सुख प्राप्त नहीं हो सकते॥४॥

वि यो वी॒रुत्सु॒ रोध॑न्महि॒त्वोत प्र॒जा उ॒त प्र॒सूष्व॒न्तः॥

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को चाहिये कि जो अन्तर्यामीरूप तथा रूप वेगादि गुणों से प्रजा में नियत (संयमन) करता है, उसी जगदीश्वर की उपासना और विद्युत् अग्नि को अपने कार्यों में संयुक्त करके जैसे विद्वान् लोग घर में स्थित हुए संग्राम में शत्रुओं को जीत कर सुखी करते हैं, वैसे सुखी करे॥५॥इस सूक्त में ईश्वर, सभाध्यक्ष और विद्युत्, अग्नि के गुणों का वर्णन होने से पूर्व सूक्तार्थ के साथ इस सूक्तार्थ की सङ्गति जाननी चाहिये॥

चित्ति॑र॒पां दमे॑ वि॒श्वायुः॒ सद्मे॑व॒ धीराः॑ सं॒माय॑ चक्रुः॥

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को चाहिये कि जो अन्तर्यामीरूप तथा रूप वेगादि गुणों से प्रजा में नियत (संयमन) करता है, उसी जगदीश्वर की उपासना और विद्युत् अग्नि को अपने कार्यों में संयुक्त करके जैसे विद्वान् लोग घर में स्थित हुए संग्राम में शत्रुओं को जीत कर सुखी करते हैं, वैसे सुखी करे॥५॥इस सूक्त में ईश्वर, सभाध्यक्ष और विद्युत्, अग्नि के गुणों का वर्णन होने से पूर्व सूक्तार्थ के साथ इस सूक्तार्थ की सङ्गति जाननी चाहिये॥

श्री॒णन्नुप॑ स्था॒द्दिवं॑ भुर॒ण्युः स्था॒तुश्च॒रथ॑म॒क्तून्व्यू॑र्णोत्॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। कोई परमेश्वर की उपासना वा विद्युत् अग्नि के आश्रय को छोड़कर सब परमार्थ और व्यवहार के सुखों को प्राप्त होने को योग्य नहीं हो सकता॥१॥

परि॒ यदे॑षा॒मेको॒ विश्वे॑षां॒ भुव॑द्दे॒वो दे॒वानां॑ महि॒त्वा॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। कोई परमेश्वर की उपासना वा विद्युत् अग्नि के आश्रय को छोड़कर सब परमार्थ और व्यवहार के सुखों को प्राप्त होने को योग्य नहीं हो सकता॥१॥

आदित्ते॒ विश्वे॒ क्रतुं॑ जुषन्त॒ शुष्का॒द्यद्दे॑व जी॒वो जनि॑ष्ठाः॥

मनुष्य परमेश्वर की उपासना वा आज्ञानुष्ठान के विना व्यवहार और परमार्थ के सुखों को प्राप्त नहीं हो सकते॥२॥

भज॑न्त॒ विश्वे॑ देव॒त्वं नाम॑ ऋ॒तं सप॑न्तो अ॒मृत॒मेवैः॑॥

मनुष्य परमेश्वर की उपासना वा आज्ञानुष्ठान के विना व्यवहार और परमार्थ के सुखों को प्राप्त नहीं हो सकते॥२॥

ऋ॒तस्य॒ प्रेषा॑ ऋ॒तस्य॑ धी॒तिर्वि॒श्वायु॒र्विश्वे॒ अपां॑सि चक्रुः॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को ऐसा जानना चाहिये ईश्वर की रचना के विना जड़ कारण से कुछ भी कार्य उत्पन्न वा नष्ट होने तथा आधार के विना आधेय भी स्थित होने को समर्थ नहीं हो सकता और कोई मनुष्य कर्म से विना क्षण भर भी स्थित नहीं हो सकता। जो विद्वान् लोग विद्या आदि उत्तम गुणों को अन्य सज्जनों के लिये देते तथा उनसे ग्रहण करते हैं, उन्हीं दोनों का सत्कार करें, औरों का नहीं॥३॥

यस्तुभ्यं॒ दाशा॒द्यो वा॑ ते॒ शिक्षा॒त्तस्मै॑ चिकि॒त्वान्र॒यिं द॑यस्व॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को ऐसा जानना चाहिये ईश्वर की रचना के विना जड़ कारण से कुछ भी कार्य उत्पन्न वा नष्ट होने तथा आधार के विना आधेय भी स्थित होने को समर्थ नहीं हो सकता और कोई मनुष्य कर्म से विना क्षण भर भी स्थित नहीं हो सकता। जो विद्वान् लोग विद्या आदि उत्तम गुणों को अन्य सज्जनों के लिये देते तथा उनसे ग्रहण करते हैं, उन्हीं दोनों का सत्कार करें, औरों का नहीं॥३॥

होता॒ निष॑त्तो॒ मनो॒रप॑त्ये॒ स चि॒न्न्वा॑सां॒ पती॑ रयी॒णाम्॥

मनुष्यों को उचित है कि परस्पर मित्र हो और समग्र विद्याओं को शीघ्र जानकर निरन्तर आनन्द भोगें॥४॥

इ॒च्छन्त॒ रेतो॑ मि॒थस्त॒नूषु॒ सं जा॑नत॒ स्वैर्दक्षै॒रमू॑राः॥

मनुष्यों को उचित है कि परस्पर मित्र हो और समग्र विद्याओं को शीघ्र जानकर निरन्तर आनन्द भोगें॥४॥

पि॒तुर्न पु॒त्राः क्रतुं॑ जुषन्त॒ श्रोष॒न्ये अ॑स्य॒ शासं॑ तु॒रासः॑॥

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को चाहिये कि ईश्वर की आज्ञा पालने विना किसी मनुष्य का कुछ भी सुख सम्भव नहीं होता तथा जितेन्द्रियता आदि गुणों के विना किसी मनुष्य को सुख प्राप्त नहीं हो सकता। इससे ईश्वर की आज्ञा और जितेन्द्रियता आदि का सेवन अवश्य करें॥५॥इस सूक्त में ईश्वर और अग्नि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥

वि राय॑ और्णो॒द्दुरः॑ पुरु॒क्षुः पि॒पेश॒ नाकं॒ स्तृभि॒र्दमू॑नाः॥

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को चाहिये कि ईश्वर की आज्ञा पालने विना किसी मनुष्य का कुछ भी सुख सम्भव नहीं होता तथा जितेन्द्रियता आदि गुणों के विना किसी मनुष्य को सुख प्राप्त नहीं हो सकता। इससे ईश्वर की आज्ञा और जितेन्द्रियता आदि का सेवन अवश्य करें॥५॥इस सूक्त में ईश्वर और अग्नि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥

शु॒क्रः शु॑शु॒क्वाँ उ॒षो न जा॒रः प॒प्रा स॑मी॒ची दि॒वो न ज्योतिः॑॥

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। विद्यार्थी न होके कोई भी मनुष्य विद्वान् नहीं हो सकता और किसी मनुष्य को बिजुली आदि विद्या तथा उसके संप्रयोग के विना बड़ा भारी सुख भी नहीं हो सकता॥१॥

परि॒ प्रजा॑तः॒ क्रत्वा॑ बभूथ॒ भुवो॑ दे॒वानां॑ पि॒ता पु॒त्रः सन्॥

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। विद्यार्थी न होके कोई भी मनुष्य विद्वान् नहीं हो सकता और किसी मनुष्य को बिजुली आदि विद्या तथा उसके संप्रयोग के विना बड़ा भारी सुख भी नहीं हो सकता॥१॥

वे॒धा अदृ॑प्तो अ॒ग्निर्वि॑जा॒नन्नूध॒र्न गोनां॒ स्वाद्मा॑ पितू॒नाम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! तुम लोगों को चाहिये कि जैसे गौओं का ऐन दूध आदि से सबको सुख देता है, वैसे विद्वान् मनुष्य सब का उपकारी होता है, वैसे ही सब में अभिव्याप्त जीव के मध्य में अन्तर्य्यामी रूप से व्याप्त ईश्वर पक्षपात को छोड़ के न्याय करता है, वैसे सभा आदि में स्थित सभापति तुम सबको सुख करानेवाले होओ॥२॥

जने॒ न शेव॑ आ॒हूर्यः॒ सन्मध्ये॒ निष॑त्तो र॒ण्वो दु॑रो॒णे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! तुम लोगों को चाहिये कि जैसे गौओं का ऐन दूध आदि से सबको सुख देता है, वैसे विद्वान् मनुष्य सब का उपकारी होता है, वैसे ही सब में अभिव्याप्त जीव के मध्य में अन्तर्य्यामी रूप से व्याप्त ईश्वर पक्षपात को छोड़ के न्याय करता है, वैसे सभा आदि में स्थित सभापति तुम सबको सुख करानेवाले होओ॥२॥

पु॒त्रो न जा॒तो र॒ण्वो दु॑रो॒णे वा॒जी न प्री॒तो विशो॒ वि ता॑रीत्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को विज्ञान और विद्वानों के सङ्ग के विना सब सुख प्राप्त नहीं हो सकते, ऐसा जानना चाहिये॥३॥

विशो॒ यदह्वे॒ नृभिः॒ सनी॑ळा अ॒ग्निर्दे॑व॒त्वा विश्वा॑न्यश्याः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को विज्ञान और विद्वानों के सङ्ग के विना सब सुख प्राप्त नहीं हो सकते, ऐसा जानना चाहिये॥३॥

नकि॑ष्ट ए॒ता व्र॒ता मि॑नन्ति॒ नृभ्यो॒ यदे॒भ्यः श्रु॒ष्टिं च॒कर्थ॑॥

सब मनुष्यों को चाहिये कि जैसे परमेश्वर वा पूर्णविद्यायुक्त विद्वान् पक्षपात छोड़कर मनुष्यादि प्राणियों में सत्य उपकार करनेवाले कर्मों के साथ वर्त्तमान है, वैसे सदा वर्त्तें॥४॥

तत्तु ते॒ दंसो॒ यदह॑न्त्समा॒नैर्नृभि॒र्यद्यु॒क्तो वि॒वे रपां॑सि॥

सब मनुष्यों को चाहिये कि जैसे परमेश्वर वा पूर्णविद्यायुक्त विद्वान् पक्षपात छोड़कर मनुष्यादि प्राणियों में सत्य उपकार करनेवाले कर्मों के साथ वर्त्तमान है वैसे सदा वर्त्ते॥४॥

उ॒षो न जा॒रो वि॒भावो॒स्रः संज्ञा॑तरूप॒श्चिके॑तदस्मै॥

इस मन्त्र में श्लेष, उपमा और लुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यो को चाहिये कि जो सूर्य्य के समान विद्या का प्रकाशक, अग्नि के समान सब दुःखों को भस्म करनेवाला परमेश्वर वा विद्वान् है, उसको अपने आत्मा से आश्रय कर दुष्ट व्यवहारों को त्याग और सत्य व्यवहारों में स्थित होकर सदा सुख को प्राप्त हों॥५॥इस सूक्त में विद्वान् बिजुली और ईश्वर के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्तार्थ की पूर्वसूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥

त्मना॒ वह॑न्तो॒ दुरो॒ व्यृ॑ण्व॒न्नव॑न्त॒ विश्वे॒ स्व१॒॑र्दृशी॑के॥

इस मन्त्र में श्लेष, उपमा और लुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यो को चाहिये कि जो सूर्य्य के समान विद्या का प्रकाशक, अग्नि के समान सब दुःखों को भस्म करनेवाला परमेश्वर वा विद्वान् है, उसको अपने आत्मा से आश्रय कर दुष्ट व्यवहारों को त्याग और सत्य व्यवहारों में स्थित होकर सदा सुख को प्राप्त हों॥५॥इस सूक्त में विद्वान् बिजुली और ईश्वर के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्तार्थ की पूर्वसूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥

व॒नेम॑ पू॒र्वीर॒र्यो म॑नी॒षा अ॒ग्निः सु॒शोको॒ विश्वा॑न्यश्याः॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को जिस जगदीश्वर वा मनुष्य के कार्य्य, कारण और जीव प्रजा शुद्ध गुण और कर्मों को व्याप्त किया करे, उसी की उपासना वा सत्कार करना चाहिये, क्योंकि इसके विना मनुष्यजन्म ही व्यर्थ जाता है॥१॥

आ दैव्या॑नि व्र॒ता चि॑कि॒त्वाना मानु॑षस्य॒ जन॑स्य॒ जन्म॑॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को जिस जगदीश्वर वा मनुष्य के कार्य्य, कारण और जीव प्रजा शुद्ध गुण और कर्मों को व्याप्त किया करे, उसी की उपासना वा सत्कार करना चाहिये, क्योंकि इसके विना मनुष्यजन्म ही व्यर्थ जाता है॥१॥

गर्भो॒ यो अ॒पां गर्भो॒ वना॑नां॒ गर्भ॑श्च स्था॒तां गर्भ॑श्च॒रथा॑म्॥

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। पूर्व मन्त्र से (अश्याः) (वनेम) (विश्वानि) (दैव्यानि) (व्रता) इन पाँच पदों की अनुवृत्ति आती है। मनुष्यों को ज्ञानस्वरूप परमेश्वर के विना कोई भी वस्तु अव्याप्त नहीं है और चेतनस्वरूप जीव अपने कर्म के फल भोग से एक क्षण भी अलग नहीं रहता। इससे उस सबमें अभिव्याप्त अन्तर्य्यामी ईश्वर को जानकर सर्वदा पापों को छोड़ कर धर्मयुक्त कार्यों में प्रवृत्त होना चाहिये। जैसे पृथिवी आदि कार्यरूप प्रजा अनेक तत्त्वों के संयोग से उत्पन्न और वियोग से नष्ट होती है, वैसे यह ईश्वर जीव कारणरूप आदि वा संयोग-वियोग से अलग होने से अनादि है, ऐसा जानना चाहिये॥२॥

अद्रौ॑ चिदस्मा अ॒न्तर्दु॑रो॒णे वि॒शां न विश्वो॑ अ॒मृतः॑ स्वा॒धीः॥

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। पूर्व मन्त्र से (अश्याः) (वनेम) (विश्वानि) (दैव्यानि) (व्रता) इन पाँच पदों की अनुवृत्ति आती है। मनुष्यों को ज्ञानस्वरूप परमेश्वर के विना कोई भी वस्तु अव्याप्त नहीं है और चेतनस्वरूप जीव अपने कर्म के फल भोग से एक क्षण भी अलग नहीं रहता। इससे उस सबमें अभिव्याप्त अन्तर्य्यामी ईश्वर को जानकर सर्वदा पापों को छोड़ कर धर्मयुक्त कार्यों में प्रवृत्त होना चाहिये। जैसे पृथिवी आदि कार्यरूप प्रजा अनेक तत्त्वों के संयोग से उत्पन्न और वियोग से नष्ट होती है, वैसे यह ईश्वर जीव कारणरूप आदि वा संयोग-वियोग से अलग होने से अनादि है, ऐसा जानना चाहिये॥२॥

स हि क्ष॒पावाँ॑ अ॒ग्नी र॑यी॒णां दाश॒द्यो अ॑स्मा॒ अरं॑ सू॒क्तैः॥

इस मन्त्र में श्लेष और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को जो परमेश्वर वा विद्वान् वेद वा अन्तर्यामि द्वारा तथा उपदेशों से सब मनुष्यों के लिये सब विद्याओं को देता है, उसकी उपासना तथा सत्सङ्ग करना चाहिये॥३॥

ए॒ता चि॑कित्वो॒ भूमा॒ नि पा॑हि दे॒वानां॒ जन्म॒ मर्तां॑श्च वि॒द्वान्॥

इस मन्त्र में श्लेष और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को जो परमेश्वर वा विद्वान् वेद वा अन्तर्यामि द्वारा तथा उपदेशों से सब मनुष्यों के लिये सब विद्याओं को देता है, उसकी उपासना तथा सत्सङ्ग करना चाहिये॥३॥

वर्धा॒न्यं पू॒र्वीः क्ष॒पो विरू॑पाः स्था॒तुश्च॒ रथ॑मृ॒तप्र॑वीतम्॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को उचित है कि जिस परमेश्वर का ज्ञान करानेवाली यह सब प्रजा है वा जिसको जानना चाहिये, जिसके उत्पन्न करने के विना किसी की उत्पत्ति का सम्भव नहीं होता, जिसके पुरुषार्थ के विना कुछ भी सुख प्राप्त नहीं हो सकता और जो सत्यमानी, सत्यकारी, सत्यवादी हो, उसी का सदा सेवन करें॥४॥

अरा॑धि॒ होता॒ स्व१॒॑र्निष॑त्तः कृ॒ण्वन्विश्वा॒न्यपां॑सि स॒त्या॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को उचित है कि जिस परमेश्वर का ज्ञान करानेवाली यह सब प्रजा है वा जिसको जानना चाहिये, जिसके उत्पन्न करने के विना किसी की उत्पत्ति का सम्भव नहीं होता, जिसके पुरुषार्थ के विना कुछ भी सुख प्राप्त नहीं हो सकता और जो सत्यमानी, सत्यकारी, सत्यवादी हो, उसी का सदा सेवन करें॥४॥

गोषु॒ प्रश॑स्तिं॒ वने॑षु धिषे॒ भर॑न्त॒ विश्वे॑ ब॒लिं स्व॑र्णः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! तुम सब लोग जिस जगदीश्वर ने सनातन कारण से सब कार्य अर्थात् स्थूलरूप वस्तुओं को उत्पन्न करके स्पर्श आदि गुणों को प्रकाशित किया है, जिसकी सृष्टि में उत्पन्न हुए सब पदार्थों के पिता-पुत्र के समान सब जीव दायभागी हैं, जो सब प्राणियों के लिये सब सुखों को देता है, उसी की आत्मा, मन, वाणी, शरीर और धनों से सेवा करो॥५॥

वि त्वा॒ नरः॑ पुरु॒त्रा स॑पर्यन्पि॒तुर्न जिव्रे॒र्वि वेदो॑ भरन्त॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! तुम सब लोग जिस जगदीश्वर ने सनातन कारण से सब कार्य अर्थात् स्थूलरूप वस्तुओं को उत्पन्न करके स्पर्श आदि गुणों को प्रकाशित किया है, जिसकी सृष्टि में उत्पन्न हुए सब पदार्थों के पिता-पुत्र के समान सब जीव दायभागी हैं, जो सब प्राणियों के लिये सब सुखों को देता है, उसी की आत्मा, मन, वाणी, शरीर और धनों से सेवा करो॥५॥

सा॒धुर्न गृ॒ध्नुरस्ते॑व॒ शूरो॒ याते॑व भी॒मस्त्वे॒षः स॒मत्सु॑॥

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो! तुम लोग परमेश्वर वा धर्मात्मा विद्वान् को छोड़ कर शत्रुओं को जीतने और दण्ड देने तथा सुखों का बढ़ानेवाला अन्य कोई अपना राजा नहीं है, ऐसा निश्चय करके सब लोग परोपकारी होके सुखों को बढ़ाओ॥६॥। इस सूक्त में ईश्वर, मनुष्य और सभा आदि अध्यक्ष के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त की पूर्वसूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥

उप॒ प्र जि॑न्वन्नुश॒तीरु॒शन्तं॒ पतिं॒ न नित्यं॒ जन॑यः॒ सनी॑ळाः। स्वसा॑रः॒ श्यावी॒मरु॑षीमजुष्रञ्चि॒त्रमु॒च्छन्ती॑मु॒षसं॒ न गावः॑॥

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। सब मनुष्यों को चाहिये कि जैसे धर्मात्मा विद्वान् स्त्री विवाहित पति का और धर्मात्मा विद्वान् मनुष्य विवाहित स्त्री का सेवन करता है, जैसे प्रातःकाल होते ही किरण वा गौ आदि पशु पृथिवी आदि पदार्थों का सेवन करते हैं, वैसे ही परमेश्वर वा सभाध्यक्ष का निरन्तर सेवन करें॥१॥

वी॒ळु चि॑द्दृ॒ळ्हा पि॒तरो॑ न उ॒क्थैरद्रिं॑ रुज॒न्नङ्गि॑रसो॒ रवे॑ण। च॒क्रुर्दि॒वो बृ॑ह॒तो गा॒तुम॒स्मे अहः॒ स्व॑र्विविदुः के॒तुमु॒स्राः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि पूर्ण विद्यायुक्त विद्वानों का सेवन तथा विद्या बुद्धि को उत्पन्न करके धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष फलों का सेवन करें॥२॥

दध॑न्नृ॒तं ध॒नय॑न्नस्य धी॒तिमादिद॒र्यो दि॑धि॒ष्वो॒३॒॑ विभृ॑त्राः। अतृ॑ष्यन्तीर॒पसो॑ य॒न्त्यच्छा॑ दे॒वाञ्जन्म॒ प्रय॑सा व॒र्धय॑न्तीः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे वैश्य लोग धर्म्म के अनुकूल धन का संचय करते हैं, वैसे ही कन्या विवाह से पहले ब्रह्मचर्यपूर्वक पूर्ण विद्वान् पढ़ानेवाली स्त्रियों को प्राप्त हो पूर्णशिक्षा और विद्या का ग्रहण तथा विवाह करके प्रजासुख को सम्पादन करे। विवाह के पीछे विद्याध्ययन का समय नहीं समझना चाहिये। किसी पुरुष वा स्त्री को विद्या के पढ़ने का अधिकार नहीं है, ऐसा किसी को नहीं समझना चाहिये, किन्तु सर्वथा सबको पढ़ने का अधिकार है॥३॥

मथी॒द्यदीं॒ विभृ॑तो मात॒रिश्वा॑ गृ॒हेगृ॑हे श्ये॒तो जेन्यो॒ भूत्। आदीं॒ राज्ञे॒ न सही॑यसे॒ सचा॒ सन्ना दू॒त्यं१॒॑ भृग॑वाणो विवाय॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। विद्या-ग्रहण के विना स्त्रियों को कुछ भी सुख नहीं होता। जैसे अविद्याओं का ग्रहण किये हुए मूढ़ पुरुष उत्तम लक्षण युक्त विद्वान् स्त्रियों को पीड़ा देते हैं, वैसे विद्या शिक्षा से रहित स्त्री अपने विद्वान् पतियों को दुःख देती हैं। इससे विद्या-ग्रहण के अनन्तर ही परस्पर प्रीति के साथ स्वयंवर विधान से विवाह कर निरन्तर सुखयुक्त होना चाहिये॥४॥

म॒हे यत्पि॒त्र ईं॒ रसं॑ दि॒वे करव॑ त्सरत्पृश॒न्य॑श्चिकि॒त्वान्। सृ॒जदस्ता॑ धृष॒ता दि॒द्युम॑स्मै॒ स्वायां॑ दे॒वो दु॑हि॒तरि॒ त्विषिं॑ धात्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सब माता-पिता आदि मनुष्यों को अपने-अपने सन्तानों में विद्यास्थापन करना चाहिये। जैसे प्रकाशमान सूर्य सबको प्रकाश करके आनन्दित करता है, वैसे ही विद्यायुक्त पुत्र वा पुत्री सब सुखों को देते हैं॥५॥

स्व आ यस्तुभ्यं॒ दम॒ आ वि॒भाति॒ नमो॑ वा॒ दाशा॑दुश॒तो अनु॒ द्यून्। वर्धो॑ अग्ने॒ वयो॑ अस्य द्वि॒बर्हा॒ यास॑द्रा॒या स॒रथं॒ यं जु॒नासि॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! तुम लोगों को चाहिये कि जो तुम्हारे पिता अर्थात् उत्पन्न करनेवाले वा पढ़ानेवाले आचार्य्य तुम्हारे लिये उत्तम शिक्षा से सूर्य के समान विद्याप्रकाश वा अन्नादि दे कर सुखी रखते हैं, उनका निरन्तर सेवन करो॥६॥

अ॒ग्निं विश्वा॑ अ॒भि पृक्षः॑ सचन्ते समु॒द्रं न स्र॒वतः॑ स॒प्त य॒ह्वीः। न जा॒मिभि॒र्वि चि॑किते॒ वयो॑ नो वि॒दा दे॒वेषु॒ प्रम॑तिं चिकि॒त्वान्॥

इस मन्त्र में उपमा तथा वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे समुद्र को नदी वा प्राणों को बिजुली आदि गति संयुक्त करती हैं, वैसे ही मनुष्य सब पुत्र वा कन्या ब्रह्मचर्य्य से विद्या वा व्रतों को समाप्त करके युवावस्थावाले होकर विवाह से सन्तानों को उत्पन्न कर उनको इसी प्रकार विद्या शिक्षा सदा ग्रहण करावें। पुत्रों के लिये विद्या की उत्तम शिक्षा करने के समान कोई बड़ा उपकार नहीं है॥७॥

आ यदि॒षे नृ॒पतिं॒ तेज॒ आन॒ट्छुचि॒ रेतो॒ निषि॑क्तं॒ द्यौर॒भीके॑। अ॒ग्निः शर्ध॑मनव॒द्यं युवा॑नं स्वा॒ध्यं॑ जनयत्सू॒दय॑च्च॥

सब मनुष्यों जो जानना चाहिये कि कभी उत्तम विद्या वा प्रदीप्त अग्नि के समान विद्वान् के सङ्ग के विना व्यवहार और परमार्थ के सुख प्राप्त नहीं होते और अपने सन्तानों को विद्या देने के विना माता-पिता आदि कृतकृत्य नहीं हो सकते॥८॥

मनो॒ न योऽध्व॑नः स॒द्य एत्येकः॑ स॒त्रा सूरो॒ वस्व॑ ईशे। राजा॑ना मि॒त्रावरु॑णा सुपा॒णी गोषु॑ प्रि॒यम॒मृतं॒ रक्ष॑माणा॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे मनुष्य विद्या और विद्वानों के संग के विना विमानादि यानों को रच और उनमें स्थित होकर देश-देशान्तर में शीघ्र जाना-आना, सत्य विज्ञान, उत्तम द्रव्यों की प्राप्ति और धर्मात्मा राजा राज्य के सम्पादन करने को समर्थ नहीं हो सकते, वैसे स्त्री और पुरुषों में निरन्तर विद्या और शरीरबल की उन्नति के विना सुख की बढ़ती कभी नहीं हो सकती॥९॥

मा नो॑ अग्ने स॒ख्या पित्र्या॑णि॒ प्र म॑र्षिष्ठा अ॒भि वि॒दुष्क॒विः सन्। नभो॒ न रू॒पं ज॑रि॒मा मि॑नाति पु॒रा तस्या॑ अ॒भिश॑स्ते॒रधी॑हि॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे रूपवाले पदार्थ सूक्ष्म अवस्था को प्राप्त होकर अन्तरिक्ष में नहीं दीखते, वैसे हम लोगों के मित्रपन आदि व्यवहार नष्ट न होवें, किन्तु हम सब लोग विरोध सर्वथा छोड़कर परस्पर मित्र होके सब काल में सुखी रहें॥१०॥इस सूक्त में ईश्वर, सभाध्यक्ष, स्त्री, पुरुष, बिजुली और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये॥

नि काव्या॑ वे॒धसः॒ शश्व॑तस्क॒र्हस्ते॒ दधा॑नो॒ नर्या॑ पु॒रूणि॑। अ॒ग्निर्भु॑वद्रयि॒पती॑ रयी॒णां स॒त्रा च॑क्रा॒णो अ॒मृता॑नि॒ विश्वा॑॥

हे मनुष्यो! अनन्त सत्यविद्यायुक्त अनादि सर्वज्ञ परमेश्वर ने तुम लोगों के हित के लिए जिन अपने विद्यामय अनादिरूप वेदों को प्रकाशित किया है, उनको पढ़-पढ़ा और धर्मात्मा विद्वान् होकर धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, आदि फलों को सिद्ध करो॥१॥

अ॒स्मे व॒त्सं परि॒ षन्तं॒ न वि॑न्दन्नि॒च्छन्तो॒ विश्वे॑ अ॒मृता॒ अमू॑राः। श्र॒म॒युवः॑ पद॒व्यो॑ धियं॒धास्त॒स्थुः प॒दे प॑र॒मे चार्व॒ग्नेः॥

सब जीव अनादि हैं, जो इनके बीच मनुष्यदेहधारी हैं, उनके प्रति ईश्वर उपदेश करता है कि हे मनुष्यो! तुम सब लोग वेदों को पढ़-पढ़ा कर अज्ञान से ज्ञानवाले पुरुषार्थी होके सुख भोगो, क्योंकि वेदार्थज्ञान के विना कोई भी मनुष्य सब विद्याओं को प्राप्त नहीं हो सकता, इससे तुम लोगों को वेदविद्या की वृद्धि निरन्तर करनी उचित है॥२॥

ति॒स्रो यद॑ग्ने श॒रद॒स्त्वामिच्छुचिं॑ घृ॒तेन॒ शुच॑यः सप॒र्यान्। नामा॑नि चिद्दधिरे य॒ज्ञिया॒न्यसू॑दयन्त त॒न्वः१॒॑ सुजा॑ताः॥

कोई भी मनुष्य वेदविद्या के विना पढ़े विद्वान् नहीं हो सकता और विद्याओं के विना निश्चय करके मनुष्य जन्म की सफलता तथा पवित्रता नहीं होती, इसलिये सब मनुष्यों को उचित है कि धर्म्म का सेवन नित्य करें॥३॥

आ रोद॑सी बृह॒ती वेवि॑दानाः॒ प्र रु॒द्रिया॑ जभ्रिरे य॒ज्ञिया॑सः। वि॒दन्मर्तो॑ ने॒मधि॑ता चिकि॒त्वान॒ग्निं प॒दे प॑र॒मे त॑स्थि॒वांस॑म्॥

मनुष्यों को चाहिये कि वेद के जाननेवाले विद्वानों से उत्तम नियम द्वारा वेदविद्या को प्राप्त हो विद्वान् होके परमेश्वर तथा उसके रचे हुए जगत् को जान अन्य मनुष्यों के लिये निरन्तर विद्या देवें॥४॥

सं॒जा॒ना॒ना उप॑ सीदन्नभि॒ज्ञु पत्नी॑वन्तो नम॒स्यं॑ नमस्यन्। रि॒रि॒क्वांस॑स्त॒न्वः॑ कृण्वत॒ स्वाः सखा॒ सख्यु॑र्नि॒मिषि॒ रक्ष॑माणाः॥

इस मन्त्र में श्लेष और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। ईश्वर और विद्वान् के सत्कार करने के विना किसी मनुष्य को विद्या के पूर्ण सुख नहीं हो सकते, इसलिए मनुष्यों को चाहिये कि सत्कार करने योग्य ही मनुष्यों का सत्कार और अयोग्यों का असत्कार करें॥५॥

त्रिः स॒प्त यद्गुह्या॑नि॒ त्वे इत्प॒दावि॑द॒न्निहि॑ता य॒ज्ञिया॑सः। तेभी॑ रक्षन्ते अ॒मृतं॑ स॒जोषाः॑ प॒शूञ्च॑ स्था॒तॄञ्च॒रथं॑ च पाहि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिए कि विद्वानों का अनुकरण करें, मूर्खों का नहीं। जैसे सज्जन पुरुष उत्तम कार्यों में प्रवृत्त होते और दुष्ट कर्मों का त्याग कर देते हैं, वैसा ही सब मनुष्य करें॥६॥

वि॒द्वाँ अ॑ग्ने व॒युना॑नि क्षिती॒नां व्या॑नु॒षक्छु॒रुधो॑ जी॒वसे॑ धाः। अ॒न्त॒र्वि॒द्वाँ अध्व॑नो देव॒याना॒नत॑न्द्रो दू॒तो अ॑भवो हवि॒र्वाट्॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जो प्रार्थना वा सेवन किया हुआ ईश्वर धर्ममार्ग वा विज्ञान को दिखाकर सुखों को देता है, उनका सेवन अवश्य करना चाहिये॥७॥

स्वा॒ध्यो॑ दि॒व आ स॒प्त य॒ह्वी रा॒यो दुरो॒ व्यृ॑त॒ज्ञा अ॑जानन्। वि॒दद्गव्यं॑ स॒रमा॑ दृ॒ळ्हमू॒र्वं येना॒ नु कं॒ मानु॑षी॒ भोज॑ते॒ विट्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को यह योग्य है कि जैसे विद्या को पढ़े, वैसी ही कपट-छल छोड़ कर सब मनुष्यों को पढ़ावें और उपदेश करें, जिससे मनुष्य लोग सब सुखों को प्राप्त हो॥८॥

आ ये विश्वा॑ स्वप॒त्यानि॑ त॒स्थुः कृ॑ण्वा॒नासो॑ अमृत॒त्वाय॑ गा॒तुम्। म॒ह्ना म॒हद्भिः॑ पृथि॒वी वि त॑स्थे मा॒ता पु॒त्रैरदि॑ति॒र्धाय॑से॒ वेः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को विद्वानों के समान अपने सन्तानों को विद्या शिक्षा से युक्त करके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी सुखों को प्राप्त करना चाहिये॥९॥

अधि॒ श्रियं॒ नि द॑धु॒श्चारु॑मस्मिन्दि॒वो यद॒क्षी अ॒मृता॒ अकृ॑ण्वन्। अध॑ क्षरन्ति॒ सिन्ध॑वो॒ न सृ॒ष्टाः प्र नीची॑रग्ने॒ अरु॑षीरजानन्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो! तुम लोग यथायोग्य विद्वानों के आचरण को स्वीकार करो और अविद्वानों का नहीं। तथा जैसे नदी सुखों के होने की हेतु होती है, वैसे सबके लिये सुखों को उत्पन्न करो॥१०॥इस सूक्त में ईश्वर और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये॥

र॒यिर्न यः पि॑तृवि॒त्तो व॑यो॒धाः सु॒प्रणी॑तिश्चिकि॒तुषो॒ न शासुः॑। स्यो॒न॒शीरति॑थि॒र्न प्री॑णा॒नो होते॑व॒ सद्म॑ विध॒तो वि ता॑रीत्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। विद्याधर्मानुष्ठान, विद्वानों का संग तथा उत्तमविचार के विना किसी मनुष्य को विद्या और सुशिक्षा का साक्षात्कार, पदार्थों का ज्ञान नहीं होता और निरन्तर भ्रमण करनेवाले अतिथि विद्वानों के उपदेश के विना कोई मनुष्य सन्देहरहित नहीं हो सकता, इससे सब मनुष्यों को अच्छा आचरण करना चाहिये॥९॥

दे॒वो न यः स॑वि॒ता स॒त्यम॑न्मा॒ क्रत्वा॑ नि॒पाति॑ वृ॒जना॑नि॒ विश्वा॑। पु॒रु॒प्र॒श॒स्तो अ॒मति॒र्न स॒त्य आ॒त्मेव॒ शेवो॑ दिधि॒षाय्यो॑ भूत्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्य विद्वानों के सत्संग से सत्यविद्या, बल, सुख और सौन्दर्य आदि के प्राप्त होने को समर्थ हो सकते हैं, इससे इन दोनों का सेवन निरन्तर करें॥२॥

दे॒वो न यः पृ॑थि॒वीं वि॒श्वधा॑या उप॒क्षेति॑ हि॒तमि॑त्रो॒ न राजा॑। पु॒रः॒सदः॑ शर्म॒सदो॒ न वी॒रा अ॑नव॒द्या पति॑जुष्टेव॒ नारी॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्य लोग परमेश्वर वा विद्वानों के साथ प्रेम प्रीति से वर्त्तने के विना सब बल वा सुखों को प्राप्त नहीं हो सकते, इससे इन्हींके साथ सदा प्रीति करें॥३॥

तं त्वा॒ नरो॒ दम॒ आ नित्य॑मि॒द्धमग्ने॒ सच॑न्त क्षि॒तिषु॑ ध्रु॒वासु॑। अधि॑ द्यु॒म्नं नि द॑धु॒र्भूर्य॑स्मि॒न्भवा॑ वि॒श्वायु॑र्ध॒रुणो॑ रयी॒णाम्॥

हे मनुष्यो! तुम लोग जिस जगदीश्वर ने अनेक पदार्थों को रच कर धारण किये हैं और जिस विद्वान् ने जाने हैं, उसकी उपासना वा सत्संग के विना किसी मनुष्य को सुख नहीं होता, ऐसा जानो॥४॥

वि पृक्षो॑ अग्ने म॒घवा॑नो अश्यु॒र्वि सू॒रयो॒ दद॑तो॒ विश्व॒मायुः॑। स॒नेम॒ वाजं॑ समि॒थेष्व॒र्यो भा॒गं दे॒वेषु॒ श्रव॑से॒ दधा॑नाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्य ईश्वर और विद्वानों के सहाय और अपने पुरुषार्थ से सब सुखों को प्राप्त हो सकते हैं, अन्यथा नहीं॥५॥

ऋ॒तस्य॒ हि धे॒नवो॑ वावशा॒नाः स्मदू॑ध्नीः पी॒पय॑न्त॒ द्युभ॑क्ताः। प॒रा॒वतः॑ सुम॒तिं भिक्ष॑माणा॒ वि सिन्ध॑वः स॒मया॑ सस्रु॒रद्रि॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे यज्ञ से सम्यक् प्रकार शोधा हुआ जल शक्ति को बढ़ानेवाला होकर विज्ञान को बढ़ाता है, वैसे ही धर्मात्मा विद्वान् हों॥६॥

त्वे अ॑ग्ने सुम॒तिं भिक्ष॑माणा दि॒वि श्रवो॑ दधिरे य॒ज्ञिया॑सः। नक्ता॑ च च॒क्रुरु॒षसा॒ विरू॑पे कृ॒ष्णं च॒ वर्ण॑मरु॒णं च॒ सं धुः॑॥

परमेश्वर की सृष्टि के विज्ञान के विना कोई मनुष्य पूर्ण विद्वान् होने को समर्थ नहीं होता। जैसे रात्री-दिवस भिन्न-भिन्न रूपवाले हैं, वैसे ही अनुकूल और विरुद्ध धर्मादि के विज्ञान से सब पदार्थों को जान के उपयोग में लेवें॥७॥

यान्रा॒ये मर्ता॒न्त्सुषू॑दो अग्ने॒ ते स्या॑म म॒घवा॑नो व॒यं च॑। छा॒येव॒ विश्वं॒ भुव॑नं सिसक्ष्यापप्रि॒वान्रोद॑सी अ॒न्तरि॑क्षम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि ईश्वर की उपासना और अपने पुरुषार्थ से आप विद्यादि धनवाले होकर सब मनुष्यों को भी करें॥८॥

अर्व॑द्भिरग्ने॒ अर्व॑तो॒ नृभि॒र्नॄन् वी॒रैर्वी॒रान्व॑नुयामा॒ त्वोताः॑। ई॒शा॒नासः॑ पितृवि॒त्तस्य॑ रा॒यो वि सू॒रयः॑ श॒तहि॑मा नो अश्युः॥

मनुष्य लोग ईश्वर के गुण, कर्म्म, स्वभाव के अनुकूल वर्त्तने और अपने पुरुषार्थ के विना उत्तम विद्या और पदार्थों के प्राप्त होने को समर्थ नहीं हो सकते, इससे इसका सदा अनुष्ठान करना उचित है॥९॥

ए॒ता ते॑ अग्न उ॒चथा॑नि वेधो॒ जुष्टा॑नि सन्तु॒ मन॑से हृ॒दे च॑। श॒केम॑ रा॒यः सु॒धुरो॒ यमं॒ तेऽधि॒ श्रवो॑ दे॒वभ॑क्तं॒ दधा॑नाः॥

मनुष्यों को चाहिये कि आप सब सुखों को प्राप्त होकर और सभी के लिये प्राप्त करावें॥१०॥इस सूक्त में ईश्वर, अग्नि, विद्वान् और सूर्य के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्तार्थ की पूर्वसूक्तार्थ के साथ सङ्गति समझनी उचित है॥

सूक्तम्

उ॒प॒प्र॒यन्तो॑ अध्व॒रं मन्त्रं॑ वोचेमा॒ग्नये॑। आ॒रे अ॒स्मे च॑ शृण्व॒ते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि बाहर-भीतर व्याप्त होके हम लोगों के दूर-समीप व्यवहार के कर्मों को जानते हुए परमात्मा को जानकर, अधर्म से अलग होकर, सत्य धर्म का सेवन करके आनन्दयुक्त रहें॥१॥

यः स्नीहि॑तीषु पू॒र्व्यः सं॑जग्मा॒नासु॑ कृ॒ष्टिषु॑। अर॑क्षद्दा॒शुषे॒ गय॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। पूर्व मन्त्र से (अग्नये) (अध्वरम्) (मन्त्रम्) (वोचेम) इन चार पदों की अनुवृत्ति आती है। प्रजा में रहनेवाले किसी जीव का परमेश्वर के विना रक्षण और सुख नहीं हो सकता, इससे सब मनुष्यों को उचित है कि इसका सेवन सर्वदा करें॥२॥

उ॒त ब्रु॑वन्तु ज॒न्तव॒ उद॒ग्निर्वृ॑त्र॒हाज॑नि। ध॒नं॒ज॒यो रणे॑रणे॥

हे मनुष्यो! तुम जिसके आश्रय से शत्रुओं के पराजय द्वारा अपने विजय से राज्यधनों की प्राप्ति होती है, उस परमेश्वर का नित्य सेवन किया करो॥३॥

यस्य॑ दू॒तो असि॒ क्षये॒ वेषि॑ ह॒व्यानि॑ वी॒तये॑। द॒स्मत्कृ॒णोष्य॑ध्व॒रम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिस मनुष्य ने परमेश्वर के समान विद्वान् पढ़ाने और उपदेश करनेवाले की चाहना की है, उसको कभी दुःख नहीं होता॥४॥

तमित्सु॑ह॒व्यम॑ङ्गिरः सुदे॒वं स॑हसो यहो। जना॑ आहुः सुब॒र्हिष॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों के संग से पदार्थविद्या को जान और सम्यक् परीक्षा करके अन्य मनुष्यों को जनावें॥५॥

आ च॒ वहा॑सि॒ ताँ इ॒ह दे॒वाँ उप॒ प्रश॑स्तये। ह॒व्या सु॑श्चन्द्र वी॒तये॑॥

जब तक मनुष्य परमेश्वर के जानने के लिये धर्मात्मा विद्वान् पुरुषों से शिक्षा और अग्नि आदि पदार्थों से उपकार लेने में ठीक-ठीक पुरुषार्थ नहीं करते, तब तक पूर्ण विद्या को प्राप्त कभी नहीं हो सकते॥६॥

न योरु॑प॒ब्दिरश्व्यः॑ शृ॒ण्वे रथ॑स्य॒ कच्च॒न। यद॑ग्ने॒ यासि॑ दू॒त्य॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्य लोग शिल्पविद्या से सिद्ध किये हुए यान और यन्त्रादिकों में युक्त अत्यन्त गमन करानेवाले अग्नि के समीपस्थ शब्द के निकट अन्य शब्दों को नहीं सुन सकते॥७॥

त्वोतो॑ वा॒ज्यह्र॑यो॒ऽभि पूर्व॑स्मा॒दप॑रः। प्र दा॒श्वाँ अ॑ग्ने अस्थात्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को यह जानना चाहिये कि शिल्पविद्यासिद्ध यन्त्रों के विना अग्नि यानों का चलानेवाला नहीं होता॥८॥

उ॒त द्यु॒मत्सु॒वीर्यं॑ बृ॒हद॑ग्ने विवाससि। दे॒वेभ्यो॑ देव दा॒शुषे॑॥

जो कार्यों के स्वामी होवें, उन विद्वानों के सकाश से विद्या और पुरुषार्थ करके विद्वान् तथा भृत्यों को बड़े-बड़े उपकारों का ग्रहण करना चाहिये॥९॥इस सूक्त में ईश्वर विद्वान् और विद्युत् अग्नि के गुणों का वर्णन होने से पूर्वसूक्तार्थ के साथ इस सूक्त की सङ्गति है॥

जु॒षस्व॑ स॒प्रथ॑स्तमं॒ वचो॑ दे॒वप्स॑रस्तमम्। ह॒व्या जुह्वा॑न आ॒सनि॑॥

जो मनुष्य युक्तिपूर्वक भोजन, पान और चेष्टाओं से युक्त ब्रह्मचारी हों, वे शरीर और आत्मा के सुख को प्राप्त होते हैं॥१॥

अथा॑ ते अङ्गिरस्त॒माग्ने॑ वेधस्तम प्रि॒यम्। वो॒चेम॒ ब्रह्म॑ सान॒सि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वेदादि सत्यशास्त्रों के उपदेश के विना किसी मनुष्य को परमेश्वर और विद्युत् अग्नि आदि पदार्थों के विषय का ज्ञान नहीं होता॥२॥

कस्ते॑ जा॒मिर्जना॑ना॒मग्ने॒ को दा॒श्व॑ध्वरः। को ह॒ कस्मि॑न्नसि श्रि॒तः॥

बहुत मनुष्यों में कोई ऐसा होता है कि जो परमेश्वर और अग्न्यादि पदार्थों को ठीक-ठीक जाने और जनावे, क्योंकि ये दोनों अत्यन्त आश्चर्य्य गुण, कर्म और स्वभाववाले हैं॥३॥

त्वं जा॒मिर्जना॑ना॒मग्ने॑ मि॒त्रो अ॑सि प्रि॒यः। सखा॒ सखि॑भ्य॒ ईड्यः॑॥

मनुष्यों को उस परमेश्वर और उस विद्वान् मनुष्य की सेवा क्यों नहीं करनी चाहिये कि जो संसार में विद्यादि शुभ गुण और सबको सुख देता है॥४॥

यजा॑ नो मि॒त्रावरु॑णा॒ यजा॑ दे॒वाँ ऋ॒तं बृ॒हत्। अग्ने॒ यक्षि॒ स्वं दम॑म्॥

जैसे परमेश्वर का परोपकार के लिये न्याय आदि शुभ गुण देने का स्वभाव है, वैसे ही विद्वानों को भी अपना स्वभाव रखना चाहिये॥५॥इस सूक्त में ईश्वर अग्नि और विद्वान् के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये॥

का त॒ उपे॑ति॒र्मन॑सो॒ वरा॑य॒ भुव॑दग्ने॒ शंत॑मा॒ का म॑नी॒षा। को वा॑ य॒ज्ञैः परि॒ दक्षं॑ त आप॒ केन॑ वा ते॒ मन॑सा दाशेम॥

मनुष्यों को परमेश्वर और विद्वान् से ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये कि हे परमात्मन् वा विद्वान् पुरुष! आप कृपा करके हमारी शुद्धि के लिये श्रेष्ठ कर्म, श्रेष्ठ बुद्धि और श्रेष्ठ बल को दीजिये, जिससे हम लोग आपको जान और प्राप्त होके सुखी हों॥१॥

एह्य॑ग्न इ॒ह होता॒ नि षी॒दाद॑ब्धः॒ सु पु॑रए॒ता भ॑वा नः। अव॑तां त्वा॒ रोद॑सी विश्वमि॒न्वे यजा॑ म॒हे सौ॑मन॒साय॑ दे॒वान्॥

इस प्रकार सत्यभाव से प्रार्थना किया हुआ परमेश्वर और सेवा किया हुआ धर्मात्मा विद्वान् सब सुख मनुष्यों को देता है॥२॥

प्र सु विश्वा॑न्र॒क्षसो॒ धक्ष्य॑ग्ने॒ भवा॑ य॒ज्ञाना॑मभिशस्ति॒पावा॑। अथा व॑ह॒ सोम॑पतिं॒ हरि॑भ्यामाति॒थ्यम॑स्मै चकृमा सु॒दाव्ने॑॥

यहाँ वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे ईश्वर ने जगत् में प्राणियों के वास्ते सब पदार्थ दिये हैं, वैसे जो मनुष्य उत्तम विद्या और शिक्षा देवे उसीका सत्कार करें, अन्य का नहीं॥३॥

प्र॒जाव॑ता॒ वच॑सा॒ वह्नि॑रा॒सा च॑ हु॒वे नि च॑ सत्सी॒ह दे॒वैः। वेषि॑ हो॒त्रमु॒त पो॒त्रं य॑जत्र बो॒धि प्र॑यन्तर्जनित॒र्वसू॑नाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्य परमेश्वर और धार्मिक विद्वानों के सहाय और संग से शुद्धि को प्राप्त होकर सब श्रेष्ठ वस्तुओं को प्राप्त हों॥४॥

यथा॒ विप्र॑स्य॒ मनु॑षो ह॒विर्भि॑र्दे॒वाँ अय॑जः क॒विभिः॑ क॒विः सन्। ए॒वा हो॑तः सत्यतर॒ त्वम॒द्याग्ने॑ म॒न्द्रया॑ जु॒ह्वा॑ यजस्व॥

जैसे कोई मनुष्य विद्वानों से सब विद्याओं को प्राप्त करके सबका उपकारक हो, सब प्राणियों को सुख दे, सब मनुष्यों को विद्वान् करके आनन्दित होता है, वैसे ही आप्त अर्थात् पूर्ण विद्वान् धार्मिक होता है॥५॥इस सूक्त में ईश्वर और विद्वान् के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये॥

क॒था दा॑शेमा॒ग्नये॒ कास्मै॑ दे॒वजु॑ष्टोच्यते भा॒मिने॒ गीः। यो मर्त्ये॑ष्व॒मृत॑ ऋ॒तावा॒ होता॒ यजि॑ष्ठ॒ इत्कृ॒णोति॑ दे॒वान्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् ईश्वर की स्तुति और विद्वानों को सेवन करके दिव्य गुणों को प्राप्त होकर सुखों को प्राप्त होता है, वैसे ही हम लोगों को सेवन करना चाहिये॥१॥

यो अ॑ध्व॒रेषु॒ शंत॑म ऋ॒तावा॒ होता॒ तमू॒ नमो॑भि॒रा कृ॑णुध्वम्। अ॒ग्निर्यद्वेर्मर्ता॑य दे॒वान्त्स चा॒ बोधा॑ति॒ मन॑सा यजाति॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। परमेश्वर और धर्मात्मा मनुष्य के विना मनुष्य को विद्या का देनेवाला कोई दूसरा नहीं है तथा उन दोनों को छोड़ के उपासना तथा सत्कार भी किसी का न करना चाहिये॥२॥

स हि क्रतुः॒ स मर्यः॒ स सा॒धुर्मि॒त्रो न भू॒दद्भु॑तस्य र॒थीः। तं मेधे॑षु प्रथ॒मं दे॑व॒यन्ती॒र्विश॒ उप॑ ब्रुवते द॒स्ममारीः॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि जो सबसे अधिक गुण, कर्म और स्वभाव तथा सबका उपकार करनेवाला सज्जन मनुष्य है, उसीको सभाध्यक्ष का अधिकार देके राजा माने अर्थात् किसी एक मनुष्य को स्वतन्त्र राज्य का अधिकार न देवें, किन्तु शिष्ट पुरुषों की जो सभा है, उसके आधीन राज्य के सब काम रक्खें॥३॥

स नो॑ नृ॒णां नृत॑मो रि॒शादा॑ अ॒ग्निर्गिरोऽव॑सा वेतु धी॒तिम्। तना॑ च॒ ये म॒घवा॑नः॒ शवि॑ष्ठा॒ वाज॑प्रसूता इ॒षय॑न्त॒ मन्म॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि अत्युत्तम सभाध्यक्ष मनुष्यों के सहित सभा बना के राज्यव्यवहार की रक्षा से चक्रवर्त्तिराज्य की शिक्षा करे, इसके विना कभी स्थिर राज्य नहीं हो सकता, इसलिये पूर्वोक्त कर्म का अनुष्ठान करके एक को राजा नहीं मानना चाहिये॥४॥

ए॒वाग्निर्गोत॑मेभिर्ऋ॒तावा॒ विप्रे॑भिरस्तोष्ट जा॒तवे॑दाः। स ए॑षु द्यु॒म्नं पी॑पय॒त्स वाजं॒ स पु॒ष्टिं या॑ति॒ जोष॒मा चि॑कि॒त्वान्॥

मनुष्यों को चाहिये कि श्रेष्ठ धर्मात्मा विद्वानों के साथ उनकी सभा में रहकर उनसे विद्या और शिक्षा को प्राप्त होके सुखों का सेवन करे॥५॥इस सूक्त में ईश्वर, विद्वान् और अग्नि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये॥

अ॒भि त्वा॒ गोत॑मा गि॒रा जात॑वेदो॒ विच॑र्षणे। द्यु॒म्नैर॒भि प्र णो॑नुमः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सब मनुष्यों को चाहिये कि परमेश्वर की उपासना और विद्वानों का सङ्ग करके विद्या का विचार करें॥१॥

तमु॑ त्वा॒ गोत॑मो गि॒रा रा॒यस्का॑मो दुवस्यति। द्यु॒म्नैर॒भि प्र णो॑नुमः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को ऐसा विचार अपने मन में सदैव रखना चाहिये कि परमेश्वर की उपासना और विद्वान् मनुष्य के संग के विना हम लोगों की धन की कामना पूरी कभी नहीं हो सकती॥२॥

तमु॑ त्वा वाज॒सात॑ममङ्गिर॒स्वद्ध॑वामहे। द्यु॒म्नैर॒भि प्र णो॑नुमः॥

हे मनुष्यो! तुम लोग विद्वान् को उक्त प्रकार के सत्कार से सन्तुष्ट करके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध करो॥३॥

तमु॑ त्वा वृत्र॒हन्त॑मं॒ यो दस्यूँ॑रवधूनु॒षे। द्यु॒म्नैर॒भि प्र णो॑नुमः॥

हे मनुष्यो! तुम लोग जिसका कोई शत्रु न हो ऐसा विद्वान् सभाध्यक्ष जो कि दुष्ट शत्रुओं को परास्त कर सके, उसकी सदैव सेवा करो॥४॥

अवो॑चाम॒ रहू॑गणा अ॒ग्नये॒ मधु॑म॒द्वचः॑। द्यु॒म्नैर॒भि प्र णो॑नुमः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को अत्यावश्यक है कि धर्मयुक्त कीर्त्तिवाले मनुष्यों ही की प्रशंसा करें, अन्य की नहीं॥५॥इस सूक्त में ईश्वर और विद्वानों के गुणकथन से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥

हिर॑ण्यकेशो॒ रज॑सो विसा॒रेऽहि॒र्धुनि॒र्वात॑इव॒ ध्रजी॑मान्। शुचि॑भ्राजा उ॒षसो॒ नवे॑दा॒ यश॑स्वतीरप॒स्युवो॒ न स॒त्याः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो कन्या लोग चौबीस वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य्यसेवन और जितेन्द्रिय होकर छः अङ्ग अर्थात् शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष, उपाङ्ग अर्थात् मीमांसा, वैशेषिक, न्याय, योग, सांख्य और वेदान्त तथा आयुर्वेद अर्थात् वैद्यक विद्या आदि को पढ़ती हैं, वे सब संसारस्थ मनुष्य जाति की शोभा करनेवाली होती हैं॥१॥

आ ते॑ सुप॒र्णा अ॑मिनन्तँ॒ एवैः॑ कृ॒ष्णो नो॑नाव वृष॒भो यदी॒दम्। शि॒वाभि॒र्न स्मय॑मानाभि॒रागा॒त्पत॑न्ति॒ मिहः॑ स्त॒नय॑न्त्य॒भ्रा॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार और उपमालङ्कार हैं। जिन विद्वान् ब्रह्मचारियों की विदुषी ब्रह्मचारिणी स्त्री हों, वे पूर्ण सुख को क्यों न प्राप्त हों॥२॥

यदी॑मृ॒तस्य॒ पय॑सा॒ पिया॑नो॒ नय॑न्नृ॒तस्य॑ प॒थिभी॒ रजि॑ष्ठैः। अ॒र्य॒मा मि॒त्रो वरु॑णः॒ परि॑ज्मा॒ त्वचं॑ पृञ्च॒न्त्युप॑रस्य॒ योनौ॑॥

जब कार्य्य और कारण में रहनेवाले प्राण और जलादि पदार्थों के साथ जीव सम्बन्ध को प्राप्त होते हैं, तब शरीरों के धारण करने को समर्थ होते हैं॥३॥

अग्ने॒ वाज॑स्य॒ गोम॑त॒ ईशा॑नः सहसो यहो। अ॒स्मे धे॑हि जातवेदो॒ महि॒ श्रवः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य विद्वान् माता और पिताओं के सन्तान होके माता, पिता और आचार्य्य से विद्या की शिक्षा को प्राप्त होकर बहुत अन्नादि ऐश्वर्य और विद्याओं को प्राप्त हों, वे अन्य मनुष्यों में भी यह सब बढ़ावें॥४॥

स इ॑धा॒नो वसु॑ष्क॒विर॒ग्निरी॒ळेन्यो॑ गि॒रा। रे॒वद॒स्मभ्यं॑ पुर्वणीक दीदिहि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। पूर्व मन्त्र से (श्रवः) इस पद की अनुवृत्ति आती है। जैसे बिजुली प्रसिद्ध पावक सूर्य अग्नि सब मूर्तिमान् द्रव्य को प्रकाश करता है, वैसे सर्वविद्यावित् सत्पुरुष सब विद्या का प्रकाश करता है॥५॥

क्ष॒पो रा॑जन्नु॒त त्मनाग्ने॒ वस्तो॑रु॒तोषसः॑। स ति॑ग्मजम्भ र॒क्षसो॑ दह॒ प्रति॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सविता निकट प्राप्त जगत् को प्रकाशित कर वृष्टि करके सब जगत् की रक्षा और अन्धकार का निवारण करता है, वैसे सज्जन राजा लोग धार्मिकों की रक्षा कर दुष्टों के दण्ड से राज्य की रक्षा करें॥६॥

अवा॑ नो अग्न ऊ॒तिभि॑र्गाय॒त्रस्य॒ प्रभ॑र्मणि। विश्वा॑सु धी॒षु व॑न्द्य॥

सब मनुष्यों को चाहिये कि जो सभाध्यक्ष विद्वान् हमारी बुद्धि को शुद्ध करता है, उसका सत्कार करें॥७॥

आ नो॑ अग्ने र॒यिं भ॑र सत्रा॒साहं॒ वरे॑ण्यम्। विश्वा॑सु पृ॒त्सु दु॒ष्टर॑म्॥

मनुष्यों को सभाध्यक्ष आदि के आश्रय और अग्न्यादि पदार्थों के विज्ञान के विना सम्पूर्ण सुख प्राप्त कभी नहीं हो सकता॥८॥

आ नो॑ अग्ने सुचे॒तुना॑ र॒यिं वि॒श्वायु॑पोषसम्। मा॒र्डी॒कं धे॑हि जी॒वसे॑॥

मनुष्यों को अच्छी प्रकार सेवा किया हुआ विद्वान् विज्ञान और धन को देके पूर्ण आयु भोगने के लिये विद्या धन को देता है॥९॥

प्र पू॒तास्ति॒ग्मशो॑चिषे॒ वाचो॑ गोतमा॒ग्नये॑। भर॑स्व सुम्न॒युर्गिरः॑॥

जिस कारण परमेश्वर और परम विद्वान् के विना कोई दूसरा सत्यविद्या के प्रकाश करने को समर्थ नहीं होता, इसलिए ईश्वर और विद्वान् की सदा सेवा करनी चाहिये॥१०॥

यो नो॑ अग्नेऽभि॒दास॒त्यन्ति॑ दू॒रे प॑दी॒ष्ट सः। अ॒स्माक॒मिद्वृ॒धे भ॑व॥

मनुष्यों को उस ईश्वर की, जो बाहर-भीतर सर्वत्र व्यापक होके ज्ञान देता है तथा जो विद्वान् दूर वा समीप स्थित होके सत्य उपदेश से विद्या देता है, उसकी सेवा क्यों न करनी चाहियेि अर्थात् अवश्य करनी चाहिये॥११॥

स॒ह॒स्रा॒क्षो विच॑र्षणिर॒ग्नी रक्षां॑सि सेधति। होता॑ गृणीत उ॒क्थ्यः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। परमेश्वर वा विद्वान् जिन कर्मों के करने की आज्ञा देवे उनको करो और जिनका निषेध करे उनको छोड़ दो॥१२॥इस सूक्त में अग्नि ईश्वर और विद्वान् के गुणों का वर्णन होने से इसके अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये॥

इ॒त्था हि सोम॒ इन्मदे॑ ब्र॒ह्मा च॒कार॒ वर्ध॑नम्। शवि॑ष्ठ वज्रि॒न्नोज॑सा पृथि॒व्या निः श॑शा॒ अहि॒मर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥

मनुष्यों को चाहिये कि चक्रवर्त्तिराज्य की सामग्री इकट्ठी कर और उसकी रक्षा करके विद्या और सुख की निरन्तर वृद्धि करें॥१॥

स त्वा॑मद॒द्वृषा॒ मदः॒ सोमः॑ श्ये॒नाभृ॑तः सु॒तः। येना॑ वृ॒त्रं निर॒द्भ्यो ज॒घन्थ॑ वज्रि॒न्नोज॒सार्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जिन पदार्थों और कामों से प्रजा प्रसन्न हो, उनसे प्रजा की उन्नति करें और शत्रुओं की निवृत्ति करके धर्मयुक्त राज्य की नित्य प्रशंसा करें॥२॥

प्रेह्य॒भी॑हि धृष्णु॒हि न ते॒ वज्रो॒ नि यं॑सते। इन्द्र॑ नृ॒म्णं हि ते॒ शवो॒ हनो॑ वृ॒त्रं जया॑ अ॒पोऽर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजपुरुष सूर्यप्रकाश के तुल्य प्रसिद्ध कीर्त्तिवाले हैं, वे राज्य के ऐश्वर्य के भोगनेहारे होते हैं॥३॥

निरि॑न्द्र॒ भूम्या॒ अधि॑ वृ॒त्रं ज॑घन्थ॒ निर्दि॒वः। सृ॒जा म॒रुत्व॑ती॒रव॑ जी॒वध॑न्या इ॒मा अ॒पोऽर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राज्य करने की इच्छा करे, वह विद्या, धर्म और विशेष नीति का प्रचार करके आप धर्म्मात्मा होकर, सब प्रजाओं में पिता के समान वर्त्ते॥४॥

इन्द्रो॑ वृ॒त्रस्य॒ दोध॑तः॒ सानुं॒ वज्रे॑ण हीळि॒तः। अ॒भि॒क्रम्याव॑ जिघ्नते॒ऽपः सर्मा॑य चो॒दय॒न्नर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सूर्य के समान अविद्यान्धकार को छुड़ा, विद्या का प्रकाश कर, दुष्टों को दण्ड और धर्मात्माओं का सत्कार करते हैं, वे विद्वानों में सत्कार को प्राप्त होते हैं॥५॥

अधि॒ सानौ॒ नि जि॑घ्नते॒ वज्रे॑ण श॒तप॑र्वणा। म॒न्दा॒न इन्द्रो॒ अन्ध॑सः॒ सखि॑भ्यो गा॒तुमि॑च्छ॒त्यर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥

इस मन्त्र में श्लेष [और] लुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे सब जगत् का उपकार करनेवाला सूर्य्य है, वैसे ही सभाध्यक्ष आदि को भी होना चाहिये॥६॥

इन्द्र॒ तुभ्य॒मिद॑द्रि॒वोऽनु॑त्तं वज्रिन्वी॒र्य॑म्। यद्ध॒ त्यं मा॒यिनं॑ मृ॒गं तमु॒ त्वं मा॒यया॑वधी॒रर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥

जो प्रजा रक्षा के लिये सूर्य के समान शरीर और आत्मा तथा न्यायविद्याओं का प्रकाश करके कपटियों को दण्ड देते हैं, वे राज्य के बढ़ाने और करों को प्राप्त होने में समर्थ होते हैं॥७॥

वि ते॒ वज्रा॑सो अस्थिरन्नव॒तिं ना॒व्या॒३॒॑अनु॑। म॒हत्त॑ इन्द्र वी॒र्यं॑ बा॒ह्वोस्ते॒ बलं॑ हि॒तमर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥

जो विद्वान् राज्य के बढ़ाने की इच्छा करें, वे बड़ी अग्नियन्त्र से चलाने योग्य नौकाओं को बनाकर द्वीप-द्वीपान्तरों में जा-आ के व्यवहार से धन आदि के लाभों को बढ़ा के अपने राज्य को धन-धान्य से सुभूषित करें॥८॥

स॒हस्रं॑ सा॒कम॑र्चत॒ परि॑ ष्टोभत विंश॒तिः। श॒तैन॒मन्व॑नोनवु॒रिन्द्रा॑य॒ ब्रह्मोद्य॑त॒मर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥

मनुष्यों को विरोध के विना छोड़े परस्पर सुख कभी नहीं होता। मनुष्यों को उचित है कि विद्या तथा उत्तम सुख से रहित और निन्दित मनुष्य को सभाध्यक्ष आदि का अधिकार कभी न देवें॥९॥

इन्द्रो॑ वृ॒त्रस्य॒ तवि॑षीं॒ निर॑ह॒न्त्सह॑सा॒ सहः॑। म॒हत्तद॑स्य॒ पौंस्यं॑ वृ॒त्रं ज॑घ॒न्वाँ अ॑सृज॒दर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य अत्यन्त बल और तेज से सबका आकर्षण और प्रकाश करता है, वैसे सभाध्यक्ष आदि को उचित है कि अपने अत्यन्त बल से शुभ गुणों के आकर्षण और न्याय के प्रकाश से राज्य की शिक्षा करें॥१०॥

इ॒मे चि॒त्तव॑ म॒न्यवे॒ वेपे॑ते भि॒यसा॑ म॒ही। यदि॑न्द्र वज्रि॒न्नोज॑सा वृ॒त्रं म॒रुत्वाँ॒ अव॑धी॒रर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सभाप्रबन्ध के होने से सुखपूर्वक प्रजा के मनुष्य अच्छे मार्ग में चलते-चलाते हैं, वैसे ही सूर्य के आकर्षण से सब भूगोल इधर-उधर चलते-फिरते हैं। जैसे सूर्य मेघ को वर्षा के सब प्रजा का पालन करता है, वैसे सभा और सभापति आदि को भी चाहिये कि शत्रु और अन्याय का नाश करके विद्या और न्याय के प्रचार से प्रजा का पालन करें॥११॥

न वेप॑सा॒ न त॑न्य॒तेन्द्रं॑ वृ॒त्रो वि बी॑भयत्। अ॒भ्ये॑नं॒ वज्र॑ आय॒सः स॒हस्र॑भृष्टिराय॒तार्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मेघ आदि सूर्य्य को नहीं जीत सकते, वैसे ही शत्रु भी धर्मात्मा सभा और सभापति का तिरस्कार नहीं कर सकते॥१२॥

यद्वृ॒त्रं तव॑ चा॒शनिं॒ वज्रे॑ण स॒मयो॑धयः। अहि॑मिन्द्र॒ जिघां॑सतो दि॒वि ते॑ बद्बधे॒ शवोऽर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य अपने बहुत से किरणों से बिजुली और मेघ का परस्पर युद्ध करता है, वैसे ही सेनापति आग्नेय आदि अस्त्रयुक्त सेना को शत्रुसेना के साथ युद्ध करावे। इस प्रकार के सेनापति का कभी पराजय नहीं हो सकता॥१३॥

अ॒भि॒ष्ट॒ने ते॑ अद्रिवो॒ यत्स्था जग॑च्च रेजते। त्वष्टा॑ चि॒त्तव॑ म॒न्यव॒ इन्द्र॑ वेवि॒ज्यते॑ भि॒यार्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिए कि जैसे सूर्य के योग से प्राणधारी अपने-अपने कर्म में वर्त्तते और सब भूगोल अपनी-अपनी कक्षा में यथावत् भ्रमण करते हैं, वैसे ही सभा से प्रशासन किये राज्य के संयोग से सब मनुष्यादि प्राणी धर्म के साथ अपने-अपने व्यवहार में वर्त्त के सन्मार्ग में अनुकूलता से गमनागमन करते हैं॥१४॥

न॒हि नु याद॑धी॒मसीन्द्रं॒ को वी॒र्या॑ प॒रः। तस्मि॑न्नृ॒म्णमु॒त क्रतुं॑ दे॒वा ओजां॑सि॒ सं द॑धु॒रर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥

कोई भी मनुष्य परमेश्वर वा परम विद्वान् की प्राप्ति के विना उत्तम विद्या और श्रेष्ठ सामर्थ्य को नहीं प्राप्त हो सकता, इस हेतु से इनका सदा आश्रय करना चाहिये॥१५॥

यामथ॑र्वा॒ मनु॑ष्पि॒ता द॒ध्यङ् धिय॒मत्न॑त। तस्मि॒न्ब्रह्मा॑णि पू॒र्वथेन्द्र॑ उ॒क्था सम॑ग्म॒तार्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्य परमेश्वर की उपासना करनेवाले विद्वानों के संग प्रीति के सदृश कर्म करके सुन्दर बुद्धि, उत्तम अन्न, धन और वेदविद्या से सुशिक्षित संभाषणों को प्राप्त होकर उनको सब मनुष्यों के लिये देना चाहिये॥१६॥इस सूक्त में सभा आदि अध्यक्ष, सूर्य, विद्वान् और ईश्वर शब्दार्थ का वर्णन करने से पूर्वसूक्त के साथ इस सूक्त के अर्थ की संगति जाननी चाहिये॥इस अध्याय में इन्द्र, मरुत्, अग्नि, सभा आदि के अध्यक्ष और अपने राज्य का पालन आदि का वर्णन करने से चतुर्थ अध्याय के अर्थ के साथ पञ्चम अध्याय के अर्थ की संगति जाननी चाहिये॥इति श्रीमत्परिव्राजकाचार्य श्रीयुतविरजानन्दसरस्वतीस्वामी जी के शिष्य श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामी ने संस्कृत और आर्यभाषाओं से सुभूषित ऋग्वेदभाष्य में पञ्चम अध्याय पूरा किया॥

इन्द्रो॒ मदा॑य वावृधे॒ शव॑से वृत्र॒हा नृभिः॑। तमिन्म॒हत्स्वा॒जिषू॒तेमर्भे॑ हवामहे॒ स वाजे॑षु॒ प्र नो॑ऽविषत्॥

मनुष्यों को उचित है कि जो पूर्ण विद्वान्, अति बलिष्ठ, धार्मिक सबका हित चाहनेवाला, शस्त्रास्त्रक्रिया और शिक्षा में अतिचतुर, भृत्य, वीरपुरुष और योद्धाओं में पिता के समान, देशकाल के अनुकूलता से युद्ध करने के लिये समय के अनुकूल व्यवहार जाननेवाला हो, उसी को सेनापति करना चाहिये, अन्य को नहीं॥१॥

असि॒ हि वी॑र॒ सेन्योऽसि॒ भूरि॑ पराद॒दिः। असि॑ द॒भ्रस्य॑ चिद्वृ॒धो यज॑मानाय शिक्षसि सुन्व॒ते भूरि॑ ते॒ वसु॑॥

भृत्य लोग जैसे सेनापतियों से सेना शिक्षित, पाली और सुखी की जाती है, वैसे सेनास्थ भृत्यों से सेनापतियों का पालन और उनको आनन्दित करना योग्य है॥२॥

यदु॒दीर॑त आ॒जयो॑ धृ॒ष्णवे॑ धीयते॒ धना॑। यु॒क्ष्वा म॑द॒च्युता॒ हरी॒ कं हनः॒ कं वसौ॑ दधो॒ऽस्माँ इ॑न्द्र॒ वसौ॑ दधः॥

जब युद्ध करना हो तो तब सेनापति लोग सवारी शतघ्नी (तोप), भुशुण्डी (बंदूक) आदि शस्त्र, आग्नेय आदि अस्त्र और भोजन-आच्छादन आदि सामग्री को पूर्ण करके किन्हीं शत्रुओं को मार, किन्ही मित्रों का सत्कार कर, युद्धादि कर्मों में धर्मात्मा जनों को संयुक्त कर, युक्ति से युद्ध कराके सदा विजय को प्राप्त हों॥३॥

क्रत्वा॑ म॒हाँ अ॑नुष्व॒धं भी॒म आ वा॑वृधे॒ शवः॑। श्रि॒य ऋ॒ष्व उ॑पा॒कयो॒र्नि शि॒प्री हरि॑वान्दधे॒ हस्त॑यो॒र्वज्र॑माय॒सम्॥

मनुष्यों को योग्य है कि जो बुद्धिमान्, बड़े-बड़े उत्तम गुणों से युक्त, शत्रुओं को भयकर्त्ता, सेनाओं का शिक्षक, अत्यन्त युद्ध करनेहारा पुरुष है, उसको सेनापति करके धर्म से राज्यपालन की न्यायव्यवस्था करनी चाहिये॥४॥

आ प॑प्रौ॒ पार्थि॑वं॒ रजो॑ बद्ब॒धे रो॑च॒ना दि॒वि। न त्वावाँ॑ इन्द्र॒ कश्च॒न न जा॒तो न ज॑निष्य॒तेऽति॒ विश्वं॑ ववक्षिथ॥

हे मनुष्यो! आप लोग जिसने सब जगत् को रचके व्याप्त कर रक्षित किया है, जो जन्म और उपमा से रहित, जिसके तुल्य कुछ भी वस्तु नहीं है, तो उस परमेश्वर से अधिक कुछ कैसे होवे! इसकी उपासना को छोड़के अन्य किसी पृथक् वस्तु का ग्रहण वा गणना मत करो॥५॥

यो अ॒र्यो म॑र्त॒भोज॑नं परा॒ददा॑ति दा॒शुषे॑। इन्द्रो॑ अ॒स्मभ्यं॑ शिक्षतु॒ वि भ॑जा॒ भूरि॑ ते॒ वसु॑ भक्षी॒य तव॒ राध॑सः॥

जो ईश्वर इस जगत् को रच धारण कर जीवों को न देता तो किसी को कुछ भी भोगसामग्री प्राप्त न हो सकती। जो यह परमात्मा वेद द्वारा मनुष्यों को शिक्षा न करता तो किसी को विद्या का लेश भी प्राप्त न होता, इससे विद्वान् को योग्य है कि सबके सुख के लिए विद्या का विस्तार करना चाहिये॥६॥

मदे॑मदे॒ हि नो॑ द॒दिर्यू॒था गवा॑मृजु॒क्रतुः॑। सं गृ॑भाय पु॒रू श॒तोभ॑याह॒स्त्या वसु॑ शिशी॒हि रा॒य आ भ॑र॥

हे मनुष्यो! जो सब आनन्दों का देनेवाला, सब साधन-साध्य रूप पदार्थों का उत्पादक, सब धनों को देता है, वही ईश्वर हमारा उपास्य है, अन्य नहीं॥७॥

मा॒दय॑स्व सु॒ते सचा॒ शव॑से शूर॒ राध॑से। वि॒द्मा हि त्वा॑ पुरू॒वसु॒मुप॒ कामा॑न्त्ससृ॒ज्महेऽथा॑ नोऽवि॒ता भ॑व॥

मनुष्यों को सेनापति के आश्रय के विना शत्रु का विजय, काम की सिद्धि, अपना रक्षण, उत्तम धन, बल और परमसुख प्राप्त नहीं हो सकता॥८॥

ए॒ते त॑ इन्द्र ज॒न्तवो॒ विश्वं॑ पुष्यन्ति॒ वार्य॑म्। अ॒न्तर्हि ख्यो जना॑नाम॒र्यो वेदो॒ अदा॑शुषां॒ तेषां॑ नो॒ वेद॒ आ भ॑र॥

हे मनुष्यो! जो ईश्वर बाहर-भीतर सर्वत्र व्याप्त होकर सब भीतर-बाहर के व्यवहारों को जानता, सत्य उपदेश और सब जीवों के हित की इच्छा करता है, उसका आश्रय लेकर परमार्थ और व्यवहार सिद्ध करके सुखों को तुम प्राप्त होओ॥इस सूक्त में सेनापति, ईश्वर और सभाध्यक्ष के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की सङ्गति पूर्व सूक्तार्थ के साथ समझनी चाहिये॥

उपो॒ षु शृ॑णु॒ही गिरो॒ मघ॑व॒न्मात॑थाइव। य॒दा नः॑ सू॒नृता॑वतः॒ कर॒ आद॒र्थया॑स॒ इद्योजा॒ न्वि॑न्द्र ते॒ हरी॑॥

मनुष्यों को योग्य है कि जैसे राजा ईश्वर के सेवक या सेनापति वा सेनापति से पालन की हुई सेना सुखों को प्राप्त होती है, जैसे सभाध्यक्ष प्रजा और सेना के अनुकूल वर्त्तमान करें, वैसे उनके अनुकूल प्रजा और सेना के मनुष्य को आचरण करना चाहिये॥१॥

अक्ष॒न्नमी॑मदन्त॒ ह्यव॑ प्रि॒या अ॑धूषत। अस्तो॑षत॒ स्वभा॑नवो॒ विप्रा॒ नवि॑ष्ठया म॒ती योजा॒ न्वि॑न्द्र ते॒ हरी॑॥

मनुष्यों को योग्य है कि श्रेष्ठ गुण-कर्म्म-स्वभावयुक्त सब प्रकार उत्तम आचरण करनेहारे सेना और सभापति तथा सत्योपदेशक आदि के गुणों की प्रशंसा और कर्मों से नवीन-नवीन विज्ञान और पुरुषार्थ को बढ़ाकर सदा प्रसन्नता से आनन्द का भोग करें॥२॥

सु॒सं॒दृशं॑ त्वा व॒यं मघ॑वन्वन्दिषी॒महि॑। प्र नू॒नं पू॒र्णव॑न्धुरः स्तु॒तो या॑हि॒ वशाँ॒ अनु॒ योजा॒ न्वि॑न्द्र ते॒ हरी॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जब मनुष्य सबके द्रष्टा परमेश्वर की स्तुति करनेहारे सभापति का आश्रय लेते हैं, तब इन शत्रुओं का शीघ्र निग्रह कर सकते हैं॥३॥

स घा॒ तं वृष॑णं॒ रथ॒मधि॑ तिष्ठाति गो॒विद॑म्। यः पात्रं॑ हारियोज॒नं पू॒र्णमि॑न्द्र॒ चिके॑तति॒ योजा॒ न्वि॑न्द्र ते॒ हरी॑॥

सेनापति को योग्य है कि शिक्षा बल से हृष्ट-पुष्ट हाथी, घोड़े रथ, शस्त्र-अस्त्रादि सामग्री से पूर्ण सेना को प्राप्त करके शत्रुओं को जीता करे॥४॥

यु॒क्तस्ते॑ अस्तु॒ दक्षि॑ण उ॒त स॒व्यः श॑तक्रतो। तेन॑ जा॒यामुप॑ प्रि॒यां म॑न्दा॒नो या॒ह्यन्ध॑सो॒ योजा॒ न्वि॑न्द्र ते॒ हरी॑॥

राजा को योग्य है कि अपनी राणी के साथ अच्छे सुशिक्षित घोड़ों से युक्त रथ में बैठ के युद्ध में विजय और व्यवहार में आनन्द को प्राप्त होवें। जहाँ-जहाँ युद्ध में वा भ्रमण के लिये जावें, वहाँ-वहाँ उत्तम कारीगरों से बनाये सुन्दर रथ में स्त्री के सहित स्थित हो के ही जावें॥५॥

यु॒नज्मि॑ ते॒ ब्रह्म॑णा के॒शिना॒ हरी॒ उप॒ प्र या॑हि दधि॒षे गभ॑स्त्योः। उत्त्वा॑ सु॒तासो॑ रभ॒सा अ॑मन्दिषुः पूष॒ण्वान्व॑ज्रि॒न्त्समु॒ पत्न्या॑मदः॥

मनुष्यों को योग्य है कि जो अश्वादि की शिक्षा सेवा करनेहारे और उनको सवारियों में चलानेवाले भृत्य हों, वे अच्छी शिक्षायुक्त हों और अपनी स्त्री आदि को भी अपने से प्रसन्न रख के आप भी उनमें यथावत् प्रीति करे। सर्वदा युक्त होके सुपरीक्षित स्त्री आदि में धर्म कार्यों को साधा करें॥६॥। इस सूक्त में सेनापति और ईश्वर के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति समझनी चाहिये॥

अश्वा॑वति प्रथ॒मो गोषु॑ गच्छति सुप्रा॒वीरि॑न्द्र॒ मर्त्य॒स्तवो॒तिभिः॑। तमित्पृ॑णक्षि॒ वसु॑ना॒ भवी॑यसा॒ सिन्धु॒मापो॒ यथा॒भितो॒ विचे॑तसः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। सेनापति आदि राजपुरुषों को योग्य है कि जो भृत्य अपने-अपने अधिकार के कर्मों में यथायोग्य न वर्त्तें, उन-उन को अच्छे प्रकार दण्ड और जो न्याय के अनुकूल वर्त्तें, उनका सत्कार कर शत्रुओं को जीत प्रजा की रक्षा कर पुरुषों को प्रसन्न रखके राजकार्यों को सिद्ध करना चाहिये। कोई भी पुरुष अपराधी के योग्य दण्ड और अच्छे कर्मकर्त्ता के योग्य प्रतिष्ठा किये विना यथावत् राज्य की व्यवस्था को स्थिर करने को समर्थ नहीं हो सकता, इससे इस कर्म का अनुष्ठान सदा करना चाहिये॥१॥

आपो॒ न दे॒वीरुप॑ यन्ति हो॒त्रिय॑म॒वः प॑श्यन्ति॒ वित॑तं॒ यथा॒ रजः॑। प्रा॒चैर्दे॒वासः॒ प्र ण॑यन्ति देव॒युं ब्र॑ह्म॒प्रियं॑ जोषयन्ते व॒राइ॑व॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। किस हेतु से विद्वान् और अविद्वान् भिन्न-भिन्न कहाते हैं, इसका उत्तर है कि जो धर्मयुक्त शुद्ध क्रियाओं को करें, सबके शरीर और आत्मा का यथावत् रक्षण करना जानें और भूगर्भादि विद्याओं से प्राचीन आप्त विद्वानों के तुल्य वेदद्वारा ईश्वरप्रणीत सत्यधर्म मार्ग का प्रचार करें, वे विद्वान् हैं और जो इनसे विपरीत हों वे अविद्वान् हैं, इस प्रकार निश्चय से जानें॥२॥

अधि॒ द्वयो॑रदधा उ॒क्थ्यं१॒॑ वचो॑ य॒तस्रु॑चा मिथु॒ना या स॑प॒र्यतः॑। असं॑यत्तो व्र॒ते ते॑ क्षेति॒ पुष्य॑ति भ॒द्रा श॒क्तिर्यज॑मानाय सुन्व॒ते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य परोपकारी बुद्धि से सबके शरीर और आत्मा के मध्य पुष्टि और विद्याबल को उत्पन्न कर विरोध छोड़के धर्मयुक्त व्यवहार को सेवन करके निरन्तर सब मनुष्यों को सत्यव्यवहार में प्रवृत्त करते हैं, वे मोक्ष को प्राप्त होते हैं॥३॥

आदङ्गि॑राः प्रथ॒मं द॑धिरे॒ वय॑ इ॒द्धाग्न॑यः॒ शम्या॒ ये सु॑कृ॒त्यया॑। सर्वं॑ प॒णेः सम॑विन्दन्त॒ भोज॑न॒मश्वा॑वन्तं॒ गोम॑न्त॒मा प॒शुं नरः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। कोई भी मनुष्य ब्रह्मचर्य से विद्या पढ़े विना साङ्गोपाङ्ग विद्याओं को प्राप्त होने को समर्थ नहीं हो सकते और विद्या सत्कर्म के विना राज्याधिकार को प्राप्त होने योग्य नहीं होते, उक्त प्रकार से रहित मनुष्य सत्य सुख को प्राप्त नहीं हो सकते॥४॥

य॒ज्ञैरथ॑र्वा प्रथ॒मः प॒थस्त॑ते॒ ततः॒ सूर्यो॑ व्रत॒पा वे॒न आज॑नि। आ गा आ॑जदु॒शना॑ का॒व्यः सचा॑ य॒मस्य॑ जा॒तम॒मृतं॑ यजामहे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि सत्य मार्ग में स्थित होके सत्य क्रिया और विज्ञान से परमेश्वर को जान के मोक्ष की इच्छा करें, वे विद्वान् मुक्ति को प्राप्त होते हैं॥५॥

ब॒र्हिर्वा॒ यत्स्व॑प॒त्याय॑ वृ॒ज्यते॒ऽर्को वा॒ श्लोक॑मा॒घोष॑ते दि॒वि। ग्रावा॒ यत्र॒ वद॑ति का॒रुरु॒क्थ्य१॒॑स्तस्येदिन्द्रो॑ अभिपि॒त्वेषु॑ रण्यति॥

विद्वान् लोगों को योग्य है कि जैसे जल छिन्न-भिन्न होकर आकाश में जा वहाँ से वर्षा से सुख करता है, वैसे कुव्यसनों को छिन्न-भिन्न कर विद्या को ग्रहण करके सब मनुष्यों को सुखी करें। जैसे सूर्य अन्धकार का नाश और प्रकाश करके सब प्राणियों को सुखी और दुष्ट चोरों को दुःखी करता है, वैसे मनुष्यों के अज्ञान का नाश विज्ञान की प्राप्ति करा के सबको सुखी करें। जैसे मेघ गर्जना कर और वर्ष के दुर्भिक्ष को छुड़ा सुभिक्ष करता है, वैसे ही सत्योपदेश की वृष्टि से अधर्म का नाश धर्म के प्रकाश से सब मनुष्यों को आनन्दित किया करें॥६॥इस सूक्त में सेनापति और उपदेशक के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये॥

असा॑वि॒ सोम॑ इन्द्र ते॒ शवि॑ष्ठ धृष्ण॒वा ग॑हि। आ त्वा॑ पृणक्त्विन्द्रि॒यं रजः॒ सूर्यो॒ न र॒श्मिभिः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। प्रजा, सेना और पाठशालाओं की सभाओ में स्थित पुरुषों को योग्य है कि अच्छे प्रकार सूर्य के समान तेजस्वी पुरुष को प्रजा, सेना और पाठशालाओं में अध्यक्ष करके सब प्रकार से उसका सत्कार करना चाहिये, वैसे सभ्यजनों की भी प्रतिष्ठा करनी चाहिये॥१॥

इन्द्र॒मिद्धरी॑ वह॒तोऽप्र॑तिधृष्टशवसम्। ऋषी॑णां च स्तु॒तीरुप॑ य॒ज्ञं च॒ मानु॑षाणाम्॥

जो प्रशंसा सत्कार अधिकार को प्राप्त है, उनके विना प्राणियों को सुख नहीं हो सकता तथा सत्क्रिया के विना चक्रवर्त्तिराज्य आदि की प्राप्ति और रक्षण नहीं हो सकते, इस हेतु से सब मनुष्यों को यह अनुष्ठान करना उचित है॥२॥

आ ति॑ष्ठ वृत्रह॒न्रथं॑ यु॒क्ता ते॒ ब्रह्म॑णा॒ हरी॑। अ॒र्वा॒चीनं॒ सु ते॒ मनो॒ ग्रावा॑ कृणोतु व॒ग्नुना॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सभापतियों को योग्य है कि सेना में दो प्रकार के अधिकारी रक्खें। उनमें एक सेना को लड़ावे और दूसरा अच्छे भाषणों से योद्धाओं को उत्साहित करे। जब युद्ध हो तब सेनापति अच्छी प्रकार परीक्षा और उत्साह से शत्रुओं के साथ ऐसा युद्ध करावे कि जिससे निश्चित विजय हो और जब युद्ध बन्द हो जाये, तब उपदेशक योद्धा और सब सेवकों को धर्मयुक्त कर्म के उपदेश से अच्छे प्रकार उत्साहित करें, ऐसे करनेहारे मनुष्यों का कभी पराजय नहीं हो सकता॥३॥

इ॒ममि॑न्द्र सु॒तं पि॑ब॒ ज्येष्ठ॒मम॑र्त्यं॒ मद॑म्। शु॒क्रस्य॑ त्वा॒भ्य॑क्षर॒न्धारा॑ ऋ॒तस्य॒ साद॑ने॥

कोई भी मनुष्य विद्या और अच्छे पान-भोजन के विना पराक्रम को प्राप्त होने को समर्थ नहीं और इसके विना सत्य का विज्ञान और विजय नहीं हो सकता॥४॥

इन्द्रा॑य नू॒नम॑र्चतो॒क्थानि॑ च ब्रवीतन। सु॒ता अ॑मत्सु॒रिन्द॑वो॒ ज्येष्ठं॑ नमस्यता॒ सहः॑॥

मनुष्यों को योग्य है कि जो सबका सत्कार करे, शरीर और आत्मा के बल को प्राप्त होके परोपकारी हो, उसको छोड़ के अन्य को सेनापति आदि अधिकारों में कभी स्थापन न करें॥५॥

नकि॒ष्ट्वद्र॒थीत॑रो॒ हरी॒ यदि॑न्द्र॒ यच्छ॑से। नकि॒ष्ट्वानु॑ म॒ज्मना॒ नकिः॒ स्वश्व॑ आनशे॥

हे मनुष्यो! तुम सेनापति को इस प्रकार उपदेश करो कि क्या तू सब से बड़ा है? क्या तेरे तुल्य कोई भी नहीं है? क्या कोई तेरे जीतने को भी समर्थ नहीं है? इससे तू निरभिमानता से सावधान होकर वर्त्ता कर॥६॥

य एक॒ इद्वि॒दय॑ते॒ वसु॒ मर्ता॑य दा॒शुषे॑। ईशा॑नो॒ अप्र॑तिष्कुत॒ इन्द्रो॑ अ॒ङ्ग॥

हे मनुष्यो! तुम लोग जो सहायरहित भी निर्भय होके युद्ध से नहीं हटता तथा अत्यन्त शूर है, उसी को सेना का स्वामी करो॥७॥

क॒दा मर्त॑मरा॒धसं॑ प॒दा क्षुम्प॑मिव स्फुरत्। क॒दा नः॑ शुश्रव॒द्गिर॒ इन्द्रो॑ अ॒ङ्ग॥

हे मनुष्यो! तुम लोग में से जो दरिद्रों को भी धनयुक्त, आलसियों को पुरुषार्थी और श्रवणरहितों को श्रवणयुक्त करे, उस पुरुष ही को सभा आदि का अध्यक्ष करो। कब यहाँ हमारी बात को सुनोगे और हम कब आपकी बात को सुनेंगे, ऐसी आशा हम करते हैं॥८॥

यश्चि॒द्धि त्वा॑ ब॒हुभ्य॒ आ सु॒तावाँ॑ आ॒विवा॑सति। उ॒ग्रं तत्प॑त्यते शव॒ इन्द्रो॑ अ॒ङ्ग॥

हे मनुष्यो! तुम लोग जो शत्रुओं के बल का हनन करके तुमको दुःखों से हटाकर सुखयुक्त करने को समर्थ हो तथा जिसके भय और पराक्रम से शत्रु नष्ट होते हैं, उसे सेनापति करके आनन्द को प्राप्त होओ॥९॥

स्वा॒दोरि॒त्था वि॑षू॒वतो॒ मध्वः॑ पिबन्ति गौ॒र्यः॑। या इन्द्रे॑ण स॒याव॑री॒र्वृष्णा॒ मद॑न्ति शो॒भसे॒ वस्वी॒रनु॑ स्व॒राज्य॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। अपनी सेना के पति और वीरपुरुषों की सेना के विना निज राज्य की शोभा तथा रक्षा नहीं हो सकती। जैसे सूर्य की किरण सूर्य के विना स्थित और वायु के विना जल का आकर्षण करके वर्षाने के लिये समर्थ नहीं हो सकती, वैसे सेनाध्यक्ष और राजा के विना प्रजा आनन्द करने को समर्थ नहीं हो सकती॥१०॥

ता अ॑स्य पृशना॒युवः॒ सोमं॑ श्रीणन्ति॒ पृश्न॑यः। प्रि॒या इन्द्र॑स्य धे॒नवो॒ वज्रं॑ हिन्वन्ति॒ साय॑कं॒ वस्वी॒रनु॑ स्व॒राज्य॑म्॥

जैसे गोपाल की गौ जल रस को पी, घास को खा, निज सुख को बढ़ाकर, औरों के आनन्द को बढ़ाती है, वैसे ही सेनाध्यक्ष की सेना और सूर्य की किरण औषधियों से वैद्यकशास्त्र के अनुकूल वा उत्पन्न हुए परिपक्व रस को पीकर विजय और प्रकाश को करके आनन्द कराती हैं॥११॥

ता अ॑स्य॒ नम॑सा॒ सहः॑ सप॒र्यन्ति॒ प्रचे॑तसः। व्र॒तान्य॑स्य सश्चिरे पु॒रूणि॑ पू॒र्वचि॑त्तये॒ वस्वी॒रनु॑ स्व॒राज्य॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि सामग्री बल और अच्छे नियमों के विना बहुत राज्य आदि के सुख नहीं प्राप्त होते, इस हेतु से यम-नियमों के अनुकूल जैसा चाहिये, वैसा इसका विचार करके विजय आदि धर्मयुक्त कर्मों को सिद्ध करें॥१२॥

इन्द्रो॑ दधी॒चो अ॒स्थभि॑र्वृ॒त्राण्यप्र॑तिष्कुतः। ज॒घान॑ नव॒तीर्नव॑॥

यहाँ वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वही सेनापति होने के योग्य होता है, जो सूर्य के समान दुष्ट शत्रुओं का हन्ता और अपनी सेना का रक्षक है॥१३॥

इ॒च्छन्नश्व॑स्य॒ यच्छिरः॒ पर्व॑ते॒ष्वप॑श्रितम्। तद्वि॑दच्छर्य॒णाव॑ति॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य आकाश में रहनेहारे मेघ का छेदन कर भूमि में गिराता है, वैसे पर्वत और किलों में भी रहनेहारे दुष्ट शत्रु का हनन करके भूमि में गिरा देवे, इस प्रकार किये विना राज्य की व्यवस्था स्थिर नहीं हो सकती॥१४॥

अत्राह॒ गोर॑मन्वत॒ नाम॒ त्वष्टु॑रपी॒च्य॑म्। इ॒त्था च॒न्द्रम॑सो गृ॒हे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को जानना चाहिये कि ईश्वर की विद्यावृद्धि की हानि और विपरीतता नहीं हो सकती। सब काल सब क्रियाओं में एकरस सृष्टि के नियम होते हैं। जैसे सूर्य का पृथिवी के साथ आकर्षण और प्रकाश आदि सम्बन्ध हैं, वैसे ही अन्य भूगोलों के साथ हैं। क्योंकि ईश्वर से स्थिर किये नियम का व्यभिचार अर्थात् भूल कभी नहीं होती॥१५॥

को अ॒द्य यु॑ङ्क्ते धु॒रि गा ऋ॒तस्य॒ शिमी॑वतो भा॒मिनो॑ दुर्हृणा॒यून्। आ॒सन्नि॑षून्हृ॒त्स्वसो॑ मयो॒भून्य ए॑षां भृ॒त्यामृ॒णध॒त्स जी॑वात्॥

सबका अध्यक्ष राजा सबको प्रकट आज्ञा देवे। सब सेना वा प्रजास्थ पुरुषों को सत्य आचरणों में नियुक्त करे। सर्वदा उनकी जीविका बढ़ाके आप बहुत काल पर्यन्त जीवे॥१६॥

क ई॑षते तु॒ज्यते॒ को बि॑भाय॒ को मं॑सते॒ सन्त॒मिन्द्रं॒ को अन्ति॑। कस्तो॒काय॒ क इभा॑यो॒त रा॒येऽधि॑ ब्रवत्त॒न्वे॒३॒॑ को जना॑य॥

जो अड़तालीस वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य, उत्तम शिक्षा और अन्य शुभ गुणों से युक्त होते हैं, वे विजयादि कर्मों को कर सकते हैं। जैसे राजा सेनापति को सब अपनी सेना के नौकरों की व्यवस्था को पूछे, वैसे सेनापति भी अपने अधीन छोटे सेनापतियों को स्वयं सब वार्त्ता पूछे। जैसे राजा सेनापति को आज्ञा देवे, वैसे (सेनापति स्वयं) सेना के प्रधान पुरुषों को करने योग्य कर्म की आज्ञा देवे॥१७॥

को अ॒ग्निमी॑ट्टे ह॒विषा॑ घृ॒तेन॑ स्रु॒चा य॑जाता ऋ॒तुभि॑र्ध्रु॒वेभिः॑। कस्मै॑ दे॒वा आ व॑हाना॒शु होम॒ को मं॑सते वी॒तिहो॑त्रः सुदे॒वः॥

हे विद्वन्! किस साधन वा कर्म से अग्निविद्या को प्राप्त हों? और किससे क्रियारूप यज्ञ सिद्ध होवे? किस प्रयोजन के लिये विद्वान् लोग यज्ञ का विस्तार करते हैं?॥१८॥

त्वम॒ङ्ग प्र शं॑सिषो दे॒वः श॑विष्ठ॒ मर्त्य॑म्। न त्वद॒न्यो म॑घवन्नस्ति मर्डि॒तेन्द्र॒ ब्रवी॑मि ते॒ वचः॑॥

मनुष्यों को योग्य है कि उत्तम कर्म करने, असाधारण सदा सुख देनेहारे धार्मिक मनुष्यों के साथ ही मित्रता करके एक-दूसरे को सुख देने का उपदेश किया करें॥१९॥

मा ते॒ राधां॑सि॒ मा त॑ ऊ॒तयो॑ वसो॒ऽस्मान्कदा॑ च॒ना द॑भन्। विश्वा॑ च न उपमिमी॒हि मा॑नुष॒ वसू॑नि चर्ष॒णिभ्य॒ आ॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही धार्मिक मनुष्य हैं जिनका शरीर, मन और धन सबको सुखी करे, वे ही प्रशंसा के योग्य हैं जो जगत् के उपकार के लिये प्रयत्न करते हैं॥२०॥इस सूक्त में सेनापति के गुण-वर्णन होने से इस सूक्तार्थ की संगति पूर्व सूक्तार्थ के संग जाननी चाहिये॥

सूक्तम्

प्र ये शुम्भ॑न्ते॒ जन॑यो॒ न सप्त॑यो॒ याम॑न्रु॒द्रस्य॑ सू॒नवः॑ सु॒दंस॑सः। रोद॑सी॒ हि म॒रुत॑श्चक्रि॒रे वृ॒धे मद॑न्ति वी॒रा वि॒दथे॑षु॒ घृष्व॑यः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे अच्छी शिक्षा और विद्या को प्राप्त हुई पतिव्रता स्त्रियाँ अपने पतियों का अथवा स्त्रीव्रत सदा अपनी स्त्रियों ही से प्रसन्न ऋतुगामी पति लोग अपनी स्त्रियों का सेवन करके सुखी और जैसे सुन्दर बलवान् घोड़े मार्ग में शीघ्र पहुँचा के आनन्दित करते हैं, वैसे धार्मिक राजपुरुष सब प्रजा को आनन्दित किया करें॥१॥

त उ॑क्षि॒तासो॑ महि॒मान॑माशत दि॒वि रु॒द्रासो॒ अधि॑ चक्रिरे॒ सदः॑। अर्च॑न्तो अ॒र्कं ज॒नय॑न्त इन्द्रि॒यमधि॒ श्रियो॑ दधिरे॒ पृश्नि॑मातरः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे वायु वृष्टि का निमित्त होके उत्तम सुखों को प्राप्त कराते हैं, वैसे सभाध्यक्ष लोग विद्या से सुशिक्षित हो के परस्पर उपकारी और प्रीतियुक्त होवें॥२॥

गोमा॑तरो॒ यच्छु॒भय॑न्ते अ॒ञ्जिभि॑स्त॒नूषु॑ शु॒भ्रा द॑धिरे वि॒रुक्म॑तः। बाध॑न्ते॒ विश्व॑मभिमा॒तिन॒मप॒ वर्त्मा॑न्येषा॒मनु॑ रीयते घृ॒तम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे वायुओं से अनेक सुख और प्राण के बल से पुष्टि होती है, वैसे ही शुभगुणयुक्त विद्या, शरीर और आत्मा के बलयुक्त सभाध्यक्षों से प्रजाजन अनेक प्रकार के रक्षणों को प्राप्त होते हैं॥३॥

वि ये भ्राज॑न्ते॒ सुम॑खास ऋ॒ष्टिभिः॑ प्रच्या॒वय॑न्तो॒ अच्यु॑ता चि॒दोज॑सा। म॒नो॒जुवो॒ यन्म॑रुतो॒ रथे॒ष्वा वृष॑व्रातासः॒ पृष॑ती॒रयु॑ग्ध्वम्॥

मनुष्यो को उचित है कि मन के समान वेगयुक्त विमानादि यानों में जल, अग्नि और वायु को संयुक्त कर, उसमें बैठ के, सर्वत्र भूगोल में जा-आके शत्रुओं को जीतकर, प्रजा को उत्तम रीति से पाल के, शिल्पविद्या कर्मों को बढ़ा के सबका उपकार किया करें॥४॥

प्र यद्रथे॑षु॒ पृष॑ती॒रयु॑ग्ध्वं॒ वाजे॒ अद्रिं॑ मरुतो रं॒हय॑न्तः। उ॒तारु॒षस्य॒ वि ष्य॑न्ति॒ धारा॒श्चर्मे॑वो॒दभि॒र्व्यु॑न्दन्ति॒ भूम॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो! जैसे वायु बादलों को संयुक्त करता और चलाता है, वैसे शिल्पि लोग उत्तम शिक्षा और हस्तक्रिया अग्नि आदि अच्छे प्रकार जाने हुए वेगकर्त्ता पदार्थों के योग से स्थानान्तर को प्राप्त हो के कार्यों को सिद्ध करते हैं॥५॥

आ वो॑ वहन्तु॒ सप्त॑यो रघु॒ष्यदो॑ रघु॒पत्वा॑नः॒ प्र जि॑गात बा॒हुभिः॑। सीद॒ता ब॒र्हिरु॒रु वः॒ सद॑स्कृ॒तं मा॒दय॑ध्वं मरुतो॒ मध्वो॒ अन्ध॑सः॥

सभाध्यक्षादि मनुष्य लोग क्रियाकौशल से शिल्पविद्या से सिद्ध करने योग्य कार्यों को करके अच्छे भोगों को प्राप्त हों, कोई भी मनुष्य इस जगत् में पदार्थविज्ञान क्रिया के विना उत्तम भोगों को प्राप्त होने में समर्थ नहीं होता। इससे इस काम का नित्य अनुष्ठान करना चाहिये॥६॥

ते॑ऽवर्धन्त॒ स्वत॑वसो महित्व॒ना नाकं॑ त॒स्थुरु॒रु च॑क्रिरे॒ सदः॑। विष्णु॒र्यद्धाव॒द्वृष॑णं मद॒च्युतं॒ वयो॒ न सी॑द॒न्नधि॑ ब॒र्हिषि॑ प्रि॒ये॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पक्षी आकाश में सुखपूर्वक जाके आते हैं, वैसे ही साङ्गोपाङ्ग शिल्पविद्या को साक्षात् करके उससे उत्तम यानादि सिद्ध करके अच्छी सामग्री को रख के बढ़ाते हैं, वे ही उत्तम प्रतिष्ठा और धनों को प्राप्त होकर नित्य बढ़ा करते हैं॥७॥

शूरा॑इ॒वेद्युयु॑धयो॒ न जग्म॑यः श्रव॒स्यवो॒ न पृत॑नासु येतिरे। भय॑न्ते॒ विश्वा॒ भुव॑ना म॒रुद्भ्यो॒ राजा॑नइव त्वे॒षसं॑दृशो॒ नरः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे भयरहित पुरुष युद्ध से निवर्त्त नहीं होते, जैसे युद्ध करनेहारे लड़ने के लिये शीघ्र दौड़ते हैं, जैसे क्षुधातुर मनुष्य अन्न की इच्छा और जैसे सेनाओं में युद्ध की इच्छा करते हैं, जैसे दण्ड देनेहारे न्यायाधीशों से अन्यायकारी मनुष्य उद्विग्न होते हैं, वैसे ही कुपथ्यकारी, [वायुओं का] अच्छे प्रकार उपयोग न करनेहारे मनुष्य वायुओं से भय को प्राप्त होते और अपनी मर्यादा में रहते हैं॥८॥

त्वष्टा॒ यद्वज्रं॒ सुकृ॑तं हिर॒ण्ययं॑ स॒हस्र॑भृष्टिं॒ स्वपा॒ अव॑र्तयत्। ध॒त्त इन्द्रो॒ नर्यपां॑सि॒ कर्त॒वेऽह॑न्वृ॒त्रं निर॒पामौ॑ब्जदर्ण॒वम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य मेघ को धारण और हनन कर वर्षा के समुद्र को भरता है, वैसे सभापति लोग विद्या न्याययुक्त प्रजा के पालन व धारण करके, अविद्या अन्याययुक्त दुष्टों का ताड़न करके, सबके हित के लिये सुखसागर को पूर्ण भरें॥९॥

ऊ॒र्ध्वं नु॑नुद्रेऽव॒तं त ओज॑सा दादृहा॒णं चि॑द्बिभिदु॒र्वि पर्व॑तम्। धम॑न्तो वा॒णं म॒रुतः॑ सु॒दान॑वो॒ मदे॒ सोम॑स्य॒ रण्या॑नि चक्रिरे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्य लोग इस जगत् में जन्म पा, विद्या शिक्षा का ग्रहण और वायु के समान कर्म्म करके सुखों को भोगें॥१०॥

जि॒ह्मं नु॑नुद्रेऽव॒तं तया॑ दि॒शासि॑ञ्च॒न्नुत्सं॒ गोत॑माय तृ॒ष्णजे॑। आ ग॑च्छन्ती॒मव॑सा चि॒त्रभा॑नवः॒ कामं॒ विप्र॑स्य तर्पयन्त॒ धाम॑भिः॥

जैसे मनुष्य कूप को खोद खेत वा बगीचे आदि को सींचके उसमें उत्पन्न हुए अन्न और फलादि से प्राणियों को तृप्त करके सुखी करते हैं, वैसे ही सभाध्यक्ष आदि लोग वेदशास्त्रों में विशारद विद्वानों को कामों से पूर्ण करके इनसे विद्या, उत्तम शिक्षा और धर्म का प्रचार कराके सब प्राणियों को आनन्दित करें॥११॥

या वः॒ शर्म॑ शशमा॒नाय॒ सन्ति॑ त्रि॒धातू॑नि दा॒शुषे॑ यच्छ॒ताधि॑। अ॒स्मभ्यं॒ तानि॑ मरुतो॒ वि य॑न्त र॒यिं नो॑ धत्त वृषणः सु॒वीर॑म्॥

सभाध्यक्षादि लोगों को योग्य है कि सुख-दुःख की अवस्था में सब प्राणियों को अपने आत्मा के समान मान के, सुख धनादि से युक्त करके पुत्रवत् पालें और प्रजा सेना के मनुष्यों को योग्य है कि उनका सत्कार पिता के समान करें॥१२॥इस सूक्त में वायु के समान सभाध्यक्ष राजा और प्रजा के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्तार्थ की संगति पूर्व सूक्तार्थ के साथ समझनी चाहिये॥

मरु॑तो॒ यस्य॒ हि क्षये॑ पा॒था दि॒वो वि॑महसः। स सु॑गो॒पात॑मो॒ जनः॑॥

जैसे प्राण के विना शरीरादि का रक्षण नहीं हो सकता, वैसे सत्योपदेशकर्त्ता के विना प्रजा की रक्षा नहीं होती॥१॥

य॒ज्ञैर्वा॑ यज्ञवाहसो॒ विप्र॑स्य वा मती॒नाम्। मरु॑तः शृणु॒ता हव॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि जानने-जनाने वा क्रियाओं से सिद्ध यज्ञों से युक्त होकर, अन्य मनुष्यों को युक्त करा, यथावत्परीक्षा करके विद्वान् करना चाहिये॥२॥

उ॒त वा॒ यस्य॑ वा॒जिनोऽनु॒ विप्र॒मत॑क्षत। स गन्ता॒ गोम॑ति व्र॒जे॥

तीव्रबुद्धि और शिल्पविद्या सिद्ध विमानादि यानों के विना मनुष्य देश-देशान्तर में सुख से जाने-आने को समर्थ नहीं हो सकते, उस कारण अति पुरुषार्थ से विमानादि यानों को यथावत् सिद्ध करें॥३॥

अ॒स्य वी॒रस्य॑ ब॒र्हिषि॑ सु॒तः सोमो॒ दिवि॑ष्टिषु। उ॒क्थं मद॑श्च शस्यते॥

विद्वानों की शिक्षा के विना मनुष्यों में उत्तम गुण उत्पन्न नहीं होते। इससे इसका अनुष्ठान नित्य करना चाहिये॥४॥

अ॒स्य श्रो॑ष॒न्त्वा भुवो॒ विश्वा॒ यश्च॑र्ष॒णीर॒भि। सूरं॑ चित्स॒स्रुषी॒रिषः॑॥

जो मनुष्य अच्छी शिक्षा से युक्त, अच्छे प्रकार परीक्षित, शुभलक्षणयुक्त, सम्पूर्ण विद्याओं का वेत्ता, दृढ़ाङ्ग, अतिबली, पढ़ानेहारा, श्रेष्ठ सहाय से सहित, पुरुषार्थी धार्मिक विद्वान् है, वही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त होके प्रजा के दुःख का निवारण कर पराविद्या को सुनके प्राप्त होता है, इससे विरुद्ध मनुष्य नहीं॥५॥

पू॒र्वाभि॒र्हि द॑दाशि॒म श॒रद्भि॑र्मरुतो व॒यम्। अवो॑भिश्चर्षणी॒नाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सब ऋतु में ठहरनेवाले वायु प्राणियों की रक्षा कर उनको सुख पहुँचाते हैं, वैसे ही विद्वान् लोग सबके सुख के लिये प्रवृत्त हों, न कि किसी के दुःख के लिये॥६॥

सु॒भगः॒ स प्र॑यज्यवो॒ मरु॑तो अस्तु॒ मर्त्यः॑। यस्य॒ प्रयां॑सि॒ पर्ष॑थ॥

जिन मनुष्यों के सभाध्यक्ष आदि विद्वान् रक्षा करनेवाले हैं, वे क्योंकर सुख और ऐश्वर्य्य को न पावें?॥७॥

श॒श॒मा॒नस्य॑ वा नरः॒ स्वेद॑स्य सत्यशवसः। वि॒दा काम॑स्य॒ वेन॑तः॥

कोई पुरुष विद्वानों के संग विना सत्य काम और अच्छे-बुरे को जान नहीं सकता। इससे सबको विद्वानों का संग करना चाहिये॥८॥

यू॒यं तत्स॑त्यशवस आ॒विष्क॑र्त महित्व॒ना। विध्य॑ता वि॒द्युता॒ रक्षः॑॥

मनुष्यों को चाहिए कि परस्पर प्रीति और पुरुषार्थ के साथ विद्युत् आदि पदार्थविद्या और अच्छे-अच्छे गुणों को पाकर दुष्ट स्वभावी और दुर्गुणी मनुष्यों को दूर कर नित्य अपनी कामना सिद्ध करें॥९॥

गूह॑ता॒ गुह्यं॒ तमो॒ वि या॑त॒ विश्व॑म॒त्रिण॑म्। ज्योति॑ष्कर्ता॒ यदु॒श्मसि॑॥

इस मन्त्र में (मरुतः, सत्यशवसः, महित्वना) इन तीनों पदों की अनुवृत्ति है। सभाध्यक्षादि को परम पुरुषार्थ से निरन्तर राज्य की रक्षा करनी तथा अविद्यारूपी अन्धकार और शत्रुजन दूर करने चाहिये तथा विद्या, धर्म और सज्जनों के सुखों का प्रचार करना चाहिये॥१०॥इस सूक्त में जैसे शरीर में ठहरनेहारे प्राण आदि पवन चाहे हुए सुखों को सिद्ध कर सबकी रक्षा करते हैं, वैसे ही सभाध्यक्षादिकों को चाहिये कि समस्त राज्य की यथावत् रक्षा करें। इस अर्थ के वर्णन से इस सूक्त में कहे हुए अर्थ की उस पिछले सूक्त के अर्थ के साथ एकता जाननी चाहिये॥

प्रत्व॑क्षसः॒ प्रत॑वसो विर॒प्शिनोऽना॑नता॒ अवि॑थुरा ऋजी॒षिणः॑। जुष्ट॑तमासो॒ नृत॑मासो अ॒ञ्जिभि॒र्व्या॑नज्रे॒ के चि॑दु॒स्राइ॑व॒ स्तृभिः॑॥

जैसे सूर्य की किरणें तीव्र प्रतापवाली हैं, वैसे प्रबल प्रतापवाले मनुष्य जिनके समीप हैं, क्योंकर उनकी हार हो। इससे सभाध्यक्ष आदिकों को उक्त लक्षणवाले पुरुष अच्छी शिक्षा, सत्कार और उत्साह देकर रखने चाहिये, विना ऐसे किये कोई राज्य नहीं कर सकते हैं॥१॥

उ॒प॒ह्व॒रेषु॒ यदचि॑ध्वं य॒यिं वय॑इव मरुतः॒ केन॑ चित्प॒था। श्चोत॑न्ति॒ कोशा॒ उप॑ वो॒ रथे॒ष्वा घृ॒तमु॑क्षता॒ मधु॑वर्ण॒मर्च॑ते॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को चाहिये कि विमान आदि रथ रचकर उनमें आग, पवन और जल के घरों को बनाकर, उनमें आग, पवन, जल धर कर कलों से उनको चलाकर उनकी भाप रोक रथों को ऊपर ले जायें, जैसे कि पखेरू वा मेघ जाते हैं, वैसे आकाश मार्ग से अभीष्ट स्थान को जा-आकर व्यवहार से धन और युद्ध सर्वथा जीत वा राज्यधन को प्राप्त होकर उन धन आदि पदार्थों से परोपकार कर निरभिमानी होकर सब प्रकार के आनन्द पावें और उन आनन्दों को सबके लिये पहुँचावें॥२॥

प्रैषा॒मज्मे॑षु विथु॒रेव॑ रेजते॒ भूमि॒र्यामे॑षु॒ यद्ध॑ यु॒ञ्जते॑ शु॒भे। ते क्री॒ळयो॒ धुन॑यो॒ भ्राज॑दृष्टयः स्व॒यं म॑हि॒त्वं प॑नयन्त॒ धूत॑यः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे शीघ्र चलनेवाले पवन वृक्ष, तृण, ओषधि और धूलि को कंपाते हैं, वैसे वीरों की सेना के रथों के पहियों के प्रहार से धरती और उनके शस्त्रों की चोटों से डरनेहारे मनुष्य कंपा करते हैं और जैसे व्यापारवाले मनुष्य व्यवहार से धन को पाकर बड़े धनाढ्य होते हैं, वैसे ही सभा आदि कामों के अधीश शत्रुओं को जीतने से अपना बड़प्पन और प्रतिष्ठा विख्यात करते हैं॥३॥

स हि स्व॒सृत्पृष॑दश्वो॒ युवा॑ ग॒णो॒३॒॑या ई॑शा॒नस्तवि॑षीभि॒रावृ॑तः। असि॑ स॒त्य ऋ॑ण॒यावाने॑द्यो॒ऽस्या धि॒यः प्रा॑वि॒ताथा॒ वृषा॑ ग॒णः॥

ब्रह्मचर्य और विद्या से परिपूर्ण शारीरिक और आत्मिक बलयुक्त अपनी सेना से रक्षा को प्राप्त सेनापति सेना की निरन्तर रक्षा करके शत्रुओं को जीतके प्रजा का पालन करे॥४॥

पि॒तुः प्र॒त्नस्य॒ जन्म॑ना वदामसि॒ सोम॑स्य जि॒ह्वा प्र जि॑गाति॒ चक्ष॑सा। यदी॒मिन्द्रं॒ शम्यृक्वा॑ण॒ आश॒तादिन्नामा॑नि य॒ज्ञिया॑नि दधिरे॥

मनुष्यों को चाहिये कि इस मनुष्यदेह को पाकर पितृभाव से परमेश्वर की आज्ञापालन रूप प्रार्थना, उपासना और परमेश्वर का उपदेश, संसार के पदार्थ और उनके विशेष ज्ञान से उपकारों को लेकर अपने जन्म को सफल करें॥५॥

श्रि॒यसे॒ कं भा॒नुभिः॒ सं मि॑मिक्षिरे॒ ते र॒श्मिभि॒स्त ऋक्व॑भिः सुखा॒दयः॑। ते वाशी॑मन्त इ॒ष्मिणो॒ अभी॑रवो वि॒द्रे प्रि॒यस्य॒ मारु॑तस्य॒ धाम्नः॑॥

जो मनुष्य प्रतिदिन सृष्टिपदार्थविद्या को पा अनेक उपकारों को ग्रहण कर उस विद्या के पढ़ने और पढ़ाने से वाचाल अर्थात् बातचीत में कुशल हो और शत्रुओं को जीतकर अच्छे आचरण में वर्त्तमान होते हैं, वे ही सब कभी सुखी होते हैं॥६॥इस सूक्त में राजा प्रजाओं के कर्त्तव्य कहे हैं, इस कारण इस सूक्त के अर्थ से पिछले सूक्त के अर्थ की संगति है, यह जानना चाहिये॥

आ वि॒द्युन्म॑द्भिर्मरुतः स्व॒र्कै रथे॑भिर्यात ऋष्टि॒मद्भि॒रश्व॑पर्णैः। आ वर्षि॑ष्ठया न इ॒षा वयो॒ न प॑प्तता सुमायाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे पखेरू ऊपर-नीचे आके चाहे हुए एक स्थान से दूसरे स्थान को सुख से जाते हैं, वैसे अच्छे प्रकार सिद्ध किये हुए तारविद्या प्रयोग से चलाये हुए विमान आदि यानों से आकाश और भूमि वा जल में अच्छे प्रकार जा-आके अभीष्ट देशों को सुख से जा-आके अपने कार्य्यों को सिद्ध करके निरन्तर सुख को प्राप्त हों॥१॥

ते॑ऽरु॒णेभि॒र्वर॒मा पि॒शङ्गैः॑ शु॒भे कं या॑न्ति रथ॒तूर्भि॒रश्वैः॑। रु॒क्मो न चि॒त्रः स्वधि॑तीवान्प॒व्या रथ॑स्य जङ्घनन्त॒ भूम॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे शूरवीर अच्छे शस्त्र रखनेवाला पुरुष वेग से जाकर शत्रुओं को मारता है, वैसे मनुष्य वेगवाले रथों पर बैठ देश-देशान्तर को जा-आ के शत्रुओं को जीतते हैं॥२॥

श्रि॒ये कं वो॒ अधि॑ त॒नूषु॒ वाशी॑र्मे॒धा वना॒ न कृ॑णवन्त ऊ॒र्ध्वा। यु॒ष्मभ्यं॒ कं म॑रुतः सुजातास्तुविद्यु॒म्नासो॑ धनयन्ते॒ अद्रि॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे मेघ वा कूप जल से सिंचे हुए वन और उपवन, बाग-बगीचे अपने फलों से प्राणियों को सुखी करते हैं, वैसे विद्वान् लोग विद्या और अच्छी शिक्षा करके अपने परिश्रम के फल से सब मनुष्यों को सुखसंयुक्त करते हैं॥३॥

अहा॑नि॒ गृध्राः॒ पर्या व॒ आगु॑रि॒मां धियं॑ वार्का॒र्यां च॑ दे॒वीम्। ब्रह्म॑ कृ॒ण्वन्तो॒ गोत॑मासो अ॒र्कैरू॒र्ध्वं नु॑नुद्र उत्स॒धिं पिब॑ध्यै॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे ज्ञान गौरव चाहनेवालो! जैसे मनुष्य पिआस के खोने आदि प्रयोजनों के लिये परिश्रम के साथ कुंआ, बावरी, तालाब आदि खुदा कर अपने-अपने कामों को सिद्ध करते हैं, वैसे आप लोग अत्यन्त पुरुषार्थ और विद्धानों के संग से विद्या के अभ्यास को जैसे चाहिये वैसा करके समस्त विद्या से प्रकाशित उत्तम बुद्धि को पाकर उसके अनुकूल क्रिया को सिद्ध करो॥४॥

ए॒तत्त्यन्न योज॑नमचेति स॒स्वर्ह॒ यन्म॑रुतो॒ गोत॑मो वः। पश्य॒न्हिर॑ण्यचक्रा॒नयो॑दंष्ट्रान्वि॒धाव॑तो व॒राहू॑न्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे अगली-पिछली बातों को जाननेवाला विद्वान् अच्छे-अच्छे काम कर आनन्द को भोगता है, वैसे आप लोग भी विद्या से सिद्ध हुए कामों को करके सुखों को भोगो॥५॥

ए॒षा स्या वो॑ मरुतोऽनुभ॒र्त्री प्रति॑ ष्टोभति वा॒घतो॒ न वाणी॑। अस्तो॑भय॒द्वृथा॑सा॒मनु॑ स्व॒धां गभ॑स्त्योः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे ऋतु-ऋतु में यज्ञ करानेवाले की वाणी यज्ञ कामों का प्रकाश कर दोषों को निवृत्त करती है, वैसे ही विद्वानों की वाणी विद्याओं का प्रकाश कर अविद्या को निवृत्त करती है, इसीसे सब मनुष्यों को विद्वानों के संग का निरन्तर सेवन करना चाहिये॥६॥। इस सूक्त में मनुष्यों को विद्यासिद्धि के लिये पढ़ने-पढ़ाने की रीति प्रकाशित की है, इस कारण इसके अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये॥

आ नो॑ भ॒द्राः क्रत॑वो यन्तु वि॒श्वतोऽद॑ब्धासो॒ अप॑रीतास उ॒द्भिदः॑। दे॒वा नो॒ यथा॒ सद॒मिद् वृ॒धे अस॒न्नप्रा॑युवो रक्षि॒तारो॑ दि॒वेऽदि॑वे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सब श्रेष्ठ सब ऋतुओं में सुख देने योग्य घर सब सुखों को पहुँचाता है, वैसे ही विद्वान् लोग, विद्या और शिल्पयज्ञ सुख करनेवाले होते हैं, यह जानना चाहिये॥१॥

दे॒वानां॑ भ॒द्रा सु॑म॒तिर्ऋ॑जूय॒तां दे॒वानां॑ रा॒तिर॒भि नो॒ नि व॑र्तताम्। दे॒वानां॑ स॒ख्यमुप॑ सेदिमा व॒यं दे॒वा न॒ आयुः॒ प्र ति॑रन्तु जी॒वसे॑॥

उत्तम विद्वानों के सङ्ग और ब्रह्मचर्य्य आदि नियमों के विना किसी का शरीर और आत्मा का बल बढ़ नहीं सकता, इससे सबको चाहिये कि इन विद्वानों का सङ्ग नित्य करें और जितेन्द्रिय रहें॥२॥

तान् पूर्व॑या नि॒विदा॑ हूमहे व॒यं भगं॑ मि॒त्रमदि॑तिं॒ दक्ष॑म॒स्रिध॑म्। अ॒र्य॒मणं॒ वरु॑णं॒ सोम॑म॒श्विना॒ सर॑स्वती नः सु॒भगा॒ मय॑स्करत्॥

किसी को भी वेदोक्त लक्षणों के विना विद्वान् और मूर्खों के लक्षण जाने नहीं जा सकते और न उनके विना विद्या और श्रेष्ठ शिक्षा से सिद्ध की हुई वाणी सुख करनेवाली हो सकती है। इससे सब मनुष्य वेदार्थ के विशेष ज्ञान से विद्वान् और मूर्खों के लक्षण जानकर विद्वानों का संग कर, मूर्खों का संग छोड़ के समस्त विद्यावाले हों॥३॥

तन्नो॒ वातो॑ मयो॒भु वा॑तु भेष॒जं तन्मा॒ता पृ॑थि॒वी तत्पि॒ता द्यौः। तद् ग्रावा॑णः सोम॒सुतो॑ मयो॒भुव॒स्तद॑श्विना शृणुतं धिष्ण्या यु॒वम्॥

शिल्पविद्या की उन्नति करनेहारे जो उसके पढ़ने-पढ़ानेहारे विद्वान् हैं, वे जितना पढ़के समझें उतना यथार्थ सबके सुखके लिये नित्य प्रकाशित करें, जिससे हम लोग ईश्वर की सृष्टि के पवन आदि पदार्थों से अनेक उपकारों को लेकर सुखी हों॥४॥

तमीशा॑नं॒ जग॑तस्त॒स्थुष॒स्पतिं॑ धियंजि॒न्वमव॑से हूमहे व॒यम्। पू॒षा नो॒ यथा॒ वेद॑सा॒मस॑द्वृ॒धे र॑क्षि॒ता पा॒युरद॑ब्धः स्व॒स्तये॑॥

इस मन्त्र में श्लेष और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को चाहिये कि वैसा अपना व्यवहार करें कि जैसा ईश्वर के उपदेश के अनुकूल हो और जैसे ईश्वर सबका अधिपति है, वैसे मनुष्यों को भी सदा उत्तम विद्या और शुभ गुणों की प्राप्ति और अच्छे पुरुषार्थ से सब पर स्वामिपन सिद्ध करना चाहिये। और जैसे ईश्वर विज्ञान से पुरुषार्थयुक्त, सब सुखों को देने, संसार की उन्नति और सब की रक्षा करनेवाला सब के सुख के लिये प्रवृत्त हो रहा है, वैसे ही मनुष्यों को भी होना चाहिये॥५॥

स्व॒स्ति न॒ इन्द्रो॑ वृ॒द्धश्र॑वाः स्व॒स्ति नः॑ पू॒षा वि॒श्ववे॑दाः। स्व॒स्ति न॒स्तार्क्ष्यो॒ अरि॑ष्टनेमिः स्व॒स्ति नो॒ बृह॒स्पति॑र्दधातु॥

ईश्वर की प्रार्थना और अपने पुरुषार्थ के विना किसी को शरीर, इन्द्रिय और आत्मा का परिपूर्ण सुख नहीं होता, इससे उसका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये॥६॥

पृष॑दश्वा म॒रुतः॒ पृश्नि॑मातरः शुभं॒यावा॑नो वि॒दथे॑षु॒ जग्म॑यः। अ॒ग्नि॒जि॒ह्वा मन॑वः॒ सूर॑चक्षसो॒ विश्वे॑ नो दे॒वा अव॒सा ग॑मन्नि॒ह॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैस बाहर और भीतरले पवन सब प्राणियों के सुख के लिये प्राप्त होते हैं, वैसे विद्वान् लोग सबके सुख के लिये प्रवृत्त होवें॥७॥

भ॒द्रं कर्णे॑भिः शृणुयाम देवा भ॒द्रं प॑श्येमा॒क्षभि॑र्यजत्राः। स्थि॒रैरङ्गै॑स्तुष्टु॒वांस॑स्त॒नूभि॒र्व्य॑शेम दे॒वहि॑तं॒ यदायुः॑॥

विद्वान्, आप्त और सज्जनों के संग के विना कोई सत्यविद्या का वचन सत्य-दर्शन और सत्य व्यवहारमय अवस्था को नहीं पा सकता और न इसके विना किसी का शरीर और आत्मा दृढ़ हो सकता है, इससे सब मनुष्यों को यह उक्त व्यवहार वर्त्तना योग्य है॥८॥

श॒तमिन्नु श॒रदो॒ अन्ति॑ देवा॒ यत्रा॑ नश्च॒क्रा ज॒रसं॑ त॒नूना॑म्। पु॒त्रासो॒ यत्र॑ पि॒तरो॒ भव॑न्ति॒ मा नो॑ म॒ध्या री॑रिष॒तायु॒र्गन्तोः॑॥

जिस विद्या में बालक भी वृद्ध होते वा जिस शुभ आचरण में वृद्धावस्था होती है, वह सब व्यवहार विद्वानों के संग ही से हो सकता है और विद्वानों को चाहिये कि यह उक्त व्यवहार सबको प्राप्त करावें॥९॥

अदि॑ति॒र्द्यौरदि॑तिर॒न्तरि॑क्ष॒मदि॑तिर्मा॒ता स पि॒ता स पु॒त्रः। विश्वे॑ दे॒वा अदि॑तिः॒ पञ्च॒ जना॒ अदि॑तिर्जा॒तमदि॑ति॒र्जनि॑त्वम्॥

इस मन्त्र में परमाणुरूप वा प्रवाहरूप से सब पदार्थ नित्य मानकर दिव् आदि पदार्थों की अदिति संज्ञा की है। जहाँ-जहाँ वेद में अदिति शब्द पढ़ा है, वहाँ-वहाँ प्रकरण की अनुकूलता से दिव् आदि पदार्थों में से जिस-जिस की योग्यता हो उस-उस का ग्रहण करना चाहिये। ईश्वर, जीव और प्रकृति अर्थात् जगत् का कारण इनके अविनाशी होने से उसकी भी अदिति संज्ञा है॥१०॥इस सूक्त में विद्वान्, विद्यार्थी और प्रकाशमय पदार्थों का विश्वेदेव पद के अन्तर्गत होने से वर्णन किया है। इससे इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, ऐसा जानना चाहिये॥

ऋ॒जु॒नी॒ती नो॒ वरु॑णो मि॒त्रो न॑यतु वि॒द्वान्। अ॒र्य॒मा दे॒वैः स॒जोषाः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। परमेश्वर वा आप्त मनुष्य सत्यविद्या के ग्राहक स्वभाववाले पुरुषार्थी मनुष्य को उत्तम धर्म और उत्तम क्रियाओं को प्राप्त कराता है, और को नहीं॥१॥

ते हि वस्वो॒ वस॑वाना॒स्ते अप्र॑मूरा॒ महो॑भिः। व्र॒ता र॑क्षन्ते वि॒श्वाहा॑॥

विद्वानों के विना किसी से धन और धर्मयुक्त आचार रक्खे नहीं जा सकते। इससे सब मनुष्यों को नित्य विद्याप्रचार करना चाहिये, जिससे सब मनुष्य विद्वान् होके धार्मिक हों॥२॥

ते अ॒स्मभ्यं॒ शर्म॑ यंसन्न॒मृता॒ मर्त्ये॑भ्यः। बाध॑माना॒ अप॒ द्विषः॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों से शिक्षा को पाकर खोटे स्वभाववालों को दूर कर नित्य आनन्दित हों॥३॥

वि नः॑ प॒थः सु॑वि॒ताय॑ चि॒यन्त्विन्द्रो॑ म॒रुतः॑। पू॒षा भगो॒ वन्द्या॑सः॥

मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों से ऐश्वर्य, पुष्टि और सौभाग्य पाकर उस सौभाग्य की योग्यता को औरों को भी प्राप्त करावें॥४॥

उ॒त नो॒ धियो॒ गोअ॑ग्राः॒ पूष॒न्विष्ण॒वेव॑यावः। कर्ता॑ नः स्वस्ति॒मतः॑॥

पढ़नेवालों को चाहिये कि पढ़ानेवाले जैसे विद्या की शिक्षा करे, वैसे उनका ग्रहण कर अच्छे विचार से नित्य उनकी उन्नति करें॥५॥

मधु॒ वाता॑ ऋताय॒ते मधु॑ क्षरन्ति॒ सिन्ध॑वः। माध्वी॑र्नः स॒न्त्वोष॑धीः॥

हे पढ़ाने वालो! तुम और हम ऐसा अच्छा यत्न करें कि जिससे सृष्टि के पदार्थों से समग्र आनन्द के लिये विद्या करके उपकारों को ग्रहण कर सकें॥६॥

मधु॒ नक्त॑मु॒तोषसो॒ मधु॑म॒त्पार्थि॑वं॒ रजः॑। मधु॒ द्यौर॑स्तु नः पि॒ता॥

पढ़ानेवाले लोगों से जैसे मनुष्यों के लिये पृथिवीस्थ पदार्थ आनन्दायक हों, वैसे सब मनुष्यों को गुण, ज्ञान, और हस्तक्रिया से विद्या का उपयोग करना चाहिए॥७॥

मधु॑मान्नो॒ वन॒स्पति॒र्मधु॑माँ अस्तु॒ सूर्यः॑। माध्वी॒र्गावो॑ भवन्तु नः॥

हे विद्वान् लोगो! तुम और हम आओ मिलके ऐसा पुरुषार्थ करें कि जिससे हम लोगों के सब काम सिद्ध होवें॥८॥

शं नो॑ मि॒त्रः शं वरु॑णः॒ शं नो॑ भवत्वर्य॒मा। शं न॒ इन्द्रो॒ बृह॒स्पतिः॒ शं नो॒ विष्णु॑रुरुक्र॒मः॥

परमेश्वर के समान मित्र, उत्तम न्याय का करनेवाला, ऐश्वर्य्यवान्, बड़े-बड़े पदार्थों का स्वामी तथा व्यापक सुख देनेवाला और विद्वान् के समान प्रेम उत्पादन करने, धार्मिक सत्य व्यवहार वर्त्तने, विद्या आदि धनों को देने और विद्या पालनेवाला शुभ गुण और सत्कर्मों में व्याप्त महापराक्रमी कोई नहीं हो सकता। इससे सब मनुष्यों को चाहिये कि परमात्मा की स्तुति, प्रार्थना, उपासना, निरन्तर विद्वानों की सेवा और संग करके नित्य आनन्द में रहें॥९॥इस सूक्त में पढ़ने-पढ़ानेवालों के और ईश्वर के कर्त्तव्य काम तथा उनके फल का कहना है, इससे इस सूक्त के अर्थ के साथ पिछले सूक्त के अर्थ की संगति जाननी चाहिये॥

त्वं सो॑म॒ प्र चि॑कितो मनी॒षा त्वं रजि॑ष्ठ॒मनु॑ नेषि॒ पन्था॑म्। तव॒ प्रणी॑ती पि॒तरो॑ न इन्दो दे॒वेषु॒ रत्न॑मभजन्त॒ धीराः॑॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जैसे परमेश्वर अत्यन्त उत्तम विद्वान् अविद्या विनाश करके विद्या और धर्ममार्ग को पहुँचाता है, वैसे ही वैद्यकशास्त्र की रीति से सेवा किया हुआ सोम आदि ओषधियों का समूह सब रोगों का विनाश करके सुखों को पहुँचाता है॥१॥

त्वं सो॑म॒ क्रतु॑भिः सु॒क्रतु॑र्भू॒स्त्वं दक्षैः॑ सु॒दक्षो॑ वि॒श्ववे॑दाः। त्वं वृषा॑ वृष॒त्वेभि॑र्महि॒त्वा द्यु॒म्नेभि॑र्द्यु॒म्न्य॑भवो नृ॒चक्षाः॑॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जैसे अच्छी रीति से सेवा किया हुआ सोम आदि ओषधियों का समूह बुद्धि, चतुराई, वीर्य और धनों को उत्पन्न कराता है, वैसे ही अच्छी उपासना को प्राप्त हुआ ईश्वर वा अच्छी सेवा को प्राप्त हुआ विद्वान् उक्त कामों को उत्पन्न कराता है॥२॥

राज्ञो॒ नु ते॒ वरु॑णस्य व्र॒तानि॑ बृ॒हद्ग॑भी॒रं तव॑ सोम॒ धाम॑। शुचि॒ष्ट्वम॑सि प्रि॒यो न मि॒त्रो द॒क्षाय्यो॑ अर्य॒मेवा॑सि सोम॥

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। मनुष्य जैसे-जैसे इस सृष्टि में सृष्टि की रचना के नियमों से ईश्वर के गुण, कर्म और स्वभावों को देख के अच्छे यत्न को करें, वैसे-वैसे विद्या और सुख उत्पन्न होते हैं॥३॥

या ते॒ धामा॑नि दि॒वि या पृ॑थि॒व्यां या पर्व॑ते॒ष्वोष॑धीष्व॒प्सु। तेभि॑र्नो॒ विश्वैः॑ सु॒मना॒ अहे॑ळ॒न्राज॑न्त्सोम॒ प्रति॑ ह॒व्या गृ॑भाय॥

जैसे जगदीश्वर अपनी रची सृष्टि में वेद के द्वारा इस सृष्टि के कामों को दिखाकर सब विद्याओं का प्रकाश करता है, वैसे ही विद्वान् पढ़े हुए अङ्ग और उपाङ्ग सहित वेदों से हस्तक्रिया के साथ कलाओं की चतुराई को दिखाकर सबको समस्त विद्या का ग्रहण करावें॥४॥

त्वं सो॑मासि॒ सत्प॑ति॒स्त्वं राजो॒त वृ॑त्र॒हा। त्वं भ॒द्रो अ॑सि॒ क्रतुः॑॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। परमेश्वर, विद्वान्, सोमलता आदि ओषधियों का समूह, ये समस्त ऐश्वर्य को प्रकाश करने, श्रेष्ठों की रक्षा करने और उनके स्वामी, दुःख का विनाश करने, और विज्ञान के देनेहारे और कल्याणकारी हैं, ऐसा अच्छी प्रकार जान के सबको इनका सेवन करना योग्य है॥५॥

त्वं च॑ सोम नो॒ वशो॑ जी॒वातुं॒ न म॑रामहे। प्रि॒यस्तो॑त्रो॒ वन॒स्पतिः॑॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जो मनुष्य ईश्वर की आज्ञा पालनेहारे विद्वानों और ओषधियों का सेवन करते हैं, वे पूरी आयु पाते हैं॥६॥

त्वं सो॑म म॒हे भगं॒ त्वं यून॑ ऋताय॒ते। दक्षं॑ दधासि जी॒वसे॑॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को परस्पर विद्वान् और ओषधियों के सेवन के विना सुख होने को योग्य नहीं है, इससे यह आचरण सबको नित्य करने योग्य है॥७॥

त्वं नः॑ सोम वि॒श्वतो॒ रक्षा॑ राजन्नघाय॒तः। न रि॑ष्ये॒त्त्वाव॑तः॒ सखा॑॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को इस प्रकार ईश्वर की प्रार्थना करके उत्तम यत्न करना चाहिये कि जिससे धर्म के छोड़ने और अधर्म के ग्रहण करने को इच्छा भी न उठे। धर्म और अधर्म की प्रवृत्ति में मन की इच्छा ही कारण है, उसकी प्रवृत्ति और उसके रोकने से कभी धर्म का त्याग और अधर्म का ग्रहण उत्पन्न न हो॥८॥

सोम॒ यास्ते॑ मयो॒भुव॑ ऊ॒तयः॒ सन्ति॑ दा॒शुषे॑। ताभि॑र्नोऽवि॒ता भ॑व॥

जिन प्राणियों की परमेश्वर, विद्वान् और अच्छी सिद्ध की हुई ओषधि रक्षा करनेवाली होती हैं, वे कहाँ से दुःख देखें॥९॥

इ॒मं य॒ज्ञमि॒दं वचो॑ जुजुषा॒ण उ॒पाग॑हि। सोम॒ त्वं नो॑ वृ॒धे भ॑व॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जब विज्ञान से ईश्वर और सेवा तथा कृतज्ञता से विद्वान्, वैद्यकविद्या वा उत्तम क्रिया से ओषधियाँ मिलती हैं, तब मनुष्यों के सब सुख उत्पन्न होते हैं॥१०॥

सोम॑ गी॒र्भिष्ट्वा॑ व॒यं व॒र्धया॑मो वचो॒विदः॑। सु॒मृ॒ळी॒को न॒ आ वि॑श॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ईश्वर, विद्वान् और ओषधि समूह के तुल्य प्राणियों को कोई सुख करनेवाला नहीं है, इससे उत्तम शिक्षा और विद्याऽध्ययन से उक्त पदार्थों के बोध की वृद्धि करके मनुष्यों को नित्य वैसे ही आचरण करना चाहिये॥११॥

ग॒य॒स्फानो॑ अमीव॒हा व॑सु॒वित्पु॑ष्टि॒वर्ध॑नः। सु॒मि॒त्रः सो॑म नो भव॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। प्राणियों को ईश्वर और ओषधियों के सेवन और विद्वानों के सङ्ग के विना रोगनाश, बलवृद्धि, पदार्थों का ज्ञान, धन की प्राप्ति तथा मित्रमिलाप नहीं हो सकता, इससे उक्त पदार्थों का यथायोग्य आश्रय और सेवा सबको करनी चाहिये॥१२॥

सोम॑ रार॒न्धि नो॑ हृ॒दि गावो॒ न यव॑से॒ष्वा। मर्य॑ इव॒ स्व ओ॒क्ये॑॥

इस मन्त्र में श्लेष और दो उपमालङ्कार हैं। हे जगदीश्वर! जैसे प्रत्यक्षता से गौ और मनुष्य अपने भोजन करने योग्य पदार्थ वा स्थान में उत्साहपूर्वक अपना वर्त्ताव वर्त्तते हैं, वैसे हम लोगों के आत्मा में प्रकाशित हूजिये। जैसे पृथिवी आदि कार्य्य पदार्थों में प्रत्यक्ष सूर्य्य की किरणें प्रकाशमान होती हैं, वैसे हम लोगों के आत्मा में प्रकाशमान हूजिये। इस मन्त्र में असंभव होने से विद्वान् का ग्रहण नहीं किया॥१३॥

यः सो॑म स॒ख्ये तव॑ रा॒रण॑द्देव॒ मर्त्यः॑। तं दक्षः॑ सचते क॒विः॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जो मनुष्य परमेश्वर, विद्वान् वा उत्तम ओषधि के साथ मित्रपन करते हैं, वे विद्या को प्राप्त होके कभी दुःखभागी नहीं होते॥१४॥

उ॒रु॒ष्या णो॑ अ॒भिश॑स्तेः॒ सोम॒ नि पा॒ह्यंह॑सः। सखा॑ सु॒शेव॑ एधि नः॥

मनुष्यों को अच्छी प्रकार सेवा किया हुआ वैद्य, उत्तम विद्वान्, समस्त अविद्या आदि राजरोगों से अलग कर उनको आनन्दित करता है, इससे यह सदैव संगम करने योग्य है॥१५॥

आ प्या॑यस्व॒ समे॑तु ते वि॒श्वतः॑ सोम॒ वृष्ण्य॑म्। भवा॒ वाज॑स्य संग॒थे॥

मनुष्यों को चाहिये कि विद्वान् और औषधिगणों का सेवनकर, बल और विद्या को प्राप्त हो, समस्त सृष्टि की अत्युत्तम विद्याओं को उन्नति कर, शत्रुओं को जीत और सज्जनों की रक्षाकर, शरीर और आत्मा की पुष्टि निरन्तर बढ़ावें॥१६॥

आ प्या॑यस्व मदिन्तम॒ सोम॒ विश्वे॑भिरं॒शुभिः॑। भवा॑ नः सु॒श्रव॑स्तमः॒ सखा॑ वृ॒धे॥

जो उत्तम विद्वान् समस्त उत्तम ओषधिगण से सृष्टिक्रम की विद्याओं में मनुष्यों की उन्नति करता है, उसके अनुकूल सबको चलना चाहिये॥१७॥

सं ते॒ पयां॑सि॒ समु॑ यन्तु॒ वाजाः॒ सं वृष्ण्या॑न्यभिमाति॒षाहः॑। आ॒प्याय॑मानो अ॒मृता॑य सोम दि॒वि श्रवां॑स्युत्त॒मानि॑ धिष्व॥

मनुष्यों को चाहिये कि विद्या और पुरुषार्थ से विद्वानों के सङ्ग, ओषधियों के सेवन और प्रयोजन से जो-जो प्रशंसित कर्म, प्रशंसित गुण और श्रेष्ठ पदार्थ प्राप्त होते हैं, उनका धारण और उनकी रक्षा तथा धर्म, कामों को सिद्धकर मोक्ष की सिद्धि करें॥१८॥

या ते॒ धामा॑नि ह॒विषा॒ यज॑न्ति॒ ता ते॒ विश्वा॑ परि॒भूर॑स्तु य॒ज्ञम्। ग॒य॒स्फानः॑ प्र॒तर॑णः सु॒वीरोऽवी॑रहा॒ प्र च॑रा सोम॒ दुर्या॑न्॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। कोई भी सृष्टि के पदार्थों के गुणों को विना जाने उनसे उपकार नहीं ले सकता है, इससे विद्वानों के सङ्ग से पृथ्वी से लेकर ईश्वरपर्यन्त यथायोग्य सब पदार्थों को जानकर मनुष्यों को चाहिये कि क्रियासिद्धि सदैव करें॥१९॥

सोमो॑ धे॒नुं सोमो॒ अर्व॑न्तमा॒शुं सोमो॑ वी॒रं क॑र्म॒ण्यं॑ ददाति। सा॒द॒न्यं॑ विद॒थ्यं॑ स॒भेयं॑ पितृ॒श्रव॑णं॒ यो ददा॑शदस्मै॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जैसे विद्वान् उत्तम शिक्षा को प्राप्त वाणी का उपदेश कर अच्छे पुरुषार्थ को प्राप्त होकर कार्यसिद्धि कराते हैं, वैसे ही सोम ओषधियों का समूह श्रेष्ठ बल और पुष्टि को कराता है॥२०॥

अषा॑ळ्हं यु॒त्सु पृत॑नासु॒ पप्रिं॑ स्व॒र्षाम॒प्सां वृ॒जन॑स्य गो॒पाम्। भ॒रे॒षु॒जां सु॑क्षि॒तिं सु॒श्रव॑सं॒ जय॑न्तं॒ त्वामनु॑ मदेम सोम॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को सब गुणों से युक्त सेनाध्यक्ष और समस्त गुण करनेवाले सोमलता आदि ओषधियों के विज्ञान और सेवन के विना कभी उत्तम राज्य और आरोग्यपन प्राप्त नहीं हो सकता, इससे उक्त प्रबन्धों का आश्रय सबको करना चाहिये॥२१॥

त्वमि॒मा ओष॑धीः सोम॒ विश्वा॒स्त्वम॒पो अ॑जनय॒स्त्वं गाः। त्वमा त॑तन्थो॒र्व१॒॑न्तरि॑क्षं॒ त्वं ज्योति॑षा॒ वि तमो॑ ववर्थ॥

जिस ईश्वर ने नाना प्रकार की सृष्टि बनाई है, वही सब मनुष्यों को उपासना के योग्य इष्टदेव हैं॥२२॥

दे॒वेन॑ नो॒ मन॑सा देव सोम रा॒यो भा॒गं स॑हसावन्न॒भि यु॑ध्य। मा त्वा त॑न॒दीशि॑षे वी॒र्य॑स्यो॒भये॑भ्यः॒ प्र चि॑कित्सा॒ गवि॑ष्टौ॥

मनुष्यों को चाहिये कि परम उत्तम सेनाध्यक्ष और ओषधिगण का आश्रय और युद्ध में प्रवृत्ति कर उत्साह के साथ अपनी सेना को जोड़ और शत्रुओं की सेना का पराजय कर चक्रवर्त्ति राज्य के ऐश्वर्य को प्राप्त हों॥२३॥इस सूक्त में पढ़ने-पढ़ानेवालों आदि की विद्या के पढ़ने आदि कामों की सिद्धि करनेवाले (सोम) शब्द के अर्थ के कथन से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह ९१ इक्कानवाँ सूक्त और वर्ग २३ तेईस समाप्त हुआ॥

ए॒ता उ॒ त्या उ॒षसः॑ के॒तुम॑क्रत॒ पूर्वे॒ अर्धे॒ रज॑सो भा॒नुम॑ञ्जते। नि॒ष्कृ॒ण्वा॒ना आयु॑धानीव धृ॒ष्णवः॒ प्रति॒ गावोऽरु॑षीर्यन्ति मा॒तरः॑॥

इस सृष्टि में सदैव सूर्य का प्रकाश भूगोल के आधे भाग को प्रकाशित करता है और आधे भाग में अन्धकार रहता है। सूर्य के प्रकाश के विना किसी पदार्थ का विशेष ज्ञान नहीं होता। सूर्य की किरणें क्षण-क्षण भूगोल आदि लोकों के घूमने से गमन करती सी दीख पड़ती हैं। जो प्रातःकाल के रक्त प्रकाश अपने-अपने देश में हैं, वे प्रत्यक्ष और दूसरे देश में हैं, वे अप्रत्यक्ष। ये सब प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रातःकाल की वेला सब लोकों में एकसी सब दिशाओं में प्रवेश करती हैं। जैसे शस्त्र आगे-पीछे जाने से सीधी-उलटी चाल को प्राप्त होते हैं, वैसे अनेक प्रकार के प्रातःप्रकाश भूगोल आदि लोकों की चाल से सीधी-तिरछी चालों से युक्त होते हैं, यह बात मनुष्यों को जाननी चाहिये॥१॥

उद॑पप्तन्नरु॒णा भा॒नवो॒ वृथा॑ स्वा॒युजो॒ अरु॑षी॒र्गा अ॑युक्षत। अक्र॑न्नु॒षासो॑ व॒युना॑नि पू॒र्वथा॒ रुश॑न्तं भा॒नुमरु॑षीरशिश्रयुः॥

जो सूर्य की किरणें भूगोल आदि लोकों का सेवन अर्थात् उनपर पड़ती हुई क्रम-क्रम से चलती जाती हैं, वे प्रातः और सायङ्काल के समय भूमि के संयोग से लाल होकर बादलों को लाल कर देती हैं और जब ये प्रातःकाल लोकों में प्रवृत्त अर्थात् उदय को प्राप्त होती हैं तब प्राणियों को सब पदार्थों के विशेष ज्ञान होते हैं। जो भूमि पर गिरी हुई लाल वर्ण की हैं वे सूर्य के आश्रय होकर और उसको लाल कर ओषधियों का सेवन करती हैं, उनका सेवन जागरितावस्था में मनुष्यों को करना चाहिये॥२॥

अर्च॑न्ति॒ नारी॑र॒पसो॒ न वि॒ष्टिभिः॑ समा॒नेन॒ योज॑ने॒ना प॑रा॒वतः॑। इषं॒ वह॑न्तीः सु॒कृते॑ सु॒दान॑वे॒ विश्वेदह॒ यज॑मानाय सुन्व॒ते॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पतिव्रता स्त्रियाँ अपने-अपने पति का सेवन कर उनका सत्कार करती हैं, वैसे ही सूर्य की किरणें भूमि को प्राप्त हुई वहाँ से निवृत्त हो और अन्तरिक्ष में प्रकाश प्रकट कर समस्त वस्तुओं को पुष्ट करके सब प्राणियों को सुख देती हैं॥३॥

अधि॒ पेशां॑सि वपते नृ॒तूरि॒वापो॑र्णुते॒ वक्ष॑ उ॒स्रेव॒ बर्ज॑हम्। ज्योति॒र्विश्व॑स्मै॒ भुव॑नाय कृण्व॒ती गावो॒ न व्र॒जं व्यु१॒॑षा आ॑व॒र्तमः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सूर्य्य की केवल ज्योति है वह दिन कहाता और जो तिरछी हुई भूमि पर पड़ती है वह (उषा) प्रातःकाल की वेला कहाती है अर्थात् प्रातःसमय अति मन्द सूर्य्य की उजेली तिरछी चाल से जहाँ-तहाँ लोक-लोकान्तरों पर पड़ती है उसके विना संसार का पालन नहीं हो सकता, इससे इस विद्या की भावना मनुष्यों को अवश्य होनी चाहिये॥४॥

प्रत्य॒र्ची रुश॑दस्या अदर्शि॒ वि ति॑ष्ठते॒ बाध॑ते कृ॒ष्णमभ्व॑म्। स्वरुं॒ न पेशो॑ वि॒दथे॑ष्व॒ञ्जञ्चि॒त्रं दि॒वो दु॑हि॒ता भा॒नुम॑श्रेत्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो सूर्य्य की उजेली आप ही उजाला करती ही सबको प्रकाशित कर सीधी-उलटी दिखलाती है, वह प्रातःकाल की वेला सूर्य्य की पुत्री के समान है, ऐसा मानना चाहिये॥५॥

अता॑रिष्म॒ तम॑सस्पा॒रम॒स्योषा उ॒च्छन्ती॑ व॒युना॑ कृणोति। श्रि॒ये छन्दो॒ न स्म॑यते विभा॒ती सु॒प्रती॑का सौमन॒साया॑जीगः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि जैसे यह उषा प्रातःकाल की वेला कर्म, ज्ञान, आनन्द, पुरुषार्थ, धनप्राप्ति के [द्वारा] दुःखरूपी अन्धकार के निवारण का निदान है, वैसे इस वेला में उत्तम पुरुषार्थ से प्रयत्न में स्थित होके सुख की बढ़ती और दुःख का नाश करें॥६॥

भास्व॑ती ने॒त्री सू॒नृता॑नां दि॒वः स्त॑वे दुहि॒ता गोत॑मेभिः। प्र॒जाव॑तो नृ॒वतो॒ अश्व॑बुध्या॒नुषो॒ गोअ॑ग्राँ॒ उप॑ मासि॒ वाजा॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सब गुणों से युक्त सुलक्ष्णा कन्या से पिता, माता, चाचा आदि सुखी होते हैं, वैसे ही प्रातःकाल की वेला के गुण-अपगुण प्रकाशित करनेवाली विद्या से विद्वान् लोग सुखी होते हैं॥७॥

उष॒स्तम॑श्यां य॒शसं॑ सु॒वीरं॑ दा॒सप्र॑वर्गं र॒यिमश्व॑बुध्यम्। सु॒दंस॑सा॒ श्रव॑सा॒ या वि॒भासि॒ वाज॑प्रसूता सुभगे बृ॒हन्त॑म्॥

जो लोग प्रातःकाल की वेला के गुण-अवगुणों को जतानेवाली विद्या से अच्छे-अच्छे यत्न करते हैं, वे यह सब वस्तु पाकर सुख से परिपूर्ण होते हैं किन्तु और नहीं॥८॥

विश्वा॑नि दे॒वी भुव॑नाभि॒चक्ष्या॑ प्रती॒ची चक्षु॑रुर्वि॒या वि भा॑ति। विश्वं॑ जी॒वं च॒रसे॑ बो॒धय॑न्ती॒ विश्व॑स्य॒ वाच॑मविदन्मना॒योः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे उत्तम स्त्री सब प्रकार से अपने पति को आनन्दित करती है, वैसे प्रातःकाल की वेला समस्त जगत् को आनन्द देती है॥९॥

पुनः॑पुन॒र्जाय॑माना पुरा॒णी स॑मा॒नं वर्ण॑म॒भि शुम्भ॑माना। श्व॒घ्नीव॑ कृ॒त्नुर्विज॑ आमिना॒ना मर्त॑स्य दे॒वी ज॒रय॒न्त्यायुः॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे छिपके वा देखते-देखते भेड़िया की स्त्री वृकी वन के जीवों को तोड़ती और जैसे बाजिनी उड़ते हुए पखेरुओं को विनाश करती है, वैसे ही यह प्रातःसमय की वेला सोते हुए हम लोगों की आयुर्दा को धीरे-धीरे अर्थात् दिनों-दिन काटती है ऐसा जान और आलस्य छोड़कर हम लोगों को रात्रि के चौथे प्रहर में जाग के विद्या, धर्म और परोपकार आदि व्यवहारों में नित्य उचित वर्त्ताव रखना चाहिये। जिनकी इस प्रकार की बुद्धि है, वे लोग आलस्य और अधर्म्म के बीच में कैसे प्रवृत्त हों!॥१०॥

व्यू॒र्ण्व॒ती दि॒वो अन्ताँ॑ अबो॒ध्यप॒ स्वसा॑रं सनु॒तर्यु॑योति। प्र॒मि॒न॒ती म॑नु॒ष्या॑ यु॒गानि॒ योषा॑ जा॒रस्य॒ चक्ष॑सा॒ वि भा॑ति॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे व्यभिचारिणी स्त्री जारकर्म करनेहारे पुरुष की उमर का विनाश करती है, वैसे सूर्य्य से सम्बन्ध रखनेहारे अन्धकार की निवृत्ति से दिन को प्रसिद्ध करनेवाली प्रातःकाल की वेला है, ऐसा जानकर रात और दिन के बीच युक्ति के साथ वर्त्ताव वर्त्तकर पूरी आयुर्दा को भोगें॥११॥

प॒शून्न चि॒त्रा सु॒भगा॑ प्रथा॒ना सिन्धु॒र्न क्षोद॑ उर्वि॒या व्य॑श्वैत्। अमि॑नती॒ दैव्या॑नि व्र॒तानि॒ सूर्य॑स्य चेति र॒श्मिभि॑र्दृशा॒ना॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पशुओं की प्राप्ति के विना वैश्यलोग वा जल की प्राप्ति के विना नदी-नद आदि अति उत्तम सुख करनेवाले नहीं होते, वैसे प्रातःसमय की वेला के गुण जतानेवाली विद्या और पुरुषार्थ के विना मनुष्य प्रशंसित ऐश्वर्य्यवाले नहीं होते, ऐसा जानना चाहिये॥१२॥

उष॒स्तच्चि॒त्रमा भ॑रा॒स्मभ्यं॑ वाजिनीवति। येन॑ तो॒कं च॒ तन॑यं च॒ धाम॑हे॥

मनुष्यों से प्रातःसमय से लेके समय के विभागों के योग्य अर्थात् समय-समय के अनुसार व्यवहारों को करके ही सब सुख के साधन और सुख किये जा सकते हैं, इससे उनको यह अनुष्ठान नित्य करना चाहिये॥१३॥

उषो॑ अ॒द्येह गो॑म॒त्यश्वा॑वति विभावरि। रे॒वद॒स्मे व्यु॑च्छ सूनृतावति॥

इस मन्त्र में (धामहे) इस पद की अनुवृत्ति आती है, मनुष्यों को चाहिये कि प्रतिदिन प्रातःकाल सोने से उठकर जबतक फिर न सोवें तबतक अर्थात् दिनभर निरालसता से उत्तम यत्न के साथ विद्या, धन और राज्य तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन सब उत्तम-उत्तम पदार्थों को सिद्ध करें॥१४॥

यु॒क्ष्वा हि वा॑जिनीव॒त्यश्वाँ॑ अ॒द्यारु॒णाँ उ॑षः। अथा॑ नो॒ विश्वा॒ सौभ॑गा॒न्या व॑ह॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। प्रतिदिन निरन्तर पुरुषार्थ के विना मनुष्यों को ऐश्वर्य्य की प्राप्ति नहीं होती, इससे उनको चाहिये कि ऐसा पुरुषार्थ नित्य करें, जिससे ऐश्वर्य बढ़े॥१५॥

अश्वि॑ना व॒र्तिर॒स्मदा गोम॑द्दस्रा॒ हिर॑ण्यवत्। अ॒र्वाग्रथं॒ सम॑नसा॒ नि य॑च्छतम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि प्रतिदिन क्रिया और चतुराई तथा अग्नि और जल आदि की उत्तेजना से विमान आदि यानों को सिद्ध करके नित्य उन्नति को प्राप्त होनेवाले धन को प्राप्त होकर सुखयुक्त हों॥१६॥

यावि॒त्था श्लोक॒मा दि॒वो ज्योति॒र्जना॑य च॒क्रथुः॑। आ न॒ ऊर्जं॑ वहतमश्विना यु॒वम्॥

मनुष्यों को चाहिये कि पवन और बिजुली के विना सूर्य का प्रकाश नहीं होता और उन दोनों ही के विद्या और उपकार के विना किसी की विद्यासिद्धि होती है, ऐसा जानें॥१७॥

एह दे॒वा म॑यो॒भुवा॑ द॒स्रा हिर॑ण्यवर्तनी। उ॒ष॒र्बुधो॑ वहन्तु॒ सोम॑पीतये॥

मनुष्यों को चाहिये कि उत्पन्न हुए दिनों में भी अग्नि और पवन के विना पदार्थ भोगना नहीं हो सकता, इससे अग्नि और पवन से उपयोग लेने का पुरुषार्थ नित्य करें॥१८॥इस सूक्त में उषा और अश्वि पदार्थों के गुणों के वर्णन से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ इस सूक्तार्थ की सङ्गति जाननी चाहिये॥यह ९२ बानवाँ सूक्त और २७ सत्ताईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अग्नी॑षोमावि॒मं सु मे॑ शृणु॒तं वृ॑षणा॒ हव॑म्। प्रति॑ सू॒क्तानि॑ हर्यतं॒ भव॑तं दा॒शुषे॒ मयः॑॥

किसी मनुष्य को पढ़ाने और परीक्षा के विना विद्या की सिद्धि नहीं होती और कोई मनुष्य पूरी विद्या के विना किसी दूसरे को पढ़ा और उसकी परीक्षा नहीं कर सकता और इस विद्या के विना समस्त सुख नहीं होते, इससे इसका सम्पादन नित्य करें॥१॥

अग्नी॑षोमा॒ यो अ॒द्य वा॑मि॒दं वचः॑ सप॒र्यति॑। तस्मै॑ धत्तं सु॒वीर्यं॒ गवां॒ पोषं॒ स्वश्व्य॑म्॥

जो ब्रह्मचारी विद्या के लिये पढ़ाने और परीक्षा करनेवालों के प्रति उत्तम प्रीति को करके और उनकी नित्य सेवा करता है, वही बड़ा विद्वान् होकर सब सुखों को पाता है॥२॥

अग्नी॑षोमा॒ य आहु॑तिं॒ यो वां॒ दाशा॑द्ध॒विष्कृ॑तिम्। स प्र॒जया॑ सु॒वीर्यं॒ विश्व॒मायु॒र्व्य॑श्नवत्॥

जो विद्वान् वायु, वृष्टि, जल और ओषधियों की शुद्धि के लिये अच्छे संस्कार किये हुए हवि को अग्नि के बीच होम के श्रेष्ठ सोमलतादि ओषधियों की प्राप्ति कर उनसे प्राणियों को सुख देते हैं, वे शरीर आत्मा के बल से युक्त होते हुए पूर्ण सुख करनेवाली आयु को प्राप्त होते हैं, अन्य नहीं॥३॥

अग्नी॑षोमा॒ चेति॒ तद्वी॒र्यं॑ वां॒ यदमु॑ष्णीतमव॒सं प॒णिं गाः। अवा॑तिरतं॒ बृस॑यस्य॒ शेषोऽवि॑न्दतं॒ ज्योति॒रेकं॑ ब॒हुभ्यः॑॥

मनुष्यों को यह जानना चाहिये कि जितना प्रसिद्ध अन्धकार को ढाँप देने और सबलोकों को प्रकाशित करनेहारा तेज होता है, उतना सब कारणरूप पवन और बिजुली की उत्तेजना से होता है॥४॥

यु॒वमे॒तानि॑ दि॒वि रो॑च॒नान्य॒ग्निश्च॑ सोम॒ सक्र॑तू अधत्तम्। यु॒वं सिन्धूँ॑र॒भिश॑स्तेरव॒द्यादग्नी॑षोमा॒वमु॑ञ्चतं गृभी॒तान्॥

मनुष्यों को जानना चाहिये कि पवन और बिजुली ये ही दोनों सबलोकों के सुख के धारण आदि व्यवहार के कारण हैं॥५॥

आन्यं दि॒वो मा॑त॒रिश्वा॑ जभा॒राम॑थ्नाद॒न्यं परि॑ श्ये॒नो अद्रेः॑। अग्नी॑षोमा॒ ब्रह्म॑णा वावृधा॒नोरुं य॒ज्ञाय॑ चक्रथुरु लो॒कम्॥

हे मनुष्यो! तुम लोग जो पवन और बिजुली के दो रूप हैं, एक कारण और दूसरा कार्य्य, उनसे जो पहिला है वह विशेष ज्ञान से जानने योग्य और जो दूसरा है वह प्रत्यक्ष इन्द्रियों से ग्रहण करने योग्य है। जिसके गुण और उपकार जाने हैं, उस पवन वा अग्नि से कारणरूप में उक्त अग्नि और पवन प्रवेश करते हैं, यही सुगम मार्ग है जो कार्य के द्वारा कारण में प्रवेश होता है, ऐसा जानो॥६॥

अग्नी॑षोमा ह॒विषः॒ प्रस्थि॑तस्य वी॒तं हर्य॑तं वृषणा जु॒षेथा॑म्। सु॒शर्मा॑णा॒ स्वव॑सा॒ हि भू॒तमथा॑ धत्तं॒ यज॑मानाय॒ शं योः॥

मनुष्यों को यह जानना चाहिये कि आग में जितने सुगन्धियुक्त पदार्थ होमे जाते हैं, सब पवन के साथ आकाश में जा मेघमण्डल के जल को शोध और सब जीवों के सुख के हेतु होकर उसके अनन्तर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि करनेहारे होते हैं॥७॥

यो अ॒ग्नीषोमा॑ ह॒विषा॑ सप॒र्याद्दे॑व॒द्रीचा॒ मन॑सा॒ यो घृ॒तेन॑। तस्य॑ व्र॒तं र॑क्षतं पा॒तमंह॑सो वि॒शे जना॑य॒ महि॒ शर्म॑ यच्छतम्॥

जो मनुष्य अग्निहोत्र आदि काम से वायु और वर्षा की शुद्धि द्वारा सब वस्तुओं को पवित्र करता है, वह सब प्राणियों को सुख देता है॥८॥

अग्नी॑षोमा॒ सवे॑दसा॒ सहू॑ती वनतं॒ गिरः॑। सं दे॑व॒त्रा ब॑भूवथुः॥

मनुष्य लोग यज्ञ आदि उत्तम कामों से वायु के शोधे विना प्राणियों को सुख नहीं हो सकता, इससे इसका अनुष्ठान नित्य करें॥९॥

अग्नी॑षोमाव॒नेन॑ वां॒ यो वां॑ घृ॒तेन॒ दाश॑ति। तस्मै॑ दीदयतं बृ॒हत्॥

जो मनुष्य क्रियारूपी यज्ञों का अनुष्ठान करते हैं, वे इस संसार में अत्यन्त सौभाग्य को प्राप्त होते हैं॥१०॥

अग्नी॑षोमावि॒मानि॑ नो यु॒वं ह॒व्या जु॑जोषतम्। आ या॑त॒मुप॑ नः॒ सचा॑॥

जब यज्ञ से सुगन्धित आदि द्रव्ययुक्त अग्नि वायु सब पदार्थ के समीप मिलकर उनमें लगते हैं, तब सबकी पुष्टि होती है॥११॥

अग्नी॑षोमा पिपृ॒तमर्व॑तो न॒ आ प्या॑यन्तामु॒स्रिया॑ हव्य॒सूदः॑। अ॒स्मे बला॑नि म॒घव॑त्सु धत्तं कृणु॒तं नो॑ अध्व॒रं श्रु॑ष्टि॒मन्त॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। पवन और बिजुली के विना किसी की बल और पुष्टि नहीं होती, इससे इनको अच्छे विचार से कामों में लाना चाहिये॥१२॥इस सूक्त में पवन और बिजुली के गुण वर्णन करने से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह छठे अध्याय का २९ उनतीसवाँ वर्ग और प्रथम मण्डल का १४ चौदहवाँ अनुवाक तथा ९३ त्रानवाँ सूक्त समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

इ॒मं स्तोम॒मर्ह॑ते जा॒तवे॑दसे॒ रथ॑मिव॒ सं म॑हेमा मनी॒षया॑। भ॒द्रा हि नः॒ प्रम॑तिरस्य सं॒सद्यग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे विद्या से सिद्ध होते हुए विमानों को सिद्धकर मित्रों का सत्कार करें वैसे ही पुरुषार्थ से विद्वानों का भी सत्कार करें। जब-जब सभासद् जन सभा में बैठें तब-तब हठ और दुराग्रह को छोड़ सबके सुख करने योग्य काम को न छोड़ें। जो-जो अग्नि आदि पदार्थों में विज्ञान हो उस-उस को सबके साथ मित्रपन का आश्रय करके और सबके लिये दें, क्योंकि इसके विना मनुष्यों के हित की संभावना नहीं होती॥१॥

यस्मै॒ त्वमा॒यज॑से॒ स सा॑धत्यन॒र्वा क्षे॑ति॒ दध॑ते सु॒वीर्य॑म्। स तू॑ताव॒ नैन॑मश्नोत्यंह॒तिरग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वानों की सभा वा अग्निविद्या में मित्रपन प्रसिद्ध करते हैं, वे पूरे शरीर तथा आत्मा के बल को पाकर सुखयुक्त रहते हैं, अन्य नहीं॥२॥

श॒केम॑ त्वा स॒मिधं॑ सा॒धया॒ धिय॒स्त्वे दे॒वा ह॒विर॑द॒न्त्याहु॑तम्। त्वमा॑दि॒त्याँ आ व॑ह॒ तान्ह्यु१॒॑श्मस्यग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑॥

जो मनुष्य विद्वानों के सङ्ग का आश्रय लेकर विद्या और अग्निकार्यों के सिद्ध करने के लिये सहनशीलता को धारण करते हैं, वे प्रबल विज्ञान और अनेक क्रियाओं से युक्त होकर सुखी होते हैं॥३॥

भरा॑मे॒ध्मं कृ॒णवा॑मा ह॒वींषि॑ ते चि॒तय॑न्तः॒ पर्व॑णापर्वणा व॒यम्। जी॒वात॑वे प्रत॒रं सा॑धया॒ धियोऽग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। सेना, सभा और प्रजा के जनों में रहनेहारे पुरुषों को चाहिये कि जिस सज्जन पुरुष से बुद्धि वा पुरुषार्थ बढ़ें, उसके लिये सब सामग्री अच्छी सिद्ध करें और उस पुरुष के साथ मित्रता को कोई भी न छोड़े॥४॥

वि॒शां गो॒पा अ॑स्य चरन्ति ज॒न्तवो॑ द्वि॒पच्च॒ यदु॒त चतु॑ष्पद॒क्तुभिः॑। चि॒त्रः प्र॑के॒त उ॒षसो॑ म॒हाँ अ॒स्यग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जिस जगदीश्वर वा सभाध्यक्ष विद्वान् के बड़प्पन से जगत् की उत्पत्ति, पालना और भङ्ग होते हैं, उसके मित्रपन वा मित्र के काम में कभी विघ्न न करें॥५॥

त्वम॑ध्व॒र्युरु॒त होता॑सि पू॒र्व्यः प्र॑शा॒स्ता पोता॑ ज॒नुषा॑ पु॒रोहि॑तः। विश्वा॑ वि॒द्वाँ आर्त्वि॑ज्या धीर पुष्य॒स्यग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। सबके अधिष्ठाता जगदीश्वर वा विद्वानों के विना जगत् के पालने आदि व्यवहारों के होने का संभव नहीं होता, इससे मनुष्यों को चाहिये कि दिन-रात ईश्वर की उपासना और इन विद्वानों का सङ्ग करके सुखी हों॥६॥

यो वि॒श्वतः॑ सु॒प्रती॑कः स॒दृङ्ङसि॑ दू॒रे चि॒त्सन्त॒ळिदि॒वाति॑ रोचसे। रात्र्या॑श्चि॒दन्धो॒ अति॑ देव पश्य॒स्यग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑॥

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार है। दूरस्थ भी सभाध्यक्ष न्यायव्यवस्थाप्रकाश से जैसे बिजुली वा सूर्य्य मूर्त्तिमान् पदार्थों को प्रकाशित करता है, वैसे गुणहीन प्राणियों को अपने प्रकाश से प्रकाशित करता है, उसके साथ वा उसमें किस विद्वान् को मित्रता न करनी चाहिये किन्तु सबको करना चाहिये॥७॥

पूर्वो॑ देवा भवतु सुन्व॒तो रथो॒ऽस्माकं॒ शंसो॑ अ॒भ्य॑स्तु दू॒ढ्यः॑। तदा जा॑नीतो॒त पु॑ष्यता॒ वचोऽग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। हे विद्वानो! जिस ढङ्ग से मनुष्यों में आत्मज्ञान और शिल्पव्यवहार की विद्या प्रकाशित होकर सुख की उन्नति हो, वैसा यत्न करो॥८॥

व॒धैर्दुः॒शंसाँ॒ अप॑ दू॒ढ्यो॑ जहि दू॒रे वा॒ ये अन्ति॑ वा॒ के चि॑द॒त्रिणः॑। अथा॑ य॒ज्ञाय॑ गृण॒ते सु॒गं कृ॒ध्यग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑॥

सभाध्यक्षादिकों को चाहिये कि उत्तम यत्न के साथ प्रजा में अयोग्य उपदेशों के पढ़ने-पढ़ाने आदि कामों को निवार के दूरस्थ मनुष्यों को मित्र के समान मान के सब प्रकार से प्रेमभाव उत्पन्न करें, जिससे परस्पर निश्चल आनन्द बढ़े॥९॥

यदयु॑क्था अरु॒षा रोहि॑ता॒ रथे॒ वात॑जूता वृष॒भस्ये॑व ते॒ रवः॑। आदि॑न्वसि व॒निनो॑ धू॒मके॑तु॒नाग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑॥

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। जिससे शिल्पी और भौतिक अग्नि सर्वहित करनेवाले कामों को सिद्ध कर सकते हैं, उससे विमान आदि यानों की संभावना करने को योग्य हैं॥१०॥

अध॑ स्व॒नादु॒त बि॑भ्युः पत॒त्रिणो॑ द्र॒प्सा यत्ते॑ यव॒सादो॒ व्यस्थि॑रन्। सु॒गं तत्ते॑ ताव॒केभ्यो॒ रथे॒भ्योऽग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑॥

जब आग्नेय अस्त्र-शस्त्र और विमानादि यानयुक्त सेना इकट्ठी कर शत्रुओं के जीतने के लिये वेग से जाकर शस्त्रों के प्रहार वा अच्छे आनन्दित शब्दों से शत्रुओं के साथ मनुष्यों का युद्ध कराया जाता है, तब दृढ़ विजय होता है यह जानना चाहिये। यह स्थिर दृढ़तर विजय, निश्चय है कि विद्वानों के विरोधियों, अग्न्यादि विद्यारहित पुरुषों का कभी नहीं हो सकता, इससे सब दिन इसका अनुष्ठान करना चाहिये॥११॥

अ॒यं मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य॒ धाय॑सेऽवया॒तां म॒रुतां॒ हेळो॒ अद्भु॑तः। मृ॒ळा सु नो॒ भूत्वे॑षां॒ मनः॒ पुन॒रग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि सभाध्यक्ष का जो श्रेष्ठों का पालन और दुष्टों को ताड़ना देना कर्म है, उसको जानकर सदा आचरण करें॥१२॥

दे॒वो दे॒वाना॑मसि मि॒त्रो अद्भु॑तो॒ वसु॒र्वसू॑नामसि॒ चारु॑रध्व॒रे। शर्म॑न्त्स्याम॒ तव॑ स॒प्रथ॑स्त॒मेऽग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। किसी मनुष्य को भी परमेश्वर और विद्वानों की सुख प्रकट करनेवाली मित्रता अच्छे प्रकार स्थिर नहीं होती, इससे इसमें हम-मनुष्यों को स्थिर मति के साथ प्रवृत्त होना चाहिये॥१३॥

तत्ते॑ भ॒द्रं यत्समि॑द्धः॒ स्वे दमे॒ सोमा॑हुतो॒ जर॑से मृळ॒यत्त॑मः। दधा॑सि॒ रत्नं॒ द्रवि॑णं च दा॒शुषेऽग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि वेदप्रमाण और संसार के बार-बार होने न होने आदि व्यवहार के प्रमाण तथा सत्यपुरुषों के वाक्यों से वा ईश्वर और विद्वान् के काम वा स्वभाव को जी में धर सब प्राणियों के साथ मित्रता वर्त्तकर सब दिन विद्या, धर्म की शिक्षा की उन्नति करें॥१४॥

यस्मै॒ त्वं सु॑द्रविणो॒ ददा॑शोऽनागा॒स्त्वम॑दिते स॒र्वता॑ता। यं भ॒द्रेण॒ शव॑सा चो॒दया॑सि प्र॒जाव॑ता॒ राध॑सा॒ ते स्या॑म॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जिस मनुष्य में अन्तर्यामी ईश्वर धर्मशीलता को प्रकाशित करता है, वह मनुष्य विद्वानों के सङ्ग में प्रेमी हुआ सब प्रकार के धन और अच्छे-अच्छे गुणों को पाकर सब दिनों सुखी होता है, इससे इस काम को हम लोग भी नित्य करें॥१५॥

स त्वम॑ग्ने सौभग॒त्वस्य॑ वि॒द्वान॒स्माक॒मायुः॒ प्र ति॑रे॒ह दे॑व। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि परमेश्वर और विद्वानों के आश्रय से पदार्थविद्या को पाकर इस संसार में सौभाग्य और आयुर्दा को बढ़ावें॥१६॥इस सूक्त में ईश्वर, सभाध्यक्ष, विद्वान् और अग्नि के गुणों का वर्णन है, इससे इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये॥इस अध्याय में सेनापति के उपदेश और उसके काम आदि का वर्णन है, इससे इस छठे अध्याय के अर्थ की पञ्चमाध्याय के अर्थ के साथ एकता समझनी चाहिये॥यह श्रीमान् संन्यासियों में भी जो आचार्य्य श्रीयुत महाविद्वान् विरजानन्द सरस्वती स्वामीजी उनके शिष्य दयानन्द सरस्वती स्वामीजी के बनाये संस्कृत और आर्य्यभाषा से शोभित अच्छे प्रमाणों से युक्त ऋग्वेद-भाष्य के प्रथमाष्टक में छठा अध्याय समाप्त हुआ॥

द्वे विरू॑पे चरतः॒ स्वर्थे॑ अ॒न्यान्या॑ व॒त्समुप॑ धापयेते। हरि॑र॒न्यस्यां॒ भव॑ति स्व॒धावा॑ञ्छु॒क्रो अ॒न्यस्यां॑ ददृशे सु॒वर्चाः॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि दिन-रात कभी निवृत्त नहीं होते किन्तु सर्वदा बने रहते हैं अर्थात् एक देश में नहीं तो दूसरे देश में होते हैं। जो काम रात और दिन में करने योग्य हों, उनको निरालस्य से करके सब कामों की सिद्धि करें॥१॥

दशे॒मं त्वष्टु॑र्जनयन्त॒ गर्भ॒मत॑न्द्रासो युव॒तयो॒ विभृ॑त्रम्। ति॒ग्मानी॑कं॒ स्वय॑शसं॒ जने॑षु वि॒रोच॑मानं॒ परि॑ षीं नयन्ति॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जिनके देश-काल का नियम अनुमान में नहीं आता, ऐसी अनन्तरूप पूर्व आदि क्रम से प्रसिद्ध सब व्यवहारों की सिद्धि करानेवाली दश दिशा हैं, उनमें नियमयुक्त व्यवहारों को सिद्ध करें, इनमें किसी को विरुद्ध व्यवहार न करना चाहिये॥२॥

त्रीणि॒ जाना॒ परि॑ भूषन्त्यस्य समु॒द्र एकं॑ दि॒व्येक॑म॒प्सु। पूर्वा॒मनु॒ प्र दिशं॒ पार्थि॑वानामृ॒तून्प्र॒शास॒द्वि द॑धावनु॒ष्ठु॥

दिन-रात आदि समय के अङ्गों के वर्त्ताव के विना भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान कालों की संभावना भी नहीं हो सकती और न इनके विना किसी ऋतु के होने का सम्भव है। जो सूर्य्य और अन्तरिक्ष में ठहरे हुए पवन की गति से समय के अवयव अर्थात् दिनरात्रि आदि प्रसिद्ध हैं, उन सबको जान के सब मनुष्यों को चाहिये कि व्यवहारसिद्धि करें॥३॥

क इ॒मं वो॑ नि॒ण्यमा चि॑केत व॒त्सो मा॒तॄर्ज॑नयत स्व॒धाभिः॑। ब॒ह्वी॒नां गर्भो॑ अ॒पसा॑मु॒पस्था॑न्म॒हान्क॒विर्निश्च॑रति स्व॒धावा॑न्॥

मनुष्यों को जानना चाहिये कि जिसका सूक्ष्म से सूक्ष्म बोध है, जो समस्त अपने अवयवों को प्रकट करता, सब कामों में व्याप्त होता, जिसमें सब जगत् एक रस रहता है उस समय को कोई विद्वान् जान-सकता है, सब कोई नहीं॥४॥

आ॒विष्ट्यो॑ वर्धते॒ चारु॑रासु जि॒ह्माना॑मू॒र्ध्वः स्वय॑शा उ॒पस्थे॑। उ॒भे त्वष्टु॑र्बिभ्यतु॒र्जाय॑मानात्प्रती॒ची सिं॒हं प्रति॑ जोषयेते॥

मनुष्यों को यह जानना चाहिये कि संसार की उत्पत्ति के समय से जो उत्पन्न हुआ अग्नि है वह छेदन गुण से ऊर्ध्वगामी अर्थात् जिसकी लपट ऊपर को जाती और काष्ठ आदि पदार्थों में अपनी व्याप्ति से बढ़ता और सूर्यरूप से दिशाओं का बोध करानेवाला है, वह भी सब समय से उत्पन्न होकर समय पाकर ही नष्ट होता है॥५॥

उ॒भे भ॒द्रे जो॑षयेते॒ न मेने॒ गावो॒ न वा॒श्रा उप॑ तस्थु॒रेवैः॑। स दक्षा॑णां॒ दक्ष॑पतिर्बभूवा॒ञ्जन्ति॒ यं द॑क्षिण॒तो ह॒विर्भिः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि रात-दिन आदि प्रत्येक समय के अवयव का अच्छी तरह सेवन करें। धर्म से उनमें यज्ञ के अनुष्ठान आदि श्रेष्ठ व्यवहारों का ही आचरण करें और अधर्म व्यवहार वा अयोग्य काम तो कभी न करें॥६॥

उद्यं॑यमीति सवि॒तेव॑ बा॒हू उ॒भे सिचौ॑ यतते भी॒म ऋ॒ञ्जन्। उच्छु॒क्रमत्क॑मजते सि॒मस्मा॒न्नवा॑ मा॒तृभ्यो॒ वस॑ना जहाति॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! तुम लोगों को जिस काल से सूर्य आदि जगत् प्रकट होता है और जो क्षण आदि अङ्गों से सबका आच्छादन करता, सबके नियम का हेतु वा सबकी प्रवृत्ति का अधिकरण है, उसको जान के समय-समय पर काम करने चाहिये॥७॥

त्वे॒षं रू॒पं कृ॑णुत॒ उत्त॑रं॒ यत्स॑म्पृञ्चा॒नः सद॑ने॒ गोभि॑र॒द्भिः। क॒विर्बु॒ध्नं परि॑ मर्मृज्यते॒ धीः सा दे॒वता॑ता॒ समि॑तिर्बभूव॥

मनुष्यों को चाहिये कि काल के विना कार्य्य स्वरूप उत्पन्न होकर और नष्ट हो जाय यह होता ही नहीं और न ब्रह्मचर्य्य आदि उत्तम समय के सेवन विना शास्त्रबोध करानेवाली बुद्धि होती है। इस कारण काल के परमसूक्ष्म स्वरूप को जानकर थोड़ा भी समय व्यर्थ न खोवें किन्तु आलस्य छोड़ के समय के अनुकूल व्यवहार और परमार्थ काम का सदा अनुष्ठान करें॥८॥

उ॒रु ते॒ ज्रयः॒ पर्ये॑ति बु॒ध्नं वि॒रोच॑मानं महि॒षस्य॒ धाम॑। विश्वे॑भिरग्ने॒ स्वय॑शोभिरि॒द्धोऽद॑ब्धेभिः पा॒युभिः॑ पाह्य॒स्मान्॥

मनुष्यों को यह जानना चाहिये कि समय के विना सूर्य्य आदि कार्य्य जगत् का बार-बार वर्त्ताव नहीं होता और न उससे अलग हम लोगों का कुछ भी काम अच्छी प्रकार होता है॥९॥

धन्व॒न्त्स्रोतः॑ कृणुते गा॒तुमू॒र्मिं शु॒क्रैरू॒र्मिभि॑र॒भि न॑क्षति॒ क्षाम्। विश्वा॒ सना॑नि ज॒ठरे॑षु धत्ते॒ऽन्तर्नवा॑सु चरति प्र॒सूषु॑॥

आप्त विद्वान् मनुष्यों को चाहिये कि व्यापनशील काल और बिजुलीरूप अग्नि को जानकर उनके निमित्त से अनेक कामों को यथावत् सिद्ध करें॥१०॥

ए॒वा नो॑ अग्ने स॒मिधा॑ वृधा॒नो रे॒वत्पा॑वक॒ श्रव॑से॒ वि भा॑हि। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। काल और भौतिक अग्नि की विद्या के विना किसी को विद्यायुक्त धन नहीं हो सकता और न कोई समय के अनुकूल वर्त्ताव वर्त्तने के विना प्राणादिकों से उपकार यथावत् ले सकता है, इससे इस समस्त उक्त व्यवहार को जानके सब कार्य्य की सिद्धि कर सदा आनन्द करना चाहिये॥११॥इस सूक्त में काल और अग्नि के गुणों के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, ऐसा जानना चाहिये॥

स प्र॒त्नथा॒ सह॑सा॒ जाय॑मानः स॒द्यः काव्या॑नि॒ बळ॑धत्त॒ विश्वा॑। आप॑श्च मि॒त्रं धि॒षणा॑ च साधन्दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन्द्रविणो॒दाम्॥

मनुष्य ब्रह्मचर्य्य से विद्या की प्राप्ति के विना कवि नहीं हो सकता और न कविताई के विना परमेश्वर वा बिजुली को जानकर कार्य्यों को कर सकता है, इससे उक्त ब्रह्मचर्य्य आदि नियम का अनुष्ठान नित्य करना चाहिये॥१॥

स पूर्व॑या नि॒विदा॑ क॒व्यता॒योरि॒माः प्र॒जा अ॑जनय॒न्मनू॑नाम्। वि॒वस्व॑ता॒ चक्ष॑सा॒ द्याम॒पश्च॑ दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन्द्रविणो॒दाम्॥

ज्ञानवान् अर्थात् जो चेतनायुक्त है, उसके विना उत्पन्न किये कुछ जड़ पदार्थ कार्य्य करनेवाला आप नहीं उत्पन्न हो सकता, इससे समस्त जगत् के उत्पन्न करनेहारे सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर को सब मनुष्य मानें अर्थात् तृणमात्र जो आप से नहीं उत्पन्न हो सकता तो यह कार्य्य जगत् कैसे उत्पन्न हो सके, इससे इसको उत्पन्न करनेवाला जो चेतनरूप है, वही परमेश्वर है॥२॥

तमी॑ळत प्रथ॒मं य॑ज्ञ॒साधं॒ विश॒ आरी॒राहु॑तमृञ्जसा॒नम्। ऊ॒र्जः पु॒त्रं भ॑र॒तं सृ॒प्रदा॑नुं दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन्द्रविणो॒दाम्॥

हे जिज्ञासु अर्थात् परमेश्वर का विज्ञान चाहनेवाले मनुष्यो! तुम जिस ईश्वर ने सब जीवों के लिये सब सृष्टियों को उत्पन्न करके प्राप्त कराई हैं वा जिसने सृष्टि धारण करनेहारा पवन और सूर्य रचा है, उसको छोड़ के अन्य किसी की कभी ईश्वरभाव से उपासना मत करो॥३॥

स मा॑त॒रिश्वा॑ पुरु॒वार॑पुष्टिर्वि॒दद्गा॒तुं तन॑याय स्व॒र्वित्। वि॒शां गो॒पा ज॑नि॒ता रोद॑स्योर्दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन्द्रविणो॒दाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। पवन के निमित्त के विना किसी की वाणी प्रवृत्त नहीं हो सकती, न किसी की पुष्टि होने के योग्य और न ईश्वर के विना इस जगत् की उत्पत्ति और रक्षा के होने की संभावना है॥४॥

नक्तो॒षासा॒ वर्ण॑मा॒मेम्या॑ने धा॒पये॑ते॒ शिशु॒मेकं॑ समी॒ची। द्यावा॒क्षामा॑ रु॒क्मो अ॒न्तर्वि भा॑ति दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन्द्रविणो॒दाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे दूध पिलानेहारे बालक के समीप में स्थित दो स्त्रियाँ उस बालक को दूध पिलाती हैं, वैसे ही दिन और रात्रि तथा सूर्य और पृथिवी हैं, जिसके नियम से ऐसा होता है, वह सबका उत्पन्न करनेवाला कैसे न हो॥५॥

रा॒यो बु॒ध्नः सं॒गम॑नो॒ वसू॑नां य॒ज्ञस्य॑ के॒तुर्म॑न्म॒साध॑नो॒ वेः। अ॒मृ॒त॒त्वं रक्ष॑माणास एनं दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन्द्रविणो॒दाम्॥

जीवनमुक्त अर्थात् देहाभिमान आदि को छोड़े हुए वा शरीरत्यागी मुक्त विद्वान् जन जिसका आश्रय करके आनन्द को प्राप्त होते हैं, वही ईश्वर सबके उपासना करने योग्य है॥६॥

नू च॑ पु॒रा च॒ सद॑नं रयी॒णां जा॒तस्य॑ च॒ जाय॑मानस्य च॒ क्षाम्। स॒तश्च॑ गो॒पां भव॑तश्च॒ भूरे॑र्दे॒वा अ॒ग्निं धा॑रयन्द्रविणो॒दाम्॥

भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान इन तीन कालों का ईश्वर से विना जाननेवाला प्रभु, कार्य कारण वा पापी और पुण्यात्मा जनों के कामों की व्यवस्था करनेवाला अन्य कोई पदार्थ नहीं है, सब यह मनुष्यों को मानना चाहिये॥७॥

द्र॒वि॒णो॒दा द्रवि॑णसस्तु॒रस्य॑ द्रविणो॒दाः सन॑रस्य॒ प्र यं॑सत्। द्र॒वि॒णो॒दा वी॒रव॑ती॒मिषं॑ नो द्रविणो॒दा रा॑सते दी॒र्घमायुः॑॥

हे मनुष्यो! तुम जिस परमगुरु परमेश्वर ने वेद के द्वारा सर्व पदार्थों का विशेष ज्ञान कराया है, उसका आश्रय करके यथायोग्य व्यवहारों का अनुष्ठान कर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि के लिये बहुत काल पर्य्यन्त जीवन की रक्षा करो॥८॥

ए॒वा नो॑ अग्ने स॒मिधा॑ वृधा॒नो रे॒वत्पा॑वक॒ श्रव॑से॒ वि भा॑हि। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥

हे मनुष्यो! जिसकी विद्या के विना यथार्थ विज्ञान नहीं होता वा जिसने भूमि से लेके आकाशपर्यन्त सृष्टि बनाई है और हम लोग जिसकी उपासना करते हैं, तुमलोग भी उसी की उपासना करो॥९॥इस सूक्त में अग्नि शब्द के गुणों के वर्णन से इसके अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह छानवाँ सूक्त और चौथा वर्ग पूरा हुआ॥

अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घमग्ने॑ शुशु॒ग्ध्या र॒यिम्। अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम्॥

सभाध्यक्ष को चाहिये कि सब मनुष्यों के लिये जो-जो उनका अहितकारक कर्म और प्रमाद है, उसको मेट के निरालस्यपन से धन की प्राप्ति करावे॥१॥

सु॒क्षे॒त्रि॒या सु॑गातु॒या व॑सू॒या च॑ यजामहे। अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम्॥

पिछले मन्त्र से (अग्ने) इस पद की अनुवृत्ति आती है। सभाध्यक्ष को चाहिये कि शान्तिवचन कहने, दुष्टों को दण्ड देने और शत्रुओं को परस्पर फूट कराने की क्रियाओं से नीति को अच्छे प्रकार प्राप्त होके प्रजाजनों के दुःख को नित्य दूर करने के लिये उद्यम करे। प्रजाजन भी ऐसे पुरुष ही को सभाध्यक्ष करें॥२॥

प्र यद्भन्दि॑ष्ठ एषां॒ प्रास्माका॑सश्च सू॒रयः॑। अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम्॥

इस मन्त्र में भी (अग्ने) इस पद की अनुवृत्ति आती है। जब विद्वान् सभा आदि के अधीश आप्त अर्थात् प्रामाणिक सत्य वचन को कहनेवाले सभासद् और आत्मिक, शारीरिक बल से परिपूर्ण सेवक हों, तब राज्यपालन और विजय अच्छे प्रकार होते हैं, इससे उलटेपन में उलटा ही ढङ्ग होता है॥३॥

प्र यत्ते॑ अग्ने सू॒रयो॒ जाये॑महि॒ प्र ते॑ व॒यम्। अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम्॥

इस संसार में जैसे धर्मिष्ठ सभा आदि के अधीश मनुष्य हों, वैसे ही प्रजाजनों को भी होना चाहिये॥४॥

प्र यद॒ग्नेः सह॑स्वतो वि॒श्वतो॒ यन्ति॑ भा॒नवः॑। अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम्॥

ऐसा कोई मूर्त्तिमान् पदार्थ नहीं कि जो इस बिजुली से अलग हो अर्थात् सब में बिजुली व्याप्त है और जो भौतिक अग्नि शिल्पविद्या से कामों में लगाया हुआ धन इकट्ठा करनेवाला होता है, वह मनुष्यों को अच्छे प्रकार जानना चाहिये॥५॥

त्वं हि वि॑श्वतोमुख वि॒श्वतः॑ परि॒भूरसि॑। अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम्॥

सत्य-सत्य प्रेमभाव से प्रार्थना को प्राप्त हुआ अन्तर्यामी जगदीश्वर मनुष्यों के आत्मा में जो सत्य-सत्य उपदेश से उन मनुष्यों को पाप से अलगकर शुभ गुण, कर्म और स्वभाव में प्रवृत्त करता है, इससे यह नित्य उपासना करने योग्य है॥६॥

द्विषो॑ नो विश्वतोमु॒खाति॑ ना॒वेव॑ पारय। अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे न्यायाधीश नाव में बैठाकर समुद्र के पार वा निर्जन जङ्गल में डाकुओं को रोक के प्रजा की पालना करता है, वैसे ही अच्छे प्रकार उपासना को प्राप्त हुआ ईश्वर अपनी उपासना करनेवालों के काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, शोकरूपी शत्रुओं को शीघ्र निवृत्त कर जितेन्द्रियपन आदि गुणों को देता है॥७॥

स नः॒ सिन्धु॑मिव ना॒वयाति॑ पर्षा स्व॒स्तये॑। अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पार करनेवाला मल्लाह सुखपूर्वक मनुष्य आदि को नाव से समुद्र के पार करता है, वैसे तारनेवाला परमेश्वर विशेष ज्ञान से दुःखसागर से पार करता और वह शीघ्र सुखी करता है॥८॥इस सूक्त में सभाध्यक्ष अग्नि और ईश्वर के गुणों के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सत्तानेवाँ सूक्त और पाचवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

वै॒श्वा॒न॒रस्य॑ सुम॒तौ स्या॑म॒ राजा॒ हि कं॒ भुव॑नानामभि॒श्रीः। इ॒तो जा॒तो विश्व॑मि॒दं वि च॑ष्टे वैश्वान॒रो य॑तते॒ सूर्ये॑ण॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो सबसे बड़ा व्याप्त होकर सब जगत् को प्रकाशित करता है, उसी के अति उत्तम गुणों से प्रसिद्ध उसकी आज्ञा में नित्य प्रवृत्त होओ तथा जो सूर्य्य आदि को प्रकाश करनेवाला अग्नि है, उसकी विद्या की सिद्धि में भी प्रवृत्त होओ, इसके विना किसी मनुष्य को पूर्ण धन नहीं हो सकते॥१॥

पृ॒ष्टो दि॒वि पृ॒ष्टो अ॒ग्निः पृ॑थि॒व्यां पृ॒ष्टो विश्वा॒ ओष॑धी॒रा वि॑वेश। वै॒श्वा॒न॒रः सह॑सा पृ॒ष्टो अ॒ग्निः स नो॒ दिवा॒ स रि॒षः पा॑तु॒ नक्त॑म्॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों के समीप जाकर ईश्वर वा बिजुली आदि अग्नि के गुणों को पूछकर ईश्वर की उपासना और अग्नि के गुणों से उपकारों का आश्रय करके हिंसा में न ठहरें॥२॥

वैश्वा॑नर॒ तव॒ तत्स॒त्यम॑स्त्व॒स्मान्रायो॑ म॒घवा॑नः सचन्ताम्। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥

ईश्वर और विद्वानों की उत्तेजना से सत्यशील धर्मयुक्त धन धार्मिक मनुष्य और क्रिया कौशलयुक्त पदार्थविद्याओं को पुरुषार्थ से पाकर समस्त सुख के लिये अच्छे प्रकार यत्न करें॥३॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों से सम्बन्ध रखनेवाले कर्म के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह ९८ अठ्ठानवाँ सूक्त और ६ छठा वर्ग पूरा हुआ॥

जा॒तवे॑दसे सुनवाम॒ सोम॑मरातीय॒तो नि द॑हाति॒ वेदः॑। स नः॑ पर्ष॒दति॑ दु॒र्गाणि॒ विश्वा॑ ना॒वेव॒ सिन्धुं॑ दुरि॒तात्य॒ग्निः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे मल्लाह कठिन बड़े समुद्रों में अत्यन्त विस्तारवाली नावों से मनुष्यादिकों को सुख से पार पहुँचाते हैं, वैसे ही अच्छे प्रकार उपासना किया हुआ जगदीश्वर दुःखरूपी बड़े भारी समुद्र में स्थित मनुष्यों को विज्ञानादि दानों से उसके पार पहुँचाता है, इसलिये उसकी उपासना करनेहारा ही मनुष्य शत्रुओं को हरा के उत्तम वीरता के आनन्द को प्राप्त हो सकता है, और का क्या सामर्थ्य है॥१॥इस सूक्त में ईश्वर के गुणों के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह ९९ निन्नानवाँ सूक्त और ७ सातवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

स यो वृषा॒ वृष्ण्ये॑भिः॒ समो॑का म॒हो दि॒वः पृ॑थि॒व्याश्च॑ स॒म्राट्। स॒ती॒नस॑त्वा॒ हव्यो॒ भरे॑षु म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जो परिमाण से बड़ा, वायुरूप कारण से प्रकट और प्रकाशस्वरूप सूर्य्यलोक है, उससे विद्यापूर्वक अनेक उपकार लेवें॥१॥

यस्याना॑प्तः॒ सूर्य॑स्येव॒ यामो॒ भरे॑भरे वृत्र॒हा शुष्मो॒ अस्ति॑। वृष॑न्तमः॒ सखि॑भिः॒ स्वेभि॒रेवै॑र्म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती॥

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को यह जानना चाहिये कि यदि सूर्यलोक तथा आप्त विद्वान् के गुण, और स्वभावों का पार दुःख से जानने योग्य है तो परमेश्वर का तो क्या ही कहना है! इन दोनों के आश्रय के विना किसी की पूर्ण रक्षा नहीं होती, इससे इनके साथ सदा मित्रता रखें॥२॥

दि॒वो न यस्य॒ रेत॑सो॒ दुघा॑नाः॒ पन्था॑सो॒ यन्ति॒ शव॒साप॑रीताः। त॒रद्द्वे॑षाः सास॒हिः पौंस्ये॑भिर्म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती॥

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। जैसे सूर्य्य के प्रकाश से समस्त मार्ग अच्छे देखने और गमन करने योग्य वा डाकू, चोर और काँटों से यथायोग्य अप्रतीत होते हैं, वैसे वेदद्वारा परमेश्वर वा विद्वान् के मार्ग अच्छे प्रकाशित होते हैं। निश्चय है कि उनमें चले विना कोई मनुष्य वैर आदि दोषों से अलग नहीं हो सकता, इससे सबको चाहिये कि इन मार्गों से नित्य चलें॥३॥

सो अङ्गि॑रोभि॒रङ्गि॑रस्तमो भू॒द्वृषा॒ वृष॑भिः॒ सखि॑भिः॒ सखा॒ सन्। ऋ॒ग्मिभि॑रृ॒ग्मी गा॒तुभि॒र्ज्येष्ठो॑ म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती॥

हे मनुष्यो! जो यथावत् उपकार करनेवाला सबसे अति उत्तम परमेश्वर वा सभा आदि का अध्यक्ष विद्वान् है, उसको नित्य सेवन करो॥४॥

स सू॒नुभि॒र्न रु॒द्रेभि॒रृभ्वा॑ नृ॒षाह्ये॑ सास॒ह्वाँ अ॒मित्रा॑न्। सनी॑ळेभिः श्रव॒स्या॑नि॒ तूर्व॑न्म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सेना आदि का अधिपति पुत्र के तुल्य सत्कार किये और शस्त्र-अस्त्रों से सिद्ध होनेवाली युद्धविद्या से शिक्षा दिये हुए सेवकों के साथ वर्त्तमान बलवान् सेना को अच्छे प्रकार प्रकट कर अति कठिन भी संग्राम में दुष्ट शत्रुओं को हार देता और धार्मिक मनुष्यों की पालना करता हुआ चक्रवर्त्ति राज्य कर सकता है, वही सब सेना तथा प्रजा के जनों को सदा सत्कार करने योग्य है॥५॥

स म॑न्यु॒मीः स॒मद॑नस्य क॒र्तास्माके॑भि॒र्नृभिः॒ सूर्यं॑ सनत्। अ॒स्मिन्नह॒न्त्सत्प॑तिः पुरुहू॒तो म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य को प्राप्त होकर सब पदार्थ अलग-अलग प्रकाशित हुए आनन्द के करनेवाले होते हैं वैसे ही धार्मिक न्यायाधीशों को प्राप्त होकर पुत्र, पौत्र, स्त्रीजन तथा सेवकों के साथ वर्त्तमान विद्या, धर्म और न्याय में प्रसिद्ध आचरणवाले होकर मनुष्य अपने और दूसरों के कल्याण करनेवाले होते हैं। जो सब कभी क्रोध को अपने वश में करने और सब प्रकार से नित्य प्रसन्नता आनन्द करनेवाला होता है, वही सेनाधीश होने में नियत करने योग्य होता है। जो बीते हुए व्यवहार के बचे हुए को जाने, चलते हुए व्यवहार में शीघ्र कर्त्तव्य काम के विचार में तत्पर है, वही सर्वदा विजय को प्राप्त होता है, दूसरा नहीं॥६॥

तमू॒तयो॑ रणय॒ञ्छूर॑सातौ॒ तं क्षेम॑स्य क्षि॒तयः॑ कृण्वत॒ त्राम्। स विश्व॑स्य क॒रुण॑स्येश॒ एको॑ म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती॥

मनुष्यों को चाहिये कि जो अकेला भी अनेक योद्धाओं को जीतता है, उसका उत्साह संग्राम और व्यवहारों में अच्छे प्रकार बढ़ावें। अच्छे उत्साह से वीरों में जैसी शूरता होती है, वैसी निश्चय है कि और प्रकार से नहीं होती॥७॥

तम॑प्सन्त॒ शव॑स उत्स॒वेषु॒ नरो॒ नर॒मव॑से॒ तं धना॑य। सो अ॒न्धे चि॒त्तम॑सि॒ ज्योति॑र्विदन्म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो शत्रुओं को जीत और धार्मिकों की पालना कर विद्या और धन की उन्नति करता है, जिसको पाकर जैसे सूर्य्यलोक का प्रकाश है वैसे विद्या के प्रकाश को प्राप्त होते हैं, उस मनुष्य को आनन्द-मङ्गल के दिनों में आदर-सत्कार देवें, क्योंकि ऐसे किये विना किसी को अच्छे कामों में उत्साह नहीं हो सकता॥८॥

स स॒व्येन॑ यमति॒ व्राध॑तश्चि॒त्स द॑क्षि॒णे संगृ॑भीता कृ॒तानि॑। स की॒रिणा॑ चि॒त्सनि॑ता॒ धना॑नि म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती॥

जो सेना की रचनाओं और सेना के अङ्गों की शिक्षा वा रक्षा के विशेष ज्ञान को तथा पूर्ण युद्ध की सामग्री को इकठ्ठा कर सकता है, वही शत्रुओं को जीत लेने से अपनी और प्रजा की रक्षा करने के योग्य है॥९॥

स ग्रामे॑भिः॒ सनि॑ता॒ स रथे॑भिर्वि॒दे विश्वा॑भिः कृ॒ष्टिभि॒र्न्व१॒॑द्य। स पौंस्ये॑भिरभि॒भूरश॑स्तीर्म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती॥

मनुष्यों को चाहिये कि जो पुर, नगर और ग्रामों का अच्छे प्रकार रक्षा करनेवाला वा पूर्ण सेनाङ्गों की सामग्री सहित जिसने कलाकौशल तथा शस्त्र-अस्त्रों से युद्धक्रिया को जाना हो और परिपूर्ण विद्या तथा बल से पुष्ट शत्रुओं के पराजय से प्रजा की पालना करने में प्रसन्न होता है, वही सेना आदि का अधिपति करने योग्य है, अन्य नहीं॥१०॥

स जा॒मिभि॒र्यत्स॒मजा॑ति मी॒ळ्हेऽजा॑मिभिर्वा पुरुहू॒त एवैः॑। अ॒पां तो॒कस्य॒ तन॑यस्य जे॒षे म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती॥

इस राज्यव्यवहार में किसी गृहस्थ को छोड़ ब्रह्मचारी वनस्थ वा यति की प्रवृत्ति होने योग्य नहीं है, और न कोई अच्छे मित्र और बन्धुओं के विना युद्ध में शत्रुओं को परास्त कर सकता है, ऐसे धार्मिक विद्वानों के विना कोई सेना आदि का अधिपति होने योग्य नहीं है, यह जानना चाहिये॥११॥

स व॑ज्र॒भृद्द॑स्यु॒हा भी॒म उ॒ग्रः स॒हस्र॑चेताः श॒तनी॑थ॒ ऋभ्वा॑। च॒म्री॒षो न शव॑सा॒ पाञ्च॑जन्यो म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को जानना चाहिए कि कोई मनुष्य धनुर्वेद के विशेष ज्ञान और उसको यथायोग्य व्यवहारों में वर्त्तने और शत्रुओं के मारने में भय के देनेवाले वा तीव्र अगाध सामर्थ्य और प्रबल बढ़ी हुई सेना के विना सेनापति नहीं हो सकता। और ऐसे हुए विना शत्रुओं का पराजय और प्रजा का पालन हो सके, यह भी सम्भव नहीं, ऐसा जानें॥१२॥

तस्य॒ वज्रः॑ क्रन्दति॒ स्मत्स्व॒र्षा दि॒वो न त्वे॒षो र॒वथः॒ शिमी॑वान्। तं स॑चन्ते स॒नय॒स्तं धना॑नि म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। सभासद्, भृत्य, सेना के पुरुष और प्रजाजनों को चाहिये कि ऐसे उत्तम कामों का सेवन करें कि जिनसे विद्या, न्याय, धर्म वा पुरुषार्थ बढ़े हुए सूर्य के समान प्रकाशित हों, क्योंकि ऐसे कामों के विना उत्तम सुखों के सेवन, धन और रक्षा हो नहीं सकती, इससे ऐसे काम सभाध्यक्ष आदि को करने योग्य हैं॥१३॥

यस्याज॑स्रं॒ शव॑सा॒ मान॑मु॒क्थं प॑रिभु॒जद्रोद॑सी वि॒श्वतः॑ सीम्। स पा॑रिष॒त्क्रतु॑भिर्मन्दसा॒नो म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती॥

जो सत्पुरुषों का मान, दुष्टों का तिरस्कार, पूरी विद्या, धर्म की मर्यादा, पुरुषार्थ और आनन्द कर सके, वही सभाध्यक्षादि अधिकार के योग्य हो॥१४॥

न यस्य॑ दे॒वा दे॒वता॒ न मर्ता॒ आप॑श्च॒न शव॑सो॒ अन्त॑मा॒पुः। स प्र॒रिक्वा॒ त्वक्ष॑सा॒ क्ष्मो दि॒वश्च॑ म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती॥

क्या अनन्त गुण, कर्म, स्वभाववाले उस परमेश्वर का पार कोई ले सकता है कि जो अपने सामर्थ्य से ही प्रकृतिरूप अतिसूक्ष्म सनातन कारण से सब पदार्थों को स्थूलरूप उत्पन्न कर उनकी पालना और प्रलय के समय सबका विनाश करता है, वह सबके उपासना करने के योग्य क्यों न होवे ?॥१५॥

रो॒हिच्छ्या॒वा सु॒मदं॑शुर्लला॒मीर्द्यु॒क्षा रा॒य ऋ॒ज्राश्व॑स्य। वृष॑ण्वन्तं॒ बिभ्र॑ती धू॒र्षु रथं॑ म॒न्द्रा चि॑केत॒ नाहु॑षीषु वि॒क्षु॥

जब विमानों के चलाने आदि कार्य्यों में इन्धनों से अच्छे प्रकार युक्त किया अग्नि जलता है, तब उसके दो ढङ्ग के रूप देख पड़ते हैं−एक उजेला लिये हुए दूसरा काला। इसीसे अग्नि को श्यामकर्णाश्व कहते हैं। जैसे घोड़े के शिर पर कान दीखते हैं, वैसे अग्नि के शिर पर श्याम कज्जल की चुटेली होती है। यह अग्नि कामों में अच्छे प्रकार जोड़ा हुआ बहुत प्रकार के धन को प्राप्त कराकर प्रजाजनों को आनन्दित करता है॥१६॥

ए॒तत्त्यत्त॑ इन्द्र॒ वृष्ण॑ उ॒क्थं वा॑र्षागि॒रा अ॒भि गृ॑णन्ति॒ राधः॑। ऋ॒ज्राश्वः॒ प्रष्टि॑भिरम्ब॒रीषः॑ स॒हदे॑वो॒ भय॑मानः सु॒राधाः॑॥

जब विद्वान् उत्तम प्रीति के साथ उपदेशों को करते हैं, तब अज्ञानी जन विश्वास को पा उन उपदेशों को सुन अच्छी विद्याओं को धारणकर धनाढ्य होके आनन्दित होते हैं॥१७॥

दस्यू॒ञ्छिम्यूँ॑श्च पुरुहू॒त एवै॑र्ह॒त्वा पृ॑थि॒व्यां शर्वा॒ नि ब॑र्हीत्। सन॒त्क्षेत्रं॒ सखि॑भिः श्वि॒त्न्येभिः॒ सन॒त्सूर्यं॒ सन॑द॒पः सु॒वज्रः॑॥

जो सज्जनों से सहित सभापति अधर्मयुक्त व्यवहार को निवृत्त और धर्म्य व्यवहार का प्रचार करके विद्या की युक्ति से सिद्ध व्यवहार का सेवन कर प्रजाके दुःखों को नष्ट करे, वह सभा आदि का अध्यक्ष सबको मानने योग्य होवे, अन्य नहीं॥१८॥

वि॒श्वाहेन्द्रो॑ अधिव॒क्ता नो॑ अ॒स्त्वप॑रिह्वृताः सनुयाम॒ वाज॑म्। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥

मनुष्यों को उचित है कि जो नित्य विद्या का देनेवाला है, उसकी सीधेपन से सेवा करके विद्याओं को पाकर मित्र, श्रेष्ठ, आकाश, नदियों, भूमि और सूर्य्य आदि लोकों से उपकारों को ग्रहण करके सब मनुष्यों में सत्कार के साथ होना चाहिये, कभी विद्या छिपानी नहीं चाहिये किन्तु सबको यह प्रकट करनी चाहिये॥१९॥इस सूक्त में सभा आदि के अधिपति, ईश्वर और पढ़ानेवालों के गुणों के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ एकता समझनी चाहिये॥यह –१०० सौवाँ सूक्त और –११ ग्यारहवाँ वर्ग पूरा हुआ॥

प्र म॒न्दिने॑ पितु॒मद॑र्चता॒ वचो॒ यः कृ॒ष्णग॑र्भा नि॒रह॑न्नृ॒जिश्व॑ना। अ॒व॒स्यवो॒ वृष॑णं॒ वज्र॑दक्षिणं म॒रुत्व॑न्तं स॒ख्याय॑ हवामहे॥

मनुष्यों को चाहिये कि जिससे विद्या लेवें, उसका सत्कार मन, वचन, कर्म और धन से सदा करें और पढ़ानेवालों को चाहिये कि जो पढ़ाने योग्य हों, उन्हें अच्छे यत्न के साथ उत्तम-उत्तम शिक्षा देकर विद्वान् करें और सब दिन श्रेष्ठों के साथ मित्रभाव रख उत्तम-उत्तम काम में चित्तवृत्ति की स्थिरता रक्खें॥१॥

यो व्यं॑सं जाहृषा॒णेन॑ म॒न्युना॒ यः शम्ब॑रं॒ यो अह॒न्पिप्रु॑मव्र॒तम्। इन्द्रो॒ यः शुष्ण॑म॒शुषं॒ न्यावृ॑णङ्म॒रुत्व॑न्तं स॒ख्याय॑ हवामहे॥

मनुष्यों को चाहिये कि जो चमकते हुए क्रोध से दुष्टों को मारकर विद्या की उन्नति के लिये ब्रह्मचर्यादि नियमों को प्रचरित और मूर्खपन और खोटी सिखावटों को रोकके सबके सुखके लिये निरन्तर अच्छा यत्न करे, वही मित्र मानने योग्य है॥२॥

यस्य॒ द्यावा॑पृथि॒वी पौंस्यं॑ म॒हद्यस्य॑ व्र॒ते वरु॑णो॒ यस्य॒ सूर्यः॑। यस्येन्द्र॑स्य॒ सिन्ध॑वः॒ सश्च॑ति व्र॒तं म॒रुत्व॑न्तं स॒ख्याय॑ हवामहे॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जिस परमेश्वर के सामर्थ्य के विना पृथिवी आदि लोकों की स्थिति अच्छे प्रकार नहीं होती तथा जिस सभाध्यक्ष के स्वभाव और वर्त्ताव की प्रकाश के समान विद्या, पृथिवी के समान सहनशीलता, चन्द्रमा के तुल्य शान्ति, सूर्य्य के तुल्य नीति का प्रकाश और समुद्र के समान गम्भीरता है, उसको छोड़के और को अपना मित्र न करें॥३॥

यो अश्वा॑नां॒ यो गवां॒ गोप॑तिर्व॒शी य आ॑रि॒तः कर्म॑णिकर्मणि स्थि॒रः। वी॒ळोश्चि॒दिन्द्रो॒ यो असु॑न्वतो व॒धो म॒रुत्व॑न्तं स॒ख्याय॑ हवामहे॥

यहाँ वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जो सबकी पालना करनेवाला जितेन्द्रिय, शान्त और जिस-जिस कर्म में सभा की आज्ञा को पावे उसी-उसी कर्म में स्थिरबुद्धि से प्रवर्त्तमान बलवान् दुष्ट शत्रुओं को जीतनेवाला हो, उसके साथ निरन्तर मित्रता की संभावना करके सुखों को सदा भोगें॥४॥

यो विश्व॑स्य॒ जग॑तः प्राण॒तस्पति॒र्यो ब्र॒ह्मणे॑ प्रथ॒मो गा अवि॑न्दत्। इन्द्रो॒ यो दस्यूँ॒रध॑राँ अ॒वाति॑रन्म॒रुत्व॑न्तं स॒ख्याय॑ हवामहे॥

पुरुषार्थ के विना विद्या, अन्न और धन की प्राप्ति तथा शत्रुओं का पराजय नहीं हो सकता, जो धार्मिक सेनाध्यक्ष सुहृद्भाव से अपने प्राण के समान सबको प्रसन्न करता है, उस पुरुष को निश्चय है कि कभी दुःख नहीं होता, इससे उक्त विषय का आचरण सदा करना चाहिये॥५॥

यः शूरे॑भि॒र्हव्यो॒ यश्च॑ भी॒रुभि॒र्यो धाव॑द्भिर्हू॒यते॒ यश्च॑ जि॒ग्युभिः॑। इन्द्रं॒ यं विश्वा॒ भुव॑ना॒भि सं॑द॒धुर्म॒रुत्व॑न्तं स॒ख्याय॑ हवामहे॥

जो परमात्मा और सेना का अधीश सब लोकों का सब प्रकार से मेल करता है, वह सबको सेवन करने और मित्रभाव से मानने के योग्य है॥६॥

रु॒द्राणा॑मेति प्र॒दिशा॑ विचक्ष॒णो रु॒द्रेभि॒र्योषा॑ तनुते पृ॒थु ज्रयः॑। इन्द्रं॑ मनी॒षा अ॒भ्य॑र्चति श्रु॒तं म॒रुत्व॑न्तं स॒ख्याय॑ हवामहे॥

जिन मनुष्यों से प्राणायामों से प्राणों को, सत्कार से श्रेष्ठों और तिरस्कार से दुष्टों को वश में कर समस्त विद्याओं को फैलाकर परमेश्वर वा अध्यापक का अच्छे प्रकार मान-सत्कार करके उपकार के साथ सब प्राणी सत्कारयुक्त किये जाते हैं, वे सुखी होते हैं॥७॥

यद्वा॑ मरुत्वः पर॒मे स॒धस्थे॒ यद्वा॑व॒मे वृ॒जने॑ मा॒दया॑से। अत॒ आ या॑ह्यध्व॒रं नो॒ अच्छा॑ त्वा॒या ह॒विश्च॑कृमा सत्यराधः॥

मनुष्यों को चाहिये कि जो विद्वान् सर्वत्र आनन्दित कराने और विद्या का देनेहारा सत्यगुण, कर्म और स्वभावयुक्त है, उसके संग से निरन्तर समस्त विद्या और उत्तम शिक्षा को पाकर सर्वदा आनन्दित होवें॥८॥

त्वा॒येन्द्र॒ सोमं॑ सुषुमा सुदक्ष त्वा॒या ह॒विश्च॑कृमा ब्रह्मवाहः। अधा॑ नियुत्वः॒ सग॑णो म॒रुद्भि॑र॒स्मिन्य॒ज्ञे ब॒र्हिषि॑ मादयस्व॥

विद्वानों के सङ्ग के विना निश्चय है कि कोई ऐश्वर्य्य और आनन्द को नहीं पा सकता है, इससे नव मनुष्य विद्वानों का सदा सत्कार कर इनसे विद्या और अच्छी-अच्छी शिक्षाओं को प्राप्त होकर सब प्रकार से सत्कार युक्त होवें॥९॥

मा॒दय॑स्व॒ हरि॑भि॒र्ये त॑ इन्द्र॒ वि ष्य॑स्व॒ शिप्रे॒ वि सृ॑जस्व॒ धेने॑। आ त्वा॑ सुशिप्र॒ हर॑यो वहन्तू॒शन्ह॒व्यानि॒ प्रति॑ नो जुषस्व॥

सेनापति को चाहिये कि सेना के समस्त अङ्गों को पूर्ण बलयुक्त और अच्छी-अच्छी शिक्षा दे, उनको युद्ध के योग्य सिद्ध कर, समस्त विघ्नों की निवृत्ति कर और अपने राज्य की उत्तम रक्षा करके सब प्रजा को निरन्तर आनन्दित करे॥१०॥

म॒रुत्स्तो॑त्रस्य वृ॒जन॑स्य गो॒पा व॒यमिन्द्रे॑ण सनुयाम॒ वाज॑म्। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥

निश्चय है कि संग्राम में किसी पूर्ण बली सेनाधिपति के विना शत्रुओं का पराजय नहीं हो सकता और न कोई सेनाधिपति अच्छी शिक्षा की हुई पूर्ण बल, अङ्ग और उपाङ्ग सहित आनन्दित और पुष्ट सेना के विना शत्रुओं के जीतने वा राज्य की पालना करने को समर्थ हो सकता है। न उक्त व्यवहारों के विना मित्र आदि सुख करने के योग्य होते हैं, इससे उक्त समस्त व्यवहार सब मनुष्यों को यथावत् मानना चाहिये॥११॥इस सूक्त में ईश्वर, सभा, सेना और शाला आदि के अधिपतियों के गुणों का वर्णन है। इससे इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह १०१ एकसौ एकवाँ सूक्त और १३ तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इ॒मां ते॒ धियं॒ प्र भ॑रे म॒हो म॒हीम॒स्य स्तो॒त्रे धि॒षणा॒ यत्त॑ आन॒जे। तमु॑त्स॒वे च॑ प्रस॒वे च॑ सास॒हिमिन्द्रं॑ दे॒वासः॒ शव॑सामद॒न्ननु॑॥

सब मनुष्यों को चाहिये कि सब धार्मिक विद्वानों की विद्या, बुद्धियों और कामों को धारण और उनकी स्तुति कर उत्तम-उत्तम व्यवहारों का सेवन करें, जिनसे विद्या और सुख मिलते हैं, वे विद्वान् जन सबको सुख और दुःख के व्यवहारों में सत्कारयुक्त करके ही सदा आनन्दित करावें॥१॥

अ॒स्य श्रवो॑ न॒द्यः॑ स॒प्त बि॑भ्रति॒ द्यावा॒क्षामा॑ पृथि॒वी द॑र्श॒तं वपुः॑। अ॒स्मे सू॑र्याचन्द्र॒मसा॑भि॒चक्षे॑ श्र॒द्धे कमि॑न्द्र चरतो वितर्तु॒रम्॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। परमेश्वर की रचना से पृथिवी आदि लोक और उनमें रहनेवाले पदार्थ अपने-अपने रूप को धारण करके सब प्राणियों के देखने और श्रद्धा के लिये हो और सुख को उत्पन्न कर चालचलन के निमित्त होते हैं परन्तु किसी प्रकार विद्या के विना इन सांसारिक पदार्थों से सुख नहीं होता, इससे सबको चाहिये कि ईश्वर की उपासना और विद्वानों के सङ्ग से लोकसम्बन्धी विद्या को पाकर सदा सुखी होवें॥२॥

तं स्मा॒ रथं॑ मघव॒न्प्राव॑ सा॒तये॒ जैत्रं॒ यं ते॑ अनु॒मदा॑म संग॒मे। आ॒जा न॑ इन्द्र॒ मन॑सा पुरुष्टुत त्वा॒यद्भ्यो॑ मघव॒ञ्छर्म॑ यच्छ नः॥

जब शूरवीर सेवकों के साथ सेनापति को संग्राम करने को जाना होता है, तब परस्पर अर्थात् एक-दूसरे का उत्साह बढ़ाके अच्छे प्रकार रक्षा, शत्रुओं के साथ अच्छा युद्ध, उनकी हार और जनों को आनन्द देकर शत्रुओं को भी किसी प्रकार सन्तोष देकर सदा अपना वर्त्ताव रखना चाहिये॥३॥

व॒यं ज॑येम॒ त्वया॑ यु॒जा वृत॑म॒स्माक॒मंश॒मुद॑वा॒ भरे॑भरे। अ॒स्मभ्य॑मिन्द्र॒ वरि॑वः सु॒गं कृ॑धि॒ प्र शत्रू॑णां मघव॒न्वृष्ण्या॑ रुज॥

राजपुरुष जब-जब युद्ध करने को प्रवृत्त होवें तब-तब धन, शस्त्र, यान, कोश, सेना आदि सामग्री को पूरी कर और प्रशंसित सेना के अधीश से रक्षा को प्राप्त होकर, प्रशंसित विचार और युक्ति से शत्रुओं के साथ युद्ध कर, उनकी सेनाओं को सदा जीतें। ऐसे पुरुषार्थ के विना किये किसी की जीत होने योग्य नहीं, इससे इस वर्त्ताव को सदा वर्त्तें॥४॥

नाना॒ हि त्वा॒ हव॑माना॒ जना॑ इ॒मे धना॑नां धर्त॒रव॑सा विप॒न्यवः॑। अ॒स्माकं॑ स्मा॒ रथ॒मा ति॑ष्ठ सा॒तये॒ जैत्रं॒ ही॑न्द्र॒ निभृ॑तं॒ मन॒स्तव॑॥

जब मनुष्य युद्ध आदि व्यवहारों में प्रवृत्त होवें तब विरोध, ईर्ष्या, डर और आलस्य को छोड़ एक-दूसरे की रक्षा में तत्पर हो शत्रुओं को जीत और जीते हुए धनों को बाँटकर सेनापति आदि लड़नेवालों की योग्यता के अनुकूल उनके सत्कार के लिये देवें कि जिससे लड़ने का उत्साह आगे को बढ़े। सब प्रकार से ले लेना प्रीति करनेवाला नहीं और देना प्रसन्नता करनेवाला होता है, यह विचारकर सदा उक्त व्यवहार को वर्त्तें॥५॥

गो॒जिता॑ बा॒हू अमि॑तक्रतुः सि॒मः कर्म॑न्कर्मञ्छ॒तमू॑तिः खजंक॒रः। अ॒क॒ल्प इन्द्रः॑ प्रति॒मान॒मोज॒साथा॒ जना॒ वि ह्व॑यन्ते सिषा॒सवः॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि जो सर्वथा समर्थ, प्रत्येक काम के करने को जानता, औरों से न जीतने योग्य, आप सबको जीतनेवाला, सबके चाहने योग्य और अनुपम मनुष्य हो, उसको सेनाधिपति करके विजय आदि कामों को साधें॥६॥

उत्ते॑ श॒तान्म॑घव॒न्नुच्च॒ भूय॑स॒ उत्स॒हस्रा॑द्रिरिचे कृ॒ष्टिषु॒ श्रवः॑। अ॒मा॒त्रं त्वा॑ धि॒षणा॑ तित्विषे म॒ह्यधा॑ वृ॒त्राणि॑ जिघ्नसे पुरंदर॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे सूर्य्य अन्धकार और मेघ आदि का हनन करके अपरिमित अर्थात् जिसका परिमाण न हो सके, उस अपने तेज को प्रकाशित करके सब तेजवाले पदार्थों में बढ़के वर्त्तमान है, वैसे विद्वान् को सभा का अधीश मानके शत्रुओं को जीतें॥७॥

त्रि॒वि॒ष्टि॒धातु॑ प्रति॒मान॒मोज॑सस्ति॒स्रो भूमी॑र्नृपते॒ त्रीणि॑ रोच॒ना। अती॒दं विश्वं॒ भुव॑नं ववक्षिथाश॒त्रुरि॑न्द्र ज॒नुषा॑ स॒नाद॑सि॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जिसकी उपमा नहीं है, उस ईश्वर ने कारण से सब कार्य्यरूप जगत् को रच और उसकी रक्षाकर उसका संहार किया है, वही इष्टदेव मानने योग्य है तथा जो अतुल सामर्थ्ययुक्त सभापति प्रसिद्ध न्याय आदि गुणों से समस्त राज्य को सन्तोषित करता है, सो भी सदा सत्कार करने योग्य है॥८॥

त्वां दे॒वेषु॑ प्रथ॒मं ह॑वामहे॒ त्वं ब॑भूथ॒ पृत॑नासु सास॒हिः। सेमं नः॑ का॒रुमु॑पम॒न्युमु॒द्भिद॒मिन्द्रः॑ कृणोतु प्रस॒वे रथं॑ पु॒रः॥

मनुष्यों को चाहिये कि जो उत्तम विद्वान्, अपनी सेना को पालन और शत्रुओं के बल को विदारने में चतुर, शिल्पकार्य्यों को जाननेवाला, प्रेमी, युद्ध में आगे होने से अत्यन्त युद्ध करता है, उसी को सेना का अधीश करें॥९॥

त्वं जि॑गेथ॒ न धना॑ रुरोधि॒थार्भे॑ष्वा॒जा म॑घवन्म॒हत्सु॑ च। त्वामु॒ग्रमव॑से॒ सं शि॑शीम॒स्यथा॑ न इन्द्र॒ हव॑नेषु चोदय॥

जो मनुष्य शत्रुओं और समय को पाकर धनों को जीतने, श्रेष्ठ कामों में सबको लगाने और दुष्टों को छिन्न-भिन्न करनेवाला हो, वही सबको सेनाओं का अधीश मानना चाहिये॥१०॥

वि॒श्वाहेन्द्रो॑ अधिव॒क्ता नो॑ अ॒स्त्वप॑रिह्वृताः सनुयाम॒ वाज॑म्। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥

सब सेवकों की यह रीति हो कि जब अपना स्वामी जैसी आज्ञा करे उसी समय उसको वैसे ही करें और जो समग्र विद्या पढ़ा हो उसीसे उपदेश सुनने चाहिये॥११॥इस सूत्र में शाला आदि के अधिपति ईश्वर पढ़ानेवाले और सेनापति के गुणों के वर्णन से इस सूत्र के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ से एकता है, यह जानना चाहिये॥यह १०२ एकसौ दोवाँ सूक्त और १५ पन्द्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

तत्त॑ इन्द्रि॒यं प॑र॒मं प॑रा॒चैरधा॑रयन्त क॒वयः॑ पु॒रेदम्। क्ष॒मेदम॒न्यद्दि॒व्य१॒॑न्यद॑स्य॒ समी॑ पृच्यते सम॒नेव॑ के॒तुः॥

हे मनुष्यो! इस जगत् में जो-जो रचना विशेष चतुराई के साथ अच्छी-अच्छी वस्तु वर्त्तमान है, वह-वह सब परमेश्वर की रचना से ही प्रसिद्ध है यह तुम जानो क्योंकि ऐसा विचित्र जगत् विधाता के विना कभी होने योग्य नहीं। इससे निश्चय है कि इस जगत् का रचनेवाला परमेश्वर है और जीव सम्बन्धी सृष्टि का रचनेवाला जीव है॥१॥

स धा॑रयत्पृथि॒वीं प॒प्रथ॑च्च॒ वज्रे॑ण ह॒त्वा निर॒पः स॑सर्ज। अह॒न्नहि॒मभि॑नद्रौहि॒णं व्यह॒न्व्यं॑सं म॒घवा॒ शची॑भिः॥

मनुष्यों को यह देखना चाहिये कि प्रसिद्ध जो सूर्यलोक है वह मेघों के विदारण, लोकों के खींचने और प्रकाश आदि कामों से जल, वर्षा, पृथिवी को धारण और अप्रकट अर्थात् अन्धकार से ढंपे हुए जो पदार्थ हैं उनको प्रकाशित कर सब प्राणियों को व्यवहार में चलाता है, वह परमात्मा के बनाने के विना उत्पन्न नहीं हो सकता॥२॥

स जा॒तूभ॑र्मा श्र॒द्दधा॑न॒ ओजः॒ पुरो॑ विभि॒न्दन्न॑चर॒द्वि दासीः॑। वि॒द्वान्व॑ज्रि॒न्दस्य॑वे हे॒तिम॒स्यार्यं॒ सहो॑ वर्धया द्यु॒म्नमि॑न्द्र॥

जो मनुष्य समस्त डांकू, चोर, लबाड़, लम्पट, लड़ाई करनेवालों का विनाश और श्रेष्ठों को हर्षित कर, शारीरिक और आत्मिक बल का संपादन कर, धन, आदि पदार्थों से सुख को बढ़ाता है, वही सबको श्रद्धा करने योग्य है॥३॥

तदू॒चुषे॒ मानु॑षे॒मा यु॒गानि॑ की॒र्तेन्यं॑ म॒घवा॒ नाम॒ बिभ्र॑त्। उ॒प॒प्र॒यन्द॑स्यु॒हत्या॑य व॒ज्री यद्ध॑ सू॒नुः श्रव॑से॒ नाम॑ द॒धे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य-काल के अवयव अर्थात् संवत्सर, महीना, दिन, घड़ी आदि और जल को धारण कर सब प्राणियों के सुख के लिये अन्धकार का विनाश करके सबको सुख देता है, वैसे ही सेनापति सुखपूर्वक संवत्सर और कीर्त्ति को धारण करके शत्रुओं के मारने से सबके सुख के लिये धन को उत्पन्न करे॥४॥

तद॑स्ये॒दं प॑श्यता॒ भूरि॑ पु॒ष्टं श्रदिन्द्र॑स्य धत्तन वी॒र्या॑य। स गा अ॑विन्द॒त्सो अ॑विन्द॒दश्वा॒न्त्स ओष॑धीः॒ सो अ॒पः स वना॑नि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जो श्रेष्ठ जनों के सत्य आचरण से प्राप्ति है, उसीको धारण करें। उसके विना सत्य पराक्रम और सब पदार्थों का लाभ नहीं होता॥५॥

भूरि॑कर्मणे वृष॒भाय॒ वृष्णे॑ स॒त्यशु॑ष्माय सुनवाम॒ सोम॑म्। य आ॒दृत्या॑ परिप॒न्थीव॒ शूरोऽय॑ज्वनो वि॒भज॒न्नेति॒ वेदः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जो ऐसा ढीठ है कि जैसे डाकू आदि होते हैं और साहस करता हुआ चोरों के धन आदि पदार्थों को हर सज्जनों का आदरकर पुरुषार्थी बलवान् उत्तम से उत्तम हो, उसीको सेनापति करें॥६॥

तदि॑न्द्र॒ प्रेव॑ वी॒र्यं॑ चकर्थ॒ यत्स॒सन्तं॒ वज्रे॒णाबो॑ध॒योऽहि॑म्। अनु॑ त्वा॒ पत्नी॑र्हृषि॒तं वय॑श्च॒ विश्वे॑ दे॒वासो॑ अमद॒न्ननु॑ त्वा॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। बलवान् सेनापति से दुष्ट जीव तथा दुष्ट शत्रुजन मारे जाते हैं॥७॥

शुष्णं॒ पिप्रुं॒ कुय॑वं वृ॒त्रमि॑न्द्र य॒दाव॑धी॒र्वि पुरः॒ शम्ब॑रस्य। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे सूर्य्य के गुण हैं उनकी उपमा अर्थात् अनुसार लेकर अपने गुणों से, सेवकादिकों से और पृथिवी आदि लोकों से उपकारों को ले और शत्रुओं को मारकर निरन्तर सुखी हों॥८॥इस सूक्त में ईश्वर, सूर्य और सेनाधिपति के गुणों के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह १०३ एकसौ तीनवाँ सूक्त और १७ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

योनि॑ष्ट इन्द्र नि॒षदे॑ अकारि॒ तमा नि षी॑द स्वा॒नो नार्वा॑। वि॒मुच्या॒ वयो॑ऽव॒सायाश्वा॑न्दो॒षा वस्तो॒र्वही॑यसः प्रपि॒त्वे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। न्यायाधीशों को चाहिये कि न्यायासन पर बैठके चलते हुए प्रसिद्ध शब्दों से अर्थी-प्रत्यर्थी अर्थात् लड़ने और दूसरी ओर से लड़नेवालों को अच्छी प्रकार समझाकर प्रतिदिन यथोचित न्याय करके उन सबको प्रसन्नकर सुखी करें। और अत्यन्त परिश्रम से अवस्था की अवश्य हानि होती है जैसे डांक आदि में अति दौड़ने से घोड़ा बहुत मरते हैं, इसको विचारकर बहुत शीघ्र जाने-आने के लिये क्रियाकौशल से विमान आदि यानों को अवश्य रचें॥१॥

ओ त्ये नर॒ इन्द्र॑मू॒तये॑ गु॒र्नू चि॒त्तान्त्स॒द्यो अध्व॑नो जगम्यात्। दे॒वासो॑ म॒न्युं दास॑स्य श्चम्न॒न्ते न॒ आ व॑क्षन्त्सुवि॒ताय॒ वर्ण॑म्॥

जो प्रजा वा सेना के जन सत्य के राखने को सभा आदि के अधीशों के शरण को प्राप्त हों, उनकी वे यथावत् रक्षा करें। जो विद्वान् लोग वेद और उत्तम शिक्षाओं से मनुष्यों के क्रोध आदि दोषों को निवृत्तकर शान्ति आदि गुणों का सेवन करावें, वे सबको सेवन करने के योग्य हैं॥२॥

अव॒ त्मना॑ भरते॒ केत॑वेदा॒ अव॒ त्मना॑ भरते॒ फेन॑मु॒दन्। क्षी॒रेण॑ स्नातः॒ कुय॑वस्य॒ योषे॑ ह॒ते ते स्या॑तां प्रव॒णे शिफा॑याः॥

जो प्रजा का विरोधी राजपुरुष वा राजा का विरोधी प्रजापुरुष है ये दोनों निश्चय है कि सुखोन्नति को नहीं पाते हैं। और जो राजपुरुष पक्षपात से अपने प्रयोजन के लिये प्रजापुरुषों को पीड़ा देके धन इकठ्ठा करता तथा जो प्रजापुरुष चोरी वा कपट आदि से राजधन को नाश करता है वे दोनों जैसे एक पुरुष की दो पत्नी परस्पर अर्थात् एक दूसरे से कलह करके क्रोध से नदी के बीच गिर के मर जाती है वैसे ही शीघ्र विनाश को प्राप्त हो जाते हैं, इससे राजपुरुष प्रजा के साथ और प्रजापुरुष राजा के साथ विरोध छोड़के परस्पर सहायकारी होकर सदा अपना वर्त्ताव रक्खें॥३॥

यु॒योप॒ नाभि॒रुप॑रस्या॒योः प्र पूर्वा॑भिस्तिरते॒ राष्टि॒ शूरः॑। अ॒ञ्ज॒सी कु॑लि॒शी वी॒रप॑त्नी॒ पयो॑ हिन्वा॒ना उ॒दभि॑र्भरन्ते॥

अच्छे राज्य से सब सुख प्रजा में होता है और विना अच्छे राज्य के दुःख और दुर्भिक्ष आदि उपद्रव होते हैं, इससे वीरपुरुषों को चाहिये कि रीति से राज्य पालन करें॥४॥

प्रति॒ यत्स्या नीथाद॑र्शि॒ दस्यो॒रोको॒ नाच्छा॒ सद॑नं जान॒ती गा॑त्। अध॑ स्मा नो मघवञ्चर्कृ॒तादिन्मा नो॑ म॒घेव॑ निष्ष॒पी परा॑ दाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे अच्छा दृढ़, अच्छे प्रकार रक्षा किया हुआ घर चोरों वा शीत, गर्मी और वर्षा से मनुष्य और धन आदि पदार्थों की रक्षा करता है वैसे ही सभापति राजाओं की अच्छी पाली हुई प्रजा इनको पालती है। जैसे कामी जन अपने शरीर, धर्म, विद्या और अच्छे आचरण को बिगाड़ता और जैसे पाये हुए बहुत धनों को मनुष्य ईर्ष्या और अभिमान से अन्यायों में फँसकर बहाते हैं वैसे उक्त राजा जन प्रजा का विनाश न करे किन्तु प्रजा के किये हुए निरन्तर उपकारों को जानकर अभिमान छोड़ और प्रेम बढ़ाकर इनको सब दिन पालें और दुष्ट शत्रुजनों से डरके पलायन न करें॥५॥

स त्वं न॑ इन्द्र॒ सूर्ये॒ सो अ॒प्स्व॑नागा॒स्त्व आ भ॑ज जीवशं॒से। मान्त॑रां॒ भुज॒मा री॑रिषो नः॒ श्रद्धि॑तं ते मह॒त इ॑न्द्रि॒याय॑॥

सभापतियों को जो प्रजाजन श्रद्धा से राज्यव्यवहार की सिद्धि के लिये बहुत धन देवें वे कभी मारने योग्य नहीं और जो प्रजाओं में डांकू वा चोर हैं वे सदैव ताड़ना देने योग्य हैं। जो सेनापति के अधिकार को पावे वह सूर्य्य के तुल्य न्यायविद्या का प्रकाश, जल के समान शान्ति और तृप्तिकर, अन्याय और अपराध का त्याग और प्रजा के प्रशंसा करने योग्य व्यवहार का सेवन कर राज्य को प्रसन्न करे॥६॥

अधा॑ मन्ये॒ श्रत्ते॑ अस्मा अधायि॒ वृषा॑ चोदस्व मह॒ते धना॑य। मा नो॒ अकृ॑ते पुरुहूत॒ योना॒विन्द्र॒ क्षुध्य॑द्भ्यो॒ वय॑ आसु॒तिं दाः॑॥

न्यायाधीश आदि राजपुरुषों को चाहिये कि जिन्होंने अपराध न किया हो उन प्रजाजनों को कभी ताड़ना न करें, सब दिन इनसे राज्य का कर धन लेवें, तथा इनको अच्छी प्रकार पाल और उन्नति दिलाकर विद्या और पुरुषार्थ के बीच प्रवृत्त कराकर आनन्दित करावें, सभापति आदि के इस सत्य काम को प्रजाजनों को सदैव मानना चाहिये॥७॥

मा नो॑ वधीरिन्द्र॒ मा परा॑ दा॒ मा नः॑ प्रि॒या भोज॑नानि॒ प्र मो॑षीः। आ॒ण्डा मा नो॑ मघवञ्छक्र॒ निर्भे॒न्मा नः॒ पात्रा॑ भेत्स॒हजा॑नुषाणि॥

हे सभापति! तू जैसे अन्याय से किसी को न मारके किसी भी धार्मिक सज्जन से विमुख न होकर चोरी-चपारी आदि दोषरहित परमेश्वर दया का प्रकाश करता है, वैसे ही अपने राज्य के काम करने में प्रवृत्त हो, ऐसे वर्त्ताव के विना राजा से प्रजा सन्तोष नहीं पाती॥८॥

अ॒र्वाङेहि॒ सोम॑कामं त्वाहुर॒यं सु॒तस्तस्य॑ पिबा॒ मदा॑य। उ॒रु॒व्यचा॑ ज॒ठर॒ आ वृ॑षस्व पि॒तेव॑ नः शृणुहि हू॒यमा॑नः॥

प्रजाजनों को चाहिये कि सभापति आदि राजपुरुषों को खान, पान, वस्त्र, धन, यान और मीठी-मीठी बातों से सदा आनन्दित बनाये रहें और राजपुरुषों को भी चाहिये कि प्रजाजनों को पुत्र के समान निरन्तर पालें॥९॥इस सूक्त में सभापति राजा और प्रजा के करने योग्य व्यवहार के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह १०४ एकसौ चारवाँ सूक्त और १९ उन्नीसवाँ वर्ग पूरा हुआ॥

च॒न्द्रमा॑ अ॒प्स्व१॒॑न्तरा सु॑प॒र्णो धा॑वते दि॒वि। न वो॑ हिरण्यनेमयः प॒दं वि॑न्दन्ति विद्युतो वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥

हे राजा और प्रजा के पुरुष! जो चन्द्रमा की छाया और अन्तरिक्ष के जल के संयोग से शीतलता का प्रकाश है उसको जानो तथा जो बिजुली लपट-झपट से दमकती हैं वे आखों से देखने योग्य हैं और जो विलाय जाती हैं उनका चिह्न भी आँख से देखा नहीं जा सकता, इस सबको जानकर सुख को उत्पन्न करो॥१॥

अर्थ॒मिद्वा उ॑ अ॒र्थिन॒ आ जा॒या यु॑वते॒ पति॑म्। तु॒ञ्जाते॒ वृष्ण्यं॒ पयः॑ परि॒दाय॒ रसं॑ दुहे वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे स्त्री अपनी इच्छा के अनुकूल पति को वा पति अपनी इच्छा के अनुकूल स्त्री को पाकर परस्पर आनन्दित करते हैं वैसे प्रयोजन सिद्ध कराने में तत्पर बिजुली, पृथिवी और सूर्य प्रकाश की विद्या के ग्रहण से पदार्थों को प्राप्त होकर सदा सुख देती है, इसकी विद्या को जाननेवालों के सङ्ग के विना यह विद्या होने को कठिन है और दुःख का भी विनाश अच्छी प्रकार नहीं होता, इससे सबको चाहिये कि इस विद्या को यत्न से लेवें॥२॥

मो षु दे॑वा अ॒दः स्व१॒॑रव॑ पादि दि॒वस्परि॑। मा सो॒म्यस्य॑ श॒म्भुवः॒ शूने॑ भूम॒ कदा॑ च॒न वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥

मनुष्यों को चाहिये कि इस संसार में धर्म और सुख से विरुद्ध काम नहीं करें और पुरुषार्थ से निरन्तर सुख की उन्नति करें॥३॥

य॒ज्ञं पृ॑च्छाम्यव॒मं स तद्दू॒तो वि वो॑चति। क्व॑ ऋ॒तं पू॒र्व्यं ग॒तं कस्तद्बि॑भर्ति॒ नूत॑नो वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥

विद्या को चाहते हुए ब्रह्मचारियों को चाहिये कि विद्वानों के समीप जाकर अनेक प्रकार के प्रश्नों को करके और उनसे उत्तर पाकर विद्या को बढ़ावें और हे पढ़ानेवाले विद्वानो! तुम लोग अच्छा गमन जैसे हो वैसे आओ और हमसे इस संसार के पदार्थों की विद्या को सब प्रकार से जान औरों को पढ़ाकर सत्य और असत्य को यथार्थभाव से समझाओ॥४॥

अ॒मी ये दे॑वाः॒ स्थन॑ त्रि॒ष्वा रो॑च॒ने दि॒वः। कद्व॑ ऋ॒तं कदनृ॑तं॒ क्व॑ प्र॒त्ना व॒ आहु॑तिर्वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥

प्रश्न−जब सब लोकों की आहुति अर्थात् प्रलय होता है तब कार्य्यकारण और जीव कहाँ ठहरते हैं ? इसका उत्तर−सर्वव्यापी ईश्वर और आकाश में कारण रूप से सब जगत् और अच्छी गाढ़ी नींद में सोते हुए के समान जीव रहते हैं। एक-एक सूर्य्य के प्रकाश और आकर्षण के विषय में जितने-जितने लोक हैं, उतने-उतने सब ईश्वर ने बनाये धारण किये तथा इनकी व्यवस्था की है, यह जानना चाहिये॥५॥

कद्व॑ ऋ॒तस्य॑ धर्ण॒सि कद्वरु॑णस्य॒ चक्ष॑णम्। कद॑र्य॒म्णो म॒हस्प॒थाति॑ क्रामेम दू॒ढ्यो॑ वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥

विद्या प्राप्ति की इच्छावाले पुरुषों को चाहिये कि विद्वानों के समीप जाकर कार्य्य और कारण की विद्या के मार्ग विषयक प्रश्नों को कर उनसे उत्तर पाकर क्रियाकुशलता से कामों को सिद्ध करके दुःख का नाश कर सुख पावें॥६॥

अ॒हं सो अ॑स्मि॒ यः पु॒रा सु॒ते वदा॑मि॒ कानि॑ चित्। तं मा॑ व्यन्त्या॒ध्यो॒३॒॑ वृको॒ न तृ॒ष्णजं॑ मृ॒गं वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥

इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार है। सब मनुष्यों के प्रति ईश्वर उपदेश करता है कि हे मनुष्यो! तुम लोग जैसे मैंने सृष्टि को रचके वेद द्वारा जैसे-जैसे उपदेश किये हैं उनको वैसे ही ग्रहण करो और उपासना करने योग्य मुझको छोड़के अन्य किसीकी उपासना कभी मत करो। जैसे कोई जीव मृग या रसिक चोर वा बघेरा हरिण को प्राप्त होने चाहता है वैसे ही सब दोषों को निर्मूल छोड़कर मेरी चाहना करो और ऐसे विद्वान् को भी चाहो॥७॥

सं मा॑ तपन्त्य॒भितः॑ स॒पत्नी॑रिव॒ पर्श॑वः। मूषो॒ न शि॒श्ना व्य॑दन्ति मा॒ध्यः॑ स्तो॒तारं॑ ते शतक्रतो वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे न्याय करने के अध्यक्ष आदि मनुष्यो! तुम जैसे सौतेली स्त्री अपने पति को कष्ट देती है वा जैसे अपने प्रयोजन मात्र वा बनाव-बिगाड़ देखनेवाले मूषे पराये पदार्थों का अच्छी प्रकार नाश करते हैं और जैसे व्यभिचारिणी वेश्या आदि कामिनीदामिनी स्त्री दमकती हुई कामीजन के लिङ्ग आदि रोगरूपी कुकर्म्म के द्वारा उसके धर्म्म, अर्थ, काम और मोक्ष के करने की रुकावट से उस कामीजन को पीड़ा देती हैं, वैसे ही जो डांकू, चोर, चवाई, अताई, लड़ाई, भिड़ाई, करनेवाले झूठ की प्रतीति और झूठे कामों की बातों में हम लोगों को क्लेश देते हैं उनको अच्छी (प्रकार) दण्ड देकर हम लोगों को तथा उनको भी निरन्तर पालो, ऐसे करने के विना राज्य का ऐश्वर्य्य नहीं बढ़ सकता॥८॥

अ॒मी ये स॒प्त र॒श्मय॒स्तत्रा॑ मे॒ नाभि॒रात॑ता। त्रि॒तस्तद्वे॑दा॒प्त्यः स जा॑मि॒त्वाय॑ रेभति वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥

जैसे सूर्य्य के साथ किरणों की शोभा और सङ्ग है, वैसे राजपुरुषों के साथ प्रजाजनों की शोभा और सङ्ग हो। तथा जो मनुष्य कर्म, उपासना और ज्ञान को यथावत् जानता है, वह प्रजा के पालने में पितृवत् होकर समस्त प्रजाजनों का मनोरञ्जन कर सकता है, और नहीं॥९॥

अ॒मी ये पञ्चो॒क्षणो॒ मध्ये॑ त॒स्थुर्म॒हो दि॒वः। दे॒व॒त्रा नु प्र॒वाच्यं॑ सध्रीची॒ना नि वा॑वृतुर्वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य आदि घटपटादि पदार्थों में संयुक्त होकर वृष्टि आदि के द्वारा अत्यन्त सुख को उत्पन्न करते हैं और समस्त पृथिवी आदि पदार्थों में आकर्षणशक्ति से वर्त्तमान हैं, वैसे ही सभाध्यक्ष आदि महात्मा जनों के गुणों वा बड़े-बड़े उत्तम गुणों से युक्त मनुष्यों को सिद्ध करके इनसे न्याय और प्रीति के साथ वर्त्तकर निरन्तर सुखी करें॥१०॥

सु॒प॒र्णा ए॒त आ॑सते॒ मध्य॑ आ॒रोध॑ने दि॒वः। ते से॑धन्ति प॒थो वृकं॒ तर॑न्तं य॒ह्वती॑र॒पो वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे ईश्वर के नियमों में सूर्य की किरणें आदि पदार्थ यथावत् वर्त्तमान हैं, वैसे ही तुम प्रजा-पुरुषों को भी राजनीति के नियमों में वर्त्तना चाहिये। जैसे सभाध्यक्ष आदि जन दुष्ट मनुष्यों को निवृत्ति करके प्रजाजनों की रक्षा करते हैं, वैसे तुम लोगों को भी ये ईर्ष्या, अभिमान आदि दोषों को निवृत्त करके रक्षा करने योग्य हैं॥११॥

नव्यं॒ तदु॒क्थ्यं॑ हि॒तं देवा॑सः सुप्रवाच॒नम्। ऋ॒तम॑र्षन्ति॒ सिन्ध॑वः स॒त्यं ता॑तान॒ सूर्यो॑ वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे समुद्रों के जल उड़कर ऊपर को चढ़ा हुआ सूर्य्य के ताप से फैलकर, बरस के, सब प्रजाजनों को सुख देता है, वैसे विद्वान् जनों को नित्य नवीन-नवीन विचार से गूढ़ विद्याओं को जान और प्रकाशित कर सबके हित का संपादन और सत्य धर्म्म के प्रचार से प्रजा को निरन्तर सुख देना चाहिये॥१२॥

अग्ने॒ तव॒ त्यदु॒क्थ्यं॑ दे॒वेष्व॒स्त्याप्य॑म्। स नः॑ स॒त्तो म॑नु॒ष्वदा दे॒वान्य॑क्षि वि॒दुष्ट॑रो वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥

जो विद्वान् समस्त विद्याओं को पढ़ाकर विद्वान् बनाने में कुशल है, उससे समस्त विद्या और धर्म के उपदेशों को सब मनुष्य ग्रहण करें, और से नहीं॥१३॥

स॒त्तो होता॑ मनु॒ष्वदा दे॒वाँ अच्छा॑ वि॒दुष्ट॑रः। अ॒ग्निर्ह॒व्या सु॑षूदति दे॒वो दे॒वेषु॒ मेधि॑रो वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥

ऐसा भाग्यहीन कौन जन होवे, जो विद्वानों से विद्या और शिक्षा न लेके इनका विरोधी हो॥१४॥

ब्रह्मा॑ कृणोति॒ वरु॑णो गातु॒विदं॒ तमी॑महे। व्यू॑र्णोति हृ॒दा म॒तिं नव्यो॑ जायतामृ॒तं वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥

किसी मनुष्य पर पिछले पुण्य इकट्ठे होने और विशेष शुद्ध क्रियमाण कर्म करने के विना परमेश्वर की दया नहीं होती और उक्त व्यवहार के विना कोई पूरी विद्या नहीं पा सकता, इससे सब मनुष्यों को परमात्मा की ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये कि हम लोगों में परिपूर्ण विद्यावान् अच्छे-अच्छे गुण, कर्म, स्वभावयुक्त मनुष्य सदा हों। ऐसी प्रार्थना को नित्य प्राप्त हुआ परमात्मा सर्वव्यापकता से उनके आत्मा का प्रकाश करता है, यह निश्चय है॥१५॥

अ॒सौ यः पन्था॑ आदि॒त्यो दि॒वि प्र॒वाच्यं॑ कृ॒तः। न स दे॑वा अति॒क्रमे॒ तं म॑र्तासो॒ न प॑श्यथ वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥

मनुष्यों को चाहिये कि जो वेदोक्त मार्ग है, वही सत्य है, ऐसा जान और समस्त सत्यविद्याओं को प्राप्त होकर सदा आनन्दित हों, सो यह वेदोक्त मार्ग विद्वानों को कभी खण्डन करने योग्य नहीं, और यह मार्ग विद्या के विना विशेष जाना भी नहीं जाता॥१६॥

त्रि॒तः कूपेऽव॑हितो दे॒वान्ह॑वत ऊ॒तये॑। तच्छु॑श्राव॒ बृह॒स्पतिः॑ कृ॒ण्वन्नं॑हूर॒णादु॒रु वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥

जो मनुष्य वा देहधारी जीव अर्थात् स्त्री आदि भी अपनी बुद्धि से प्रयत्न के साथ पण्डितों की उत्तेजना से समस्त विद्याओं को सुन, मान, विचार और प्रकट कर खोटे गुण स्वभाव वा खोटे कामों को छोड़कर विद्वान् होता है, वह आत्मा और शरीर की रक्षा आदि को पाकर बहुत सुख पाता है॥१७॥

अ॒रु॒णो मा॑ स॒कृद्वृकः॑ प॒था यन्तं॑ द॒दर्श॒ हि। उज्जि॑हीते नि॒चाय्या॒ तष्टे॑व पृष्ट्याम॒यी वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो विद्वान् चन्द्रमा के तुल्य शान्तस्वभाव और सूर्य्य के तुल्य विद्या के प्रकाश करने को स्वीकार करके संसार में समस्त विद्याओं को फैलाता है, वही आप्त अर्थात् अतिउत्तम विद्वान् है॥१८॥

ए॒नाङ्गू॒षेण॑ व॒यमिन्द्र॑वन्तो॒ऽभि ष्या॑म वृ॒जने॒ सर्व॑वीराः। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥

मनुष्यों को चाहिये कि जिसके पढ़ाने से विद्या और अच्छी शिक्षा बढ़े, उसके सङ्ग से समस्त विद्याओं का सर्वथा निश्चय करें॥१९॥इस सूक्त में समस्त विद्वानों के गुण और काम के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह –१०५ एकसौ पाँचवाँ सूक्त १५ पन्द्रहवाँ अनुवाक और २३ तेईसवाँ वर्ग पूरा हुआ॥

सूक्तम्

इन्द्रं॑ मि॒त्रं वरु॑णम॒ग्निमू॒तये॒ मारु॑तं॒ शर्धो॒ अदि॑तिं हवामहे। रथं॒ न दु॒र्गाद्व॑सवः सुदानवो॒ विश्व॑स्मान्नो॒ अंह॑सो॒ निष्पि॑पर्तन॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे मनुष्य अच्छी प्रकार सिद्ध किये हुए विमान आदि यान से अति कठिन मार्गों में भी सुख से जाना-आना करके कामों को सिद्धकर समस्त दरिद्रता आदि दुःख से छूटते हैं, वैसे ही ईश्वर की सृष्टि के पृथिवी आदि पदार्थों वा विद्वानों को जान उपकार में लाकर उनका अच्छे प्रकार सेवनकर बहुत सुख को प्राप्त हो सकते हैं॥१॥

त आ॑दित्या॒ आ ग॑ता स॒र्वता॑तये भू॒त दे॑वा वृत्र॒तूर्ये॑षु श॒म्भुवः॑। रथं॒ न दु॒र्गाद्व॑सवः सुदानवो॒ विश्व॑स्मान्नो॒ अंह॑सो॒ निष्पि॑पर्तन॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे ईश्वर के बनाये हुए पृथिवी आदि पदार्थ सब प्राणियों के उपकार के लिये हैं, वैसे ही सबके उपकार के लिये विद्वानों को नित्य अपना वर्त्ताव रखना चाहिये। जैसे अच्छे दृढ़ विमान आदि यान पर बैठ देश-देशान्तर की जा-आकर व्यापार वा विजय से धन और प्रतिष्ठा को प्राप्त हो दरिद्रता और अयश से छूटकर सुखी होते हैं, वैसे ही विद्वान् जन अपने उपदेश से विद्या को प्राप्त कराकर सबको सुखी करें॥२॥

अव॑न्तु नः पि॒तरः॑ सुप्रवाच॒ना उ॒त दे॒वी दे॒वपु॑त्रे ऋता॒वृधा॑। रथं॒ न दु॒र्गाद्व॑सवः सुदानवो॒ विश्व॑स्मान्नो॒ अंह॑सो॒ निष्पि॑पर्तन॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे दिव्य औषधियों और प्रकाश आदि गुणों से भूमि और सूर्य्यमण्डल सबको सुख के साथ बढ़ाते हैं, वैसे ही आप्त विद्वान् जन सब मनुष्यों को अच्छी शिक्षा और पढ़ाने से विद्या आदि अच्छे गुणों में उन्नति देकर सुखी करते हैं। और जैसे उत्तम रथ आदि पर बैठ के दुःख से जाने योग्य मार्ग के पार सुखपूर्वक जाकर समग्र क्लेश से छूटके सुखी होते हैं, वैसे ही वे उक्त विद्वान् दुष्ट गुण, कर्म और स्वभाव से अलगकर हम लोगों को धर्म के आचरण में उन्नति देवें॥३॥

नरा॒शंसं॑ वा॒जिनं॑ वा॒जय॑न्नि॒ह क्ष॒यद्वी॑रं पू॒षणं॑ सु॒म्नैरी॑महे। रथं॒ न दु॒र्गाद्व॑सवः सुदानवो॒ विश्व॑स्मान्नो॒ अंह॑सो॒ निष्पि॑पर्तन॥

हम लोग शुभ गुणों से युक्त सुखी मनुष्यों को मित्रता को प्राप्त होकर श्रेष्ठ यानयुक्त हुए शिल्पियों के समान दुःख से पार हों॥४॥

बृह॑स्पते॒ सद॒मिन्नः॑ सु॒गं कृ॑धि॒ शं योर्यत्ते॒ मनु॑र्हितं॒ तदी॑महे। रथं॒ न दु॒र्गाद्व॑सवः सुदानवो॒ विश्व॑स्मान्नो॒ अंह॑सो॒ निष्पि॑पर्तन॥

मनुष्यों को चाहिये कि जैसे गुरुजन से विद्या ली जाती है, वैसे ही सब विद्वानों से विद्या लेकर दुःखों का विनाश करें॥५॥

इन्द्रं॒ कुत्सो॑ वृत्र॒हणं॒ शची॒पतिं॑ का॒टे निवा॑ळ्ह॒ ऋषि॑रह्वदू॒तये॑। रथं॒ न दु॒र्गाद्व॑सवः सुदानवो॒ विश्व॑स्मान्नो॒ अंह॑सो॒ निष्पि॑पर्तन॥

विद्यार्थी को कपटी पढ़ानेवाले के समीप ठहरना नहीं चाहिये किन्तु आप्त विद्वानों के समीप ठहर और विद्वान् होकर ऋषिजनों के स्वभाव से युक्त होना चाहिये और अपने आत्मा की रक्षा के लिये अधर्म से डरकर धर्म में सदा रहना चाहिये॥६॥

दे॒वैर्नो॑ दे॒व्यदि॑ति॒र्नि पा॑तु दे॒वस्त्रा॒ता त्रा॑यता॒मप्र॑युच्छन्। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥

मनुष्यों को चाहिये कि जो अप्रमादी, विद्वानों में विद्वान्, विद्या की रक्षा करनेवाला विद्यादान से सबके सुख को बढ़ाता है, उसका सत्कार करके विद्या और धर्म का प्रचार संसार में करें॥७॥इस सूक्त में समस्त विद्वानों के गुणों का वर्णन है। इससे इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह १०६ एकसौ छः वाँ सूक्त और चौबीसवाँ वर्ग पूरा हुआ॥

य॒ज्ञो दे॒वानां॒ प्रत्ये॑ति सु॒म्नमादि॑त्यासो॒ भव॑ता मृळ॒यन्तः॑। आ वो॒ऽर्वाची॑ सुम॒तिर्व॑वृत्यादं॒होश्चि॒द्या व॑रिवो॒वित्त॒रास॑त्॥

इस संसार में विद्वानों को चाहिये कि जो उन्होंने अपने पुरुषार्थ से शिल्पक्रिया प्रत्यक्ष कर रक्खी हैं, उनको सब मनुष्यों के लिये प्रकाशित करें कि जिससे बहुत मनुष्य शिल्पक्रियाओं को करके सुखी हों॥१॥

उप॑ नो दे॒वा अव॒सा ग॑म॒न्त्वङ्गि॑रसां॒ साम॑भिः स्तू॒यमा॑नाः। इन्द्र॑ इन्द्रि॒यैर्म॒रुतो॑ म॒रुद्भि॑रादि॒त्यैर्नो॒ अदि॑तिः॒ शर्म॑ यंसत्॥

ज्ञानप्रचार सीखनेहारे जन जिन विद्वानों के समीप वा विद्वान् जन जिन विद्यार्थियों के समीप जावें, वे विद्या, धर्म और अच्छी शिक्षा के व्यवहार को छोड़कर और कर्म कभी न करें, जिससे दुःख की हानि होके निरन्तर सुख की सिद्धि हो॥२॥

तन्न॒ इन्द्र॒स्तद्वरु॑ण॒स्तद॒ग्निस्तद॑र्य॒मा तत्स॑वि॒ता चनो॑ धात्। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥

जैसे संसारस्थ पृथिवी आदि पदार्थ सुख देनेवाले हैं, वैसे ही विद्वानों को सुख देनेवाले होना चाहिये॥३॥इस सूक्त में समस्त विद्वानों के गुणों का वर्णन है। इससे इस सूक्त की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह १०७ एकसौ सातवाँ सूक्त और २५ पच्चीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

य इ॑न्द्राग्नी चि॒त्रत॑मो॒ रथो॑ वाम॒भि विश्वा॑नि॒ भुव॑नानि॒ चष्टे॑। तेना या॑तं स॒रथं॑ तस्थि॒वांसाथा॒ सोम॑स्य पिबतं सु॒तस्य॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि कलाओं में अच्छी प्रकार जोड़के चलाये, हुए वायु और अग्नि आदि पदार्थों से युक्त विमान आदि रथों से आकाश, समुद्र और भूमि मार्गों में एक देश से दूसरे देशों को जा-आकर सर्वदा अपने अभिप्राय की सिद्धि से आनन्दरस भोगें॥१॥

याव॑दि॒दं भुव॑नं॒ विश्व॒मस्त्यु॑रु॒व्यचा॑ वरि॒मता॑ गभी॒रम्। तावाँ॑ अ॒यं पात॑वे॒ सोमो॑ अ॒स्त्वर॑मिन्द्राग्नी॒ मन॑से यु॒वभ्या॑म्॥

विचारशील पुरुषों को यह अवश्य जानना चाहिये कि जहाँ-जहाँ मूर्त्तिमान् लोक हैं, वहाँ-वहाँ पवन और बिजुली अपनी व्याप्ति से वर्त्तमान हैं। जितना मनुष्यों का सामर्थ्य है, उतने तक इनके गुणों को जानकर और पुरुषार्थ से उपयोग लेकर परिपूर्ण सुखी होवें॥२॥

च॒क्राथे॒ हि स॒ध्र्य१॒॑ङ्नाम॑ भ॒द्रं स॑ध्रीची॒ना वृ॑त्रहणा उ॒त स्थः॑। तावि॑न्द्राग्नी स॒ध्र्य॑ञ्चा नि॒षद्या॒ वृष्णः॒ सोम॑स्य वृष॒णा वृ॑षेथाम्॥

मनुष्यों को अत्यन्त उपयोग करनेहारे वायु और सूर्य्यमण्डल को जानके कैसे उपयोग में न लाने चाहिये॥३॥

समि॑द्धेष्व॒ग्निष्वा॑नजा॒ना य॒तस्रु॑चा ब॒र्हिरु॑ तिस्तिरा॒णा। ती॒व्रैः सोमैः॒ परि॑षिक्तेभिर॒र्वागेन्द्रा॑ग्नी सौमन॒साय॑ यातम्॥

जब शिल्पियों से पवन और बिजुली कार्यसिद्धि के अर्थ कलायन्त्रों की क्रियाओं से युक्त किये जाते हैं, तब ये सर्वसुखों के लाभ के लिये समर्थ होते हैं॥४॥

यानी॑न्द्राग्नी च॒क्रथु॑र्वी॒र्या॑णि॒ यानि॑ रू॒पाण्यु॒त वृष्ण्या॑नि। या वां॑ प्र॒त्नानि॑ स॒ख्या शि॒वानि॒ तेभिः॒ सोम॑स्य पिबतं सु॒तस्य॑॥

इस मन्त्र में इन्द्र शब्द से धनाढ्य और अग्नि शब्द से विद्यावान् शिल्पी का ग्रहण किया जाता है, विद्या और पुरुषार्थ के विना कामों की सिद्धि कभी नहीं होती और न मित्रभाव के विना सर्वदा व्यवहार सिद्ध हो सकता है, इससे उक्त काम सर्वदा करने योग्य हैं॥५॥

यदब्र॑वं प्रथ॒मं वां॑ वृणा॒नो॒३॒॑ऽयं सोमो॒ असु॑रैर्नो वि॒हव्यः॑। तां स॒त्यां श्र॒द्धाम॒भ्या हि या॒तमथा॒ सोम॑स्य पिबतं सु॒तस्य॑॥

जन्म के समय में सब मूर्ख होते हैं और फिर विद्या का अभ्यास करके विद्वान् भी हो जाते हैं, इससे विद्याहीन मूर्ख जन ज्येष्ठ और विद्वान् जन कनिष्ठ गिने जाते हैं। सबको यही चाहिये कि कोई हो परन्तु उसके प्रति सांची ही कहैं किन्तु किसीके प्रति असत्य न कहें॥६॥

यदि॑न्द्राग्नी॒ मद॑थः॒ स्वे दु॑रो॒णे यद्ब्र॒ह्मणि॒ राज॑नि वा यजत्रा। अतः॒ परि॑ वृषणा॒वा हि या॒तमथा॒ सोम॑स्य पिबतं सु॒तस्य॑॥

जहाँ-जहाँ स्वामि और शिल्पि वा पढ़ाने और पढ़नेवाले वा राजा और प्रजाजन जायें वा आवें वहाँ-वहाँ सभ्यता से स्थित हों, विद्या और शान्तियुक्त वचन को कह और अच्छे शील का ग्रहण कर सत्य कहें और सुनें॥७॥

यदि॑न्द्राग्नी॒ यदु॑षु तु॒र्वशे॑षु॒ यद्द्रु॒ह्युष्वनु॑षु पू॒रुषु॒ स्थः। अतः॒ परि॑ वृषणा॒वा हि या॒तमथा॒ सोम॑स्य पिबतं सु॒तस्य॑॥

जो न्याय और सेना के अधिकार को प्राप्त हुए मनुष्यों में यथायोग्य वर्त्तमान हैं, सब मनुष्यों को चाहिये कि उनको ही उन कामों में स्थापन अर्थात् मानकर कामों की सिद्धि करें॥८॥

यदि॑न्द्राग्नी अव॒मस्यां॑ पृथि॒व्यां म॑ध्य॒मस्यां॑ पर॒मस्या॑मु॒त स्थः। अतः॒ परि॑ वृषणा॒वा हि या॒तमथा॒ सोम॑स्य पिबतं सु॒तस्य॑॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। उत्तम, मध्यम, और निकृष्ट गुण, कर्म और स्वभाव के भेद से जो-जो राज्य है, वहाँ-वहाँ वैसे ही उत्तम, मध्यम, निकृष्ट गुण, कर्म और स्वभाव के मनुष्यों को स्थापनकर और चक्रवर्त्ती राज्य करके सबको आनन्द भोगना-भोगवाना चाहिये। ऐसे ही इस सृष्टि में ठहरे और सब लोकों में प्राप्त होते हुए पवन और बिजुली को जान और उनका अच्छे प्रकार प्रयोग कर तथा कार्य्यों की सिद्धि करके दारिद्र्य दोष सबको नाश करना चाहिये॥९॥

यदि॑न्द्राग्नी पर॒मस्यां॑ पृथि॒व्यां म॑ध्य॒मस्या॑मव॒मस्या॑मु॒त स्थः। अतः॒ परि॑ वृषणा॒वा हि या॒तमथा॒ सोम॑स्य पिबतं सु॒तस्य॑॥

इन्द्र और अग्नि दो प्रकार के हैं। एक तो वे कि जो उत्तम गुण, कर्म, स्वभाव में स्थिर वा पवित्र भूमि में स्थिर हैं वे उत्तम और जो अपवित्र गुण, कर्म, स्वभाव में वा अपवित्र भूमि आदि पदार्थों में स्थिर होते हैं वे निकृष्ट, ये दोनों प्रकार के पवन और अग्नि ऊपर-नीचे सर्वत्र चलते हैं। इससे दोनों मन्त्रों से (अवम) और (परम) शब्द जो पहिले प्रयोग किये हुए हैं, उनसे दो प्रकार के (इन्द्र) और (अग्नि) के अर्थ को समझाया है, ऐसा जानना चाहिये॥१०॥

यदि॑न्द्राग्नी दि॒वि ष्ठो यत्पृ॑थि॒व्यां यत्पर्व॑ते॒ष्वोष॑धीष्व॒प्सु। अतः॒ परि॑ वृषणा॒वा हि या॒तमथा॒ सोम॑स्य पिबतं सु॒तस्य॑॥

जो धनञ्जय पवन और कारणरूप अग्नि सब पदार्थों में विद्यमान हैं, वे जैसे के वैसे जाने और क्रियाओं में जोड़े हुए बहुत कामों को सिद्ध करते हैं॥११॥

यदि॑न्द्राग्नी॒ उदि॑ता॒ सूर्य॑स्य॒ मध्ये॑ दि॒वः स्व॒धया॑ मा॒दये॑थे। अतः॒ परि॑ वृषणा॒वा हि या॒तमथा॒ सोम॑स्य पिबतं सु॒तस्य॑॥

पवन और बिजुली के विना किसी लोक वा प्राणी की रक्षा और जीवन नहीं होते हैं, इससे संसार की पालना में ये ही मुख्य हैं॥१२॥

ए॒वेन्द्रा॑ग्नी पपि॒वांसा॑ सु॒तस्य॒ विश्वा॒स्मभ्यं॒ सं ज॑यतं॒ धना॑नि। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥

विद्वान्, बलिष्ठ, धार्मिक, कोशस्वामी और सेनाध्यक्ष और उत्तम पुरुषार्थ करनेवालों के विना विद्या आदि धन नहीं बढ़ सकते हैं। जैसे मित्र आदि अपने मित्रों के लिये सुख देते हैं वैसे ही कोशस्वामी और सेनाध्यक्ष आदि प्रजाजनों के लिये सुख देते हैं, इससे सबको चाहिये कि इनकी सदा पालना करें॥१३॥इस सूक्त में पवन और बिजुली आदि गुणों के वर्णन से उसके अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह १०८ एकसौ आठवाँ सूक्त और २७ सत्ताईसवाँ वर्ग पूरा हुआ॥

वि ह्यख्यं॒ मन॑सा॒ वस्य॑ इ॒च्छन्निन्द्रा॑ग्नी ज्ञा॒स उ॒त वा॑ सजा॒तान्। नान्या यु॒वत्प्रम॑तिरस्ति॒ मह्यं॒ स वां॒ धियं॑ वाज॒यन्ती॑मतक्षम्॥

इस मन्त्र में दो लुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों की योग्यता यह है कि अच्छी प्रीति और पुरुषार्थ से श्रेष्ठ विद्या आदि को बोध कराते हुए अति उत्तम बुद्धि उत्पन्न कराकर व्यवहार और परमार्थ की सिद्धि करानेवाले कामों को अवश्य सिद्ध करें॥१॥

अश्र॑वं॒ हि भू॑रि॒दाव॑त्तरा वां॒ विजा॑मातुरु॒त वा॑ घा स्या॒लात्। अथा॒ सोम॑स्य॒ प्रय॑ती यु॒वभ्या॒मिन्द्रा॑ग्नी॒ स्तोमं॑ जनयामि॒ नव्य॑म्॥

सब मनुष्यों को बिजुली आदि पदार्थों के गुणों का ज्ञान और उनके अच्छे प्रकार कार्य में युक्त करने से नवीन-नवीन कार्य्य की सिद्धि करनेवाले कलायन्त्र आदि का विधानकर अनेक कामों को बनाकर धर्म, अर्थ और अपनी कामना की सिद्धि करनी चाहिये॥२॥

मा च्छे॑द्म र॒श्मीँरिति॒ नाध॑मानाः पितॄ॒णां श॒क्तीर॑नु॒यच्छ॑मानाः। इ॒न्द्रा॒ग्निभ्यां॒ कं वृष॑णो मदन्ति॒ ता ह्यद्री॑ धि॒षणा॑या उ॒पस्थे॑॥

ऐश्वर्य्य की कामना करते हुए हम लोगों को कभी विद्वानों का सङ्ग और उनकी सेवा को छोड़ तथा वसन्त आदि ऋतुओं का यथायोग्य अच्छी प्रकार ज्ञान और सेवन का न त्यागकर अपना वर्त्ताव रखना चाहिये और विद्या तथा बुद्धि की उन्नति और व्यवहारसिद्धि उत्तम प्रयत्न के साथ करना चाहिये॥३॥

यु॒वाभ्यां॑ दे॒वी धि॒षणा॒ मदा॒येन्द्रा॑ग्नी॒ सोम॑मुश॒ती सु॑नोति। ताव॑श्विना भद्रहस्ता सुपाणी॒ आ धा॑वतं॒ मधु॑ना पृ॒ङ्क्तम॒प्सु॥

मनुष्य जब-तक अच्छी शिक्षा, उत्तम विद्या और क्रियाकौशलयुक्त बुद्धियों को न सिद्ध करते हैं, तब-तक बिजुली आदि पदार्थों से उपकार को नहीं ले सकते। इससे इस काम को अच्छे यत्न से सिद्ध करना चाहिये॥४॥

यु॒वामि॑न्द्राग्नी॒ वसु॑नो विभा॒गे त॒वस्त॑मा शुश्रव वृत्र॒हत्ये॑। तावा॒सद्या॑ ब॒र्हिषि॑ य॒ज्ञे अ॒स्मिन्प्र च॑र्षणी मादयेथां सु॒तस्य॑॥

मनुष्य जिनसे धनों का विभाग करते हैं वा शत्रुओं को जीतके समस्त पृथिवी पर राज्यकर सकते हैं, उनको कार्य की सिद्धि के लिये कैसे न यथायोग्य कामों में युक्त करें॥५॥

प्र च॑र्ष॒णिभ्यः॑ पृतना॒हवे॑षु॒ प्र पृ॑थि॒व्या रि॑रिचाथे दि॒वश्च॑। प्र सिन्धु॑भ्यः॒ प्र गि॒रिभ्यो॑ महि॒त्वा प्रेन्द्रा॑ग्नी॒ विश्वा॒ भुव॒नात्य॒न्या॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। पवन और बिजुली के समान बड़ा कोई लोक नहीं होने योग्य है क्योंकि ये दोनों सब लोकों को व्याप्त होकर ठहरे हुए हैं॥६॥

आ भ॑रतं॒ शिक्ष॑तं वज्रबाहू अ॒स्माँ इ॑न्द्राग्नी अवतं॒ शची॑भिः। इ॒मे नु ते र॒श्मयः॒ सूर्य॑स्य॒ येभिः॑ सपि॒त्वं पि॒तरो॑ न॒ आस॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो अच्छी शिक्षा से मनुष्यों में सूर्य के समान विद्या का प्रकाशकर्त्ता और माता-पिता के तुल्य कृपा से रक्षा करने वा पढ़ानेवाला तथा सूर्य के तुल्य प्रकाशित बुद्धि को प्राप्त और दूसरा पढ़नेवाला है, उन दोनों का नित्य सत्कार करो, इस काम के विना कभी विद्या की उन्नति होने का संभव नहीं हैं॥७॥

पुरं॑दरा॒ शिक्ष॑तं वज्रहस्ता॒स्माँ इ॑न्द्राग्नी अवतं॒ भरे॑षु। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मित्र आदि जन अपने मित्रादिकों की रक्षा कर और उन्नति करते वा एक दूसरे की अनुकूलता में रहते हैं, वैसे उपदेश के सुनने और सुनानेवाले परस्पर विद्या की वृद्धि कर प्रीति के साथ मित्रपन में वर्त्ताव रक्खें॥८॥इस सूक्त्त में इन्द्र और अग्नि शब्द के अर्थ का वर्णन है। इससे इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह १०९ एकसौ नववाँ सूक्त और २९ उनतीसवाँ वर्ग पूरा हुआ॥

त॒तं मे॒ अप॒स्तदु॑ तायते॒ पुनः॒ स्वादि॑ष्ठा धी॒तिरु॒चथा॑य शस्यते। अ॒यं स॑मु॒द्र इ॒ह वि॒श्वदे॑व्यः॒ स्वाहा॑कृतस्य॒ समु॑ तृप्णुत ऋभवः॥

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। जैसे समस्त रत्नों से भरा हुआ समुद्र दिव्य गुणयुक्त है, वैसे ही धार्मिक पढ़ानेवालों को चाहिये कि मनुष्यों में सत्य काम और अच्छी बुद्धि का प्रचारकर दिव्य गुणों की प्रसिद्धि करें॥१॥

आ॒भो॒गयं॒ प्र यदि॒च्छन्त॒ ऐत॒नापा॑काः॒ प्राञ्चो॒ मम॒ के चि॑दा॒पयः॑। सौध॑न्वनासश्चरि॒तस्य॑ भू॒मनाग॑च्छत सवि॒तुर्दा॒शुषो॑ गृ॒हम्॥

हे गृहस्थ आदि मनुष्यो! तुम संन्यासियों से सत्य विद्या को पाकर, कहीं दान करनेवालों की सभा में जाकर, वहाँ युक्ति से बैठ और निरभिमानता से वर्त्तकर विद्या और विनय का प्रचार करो॥२॥

तत्स॑वि॒ता वो॑ऽमृत॒त्वमासु॑व॒दगो॑ह्यं॒ यच्छ्र॒वय॑न्त॒ ऐत॑न। त्यं चि॑च्चम॒समसु॑रस्य॒ भक्ष॑ण॒मेकं॒ सन्त॑मकृणुता॒ चतु॑र्वयम्॥

हे विद्वानो! जैसे मेघ प्राण की पुष्टि करनेवाले अन्न आदि पदार्थों को देनेवाला होकर सुखी करता है, वैसे ही आप लोग विद्या के दान करनेवाले होकर विद्यार्थियों को विद्वान् कर सुन्दर उपकार करो॥३॥

वि॒ष्ट्वी शमी॑ तरणि॒त्वेन॑ वा॒घतो॒ मर्ता॑सः॒ सन्तो॑ अमृत॒त्वमा॑नशुः। सौ॒ध॒न्व॒ना ऋ॒भवः॒ सूर॑चक्षसः संवत्स॒रे सम॑पृच्यन्त धी॒तिभिः॑॥

जो मनुष्य प्रत्येक क्षण अच्छे-अच्छे पुरुषार्थ करते हैं, वे संसार से लेके मोक्षपर्यन्त पदार्थों को होकर सुखी होते हैं, किन्तु आलसी मनुष्य कभी सुखों को नहीं प्राप्त हो सकते॥४॥

क्षेत्र॑मिव॒ वि म॑मु॒स्तेज॑नेनँ॒ एकं॒ पात्र॑मृ॒भवो॒ जेह॑मानम्। उप॑स्तुता उप॒मं नाध॑माना॒ अम॑र्त्येषु॒ श्रव॑ इ॒च्छमा॑नाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे मनुष्य खेत को जोत, बोय और सम्यक् रक्षा कर उससे अन्न आदि को पाके उसका भोजन कर आनन्दित होते हैं, वैसे वेद में कहे हुए कलाकौशल से प्रशंसित यानों को रचकर उनमें बैठ और उन्हें चला और एक देश से दूसरे देश में जाकर व्यवहार वा राज्य से धन को पाकर सुखी होते हैं॥५॥

आ म॑नी॒षाम॒न्तरि॑क्षस्य॒ नृभ्यः॑ स्रु॒चेव॑ घृ॒तं जु॑हवाम वि॒द्मना॑। त॒र॒णि॒त्वा ये पि॒तुर॑स्य सश्चि॒र ऋ॒भवो॒ वाज॑मरुहन्दि॒वो रजः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे ये सूर्य की किरणें लोक-लोकान्तरों को चढ़कर शीघ्र जल वर्षा और उससे ओषधियों को उत्पन्न कर सब प्राणियों को सुखी करती हैं, वैसे राजादि जन प्रजाओं को सुखी करें॥६॥

ऋ॒भुर्न॒ इन्द्रः॒ शव॑सा॒ नवी॑यानृ॒भुर्वाजे॑भि॒र्वसु॑भि॒र्वसु॑र्द॒दिः। यु॒ष्माकं॑ देवा॒ अव॒साह॑नि प्रि॒ये॒३॒॑ऽभि ति॑ष्ठेम पृत्सु॒तीरसु॑न्वताम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य अपने प्रकाश से तेजस्वी समस्त चर और अचर जीवों और समस्त पदार्थों के जीवन कराने से आनन्दित करता है वैस विद्वान्, शूरवीर और विद्वानों में अच्छे विद्वान् के सहायों से युक्त हम लोग अच्छी शिक्षा किई हुई, प्रसन्न और पुष्ट अपनी सेनाओं से जो सेना को लिए हुए हैं, उन शत्रुओं का तिरस्कार कर धार्मिक प्रजाजनों को पाल चक्रवर्त्ति राज्य को निरन्तर सेवें॥७॥

निश्चर्म॑ण ऋभवो॒ गाम॑पिंशत॒ सं व॒त्सेना॑सृजता मा॒तरं॒ पुनः॑। सौध॑न्वनासः स्वप॒स्यया॑ नरो॒ जिव्री॒ युवा॑ना पि॒तरा॑कृणोतन॥

पिछले कहे हुए काम के विना कोई भी राज्य नहीं कर सकते, इससे मनुष्यों को चाहिये कि उन कामों का सदा अनुष्ठान किया करें॥८॥

वाजे॑भिर्नो॒ वाज॑सातावविड्ढ्यृभु॒माँ इ॑न्द्र चि॒त्रमा द॑र्षि॒ राधः॑। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥

कोई सेनाध्यक्ष बुद्धिमानों के सहाय के विना शत्रुओं को जीत नहीं सकता॥९॥। इस सूक्त में बुद्धिमानों के काम और गुणों का वर्णन है। इससे इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह –३१ एकतीसवाँ वर्ग और– ११० एकसौ दशवाँ सूक्त पूरा हुआ॥

तक्ष॒न्रथं॑ सु॒वृतं॑ विद्म॒नाप॑स॒स्तक्ष॒न्हरी॑ इन्द्र॒वाहा॒ वृष॑ण्वसू। तक्ष॑न्पि॒तृभ्या॑मृ॒भवो॒ युव॒द्वय॒स्तक्ष॑न्व॒त्साय॑ मा॒तरं॑ सचा॒भुव॑म्॥

विद्वान् जन जब तक इस संसार में कार्य्य के दर्शन और गुणों की परीक्षा से कारण को नहीं पहुँचते हैं, तब तक शिल्पविद्या को नहीं सिद्ध कर सकते हैं॥१॥

आ नो॑ य॒ज्ञाय॑ तक्षत ऋभु॒मद्वयः॒ क्रत्वे॒ दक्षा॑य सुप्र॒जाव॑ती॒मिष॑म्। यथा॒ क्षया॑म॒ सर्व॑वीरया वि॒शा तन्नः॒ शर्धा॑य धासथा॒ स्वि॑न्द्रि॒यम्॥

इस संसार में विद्वानों के साथ अविद्वान् और अविद्वानों के साथ विद्वान् जन प्रीति से नित्य अपना वर्त्ताव रक्खें। इस काम के विना शिल्पविद्यासिद्धि, उत्तम बुद्धि, बल और श्रेष्ठ प्रजाजन कभी नहीं हो सकते॥२॥

आ त॑क्षत सा॒तिम॒स्मभ्य॑मृभवः सा॒तिं रथा॑य सा॒तिमर्व॑ते नरः। सा॒तिं नो॒ जैत्रीं॒ सं म॑हेत वि॒श्वहा॑ जा॒मिमजा॑मिं॒ पृत॑नासु स॒क्षणि॑म्॥

जो विद्वान् जन हमारी रक्षा करने और शत्रुओं को जीतनेहारे हैं, उनका सत्कार हम लोग निरन्तर करें॥३॥

ऋ॒भु॒क्षण॒मिन्द्र॒मा हु॑व ऊ॒तय॑ ऋ॒भून्वाजा॑न्म॒रुतः॒ सोम॑पीतये। उ॒भा मि॒त्रावरु॑णा नू॒नम॒श्विना॒ ते नो॑ हिन्वन्तु सा॒तये॑ धि॒ये जि॒षे॥

जो शास्त्र में दक्ष, सत्यवादी, क्रियाओं में अतिचतुर और विद्वानों का सेवन करते हैं, वे अच्छी शिक्षायुक्त उत्तम बुद्धि को प्राप्त हों और शत्रुओं को जीतकर कैसे न उन्नति को प्राप्त हों॥४॥

ऋ॒भुर्भरा॑य॒ सं शि॑शातु सा॒तिं स॑मर्य॒जिद्वाजो॑ अ॒स्माँ अ॑विष्टु। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥

विद्वानों का यही मुख्य कार्य्य है कि जो जिज्ञासु अर्थात् ज्ञान चाहनेवाले, विद्या के न पढ़े हुए विद्यार्थियों को अच्छी शिक्षा और विद्यादान से बढ़ावें, जैसे मित्र आदि सज्जन वा प्राण आदि पवन सबकी वृद्धि करके उनको सुखी करते हैं वैसे ही विद्वान् जन भी अपना वर्ताव रक्खें॥५॥इस सूक्त में बुद्धिमानों के गुणों के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये॥यह ३२ बत्तीसवाँ वर्ग और १११ एकसौ ग्यारहवाँ सूक्त समाप्त हुआ॥

ईळे॒ द्यावा॑पृथि॒वी पू॒र्वचि॑त्तये॒ऽग्निं घ॒र्मं सु॒रुचं॒ याम॑न्नि॒ष्टये॑। याभि॒र्भरे॑ का॒रमंशा॑य॒ जिन्व॑थ॒स्ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे प्रकाशयुक्त सूर्य्यादि और अन्धकारयुक्त भूमि आदि लोक सब घर आदिकों के चिनने और आधार के लिये होते और बिजुली के साथ सम्बन्ध करके सबके धारण करनेवाले होते हैं, वैसे तुम भी प्रजा में वर्त्ता करो॥१॥

यु॒वोर्दा॒नाय॑ सु॒भरा॑ अस॒श्चतो॒ रथ॒मा त॑स्थुर्वच॒सं न मन्त॑वे। याभि॒र्धियोऽव॑थः॒ कर्म॑न्नि॒ष्टये॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो तुमको उत्तम बुद्धि की प्राप्ति करावें उनकी सब प्रकार से रक्षा करो, जैसे आप लोग उनका सेवन करें वैसे ही वे लोग भी तुमको शुभ विद्या का बोध कराया करें॥२॥

यु॒वं तासां॑ दि॒व्यस्य॑ प्र॒शास॑ने वि॒शां क्ष॑यथो अ॒मृत॑स्य म॒ज्मना॑। याभि॑र्धे॒नुम॒स्वं१॒॑ पिन्व॑थो नरा॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

वे ही धन्य विद्वान् हैं जो प्रजाजनों को विद्या, अच्छी शिक्षा और सुख की वृद्धि होने के लिये प्रसन्न करते और उनके शरीर तथा आत्मा के बल को नित्य बढ़ाया करते हैं॥३॥

याभिः॒ परि॑ज्मा॒ तन॑यस्य म॒ज्मना॑ द्विमा॒ता तू॒र्षु त॒रणि॑र्वि॒भूष॑ति। याभि॑स्त्रि॒मन्तु॒रभ॑वद्विचक्ष॒णस्ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि प्राण के समान प्रीति और संन्यासियों के समान उपकार करने से सबके लिये विद्या की उन्नति किया करें॥४॥

याभी॑ रे॒भं निवृ॑तं सि॒तम॒द्भ्य उद्वन्द॑न॒मैर॑यतं॒ स्व॑र्दृ॒शे। याभिः॒ कण्वं॒ प्र सिषा॑सन्त॒माव॑तं॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

जो मनुष्य विद्वानों की अच्छे प्रकार रक्षा कर, उनसे विद्याओं को प्राप्त हो, जलादि पदार्थों से शिल्पविद्या को सिद्ध करके बढ़ते हैं, वे सब सुखों को प्राप्त होते हैं॥५॥

याभि॒रन्त॑कं॒ जस॑मान॒मार॑णे भु॒ज्युं याभि॑रव्य॒थिभि॑र्जिजि॒न्वथुः॑। याभिः॑ क॒र्कन्धुं॑ व॒य्यं॑ च॒ जिन्व॑थ॒स्ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

रक्षा करनेवाले और अधिष्ठाताओं के बिना योद्धा लोग शत्रुओं के साथ संग्राम में युद्ध करने और प्रजाओं के पालने को समर्थ नहीं हो सकते। जो प्रबन्ध से विद्वानों की रक्षा नहीं करते वे पराजय को प्राप्त होकर राज्य करने को समर्थ नहीं होते॥६॥

याभिः॑ शुच॒न्तिं ध॑न॒सां सु॑षं॒सदं॑ त॒प्तं घ॒र्ममो॒म्याव॑न्त॒मत्र॑ये। याभिः॒ पृश्नि॑गुं पुरु॒कुत्स॒माव॑तं॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

विद्वानों को योग्य है कि धर्मात्माओं की रक्षा और दुष्टों की ताड़ना से सत्यविद्याओं का प्रकाश करें॥७॥

याभिः॒ शची॑भिर्वृषणा परा॒वृजं॒ प्रान्धं श्रो॒णं चक्ष॑स॒ एत॑वे कृ॒थः। याभि॒र्वर्ति॑कां ग्रसि॒ताममु॑ञ्चतं॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

सभा और सेना के पति को योग्य है कि अपनी विद्या और धर्म के आश्रय से प्रजाओं में विद्या और विनय का प्रचार करके अविद्या और अधर्म के निवारण से सब प्राणियों को अभयदान निरन्तर किया करें॥८॥

याभिः॒ सिन्धुं॒ मधु॑मन्त॒मस॑श्चतं॒ वसि॑ष्ठं॒ याभि॑रजरा॒वजि॑न्वतम्। याभिः॒ कुत्सं॑ श्रु॒तर्यं॒ नर्य॒माव॑तं॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

मनुष्यों को योग्य है कि यज्ञविधि से सब पदार्थों को अच्छे प्रकार शोधन कर सबका सेवन और रोगों का निवारण करके सदैव सुखी रहें॥९॥

याभि॑र्वि॒श्पलां॑ धन॒साम॑थ॒र्व्यं॑ स॒हस्र॑मीळ्ह आ॒जावजि॑न्वतम्। याभि॒र्वश॑म॒श्व्यं प्रे॒णिमाव॑तं॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

मनुष्यों को यह अवश्य जानना चाहिये कि शरीर, आत्मा की पुष्टि और अच्छे प्रकार शिक्षा की हुई सेना के विना युद्ध में विजय और विजय के विना प्रजापालन, धन का संचय और राज्य की वृद्धि होने को योग्य नहीं है॥१०॥

याभिः॑ सुदानू औशि॒जाय॑ व॒णिजे॑ दी॒र्घश्र॑वसे॒ मधु॒ कोशो॒ अक्ष॑रत्। क॒क्षीव॑न्तं स्तो॒तारं॒ याभि॒राव॑तं॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

राजपुरुषों को योग्य है कि जो द्वीप-द्वीपान्तर और देश-देशान्तर में व्यापार करने के लिये जावें-आवें, उनकी रक्षा प्रयत्न से किया करें॥११॥

याभी॑ र॒सां क्षोद॑सो॒द्नः पि॑पि॒न्वथु॑रन॒श्वं याभी॒ रथ॒माव॑तं जि॒षे। याभि॑स्त्रि॒शोक॑ उ॒स्रिया॑ उ॒दाज॑त॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

जैसे सब शिल्पशास्त्रों में चतुर विद्वान् विमानादि यानों में कलायन्त्रों को रच के, उनमें जल विद्युत् आदि का प्रयोग कर, यन्त्र से कलाओं को चला, अपने अभीष्ट स्थान में जाना-आना करता है, वैसे ही सभा सेना के प्रति किया करें॥१२॥

याभिः॒ सूर्यं॑ परिया॒थः प॑रा॒वति॑ मन्धा॒तारं॒ क्षैत्र॑पत्ये॒ष्वाव॑तम्। याभि॒र्विप्रं॒ प्र भ॒रद्वा॑ज॒माव॑तं॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

व्यवहार करनेवाले मनुष्यों से विमानादि यानों के विना दूसरे देशों में जाना-आना नहीं हो सकता, इससे बड़ा लाभ नहीं हो सकता। इस कारण नाव-विमानादि की रचना अवश्य सदा करनी चाहिये॥१३॥

याभि॑र्म॒हाम॑तिथि॒ग्वं क॑शो॒जुवं॒ दिवो॑दासं शम्बर॒हत्य॒ आव॑तम्। याभिः॑ पू॒र्भिद्ये॑ त्र॒सद॑स्यु॒माव॑तं॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

प्रजा और सेना के मनुष्यों को योग्य है कि सब विद्या में निपुण धार्मिक पुरुष को सभापति कर उसकी सब प्रकार रक्षा करके सबको भय देनेवाले दुष्ट डांकू को मारके आप सुखों को प्राप्त हों और सबको सुखी करें॥१४॥

याभि॑र्व॒म्रं वि॑पिपा॒नमु॑पस्तु॒तं क॒लिं याभि॑र्वि॒त्तजा॑निं दुव॒स्यथः॑। याभि॒र्व्य॑श्वमु॒त पृथि॒माव॑तं॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

मनुष्यों को उचित है कि सद्वैद्यों के द्वारा उत्तम ओषधियों के सेवन से रोगों का निवारण, बल और बुद्धि को बढ़ा, सेनाके अध्यक्ष और विस्तृत पुरुषार्थयुक्त शिल्पीजन की सम्यक् सेवा कर शरीर और आत्मा के सुखों को प्राप्त होवें॥१५॥

याभि॑र्नरा श॒यवे॒ याभि॒रत्र॑ये॒ याभिः॑ पु॒रा मन॑वे गा॒तुमी॒षथुः॑। याभिः॒ शारी॒राज॑तं॒ स्यूम॑रश्मये॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

अध्यापक और उपदेष्टाओं को यह योग्य है कि विद्या और धर्म के उपदेश से सब जनों को विद्वान् धार्मिक करके पुरुषार्थयुक्त निरन्तर किया करें॥१६॥

याभिः॒ पठ॑र्वा॒ जठ॑रस्य म॒ज्मना॒ग्निर्नादी॑देच्चि॒त इ॒द्धो अज्म॒न्ना। याभिः॒ शर्या॑त॒मव॑थो महाध॒ने ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे कोई शौर्य्यादि गुणों से शोभायमान राजा रक्षणीय की रक्षा करे और मारने योग्यों को मारे और जैसे अग्नि वन का दाह करे वैसे शत्रु की सेना को भस्म करे और शत्रुओं के बड़े-बड़े धनों को प्राप्त कराकर आनन्दित करावे, वैसे ही सभा और सेना के प्रति काम किया करें॥१७॥

याभि॑रङ्गिरो॒ मन॑सा निर॒ण्यथोऽग्रं॒ गच्छ॑थो विव॒रे गोअ॑र्णसः। याभि॒र्मनुं॒ शूर॑मि॒षा स॒माव॑तं॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

जैसे विद्वान् विज्ञान से सब सुखों को सिद्ध करता है वैसे सब राजपुरुषों को अनेक साधनों से पृथिवी, नदी और समुद्र से आकाश के मध्य में शत्रुओं को जीत के सुखों को अच्छे प्रकार प्राप्त होना चाहिये॥१८॥

याभिः॒ पत्नी॑र्विम॒दाय॑ न्यू॒हथु॒रा घ॑ वा॒ याभि॑ररु॒णीरशि॑क्षतम्। याभिः॑ सु॒दास॑ ऊ॒हथुः॑ सुदे॒व्यं१॒॑ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

सुख पाने की इच्छा करनेवाले पुरुष और स्त्रियों को धर्म से सेवित ब्रह्मचर्य से पूर्ण विद्या और युवावस्था को प्राप्त होकर अपनी तुल्यता से ही विवाह करना योग्य है अथवा ब्रह्मचर्य ही में ठहर के सर्वदा स्त्री-पुरुषों को अच्छी शिक्षा करना योग्य है क्योंकि तुल्य गुणकर्मस्वभाववाले स्त्री-पुरुषों के विना गृहाश्रम को धारण करके कोई किञ्चित् भी सुख वा उत्तम सन्तान को प्राप्त होने में समर्थ नहीं होते, इससे इसी प्रकार विवाह करना चाहिये॥१९॥

याभिः॒ शंता॑ती॒ भव॑थो ददा॒शुषे॑ भु॒ज्युं याभि॒रव॑थो॒ याभि॒रध्रि॑गुम्। ओ॒म्याव॑तीं सु॒भरा॑मृत॒स्तुभं॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

राजादि राजपुरुषों को योग्य है कि सबको सुख देवें और आप्त पुरुषों की विद्या और नीति को धारण कर कल्याण को प्राप्त होवें॥२०॥

याभिः॑ कृ॒शानु॒मस॑ने दुव॒स्यथो॑ ज॒वे याभि॒र्यूनो॒ अर्व॑न्त॒माव॑तम्। मधु॑ प्रि॒यं भ॑रथो॒ यत्स॒रड्भ्य॒स्ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

राजपुरुषों को योग्य है कि दुःखों से पीड़ित प्राणियों और युवावस्थावाले स्त्री-पुरुषों की व्यभिचार से रक्षा करें और घोड़े आदि सेना के अङ्गों की रक्षा के लिये सब प्रिय वस्तु को धारण करें, प्रतिक्षण सम्हाल से सबको बढ़ाया करें॥२१॥

याभि॒र्नरं॑ गोषु॒युधं॑ नृ॒षाह्ये॒ क्षेत्र॑स्य सा॒ता तन॑यस्य॒ जिन्व॑थः। याभी॒ रथाँ॒ अव॑थो॒ याभि॒रर्व॑त॒स्ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

मनुष्यों को योग्य है कि युद्ध में शत्रुओं को मार अपने भृत्य आदि की रक्षा करके सेना के अङ्गों को बढ़ावें और स्त्री, बालकों, युद्ध के देखनेवाले और दूतों को कभी न मारें॥२२॥

याभिः॒ कुत्स॑मार्जुने॒यं श॑तक्रतू॒ प्र तु॒र्वीतिं॒ प्र च॑ द॒भीति॒माव॑तम्। याभि॑र्ध्व॒सन्तिं॑ पुरु॒षन्ति॒माव॑तं॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

राजादि मनुष्यों को योग्य है कि शस्त्रास्त्र प्रयोगों को जान, दुष्ट शत्रुओं का निवारण करके जितने इस संसार में अधर्मयुक्त कर्म हैं उतनों का धर्म्मोपदेश से निवारण कर, नाना प्रकार की रक्षा का विधानकर, प्रजा का अच्छे प्रकार पालन करके परम आनन्द का भोग किया करें॥२३॥

अप्न॑स्वतीमश्विना॒ वाच॑म॒स्मे कृ॒तं नो॑ दस्रा वृषणा मनी॒षाम्। अ॒द्यू॒त्येऽव॑से॒ नि ह्व॑ये वां वृ॒धे च॑ नो भवतं॒ वाज॑सातौ॥

कोई भी पुरुष आप्त विद्वानों के समागम के विना पूर्ण विद्यायुक्त वाणी और बुद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता, न इन दोनों के विना शत्रुओं का जय और सब ओर से बढ़ती को प्राप्त हो सकता है॥२४॥

द्युभि॑र॒क्तुभिः॒ परि॑ पातम॒स्मानरि॑ष्टेभिरश्विना॒ सौभ॑गेभिः। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे माता और पिता अपने-अपने सन्तानों, सखा मित्रों और प्राण शरीर को प्रसन्न करते हैं और समुद्र गम्भीरतादि, पृथिवी वृक्षादि और सूर्य प्रकाश को धारण कर और सब प्राणियों को सुखी करके उपकार को उत्पन्न करते हैं, वैसे पढ़ाने और उपदेश करनेहारे सब सत्य विद्या और अच्छी शिक्षा को प्राप्त कराके सबको इष्ट सुख से युक्त किया करें॥२५॥इस सूक्त में सूर्य पृथिवी आदि के गुणों और सभा सेना के अध्यक्षों के कर्त्तव्यों तथा उनके किये परोपकारादि कर्मों का वर्णन किया है, इससे इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सैंतीसवाँ वर्ग और एकसौ बारहवाँ सूक्त पूरा हुआ॥। इस अध्याय में दिन, रात्रि, अग्नि और विद्वान् आदि के गुणों के वर्णन से इस सप्तमाध्याय में कहे अर्थों की षष्ठाध्याय में कहे अर्थों के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥

इ॒दं श्रेष्ठं॒ ज्योति॑षां॒ ज्योति॒रागा॑च्चि॒त्रः प्र॑के॒तो अ॑जनिष्ट॒ विभ्वा॑। यथा॒ प्रसू॑ता सवि॒तुः स॒वायँ॑ ए॒वा रात्र्यु॒षसे॒ योनि॑मारैक्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्योदय को प्राप्त होकर अन्धकार नष्ट हो जाता है, वैसे ही ब्रह्मज्ञान को प्राप्त होकर दुःख दूर हो जाता है। इससे सब मनुष्यों को योग्य है कि परमेश्वर को जानने के लिये प्रयत्न किया करें॥१॥

रुश॑द्वत्सा॒ रुश॑ती श्वे॒त्यागा॒दारै॑गु कृ॒ष्णा सद॑नान्यस्याः। स॒मा॒नब॑न्धू अ॒मृते॑ अनू॒ची द्यावा॒ वर्णं॑ चरत आमिना॒ने॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जिस स्थान में रात्री वसती है, उसी स्थान में कालान्तर में उषा भी वसती है। इन दोनों से उत्पन्न हुआ सूर्य्य जानों दोनों माताओं से उत्पन्न हुए लड़के के समान है और ये दोनों सदा बन्धु के समान जाने-आनेवाली उषा और रात्रि हैं, ऐसा तुम लोग जानो॥२॥

स॒मा॒नो अध्वा॒ स्वस्रो॑रन॒न्तस्तम॒न्यान्या॑ चरतो दे॒वशि॑ष्टे। न मे॑थेते॒ न त॑स्थतुः सु॒मेके॒ नक्तो॒षासा॒ सम॑नसा॒ विरू॑पे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विरुद्ध स्वरूपवाले मित्र लोग इस निःसीम अनन्त आकाश में न्यायाधीश के नियम के साथ ही नित्य वर्त्तते हैं, वैसे रात्रि और दिन परमेश्वर के नियम से नियत होकर वर्त्तते हैं॥३॥

भास्व॑ती ने॒त्री सू॒नृता॑ना॒मचे॑ति चि॒त्रा वि दुरो॑ न आवः। प्रार्प्या॒ जग॒द्व्यु॑ नो रा॒यो अ॑ख्यदु॒षा अ॑जीग॒र्भुव॑नानि॒ विश्वा॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो उषा सब जगत् को प्रकाशित करके, सब प्राणियों को जगा, सब संसार में व्याप्त होकर, सब पदार्थों को वृष्टि द्वारा समर्थ करके, पुरुषार्थ में प्रवृत्त करा, धनादि की प्राप्ति करा, माता के समान सब प्राणियों को पालती है, इससे आलस्य में उत्तम प्रातःसमय की वेला व्यर्थ न गमाना चाहिये॥४॥

जि॒ह्म॒श्ये॒३॒॑चरि॑तवे म॒घोन्या॑भो॒गय॑ इ॒ष्टये॑ रा॒य उ॑ त्वम्। द॒भ्रं पश्य॑द्भ्य उर्वि॒या वि॒चक्ष॑ उ॒षा अ॑जीग॒र्भुव॑नानि॒ विश्वा॑॥

जो मनुष्य रात्री के चौथे प्रहर में जागकर शयन पर्य्यन्त व्यर्थ समय को नहीं जाने देते, वे ही सुखी होते हैं, अन्य नहीं॥५॥

क्ष॒त्राय॑ त्वं॒ श्रव॑से त्वं मही॒या इ॒ष्टये॑ त्व॒मर्थ॑मिव त्वमि॒त्यै। विस॑दृशा जीवि॒ताभि॑प्र॒चक्ष॑ उ॒षा अ॑जीग॒र्भुव॑नानि॒ विश्वा॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्या विनय से प्रकाशमान सत्पुरुष सब समीपस्थ पदार्थों को व्याप्त होकर उनके गुणों के प्रकाश से समस्त अर्थों को सिद्ध करनेवाले होते हैं, वैसे राजादि पुरुष विद्या न्याय और धर्मादि को सब ओर से व्याप्त होकर चक्रवर्त्ती राज्य की यथावत् रक्षा से सब आनन्द को सिद्ध करें॥६॥

ए॒षा दि॒वो दु॑हि॒ता प्रत्य॑दर्शि व्यु॒च्छन्ती॑ युव॒तिः शु॒क्रवा॑साः। विश्व॒स्येशा॑ना॒ पार्थि॑वस्य॒ वस्व॒ उषो॑ अ॒द्येह सु॑भगे॒ व्यु॑च्छ॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जब ब्रह्मचर्य किया हुआ सन्मार्गस्थ ज्वान विद्वान् पुरुष अपने तुल्य, अपने विद्यायुक्त, ब्रह्मचारिणी, सुन्दर रूप, बल, पराक्रमवाली, साध्वी अच्छे स्वभावयुक्त सुख देनेहारी, युवति अर्थात् बीसवें वर्ष से चौबीसवें वर्ष की आयु युक्त कन्या से विवाह करे, तभी विवाहित स्त्री-पुरुष उषा के समान सुप्रकाशित होकर सब सुखों को प्राप्त होवें॥७॥

प॒रा॒य॒ती॒नामन्वे॑ति॒ पाथ॑ आयती॒नां प्र॑थ॒मा शश्व॑तीनाम्। व्यु॒च्छन्ती॑ जी॒वमु॑दी॒रय॑न्त्यु॒षा मृ॒तं कं च॒न बो॒धय॑न्ती॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कर है। सौभाग्य की इच्छा करनेवाली स्त्रीजन उषा के तुल्य भूत, भविष्यत्, वर्त्तमान समयों में हुई उत्तम शील पतिव्रता स्त्रियों के सनातन वेदोक्त धर्म का आश्रय कर अपने-अपने पति को सुखी करती और उत्तम शोभावाली होती हुई सन्तानों को उत्पन्न कर और सब ओर से पालन करके उन्हें सत्य विद्या और उत्तम शिक्षाओं का बोध कराती हुई सदा आनन्द को प्राप्त करावें॥८॥

उषो॒ यद॒ग्निं स॒मिधे॑ च॒कर्थ॒ वि यदाव॒श्चक्ष॑सा॒ सूर्य॑स्य। यन्मानु॑षान्य॒क्ष्यमा॑णाँ॒ अजी॑ग॒स्तद्दे॒वेषु॑ चकृषे भ॒द्रमप्नः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य की संबन्धिनी प्रातःकाल की वेला सब प्राणियों के साथ संयुक्त होकर सब जीवों को सुखी करती है, वैसे सज्जन विदुषी स्त्री अपने पतियों को प्रसन्न करती हुईं उत्तम सन्तानों के उत्पन्न करने को समर्थ होती हैं, इतर दुष्ट भार्य्या वैसा काम नहीं कर सकतीं॥९॥

किया॒त्या यत्स॒मया॒ भवा॑ति॒ या व्यू॒षुर्याश्च॑ नू॒नं व्यु॒च्छान्। अनु॒ पूर्वाः॑ कृपते वावशा॒ना प्र॒दीध्या॑ना॒ जोष॑म॒न्याभि॑रेति॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है।  (प्रश्न−) कितने समय तक उषःकाल होता है ? (उत्तर−) सूर्य्योदय से पूर्व पाँच घड़ी उषःकाल होता है। (प्रश्न−) कौन स्त्री सुख को प्राप्त होती है ? (उत्तर−) जो अन्य विदुषी स्त्रियों और अपने पतियों के साथ सदा अनुकूल रहती हैं, और वे स्त्री प्रशंसा को भी प्राप्त होती हैं, जो कृपालु होती हैं, वे स्त्री पतियों को प्रसन्न करती हैं, जो पतियों के अनुकूल वर्त्तती हैं, वे सदा सुखी रहती हैं॥१०॥

ई॒युष्टे ये पूर्व॑तरा॒मप॑श्यन्व्यु॒च्छन्ती॑मु॒षसं॒ मर्त्या॑सः। अ॒स्माभि॑रू॒ नु प्र॑ति॒चक्ष्या॑भू॒दो ते य॑न्ति॒ ये अ॑प॒रीषु॒ पश्या॑न्॥

जो मनुष्य उषा के पहिले शयन से उठ आवश्यक कर्म करके परमेश्वर का ध्यान करते हैं, वे बुद्धिमान् और धार्मिक होते हैं। जो स्त्री-पुरुष परमेश्वर का ध्यान करके प्रीति से आपस में बोलते-चालते हैं, वे अनेकविध सुखों को प्राप्त होते हैं॥११॥

या॒व॒यद्द्वे॑षा ऋत॒पा ऋ॑ते॒जाः सु॑म्ना॒वरी॑ सू॒नृता॑ ई॒रय॑न्ती। सु॒म॒ङ्ग॒लीर्बिभ्र॑ती दे॒ववी॑तिमि॒हाद्योषः॒ श्रेष्ठ॑तमा॒ व्यु॑च्छ॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रभात वेला अन्धकार का निवारण, प्रकाश का प्रादुर्भाव करा, धार्मिकों को सुखी और चोरादि को पीड़ित करके सब प्राणियों को आनन्दित करती है, वैसे ही विद्या, धर्म, प्रकाशवती शमादि गुणों से युक्त, विदुषी, उत्तम स्त्री अपने पतियों से सन्तानोत्पत्ति करके अच्छी शिक्षा से अविद्यान्धकार को छुड़ा विद्यारूप सूर्य को प्राप्त करा कुल को सुभूषित करें॥१२॥

शश्व॑त्पु॒रोषा व्यु॑वास दे॒व्यथो॑ अ॒द्येदं व्या॑वो म॒घोनी॑। अथो॒ व्यु॑च्छा॒दुत्त॑राँ॒ अनु॒ द्यून॒जरा॒मृता॑ चरति स्व॒धाभिः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे स्त्रि! जैसे प्रभात वेला कारण और प्रवाहरूप से नित्य हुई तीनों कालों में प्रकाश करने योग्य पदार्थों का प्रकाश करके वर्त्तमान रहती है, वैसे आत्मपन से नित्यस्वरूप तू तीनों कालों में स्थित सत्य व्यवहारों को विद्या और सुशिक्षा से प्रकाश करके पुत्र, पौत्र ऐश्वर्यादि सौभाग्ययुक्त होके सदा सुखी हो॥१३॥

व्य१॒॑ञ्जिभि॑र्दि॒व आता॑स्वद्यौ॒दप॑ कृ॒ष्णां नि॒र्णिजं॑ दे॒व्या॑वः। प्र॒बो॒धय॑न्त्यरु॒णेभि॒रश्वै॒रोषा या॑ति सु॒युजा॒ रथे॑न॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रातःसमय की वेला दिशाओं में व्याप्त है, वैसे कन्या लोग विद्याओं में व्याप्त होवें, वा जैसे यह उषा अपनी कान्तियों से शोभायमान होकर रमणीय स्वरूप से प्रकाशमान रहती है, वैसे यह कन्याजन अपने शील आदि गुण और सुन्दर रूप से प्रकाशमान हों, जैसे यह उषा अन्धकार के निवारणरूप प्रकाश को उत्पन्न करती है, वैसे ये कन्याजन मूर्खता आदि का निवारण कर सुसभ्यतादि शुभ गुणों से सदा प्रकाशित रहें॥१४॥

आ॒वह॑न्ती॒ पोष्या॒ वार्या॑णि चि॒त्रं के॒तुं कृ॑णुते॒ चेकि॑ताना। ई॒युषी॑णामुप॒मा शश्व॑तीनां विभाती॒नां प्र॑थ॒मोषा व्य॑श्वैत्॥

हे मनुष्यो! तुम लोग यह निश्चित जानो कि जैसे प्रातःकाल से आरम्भ करके कर्म उत्पन्न होते हैं, वैसे स्त्रियों के आरम्भ से घर के कर्म हुआ करते हैं॥१५॥

उदी॑र्ध्वं जी॒वो असु॑र्न॒ आगा॒दप॒ प्रागा॒त्तम॒ आ ज्योति॑रेति। आरै॒क्पन्थां॒ यात॑वे॒ सूर्या॒याग॑न्म॒ यत्र॑ प्रति॒रन्त॒ आयुः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे यह प्रातःकाल की उषा सब प्राणियों को जगाती, अन्धकार को निवृत्त करती है। और जैसे सांयकाल की उषा सबको कार्य्यों से निवृत्त करके सुलाती है अर्थात् माता के समान सब जीवों को अच्छे प्रकार पालन कर व्यवहार में नियुक्त कर देती है, वैसे ही सज्जन विदुषी स्त्री होती है॥१६॥

स्यूम॑ना वा॒च उदि॑यर्ति॒ वह्निः॒ स्तवा॑नो रे॒भ उ॒षसो॑ विभा॒तीः। अ॒द्या तदु॑च्छ गृण॒ते म॑घोन्य॒स्मे आयु॒र्नि दि॑दीहि प्र॒जाव॑त्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जब स्त्री-पुरुष सुहृद्भाव से परस्पर विद्या और अच्छी शिक्षाओं को ग्रहण कर उत्तम अन्न, धनादि वस्तुओं का संचय करके सूर्य के समान धर्म न्याय का प्रकाश कर सुख में निवास करते हैं, तभी गृहाश्रम के पूर्ण सुख को प्राप्त होते हैं॥१७॥

या गोम॑तीरु॒षसः॒ सर्व॑वीरा व्यु॒च्छन्ति॑ दा॒शुषे॒ मर्त्या॑य। वा॒योरि॑व सू॒नृता॑नामुद॒र्के ता अ॑श्व॒दा अ॑श्नवत्सोम॒सुत्वा॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। ब्रह्मचारी लोगों को योग्य है कि समावर्त्तन के पश्चात् अपने सदृश विद्या, उत्तम शीलता, रूप और सुन्दरता से सम्पन्न हृदय को प्रिय, प्रभात वेला के समान, प्रशंसित, ब्रह्मचारिणी कन्याओं से विवाह करके गृहाश्रम में पूर्ण सुख करें॥१८॥

मा॒ता दे॒वाना॒मदि॑ते॒रनी॑कं य॒ज्ञस्य॑ के॒तुर्बृ॑ह॒ती वि भा॑हि। प्र॒श॒स्ति॒कृद्ब्रह्म॑णे नो॒ व्यु१॒॑च्छा नो॒ जने॑ जनय विश्ववारे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सत्पुरुष को योग्य है कि उत्तम विदुषी स्त्री के साथ विवाह करे जिससे अच्छे सन्तान हों और ऐश्वर्य नित्य बढ़ा करें क्योंकि स्त्रीसंबन्ध से उत्पन्न हुए दुःखों के तुल्य इस संसार में कुछ भी बड़ा कष्ट नहीं है, उससे पुरुष सुलक्षणा स्त्री की परीक्षा करके पाणिग्रहण करे और स्त्री को भी योग्य है कि अतीव हृदय के प्रिय प्रशंसित रूप गुणवाले पुरुष ही का पाणिग्रहण करे॥१९॥

यच्चि॒त्रमप्न॑ उ॒षसो॒ वह॑न्तीजा॒नाय॑ शशमा॒नाय॑ भ॒द्रम्। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। श्रेष्ठ विद्वान् ही सन्तानों को उत्पन्न अच्छे प्रकार रक्षित और उनको अच्छी शिक्षा करके उनके बढ़ाने को समर्थ होते हैं। जो पुरुष स्त्रियों और जो स्त्री पुरुषों का सत्कार करती हैं, उनके कुल में सब सुख निवास करते हैं और दुःख भाग जाते हैं॥२०॥इस सूक्त में रात्रि और प्रभात समय के गुणों का वर्णन और इनके दृष्टान्त से स्त्री-पुरुषों के कर्त्तव्य कर्म का उपदेश किया है। इससे इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त से कहे अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह ११३ एक सौ तेरहवाँ सूक्त और ४ चौथा वर्ग समाप्त हुआ॥

इ॒मा रु॒द्राय॑ त॒वसे॑ कप॒र्दिने॑ क्ष॒यद्वी॑राय॒ प्र भ॑रामहे म॒तीः। यथा॒ शमस॑द्द्वि॒पदे॒ चतु॑ष्पदे॒ विश्वं॑ पु॒ष्टं ग्रामे॑ अ॒स्मिन्न॑नातु॒रम्॥

अत्रोपमालङ्कारः। जब आप्त, सत्यवादी, धर्मात्मा, वेदों के ज्ञाता, पढ़ाने और उपदेश करनेहारे विद्वान्, तथा पढ़ाने और उपदेश करनेहारी स्त्री, उत्तम शिक्षा से ब्रह्मचारी और श्रोता पुरुषों तथा ब्रह्मचारिणी और सुननेहारी स्त्रियों को विद्यायुक्त करते हैं, तभी ये लोग शरीर और आत्मा के बल को प्राप्त होकर सब संसार को सुखी कर देते हैं॥१॥

मृ॒ळा नो॑ रुद्रो॒त नो॒ मय॑स्कृधि क्ष॒यद्वी॑राय॒ नम॑सा विधेम ते। यच्छं च॒ योश्च॒ मनु॑राये॒जे पि॒ता तद॑श्याम॒ तव॑ रुद्र॒ प्रणी॑तिषु॥

राजपुरुषों को योग्य है कि स्वयं सुखी होकर सब प्रजाओं को सुखी करें। इस काम में आलस्य कभी न करें और प्रजाजन राजनीति के नियम में वर्त्त के राजपुरुषों को सदा प्रसन्न रक्खें॥२॥

अ॒श्याम॑ ते सुम॒तिं दे॑वय॒ज्यया॑ क्ष॒यद्वी॑रस्य॒ तव॑ रुद्र मीढ्वः। सु॒म्ना॒यन्निद्विशो॑ अ॒स्माक॒मा च॒रारि॑ष्टवीरा जुहवाम ते ह॒विः॥

राजा को योग्य है कि प्रजाओं को निरन्तर प्रसन्न रक्खे और प्रजाओं को उचित है कि राजा को आनन्दित करें। जो राजा प्रजा से कर लेकर पालन न करे तो वह राजा डाकुओं के समान जानना चाहिये। जो पालन की हुई प्रजा राजभक्त न हों वे भी चोर के तुल्य जाननी चाहिये, इसलिये प्रजा राजा को कर देती है कि जिससे यह हमारा पालन करे और राजा इसलिये पालन करता है कि जिससे प्रजा मुझको कर देवें॥३॥

त्वे॒षं व॒यं रु॒द्रं य॑ज्ञ॒साधं॑ व॒ङ्कुं क॒विमव॑से॒ नि ह्व॑यामहे। आ॒रे अ॒स्मद्दैव्यं॒ हेळो॑ अस्यतु सुम॒तिमिद्व॒यम॒स्या वृ॑णीमहे॥

जैसे प्रजाजन राजा की आज्ञा को स्वीकार करते हैं, वैसे राजपुरुष भी प्रजा की आज्ञा को माना करें॥४॥

दि॒वो व॑रा॒हम॑रु॒षं क॑प॒र्दिनं॑ त्वे॒षं रू॒पं नम॑सा॒ नि ह्व॑यामहे। हस्ते॒ बिभ्र॑द्भेष॒जा वार्या॑णि॒ शर्म॒ वर्म॑ च्छ॒र्दिर॒स्मभ्यं॑ यंसत्॥

जो मनुष्य वैद्य के मित्र पथ्यकारी जितेन्द्रिय उत्तम शीलवाले होते हैं, वे ही इस जगत् में रोगरहित और राज्यादि को प्राप्त होकर सुख को बढ़ाते हैं॥५॥

इ॒दं पि॒त्रे म॒रुता॑मुच्यते॒ वचः॑ स्वा॒दोः स्वादी॑यो रु॒द्राय॒ वर्ध॑नम्। रास्वा॑ च नो अमृत मर्त॒भोज॑नं॒ त्मने॑ तो॒काय॒ तन॑याय मृळ॥

वैद्य और उपदेश करनेवाले को यह योग्य है कि आप नीरोग और सत्याचारी होकर सब मनुष्यों के लिये औषध देने और उपदेश करने से उपकार कर सबकी निरन्तर रक्षा करें॥६॥

मा नो॑ म॒हान्त॑मु॒त मा नो॑ अर्भ॒कं मा न॒ उक्ष॑न्तमु॒त मा न॑ उक्षि॒तम्। मा नो॑ बधीः पि॒तरं॒ मोत मा॒तरं॒ मा नः॑ प्रि॒यास्त॒न्वो॑ रुद्र रीरिषः॥

हे मनुष्यो! जैसे ईश्वर पक्षपात को छोड़ के धार्मिक सज्जनों को उत्तम कर्मों के फल देने से सुख देता और पापियों को पाप का फल देने से पीड़ा देता है, वैसे ही तुम लोग भी अच्छा यत्न करो॥७॥

मा न॑स्तो॒के तन॑ये॒ मा न॑ आ॒यौ मा नो॒ गोषु॒ मा नो॒ अश्वे॑षु रीरिषः। वी॒रान्मा नो॑ रुद्र भामि॒तो व॑धीर्ह॒विष्म॑न्तः॒ सद॒मित्त्वा॑ हवामहे॥

क्रोध को प्राप्त हुए सज्जन राजपुरुषों को किसी का अन्याय से हनन न करना चाहिये और गौ आदि पशुओं की सदा रक्षा करनी चाहिये। प्रजाजनों को भी राजा के आश्रय से ही निरन्तर आनन्द करना चाहिये और सबों को मिलकर ईश्वर की ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये कि हे परमेश्वर! आपकी कृपा से हम लोग बाल्यावस्था में विवाह आदि बुरे काम करके पुत्रादिकों का विनाश कभी न करें और वे पुत्र आदि भी हम लोगों के विरुद्ध काम को न करें तथा संसार का उपकार करने हारे गौ आदि पशुओं का कभी विनाश न करें॥८॥

उप॑ ते॒ स्तोमा॑न्पशु॒पा इ॒वाक॑रं॒ रास्वा॑ पितर्मरुतां सु॒म्नम॒स्मे। भ॒द्रा हि ते॑ सुम॒तिर्मृ॑ळ॒यत्त॒माथा॑ व॒यमव॒ इत्ते॑ वृणीमहे॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। प्रजापुरुष राजपुरुषों से राजनीति और राजपुरुष प्रजापुरुषों से प्रजाव्यवहार को जान, जानने योग्य को जाने हुए सनातन धर्म का आश्रय करें॥९॥

आ॒रे ते॑ गो॒घ्नमु॒त पू॑रुष॒घ्नं क्षय॑द्वीर सु॒म्नम॒स्मे ते॑ अस्तु। मृ॒ळा च॑ नो॒ अधि॑ च ब्रूहि दे॒वाधा॑ च नः॒ शर्म॑ यच्छ द्वि॒बर्हाः॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि यत्न के साथ पशु और मनुष्यों के विनाश करनेहारे दुराचारियों से दूर रहें और अपने से उनका दूर निवास करावें। राजा और प्रजाजनों को परस्पर एक दूसरे से उपदेश कर सभा बना और सबकी रक्षा कर व्यवहार और परमार्थ का सुख सिद्ध करना चाहिये॥१०॥

अवो॑चाम॒ नमो॑ अस्मा अव॒स्यवः॑ शृ॒णोतु॑ नो॒ हवं॑ रु॒द्रो म॒रुत्वा॑न्। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥

प्रजापुरुषों को राजा लोगों के प्रिय आचरण नित्य करने चाहिये और राजा लोगों को प्रजाजनों के कहे वाक्य सुनने योग्य हैं। ऐसे सब राजा-प्रजा मिलकर न्याय की उन्नति और अन्याय को दूर करें॥११॥इस सूक्त में ब्रह्मचारी, विद्वान्, सभाध्यक्ष और सभासद् आदि गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त में कहे अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ एकता जानने योग्य है॥यह ११४ एकसौ चौदहवाँ सूक्त और ६ छठा वर्ग समाप्त हुआ॥११॥

चि॒त्रं दे॒वाना॒मुद॑गा॒दनी॑कं॒ चक्षु॑र्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्या॒ग्नेः। आप्रा॒ द्यावा॑पृथि॒वी अ॒न्तरि॑क्षं॒ सूर्य॑ आ॒त्मा जग॑तस्त॒स्थुष॑श्च॥

जो देखने योग्य परिमाणवाला पदार्थ है वह परमात्मा होने को योग्य नहीं। न कोई भी उस अव्यक्त सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर के विना समस्त जगत् को उत्पन्न कर सकता है और न कोई सर्वव्यापक, सच्चिदानन्दस्वरूप, अनन्त, अन्तर्यामी, चराचर जगत् के आत्मा परमेश्वर के विना संसार के धारण करने, जीवों को पाप और पुण्यों को साक्षीपन और उनके अनुसार जीवों को सुख-दुःख रूप फल देने को योग्य है। न इस परमेश्वर की उपासना के विना धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के पाने को कोई जीव समर्थ होता है, इससे यही परमेश्वर उपासना करने योग्य इष्टदेव सबको मानना चाहिये॥१॥

सूर्यो॑ दे॒वीमु॒षसं॒ रोच॑मानां॒ मर्यो॒ न योषा॑म॒भ्ये॑ति प॒श्चात्। यत्रा॒ नरो॑ देव॒यन्तो॑ यु॒गानि॑ वितन्व॒ते प्रति॑ भ॒द्राय॑ भ॒द्रम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वानो! तुम लोगों से जिस ईश्वर ने सूर्य्य को बनाकर प्रत्येक ब्रह्माण्ड में स्थापन किया, उसके आश्रय से गणित आदि समस्त व्यवहार सिद्ध होते हैं, वह ईश्वर क्यों न सेवन किया जाय॥२॥

भ॒द्रा अश्वा॑ ह॒रितः॒ सूर्य॑स्य चि॒त्रा एत॑ग्वा अनु॒माद्या॑सः। न॒म॒स्यन्तो॑ दि॒व आ पृ॒ष्ठम॑स्थुः॒ परि॒ द्यावा॑पृथि॒वी य॑न्ति स॒द्यः॥

मनुष्यों को योग्य है कि श्रेष्ठ पढ़ानेवाले शास्त्रवेत्ता विद्वानों को प्राप्त हो, उनका सत्कार कर, उनसे विद्या पढ़, गणित आदि क्रियाओं की चतुराई को ग्रहण कर, सूर्यसम्बन्धी व्यवहारों का अनुष्ठान कर कार्यसिद्धि करें॥३॥

तत्सूर्य॑स्य देव॒त्वं तन्म॑हि॒त्वं म॒ध्या कर्तो॒र्वित॑तं॒ सं ज॑भार। य॒देदयु॑क्त ह॒रितः॑ स॒धस्था॒दाद्रात्री॒ वास॑स्तनुते सि॒मस्मै॑॥

हे सज्जनो! यद्यपि सूर्य्य आकर्षण से पृथिवी आदि पदार्थों का धारण करता है, पृथिवी आदि लोकों से बड़ा भी वर्त्तमान है। संसार का प्रकाश कर व्यवहार भी कराता है तो भी यह सूर्य्य परमेश्वर के उत्पादन, धारण और आकर्षण आदि गुणों के विना उत्पन्न होने, स्थिर रहने और पदार्थों का आकर्षण करने को समर्थ नहीं हो सकता। न इस ईश्वर के विना ऐसे-ऐसे लोक-लोकान्तरों की रचना, धारणा और इनके प्रलय करने को कोई समर्थ होता है॥४॥

तन्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्याभि॒चक्षे॒ सूर्यो॑ रू॒पं कृ॑णुते॒ द्योरु॒पस्थे॑। अ॒न॒न्तम॒न्यद्रुश॑दस्य॒ पाजः॑ कृ॒ष्णम॒न्यद्ध॒रितः॒ सं भ॑रन्ति॥

जिसके सामर्थ्य से रूप, दिन और रात्रि की प्राप्ति का निमित्त सूर्य श्वेत-कृष्ण रूप के विभाग से दिन-रात्रि को उत्पन्न करता है, उस अनन्त परमेश्वर को छोड़कर किसी और की उपासना मनुष्य नहीं करें, यह विद्वानों को निरन्तर उपदेश करना चाहिये॥५॥

अ॒द्या दे॑वा॒ उदि॑ता॒ सूर्य॑स्य॒ निरंह॑सः पिपृ॒ता निर॑व॒द्यात्। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥

मनुष्यों को चाहिये कि पाप से दूर रह धर्म का आचरण और जगदीश्वर की उपासना कर शान्ति के साथ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की परिपूर्ण सिद्धि करें॥६॥इस सूक्त में सूर्य शब्द से ईश्वर और सूर्य्यलोक के अर्थ का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ एकता है, यह जानना चाहिये॥यह १ मण्डल में १६ वाँ अनुवाक ११५ वाँ सूक्त और ७ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥इस सूक्त में सूर्य शब्द से ईश्वर और सूर्य्यलोक के अर्थ का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ एकता है, यह जानना चाहिये॥यह १ मण्डल में १६ वाँ अनुवाक ११५ वाँ सूक्त और ७ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

नास॑त्याभ्यां ब॒र्हिरि॑व॒ प्र वृ॑ञ्जे॒ स्तोमाँ॑ इयर्म्य॒भ्रिये॑व॒ वातः॑। यावर्भ॑गाय विम॒दाय॑ जा॒यां से॑ना॒जुवा॑ न्यू॒हतू॒ रथे॑न॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। रथ आदि यानों में उपकारी किए पृथिवी विकार, जल और अग्नि आदि पदार्थ क्या-क्या अद्भुत कार्यों को सिद्ध नहीं करते हैं ?॥१॥

वी॒ळु॒पत्म॑भिराशु॒हेम॑भिर्वा दे॒वानां॑ वा जू॒तिभिः॒ शाश॑दाना। तद्रास॑भो नासत्या स॒हस्र॑मा॒जा य॒मस्य॑ प्र॒धने॑ जिगाय॥

जैसे अग्नि वा जल वन वा पृथिवी को प्रवेश कर उसको जलाता वा छिन्न-भिन्न करता है, वैसे अत्यन्त वेग करनेहारे बिजुली आदि पदार्थों से किये हुए शस्त्र और अस्त्रों से शत्रु जन जीतने चाहिये॥२॥

तुग्रो॑ ह भु॒ज्युम॑श्विनोदमे॒घे र॒यिं न कश्चि॑न्ममृ॒वाँ अवा॑हाः। तमू॑हथुर्नौ॒भिरा॑त्म॒न्वती॑भिरन्तरिक्ष॒प्रुद्भि॒रपो॑दकाभिः॥

जैसे कोई मरण चाहता हुआ मनुष्य धन, पुत्र आदि के मोह से छूट के शरीर से निकल जाता है, वैसे युद्ध चाहते हुए शूरों को अनुभव करना चाहिए। जब मनुष्य पृथिवी के किसी भाग से किसी भाग को समुद्र से उतरकर शत्रुओं के जीतने को जाया चाहें तब पुष्ट बड़ी-बड़ी कि जिनमें भीतर जल न जाता हो और जिनमें आत्मज्ञानी विचारवाले पुरुष बैठे हों और जो शस्त्र-अस्त्र आदि युद्ध की सामग्री से शोभित हों, उन नावों के साथ जावें॥३॥

ति॒स्रः क्षप॒स्त्रिरहा॑ति॒व्रज॑द्भि॒र्नास॑त्या भु॒ज्युमू॑हथुः पत॒ङ्गैः। स॒मु॒द्रस्य॒ धन्व॑न्ना॒र्द्रस्य॑ पा॒रे त्रि॒भी रथैः॑ श॒तप॑द्भिः॒ षळ॑श्वैः॥

आश्चर्य इस बात का है कि मनुष्य जो तीन दिन-रात में समुद्र आदि स्थानों के अवार-पार जावें-आवेंगे तो कुछ भी सुख दुर्लभ रहेगा! किन्तु कुछ भी नहीं॥४॥

अ॒ना॒र॒म्भ॒णे तद॑वीरयेथामनास्था॒ने अ॑ग्रभ॒णे स॑मु॒द्रे। यद॑श्विना ऊ॒हथु॑र्भु॒ज्युमस्तं॑ श॒तारि॑त्रां॒ नाव॑मातस्थि॒वांस॑म्॥

राजपुरुषों को चाहिये कि निरालम्ब मार्ग में अर्थात् जिसमें कुछ ठहरने का स्थान नहीं है वहां विमान आदि यानों से ही जावें। जबतक युद्ध में लड़नेवाले वीरों की जैसी चाहिये वैसी रक्षा न की जाय तबतक शत्रु जीते नहीं जा सकते, जिसमें सौ वल्ली विद्यमान हैं वह बड़े फैलाव की नाव बनाई जा सकती है। इस मन्त्र में शत शब्द असंख्यातयाची भी लिया जा सकता है, इससे अतिदीर्घ नौका का बनाना इस मन्त्र में जाना जाता है। मनुष्य जितनी बड़ी नौका बना सकते हैं, उतनी बड़ी बनानी चाहिये। इस प्रकार शीघ्र जानेवाला पुरुष भूमि और अन्तरिक्ष में जाने-आने के लिये यानों को बनावे॥५॥

यम॑श्विना द॒दथुः॑ श्वे॒तमश्व॑म॒घाश्वा॑य॒ शश्व॒दित्स्व॒स्ति। तद्वां॑ दा॒त्रं महि॑ की॒र्तेन्यं॑ भूत्पै॒द्वो वा॒जी सद॒मिद्धव्यो॑ अ॒र्यः॥

जो सभा और सेना के अधिपति वणियों (=वणिकों) की भली-भाँति रक्षा कर रथ आदि यानों में बैठाकर द्वीप-द्वीपान्तर में पहुँचावें, वे बहुत धनयुक्त होकर निरन्तर सुखी होते हैं॥६॥

यु॒वं न॑रा स्तुव॒ते प॑ज्रि॒याय॑ क॒क्षीव॑ते अरदतं॒ पुर॑न्धिम्। का॒रो॒त॒राच्छ॒फादश्व॑स्य॒ वृष्णः॑ श॒तं कु॒म्भाँ अ॑सिञ्चतं॒ सुरा॑याः॥

जो शस्त्रवेत्ता अध्यापक विद्वान् जिस शान्तिपूर्वक इन्द्रियों को विषयों से रोकने आदि गुणों से युक्त सज्जन विद्यार्थी के लिये शिल्पकार्य्य अर्थात् कारीगरी सिखाने को हाथ की चतुराईयुक्त बुद्धि उत्पन्न कराते अर्थात् सिखाते हैं वह प्रशंसायुक्त शिल्पी अर्थात् कारीगर होकर रथ आदि को बना सकता है। शिल्पीजन जिस यान अर्थात् उत्तम विमान आदि रथ में जलघर से जल सींच और नीचे आग जलाकर भाफों से उसे चलाते हैं, उससे वे घोड़े से जैसे वैसे बिजुली आदि पदार्थों से शीघ्र एक देश से दूसरे देश को जा सकते हैं॥७॥

हि॒मेना॒ग्निं घ्रं॒सम॑वारयेथां पितु॒मती॒मूर्ज॑मस्मा अधत्तम्। ऋ॒बीसे॒ अत्रि॑मश्वि॒नाव॑नीत॒मुन्नि॑न्यथुः॒ सर्व॑गणं स्व॒स्ति॥

विद्वानों को चाहिये कि इस संसार के सुख के लिये यज्ञ से शोधे हुए जल से और वनों के रखने से अति उष्णता (खुश्की) दूर करें। अच्छे बनाए हुए अन्न से बल उत्पन्न करें और यज्ञ के आचरण से तीन प्रकार के दुःख को निवार के सुख को उन्नति देवें॥८॥

परा॑व॒तं ना॑सत्यानुदेथामु॒च्चाबु॑ध्नं चक्रथुर्जि॒ह्मवा॑रम्। क्षर॒न्नापो॒ न पा॒यना॑य रा॒ये स॒हस्रा॑य॒ तृष्य॑ते॒ गोत॑मस्य॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। शिल्पी लोगों को विमानादि यानों में जिसमें बहुत मीठे जल की धार मावे ऐसे कुण्ड को बना, आग से उस विमान आदि यान को चला, उसमें सामग्री को धर, एक देश से दूसरे देश को जाय और असंख्यात धन पाय के परोपकार का सेवन करना चाहिये॥९॥

जु॒जु॒रुषो॑ नासत्यो॒त व॒व्रिं प्रामु॑ञ्चतं द्रा॒पिमि॑व॒ च्यवा॑नात्। प्राति॑रतं जहि॒तस्यायु॑र्द॒स्रादित्पति॑मकृणुतं क॒नीना॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजपुरुष और उपदेश करनेवालों को देनेवालों का दुःख दूर करना चाहिये, विद्याओं में प्रवृत्ति करते हुए कुमार और कुमारियों की रक्षा कर विद्या और अच्छी शिक्षा उनको दिलवाना चाहिये। बालकपन में अर्थात् पच्चीस वर्ष के भीतर पुरुष और सोलह वर्ष के भीतर स्त्री के विवाह को रोक, इसके उपरान्त अड़तालीस वर्ष पर्य्यन्त पुरुष और चौबीस वर्ष पर्यन्त स्त्री का स्वयंवर विवाह कराकर सबके आत्मा और शरीर के बल को पूर्ण करना चाहिये॥१०॥

तद्वां॑ नरा॒ शंस्यं॒ राध्यं॑ चाभिष्टि॒मन्ना॑सत्या॒ वरू॑थम्। यद्वि॒द्वांसा॑ नि॒धिमि॒वाप॑गूळ्ह॒मुद्द॑र्श॒तादू॒पथु॒र्वन्द॑नाय॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! विद्यानिधि के परे सुख देनेवाला धन कोई भी तुम मत जानो। न इस कर्म के विना चाहे हुए संतान और सुख मिल सकते हैं और न सत्यासत्य के विचार से निर्णीत ज्ञान के विना विद्या की वृद्धि होती है, यह जानो॥११॥

तद्वां॑ नरा स॒नये॒ दंस॑ उ॒ग्रमा॒विष्कृ॑णोमि तन्य॒तुर्न वृ॒ष्टिम्। द॒ध्यङ्ह॒ यन्मध्वा॑थर्व॒णो वा॒मश्व॑स्य शी॒र्ष्णा प्र यदी॑मु॒वाच॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे वृष्टि के विना किसी को भी सुख नहीं होता है, वैसे विद्वानों और विद्या के विना सुख और बुद्धि बढ़ना और इसके विना धर्म आदि पदार्थ नहीं सिद्ध होते हैं, इससे इस कर्म का अनुष्ठान मनुष्यों को सदा करना चाहिये॥१२॥

अजो॑हवीन्नासत्या क॒रा वां॑ म॒हे याम॑न्पुरुभुजा॒ पुर॑न्धिः। श्रु॒तं तच्छासु॑रिव वध्रिम॒त्या हिर॑ण्यहस्तमश्विनावदत्तम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वानो जैसे विद्वान् जन विदुषी स्त्री का पाणिग्रहण कर गृहाश्रम के व्यवहार को सिद्ध करे, वैसे बुद्धिमान् विद्यार्थियों का संग्रह कर पूर्ण विद्याप्रचार को करो और जैसे पढ़ानेवाले से पढ़नेवाले विद्या का संग्रह कर आनन्दित होते हैं, वैसे विद्वान् स्त्री-पुरुष अपने तथा औरों के सन्तानों को उत्तम शिक्षा से विद्या देकर सदा प्रमुदित होवें॥१३॥

आ॒स्नो वृक॑स्य॒ वर्ति॑काम॒भीके॑ यु॒वं न॑रा नासत्यामुमुक्तम्। उ॒तो क॒विं पु॑रुभुजा यु॒वं ह॒ कृप॑माणमकृणुतं वि॒चक्षे॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि सुखरूप सबके चाहे हुए विद्या ग्रहण करने के व्यवहार में सब मनुष्यों को प्रवृत्त करके जिसका दुःख फल है उस अन्यायरूप काम से निवृत्त करके उन सब प्राणियों पर कृपा कर सुख देवें॥१४॥

च॒रित्रं॒ हि वेरि॒वाच्छे॑दि प॒र्णमा॒जा खे॒लस्य॒ परि॑तक्म्यायाम्। स॒द्यो जङ्घा॒माय॑सीं वि॒श्पला॑यै॒ धने॑ हि॒ते सर्त॑वे॒ प्रत्य॑धत्तम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। प्रजाजनों की पालना करने में अत्यन्त चित्त दिये हुए भद्र राजा आदि जनों को चाहिये कि पखेरू के पंखों के समान दुष्टों के चरित्र को युद्ध में छिन्न-भिन्न करें। शस्त्र और अस्त्रों को धारण कर प्रजाजनों की पालना करें। क्योंकि जो प्रजाजनों से कर लिया जाता है, उसका बदला देना उन प्रजाजनों की रक्षा करना ही समझना चाहिये॥१५॥

श॒तं मे॒षान्वृ॒क्ये॑ चक्षदा॒नमृ॒ज्राश्वं॒ तं पि॒तान्धं च॑कार। तस्मा॑ अ॒क्षी ना॑सत्या वि॒चक्ष॒ आध॑त्तं दस्रा भिषजावन॒र्वन्॥

सभा के सहित राजा हिंसा करनेवाले, चोर, कपटी, छली मनुष्यों को काराघर में अन्धों के समान रखकर और अपने उपदेश अर्थात् आज्ञा रूप शिक्षा और व्यवहार की शिक्षा से धर्मात्मा कर, और विद्या में प्रीति रखनेवालों को उनकी प्रकृति के अनुकूल ओषधि देकर उनको आरोग्य करे॥१६॥

आ वां॒ रथं॑ दुहि॒ता सूर्य॑स्य॒ कार्ष्मे॑वातिष्ठ॒दर्व॑ता॒ जय॑न्ती। विश्वे॑ दे॒वा अन्व॑मन्यन्त हृ॒द्भिः समु॑ श्रि॒या ना॑सत्या सचेथे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! समस्त विद्वानों ने प्रशंसा की हुई शस्त्र, अस्त्र, वाहन तथा और सामग्री आदि सहित धनवती सेना को सिद्ध कर जैसे सूर्य्य अपना प्रकाश करे, वैसे तुम लोग धर्म और न्याय का प्रकाश कराओ॥१७॥

यदया॑तं॒ दिवो॑दासाय व॒र्तिर्भ॒रद्वा॑जायाश्विना॒ हय॑न्ता। रे॒वदु॑वाह सच॒नो रथो॑ वां वृष॒भश्च॑ शिंशु॒मार॑श्च यु॒क्ता॥

राजा आदि राजपुरुषों को समस्त अपनी सामग्री न्याय से राज्य की पालना करने ही के लिये बनानी चाहिये॥१८॥

र॒यिं सु॑क्ष॒त्रं स्व॑प॒त्यमायुः॑ सु॒वीर्यं॑ नासत्या॒ वह॑न्ता। आ ज॒ह्नावीं॒ सम॑न॒सोप॒ वाजै॒स्त्रिरह्नो॑ भा॒गं दध॑तीमयातम्॥

कोई विद्या और सत्यन्याय के सेवन के विना इन धन आदि पदार्थों को प्राप्त हो और इनकी रक्षा कर सुख नहीं कर सकता है, इससे धर्म के सेवन से ही राज्य आदि प्राप्त हो सकता है॥१९॥

परि॑विष्टं जाहु॒षं वि॒श्वतः॑ सीं सु॒गेभि॒र्नक्त॑मूहथू॒ रजो॑भिः। वि॒भि॒न्दुना॑ नासत्या॒ रथे॑न॒ वि पर्व॑ताँ अजर॒यू अ॑यातम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे राजा के सभासद् जन धर्म के अनुकूल मार्गों से राज्य पाकर किला में वा पर्वत आदि स्थानों में ठहरे हुए शत्रुओं को वश में करके अपने प्रभाव को प्रकाशित करते हैं, वैसे सूर्य और चन्द्रमा पृथिवी के पदार्थों को प्रकाशित करते हैं। जैसे इन सूर्य्य और चन्द्रमा के निकट न होने से अन्धकार उत्पन्न होता है, वैसे राजपुरुषों के अभाव में अन्यायरूपी अन्धकार प्रवृत्त हो जाता है॥२०॥

एक॑स्या॒ वस्तो॑रावतं॒ रणा॑य॒ वश॑मश्विना स॒नये॑ स॒हस्रा॑। निर॑हतं दु॒च्छुना॒ इन्द्र॑वन्ता पृथु॒श्रव॑सो वृषणा॒वरा॑तीः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य और चन्द्रमा के उदय से अन्धकार की निवृत्ति होकर सब प्राणी सुखी होते हैं, वैसे धर्मरूपी व्यवहार से शत्रुओं और अधर्म की निवृत्ति होने से धर्मात्मा जन अच्छे राज्य में सुखी होते हैं॥२१॥

श॒रस्य॑ चिदार्च॒त्कस्या॑व॒तादा नी॒चादु॒च्चा च॑क्रथुः॒ पात॑वे॒ वाः। श॒यवे॑ चिन्नासत्या॒ शची॑भि॒र्जसु॑रये स्त॒र्यं॑ पिप्यथु॒र्गाम्॥

हे मनुष्यो! तुम शत्रुओं के नाशक और मित्रजनों की प्रशंसा करनेवाले जन का सत्कार करो और उसके लिये पृथिवी देओ, जैसे पवन और सूर्य भूमि और वृक्षों से जल को खैच और वर्षाकर सबको बढ़ाते हैं, वैसे ही उत्तम कामों से संसार को बढ़ाओ॥२२॥

अ॒व॒स्य॒ते स्तु॑व॒ते कृ॑ष्णि॒याय॑ ऋजूय॒ते ना॑सत्या॒ शची॑भिः। प॒शुं न न॒ष्टमि॑व॒ दर्श॑नाय विष्णा॒प्वं॑ ददथु॒र्विश्व॑काय॥

इस मन्त्र में दो उपमालङ्कार हैं। शास्त्र के वक्ता, उपदेश करने और विद्या पढ़ानेवाले विद्वान् जन जैसे प्रत्यक्ष गौ आदि पशु को वा छिपे हुए वस्तु को दिखाकर प्रत्यक्ष कराते हैं, वैसे शम, दम आदि गुणों से युक्त बुद्धिमान् श्रोता वा अध्येताओं को पृथिवी से लेके ईश्वरपर्य्यन्त पदार्थों का विज्ञान देनेवाली साङ्गोपाङ्ग विद्याओं को प्रत्यक्ष करावें और इस विषय में कपट और आलस्य आदि निन्दित कर्म कभी न करें॥२३॥

दश॒ रात्री॒रशि॑वेना॒ नव॒ द्यूनव॑नद्धं श्नथि॒तम॒प्स्व१॒॑न्तः। विप्रु॑तं रे॒भमु॒दनि॒ प्रवृ॑क्त॒मुन्नि॑न्यथुः॒ सोम॑मिव स्रु॒वेण॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। पिछले मन्त्र से (नासत्या, शचीभिः) इन दो पदों की अनुवृत्ति आती है। हे मनुष्यो! जैसे जल के भीतर नौका आदि में स्थित हुई सेना शत्रुओं से मारी नहीं जा सकती, वैसे विद्या और सत्यधर्म के उपदेशों में स्थापित किये हुए जन अविद्याजन्य दुःख से पीड़ा नहीं पाते। जैसे नियत समय पर कारीगर लोग नौकादि यानों को जल में इधर-उधर लेजा के शत्रुओं को जीतते हैं, वैसे विद्यादान से अविद्याओं को आप जीतो। जैसे यज्ञकर्म में होमा हुआ द्रव्य वायु और जल आदि की शुद्धि करनेवाला होता है, वैसे सज्जनों का उपदेश आत्मा की शुद्धि करनेवाला होता है॥२४॥

प्र वां॒ दंसां॑स्यश्विनाववोचम॒स्य पतिः॑ स्यां सु॒गवः॑ सु॒वीरः॑। उ॒त पश्य॑न्नश्नु॒वन्दी॒र्घमायु॒रस्त॑मि॒वेज्ज॑रि॒माणं॑ जगम्याम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्य सदा धार्मिक शास्त्रवक्ताओं के कर्मों को सेवन कर धर्म और जितेन्द्रियपन से विद्याओं को पाकर आयुर्दा बढ़ाके अच्छे सहाययुक्त हुए संसार की पालना करें और योगाभ्यास से जीर्ण अर्थात् बुड्ढे शरीरों को छोड़ विज्ञान से मुक्ति को प्राप्त होवें॥२५॥इस सूक्त में पृथिवी आदि पदार्थों के गुणों के दृष्टान्त तथा अनुकूलता से सभासेनापति आदि के गुण कर्मों के वर्णन से इस सूक्त में कहे अर्थ की पिछले सूक्त में कहे अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह १२ वर्ग और ११६ सूक्त समाप्त हुआ॥

मध्वः॒ सोम॑स्याश्विना॒ मदा॑य प्र॒त्नो होता वि॑वासते वाम्। ब॒र्हिष्म॑ती रा॒तिर्विश्रि॑ता॒ गीरि॒षा या॑तं नास॒त्योप॒ वाजैः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे सभा और सेना के अधीशो! तुम उत्तम शास्त्रवेत्ता विद्वानों के गुण और कर्मों की सेवा से विशेष ज्ञान आदि को पाकर शरीर के रोग दूर करने के लिये सोमवल्ली आदि ओषधियों की विद्या और अविद्या अज्ञान के दूर करने को विद्या का सेवन कर चाहे हुए सुख की सिद्धि करो॥१॥

यो वा॑मश्विना॒ मन॑सो॒ जवी॑या॒न्रथः॒ स्वश्वो॒ विश॑ आ॒जिगा॑ति। येन॒ गच्छ॑थः सु॒कृतो॑ दुरो॒णं तेन॑ नरा व॒र्तिर॒स्मभ्यं॑ यातम्॥

राजपुरुषों को चाहिये कि मन के समान वेगवाले, बिजुली आदि पदार्थों से युक्त, अनेक प्रकार के रथ आदि यानों को निश्चित कर प्रजाजनों को सन्तोष देवें। और जिस-जिस कर्म से प्रशंसा हो उसी-उसी का निरन्तर सेवन करें, उससे और कर्म का सेवन न करें॥२॥

ऋषिं॑ नरा॒वंह॑सः॒ पाञ्च॑जन्यमृ॒बीसा॒दत्रिं॑ मुञ्चथो ग॒णेन॑। मि॒नन्ता॒ दस्यो॒रशि॑वस्य मा॒या अ॑नुपू॒र्वं वृ॑षणा चो॒दय॑न्ता॥

राजपुरुषों का यह अत्यन्त उत्तम काम है जो विद्याप्रचार करनेहारों को दुःख से बचाना, उनको सुख में राखना और डाकू उचक्के आदि दुष्ट जनों को दूर करना और वे राजपुरुष आप विद्या और धर्मयुक्त हो विद्वानों को विद्या और धर्म्म के प्रचार में लगाकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि करें॥३॥

अश्वं॒ न गू॒ळ्हम॑श्विना दु॒रेवै॒ॠषिं॑ नरा वृषणा रे॒भम॒प्सु। सं तं रि॑णीथो॒ विप्रु॑तं॒ दंसो॑भि॒र्न वां॑ जूर्यन्ति पू॒र्व्या कृ॒तानि॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजपुरुषों से जैसे डाकुओं द्वारा हरे छिपे हुए स्थान में ठहराये और पीड़ा दिये हुए घोड़े को लेकर वह सुख के साथ अच्छी प्रकार रक्षा किया जाता है, वैसे मूढ़ दुराचारी मनुष्यों द्वारा तिरस्कार किये हुए विद्याप्रचार करनेवाले मनुष्यों को समस्त पीड़ाओं से अलगकर, सत्कार के साथ सङ्ग कर, ये सेवा को प्राप्त किये जाते हैं और जो उनके बिजुली की विद्या के प्रचार के काम हैं, वे अजर-अमर हैं, यह जानना चाहिये॥४॥

सु॒षु॒प्वांसं॒ न निर्ॠ॑तेरु॒पस्थे॒ सूर्यं॒ न द॑स्रा॒ तम॑सि क्षि॒यन्त॑म्। शु॒भे रु॒क्मं न द॑र्श॒तं निखा॑त॒मुदू॑पथुरश्विना॒ वन्द॑नाय॥

इस मन्त्र में तीन उपमालङ्कार हैं। जैसे प्रजास्थ जन अच्छे राज्य को पाकर रात्रि में सुख से सोके दिन में चाहे हुए कामों में मन लगाते हैं वा अच्छी शोभा होने के लिये सुवर्ण आदि वस्तुओं को पाते वा खेती आदि कामों को करते हैं, वैसे अच्छी प्रजा को प्राप्त होकर राजपुरुष प्रशंसा पाते हैं॥५॥

तद्वां॑ नरा॒ शंस्यं॑ पज्रि॒येण॑ क॒क्षीव॑ता नासत्या॒ परि॑ज्मन्। श॒फादश्व॑स्य वा॒जिनो॒ जना॑य श॒तं कु॒म्भाँ अ॑सिञ्चतं॒ मधू॑नाम्॥

राजपुरुषों को चाहिये कि मनुष्य आदि प्राणियों के सुख के लिये मार्ग में अनेक घड़ों के जल से नित्य सींचाव कराया करें, जिससे घोड़े, बैल आदि के पैरों की खूदन से धूर न उड़े। और जिससे मार्ग में अपनी सेना के जन सुख से आवें-जावें। इस प्रकार ऐसे प्रशंसित कामों को करके प्रजाजनों को निरन्तर आनन्द देवें॥६॥

यु॒वं न॑रा स्तुव॒ते कृ॑ष्णि॒याय॑ विष्णा॒प्वं॑ ददथु॒र्विश्व॑काय। घोषा॑यै चित्पितृ॒षदे॑ दुरो॒णे पतिं॒ जूर्य॑न्त्या अश्विनावदत्तम्॥

राजा आदि न्यायाधीश खेती आदि कामों के करनेवाले पुरुषों से सब उपकार पालना करनेवाले पुरुष और सत्य न्याय को प्रजाजनों को देकर उन्हें पुरुषार्थ में प्रवृत्त करें। इन कार्य्यों की सिद्धि को प्राप्त हुए प्रजाजनों से धर्म के अनुकूल अपने भाग को यथायोग्य ग्रहण करें॥७॥

यु॒वं श्यावा॑य॒ रुश॑तीमदत्तं म॒हः क्षो॒णस्या॑श्विना॒ कण्वा॑य। प्र॒वाच्यं॒ तद्वृ॑षणा कृ॒तं वां॒ यन्ना॑र्ष॒दाय॒ श्रवो॑ अ॒ध्यध॑त्तम्॥

सभाध्यक्ष पुरुष से जिस प्रकार का उपदेश अच्छे बुद्धिमानों के प्रति किया जाता हो, वैसा ही सब लोकों के स्वामी के लिये उपदेश करें। ऐसे ही सब मनुष्यों के प्रति वर्त्ताव करना चाहिये॥८॥

पु॒रू वर्पां॑स्यश्विना॒ दधा॑ना॒ नि पे॒दव॑ ऊहथुरा॒शुमश्व॑म्। स॒ह॒स्र॒सां वा॒जिन॒मप्र॑तीतमहि॒हनं॑ श्रव॒स्यं१॒॑तरु॑त्रम्॥

ऐसे शीघ्र पहुँचानेवाले बिजुली आदि अग्नि के विना एक देश से दूसरे देश को सुख से जाने-आने तथा शीघ्र समाचार लेने को कोई समर्थ नहीं हो सकता है॥९॥

ए॒तानि॑ वां श्रव॒स्या॑ सुदानू॒ ब्रह्मा॑ङ्गू॒षं सद॑नं॒ रोद॑स्योः। यद्वां॑ प॒ज्रासो॑ अश्विना॒ हव॑न्ते या॒तमि॒षा च॑ वि॒दुषे॑ च॒ वाज॑म्॥

सब मनुष्यों को चाहिये कि सबका आधार, सबको उपासना के योग्य, सबका रचनेहारा ब्रह्म जिन उपायों से जाना जाता है, उनसे जान औरों के लिये भी ऐसे ही जनाकर पूर्ण आनन्द को प्राप्त होवें॥१०॥

सू॒नोर्माने॑नाश्विना गृणा॒ना वाजं॒ विप्रा॑य भुरणा॒ रद॑न्ता। अ॒गस्त्ये॒ ब्रह्म॑णा वावृधा॒ना सं वि॒श्पलां॑ नासत्यारिणीतम्॥

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। जैसे माता-पिता संतानों और संतान माता-पिताओं, पढ़ानेवाले पढ़नेवालों और पढ़नेवाले पढ़ानेवालों, पति स्त्रियों और स्त्री पतियों तथा मित्र मित्रों को परस्पर प्रसन्न करते हैं, वैसे ही राजा प्रजाजनों और प्रजा राजजनों को निरन्तर प्रसन्न करें॥११॥

कुह॒ यान्ता॑ सुष्टु॒तिं का॒व्यस्य॒ दिवो॑ नपाता वृषणा शयु॒त्रा। हिर॑ण्यस्येव क॒लशं॒ निखा॑त॒मुदू॑पथुर्दश॒मे अ॑श्वि॒नाह॑न्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे धनाढ्यजन सुवर्ण आदि धातुओं के वासनों में दूध, घी, दही आदि पदार्थों को धर और उनको पकाकर खाते हुए प्रशंसा पाते हैं, वैसे दो शिल्पीजन इस विद्या और न्यायमार्गों में प्रजाजनों का प्रवेश कराकर धर्म और न्याय के उपदेशों से उनको पक्के कर राज्य और धन के सुख को भोगते हुए प्रशंसित कहाँ होवें ? इसका यह उत्तर है कि धार्मिक विद्वान् जनों में होवें॥१२॥

यु॒वं च्यवा॑नमश्विना॒ जर॑न्तं॒ पुन॒र्युवा॑नं चक्रथुः॒ शची॑भिः। यु॒वो रथं॑ दुहि॒ता सूर्य॑स्य स॒ह श्रि॒या ना॑सत्यावृणीत॥

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। माता-पिता आदि को अतीव योग्य है कि जब अपने सन्तान पूर्ण अच्छी सिखावट, विद्या, शरीर और आत्मा के बल, रूप, लावण्य, स्वभाव, आरोग्यपन, धर्म और ईश्वर को जानने आदि उत्तम गुणों के साथ वर्त्ताव रखने को समर्थ हों तब अपनी इच्छा और परीक्षा के साथ आप ही स्वयंवर विधि से दोनों सुन्दर समान गुण, कर्म, स्वभावयुक्त पूरे ज्वान, बली, लड़की-लड़के विवाह कर ऋतु समय में साथ का संयोग करनेवाले होकर, धर्म के साथ अपना वर्त्ताव वर्त्तकर प्रजा अर्थात् सन्तानों को अच्छे उत्पन्न करें, यह उपदेश देने चाहियें। विना इसके कभी कुल की उन्नति होने के योग्य नहीं है, इससे सज्जन पुरुषों को ऐसा ही सदा करना चाहिये॥१३॥

यु॒वं तुग्रा॑य पू॒र्व्येभि॒रेवैः॑ पुनर्म॒न्याव॑भवतं युवाना। यु॒वं भु॒ज्युमर्ण॑सो॒ निः स॑मु॒द्राद्विभि॑रूहथुरृ॒ज्रेभि॒रश्वैः॑॥

स्त्री-पुरुष अगले महात्मा, ऋषि, महर्षियों ने किये जो काम हैं, उनका आचरण कर धर्मयुक्त ब्रह्मचर्य्य से शीघ्र पूर्ण विद्याओं को पाकर क्रिया की कुशलता से विमान आदि यानों को बनाकर भूगोल के सब ओर विहार कर नित्य आनन्दयुक्त हों॥१४॥

अजो॑हवीदश्विना तौ॒ग्र्यो वां॒ प्रोळ्हः॑ समु॒द्रम॑व्य॒थिर्ज॑ग॒न्वान्। निष्टमू॑हथुः सु॒युजा॒ रथे॑न॒ मनो॑जवसा वृषणा स्व॒स्ति॥

जब ब्रह्मचर्य किये पुरुष शत्रुओं के विजय के लिये समुद्र के पार जाना चाहें तब स्त्री और सेना के साथ ही वेगवान् यानों से जावें-आवें॥१५॥

अजो॑हवीदश्विना॒ वर्ति॑का वामा॒स्नो यत्सी॒ममु॑ञ्चतं॒ वृक॑स्य। वि ज॒युषा॑ ययथुः॒ सान्वद्रे॑र्जा॒तं वि॒ष्वाचो॑ अहतं वि॒षेण॑॥

राजपुरुष जैसे बलवान् दयालु शूरवीर बघेले के मुख से छेरी को छुड़ाता है, वैसे डाकुओं के भय से प्रजाजनों को अलग रक्खें। जब शत्रुजन पर्वतों में वर्त्तमान मारे नहीं जा सकते हों तब उनके अन्न-पान आदि को विदूषित कर उनको वश में लावें॥१६॥

श॒तं मे॒षान्वृ॒क्ये॑ मामहा॒नं तमः॒ प्रणी॑त॒मशि॑वेन पि॒त्रा। आक्षी ऋ॒ज्राश्वे॑ अश्विनावधत्तं॒ ज्योति॑र॒न्धाय॑ चक्रथुर्वि॒चक्षे॑॥

हे सभासेना आदि के पुरुषो! तुम लोग प्रजाजनों में अन्याय से भेड़िनी अपने प्रयोजन के लिये भेड़ बकरों में जैसे प्रवृत्त होते हैं, वैसे वर्त्ताव रखनेवाले अपने भृत्यों को अच्छे दण्ड देकर अन्य धर्मात्मा भृत्यों से प्रजाजनों में सूर्य्य के समान रक्षा आदि व्यवहारों को निरन्तर प्रकाशित करो। जैसे आँखवाला कुएँ से अन्धे को बचाकर सुख देता है, वैसे अन्याय करनेवाले भृत्यों से पीड़ा को प्राप्त हुए प्रजाजनों को अलग रक्खो॥१७॥

शु॒नम॒न्धाय॒ भर॑मह्वय॒त्सा वृ॒कीर॑श्विना वृषणा॒ नरेति॑। जा॒रः क॒नीन॑ इव चक्षदा॒न ऋ॒ज्राश्वः॑ श॒तमेकं॑ च मे॒षान्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजपुरुष अविद्या से अन्धे हो रहे जनों को अन्यायकारियों से, उत्तम सती स्त्रियों को लंपट वेश्याबाजों से, जैसे भेड़ियों से भेड़-बकरों को बचावें, वैसे निरन्तर बचा कर पालें॥१८॥

म॒ही वा॑मू॒तिर॑श्विना मयो॒भूरु॒त स्रा॒मं धि॑ष्ण्या॒ सं रि॑णीथः। अथा॑ यु॒वामिद॑ह्वय॒त्पुर॑न्धि॒राग॑च्छतं सीं वृषणा॒ववो॑भिः॥

राजपुरुषों को चाहिये कि न्याय से अन्याय को अलग कर धर्म में प्रवृत्त, शरण आये हुए जनों को अच्छे प्रकार पाल के सब ओर से कृतकृत्य हों॥१९॥

अधे॑नुं दस्रा स्त॒र्यं१॒॑ विष॑क्ता॒मपि॑न्वतं श॒यवे॑ अश्विना॒ गाम्। यु॒वं शची॑भिर्विम॒दाय॑ जा॒यां न्यू॑हथुः पुरुमि॒त्रस्य॒ योषा॑म्॥

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। हे राजपुरुषो! तुम जैसे सबके मित्र की सुलक्षणा मन लगती, ब्रह्मचारिणी, पण्डिता, अच्छे शीलस्वभाव की, निरन्तर सुख देनेवाली, धर्मशील, कुमारी को भार्य्या करने के लिये स्वीकार कर उसकी रक्षा करते हो, वैसे ही साम, दाम, दण्ड, भेद अर्थात् शान्ति, किसी प्रकार का दबाव, दण्ड देना ओर एक से दूसरे को तोड़-फोड़ उसको बेमन करना आदि राज कामों से भूमि के राज्य को पाकर धर्म से सदैव उसकी रक्षा करो॥२०॥

यवं॒ वृके॑णाश्विना॒ वप॒न्तेषं॑ दु॒हन्ता॒ मनु॑षाय दस्रा। अ॒भि दस्युं॒ बकु॑रेणा॒ धम॑न्तो॒रु ज्योति॑श्चक्रथु॒रार्या॑य॥

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। राजपुरुषों को चाहिये कि प्रजाजनों में जो कण्टक, लम्पट, चोर, झूठा और खारे बोलनेवाले दुष्ट मनुष्य हैं उनको रोक, खेती आदि कामों से युक्त वैश्य प्रजाजनों की रक्षा और खेती आदि कामों की उन्नति कर अत्यन्त विस्तीर्ण राज्य का सेवन करें॥२१॥

आ॒थ॒र्व॒णाया॑श्विना दधी॒चेऽश्व्यं॒ शिरः॒ प्रत्यै॑रयतम्। स वां॒ मधु॒ प्र वो॑चदृता॒यन्त्वा॒ष्ट्रं यद्द॑स्रावपिक॒क्ष्यं॑ वाम्॥

सभासेनाधीश आदि राजजन विद्वानों में श्रद्धा करें और अच्छे कामों में प्रेरणा दें और वे तुम लोगों के लिये सत्य का उपदेश देकर प्रमाद और अधर्म से निवृत्त करें॥२२॥

सदा॑ कवी सुम॒तिमा च॑के वां॒ विश्वा॒ धियो॑ अश्विना॒ प्राव॑तं मे। अ॒स्मे र॒यिं ना॑सत्या बृ॒हन्त॑मपत्य॒साचं॒ श्रुत्यं॑ रराथाम्॥

विद्यार्थी और राजा आदि गृहस्थों को चाहिये कि शास्त्रवेत्ता विद्वानों के निकट से उत्तम बुद्धियों को लेवें और वे विद्वान् भी उनके लिये विद्या आदि धन को दे निरन्तर उन्हें अच्छी सिखावट सिखाय के धर्मात्मा विद्वान् करें॥२३॥

हिर॑ण्यहस्तमश्विना॒ ररा॑णा पु॒त्रं न॑रा वध्रिम॒त्या अ॑दत्तम्। त्रिधा॑ ह॒ श्याव॑मश्विना॒ विक॑स्त॒मुज्जी॒वस॑ ऐरयतं सुदानू॥

पढ़ानेवाले सज्जन पुत्रों और पढ़ानेवाली स्त्रियाँ पुत्रियों को ब्रह्मचर्य्य नियम में लगाकर, इनके दूसरे विद्याजन्म को सिद्धकर, जीवन के उपाय अच्छे प्रकार सिखाय के, समय पर उनके माता-पिता को देवें और वे घर को पाकर भी उन गुरुजनों की शिक्षाओं को न भूलें॥२४॥

ए॒तानि॑ वामश्विना वी॒र्या॑णि॒ प्र पू॒र्व्याण्या॒यवो॑ऽवोचन्। ब्रह्म॑ कृ॒ण्वन्तो॑ वृषणा यु॒वभ्यां॑ सु॒वीरा॑सो वि॒दथ॒मा व॑देम॥

मनुष्य जिन विद्वानों ने लोक के उपकारक विद्या और धर्मोपदेश से प्रचार करनेवाले काम किये वा जिनसे किये जाते हैं, उनकी प्रशंसा और अन्न वा धन आदि से सेवा करें क्योंकि कोई विद्वानों के सङ्ग के विना विद्या आदि उत्तम-उत्तम रत्नों को नहीं पा सकते। न कोई कपट आदि दोषों से रहित शास्त्र जाननेवाले विद्वानों के सङ्ग और उनसे विद्या पढ़ने के विना अच्छी शीलता और विद्या की वृद्धि करने को समर्थ होते हैं॥२५॥इस सूक्त में राजा, प्रजा और पढ़ने-पढ़ाने आदि कामों के वर्णन से पूर्व सूक्तार्थ के साथ इस सूक्त के अर्थ की सङ्गति है, यह समझना चाहिये॥यह १ अष्टक के ८ वे अध्याय में सत्रहवाँ वर्ग और एक सौ सत्रहवाँ सूक्त पूरा हुआ॥

आ वां॒ रथो॑ अश्विना श्ये॒नप॑त्वा सुमृळी॒कः स्ववाँ॑ यात्व॒र्वाङ्। यो मर्त्य॑स्य॒ मन॑सो॒ जवी॑यान्त्रिबन्धु॒रो वृ॑षणा॒ वात॑रंहाः॥

स्त्री-पुरुष जब ऐसे यान को उत्पन्न कर उपयोग में लावें तब ऐसा कौन सुख है, जिसको वे सिद्ध नहीं कर सकें॥१॥

त्रि॒व॒न्धु॒रेण॑ त्रि॒वृता॒ रथे॑न त्रिच॒क्रेण॑ सु॒वृता या॑तम॒र्वाक्। पिन्व॑तं॒ गा जिन्व॑त॒मर्व॑तो नो व॒र्धय॑तमश्विना वी॒रम॒स्मे॥

राजपुरुष अच्छी सामग्री और उत्तम शास्त्रवेत्ता विद्वानों का सहाय ले सब स्त्री-पुरुषों को समृद्धि और सिद्धियुक्त करके प्रशंसित हों॥२॥

प्र॒वद्या॑मना सु॒वृता॒ रथे॑न॒ दस्रा॑वि॒मं शृ॑णुतं॒ श्लोक॒मद्रेः॑। किम॒ङ्ग वां॒ प्रत्यव॑र्तिं॒ गमि॑ष्ठा॒हुर्विप्रा॑सो अश्विना पुरा॒जाः॥

हे राजा आदि स्त्री-पुरुषो! तुम जो-जो उत्तम विद्वानों ने उपदेश किया उसी-उसी को स्वीकार करो क्योंकि सत्पुरुषों के उपदेश के विना संसार में मनुष्यों की उन्नति नहीं होती। जहाँ उत्तम विद्वानों के उपदेश नहीं प्रवृत्त होते हैं, वहाँ सब अज्ञानरूपी अंधेरे से ढपे ही होकर पशुओं के समान वर्त्तावकर दुःख को इकट्ठा करते हैं॥३॥

आ वां॑ श्ये॒नासो॑ अश्विना वहन्तु॒ रथे॑ यु॒क्तास॑ आ॒शवः॑ पत॑ङ्गाः। ये अ॒प्तुरो॑ दि॒व्यासो॒ न गृध्रा॑ अ॒भि प्रयो॑ नासत्या॒ वह॑न्ति॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे स्त्री-पुरुषो! जैसे आकाश में अपने पङ्खों से उड़ते हुए गृध्र आदि पखेरू सुख से आते-जाते हैं, वैसे ही तुम अच्छे सिद्ध किये विमान आदि यानों से अन्तरिक्ष में आओ-जाओ॥४॥

आ वां॒ रथं॑ युव॒तिस्ति॑ष्ठ॒दत्र॑ जु॒ष्ट्वी न॑रा दुहि॒ता सूर्य॑स्य। परि॑ वा॒मश्वा॒ वपु॑षः पत॒ङ्गा वयो॑ वहन्त्वरु॒षा अ॒भीके॑॥

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य की किरणें सब ओर से आती-जाती हैं वा जैसे पतिव्रता उत्तम स्त्री पति को सुख पहुँचाती है वा जैसे पखेरू ऊपर-नीचे जाते हैं, वैसे युद्ध में उत्तम यान और उत्तम वीर जन चाहे हुए सुख को सिद्ध करते हैं॥५॥

उद्वन्द॑नमैरतं दं॒सना॑भि॒रुद्रे॒भं द॑स्रा वृषणा॒ शची॑भिः। निष्टौ॒ग्र्यं पा॑रयथः समु॒द्रात्पुन॒श्च्यवा॑नं चक्रथु॒र्युवा॑नम्॥

जैसे नाव के चलानेवाले मल्लाह आदि मनुष्यों को समुद्र के पार पहुँचाकर सुखी करते हैं, वैसे राजसभा शिल्पीजनों और उपदेश करनेवालों को दुःख से पार पहुँचाकर निरन्तर आनन्द देवें॥६॥

यु॒वमत्र॒येऽव॑नीताय त॒प्तमूर्ज॑मो॒मान॑मश्विनावधत्तम्। यु॒वं कण्वा॒यापि॑रिप्ताय॒ चक्षुः॒ प्रत्य॑धत्तं सुष्टु॒तिं जु॑जुषा॒णा॥

सभासेनाधीश आदि राजपुरषों को चाहिये कि धर्मात्मा जो कि वेद आदि विद्या के प्रचार के लिये अच्छा यत्न करते हैं, उन विद्वानों की रक्षा का विधान कर उनसे विनय को पाकर प्रजाजनों की पालना करें॥७॥

यु॒वं धे॒नुं श॒यवे॑ नाधि॒तायापि॑न्वतमश्विना पू॒र्व्याय॑। अमु॑ञ्चतं॒ वर्ति॑का॒मंह॑सो॒ निः प्रति॒ जङ्घां॑ वि॒श्पला॑या अधत्तम्॥

राजपुरुष सब ऐश्वर्ययुक्त परस्पर धनीजनों के कुल में हुए प्रजाजनों को सत्यन्याय से सन्तोष दे उनको ब्रह्मचर्य के नियम से विद्या ग्रहण करने के लिये प्रवृत्त करावें, जिससे किसी का लड़का और लड़की विद्या और उत्तम शिक्षा के विना न रह जाय॥८॥

यु॒वं श्वे॒तं पे॒दव॒ इन्द्र॑जूतमहि॒हन॑मश्विनादत्त॒मश्व॑म्। जो॒हूत्र॑म॒र्यो अ॒भिभू॑तिमु॒ग्रं स॑हस्र॒सां वृष॑णं वी॒ड्व॑ङ्गम्॥

जैसे सूर्य्य मेघ को वर्षा के सब प्रजा के लिये सुख देता है, वैसे शिल्पविद्या के जाननेवाले स्त्री-पुरुष समस्त प्रजा के लिये सुख देवें और अपने बीच में जो अतिरथी वीर स्त्री-पुरुष हैं, उनका सदा सत्कार करें॥९॥

ता वां॑ नरा॒ स्वव॑से सुजा॒ता हवा॑महे अश्विना॒ नाध॑मानाः। आ न॒ उप॒ वसु॑मता॒ रथे॑न॒ गिरो॑ जुषा॒णा सु॑वि॒ताय॑ यातम्॥

प्रजाजनों के स्त्री-पुरुषों से जो राजपुरुष प्रीति को पावें, प्रसन्न हों, वे प्रजाजनों को प्रसन्न करें जिससे एक दूसरे की रक्षा से ऐश्वर्यसमूह नित्य बढ़े॥१०॥

आ श्ये॒नस्य॒ जव॑सा॒ नूत॑नेना॒स्मे या॑तं नासत्या स॒जोषाः॑। हवे॒ हि वा॑मश्विना रा॒तह॑व्यः शश्वत्त॒माया॑ उ॒षसो॒ व्यु॑ष्टौ॥

स्त्री-पुरुष रात्रि के चौथे प्रहर में उठ अपना आवश्यक अर्थात् शरीर शुद्धि आदि काम कर फिर जगदीश्वर की उपासना और योगाभ्यास को करके राजा और प्रजा के कामों का आचरण करने को प्रवृत्त हों। राजा आदि सज्जनों को चाहिये कि प्रशंसा के योग्य प्रजाजनों का सत्कार करें और प्रजाजनों को चाहिये कि स्तुति के योग्य राजजनों की स्तुति करें। क्योंकि किसी को अधर्म सेवनेवाले दुष्ट जन की स्तुति और धर्म का सेवन करनेवाले धर्मात्मा जन की निन्दा करने योग्य नहीं हैं, इससे सब जन धर्म की व्यवस्था का आचरण करें॥११॥इस सूक्त में स्त्री-पुरुष और राजा-प्रजा के धर्म का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये॥यह एकसौ अट्ठारहवाँ सूक्त और उन्नीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ वां॒ रथं॑ पुरुमा॒यं म॑नो॒जुवं॑ जी॒राश्वं॑ य॒ज्ञियं॑ जी॒वसे॑ हुवे। स॒हस्र॑केतुं व॒निनं॑ श॒तद्व॑सुं श्रुष्टी॒वानं॑ वरिवो॒धाम॒भि प्रयः॑॥

इस मन्त्र में पिछले सूक्त के अन्तिम मन्त्र से (अश्विना) इस पद की अनुवृत्ति आती है। अच्छा यत्न करते हुए विद्वान् शिल्पी जनों ने जो चाहा हो तो जैसा कि सब गुणों से युक्त विमान आदि रथ इस मन्त्र में वर्णन किया वैसा बन सके॥१॥

ऊ॒र्ध्वा धी॒तिः प्रत्य॑स्य॒ प्रया॑म॒न्यधा॑यि॒ शस्म॒न्त्सम॑यन्त॒ आ दिशः॑। स्वदा॑मि घ॒र्मं प्रति॑ यन्त्यू॒तय॒ आ वा॑मू॒र्जानी॒ रथ॑मश्विनारुहत्॥

हे मनुष्यो! तुम अच्छे बने हुए, रोगों का विनाश करने और बल के देनेहारे अन्नों को भोगो। यात्रा में सब सामग्री को लेकर एक दूसरे से प्रीति और रक्षा कर-करा देश-परदेश को जाओ पर कहीं नीति को न छोड़ो॥२॥

सं यन्मि॒थः प॑स्पृधा॒नासो॒ अग्म॑त शु॒भे म॒खा अमि॑ता जा॒यवो॒ रणे॑। यु॒वोरह॑ प्रव॒णे चे॑किते॒ रथो॒ यद॑श्विना॒ वह॑थः सू॒रिमा वर॑म्॥

राजपुरुष जब शत्रुओं को जीतने को अपनी सेना पठावें तब जिन्होंने धन पाया, जो करे को जाननेवाले, युद्ध में चतुर औरों से युद्ध करानेवाले विद्वान् जन वे सेनाओं के साथ अवश्य जावें। और सब सेना उन विद्वानों के अनुकूलता से युद्ध करें जिससे निश्चल विजय हो। जब युद्ध निवृत्त हो रुक जाय और अपने-अपने स्थान पर वीर बैठें तब उन सबको इकट्ठा कर आनन्द देकर जीतने के ढंग की बातें-चीतें करें, जिससे वे सब युद्ध करने के लिये उत्साह बाँध के शत्रुओं को अवश्य जीतें॥३॥

यु॒वं भु॒ज्युं भु॒रमा॑णं॒ विभि॑र्ग॒तं स्वयु॑क्तिभिर्नि॒वह॑न्ता पि॒तृभ्य॒ आ। या॒सि॒ष्टं व॒र्तिर्वृ॑षणा विजे॒न्यं१॒॑ दिवो॑दासाय॒ महि॑ चेति वा॒मवः॑॥

सेनापतियों से जो सेनासमूह हृष्ट-पुष्ट अर्थात् चैनचान से भरा-पूरा खाने-पीने से पुष्ट अपने को चाहता हुआ जान पड़े, उसको अनेक प्रकार के भोग और अच्छी सिखावट से युक्त कर अर्थात् उक्त पदार्थ उनको देकर आगे होनेवाले लाभ के लिये प्रवृत्त करा, ऐसे सेनासमूह से युद्धकर शत्रु जन जीते जा सकते हैं॥४॥

यु॒वोर॑श्विना॒ वपु॑षे युवा॒युजं॒ रथं॒ वाणी॑ येमतुरस्य॒ शर्ध्य॑म्। आ वां॑ पति॒त्वं स॒ख्याय॑ ज॒ग्मुषी॒ योषा॑वृणीत॒ जेन्या॑ यु॒वां पती॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे ब्रह्मचर्य्य करके यौवन अवस्था को पाए हुए विदुषी कुमारी कन्या अपने को प्यारे पति को पाय निरन्तर उसकी सेवा करती है और जैसे ब्रह्मचर्य को किये हुए ज्वान पुरुष अपनी प्रीति के अनुकूल चाही हुई स्त्री को पाकर आनन्दित होता है। वैसे ही सभा और सेनापति सदा होवें॥५॥

यु॒वं रे॒भं परि॑षूतेरुरुष्यथो हि॒मेन॑ घ॒र्मं परि॑तप्त॒मत्र॑ये। यु॒वं श॒योर॑व॒सं पि॑प्यथु॒र्गवि॒ प्र दी॒र्घेण॒ वन्द॑नस्ता॒र्यायु॑षा॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विवाह किये हुए स्त्री-पुरुषो! जैसे शीत से गरमी मारी जाती है वैसे अविद्या को विद्या से मारो, जिससे आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक ये तीन प्रकार के दुःख नष्ट हों। जैसे धार्मिक राजपुरुष चोर आदि को दूरकर सोते हुए प्रजाजनों की रक्षा करते हैं, और जैसे सूर्य्य चन्द्रमा सब जगत् को पुष्टि देकर जीवने के आनन्द को देनेवाले हैं, वैसे इस जगत् में प्रवृत्त होओ॥६॥

यु॒वं वन्द॑नं॒ निर्ऋ॑तं जर॒ण्यया॒ रथं॒ न द॑स्रा कर॒णा समि॑न्वथः। क्षेत्रा॒दा विप्रं॑ जनथो विप॒न्यया॒ प्र वा॒मत्र॑ विध॒ते दं॒सना॑ भुवत्॥

विचार करनेवाले स्त्रीपुरुष जन्म से लेके जब-तक ब्रह्मचर्य्य से समस्त विद्या ग्रहण करें तब तक उत्तम शिक्षा देकर सन्तानों को यथायोग्य व्यवहारों में निरन्तर युक्त करें॥७॥

अग॑च्छतं॒ कृप॑माणं परा॒वति॑ पि॒तुः स्वस्य॒ त्यज॑सा॒ निबा॑धितम्। स्व॑र्वतीरि॒त ऊ॒तीर्यु॒वोरह॑ चि॒त्रा अ॒भीके॑ अभवन्न॒भिष्ट॑यः॥

सब मनुष्य पूरी विद्या जानने और शास्त्रसिद्धान्त में रमनेवाले राग-द्वेष और पक्षपातरहित सबके ऊपर कृपा करते सर्वथा सत्ययुक्त असत्य को छोड़े, इन्द्रियों को जीते और योग के सिद्धान्त को पाये हुए अगले-पिछले व्यवहार को जाननेवाले जीवन्मुक्त संन्यास के आश्रम में स्थित संसार में उपदेश करने के लिये नित्य भ्रमते हुए वेदविद्या के जाननेवाले संन्यासीजन को पाकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्षों की सिद्धियों को विधान के साथ पावें। ऐसे संन्यासी आदि उत्तम विद्वान् के सङ्ग और उपदेश के सुने विना कोई भी मनुष्य यथार्थ बोध को नहीं पा सकता॥८॥

उ॒त स्या वां॒ मधु॑म॒न्मक्षि॑कारप॒न्मदे॒ सोम॑स्यौशि॒जो हु॑वन्यति। यु॒वं द॑धी॒चो मन॒ आ वि॑वास॒थोऽथा॒ शिरः॒ प्रति॑ वा॒मश्व्यं॑ वदत्॥

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे माखी पृथिवी में उत्पन्न हुए वृक्ष वनस्पतियों से रस, जिसको सहत कहते हैं उसको, लेकर अपने निवासस्थान में इकट्ठा कर आनन्द करती है, वैसे ही योगविद्या के ऐश्वर्य्य को प्राप्त सत्य उपदेश से सुख का विधान करनेहारे ब्रह्म-विचार में स्थिर विद्वान् संन्यासी के समीप से सत्यशिक्षा को सुन, मान और विचार के सर्वदा तुम लोग सुखी होओ॥९॥

यु॒वं पे॒दवे॑ पुरु॒वार॑मश्विना स्पृ॒धां श्वे॒तं त॑रु॒तारं॑ दुवस्यथः। शर्यै॑र॒भिद्युं॒ पृत॑नासु दु॒ष्टरं॑ च॒र्कृत्य॒मिन्द्र॑मिव चर्षणी॒सह॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे मनुष्यों से बिजुली से सिद्ध की हुई तारविद्या से चाहे हुए काम सिद्ध किये जाते हैं, वैसे ही संन्यासी के सङ्ग से समस्त विद्याओं को पाकर धर्म आदि काम करने को समर्थ होते हैं। इन्हीं दोनों से व्यवहार और परमार्थसिद्धि करी जा सकती है, इससे यत्न के साथ तडित्-तारविद्या अवश्य सिद्ध करनी चाहिये॥१०॥इस सूक्त में राजा-प्रजा, संन्यासी-महात्माओं की विद्या के विचार का आचरण कहने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये॥यह २१ इक्कीसवाँ वर्ग और ११९ एकसौ उन्नीसवाँ सूक्त पूरा हुआ॥

का रा॑ध॒द्धोत्रा॑श्विना वां॒ को वां॒ जोष॑ उ॒भयोः॑। क॒था वि॑धा॒त्यप्र॑चेताः॥

सभासेनाधीश शूर और विद्वान् के व्यवहारों को जाननेहारों के साथ अपना व्यवहार करें फिर शूर और विद्वान् के हार देने और उनकी जीत को रोकने को समर्थ हों, कभी किसी का मूढ़ के सहाय से प्रयोजन नहीं सिद्ध होता। इससे सब दिन विद्वानों से मित्रता रक्खें॥१॥

वि॒द्वांसा॒विद्दुरः॑ पृच्छे॒दवि॑द्वानि॒त्थाप॑रो अचे॒ताः। नू चि॒न्नु मर्ते॒ अक्रौ॑॥

जैसे विद्वान् विद्वानों की सम्मति से वर्त्ताव वर्त्ते वैसे और भी वर्त्तें। सदैव विद्वानों को पूछकर सत्य और असत्य का निर्णय कर आचरण करें और झूठ को त्याग करें। इस बात में किसी को कभी आलस्य न करना चाहिये क्योंकि विना पूछे कोई नहीं जानता है, इससे किसी को मूर्खों के उपदेश पर विश्वास न लाना चाहिये॥२॥

ता वि॒द्वांसा॑ हवामहे वां॒ ता नो॑ वि॒द्वांसा॒ मन्म॑ वोचेतम॒द्य। प्रार्च॒द्दय॑मानो यु॒वाकुः॑॥

इस संसार में जो जिसके लिये सत्य विद्याओं को देवे वह उसको मन, वाणी और शरीर से सेवे और जो कपट से विद्या को छिपावे उसका निरन्तर तिरस्कार करे। ऐसे सब लोग मिल-मिलाके विद्वानों का मान और मूर्खों का अपमान निरन्तर करें, जिससे सत्कार को पाये हुए विद्वान् विद्या के प्रचार करने में अच्छे-अच्छे यत्न करें और अपमान को पाये हुए मूर्ख भी करें॥३॥

वि पृ॑च्छामि पा॒क्या॒३॒॑ न दे॒वान्वष॑ट्कृतस्याद्भु॒तस्य॑ दस्रा। पा॒तं च॒ सह्य॑सो यु॒वं च॒ रभ्य॑सो नः॥

विद्वान् जन नित्य बालक आदि वृद्ध पर्य्यन्त मनुष्यों को सिद्धान्त विद्याओं का उपदेश करें, जिससे उनकी रक्षा और उन्नति होवे और वे भी उनकी सेवा कर अच्छे स्वभाव से पूछ कर विद्वानों के दिये हुए समाधानों को धारण करें, ऐसे हिलमिल के एक दूसरे के उपकार से सब सुखी हों॥४॥

प्र या घोषे॒ भृग॑वाणे॒ न शोभे॒ यया॑ वा॒चा यज॑ति पज्रि॒यो वा॑म्। प्रैष॒युर्न वि॒द्वान्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे पढ़ाने और उपदेश करनेहारे विद्वानो! आप उत्तम शास्त्र जाननेहारे श्रेष्ठ सज्जन के समान सबके सुख के लिये नित्य प्रवृत्त रहो, ऐसे विदुषी स्त्री भी हो। सब मनुष्य विद्याधर्म और अच्छे शीलयुक्त होते हुए निरन्तर शोभायुक्त हों। कोई विद्वान् मूर्ख स्त्री के साथ विवाह न करे और न कोई पढ़ी स्त्री मूर्ख के साथ विवाह करे, किन्तु मूर्ख मूर्खा से और विद्वान् मनुष्य विदुषी स्त्री से सम्बन्ध करें॥५॥

श्रु॒तं गा॑य॒त्रं तक॑वानस्या॒हं चि॒द्धि रि॒रेभा॑श्विना वाम्। आक्षी शु॑भस्पती॒ दन्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जो-जो उत्तम विद्वानों से पढ़ा वा सुना है, उस-उस को औरों को नित्य पढ़ाया और उपदेश किया करें। मनुष्य जैसे औरों से विद्या पावे वैसे ही देवे क्योंकि विद्यादान के समान कोई और धर्म बड़ा नहीं है॥६॥

यु॒वं ह्यास्तं॑ म॒हो रन्यु॒वं वा॒ यन्नि॒रत॑तंसतम्। ता नो॑ वसू सुगो॒पा स्या॑तं पा॒तं नो॒ वृका॑दघा॒योः॥

जैसे सभा सेनाधीश चोर आदि के भय से प्रजाजनों की रक्षा करें वैसे ये भी सब प्रजाजनों के पालना करने योग्य होवें। सब अध्यापक उपदेशक तथा शिक्षक आदि मनुष्य धर्म में स्थिर हुए अधर्म का विनाश करें॥७॥

मा कस्मै॑ धातम॒भ्य॑मि॒त्रिणे॑ नो॒ माकुत्रा॑ नो गृ॒हेभ्यो॑ धे॒नवो॑ गुः। स्त॒ना॒भुजो॒ अशि॑श्वीः॥

प्रजाजन राजजनों को ऐसी शिक्षा देवें कि हम लोगों को शत्रुजन मत पीड़ा दें और हमारे गौ, बैल, घोड़े आदि पशुओं को न चोर लें, ऐसा आप यत्न करो॥८॥

दु॒ही॒यन्मि॒त्रधि॑तये यु॒वाकु॑ रा॒ये च॑ नो मिमी॒तं वाज॑वत्यै। इ॒षे च॑ नो मिमीतं धेनु॒मत्यै॑॥

जो गौ आदि पशु मित्रों की पालना, ज्ञान और धन के कारण हों उनको मनुष्य निरन्तर राखें और सबको पुरुषार्थ के लिये प्रवृत्त करें जिससे सुख का मेल और दुःख से अलग रहें॥९॥

अ॒श्विनो॑रसनं॒ रथ॑मन॒श्वं वा॒जिनी॑वतोः। तेना॒हं भूरि॑ चाकन॥

जो भूमि, जल और अन्तरिक्ष में चलने के विमान आदि यान बनाये जाते हैं, उनमें पशु नहीं जोड़े जाते किन्तु वे पानी और अग्नि के कलायन्त्रों से चलते हैं॥१०॥

अ॒यं स॑मह मा तनू॒ह्याते॒ जनाँ॒ अनु॑। सो॒म॒पेयं॑ सु॒खो रथः॑॥

जो अत्यन्त उत्तम अर्थात् जिससे उत्तम और न बन सके, उस यान का बनानेवाला शिल्पी हो, वह सबको सत्कार करने योग्य है॥११॥

अध॒ स्वप्न॑स्य॒ निर्वि॒देऽभु॑ञ्जतश्च रे॒वतः॑। उ॒भा ता बस्रि॑ नश्यतः॥

जो ऐश्वर्यवान् न देनेवाला वा जो दरिद्री उदारचित्त है, वे दोनों आलसी होते हुए दुःख भोगनेवाले निरन्तर होते हैं, इससे सबको पुरुषार्थ के निमित्त अवश्य यत्न करना चाहिये॥१२॥इस सूक्त में प्रश्नोत्तर पढ़ने-पढ़ाने और राजधर्म के विषय का वर्णन होने से इसके अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये॥यह १२० वाँ सूक्त १७ वाँ अनुवाक और १३ वाँ वर्ग पूरा हुआ॥

सूक्तम्

कदि॒त्था नॄँः पात्रं॑ देवय॒तां श्रव॒द्गिरो॒ अङ्गि॑रसां तुर॒ण्यन्। प्र यदान॒ड्विश॒ आ ह॒र्म्यस्यो॒रु क्रं॑सते अध्व॒रे यज॑त्रः॥

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। हे स्त्री पुरुषो! जैसे शास्त्रवेत्ता विद्वान् सब मनुष्यादि को सत्य बोध कराते और झूठ से रोकते हुए उत्तम शिक्षा देते हैं, वैसे अपने सन्तान आदि को आप निरन्तर अच्छी शिक्षा देओ, जिससे तुम्हारे कुल में अयोग्य सन्तान कभी न उत्पन्न हों॥१॥

स्तम्भी॑द्ध॒ द्यां स ध॒रुणं॑ प्रुषायदृ॒भुर्वाजा॑य॒ द्रवि॑णं॒ नरो॒ गोः। अनु॑ स्व॒जां म॑हि॒षश्च॑क्षत॒ व्रां मेना॒मश्व॑स्य॒ परि॑ मा॒तरं॒ गोः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो आप्त अर्थात् उत्तम शास्त्री विद्वान् के सङ्ग से विद्या, विनय और न्याय आदि का धारण करे वह सुख से बढ़े और बड़ा सत्कार करने योग्य हो॥२॥

नक्ष॒द्धव॑मरु॒णीः पू॒र्व्यं राट् तु॒रो वि॒शामङ्गि॑रसा॒मनु॒ द्यून्। तक्ष॒द्वज्रं॒ नियु॑तं त॒स्तम्भ॒द्द्यां चतु॑ष्पदे॒ नर्या॑य द्वि॒पादे॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य विनय आदि से मनुष्य आदि प्राणी और गौ आदि पशुओं को व्यतीत हुए आप्त, निष्कपट, सत्यवादी राजाओं के समान पालते और अन्याय से किसी को नहीं मारते हैं, वे ही सुखों को पाते हैं और नहीं॥३॥

अ॒स्य मदे॑ स्व॒र्यं॑ दा ऋ॒तायापी॑वृतमु॒स्रिया॑णा॒मनी॑कम्। यद्ध॑ प्र॒सर्गे॑ त्रिक॒कुम्नि॒वर्त॒दप॒ द्रुहो॒ मानु॑षस्य॒ दुरो॑ वः॥

वे ही राजपुरुष उत्तम होते हैं, जो प्रजास्थ मनुष्य और गौ आदि प्राणियों के सुख के लिये हिंसक दुष्ट पुरुषों की निवृत्ति कर धर्म में प्रकाशमान होते और जो परोपकारी होते हैं। जो अधर्म मार्गों को रोक धर्ममार्गों को प्रकाशित करते हैं, वे ही राजकामों के योग्य होते हैं॥४॥

तुभ्यं॒ पयो॒ यत्पि॒तरा॒वनी॑तां॒ राधः॑ सु॒रेत॑स्तु॒रणे॑ भुर॒ण्यू। शुचि॒ यत्ते॒ रेक्ण॒ आय॑जन्त सब॒र्दुघा॑याः॒ पय॑ उ॒स्रिया॑याः॥

मनुष्य लोग जैसे माता-पिता और विद्वानों की सेवा से धर्म के साथ सुखों की प्राप्त होवें, वैसे ही गौ आदि पशुओं की रक्षा से धर्म के साथ सुख पावें। इनके मन के विरुद्ध आचरण को कभी न करें क्योंकि ये सबका उपकार करनेवाले प्राणी हैं, इससे॥५॥

अध॒ प्र ज॑ज्ञे त॒रणि॑र्ममत्तु॒ प्र रो॑च्य॒स्या उ॒षसो॒ न सूरः॑। इन्दु॒र्येभि॒राष्ट॒ स्वेदु॑हव्यैः स्रु॒वेण॑ सि॒ञ्चञ्ज॒रणा॒भि धाम॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्य गौ आदि पशुओं को राख और उनकी वृद्धि कर वैद्यकशास्त्र के अनुसार इन पशुओं से दूध आधि को सेवते हुए बलिष्ठ और अत्यन्त ऐश्वर्ययुक्त निरन्तर हों, जैसे कोई हल, पटेला आदि साधनों से युक्ति के साथ खेत को सिद्ध कर जल से सींचता हुआ अन्न आदि पदार्थों से युक्त होकर बल और ऐश्वर्य्य से सूर्य्य के समान प्रकाशमान होता है, वैसे इन प्रशंसा योग्य कामों को करते हुए प्रकाशित हों॥६॥

स्वि॒ध्मा यद्व॒नधि॑तिरप॒स्यात्सूरो॑ अध्व॒रे परि॒ रोध॑ना॒ गोः। यद्ध॑ प्र॒भासि॒ कृत्व्याँ॒ अनु॒ द्यूनन॑र्विशे प॒श्विषे॑ तु॒राय॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य पशुओं की रक्षा और बढ़ने आदि के लिये वनों को राख, उन्हीं में उन पशुओं को चरा, दूध आदि का सेवन कर खेती आदि कामों को यथावत् करें, वे राज्य के ऐश्वर्य से सूर्य के समान प्रकाशमान होते हैं और गौ आदि पशुओं के मारनेवाले नहीं॥७॥

अ॒ष्टा म॒हो दि॒व आदो॒ हरी॑ इ॒ह द्यु॑म्ना॒साह॑म॒भि यो॑धा॒न उत्स॑म्। हरिं॒ यत्ते॑ म॒न्दिनं॑ दु॒क्षन्वृ॒धे गोर॑भस॒मद्रि॑भिर्वा॒ताप्य॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! तुम जैसे सूर्य्य अपने प्रकाश से सब जगत् को आनन्द देकर अपनी आकर्षण शक्ति से भूगोल का धारण करता है, वैसे ही नदी, सोता, कुआँ, बावरी, तालाब आदि को बनाकर वन वा पर्वतों में घास आदि को बढ़ा, गौ और घोड़े आदि पशुओं की रक्षा और वृद्धि कर, दूध आदि के सेवन से निरन्तर आनन्द को प्राप्त होओ॥८॥

त्वमा॑य॒सं प्रति॑ वर्तयो॒ गोर्दि॒वो अश्मा॑न॒मुप॑नीत॒मृभ्वा॑। कुत्सा॑य॒ यत्र॑ पुरुहूत व॒न्वञ्छुष्ण॑मन॒न्तैः प॑रि॒यासि॑ व॒धैः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! तुम लोग जैसे सूर्य मेघ की वर्षा और अन्धकार को दूर कर सबको हर्ष आनन्दयुक्त करता है, वैसे गौ आदि पशुओं की रक्षा कर उनके मारनेवालों को रोक निरन्तर सुखी होओ। यह काम बुद्धिमानों के सहाय के विना होने को संभव नहीं है, इससे बुद्धिमानों के सहाय से ही उक्त काम का आचरण करो॥९॥

पु॒रा यत्सूर॒स्तम॑सो॒ अपी॑ते॒स्तम॑द्रिवः फलि॒गं हे॒तिम॑स्य। शुष्ण॑स्य चि॒त्परि॑हितं॒ यदोजो॑ दि॒वस्परि॒ सुग्र॑थितं॒ तदादः॑॥

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। हे राजपुरुषो! जैसे सूर्य मेघ को मार और उसको भूमि में गिराय सब प्राणियों को प्रसन्न करता है, वैसे ही गौओं के मारनेवालों को मार गौ आदि पशुओं को निरन्तर सुखी करो॥१०॥

अनु॑ त्वा म॒ही पाज॑सी अच॒क्रे द्यावा॒क्षामा॑ मदतामिन्द्र॒ कर्म॑न्। त्वं वृ॒त्रमा॒शया॑नं सि॒रासु॑ म॒हो वज्रे॑ण सिष्वपो व॒राहु॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजपुरुषों को चाहिये कि विनय और पराक्रम से दुष्ट शत्रुओं को बाँध, मार और निवार अर्थात् उनको धार्मिक मित्र बना कर समस्त प्रजाजनों को अच्छे कामों में प्रवृत्त करा आनन्दित करें॥११॥

त्वमि॑न्द्र॒ नर्यो॒ याँ अवो॒ नॄन्तिष्ठा॒ वात॑स्य सु॒युजो॒ वहि॑ष्ठान्। यं ते॑ का॒व्य उ॒शना॑ म॒न्दिनं॒ दाद्वृ॑त्र॒हणं॒ पार्यं॑ ततक्ष॒ वज्र॑म्॥

जैसे राजपुरुष परमेश्वर की उपासना करने, पढ़ने और उपदेश करनेवाले तथा और उत्तम व्यवहारों में स्थिर प्रजा और सेनाजनों की रक्षा करें, वैसे वे भी उनकी निरन्तर रक्षा किया करें॥१२॥

त्वं सूरो॑ ह॒रितो॑ रामयो॒ नॄन्भर॑च्च॒क्रमेत॑शो॒ नायमि॑न्द्र। प्रास्य॑ पा॒रं न॑व॒तिं ना॒व्या॑ना॒मपि॑ क॒र्तम॑वर्त॒योऽय॑ज्यून्॥

इस मन्त्र में लुप्तोपमा और श्लेषालङ्कार हैं। जैसे सूर्य्य सबको अपने-अपने कामों में लगाता है, वैसे उत्तम शास्त्र जाननेवाले विद्वान् जन मूर्खजनों को शास्त्र और शारीर कर्म में प्रवृत्त करा सब सुखों को सिद्ध करावें॥१३॥

त्वं नो॑ अ॒स्या इ॑न्द्र दु॒र्हणा॑याः पा॒हि व॑ज्रिवो दुरि॒ताद॒भीके॑। प्र नो॒ वाजा॑न्र॒थ्यो॒३॒॑अश्व॑बुध्यानि॒षे य॑न्धि॒ श्रव॑से सू॒नृता॑यै॥

सेनाधीश को चाहिये कि अपनी सेना को शत्रु के मारने से और दुष्ट आचरण से अलग रक्खे तथा वीरों के लिये बल तथा उनकी इच्छा के अनुकूल बल के बढ़ानेवाले पीने योग्य पदार्थ तथा पुष्कल अन्न दे, उनको प्रसन्न और शत्रुओं को अच्छे प्रकार जीत कर प्रजा की निरन्तर रक्षा करे॥१४॥

मा सा ते॑ अ॒स्मत्सु॑म॒तिर्वि द॑स॒द्वाज॑प्रमहः॒ समिषो॑ वरन्त। आ नो॑ भज मघव॒न्गोष्व॒र्यो मंहि॑ष्ठास्ते सध॒मादः॑ स्याम॥

मनुष्यों को चाहिये कि उत्तम बुद्धि आदि की प्राप्ति के लिये परमेश्वर को स्वामी मानें और उसकी प्रार्थना करें। जिससे ईश्वर के जैसे गुण, कर्म और स्वभाव हैं, वैसे अपने सिद्ध करके परमात्मा के साथ आनन्द में निरन्तर स्थित हों॥१५॥इस सूक्त में स्त्री-पुरुष और राज-प्रजा आदि के धर्म का वर्णन होने से पूर्व सूक्तार्थ के साथ इस अर्थ की सङ्गति जाननी चाहिये॥हे जगदीश्वर! जैसे आपकी कृपाकटाक्ष का सहाय जिसको प्राप्त हुआ, उस मैंने ऋग्वेद के प्रथम अष्टक का भाष्य सुख से बनाया, वैसे आगे भी वह ऋग्वेदभाष्य मुझसे बन सके॥यह प्रथम अष्टक के आठवें अध्याय में छब्बीसवाँ वर्ग, प्रथम अष्टक, आठवाँ अध्याय और एकसौ इक्कीसवाँ सूक्त समाप्त हुआ॥१५॥। इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्याणां श्रीपरमविदुषां विरजानन्दसरस्वतीस्वामिनां शिष्येण परमहंसपरिव्राजकाचार्येण श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिना विरचिते संस्कृतार्यभाषाभ्यां समन्विते सुप्रमाणयुक्ते ऋग्वेदभाष्ये प्रथमाष्टकेऽष्टमोऽध्यायोऽलमगात्॥

प्र वः॒ पान्तं॑ रघुमन्य॒वोऽन्धो॑ य॒ज्ञं रु॒द्राय॑ मी॒ळ्हुषे॑ भरध्वम्। दि॒वो अ॑स्तो॒ष्यसु॑रस्य वी॒रैरि॑षु॒ध्येव॑ म॒रुतो॒ रोद॑स्योः॥

इस मन्त्र में पूर्णोपमा और वाचकलुप्तोपमा ये दोनों अलङ्कार हैं। जब मनुष्यों का योग्य पुरुषों के साथ अच्छा यत्न बनता है, तब कठिन भी काम सहज से सिद्ध कर सकते हैं॥१॥

पत्नी॑व पू॒र्वहू॑तिं वावृ॒धध्या॑ उ॒षासा॒नक्ता॑ पुरु॒धा विदा॑ने। स्त॒रीर्नात्कं॒ व्यु॑तं॒ वसा॑ना॒ सूर्य॑स्य श्रि॒या सु॒दृशी॒ हिर॑ण्यैः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। पतिव्रता स्त्री विद्यमान अपने पति को प्रसन्न करती और स्त्रीव्रत अर्थात् नियम से अपनी स्त्री में रमनेहारा पति जैसे दिन-रात्रि सम्बन्ध से मिला हुआ वर्त्तमान है, वैसे सम्बन्ध से वर्त्तमान कपड़े और गहने पहिने हुए सुशोभित धर्मयुक्त व्यवहार में यथावत् प्रयत्न करे॥२॥

म॒मत्तु॑ नः॒ परि॑ज्मा वस॒र्हा म॒मत्तु॒ वातो॑ अ॒पां वृष॑ण्वान्। शि॒शी॒तमि॑न्द्रापर्वता यु॒वं न॒स्तन्नो॒ विश्वे॑ वरिवस्यन्तु दे॒वाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य जैसे हम लोगों को प्रसन्न करें, वैसे हम लोग भी उन मनुष्यों को प्रसन्न करें॥३॥

उ॒त त्या मे॑ य॒शसा॑ श्वेत॒नायै॒ व्यन्ता॒ पान्तौ॑शि॒जो हु॒वध्यै॑। प्र वो॒ नपा॑तम॒पां कृ॑णुध्वं॒ प्र मा॒तरा॑ रास्पि॒नस्या॒योः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सुन्दर शिक्षा से हम लोगों की आयुर्दा को तुम बढ़ाओ, वैसे हम भी तुम्हारी आयुर्दा की उन्नति किया करें॥४॥

आ वो॑ रुव॒ण्युमौ॑शि॒जो हु॒वध्यै॒ घोषे॑व॒ शंस॒मर्जु॑नस्य॒ नंशे॑। प्र वः॑ पू॒ष्णे दा॒वन॒ आँ अच्छा॑ वोचेय व॒सुता॑तिम॒ग्नेः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे वैद्यजन सबके लिये आरोग्यपन दे के रोगों को जल्दी दूर कराते, वैसे सब विद्यावान् सबको सुखी कर अच्छी प्रतिष्ठावाले करें॥५॥

श्रु॒तं मे॑ मित्रावरुणा॒ हवे॒मोत श्रु॑तं॒ सद॑ने वि॒श्वतः॑ सीम्। श्रोतु॑ नः॒ श्रोतु॑रातिः सु॒श्रोतुः॑ सु॒क्षेत्रा॒ सिन्धु॑र॒द्भिः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वानों को चाहिये कि सबके प्रश्नों को सुन के यथावत् उनका समाधान करें॥६॥

स्तु॒षे सा वां॑ वरुण मित्र रा॒तिर्गवां॑ श॒ता पृ॒क्षया॑मेषु प॒ज्रे। श्रु॒तर॑थे प्रि॒यर॑थे॒ दधा॑नाः स॒द्यः पु॒ष्टिं नि॑रुन्धा॒नासो॑ अग्मन्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे इस संसार में विद्वान् जन पुरुषार्थ से अनेकों अद्भुत यानों को बनाते हैं, वैसे औरों को भी बनाने चाहिये॥७॥

अ॒स्य स्तु॑षे॒ महि॑मघस्य॒ राधः॒ सचा॑ सनेम॒ नहु॑षः सु॒वीराः॑। जनो॒ यः प॒ज्रेभ्यो॑ वा॒जिनी॑वा॒नश्वा॑वतो र॒थिनो॒ मह्यं॑ सू॒रिः॥

जैसे पुरुषार्थी मनुष्य समृद्धिमान् होता है, वैसे सब लोगों को होना चाहिये॥८॥

जनो॒ यो मि॑त्रावरुणावभि॒ध्रुग॒पो न वां॑ सु॒नोत्य॑क्ष्णया॒ध्रुक्। स्व॒यं स यक्ष्मं॒ हृद॑ये॒ नि ध॑त्त॒ आप॒ यदीं॒ होत्रा॑भिर्ऋ॒तावा॑॥

जो मनुष्य परोपकार करनेवाले विद्वानों से द्रोह करता वह सदा दुःखी और जो प्रीति करता है, वह सुखी होता है॥९॥

स व्राध॑तो॒ नहु॑षो॒ दंसु॑जूतः॒ शर्ध॑स्तरो न॒रां गू॒र्तश्र॑वाः। विसृ॑ष्टरातिर्याति बाळ्ह॒सृत्वा॒ विश्वा॑सु पृ॒त्सु सद॒मिच्छूरः॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि अपने शत्रु से अधिक युद्ध की सामग्री को इकट्ठी कर अच्छे पुरुषों के सहाय से उस शत्रु को जीतें॥१०॥

अध॒ ग्मन्ता॒ नहु॑षो॒ हवं॑ सू॒रेः श्रोता॑ राजानो अ॒मृत॑स्य मन्द्राः। न॒भो॒जुवो॒ यन्नि॑र॒वस्य॒ राधः॒ प्रश॑स्तये महि॒ना रथ॑वते॥

जो परमेश्वर, परम विद्वान् और अपने आत्मा के सकाश से विरोधी नहीं होते और उनके उपदेशों का ग्रहण करें, वे विद्याओं को प्राप्त हुए महाशय होते हैं॥११॥

ए॒तं शर्धं॑ धाम॒ यस्य॑ सू॒रेरित्य॑वोच॒न्दश॑तयस्य॒ नंशे॑। द्यु॒म्नानि॒ येषु॑ व॒सुता॑ती रा॒रन्विश्वे॑ सन्वन्तु प्रभृ॒थेषु॒ वाज॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वान् मनुष्य पूर्ण विद्याओं को जाननेहारे समस्त विद्याओं को पाकर औरों को उपदेश देते हैं, वे यशस्वी होते हैं॥१२॥

मन्दा॑महे॒ दश॑तयस्य धा॒सेर्द्विर्यत्पञ्च॒ बिभ्र॑तो॒ यन्त्यन्ना॑। किमि॒ष्टाश्व॑ इ॒ष्टर॑श्मिरे॒त ई॑शा॒नास॒स्तरु॑ष ऋञ्जते॒ नॄन्॥

जो अच्छी शिक्षा से सबको विद्वान् करते हुए साधनों से चाहे हुए को सिद्ध करनेवाले समर्थ विद्वानों का सेवन नहीं करते, वे अभीष्ट सुख को भी नहीं प्राप्त होते हैं॥१३॥

हिर॑ण्यकर्णं मणिग्रीव॒मर्ण॒स्तन्नो॒ विश्वे॑ वरिवस्यन्तु दे॒वाः। अ॒र्यो गिरः॑ स॒द्य आ ज॒ग्मुषी॒रोस्राश्चा॑कन्तू॒भये॑ष्व॒स्मे॥

जो विद्वान् मनुष्य वा विदुषी पण्डिता स्त्री लड़के-लड़कियों को शीघ्र विद्वान् और विदुषी करते वा जो वणियें सब देशों की भाषाओं को जानके देश-देशान्तर और द्वीप-द्वीपान्तर से धन को लाख ऐश्वर्ययुक्त होते हैं, वे सबको सब प्रकारों से सत्कार करने योग्य हैं॥१४॥

च॒त्वारो॑ मा मश॒र्शार॑स्य॒ शिश्व॒स्त्रयो॒ राज्ञ॒ आय॑वसस्य जि॒ष्णोः। रथो॑ वां मित्रावरुणा दी॒र्घाप्साः॒ स्यूम॑गभस्तिः॒ सूरो॒ नाद्यौ॑त्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जिस राजा के राज्य में विद्या और अच्छी शिक्षायुक्त गुण, कर्म, स्वभाव से नियमयुक्त धर्मात्माजन चारों वर्ण और आश्रम तथा सेना, प्रजा और न्यायाधीश हैं, वह सूर्य्य के तुल्य कीर्त्ति से अच्छी शोभायुक्त होता है॥१५॥इस सूक्त में राजा, प्रजा और साधारण मनुष्यों के धर्म के वर्णन से इस सूक्त में कहे हुए अर्थ की पिछले सूक्त के साथ एकता है, यह जानना चाहिये॥यह १२२ एकसौ बाईसवाँ सूक्त और तीसरा वर्ग पूरा हुआ॥

पृ॒थू रथो॒ दक्षि॑णाया अयो॒ज्यैनं॑ दे॒वासो॑ अ॒मृता॑सो अस्थुः। कृ॒ष्णादुद॑स्थाद॒र्या॒३॒॑ विहा॑या॒श्चिकि॑त्सन्ती॒ मानु॑षाय॒ क्षया॑य॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो प्रातःसमय की वेला के गुणयुक्त अर्थात् शीतल स्वभाववाली स्त्री और चन्द्रमा के समान शीतल गुणवाला पुरुष हो, उनका परस्पर विवाह हो तो निरन्तर सुख होता है॥१॥

पूर्वा॒ विश्व॑स्मा॒द्भुव॑नादबोधि॒ जय॑न्ती॒ वाजं॑ बृह॒ती सनु॑त्री। उ॒च्चा व्य॑ख्यद्युव॒तिः पु॑न॒र्भूरोषा अ॑गन्प्रथ॒मा पू॒र्वहू॑तौ॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सब कन्या पच्चीस वर्ष अपनी आयु को विद्या के अभ्यास करने में व्यतीत कर पूरी विद्यावाली होकर अपने समान पति से विवाह कर प्रातःकाल की वेला के समान अच्छे रूपवाली हों॥२॥

यद॒द्य भा॒गं वि॒भजा॑सि॒ नृभ्य॒ उषो॑ देवि मर्त्य॒त्रा सु॑जाते। दे॒वो नो॒ अत्र॑ सवि॒ता दमू॑ना॒ अना॑गसो वोचति॒ सूर्या॑य॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जब दो स्त्री-पुरुष विद्यावान् धर्म का आचरण और विद्या का प्रचार करनेहारे सब कभी परस्पर में प्रसन्न हों, तब गृहाश्रम में अत्यन्त सुख का सेवन करनेहारे होवें॥३॥

गृ॒हंगृ॑हमह॒ना या॒त्यच्छा॑ दि॒वेदि॑वे॒ अधि॒ नामा॒ दधा॑ना। सिषा॑सन्ती द्योत॒ना शश्व॒दागा॒दग्र॑मग्र॒मिद्भ॑जते॒ वसू॑नाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य की कान्ति-घाम सब पदार्थों के अगले-अगले भाग को सेवन करती और नियम से प्रत्येक समय प्राप्त होती है, वैसे स्त्री को भी होना चाहिये॥४॥

भग॑स्य॒ स्वसा॒ वरु॑णस्य जा॒मिरुषः॑ सूनृते प्रथ॒मा ज॑रस्व। प॒श्चा स द॑घ्या॒ यो अ॒घस्य॑ धा॒ता जये॑म॒ तं दक्षि॑णया॒ रथे॑न॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। स्त्रियों को चाहिये कि अपने-अपने घर में ऐश्वर्य की उन्नति श्रेष्ठ रीति और दुष्टों का ताड़न निरन्तर किया करें॥५॥

उदी॑रतां सू॒नृता॒ उत्पुर॑न्धी॒रुद॒ग्नयः॑ शुशुचा॒नासो॑ अस्थुः। स्पा॒र्हा वसू॑नि॒ तम॒साप॑गूळ्हा॒विष्कृ॑ण्वन्त्यु॒षसो॑ विभा॒तीः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जब स्त्रीजन प्रभातसमय की वेलाओं के समान वर्त्तमान अविद्या, मैलापन आदि दोषों को निराले [= दूर] कर विद्या और पाकपन आदि गुणों को प्रकाश कर ऐश्वर्य्य की उन्नति करती हैं, तब वे निरन्तर सुखयुक्त होती हैं॥६॥

अपा॒न्यदेत्य॒भ्य१॒॑न्यदे॑ति॒ विषु॑रूपे॒ अह॑नी॒ सं च॑रेते। प॒रि॒क्षितो॒स्तमो॑ अ॒न्या गुहा॑क॒रद्यौ॑दु॒षाः शोशु॑चता॒ रथे॑न॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। इस जगत् में अन्धेरा-उजेला दो पदार्थ हैं, जिनसे सदैव पृथिवी आदि लोकों के आधे भाग में दिन और आधे में रात्रि रहती है। जो वस्तु अन्धकार को छोड़ता वह उजेले का ग्रहण करता और जितना प्रकाश अन्धकार को छोड़ता उतना रात्रि लेती, दोनों पारी से सदैव अपनी व्याप्ति के साथ पाये-पाये हुए पदार्थ को ढाँपते और दोनों एक साथ वर्त्तमान हैं। उनका जहाँ-जहाँ संयोग है वहाँ-वहाँ संध्या और जहाँ-जहाँ वियोग होता अर्थात् अलग होते वहाँ-वहाँ रात्रि और दिन होता। जो स्त्री-पुरुष ऐसे मिल और अलग होकर दुःख के कारणों को छोड़ते और सुख के कारणों को ग्रहण करते वे सदैव आनन्दित होते हैं॥७॥

स॒दृशी॑र॒द्य स॒दृशी॒रिदु॒ श्वो दी॒र्घं स॑चन्ते॒ वरु॑णस्य॒ धाम॑। अ॒न॒व॒द्यास्त्रिं॒शतं॒ योज॑ना॒न्येकै॑का॒ क्रतुं॒ परि॑ यन्ति स॒द्यः॥

जैसे ईश्वर के नियम को प्राप्त जो हो गये, होते और होनेवाले रात्रि-दिन हैं उनका अन्यथापन नहीं होता, वैसे ही इस सब संसार के क्रम का विपरीत भाव नहीं होता तथा जो मनुष्य आलस को छोड़ सृष्टिक्रम की अनुकूलता से अच्छा यत्न किया करते हैं, वे प्रशंसित विद्या और ऐश्वर्य्यवाले होते हैं और जैसे यह रात्रि दिन नियत समय आता और जाता वैसे ही मनुष्यों को व्यवहारों में सदा अपना वर्ताव रखना चाहिये॥८॥

जा॒न॒त्यह्नः॑ प्रथ॒मस्य॒ नाम॑ शु॒क्रा कृ॒ष्णाद॑जनिष्ट श्विती॒ची। ऋ॒तस्य॒ योषा॒ न मि॑नाति॒ धामाह॑रहर्निष्कृ॒तमा॒चर॑न्ती॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रातःसमय की वेला अन्धकार से उत्पन्न होकर दिन को प्रसिद्ध करती है, दिन से विरोध करनेहारी नहीं होती वैसे स्त्री सत्य आचरण से तथा अपने माता, पिता और पति के कुल को उत्तम कीर्ति से प्रशस्त कर अपने श्वसुर और पति के प्रति उनके अप्रसन्न होने का व्यवहार कुछ न करे॥९॥

क॒न्ये॑व त॒न्वा॒३॒॑ शाश॑दानाँ॒ एषि॑ देवि दे॒वमिय॑क्षमाणम्। सं॒स्मय॑माना युव॒तिः पु॒रस्ता॑दा॒विर्वक्षां॑सि कृणुषे विभा॒ती॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे विदुषी ब्रह्मचारिणी स्त्री पूरी विद्या शिक्षा और अपने समान मनमाने पति को पा कर सुखी होती है, वैसे ही और स्त्रियों को भी आचरण करना चाहिये॥१०॥

सु॒सं॒का॒शा मा॒तृमृ॑ष्टेव॒ योषा॒विस्त॒न्वं॑ कृणुषे दृ॒शे कम्। भ॒द्रा त्वमु॑षो वित॒रं व्यु॑च्छ॒ न तत्ते॑ अ॒न्या उ॒षसो॑ नशन्त॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे प्रातःकाल की वेला नियम से अपने अपने समय और देश को प्राप्त होती है, वैसे स्त्री अपने-अपने पति को पा कर ऋतुधर्म को प्राप्त होवें॥११॥

अश्वा॑वती॒र्गोम॑तीर्वि॒श्ववा॑रा॒ यत॑माना र॒श्मिभिः॒ सूर्य॑स्य। परा॑ च॒ यन्ति॒ पुन॒रा च॑ यन्ति भ॒द्रा नाम॒ वह॑माना उ॒षासः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रभातवेला सूर्य के संयोग से नियम को प्राप्त हैं, वैसे विवाहित स्त्रीपुरुष परस्पर प्रेम के स्थिर करनेहारे हों॥१२॥

ऋ॒तस्य॑ र॒श्मिम॑नु॒यच्छ॑माना भ॒द्रम्भ॑द्रं॒ क्रतु॑म॒स्मासु॑ धेहि। उषो॑ नो अ॒द्य सु॒हवा॒ व्यु॑च्छा॒स्मासु॒ रायो॑ म॒घव॑त्सु च स्युः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे श्रेष्ठ स्त्री अपने-अपने पति आदि की यथावत् सेवा कर बुद्धि, धर्म और ऐश्वर्य्य को नित्य बढ़ाती हैं, वैसे प्रभात समय की वेला भी हैं॥१३॥इस सूक्त में प्रभात समय की वेला के दृष्टान्त से स्त्रियों के धर्म का वर्णन करने से इस सूक्त में कहे हुए अर्थ की पिछले सूक्त में कहे अर्थ के साथ एकता है, यह जानना चाहिये॥यह १२३ वाँ सूक्त और ६ छठा वर्ग पूरा हुआ॥

उ॒षा उ॒च्छन्ती॑ समिधा॒ने अ॒ग्ना उ॒द्यन्त्सूर्य॑ उर्वि॒या ज्योति॑रश्रेत्। दे॒वो नो॒ अत्र॑ सवि॒ता न्वर्थं॒ प्रासा॑वीद्द्वि॒पत्प्र चतु॑ष्पदि॒त्यै॥

पृथिवी का सूर्य की किरणों के साथ संयोग होता है, वही संयोग तिरछा जाता हुआ प्रभात समय के होने का कारण होता है, जो सूर्य न हो तो अनेक प्रकार के पदार्थ अलग-अलग देखे नहीं जा सकते हैं॥१॥

अमि॑नती॒ दैव्या॑नि व्र॒तानि॑ प्रमिन॒ती म॑नु॒ष्या॑ यु॒गानि॑। ई॒युषी॑णामुप॒मा शश्व॑तीनामायती॒नां प्र॑थ॒मोषा व्य॑द्यौत्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे यह प्रातःसमय की वेला विस्तारयुक्त पृथ्वी और सूर्य के साथ चलनेहारी जितने पूर्व देश को छोड़ती उतने उत्तर देश को ग्रहण करती है तथा वर्त्तमान और व्यतीत हुई प्रातःसमय की वेलाओं की उपमा और आनेवालियों की पहिली हुई कार्यरूप जगत् का और जगत् के कारण का अच्छे प्रकार ज्ञान कराती और सत्य धर्म के आचरण निमित्तक समय का अङ्ग होने से उमर को घटाती हुई वर्त्तमान है, वह सेवन की हुई बुद्धि और आरोग्य आदि अच्छे गुणों को देती है, वैसे पण्डिता स्त्री हों॥२॥

ए॒षा दि॒वो दु॑हि॒ता प्रत्य॑दर्शि॒ ज्योति॒र्वसा॑ना सम॒ना पु॒रस्ता॑त्। ऋ॒तस्य॒ पन्था॒मन्वे॑ति सा॒धु प्र॑जान॒तीव॒ न दिशो॑ मिनाति॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अच्छे नियम से वर्त्तमान हुई प्रातः समय की वेला सबको आनन्दित कराती और वह अपने उत्तम स्वभाव को नहीं नष्ट करती, वैसे स्त्री लोग गिरस्ती के धर्म में वर्त्तें॥३॥

उपो॑ अदर्शि शु॒न्ध्युवो॒ न वक्षो॑ नो॒धा इ॑वा॒विर॑कृत प्रि॒याणि॑। अ॒द्म॒सन्न स॑स॒तो बो॒धय॑न्ती शश्वत्त॒मागा॒त्पुन॑रे॒युषी॑णाम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो स्त्री प्रभात वेला वा सूर्य वा विद्वान् के समान अपने सन्तानों को उत्तम शिक्षा से विद्वान् करती है, वह सबको सत्कार करने योग्य है॥४॥

पूर्वे॒ अर्धे॒ रज॑सो अ॒प्त्यस्य॒ गवां॒ जनि॑त्र्यकृत॒ प्र के॒तुम्। व्यु॑ प्रथते वित॒रं वरी॑य॒ ओभा पृ॒णन्ती॑ पि॒त्रोरु॒पस्था॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। प्रभात वेला से प्रसिद्ध हुआ सूर्यमण्डल का प्रकाश भूगोल के आधे भाग में सब कभी उजेला करता है और आधे भाग में रात्रि होती है, उन दिन रात्रि के बीच में प्रातःसमय की वेला विराजमान है, ऐसे निरन्तर रात्रि प्रभातवेला और दिन क्रम से वर्त्तमान हैं। इससे क्या आया कि जितना पृथिवी का प्रदेश सूर्यमण्डल के आगे होता, उतने में दिन और जितना पीछे होता जाता, उतने में रात्रि होती तथा सायं और प्रातःकाल की सन्धि में उषा होती है, इसी उक्त प्रकार से लोकों के घूमने के द्वारा ये सायं प्रातःकाल भी घूमते से दिखाई देते हैं॥५॥

ए॒वेदे॒षा पु॑रु॒तमा॑ दृ॒शे कं नाजा॑मिं॒ न परि॑ वृणक्ति जा॒मिम्। अ॒रे॒पसा॑ त॒न्वा॒३॒॑ शाश॑दाना॒ नार्भा॒दीष॑ते॒ न म॒हो वि॑भा॒ती॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पतिव्रता स्त्री अपने पति को छोड़ और के पति का सङ्ग नहीं करती वा जैसे स्त्रीव्रत पुरुष अपनी स्त्री से भिन्न दूसरी स्त्री का सम्बन्ध नहीं करता और विवाह किये हुए स्त्रीपुरुष नियम और समय के अनुकूल सङ्ग करते हैं, वैसे ही प्रातःसमय की वेला नियमयुक्त देश और समय को छोड़ अन्यत्र युक्त नहीं होती॥६॥

अ॒भ्रा॒तेव॑ पुं॒स ए॑ति प्रती॒ची ग॑र्ता॒रुगि॑व स॒नये॒ धना॑नाम्। जा॒येव॒ पत्य॑ उश॒ती सु॒वासा॑ उ॒षा ह॒स्रेव॒ नि रि॑णीते॒ अप्सः॑॥

इस मन्त्र में चार उपमालङ्कार हैं। जैसे विना भाई की कन्या अपनी प्रीति से चाहे हुए पति को आप प्राप्त होती वा जैसे न्यायाधीश राजा, राजपत्नी और धन आदि पदार्थों के विभाग करने के लिये न्यायासन अर्थात् राजगद्दी [को], जैसे हँसमुखी स्त्री आनन्दयुक्त पति को प्राप्त होती और अच्छे रूप से अपने हावभाव को प्रकाशित करती, वैसे ही यह प्रातःसमय की वेला है, यह समझना चाहिये॥७॥

स्वसा॒ स्वस्रे॒ ज्याय॑स्यै॒ योनि॑मारै॒गपै॑त्यस्याः प्रति॒चक्ष्ये॑व। व्यु॒च्छन्ती॑ र॒श्मिभिः॒ सूर्य॑स्या॒ञ्ज्य॑ङ्क्ते समन॒गा इ॑व॒ व्राः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। छोटी बहिन जेठी बहिन के वर्त्तमान हाल को जान आप स्वयंवर विवाह के लिये दूर भी ठहरे हुए अपने अनुकूल पति का ग्रहण करे, जैसे शान्त पतिव्रता स्त्री अपने अपने पति को सेवन करती है, वैसे अपने पति का सेवन करे, जैसे सूर्य अपनी कान्ति के साथ और कान्ति सूर्य के साथ नित्य अनुकूलता से वर्त्ते, वैसे ही स्त्री-पुरुष हों॥८॥

आ॒सां पूर्वा॑सा॒मह॑सु॒ स्वसॄ॑णा॒मप॑रा॒ पूर्वा॑म॒भ्ये॑ति प॒श्चात्। ताः प्र॑त्न॒वन्नव्य॑सीर्नू॒नम॒स्मे रे॒वदु॑च्छन्तु सु॒दिना॑ उ॒षासः॑॥

जैसे बहुत बहिनें दूर दूर देश में विवाही हुई होती उनमें कभी किसी के साथ कोई मिलती और अपने व्यवहार को कहती है, वैसे पिछिली प्रातःसमय की वेला वर्त्तमान वेला के साथ संयुक्त होकर अपने व्यवहार को प्रसिद्ध करती है॥९॥

प्र बो॑धयोषः पृण॒तो म॑घो॒न्यबु॑ध्यमानाः प॒णयः॑ ससन्तु। रे॒वदु॑च्छ म॒घव॑द्भ्यो मघोनि रे॒वत्स्तो॒त्रे सू॑नृते जा॒रय॑न्ती॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। किसी को रात्रि के पिछले पहर में वा दिन में न सोना चाहिये क्योंकि नींद और दिन के घाम आदि की अधिक गरमी के योग से रोगों की उत्पत्ति होने से तथा काम और अवस्था की हानि से, जैसे पुरुषार्थ की युक्ति से बहुत धन को प्राप्त होता, वैसे सूर्योदय से पहिले उठ कर यत्नवान् पुरुष दरिद्रता का त्याग करता है॥१०॥

अवे॒यम॑श्वैद्युव॒तिः पु॒रस्ता॑द्यु॒ङ्क्ते गवा॑मरु॒णाना॒मनी॑कम्। वि नू॒नमु॑च्छा॒दस॑ति॒ प्र के॒तुर्गृ॒हंगृ॑ह॒मुप॑ तिष्ठाते अ॒ग्निः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रभातवेला और दिन सदैव मिले हुए वर्त्तमान हैं, वैसे ही विवाहित स्त्री-पुरुष मेल से अपना वर्त्ताव रक्खें और जिस नियम के जो पदार्थ हों, उस नियम से उनको पावें तब इनका प्रताप बढ़ता है॥११॥

उत्ते॒ वय॑श्चिद्वस॒तेर॑पप्त॒न्नर॑श्च॒ ये पि॑तु॒भाजो॒ व्यु॑ष्टौ। अ॒मा स॒ते व॑हसि॒ भूरि॑ वा॒ममुषो॑ देवि दा॒शुषे॒ मर्त्या॑य॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पखेरू ऊपर और नीचे जाते हैं, वैसे प्रातःसमय की वेला रात्रि और दिन के ऊपर और नीचे जाती है तथा जैसे स्त्री पति के प्रियाचरण को करे, वैसे ही पति भी स्त्री के प्यारे आचरण को करे॥१२॥

अस्तो॑ढ्वं स्तोम्या॒ ब्रह्म॑णा॒ मेऽवी॑वृधध्वमुश॒तीरु॑षासः। यु॒ष्माकं॑ देवी॒रव॑सा सनेम सह॒स्रिणं॑ च श॒तिनं॑ च॒ वाज॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रातर्वेला अच्छे गुण, कर्म और स्वभाववाली है, वैसी स्त्री हों और वैसे उत्तम गुण, कर्मवाले मनुष्य हों जैसे और विद्वान् से अपने प्रयोजन के लिये विद्या लेवें, वैसे ही प्रीति से औरों के लिये भी विद्या देवें॥१३॥इस सूक्त में प्रभात वेला के दृष्टान्त से स्त्रियों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह १२४ वाँ सूक्त और ९ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्रा॒ता रत्नं॑ प्रात॒रित्वा॑ दधाति॒ तं चि॑कि॒त्वान्प्र॑ति॒गृह्या॒ नि ध॑त्ते। तेन॑ प्र॒जां व॒र्धय॑मान॒ आयू॑ रा॒यस्पोषे॑ण सचते सु॒वीरः॑॥

जो आलस्य को छोड़ धर्म सम्बन्धी व्यवहार से धन को पा उसकी रक्षा उसका स्वयं भोग कर दूसरों को भोग करा और दे-ले कर निरन्तर उत्तम यत्न करे, वह सब सुखों को प्राप्त होवे॥१॥

सु॒गुर॑सत्सुहिर॒ण्यः स्वश्वो॑ बृ॒हद॑स्मै॒ वय॒ इन्द्रो॑ दधाति। यस्त्वा॒यन्तं॒ वसु॑ना प्रातरित्वो मु॒क्षीज॑येव॒ पदि॑मुत्सि॒नाति॑॥

जो विद्वान् पाये हुए शिष्यों को उत्तम शिक्षा अर्थात् अधर्म और विषय भोग की चञ्चलता के त्याग आदि के उपदेश से बहुत आयुर्दायुक्त विद्या और धनवाले करता है, वह इस संसार में उत्तम कीर्तिमान् होता है॥२॥

आय॑म॒द्य सु॒कृतं॑ प्रा॒तरि॒च्छन्नि॒ष्टेः पु॒त्रं वसु॑मता॒ रथे॑न। अं॒शोः सु॒तं पा॑यय मत्स॒रस्य॑ क्ष॒यद्वी॑रं वर्धय सू॒नृता॑भिः॥

स्त्री-पुरुष पूरे ब्रह्मचर्य से विद्या का संग्रह और एक-दूसरे की प्रसन्नता से विवाह कर धर्मयुक्त व्यवहार से पुत्र आदि सन्तानों को उत्पन्न करें और उनकी रक्षा कराने के लिये धर्मवती धायि को देवें और वह इस सन्तान को उत्तम शिक्षा से युक्त करे॥३॥

उप॑ क्षरन्ति॒ सिन्ध॑वो मयो॒भुव॑ ईजा॒नं च॑ य॒क्ष्यमा॑णं च धे॒नवः॑। पृ॒णन्तं॑ च॒ पपु॑रिं च श्रव॒स्यवो॑ घृ॒तस्य॒ धारा॒ उप॑ यन्ति वि॒श्वतः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो पुरुष और स्त्री गृहाश्रम में एक दूसरे के प्रिय आचरण और विद्याओं का अभ्यास करके सन्तानों को अभ्यास कराते हैं, वे निरन्तर सुखों को प्राप्त होते हैं॥४॥

नाक॑स्य पृ॒ष्ठे अधि॑ तिष्ठति श्रि॒तो यः पृ॒णाति॒ स ह॑ दे॒वेषु॑ गच्छति। तस्मा॒ आपो॑ घृ॒तम॑र्षन्ति॒ सिन्ध॑व॒स्तस्मा॑ इ॒यं दक्षि॑णा पिन्वते॒ सदा॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य इस मनुष्य देह का आश्रय कर सत्पुरुषों का सङ्ग और धर्म के अनुकूल आचरण को सदा करते वे सदैव सुखी होते हैं। जो विद्वान् वा जो विदुषी पण्डिता स्त्री, बालक, ज्वान और बुड्ढे मनुष्यों तथा कन्या, युवति और बुड्ढी स्त्रियों को निष्कपटता से विद्या और उत्तम शिक्षा को निरन्तर प्राप्त कराते, वे इस संसार में समग्र सुख को प्राप्त होकर अन्तकाल में मोक्ष को अधिगत होते अर्थात् अधिकता से प्राप्त होते हैं॥५॥

दक्षि॑णावता॒मिदि॒मानि॑ चि॒त्रा दक्षि॑णावतां दि॒वि सूर्या॑सः। दक्षि॑णावन्तो अ॒मृतं॑ भजन्ते॒ दक्षि॑णावन्तः॒ प्र ति॑रन्त॒ आयुः॑॥

जो ब्राह्मण सब मनुष्यों के सुख के लिये विद्या और उत्तम शिक्षा का दान, वा जो क्षत्रिय न्याय के अनुकूल व्यवहार से प्रजा जनों को अभय दान, वा जो वैश्य धर्म से इकट्ठे किये हुए धन का दान और जो शूद्र सेवा दान करते हैं, वे पूर्ण आयुवाले होकर इस जन्म और दूसरे जन्म में निरन्तर आनन्द को भोगते हैं॥६॥

मा पृ॒णन्तो॒ दुरि॑त॒मेन॒ आर॒न्मा जा॑रिषुः सू॒रयः॑ सुव्र॒तासः॑। अ॒न्यस्तेषां॑ परि॒धिर॑स्तु॒ कश्चि॒दपृ॑णन्तम॒भि सं य॑न्तु॒ शोकाः॑॥

इस संसार में दो प्रकार के मनुष्य होते हैं, एक धार्मिक और दूसरे पापी। ये दोनों अच्छे प्रकार अलग-अलग स्थान और आचरणवाले हैं अर्थात् जो धार्मिक हैं, वे धर्मात्माओं के अनुकरण ही से धर्ममार्ग में चलते और जो दुष्ट आचरण करनेवाले पापी हैं, वे अधर्मी दुष्ट जनों के आचरण ही से अधर्म में चलते हैं। कभी किन्हीं धर्मात्माओं को अधर्मी दुष्ट जनों के मार्ग में नहीं चलना चाहिये और अधर्मी दुष्टों को अपनी दुष्टता छोड़ धार्मिकों के मार्ग में चलना योग्य है। इस प्रकार प्रत्येक जाति के पीछे धार्मिक और अधार्मिकों के दो मार्ग हैं, उनमें धर्म करनेवालों को सुख और अधर्मी दुष्टों को दुःख सदा प्राप्त होते हैं॥७॥इस सूक्त में धर्म के अनुकूल आचरण का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह एकसौ पच्चसीवाँ सूक्त और दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अम॑न्दा॒न्त्स्तोमा॒न्प्र भ॑रे मनी॒षा सिन्धा॒वधि॑ क्षिय॒तो भा॒व्यस्य॑। यो मे॑ स॒हस्र॒ममि॑मीत स॒वान॒तूर्तो॒ राजा॒ श्रव॑ इ॒च्छमा॑नः॥

जब तक सकल शास्त्र जाननेहारे विद्वान् की आज्ञा से पुरुषार्थी विद्वान् न हो, तब तक उसका राज्य के अधिकार में स्थापन न करे॥१॥

श॒तं राज्ञो॒ नाध॑मानस्य नि॒ष्काञ्छ॒तमश्वा॒न्प्रय॑तान्त्स॒द्य आद॑म्। श॒तं क॒क्षीवाँ॒ असु॑रस्य॒ गोनां॑ दि॒वि श्रवो॒ऽजर॒मा त॑तान॥

जो न्यायकारी विद्वान् राजा के समीप से सत्कार को प्राप्त होते हैं, वे यश का विस्तार करते हैं॥२॥

उप॑ मा श्या॒वाः स्व॒नये॑न द॒त्ता व॒धूम॑न्तो॒ दश॒ रथा॑सो अस्थुः। ष॒ष्टिः स॒हस्र॒मनु॒ गव्य॒मागा॒त्सन॑त्क॒क्षीवाँ॑ अभिपि॒त्वे अह्ना॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिस कारण सब योद्धा राजा के समीप से धन आदि पदार्थ की प्राप्ति चाहते हैं, इससे राजा को उनके लिये यथायोग्य धन आदि पदार्थ देना योग्य है, ऐसे विना किये उत्साह नहीं होता॥३॥

च॒त्वा॒रिं॒शद्दश॑रथस्य॒ शोणाः॑ स॒हस्र॒स्याग्रे॒ श्रेणिं॑ नयन्ति। म॒द॒च्युतः॑ कृश॒नाव॑तो॒ अत्या॑न्क॒क्षीव॑न्त॒ उद॑मृक्षन्त प॒ज्राः॥

जिनके चार घोड़ा, युक्त दशों दिशाओं में रथ, सहस्रों अश्ववार (असवार), लाखों पैदल जानेवाले, अत्यन्त पूर्ण कोश धन और पूर्ण विद्या, विनय, नम्रता आदि गुण हैं, वे ही चक्रवर्त्ति राज्य करने को योग्य हैं॥४॥

पूर्वा॒मनु॒ प्रय॑ति॒मा द॑दे व॒स्त्रीन्यु॒क्ताँ अ॒ष्टाव॒रिधा॑यसो॒ गाः। सु॒बन्ध॑वो॒ ये वि॒श्या॑ इव॒ व्रा अन॑स्वन्तः॒ श्रव॒ ऐष॑न्त प॒ज्राः॥

जो जन सभा, सेना और शाला के अधिकारी, कुशल चतुर आठ सभासदों, शत्रुओं का विनाश करनेवाले वीरों, गौ बैल आदि पशुओं, मित्र, धनी, वणिक्जनों और खेती करनेवालों की अच्छे प्रकार रक्षा करके अन्न आदि ऐश्वर्य्य की उन्नति करते हैं, वे मनुष्यों में शिरोमणि अर्थात् अत्यन्त उत्तम होते हैं॥५॥

आग॑धिता॒ परि॑गधिता॒ या क॑शी॒केव॒ जङ्ग॑हे। ददा॑ति॒ मह्यं॒ यादु॑री॒ याशू॑नां भो॒ज्या॑ श॒ता॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जिस नीति अर्थात् धर्म की चाल (से) अगणित सुख हों, वह सबको सिद्ध करनी चाहिये॥६॥

उपो॑प मे॒ परा॑ मृश॒ मा मे॑ द॒भ्राणि॑ मन्यथाः। सर्वा॒हम॑स्मि रोम॒शा ग॒न्धारी॑णामिवावि॒का॥

रानी राजा के प्रति कहे कि मैं आप से न्यून नहीं हूँ, जैसे आप पुरुषों के न्यायाधीश हो, वैसे मैं स्त्रियों का न्याय करनेवाली होती हूँ, और जैसे पहिले राजा-महाराजाओं की स्त्री प्रजास्थ स्त्रियों की न्याय करनेवाली हुई, वैसे मैं भी होऊँ॥७॥इस सूक्त में राजाओं के धर्म का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ एकता है, यह जानना चाहिये॥यह एकसौ छब्बीसवाँ सूक्त, ग्यारहवाँ वर्ग और अठारहवाँ अनुवाक समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

अ॒ग्निं होता॑रं मन्ये॒ दास्व॑न्तं॒ वसुं॑ सू॒नुं सह॑सो जा॒तवे॑दसं॒ विप्रं॒ न जा॒तवे॑दसम्। य ऊ॒र्ध्वया॑ स्वध्व॒रो दे॒वो दे॒वाच्या॑ कृ॒पा। घृ॒तस्य॒ विभ्रा॑ष्टि॒मनु॑ वष्टि शो॒चिषा॒जुह्वा॑नस्य स॒र्पिषः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिसकी उत्तम गुणवाले में बहुत प्रशंसा जिसका अति उत्तम शरीर और आत्मा का बल हो, उस पुरुष को स्त्री पतिपने के लिये स्वीकार करे, ऐसा पुरुष भी इसी प्रकार की स्त्री को भार्यापन के लिये स्वीकार करे॥१॥

यजि॑ष्ठं त्वा॒ यज॑माना हुवेम॒ ज्येष्ठ॒मङ्गि॑रसां विप्र॒ मन्म॑भि॒र्विप्रे॑भिः शुक्र॒ मन्म॑भिः। परि॑ज्मानमिव॒ द्यां होता॑रं चर्षणी॒नाम्। शो॒चिष्के॑शं॒ वृष॑णं॒ यमि॒मा विशः॒ प्राव॑न्तु जू॒तये॒ विशः॑॥

विद्वान् और प्रजाजन जिसकी प्रशंसा करें, उसी आप्त सर्वशास्त्रवेत्ता विद्वान् का आश्रय सब मनुष्य करें॥२॥

स हि पु॒रू चि॒दोज॑सा वि॒रुक्म॑ता॒ दीद्या॑नो॒ भव॑ति द्रुहन्त॒रः प॑र॒शुर्न द्रु॑हन्त॒रः। वी॒ळु चि॒द्यस्य॒ समृ॑तौ॒ श्रुव॒द्वने॑व॒ यत्स्थि॒रम्। निः॒षह॑माणो यमते॒ नाय॑ते धन्वा॒सहा॒ नाय॑ते॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को जानना चाहिये कि जो शत्रुओं से नहीं पराजित होता और अपने प्रशंसित बल से उनको जीत सकता है, वही प्रजा पालनेवालों में शिरोमणि होता है॥३॥

दृ॒ळ्हा चि॑दस्मा॒ अनु॑ दु॒र्यथा॑ वि॒दे तेजि॑ष्ठाभिर॒रणि॑भिर्दा॒ष्ट्यव॑से॒ऽग्नये॑ दा॒ष्ट्यव॑से। प्र यः पु॒रूणि॒ गाह॑ते॒ तक्ष॒द्वने॑व शो॒चिषा॑। स्थि॒रा चि॒दन्ना॒ नि रि॑णा॒त्योज॑सा॒ नि स्थि॒राणि॑ चि॒दोज॑सा॥

इस मन्त्र में दो उपमालङ्कार हैं। जैसे विद्वान् जन विद्या के प्रचार से मनुष्यों के आत्माओं को प्रकाशित कर सबको पुरुषार्थी बनाते हैं, वैसे न्यायाधीश विद्वान् प्रजाजनों को उद्यमी करते हैं॥४॥

तम॑स्य पृ॒क्षमुप॑रासु धीमहि॒ नक्तं॒ यः सु॒दर्श॑तरो॒ दिवा॑तरा॒दप्रा॑युषे॒ दिवा॑तरात्। आद॒स्यायु॒र्ग्रभ॑णवद्वी॒ळु शर्म॒ न सू॒नवे॑। भ॒क्तमभ॑क्त॒मवो॒ व्यन्तो॑ अ॒जरा॑ अ॒ग्नयो॒ व्यन्तो॑ अ॒जराः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कर है। जैसे चन्द्रमा तारागण और ओषधियों को पुष्ट करता है, वैसे सज्जनों को प्रजाजनों का पालन-पोषण करना चाहिये। जैसे सन्तानों को पिता-माता तृप्त करते हैं, वैसे सब प्राणियों को हम लोग तृप्त करें॥५॥

स हि शर्धो॒ न मारु॑तं तुवि॒ष्वणि॒रप्न॑स्वतीषू॒र्वरा॑स्वि॒ष्टनि॒रार्त॑नास्वि॒ष्टनिः॑। आद॑द्ध॒व्यान्या॑द॒दिर्य॒ज्ञस्य॑ के॒तुर॒र्हणा॑। अध॑ स्मास्य॒ हर्ष॑तो॒ हृषी॑वतो॒ विश्वे॑ जुषन्त॒ पन्थां॒ नरः॑ शु॒भे न पन्था॑म्॥

इस मन्त्र में दो उपमालङ्कार हैं। जो मनुष्य धर्म से इकट्ठे किये हुए पदार्थों का भोग करते हुए प्रजाजनों में धर्म और विद्या आदि गुणों का प्रचार करते हैं, वे दूसरों से धर्ममार्ग का प्रचार करा सकते हैं॥६॥

द्वि॒ता यदीं॑ की॒स्तासो॑ अ॒भिद्य॑वो नम॒स्यन्त॑ उप॒वोच॑न्त॒ भृग॑वो म॒थ्नन्तो॑ दा॒शा भृग॑वः। अ॒ग्निरी॑शे॒ वसू॑नां॒ शुचि॒र्यो ध॒र्णिरे॑षाम्। प्रि॒याँ अ॑पि॒धीँर्व॑निषीष्ट॒ मेधि॑र॒ आ व॑निषीष्ट॒ मेधि॑रः॥

जो विद्यार्थी विद्वानों से नित्य विद्या माँगे, उनके लिये विद्वान् भी नित्य ही विद्या को अच्छे प्रकार देवें, क्योंकि इस देने-लेने के तुल्य कुछ भी उत्तम काम नहीं है॥७॥

विश्वा॑सां त्वा वि॒शां पतिं॑ हवामहे॒ सर्वा॑सां समा॒नं दम्प॑तिं भु॒जे स॒त्यगि॑र्वाहसं भु॒जे। अति॑थिं॒ मानु॑षाणां पि॒तुर्न यस्या॑स॒या। अ॒मी च॒ विश्वे॑ अ॒मृता॑स॒ आ वयो॑ ह॒व्या दे॒वेष्वा वयः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जब तक पक्षपातरहित समग्र विद्या को जाने हुए धर्मात्मा विद्वान् राज्य के अधिकारी नहीं होते हैं, तब तक राजा और प्रजाजनों की उन्नति भी नहीं होती है॥८॥

त्वम॑ग्ने॒ सह॑सा॒ सह॑न्तमः शु॒ष्मिन्त॑मो जायसे दे॒वता॑तये र॒यिर्न दे॒वता॑तये। शु॒ष्मिन्त॑मो॒ हि ते॒ मदो॑ द्यु॒म्निन्त॑म उ॒त क्रतुः॑। अध॑ स्मा ते॒ परि॑ चरन्त्यजर श्रुष्टी॒वानो॒ नाज॑र॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य शरीर और आत्मा के बल से युक्त, अच्छे प्रकार ज्ञाता, विद्या आदि धन प्रकाश युक्त सन्तानोंवाले होते हैं, वे सुख करनेवाले होते हैं॥९॥

प्र वो॑ म॒हे सह॑सा॒ सह॑स्वत उष॒र्बुधे॑ पशु॒षे नाग्नये॒ स्तोमो॑ बभूत्व॒ग्नये॑। प्रति॒ यदीं॑ ह॒विष्मा॒न्विश्वा॑सु॒ क्षासु॒ जोगु॑वे। अग्रे॑ रे॒भो न ज॑रत ऋषू॒णां जूर्णि॒र्होत॑ ऋषू॒णाम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् जन विद्या प्राप्ति के लिये अच्छा यत्न करते हैं, वैसे इस संसार में सब मनुष्यों को प्रयत्न करना चाहिये॥१०॥

स नो॒ नेदि॑ष्ठं॒ ददृ॑शान॒ आ भ॒राग्ने॑ दे॒वेभिः॒ सच॑नाः सुचे॒तुना॑ म॒हो रा॒यः सु॑चे॒तुना॑। महि॑ शविष्ठ नस्कृधि सं॒चक्षे॑ भु॒जे अ॒स्यै। महि॑ स्तो॒तृभ्यो॑ मघवन्त्सु॒वीर्यं॒ मथी॑रु॒ग्रो न शव॑सा॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। विद्यार्थियों को चाहिये कि सकल शास्त्र पढ़े हुए धार्मिक विद्वानों की प्रार्थना और सेवा कर पूरी विद्याओं को पावें, जिससे राजा और प्रजाजन विद्यावान् होकर निरन्तर धर्म का आचरण करें॥११॥इस सूक्त में विद्वान् और राजधर्म का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ एकता जाननी चाहिये॥यह एकसौ सत्ताईसवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒यं जा॑यत॒ मनु॑षो॒ धरी॑मणि॒ होता॒ यजि॑ष्ठ उ॒शिजा॒मनु॑ व्र॒तम॒ग्निः स्वमनु॑ व्र॒तम्। वि॒श्वश्रु॑ष्टिः सखीय॒ते र॒यिरि॑व श्रवस्य॒ते। अद॑ब्धो॒ होता॒ नि ष॑ददि॒ळस्प॒दे परि॑वीत इ॒ळस्प॒दे॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्या की इच्छा करनेवालों के अनुकूल चालचलन चलनेवाला सुशील धर्मयुक्त व्यवहार में अच्छी निष्ठा रखनेवाला सबका मित्र शुभ गुणों का ग्रहण करनेवाला हो, वही मनुष्यों का मुकुटमणि अर्थात् अति श्रेष्ठ शिरधरा होवे॥१॥

तं य॑ज्ञ॒साध॒मपि॑ वातयामस्यृ॒तस्य॑ प॒था नम॑सा ह॒विष्म॑ता दे॒वता॑ता ह॒विष्म॑ता। स न॑ ऊ॒र्जामु॒पाभृ॑त्य॒या कृ॒पा न जू॑र्यति। यं मा॑त॒रिश्वा॒ मन॑वे परा॒वतो॑ दे॒वं भाः प॑रा॒वतः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वान् मनुष्य जैसे पवन सब मूर्त्तिमान् पदार्थों को धारण करके प्राणियों को सुखी करता, वैसे ही विद्या और धर्म को धारण कर सब मनुष्यों को सुख देवे॥२॥

एवे॑न स॒द्यः पर्ये॑ति॒ पार्थि॑वं मुहु॒र्गी रेतो॑ वृष॒भः कनि॑क्रद॒द्दध॒द्रेतः॒ कनि॑क्रदत्। श॒तं चक्षा॑णो अ॒क्षभि॑र्दे॒वो वने॑षु तु॒र्वणिः॑। सदो॒ दधा॑न॒ उप॑रेषु॒ सानु॑ष्व॒ग्निः परे॑षु॒ सानु॑षु॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य और वायु सबको धारण और मेघ को वर्षाकर सब जगत् का आनन्द करते, वैसे विद्वान् जन वेद विद्या को धारण कर औरों के आत्माओं में अपने उपदेशों को वर्षा कर सब मनुष्यों को सुख देते हैं॥३॥

स सु॒क्रतुः॑ पु॒रोहि॑तो॒ दमे॑दमे॒ऽग्निर्य॒ज्ञस्या॑ध्व॒रस्य॑ चेतति॒ क्रत्वा॑ य॒ज्ञस्य॑ चेतति। क्रत्वा॑ वे॒धा इ॑षूय॒ते विश्वा॑ जा॒तानि॑ पस्पशे। यतो॑ घृत॒श्रीरति॑थि॒रजा॑यत॒ वह्नि॑र्वे॒धा अजा॑यत॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वान् देश-देश, नगर-नगर, द्वीप-द्वीप, गाँव-गाँव, घर-घर में सत्य का उपदेश करते, वे सबको सत्कार करने योग्य होते हैं॥४॥

क्रत्वा॒ यद॑स्य॒ तवि॑षीषु पृ॒ञ्चते॒ऽग्नेरवे॑ण म॒रुतां॒ न भो॒ज्ये॑षि॒राय॒ न भो॒ज्या॑। स हि ष्मा॒ दान॒मिन्व॑ति॒ वसू॑नां च म॒ज्मना॑। स न॑स्त्रासते दुरि॒ताद॑भि॒ह्रुतः॒ शंसा॑द॒घाद॑भि॒ह्रुतः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो उत्तम शिक्षा और विद्या के दान से दुष्टस्वभावी प्राणियों और अधर्म के आचरणों से निवृत्त कराके अच्छे गुणों में प्रवृत्त कराते, वे इस संसार में कल्याण करनेवाले धर्मात्मा विद्वान् होते हैं॥५॥

विश्वो॒ विहा॑या अर॒तिर्वसु॑र्दधे॒ हस्ते॒ दक्षि॑णे त॒रणि॒र्न शि॑श्रथच्छ्रव॒स्यया॒ न शि॑श्रथत्। विश्व॑स्मा॒ इदि॑षुध्य॒ते दे॑व॒त्रा ह॒व्यमोहि॑षे। विश्व॑स्मा॒ इत्सु॒कृते॒ वार॑मृण्वत्य॒ग्निर्द्वारा॒ व्यृ॑ण्वति॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य सब व्यक्त पदार्थों को प्रकाशित कर सबके लिये सब सुखों को उत्पन्न करता, वैसे हिंसा आदि दोषों से रहित विद्वान् जन विद्या का प्रकाश कर सबको आनन्दित करते हैं॥६॥

स मानु॑षे वृ॒जने॒ शंत॑मो हि॒तो॒३॒॑ऽग्निर्य॒ज्ञेषु॒ जेन्यो॒ न वि॒श्पतिः॑ प्रि॒यो य॒ज्ञेषु॑ वि॒श्पतिः॑। स ह॒व्या मानु॑षाणामि॒ळा कृ॒तानि॑ पत्यते। स न॑स्त्रासते॒ वरु॑णस्य धू॒र्तेर्म॒हो दे॒वस्य॑ धू॒र्तेः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो धर्म मार्ग में मनुष्यों को उपदेश से प्रवृत्त कराते, न्यायाधीश राजा के समान प्रजाजनों को पालने, डाँकू आदि दुष्ट प्राणियों से जो डर उसको निवृत्त करानेवाले विद्वानों के मित्रजन हैं, वे ही अन्धपरम्परा अर्थात् कुमार्ग के रोकनेवाले होने को योग्य होते हैं॥७॥

अ॒ग्निं होता॑रमीळते॒ वसु॑धितिं प्रि॒यं चेति॑ष्ठमर॒तिं न्ये॑रिरे हव्य॒वाहं॒ न्ये॑रिरे। वि॒श्वायुं॑ वि॒श्ववे॑दसं॒ होता॑रं यज॒तं क॒विम्। दे॒वासो॑ र॒ण्वमव॑से वसू॒यवो॑ गी॒र्भी र॒ण्वं व॑सू॒यवः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! विद्वान् लोग जिसकी सेवा और सङ्ग से विद्यादि गुणों को पाते हैं, उसी की सेवा और सङ्ग से तुम लोगों को चाहिये कि इनको पाओ॥८॥इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ एकता है, यह जानना चाहिये॥यह एकसौ अट्ठाईसवाँ १२८ सूक्त और पन्द्रहवाँ वर्ग पूरा हुआ॥

यं त्वं रथ॑मिन्द्र मे॒धसा॑तयेऽपा॒का सन्त॑मिषिर प्र॒णय॑सि॒ प्रान॑वद्य॒ नय॑सि। स॒द्यश्चि॒त्तम॒भिष्ट॑ये॒ करो॒ वश॑श्च वा॒जिन॑म्। सास्माक॑मनवद्य तूतुजान वे॒धसा॑मि॒मां वाचं॒ न वे॒धसा॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वान् जन सब मनुष्यों को विद्या और विनय आदि गुणों में प्रवृत्त कराते हैं, वे सब ओर से चाहे हुए पदार्थों की सिद्धि कर सकते हैं॥१॥

स श्रु॑धि॒ यः स्मा॒ पृत॑नासु॒ कासु॑ चिद्द॒क्षाय्य॑ इन्द्र॒ भर॑हूतये॒ नृभि॒रसि॒ प्रतू॑र्तये॒ नृभिः॑। यः शूरैः॒ स्व१॒॑सनि॑ता॒ यो विप्रै॒र्वाजं॒ तरु॑ता। तमी॑शा॒नास॑ इरधन्त वा॒जिनं॑ पृ॒क्षमत्यं॒ न वा॒जिन॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वान् और न्यायाधीशों के साथ राजधर्म को प्राप्त करते, वे प्रजाजनों में आनन्द को अच्छे प्रकार देनेवाले होते हैं॥२॥

द॒स्मो हि ष्मा॒ वृष॑णं॒ पिन्व॑सि॒ त्वचं॒ कं चि॑द्यावीर॒ररुं॑ शूर॒ मर्त्यं॑ परिवृ॒णक्षि॒ मर्त्य॑म्। इन्द्रो॒त तुभ्यं॒ तद्दि॒वे तद्रु॒द्राय॒ स्वय॑शसे। मि॒त्राय॑ वोचं॒ वरु॑णाय स॒प्रथः॑ सुमृळी॒काय॑ स॒प्रथः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सब मनुष्यों के लिये मित्रभाव से सत्य का उपदेश करते वा धर्म का सेवन करते, वे परम सुख के देनेवाले होते हैं॥३॥

अ॒स्माकं॑ व॒ इन्द्र॑मुश्मसी॒ष्टये॒ सखा॑यं वि॒श्वायुं॑ प्रा॒सहं॒ युजं॒ वाजे॑षु प्रा॒सहं॒ युज॑म्। अ॒स्माकं॒ ब्रह्मो॒तयेऽवा॑ पृ॒त्सुषु॒ कासु॑ चित्। न॒हि त्वा॒ शत्रुः॒ स्तर॑ते स्तृ॒णोषि॒ यं विश्वं॒ शत्रुं॑ स्तृ॒णोषि॒ यम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जितना सामर्थ्य हो सके उतने से बहुत मित्र करने को उत्तम यत्न करें परन्तु अधर्मी दुष्ट जन मित्र न करने चाहिये और न दुष्टों में मित्रपन का आचरण करना चाहिये, ऐसे हुए पर शत्रुओं का बल नहीं बढ़ता है॥४॥

नि षू न॒माति॑मतिं॒ कय॑स्य चि॒त्तेजि॑ष्ठाभिर॒रणि॑भि॒र्नोतिभि॑रु॒ग्राभि॑रुग्रो॒तिभिः॑। नेषि॑ णो॒ यथा॑ पु॒राने॒नाः शू॑र॒ मन्य॑से। विश्वा॑नि पू॒रोरप॑ पर्षि॒ वह्नि॑रा॒सा वह्नि॑र्नो॒ अच्छ॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्यों की बुद्धि को उत्तम रक्षा से बढ़ा कर पाप कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न करता, वही सभों को सुखों को पहुँचा सकता है॥५॥

प्र तद्वो॑चेयं॒ भव्या॒येन्द॑वे॒ हव्यो॒ न य इ॒षवा॒न्मन्म॒ रेज॑ति रक्षो॒हा मन्म॒ रेज॑ति। स्व॒यं सो अ॒स्मदा नि॒दो व॒धैर॑जेत दुर्म॒तिम्। अव॑ स्रवेद॒घशं॑सोऽवत॒रमव॑ क्षु॒द्रमि॑व स्रवेत्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। अध्यापक विद्वान् जो शुभ गुण, कर्म, स्वभाववाले विद्यार्थी हैं, उनके लिये प्रीति से विद्याओं को देवे और निन्दा करनेहारे चोरों को निकाल देवे और आप भी सदैव धर्मात्मा हो॥६॥

व॒नेम॒ तद्धोत्र॑या चि॒तन्त्या॑ व॒नेम॑ र॒यिं र॑यिवः सु॒वीर्यं॑ र॒ण्वं सन्तं॑ सु॒वीर्य॑म्। दु॒र्मन्मा॑नं सु॒मन्तु॑भि॒रेमि॒षा पृ॑चीमहि। आ स॒त्याभि॒रिन्द्रं॑ द्यु॒म्नहू॑तिभि॒र्यज॑त्रं द्यु॒म्नहू॑तिभिः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। माता और पिता आदि को वा विद्वानों को चाहिये कि अपने सन्तानों को इस प्रकार उपदेश करें कि जो हमारे धर्म के अनुकूल काम हैं, वे आचरण करने योग्य किन्तु और काम आचरण करने योग्य नहीं, ऐसे सत्याचरणों और परोपकार से निरन्तर ऐश्वर्य्य की उन्नति करनी चाहिये॥७॥

प्रप्रा॑ वो अ॒स्मे स्वय॑शोभिरू॒ती प॑रिव॒र्ग इन्द्रो॑ दुर्मती॒नां दरी॑मन्दुर्मती॒नाम्। स्व॒यं सा रि॑ष॒यध्यै॒ या न॑ उपे॒षे अ॒त्रैः। ह॒तेम॑स॒न्न व॑क्षति क्षि॒प्ता जू॒र्णिर्न व॑क्षति॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो दुष्टों के सङ्ग को छोड़ सत्सङ्ग से कीर्त्तिमान् होकर अतीव प्रशंसित सेना से प्रजा की रक्षा करते हैं, वे उत्तम ऐश्वर्य्यवाले होते हैं॥८॥

त्वं न॑ इन्द्र रा॒या परी॑णसा या॒हि प॒थाँ अ॑ने॒हसा॑ पु॒रो या॑ह्यर॒क्षसा॑। सच॑स्व नः परा॒क आ सच॑स्वास्तमी॒क आ। पा॒हि नो॑ दू॒रादा॒राद॒भिष्टि॑भिः॒ सदा॑ पाह्य॒भिष्टि॑भिः॥

उपदेशकों को चाहिये कि धर्म के अनुकूल मार्ग से आप प्रवृत्त हों और सबको प्रवृत्त करा कर अपने उपदेश के द्वारा समीपस्थ और दूरस्थ पदार्थों का सङ्ग कर भ्रम मिटाने और सत्यविज्ञान की प्राप्ति कराने से सबकी निरन्तर अच्छी रक्षा करें॥९॥

त्वं न॑ इन्द्र रा॒या तरू॑षसो॒ग्रं चि॑त्त्वा महि॒मा स॑क्ष॒दव॑से म॒हे मि॒त्रं नाव॑से। ओजि॑ष्ठ॒ त्रात॒रवि॑ता॒ रथं॒ कं चि॑दमर्त्य। अ॒न्यम॒स्मद्रि॑रिषेः॒ कं चि॑दद्रिवो॒ रिरि॑क्षन्तं चिदद्रिवः॥

मनुष्यों की यही महिमा है जो श्रेष्ठों की पालना और दुष्टों की हिंसा करना॥१०॥

पा॒हि न॑ इन्द्र सुष्टुत स्रि॒धो॑ऽवया॒ता सद॒मिद्दु॑र्मती॒नां दे॒वः सन्दु॑र्मती॒नाम्। ह॒न्ता पा॒पस्य॑ र॒क्षस॑स्त्रा॒ता विप्र॑स्य॒ माव॑तः। अधा॒ हि त्वा॑ जनि॒ता जीज॑नद्वसो रक्षो॒हणं॑ त्वा॒ जीज॑नद्वसो॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। यही विद्वानों का प्रशंसा करने योग्य काम है जो पाप का खण्डन और धर्म का मण्डन करना, किसी को दुष्ट का सङ्ग और श्रेष्ठजन का त्याग न करना चाहिये॥११॥इस सूक्त में विद्वानों और राजजनों के धर्म का वर्णन होने से इस सूक्त में कहे हुए अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह एकसौ उनतीसवाँ सूक्त और सत्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

एन्द्र॑ या॒ह्युप॑ नः परा॒वतो॒ नायमच्छा॑ वि॒दथा॑नीव॒ सत्प॑ति॒रस्तं॒ राजे॑व॒ सत्प॑तिः। हवा॑महे त्वा व॒यं प्रय॑स्वन्तः सु॒ते सचा॑। पु॒त्रासो॒ न पि॒तरं॒ वाज॑सातये॒ मंहि॑ष्ठं॒ वाज॑सातये॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। समस्त राजप्रजाजन पिता और पुत्र के समान इस संसार में वर्त्तकर पुरुषार्थी हों॥१॥

पिबा॒ सोम॑मिन्द्र सुवा॒नमद्रि॑भिः॒ कोशे॑न सि॒क्तम॑व॒तं न वंस॑गस्तातृषा॒णो न वंस॑गः। मदा॑य हर्य॒ताय॑ ते तु॒विष्ट॑माय॒ धाय॑से। आ त्वा॑ यच्छन्तु ह॒रितो॒ न सूर्य॒महा॒ विश्वे॑व॒ सूर्य॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो बड़े साधन और छोटे साधनों और आयुर्वेद अर्थात् वैद्यकविद्या की रीति से बड़ी-बड़ी ओषधियों के रसों को बनाकर उसका सेवन करते, वे आरोग्यवान् होकर प्रयत्न कर सकते हैं॥२॥

अवि॑न्दद्दि॒वो निहि॑तं॒ गुहा॑ नि॒धिं वेर्न गर्भं॒ परि॑वीत॒मश्म॑न्यन॒न्ते अ॒न्तरश्म॑नि। व्र॒जं व॒ज्री गवा॑मिव॒ सिषा॑स॒न्नङ्गि॑रस्तमः। अपा॑वृणो॒दिष॒ इन्द्रः॒ परी॑वृता॒ द्वार॒ इषः॒ परी॑वृताः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो योग के अङ्ग, धर्म, विद्या और सत्सङ्ग के अनुष्ठान से अपनी आत्मा में स्थित परमात्मा को जानें, वे सूर्य जैसे अन्धकार को वैसे अपने सङ्गियों की अविद्या छुड़ा विद्या के प्रकाश को उत्पन्न कर सबको मोक्षमार्ग में प्रवृत्त कराके उन्हें आनन्दित कर सकते हैं॥३॥

दा॒दृ॒हा॒णो वज्र॒मिन्द्रो॒ गभ॑स्त्योः॒ क्षद्मे॑व ति॒ग्ममस॑नाय॒ सं श्य॑दहि॒हत्या॑य॒ सं श्य॑त्। सं॒वि॒व्या॒न ओज॑सा॒ शवो॑भिरिन्द्र म॒ज्मना॑। तष्टे॑व वृ॒क्षं व॒निनो॒ नि वृ॑श्चसि पर॒श्वेव॒ नि वृ॑श्चसि॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य प्रमाद और आलस्य आदि दोषों को अलग कर संसार में गुणों को निरन्तर धारण करते हैं, वे सूर्य की किरणों के समान यहाँ अच्छी शोभा को प्राप्त होते हैं॥४॥

त्वं वृथा॑ न॒द्य॑ इन्द्र॒ सर्त॒वेऽच्छा॑ समु॒द्रम॑सृजो॒ रथाँ॑ इव वाजय॒तो रथाँ॑ इव। इ॒त ऊ॒तीर॑युञ्जत समा॒नमर्थ॒मक्षि॑तम्। धे॒नूरि॑व॒ मन॑वे वि॒श्वदो॑हसो॒ जना॑य वि॒श्वदो॑हसः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार हैं। जो पुरुष गौओं के समान सुख, रथ के समान धर्म के अनुकूल मार्ग का अवलम्ब कर धार्मिक न्यायाधीश के समान होकर सबको अपने समान करते हैं, वे इस संसार में प्रंशसित होते हैं॥५॥

इ॒मां ते॒ वाचं॑ वसू॒यन्त॑ आ॒यवो॒ रथं॒ न धीरः॒ स्वपा॑ अतक्षिषुः सु॒म्नाय॒ त्वाम॑तक्षिषुः। शु॒म्भन्तो॒ जेन्यं॑ यथा॒ वाजे॑षु विप्र वा॒जिन॑म्। अत्य॑मिव॒ शव॑से सा॒तये॒ धना॒ विश्वा॒ धना॑नि सा॒तये॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो उपदेश करनेवाले धर्मात्मा विद्वान् जन से समस्त विद्याओं को पाकर विस्तारयुक्तबुद्धि अर्थात् सब विषयों में बुद्धि फैलानेहारे होते हैं, वे समग्र ऐश्वर्य को पाकर, रथ, घोड़ा और धीर पुरुष के समान धर्म के अनुकूल मार्ग को प्राप्त होकर कृतकृत्य होते हैं॥६॥

भि॒नत्पुरो॑ नव॒तिमि॑न्द्र पू॒रवे॒ दिवो॑दासाय॒ महि॑ दा॒शुषे॑ नृतो॒ वज्रे॑ण दा॒शुषे॑ नृतो। अ॒ति॒थि॒ग्वाय॒ शम्ब॑रं गि॒रेरु॒ग्रो अवा॑भरत्। म॒हो धना॑नि॒ दय॑मान॒ ओज॑सा॒ विश्वा॒ धना॒न्योज॑सा॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। इस मन्त्र में “नवतिम्” यह पद बहुतों का बोध कराने के लिये है। जो शत्रुओं को जीतते, अथितियों का सत्कार करते और धार्मिकों को विद्या आदि गुण देते हुए वर्त्तमान हैं, वे सूर्य्य जैसे मेघ को वैसे समस्त ऐश्वर्य्य धारण करते हैं॥७॥

इन्द्रः॑ स॒मत्सु॒ यज॑मान॒मार्यं॒ प्राव॒द्विश्वे॑षु श॒तमू॑तिरा॒जिषु॒ स्व॑र्मीळ्हेष्वा॒जिषु॑। मन॑वे॒ शास॑दव्र॒तान्त्वचं॑ कृ॒ष्णाम॑रन्धयत्। दक्ष॒न्न विश्वं॑ ततृषा॒णमो॑षति॒ न्य॑र्शसा॒नमो॑षति॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को चाहिये कि श्रेष्ठ गुण, कर्म, स्वभावों को स्वीकार और दुष्टों के गुण, कर्म, स्वभावों का त्याग कर श्रेष्ठों को रक्षा और दुष्टों को ताड़ना देकर धर्म में राज्य की शासना करें॥८॥

सूर॑श्च॒क्रं प्र बृ॒हज्जा॒त ओज॑सा प्रपि॒त्वे वाच॑मरु॒णो मु॑षायतीशा॒न आ मु॑षायति। उ॒शना॒ यत्प॑रा॒वतोऽज॑गन्नू॒तये॑ कवे। सु॒म्नानि॒ विश्वा॒ मनु॑षेव तु॒र्वणि॒रहा॒ विश्वे॑व तु॒र्वणिः॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो सूर्य के तुल्य विद्या, विनय और धर्म का प्रकाश करनेवाले सबकी उन्नति के लिये अच्छा यत्न करते हैं, वे आप भी उन्नतियुक्त होते हैं॥९॥

स नो॒ नव्ये॑भिर्वृषकर्मन्नु॒क्थैः पुरां॑ दर्तः पा॒युभिः॑ पाहि श॒ग्मैः। दि॒वो॒दा॒सेभि॑रिन्द्र॒ स्तवा॑नो वावृधी॒था अहो॑भिरिव॒ द्यौः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजपुरुषों को सूर्य के समान विद्या, उत्तम शिक्षा और धर्म के उपदेश से प्रजाजनों को उत्साह देना और उनकी प्रशंसा करनी चाहिये और वैसे ही प्रजाजनों को राजजन वर्त्तने चाहिये॥१०॥इस सूक्त में राजा और प्रजाजन के काम का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ एकता है, यह जाननी चाहिये॥यह एकसौ १३० तीसवाँ सूक्त और १९ उन्नीसवाँ वर्ग पूरा हुआ॥

इन्द्रा॑य॒ हि द्यौरसु॑रो॒ अन॑म्न॒तेन्द्रा॑य म॒ही पृ॑थि॒वी वरी॑मभिर्द्यु॒म्नसा॑ता॒ वरी॑मभिः। इन्द्रं॒ विश्वे॑ स॒जोष॑सो दे॒वासो॑ दधिरे पु॒रः। इन्द्रा॑य॒ विश्वा॒ सव॑नानि॒ मानु॑षा रा॒तानि॑ सन्तु॒ मानु॑षा॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को जानना चाहिये कि जितना कुछ यहाँ कार्यकारणात्मक जगत् और जितने जीव वर्त्तमान हैं, यह सब परमेश्वर का राज्य है॥१॥

विश्वे॑षु॒ हि त्वा॒ सव॑नेषु तु॒ञ्जते॑ समा॒नमेकं॒ वृष॑मण्यवः॒ पृथ॒क्स्वः॑ सनि॒ष्यवः॒ पृथ॑क्। तं त्वा॒ नावं॒ न प॒र्षणिं॑ शू॒षस्य॑ धु॒रि धी॑महि। इन्द्रं॒ न य॒ज्ञैश्चि॒तय॑न्त आ॒यवः॒ स्तोमे॑भि॒रिन्द्र॑मा॒यवः॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को चाहिये कि विद्वान् जन जिस सच्चिदानन्दस्वरूप नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्तस्वभाव, सर्वत्र एकरसव्यापी, सबका आधार, सब ऐश्वर्य देनेवाले एक अद्वैत (कि जिसकी तुल्यता का दूसरा नहीं) परमात्मा की उपासना करते, वही निरन्तर सबको उपासना करने योग्य है॥२॥

वि त्वा॑ ततस्रे मिथु॒ना अ॑व॒स्यवो॑ व्र॒जस्य॑ सा॒ता गव्य॑स्य निः॒सृजः॒ सक्ष॑न्त इन्द्र निः॒सृजः॑। यद्ग॒व्यन्ता॒ द्वा जना॒ स्व१॒॑र्यन्ता॑ स॒मूह॑सि। आ॒विष्करि॑क्र॒द्वृष॑णं सचा॒भुवं॒ वज्र॑मिन्द्र सचा॒भुव॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो पुरुष और स्त्री सब जगत् को प्रकाशित करने, उत्पन्न करने, धारण करने और देनेवाले सर्वान्तर्यामी जगदीश्वर ही का सेवन करते हैं, वे निरन्तर सुखी होते हैं॥३॥

वि॒दुष्टे॑ अ॒स्य वी॒र्य॑स्य पू॒रवः॒ पुरो॒ यदि॑न्द्र॒ शार॑दीर॒वाति॑रः सासहा॒नो अ॒वाति॑रः। शास॒स्तमि॑न्द्र॒ मर्त्य॒मय॑ज्युं शवसस्पते। म॒हीम॑मुष्णाः पृथि॒वीमि॒मा अ॒पो म॑न्दसा॒न इ॒मा अ॒पः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो धर्मात्मा सज्जनों के प्रभाव को जानकर धर्माचरण करते हैं, वे दुष्टों को सिखला सकते हैं अर्थात् उनकी दुष्टता दूर होने को अच्छी शिक्षा दे सकते हैं॥४॥

आदित्ते॑ अ॒स्य वी॒र्य॑स्य चर्किर॒न्मदे॑षु वृषन्नु॒शिजो॒ यदावि॑थ सखीय॒तो यदावि॑थ। च॒कर्थ॑ का॒रमे॑भ्यः॒ पृत॑नासु॒ प्रव॑न्तवे। ते अ॒न्याम॑न्यां न॒द्यं॑ सनिष्णत श्रव॒स्यन्तः॑ सनिष्णत॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य प्रजा की रक्षा करने में अधिकार पाये हुए हैं, वे धर्म के साथ प्रजा पालने की इच्छा करते हुए उत्तम यत्नवान् हों॥५॥

उ॒तो नो॑ अ॒स्या उ॒षसो॑ जु॒षेत॒ ह्य१॒॑र्कस्य॑ बोधि ह॒विषो॒ हवी॑मभिः॒ स्व॑र्षाता॒ हवी॑मभिः। यदि॑न्द्र॒ हन्त॑वे॒ मृधो॒ वृषा॑ वज्रि॒ञ्चिके॑तसि। आ मे॑ अ॒स्य वे॒धसो॒ नवी॑यसो॒ मन्म॑ श्रुधि॒ नवी॑यसः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य से प्रकट हुई प्रभात वेला से जागे हुए जन सूर्य के उजेले में अपने-अपने व्यवहारों का आरम्भ करते हैं, वैसे विद्वानों से सुबोध किये मनुष्य विशेष ज्ञान के प्रकाश में अपने-अपने कामों को करते हैं। जो दुष्टों की निवृत्ति और श्रेष्ठों की उत्तम सेवा वा नवीन पढ़े हुए विद्वानों के निकट से विद्या का ग्रहण करते हैं, वे चाहे हुए पदार्थ की प्राप्ति में सिद्ध होते हैं॥६॥

त्वं तमि॑न्द्र वावृधा॒नो अ॑स्म॒युर॑मित्र॒यन्तं॑ तुविजात॒ मर्त्यं॒ वज्रे॑ण शूर॒ मर्त्य॑म्। ज॒हि यो नो॑ अघा॒यति॑ शृणु॒ष्व सु॒श्रव॑स्तमः। रि॒ष्टं न याम॒न्नप॑ भूतु दुर्म॒तिर्विश्वाप॑ भूतु दुर्म॒तिः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो धार्मिक राजा और प्रजाजन हों, वे सब चतुराइयों से द्वेष वैर करने और पराया माल हरनेवाले दुष्टों को मार धर्म के अनुकूल राज्य की शिक्षा और बेखटक मार्ग कर विद्या की वृद्धि करें॥७॥इस सूक्त में श्रेष्ठ और दुष्ट मनुष्यों का सत्कार और ताड़ना के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह एक सौ १३१ इकतीसवाँ सूक्त और बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

त्वया॑ व॒यं म॑घव॒न्पूर्व्ये॒ धन॒ इन्द्र॑त्वोताः सासह्याम पृतन्य॒तो व॑नु॒याम॑ वनुष्य॒तः। नेदि॑ष्ठे अ॒स्मिन्नह॒न्यधि॑ वोचा॒ नु सु॑न्व॒ते। अ॒स्मिन्य॒ज्ञे वि च॑येमा॒ भरे॑ कृ॒तं वा॑ज॒यन्तो॒ भरे॑ कृ॒तम्॥

सब मनुष्यों को चाहिये कि धार्मिक सेनापति के साथ प्रीति और उत्साह कर शत्रुओं को जीत के अति उत्तम धन का समूह सिद्ध करें और सेनापति समय-समय पर अपनी वक्तृता से शूरता आदि गुणों का उपदेश कर शत्रुओं के साथ अपने सैनिकजनों का युद्ध करावे॥१॥

स्व॒र्जे॒षे भर॑ आ॒प्रस्य॒ वक्म॑न्युष॒र्बुधः॒ स्वस्मि॒न्नञ्ज॑सि क्रा॒णस्य॒ स्वस्मि॒न्नञ्ज॑सि। अह॒न्निन्द्रो॒ यथा॑ वि॒दे शी॒र्ष्णाशी॑र्ष्णोप॒वाच्यः॑। अ॒स्म॒त्रा ते॑ स॒ध्र्य॑क्सन्तु रा॒तयो॑ भ॒द्रा भ॒द्रस्य॑ रा॒तयः॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो सभापति सब शूरवीरों का अपने समान सत्कार करता है, वह शत्रुओं को जीतकर सबके लिये सुख दे सकता है, संग्राम में अपने पदार्थ औरों के लिये और औरों के अपने लिये करने चाहिये। ऐसे एक दूसरे में प्रीति के साथ विरोध छोड़ उत्तम जय प्राप्त करना चाहिये॥२॥

तत्तु प्रयः॑ प्र॒त्नथा॑ ते शुशुक्व॒नं यस्मि॑न्य॒ज्ञे वार॒मकृ॑ण्वत॒ क्षय॑मृ॒तस्य॒ वार॑सि॒ क्षय॑म्। वि तद्वो॑चे॒रध॑ द्वि॒तान्तः प॑श्यन्ति र॒श्मिभिः॑। स घा॑ विदे॒ अन्विन्द्रो॑ ग॒वेष॑णो बन्धु॒क्षिद्भ्यो॑ ग॒वेष॑णः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमलाङ्कार है। जो सत्य गुणों में प्रीति करते हैं, वे विद्वान् होते और जो विद्वान् हों, वे सूर्य के प्रकाश से सब हाथ में आमले के समान पदार्थों को देख सकते हैं॥३॥

नू इ॒त्था ते॑ पू॒र्वथा॑ च प्र॒वाच्यं॒ यदङ्गि॑रो॒भ्योऽवृ॑णो॒रप॑ व्र॒जमिन्द्र॒ शिक्ष॒न्नप॑ व्र॒जम्। ऐभ्यः॑ समा॒न्या दि॒शास्मभ्यं॑ जेषि॒ योत्सि॑ च। सु॒न्वद्भ्यो॑ रन्धया॒ कं चि॑दव्र॒तं हृ॑णा॒यन्तं॑ चिदव्र॒तम्॥

जिनके राज्य में दुष्ट वचन कहनेवाले चोर और व्यभिचारी नहीं हैं, वे चक्रवर्त्ति राज्य करने को समर्थ होते हैं॥४॥

सं यज्जना॒न्क्रतु॑भिः॒ शूर॑ ई॒क्षय॒द्धने॑ हि॒ते त॑रुषन्त श्रव॒स्यवः॒ प्र य॑क्षन्त श्रव॒स्यवः॑। तस्मा॒ आयुः॑ प्र॒जाव॒दिद्बाधे॑ अर्च॒न्त्योज॑सा। इन्द्र॑ ओ॒क्यं॑ दिधिषन्त धी॒तयो॑ दे॒वाँ अच्छा॒ न धी॒तयः॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो विद्वानों के सङ्ग और सेवा में विद्याओं को पाकर पुरुषार्थ से परम ऐश्वर्य्य की उन्नति करते हैं, वे सब ज्ञानवान् पुरुषों को सुखयुक्त कर सकते हैं॥५॥

यु॒वं तमि॑न्द्रापर्वता पुरो॒युधा॒ यो नः॑ पृत॒न्यादप॒ तंत॒मिद्ध॑तं॒ वज्रे॑ण॒ तंत॒मिद्ध॑तम्। दू॒रे च॒त्ताय॑ च्छन्त्स॒द्गह॑नं॒ यदिन॑क्षत्। अ॒स्माकं॒ शत्रू॒न्परि॑ शूर वि॒श्वतो॑ द॒र्मा द॑र्षीष्ट वि॒श्वतः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सेना पुरुषों को जो सेनापति आदि पुरुषों के शत्रु हैं, वे अपने भी शत्रु जानने चाहिये, शत्रुओं से परस्पर फूट को न प्राप्त हुए धार्मिक जन उन शत्रुओं को विदीर्ण कर प्रजाजनों की रक्षा करें॥६॥इस सूक्त में राजधर्म का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह एकसौ बत्तीसवाँ सूक्त और इक्कीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

उ॒भे पु॑नामि॒ रोद॑सी ऋ॒तेन॒ द्रुहो॑ दहामि॒ सं म॒हीर॑नि॒न्द्राः। अ॒भि॒व्लग्य॒ यत्र॑ ह॒ता अ॒मित्रा॑ वैलस्था॒नं परि॑ तृ॒ळ्हा अशे॑रन्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सब मनुष्यों को यह निरन्तर इच्छा करनी चाहिये कि जिस सत्यव्यवहार से राज्य की उन्नति, पवित्रता, शत्रुओं की निवृत्ति और निर्वैर निश्शत्रु राज्य हो॥१॥

अ॒भि॒व्लग्या॑ चिदद्रिवः शी॒र्षा या॑तु॒मती॑नाम्। छि॒न्धि व॑टू॒रिणा॑ प॒दा म॒हाव॑टूरिणा प॒दा॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो अपने बल की उन्नति कर शत्रुओं के बलों को छिन्न-भिन्न कर उनको पैर से दबाता है, वह राज्य करने को योग्य होता है॥२॥

अवा॑सां मघवञ्जहि॒ शर्धो॑ यातु॒मती॑नाम्। वै॒ल॒स्था॒न॒के अ॑र्म॒के म॒हावै॑लस्थे अर्म॒के॥

सेनावीरों को चाहिये कि शत्रुओं को सेनाओं को अतीव दुःख से जाने योग्य गढ़ेले आदि से युक्त स्थान में गिरा कर मारें॥३॥

यासां॑ ति॒स्रः प॑ञ्चा॒शतो॑ऽभिव्ल॒ङ्गैर॒पाव॑पः। तत्सु ते॑ मनायति त॒कत्सु ते॑ मनायति॥

मनुष्यों को चाहिये कि ऐसा बल बढ़ावें जिससे एक ही वीर पचास दुष्ट शत्रुओं को जीते और अपने बल की रक्षा करे॥४॥

पि॒शङ्ग॑भृष्टिमम्भृ॒णं पि॒शाचि॑मिन्द्र॒ सं मृ॑ण। सर्वं॒ रक्षो॒ नि ब॑र्हय॥

राजपुरुषों को चाहिये कि दुष्ट शत्रुओं को निर्मूल कर सब सज्जनों को निरन्तर बढ़ावें॥५॥

अ॒वर्म॒ह इ॑न्द्र दादृ॒हि श्रु॒धी नः॑ शु॒शोच॒ हि द्यौः क्षा न भी॒षाँ अ॑द्रिवो घृ॒णान्न भी॒षाँ अ॑द्रिवः। शु॒ष्मिन्त॑मो॒ हि शु॒ष्मिभि॑र्व॒धैरु॒ग्रेभि॒रीय॑से। अपू॑रुषघ्नो अप्रतीत शूर॒ सत्व॑भिस्त्रिस॒प्तैः शू॑र॒ सत्व॑भिः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। धार्मिक पुरुषों को नीचपन की निवृत्ति और उत्तमता का प्रचार कर प्रशंसित बल की उन्नति के लिए शूरवीर पुरुषों से प्रजाजनों की अच्छे प्रकार रक्षा कर दश प्राण और एक जीव से दश इन्द्रियों के समान पुरुषार्थ कर यथायोग्य पदार्थों की वृद्धि प्राप्त करने योग्य है॥६॥

व॒नोति॒ हि सु॒न्वन्क्षयं॒ परी॑णसः सुन्वा॒नो हि ष्मा॒ यज॒त्यव॒ द्विषो॑ दे॒वाना॒मव॒ द्विषः॑। सु॒न्वा॒न इत्सि॑षासति स॒हस्रा॑ वा॒ज्यवृ॑तः। सु॒न्वा॒नायेन्द्रो॑ ददात्या॒भुवं॑ र॒यिं द॑दात्या॒भुव॑म्॥

जो सब में मित्रता की भावना कराकर सबके शत्रुओं की निवृत्ति कराते हैं, वे सबके सुख करनेवाले होकर सबके लिये बहुत सुख दे सकते हैं॥७॥इस सूक्त में श्रेष्ठों की पालना और दुष्टों की निवृत्ति से राज्य की स्थिरता का वर्णन है, इससे इस सूक्त में कहे हुए अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह एक सौ तेंतीसवाँ सूक्त बाईसवाँ वर्ग और उन्नीसवाँ अनुवाक पूरा हुआ॥

सूक्तम्

आ त्वा॒ जुवो॑ रारहा॒णा अ॒भि प्रयो॒ वायो॒ वह॑न्त्वि॒ह पू॒र्वपी॑तये॒ सोम॑स्य पू॒र्वपी॑तये। ऊ॒र्ध्वा ते॒ अनु॑ सू॒नृता॒ मन॑स्तिष्ठतु जान॒ती। नि॒युत्व॑ता॒ रथे॒ना या॑हि दा॒वने॒ वायो॑ म॒खस्य॑ दा॒वने॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वान् लोग सर्व प्राणियों में प्राण के समान प्रिय होकर अनेक घोड़ों से जुते हुए रथों से जावें-आवें॥१॥

मन्द॑न्तु त्वा म॒न्दिनो॑ वाय॒विन्द॑वो॒ऽस्मत्क्रा॒णासः॒ सुकृ॑ता अ॒भिद्य॑वो॒ गोभिः॑ क्रा॒णा अ॒भिद्य॑वः। यद्ध॑ क्रा॒णा इ॒रध्यै॒ दक्षं॒ सच॑न्त ऊ॒तयः॑। स॒ध्री॒ची॒ना नि॒युतो॑ दा॒वने॒ धिय॒ उप॑ ब्रुवत ईं॒ धियः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य विद्वानों का सेवन करते और सत्य का उपदेश करते हैं, वे शरीर और आत्मा के बल को कैसे न प्राप्त हों॥२॥

वा॒युर्यु॑ङ्क्ते॒ रोहि॑ता वा॒युर॑रु॒णा वा॒यू रथे॑ अजि॒रा धु॒रि वोळ्ह॑वे॒ वहि॑ष्ठा धु॒रि वोळ्ह॑वे। प्र बो॑धया॒ पुरं॑धिं जा॒र आ स॑स॒तीमि॑व। प्र च॑क्षय॒ रोद॑सी वासयो॒षसः॒ श्रव॑से वासयो॒षसः॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो पवन के समान अच्छा यत्न करते और उत्तम धर्मात्मा के समान मनुष्यों को बोध कराते हैं, वे सूर्य्य और पृथिवी के समान प्रकाश और सहनशीलता से युक्त होते हैं॥३॥

तुभ्य॑मु॒षासः॒ शुच॑यः परा॒वति॑ भ॒द्रा वस्त्रा॑ तन्वते॒ दंसु॑ र॒श्मिषु॑ चि॒त्रा नव्ये॑षु र॒श्मिषु॑। तुभ्यं॑ धे॒नुः स॑ब॒र्दुघा॒ विश्वा॒ वसू॑नि दोहते। अज॑नयो म॒रुतो॑ व॒क्षणा॑भ्यो दि॒व आ व॒क्षणा॑भ्यः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य किरणों के समान न्याय के प्रकाश और अच्छी शिक्षा युक्त वाणी के समान वक्तृता बोल-चाल और नदी के समान अच्छे गुणों की प्राप्ति करते, वे समग्र सुख को प्राप्त होते हैं॥४॥

तुभ्यं॑ शु॒क्रासः॒ शुच॑यस्तुर॒ण्यवो॒ मदे॑षू॒ग्रा इ॑षणन्त भु॒र्वण्य॒पामि॑षन्त भु॒र्वणि॑। त्वां त्सा॒री दस॑मानो॒ भग॑मीट्टे तक्व॒वीये॑। त्वं विश्व॑स्मा॒द्भुव॑नात्पासि॒ धर्म॑णासु॒र्या॑त्पासि॒ धर्म॑णा॥

मनुष्यों की योग्यता है कि जो जिनकी रक्षा करें, उनकी वे भी रक्षा करें। दुष्टों की निवृत्ति से ऐश्वर्य्य को चाहें और कभी दुष्टों में विश्वास न करें॥५॥

त्वं नो॑ वायवेषा॒मपू॑र्व्यः॒ सोमा॑नां प्रथ॒मः पी॒तिम॑र्हसि सु॒तानां॑ पी॒तिम॑र्हसि। उ॒तो वि॒हुत्म॑तीनां वि॒शां व॑व॒र्जुषी॑णाम्। विश्वा॒ इत्ते॑ धे॒नवो॑ दुह्र आ॒शिरं॑ घृ॒तं दु॑ह्रत आ॒शिर॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजपुरुषों को चाहिये कि ब्रह्मचर्य्य और उत्तम औषध के सेवन और योग्य आहार-विहारों से शरीर और आत्मा के बल की उन्नति कर धर्म से प्रजा की पालना करने में स्थिर हों॥६॥। इस सूक्त में पवन के दृष्टान्त से शूरवीरों के न्यायविषयकों में प्रजा कर्म के वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह एकसौ चौंतीसवाँ सूक्त और तेईसवाँ वर्ग पूरा हुआ॥

स्ती॒र्णं ब॒र्हिरुप॑ नो याहि वी॒तये॑ स॒हस्रे॑ण नि॒युता॑ नियुत्वते श॒तिनी॑भिर्नियुत्वते। तुभ्यं॒ हि पू॒र्वपी॑तये दे॒वा दे॒वाय॑ येमि॒रे। प्र ते॑ सु॒तासो॒ मधु॑मन्तो अस्थिर॒न्मदा॑य॒ क्रत्वे॑ अस्थिरन्॥

विद्या और धर्म को जानने की इच्छा करनेवाले मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों का बुलाना सब कभी करें। उनकी सेवा और सङ्ग से विशेष ज्ञान की उन्नति कर नित्य आनन्दयुक्त हों॥१॥

तुभ्या॒यं सोमः॒ परि॑पूतो॒ अद्रि॑भिः स्पा॒र्हा वसा॑नः॒ परि॒ कोश॑मर्षति शु॒क्रा वसा॑नो अर्षति। तवा॒यं भा॒ग आ॒युषु॒ सोमो॑ दे॒वेषु॑ हूयते। वह॑ वायो नि॒युतो॑ याह्यस्म॒युर्जु॑षा॒णो या॑ह्यस्म॒युः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य प्रशंसित कपड़े-गहने पहिने हुए सुन्दर रूपवान् अच्छे आचरण करते हैं, वे सर्वत्र प्रशंसा को प्राप्त होते हैं॥२॥

आ नो॑ नि॒युद्भिः॑ श॒तिनी॑भिरध्व॒रं स॑ह॒स्रिणी॑भि॒रुप॑ याहि वी॒तये॒ वायो॑ ह॒व्यानि॑ वी॒तये॑। तवा॒यं भा॒ग ऋ॒त्वियः॒ सर॑श्मिः॒ सूर्ये॒ सचा॑। अ॒ध्व॒र्युभि॒र्भर॑माणा अयंसत॒ वायो॑ शु॒क्रा अ॑यंसत॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजपुरुषों को चाहिये कि शत्रुओं के बल से चौगुना वा अधिक बल कर दुष्ट शत्रुओं के साथ युद्ध करें और वे प्रतिवर्ष प्रजाजनों से जितना कर लेना योग्य हो उतना ही लेवें तथा सदैव धर्मात्मा विद्वानों की सेवा करें॥३॥

आ वां॒ रथो॑ नि॒युत्वा॑न्वक्ष॒दव॑से॒ऽभि प्रयां॑सि॒ सुधि॑तानि वी॒तये॒ वायो॑ ह॒व्यानि॑ वी॒तये॑। पिब॑तं॒ मध्वो॒ अन्ध॑सः पूर्व॒पेयं॒ हि वां॑ हि॒तम्। वाय॒वा च॒न्द्रेण॒ राध॒सा ग॑त॒मिन्द्र॑श्च॒ राध॒सा ग॑तम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे पवन और बिजुली सब में अभिव्याप्त होकर सब वस्तुओं का सेवन करते, वैसे सज्जनों को चाहिये कि ऐश्वर्य्य की प्राप्ति के लिये सब साधनों का सेवन करें॥४॥

आ वां॒ धियो॑ ववृत्युरध्व॒राँ उपे॒ममिन्दुं॑ मर्मृजन्त वा॒जिन॑मा॒शुमत्यं॒ न वा॒जिन॑म्। तेषां॑ पिबतमस्म॒यू आ नो॑ गन्तमि॒होत्या। इन्द्र॑वायू सु॒ताना॒मद्रि॑भिर्यु॒वं मदा॑य वाजदा यु॒वम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार हैं। जो उपदेश करने और पढ़ानेवाले मनुष्यों की बुद्धियों को शुद्ध कर अच्छे सिखाये हुए घोड़े के समान पराक्रम युक्त कराते, वे आनन्द सेवनवाले होते हैं॥५॥

इ॒मे वां॒ सोमा॑ अ॒प्स्वा सु॒ता इ॒हाध्व॒र्युभि॒र्भर॑माणा अयंसत॒ वायो॑ शु॒क्रा अ॑यंसत। ए॒ते वा॑म॒भ्य॑सृक्षत ति॒रः प॒वित्र॑मा॒शवः॑। यु॒वा॒यवोऽति॒ रोमा॑ण्य॒व्यया॒ सोमा॑सो॒ अत्य॒व्यया॑॥

हे मनुष्यो! जिनके सेवन से दृढ़ और आरोग्ययुक्त देह और आत्मा होते हैं तथा जो अन्तःकरण को शुद्ध करते, उनका तुम नित्य सेवन करो॥६॥

अति॑ वायो सस॒तो या॑हि॒ शश्व॑तो॒ यत्र॒ ग्रावा॒ वद॑ति॒ तत्र॑ गच्छतं गृ॒हमिन्द्र॑श्च गच्छतम्। वि सू॒नृता॒ ददृ॑शे॒ रीय॑ते घृ॒तमा पू॒र्णया॑ नि॒युता॑ याथो अध्व॒रमिन्द्र॑श्च याथो अध्व॒रम्॥

मनुष्य लोग जिस देश वा स्थान में शास्त्रवेत्ता आप्त विद्वान् सत्य का उपदेश करें, उनके स्थान पर जाके उनके उपदेश को नित्य सुना करें, जिससे विद्यायुक्त वाणी और सत्य विज्ञान और धर्मज्ञान को प्राप्त होवें॥७॥

अत्राह॒ तद्व॑हेथे॒ मध्व॒ आहु॑तिं॒ यम॑श्व॒त्थमु॑प॒तिष्ठ॑न्त जा॒यवो॒ऽस्मे ते स॑न्तु जा॒यवः॑। सा॒कं गावः॒ सुव॑ते॒ पच्य॑ते॒ यवो॒ न ते॑ वाय॒ उप॑ दस्यन्ति धे॒नवो॒ नाप॑ दस्यन्ति धे॒नवः॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो सब मनुष्यों से श्रेष्ठ मनुष्यों के सङ्ग की कामना और आपस में प्रीति की जाय तो उनकी विद्या बल की हानि और भेदबुद्धि न उत्पन्न हो॥८॥

इ॒मे ये ते॒ सु वा॑यो बा॒ह्वो॑जसो॒ऽन्तर्न॒दी ते॑ प॒तय॑न्त्यु॒क्षणो॒ महि॒ व्राध॑न्त उ॒क्षणः॑। धन्व॑ञ्चि॒द्ये अ॑ना॒शवो॑ जी॒राश्चि॒दगि॑रौकसः। सूर्य॑स्येव र॒श्मयो॑ दुर्नि॒यन्त॑वो॒ हस्त॑योर्दुर्नि॒यन्त॑वः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। राजपुरुषों को चाहिये कि बाहुबलयुक्त शत्रुओं से न डरनेवाले वीर पुरुषों को सेना में सदैव रक्खें, जिससे राज्य का प्रताप सदा बढ़े॥९॥इस सूक्त में मनुष्यों का परस्पर वर्त्ताव कहने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ एकता है, यह जानना चाहिये॥यह १३५ एकसौ पैंतीसवाँ सूक्त और पच्चीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र सु ज्येष्ठं॑ निचि॒राभ्यां॑ बृ॒हन्नमो॑ ह॒व्यं म॒तिं भ॑रता मृळ॒यद्भ्यां॒ स्वादि॑ष्ठं मृळ॒यद्भ्या॑म्। ता स॒म्राजा॑ घृ॒तासु॑ती य॒ज्ञेय॑ज्ञ॒ उप॑स्तुता। अथै॑नोः क्ष॒त्रं न कुत॑श्च॒नाधृषे॑ देव॒त्वं नू चि॑दा॒धृषे॑॥

जो बहुत काल से प्रवृत्त पढ़ाने और उपदेश करनेवालों के समीप से विद्या और अच्छे उपदेशों को शीघ्र ग्रहण करते, वे चक्रवर्त्ति राजा होने के योग्य होते हैं और न इनका ऐश्वर्य्य कभी नष्ट होता है॥१॥

अद॑र्शि गा॒तुरु॒रवे॒ वरी॑यसी॒ पन्था॑ ऋ॒तस्य॒ सम॑यंस्त र॒श्मिभि॒श्चक्षु॒र्भग॑स्य र॒श्मिभिः॑। द्यु॒क्षं मि॒त्रस्य॒ साद॑नमर्य॒म्णो वरु॑णस्य च। अथा॑ दधाते बृ॒हदु॒क्थ्यं१॒॑ वय॑ उप॒स्तुत्यं॑ बृ॒हद्वयः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य के प्रकाश से भूमि पर मार्ग दीखते हैं, वैसे ही उत्तम विद्वानों के सङ्ग से सत्य विद्याओं का प्रकाश होता है वा जैसे पखेरू उत्तम आश्रय स्थान पाकर आनन्द पाते हैं, वैसे उत्तम विद्याओं को पाकर मनुष्य सब कभी सुख पाते हैं॥२॥

ज्योति॑ष्मती॒मदि॑तिं धार॒यत्क्षि॑तिं॒ स्व॑र्वती॒मा स॑चेते दि॒वेदि॑वे जागृ॒वांसा॑ दि॒वेदि॑वे। ज्योति॑ष्मत्क्ष॒त्रमा॑शाते आदि॒त्या दानु॑न॒स्पती॑। मि॒त्रस्तयो॒र्वरु॑णो यात॒यज्ज॑नोऽर्य॒मा या॑त॒यज्ज॑नः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सूर्य, प्राण और योगीजन के समान सचेत होकर विद्या, विनय और धर्म से सेना और प्रजाजनों को प्रसन्न करते हैं, वे अत्यन्त यश पाते हैं॥३॥

अ॒यं मि॒त्राय॒ वरु॑णाय॒ शंत॑मः॒ सोमो॑ भूत्वव॒पाने॒ष्वाभ॑गो दे॒वो दे॒वेष्वाभ॑गः। तं दे॒वासो॑ जुषेरत॒ विश्वे॑ अ॒द्य स॒जोष॑सः। तथा॑ राजाना करथो॒ यदीम॑ह॒ ऋता॑वाना॒ यदीम॑हे॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। इस संसार में जैसे शास्त्रवेत्ता विद्वान् धर्म के अनुकूल व्यवहार से ऐश्वर्य्य की उन्नति कर सबके उपकार करनेहारे काम में खर्च करते वा जैसे सत्य व्यवहार को जानने की इच्छा करनेवाले धार्मिक विद्वानों को याचते अर्थात् उनसे अपने प्रिय पदार्थ को माँगते, वैसे सब मनुष्य अपने ऐश्वर्य को अच्छे काम में खर्च करें और विद्वान् महाशयों से विद्याओं की याचना करें॥४॥

यो मि॒त्राय॒ वरु॑णा॒यावि॑ध॒ज्जनो॑ऽन॒र्वाणं॒ तं परि॑ पातो॒ अंह॑सो दा॒श्वांसं॒ मर्त॒मंह॑सः। तम॑र्य॒माभि र॑क्षत्यृजू॒यन्त॒मनु॑ व्र॒तम्। उ॒क्थैर्य ए॑नोः परि॒भूष॑ति व्र॒तं स्तोमै॑रा॒भूष॑ति व्र॒तम्॥

विद्वान् जन जो लोग धर्म और अधर्म को जानना चाहें तथा धर्म का ग्रहण और अधर्म का त्याग करना चाहें, उनको पढ़ा और उपदेश कर विद्या और धर्म आदि शुभ गुण, कर्म और स्वभाव से सब ओर से सुशोभित करें॥५॥

नमो॑ दि॒वे बृ॑ह॒ते रोद॑सीभ्यां मि॒त्राय॑ वोचं॒ वरु॑णाय मी॒ळ्हुषे॑ सुमृळी॒काय॑ मी॒ळ्हुषे॑। इन्द्र॑म॒ग्निमुप॑ स्तुहि द्यु॒क्षम॑र्य॒मणं॒ भग॑म्। ज्योग्जीव॑न्तः प्र॒जया॑ सचेमहि॒ सोम॑स्यो॒ती स॑चेमहि॥

इस मन्त्र में अनेक वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को विद्वानों के समान चाल-चलन कर पदार्थविद्या के लिये प्रवृत्त हो तथा प्रजा और ऐश्वर्य को पाकर निरन्तर आनन्दयुक्त होना चाहिये॥६॥

ऊ॒ती दे॒वानां॑ व॒यमिन्द्र॑वन्तो मंसी॒महि॒ स्वय॑शसो म॒रुद्भिः॑। अ॒ग्निर्मि॒त्रो वरु॑णः॒ शर्म॑ यंस॒न्तद॑श्याम म॒घवा॑नो व॒यं च॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे इस संसार में पृथिवी आदि पदार्थ सुख और ऐश्वर्य करनेवाले हैं, वैसे ही विद्वानों की सिखावट और उनके सङ्ग हैं, इनसे हम लोग सुख और ऐश्वर्यवाले होकर निरन्तर आनन्दयुक्त हों॥७॥इस सूक्त में वायु और इन्द्र आदि पदार्थों के दृष्टान्तों से मनुष्यों के लिये विद्या और उत्तम शिक्षा का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ एकता है, यह जानना चाहिये॥इस अध्याय में क्रोध आदि का निवारण, अन्न आदि की रक्षा और परम ऐश्वर्य की प्राप्ति पर्यन्त अर्थ कहे हैं, इससे इस अध्याय में कहे हुए अर्थों की पिछले अध्याय में कहे हुए अर्थों के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह ऋग्वेद में दूसरे अष्टक में पहला अध्याय और छब्बीसवाँ वर्ग तथा प्रथम मण्डल में एकसौ छत्तीसवाँ सूक्त पूरा हुआ॥

सु॒षु॒मा या॑त॒मद्रि॑भि॒र्गोश्री॑ता मत्स॒रा इ॒मे सोमा॑सो मत्स॒रा इ॒मे। आ रा॑जाना दिविस्पृशास्म॒त्रा ग॑न्त॒मुप॑ नः। इ॒मे वां॑ मित्रावरुणा॒ गवा॑शिरः॒ सोमाः॑ शु॒क्रा गवा॑शिरः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। इस जगत् में जैसे पृथिवी आदि पदार्थ जीवन के हेतु हैं, वैसे मेघ अतीव जीवन देनेवाले हैं, जैसे ये सब वर्त्त रहे हैं। वैसे मनुष्य वर्त्ते॥१॥

इ॒म आ या॑त॒मिन्द॑वः॒ सोमा॑सो॒ दध्या॑शिरः सु॒तासो॒ दध्या॑शिरः। उ॒त वा॑मु॒षसो॑ बु॒धि सा॒कं सूर्य॑स्य र॒श्मिभिः॑। सु॒तो मि॒त्राय॒ वरु॑णाय पी॒तये॒ चारु॑र्ऋ॒ताय॑ पी॒तये॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि इस संसार में जितने रस वा ओषधियों को सिद्ध करें, उन सबको मित्रपन और उत्तम कर्म सेवने को तथा आलस्यादि दोषों के नाश करने को समर्पण करें॥२॥

तां वां॑ धे॒नुं न वा॑स॒रीमं॒शुं दु॑ह॒न्त्यद्रि॑भिः॒ सोमं॑ दुह॒न्त्यद्रि॑भिः। अ॒स्म॒त्रा ग॑न्त॒मुप॑ नो॒ऽर्वाञ्चा॒ सोम॑पीतये। अ॒यं वां॑ मित्रावरुणा॒ नृभिः॑ सु॒तः सोम॒ आ पी॒तये॑ सु॒तः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे दूध देनेवाली गौयें सुखों को पूरा करती हैं, वैसे युक्ति से सिद्ध किया हुआ सोमवल्ली आदि का रस सब रोगों का नाश करता है॥३॥इस सूक्त में सोमलता के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह एकसौ सैंतीसवाँ सूक्त और पहिला वर्ग पूरा हुआ॥

प्रप्र॑ पू॒ष्णस्तु॑विजा॒तस्य॑ शस्यते महि॒त्वम॑स्य त॒वसो॒ न त॑न्दते स्तो॒त्रम॑स्य॒ न त॑न्दते। अर्चा॑मि सुम्न॒यन्न॒हमन्त्यू॑तिं मयो॒भुव॑म्। विश्व॑स्य॒ यो मन॑ आयुयु॒वे म॒खो दे॒व आ॑युयु॒वे म॒खः॥

जो शुभ अच्छे कर्मों का आचरण करते हैं वे अत्यन्त प्रशंसित होते हैं, जो सुशीलता और नम्रता से सबके चित्त को धर्मयुक्त व्यवहारों में बाँधते हैं, वे ही सबको सत्कार करने योग्य हैं॥१॥

प्र हि त्वा॑ पूषन्नजि॒रं न याम॑नि॒ स्तोमे॑भिः कृ॒ण्व ऋ॒णवो॒ यथा॒ मृध॒ उष्ट्रो॒ न पी॑परो॒ मृधः॑। हु॒वे यत्त्वा॑ मयो॒भुवं॑ दे॒वं स॒ख्याय॒ मर्त्यः॑। अ॒स्माक॑माङ्गू॒षान्द्यु॒म्निन॑स्कृधि॒ वाजे॑षु द्यु॒म्निन॑स्कृधि॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य बुद्धिमान् विद्यार्थियों को विद्यावान् करें, शत्रुओं को जीतें, वे अच्छी कीर्त्ति के साथ माननीय हों॥२॥

यस्य॑ ते पूषन्त्स॒ख्ये वि॑प॒न्यवः॒ क्रत्वा॑ चि॒त्सन्तोऽव॑सा बुभुज्रि॒र इति॒ क्रत्वा॑ बुभुज्रि॒रे। तामनु॑ त्वा॒ नवी॑यसीं नि॒युतं॑ रा॒य ई॑महे। अहे॑ळमान उरुशंस॒ सरी॑ भव॒ वाजे॑वाजे॒ सरी॑ भव॥

जो बुद्धिमानों के सङ्ग और मित्रपन से नवीन-नवीन विद्या को प्राप्त होते हैं, वे प्राज्ञ उत्तम ज्ञानवान् होकर विजयी होते हैं॥३॥

अ॒स्या ऊ॒ षु ण॒ उप॑ सा॒तये॑ भु॒वोऽहे॑ळमानो ररि॒वाँ अ॑जाश्व श्रवस्य॒ताम॑जाश्व। ओ षु त्वा॑ ववृतीमहि॒ स्तोमे॑भिर्दस्म सा॒धुभिः॑। न॒हि त्वा॑ पूषन्नति॒मन्य॑ आघृणे॒ न ते॑ स॒ख्यम॑पह्नु॒वे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। धार्मिक विद्वानों के साथ सिद्ध मित्रभाव को वर्त्त कर सब मनुष्यों को चाहिये कि बहुत प्रकार की उत्तम-उत्तम बुद्धियों को प्राप्त होवें और कभी किसी शिष्ट पुरुष का तिरस्कार न करें॥४॥इस सूक्त में पुष्टि करनेवाले विद्वान् वा धार्मिक सामान्य जन की प्रशंसा के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह एकसौ अड़तीसवाँ सूक्त और दूसरा वर्ग पूरा हुआ॥

अस्तु॒ श्रौष॑ट् पु॒रो अ॒ग्निं धि॒या द॑ध॒ आ नु तच्छर्धो॑ दि॒व्यं वृ॑णीमह इन्द्रवा॒यू वृ॑णीमहे। यद्ध॑ क्रा॒णा वि॒वस्व॑ति॒ नाभा॑ सं॒दायि॒ नव्य॑सी। अध॒ प्र सू न॒ उप॑ यन्तु धी॒तयो॑ दे॒वाँ अच्छा॒ न धी॒तयः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे अङ्गुली सब कर्मों में उपयुक्त होती हैं, वैसे तुम लोग भी पुरुषार्थ में युक्त होओ, जिससे तुम में बल बढ़े॥—१॥

यद्ध॒ त्यन्मि॑त्रावरुणावृ॒तादध्या॑द॒दाथे॒ अनृ॑तं॒ स्वेन॑ म॒न्युना॒ दक्ष॑स्य॒ स्वेन॑ म॒न्युना॑। यु॒वोरि॒त्थाधि॒ सद्म॒स्वप॑श्याम हिर॒ण्यय॑म्। धी॒भिश्च॒न मन॑सा॒ स्वेभि॑र॒क्षभिः॒ सोम॑स्य॒ स्वेभि॑र॒क्षभिः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को सत्य ग्रहण और असत्य का त्याग कर अपने पुरषार्थ से पूरा बल और ऐश्वर्य्य सिद्ध कर अपना अन्तःकरण और अपने इन्द्रियों को सत्य काम में प्रवृत्त करना चाहिये॥२॥

यु॒वां स्तोमे॑भिर्देव॒यन्तो॑ अश्विनाऽऽश्रा॒वय॑न्त इव॒ श्लोक॑मा॒यवो॑ यु॒वां ह॒व्याभ्या॒३॒॑यवः॑। यु॒वोर्विश्वा॒ अधि॒ श्रियः॒ पृक्ष॑श्च विश्ववेदसा। प्रु॒षा॒यन्ते॑ वां प॒वयो॑ हिर॒ण्यये॒ रथे॑ दस्रा हिर॒ण्यये॑॥

जो पूर्ण विद्या की प्राप्ति निमित्त विद्वानों का आश्रय करते हैं, वे धन-धान्य और ऐश्वर्य आदि पदार्थों से पूर्ण होते हैं॥३॥

अचे॑ति दस्रा॒ व्यू१॒॑नाक॑मृण्वथो यु॒ञ्जते॑ वां रथ॒युजो॒ दिवि॑ष्टिष्वध्व॒स्मानो॒ दिवि॑ष्टिषु। अधि॑ वां॒ स्थाम॑ ब॒न्धुरे॒ रथे॑ दस्रा हिर॒ण्यये॑। प॒थेव॒ यन्ता॑वनु॒शास॑ता॒ रजोऽञ्ज॑सा॒ शास॑ता॒ रजः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वानों को प्राप्त हो शिल्प विद्या पढ़ और विमानादि रथ को सिद्ध कर अन्तरिक्ष में जाते हैं, वे सुख को प्राप्त होते हैं॥४॥

शची॑भिर्नः शचीवसू॒ दिवा॒ नक्तं॑ दशस्यतम्। मा वां॑ रा॒तिरुप॑ दस॒त्कदा॑ च॒नास्मद्रा॒तिः कदा॑ च॒न॥

इस संसार में अध्यापक और उपदेशक अच्छी शिक्षायुक्त वाणी से दिन रात विद्या का उपदेश करें, जिससे किसी की उदारता न नष्ट हो॥५॥

वृष॑न्निन्द्र वृष॒पाणा॑स॒ इन्द॑व इ॒मे सु॒ता अद्रि॑षुतास उ॒द्भिद॒स्तुभ्यं॑ सु॒तास॑ उ॒द्भिदः॑। ते त्वा॑ मदन्तु दा॒वने॑ म॒हे चि॒त्राय॒ राध॑से। गी॒र्भिर्गि॑र्वाहः॒ स्तव॑मान॒ आ ग॑हि सुमृळी॒को न॒ आ ग॑हि॥

मनुष्यों को चाहिये कि उन्हीं ओषधि और औषधिरसों का सेवन करें कि जो प्रमाद न उत्पन्न करें, जिससे ऐश्वर्य्य की उन्नति हो॥६॥

ओ षू णो॑ अग्ने शृणुहि॒ त्वमी॑ळि॒तो दे॒वेभ्यो॑ ब्रवसि य॒ज्ञिये॑भ्यो॒ राज॑भ्यो य॒ज्ञिये॑भ्यः। यद्ध॒ त्यामङ्गि॑रोभ्यो धे॒नुं दे॑वा॒ अद॑त्तन। वि तां दु॑ह्रे अर्य॒मा क॒र्तरि॒ सचाँ॑ ए॒ष तां वे॑द मे॒ सचा॑॥

अध्यापकों को योग्यता यह है कि सब विद्यार्थियों को निष्कपटता से समस्त विद्या प्रतिदिन पढ़ा के परीक्षा के लिये उनका पढ़ा हुआ सुनें, जिससे पढ़े हुए को विद्यार्थी जन न भूलें॥७॥

मो षु वो॑ अ॒स्मद॒भि तानि॒ पौंस्या॒ सना॑ भूवन्द्यु॒म्नानि॒ मोत जा॑रिषुर॒स्मत्पु॒रोत जा॑रिषुः। यद्व॑श्चि॒त्रं यु॒गेयु॑गे॒ नव्यं॒ घोषा॒दम॑र्त्यम्। अ॒स्मासु॒ तन्म॑रुतो॒ यच्च॑ दु॒ष्टरं॑ दिधृ॒ता यच्च॑ दु॒ष्टर॑म्॥

मनुष्यों को इस प्रकार आशंसा, इच्छा और प्रयत्न करना चाहिये कि जिससे बल, यश, धन, आयु और राज्य नित्य बढ़े॥८॥

द॒ध्यङ्ह॑ मे ज॒नुषं॒ पूर्वो॒ अङ्गि॑राः प्रि॒यमे॑धः॒ कण्वो॒ अत्रि॒र्मनु॑र्विदु॒स्ते मे॒ पूर्वे॒ मनु॑र्विदुः। तेषां॑ दे॒वेष्वाय॑तिर॒स्माकं॒ तेषु॒ नाभ॑यः। तेषां॑ प॒देन॒ मह्या न॑मे गि॒रेन्द्रा॒ग्नी आ न॑मे गि॒रा॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जगत् में जो विद्वान् हैं, वे ही विद्वान् के प्रभाव को जानने योग्य होते हैं किन्तु क्षुद्राशय नहीं, जो जिनसे विद्या ग्रहण करें, वे उनके प्रियाचरण का सदा अनुष्ठान करें, सब इतर जनों को आप्त विद्वानों के मार्ग ही से चलना चाहिये किन्तु और मूर्खों के मार्ग से नहीं॥९॥

होता॑ यक्षद्व॒निनो॑ वन्त॒ वार्यं॒ बृह॒स्पति॑र्यजति वे॒न उ॒क्षभिः॑ पुरु॒वारे॑भिरु॒क्षभिः॑। ज॒गृ॒भ्मा दू॒र आ॑दिशं॒ श्लोक॒मद्रे॒रध॒ त्मना॑। अधा॑रयदर॒रिन्दा॑नि सु॒क्रतुः॑ पु॒रू सद्मा॑नि सु॒क्रतुः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मेघ से छुटे हुए जल समस्त प्राणी-अप्राणियों अर्थात् जड़-चेतनों को जिलाते उनकी पालना करते हैं, वैसे वेदादि विद्याओं के पढ़ाने-पढ़नेवालों से प्राप्त हुई विद्या सब मनुष्यों को वृद्धि देती हैं और जैसे महात्मा शास्त्रवेत्ता विद्वानों के साथ सम्बन्ध से सज्जन लोग जानने योग्य विषय को जानते हैं, वैसे विद्या के उत्तम सम्बन्ध से मनुष्य चाहे हुए विषय को प्राप्त होते हैं॥१०॥

ये दे॑वासो दि॒व्येका॑दश॒ स्थ पृ॑थि॒व्यामध्येका॑दश॒ स्थ। अ॒प्सु॒क्षितो॑ महि॒नैका॑दश॒ स्थ ते दे॑वासो य॒ज्ञमि॒मं जु॑षध्वम्॥

ईश्वर के इस सृष्टि में जो पदार्थ सूर्यादि लोकों में हैं अर्थात् जो अन्यत्र वर्त्तमान हैं वे ही यहाँ हैं, जितने यहाँ हैं उतने ही वहाँ और लोकों में हैं, उनको यथावत् जानके मनुष्यों को योगक्षेम निरन्तर करना चाहिये॥११॥। इस सूक्त में विद्वानों के शील का वर्णन होने से इसके अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥११॥यह एकसौ उनतालीसवाँ सूक्त, चौथा वर्ग और बीसवाँ अनुवाक समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

वे॒दि॒षदे॑ प्रि॒यधा॑माय सु॒द्युते॑ धा॒सिमि॑व॒ प्र भ॑रा॒ योनि॑म॒ग्नये॑। वस्त्रे॑णेव वासया॒ मन्म॑ना॒ शुचिं॑ ज्यो॒तीर॑थं शु॒क्रव॑र्णं तमो॒हन॑म्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे होता जन आग में समिधरूप काष्ठों को अच्छे प्रकार स्थिर कर और उसमें घृत आदि हवि का हवन कर इस आग को बढ़ाते हैं, वैसे शुद्ध जन को भोजन और आच्छादन अर्थात् वस्त्र आदि से विद्वान् जन बढ़ावें॥१॥

अ॒भि द्वि॒जन्मा॑ त्रि॒वृदन्न॑मृज्यते संवत्स॒रे वा॑वृधे ज॒ग्धमीं॒ पुनः॑। अ॒न्यस्या॒सा जि॒ह्वया॒ जेन्यो॒ वृषा॒ न्य१॒॑न्येन॑ व॒निनो॑ मृष्ट वार॒णः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य अन्न आदि बहुत पदार्थ इकट्ठे कर उनको बना और भोजन करते वा दूसरों को कराते तथा हवन आदि उत्तम कामों से वर्षा की शुद्धि करते हैं, वे अत्यन्त बली होते हैं॥२॥

कृ॒ष्ण॒प्रुतौ॑ वेवि॒जे अ॑स्य स॒क्षिता॑ उ॒भा त॑रेते अ॒भि मा॒तरा॒ शिशु॑म्। प्रा॒चाजि॑ह्वं ध्व॒सय॑न्तं तृषु॒च्युत॒मा साच्यं॒ कुप॑यं॒ वर्ध॑नं पि॒तुः॥

भले-बुरे का ज्ञान बढ़ाने, रोग आदि बढ़े क्लेशों को दूर करने और प्रेम उत्पन्न करानेवाले विद्वानो के उपदेश को पाये हुए भी बालक की माता अर्थात् दूध पिलानेवाली धाय और उत्पन्न करानेवाली निज माता अपने प्रेम से सर्वदा डरती हैं॥३॥

मु॒मु॒क्ष्वो॒३॒॑ मन॑वे मानवस्य॒ते र॑घु॒द्रुवः॑ कृ॒ष्णसी॑तास ऊ॒ जुवः॑। अ॒स॒म॒ना अ॑जि॒रासो॑ रघु॒ष्यदो॒ वात॑जूता॒ उप॑ युज्यन्त आ॒शवः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे खेती करनेवाले जन खेतों को अच्छे प्रकार जोत बोने के योग्य भली भाँति करके और उसमें बीज बोय फलवान् होते हैं, वैसे मुमुक्षु पुरुष दम नियम से इन्द्रियों को खैंच और शम अर्थात् शान्तिभाव से मन को शान्त कर अपने आत्मा को पवित्र कर ब्रह्मवेत्ता जनों की सेवा करें॥४॥

आद॑स्य॒ ते ध्व॒सय॑न्तो॒ वृथे॑रते कृ॒ष्णमभ्वं॒ महि॒ वर्पः॒ करि॑क्रतः। यत्सीं॑ म॒हीम॒वनिं॒ प्राभि मर्मृ॑शदभिश्व॒सन्त्स्त॒नय॒न्नेति॒ नान॑दत्॥

जो मनुष्य इस संसार में शरीर का आश्रय कर अधर्म करते हैं, वे दृढ़ बन्धन को पाते हैं और जो शास्त्रों को पढ़, योगाभ्यास कर, धर्म का अनुष्ठान करते, उन्हीं की मुक्ति होती है॥५॥

भूष॒न्न योऽधि॑ ब॒भ्रूषु॒ नम्न॑ते॒ वृषे॑व॒ पत्नी॑र॒भ्ये॑ति॒ रोरु॑वत्। ओ॒जा॒यमा॑नस्त॒न्व॑श्च शुम्भते भी॒मो न शृङ्गा॑ दविधाव दु॒र्गृभिः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य सिंह के तुल्य शत्रुओं से अग्राह्य, बैल के तुल्य अति बली, पुष्ट, नीरोग शरीरवाले, बड़ी ओषधियों के सेवक सब सज्जनों को शोभित करें, वे इस जगत् में शोभायमान होते हैं॥६॥

स सं॒स्तिरो॑ वि॒ष्टिरः॒ सं गृ॑भायति जा॒नन्ने॒व जा॑न॒तीर्नित्य॒ आ श॑ये। पुन॑र्वर्धन्ते॒ अपि॑ यन्ति दे॒व्य॑म॒न्यद्वर्पः॑ पि॒त्रोः कृ॑ण्वते॒ सचा॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिन विद्वानों के साथ विदुषी स्त्रियों का विवाह होता है, वे विद्वान् जन नित्य बढ़ते हैं, जो उत्तम गुणों का ग्रहण करते, वे यहाँ पुरुषार्थी होकर जन्मान्तर में भी सुखयुक्त होते हैं॥७॥

तम॒ग्रुवः॑ के॒शिनीः॒ सं हि रे॑भि॒र ऊ॒र्ध्वास्त॑स्थुर्म॒म्रुषीः॒ प्रायवे॒ पुनः॑। तासां॑ ज॒रां प्र॑मु॒ञ्चन्ने॑ति॒ नान॑द॒दसुं॒ परं॑ ज॒नय॑ञ्जी॒वमस्तृ॑तम्॥

जो कन्या जन ब्रह्मचर्य्य के साथ समस्त विद्याओं का अभ्यास करती हैं, वे इस संसार में प्रशंसित हो और बहुत सुख भोग जन्मान्तर में भी उत्तम सुख को प्राप्त होती हैं और जो विद्वान् लोग भी शरीर और आत्मा के बल को नष्ट नहीं करते, वे वृद्धावस्था और रोगों से रहित होते हैं॥८॥

अ॒धी॒वा॒सं परि॑ मा॒तू रि॒हन्नह॑ तुवि॒ग्रेभिः॒ सत्व॑भिर्याति॒ वि ज्रयः॑। वयो॒ दध॑त्प॒द्वते॒ रेरि॑ह॒त्सदानु॒ श्येनी॑ सचते वर्त॒नीरह॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे अग्नि जङ्गलादिकों को जलाता वा पर्वतों को तोड़ता वैसे अन्याय और अधर्मात्माओं की निवृत्ति कर और दुष्टों के अभिमानों को तोड़के सत्य धर्म का तुम प्रचार करो॥९॥

अ॒स्माक॑मग्ने म॒घव॑त्सु दीदि॒ह्यध॒ श्वसी॑वान्वृष॒भो दमू॑नाः। अ॒वास्या॒ शिशु॑मतीरदीदे॒र्वर्मे॑व यु॒त्सु प॑रि॒जर्भु॑राणः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वान्! संग्राम में जैसे कवच से शरीर संरक्षित किया जाता है, वैसे न्याय से प्रजाजनों की रक्षा कीजिये और युद्ध में स्त्रियों को न मारिये, जैसे धनी पुरुषों की स्त्रियाँ नित्य आनन्द भोगती हैं, वैसे ही प्रजाजनों को आनन्दित कीजिये॥१०॥

इ॒दम॑ग्ने॒ सुधि॑तं॒ दुर्धि॑ता॒दधि॑ प्रि॒यादु॑ चि॒न्मन्म॑नः॒ प्रेयो॑ अस्तु ते। यत्ते॑ शु॒क्रं त॒न्वो॒३॒॑ रोच॑ते॒ शुचि॒ तेना॒स्मभ्यं॑ वनसे॒ रत्न॒मा त्वम्॥

मनुष्यों को दुःख से सोच न करना चाहिये और न सुख से हर्ष मानना चाहिये, जिससे एक दूसरे के उपकार के लिये चित्त अच्छे प्रकार लगाया जाय और जो ऐश्वर्य हो, वह सबके सुख के लिये बाँटा जाय॥११॥

रथा॑य॒ नाव॑मु॒त नो॑ गृ॒हाय॒ नित्या॑रित्रां प॒द्वतीं॑ रास्यग्ने। अ॒स्माकं॑ वी॒राँ उ॒त नो॑ म॒घोनो॒ जनाँ॑श्च॒ या पा॒रया॒च्छर्म॒ या च॑॥

विद्वानों को चाहिये कि जैसे मनुष्य और घोड़े आदि पशु पैरों से चलते हैं, वैसे चलनेवाली बड़ी नाव रचके और एक द्वीप से दूसरे द्वीप वा समुद्र में युद्ध अथवा व्यवहार के लिये जाय-आय (=जाना-आना) करके ऐश्वर्य की उन्नति निरन्तर करें॥१२॥

अ॒भी नो॑ अग्न उ॒क्थमिज्जु॑गुर्या॒ द्यावा॒क्षामा॒ सिन्ध॑वश्च॒ स्वगू॑र्ताः। गव्यं॒ यव्यं॒ यन्तो॑ दी॒र्घाहेषं॒ वर॑मरु॒ण्यो॑ वरन्त॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को सदा पुरुषार्थी होना चाहिये, जिन यानों से भूमि, अन्तरिक्ष, समुद्र और नदियों में सुख से शीघ्र जाना हो, उन यानों पर चढ़कर प्रतिदिन रात्रि के चौथे प्रहर में उठकर और दिन में न सोयकर सदा प्रयत्न करना चाहिये, जिससे उद्यमी ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं॥१३॥इस सूक्त में विद्वानों के पुरुषार्थ और गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह एकसौ चालीसवाँ सूक्त और सातवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

बळि॒त्था तद्वपु॑षे धायि दर्श॒तं दे॒वस्य॒ भर्गः॒ सह॑सो॒ यतो॒ जनि॑। यदी॒मुप॒ ह्वर॑ते॒ साध॑ते म॒तिर्ऋ॒तस्य॒ धेना॑ अनयन्त स॒स्रुतः॑॥

हे मनुष्यो! जिस उत्तम बुद्धि और सत्य आचरण से विद्यावानों का देखने योग्य स्वरूप धारण किया जाता और काम सिद्ध किया जाता, उस वाणी और उस सत्य आचार को तुम नित्य स्वीकार करो॥१॥

पृ॒क्षो वपुः॑ पितु॒मान्नित्य॒ आ श॑ये द्वि॒तीय॒मा स॒प्तशि॑वासु मा॒तृषु॑। तृ॒तीय॑मस्य वृष॒भस्य॑ दो॒हसे॒ दश॑प्रमतिं जनयन्त॒ योष॑णः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य इस जगत् में सात प्रकार के लोकों में ब्रह्मचर्य से प्रथम, गृहाश्रम से दूसरे और वानप्रस्थ वा संन्यास से तीसरे कर्म और उपासना के विज्ञान को प्राप्त होते, वे दश इन्द्रियों, दश प्राणों के विषयक मन बुद्धि चित्त अहङ्कार और जीव के ज्ञान को प्राप्त होते हैं॥२॥

निर्यदीं॑ बु॒ध्नान्म॑हि॒षस्य॒ वर्प॑स ईशा॒नासः॒ शव॑सा॒ क्रन्त॑ सू॒रयः॑। यदी॒मनु॑ प्र॒दिवो॒ मध्व॑ आध॒वे गुहा॒ सन्तं॑ मात॒रिश्वा॑ मथा॒यति॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही ब्रह्मवेत्ता विद्वान् होते हैं, जो धर्मानुष्ठान, योगाभ्यास और सत्सङ्ग करके अपने आत्मा को जान परमात्मा को जानते हैं और वे ही मुमुक्षु जनों के लिये इस ज्ञान को विदित कराने के योग्य होते हैं॥३॥

प्र यत्पि॒तुः प॑र॒मान्नी॒यते॒ पर्या पृ॒क्षुधो॑ वी॒रुधो॒ दंसु॑ रोहति। उ॒भा यद॑स्य ज॒नुषं॒ यदिन्व॑त॒ आदिद्यवि॑ष्ठो अभवद्घृ॒णा शुचिः॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि अन्न और औषध सब से लेवें और संस्कार किये अर्थात् बनाये हुए उस अन्न के भोजन से समस्त सुख होता है, ऐसा जानना चाहिये॥४॥

आदिन्मा॒तॄरावि॑श॒द्यास्वा शुचि॒रहिं॑स्यमान उर्वि॒या वि वा॑वृधे। अनु॒ यत्पूर्वा॒ अरु॑हत्सना॒जुवो॒ नि नव्य॑सी॒ष्वव॑रासु धावते॥

जो पुरुष वैद्यक विद्या को पढ़, बड़ी-बड़ी ओषधियों का युक्ति के साथ सेवन करते हैं, वे बहुत बढ़ते हैं। ओषधी दो प्रकार की होती हैं अर्थात् पुरानी और नवीन। उनमें जो विचक्षण चतुर होते हैं, वे ही नीरोग होते हैं॥५॥

आदिद्धोता॑रं वृणते॒ दिवि॑ष्टिषु॒ भग॑मिव पपृचा॒नास॑ ऋञ्जते। दे॒वान्यत्क्रत्वा॑ म॒ज्मना॑ पुरुष्टु॒तो मर्तं॒ शंसं॑ वि॒श्वधा॒ वेति॒ धाय॑से॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो अच्छे वैद्य का रत्न के समान सेवन करते हैं, वे शरीर और आत्मा के बलवाले होकर सुखी होते हैं॥६॥

वि यदस्था॑द्यज॒तो वात॑चोदितो ह्वा॒रो न वक्वा॑ ज॒रणा॒ अना॑कृतः। तस्य॒ पत्म॑न्द॒क्षुषः॑ कृ॒ष्णजं॑हसः॒ शुचि॑जन्मनो॒ रज॒ आ व्य॑ध्वनः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो धर्म में अच्छी स्थिरता रखते हैं, वे सूर्य के समान प्रसिद्ध होते हैं और उनकी की हुई कीर्त्ति सब दिशाओं में विराजमान होती है॥७॥

रथो॒ न या॒तः शिक्व॑भिः कृ॒तो द्यामङ्गे॑भिररु॒षेभि॑रीयते। आद॑स्य॒ ते कृ॒ष्णासो॑ दक्षि सू॒रयः॒ शूर॑स्येव त्वे॒षथा॑दीषते॒ वयः॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे उत्तम विमान से अन्तरिक्ष में आना-जाना सुख से जन करते हैं, वैसे विद्वान् जन विद्या से धर्म सम्बन्धी मार्ग में विचरने को समर्थ होते हैं॥८॥

त्वया॒ ह्य॑ग्ने॒ वरु॑णो धृ॒तव्र॑तो मि॒त्रः शा॑श॒द्रे अ॑र्य॒मा सु॒दान॑वः। यत्सी॒मनु॒ क्रतु॑ना वि॒श्वथा॑ वि॒भुर॒रान्न ने॒मिः प॑रि॒भूरजा॑यथाः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे ईश्वर न्यायकारी और सब विद्याओं में प्रवीण है, वैसे विद्वानों के सङ्ग से बुद्धिमान्, न्यायकारी और पूरी विद्यावाला हो॥९॥

त्वम॑ग्ने शशमा॒नाय॑ सुन्व॒ते रत्नं॑ यविष्ठ दे॒वता॑तिमिन्वसि। तं त्वा॒ नु नव्यं॑ सहसो युवन्व॒यं भगं॒ न का॒रे म॑हिरत्न धीमहि॥

जो अधर्म को छोड़ धर्म का अनुष्ठान कर परमात्मा को प्राप्त होते हैं, वे अति रमणीय आनन्द को प्राप्त होते हैं॥१०॥

अ॒स्मे र॒यिं न स्वर्थं॒ दमू॑नसं॒ भगं॒ दक्षं॒ न प॑पृचासि धर्ण॒सिम्। र॒श्मीँरि॑व॒ यो यम॑ति॒ जन्म॑नी उ॒भे दे॒वानां॒ शंस॑मृ॒त आ च॑ सु॒क्रतुः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार हैं। जो सूर्य की किरणों के समान सबको धर्मसम्बन्धी पुरुषार्थ मे संयुक्त करते हैं और आप भी वैसे ही वर्त्तते हैं, वे अगले-पिछले जन्मों को पवित्र करते हैं॥११॥

उ॒त नः॑ सु॒द्योत्मा॑ जी॒राश्वो॒ होता॑ म॒न्द्रः शृ॑णवच्च॒न्द्रर॑थः। स नो॑ नेष॒न्नेष॑तमै॒रमू॑रो॒ऽग्निर्वा॒मं सु॑वि॒तं वस्यो॒ अच्छ॑॥

जो सबके न्याय का सुननेवाला साङ्गोपाङ्ग सामग्रीसहित विद्याप्रकाशयुक्त सब विद्या के उत्साहियों को विद्यायुक्त करता है, वह प्रकाशात्मा होता है॥१२॥

अस्ता॑व्य॒ग्निः शिमी॑वद्भिर॒र्कैः साम्रा॑ज्याय प्रत॒रं दधा॑नः। अ॒मी च॒ ये म॒घवा॑नो व॒यं च॒ मिहं॒ न सूरो॒ अति॒ निष्ट॑तन्युः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य धार्मिक विद्वानों से अच्छी शिक्षा को पाये हुए धर्म से राज्य का विस्तार करते हुए प्रयत्न करते हैं, वे ही राज्य, विद्या और धर्म के उपदेश में अच्छे प्रकार स्थापन करने योग्य हैं॥१३॥इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति वर्त्तमान है, यह जानना चाहिये॥यह एकसौ इकतालीसवाँ सूक्त और नववाँ वर्ग पूरा हुआ॥

समि॑द्धो अग्न॒ आ व॑ह दे॒वाँ अ॒द्य य॒तस्रु॑चे। तन्तुं॑ तनुष्व पू॒र्व्यं सु॒तसो॑माय दा॒शुषे॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे बालकपन और तरुण अवस्था में माता और पिता आदि सन्तानों को सुखी करें, वैसे पुत्रलोग ब्रह्मचर्य से विद्या को पढ़ युवावस्था को प्राप्त और विवाह किये हुए अपने माता-पिता आदि को आनन्द देवें॥१॥

घृ॒तव॑न्त॒मुप॑ मासि॒ मधु॑मन्तं तनूनपात्। य॒ज्ञं विप्र॑स्य॒ माव॑तः शशमा॒नस्य॑ दा॒शुषः॑॥

विद्यार्थियों को विद्वानों की सङ्गति कर विद्वानों के सदृश होना चाहिये॥२॥

शुचिः॑ पाव॒को अद्भु॑तो॒ मध्वा॑ य॒ज्ञं मि॑मिक्षति। नरा॒शंस॒स्त्रिरा दि॒वो दे॒वो दे॒वेषु॑ य॒ज्ञियः॑॥

जो मनुष्य बालकाई, ज्वानी और बुढ़ापे में विद्याप्रचाररूपी व्यवहार को करें, वे कायिक, वाचिक और मानसिक सुखों को प्राप्त होवें॥३॥

ई॒ळि॒तो अ॑ग्न॒ आ व॒हेन्द्रं॑ चि॒त्रमि॒ह प्रि॒यम्। इ॒यं हि त्वा॑ म॒तिर्ममाच्छा॑ सुजिह्व व॒च्यते॑॥

सबको पुरुषार्थ से विद्वानों की बुद्धि पाकर महान् ऐश्वर्य का अच्छा संग्रह करना चाहिये॥४॥

स्तृ॒णा॒नासो॑ य॒तस्रु॑चो ब॒र्हिर्य॒ज्ञे स्व॑ध्व॒रे। वृ॒ञ्जे दे॒वव्य॑चस्तम॒मिन्द्रा॑य॒ शर्म॑ स॒प्रथः॑॥

उद्यम करनेवालों के विना लक्ष्मी और राज्य श्री प्राप्त नहीं होती तथा जो अतीव उत्तम विद्वानों के निवास संयुक्त घर में अच्छे प्रकार वसते हैं, वे अविद्या और दरिद्रता को निरन्तर नष्ट करते हैं॥५॥

वि श्र॑यन्तामृता॒वृधः॑ प्र॒यै दे॒वेभ्यो॑ म॒हीः। पा॒व॒कासः॑ पुरु॒स्पृहो॒ द्वारो॑ दे॒वीर॑स॒श्चतः॑॥

मनुष्यों को सबके उपकार के लिये विद्या और अच्छी शिक्षायुक्त वाणी और रत्नों को प्रसिद्ध करनेवाली भूमियों की कामना करनी चाहिये और उनके आश्रय से पवित्रता संपादन करनी चाहिये॥६॥

आ भन्द॑माने॒ उपा॑के॒ नक्तो॒षासा॑ सु॒पेश॑सा। य॒ह्वी ऋ॒तस्य॑ मा॒तरा॒ सीद॑तां ब॒र्हिरा सु॒मत्॥

जैसे दिन-रात्रि समस्त प्राणी-अप्राणी को नियम से अपनी-अपनी क्रियाओं में प्रवृत्त कराता है, वैसे सब विद्वानों को सर्वसाधारण मनुष्य उत्तम क्रियाओं में प्रवृत्त करने चाहिये॥७॥

म॒न्द्रजि॑ह्वा जुगु॒र्वणी॒ होता॑रा॒ दैव्या॑ क॒वी। य॒ज्ञं नो॑ यक्षतामि॒मं सि॒ध्रम॒द्य दि॑वि॒स्पृश॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् जन धर्मयुक्त व्यवहार के साथ परस्पर सङ्ग करते हैं, वैसे साधारण मनुष्यों को भी होना चाहिये॥८॥

शुचि॑र्दे॒वेष्वर्पि॑ता॒ होत्रा॑ म॒रुत्सु॒ भार॑ती। इळा॒ सर॑स्वती म॒ही ब॒र्हिः सी॑दन्तु य॒ज्ञियाः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्यार्थियों को ऐसी इच्छा करनी चाहिये कि जो विद्वानों में विद्या वा वाणी वर्त्तमान है, वह हमको प्राप्त होवे॥९॥

तन्न॑स्तु॒रीप॒मद्भु॑तं पु॒रु वारं॑ पु॒रु त्मना॑। त्वष्टा॒ पोषा॑य॒ वि ष्य॑तु रा॒ये नाभा॑ नो अस्म॒युः॥

जो विद्वान् हम लोगों की कामना करे उसकी हम लोग भी कामना करें। जो हम लोगों की कामना न करे उसकी हम भी कामना न करें, इससे परस्पर विद्या और सुख की कामना करते हुए आचार्य्य और विद्यार्थी लोग विद्या की उन्नति करें॥१०॥

अ॒व॒सृ॒जन्नुप॒ त्मना॑ दे॒वान्य॑क्षि वनस्पते। अ॒ग्निर्ह॒व्या सु॑षूदति दे॒वो दे॒वेषु॒ मेधि॑रः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्यमण्डल पृथिवी आदि दिव्य पदार्थों में दिव्यरूप हुआ जल को वर्षाता है, वैसे विद्वान् जन संसार में विद्यार्थियों में विद्या की वर्षा करावें॥११॥

पू॒ष॒ण्वते॑ म॒रुत्व॑ते वि॒श्वदे॑वाय वा॒यवे॑। स्वाहा॑ गाय॒त्रवे॑पसे ह॒व्यमिन्द्रा॑य कर्तन॥

जिस धन से पुष्टि, विद्या विद्वानों का सत्कार, वेदविद्या की प्रवृत्ति और सर्वोपकार हो वही धर्म सम्बन्धी धन है, और नहीं॥१२॥

स्वाहा॑कृता॒न्या ग॒ह्युप॑ ह॒व्यानि॑ वी॒तये॑। इन्द्रा ग॑हि श्रु॒धी हवं॒ त्वां ह॑वन्ते अध्व॒रे॥

अध्यापक जितना शास्त्र विद्यार्थियों को पढ़ावे उसकी प्रतिदिन वा प्रतिमास परीक्षा करे और विद्यार्थियों में जो जिनको विद्या देवें वे उनकी तन, मन, धन से सेवा करें॥१३॥इस सूक्त में पढ़ने-पढ़ानेवालों के गुणों और विद्या की प्रशंसा होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जानना चाहिये॥यह एकसौ बयालीसवाँ सूक्त और ग्यारहवाँ वर्ग पूरा हुआ॥

प्र तव्य॑सीं॒ नव्य॑सीं धी॒तिम॒ग्नये॑ वा॒चो म॒तिं सह॑सः सू॒नवे॑ भरे। अ॒पां नपा॒द्यो वसु॑भिः स॒ह प्रि॒यो होता॑ पृथि॒व्यां न्यसी॑ददृ॒त्वियः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वानों की योग्यता है कि जैसे सूर्य जलों की धारणा करनेवाला है, वैसे पवित्र बुद्धिमान् प्रिय आचरण करने और शीघ्र विद्याओं को ग्रहण करनेवाले विद्यार्थियों को लेकर विद्या का विज्ञान शीघ्र उत्पन्न करावें॥१॥

स जाय॑मानः पर॒मे व्यो॑मन्या॒विर॒ग्निर॑भवन्मात॒रिश्व॑ने। अ॒स्य क्रत्वा॑ समिधा॒नस्य॑ म॒ज्मना॒ प्र द्यावा॑ शो॒चिः पृ॑थि॒वी अ॑रोचयत्॥

जो विद्वान् लोग विद्यार्थियों को प्रयत्न के साथ विद्या, अच्छी शिक्षा और धर्म नीतियुक्त करें तो वे सर्वदैव कल्याण का सेवन करनेवाले होवें॥२॥

अ॒स्य त्वे॒षा अ॒जरा॑ अ॒स्य भा॒नवः॑ सुसं॒दृशः॑ सु॒प्रती॑कस्य सु॒द्युतः॑। भात्व॑क्षसो॒ अत्य॒क्तुर्न सिन्ध॑वो॒ऽग्ने रे॑जन्ते॒ अस॑सन्तो अ॒जराः॑॥

जो मनुष्य सूर्य के समान विद्या के प्रकाश करने, अविद्यान्धकार के विनाश करने और सबको आनन्द देनेवाले होते हैं वे ही मनुष्यों के शिरोमणि होते हैं॥३॥

यमे॑रि॒रे भृग॑वो वि॒श्ववे॑दसं॒ नाभा॑ पृथि॒व्या भुव॑नस्य म॒ज्मना॑। अ॒ग्निं तं गी॒र्भिर्हि॑नुहि॒ स्व आ दमे॒ य एको॒ वस्वो॒ वरु॑णो॒ न राज॑ति॥

हे मनुष्यो! जो विद्वानों से जानने योग्य सब में सब प्रकार व्याप्त प्रशंसा के योग्य सच्चिदानन्दादि लक्षण सर्वशक्तिमान् अद्वितीय अति-सूक्ष्म आप ही प्रकाशमान अन्तर्यामी परमेश्वर है, उसको योग के अङ्गों के अनुष्ठान की सिद्धि से अपने हृदय में जानो॥४॥

न यो वरा॑य म॒रुता॑मिव स्व॒नः सेने॑व सृ॒ष्टा दि॒व्या यथा॒शनिः॑। अ॒ग्निर्जम्भै॑स्तिगि॒तैर॑त्ति॒ भर्व॑ति यो॒धो न शत्रू॒न्त्स वना॒ न्यृ॑ञ्जते॥

प्रचण्ड वायु से प्रेरित अति जलता हुआ अग्नि शत्रुओं को मारने के तुल्य पदार्थों को जलाता है, वह सहसा नहीं रुक सकता॥५॥

कु॒विन्नो॑ अ॒ग्निरु॒चथ॑स्य॒ वीरस॒द्वसु॑ष्कु॒विद्वसु॑भिः॒ काम॑मा॒वर॑त्। चो॒दः कु॒वित्तु॑तु॒ज्यात्सा॒तये॒ धियः॒ शुचि॑प्रतीकं॒ तम॒या धि॒या गृ॑णे॥

जो बिजुली के समान उचित काम प्राप्त कराने और बुद्धि बल अत्यन्त देनेवाले बड़े प्रशंसित विद्वान् अपनी बुद्धि से सब मनुष्यों को विद्वान् करते हैं, उनकी सब लोग प्रशंसा करें॥६॥

घृ॒तप्र॑तीकं व ऋ॒तस्य॑ धू॒र्षद॑म॒ग्निं मि॒त्रं न स॑मिधा॒न ऋ॑ञ्जते। इन्धा॑नो अ॒क्रो वि॒दथे॑षु॒ दीद्य॑च्छु॒क्रव॑र्णा॒मुदु॑ नो यंसते॒ धिय॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो बिजुली के समान समस्त शुभ गुणों की खान, मित्र के समान सुख का देने, संग्रामों में वीर के तुल्य शत्रुओं को जीतने और दुःख का विनाश करनेवाला है, उस विद्वान् का आश्रय कर सब मनुष्य विद्याओं को प्राप्त होवें॥७॥

अप्र॑युच्छ॒न्नप्र॑युच्छद्भिरग्ने शि॒वेभि॑र्नः पा॒युभिः॑ पाहि श॒ग्मैः। अद॑ब्धेभि॒रदृ॑पितेभिरि॒ष्टेऽनि॑मिषद्भिः॒ परि॑ पाहि नो॒ जाः॥

मनुष्यों को निरन्तर यह चाहना और ऐसा प्रयत्न करना चाहिये कि धार्मिक विद्वानों के साथ धार्मिक विद्वान् हमारी निरन्तर रक्षा करें॥८॥इस सूक्त में विद्वान् और ईश्वर के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ की साथ सङ्गति जानना चाहिये॥यह एकसौ तेंतालीसवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

एति॒ प्र होता॑ व्र॒तम॑स्य मा॒ययो॒र्ध्वां दधा॑नः॒ शुचि॑पेशसं॒ धिय॑म्। अ॒भि स्रुचः॑ क्रमते दक्षिणा॒वृतो॒ या अ॑स्य॒ धाम॑ प्रथ॒मं ह॒ निंस॑ते॥

जो मनुष्य शास्त्रवेत्ता विद्वान् के उपदेश और पढ़ाने से विद्यायुक्त बुद्धि को प्राप्त होते हैं, वे सुशील होते हैं॥१॥

अ॒भीमृ॒तस्य॑ दो॒हना॑ अनूषत॒ योनौ॑ दे॒वस्य॒ सद॑ने॒ परी॑वृताः। अ॒पामु॒पस्थे॒ विभृ॑तो॒ यदाव॑स॒दध॑ स्व॒धा अ॑धय॒द्याभि॒रीय॑ते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे आकाश में जल स्थिर हो और वहाँ से वर्ष कर समस्त जगत् को पुष्ट करता है, वैसे विद्वान् जन चित्त में विद्या को स्थिर कर सब मनुष्यों को पुष्ट करें॥२॥

युयू॑षतः॒ सव॑यसा॒ तदिद्वपुः॑ समा॒नमर्थं॑ वि॒तरि॑त्रता मि॒थः। आदीं॒ भगो॒ न हव्यः॒ सम॒स्मदा वोळ्हु॒र्न र॒श्मीन्त्सम॑यंस्त॒ सार॑थिः॥

जो अध्यापक और उपदेशक कपट-छल के विना औरों को अपने तुल्य करने की इच्छा से उन्हें विद्वान् करें, वे उत्तम ऐश्वर्य को पाकर जितेन्द्रिय हों॥३॥

यमीं॒ द्वा सव॑यसा सप॒र्यतः॑ समा॒ने योना॑ मिथु॒ना समो॑कसा। दिवा॒ न नक्तं॑ पलि॒तो युवा॑जनि पु॒रू चर॑न्न॒जरो॒ मानु॑षा यु॒गा॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रीति के साथ वर्त्तमान स्त्री-पुरुष धर्मसम्बन्धी व्यवहार से पुत्र को उत्पन्न कर उसे अच्छी शिक्षा दे शीलवान् कर सुखी करते हैं, वैसे समान पढ़ाने और उपदेश करनेवाले दो विद्वान् शिष्यों को सुशील करते हैं। वा जैसे दिन, रात्रि के साथ वर्त्तमान भी अपने स्थान में रात्रि को निवृत्त करता है, वैसे अज्ञानियों के साथ वर्त्तमान पढ़ाने और उपदेश करनेवाले विद्वान् मोह में नहीं लगते हैं। वा जैसे किया है पूरा ब्रह्मचर्य जिन्होंने, वे रूपलावण्य और बलादि गुणों से युक्त सन्तान को उत्पन्न करते हैं, वैसे ये सत्य पढ़ाने और उपदेश करने से सबका पूरा आत्मबल उत्पन्न करते हैं॥४॥

तमीं॑ हिन्वन्ति धी॒तयो॒ दश॒ व्रिशो॑ दे॒वं मर्ता॑स ऊ॒तये॑ हवामहे। धनो॒रधि॑ प्र॒वत॒ आ स ऋ॑ण्वत्यभि॒व्रज॑द्भिर्व॒युना॒ नवा॑धित॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे हाथों की अङ्गुलियों से भोजन आदि की क्रिया करने से शरीरादि बढ़ते हैं वैसे विद्वानों के अध्यापन और उपदेशों की क्रिया से प्रजाजन वृद्धि पाते हैं वा जैसे धनुर्वेद का जाननेवाला शत्रुओं को जीतकर रत्नों को प्राप्त होता है वैसे विद्वानों के सङ्ग के फल को जाननेवाला जन उत्तम ज्ञानों को प्राप्त होता है॥५॥

त्वं ह्य॑ग्ने दि॒व्यस्य॒ राज॑सि॒ त्वं पार्थि॑वस्य पशु॒पा इ॑व॒ त्मना॑। एनी॑ त ए॒ते बृ॑ह॒ती अ॑भि॒श्रिया॑ हिर॒ण्ययी॒ वक्व॑री ब॒र्हिरा॑शाते॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे ऋद्धि और सिद्धि पूरी लक्ष्मी को करती हैं वैसे आत्मवान् पुरुष परमेश्वर और पृथिवी के राज्य में अच्छे प्रकार प्रकाशित होता जैसे पशुओं का पालनेवाला प्रीति से अपने पशुओं की रक्षा करता है, वैसे सभापति अपने प्रजाजनों की रक्षा करे॥६॥

अग्ने॑ जु॒षस्व॒ प्रति॑ हर्य॒ तद्वचो॒ मन्द्र॒ स्वधा॑व॒ ऋत॑जात॒ सुक्र॑तो। यो वि॒श्वतः॑ प्र॒त्यङ्ङसि॑ दर्श॒तो र॒ण्वः संदृ॑ष्टौ पितु॒माँ इ॑व॒ क्षयः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो प्रशंसित बुद्धिवाले यथायोग्य आहार-विहार से रहते हुए सत्य व्यवहार में प्रसिद्ध धर्म के अनुकूल कर्म और बुद्धि रखनेहारे शास्त्रज्ञ विद्वानों के समीप से विद्या और उपदेशों को चाहते और सेवन करते हैं वे सबसे उत्तम होते हैं॥७॥। इस सूक्त में अध्यापक और उपेदशकों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह एकसौ चवालीसवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

तं पृ॑च्छता॒ स ज॑गामा॒ स वे॑द॒ स चि॑कि॒त्वाँ ई॑यते॒ सा न्वी॑यते। तस्मि॑न्त्सन्ति प्र॒शिष॒स्तस्मि॑न्नि॒ष्टयः॒ स वाज॑स्य॒ शव॑सः शु॒ष्मिण॒स्पतिः॑॥

जो विद्या और अच्छी शिक्षायुक्त, धार्मिक और यत्नशील सबका उपकारी, सत्य की पालना करनेवाला विद्वान् हो, उसके आश्रय जो पढ़ाना और उपदेश हैं, उनसे सब मनुष्य चाहे हुए काम और विनय को प्राप्त हों॥१॥

तमित्पृ॑च्छन्ति॒ न सि॒मो वि पृ॑च्छति॒ स्वेने॑व॒ धीरो॒ मन॑सा॒ यदग्र॑भीत्। न मृ॑ष्यते प्रथ॒मं नाप॑रं॒ वचो॒ऽस्य क्रत्वा॑ सचते॒ अप्र॑दृपितः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। आप्त=साक्षात्कार जिन्होंने धर्मादि पदार्थ किये वे=शास्त्रवेत्ता मोहादि दोषरहित विद्वान् योगाभ्यास से पवित्र किये हुए आत्मा से जिस जिस को सत्य वा असत्य निश्चय करें वह वह अच्छा निश्चय किया हुआ है यह और मनुष्य मानें, जो उनका सङ्ग न करके सत्य-असत्य के निर्णय को जानना चाहते हैं वे कभी सत्य-असत्य का निर्णय नहीं कर सकते, इससे आप्त विद्वानों के उपदेश से सत्य-असत्य का निर्णय करना चाहिये॥२॥

तमिद्ग॑च्छन्ति जु॒ह्व१॒॑स्तमर्व॑ती॒र्विश्वा॒न्येकः॑ शृणव॒द्वचां॑सि मे। पु॒रु॒प्रै॒षस्ततु॑रिर्यज्ञ॒साध॒नोऽच्छि॑द्रोतिः॒ शिशु॒राद॑त्त॒ सं रभः॑॥

मनुष्यों ने जो जाना और जो-जो पढ़ा उस-उस की परीक्षा जैसे अपने आप पढ़ानेवाले विद्वान् को देवें वैसे कन्या भी अपनी पढ़ानेवाली को अपने पढ़े हुए की परीक्षा देवें ऐसे करने के विना सत्याऽसत्य का सम्यक् निर्णय होने को योग्य नहीं है॥३॥

उ॒प॒स्थायं॑ चरति॒ यत्स॒मार॑त स॒द्यो जा॒तस्त॑त्सार॒ युज्ये॑भिः। अ॒भि श्वा॒न्तं मृ॑शते ना॒न्द्ये॑ मु॒दे यदीं॒ गच्छ॑न्त्युश॒तीर॑पिष्ठि॒तम्॥

हे मनुष्यो! जो बालक और जो कन्या शीघ्र पूर्ण विद्यायुक्त होते हैं और कुटिलतादि दोषों को छोड़ शान्ति आदि गुणों को प्राप्त होकर सबको विद्या तथा सुख होने के लिये बार-बार प्रयत्न करते हैं, वे जगत् को आनन्द देनेवाले होते हैं॥४॥

स ईं॑ मृ॒गो अप्यो॑ वन॒र्गुरुप॑ त्व॒च्यु॑प॒मस्यां॒ नि धा॑यि। व्य॑ब्रवीद्व॒युना॒ मर्त्ये॑भ्यो॒ऽग्निर्वि॒द्वाँ ऋ॑त॒चिद्धि स॒त्यः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे तृषातुर मृग जल पीने के लिये वन में डोलता-डोलता जल को पाकर आनन्दित होता है वैसे विद्वान् जन शुभ आचरण करनेवाले विद्यार्थियों को पाकर आनन्दित होते हैं और जो शिक्षा पाकर औरों को नहीं देते वे क्षुद्राशय और अत्यन्त पापी होते हैं॥५॥इस सूक्त में उपदेश करने और उपदेश सुननेवालों के कर्त्तव्य कामों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है यह जानना चाहिये॥यह एकसौ पैंतालीसवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

त्रि॒मू॒र्धानं॑ स॒प्तर॑श्मिं गृणी॒षेऽनू॑नम॒ग्निं पि॒त्रोरु॒पस्थे॑। नि॒ष॒त्तम॑स्य॒ चर॑तो ध्रु॒वस्य॒ विश्वा॑ दि॒वो रो॑च॒नाप॑प्रि॒वांस॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे तीन बिजुली, सूर्य और प्रसिद्ध रूपों से अग्नि चराचर जगत् के कार्य्यों को सिद्ध करनेवाला है, वैसे विद्वान् जन समस्त विश्व का उपकार करनेवाले होते हैं॥१॥

उ॒क्षा म॒हाँ अ॒भि व॑वक्ष एने अ॒जर॑स्तस्थावि॒तऊ॑तिर्ऋ॒ष्वः। उ॒र्व्याः प॒दो नि द॑धाति॒ सानौ॑ रि॒हन्त्यूधो॑ अरु॒षासो॑ अस्य॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को जैसे सूत्रात्मा वायु, भूमि और सूर्यमण्डल को धारण करके संसार की रक्षा करता है वा जैसे सूर्य पृथिवी से बड़ा है, वैसा वर्त्ताव वर्त्तना चाहिये॥२॥

स॒मा॒नं व॒त्सम॒भि सं॒चर॑न्ती॒ विष्व॑ग्धे॒नू वि च॑रतः सु॒मेके॑। अ॒न॒प॒वृ॒ज्याँ अध्व॑नो॒ मिमा॑ने॒ विश्वा॒न्केताँ॒ अधि॑ म॒हो दधा॑ने॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सूर्य के समान न्याय गुणों के आकर्षण और प्रकाश [*] करनेवाले, नानाविध मार्गों का निर्माण करते हुए धेनु के समान सबकी पुष्टि करते हुए समग्र विद्याओं को धारण करते हैं, वे दुःखरहित होते हैं॥३॥[* गुणों को आकर्षण करनेवालों का प्रकाश- हस्तलेख॥सं० ]॥

धीरा॑सः प॒दं क॒वयो॑ नयन्ति॒ नाना॑ हृ॒दा रक्ष॑माणा अजु॒र्यम्। सिषा॑सन्तः॒ पर्य॑पश्यन्त॒ सिन्धु॑मा॒विरे॑भ्यो अभव॒त्सूर्यो॒ नॄन्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सबको आत्मा के समान सुख-दुःख की व्यवस्था में जान न्याय का ही आश्रय करते हैं वे अव्यय पद को प्राप्त होते हैं। जैसे सूर्य जल को वर्षा कर नदियों को भरता पूरी करता है वैसे विद्वान् जन सत्य वचनों को वर्षा कर मनुष्यों के आत्माओं को पूर्ण करते हैं॥४॥

दि॒दृ॒क्षेण्यः॒ परि॒ काष्ठा॑सु॒ जेन्य॑ ई॒ळेन्यो॑ म॒हो अर्भा॑य जी॒वसे॑। पु॒रु॒त्रा यदभ॑व॒त्सूरहै॑भ्यो॒ गर्भे॑भ्यो म॒घवा॑ वि॒श्वद॑र्शतः॥

जो दिशाओं में व्याप्त कीर्त्ति अर्थात् दिग्विजयी, प्रसिद्ध शत्रुओं को जीतनेवाले, उत्तम विद्वानों से विद्या उत्तम शिक्षाओं को पाये हुए शुभ गुणों से दर्शनीय जन हैं, वे संसार के मङ्गल के लिये समर्थ होते हैं॥५॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जानना चाहिये॥यह एकसौ छयालीसवाँ सूक्त और पन्द्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

क॒था ते॑ अग्ने शु॒चय॑न्त आ॒योर्द॑दा॒शुर्वाजे॑भिराशुषा॒णाः। उ॒भे यत्तो॒के तन॑ये॒ दधा॑ना ऋ॒तस्य॒ साम॑न्र॒णय॑न्त दे॒वाः॥

सब अध्यापक विद्वान् जन उपदेशक शास्त्रवेत्ता धर्मज्ञ विद्वान् को पूछें कि हम लोग कैसे पढ़ावें, वह उन्हें अच्छे प्रकार सिखावे, क्या सिखावे ? कि जैसे ये विद्या तथा उत्तम शिक्षा को प्राप्त इन्द्रियों को जीतनेवाले धार्मिक पढ़नेवाले हों वैसे आप लोग पढ़ावें, यह उत्तर है॥१॥

बोधा॑ मे अ॒स्य वच॑सो यविष्ठ॒ मंहि॑ष्ठस्य॒ प्रभृ॑तस्य स्वधावः। पीय॑ति त्वो॒ अनु॑ त्वो गृणाति व॒न्दारु॑स्ते त॒न्वं॑ वन्दे अग्ने॥

जब आचार्य के समीप शिष्य पढ़े तब पिछले पढ़े हुए की परीक्षा देवे, पढ़ने से पहिले आचार्य को नमस्कार उसकी वन्दना करे और जैसे अन्य धीर बुद्धिवाले पढ़ें, वैसे आप भी पढ़े॥२॥

ये पा॒यवो॑ मामते॒यं ते॑ अग्ने॒ पश्य॑न्तो अ॒न्धं दु॑रि॒तादर॑क्षन्। र॒रक्ष॒ तान्त्सु॒कृतो॑ वि॒श्ववे॑दा॒ दिप्स॑न्त॒ इद्रि॒पवो॒ नाह॑ देभुः॥

जो विद्याचक्षु जन अन्धे को कूप से जैसे वैसे मनुष्यों को अविद्या और अधर्म के आचरण से बचावें, उनका पितरों के समान सत्कार करें और जो दुष्ट आचरणों में गिरावें, उनका दूर से त्याग करे रहें॥३॥

यो नो॑ अग्ने॒ अर॑रिवाँ अघा॒युर॑राती॒वा म॒र्चय॑ति द्व॒येन॑। मन्त्रो॑ गु॒रुः पुन॑रस्तु॒ सो अ॑स्मा॒ अनु॑ मृक्षीष्ट त॒न्वं॑ दुरु॒क्तैः॥

जो मनुष्यों के बीच दुष्ट शिक्षा देते वा दुष्टों को सिखाते हैं, वे छोड़ने योग्य और जो सत्य शिक्षा देते वा सत्य वर्त्ताव वर्त्तनेवाले को सिखाते वे मानने के योग्य होवें॥४॥

उ॒त वा॒ यः स॑हस्य प्रवि॒द्वान्मर्तो॒ मर्तं॑ म॒र्चय॑ति द्व॒येन॑। अतः॑ पाहि स्तवमान स्तु॒वन्त॒मग्ने॒ माकि॑र्नो दुरि॒ताय॑ धायीः॥

जो विद्वान् उत्तम शिक्षा और पढ़ाने से मनुष्यों के आत्मिक और शारीरिक बल को बढ़ा के और उनको अविद्या और पाप के आचरण से अलग करते हैं, वे सबकी शुद्धि करनेवाले होते हैं॥५॥इस सूक्त में मित्र और अमित्रों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जानना चाहिये॥। एकसौ सैंतालीसवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

मथी॒द्यदीं॑ वि॒ष्टो मा॑त॒रिश्वा॒ होता॑रं वि॒श्वाप्सुं॑ वि॒श्वदे॑व्यम्। नि यं द॒धुर्म॑नु॒ष्या॑सु वि॒क्षु स्व१॒॑र्ण चि॒त्रं वपु॑षे वि॒भाव॑म्॥

जो मनुष्य पवन के समान व्याप्त होनेवाली बिजुली रूप आग को मथ के कार्य्यों की सिद्धि करते हैं, वे अद्भुत कार्यों को कर सकते हैं॥१॥

द॒दा॒नमिन्न द॑दभन्त॒ मन्मा॒ग्निर्वरू॑थं॒ मम॒ तस्य॑ चाकन्। जु॒षन्त॒ विश्वा॑न्यस्य॒ कर्मोप॑स्तुतिं॒ भर॑माणस्य का॒रोः॥

हे मनुष्यो! जो जिनके लिये विद्या दें वे उसकी सेवा निरन्तर करें और अवश्य सब लोग वेद का अभ्यास करें॥२॥

नित्ये॑ चि॒न्नु यं सद॑ने जगृ॒भ्रे प्रश॑स्तिभिर्दधि॒रे य॒ज्ञिया॑सः। प्र सू न॑यन्त गृ॒भय॑न्त इ॒ष्टावश्वा॑सो॒ न र॒थ्यो॑ रारहा॒णाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो नित्य आकाश में स्थित वायु और अग्नि आदि पदार्थों को उत्तम क्रियाओं से कार्यों में युक्त करते हैं, वे विमान आदि यानों को बना सकते हैं॥३॥

पु॒रूणि॑ द॒स्मो नि रि॑णाति॒ जम्भै॒राद्रो॑चते॒ वन॒ आ वि॒भावा॑। आद॑स्य॒ वातो॒ अनु॑ वाति शो॒चिरस्तु॒र्न शर्या॑मस॒नामनु॒ द्यून्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्या से उत्पन्न की हुई ताड़नादि क्रियाओं से बिजुली की विद्या को सिद्ध करते हैं, वे प्रतिदिन उन्नति को प्राप्त होते हैं॥४॥

न यं रि॒पवो॒ न रि॑ष॒ण्यवो॒ गर्भे॒ सन्तं॑ रेष॒णा रे॒षय॑न्ति। अ॒न्धा अ॑प॒श्या न द॑भन्नभि॒ख्या नित्या॑स ईं प्रे॒तारो॑ अरक्षन्॥

हे मनुष्यो! जिसको रिपु जन नष्ट नहीं कर सकते हैं, जो गर्भ में भी नष्ट नहीं होता है, वह आत्मा जानने योग्य है॥५॥इस सूक्त में विद्वान् और अग्नि आदि पदार्थों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानने योग्य है॥यह एकसौ अड़तालीसवाँ सूक्त और सत्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

म॒हः स रा॒य एष॑ते॒ पति॒र्दन्नि॒न इ॒नस्य॒ वसु॑नः प॒द आ। उप॒ ध्रज॑न्त॒मद्र॑यो वि॒धन्नित्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। इस संसार में जैसे सुपात्र को देने से कीर्त्ति होती है, वैसे और उपाय से नहीं। जो पुरुषार्थ का आश्रय कर अच्छा यत्न करता है, वह पूर्ण धन को प्राप्त होता है॥१॥

स यो वृषा॑ न॒रां न रोद॑स्योः॒ श्रवो॑भि॒रस्ति॑ जी॒वपी॑तसर्गः। प्र यः स॑स्रा॒णः शि॑श्री॒त योनौ॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो नायकों में नायक, पृथिवी आदि पदार्थों के कार्य कारण को जाननेवालों की विद्या का आश्रय करता है, वही सुखी होता है॥२॥

आ यः पुरं॒ नार्मि॑णी॒मदी॑दे॒दत्यः॑ क॒विर्न॑भ॒न्यो॒३॒॑ नार्वा॑। सूरो॒ न रु॑रु॒क्वाञ्छ॒तात्मा॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो असंख्यात पदार्थों की विद्याओं को जाननेवाला अच्छी शोभायुक्त नगरी को बसावे, वह ऐश्वर्यों से सूर्य के समान प्रकाशमान हो॥३॥

अ॒भि द्वि॒जन्मा॒ त्री रो॑च॒नानि॒ विश्वा॒ रजां॑सि शुशुचा॒नो अ॑स्थात्। होता॒ यजि॑ष्ठो अ॒पां स॒धस्थे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्या और धर्मसंयुक्त व्यवहार में विद्वानों के सङ्ग से प्रकाशित हुए स्थान के निमित्त अनुष्ठान करते हैं, वे समस्त अच्छे गुण, कर्म और स्वभावों के ग्रहण करने के योग्य होते हैं॥४॥

अ॒यं स होता॒ यो द्वि॒जन्मा॒ विश्वा॑ द॒धे वार्या॑णि श्रव॒स्या। मर्तो॒ यो अ॑स्मै सु॒तुको॑ द॒दाश॑॥

जिसका विद्या और उत्तम शिक्षायुक्त माता-पिताओं से एक जन्म और दूसरा जन्म आचार्य और विद्या से हो, वह द्विज होता हुआ विद्वान् हो॥५॥इस सूक्त में विद्वान् और अग्न्यादि पदार्थों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह एकसौ उनचासवाँ सूक्त और अठारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

पु॒रु त्वा॑ दा॒श्वान्वो॑चे॒ऽरिर॑ग्ने॒ तव॑ स्वि॒दा। तो॒दस्ये॑व शर॒ण आ म॒हस्य॑॥

जो जिसका रक्खा हुआ सेवक हो, वह उसकी आज्ञा का पालन करके कृतार्थ होवे॥१॥

व्य॑नि॒नस्य॑ ध॒निनः॑ प्रहो॒षे चि॒दर॑रुषः। क॒दा च॒न प्र॒जिग॑तो॒ अदे॑वयोः॥

जो अविद्वान् पढ़ाने और उपदेश करनेवालों के सङ्ग को छोड़ विद्वानों का सङ्ग करता है, वह सुखों से युक्त होता है॥२॥

स च॒न्द्रो वि॑प्र॒ मर्त्यो॑ म॒हो व्राध॑न्तमो दि॒वि। प्रप्रेत्ते॑ अग्ने व॒नुषः॑ स्याम॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पृथिव्यादि पदार्थों को जाने हुए विद्वान् जन विद्याप्रकाश में प्रवृत्त होते हैं, वैसे और जनों को भी वर्त्ताव रखना चाहिये॥३॥इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह एक सौ पचासवाँ सूक्त और उन्नीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

मि॒त्रं न यं शिम्या॒ गोषु॑ ग॒व्यवः॑ स्वा॒ध्यो॑ वि॒दथे॑ अ॒प्सु जीज॑नन्। अरे॑जेतां॒ रोद॑सी॒ पाज॑सा गि॒रा प्रति॑ प्रि॒यं य॑ज॒तं ज॒नुषा॒मवः॑॥

जो विद्वान् प्रजापालना किया चाहते हैं, वे मित्रता कर समस्त जगत् की अपने आत्मा के समान रक्षा करें॥१॥

यद्ध॒ त्यद्वां॑ पुरुमी॒ळ्हस्य॑ सो॒मिनः॒ प्र मि॒त्रासो॒ न द॑धि॒रे स्वा॒भुवः॑। अध॒ क्रतुं॑ विदतं गा॒तुमर्च॑त उ॒त श्रु॑तं वृषणा प॒स्त्या॑वतः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मित्र के समान सब जनों में उत्तम बुद्धि को स्थापन पर विद्याओं का स्थापन करते हैं, वे अच्छे भाग्यशाली होते हैं॥२॥

आ वां॑ भूषन्क्षि॒तयो॒ जन्म॒ रोद॑स्योः प्र॒वाच्यं॑ वृषणा॒ दक्ष॑से म॒हे। यदी॑मृ॒ताय॒ भर॑थो॒ यदर्व॑ते॒ प्र होत्र॑या॒ शिम्या॑ वीथो अध्व॒रम्॥

जो विद्वान् बाल्यावस्था से लेकर पुत्र और कन्याओं को विद्या जन्म की अति उन्नति दिलाते हैं, वे सत्यविद्याओं के प्रचार से सबको विभूषित करते हैं॥३॥

प्र सा क्षि॒तिर॑सुर॒ या महि॑ प्रि॒य ऋता॑वानावृ॒तमा घो॑षथो बृ॒हत्। यु॒वं दि॒वो बृ॑ह॒तो दक्ष॑मा॒भुवं॒ गां न धु॒र्युप॑ युञ्जाथे अ॒पः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सत्य का आचरण करते और उसका उपदेश करते हैं, वे असंख्य बल को प्राप्त होकर पृथिवी के राज्य को भोगते हैं॥४॥

म॒ही अत्र॑ महि॒ना वार॑मृण्वथोऽरे॒णव॒स्तुज॒ आ सद्म॑न्धे॒नवः॑। स्वर॑न्ति॒ ता उ॑प॒रता॑ति॒ सूर्य॒मा नि॒म्रुच॑ उ॒षस॑स्तक्व॒वीरि॑व॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे दूध देनेवाली गौयें सब प्राणियों को प्रसन्न करती हैं, वैसे पढ़ाने और उपदेश करनेवाले जन विद्या और उत्तम शिक्षा को अच्छे प्रकार देकर सब मनुष्यों को सुखी करें॥५॥

आ वा॑मृ॒ताय॑ के॒शिनी॑रनूषत॒ मित्र॒ यत्र॒ वरु॑ण गा॒तुमर्च॑थः। अव॒ त्मना॑ सृ॒जतं॒ पिन्व॑तं॒ धियो॑ यु॒वं विप्र॑स्य॒ मन्म॑नामिरज्यथः॥

जो यहाँ प्रशंसायुक्त स्त्रियाँ और जो पुरुष हैं वे अपने समान पुरुष-स्त्रियों के साथ संयोग करें, ब्रह्मचर्य से और विद्या से विशेष ज्ञान की उन्नति कर ऐश्वर्य को बढ़ावें॥६॥

यो वां॑ य॒ज्ञैः श॑शमा॒नो ह॒ दाश॑ति क॒विर्होता॒ यज॑ति मन्म॒साध॑नः। उपाह॒ तं गच्छ॑थो वी॒थो अ॑ध्व॒रमच्छा॒ गिरः॑ सुम॒तिं ग॑न्तमस्म॒यू॥

जो इस संसार में सत्य विद्या की कामना करनेवाले सबके लिये विद्या दान से उत्तम शीलपन का सम्पादन करते हुए सुख देते हैं, वे सबको सत्कार करने योग्य हैं॥७॥

यु॒वां य॒ज्ञैः प्र॑थ॒मा गोभि॑रञ्जत॒ ऋता॑वाना॒ मन॑सो॒ न प्रयु॑क्तिषु। भर॑न्ति वां॒ मन्म॑ना सं॒यता॒ गिरोऽदृ॑प्यता॒ मन॑सा रे॒वदा॑शाथे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वानो! जो तुमको विद्या प्राप्ति के लिये श्रद्धा से प्राप्त होवें और जो जितेन्द्रिय, धार्मिक हों, उन सभों को अच्छे यत्न के साथ विद्यावान् और धार्मिक करो॥८॥

रे॒वद्वयो॑ दधाथे रे॒वदा॑शाथे॒ नरा॑ मा॒याभि॑रि॒तऊ॑ति॒ माहि॑नम्। न वां॒ द्यावोऽह॑भि॒र्नोत सिन्ध॑वो॒ न दे॑व॒त्वं प॒णयो॒ नान॑शुर्म॒घम्॥

जिस जिस को विद्वान् प्राप्त करते हैं, उस उस को इतर सामान्य जन प्राप्त नहीं होते, विद्वानों के उपमा विद्वान् ही होते हैं और नहीं होते॥९॥इस सूक्त में मित्र-वरुण के लक्षण अर्थात् मित्र-वरुण शब्द से लक्षित अध्यापक और उपदेशक आदि का वर्णन किया, इससे इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह एकसौ एकावनवाँ सूक्त और इक्कीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

यु॒वं वस्त्रा॑णि पीव॒सा व॑साथे यु॒वोरच्छि॑द्रा॒ मन्त॑वो ह॒ सर्गाः॑। अवा॑तिरत॒मनृ॑तानि॒ विश्व॑ ऋ॒तेन॑ मित्रावरुणा सचेथे॥

मनुष्यों को सदैव स्थूल छिद्ररहित वस्त्र पहन कर जानने के योग्य दोषरहित वस्त्र आदि पदार्थ निर्माण करने चाहियें और सदैव धारण किये हुए सत्याचरण से असत्याचरणों को छोड़ धर्म्म, अर्थ, काम और मोक्ष अच्छे प्रकार सिद्ध करने चाहियें॥१॥

ए॒तच्च॒न त्वो॒ वि चि॑केतदेषां स॒त्यो मन्त्रः॑ कविश॒स्त ऋघा॑वान्। त्रि॒रश्रिं॑ हन्ति॒ चतु॑रश्रिरु॒ग्रो दे॑व॒निदो॒ ह प्र॑थ॒मा अ॑जूर्यन्॥

जो मनुष्य विद्वानों की निन्दा को छोड़ निन्दकों को निवार के सत्य ज्ञान को प्राप्त हो सत्य विद्याओं को पढ़ाते हुए और सत्य का उपदेश करते हुए विस्तृत सुख को प्राप्त होते हैं, वे धन्य हैं॥२॥

अ॒पादे॑ति प्रथ॒मा प॒द्वती॑नां॒ कस्तद्वां॑ मित्रावरु॒णा चि॑केत। गर्भो॑ भा॒रं भ॑र॒त्या चि॑दस्य ऋ॒तं पिप॒र्त्यनृ॑तं॒ नि ता॑रीत्॥

जो झूठ को छोड़ सत्य को धारण कर अपने सब सामान इकट्ठे करते हैं, वे सत्य विद्या को प्राप्त होते हैं॥३॥

प्र॒यन्त॒मित्परि॑ जा॒रं क॒नीनां॒ पश्या॑मसि॒ नोप॑नि॒पद्य॑मानम्। अन॑वपृग्णा॒ वित॑ता॒ वसा॑नं प्रि॒यं मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य॒ धाम॑॥

मनुष्य लोग जैसे रात्रियों के निहन्ता अपने प्रकाश का विस्तार करते हुए सूर्य को देख कर कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वैसे अविद्यान्धकार का नाश और विद्या का प्रकाश करनेवाले आप्त अध्यापक और उपदेशक के सङ्ग को पाकर क्लेशों को नष्ट करें॥४॥

अ॒न॒श्वो जा॒तो अ॑नभी॒शुरर्वा॒ कनि॑क्रदत्पतयदू॒र्ध्वसा॑नुः। अ॒चित्तं॒ ब्रह्म॑ जुजुषु॒र्युवा॑नः॒ प्र मि॒त्रे धाम॒ वरु॑णे गृ॒णन्तः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे घोड़े वा रथ आदि सवारी से रहित आकाश के बीच ऊपर को स्थित सूर्य ईश्वर के अवलम्ब से प्रकाशमान होता है, वैसे विद्वानों की विद्या के आधारभूत मनुष्य बहुत धन और अन्न को पाकर धर्मयुक्त व्यवहार में विराजमान होते हैं॥५॥

आ धे॒नवो॑ मामते॒यमव॑न्तीर्ब्रह्म॒प्रियं॑ पीपय॒न्त्सस्मि॒न्नूध॑न्। पि॒त्वो भि॑क्षेत व॒युना॑नि वि॒द्वाना॒साविवा॑स॒न्नदि॑तिमुरुष्येत्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे माता जन अपने लड़कों को दूध आदि के देने से बढ़ाती हैं, वैसे विदुषी स्त्री और विद्वान् पुरुष कुमार और कुमारियों को विद्या और अच्छी शिक्षा से बढ़ावें, उन्नतियुक्त करें॥६॥

आ वां॑ मित्रावरुणा ह॒व्यजु॑ष्टिं॒ नम॑सा देवा॒वव॑सा ववृत्याम्। अ॒स्माकं॒ ब्रह्म॒ पृत॑नासु सह्या अ॒स्माकं॑ वृ॒ष्टिर्दि॒व्या सु॑पा॒रा॥

जैसे विद्वान् जन अति प्रीति से हमारे लिये विद्याओं को देवें वैसे हम लोग इनको अत्यन्त श्रद्धा से सेवें, जिससे हमारी शुद्ध प्रशंसा सर्वत्र विदित हो॥७॥

यजा॑महे वां म॒हः स॒जोषा॑ ह॒व्येभि॑र्मित्रावरुणा॒ नमो॑भिः। घृ॒तैर्घृ॑तस्नू॒ अध॒ यद्वा॑म॒स्मे अ॑ध्व॒र्यवो॒ न धी॒तिभि॒र्भर॑न्ति॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे यजमान अग्निहोत्र आदि अनुष्ठानों से सबके सुख को बढ़ाते हैं, वैसे समस्त विद्वान् जन अनुष्ठान करें॥१॥

प्रस्तु॑तिर्वां॒ धाम॒ न प्रयु॑क्ति॒रया॑मि मित्रावरुणा सुवृ॒क्तिः। अ॒नक्ति॒ यद्वां॑ वि॒दथे॑षु॒ होता॑ सु॒म्नं वां॑ सू॒रिर्वृ॑षणा॒विय॑क्षन्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य पाप हरने और प्रशंसित गुणों को ग्रहण करनेवाले, जिनको विद्वानों का सङ्ग प्यारा है और सबके लिये सुख देनेवाले होते हैं, वे कल्याण सेवनेवाले होते हैं॥२॥

पी॒पाय॑ धे॒नुरदि॑तिर्ऋ॒ताय॒ जना॑य मित्रावरुणा हवि॒र्दे। हि॒नोति॒ यद्वां॑ वि॒दथे॑ सप॒र्यन्त्स रा॒तह॑व्यो॒ मानु॑षो॒ न होता॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो विद्या देने-लेने में कुशल, पढ़ाने और उपदेश करनेवाले सबको उन्नति देते हैं, वे शुभ गुणों से सबके अधिक उन्नति को पाते हैं॥३॥

उ॒त वां॑ वि॒क्षु मद्या॒स्वन्धो॒ गाव॒ आप॑श्च पीपयन्त दे॒वीः। उ॒तो नो॑ अ॒स्य पू॒र्व्यः पति॒र्दन्वी॒तं पा॒तं पय॑स उ॒स्रिया॑याः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो यहाँ गौओं के समान सुख देनेवाले और प्राण के समान प्रिय प्रजाजनों में वर्त्तमान हैं, वे इस संसार में अतुल आनन्द को प्राप्त होते हैं॥४॥इस सूक्त में मित्र और वरुण के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह एकसौ त्रेपनवाँ सूक्त और तेईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

विष्णो॒र्नु कं॑ वी॒र्या॑णि॒ प्र वो॑चं॒ यः पार्थि॑वानि विम॒मे रजां॑सि। यो अस्क॑भाय॒दुत्त॑रं स॒धस्थं॑ विचक्रमा॒णस्त्रे॒धोरु॑गा॒यः॥

जैसे सूर्य अपनी आकर्षण शक्ति से सब भूगोलों को धारण करता है, वैसे सूर्य्यादि लोक, कारण और जीवों को जगदीश्वर धारण कर रहा है। जो इन असंख्य लोकों को शीघ्र निर्माण करता और जिसमें प्रलय को प्राप्त होते हैं, वही सबको उपासना करने योग्य है॥१॥

प्र तद्विष्णुः॑ स्तवते वी॒र्ये॑ण मृ॒गो न भी॒मः कु॑च॒रो गि॑रि॒ष्ठाः। यस्यो॒रुषु॑ त्रि॒षु वि॒क्रम॑णेष्वधिक्षि॒यन्ति॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑॥

कोई भी पदार्थ ईश्वर और सृष्टि के नियम को उल्लङ्घ नहीं सकता है, जो धार्मिक जनों को मित्र के समान आनन्द देने, दुष्टों को सिंह के समान भय देने और न्यायादि गुणों का धारण करनेवाला परमात्मा है, वही सबका अधिष्ठाता और न्यायाधीश है, यह जानना चाहिये॥२॥

प्र विष्ण॑वे शू॒षमे॑तु॒ मन्म॑ गिरि॒क्षित॑ उरुगा॒याय॒ वृष्णे॑। य इ॒दं दी॒र्घं प्रय॑तं स॒धस्थ॒मेको॑ विम॒मे त्रि॒भिरित्प॒देभिः॑॥

कोई भी अनन्त पराक्रमी जगदीश्वर के विना इस विचित्र जगत् के रचने, धारण करने और प्रलय करने को समर्थ नहीं हो सकता, इससे इसको छोड़ और की उपासना किसी को न करनी चाहिये॥३॥

यस्य॒ त्री पू॒र्णा मधु॑ना प॒दान्यक्षी॑यमाणा स्व॒धया॒ मद॑न्ति। य उ॑ त्रि॒धातु॑ पृथि॒वीमु॒त द्यामेको॑ दा॒धार॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑॥

जो अनादि कारण से सूर्य आदि के तुल्य प्रकाशमान पृथिवियों को उत्पन्न कर समस्त भोग्य पदार्थों के साथ उनका संयोग करा सबको आनन्दित करता है, उसके गुण कर्म की उपासना से आनन्द ही सबको बढ़ाना चाहिये॥४॥

तद॑स्य प्रि॒यम॒भि पाथो॑ अश्यां॒ नरो॒ यत्र॑ देव॒यवो॒ मद॑न्ति। उ॒रु॒क्र॒मस्य॒ स हि बन्धु॑रि॒त्था विष्णोः॑ प॒दे प॑र॒मे मध्व॒ उत्सः॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो परमेश्वर की वेदद्वारा दी हुई आज्ञा के अनुकूल चलते हैं, वे मोक्ष सुख को प्राप्त होते हैं। जैसे जन बन्धु को प्राप्त होकर सहायता को पाते हैं वा प्यासे जन मीठे जल से पूर्ण कुये को पाकर तृप्त होते हैं, वैसे परमेश्वर को प्राप्त होकर पूर्ण आनन्द को प्राप्त होते हैं॥५॥

ता वां॒ वास्तू॑न्युश्मसि॒ गम॑ध्यै॒ यत्र॒ गावो॒ भूरि॑शृङ्गा अ॒यासः॑। अत्राह॒ तदु॑रुगा॒यस्य॒ वृष्णः॑ पर॒मं प॒दमव॑ भाति॒ भूरि॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जहाँ विद्वान् जन मुक्ति पाते हैं वहाँ कुछ भी अन्धकार नहीं है और वे मोक्ष को प्राप्त हुए प्रकाशमान होते हैं, वही आप्त विद्वानों का मुक्तिपद है सो ब्रह्म सबका प्रकाश करनेवाला है॥६॥इस सूक्त में परमेश्वर और मुक्ति का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह एकसौ चौवनवाँ सूक्त और चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र वः॒ पान्त॒मन्ध॑सो धियाय॒ते म॒हे शूरा॑य॒ विष्ण॑वे चार्चत। या सानु॑नि॒ पर्व॑ताना॒मदा॑भ्या म॒हस्त॒स्थतु॒रर्व॑तेव सा॒धुना॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्यादान, उत्तम शिक्षा और विज्ञान से जनों को वृद्धि देते हैं, वे महात्मा होते हैं॥१॥

त्वे॒षमि॒त्था स॒मर॑णं॒ शिमी॑वतो॒रिन्द्रा॑विष्णू सुत॒पा वा॑मुरुष्यति। या मर्त्या॑य प्रतिधी॒यमा॑न॒मित्कृ॒शानो॒रस्तु॑रस॒नामु॑रु॒ष्यथः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो तपस्वी जितेन्द्रिय होते हुए विद्या का अभ्यास करते हैं, वे सूर्य और बिजुली के समान प्रकाशितात्मा होते हैं॥२॥

ता ईं॑ वर्धन्ति॒ मह्य॑स्य॒ पौंस्यं॒ नि मा॒तरा॑ नयति॒ रेत॑से भु॒जे। दधा॑ति पु॒त्रोऽव॑रं॒ परं॑ पि॒तुर्नाम॑ तृ॒तीय॒मधि॑ रोच॒ने दि॒वः॥

वे ही माता-पिता हितैषी होते हैं, जो अपने सन्तानों को दीर्घ ब्रह्मचर्य से पूरी विद्या, उत्तम शिक्षा और युवावस्था को प्राप्त करा विवाह कराते हैं। वे ही प्रथम ब्रह्मचर्य, दूसरी पूरी विद्या, उत्तम शिक्षा और तृतीय युवावस्था को प्राप्त होकर सूर्य के समान प्रकाशमान होते हैं॥३॥

तत्त॒दिद॑स्य॒ पौंस्यं॑ गृणीमसी॒नस्य॑ त्रा॒तुर॑वृ॒कस्य॑ मी॒ळ्हुषः॑। यः पार्थि॑वानि त्रि॒भिरिद्विगा॑मभिरु॒रु क्रमि॑ष्टोरुगा॒याय॑ जी॒वसे॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि सुख से चिरकाल तक जीवने के लिये दीर्घ ब्रह्मचर्य को अच्छे प्रकार सेवन कर आरोग्य और धातुओं की समता बढ़ाने से शरीर के बल और विद्या, धर्म तथा योगाभ्यास के बढ़ाने से आत्मबल की उन्नति कर सदैव सुख में रहें। जो लोग इस ईश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे बाल्यावस्था में स्वयंवर विवाह कभी नहीं करते, इसके विना पूर्ण पुरुषार्थ की वृद्धि की संभावना नहीं है॥४॥

द्वे इद॑स्य॒ क्रम॑णे स्व॒र्दृशो॑ऽभि॒ख्याय॒ मर्त्यो॑ भुरण्यति। तृ॒तीय॑मस्य॒ नकि॒रा द॑धर्षति॒ वय॑श्च॒न प॒तय॑न्तः पत॒त्रिणः॑॥

जो माता-पिता अपने सन्तानों की ब्रह्मचर्य के अनुक्रम से विद्या जन्म को बढ़ाते हैं, वे अपने सन्तानों को दीर्घ आयुवाले, बलवान्, सुन्दरशीलयुक्त करके नित्य हर्षित होते हैं॥५॥

च॒तुर्भिः॑ सा॒कं न॑व॒तिं च॒ नाम॑भिश्च॒क्रं न वृ॒त्तं व्यतीँ॑रवीविपत्। बृ॒हच्छ॑रीरो वि॒मिमा॑न॒ ऋक्व॑भि॒र्युवाकु॑मारः॒ प्रत्ये॑त्याह॒वम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो अड़तालीस वर्ष भर अखण्डित ब्रह्मचर्य का सेवन करता है वह इकेला भी गोलचक्र के समान चौरानवे योद्धाओं को भ्रमा सकता है। मनुष्यों में दश वर्ष तक बाल्यावस्था पच्चीस वर्ष तक कुमारावस्था तदनन्तर छब्बीसवें वर्ष के आरम्भ से युवावस्था पुरुष की होती है और सत्रहवें वर्ष से कन्या की युवावस्था का आरम्भ है, इसके उपरान्त जो स्वयंवर विवाह को करते-कराते हैं वे महाभाग्यशाली होते हैं॥६॥इस सूक्त में अध्यापकोपदेशक और ब्रह्मचर्य के फल के वर्णन से इसके अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह एकसौ पचपनवाँ सूक्त और पच्चीसवाँ वर्ग पूरा हुआ॥

भवा॑ मि॒त्रो न शेव्यो॑ घृ॒तासु॑ति॒र्विभू॑तद्युम्न एव॒या उ॑ स॒प्रथाः॑। अधा॑ ते विष्णो वि॒दुषा॑ चि॒दर्ध्यः॒ स्तोमो॑ य॒ज्ञश्च॒ राध्यो॑ ह॒विष्म॑ता॥

विद्वान् जन जिस ब्रह्मचर्यानुष्ठानरूप यज्ञ की वृद्धि, स्तुति और उत्तमता से सिद्धि करने की इच्छा करते हैं, उसका अच्छे प्रकार सेवन कर विद्वान् होके सबका मित्र हो॥१॥

यः पू॒र्व्याय॑ वे॒धसे॒ नवी॑यसे सु॒मज्जा॑नये॒ विष्ण॑वे॒ ददा॑शति। यो जा॒तम॑स्य मह॒तो महि॒ ब्रव॒त्सेदु॒ श्रवो॑भि॒र्युज्यं॑ चिद॒भ्य॑सत्॥

जो निष्कपटता से बुद्धिमान् विद्यार्थियों को पढ़ाते वा उनको उपदेश देते हैं और जो धर्मयुक्त व्यवहार से पढ़ते और अभ्यास करते हैं, वे सब अतीव विद्वान् और धार्मिक होकर बड़े सुख को प्राप्त होते हैं॥२॥

तमु॑ स्तोतारः पू॒र्व्यं यथा॑ वि॒द ऋ॒तस्य॒ गर्भं॑ ज॒नुषा॑ पिपर्तन। आस्य॑ जा॒नन्तो॒ नाम॑ चिद्विवक्तन म॒हस्ते॑ विष्णो सुम॒तिं भ॑जामहे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्य विद्या की वृद्धि के लिये शास्त्रवक्ता अध्यापक को पाकर और उसकी उत्तम सेवा कर सत्यविद्याओं को अच्छे यत्न से ग्रहण करके पूरे विद्वान् हों॥३॥

तम॑स्य॒ राजा॒ वरु॑ण॒स्तम॒श्विना॒ क्रतुं॑ सचन्त॒ मारु॑तस्य वे॒धसः॑। दा॒धार॒ दक्ष॑मुत्त॒मम॑ह॒र्विदं॑ व्र॒जं च॒ विष्णुः॒ सखि॑वाँ अपोर्णु॒ते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे और सज्जन आप्त विद्वान् से विद्या ग्रहण कर उत्तम बुद्धि की उन्नति कर पूरे बल को प्राप्त होते हैं वा जैसे जहाँ-जहाँ सविता अन्धकार को निवृत्त करता है, वैसे वहाँ-वहाँ उस सवितृमण्डल के महत्त्व को देखके समस्त लटे-मोटे, धनी-निर्धनी जन पूर्ण विद्यावाले से विद्या और शिक्षाओं को पाकर अविद्यारूपी अन्धकार को निवृत्त करें॥४॥

आ यो वि॒वाय॑ स॒चथा॑य॒ दैव्य॒ इन्द्रा॑य॒ विष्णुः॑ सु॒कृते॑ सु॒कृत्त॑रः। वे॒धा अ॑जिन्वत्त्रिषध॒स्थ आर्य॑मृ॒तस्य॑ भा॒गे यज॑मान॒माभ॑जत्॥

जो विद्वानों के प्रिय, किये को जानने-माननेवाले, सुकृति, सर्वविद्यावेत्ता जन, सत्य धर्म विद्या पहुँचाने से सब जनों को सुख देते हैं, वे अखिल सुख भोगनेवाले होते हैं॥५॥

सूक्तम्

अबो॑ध्य॒ग्निर्ज्म उदे॑ति॒ सूर्यो॒ व्यु१॒॑षाश्च॒न्द्रा म॒ह्या॑वो अ॒र्चिषा॑। आयु॑क्षाताम॒श्विना॒ यात॑वे॒ रथं॒ प्रासा॑वीद्दे॒वः स॑वि॒ता जग॒त्पृथ॑क्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे बिजुली, सूर्य और प्रभातवेला अपने प्रकाश से आप प्रकाशित हो समस्त जगत् को प्रकाशित कर ऐश्वर्य की प्राप्ति कराते हैं, वैसे ही अध्यापक और उपदेशक लोग पदार्थ तथा ईश्वरसम्बन्धी विद्याओं को प्रकाशित कर समस्त ऐश्वर्य की उत्पत्ति करावें॥१॥

यद्यु॒ञ्जाथे॒ वृष॑णमश्विना॒ रथं॑ घृ॒तेन॑ नो॒ मधु॑ना क्ष॒त्रमु॑क्षतम्। अ॒स्माकं॒ ब्रह्म॒ पृत॑नासु जिन्वतं व॒यं धना॒ शूर॑साता भजेमहि॥

मनुष्यों को राजनीति के अङ्गों से राज्य को रख कर, धनादि को बढ़ाय और संग्रामों को जीत कर सबके लिये सुख की उन्नति करनी चाहिये॥२॥

अ॒र्वाङ्त्रि॑च॒क्रो म॑धु॒वाह॑नो॒ रथो॑ जी॒राश्वो॑ अ॒श्विनो॑र्यातु॒ सुष्टु॑तः। त्रि॒व॒न्धु॒रो म॒घवा॑ वि॒श्वसौ॑भगः॒ शं न॒ आ व॑क्षद्द्वि॒पदे॒ चतु॑ष्पदे॥

मनुष्यों को इस प्रकार प्रयत्न करना चाहिये जिससे पदार्थविद्या से प्रशंसायुक्त यानों को बनाने को समर्थ हों, ऐसे करने के विना समस्त सुख होने को योग्य नहीं॥३॥

आ न॒ ऊर्जं॑ वहतमश्विना यु॒वं मधु॑मत्या नः॒ कश॑या मिमिक्षतम्। प्रायु॒स्तारि॑ष्टं॒ नी रपां॑सि मृक्षतं॒ सेध॑तं॒ द्वेषो॒ भव॑तं सचा॒भुवा॑॥

अध्यापक और उपदेशक लोग ऐसी शिक्षा करें कि जिससे हम लोग सबके मित्र होकर पक्षपात से उत्पन्न होनेवाले पापों को छोड़ अभीष्ट सिद्धि पानेवाले हों॥४॥

यु॒वं ह॒ गर्भं॒ जग॑तीषु धत्थो यु॒वं विश्वे॑षु॒ भुव॑नेष्व॒न्तः। यु॒वम॒ग्निं च॑ वृषणाव॒पश्च॒ वन॒स्पतीँ॑रश्विना॒वैर॑येथाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्य जैसे यहाँ सूर्य और चन्द्रमा विराजमान हुए पृथिवी में वर्षा से गर्भ धारण करा कर समस्त पदार्थों को उत्पन्न कराते हैं, वैसे विद्यारूप गर्भ को धारण करा के समस्त सुखों को उत्पन्न करावें॥५॥

यु॒वं ह॑ स्थो भि॒षजा॑ भेष॒जेभि॒रथो॑ ह स्थो र॒थ्या॒३॒॑ राथ्ये॑भिः। अथो॑ ह क्ष॒त्रमधि॑ धत्थ उग्रा॒ यो वां॑ ह॒विष्मा॒न्मन॑सा द॒दाश॑॥

जब मनुष्य विद्वान् वैद्यों का सङ्ग करते हैं तब वैद्यक विद्या को प्राप्त होते हैं। जब शूर दाता होते हैं तब राज्य धारण कर और प्रशंसित होकर निरन्तर सुखी होते हैं॥६॥। इस सूक्त में अश्वियों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह एकसौ सत्तावनवाँ सूक्त और सत्ताईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥इस अध्याय में सोम आदि पदार्थों के प्रतिपादन से इस दशवें अध्याय के अर्थों की नवम अध्याय में कहे हुए अर्थों के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥

वसू॑ रु॒द्रा पु॑रु॒मन्तू॑ वृ॒धन्ता॑ दश॒स्यतं॑ नो वृषणाव॒भिष्टौ॑। दस्रा॑ ह॒ यद्रेक्ण॑ औच॒थ्यो वां॒ प्र यत्स॒स्राथे॒ अक॑वाभिरू॒ती॥

जो सूर्य और पवन के समान सबका उपकार करते हैं, वे धनवान् होते हैं॥१॥

को वां॑ दाशत्सुम॒तये॑ चिद॒स्यै वसू॒ यद्धेथे॒ नम॑सा प॒दे गोः। जि॒गृ॒तम॒स्मे रे॒वतीः॒ पुरं॑धीः काम॒प्रेणे॑व॒ मन॑सा॒ चर॑न्ता॥

जो पूर्णविद्या और कामनावाले पुरुष मनुष्यों को सुन्दर बुद्धिवाले करने को प्रयत्न करते हैं, वे पृथिवी में सत्कारयुक्त होते हैं॥२॥

यु॒क्तो ह॒ यद्वां॑ तौ॒ग्र्याय॑ पे॒रुर्वि मध्ये॒ अर्ण॑सो॒ धायि॑ प॒ज्रः। उप॑ वा॒मवः॑ शर॒णं ग॑मेयं॒ शूरो॒ नाज्म॑ प॒तय॑द्भि॒रेवैः॑॥

जो जिज्ञासु पुरुष साधन और उपसाधनों से अध्यापक आप्त विद्वानों के आश्रय को प्राप्त हों, वे विद्वान् होते हैं और जो अच्छे प्रकार प्रीति के साथ विद्या और अच्छी शिक्षा को बढ़ाते हैं, वे इस संसार में पूज्य होते हैं॥३॥

उप॑स्तुतिरौच॒थ्यमु॑रुष्ये॒न्मा मामि॒मे प॑त॒त्रिणी॒ वि दु॑ग्धाम्। मा मामेधो॒ दश॑तयश्चि॒तो धा॒क्प्र यद्वां॑ ब॒द्धस्त्मनि॒ खाद॑ति॒ क्षाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे इन्धनों से निर्वात स्थान में अच्छे प्रकार बढ़ा हुआ अग्नि, पृथिवी और काष्ठ आदि पदार्थों को जलाता है, वैसे मुझे शोकरूप अग्नि मत जलावे और अज्ञान वा कुशील मत प्राप्त हों किन्तु शान्ति और विद्या निरन्तर बढ़े॥४॥

न मा॑ गरन्न॒द्यो॑ मा॒तृत॑मा दा॒सा यदीं॒ सुस॑मुब्धम॒वाधुः॑। शिरो॒ यद॑स्य त्रैत॒नो वि॒तक्ष॑त्स्व॒यं दा॒स उरो॒ अंसा॒वपि॑ ग्ध॥

मनुष्यों को चाहिये कि ऐसा प्रयत्न करें जिससे नदी और समुद्र आदि न डुबा मारें। शूद्र आदि दास जनसेवा करने पर नियत हुआ भी आलस्यवश अति सूधे स्वभाववाले स्वामी को पीड़ा दिया करता अर्थात् उनका काम मन से नहीं करता, इससे उसको अच्छी शिक्षा देवे और अनुचित करने में ताड़ना भी दे तथा अपने अपने शरीर के अङ्गों की सदा पुष्टि करें॥५॥

दी॒र्घत॑मा मामते॒यो जु॑जु॒र्वान्द॑श॒मे यु॒गे। अ॒पामर्थं॑ य॒तीनां॑ ब्र॒ह्मा भ॑वति॒ सार॑थिः॥

जो इस संसार में अत्यन्त अविद्या अज्ञानयुक्त, लोभातुर हैं वे शीघ्र रोगी होते और जो पक्षपातरहित संन्यासियों के सकाश से हर्ष-शोक तथा निन्दा-स्तुति रहित, विज्ञान और आनन्द को प्राप्त होते हैं, वे आप दुःख के पारगामी होकर औरों को भी उसके पार करते हैं॥६॥इस सूक्त में शिष्य और शिक्षा देनेवाले के काम का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह एकसौ अट्ठावनवाँ सूक्त और प्रथम वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र द्यावा॑ य॒ज्ञैः पृ॑थि॒वी ऋ॑ता॒वृधा॑ म॒ही स्तु॑षे वि॒दथे॑षु॒ प्रचे॑तसा। दे॒वेभि॒र्ये दे॒वपु॑त्रे सु॒दंस॑से॒त्था धि॒या वार्या॑णि प्र॒भूष॑तः॥

जो मनुष्य उत्तम यत्न के साथ पृथिवी और सूर्यमण्डल के गुण, कर्म, स्वभाव को यथावत् जानें, वे अतुल सुख से भूषित हों॥१॥

उ॒त म॑न्ये पि॒तुर॒द्रुहो॒ मनो॑ मा॒तुर्महि॒ स्वत॑व॒स्तद्धवी॑मभिः। सु॒रेत॑सा पि॒तरा॒ भूम॑ चक्रतुरु॒रु प्र॒जाया॑ अ॒मृतं॒ वरी॑मभिः॥

जैसे माता-पिता लड़कों को अच्छे प्रकार पालन कर उनको बढ़ाते हैं, वैसे भूमि और सूर्य्य प्रजाजनों के लिये सुख की उन्नति करते हैं॥२॥

ते सू॒नवः॒ स्वप॑सः सु॒दंस॑सो म॒ही ज॑ज्ञुर्मा॒तरा॑ पू॒र्वचि॑त्तये। स्था॒तुश्च॑ स॒त्यं जग॑तश्च॒ धर्म॑णि पु॒त्रस्य॑ पाथः प॒दमद्व॑याविनः॥

क्या भूमि और सूर्य सबके पालन के निमित्त नहीं हैं ? जो पिता-माता चराचर जगत् का विज्ञान पुत्रों के लिये ग्रहण कराते हैं, वे कृतकृत्य क्यों न हों ?॥३॥

ते मा॒यिनो॑ ममिरे सु॒प्रचे॑तसो जा॒मी सयो॑नी मिथु॒ना समो॑कसा। नव्यं॑नव्यं॒ तन्तु॒मा त॑न्वते दि॒वि स॑मु॒द्रे अ॒न्तः क॒वयः॑ सुदी॒तयः॑॥

जो मनुष्य आप्त अध्यापक और उपदेशकों को प्राप्त हो विद्याओं को प्राप्त हो वा भूमि और बिजुली को जान समस्त विद्या के कामों को हाथ में आमले के समान साक्षात् कर औरों को उपदेश देते हैं, वे संसार को शोभित करनेवाले होते हैं॥४॥

तद्राधो॑ अ॒द्य स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं व॒यं दे॒वस्य॑ प्रस॒वे म॑नामहे। अ॒स्मभ्यं॑ द्यावापृथिवी सुचे॒तुना॑ र॒यिं ध॑त्तं॒ वसु॑मन्तं शत॒ग्विन॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वान् जन जैसे द्यावापृथिवी सब प्राणियों को सुखी करते हैं, वैसे सबको विद्या और धन की उन्नति से सुखी करें॥५॥

ते हि द्यावा॑पृथि॒वी वि॒श्वश॑म्भुव ऋ॒ताव॑री॒ रज॑सो धार॒यत्क॑वी। सु॒जन्म॑नी धि॒षणे॑ अ॒न्तरी॑यते दे॒वो दे॒वी धर्म॑णा॒ सूर्यः॒ शुचिः॑॥

जैसे सब लोकों के वायु, बिजुली और आकाश ठहरने के स्थान हैं, वैसे ईश्वर उन वायु आदि पदार्थों का आधार है। इस सृष्टि में एक-एक ब्रह्माण्ड के बीच एक-एक सूर्यलोक है, यह सब जानें॥१॥

उ॒रु॒व्यच॑सा म॒हिनी॑ अस॒श्चता॑ पि॒ता मा॒ता च॒ भुव॑नानि रक्षतः। सु॒धृष्ट॑मे वपु॒ष्ये॒३॒॑ न रोद॑सी पि॒ता यत्सी॑म॒भि रू॒पैरवा॑सयत्॥

जैसे समस्त प्राणियों को भूमि और सूर्यमण्डल पालते और धारण करते हैं, वैसे माता-पिता सन्तानों की पालना और रक्षा करते हैं। जो जलों और पृथिवी वा इनके विकारों में रूप दिखाई देता है, वह व्याप्त अग्नि ही का है, यह समझना चाहिये॥२॥

स वह्निः॑ पु॒त्रः पि॒त्रोः प॒वित्र॑वान्पु॒नाति॒ धीरो॒ भुव॑नानि मा॒यया॑। धे॒नुं च॒ पृश्निं॑ वृष॒भं सु॒रेत॑सं वि॒श्वाहा॑ शु॒क्रं पयो॑ अस्य दुक्षत॥

जैसे सूर्य समस्त लोकों को धारण करता और पवित्र करता है, वैसे सुपुत्र कुल को पवित्र करते हैं॥३॥

अ॒यं दे॒वाना॑म॒पसा॑म॒पस्त॑मो॒ यो ज॒जान॒ रोद॑सी वि॒श्वश॑म्भुवा। वि यो म॒मे रज॑सी सुक्रतू॒यया॒जरे॑भिः॒ स्कम्भ॑नेभिः॒ समा॑नृचे॥

सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करने आदि काम जिस जगदीश्वर के होते हैं, जो निश्चय के साथ कारण से समस्त नाना प्रकार के कार्य को रचकर अनन्त बल से धारण करता है, उसीको सब लोग सदैव प्रशंसित करें॥४॥

ते नो॑ गृणा॒ने म॑हिनी॒ महि॒ श्रवः॑ क्ष॒त्रं द्या॑वापृथिवी धासथो बृ॒हत्। येना॒भि कृ॒ष्टीस्त॒तना॑म वि॒श्वहा॑ प॒नाय्य॒मोजो॑ अ॒स्मे समि॑न्वतम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो जन भूमि के गुणों को जाननेवालों की विद्या को जानके उससे उपयोग करना जानते हैं, वे अत्यन्त बल को पाकर सब पृथिवी का राज्य कर सकते हैं॥५॥इस सूक्त में द्यावापृथिवी के दृष्टान्त से मनुष्यों का यह उपकार ग्रहण करना कहा, इससे इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह समझना चाहिये॥यह एकसौ साठवाँ सूक्त और तीसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

किमु॒ श्रेष्ठः॒ किं यवि॑ष्ठो न॒ आज॑ग॒न्किमी॑यते दू॒त्यं१॒॑ कद्यदू॑चि॒म। न नि॑न्दिम चम॒सं यो म॑हाकु॒लोऽग्ने॑ भ्रात॒र्द्रुण॒ इद्भू॒तिमू॑दिम॥

जिज्ञासु जन विद्वानों को ऐसा पूछें कि हमको उत्तम विद्या कैसे प्राप्त हो और कौन इस विद्या विषय में श्रेष्ठ बलवान् दूत के समान पदार्थ है, किसको पा कर हम लोग सुखी होवें॥१॥

एकं॑ चम॒सं च॒तुरः॑ कृणोतन॒ तद्वो॑ दे॒वा अ॑ब्रुव॒न्तद्व॒ आग॑मम्। सौध॑न्वना॒ यद्ये॒वा क॑रि॒ष्यथ॑ सा॒कं दे॒वैर्य॒ज्ञिया॑सो भविष्यथ॥

जो विद्वानों की उत्तेजना से प्रश्नोत्तरों से विद्याओं को पाकर उसमें कहे हुए कामों को करते हैं वे विद्वान् होते हैं। पिछले प्रश्नों के यहाँ ये उत्तर हैं कि जो हम लोगों में विद्या में अधिक है वह श्रेष्ठ। जो जितेन्द्रिय है वह अत्यन्त बलवान्। जो अग्नि है वह दूत और जो पुरुषार्थसिद्धि है वह विभूति है॥२॥

अ॒ग्निं दू॒तं प्रति॒ यदब्र॑वीत॒नाश्वः॒ कर्त्वो॒ रथ॑ उ॒तेह कर्त्वः॑। धे॒नुः कर्त्वा॑ युव॒शा कर्त्वा॒ द्वा तानि॑ भ्रात॒रनु॑ वः कृ॒त्व्येम॑सि॥

जो जिसके लिये सत्य विद्या को कहे और अग्नि आदि से कर्त्तव्य का उपदेश करे, वह उसको बन्धु के समान जाने और वह करने योग्य कामों को सिद्ध कर सके॥३॥

च॒कृ॒वांस॑ ऋभव॒स्तद॑पृच्छत॒ क्वेद॑भू॒द्यः स्य दू॒तो न॒ आज॑गन्। य॒दावाख्य॑च्चम॒साञ्च॒तुरः॑ कृ॒तानादित्त्वष्टा॒ ग्नास्व॒न्तर्न्या॑नजे॥

जो विद्वानों के समीप में उत्तम शिक्षा और विद्या को पाकर समस्त सिद्धान्तों के उत्तरों को जान कार्य्यों में अत्युत्तम योग करते हैं, वे बुद्धिमान् होते हैं॥४॥

हना॑मैनाँ॒ इति॒ त्वष्टा॒ यदब्र॑वीच्चम॒सं ये दे॑व॒पान॒मनि॑न्दिषुः। अ॒न्या नामा॑नि कृण्वते सु॒ते सचाँ॑ अ॒न्यैरे॑नान्क॒न्या॒३॒॑ नाम॑भिः स्परत्॥

जो विद्वानों की निन्दा करें, विद्वानों में मूर्खबुद्धि और मूर्खों में विद्वद्बुद्धि करें, वे ही खल सबको तिरस्कार करने योग्य हैं॥५॥

इन्द्रो॒ हरी॑ युयु॒जे अ॒श्विना॒ रथं॒ बृह॒स्पति॑र्वि॒श्वरू॑पा॒मुपा॑जत। ऋ॒भुर्विभ्वा॒ वाजो॑ दे॒वाँ अ॑गच्छत॒ स्वप॑सो य॒ज्ञियं॑ भा॒गमै॑तन॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो बिजुली के समान कार्य को युक्त करने, शिल्पविद्या के समान सब कार्यों को यथायोग्य व्यवहारों में लगाने, सूर्य के समान राज्य को पालनेवाले, बुद्धिमानों के समान विद्वानों का सङ्ग करने और धार्मिक के समान कर्म करनेवाले मनुष्य हैं, वे सौभाग्यवान् होते हैं॥६॥

निश्चर्म॑णो॒ गाम॑रिणीत धी॒तिभि॒र्या जर॑न्ता युव॒शा ताकृ॑णोतन। सौध॑न्वना॒ अश्वा॒दश्व॑मतक्षत यु॒क्त्वा रथ॒मुप॑ दे॒वाँ अ॑यातन॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य अङ्गुलियों के समान कर्म के करने और शिल्पविद्या में प्रीति रखनेवाले पदार्थ से पदार्थ के गुणों को जानकर यान आदि कार्यों में उनका उपयोग करते हैं, वे दिव्य भोगों को प्राप्त होते हैं॥७॥

इ॒दमु॑द॒कं पि॑ब॒तेत्य॑ब्रवीतने॒दं वा॑ घा पिबता मुञ्ज॒नेज॑नम्। सौध॑न्वना॒ यदि॒ तन्नेव॒ हर्य॑थ तृ॒तीये॑ घा॒ सव॑ने मादयाध्वै॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। वैद्य वा माता-पिताओं को चाहिये कि समस्त रोगी और सन्तानों के लिये प्रथम ऐसा उपदेश करे कि तुमको शारीरिक और आत्मिक सुख के लिये यह सेवन करना चाहिये, यह न सेवन करना चाहिये, यह अनुष्ठान करना चाहिये, यह नहीं। जिस कारण ये पूर्ण आत्मिक और शारीरिक सुखयुक्त निरन्तर हों॥८॥

आपो॒ भूयि॑ष्ठा॒ इत्येको॑ अब्रवीद॒ग्निर्भूयि॑ष्ठ॒ इत्य॒न्यो अ॑ब्रवीत्। व॒ध॒र्यन्तीं॑ ब॒हुभ्यः॒ प्रैको॑ अब्रवीदृ॒ता वद॑न्तश्चम॒साँ अ॑पिंशत॥

इस संसार में स्थूल पदार्थों के बीच कोई जल को अधिक, कोई अग्नि को अधिक और कोई भूमि को बड़ी-बड़ी बतलाते हैं। परन्तु स्थूल पदार्थों में भूमि ही अधिक है, इस प्रकार सत्यविज्ञान से मेघ के अवयवों का जो ज्ञान उसके समान सब पदार्थों को अलग-अलग कर सिद्धान्तों की सब परीक्षा करें, इस काम के विना यथार्थ पदार्थविद्या को नहीं जान सकते॥९॥

श्रो॒णामेक॑ उद॒कं गामवा॑जति मां॒समेकः॑ पिंशति सू॒नयाभृ॑तम्। आ नि॒म्रुचः॒ शकृ॒देको॒ अपा॑भर॒त्किं स्वि॑त्पु॒त्रेभ्यः॑ पि॒तरा॒ उपा॑वतुः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो पिता-माता जैसे गौएं बछड़े को सुख चाहती, दुःख से बचाती वा बहेलिया मांस को लेके अनिष्ट को छोड़े वा वैद्य रोगी के मल को दूर करे वैसे पुत्रों को दुर्गुणों से पृथक् कर शिक्षा और विद्यायुक्त करते हैं, वे सन्तान के सुख को पाते हैं॥१०॥

उ॒द्वत्स्व॑स्मा अकृणोतना॒ तृणं॑ नि॒वत्स्व॒पः स्व॑प॒स्यया॑ नरः। अगो॑ह्यस्य॒ यदस॑स्तना गृ॒हे तद॒द्येदमृ॑भवो॒ नानु॑ गच्छथ॥

मनुष्यों को चाहिये कि ऊँचे-नीचे स्थलों में पशुओं के राखने के लिये जल और घास आदि पदार्थों को राखें और अरक्षित अर्थात् गिरे, पड़े वा प्रत्यक्ष में धरे हुए दूसरे के पदार्थ को भी अन्याय से ले लेने की इच्छा कभी न करें। धर्म, विद्या और बुद्धिमान् जनों का सङ्ग सदैव करें॥११॥

स॒म्मील्य॒ यद्भुव॑ना प॒र्यस॑र्पत॒ क्व॑ स्वित्ता॒त्या पि॒तरा॑ व आसतुः। अश॑पत॒ यः क॒रस्नं॑ व आद॒दे यः प्राब्र॑वी॒त्प्रो तस्मा॑ अब्रवीतन॥

जब पढ़ानेवालों के समीप विद्यार्थी आवें तब उनसे यह पूछना योग्य है कि तुम कहाँ के हो ? तुम्हारा निवास कहाँ है ? तुम्हारे माता-पिता का क्या नाम है ? क्या पढ़ना चाहते हो ? अखण्डित ब्रह्मचर्य करोगे वा न करोगे ? इत्यादि पूछ करके ही इनको विद्या ग्रहण करने के लिये ब्रह्मचर्य की शिक्षा देवें और शिष्य जन पढ़ानेवालों की निन्दा और उनके प्रतिकूल आचरण कभी न करें॥१२॥

सु॒षु॒प्वांस॑ ऋभव॒स्तद॑पृच्छ॒तागो॑ह्य॒ क इ॒दं नो॑ अबूबुधत्। श्वानं॑ व॒स्तो बो॑धयि॒तार॑मब्रवीत्संवत्स॒र इ॒दम॒द्या व्य॑ख्यत॥

बुद्धिमान् जन जिस-जिस विषय को विद्वानों को पूछ कर निश्चय करें उस उस को मूर्ख निर्बुद्धि जन निश्चय नहीं कर सकें, जड़ मन्दमति जन जितना एक संवत्सर में पढ़ता है, उतना बुद्धिमान् एक दिन में ग्रहण कर सकता है॥१३॥

दि॒वा या॑न्ति म॒रुतो॒ भूम्या॒ग्निर॒यं वातो॑ अ॒न्तरि॑क्षेण याति। अ॒द्भिर्या॑ति॒ वरु॑णः समु॒द्रैर्यु॒ष्माँ इ॒च्छन्तः॑ शवसो नपातः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य, पवन, भूमि, अग्नि, वायु, अन्तरिक्ष तथा वरुण और जलों का एक साथ निवास है वैसे मनुष्य विद्या और विद्वानों के साथ वास कर नित्य सुखयुक्त और बली होवें॥१४॥इस सूक्त में मेधावि के कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह एकसौ इकसठवाँ सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ॥

मा नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो अर्य॒मायुरिन्द्र॑ ऋभु॒क्षा म॒रुतः॒ परि॑ ख्यन्। यद्वा॒जिनो॑ दे॒वजा॑तस्य॒ सप्तेः॑ प्रव॒क्ष्यामो॑ वि॒दथे॑ वी॒र्या॑णि॥

मनुष्यों को प्रशंसित बलवान् अच्छे सीखे हुए घोड़े ग्रहण करने चाहिये, जिससे सर्वत्र विजय और ऐश्वर्यों को प्राप्त हों॥१॥

यन्नि॒र्णिजा॒ रेक्ण॑सा॒ प्रावृ॑तस्य रा॒तिं गृ॑भी॒तां मु॑ख॒तो नय॑न्ति। सुप्रा॑ङ॒जो मेम्य॑द्वि॒श्वरू॑प इन्द्रापू॒ष्णोः प्रि॒यमप्ये॑ति॒ पाथः॑॥

जो न्याय से संचित किये हुए धन से मुख्य धर्म्म सम्बन्धी काम करते हैं, वे परोपकारी होते हैं॥२॥

ए॒ष च्छागः॑ पु॒रो अश्वे॑न वा॒जिना॑ पू॒ष्णो भा॒गो नी॑यते वि॒श्वदे॑व्यः। अ॒भि॒प्रियं॒ यत्पु॑रो॒ळाश॒मर्व॑ता॒ त्वष्टेदे॑नं सौश्रव॒साय॑ जिन्वति॥

जो मनुष्य घोड़ों की पुष्टि के लिये छेरी का दूध उनको पिलाते और अच्छे बनाये हुए अन्न को खाते हैं, वे निरन्तर सुखी होते हैं॥३॥

यद्ध॑वि॒ष्य॑मृतु॒शो दे॑व॒यानं॒ त्रिर्मानु॑षाः॒ पर्यश्वं॒ नय॑न्ति। अत्रा॑ पू॒ष्णः प्र॑थ॒मो भा॒ग ए॑ति य॒ज्ञं दे॒वेभ्यः॑ प्रतिवे॒दय॑न्न॒जः॥

जो समस्त ऋतुओं के सुख सिद्ध करनेवाले यानों को रच घोड़े और बकरे आदि पशुओं को बढ़ा कर जगत् का हित सिद्ध करते हैं, वे शारीरिक, वाचिक और मानसिक तीनों प्रकार के सुख को प्राप्त होते हैं॥४॥

होता॑ध्व॒र्युराव॑या अग्निमि॒न्धो ग्रा॑वग्रा॒भ उ॒त शंस्ता॒ सुवि॑प्रः। तेन॑ य॒ज्ञेन॒ स्व॑रंकृतेन॒ स्वि॑ष्टेन व॒क्षणा॒ आ पृ॑णध्वम्॥

सब मनुष्य दुर्गन्ध के निवारने और सुख की उन्नति के लिये यज्ञ का अनुष्ठान कर सर्वत्र देशों में सुगन्धित जलों को वर्षा कर नदियों को परिपूर्ण करें अर्थात् जल से भरें॥५॥

यू॒प॒व्र॒स्का उ॒त ये यू॑पवा॒हाश्च॒षालं॒ ये अ॑श्वयू॒पाय॒ तक्ष॑ति। ये चार्व॑ते॒ पच॑नं स॒म्भर॑न्त्यु॒तो तेषा॑म॒भिगू॑र्तिर्न इन्वतु॥

जो मनुष्य घोड़े आदि पशुओं के बाँधने के लिये काठ के खभ्भे वा खूँटे करते बनाते हैं वा जो घोड़ों के राखन को पदार्थ दाना, घास, चारा, घुड़सार आदि स्वीकार करते बनाते हैं, वे उद्यमी होकर सुखों को प्राप्त होते हैं॥६॥

उप॒ प्रागा॑त्सु॒मन्मे॑ऽधायि॒ मन्म॑ दे॒वाना॒माशा॒ उप॑ वी॒तपृ॑ष्ठः। अन्वे॑नं॒ विप्रा॒ ऋष॑यो मदन्ति दे॒वानां॑ पु॒ष्टे च॑कृमा सु॒बन्धु॑म्॥

जो विद्वानों के सिद्धान्त किये हुए विज्ञान का धारण कर तदनुकूल हो विद्वान् होते हैं, वे शरीर और आत्मा की पुष्टि से युक्त होते हैं॥७॥

यद्वा॒जिनो॒ दाम॑ सं॒दान॒मर्व॑तो॒ या शी॑र्ष॒ण्या॑ रश॒ना रज्जु॑रस्य। यद्वा॑ घास्य॒ प्रभृ॑तमा॒स्ये॒३॒॑ तृणं॒ सर्वा॒ ता ते॒ अपि॑ दे॒वेष्व॑स्तु॥

जो घोड़ों को सुशिक्षित अच्छे इन्द्रिय दमन करनेवाले उत्तम गहनों से युक्त और पुष्ट कर इनसे कार्यों को सिद्ध करते हैं, वे समस्त विजय आदि व्यवहारों को सिद्ध कर सकते हैं॥८॥

यदश्व॑स्य क्र॒विषो॒ मक्षि॒काश॒ यद्वा॒ स्वरौ॒ स्वधि॑तौ रि॒प्तमस्ति॑। यद्धस्त॑योः शमि॒तुर्यन्न॒खेषु॒ सर्वा॒ ता ते॒ अपि॑ दे॒वेष्व॑स्तु॥

भृत्यों को घोड़े दुर्गन्ध लेप रहित शुद्ध, माखी और डाँश से रहित रखने चाहिये, अपने हाथ तथा रज्जु आदि से उत्तम नियम कर अपने इच्छानुकूल चाल चलवाना चाहिये, ऐसे करने से घोड़े उत्तम काम करते हैं॥९॥

यदूव॑ध्यमु॒दर॑स्याप॒वाति॒ य आ॒मस्य॑ क्र॒विषो॑ ग॒न्धो अस्ति॑। सु॒कृ॒ता तच्छ॑मि॒तारः॑ कृण्वन्तू॒त मेधं॑ शृत॒पाकं॑ पचन्तु॥

जो मनुष्य उदररोग निवारने के लिये अच्छे बनाये अन्न और ओषधियों को खाते हैं, वे सुखी होते हैं॥१०॥

यत्ते॒ गात्रा॑द॒ग्निना॑ प॒च्यमा॑नाद॒भि शूलं॒ निह॑तस्याव॒धाव॑ति। मा तद्भूम्या॒मा श्रि॑ष॒न्मा तृणे॑षु दे॒वेभ्य॒स्तदु॒शद्भ्यो॑ रा॒तम॑स्तु॥

बलिष्ठ विद्वान् मनुष्यो को चाहिये कि संग्राम में शस्त्र चलाने के समय विचारपूर्वक ही शस्त्र चलावें, जिससे क्रोधपूर्वक चला शस्त्र भूमि आदि में न पड़े किन्तु शत्रुओं को ही मारनेवाला हो॥११॥

ये वा॒जिनं॑ परि॒पश्य॑न्ति प॒क्वं य ई॑मा॒हुः सु॑र॒भिर्निर्ह॒रेति॑। ये चार्व॑तो मांसभि॒क्षामु॒पास॑त उ॒तो तेषा॑म॒भिगू॑र्तिर्न इन्वतु॥

जो लोग अन्न और जल को शुद्ध करना, पकाना, उसका भोजन करना जानते और मांस को छोड़ कर भोजन करते, वे उद्यमी होते हैं॥१२॥

यन्नीक्ष॑णं मां॒स्पच॑न्या उ॒खाया॒ या पात्रा॑णि यू॒ष्ण आ॒सेच॑नानि। ऊ॒ष्म॒ण्या॑पि॒धाना॑ चरू॒णाम॒ङ्काः सू॒नाः परि॑ भूष॒न्त्यश्व॑म्॥

जो मनुष्य मांसादि के पकाने के दोष से रहित बटलोई के धरने, जल आदि उस में छोड़ने, अग्नि को जलाने और उसको ढकनों से ढाँपने को जानते हैं, वे पाकविद्या में कुशल होते हैं। जो घोड़ा को अच्छा सिखा उनको सुशोभित कर चलाते हैं, वे सुख से मार्ग को जाते हैं॥१३॥

नि॒क्रम॑णं नि॒षद॑नं वि॒वर्त॑नं॒ यच्च॒ पड्बी॑श॒मर्व॑तः। यच्च॑ प॒पौ यच्च॑ घा॒सिं ज॒घास॒ सर्वा॒ ता ते॒ अपि॑ दे॒वेष्व॑स्तु॥

जैसे सुन्दर सिखाये हुए घोड़े सुशील अच्छी चाल चलनेवाले होते हैं, वैसे विद्वानों की शिक्षा पाये हुए जन सभ्य होते हैं। जैसे घोड़े आहार भर पी खाके पचाते हैं, वैसे विचक्षण बुद्धि विद्या से तीव्र पुरुष भी हों॥१४॥

मा त्वा॒ग्निर्ध्व॑नयीद्धू॒मग॑न्धि॒र्मोखा भ्राज॑न्त्य॒भि वि॑क्त॒ जघ्रिः॑। इ॒ष्टं वी॒तम॒भिगू॑र्तं॒ वष॑ट्कृतं॒ तं दे॒वासः॒ प्रति॑ गृभ्ण॒न्त्यश्व॑म्॥

जो मनुष्य अग्नि वा घोड़े से रथों को चलाते हैं, वे लक्ष्मी से प्रकाशमान होते हैं। जो अग्नि में सुगन्धि आदि पदार्थों को होमते हैं, वे रोग और कष्ट के शब्दों से पीड्यमान नहीं होते हैं॥१५॥

यदश्वा॑य॒ वास॑ उपस्तृ॒णन्त्य॑धीवा॒सं या हिर॑ण्यान्यस्मै। सं॒दान॒मर्व॑न्तं॒ पड्बी॑शं प्रि॒या दे॒वेष्वा या॑मयन्ति॥

जो मनुष्य बिजुली आदि रूपवाले अग्नि के उपयोग करने और उसको बढ़ाने को जानें तो बहुत सुखों को प्राप्त हों॥१६॥

यत्ते॑ सा॒दे मह॑सा॒ शूकृ॑तस्य॒ पार्ष्ण्या॑ वा॒ कश॑या वा तु॒तोद॑। स्रु॒चेव॒ ता ह॒विषो॑ अध्व॒रेषु॒ सर्वा॒ ता ते॒ ब्रह्म॑णा सूदयामि॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् जन कोड़ा वा बेंत से घोड़े को, पनेड़ी से बैलों को, अंकुश से हाथी को अच्छी ताड़ना दे उनको शीघ्र चलाते हैं, वैसे ही कलायन्त्रों से अग्नि को अच्छे प्रकार चलाकर विमान आदि यानों को शीघ्र चलावें॥१७॥

चतु॑स्त्रिंशद्वा॒जिनो॑ दे॒वब॑न्धो॒र्वङ्क्री॒रश्व॑स्य॒ स्वधि॑तिः॒ समे॑ति। अच्छि॑द्रा॒ गात्रा॑ व॒युना॑ कृणोत॒ परु॑ष्परुरनु॒घुष्या॒ वि श॑स्त॥

हे मनुष्यो! जिस कारण से बिजुली उत्पन्न होती है, वह कारण सब पृथिव्यादिकों में व्याप्त है। इससे बिजुली की ताड़ना आदि से किसी का अङ्ग-भङ्ग न हो उतनी बिजुली काम में लाओ। जो अग्नि के गुणों को जानकर यथायोग्य क्रिया से उस अग्नि का प्रयोग किया जाय तो कौन काम न सिद्ध होने योग्य हों अर्थात् सभी यथेष्ट काम बनें॥१८॥

एक॒स्त्वष्टु॒रश्व॑स्या विश॒स्ता द्वा य॒न्तारा॑ भवत॒स्तथ॑ ऋ॒तुः। या ते॒ गात्रा॑णामृतु॒था कृ॒णोमि॒ ताता॒ पिण्डा॑नां॒ प्र जु॑होम्य॒ग्नौ॥

जो सब पदार्थों के छिन्न-भिन्न करनेवाले ऋतु के अनुकूल पाये हुए पदार्थों में व्याप्त बिजुलीरूप अग्नि के काल और सृष्टिक्रम नियम करनेवालों और प्रशंसित गुणों को जान अभीष्ट कामों को सिद्ध करते हुए मोटे-मोटे लक्कड़ आदि पदार्थों को आग में छोड़ बहुत कामों को सिद्ध करें, वे शिल्पविद्या को जाननेवाले कैसे न हों ?॥१९॥

मा त्वा॑ तपत्प्रि॒य आ॒त्मापि॒यन्तं॒ मा स्वधि॑तिस्त॒न्व१॒॑ आ ति॑ष्ठिपत्ते। मा ते॑ गृ॒ध्नुर॑विश॒स्ताति॒हाय॑ छि॒द्रा गात्रा॑ण्य॒सिना॒ मिथू॑ कः॥

जो मनुष्य योगाभ्यास करते हैं, वे मृत्यु रोग से नहीं पीड़ित होते। और उनको जीवन में रोग भी दुःखी नहीं करते हैं॥२०॥

न वा उ॑ ए॒तन्म्रि॑यसे॒ न रि॑ष्यसि दे॒वाँ इदे॑षि प॒थिभिः॑ सु॒गेभिः॑। हरी॑ ते॒ युञ्जा॒ पृष॑ती अभूता॒मुपा॑स्थाद्वा॒जी धु॒रि रास॑भस्य॥

जो योगाभ्यास से समाहित चित्त दिव्य योगी जनों को अच्छे प्रकार प्राप्त हो धर्म-युक्त मार्ग से चलते हुए परमात्मा में अपने आत्मा को युक्त करते हैं, वे मोक्ष पाये हुए होते हैं॥२१॥

सु॒गव्यं॑ नो वा॒जी स्वश्व्यं॑ पुं॒सः पु॒त्राँ उ॒त वि॑श्वा॒पुषं॑ र॒यिम्। अ॒ना॒गा॒स्त्वं नो॒ अदि॑तिः कृणोतु क्ष॒त्रं नो॒ अश्वो॑ वनतां ह॒विष्मा॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो पृथिवी आदि कि विद्या से गौ, घोड़े और पुरुष सन्तानों की पूरी पुष्टि और धन को संचित करके शीघ्रगामी अश्वरूप अग्नि की विद्या से राज्य को बढ़ाके निष्पाप होके सुखी होंवे औरों को भी ऐसे ही करें॥२२॥इस सूक्त में अश्वरूप अग्नि की विद्या का प्रतिपादन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह एकसौ बासठवाँ सूक्त और दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

यदक्र॑न्दः प्रथ॒मं जाय॑मान उ॒द्यन्त्स॑मु॒द्रादु॒त वा॒ पुरी॑षात्। श्ये॒नस्य॑ प॒क्षा ह॑रि॒णस्य॑ बा॒हू उ॑प॒स्तुत्यं॒ महि॑ जा॒तं ते॑ अर्वन्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो धर्मयुक्त ब्रह्मचर्य से विद्याओं को पढ़ते हैं, वे सूर्य के समान प्रकाशमान, वाज के समान वेगवान् और हरिण के समान कूदते हुए प्रशंसित होते हैं॥१॥

य॒मेन॑ द॒त्तं त्रि॒त ए॑नमायुन॒गिन्द्र॑ एणं प्रथ॒मो अध्य॑तिष्ठत्। ग॒न्ध॒र्वो अ॑स्य रश॒नाम॑गृभ्णा॒त्सूरा॒दश्वं॑ वसवो॒ निर॑तष्ट॥

जो मनुष्य विद्वानों के उपदेश से पाई हुई विद्या को ग्रहण कर बिजुली से उत्पन्न हुए कारण से फैले वायु से धारण किये सूर्य से प्रकट हुए शीघ्रगामी अग्नि को प्रयोजन में लाते हैं, वे दरिद्रपन के नाश करनेवाले होते हैं॥२॥

असि॑ य॒मो अस्या॑दि॒त्यो अ॑र्व॒न्नसि॑ त्रि॒तो गुह्ये॑न व्र॒तेन॑। असि॒ सोमे॑न स॒मया॒ विपृ॑क्त आ॒हुस्ते॒ त्रीणि॑ दि॒वि बन्ध॑नानि॥

जो गूढ़ अग्नि पृथिव्यादि पदार्थों में वायु और ओषधियों में प्राप्त है, जिसके पृथिवी, अन्तरिक्ष और सूर्य में बन्धन हैं, उसको सब मनुष्य जानें॥३॥

त्रीणि॑ त आहुर्दि॒वि बन्ध॑नानि॒ त्रीण्य॒प्सु त्रीण्य॒न्तः स॑मु॒द्रे। उ॒तेव॑ मे॒ वरु॑णश्छन्त्स्यर्व॒न्यत्रा॑ त आ॒हुः प॑र॒मं ज॒नित्र॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे अग्नि के कारण, सूक्ष्म और स्थूल रूप हैं, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी के भी हैं, वैसे सब उत्पन्न हुए पदार्थों के तीन स्वरूप हैं। हे विद्वान्! जैसे तुम्हारा विद्या जन्म उत्तम है, वैसा मेरा भी हो॥४॥

इ॒मा ते॑ वाजिन्नव॒मार्ज॑नानी॒मा श॒फानां॑ सनि॒तुर्नि॒धाना॑। अत्रा॑ ते भ॒द्रा र॑श॒ना अ॑पश्यमृ॒तस्य॒ या अ॑भि॒रक्ष॑न्ति गो॒पाः॥

जो मनुष्य अनुक्रम अर्थात् एक के पीछे एक, एक के पीछे एक ऐसे क्रम से समस्त पदार्थों के कारण और संयोग को जानते हैं, वे पदार्थवेत्ता होते हैं॥५॥

आ॒त्मानं॑ ते॒ मन॑सा॒राद॑जानाम॒वो दि॒वा प॒तय॑न्तं पतं॒गम्। शिरो॑ अपश्यं प॒थिभिः॑ सु॒गेभि॑ररे॒णुभि॒र्जेह॑मानं पत॒त्रि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो अपने वा पराये आत्मा के जाननेवाले विज्ञान से उत्पन्न कार्यों की परीक्षा द्वारा कारण गुणों को जानते हैं वे सुख से विद्वान् होते हैं। जो विन ढपे, विन, धूल के संयोग अन्तरिक्ष में अग्नि आदि पदार्थों के योग से विमानादिकों को चलाते हैं, वे दूर देश को भी शीघ्र जाने को योग्य होते हैं॥६॥

अत्रा॑ ते रू॒पमु॑त्त॒मम॑पश्यं॒ जिगी॑षमाणमि॒ष आ प॒दे गोः। य॒दा ते॒ मर्तो॒ अनु॒ भोग॒मान॒ळादिद्ग्रसि॑ष्ठ॒ ओष॑धीरजीगः॥

उद्योगी पुरुष ही को अच्छे-अच्छे पदार्थ भोग प्राप्त होते हैं किन्तु आलस्य करनेवाले को नहीं। जो यत्न के साथ पदार्थविद्या का ग्रहण करते हैं, वे अति उत्तम प्रतिष्ठा को प्राप्त होते हैं॥७॥

अनु॑ त्वा॒ रथो॒ अनु॒ मर्यो॑ अर्व॒न्ननु॒ गावोऽनु॒ भगः॑ क॒नीना॑म्। अनु॒ व्राता॑स॒स्तव॑ स॒ख्यमी॑यु॒रनु॑ दे॒वा म॑मिरे वी॒र्यं॑ ते॥

जैसे अग्नि के अनुकूल विमानादि यानों को मनुष्य प्राप्त होते हैं, वैसे अध्यापक और उपदेशक के अनुकूल विज्ञान को प्राप्त होते हैं। जो विद्वानों को मित्र करते हैं, वे सत्याचरणशील और पराक्रमवान् होते हैं॥८॥

हिर॑ण्यशृ॒ङ्गोऽयो॑ अस्य॒ पादा॒ मनो॑जवा॒ अव॑र॒ इन्द्र॑ आसीत्। दे॒वा इद॑स्य हवि॒रद्य॑माय॒न्यो अर्व॑न्तं प्रथ॒मो अ॒ध्यति॑ष्ठत्॥

इस जगत् में तीन प्रकार का अग्नि है। एक अति सूक्ष्म जो कारण रूप कहाता, दूसरा वह जो सूक्ष्म मूर्त्तिमान् पदार्थों में व्याप्त होनेवाला और तीसरा स्थूल सूर्यादि स्वरूपवाला, जो इसको गुण, कर्म, स्वभाव से जानकर इसका अच्छे प्रकार प्रयोग करते हैं, वे निरन्तर सुखी होते हैं॥९॥

ई॒र्मान्ता॑सः॒ सिलि॑कमध्यमासः॒ सं शूर॑णासो दि॒व्यासो॒ अत्याः॑। हं॒सा इ॑व श्रेणि॒शो य॑तन्ते॒ यदाक्षि॑षुर्दि॒व्यमज्म॒मश्वाः॑॥

जो सिलिकादि यन्त्रों से अर्थात् जिनमें कोठे-दरकोठे कलाओं के होते हैं, उन यन्त्रों से बिजुली आदि उत्पन्न कर और विमान आदि यानों में उनका संप्रयोग कर कार्यसिद्धि को करते हैं, वे मनुष्य बड़ी भारी लक्ष्मी को पाते हैं॥१०॥

तव॒ शरी॑रं पतयि॒ष्ण्व॑र्व॒न्तव॑ चि॒त्तं वात॑ इव॒ ध्रजी॑मान्। तव॒ शृङ्गा॑णि॒ विष्ठि॑ता पुरु॒त्रार॑ण्येषु॒ जर्भु॑राणा चरन्ति॥

जिन्होंने चलाई हुई बिजुली मन के समान जाती वा पर्वतों के शिखरों के समान विमान आदि यान रचे हैं और जो वन की आग के समान अग्नि के घरों में अग्नि जलाकर विमान आदि रथों को चलाते हैं, वे सर्वत्र भूगोल में विचरते हैं॥११॥

उप॒ प्रागा॒च्छस॑नं वा॒ज्यर्वा॑ देव॒द्रीचा॒ मन॑सा॒ दीध्या॑नः। अ॒जः पु॒रो नी॑यते॒ नाभि॑र॒स्यानु॑ प॒श्चात्क॒वयो॑ यन्ति रे॒भाः॥

खैचना वा ताड़ना आदि शिल्पविद्याओं के विना अग्नि पदार्थ कार्यों के सिद्ध करनेवाले नहीं हैं॥१२॥

उप॒ प्रागा॑त्पर॒मं यत्स॒धस्थ॒मर्वाँ॒ अच्छा॑ पि॒तरं॑ मा॒तरं॑ च। अ॒द्या दे॒वाञ्जुष्ट॑तमो॒ हि ग॒म्या अथा शा॑स्ते दा॒शुषे॒ वार्या॑णि॥

जो माता, पिता और आचार्य से शिक्षा पाये प्रशंसित स्थानों के निवासी विद्वानों के सङ्ग की प्रीति रखनेवाले सबके सुख देनेवाले वर्त्तमान हैं, वे यहाँ उत्तम आनन्द को प्राप्त होते हैं॥१३॥इस सूक्त में विद्वान् और बिजुली के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह एकसौ तिरेसठवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒स्य वा॒मस्य॑ पलि॒तस्य॒ होतु॒स्तस्य॒ भ्राता॑ मध्य॒मो अ॒स्त्यश्नः॑। तृ॒तीयो॒ भ्राता॑ घृ॒तपृ॑ष्ठो अ॒स्यात्रा॑पश्यं वि॒श्पतिं॑ स॒प्तपु॑त्रम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। इस जगत् में तीन प्रकार का अग्नि है−एक बिजुलीरूप, दूसरा काष्ठादि में जलता हुआ भूमिस्थ और तीसरा वह है जो कि सूर्यमण्डलस्थ होकर समस्त जगत् की पालना करता है॥१॥

स॒प्त यु॑ञ्जन्ति॒ रथ॒मेक॑चक्र॒मेको॒ अश्वो॑ वहति स॒प्तना॑मा। त्रि॒नाभि॑ च॒क्रम॒जर॑मन॒र्वं यत्रे॒मा विश्वा॒ भुव॒नाधि॑ त॒स्थुः॥

जो लोग बिजुली और जलादि रूप घोड़ों से युक्त विमानादि रथ को बनाय सब लोकों के अधिष्ठान अर्थात् जिसमें सब लोक ठहरते हैं, उस आकाश में गमनाऽगमन सुख से करें, वे समग्र ऐश्वर्य को प्राप्त हों॥२॥

इ॒मं रथ॒मधि॒ ये स॒प्त त॒स्थुः स॒प्तच॑क्रं स॒प्त व॑ह॒न्त्यश्वाः॑। स॒प्त स्वसा॑रो अ॒भि सं न॑वन्ते॒ यत्र॒ गवां॒ निहि॑ता स॒प्त नाम॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो स्वामी अध्यापक अध्येता रचनेवाले नियम कर्त्ता और चलानेवाले अनेक चक्कर और तत्त्वादियुक्त विमानादि यानों को रचने को जानते हैं, वे प्रशंसित होते हैं, जिनमें छेदन वा आकर्षण गुणवाले किरण वर्त्तमान हैं, वहाँ प्राण भी हैं॥३॥

को द॑दर्श प्रथ॒मं जाय॑मानमस्थ॒न्वन्तं॒ यद॑न॒स्था बिभ॑र्ति। भूम्या॒ असु॒रसृ॑गा॒त्मा क्व॑ स्वि॒त्को वि॒द्वांस॒मुप॑ गा॒त्प्रष्टु॑मे॒तत्॥

जब सृष्टि के प्रारम्भ में ईश्वर ने सबके शरीर बनाये तब कोई जीव इनका देखने-वाला न हुआ। जब उनमें जीवात्मा प्रवेश किये तब प्राण आदि वायु, रुधिर आदि धातु और जीव भी मिलकर देह को धारण करते हुए और चेष्टा करते हुए, इत्यादि विषय की प्राप्ति के लिये विद्वान् को कोई ही पूछने को जाता है, किन्तु सब नहीं॥४॥

पाकः॑ पृच्छामि॒ मन॒सावि॑जानन्दे॒वाना॑मे॒ना निहि॑ता प॒दानि॑। व॒त्से ब॒ष्कयेऽधि॑ स॒प्त तन्तू॒न्वि त॑त्रिरे क॒वय॒ ओत॒वा उ॑॥

मनुष्यों को योग्य है कि बाल्यावस्था को लेकर अविदित शास्त्रों को विद्वानों से पढ़कर दूसरों को पढ़ाने से सब विद्याओं को फैलावें॥५॥

अचि॑कित्वाञ्चिकि॒तुष॑श्चि॒दत्र॑ क॒वीन्पृ॑च्छामि वि॒द्मने॒ न वि॒द्वान्। वि यस्त॒स्तम्भ॒ षळि॒मा रजां॑स्य॒जस्य॑ रू॒पे किमपि॑ स्वि॒देक॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे अविद्वान् विद्वानों को पूछ के विद्वान् होते हैं, वैसे विद्वान् भी परम विद्वानों को पूछ कर विद्या की वृद्धि करें॥६॥

इ॒ह ब्र॑वीतु॒ य ई॑म॒ङ्ग वेदा॒स्य वा॒मस्य॒ निहि॑तं प॒दं वेः। शी॒र्ष्णः क्षी॒रं दु॑ह्रते॒ गावो॑ अस्य व॒व्रिं वसा॑ना उद॒कं प॒दापुः॑॥

जैसे पक्षी अन्तरिक्ष में भ्रमते हैं, वैसे ही सब लोक अन्तरिक्ष में भ्रमते हैं। जैसे गौएँ बछड़ों के लिये दूध देकर बढ़ाती हैं, वैसे कारण कार्यों को बढ़ाते हैं वा जैसे वृक्ष जड़ में जल पीकर बढ़ते हैं, वैसे कारण से कार्य बढ़ता है॥७॥

मा॒ता पि॒तर॑मृ॒त आ ब॑भाज धी॒त्यग्रे॒ मन॑सा॒ सं हि ज॒ग्मे। सा बी॑भ॒त्सुर्गर्भ॑रसा॒ निवि॑द्धा॒ नम॑स्वन्त॒ इदु॑पवा॒कमी॑युः॥

यदि सूर्य के विना पृथिवी हो तो अपनी शक्ति से सबको क्यों न धारण करे ? जो पृथिवी न हो तो सूर्य आप ही प्रकाशमान कैसे न हो ? इस कारण इस सृष्टि में अपने-अपने स्वभाव से सब पदार्थ स्वतन्त्र हैं और सापेक्ष व्यवहार में परतन्त्र भी हैं॥८॥

यु॒क्ता मा॒तासी॑द्धु॒रि दक्षि॑णाया॒ अति॑ष्ठ॒द्गर्भो॑ वृज॒नीष्व॒न्तः। अमी॑मेद्व॒त्सो अनु॒ गाम॑पश्यद्विश्वरू॒प्यं॑ त्रि॒षु योज॑नेषु॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे गर्भरूप मेघ चलते हुए बद्दलों में विराजमान है, वैसे सबको मान्य देनेवाली भूमि आकर्षणों में युक्त है। जैसे बछड़ा गौ के पीछे जाता है, वैसे यह भूमि सूर्य का अनुभ्रमण करती है, जिसमें समस्त सुपेद, हरे, पीले, लाल आदि रूप हैं, वही सबका पालन करनेवाली है॥९॥

ति॒स्रो मा॒तॄस्त्रीन्पि॒तॄन्बिभ्र॒देक॑ ऊ॒र्ध्वस्त॑स्थौ॒ नेमव॑ ग्लापयन्ति। म॒न्त्रय॑न्ते दि॒वो अ॒मुष्य॑ पृ॒ष्ठे वि॑श्व॒विदं॒ वाच॒मवि॑श्वमिन्वाम्॥

जो सूत्रात्मा वायु, अग्नि, जल और पृथिवी को धारण करता है उसको अभ्यास से जानके सत्य वाणी का औरों के लिये उपदेश करे॥१०॥

द्वाद॑शारं न॒हि तज्जरा॑य॒ वर्व॑र्ति च॒क्रं परि॒ द्यामृ॒तस्य॑। आ पु॒त्रा अ॑ग्ने मिथु॒नासो॒ अत्र॑ स॒प्त श॒तानि॑ विंश॒तिश्च॑ तस्थुः॥

काल अनन्त अपरिणामी और विभु वर्त्तमान है, न उसकी कभी उत्पत्ति है और न नाश है। इस जगत् के कारण में सात सौ बीस जो तत्त्व हैं, वे मिलके स्थूल ईश्वर के निर्माण किए हुए योग से उत्पन्न हुए हैं, इनका कारण अज और नित्य है, जबतक अलग अलग इन तत्त्वों को प्रत्यक्ष में न जाने तबतक विद्या की वृद्धि के लिये मनुष्य यत्न किया करे॥११॥

पञ्च॑पादं पि॒तरं॒ द्वाद॑शाकृतिं दि॒व आ॑हुः॒ परे॒ अर्धे॑ पुरी॒षिण॑म्। अथे॒मे अ॒न्य उप॑रे विचक्ष॒णं स॒प्तच॑क्रे॒ षळ॑र आहु॒रर्पि॑तम्॥

हे मनुष्यो! तुम इस मन्त्र में काल के अवयव कहने को अभीष्ट हैं जिस विभु एक रस सनातन काल में समस्त जगत् उत्पत्ति, स्थिति, प्रलयान्त लब्ध होता है, उसके सूक्ष्मत्व से उस काल का बोध कठिन है, इससे प्रयत्न से जानो॥१२॥

पञ्चा॑रे च॒क्रे प॑रि॒वर्त॑माने॒ तस्मि॒न्ना त॑स्थु॒र्भुव॑नानि॒ विश्वा॑। तस्य॒ नाक्ष॑स्तप्यते॒ भूरि॑भारः स॒नादे॒व न शी॑र्यते॒ सना॑भिः॥

जैसे यह चक्ररूप कारण, काल, आकाश और दिशात्मक जगत् परमेश्वर में व्याप्त है, वैसे ही काल, आकाश और दिशाओं में कार्यकारणात्मक जगत् व्याप्य है॥१३॥

सने॑मि च॒क्रम॒जरं॒ वि वा॑वृत उत्ता॒नायां॒ दश॑ यु॒क्ता व॑हन्ति। सूर्य॑स्य॒ चक्षू॒ रज॑सै॒त्यावृ॑तं॒ तस्मि॒न्नार्पि॑ता॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑॥

जो विभु, नित्य और सब लोकों का आधार समय वर्त्तमान है, उसी काल की गति से सूर्य आदि लोक प्रकाशित होते हैं, ऐसा सब लोगों को जानना चाहिये॥१४॥

सा॒कं॒जानां॑ स॒प्तथ॑माहुरेक॒जं षळिद्य॒मा ऋष॑यो देव॒जा इति॑। तेषा॑मि॒ष्टानि॒ विहि॑तानि धाम॒शः स्था॒त्रे रे॑जन्ते॒ विकृ॑तानि रूप॒शः॥

जो इस जगत् में पदार्थ हैं वे सब ब्रह्म के निश्चित किये हुए व्यवहार से एक साथ उत्पन्न होते हैं। यहाँ रचना में क्रम की आकाङ्क्षा नहीं है क्योंकि परमेश्वर के सर्वव्यापक और अनन्त सामर्थ्यवाला होने से। इससे वह आप अचलित हुआ सब भुवनों को चलाता है और वह ईश्वर विकाररहित होता हुआ सबको विकारयुक्त करता है। जैसे क्रम से ऋतु वर्त्तमान हैं और अपने अपने चिह्नों को समय समय में उत्पन्न करते हैं, वैसे ही उत्पन्न होते हुए पदार्थ अपने-अपने गुणों को प्राप्त होते हैं॥१५॥

स्त्रियः॑ स॒तीस्ताँ उ॑ मे पुं॒स आ॑हुः॒ पश्य॑दक्ष॒ण्वान्न वि चे॑तद॒न्धः। क॒विर्यः पु॒त्रः स ई॒मा चि॑केत॒ यस्ता वि॑जा॒नात्स पि॒तुष्पि॒तास॑त्॥

जिसको विद्वान् जानते हैं उसको अविद्वान् नहीं जान सकते, जैसे विद्वान् जन पुत्रों को पढ़ाकर विद्वान् करें वैसे विदुषी स्त्रियाँ कन्याओं को विदुषी करें। जो पृथिवी से लेके ईश्वरपर्यन्त पदार्थों के गुण, कर्म, स्वभावों को जान, धर्म्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध करते हैं, वे ज्वान भी बुड्ढों के पिता होते हैं॥१६॥

अ॒वः परे॑ण प॒र ए॒नाव॑रेण प॒दा व॒त्सं बिभ्र॑ती॒ गौरुद॑स्थात्। सा क॒द्रीची॒ कं स्वि॒दर्धं॒ परा॑गा॒त्क्व॑ स्वित्सूते न॒हि यू॒थे अ॒न्तः॥

यह पृथिवी सूर्य से नीचे ऊपर और उत्तर दक्षिण को जाती है। इसकी गति विद्वानों के विना न देखी जाती। इसके परले आधे भाग में सदा अन्धकार और उरले आधे भाग में प्रकाश वर्त्तमान है बीच में सब पदार्थ वर्त्तमान हैं, सो यह पृथिवी माता के तुल्य सबकी रक्षा करती है॥१७॥

अ॒वः परे॑ण पि॒तरं॒ यो अ॑स्यानु॒वेद॑ प॒र ए॒नाव॑रेण। क॒वी॒यमा॑नः॒ क इ॒ह प्र वो॑चद्दे॒वं मनः॒ कुतो॒ अधि॒ प्रजा॑तम्॥

जो मनुष्य बिजुली को लेकर सूर्यपर्यन्त अग्नि को पिता के समान पालनेवाला जानें जिसके पराऽवर भाग में कार्यकारण स्वरूप हैं उसका उपदेश दिव्य अन्तःकरणवाले होकर इस संसार में कहें॥१८॥

ये अ॒र्वाञ्च॒स्ताँ उ॒ परा॑च आहु॒र्ये परा॑ञ्च॒स्ताँ उ॑ अ॒र्वाच॑ आहुः। इन्द्र॑श्च॒ या च॒क्रथुः॑ सोम॒ तानि॑ धु॒रा न यु॒क्ता रज॑सो वहन्ति॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! यहाँ नीचे, ऊपर, परे, उरे, मोटे, सूक्ष्म, छुटाई-बड़ाई के व्यवहार हैं वे सापेक्ष हैं। एक की अपेक्षा से यह इससे ऊँचा जो कहा जाता है, वही दोनों कथनों को प्राप्त होता है। जो इससे परे है वही और से नीचे है, जो इससे मोटा है वह और से सूक्ष्म। जो-जो इससे छोटा है वह और से बड़ा गुरु है यह तुम जानो, यहाँ कोई वस्तु अपेक्षारहित नहीं है और न निराधार ही है॥१९॥

द्वा सु॑प॒र्णा स॒युजा॒ सखा॑या समा॒नं वृ॒क्षं परि॑ षस्वजाते। तयो॑र॒न्यः पिप्प॑लं स्वा॒द्वत्त्यन॑श्नन्न॒न्यो अ॒भि चा॑कशीति॥

इस मन्त्र में रूपकालङ्कार है। जीव, परमात्मा और जगत् का कारण ये तीन पदार्थ अनादि और नित्य हैं। जीव और ईश-परमात्मा यथाक्रम से अल्प अनन्त चेतन विज्ञानवान् सदा विलक्षण व्याप्यव्यापकभाव से संयुक्त और मित्र के समान वर्त्तमान हैं। वैसे ही जिस अव्यक्त परमाणुरूप कारण से कार्य्यरूप जगत् होता है वह भी अनादि और नित्य है। समस्त जीव पाप-पुण्यात्मक कार्यों को करके उनके फलों को भोगते हैं और ईश्वर एक सब ओर से व्याप्त होता हुआ न्याय से पाप-पुण्य के फल को देने से न्यायाधीश के समान देखता है॥२०॥

यत्रा॑ सुप॒र्णा अ॒मृत॑स्य भा॒गमनि॑मेषं वि॒दथा॑भि॒स्वर॑न्ति। इ॒नो विश्व॑स्य॒ भुव॑नस्य गो॒पाः स मा॒ धीरः॒ पाक॒मत्रा वि॑वेश॥

जिस परमात्मा में सवितृमण्डल को आदि लेकर लोकलोकान्तर और द्वीपद्वीपान्तर सब लय हो जाते हैं, तद्विषयक उपदेश से ही साधक जन मोक्ष पाते हैं और किसी तरह से मोक्ष को प्राप्त नहीं हो सकते॥२१॥

यस्मि॑न्वृ॒क्षे म॒ध्वदः॑ सुप॒र्णा नि॑वि॒शन्ते॒ सुव॑ते॒ चाधि॒ विश्वे॑। तस्येदा॑हुः॒ पिप्प॑लं स्वा॒द्वग्रे॒ तन्नोन्न॑श॒द्यः पि॒तरं॒ न वेद॑॥

इस मन्त्र में रूपकालङ्कार है। अनादि अनन्त काल से यह विश्व उत्पन्न होता और नष्ट होता है, जीव उत्पन्न होते और मरते भी जाते हैं, इस संसार में जीवों ने जैसा कर्म किया वैसा ही अवश्य ईश्वर के न्याय से भोग्य है। कर्म, जीव का भी नित्यसम्बन्ध है। जो परमात्मा और उसके गुण, कर्म, स्वभावों के अनुकूल आचरण को न जानकर मनमाने काम करते हैं, वे निरन्तर पीड़ित होते हैं और जो उससे विपरीत हैं, वे सदा आनन्द भोगते हैं॥२२॥

यद्गा॑य॒त्रे अधि॑ गाय॒त्रमाहि॑तं॒ त्रैष्टु॑भाद्वा॒ त्रैष्टु॑भं नि॒रत॑क्षत। यद्वा॒ जग॒ज्जग॒त्याहि॑तं प॒दं य इत्तद्वि॒दुस्ते अ॑मृत॒त्वमा॑नशुः॥

जो सृष्टि के पदार्थ और तत्रस्थ ईश्वरकृत रचना को जानकर परमात्मा का सब ओर से ध्यान कर विद्या और धर्म की उन्नति करते हैं, वे मोक्ष पाते हैं॥२३॥

गा॒य॒त्रेण॒ प्रति॑ मिमीते अ॒र्कम॒र्केण॒ साम॒ त्रैष्टु॑भेन वा॒कम्। वा॒केन॑ वा॒कं द्वि॒पदा॒ चतु॑ष्पदा॒क्षरे॑ण मिमते स॒प्त वाणीः॑॥

जिस जगदीश्वर ने वेदस्थ अक्षर, पद, वाक्य, छन्द, अध्याय आदि बनाये हैं, उसको सब मनुष्य धन्यवाद देवें॥२४॥

जग॑ता॒ सिन्धुं॑ दि॒व्य॑स्तभायद्रथंत॒रे सूर्यं॒ पर्य॑पश्यत्। गा॒य॒त्रस्य॑ स॒मिध॑स्ति॒स्र आ॑हु॒स्ततो॑ म॒ह्ना प्र रि॑रिचे महि॒त्वा॥

जब ईश्वर ने जगत् बनाया तभी नदी और समुद्र आदि बनाये। जैसे सूर्य आकर्षण से भूगोलों को धारण करता है, वैसे सूर्य आदि जगत् को ईश्वर धारण करता है। जो सब जीवों के समस्त पाप पुण्यरूपी कर्म्मों को जानके फलों को देता है, वह ईश्वर सब पदार्थों से बड़ा है॥२५॥

उप॑ ह्वये सु॒दुघां॑ धे॒नुमे॒तां सु॒हस्तो॑ गो॒धुगु॒त दो॑हदेनाम्। श्रेष्ठं॑ स॒वं स॑वि॒ता सा॑विषन्नो॒ऽभी॑द्धो घ॒र्मस्तदु॒ षु प्र वो॑चम्॥

इस मन्त्र में रूपकालङ्कार है। अध्यापक विद्वान् जन पूरी विद्या से भरी हुई वाणी को अच्छे प्रकार देवें। जिससे उत्तम ऐश्वर्य को शिष्य प्राप्त हों। जैसे सविता समस्त जगत् को प्रकाशित करता है, वैसे उपदेशक लोग सब विद्याओं को प्रकाशित करें॥२६॥

हि॒ङ्कृ॒ण्व॒ती व॑सु॒पत्नी॒ वसू॑नां व॒त्समि॒च्छन्ती॒ मन॑सा॒भ्यागा॑त्। दु॒हाम॒श्विभ्यां॒ पयो॑ अ॒घ्न्येयं सा व॑र्धतां मह॒ते सौभ॑गाय॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पृथिवी महान् ऐश्वर्य को बढ़ाती है, वैसे गौएँ अत्यन्त सुख देती हैं, इससे ये गौएँ कभी किसीको मारनी न चाहियें॥२७॥

गौर॑मीमे॒दनु॑ व॒त्सं मि॒षन्तं॑ मू॒र्धानं॒ हिङ्ङ॑कृणो॒न्मात॒वा उ॑। सृक्वा॑णं घ॒र्मम॒भि वा॑वशा॒ना मिमा॑ति मा॒युं पय॑ते॒ पयो॑भिः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे गौओं के पीछे बछड़े और बछड़ों के पीछे गौएँ जातीं वैसे पृथिवियों के पीछे पदार्थ और पदार्थों के पीछे पृथिवी जाती है॥२८॥

अ॒यं स शि॑ङ्क्ते॒ येन॒ गौर॒भीवृ॑ता॒ मिमा॑ति मा॒युं ध्व॒सना॒वधि॑ श्रि॒ता। सा चि॒त्तिभि॒र्नि हि च॒कार॒ मर्त्यं॑ वि॒द्युद्भव॑न्ती॒ प्रति॑ व॒व्रिमौ॑हत॥

जैसे पृथिवी से उत्पन्न हो उठकर अन्तरिक्ष में बढ़ फैल मेघ पृथिवी में वृक्षादि को अच्छे सींच उनको बढ़ाता है, वैसे पृथिवी सबको बढ़ाती है और पृथिवी में जो बिजुली है वह रूप को प्रकाशित करती। जैसे शिल्पी जन क्रम से किसी पदार्थ के इकट्ठा करने और विज्ञान से घर आदि बनाता है, वैसे परमेश्वर ने यह सृष्टि बनाई है॥२९॥

अ॒नच्छ॑ये तु॒रगा॑तु जी॒वमेज॑द्ध्रु॒वं मध्य॒ आ प॒स्त्या॑नाम्। जी॒वो मृ॒तस्य॑ चरति स्व॒धाभि॒रम॑र्त्यो॒ मर्त्ये॑ना॒ सयो॑निः॥

इस मन्त्र में रूपकालङ्कार है। जो चलते हुए पदार्थों में अचल, अनित्य पदार्थों में नित्य और व्याप्य पदार्थों में व्यापक परमेश्वर है, उसकी व्याप्ति के विना सूक्ष्म से सूक्ष्म भी वस्तु नहीं है, इससे सब जीवों को जो यह अन्तर्यामिरूप से स्थित हो रहा है, वह नित्य उपासना करने योग्य है॥३०॥

अप॑श्यं गो॒पामनि॑पद्यमान॒मा च॒ परा॑ च प॒थिभि॒श्चर॑न्तम्। स स॒ध्रीचीः॒ स विषू॑ची॒र्वसा॑न॒ आ व॑रीवर्ति॒ भुव॑नेष्व॒न्तः॥

सबके देखनेवाले परमेश्वर के देखने को जीव समर्थ नहीं और परमेश्वर सबको यथार्थ भाव से देखता है। जैसे वस्त्रों आदि से ढंपा हुआ पदार्थ नहीं देखा जाता वैसे जीव भी सूक्ष्म होने से नहीं देखा जाता। ये जीव कर्मगति से सब लोकों में भ्रमते हैं। इनके भीतर-बाहर परमात्मा स्थित हुआ पापपुण्य के फल देनेरूप न्याय से सबको सर्वत्र जन्म देता है॥३१॥

य ईं॑ च॒कार॒ न सो अ॒स्य वे॑द॒ य ईं॑ द॒दर्श॒ हिरु॒गिन्नु तस्मा॑त्। स मा॒तुर्योना॒ परि॑वीतो अ॒न्तर्ब॑हुप्र॒जा निर्ऋ॑ति॒मा वि॑वेश॥

जो जीव कर्ममात्र करते किन्तु उपासना और ज्ञान को नहीं प्राप्त होते हैं, वे अपने स्वरूप को भी नहीं जानते। और जो कर्म, उपासना और ज्ञान में निपुण हैं, वे अपने स्वरूप और परमात्मा के जानने को योग्य हैं। जीवों के अगले जन्मों का आदि और पीछे अन्त नहीं है। जब शरीर को छोड़ते हैं तब आकाशस्थ हो गर्भ में प्रवेश कर और जन्म पाकर पृथिवी में चेष्टा क्रियावान् होते हैं॥३२॥

द्यौर्मे॑ पि॒ता ज॑नि॒ता नाभि॒रत्र॒ बन्धु॑र्मे मा॒ता पृ॑थि॒वी म॒हीयम्। उ॒त्ता॒नयो॑श्च॒म्वो॒३॒॑र्योनि॑र॒न्तरत्रा॑ पि॒ता दु॑हि॒तुर्गर्भ॒माधा॑त्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। भूमि और सूर्य सबके माता-पिता और बन्धु के समान वर्त्तमान है, यही हमारा निवासस्थान है। जैसे सूर्य अपने से उत्पन्न हुई उषा के बीच किरणरूपी वीर्य को संस्थापन कर दिनरूपी पुत्र को उत्पन्न करता है, वैसे माता-पिता प्रकाशमान पुत्र को उत्पन्न करें॥३३॥

पृ॒च्छामि॑ त्वा॒ पर॒मन्तं॑ पृथि॒व्याः पृ॒च्छामि॒ यत्र॒ भुव॑नस्य॒ नाभिः॑। पृ॒च्छामि॑ त्वा॒ वृष्णो॒ अश्व॑स्य॒ रेतः॑ पृ॒च्छामि॑ वा॒चः प॑र॒मं व्यो॑म॥

इस मन्त्र में चार प्रश्न हैं और उनके उत्तर अगले मन्त्र में वर्त्तमान हैं। ऐसे ही जिज्ञासुओं को विद्वान् जन नित्य पूछने चाहिये॥३४॥

इ॒यं वेदिः॒ परो॒ अन्तः॑ पृथि॒व्या अ॒यं य॒ज्ञो भुव॑नस्य॒ नाभिः॑। अ॒यं सोमो॒ वृष्णो॒ अश्व॑स्य॒ रेतो॑ ब्र॒ह्मायं वा॒चः प॑र॒मं व्यो॑म॥

पिछले मन्त्र में कहे हुए प्रश्नों के यहाँ क्रम से उत्तर जानने चाहिये−पृथिवी के चारों ओर आकाशयुक्त वायु, एक एक ब्रह्माण्ड के बीच सूर्य और बल उत्पन्न करनेवाली ओषधियाँ, तथा पृथिवी के बीच विद्या की अवधि समस्त वेदों का पढ़ना और परमात्मा का उत्तम ज्ञान है, यह निश्चय करना चाहिये॥३५॥

स॒प्तार्ध॑ग॒र्भा भुव॑नस्य॒ रेतो॒ विष्णो॑स्तिष्ठन्ति प्र॒दिशा॒ विध॑र्मणि। ते धी॒तिभि॒र्मन॑सा॒ ते वि॑प॒श्चितः॑ परि॒भुवः॒ परि॑ भवन्ति वि॒श्वतः॑॥

जो महत्तत्त्व, अहङ्कार, पञ्चसूक्ष्मभूत सात पदार्थ हैं वे पञ्चीकरण को प्राप्त हुए सब स्थूल जगत् के कारण हैं। चेतन से विरुद्ध धर्म्मवाले जड़रूप अन्तरिक्ष में सब वसते हैं। जो यथावत् सृष्टिक्रम को जानते हैं वे विद्वान् जन सब ओर से सत्कार को प्राप्त होते हैं और जो इसको नहीं जानते वे सब ओर से तिरस्कार को प्राप्त होते हैं॥३६॥

न वि जा॑नामि॒ यदि॑वे॒दमस्मि॑ नि॒ण्यः संन॑द्धो॒ मन॑सा चरामि। य॒दा माग॑न्प्रथम॒जा ऋ॒तस्यादिद्वा॒चो अ॑श्नुवे भा॒गम॒स्याः॥

अल्पज्ञता और अल्पशक्तिमत्ता के कारण साधनरूप इन्द्रियों के विना जीव सिद्ध करने योग्य वस्तु को नहीं ग्रहण कर सकता, जब श्रोत्रादि इन्द्रियों को प्राप्त होता है तब जानने को योग्य होता है, जबतक विद्या से सत्य पदार्थ को नहीं जानता तबतक अभिमान करता हुआ पशु के समान विचरता है॥३७॥

अपा॒ङ्प्राङे॑ति स्व॒धया॑ गृभी॒तोऽम॑र्त्यो॒ मर्त्ये॑ना॒ सयो॑निः। ता शश्व॑न्ता विषू॒चीना॑ वि॒यन्ता॒ न्य१॒॑न्यं चि॒क्युर्न नि चि॑क्युर॒न्यम्॥

इस जगत् में दो पदार्थ वर्त्तमान हैं एक जड़ दूसरा चेतन। उनमें जड़ और को और अपने रूप को नहीं जानता और चेतन अपने को और दूसरे को जानता है। दोनों अनुत्पन्न अनादि और विनाशरहित वर्त्तमान हैं। जड़ अर्थात् शरीरादि परमाणुओं के संयोग से स्थूलावस्था को प्राप्त हुआ चेतन जीव संयोग वा वियोग से अपने रूप को नहीं छोड़ता किन्तु स्थूल वा सूक्ष्म पदार्थ के संयोग से स्थूल वा सूक्ष्म सा भान होता है परन्तु वह एकतार स्थित जैसा है वैसा ही ठहरता है॥३८॥

ऋ॒चो अ॒क्षरे॑ पर॒मे व्यो॑म॒न्यस्मि॑न्दे॒वा अधि॒ विश्वे॑ निषे॒दुः। यस्तन्न वेद॒ किमृ॒चा क॑रिष्यति॒ य इत्तद्वि॒दुस्त इ॒मे समा॑सते॥

जो सब वेदों का परमप्रमेय पदार्थरूप और वेदों से प्रतिपाद्य ब्रह्म अमर और जीव तथा कार्यकारणरूप जगत् है, इन सभों में से सबका आधार अर्थात् ठहरने का स्थान आकाशवत् परमात्मा व्यापक और जीव तथा कार्य कारणरूप जगत् व्याप्य है, इसीसे सब जीव आदि पदार्थ परमेश्वर में निवास करते हैं। और जो वेदों को पढ़के इस प्रमेय को नहीं जानते, वे वेदों से कुछ भी फल नहीं पाते और जो वेदों को पढ़के जीव, कार्य, कारण और ब्रह्म को गुण, कर्म, स्वभाव से जानते हैं, वे सब धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के सिद्ध होते आनन्द को प्राप्त होते हैं॥३९॥

सू॒य॒व॒साद्भग॑वती॒ हि भू॒या अथो॑ व॒यं भग॑वन्तः स्याम। अ॒द्धि तृण॑मघ्न्ये विश्व॒दानीं॒ पिब॑ शु॒द्धमु॑द॒कमा॒चर॑न्ती॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जबतक माताजन वेदवित् न हों तबतक उनमें सन्तान भी विद्यावान् नहीं होते हैं। जो विदुषी हो स्वयंवर विवाह कर सन्तानों को उत्पन्न कर उनको अच्छी शिक्षा देकर उन्हें विद्वान् करती हैं, वे गौओं के समान समस्त जगत् को आनन्दित करती हैं॥४०॥

गौ॒रीर्मि॑माय सलि॒लानि॒ तक्ष॒त्येक॑पदी द्वि॒पदी॒ सा चतु॑ष्पदी। अ॒ष्टाप॑दी॒ नव॑पदी बभू॒वुषी॑ स॒हस्रा॑क्षरा पर॒मे व्यो॑मन्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो स्त्री समस्त साङ्गोपाङ्ग वेदों को पढ़के पढ़ाती हैं, वे सब मनुष्यों की उन्नति करती हैं॥४१॥

तस्याः॑ समु॒द्रा अधि॒ वि क्ष॑रन्ति॒ तेन॑ जीवन्ति प्र॒दिश॒श्चत॑स्रः। ततः॑ क्षरत्य॒क्षरं॒ तद्विश्व॒मुप॑ जीवति॥

समुद्र के समान आकाश है उसके बीच रत्नों के समान शब्द शब्दों के प्रयोग करनेवाले रत्नों का ग्रहण करनेवाले हैं, उन शब्दों के उपदेश सुनने से सबकी जीविका और सबका आश्रय होता है॥४२॥

श॒क॒मयं॑ धू॒ममा॒राद॑पश्यं विषू॒वता॑ प॒र ए॒नाव॑रेण। उ॒क्षाणं॒ पृश्नि॑मपचन्त वी॒रास्तानि॒ धर्मा॑णि प्रथ॒मान्या॑सन्॥

विद्वान् जन अग्निहोत्रादि यज्ञों से मेघमण्डलस्थ जल को शुद्ध कर सब वस्तुओं को शुद्ध करते हैं इससे ब्रह्मचर्य के अनुष्ठान से सबके शरीर, आत्मा और मन को शुद्ध करावें। सब मनुष्यमात्र समीपस्थ धूम और अग्नि वा और पदार्थ को प्रत्यक्षता से देखते हैं और अगले-पिछले भाव को जाननेवाला विद्वान् तो भूमि से लेके परमेश्वरपर्यन्त वस्तुसमूह को साक्षात् कर सकता है॥४३॥

त्रयः॑ के॒शिन॑ ऋतु॒था वि च॑क्षते संवत्स॒रे व॑पत॒ एक॑ एषाम्। विश्व॒मेको॑ अ॒भि च॑ष्टे॒ शची॑भि॒र्ध्राजि॒रेक॑स्य ददृशे॒ न रू॒पम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! तुम वायु, सूर्य और बिजुली के समान अध्ययन-अध्यापन आदि कार्मों से विद्याओं को बढ़ाओ। जैसे अपने आत्मा का रूप नेत्र से नहीं दीखता वैसे विद्वानों की गति नहीं जानी जाती। जैसे ऋतु संवत्सर को आरम्भ करते हुए समय को विभाग करते हैं, वैसे कर्म्मारम्भ विद्या-अविद्या और धर्म्म-अधर्म्म को पृथक्पृथक् करें॥४४॥

च॒त्वारि॒ वाक्परि॑मिता प॒दानि॒ तानि॑ विदुर्ब्राह्म॒णा ये म॑नी॒षिणः॑। गुहा॒ त्रीणि॒ निहि॑ता॒ नेङ्ग॑यन्ति तु॒रीयं॑ वा॒चो म॑नु॒ष्या॑ वदन्ति॥

विद्वान् और अविद्वानों में इतना ही भेद है कि जो विद्वान् हैं, वे नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात इन चारों को जानते हैं। उनमें से तीन ज्ञान में रहते हैं, चौथे सिद्ध शब्दसमूह को प्रसिद्ध व्यवहार में सब कहते हैं। और जो अविद्वान् हैं वे नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपातों को नहीं जानते किन्तु निपातरूप साधन-ज्ञान-रहित प्रसिद्ध शब्द का प्रयोग करते हैं॥४५॥

इन्द्रं॑ मि॒त्रं वरु॑णम॒ग्निमा॑हु॒रथो॑ दि॒व्यः स सु॑प॒र्णो ग॒रुत्मा॑न्। एकं॒ सद्विप्रा॑ बहु॒धा व॑दन्त्य॒ग्निं य॒मं मा॑त॒रिश्वा॑नमाहुः॥

जैसे अग्न्यादि पदार्थों के इन्द्र आदि नाम हैं वैसे एक परमात्मा के अग्नि आदि सहस्रों नाम वर्त्तमान हैं। जितने परमेश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव हैं उतने ही इस परमात्मा के नाम हैं, यह जानना चाहिये॥४६॥

कृ॒ष्णं नि॒यानं॒ हर॑यः सुप॒र्णा अ॒पो वसा॑ना॒ दिव॒मुत्प॑तन्ति। त आव॑वृत्र॒न्त्सद॑नादृ॒तस्यादिद्घृ॒तेन॑ पृथि॒वी व्यु॑द्यते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अच्छे सीखे हुए घोड़े रथों को शीघ्र पहुँचाते हैं, वैसे अग्नि आदि पदार्थ विमान रथ को आकाश में पहुँचाते हैं, जैसे सूर्य की किरणें भूमितल से जल को खींच और वर्षा कर समस्त वृक्ष आदि को आर्द्र करती हैं, वैसे विद्वान् जन सब मनुष्यों को आनन्दित करते हैं॥४७॥

द्वाद॑श प्र॒धय॑श्च॒क्रमेकं॒ त्रीणि॒ नभ्या॑नि॒ क उ॒ तच्चि॑केत। तस्मि॑न्त्सा॒कं त्रि॑श॒ता न श॒ङ्कवो॑ऽर्पि॒ताः ष॒ष्टिर्न च॑लाच॒लासः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। कोई ही विद्वान् जैसे शरीर-रचना को जानते हैं वैसे विमान आदि यानों को बनाना जानते हैं। जब जल, स्थल और आकाश में शीघ्र जानेके लिये रथों को बनाने की इच्छा होती है तब उनमें अनेक जल अग्नि के चक्कर, अनेक बन्धन, अनेक धारण और कीलें रचनी चाहियें, ऐसा करने से चाही हुई सिद्धि होती है॥४८॥

यस्ते॒ स्तनः॑ शश॒यो यो म॑यो॒भूर्येन॒ विश्वा॒ पुष्य॑सि॒ वार्या॑णि। यो र॑त्न॒धा व॑सु॒विद्यः सु॒दत्रः॒ सर॑स्वति॒ तमि॒ह धात॑वे कः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे माता अपने स्तन के दूध से सन्तान की रक्षा करती है, वैसे विदुषी स्त्री सब कुटुम्ब की रक्षा करती है, जैसे सुन्दर घृतान्न पदार्थों के भोजन करने से शरीर बलवान् होता है, वैसे माता की सुशिक्षा को पाकर आत्मा पुष्ट होता है॥४९॥

य॒ज्ञेन॑ य॒ज्ञम॑यजन्त दे॒वास्तानि॒ धर्मा॑णि प्रथ॒मान्या॑सन्। ते ह॒ नाकं॑ महि॒मानः॑ सचन्त॒ यत्र॒ पूर्वे॑ सा॒ध्याः सन्ति॑ दे॒वाः॥

जो लोग प्रथमावस्था में ब्रह्मचर्य से उत्तम उत्तम शिक्षा आदि सेवन करने योग्य कामों को प्रथम करते हैं, वे आप्त अर्थात् विद्यादि गुण, धर्म्मादि कार्यों को साक्षात् किये हुए जो विद्वान्, उनके समान विद्वान् होकर विद्यानन्द को प्राप्त होकर सर्वत्र सत्कार को प्राप्त होते हैं॥५०॥

स॒मा॒नमे॒तदु॑द॒कमुच्चैत्यव॒ चाह॑भिः। भूमिं॑ प॒र्जन्या॒ जिन्व॑न्ति॒ दिवं॑ जिन्वन्त्य॒ग्नयः॑॥

ब्रह्मचर्य आदि अनुष्ठानों में किये हुए हवन आदि से पवन और वर्षा जल की शुद्धि होती है उससे शुद्ध जल वर्षने से भूमि पर उत्पन्न हुए जीव वे तृप्त होते हैं। इससे विद्वानों का पूर्वोक्त ब्रह्मचर्यादि कर्म जल के समान है जैसे ऊपर जाता और नीचे आता वैसे अग्निहोत्रादि से पदार्थ का ऊपर जाना और नीचे आना है॥५१॥

दि॒व्यं सु॑प॒र्णं वा॑य॒सं बृ॒हन्त॑म॒पां गर्भं॑ दर्श॒तमोष॑धीनाम्। अ॒भी॒प॒तो वृ॒ष्टिभि॑स्त॒र्पय॑न्तं॒ सर॑स्वन्त॒मव॑से जोहवीमि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्यलोक भूगोल के बीच स्थित हुआ सबको प्रकाशित करता है, वैसे ही विद्वान् जन सब लोकों के मध्य स्थिर होता हुआ सबके आत्माओं को प्रकाशित करता है। जैसे सूर्य वर्षा से सबको सुखी करता है, वैसे ही विद्वान् विद्या उत्तम शिक्षा और उपदेशवृष्टियों से सब जनों को आनन्दित करता है॥५२॥इस सूक्त में अग्नि, काल, सूर्य, विमान आदि पदार्थ तथा ईश्वर, विद्वान् और स्त्री आदि के गुण वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह एकसौ चौंसठवाँ सूक्त और तेईसवाँ वर्ग और बाईसवाँ अनुवाक पूरा हुआ॥

सूक्तम्

कया॑ शु॒भा सव॑यसः॒ सनी॑ळाः समा॒न्या म॒रुतः॒ सं मि॑मिक्षुः। कया॑ म॒ती कुत॒ एता॑स ए॒तेऽर्च॑न्ति॒ शुष्मं॒ वृष॑णो वसू॒या॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। (प्रश्न) जैसे पवन वर्षा कर सबको तृप्त करते हैं, वैसे विद्वान् जन भी रागद्वेषरहित धर्मयुक्त किस क्रिया से जनों की उन्नति करावें और किस विज्ञान वा अच्छी क्रिया से सबका सत्कार करें। इस विषय में उत्तर यही है कि आप्त सज्जनों की रीति और वेदोक्त क्रिया से उक्त कार्य करें॥१॥

कस्य॒ ब्रह्मा॑णि जुजुषु॒र्युवा॑नः॒ को अ॑ध्व॒रे म॒रुत॒ आ व॑वर्त। श्ये॒नाँ इ॑व॒ ध्रज॑तो अ॒न्तरि॑क्षे॒ केन॑ म॒हा मन॑सा रीरमाम॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे वायु संसारस्थ पदार्थों को सेवन करते हैं, वैसे ब्रह्मचर्य और विद्या के बोध से परम श्री को सेवें। जैसे अन्तरिक्ष में उड़ते हुए श्येनादि पक्षियों को देखते हैं, वैसे ही भूगोल के साथ हम लोग आकाश में रमें और सबको रमावें, इसको विद्वान् ही जान सकते हैं॥२॥

कुत॒स्त्वमि॑न्द्र॒ माहि॑नः॒ सन्नेको॑ यासि सत्पते॒ किं त॑ इ॒त्था। सं पृ॑च्छसे समरा॒णः शु॑भा॒नैर्वो॒चेस्तन्नो॑ हरिवो॒ यत्ते॑ अ॒स्मे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य एकाएकी सबको खींचके आप प्रकाशमान होता है वा जैसे आप्त विद्वान् सर्वत्र भ्रमण करता हुआ सबको सत्य पालनेवाले करता है, वैसे तू कहाँ जाता है ? कहाँ से आता है ? क्या करता है ? यह पूछता हूँ, उत्तर कह। धर्मयुक्त मार्गों को जाता हूँ। गुरुकुल से आता हूँ। पढ़ाना वा उपदेश करता हूँ। यह समाधान है॥३॥

ब्रह्मा॑णि मे म॒तयः॒ शं सु॒तासः॒ शुष्म॑ इयर्ति॒ प्रभृ॑तो मे॒ अद्रिः॑। आ शा॑सते॒ प्रति॑ हर्यन्त्यु॒क्थेमा हरी॑ वहत॒स्ता नो॒ अच्छ॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो उदार हैं वे मेघ के समान सबके लिये समान सुखों को वर्षाते हैं, सबके लिये विद्यादान की कामना करते हैं। जैसे अपने को सुख की इच्छा करते हैं वैसे औरों को सुख करने और दुःखों का विनाश करने को सब चाहैं॥४॥

अतो॑ व॒यम॑न्त॒मेभि॑र्युजा॒नाः स्वक्ष॑त्रेभिस्त॒न्वः१॒॑ शुम्भ॑मानाः। महो॑भि॒रेताँ॒ उप॑ युज्महे॒ न्विन्द्र॑ स्व॒धामनु॒ हि नो॑ ब॒भूथ॑॥

जो शरीर से बल और आरोग्ययुक्त धार्मिक बलिष्ठ विद्वानों से सब कामों का समाधान करते हुए सबके सुख के लिये वर्त्तमान अत्यन्त राज्य के न्याय के लिये उपयोग करते हैं, वे शीघ्र धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि को प्राप्त होते हैं॥५॥

क्व१॒॑ स्या वो॑ मरुतः स्व॒धासी॒द्यन्मामेकं॑ स॒मध॑त्ताहि॒हत्ये॑। अ॒हं ह्यु१॒॑ग्रस्त॑वि॒षस्तुवि॑ष्मा॒न्विश्व॑स्य॒ शत्रो॒रन॑मं वध॒स्नैः॥

जो मनुष्य विद्याओं को धारण कर सूर्य जैसे मेघ को वैसे शत्रु बल को निवृत्त करें, वे सब विद्वान् के प्रति पूछें कि जो सबको धारण करनेवाली शक्ति है, वह कहाँ है ? सर्वत्र स्थित है, यह उत्तर है॥६॥

भूरि॑ चकर्थ॒ युज्ये॑भिर॒स्मे स॑मा॒नेभि॑र्वृषभ॒ पौंस्ये॑भिः। भूरी॑णि॒ हि कृ॒णवा॑मा शवि॒ष्ठेन्द्र॒ क्रत्वा॑ मरुतो॒ यद्वशा॑म॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे इस संसार में विद्वान् जन पुरुषार्थ से सबको विद्या और उत्तम शिक्षा से युक्त करते हैं, वैसे इनको सब सत्कारयुक्त करें। जो सब विद्याओं के पढ़ाने और सबके सुख को चाहनेवाले हों, वे पढ़ाने और उपदेश करने में प्रधान हों॥७॥

वधीं॑ वृ॒त्रं म॑रुत इन्द्रि॒येण॒ स्वेन॒ भामे॑न तवि॒षो ब॑भू॒वान्। अ॒हमे॒ता मन॑वे वि॒श्वश्च॑न्द्राः सु॒गा अ॒पश्च॑कर॒ वज्र॑बाहुः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य से प्रेरित वर्षा से समस्त जगत् जीवता है, वैसे शत्रुओं से होते हुए विघ्नों को निवारने से सब प्राणी जीवते हैं॥८॥

अनु॑त्त॒मा ते॑ मघव॒न्नकि॒र्नु न त्वावाँ॑ अस्ति दे॒वता॒ विदा॑नः। न जाय॑मानो॒ नश॑ते॒ न जा॒तो यानि॑ करि॒ष्या कृ॑णु॒हि प्र॑वृद्ध॥

जैसे अन्तर्यामी ईश्वर से अव्याप्त कुछ भी नहीं विद्यमान है, न कोई उसके सदृश उत्पन्न होता न उत्पन्न हुआ और न होगा न वह नष्ट होता है किन्तु ईश्वरभाव से अपने कर्त्तव्य कामों को करता है, वैसे ही विद्वानों को होना और जानना चाहिये॥९॥

एक॑स्य चिन्मे वि॒भ्व१॒॑स्त्वोजो॒ या नु द॑धृ॒ष्वान्कृ॒णवै॑ मनी॒षा। अ॒हं ह्यु१॒॑ग्रो म॑रुतो॒ विदा॑नो॒ यानि॒ च्यव॒मिन्द्र॒ इदी॑श एषाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जगदीश्वर अनन्त पराक्रमी और व्यापक है, वैसे विद्वान् जन समस्त शास्त्र और धर्मकृत्यों में व्याप्त होवें और न्यायाधीश होकर इन मनुष्यादि के सुखों को संपादन करें॥१०॥

अम॑न्दन्मा मरुतः॒ स्तोमो॒ अत्र॒ यन्मे॑ नरः॒ श्रुत्यं॒ ब्रह्म॑ च॒क्र। इन्द्रा॑य॒ वृष्णे॒ सुम॑खाय॒ मह्यं॒ सख्ये॒ सखा॑यस्त॒न्वे॑ त॒नूभिः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वान् जन जैसे पढ़े और शब्दार्थ सम्बन्ध से जाने हुए वेद पढ़नेवाले के आत्मा को सुख देते हैं, वैसे ही औरों को भी सुखी करेंगे, ऐसा मान के वे अध्यापक शिष्य को पढ़ावें। जैसे आप ब्रह्मचर्य से रोगरहित बलवान् होकर दीर्घजीवी हों, वैसे औरों को भी करें॥११॥

ए॒वेदे॒ते प्रति॑ मा॒ रोच॑माना॒ अने॑द्यः॒ श्रव॒ एषो॒ दधा॑नाः। सं॒चक्ष्या॑ मरुतश्च॒न्द्रव॑र्णा॒ अच्छा॑न्त मे छ॒दया॑था च नू॒नम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो स्त्री-पुरुषों को विद्याओं में प्रकाशित और उन्हें प्रशंसित गुण, कर्म, स्वभाववाले कर धर्मयुक्त व्यवहारों में लगाते हैं, वे सबके सुभूषित करनेवाले हों॥१२॥

को न्वत्र॑ मरुतो मामहे वः॒ प्र या॑तन॒ सखीँ॒रच्छा॑ सखायः। मन्मा॑नि चित्रा अपिवा॒तय॑न्त ए॒षां भू॑त॒ नवे॑दा म ऋ॒ताना॑म्॥

मनुष्य सबमें मित्र हो और उनको विद्या पहुँचाकर सबको धर्मयुक्त पुरुषार्थ में संयुक्त करें। जिससे ये सर्वत्र सत्कारयुक्त हों और आप सत्य-असत्य जान औरों को उपदेश दें॥१३॥

आ यद्दु॑व॒स्याद्दु॒वसे॒ न का॒रुर॒स्माञ्च॒क्रे मा॒न्यस्य॑ मे॒धा। ओ षु व॑र्त्त मरुतो॒ विप्र॒मच्छे॒मा ब्रह्मा॑णि जरि॒ता वो॑ अर्चत्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे शिल्पीजन शिल्पविद्या से सिद्ध की हुई वस्तुओं का सेवन करते हैं, वैसे वेदार्थ और वेदज्ञान सबको सेवने चाहिये, जिस कारण वेदविद्या के विना अतीव सत्कार करने योग्य विद्वान् नहीं होता॥१४॥

ए॒ष वः॒ स्तोमो॑ मरुत इ॒यं गीर्मा॑न्दा॒र्यस्य॑ मा॒न्यस्य॑ का॒रोः। एषा या॑सीष्ट त॒न्वे॑ व॒यां वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥

जो आप्त, शास्त्रज्ञ, धर्मात्मा, पुरुषार्थी, विद्वान् पुरुषों की उत्तेजना से विद्या और शिक्षा को प्राप्त होकर धर्मयुक्त व्यवहार का आचरण करते हैं, उनके जन्म की सफलता है यह जानना चाहिये॥१५॥इस सूक्त में विद्वानों के गुणों के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह एकसौ पैंसठवाँ सूक्त और छब्बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥इस अध्याय में वसु रुद्रादिकों के अर्थों का प्रतिपादन होने से इस अध्याय में कहे हुए अर्थों की पिछले अध्याय में कहे अर्थों के साथ सङ्गति वर्त्तमान है, यह जानना चाहिये॥इति श्रीयुत परमहंसपरिव्राजकाचार्य्याणां परमविदुषां श्रीमद्विरजानन्दसरस्वतीस्वामिनां शिष्येण श्रीपरमहंसपरिव्राजकाचार्येण श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिना निर्मिते संस्कृतार्यभाषाभ्यां सुभूषिते सुप्रमाणयुक्त ऋग्वेदभाष्ये द्वितीयाष्टके तृतीयोऽध्यायः समाप्तः॥

तन्नु वो॑चाम रभ॒साय॒ जन्म॑ने॒ पूर्वं॑ महि॒त्वं वृ॑ष॒भस्य॑ के॒तवे॑। ऐ॒धेव॒ याम॑न्मरुतस्तुविष्वणो यु॒धेव॑ शक्रास्तवि॒षाणि॑ कर्तन॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। विद्वान् जन जिज्ञासु जनों के प्रति वर्त्तमान जन्म और पूर्व जन्मों के सञ्चित कर्मों के निमित्त ज्ञान को उनके कार्यों को देख कर उपदेश करें। और जैसे मनुष्यों के ब्रह्मचर्य और जितेन्द्रियत्वादि गुणों से शरीर और आत्मबल पूरे हों, वैसे करें॥१॥

नित्यं॒ न सू॒नुं मधु॒ बिभ्र॑त॒ उप॒ क्रीळ॑न्ति क्री॒ळा वि॒दथे॑षु॒ घृष्व॑यः। नक्ष॑न्ति रु॒द्रा अव॑सा नम॒स्विनं॒ न म॑र्धन्ति॒ स्वत॑वसो हवि॒ष्कृत॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सबके उपकार में प्राण के समान तृप्ति करने में जल अन्न के समान और आनन्द में सुन्दर लक्षणोंवाली विदुषी के पुत्र के समान वर्त्तमान हैं, वे श्रेष्ठों को बढ़ा और दुष्टों को नमा सकते हैं अर्थात् श्रेष्ठों को उन्नति दे सकते और दुष्टों को नम्र कर सकते हैं॥२॥

यस्मा॒ ऊमा॑सो अ॒मृता॒ अरा॑सत रा॒यस्पोषं॑ च ह॒विषा॑ ददा॒शुषे॑। उ॒क्षन्त्य॑स्मै म॒रुतो॑ हि॒ता इ॑व पु॒रू रजां॑सि॒ पय॑सा मयो॒भुवः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को वायु के समान सबके सुखों को अच्छे प्रकार विद्या और सत्योपदेश से जल से वृक्षों के समान सींचकर मनुष्यों की वृद्धि करनी चाहिये॥३॥

आ ये रजां॑सि॒ तवि॑षीभि॒रव्य॑त॒ प्र व॒ एवा॑सः॒ स्वय॑तासो अध्रजन्। भय॑न्ते॒ विश्वा॒ भुव॑नानि ह॒र्म्या चि॒त्रो वो॒ यामः॒ प्रय॑तास्वृ॒ष्टिषु॑॥

विद्वान् जन निज शास्त्रीय अद्भुत बल से रथादि बना के नियत वृत्तियों में जा आकर सत्य विद्या पढ़ाने और उनके उपदेशों से सब मनुष्यों को पाल के असत्य विद्या के उपदेशों को निवृत्त करें॥४॥

यत्त्वे॒षया॑मा न॒दय॑न्त॒ पर्व॑तान्दि॒वो वा॑ पृ॒ष्ठं नर्या॒ अचु॑च्यवुः। विश्वो॑ वो॒ अज्म॑न्भयते॒ वन॒स्पती॑ रथी॒यन्ती॑व॒ प्र जि॑हीत॒ ओष॑धिः॥

अन्तरिक्ष के मार्गों में विद्वानों के प्रयोग किये हुए आकाशगामी यानों के अत्यन्त वेग से कभी मेघों के तितर-वितर जाने का सम्भव और पृथिवी के कम्पन से वृक्ष वनस्पति के कम्पने का सम्भव होता है॥५॥

यू॒यं न॑ उग्रा मरुतः सुचे॒तुनारि॑ष्टग्रामाः सुम॒तिं पि॑पर्तन। यत्रा॑ वो दि॒द्युद्रद॑ति॒ क्रिवि॑र्दती रि॒णाति॑ प॒श्वः सुधि॑तेव ब॒र्हणा॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। शिल्पव्यवहार से सिद्ध की बिजुलीरूप आग घोड़े आदि पशुओं के समान कार्य सिद्ध करनेवाली होती है, उसकी क्रिया को जाननेवाले विद्वान् अन्य जनों को भी उस विद्युद्विद्या से कुशल करें॥६॥

प्र स्क॒म्भदे॑ष्णा अनव॒भ्ररा॑धसोऽलातृ॒णासो॑ वि॒दथे॑षु॒ सुष्टु॑ताः। अर्च॑न्त्य॒र्कं म॑दि॒रस्य॑ पी॒तये॑ वि॒दुर्वी॒रस्य॑ प्रथ॒मानि॒ पौंस्या॑॥

जो यथायोग्य आहार-विहार करने, शूरजनों से प्रीति रखनेवाले अपनी सेना के बलों को बढ़ाते हैं, वे शत्रुरहित असङ्ख्य धनयुक्त बहुत दान देनेवाले और प्रशंसा को प्राप्त होते हैं॥७॥

श॒तभु॑जिभि॒स्तम॒भिह्रु॑तेर॒घात्पू॒र्भी र॑क्षता मरुतो॒ यमाव॑त। जनं॒ यमु॑ग्रास्तवसो विरप्शिनः पा॒थना॒ शंसा॒त्तन॑यस्य पु॒ष्टिषु॑॥

जो मनुष्य युक्त आहार-विहार, उत्तम शिक्षा, ब्रह्मचर्य और विद्यादि गुणों से अपने सन्तानों को पुष्टियुक्त, सत्य की प्रशंसा करनेवाले और पाप से अलग रहनेवाले करते और प्राण के समान प्रजा को आनन्दित करते हैं, वे अनन्त सुखभोक्ता होते हैं॥८॥

विश्वा॑नि भ॒द्रा म॑रुतो॒ रथे॑षु वो मिथ॒स्पृध्ये॑व तवि॒षाण्याहि॑ता। अंसे॒ष्वा वः॒ प्रप॑थेषु खा॒दयोऽक्षो॑ वश्च॒क्रा स॒मया॒ वि वा॑वृते॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो आप बलवान्, कल्याण के आचरण करनेवाले, सुमार्गगामी, परिपूर्ण धन सेनादि सहित हैं, वे प्रत्यक्ष शत्रुओं को जीत सकते हैं॥९॥

भूरी॑णि भ॒द्रा नर्ये॑षु बा॒हुषु॒ वक्ष॑स्सु रु॒क्मा र॑भ॒सासो॑ अ॒ञ्जयः॑। अंसे॒ष्वेताः॑ प॒विषु॑ क्षु॒रा अधि॒ वयो॒ न प॒क्षान्व्यनु॒ श्रियो॑ धिरे॥

जो ब्रह्मचर्य से विद्याओं को प्राप्त हुए, गृहाश्रम में आभूषणों को धारण किये पुरुषार्थयुक्त परोपकारी, वानप्रस्थाश्रम में वैराग्य को प्राप्त पढ़ाने में रमे हुए और संन्यास आश्रम में प्राप्त हुआ यथार्थभाव जिनको और परोपकारी सर्वत्र विचरते सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग कराते हुए समस्त मनुष्यों को बढ़ाते हैं, वे मोक्ष को प्राप्त होते हैं॥१०॥

म॒हान्तो॑ म॒ह्ना वि॒भ्वो॒३॒॑ विभू॑तयो दूरे॒दृशो॒ ये दि॒व्या इ॑व॒ स्तृभिः॑। म॒न्द्राः सु॑जि॒ह्वाः स्वरि॑तार आ॒सभिः॒ सम्मि॑श्ला॒ इन्द्रे॑ म॒रुतः॑ परि॒ष्टुभः॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पवन समस्त मूर्त्तिमान् पदार्थों को धारण करनेवाले बिजुली के संयोग से प्रकाशक और सर्वत्र व्याप्त है, वैसे विद्वान् जन मूर्त्तिमान् द्रव्यों की विद्या के उपदेष्टा विद्या और विद्यार्थियों के संयोग के विशेष ज्ञान को देनेवाले सकल विद्या और शुभ आचरणों में व्याप्त होते हुए मनुष्यों में उत्तम होते हैं॥११॥

तद्वः॑ सुजाता मरुतो महित्व॒नं दी॒र्घं वो॑ दा॒त्रमदि॑तेरिव व्र॒तम्। इन्द्र॑श्च॒न त्यज॑सा॒ वि ह्रु॑णाति॒ तज्जना॑य॒ यस्मै॑ सु॒कृते॒ अरा॑ध्वम्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिनकी प्राण के तुल्य महिमा, विस्तारयुक्त विद्या का दान, आकाशवत् शान्तियुक्त शील और बिजुली के समान दुष्टाचरण का त्याग है, वे सबको सुख देने को योग्य हैं॥१२॥

तद्वो॑ जामि॒त्वं म॑रुतः॒ परे॑ यु॒गे पु॒रू यच्छंस॑ममृतास॒ आव॑त। अ॒या धि॒या मन॑वे श्रु॒ष्टिमाव्या॑ सा॒कं नरो॑ दं॒सनै॒रा चि॑कित्रिरे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे वायु इस सृष्टि में और वर्त्तमान प्रलय में वर्त्तमान हैं, वैसे नित्य जीव हैं तथा जैसे वायु जड़ वस्तु को भी नीचे ऊपर पहुँचाते हैं, वैसे जीव भी कर्मों के साथ पिछले, बीच के और अगले समय में समय और अपने कर्मों के अनुसार चक्कर खाते फिरते हैं॥१३॥

येन॑ दी॒र्घं म॑रुतः शू॒शवा॑म यु॒ष्माके॑न॒ परी॑णसा तुरासः। आ यत्त॒तन॑न्वृ॒जने॒ जना॑स ए॒भिर्य॒ज्ञेभि॒स्तद॒भीष्टि॑मश्याम्॥

जिनके सहाय से मनुष्य बहुत विद्या, धन और बलवाले हों, उनकी नित्य वृद्धि करें, विद्वान् जन जैसे धर्म का आचरण करें, वैसा ही और भी जन करें॥१४॥

ए॒ष वः॒ स्तोमो॑ मरुत इ॒यं गीर्मा॑न्दा॒र्यस्य॑ मा॒न्यस्य॑ का॒रोः। एषा या॑सीष्ट त॒न्वे॑ व॒यां वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥

मनुष्यों को विद्वानों की स्तुति कर, शास्त्रज्ञ धर्मात्माओं की वाणी सुन, शरीर और आत्मा के बल को बढ़ा दीर्घजीवन प्राप्त करना चाहिये॥१५॥इस सूक्त में मरुच्छब्दार्थ से विद्वानों के गुण का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह एकसौ छियासठवाँ सूक्त और तीसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

स॒हस्रं॑ त इन्द्रो॒तयो॑ नः स॒हस्र॒मिषो॑ हरिवो गू॒र्तत॑माः। स॒हस्रं॒ रायो॑ माद॒यध्यै॑ सह॒स्रिण॒ उप॑ नो यन्तु॒ वाजाः॑॥

मनुष्यों को जो भाग्यशालियों को सर्वोत्तम सामग्री से और यथायोग्य क्रिया से असंख्य सुख होते हैं, वे हमारे हों, ऐसा मानकर निरन्तर प्रयत्न करना चाहिये॥१॥

आ नोऽवो॑भिर्म॒रुतो॑ या॒न्त्वच्छा॒ ज्येष्ठे॑भिर्वा बृ॒हद्दि॑वैः सुमा॒याः। अध॒ यदे॑षां नि॒युतः॑ पर॒माः स॑मु॒द्रस्य॑ चिद्ध॒नय॑न्त पा॒रे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो अतीव बड़ी नौकाओं से पवन के समान वेग से व्यवहारसिद्धि के लिये समुद्र के वार-पार जा-आ के धन की उन्नति करते हैं, वे अतुल सुख को प्राप्त होते हैं॥२॥

मि॒म्यक्ष॒ येषु॒ सुधि॑ता घृ॒ताची॒ हिर॑ण्यनिर्णि॒गुप॑रा॒ न ऋ॒ष्टिः। गुहा॒ चर॑न्ती॒ मनु॑षो॒ न योषा॑ स॒भाव॑ती विद॒थ्ये॑व॒ सं वाक्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो मनुष्य सत्य-असत्य के निर्णय के लिये सब शुभ, गुण, कर्म स्वभाववाली विद्या सुशिक्षायुक्त शास्त्रज्ञ धर्मात्मा विद्वानों की वाणी को प्राप्त होते हैं, वे बहुत ऐश्वर्यवान् होते हुए दिशाओं में सुन्दर कीर्त्ति को प्राप्त होते हैं॥३॥

परा॑ शु॒भ्रा अ॒यासो॑ य॒व्या सा॑धार॒ण्येव॑ म॒रुतो॑ मिमिक्षुः। न रो॑द॒सी अप॑ नुदन्त घो॒रा जु॒षन्त॒ वृधं॑ स॒ख्याय॑ दे॒वाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे वायु और बिजुली के योग से उत्पन्न हुई वर्षा अनेक ओषधियों को उत्पन्न कर सब प्राणियों को जीवन देकर दुःखों को दूर करती है वा जैसे उत्तम पतिव्रता स्त्री पति को आनन्दित करती है, वैसे ही विद्वान् जन विद्या और उत्तम शिक्षा की वर्षा से और धर्म के सेवन से सब मनुष्यों को आह्लादित करें॥४॥

जोष॒द्यदी॑मसु॒र्या॑ स॒चध्यै॒ विषि॑तस्तुका रोद॒सी नृ॒मणाः॑। आ सू॒र्येव॑ विध॒तो रथं॑ गात्त्वे॒षप्र॑तीका॒ नभ॑सो॒ नेत्या॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे अग्नि बिजुलीरूप से सबको सब प्रकार से व्याप्त होकर प्रकाशित करती है, वैसे सब विद्या उत्तम शिक्षाओं को पाकर स्त्री समग्र कुल को प्रशंसित करती है॥५॥

आस्था॑पयन्त युव॒तिं युवा॑नः शु॒भे निमि॑श्लां वि॒दथे॑षु प॒ज्राम्। अ॒र्को यद्वो॑ मरुतो ह॒विष्मा॒न्गाय॑द्गा॒थं सु॒तसो॑मो दुव॒स्यन्॥

सब राजपुरुषादिकों को अत्यन्त योग्य है कि अपने कन्या और पुत्रों को दीर्घ ब्रह्मचर्य में संस्थापित कर विद्या और उत्तम शिक्षा उनको ग्रहण करा पूर्ण विद्यावाले परस्पर प्रसन्न पुत्र कन्याओं का स्वयंवर विवाह करावें, जिससे जब तक जीवन रहे, तब तक आनन्दित रहें॥६॥

प्र तं वि॑वक्मि॒ वक्म्यो॒ य ए॑षां म॒रुतां॑ महि॒मा स॒त्यो अस्ति॑। सचा॒ यदीं॒ वृष॑मणा अहं॒युः स्थि॒रा चि॒ज्जनी॒र्वह॑ते सुभा॒गाः॥

मनुष्यों का यही बड़प्पन है जो दीर्घ ब्रह्मचर्य से कुमार और कुमारी शरीर और आत्मा के पूर्ण बल के लिये विद्या और उत्तम शिक्षा को ग्रहण कर चिरञ्जीवी दृढ़ जिनके शरीर और मन ऐसे भाग्यशाली सन्तानों को उत्पन्न कर उनको प्रशंसित करना॥७॥

पान्ति॑ मि॒त्रावरु॑णावव॒द्याच्चय॑त ईमर्य॒मो अप्र॑शस्तान्। उ॒त च्य॑वन्ते॒ अच्यु॑ता ध्रु॒वाणि॑ ववृ॒ध ईं॑ मरुतो॒ दाति॑वारः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य विद्या, धर्म और उत्तम शिक्षा के देने से अज्ञानियों को अधर्म से निवृत्त कर ध्रुव शुभ गुण और कर्मों को प्राप्त कराते हैं, वे सुख से अलग नहीं होते॥८॥

न॒ही नु वो॑ मरुतो॒ अन्त्य॒स्मे आ॒रात्ता॑च्चि॒च्छव॑सो॒ अन्त॑मा॒पुः। ते धृ॒ष्णुना॒ शव॑सा शूशु॒वांसोऽर्णो॒ न द्वेषो॑ धृष॒ता परि॑ ष्ठुः॥

यदि हम लोग पूर्ण शरीर और आत्मा के बल को प्राप्त होवें तो शत्रुजन हमारा और तुम्हारा पराजय न कर सकें। जो दुष्ट और लोभादि दोषों को छोड़ें, वे अति बली होकर दुःख के पार पहुँचें॥९॥

व॒यम॒द्येन्द्र॑स्य॒ प्रेष्ठा॑ व॒यं श्वो वो॑चेमहि सम॒र्ये। व॒यं पु॒रा महि॑ च नो॒ अनु॒ द्यून्तन्न॑ ऋभु॒क्षा न॒रामनु॑ ष्यात्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वानों से प्रीति, युद्ध में उत्साह और मनुष्यादिकों का प्रिय काम का पहिले से आचरण करते हैं, वे सबके पियारे होते हैं॥१०॥

ए॒ष वः॒ स्तोमो॑ मरुत इ॒यं गीर्मा॑न्दा॒र्यस्य॑ मा॒न्यस्य॑ का॒रोः। एषा या॑सीष्ट त॒न्वे॑ व॒यां वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥

जो सबसे प्रशंसा करने योग्य गुणों को प्राप्त होकर आप्त धर्मात्मा सज्जनों का सत्कार कर शरीर और आत्मा के बल के लिये विद्या और पराक्रम सम्पादन करते हैं, वे सुख से जीते हैं॥११॥इस सूक्त में वायु के दृष्टान्त से सज्जन विद्वान् जनों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह समझना चाहिये॥यह एकसौ सरसठवाँ सूक्त और पाँचवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

य॒ज्ञाय॑ज्ञा वः सम॒ना तु॑तु॒र्वणि॒र्धियं॑धियं वो देव॒या उ॑ दधिध्वे। आ वो॒ऽर्वाचः॑ सुवि॒ताय॒ रोद॑स्योर्म॒हे व॑वृत्या॒मव॑से सुवृ॒क्तिभिः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पवन नियम से अनेकविध गतिमान् होकर विश्व का धारण करते हैं, वैसे विद्वान् जन विद्या और उत्तम शिक्षायुक्त होकर विद्यार्थियों को धारण करें, जिससे असंख्य ऐश्वर्य प्राप्त हों॥१॥

व॒व्रासो॒ न ये स्व॒जाः स्वत॑वस॒ इषं॒ स्व॑रभि॒जाय॑न्त॒ धूत॑यः। स॒ह॒स्रिया॑सो अ॒पां नोर्मय॑ आ॒सा गावो॒ वन्द्या॑सो॒ नोक्षणः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो पवन के समान बलवान्, तरङ्गों के समान उत्साही, गौओं के समान उपकार करनेवाले, कारण के तुल्य सुखजनक दुष्टों को कम्पाने भय देनेवाले मनुष्य हों, वे यहाँ धन्य होते हैं॥२॥

सोमा॑सो॒ न ये सु॒तास्तृ॒प्तांश॑वो हृ॒त्सु पी॒तासो॑ दु॒वसो॒ नास॑ते। ऐषा॒मंसे॑षु र॒म्भिणी॑व रारभे॒ हस्ते॑षु खा॒दिश्च॑ कृ॒तिश्च॒ सं द॑धे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सज्जन ओषधियों के समान दुष्ट शिक्षा और दुष्टाचार के विनाश करने, सेवकों के समान सुख देने और पतिव्रता स्त्री के समान प्रिय आचरण करनेवाले क्रियाकुशल हैं, वे इस सृष्टि में सब विद्याओं के अच्छे धारण करने यथायोग्य कामों में वर्त्ताने को योग्य होते हैं॥३॥

अव॒ स्वयु॑क्ता दि॒व आ वृथा॑ ययु॒रम॑र्त्याः॒ कश॑या चोदत॒ त्मना॑। अ॒रे॒णव॑स्तुविजा॒ता अ॑चुच्यवुर्दृ॒ळ्हानि॑ चिन्म॒रुतो॒ भ्राज॑दृष्टयः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पवन आप ही जाते-आते हैं और अग्नि आदि पदार्थों को धारण कर दृढ़ता से प्रकाशित करते हैं, वैसे विद्वान् जन आप ही पढ़ाने और उपदेशों में नियुक्त हो व्यर्थ कामों को छोड़कर और छुड़वा के विद्या और उत्तम शिक्षा से सब जनों को प्रकाशित करते हैं॥४॥

को वो॒ऽन्तर्म॑रुत ऋष्टिविद्युतो॒ रेज॑ति॒ त्मना॒ हन्वे॑व जि॒ह्वया॑। ध॒न्व॒च्युत॑ इ॒षां न याम॑नि पुरु॒प्रैषा॑ अह॒न्यो॒३॒॑ नैत॑शः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जब जिज्ञासु जन विद्वानों के प्रति पूछें तब विद्वान् जन इनके लिये यथार्थ उत्तर देवें॥५॥

क्व॑ स्विद॒स्य रज॑सो म॒हस्परं॒ क्वाव॑रं मरुतो॒ यस्मि॑न्नाय॒य। यच्च्या॒वय॑थ विथु॒रेव॒ संहि॑तं॒ व्यद्रि॑णा पतथ त्वे॒षम॑र्ण॒वम्॥

जिसमें यह भूगोल आदि जगत् जाता-आता, कम्पता उसीको आकाश के समान कारण जानो, जिसमें ये लोक उत्पन्न होते, भ्रमते और प्रलय हो जाते हैं, वह परम उत्कृष्ट निमित्त कारण ब्रह्म है॥६॥

सा॒तिर्न वोऽम॑वती॒ स्व॑र्वती त्वे॒षा विपा॑का मरुतः॒ पिपि॑ष्वती। भ॒द्रा वो॑ रा॒तिः पृ॑ण॒तो न दक्षि॑णा पृथु॒ज्रयी॑ असु॒र्ये॑व॒ जञ्ज॑ती॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो इन जीवों की पाप पुण्य से उत्पन्न हुई सुख दुःख फलवाली गति है, उससे समस्त जीव विचरते हैं। जो पुरुषार्थी जन सेना जन शत्रुओं को जैसे-वैसे पापों को जीत निवारि धर्म का आचरण करते हैं, वे सदैव सुखी होते हैं॥७॥

प्रति॑ ष्टोभन्ति॒ सिन्ध॑वः प॒विभ्यो॒ यद॒भ्रियां॒ वाच॑मुदी॒रय॑न्ति। अव॑ स्मयन्त वि॒द्युतः॑ पृथि॒व्यां यदी॑ घृ॒तं म॒रुतः॑ प्रुष्णु॒वन्ति॑॥

जो मनुष्य नदी के समान आर्द्रचित्त बिजुली के समान तीव्र स्वभाववाले विद्या को पढ़कर पढ़ाते हैं, वे सूर्य के समान सत्य और असत्य को प्रकाश करनेवाले होते हैं॥८॥

असू॑त॒ पृश्नि॑र्मह॒ते रणा॑य त्वे॒षम॒यासां॑ म॒रुता॒मनी॑कम्। ते स॑प्स॒रासो॑ऽजनय॒न्ताभ्व॒मादित्स्व॒धामि॑षि॒रां पर्य॑पश्यन्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विचक्षण राजपुरुष विजय के लिये प्रशंसित सेना को स्वीकार कर अन्नादि ऐश्वर्य की उन्नति करते हैं, वे तृप्ति को प्राप्त होते हैं॥९॥

ए॒ष वः॒ स्तोमो॑ मरुत इ॒यं गीर्मा॑न्दा॒र्यस्य॑ मा॒न्यस्य॑ का॒रोः। एषा या॑सीष्ट त॒न्वे॑ व॒यां वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥

जो समस्त विद्या की स्तुति और प्रशंसा करने और आप्तवाक् अर्थात् धर्मात्मा विद्वानों की वाणियों में रहने तथा जीवों की दया से युक्त सज्जन पुरुष हैं, वे सभों के सुखों को उत्पन्न करानेवाले होते हैं॥१०॥इस सूक्त में पवनों के दृष्टान्त से विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इसके अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह एकसौ अरसठवाँ सूक्त और सातवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

म॒हश्चि॒त्त्वमि॑न्द्र य॒त ए॒तान्म॒हश्चि॑दसि॒ त्यज॑सो वरू॒ता। स नो॑ वेधो म॒रुतां॑ चिकि॒त्वान्त्सु॒म्ना व॑नुष्व॒ तव॒ हि प्रेष्ठा॑॥

जो विरक्त संन्यासियों के सङ्ग से बुद्धिमान् होते हैं, उनको कभी अनिष्ट दुःख नहीं उत्पन्न होता॥१॥

अयु॑ज्रन्त इन्द्र वि॒श्वकृ॑ष्टीर्विदा॒नासो॑ नि॒ष्षिधो॑ मर्त्य॒त्रा। म॒रुतां॑ पृत्सु॒तिर्हास॑माना॒ स्व॑र्मीळ्हस्य प्र॒धन॑स्य सा॒तौ॥

जो पहिले ब्रह्मचर्य से विद्या को पढ़कर धर्मात्मा शास्त्रज्ञ विद्वानों के सङ्ग से समस्त शिक्षा को पाकर धार्मिक होते हैं, वे संसार को सुख देनेवाले होते हैं॥२॥

अम्य॒क्सा त॑ इन्द्र ऋ॒ष्टिर॒स्मे सने॒म्यभ्वं॑ म॒रुतो॑ जुनन्ति। अ॒ग्निश्चि॒द्धि ष्मा॑त॒से शु॑शु॒क्वानापो॒ न द्वी॒पं दध॑ति॒ प्रयां॑सि॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जिस अनादि कारण को विद्वान् जानते उसको और जन नहीं जान सकते हैं॥३॥

त्वं तू न॑ इन्द्र॒ तं र॒यिं दा॒ ओजि॑ष्ठया॒ दक्षि॑णयेव रा॒तिम्। स्तुत॑श्च॒ यास्ते॑ च॒कन॑न्त वा॒योः स्तनं॒ न मध्वः॑ पीपयन्त॒ वाजैः॑॥

जैसे बहुत पदार्थों को देनेवाला यजमान ऋतु-ऋतु में यज्ञादि करानेवाले पुरोहित के लिये बहुत धन देकर उसको सुशोभित करता है वा जैसे पुत्र माता का दूध पीके पुष्ट हो जाते हैं, वैसे सभाध्यक्ष के परितोष से भृत्यजन पूर्ण धनी और उनके दिये भोजनादि पदार्थों से बलवान् होते हैं॥४॥

त्वे राय॑ इन्द्र तो॒शत॑माः प्रणे॒तारः॒ कस्य॑ चिदृता॒योः। ते षु णो॑ म॒रुतो॑ मृळयन्तु॒ ये स्मा॑ पु॒रा गा॑तु॒यन्ती॑व दे॒वाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो वायुविद्या के जाननेवाले परोपकार और विद्यादान देने में प्रसन्नचित्त पृथिवी के समान सब प्राणियों को पुरुषार्थ में धारण करते हैं, वे सर्वदा सुखी होते हैं॥५॥

प्रति॒ प्र या॑हीन्द्र मी॒ळ्हुषो॒ नॄन्म॒हः पार्थि॑वे॒ सद॑ने यतस्व। अध॒ यदे॑षां पृथुबु॒ध्नास॒ एता॑स्ती॒र्थे नार्यः पौंस्या॑नि त॒स्थुः॥

जो पुरुष और जो स्त्री ब्रह्मचर्य से बलों को बढ़ाकर आप्त धर्म्मात्मा शास्त्रवक्ता सज्जनों की सेवा करते हैं, वे पुरुष विद्वान् और वे स्त्रियाँ विदुषी होती हैं॥६॥

प्रति॑ घो॒राणा॒मेता॑नाम॒यासां॑ म॒रुतां॑ शृण्व आय॒तामु॑प॒ब्दिः। ये मर्त्यं॑ पृतना॒यन्त॒मूमै॑र्ऋणा॒वानं॒ न प॒तय॑न्त॒ सर्गैः॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो दुष्ट पुरुषों और स्त्रियों के कठोर शब्दों को सुनकर नहीं सोच करते हैं, वे शूरवीर होते हैं॥७॥

त्वं माने॑भ्य इन्द्र वि॒श्वज॑न्या॒ रदा॑ म॒रुद्भिः॑ शु॒रुधो॒ गोअ॑ग्राः। स्तवा॑नेभिः स्तवसे देव दे॒वैर्वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि विद्वानों के सत्कार से विद्याओं को अध्ययन कर पदार्थविद्या के विज्ञान को प्राप्त होवें॥८॥इस सूक्त में विद्वान् आदि के गुणों का वर्णन होने से इसके अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह एकसौ उनहत्तरवाँ सूक्त और नवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

न नू॒नमस्ति॒ नो श्वः कस्तद्वे॑द॒ यदद्भु॑तम्। अ॒न्यस्य॑ चि॒त्तम॒भि सं॑च॒रेण्य॑मु॒ताधी॑तं॒ वि न॑श्यति॥

जो जीवरूप होकर उत्पन्न नहीं होता और न उत्पन्न होकर विनाश को प्राप्त होता है, नित्य आश्चर्य गुण, कर्म, स्वभाववाला अनादि चेतन है, उसका जाननेवाला भी आश्चर्यस्वरूप होता है॥१॥

किं न॑ इन्द्र जिघांससि॒ भ्रात॑रो म॒रुत॒स्तव॑। तेभिः॑ कल्पस्व साधु॒या मा नः॑ स॒मर॑णे वधीः॥

जो कोई बन्धुओं को पीड़ा देना चाहें वे सदा पीड़ित होते हैं और जो बन्धुओं की रक्षा किया चाहते हैं वे समर्थ होते हैं अर्थात् सब काम उनके प्रबलता से बनते हैं, जो सबका उपकार करनेवाले हैं, उनको कुछ भी काम अप्रिय नहीं प्राप्त होता॥२॥

किं नो॑ भ्रातरगस्त्य॒ सखा॒ सन्नति॑ मन्यसे। वि॒द्मा हि ते॒ यथा॒ मनो॒ऽस्मभ्य॒मिन्न दि॑त्ससि॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो जिनके मित्र हों वे मन, वचन और कर्म से उनकी प्रसन्नता का काम करें और जितना विद्या, ज्ञान अपने को हो उतना मित्र के समर्पण करे॥३॥

अरं॑ कृण्वन्तु॒ वेदिं॒ सम॒ग्निमि॑न्धतां पु॒रः। तत्रा॒मृत॑स्य॒ चेत॑नं य॒ज्ञं ते॑ तनवावहै॥

जैसे ऋतु-ऋतु में यज्ञ करानेवाले और यजमान अग्नि में सुगन्धादि द्रव्य का हवन कर उससे वायु और जल को अच्छे प्रकार शोध कर जगत् को सुख से युक्त करते हैं, वैसे अध्यापक और उपदेशक औरों के अन्तःकरणों में विद्या और उत्तम शिक्षा संस्थापन कर सबके सुख का विस्तार करें॥४॥

त्वमी॑शिषे वसुपते॒ वसू॑नां॒ त्वं मि॒त्राणां॑ मित्रपते॒ धेष्ठः॑। इन्द्र॒ त्वं म॒रुद्भिः॒ सं व॑द॒स्वाध॒ प्राशा॑न ऋतु॒था ह॒वींषि॑॥

जो धनवान् सबके मित्र बहुतों के साथ संस्कार किये हुए अन्नों को खाते और विद्या से परिपूर्ण विद्वानों के साथ संवाद करते हैं, वे समर्थ और ऐश्वर्य्यवान् होते हैं॥५॥इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह एकसौ सत्तरवाँ सूक्त और दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्रति॑ व ए॒ना नम॑सा॒हमे॑मि सू॒क्तेन॑ भिक्षे सुम॒तिं तु॒राणा॑म्। र॒रा॒णता॑ मरुतो वे॒द्याभि॒र्नि हेळो॑ ध॒त्त वि मु॑चध्व॒मश्वा॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो शुद्ध, अन्तःकरण से नाना प्रकार के विज्ञानों को प्राप्त होते हैं, वे कहीं अनादर नहीं पाते॥१॥

ए॒ष वः॒ स्तोमो॑ मरुतो॒ नम॑स्वान्हृ॒दा त॒ष्टो मन॑सा धायि देवाः। उपे॒मा या॑त॒ मन॑सा जुषा॒णा यू॒यं हि ष्ठा नम॑स॒ इद्वृ॒धासः॑॥

जो धार्मिक विद्वानों के शील को स्वीकार करते हैं, वे प्रशंसित होते हैं॥२॥

स्तु॒तासो॑ नो म॒रुतो॑ मृळयन्तू॒त स्तु॒तो म॒घवा॒ शम्भ॑विष्ठः। ऊ॒र्ध्वा नः॑ सन्तु को॒म्या वना॒न्यहा॑नि॒ विश्वा॑ मरुतो जिगी॒षा॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जिनमें जैसे गुण, कर्म, स्वभाव हों, उनकी वैसी ही प्रशंसा करें और प्रशंसा योग्य वे ही हों जो औरों की सुखोन्नति के लिये प्रयत्न करें और वे ही सेवने योग्य हों जो पापाचरण को छोड़ धार्मिक हों, वे प्रतिदिन विद्या और उत्तम शिक्षा की वृद्धि के अर्थ उद्योगी हों॥३॥

अ॒स्माद॒हं त॑वि॒षादीष॑माण॒ इन्द्रा॑द्भि॒या म॑रुतो॒ रेज॑मानः। यु॒ष्मभ्यं॑ ह॒व्या निशि॑तान्यास॒न्तान्या॒रे च॑कृमा मृ॒ळता॑ नः॥

जब किसी राजपुरुष से अन्यायपूर्वक पीड़ा को प्राप्त होता हुआ प्रजाजन सभा के बीच अपने दुःख का निवेदन करे तब उसके मन के कांटों को उपाड़ देवें अर्थात् उसके मन की शुद्ध भावना करा देवें जिससे राजपुरुष न्याय में वर्त्ते और प्रजाजन भी प्रसन्न हों, जितने स्त्री पुरुष हों सब शस्त्र का अभ्यास करें॥४॥

येन॒ माना॑सश्चि॒तय॑न्त उ॒स्रा व्यु॑ष्टिषु॒ शव॑सा॒ शश्व॑तीनाम्। स नो॑ म॒रुद्भि॑र्वृषभ॒ श्रवो॑ धा उ॒ग्र उ॒ग्रेभिः॒ स्थवि॑रः सहो॒दाः॥

जहाँ सभा में मूल जड़ के अर्थात् निष्कलङ्क कुल परम्परा से उत्पन्न हुए और शास्त्रवेत्ता धार्मिक सभासद् सत्य न्याय करें और विद्या तथा अवस्था से वृद्ध सभापति भी हो वहाँ अन्याय का प्रवेश नहीं होता है॥५॥

त्वं पा॑हीन्द्र॒ सही॑यसो॒ नॄन्भवा॑ म॒रुद्भि॒रव॑यातहेळाः। सु॒प्र॒के॒तेभिः॑ सास॒हिर्दधा॑नो वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥

जो मनुष्य क्रोधादि दोषरहित विद्या विज्ञान धर्म्मयुक्त क्षमावान् जन सज्जनों के साथ जो दण्ड देने योग्य नहीं हैं उनकी रक्षा करते और दण्ड देने योग्यों को दण्ड देते हैं, वे राजकर्मचारी होनेके योग्य हैं॥६॥इस सूक्त में विद्वानों के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह एकसौ इकहत्तरवाँ सूक्त और ग्यारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

चि॒त्रो वो॑ऽस्तु॒ याम॑श्चि॒त्र ऊ॒ती सु॑दानवः। मरु॑तो॒ अहि॑भानवः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे जीवन का अच्छे प्रकार देना, वर्षा करना आदि पवनों के अद्भुत कर्म्म हैं, वैसे तुम्हारे भी हों॥१॥

आ॒रे सा वः॑ सुदानवो॒ मरु॑त ऋञ्ज॒ती शरुः॑। आ॒रे अश्मा॒ यमस्य॑थ॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य मेघ के समान सुख देनेवाले, दुष्टों को छोड़नेवाले, श्रेष्ठों के समीप और दुष्टों से दूर वसते हैं, वे सङ्ग करने योग्य हैं॥२॥

तृ॒ण॒स्क॒न्दस्य॒ नु विशः॒ परि॑ वृङ्क्त सुदानवः। ऊ॒र्ध्वान्नः॑ कर्त जी॒वसे॑॥

जैसे वायु समस्त प्रजा की रक्षा करता वैसे सभापति वर्त्तें। जैसे प्रजाजनों की पीड़ा नष्ट हो मनुष्य उत्कृष्ट अति उत्तम बहुत जीवनेवाले उत्पन्न हों, वैसा कार्य्यारम्भ सबको करना चाहिये॥३॥इस सूक्त में पवन के तुल्य विद्वानों के गुणों की प्रशंसा होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह एकसौ बहत्तरवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

गाय॒त्साम॑ नभ॒न्यं१॒॑ यथा॒ वेरर्चा॑म॒ तद्वा॑वृधा॒नं स्व॑र्वत्। गावो॑ धे॒नवो॑ ब॒र्हिष्यद॑ब्धा॒ आ यत्स॒द्मानं॑ दि॒व्यं विवा॑सान्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे किरणें अन्तरिक्ष में विथुर कर सबका प्रकाश करती हैं, वैसे हम लोगों को विद्या से सबके अन्तःकरण प्रकाशित करने चाहिये, जैसे निराधार पक्षी आकाश में आते-जाते हैं, वैसे विद्वानों और लोकलोकान्तरों की चाल है॥१॥

अर्च॒द्वृषा॒ वृष॑भिः॒ स्वेदु॑हव्यैर्मृ॒गो नाश्नो॒ अति॒ यज्जु॑गु॒र्यात्। प्र म॑न्द॒युर्म॒नां गू॑र्त॒ होता॒ भर॑ते॒ मर्यो॑ मिथु॒ना यज॑त्रः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे स्वयंवर किये हुए स्त्री-पुरुष परस्पर उद्योग कर हरिण के समान वेग से घर के कामों को सिद्ध कर विद्वानों के सङ्ग से सत्य का स्वीकार कर असत्य को छोड़कर परमेश्वर और विद्वानों का सत्कार करते हैं, वैसे समस्त मनुष्य सङ्ग करनेवाले हों॥२॥

नक्ष॒द्धोता॒ परि॒ सद्म॑ मि॒ता यन्भर॒द्गर्भ॒मा श॒रदः॑ पृथि॒व्याः। क्रन्द॒दश्वो॒ नय॑मानो रु॒वद्गौर॒न्तर्दू॒तो न रोद॑सी चर॒द्वाक्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे घोड़ा और गौएँ परिमित मार्ग को जाती हैं, वैसे अग्नि नियत किये हुए देशस्थान को जाता है, जैसे धार्मिक जन अपने पदार्थ लेते हैं, वैसे ऋतु अपने चिह्नों को प्राप्त होते हैं, वा जैसे द्यावापृथिवी एक साथ वर्त्तमान हैं, वैसे विवाह किये हुए स्त्री-पुरुष वर्त्तें॥३॥

ता क॒र्माष॑तरास्मै॒ प्र च्यौ॒त्नानि॑ देव॒यन्तो॑ भरन्ते। जुजो॑ष॒दिन्द्रो॑ द॒स्मव॑र्चा॒ नास॑त्येव॒ सुग्म्यो॑ रथे॒ष्ठाः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो सूर्य-चन्द्रमा के समान शुभ गुण, कर्म, स्वभावों से प्रकाशित, आप्त शास्त्रज्ञ धर्मात्माओं के तुल्य आचरण करते हैं, वे क्या-क्या सुख नहीं पाते हैं॥४॥

तमु॑ ष्टु॒हीन्द्रं॒ यो ह॒ सत्वा॒ यः शूरो॑ म॒घवा॒ यो र॑थे॒ष्ठाः। प्र॒ती॒चश्चि॒द्योधी॑या॒न्वृष॑ण्वान्वव॒व्रुष॑श्चि॒त्तम॑सो विह॒न्ता॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि उसीकी स्तुति करें जो प्रशंसित कर्म करे और उसीकी निन्दा करें जो निन्दित कर्मों का आचरण करे। वही स्तुति है जो सत्य कहना और वहीं निन्दा है जो किसी के विषय में झूठ बकना है॥५॥

प्र यदि॒त्था म॑हि॒ना नृभ्यो॒ अस्त्यरं॒ रोद॑सी क॒क्ष्ये॒३॒॑ नास्मै॑। सं वि॑व्य॒ इन्द्रो॑ वृ॒जनं॒ न भूमा॒ भर्ति॑ स्व॒धावाँ॑ ओप॒शमि॑व॒ द्याम्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे प्रकाशरहित पृथिवी आदि पदार्थ सबका आच्छादन करते हैं, वैसे सूर्य अपने प्रकाश से सबका आच्छादन करता है। जैसे भूमिज पदार्थों को पृथिवी धारण करती है, ऐसे ही सूर्य भूगोलों को धारण करता है॥६॥

स॒मत्सु॑ त्वा शूर स॒तामु॑रा॒णं प्र॑प॒थिन्त॑मं परितंस॒यध्यै॑। स॒जोष॑स॒ इन्द्रं॒ मदे॑ क्षो॒णीः सू॒रिं चि॒द्ये अ॑नु॒मद॑न्ति॒ वाजैः॑॥

वे ही निर्वैर हैं, जो अपने समान और प्राणियों को जानते हैं। उन्हीं का राज्य बढ़ता है, जो सत्पुरुषों का ही प्रतिदिन सङ्ग करते हैं॥७॥

ए॒वा हि ते॒ शं सव॑ना समु॒द्र आपो॒ यत्त॑ आ॒सु मद॑न्ति दे॒वीः। विश्वा॑ ते॒ अनु॒ जोष्या॑ भू॒द्गौः सू॒रीँश्चि॒द्यदि॑ धि॒षा वेषि॒ जना॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य आकाश में मेघ की उन्नति कर सबको सुखी करता है, वैसे सज्जन पुरुष का बढ़ता हुआ ऐश्वर्य सबको आनन्दित करता है, जैसे पुरुष विद्वान् हों, वैसे स्त्री भी हों॥८॥

असा॑म॒ यथा॑ सुष॒खाय॑ एन स्वभि॒ष्टयो॑ न॒रां न शंसैः॑। अस॒द्यथा॑ न॒ इन्द्रो॑ वन्दने॒ष्ठास्तु॒रो न कर्म॒ नय॑मान उ॒क्था॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सब प्राणियों में मित्रभाव से वर्त्तमान हैं, वे सबको अभिवादन करने योग्य हों, जो सबको उत्तम बोध को प्राप्त कराते हैं, वे अतीव उत्तम विद्यावाले होते हैं॥९॥

विष्प॑र्धसो न॒रां न शंसै॑र॒स्माका॑स॒दिन्द्रो॒ वज्र॑हस्तः। मि॒त्रा॒युवो॒ न पूर्प॑तिं॒ सुशि॑ष्टौ मध्या॒युव॒ उप॑ शिक्षन्ति य॒ज्ञैः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे सत्याचरण में स्पर्द्धा करनेवाले सबके मित्र पक्षपातरहित सत्य का आचरण करते हुए जन सत्य का उपदेश करते हैं, वैसे ही सभापति राजा प्रजाजनों में वर्त्ते॥१०॥

य॒ज्ञो हि ष्मेन्द्रं॒ कश्चि॑दृ॒न्धञ्जु॑हुरा॒णश्चि॒न्मन॑सा परि॒यन्। ती॒र्थे नाच्छा॑ तातृषा॒णमोको॑ दी॒र्घो न सि॒ध्रमा कृ॑णो॒त्यध्वा॑॥

पूर्व मन्त्र में अति शीघ्रता से रक्षा चाहते हुए विद्वान् बुद्धिमान् जन शिक्षा करना रूप आदि यज्ञों से अपनी पुरी नगरी के पालनेवाले राजा को समीप जाकर शिक्षा देते हैं, यह जो विषय कहा था, वहाँ यज्ञ से शीघ्रता का उपदेश करते हुए (यज्ञो हि०) इस मन्त्र का उपदेश करते हैं। इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं—जो सुख के बढ़ाने की इच्छा करें तो सब धर्म का आचरण करें और जो परोपकार करने की इच्छा करें तो सत्य का उपदेश करें॥११॥

मो षू ण॑ इ॒न्द्रात्र॑ पृ॒त्सु दे॒वैरस्ति॒ हि ष्मा॑ ते शुष्मिन्नव॒याः। म॒हश्चि॒द्यस्य॑ मी॒ळ्हुषो॑ य॒व्या ह॒विष्म॑तो म॒रुतो॒ वन्द॑ते॒ गीः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो बल को प्राप्त हो वह सज्जनों में शत्रु के समान न वर्त्ते, सदा आप्त शास्त्रज्ञ धर्मात्मा जनों के उपदेश को स्वीकार करे, इतर अधर्मात्मा के उपदेश को न स्वीकार करे॥१२॥

ए॒ष स्तोम॑ इन्द्र॒ तुभ्य॑म॒स्मे ए॒तेन॑ गा॒तुं ह॑रिवो विदो नः। आ नो॑ ववृत्याः सुवि॒ताय॑ देव वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥

किसी भद्रजन को अपने मुख से अपनी प्रशंसा नहीं करनी चाहिये तथा और ने कही हुई अपनी प्रशंसा सुनकर न आनन्दित होना चाहिये अर्थात् न हँसना चाहिये, जैसे अपने से अपनी उन्नति चाही जावे वैसे औरों की उन्नति सदैव चाहनी चाहिये॥१३॥इस सूक्त में विद्वानों के विषय का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह एकसौ तिहत्तरवाँ सूक्त और पन्द्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

त्वं राजे॑न्द्र॒ ये च॑ दे॒वा रक्षा॒ नॄन्पा॒ह्य॑सुर॒ त्वम॒स्मान्। त्वं सत्प॑तिर्म॒घवा॑ न॒स्तरु॑त्र॒स्त्वं स॒त्यो वस॑वानः सहो॒दाः॥

जो राजा होना चाहे वह धार्मिक सत्पुरुष विद्वान् मन्त्री जनों को अच्छे प्रकार रखके उनसे प्रजाजनों की पालना करावे, जो ही सत्याचारी बलवान् सज्जनों का सङ्ग करनेवाला होता है, वह राज्य को प्राप्त होता है॥१॥

दनो॒ विश॑ इन्द्र मृ॒ध्रवा॑चः स॒प्त यत्पुरः॒ शर्म॒ शार॑दी॒र्दर्त्। ऋ॒णोर॒पो अ॑नव॒द्यार्णा॒ यूने॑ वृ॒त्रं पु॑रु॒कुत्सा॑य रन्धीः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजा को चाहिये कि शत्रुओं के पुर नगर, शरद् आदि ऋतुओं में सुख देनेवाले स्थान आदि वस्तु नष्ट कर शत्रुजन निवारणे चाहियें और सूर्य मेघजल से जैसे जगत् की रक्षा करता है, वैसे राजा को प्रजा की रक्षा करनी चाहिये॥२॥

अजा॒ वृत॑ इन्द्र॒ शूर॑पत्नी॒र्द्यां च॒ येभिः॑ पुरुहूत नू॒नम्। रक्षो॑ अ॒ग्निम॒शुषं॒ तूर्व॑याणं सिं॒हो न दमे॒ अपां॑सि॒ वस्तोः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सिंह अपने भिटे में बल से सबको रोकता ले जाता है, वैसे राजा निज बल से अपने घर में लाभप्राप्ति के लिये प्रयत्न करे। जिस अच्छे प्रकार प्रयोग किये अग्नि से यान शीघ्र जाते हैं, उस अग्नि से सिद्ध किये हुए यान पर स्थिर होकर स्त्री-पुरुष इधर-उधर से आवें-जावें॥३॥

शेष॒न्नु त इ॑न्द्र॒ सस्मि॒न्योनौ॒ प्रश॑स्तये॒ पवी॑रवस्य म॒ह्ना। सृ॒जदर्णां॒स्यव॒ यद्यु॒धा गास्तिष्ठ॒द्धरी॑ धृष॒ता मृ॑ष्ट॒ वाजा॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो अपने स्वभावानुकूल शूरवीर हों वे अपने-अपने अधिकार में न्याय से वर्त्तकर शत्रुजनों को निःशेष कर धर्म के अनुकूल अपनी महिमा का प्रकाश करावें॥४॥

वह॒ कुत्स॑मिन्द्र॒ यस्मि॑ञ्चा॒कन्त्स्यू॑म॒न्यू ऋ॒ज्रा वात॒स्याश्वा॑। प्र सूर॑श्च॒क्रं वृ॑हताद॒भीके॒ऽभि स्पृधो॑ यासिष॒द्वज्र॑बाहुः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य प्रतापवान् है, वैसा प्रतापवान् राजा अस्त्र और शस्त्रों के प्रहारों से संग्राम में शत्रुओं को अच्छे प्रकार जीतकर अपने राज्य को बढ़ावे॥५॥

ज॒घ॒न्वाँ इ॑न्द्र मि॒त्रेरू॑ञ्चो॒दप्र॑वृद्धो हरिवो॒ अदा॑शून्। प्र ये पश्य॑न्नर्य॒मणं॒ सचा॒योस्त्वया॑ शू॒र्ता वह॑माना॒ अप॑त्यम्॥

जो मित्र के समान बातचीत करते हुए दुष्टप्रकृति चतुर शत्रुजन सज्जनों को उद्वेग कराते उनको राजा समूल जैसे वे नष्ट हों वैसे मारे और न्यायासन पर बैठ कर अच्छे प्रकार देख विचार अन्याय को निवृत्त करे॥६॥

रप॑त्क॒विरि॑न्द्रा॒र्कसा॑तौ॒ क्षां दा॒सायो॑प॒बर्ह॑णीं कः। कर॑त्ति॒स्रो म॒घवा॒ दानु॑चित्रा॒ नि दु॑र्यो॒णे कुय॑वाचं मृ॒धि श्रे॑त्॥

शास्त्र जाननेवाले सभापति शूद्र वर्ग के लिये शास्त्र की शिक्षा के साथ उत्तमान्नादि की वृद्धि करनेवाली भूमि को संपादन करावें और सत्यशील तथा दान की विचित्रता संपादन करने के लिये उत्तम, मध्यम, निकृष्ट दानव्यवहारों को सिद्ध करे और सब काल में संग्रामादि भूमियों में शत्रुओं का संहार कर अपने राज्य को बढ़ाता रहे॥७॥

सना॒ ता त॑ इन्द्र॒ नव्या॒ आगुः॒ सहो॒ नभोऽवि॑रणाय पू॒र्वीः। भि॒नत्पुरो॒ न भिदो॒ अदे॑वीर्न॒नमो॒ वध॒रदे॑वस्य पी॒योः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजजन संग्रामादि भूमियों में ऐसे शूरता दिखलानेवाले कामों का आचरण करें, जिनको देखके ही जिन्होंने पिछली शूरता के काम नहीं देखे वे नवीन दुष्ट प्रजाजन भयभीत हों॥८॥

त्वं धुनि॑रिन्द्र॒ धुनि॑मतीर्ऋ॒णोर॒पः सी॒रा न स्रव॑न्तीः। प्र यत्स॑मु॒द्रमति॑ शूर॒ पर्षि॑ पा॒रया॑ तु॒र्वशं॒ यदुं॑ स्व॒स्ति॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे शरीरस्थ बिजुलीरूप अग्नि नाड़ियों में रुधिर को पहुँचाती है और सूर्यमण्डल जल को जगत् में पहुँचाता है, वैसे प्रजाओं में सुख को प्राप्त करावें और दुष्टों को कंपावें॥९॥

त्वम॒स्माक॑मिन्द्र वि॒श्वध॑ स्या अवृ॒कत॑मो न॒रां नृ॑पा॒ता। स नो॒ विश्वा॑सां स्पृ॒धां स॑हो॒दा वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥

जो यम-नियमों से युक्त नियत इन्द्रियोंवाले प्रजाजनों के रक्षक चौर्यादि कर्मों को छोड़े हुए अपने राज्य में निवास करते हैं, वे अत्यन्त ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं॥१०॥इस मन्त्र में राजजनों के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह एकसौ चौहत्तरवाँ सूक्त और सत्रहवाँ वर्ग पूरा हुआ॥

मत्स्यपा॑यि ते॒ महः॒ पात्र॑स्येव हरिवो मत्स॒रो मदः॑। वृषा॑ ते॒ वृष्ण॒ इन्दु॑र्वा॒जी स॑हस्र॒सात॑मः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे घोड़े दूध आदि पी, घास खा बलवान् और वेगवान् होते हैं, वैसे पथ्य ओषधियों के सेवन करनेवाले मनुष्य आनन्दित होते हैं॥१॥

आ न॑स्ते गन्तु मत्स॒रो वृषा॒ मदो॒ वरे॑ण्यः। स॒हावाँ॑ इन्द्र सान॒सिः पृ॑तना॒षाळम॑र्त्यः॥

मनुष्यों को चाहिये कि आप्त धर्मात्मा जनों का ओषधि रस हमको प्राप्त हो, ऐसी सदा चाहना करें॥२॥

त्वं हि शूरः॒ सनि॑ता चो॒दयो॒ मनु॑षो॒ रथ॑म्। स॒हावा॒न्दस्यु॑मव्र॒तमोषः॒ पात्रं॒ न शो॒चिषा॑॥

जो सेनापति युद्ध समय में रथ आदि यान और योद्धाओं को ढङ्ग से चलाने को जानते हैं, वे आग जैसे काष्ठ को वैसे डाकुओं को भस्म कर सकते हैं॥३॥

मु॒षा॒य सूर्यं॑ कवे च॒क्रमीशा॑न॒ ओज॑सा। वह॒ शुष्णा॑य व॒धं कुत्सं॒ वात॒स्याश्वैः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो चक्रवर्त्ती राज्य करने की इच्छा करें वे डाकू और दुष्टाचारी मनुष्यों को निवार के न्याय को प्रवृत्त करावें॥४॥

शु॒ष्मिन्त॑मो॒ हि ते॒ मदो॑ द्यु॒म्निन्त॑म उ॒त क्रतुः॑। वृ॒त्र॒घ्ना व॑रिवो॒विदा॑ मंसी॒ष्ठा अ॑श्व॒सात॑मः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सूर्य के समान तेजस्वी, बिजुली के समान पराक्रमी, यशस्वी, अत्यन्त बली जन विद्या, विनय और धर्म का सेवन करते हैं, वे सुख को प्राप्त होते हैं॥५॥

यथा॒ पूर्वे॑भ्यो जरि॒तृभ्य॑ इन्द्र॒ मय॑ इ॒वापो॒ न तृष्य॑ते ब॒भूथ॑। तामनु॑ त्वा नि॒विदं॑ जोहवीमि वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो ब्रह्मचर्य के साथ शास्त्रज्ञ धर्मात्माओं से विद्या और शिक्षा पाकर औरों को देते हैं, वे सुख से तृप्त होते हुए प्रशंसा को प्राप्त होते हैं और जो विरोध को छोड़ परस्पर उपदेश करते हैं, वे विज्ञान, बल और जीवात्मा-परमात्मा के स्वरूप को जानते हैं॥६॥इस सूक्त में राजव्यवहार के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह एकसौ पचहत्तरवाँ सूक्त और अठारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

मत्सि॑ नो॒ वस्य॑इष्टय॒ इन्द्र॑मिन्दो॒ वृषा वि॑श। ऋ॒घा॒यमा॑ण इन्वसि॒ शत्रु॒मन्ति॒ न वि॑न्दसि॥

जो प्रजाजनों के चाहे हुए सुख के लिये दुष्टों की निवृत्ति कराते और सत्य आचरण को व्याप्त होते वे महान् ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं॥१॥

तस्मि॒न्ना वे॑शया॒ गिरो॒ य एक॑श्चर्षणी॒नाम्। अनु॑ स्व॒धा यमु॒प्यते॒ यवं॒ न चर्कृ॑ष॒द्वृषा॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे कृषिवल खेती करनेवाले उत खेतों में बीजों को बोकर अन्नों वा धनों को पाते हैं, वैसे विद्वान् जन ज्ञान विद्या चाहनेवाले शिष्य जनों के आत्मा में विद्या और उत्तम शिक्षा प्रवेश करा सुखों को प्राप्त होते हैं॥२॥

यस्य॒ विश्वा॑नि॒ हस्त॑योः॒ पञ्च॑ क्षिती॒नां वसु॑। स्पा॒शय॑स्व॒ यो अ॑स्म॒ध्रुग्दि॒व्येवा॒शनि॑र्जहि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिसके अधिकार में समग्र विद्या हैं, जो उत्पन्न हुए शत्रुओं को मारता है वह दिव्य ऐश्वर्य प्राप्ति करानेवाला होता है॥३॥

असु॑न्वन्तं समं जहि दू॒णाशं॒ यो न ते॒ मयः॑। अ॒स्मभ्य॑मस्य॒ वेद॑नं द॒द्धि सू॒रिश्चि॑दोहते॥

जो आलसी जन हों उनको राजा ताड़ना दिलावे। जैसे विद्वान् जन सबके लिये सुख देता है, वैसे जितना अपना सामर्थ्य हो उतना सुख सबके लिये देवे॥४॥

आवो॒ यस्य॑ द्वि॒बर्ह॑सो॒ऽर्केषु॑ सानु॒षगस॑त्। आ॒जाविन्द्र॑स्येन्दो॒ प्रावो॒ वाजे॑षु वा॒जिन॑म्॥

जैसे सेनापति सब चाकरों की रक्षा करे, वैसे वे चाकर भी उसकी निरन्तर रक्षा करें॥५॥

यथा॒ पूर्वे॑भ्यो जरि॒तृभ्य॑ इन्द्र॒ मय॑ इ॒वापो॒ न तृष्य॑ते ब॒भूथ॑। तामनु॑ त्वा नि॒विदं॑ जोहवीमि वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥

जो जिज्ञासु जन योगारूढ़ पुरुषों से योगशिक्षा को प्राप्त होकर पुरुषार्थ से योग का अभ्यास कर सिद्ध होते हैं, वे पूर्ण सुख को पाते और जो उत्तम योगियों का सेवन करते, वे भी सुख को प्राप्त होते हैं॥६॥इस सूक्त में विद्या, पुरुषार्थ और योग का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह एकसौ छिहत्तरवाँ सूक्त और उन्नीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ च॑र्षणि॒प्रा वृ॑ष॒भो जना॑नां॒ राजा॑ कृष्टी॒नां पु॑रुहू॒त इन्द्रः॑। स्तु॒तः श्र॑व॒स्यन्नव॒सोप॑ म॒द्रिग्यु॒क्त्वा हरी॒ वृष॒णा या॑ह्य॒र्वाङ्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे शुभ, गुण, कर्म, स्वभाववाले सभाध्यक्ष प्रजाजनों में चेष्टा करें, वैसे प्रजाजनों को भी चेष्टा करनी चाहिये। जैसे कोई विमान पर चढि और ऊपर को जायकर नीचे आता है, वैसे विद्वान् जन अगले-पिछले विषय को जाननेवाले हों॥१॥

ये ते॒ वृष॑णो वृष॒भास॑ इन्द्र ब्रह्म॒युजो॒ वृष॑रथासो॒ अत्याः॑। ताँ आ ति॑ष्ठ॒ तेभि॒रा या॑ह्य॒र्वाङ्हवा॑महे त्वा सु॒त इ॑न्द्र॒ सोमे॑॥

जो राजजन समस्त साधनों से साध्य रथों, प्रबल घोड़ों और बैलों को कार्य्यों में संयुक्त कराते हैं, वे प्रशस्त यान आदि पदार्थों से युक्त हुए ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं॥२॥

आ ति॑ष्ठ॒ रथं॒ वृष॑णं॒ वृषा॑ ते सु॒तः सोमः॒ परि॑षिक्ता॒ मधू॑नि। यु॒क्त्वा वृष॑भ्यां वृषभ क्षिती॒नां हरि॑भ्यां याहि प्र॒वतोप॑ म॒द्रिक्॥

जो आहार-विहार से सोमादि ओषधियों के रस के सेवनेवाले, दीर्घ ब्रह्मचर्य्य, किये हुए शरीर और आत्मा के बल से युक्त राजजन बिजुली आदि पदार्थों के वेग से युक्त यानों को सिद्ध कर दण्ड से दुष्टों को निवारण कर न्याय से राज्य की रक्षा कराया करें, वे ही सुखी होते हैं॥३॥

अ॒यं य॒ज्ञो दे॑व॒या अ॒यं मि॒येध॑ इ॒मा ब्रह्मा॑ण्य॒यमि॑न्द्र॒ सोमः॑। स्ती॒र्णं ब॒र्हिरा तु श॑क्र॒ प्र या॑हि॒ पिबा॑ नि॒षद्य॒ वि मु॑चा॒ हरी॑ इ॒ह॥

सब मनुष्यों को व्यवहार में अच्छा यत्न कर जब राजा, ब्रह्मचारी तथा विद्या और अवस्था से बढ़ा हुआ सज्जन आवे तब आसन आदि से उसका सत्कार कर पूछना चाहिए। वह उनके प्रति यथोचित धर्म के अनुकूल विद्या की प्राप्ति करनेवाले वचन को कहे जिससे दुःख की हानि सुख की वृद्धि और बिजुली आदि पदार्थों की भी सिद्धि हो॥४॥

ओ सुष्टु॑त इन्द्र याह्य॒र्वाङुप॒ ब्रह्मा॑णि मा॒न्यस्य॑ का॒रोः। वि॒द्याम॒ वस्तो॒रव॑सा गृ॒णन्तो॑ वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो धन को प्राप्त हों वे औरों का सत्कार करें, जो क्रियाकुशल शिल्पीजन ऐश्वर्य को प्राप्त हों वे सबको सत्कार करने योग्य हों, जैसे जैसे विद्या आदि अच्छे गुण अधिक हों वैसे वैसे अभिमानरहित हों॥५॥। यहाँ राजा आदि विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह एकसौ सतहत्तरवाँ सूक्त और बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

यद्ध॒ स्या त॑ इन्द्र श्रु॒ष्टिरस्ति॒ यया॑ ब॒भूथ॑ जरि॒तृभ्य॑ ऊ॒ती। मा नः॒ कामं॑ म॒हय॑न्त॒मा ध॒ग्विश्वा॑ ते अश्यां॒ पर्याप॑ आ॒योः॥

सेनापति आदि राजपुरुष अपने प्रयोजन के लिये किसीके काम को न विनाशें, सदैव पढ़ाने और पढ़नेवालों की रक्षा करें, जिससे बहुत बलवान् आयुयुक्त जन हों॥१॥

न घा॒ राजेन्द्र॒ आ द॑भन्नो॒ या नु स्वसा॑रा कृ॒णव॑न्त॒ योनौ॑। आप॑श्चिदस्मै सु॒तुका॑ अवेष॒न्गम॑न्न॒ इन्द्रः॑ स॒ख्या वय॑श्च॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे शास्त्रज्ञ धर्मात्मा दयालु विद्वान् किसीको नहीं मारते, वैसे सब आचरण करें॥२॥

जेता॒ नृभि॒रिन्द्रः॑ पृ॒त्सु शूरः॒ श्रोता॒ हवं॒ नाध॑मानस्य का॒रोः। प्रभ॑र्ता॒ रथं॑ दा॒शुष॑ उपा॒क उद्य॑न्ता॒ गिरो॒ यदि॑ च॒ त्मना॒ भूत्॥

जो विद्या की याचना करें, उसको निरन्तर विद्या देवें। जो जितेन्द्रिय सत्यवादी होते हैं, उन्हीं को विद्या प्राप्त होती है। जो विद्या और शरीर बलों से शत्रुओं के साथ युद्ध करते हैं, उनका कैसे पराजय हो ?॥३॥

ए॒वा नृभि॒रिन्द्रः॑ सुश्रव॒स्या प्र॑खा॒दः पृ॒क्षो अ॒भि मि॒त्रिणो॑ भूत्। स॒म॒र्य इ॒षः स्त॑वते॒ विवा॑चि सत्राक॒रो यज॑मानस्य॒ शंसः॑॥

जो उद्योगी और सत्यवादी जन सत्योपदेश करते हैं, वे नायक, अधिपति और अग्रगामी होते हैं॥४॥

त्वया॑ व॒यं म॑घवन्निन्द्र॒ शत्रू॑न॒भि ष्या॑म मह॒तो मन्य॑मानान्। त्वं त्रा॒ता त्वमु॑ नो वृ॒धे भू॑र्वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥

जो युद्ध करनेवाले भृत्यों का सर्वथा सत्कार कर और उनको उत्साह दे युद्ध करते हैं, युद्ध करते हुओं की निरन्तर रक्षा और मरे हुओं के पुत्र, कन्या और स्त्रियों की पालना करें वे सब सर्वत्र विजय करनेवाले हों॥५॥इस सूक्त में सेनापति के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह एकसौ अठहत्तरवाँ सूक्त और इक्कीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

पू॒र्वीर॒हं श॒रदः॑ शश्रमा॒णा दो॒षा वस्तो॑रु॒षसो॑ ज॒रय॑न्तीः। मि॒नाति॒ श्रियं॑ जरि॒मा त॒नूना॒मप्यू॒ नु पत्नी॒र्वृष॑णो जगम्युः॥

इस मन्त्र में वाचकुलप्तोपमालङ्कार है। जैसे बाल्यावस्था को लेकर विदुषी स्त्रियों ने प्रतिदिन प्रभात समय से घर के कार्य और पति की सेवा आदि कर्म किये हैं, वैसे किया है ब्रह्मचर्य जिन्होंने, उन स्त्री-पुरुषों को समस्त कार्यों का अनुष्ठान करना चाहिये॥१॥

ये चि॒द्धि पूर्व॑ ऋत॒साप॒ आस॑न्त्सा॒कं दे॒वेभि॒रव॑दन्नृ॒तानि॑। ते चि॒दवा॑सुर्न॒ह्यन्त॑मा॒पुः समू॒ नु पत्नी॒र्वृष॑भिर्जगम्युः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। ब्रह्मचर्य्यस्थ विद्यार्थियों को उन्हीं से विद्या और अच्छी शिक्षा लेनी चाहिये कि जो पहिले विद्या पढ़े हुए सत्याचारी जितेन्द्रिय हों और उन ब्रह्मचारियों के साथ विवाह करें, जो अपने तुल्य गुण, कर्म, स्वभाववाली विदुषी हों॥२॥

न मृषा॑ श्रा॒न्तं यदव॑न्ति दे॒वा विश्वा॒ इत्स्पृधो॑ अ॒भ्य॑श्नवाव। जया॒वेदत्र॑ श॒तनी॑थमा॒जिं यत्स॒म्यञ्चा॑ मिथु॒नाव॒भ्यजा॑व॥

जिस कारण आप विद्वान् जन मिथ्याचारी मूढ़ विद्यार्थी जनों को नहीं पढ़ाते हैं, इससे स्त्रीपुरुष मिथ्या आचार व्यभिचारादि दोषों को त्यागें और जैसे गृहाश्रम का उत्कर्ष हो वैसे स्त्रीपुरुष परस्पर धर्म के आचरण करनेवाले हों॥३॥

न॒दस्य॑ मा रुध॒तः काम॒ आग॑न्नि॒त आजा॑तो अ॒मुतः॒ कुत॑श्चित्। लोपा॑मुद्रा॒ वृष॑णं॒ नी रि॑णाति॒ धीर॒मधी॑रा धयति श्व॒सन्त॑म्॥

जो विद्या धैर्य आदि रहित स्त्रियों को विवाहते हैं वे सुख नहीं पाते हैं। जो पुरुष कामरहित कन्या को वा कामरहित पुरुष को कुमारी विवाहे वहाँ कुछ भी सुख नहीं होता, इससे परस्पर प्रीतिवाले गुणों में समान स्त्री-पुरुष विवाह करें, वहाँ ही मङ्गल समाचार है॥४॥

इ॒मं नु सोम॒मन्ति॑तो हृ॒त्सु पी॒तमुप॑ ब्रुवे। यत्सी॒माग॑श्चकृ॒मा तत्सु मृ॑ळतु पुलु॒कामो॒ हि मर्त्यः॑॥

जो महौषधियों के रस को पीते हैं, वे रोगरहित बलिष्ठ होते हैं, जो कुपथ्याचरण करते हैं, वे रोगों से पीड्यमान होते हैं॥५॥

अ॒गस्त्यः॒ खन॑मानः ख॒नित्रैः॑ प्र॒जामप॑त्यं॒ बल॑मि॒च्छमा॑नः। उ॒भौ वर्णा॒वृषि॑रु॒ग्रः पु॑पोष स॒त्या दे॒वेष्वा॒शिषो॑ जगाम॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे कृषि करनेवाले अच्छे खेतों में उत्तम बीजों को बोय कर फलवान् होते हैं और जैसे धार्मिक विद्वान् जन सत्य कामों को प्राप्त होते हैं वैसे ब्रह्मचर्य से युवावस्था को प्राप्त होकर अपनी इच्छा से विवाह करें वे अच्छे खेत में उत्तम बीज सम्बन्धी के समान फलवान् होते हैं॥६॥इस सूक्त में विदुषी स्त्री और विद्वान् पुरुषों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह एकसौ उनासीवाँ सूक्त बाईसवाँ वर्ग और तेईसवाँ अनुवाक समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

यु॒वो रजां॑सि सु॒यमा॑सो॒ अश्वा॒ रथो॒ यद्वां॒ पर्यर्णां॑सि॒ दीय॑त्। हि॒र॒ण्यया॑ वां प॒वयः॑ प्रुषाय॒न्मध्वः॒ पिब॑न्ता उ॒षसः॑ सचेथे॥

जो स्त्री-पुरुष लोक का विज्ञान राखते और पदार्थविद्या संसाधित रथ से जानेवाले अच्छे आभूषण पहिने दुग्धादि रस पीते हुए समय के अनुरोध से कार्य्यसिद्ध करनेवाले हैं, वे ऐश्वर्य्य को प्राप्त हों॥१॥

यु॒वमत्य॒स्याव॑ नक्षथो॒ यद्विप॑त्मनो॒ नर्य॑स्य॒ प्रय॑ज्योः। स्वसा॒ यद्वां॑ विश्वगूर्ती॒ भरा॑ति॒ वाजा॒येट्टे॑ मधुपावि॒षे च॑॥

जो स्त्री-पुरुष अग्नि आदि पदार्थों को शीघ्रगामी करने की विद्या को जानें तो यथेष्ट स्थान को जा सकते हैं, जिसकी बहिन पण्डिता हो उसकी प्रशंसा क्यों न हो ?॥२॥

यु॒वं पय॑ उ॒स्रिया॑यामधत्तं प॒क्वमा॒माया॒मव॒ पूर्व्यं॒ गोः। अ॒न्तर्यद्व॒निनो॑ वामृतप्सू ह्वा॒रो न शुचि॒र्यज॑ते ह॒विष्मा॑न्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे सूर्यमण्डल रस को खींचता है और चन्द्रमा वर्षाता, पृथिवी की पुष्टि करता वैसे अध्यापक उपदेश करनेवाले वर्त्ताव रक्खें। जैसे क्रोधादि दोषरहित जन शान्ति आदि गुणों से सुखों को प्राप्त होते हैं, वैसे तुम भी होओ॥३॥

यु॒वं ह॑ घ॒र्मं मधु॑मन्त॒मत्र॑ये॒ऽपो न क्षोदो॑ऽवृणीतमे॒षे। तद्वां॑ नरावश्विना॒ पश्व॑इष्टी॒ रथ्ये॑व च॒क्रा प्रति॑ यन्ति॒ मध्वः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। यदि स्त्रीपुरुष गृहाश्रम में मधुरादि रसों से युक्त पदार्थों और उत्तम पशुओं को, रथ आदि यानों को प्राप्त होवें तो उनके सब दिन सुख से जावें॥४॥

आ वां॑ दा॒नाय॑ ववृतीय दस्रा॒ गोरोहे॑ण तौ॒ग्र्यो न जिव्रिः॑। अ॒पः क्षो॒णी स॑चते॒ माहि॑ना वां जू॒र्णो वा॒मक्षु॒रंह॑सो यजत्रा॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। विद्वान् जन स्त्री-पुरुषों के लिये ऐसा उपदेश करें कि जैसे हम लोग तुम्हारे लिये विद्यायें देवें, दुष्ट आचारों से अलग रक्खें वैसा तुमको भी आचरण करना चाहिये और पृथिवी के समान क्षमा तथा परोपकारादि कर्म करने चाहियें॥५॥

नि यद्यु॒वेथे॑ नि॒युतः॑ सुदानू॒ उप॑ स्व॒धाभिः॑ सृजथः॒ पुरं॑धिम्। प्रेष॒द्वेष॒द्वातो॒ न सू॒रिरा म॒हे द॑दे सुव्र॒तो न वाज॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। पितादिकों को चाहिये कि शिल्पक्रिया की कुशलता को पुत्रादिकों में उत्पन्न करावें, शिक्षा को प्राप्त हुए पुत्रादि समस्त पदार्थों को विशेषता से जानें और कलायन्त्रों से चलाये हुए पवन के समान जिससे वेग उस यान से जहाँ-तहाँ चाहे हुए स्थान को जावें॥६॥

व॒यं चि॒द्धि वां॑ जरि॒तारः॑ स॒त्या वि॑प॒न्याम॑हे॒ वि प॒णिर्हि॒तावा॑न्। अधा॑ चि॒द्धि ष्मा॑श्विनावनिन्द्या पा॒थो हि ष्मा॑ वृषणा॒वन्ति॑देवम्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे विद्वान् जन प्रशंसा करने योग्यों की प्रशंसा करते और निन्दा करने योग्यों की निन्दा करते हैं, वैसे वर्त्ताव रक्खें॥७॥

यु॒वां चि॒द्धि ष्मा॑श्विना॒वनु॒ द्यून्विरु॑द्रस्य प्र॒स्रव॑णस्य सा॒तौ। अ॒गस्त्यो॑ न॒रां नृषु॒ प्रश॑स्तः॒ कारा॑धुनीव चितयत्स॒हस्रैः॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो स्त्रीपुरुष निरन्तर सूर्य और चन्द्रमा के समान सन्तानों की विद्या और उत्तम उपदेशों से प्रकाशित करते हैं, वे प्रशंसावान् होते हैं॥८॥

प्र यद्वहे॑थे महि॒ना रथ॑स्य॒ प्र स्प॑न्द्रा याथो॒ मनु॑षो॒ न होता॑। ध॒त्तं सू॒रिभ्य॑ उ॒त वा॒ स्वश्व्यं॒ नास॑त्या रयि॒षाचः॑ स्याम॥

मनुष्य जैसे अपने सुख के लिये जिन साधनों की इच्छा करें उन्हीं को औरों के आनन्द के लिये चाहें। जो सुपात्र पढ़ानेवालों को धनदान देते हैं, वे श्रीमान् धनवान् होते हैं॥९॥

तं वां॒ रथं॑ व॒यम॒द्या हु॑वेम॒ स्तोमै॑रश्विना सुवि॒ताय॒ नव्य॑म्। अरि॑ष्टनेमिं॒ परि॒ द्यामि॑या॒नं वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥

मनुष्यों को सदैव नवीन-नवीन विद्या के कार्य सिद्ध करने चाहियें जिससे इस संसार में प्रशंसा हो और आकाशादिकों में जाने से इच्छासिद्धि पाई जावे॥१०॥इस सूक्त में स्त्री-पुरुषों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह १८० एकसौ अस्सीवाँ सूक्त और चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

कदु॒ प्रेष्ठा॑वि॒षां र॑यी॒णाम॑ध्व॒र्यन्ता॒ यदु॑न्निनी॒थो अ॒पाम्। अ॒यं वां॑ य॒ज्ञो अ॑कृत॒ प्रश॑स्तिं॒ वसु॑धिती॒ अवि॑तारा जनानाम्॥

जब विद्वान् जन मनुष्यों को विद्याओं की प्राप्ति कराते हैं, तब वे सबके पियारे ऐश्वर्यवान् होते हैं। जब पढ़ने और पढ़ाने से और सुगन्धादि पदार्थों के होम से जीवात्मा और जलों की शुद्धि कराते हैं, तब प्रशंसा को प्राप्त होते हैं॥१॥

आ वा॒मश्वा॑सः॒ शुच॑यः पय॒स्पा वात॑रंहसो दि॒व्यासो॒ अत्याः॑। म॒नो॒जुवो॒ वृष॑णो वी॒तपृ॑ष्ठा॒ एह स्व॒राजो॑ अ॒श्विना॑ वहन्तु॥

विद्वान् जन जिन बिजुली आदि पदार्थों को गुण, कर्म, स्वभाव से जानें उनका औरों के लिये भी उपदेश देवें। जबतक मनुष्य सृष्टि की पदार्थविद्या को नहीं जानते, तबतक संपूर्ण सुख को नहीं प्राप्त होते हैं॥२॥

आ वां॒ रथो॒ऽवनि॒र्न प्र॒वत्वा॑न्त्सृ॒प्रव॑न्धुरः सुवि॒ताय॑ गम्याः। वृष्णः॑ स्थातारा॒ मन॑सो॒ जवी॑यानहम्पू॒र्वो य॑ज॒तो धि॑ष्ण्या॒ यः॥

मनुष्यों से जो ऐश्वर्य्य की उन्नति के लिये पृथिवी के तुल्य वा मन के वेग तुल्य वेगवान् यान बनाये जाते हैं, वे यहाँ स्थिर सुख देनेवाले होते हैं॥३॥

इ॒हेह॑ जा॒ता सम॑वावशीतामरे॒पसा॑ त॒न्वा॒३॒॑ नाम॑भिः॒ स्वैः। जि॒ष्णुर्वा॑म॒न्यः सुम॑खस्य सू॒रिर्दि॒वो अ॒न्यः सु॒भगः॑ पु॒त्र ऊ॑हे॥

हे मनुष्यो! इस सृष्टि में भूगर्भादि विद्या को जानके जो जीतनेवाला अध्यापक बहुत ऐश्वर्य्यवाला सबका रक्षक पदार्थविद्या को तर्क से जाने, वह प्रसिद्ध होता है॥४॥

प्र वां॑ निचे॒रुः क॑कु॒हो वशाँ॒ अनु॑ पि॒शङ्ग॑रूपः॒ सद॑नानि गम्याः। हरी॑ अ॒न्यस्य॑ पी॒पय॑न्त॒ वाजै॑र्म॒थ्रा रजां॑स्यश्विना॒ वि घोषैः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे पवन सबको अपने वश में करता है तथा वायु और सूर्य लोक सबको धारण करते हैं, वैसे विद्या धर्म्म को धारण कर तुम भी सुखी होओ॥५॥

प्र वां॑ श॒रद्वा॑न्वृष॒भो न नि॒ष्षाट् पू॒र्वीरिष॑श्चरति॒ मध्व॑ इ॒ष्णन्। एवै॑र॒न्यस्य॑ पी॒पय॑न्त॒ वाजै॒र्वेष॑न्तीरू॒र्ध्वा न॒द्यो॑ न॒ आगुः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो आप्त अध्यापक और उपदेशकों से विद्याओं को प्राप्त होके औरों को देते हैं, वे अग्नि के तुल्य तेजस्वी शुद्ध होकर सब ओर से वर्त्तमान हैं॥६॥

अस॑र्जि वां॒ स्थवि॑रा वेधसा॒ गीर्वा॒ळ्हे अ॑श्विना त्रे॒धा क्षर॑न्ती। उप॑स्तुताववतं॒ नाध॑मानं॒ याम॒न्नया॑मञ्छृणुतं॒ हवं॑ मे॥

जो श्रेष्ठ धर्मात्मा विद्वानों की वाणी को सुनते हैं, वे कुमार्ग को छोड़ सुमार्ग को प्राप्त होते हैं। जो मन और कर्म से झूठ बोलने को नहीं चाहते, वे माननीय होते हैं॥७॥

उ॒त स्या वां॒ रुश॑तो॒ वप्स॑सो॒ गीस्त्रि॑ब॒र्हिषि॒ सद॑सि पिन्वते॒ नॄन्। वृषा॑ वां मे॒घो वृ॑षणा पीपाय॒ गोर्न सेके॒ मनु॑षो दश॒स्यन्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्य जब सत्य कहते हैं तब उनके मुख की आकृति मलीन नहीं होती और जब झूठ कहते हैं तब उनका मुख मलीन हो जाता है। जैसे पृथिवी पर ओषधियों का बढ़ानेवाला मेघ है, वैसे जो सभासद् उपदेश करने योग्यों को सत्य भाषण से बढ़ाते हैं, वे सबके हितैषी होते हैं॥८॥

यु॒वां पू॒षेवा॑श्विना॒ पुरं॑धिर॒ग्निमु॒षां न ज॑रते ह॒विष्मा॑न्। हु॒वे यद्वां॑ वरिव॒स्या गृ॑णा॒नो वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य सबकी पुष्टि करनेवाला अग्नि और प्रभात समय को प्रकट करता वैसे प्रशंसित दानशील पुरुष विद्वानों के गुणों को अच्छे प्रकार कहता है॥९॥इस सूक्त में अश्वि के दृष्टान्त से अध्यापक और उपदेशकों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की सङ्गति पिछले सूक्त के साथ समझनी चाहिये॥यह एकसौ इक्यासीवाँ सूक्त और छब्बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अभू॑दि॒दं व॒युन॒मो षु भू॑षता॒ रथो॒ वृष॑ण्वा॒न्मद॑ता मनीषिणः। धि॒यं॒जि॒न्वा धिष्ण्या॑ वि॒श्पला॑वसू दि॒वो नपा॑ता सु॒कृते॒ शुचि॑व्रता॥

हे मनुष्यो वे श्रेष्ठ अध्यापक और उपदेशक नहीं है कि जिनके सङ्ग से प्रजा पालना, सुशीलता, ईश्वर, धर्म और शिल्प व्यवहार की विद्या न बढ़ें॥१॥

इन्द्र॑तमा॒ हि धिष्ण्या॑ म॒रुत्त॑मा द॒स्रा दंसि॑ष्ठा र॒थ्या॑ र॒थीत॑मा। पू॒र्णं रथं॑ वहेथे॒ मध्व॒ आचि॑तं॒ तेन॑ दा॒श्वांस॒मुप॑ याथो अश्विना॥

जो बिजुली, अग्नि, जल और वायु इनसे चलाये हुए रथ पर स्थित हो देशदेशान्तर को जाते हैं, वे परिपूर्ण धन जीतनेवाले होते हैं॥२॥

किमत्र॑ दस्रा कृणुथः॒ किमा॑साथे॒ जनो॒ यः कश्चि॒दह॑विर्मही॒यते॑। अति॑ क्रमिष्टं जु॒रतं॑ प॒णेरसुं॒ ज्योति॒र्विप्रा॑य कृणुतं वच॒स्यवे॑॥

अध्यापक और उपदेशक जैसे आप्त विद्वान् सबके सुख के लिये उत्तम यत्न करता है, वैसे अपना वर्त्ताव वर्त्ते॥३॥

ज॒म्भय॑तम॒भितो॒ राय॑तः॒ शुनो॑ ह॒तं मृधो॑ वि॒दथु॒स्तान्य॑श्विना। वाचं॑वाचं जरि॒तू र॒त्निनीं॑ कृतमु॒भा शंसं॑ नासत्यावतं॒ मम॑॥

जिनका दुष्टों के बाँधने, शत्रुओं के जीतने और विद्वानों के उपदेश के स्वीकार करने में सामर्थ्य है, वे ही हम लोगों के रक्षक होते हैं॥४॥

यु॒वमे॒तं च॑क्रथुः॒ सिन्धु॑षु प्ल॒वमा॑त्म॒न्वन्तं॑ प॒क्षिणं॑ तौ॒ग्र्याय॒ कम्। येन॑ देव॒त्रा मन॑सा निरू॒हथुः॑ सुपप्त॒नी पे॑तथुः॒ क्षोद॑सो म॒हः॥

जो जन लम्बी, चौड़ी, ऊँची नावों को रच के समुद्र के बीच जाना-आना करते हैं, वे आप सुखी होकर औरों को सुखी करते हैं॥५॥

अव॑विद्धं तौ॒ग्र्यम॒प्स्व१॒॑न्तर॑नारम्भ॒णे तम॑सि॒ प्रवि॑द्धम्। चत॑स्रो॒ नावो॒ जठ॑लस्य॒ जुष्टा॒ उद॒श्विभ्या॑मिषि॒ताः पा॑रयन्ति॥

मनुष्य जब नौका में बैठके समुद्र के मार्ग से जाने की इच्छा करें, तब बड़ी नाव के साथ छोटी नावें जोड़ समुद्र में जाना-आना करें॥६॥

कः स्वि॑द्वृ॒क्षो निःष्ठि॑तो॒ मध्ये॒ अर्ण॑सो॒ यं तौ॒ग्र्यो ना॑धि॒तः प॒र्यष॑स्वजत्। प॒र्णा मृ॒गस्य॑ प॒तरो॑रिवा॒रभ॒ उद॑श्विना ऊहथुः॒ श्रोम॑ताय॒ कम्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे नौका पर जानेवालो! समुद्र में कोई वृक्ष है जिसमें बन्धी हुई नौका स्थित हों, वहाँ नहीं वृक्ष और न आधार है किन्तु नौका ही आधार, वल्ली ही खम्भे हैं, ऐसे ही जैसे पखेरू ऊपर को जाय फिर नीचे आते हैं वैसे ही विमानादि यान हैं॥७॥

तद्वां॑ नरा नासत्या॒वनु॑ ष्या॒द्यद्वां॒ माना॑स उ॒चथ॒मवो॑चन्। अ॒स्माद॒द्य सद॑सः सो॒म्यादा वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्य को यह अच्छे प्रकार उचित है कि अपने प्रयोजन को चाहे तथा परोपकार भी चाहे और विद्वान् जन जिस जिसका उपदेश करें उस उसको प्रीति से सब लोग ग्रहण करें॥८॥इस सूक्त में विद्वानों के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह एकसौ बयासीवाँ सूक्त और अट्ठाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

तं यु॑ञ्जाथां॒ मन॑सो॒ यो जवी॑यान्त्रिवन्धु॒रो वृ॑षणा॒ यस्त्रि॑च॒क्रः। येनो॑पया॒थः सु॒कृतो॑ दुरो॒णं त्रि॒धातु॑ना पतथो॒ विर्न प॒र्णैः॥

जो शीघ्र ले जाने और पखेरू के समान आकाश में चलनेवाले साङ्गोपाङ्ग अच्छे बने हुए रथ को नहीं सिद्ध करते हैं, वे कैसे ऐश्वर्य को पावें ?॥१॥

सु॒वृद्रथो॑ वर्तते॒ यन्न॒भि क्षां यत्तिष्ठ॑थः॒ क्रतु॑म॒न्तानु॑ पृ॒क्षे। वपु॑र्वपु॒ष्या स॑चतामि॒यं गीर्दि॒वो दु॑हि॒त्रोषसा॑ सचेथे॥

मनुष्य जिस यान से जाने को चाहें वह सुन्दर पृथिव्यादिकों में शीघ्र चलने योग्य प्रभात वेला के समान प्रकाशमान जैसे वैसे अच्छे विचार से बनावें॥२॥

आ ति॑ष्ठतं सु॒वृतं॒ यो रथो॑ वा॒मनु॑ व्र॒तानि॒ वर्त॑ते ह॒विष्मा॑न्। येन॑ नरा नासत्येष॒यध्यै॑ व॒र्तिर्या॒थस्तन॑याय॒ त्मने॑ च॥

मनुष्य अपने (व) सन्तानों की सुखोन्नति के लिये अच्छा दृढ़, लम्बे, चौड़े, साङ्गोपाङ्ग सामग्री से पूर्ण शीघ्र चलनेवाले भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य अर्थात् चट-पट खाने उत्तमता से धीरज में खाने, चाटने और चूषने योग्य पदार्थों से युक्त रथ से पृथिवी, समुद्र और आकाश मार्गों में अति उत्तमता से सावधानी के साथ जावें और आवें॥३॥

मा वां॒ वृको॒ मा वृ॒कीरा द॑धर्षी॒न्मा परि॑ वर्क्तमु॒त माति॑ धक्तम्। अ॒यं वां॑ भा॒गो निहि॑त इ॒यं गीर्दस्रा॑वि॒मे वां॑ नि॒धयो॒ मधू॑नाम्॥

मनुष्य जब घर में निवास करें वा यानों में और वन में प्रतिष्ठित होवें तब भोग करने के लिये पूर्ण भोग और उपभोग योग्य पदार्थों, शस्त्र वा अस्त्रों और वीरसेना को संस्थापन कर निवास करें वा जावें, जिससे कोई विघ्न न हो॥४॥

यु॒वां गोत॑मः पुरुमी॒ळ्हो अत्रि॒र्दस्रा॒ हव॒तेऽव॑से ह॒विष्मा॑न्। दिशं॒ न दि॒ष्टामृ॑जू॒येव॒ यन्ता मे॒ हवं॑ नास॒त्योप॑ यातम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे नौकादि यान से जानेवाले जन सरल मार्ग से बताई हुई दिशा को जाते हैं, वैसे सीखनेवाले विद्यार्थी जन आप्त विद्वानों के समीप जावें॥५॥

अता॑रिष्म॒ तम॑सस्पा॒रम॒स्य प्रति॑ वां॒ स्तोमो॑ अश्विनावधायि। एह या॑तं प॒थिभि॑र्देव॒यानै॑र्वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥

जो अतीव शिल्पविद्यावेत्ता जन हों वे ही नौकादि यानों से भू, समुद्र और अन्तरिक्ष मार्गों से पार-अवर लेजा-लेआ सकते हैं, वे ही विद्वानों के मार्गों में अग्नि आदि पदार्थों से बने हुए विमान आदि यानों से जाने को योग्य हैं॥६॥इस सूक्त में विद्वानों की शिल्पविद्या के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह एकसौ तिरासीवाँ सूक्त और ऊनतीसवाँ वर्ग और चतुर्थाऽध्याय समाप्त हुआ॥इस अध्याय में जन्म, पवन, इन्द्र, अग्नि, अश्वि और विमानादि यानों के गुणों का वर्णन आदि होने से इस अध्याय के अर्थ की पिछले अध्याय के अर्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये॥। इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्याणां परमविदुषां श्रीमद्विरजानन्दसरस्वतीस्वामिनां शिष्येण परमहंसपरिव्राजकाचार्येण श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिना निर्मिते संस्कृतार्य्यभाषाभ्यां विभूषिते सुप्रमाणयुक्ते ऋग्वेदभाष्ये द्वितीयाऽष्टकस्य चतुर्थाऽध्यायः समाप्तः॥

ता वा॑म॒द्य ताव॑प॒रं हु॑वेमो॒च्छन्त्या॑मु॒षसि॒ वह्नि॑रु॒क्थैः। नास॑त्या॒ कुह॑ चि॒त्सन्ता॑व॒र्यो दि॒वो नपा॑ता सु॒दास्त॑राय॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् जन आकाश और पृथिवी से उपकार करते हैं, वैसे हम लोग विद्वानों से उपकार को प्राप्त हुए वर्त्तें॥१॥

अ॒स्मे ऊ॒ षु वृ॑षणा मादयेथा॒मुत्प॒णीँर्ह॑तमू॒र्म्या मद॑न्ता। श्रु॒तं मे॒ अच्छो॑क्तिभिर्मती॒नामेष्टा॑ नरा॒ निचे॑तारा च॒ कर्णैः॑॥

जैसे अध्यापक और उपदेश करनेवाले जन पढ़ाने और उपदेश सुनाने योग्य पुरुषों को वेदवचनों से अच्छे प्रकार ज्ञान देकर विद्वान् करते हैं, वैसे उनके वचन को सुनके वे सब काल में सबको आनन्दित करने योग्य हैं॥२॥

श्रि॒ये पू॑षन्निषु॒कृते॑व दे॒वा नास॑त्या वह॒तुं सू॒र्यायाः॑। व॒च्यन्ते॑ वां ककु॒हा अ॒प्सु जा॒ता यु॒गा जू॒र्णेव॒ वरु॑णस्य॒ भूरेः॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसी बाणकृत सेना अर्थात् बाण के समान प्रेरणा दी हुई सेना शत्रुओं को जीतती है वैसे धन के श्रेष्ठ उपाय को शीघ्र ही करे, काल के विशेष विभागों में जो दिन है, उनमें कार्य जैसे बनते हैं, वैसे रात्रि भागों में नहीं उत्पन्न होते हैं, श्रेष्ठ गुणीजनों की सब जगह प्रशंसा होती है॥३॥

अ॒स्मे सा वां॑ माध्वी रा॒तिर॑स्तु॒ स्तोमं॑ हिनोतं मा॒न्यस्य॑ का॒रोः। अनु॒ यद्वां॑ श्रव॒स्या॑ सुदानू सु॒वीर्या॑य चर्ष॒णयो॒ मद॑न्ति॥

जो आप्त श्रेष्ठ सद्धर्मी सज्जनों की नीति और विद्वानों की स्तुति मनोहर हो, वह उत्तम पराक्रम के लिये समर्थ होती है॥४॥

ए॒ष वां॒ स्तोमो॑ अश्विनावकारि॒ माने॑भिर्मघवाना सुवृ॒क्ति। या॒तं व॒र्तिस्तन॑याय॒ त्मने॑ चा॒गस्त्ये॑ नासत्या॒ मद॑न्ता॥

वही स्तुति होती है, जिनको विद्वान् जन मानते हैं, वैसी ही परोपकार होता है, जैसा अपने सन्तान और अपने लिये चाहा जाता है और वही धर्ममार्ग हो कि जिसमें श्रेष्ठ धर्मात्मा विद्वान् जन चलते हैं॥५॥

अता॑रिष्म॒ तम॑सस्पा॒रम॒स्य प्रति॑ वां॒ स्तोमो॑ अश्विनावधायि। एह या॑तं प॒थिभि॑र्देव॒यानै॑र्वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥

वे ही विद्या के परमपार मनुष्यों को पहुँचा सकते हैं, जो धर्म मार्ग से ही चलते हैं और यथार्थ के उपदेशक भी हैं॥६॥इस सूक्त में अध्यापक और उपदेशकों के लक्षणों को कहने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये॥यह एकसौ चौरासीवाँ सूक्त और प्रथम वर्ग समाप्त हुआ॥

क॒त॒रा पूर्वा॑ कत॒राप॑रा॒योः क॒था जा॒ते क॑वयः॒ को वि वे॑द। विश्वं॒ त्मना॑ बिभृतो॒ यद्ध॒ नाम॒ वि व॑र्तेते॒ अह॑नी च॒क्रिये॑व॥

हे विद्वानो! जो इस जगत् में द्यावापृथिवी और जो प्रथम कारण और परकार्य्यरूप पदार्थ हैं तथा जो आधाराधेय सम्बन्ध से दिन-रात्रि के समान वर्त्तमान हैं, उन सबको तुम जानो॥१॥

भूरिं॒ द्वे अच॑रन्ती॒ चर॑न्तं प॒द्वन्तं॒ गर्भ॑म॒पदी॑ दधाते। नित्यं॒ न सू॒नुं पि॒त्रोरु॒पस्थे॒ द्यावा॒ रक्ष॑तं पृथिवी नो॒ अभ्वा॑त्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे भूमि सूर्य दृढ़ होते हुए स्थावर, जङ्गम, चर, अचर, जगत् को बहुत प्रकार से पाल के बढ़ाते हैं, वैसे माता, पिता, अतिथि, आचार्य्य, सन्तान और शिष्यों की अच्छे प्रकार रक्षा कर विद्या और उत्तम शिक्षा से बढ़ावें॥२॥

अ॒ने॒हो दा॒त्रमदि॑तेरन॒र्वं हु॒वे स्व॑र्वदव॒धं नम॑स्वत्। तद्रो॑दसी जनयतं जरि॒त्रे द्यावा॒ रक्ष॑तं पृथिवी नो॒ अभ्वा॑त्॥

जो ये भूमि सूर्य और प्रत्यक्ष पदार्थ दीखते हैं, वे अविनाशी अनादिकारण से हुए है, ऐसा जानना चाहिये॥३॥

अत॑प्यमाने॒ अव॒साव॑न्ती॒ अनु॑ ष्याम॒ रोद॑सी दे॒वपु॑त्रे। उ॒भे दे॒वाना॑मु॒भये॑भि॒रह्नां॒ द्यावा॒ रक्ष॑तं पृथिवी नो॒ अभ्वा॑त्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पृथिवी आदि पदार्थ समस्त स्थावर जङ्गम की पालना करते हैं, वैसे माता, पिता, आचार्य्य और राजा आदि प्रजा की रक्षा करें॥४॥

सं॒गच्छ॑माने युव॒ती सम॑न्ते॒ स्वसा॑रा जा॒मी पि॒त्रोरु॒पस्थे॑। अ॒भि॒जिघ्र॑न्ती॒ भुव॑नस्य॒ नाभिं॒ द्यावा॒ रक्ष॑तं पृथिवी नो॒ अभ्वा॑त्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे ब्रह्मचर्य से विद्या सिद्धि किये हुए तरुण जिनको परस्पर पूर्ण प्रीति है, वे कन्या-वर सुखी हों, वैसे द्यावापृथिवी जगत् के हित के लिये वर्त्तमान हैं॥५॥

उ॒र्वी सद्म॑नी बृह॒ती ऋ॒तेन॑ हु॒वे दे॒वाना॒मव॑सा॒ जनि॑त्री। द॒धाते॒ ये अ॒मृतं॑ सु॒प्रती॑के॒ द्यावा॒ रक्ष॑तं पृथिवी नो॒ अभ्वा॑त्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो माता-पिता सत्योपदेश से सूर्य के समान विद्या प्रकाश से युक्त सर्वगुण सम्भृत पृथिवी जैसे जल से वृक्षों को वैसे शारीरिक बल से बढ़ाते हैं, वे सबकी रक्षा करने को योग्य हैं॥६॥

उ॒र्वी पृ॒थ्वी ब॑हु॒ले दू॒रेअ॑न्ते॒ उप॑ ब्रुवे॒ नम॑सा य॒ज्ञे अ॒स्मिन्। द॒धाते॒ ये सु॒भगे॑ सु॒प्रतू॑र्ती॒ द्यावा॒ रक्ष॑तं पृथिवी नो॒ अभ्वा॑त्॥

जैसे पृथिवी के समीप में चन्द्रलोक की भूमि है वैसे सूर्य लोकस्थ भूमि दूर में है, ऐसे सब जगह प्रकाश और अन्धकाररूप लोकद्वय वर्त्तमान है, उन लोकों से जैसे उन्नति हो वैसा यत्न सबको करना चाहिये॥७॥

दे॒वान्वा॒ यच्च॑कृ॒मा कच्चि॒दागः॒ सखा॑यं वा॒ सद॒मिज्जास्प॑तिं वा। इ॒यं धीर्भू॑या अव॒यान॑मेषां॒ द्यावा॒ रक्ष॑तं पृथिवी नो॒ अभ्वा॑त्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो माता-पिता सन्तानों को अन्न, जल के समान नहीं पालते, वे अपने धर्म्म से गिरते हैं और माता-पिताओं की रक्षा नहीं करते, वे सन्तान भी अधर्मी होते हैं॥८॥

उ॒भा शंसा॒ नर्या॒ माम॑विष्टामु॒भे मामू॒ती अव॑सा सचेताम्। भूरि॑ चिद॒र्यः सु॒दास्त॑राये॒षा मद॑न्त इषयेम देवाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य और चन्द्रमा सबका संयोग कर प्राणियों को सुखी करते हैं तथा जैसे धनाढ्य वैश्य बहुत अन्न आदि पदार्थ देकर भिखारियों को प्रसन्न करता है, वैसे विद्वान् जन सबके प्रसन्न करने में प्रवृत्त होवें॥९॥

ऋ॒तं दि॒वे तद॑वोचं पृथि॒व्या अ॑भिश्रा॒वाय॑ प्रथ॒मं सु॑मे॒धाः। पा॒ताम॑व॒द्याद्दु॑रि॒ताद॒भीके॑ पि॒ता मा॒ता च॑ रक्षता॒मवो॑भिः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। उपदेश करनेवाले को उपदेश सुनने योग्यों के प्रति ऐसा कहना चाहिये कि जैसा प्रिय लोकहितकारी वचन मुझसे कहा जावे, वैसे आप लोगों को भी कहना चाहिये, जैसे माता-पिता अपने सन्तानों की सेवा करते हैं, वैसे ये सन्तानों को भी सदा सेवने योग्य हैं॥१०॥

इ॒दं द्या॑वापृथिवी स॒त्यम॑स्तु॒ पित॒र्मात॒र्यदि॒होप॑ब्रु॒वे वा॑म्। भू॒तं दे॒वाना॑मव॒मे अवो॑भिर्वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥

माता-पिता जब सन्तानों के प्रति ऐसा उपदेश करें कि जो हमारे धर्मयुक्त कर्म हैं, वे ही तुमको सेवने चाहियें और नहीं तथा सन्तान पिता-माता आदि अपने पालनेवालों से ऐसे कहें कि जो हमारे सत्य आचरण हैं, वे ही तुमको आचरण करने चाहियें और उनसे विपरीत नहीं॥११॥इस सूक्त में द्यावापृथिवी के दृष्टान्त से उत्पन्न होने योग्य और उत्पादक के कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह एकसौ पचासीवाँ सूक्त और तीसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

आ न॒ इळा॑भिर्वि॒दथे॑ सुश॒स्ति वि॒श्वान॑रः सवि॒ता दे॒व ए॑तु। अपि॒ यथा॑ युवानो॒ मत्स॑था नो॒ विश्वं॒ जग॑दभिपि॒त्वे म॑नी॒षा॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे परमात्मा पक्षपात को छोड़के सबका न्याय और सभों में समान प्रीति करता है, वैसे विद्वानों को भी होना चाहिये। जैसा युवावस्थावाले पुरुष अपने समान मन को प्यारी युवती स्त्रियों के साथ विवाह कर सुखयुक्त होते हैं, वैसे विद्वान् जन विद्यार्थियों को विद्वान् कर प्रसन्न होते हैं॥१॥

आ नो॒ विश्व॒ आस्क्रा॑ गमन्तु दे॒वा मि॒त्रो अ॑र्य॒मा वरु॑णः स॒जोषाः॑। भुव॒न्यथा॑ नो॒ विश्वे॑ वृ॒धासः॒ कर॑न्त्सु॒षाहा॑ विथु॒रं न शवः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जिस मार्ग से विद्वान् जन चलें, उसीसे सर्व लोग चलें। जैसे आप्त शास्त्रज्ञ विद्वान् जन औरों के सुख-दुःखों को अपने तुल्य जानते हैं, वैसे ही सबको होना चाहिये॥२॥

प्रेष्ठं॑ वो॒ अति॑थिं गृणीषे॒ऽग्निं श॒स्तिभि॑स्तु॒र्वणिः॑ स॒जोषाः॑। अस॒द्यथा॑ नो॒ वरु॑णः सुकी॒र्तिरिष॑श्च पर्षदरिगू॒र्तः सू॒रिः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो गृहस्थजन प्रीति के साथ श्रेष्ठ, उत्तम शास्त्रज्ञ विद्वानों और अतिथि की सेवा करते हैं, धर्मयुक्त व्यवहार में उद्योगवान् होते वे यथार्थ विज्ञान को पाकर श्रीमान् होते हैं॥३॥

उप॑ व॒ एषे॒ नम॑सा जिगी॒षोषासा॒नक्ता॑ सु॒दुघे॑व धे॒नुः। स॒मा॒ने अह॑न्वि॒मिमा॑नो अ॒र्कं विषु॑रूपे॒ पय॑सि॒ सस्मि॒न्नूध॑न्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो रात्रि-दिवस के समान वर्त्तमान विद्या-अविद्या को जानकर, सब समय में उद्योग कर, धेनु के समान प्राणियों का उपकार कर, दुष्टों को जीतते, वे दूध में घी के तुल्य संसार में सारभूत होते हैं॥४॥

उ॒त नोऽहि॑र्बु॒ध्न्यो॒३॒॑ मय॑स्कः॒ शिशुं॒ न पि॒प्युषी॑व वेति॒ सिन्धुः॑। येन॒ नपा॑तम॒पां जु॒नाम॑ मनो॒जुवो॒ वृष॑णो॒ यं वह॑न्ति॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मेघ न हो तो माता के तुल्य प्राणियों की पालना कौन करे ? जो सूर्य, बिजुली और पवन न हों तो इस मेघ को कौन धारण करे ?॥५॥

उ॒त न॑ ईं॒ त्वष्टा ग॒न्त्वच्छा॒ स्मत्सू॒रिभि॑रभिपि॒त्वे स॒जोषाः॑। आ वृ॑त्र॒हेन्द्र॑श्चर्षणि॒प्रास्तु॒विष्ट॑मो न॒रां न॑ इ॒ह ग॑म्याः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सूर्य के समान विद्या का प्रकाश कराते हैं, और अपने आत्मा के तुल्य सबको मान सुखी करते हैं, वे बलवान् होते हैं॥६॥

उ॒त न॑ ईं म॒तयोऽश्व॑योगाः॒ शिशुं॒ न गाव॒स्तरु॑णं रिहन्ति। तमीं॒ गिरो॒ जन॑यो॒ न पत्नीः॑ सुर॒भिष्ट॑मं न॒रां न॑सन्त॥

जैसे घुड़चढ़ा शीघ्र एकस्थान से दूसरे स्थान को वा जे गौयें बछड़ों को वा स्त्रीव्रत जन अपनी अपनी पत्नियों को प्राप्त होते हैं, वैसे विद्वान् जन विद्या और श्रेष्ठ विद्वानों की वाणियों को प्राप्त होते हैं॥७॥

उ॒त न॑ ईं म॒रुतो॑ वृ॒द्धसे॑नाः॒ स्मद्रोद॑सी॒ सम॑नसः सदन्तु। पृष॑दश्वासो॒ऽवन॑यो॒ न रथा॑ रि॒शाद॑सो मित्र॒युजो॒ न दे॒वाः॥

जिनकी वीर सेना जो समान मति रखनेवाले बड़े बड़े रथादि यान जिनके तीर (=पास) पृथिवी के समान क्षमाशील मित्रप्रिय विद्वान् जन सबका प्रिय आचरण करते हैं, वे प्रसन्न होते हैं॥८॥

प्र नु यदे॑षां महि॒ना चि॑कि॒त्रे प्र यु॑ञ्जते प्र॒युज॒स्ते सु॑वृ॒क्ति। अध॒ यदे॑षां सु॒दिने॒ न शरु॒र्विश्व॒मेरि॑णं प्रुषा॒यन्त॒ सेनाः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजजन पूरी विद्यावाले अध्यापकों को विद्याप्रचार के लिये प्रवृत्त करते हैं, वे महिमा—बड़ाई को प्राप्त होते हैं। जो किये को जाननेवाले कुलीन शूरवीरों की सेनाओं को पुष्ट करते, वे सदा विजय को प्राप्त होते हैं॥९॥

प्रो अ॒श्विना॒वव॑से कृणुध्वं॒ प्र पू॒षणं॒ स्वत॑वसो॒ हि सन्ति॑। अ॒द्वे॒षो विष्णु॒र्वात॑ ऋभु॒क्षा अच्छा॑ सु॒म्नाय॑ ववृतीय दे॒वान्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो रागद्वेषरहित, विद्याप्रचार के प्रिय, पूरे शारीरिक-आत्मिक बलवाले धार्मिक विद्वान् हैं, उनको सब लोग विद्याप्रचार के लिये संस्थापन करें, जिससे सुख बढ़े॥१०॥

इ॒यं सा वो॑ अ॒स्मे दीधि॑तिर्यजत्रा अपि॒प्राणी॑ च॒ सद॑नी च भूयाः। नि या दे॒वेषु॒ यत॑ते वसू॒युर्वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥

विद्या ही मनुष्यों को सुख देनेवाली है, जिसने विद्या धन न पाया वह भीतर से सदा दरिद्रसा वर्त्तमान रहता है॥११॥इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इसके अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जानना चाहिये॥यह एकसौ छयासीवाँ सूक्त और पाँचवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

पि॒तुं नु स्तो॑षं म॒हो ध॒र्माणं॒ तवि॑षीम्। यस्य॑ त्रि॒तो व्योज॑सा वृ॒त्रं विप॑र्वम॒र्दय॑त्॥

जो बहुत अन्न को ले अच्छा संस्कार कर और उसके गुणों को जान यथायोग्य और व्यञ्जनादि पदार्थों के साथ मिलाके खाते हैं, वे धर्म के आचरण करनेवाले होते हुए शरीर और आत्मा के बल को प्राप्त होकर पुरुषार्थ से लक्ष्मी की उन्नति कर सकते हैं॥१॥

स्वादो॑ पितो॒ मधो॑ पितो व॒यं त्वा॑ ववृमहे। अ॒स्माक॑मवि॒ता भ॑व॥

मनुष्यों को मधुरादि रस के योग से स्वादिष्ठ अन्न और व्यञ्जन को आयुर्वेद की रीति से बनाकर सदा भोजन करना चाहिये, जो रोग को नष्ट करने से आयुर्दा बढ़ाने से रक्षा करनेवाला हो॥२॥

उप॑ नः पित॒वा च॑र शि॒वः शि॒वाभि॑रू॒तिभिः॑। म॒यो॒भुर॑द्विषे॒ण्यः सखा॑ सु॒शेवो॒ अद्व॑याः॥

अन्नादि पदार्थव्यापी परमेश्वर आरोग्य देनेवाली रक्षारूप क्रियाओं से सब जीवों को मित्रभाव से अच्छे प्रकार पालता हुआ सबका मित्र हुआ ही वर्त्त रहा है॥३॥

तव॒ त्ये पि॑तो॒ रसा॒ रजां॒स्यनु॒ विष्ठि॑ताः। दि॒वि वाता॑ इव श्रि॒ताः॥

इस संसार में परमात्मा की व्यवस्था से लोकलोकान्तरों में भूमि, जल और पवन के अनुकूल रसादि पदार्थ होते हैं किन्तु सब पदार्थ सब जगह प्राप्त नहीं हो सकते॥४॥

तव॒ त्ये पि॑तो॒ दद॑त॒स्तव॑ स्वादिष्ठ॒ ते पि॑तो। प्र स्वा॒द्मानो॒ रसा॑नां तुवि॒ग्रीवा॑ इवेरते॥

सब पदार्थों में व्याप्त परमात्मा ही सभों के लिये अन्नादि पदार्थों को अच्छे प्रकार देता है और उसके किये हुए ही पदार्थ अपने गुणों के अनुकूल कोई अतीव स्वादु और कोई अतीव स्वादुतर हैं, यह सबको जानना चाहिये॥५॥

त्वे पि॑तो म॒हानां॑ दे॒वानां॒ मनो॑ हि॒तम्। अका॑रि॒ चारु॑ के॒तुना॒ तवाहि॒मव॑सावधीत्॥

यदि अन्न भोजन न किया जाय तो किसी का मन आनन्दित न हो क्योंकि मन अन्नमय है। इस कारण जिसकी उत्पत्ति के लिये मेघ निमित्त है, उस अन्न को सुन्दरता से बनाकर भोजन करना चाहिये॥६॥

यद॒दो पि॑तो॒ अज॑गन्वि॒वस्व॒ पर्व॑तानाम्। अत्रा॑ चिन्नो मधो पि॒तोऽरं॑ भ॒क्षाय॑ गम्याः॥

सब पदार्थों में व्याप्त परमेश्वर को भक्षण आदि समय में स्मरण करे, जिस कारण जिस परमात्मा की कृपा से अन्नादि पदार्थ विविध प्रकार के पूर्वादि दिशा, देश और काल के अनुकूल वर्त्तमान हैं, उस परमात्मा ही का संस्मरण कर सब पदार्थ ग्रहण करने चाहियें॥७॥

यद॒पामोष॑धीनां परिं॒शमा॑रि॒शाम॑हे। वाता॑पे॒ पीब॒ इद्भ॑व॥

जल, अन्न और घृत के संस्कार से प्रशंसित अन्न और व्यञ्जन इलायची, मिरच वा घृत, दूध पदार्थों को उत्तम बनाकर उन पदार्थों के भोजन करनेवाले जन युक्त आहार और विहार से पुष्ट होवें॥८॥

यत्ते॑ सोम॒ गवा॑शिरो॒ यवा॑शिरो॒ भजा॑महे। वाता॑पे॒ पीव॒ इद्भ॑व॥

जैसे मनुष्य अन्नादि पदार्थों में उन उन की पाकक्रिया के अनुकूल सब संस्कारों को करते हैं, वैसे रसों को भी रसोचित संस्कारों से सिद्ध करें॥९॥

क॒र॒म्भ ओ॑षधे भव॒ पीवो॑ वृ॒क्क उ॑दार॒थिः। वाता॑पे॒ पीव॒ इद्भ॑व॥

जैसे संयमी पुरुष शुभाचार से शरीर और आत्मा को बलयुक्त करता है, वैसे संयम से सब पदार्थों को सब वर्त्तो॥१०॥

तं त्वा॑ व॒यं पि॑तो॒ वचो॑भि॒र्गावो॒ न ह॒व्या सु॑षूदिम। दे॒वेभ्य॑स्त्वा सध॒माद॑म॒स्मभ्यं॑ त्वा सध॒माद॑म्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे गौयें तृण, घास आदि खाकर रत्न दूध देती हैं, वैसे अन्नादि पदार्थों से श्रेष्ठतर भाग निकाशना चाहिये। जो अपने सङ्गियों का अन्नादि पदार्थों से सत्कार करते और परस्पर एक दूसरे के आनन्द की इच्छा से परमात्मा का आश्रय लेते हैं, वे प्रशंसित होते हैं॥११॥इस सूक्त में अन्न के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये॥यह एकसौ सतासीवाँ सूक्त और सातवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

समि॑द्धो अ॒द्य रा॑जसि दे॒वो दे॒वैः स॑हस्रजित्। दू॒तो ह॒व्या क॒विर्व॑ह॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो अग्नि के समान दुष्टों को सब ओर से कष्ट देता, सज्जनों के सङ्ग से शत्रुओं को जीतता, विद्वानों के सङ्ग से बुद्धिमान् होता हुआ प्राप्त होने योग्य वस्तुओं को प्राप्त होता, वह राज्य करने को योग्य है॥१॥

तनू॑नपादृ॒तं य॒ते मध्वा॑ य॒ज्ञः सम॑ज्यते। दध॑त्सह॒स्रिणी॒रिषः॑॥

जिस कर्म से अतुल धन-धान्य प्राप्त होते हैं, उसका अनुष्ठान आरम्भ मनुष्य निरन्तर करें॥२॥

आ॒जुह्वा॑नो न॒ ईड्यो॑ दे॒वाँ आ व॑क्षि य॒ज्ञिया॑न्। अग्ने॑ सहस्र॒सा अ॑सि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे गुण, कर्म, स्वभाव से अच्छे प्रकार सेवन किया हुआ अग्नि बहुत कार्यों को सिद्ध करता है, वैसे सेवा किया हुआ आप्त विद्वान् समस्त शुभ गुणों और कार्यसिद्धियों को प्राप्त कराता है॥३॥

प्रा॒चीनं॑ ब॒र्हिरोज॑सा स॒हस्र॑वीरमस्तृणन्। यत्रा॑दित्या वि॒राज॑थ॥

जिस सनातन कारण में सूर्य्यादि लोक-लोकान्तर प्रकाशित होते हैं, वहाँ तुम हम प्रकाशित होते हैं॥४॥

वि॒राट् स॒म्राड्वि॒भ्वीः प्र॒भ्वीर्ब॒ह्वीश्च॒ भूय॑सीश्च॒ याः। दुरो॑ घृ॒तान्य॑क्षरन्॥

हे मनुष्यो! जो सब जगत् की बहुत तत्त्वयुक्त सत्व रजस्तमो गुणवाली सूक्ष्ममात्रा नित्यस्वरूप से सदा वर्त्तमान हैं, उनको लेकर पृथिवीपर्यन्त पदार्थों को जान सब कार्य सिद्ध करने चाहियें॥५॥

सु॒रु॒क्मे हि सु॒पेश॒साधि॑ श्रि॒या वि॒राज॑तः। उ॒षासा॒वेह सी॑दताम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो इस सृष्टि के विद्या और अच्छी शिक्षा को पाकर कार्य्यज्ञानपूर्वक कारणज्ञान को प्राप्त होते हैं, वे सूर्य-चन्द्रमा के समान परोपकार में रमते हैं॥६॥

प्र॒थ॒मा हि सु॒वाच॑सा॒ होता॑रा॒ दैव्या॑ क॒वी। य॒ज्ञं नो॑ यक्षतामि॒मम्॥

इस संसार में जो जिनका उपकार करते हैं, वे उनको सत्कार करने योग्य होते हैं॥७॥

भार॒तीळे॒ सर॑स्वति॒ या वः॒ सर्वा॑ उपब्रु॒वे। ता न॑श्चोदयत श्रि॒ये॥

जो प्रशंसित सौन्दर्य उत्तम लक्षणों से युक्त देखी गई, श्रेष्ठतर शास्त्रविज्ञान में रमनेवाली कन्या हों, वे अपने पाणिग्रहण करनेवाले पतियों को पाकर धर्म से धनादि पदार्थों की उन्नति करें॥८॥

त्वष्टा॑ रू॒पाणि॒ हि प्र॒भुः प॒शून्विश्वा॑न्त्समान॒जे। तेषां॑ नः स्फा॒तिमा य॑ज॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जगदीश्वर ने इन्द्रियों से परे जो अतिसूक्ष्म कारण है उससे चित्र-विचित्र सूर्य, चन्द्रमा, पृथिवी, ओषधि और मनुष्य के शरीरावयवादि वस्तु बनाई हैं, वैसे इस सृष्टि के गुण, कर्म और स्वभाव क्रम से अनेक व्यवहार सिद्ध करनेवाली वस्तुयें बनानी चाहियें॥९॥

उप॒ त्मन्या॑ वनस्पते॒ पाथो॑ दे॒वेभ्यः॑ सृज। अ॒ग्निर्ह॒व्यानि॑ सिष्वदत्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो वनादिकों की रक्षा से घास, फूस और ओषधियों को बढ़ाते हैं, वे सबका उपकार करने योग्य होते हैं॥१०॥

पु॒रो॒गा अ॒ग्निर्दे॒वानां॑ गाय॒त्रेण॒ सम॑ज्यते। स्वाहा॑कृतीषु रोचते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। यदि मनुष्य अग्निप्रधान दिव्य पदार्थों को व्यवहारसिद्धि के लिये संयुक्त करें तो वे ऐश्वर्ययुक्त होकर माननीय होते हैं, यह समझना चाहिये॥११॥इस सूक्त में अग्नि के दृष्टान्त से राजा, अध्यापक, उपदेशक, स्त्रीपुरुष, ईश्वर और देनेवाले के गुणों का वर्णन होने से इसके अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये॥यह एकसौ अठासीवाँ सूक्त और नवमाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अग्ने॒ नय॑ सु॒पथा॑ रा॒ये अ॒स्मान्विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि वि॒द्वान्। यु॒यो॒ध्य१॒॑स्मज्जु॑हुरा॒णमेनो॒ भूयि॑ष्ठां ते॒ नम॑उक्तिं विधेम॥

मनुष्यों को धर्म तथा विज्ञान मार्ग की प्राप्ति और अधर्म की निवृत्ति के लिये परमेश्वर की अच्छे प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये और सदा सुमार्ग से चलना चाहिये, दुःखरूपी अधर्ममार्ग से अलग रहना चाहिये, जैसे विद्वान् लोग परमेश्वर में उत्तम अनुराग करते वैसे अन्य लोगों को भी करना चाहिये॥१॥

अग्ने॒ त्वं पा॑रया॒ नव्यो॑ अ॒स्मान्त्स्व॒स्तिभि॒रति॑ दु॒र्गाणि॒ विश्वा॑। पूश्च॑ पृ॒थ्वी ब॑हु॒ला न॑ उ॒र्वी भवा॑ तो॒काय॒ तन॑याय॒ शं योः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे परमेश्वर पुण्यात्मा जनों को दुष्ट आचार से अलग रखता और पृथिवी के समान पालना करता है, वैसे विद्वान् जन सुन्दर शिक्षा से उत्तम कर्म करनेवालों को दुष्ट आचरण से अलग कर सुन्दर व्यवहार से रक्षा करता है॥२॥

अग्ने॒ त्वम॒स्मद्यु॑यो॒ध्यमी॑वा॒ अन॑ग्नित्रा अ॒भ्यम॑न्त कृ॒ष्टीः। पुन॑र॒स्मभ्यं॑ सुवि॒ताय॑ देव॒ क्षां विश्वे॑भिर॒मृते॑भिर्यजत्र॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे ईश्वर वेदद्वारा अविद्यारूपी रोग से मनुष्यों को अलग करता है, वैसे अच्छे वैद्य मनुष्यों को रोगों से निवृत्त कर अमृतरूपी ओषधियों से बढ़ाकर ऐश्वर्य की प्राप्ति कराते हैं॥३॥

पा॒हि नो॑ अग्ने पा॒युभि॒रज॑स्रैरु॒त प्रि॒ये सद॑न॒ आ शु॑शु॒क्वान्। मा ते॑ भ॒यं ज॑रि॒तारं॑ यविष्ठ नू॒नं वि॑द॒न्माप॒रं स॑हस्वः॥

वे ही प्रशंसनीय जन हैं, जो निरन्तर प्राणियों की रक्षा करते हैं और किसीके लिये भय वा निर्बलता को नहीं प्रकाशित करते हैं॥४॥

मा नो॑ अ॒ग्नेऽव॑ सृजो अ॒घाया॑वि॒ष्यवे॑ रि॒पवे॑ दु॒च्छुना॑यै। मा द॒त्वते॒ दश॑ते॒ मादते॑ नो॒ मा रीष॑ते सहसाव॒न्परा॑ दाः॥

मनुष्यों को विद्वान्, राजा, अध्यापक और उपदेशकों के प्रति ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये कि हम लोगों को दुष्ट स्वभाव और दुष्ट सङ्गवाले को मत पहुँचाओ किन्तु सदैव श्रेष्ठाचार धर्ममार्ग और सत्सङ्गों में संयुक्त करो॥५॥

वि घ॒ त्वावाँ॑ ऋतजात यंसद्गृणा॒नो अ॑ग्ने त॒न्वे॒३॒॑ वरू॑थम्। विश्वा॑द्रिरि॒क्षोरु॒त वा॑ निनि॒त्सोर॑भि॒ह्रुता॒मसि॒ हि दे॑व वि॒ष्पट्॥

जो गुण दोषों के जाननेवाले सत्याचरणवान् जन समस्त हिंसक, निन्दक और कुटिल जनों से अलग रहते हैं, वे समस्त कल्याण को प्राप्त होते हैं॥६॥

त्वं ताँ अ॑ग्न उ॒भया॒न्वि वि॒द्वान्वेषि॑ प्रपि॒त्वे मनु॑षो यजत्र। अ॒भि॒पि॒त्वे मन॑वे॒ शास्यो॑ भूर्मर्मृ॒जेन्य॑ उ॒शिग्भि॒र्नाक्रः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वान् जन जितना हो सके उतना हिंसक क्रूर और निन्दक जनों को अपने बल से सब ओर से मींजमांज उनका बल नष्ट कर सत्य की कामना करनेवालों को हर्ष दिलाते हैं, वे शिक्षा देनेवाले होकर शुद्ध होते हैं॥७॥

अवो॑चाम नि॒वच॑नान्यस्मि॒न्मान॑स्य सू॒नुः स॑हसा॒ने अ॒ग्नौ। व॒यं स॒हस्र॒मृषि॑भिः सनेम वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथाप्ताः शान्ता उपदेष्टारः श्रोतृभ्यः सत्यान्युपदिश्य सुखिनः कुर्वन्ति तैः सहान्ये विद्वांसो जायन्ते तथोपदिश्य श्रुत्वा विद्यावृद्धिं सर्वे कुर्वन्तु॥८॥अस्मिन् सूक्ते परमेश्वरविद्वच्छासकगुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति वेद्यम्॥इत्येकोननवत्युत्तरं शततमं सूक्तमेकादशो वर्गश्च समाप्तः॥अस्मिन् सूक्ते परमेश्वरविद्वच्छासकगुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति वेद्यम्॥इत्येकोननवत्युत्तरं शततमं सूक्तमेकादशो वर्गश्च समाप्तः॥

अ॒न॒र्वाणं॑ वृष॒भं म॒न्द्रजि॑ह्वं॒ बृह॒स्पतिं॑ वर्धया॒ नव्य॑म॒र्कैः। गा॒था॒न्यः॑ सु॒रुचो॒ यस्य॑ दे॒वा आ॑शृ॒ण्वन्ति॒ नव॑मानस्य॒ मर्ताः॑॥

जो गृहस्थ प्रशंसा करनेवाले धार्मिक विद्वान् वा अतिथि संन्यासी अभ्यागत आदि सज्जनों की प्रशंसा सुनें उन्हें दूर से भी बुलाकर अच्छी प्रीति अन्न, पान, वस्त्र और धनादिक पदार्थों से सत्कार कर उनसे सङ्ग कर विद्या की उन्नति से शरीर आत्मा के बल को बढ़वा न्याय से सभों को सुख के साथ संयोग करावें॥१॥

तमृ॒त्विया॒ उप॒ वाचः॑ सचन्ते॒ सर्गो॒ न यो दे॑वय॒तामस॑र्जि। बृह॒स्पतिः॒ स ह्यञ्जो॒ वरां॑सि॒ विभ्वाभ॑व॒त्समृ॒ते मा॑त॒रिश्वा॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे जल नीचे मार्ग से जाकर गढ़ेले में ठहरता वैसे जिसको विद्या शिक्षा प्राप्त होती हैं वह अभिमान छोड़के नम्र हो विद्याशय और उचित कहनेवाला प्रसिद्ध हो, जैसे सर्वत्र व्याप्त ईश्वर ने यथायोग्य विविध प्रकार का जगत् बनाया, वैसे विद्वानों की सेवा करनेवाला समस्त काम करनेवाला हो॥२॥

उप॑स्तुतिं॒ नम॑स॒ उद्य॑तिं च॒ श्लोकं॑ यंसत्सवि॒तेव॒ प्र बा॒हू। अ॒स्य क्रत्वा॑ह॒न्यो॒३॒॑ यो अस्ति॑ मृ॒गो न भी॒मो अ॑र॒क्षस॒स्तुवि॑ष्मान्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जिसके सूर्यप्रकाश के तुल्य विद्या, कीर्त्ति, उद्यम, प्रज्ञा और बल हों, वह सत्य वाणीवाला सबको सत्कार करने योग्य है॥३॥

अ॒स्य श्लोको॑ दि॒वीय॑ते पृथि॒व्यामत्यो॒ न यं॑सद्यक्ष॒भृद्विचे॑ताः। मृ॒गाणां॒ न हे॒तयो॒ यन्ति॑ चे॒मा बृह॒स्पते॒रहि॑मायाँ अ॒भि द्यून्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो दिव्य विद्या और प्रज्ञाशील विद्वानों की सेवा करता है, वह मेघ के डंग-डमालयुक्त दिनों के समान वर्त्तमान अविद्यायुक्त मनुष्यों को प्रकाश को सविता जैसे वैसे विद्या देकर पवित्र कर सकता है॥४॥

ये त्वा॑ देवोस्रि॒कं मन्य॑मानाः पा॒पा भ॒द्रमु॑प॒जीव॑न्ति प॒ज्राः। न दू॒ढ्ये॒३॒॑ अनु॑ ददासि वा॒मं बृह॑स्पते॒ चय॑स॒ इत्पिया॑रुम्॥

जो विद्वान् जन अपने निकटवर्त्ती अज्ञ, अभिमानी, पापी जनों को उपदेश दे धार्मिक करते हैं, वे कल्याण को प्राप्त होते हैं॥५॥

सु॒प्रैतुः॑ सू॒यव॑सो॒ न पन्था॑ दुर्नि॒यन्तुः॒ परि॑प्रीतो॒ न मि॒त्रः। अ॒न॒र्वाणो॑ अ॒भि ये चक्ष॑ते॒ नोऽपी॑वृता अपोर्णु॒वन्तो॑ अस्थुः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वान् जन पूर्ण साधन और उपसाधनों से युक्त उत्तम मार्ग से अविद्या युक्तों को विद्या और धर्म के बीच प्राप्त करते और जिसने इन्द्रिय नहीं जीते उसको जितेन्द्रियता देनेवाले मित्र के समान शिष्यों को उत्तम शिक्षा देते हैं, वे इस जगत् में अध्यापक और उपदेशक होने चाहियें॥६॥

सं यं स्तुभो॒ऽवन॑यो॒ न यन्ति॑ समु॒द्रं न स्र॒वतो॒ रोध॑चक्राः। स वि॒द्वाँ उ॒भयं॑ चष्टे अ॒न्तर्बृह॒स्पति॒स्तर॒ आप॑श्च॒ गृध्रः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सबका आधार भूमि सूर्य्य के चारों और जाती है वा जैसे नदी समुद्र को प्रवेश करती है, वैसे सज्जन श्रेष्ठ विद्वानों और विद्या को प्राप्त हो धर्म में प्रवेश कर बाहरले और भीतर के व्यवहारों को शुद्ध करें॥७॥

ए॒वा म॒हस्तु॑विजा॒तस्तुवि॑ष्मा॒न्बृह॒स्पति॑र्वृष॒भो धा॑यि दे॒वः। स नः॑ स्तु॒तो वी॒रव॑द्धातु॒ गोम॑द्वि॒द्यामे॒षं वृ॒जनं॑ जी॒रदा॑नुम्॥

विद्वानों को चाहिये कि सकल शास्त्रों के विचार के सार से विद्यार्थी जनों को शास्त्रसम्पन्न करें जिससे वे शारीरिक और आत्मिक बल और विज्ञान को प्राप्त होवें॥८॥इस सूक्त में विद्वानों के गुण, कर्म और स्वभावों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये॥यह एकसौ नब्बेवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

कङ्क॑तो॒ न कङ्क॒तोऽथो॑ सती॒नक॑ङ्कतः। द्वाविति॒ प्लुषी॒ इति॒ न्य१॒॑दृष्टा॑ अलिप्सत॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे कोई चञ्चल जन अध्यापक और उपदेशक को पाकर चञ्चलता देता है, वैसे न देखे हुए छोटे-छोटे विषधारी मत्कुण, डांश आदि क्षुद्र जीव बार-बार निवारण करने पर भी ऊपर गिरते हैं॥१॥

अ॒दृष्टा॑न्हन्त्याय॒त्यथो॑ हन्ति पराय॒ती। अथो॑ अवघ्न॒ती ह॒न्त्यथो॑ पिनष्टि पिंष॒ती॥

जो आये, न आये वा आनेवाले विषधारियों को अगली-पिछली ओषधियों के देने से निवृत्त कराते हैं, वे विषधारियों के विषों से नहीं पीड़ित होते हैं॥२॥

श॒रासः॒ कुश॑रासो द॒र्भासः॑ सै॒र्या उ॒त। मौ॒ञ्जा अ॒दृष्टा॑ वैरि॒णाः सर्वे॑ सा॒कं न्य॑लिप्सत॥

जो नाना प्रकार के तृणों में कहीं स्थानादि के लोभ से और कहीं उन तृणों के गन्ध लेने को अलग-अलग छोटे-छोटे विषधारी छिपे हुए जीव रहते हैं, वे अवसर पाकर मनुष्यादि प्राणियों को पीड़ा देते हैं॥३॥

नि गावो॑ गो॒ष्ठे अ॑सद॒न्नि मृ॒गासो॑ अविक्षत। नि के॒तवो॒ जना॑नां॒ न्य१॒॑दृष्टा॑ अलिप्सत॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे नाना प्रकार के जीव निज-निज सुख-संभोग के स्थान को प्रवेश करते हैं, वैसे विषधर जीव जहाँ-तहाँ पाये हुए स्थान को प्रवेश करते हैं॥४॥

ए॒त उ॒ त्ये प्रत्य॑दृश्रन्प्रदो॒षं तस्क॑रा इव। अदृ॑ष्टा॒ विश्व॑दृष्टाः॒ प्रति॑बुद्धा अभूतन॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे चोरों में डाँकू देखे और न देखे होते हैं, वैसे मनुष्य नाना प्रकार के प्रसिद्ध-अप्रसिद्ध विषधारियों वा विषों को जानें॥५॥

द्यौर्वः॑ पि॒ता पृ॑थि॒वी मा॒ता सोमो॒ भ्रातादि॑तिः॒ स्वसा॑। अदृ॑ष्टा॒ विश्व॑दृष्टा॒स्तिष्ठ॑ते॒लय॑ता॒ सु क॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विषधारी प्राणी हैं, वे शान्त्यादि उपायों से ओर ओषध्यादिकों से विषनिवारण करने चाहियें॥६॥

ये अंस्या॒ ये अङ्ग्याः॑ सू॒चीका॒ ये प्र॑कङ्क॒ताः। अदृ॑ष्टाः॒ किं च॒नेह वः॒ सर्वे॑ सा॒कं नि ज॑स्यत॥

मनुष्यों को उत्तम यत्न के साथ शरीर और आत्मा को दुःख देनेवाले विष दूर करने चाहियें, जिससे यहाँ निरन्तर पुरुषार्थ बढ़े॥७॥

उत्पु॒रस्ता॒त्सूर्य॑ एति वि॒श्वदृ॑ष्टो अदृष्ट॒हा। अ॒दृष्टा॒न्त्सर्वा॑ञ्ज॒म्भय॒न्त्सर्वा॑श्च यातुधा॒न्यः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य अन्धकार को निवारण करके प्रकाश को उत्पन्न करता है, वैसे वैद्यजनों को विषहरण ओषधियों से विषों को निर्मूल करना विनाशना चाहिये॥८॥

उद॑पप्तद॒सौ सूर्यः॑ पु॒रु विश्वा॑नि॒ जूर्व॑न्। आ॒दि॒त्यः पर्व॑तेभ्यो वि॒श्वदृ॑ष्टो अदृष्ट॒हा॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सविता अपने प्रकाश से सब पदार्थों को प्राप्त होता है, वैसे विषहरणशील वैद्य जन विषसंयुक्त पवन आदि पदार्थों को हरते और प्राणियों को सुखी करते हैं॥९॥

सूर्ये॑ वि॒षमा स॑जामि॒ दृतिं॒ सुरा॑वतो गृ॒हे। सो चि॒न्नु न म॑राति॒ नो व॒यं म॑रामा॒रे अ॑स्य॒ योज॑नं हरि॒ष्ठा मधु॑ त्वा मधु॒ला च॑कार॥

जो रोगनिवारक सूर्य के प्रकाश के संयोग से विषहरी वैद्यजन बड़ी-बड़ी ओषधियों से विष को दूर करते हैं और मधुरता को सिद्ध करते हैं, सो यह सूर्य का विध्वंस करनेवाला काम नहीं होता और वे विष हरनेवाले भी दीर्घायु होते हैं॥१०॥

इ॒य॒त्ति॒का श॑कुन्ति॒का स॒का ज॑घास ते वि॒षम्। सो चि॒न्नु न म॑राति॒ नो व॒यं म॑रामा॒रे अ॑स्य॒ योज॑नं हरि॒ष्ठा मधु॑ त्वा मधु॒ला च॑कार॥

मनुष्य जो विष हरनेवाले पक्षी हैं, उन्हें पालन कर उनसे विष हराया करें॥११॥

त्रिः स॒प्त वि॑ष्पुलिङ्ग॒का वि॒षस्य॒ पुष्य॑मक्षन्। ताश्चि॒न्नु न म॑रन्ति॒ नो व॒यं म॑रामा॒रे अ॑स्य॒ योज॑नं हरि॒ष्ठा मधु॑ त्वा मधु॒ला च॑कार॥

जैसे जोंक विष हरनेवाली हैं वैसे इक्कीस छोटी-छोटी पक्षिणी पङ्खोंवाली चिड़ियाँ विष खानेवाली हैं। उनसे और ओषधियों से जो विष सम्बन्धी रोगों का नाश करते हैं, वे चिरंजीवी होते हैं॥१२॥

न॒वा॒नां न॑वती॒नां वि॒षस्य॒ रोपु॑षीणाम्। सर्वा॑सामग्रभं॒ नामा॒रे अ॑स्य॒ योज॑नं हरि॒ष्ठा मधु॑ त्वा मधु॒ला च॑कार॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! हम लोग जो यहाँ निन्यानवे प्रकार का विष है उसके नाम, गुण, कर्म और स्वभावों को जानकर उस विष का प्रतिषेध करनेवाली ओषधियों को जान और उनका सेवन कर विषसम्बन्धी रोगों को दूर करें॥१३॥

त्रिः स॒प्त म॑यू॒र्यः॑ स॒प्त स्वसा॑रो अ॒ग्रुवः॑। तास्ते॑ वि॒षं वि ज॑भ्रिर उद॒कं कु॒म्भिनी॑रिव॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को जो इक्कीस प्रकार की मयूर की व्यक्ति हैं वे न मारनी चाहियें किन्तु सदैव उनकी वृद्धि करने योग्य है। जो नदी स्थिर जलवाली हो वे रोग के कारण होने से न सेवनी चाहिये। जो जल चलता है, सूर्यकिरण और वायु को छूता है, वह रोग दूर करनेवाला उत्तम होता है॥१४॥

इ॒य॒त्त॒कः कु॑षुम्भ॒कस्त॒कं भि॑न॒द्म्यश्म॑ना। ततो॑ वि॒षं प्र वा॑वृते॒ परा॑ची॒रनु॑ सं॒वतः॑॥

जो पुरुष विष हरनेवाले रत्नों से विष को निवृत्त करते हैं, वे विष से उत्पन्न हुए रोगों को मार बली होकर शत्रु-भूत रोगों को जीतते हैं॥१५॥

कु॒षु॒म्भ॒कस्तद॑ब्रवीद्गि॒रेः प्र॑वर्तमान॒कः। वृश्चि॑कस्यार॒सं वि॒षम॑र॒सं वृ॑श्चिक ते वि॒षम्॥

मनुष्य वीछी आदि छोटे-छोटे जीवों के विष हरनेवाले पर्वतीय निउले का संरक्षण करें, जिससे विष-रोगों को निवारण करने में समर्थ होवें॥१६॥इस सूक्त में विष हरनेवाली ओषधी, विष हरनेवाले जीव और विषहारी वेद्यों के गुण का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ सङ्गति है, यह समझना चाहिये॥यह एकसौ एक्यानवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग चौबीसवाँ अनुवाक और प्रथम मण्डल समाप्त हुआ॥। इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्याणां परमविदुषां विरजानन्दसरस्वतीस्वामिनां शिष्येण श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिना विरचिते संस्कृतार्यभाषाभ्यां समन्विते सुप्रमाणयुक्ते सुभाषाविभूषिते ऋग्वेदभाष्ये प्रथमं मण्डलं समाप्तम्॥

मण्डलम्

सूक्तम्

त्वम॑ग्ने॒ द्युभि॒स्त्वमा॑शुशु॒क्षणि॒स्त्वम॒द्भ्यस्त्वमश्म॑न॒स्परि॑। त्वं वने॑भ्य॒स्त्वमोष॑धीभ्य॒स्त्वं नृ॒णां नृ॑पते जायसे॒ शुचिः॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे राजन्! जैसे बिजुली अपने प्रकाश से शीघ्र जानेवाली जल, पाषाण, वन ओषधियों के पवित्र करने से सबकी पालना करनेवाली है। वैसे विद्वान् जन समग्र सामग्री से पवित्र आचरणवाला होता हुआ विद्यादि के प्रकाश से सबकी उन्नति करनेवाला होता है। इस मन्त्र का निरुक्त में भी व्याख्यान है॥१॥

तवा॑ग्ने हो॒त्रं तव॑ पो॒त्रमृ॒त्वियं॒ तव॑ ने॒ष्ट्रं त्वम॒ग्निदृ॑ताय॒तः। तव॑ प्रशा॒स्त्रं त्वम॑ध्वरीयसि ब्र॒ह्मा चासि॑ गृ॒हप॑तिश्च नो॒ दमे॑॥

जिस पुरुष का अग्निहोत्र के तुल्य उपकार, ऋत्विजों के कर्म के समान पवित्र क्रिया, आप्त विद्वानों के समान न्याय, अग्नि विद्या को जाननेवाले के समान उद्यम, न्यायाधीश के समान न्याय-व्यवस्था, यज्ञ करनेवाले के समान अहिंसा, वेदपारङ्गत के समान विद्या, और गृहपति के समान ऐश्वर्य्य का संग्रह हो, वही प्रशंसा को प्राप्त होने योग्य होता है॥२॥

त्वम॑ग्न॒ इन्द्रो॑ वृष॒भः स॒ताम॑सि॒ त्वं विष्णु॑रुरुगा॒यो न॑म॒स्यः॑। त्वं ब्र॒ह्मा र॑यि॒विद्ब्र॑ह्मणस्पते॒ त्वं वि॑धर्तः सचसे॒ पुरं॑ध्या॥

जो मनुष्य ब्रह्मचर्य से आप्त विद्वानों के समीप से विद्या शिक्षा को प्राप्त हुआ ईश्वर के समान उपकारदृष्टि से प्रशंसा और सत्कार को प्राप्त हुआ प्रतिदिन उत्तम बुद्धि से समस्त शुभ गुण, कर्म और स्वभावों को धारण करता है, वह सम्पूर्ण विद्यावान् होता है॥३॥

त्वम॑ग्ने॒ राजा॒ वरु॑णो धृ॒तव्र॑त॒स्त्वं मि॒त्रो भ॑वसि द॒स्म ईड्यः॑। त्वम॑र्य॒मा सत्प॑ति॒र्यस्य॑ सं॒भुजं॒ त्वमंशो॑ वि॒दथे॑ देव भाज॒युः॥

जिससे सत्य को धारण कर असत्य का त्याग किया जाता और मित्र के समान सबके लिये सुख दिया जाता है, वह सत्यसन्धि दुष्टाचार से अलग हुआ सत्य और असत्य का यथावद्विवेचन करनेवाला सबको मान करने योग्य होता है॥४॥

त्वम॑ग्ने॒ त्वष्टा॑ विध॒ते सु॒वीर्यं॒ तव॒ ग्नावो॑ मित्रमहः सजा॒त्य॑म्। त्वमा॑शु॒हेमा॑ ररिषे॒ स्वश्व्यं॒ त्वं न॒रां शर्धो॑ असि पुरू॒वसुः॑॥

जिस पुरुष की सत्यवाणी और परार्थ पराक्रम है, वह राजजनों में प्रशंसायुक्त होता है॥५॥

त्वम॑ग्ने रु॒द्रो असु॑रो म॒हो दि॒वस्त्वं शर्धो॒ मारु॑तं पृ॒क्ष ई॑शिषे। त्वं वातै॑ररु॒णैर्या॑सि शंग॒यस्त्वं पू॒षा वि॑ध॒तः पा॑सि॒ नु त्मना॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो जन बल की इच्छा करते दुष्टाचारियों को अच्छे प्रकार ताड़ना देकर धर्माचारियों को सुखी करते और सदैव सबकी उन्नति को चाह्ते हैं, वे अतुल ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं॥६॥

त्वम॑ग्ने द्रविणो॒दा अ॑रं॒कृते॒ त्वं दे॒वः स॑वि॒ता र॑त्न॒धा अ॑सि। त्वं भगो॑ नृपते॒ वस्व॑ ईशिषे॒ त्वं पा॒युर्दमे॒ यस्तेऽवि॑धत्॥

जो पुरुषार्थी मनुष्यों का सत्कार तथा आलस्य करनेवालों का तिरस्कार करनेवाले और सेवकों के लिये सुख देनेवाले ऐश्वर्यवान् हों, वे इस संसार में सबके राजा होने को योग्य होवें॥७॥

त्वाम॑ग्ने॒ दम॒ आ वि॒श्पतिं॒ विश॒स्त्वां राजा॑नं सुवि॒दत्र॑मृञ्जते। त्वं विश्वा॑नि स्वनीक पत्यसे॒ त्वं स॒हस्रा॑णि श॒ता दश॒ प्रति॑॥

वही राजा होने योग्य है, जिसको समस्त प्रजाजन स्वीकार करें। वही सेनापति होने को योग्य है, जो दश वा सौ वा सहस्र वीरों के साथ युद्ध कर सकता है॥८॥

त्वाम॑ग्ने पि॒तर॑मि॒ष्टिभि॒र्नर॒स्त्वां भ्रा॒त्राय॒ शम्या॑ तनू॒रुच॑म्। त्वं पु॒त्रो भ॑वसि॒ यस्तेऽवि॑ध॒त्त्वं सखा॑ सु॒शेवः॑ पास्या॒धृषः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे होम आदि से अच्छा सेवन किया हुआ अग्नि रक्षा करनेवाला होता है, वैसे भ्राता मित्र पुत्रजन अपने भ्राता मित्र और पितृयों को सेवें॥९॥

त्वम॑ग्न ऋ॒भुरा॒के न॑म॒स्य१॒॑स्त्वं वाज॑स्य क्षु॒मतो॑ रा॒य ई॑शिषे। त्वं वि भा॒स्यनु॑ दक्षि दा॒वने॒ त्वं वि॒शिक्षु॑रसि य॒ज्ञमा॒तनिः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो अग्नि के समान प्रजाओं के पीड़ादेनेवालों को जलाते हैं, पुरुषार्थ से ऐश्वर्य की उन्नति करते हैं, विद्या विनय और उत्तम शीलादि का प्रकाश करते हैं, वे सबको माननीय होते हैं॥१०॥

त्वम॑ग्ने॒ अदि॑तिर्देव दा॒शुषे॒ त्वं होत्रा॒ भार॑ती वर्धसे गि॒रा। त्वमिळा॑ श॒तहि॑मासि॒ दक्ष॑से॒ त्वं वृ॑त्र॒हा व॑सुपते॒ सर॑स्वती॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। अच्छी विद्या का पढ़ाने हारा शास्त्र का पारगन्ता विद्वान् जन माता के समान पालना करता है और सब विषयों से उत्तमगुणों को देता है। उससे शिष्यजन शीघ्र विद्याबलयुक्त होते हैं॥११॥

त्वम॑ग्ने॒ सुभृ॑त उत्त॒मं वय॒स्तव॑ स्पा॒र्हे वर्ण॒ आ सं॒दृशि॒ श्रियः॑। त्वं वाजः॑ प्र॒तर॑णो बृ॒हन्न॑सि॒ त्वं र॒यिर्ब॑हु॒लो वि॒श्वत॑स्पृ॒थुः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् जन गुण कर्म स्वभाव से बिजुली को जान और कार्य्यों में उसका अच्छे प्रकार प्रयोग कर श्रीमान् होते हैं और ब्रह्मचर्य से दीर्घायु होते हैं, वैसे सब विद्यायुक्त मनुष्यों को होना चाहिये॥१२॥

त्वाम॑ग्न आदि॒त्यास॑ आ॒स्यं१॒॑त्वां जि॒ह्वां शुच॑यश्चक्रिरे कवे। त्वां रा॑ति॒षाचो॑ अध्व॒रेषु॑ सश्चिरे॒ त्वे दे॒वा ह॒विर॑द॒न्त्याहु॑तम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे संवत्सर का आश्रय लेकर महीने मुख का आश्रय लेकर शरीर की पुष्टि जिह्वा के आश्रय से रस का विज्ञान यज्ञ को प्राप्त हो विद्वानों के सत्कार और उत्तम अन्न को पाकर रुचि होती है, वैसे आप्तशास्त्रज्ञ धर्मात्मा विद्वानों को प्राप्त होकर मनुष्य शुभगुणलक्षणयुक्त होते हैं॥१३॥

त्वे अ॑ग्ने॒ विश्वे॑ अ॒मृता॑सो अ॒द्रुह॑ आ॒सा दे॒वा ह॒विर॑द॒न्त्याहु॑तम्। त्वया॒ मर्ता॑सः स्वदन्त आसु॒तिं त्वं गर्भो॑ वी॒रुधां॑ जज्ञिषे॒ शुचिः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सब जीव विद्यमान अग्नि के होते जीने और भोजन करने को योग्य होते हैं, वैसे शास्त्रज्ञ धर्मात्मा पढ़ानेवालों के होते पवित्र राग-द्वेष रहित सांसारिक और पारमार्थिक सुख को प्राप्त हुए मुक्ति के बीच आनन्द करते हुए जन्मान्तर संस्कार में पवित्र होते हैं॥१४॥

त्वं तान्त्सं च॒ प्रति॑ चासि म॒ज्मनाग्ने॑ सुजात॒ प्र च॑ देव रिच्यसे। पृ॒क्षो यदत्र॑ महि॒ना वि ते॒ भुव॒दनु॒ द्यावा॑पृथि॒वी रोद॑सी उ॒भे॥

जैसे अग्नि में अनेक गुण हैं, वैसे विद्वानों की सेवा करने और धर्म में प्रवर्त्तमान होने [वाले तथा] अधर्म से निवृत्त जनों में इस संसार में बहुत शुभ गुण उत्पन्न होते हैं॥१५॥

ये स्तो॒तृभ्यो॒ गोअ॑ग्रा॒मश्व॑पेशस॒मग्ने॑ रा॒तिमु॑पसृ॒जन्ति॑ सू॒रयः॑। अ॒स्माञ्च॒ तांश्च॒ प्र हि नेषि॒ वस्य॒ आ बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे विद्वान् सर्वोत्तम विद्यादान देके हमको तथा औरों को विद्वान् करते हैं, वैसे हमको भी चाहिये कि उनको सदा प्रसन्न करें॥१६॥इस सूक्त में अग्नि के दृष्टान्त से विद्वान् और विद्यार्थियों के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये॥यह दूसरे मण्डल में प्रथम सूक्त और उन्नीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

य॒ज्ञेन॑ वर्धत जा॒तवे॑दसम॒ग्निं य॑जध्वं ह॒विषा॒ तना॑ गि॒रा। स॒मि॒धा॒नं सु॑प्र॒यसं॒ स्व॑र्णरं द्यु॒क्षं होता॑रं वृ॒जने॑षु धू॒र्षद॑म्॥

जो मनुष्य शिल्प-क्रिया से बिजुली आदि के रूप को यान-विमान आदि के कार्य्य में अच्छे प्रकार युक्त करें, वे ऐश्वर्य को प्राप्त हों॥१॥

अ॒भि त्वा॒ नक्ती॑रुष॒सो॑ ववाशि॒रेऽग्ने॑ व॒त्सं न स्वस॑रेषु धे॒नवः॑। दि॒वइ॒वेद॑र॒तिर्मानु॑षा यु॒गा क्षपो॑ भासि पुरुवार सं॒यतः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे गौयें अपने बछड़ों को प्राप्त होतीं, वैसे काल-विभाग परिश्रमी विद्वान् जन को प्राप्त होते हैं। जिस कारण उसके सब कार्य नियमयुक्त काल से सिद्ध होते हैं। आलसी जनों के काम कभी भी नियत समय पर नहीं होते। परिश्रमी विद्वान् जन रात्रि के समय को भी अपने कार्य का समय मानकर जैसा चाहते वैसे समय पर कार्य किया करते हैं और मनुष्यसम्बन्धी पूर्णायु को प्राप्त होते हैं किन्तु परिश्रम से आयु की हानि को नहीं प्राप्त होते॥२॥

तं दे॒वा बु॒ध्ने रज॑सः सु॒दंस॑सं दि॒वस्पृ॑थि॒व्योर॑र॒तिं न्ये॑रिरे। रथ॑मिव॒ वेद्यं॑ शु॒क्रशो॑चिषम॒ग्निं मि॒त्रं न क्षि॒तिषु॑ प्र॒शंस्य॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! यदि आप लोग अन्तरिक्ष में स्थित पदार्थों में वर्त्तमान अग्नि को जानकर रथ के समान कार्यों में चलावें, तो वह मित्र के समान कार्यों को सिद्ध करे॥३॥

तमु॒क्षमा॑णं॒ रज॑सि॒ स्व आ दमे॑ च॒न्द्रमि॑व सु॒रुचं॑ ह्वा॒र आ द॑धुः। पृश्न्याः॑ पत॒रं चि॒तय॑न्तम॒क्षभिः॑ पा॒थो न पा॒युं जन॑सी उ॒भे अनु॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे जल पियासे को तृप्त करता है, वैसे कार्यों में संप्रयुक्त किया हुआ अग्नि ऐश्वर्य के साथ जनों को युक्त करता है॥४॥

स होता॒ विश्वं॒ परि॑ भूत्वध्व॒रं तमु॑ ह॒व्यैर्मनु॑ष ऋञ्जते गि॒रा। हि॒रि॒शि॒प्रो वृ॑धसा॒नासु॒ जर्भु॑र॒द्द्यौर्न स्तृभि॑श्चितय॒द्रोद॑सी॒ अनु॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य नक्षत्रों को प्रकाशित करता है, वैसे यह अग्नि समस्त विश्व को प्रकाशित करता है। जो पढ़ने और सुनने से अग्नि विद्या का ग्रहण करते हैं, वे सुभूषित होते हैं॥५॥

स नो॑ रे॒वत्स॑मिधा॒नः स्व॒स्तये॑ संदद॒स्वान्र॒यिम॒स्मासु॑ दीदिहि। आ नः॑ कृणुष्व सुवि॒ताय॒ रोद॑सी॒ अग्ने॑ ह॒व्या मनु॑षो देव वी॒तये॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे संसिद्ध किया हुआ अग्नि धन प्राप्ति का निमित्त होता है, वैसे अच्छे प्रकार प्राप्त हुए विद्वान् जन मनुष्यों को विद्याप्राप्ति के हेतु होते हैं॥६॥

दा नो॑ अग्ने बृह॒तो दाः स॑ह॒स्रिणो॑ दु॒रो न वाजं॒ श्रुत्या॒ अपा॑ वृधि। प्राची॒ द्यावा॑पृथि॒वी ब्रह्म॑णा कृधि॒ स्व१॒॑र्ण शु॒क्रमु॒षसो॒ वि दि॑द्युतः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो अग्नि के तुल्य असंख्य सुख द्वारों के समान विद्यामार्ग और यथा समय कार्यों से दिवसों को संयुक्त करते हैं, वे सूर्य और पृथिवी के समान अन्नादि के संयोग से सुखी होते हैं॥७॥

स इ॑धा॒न उ॒षसो॒ राम्या॒ अनु॒ स्व१॒॑र्ण दी॑देदरु॒षेण॑ भा॒नुना॑। होत्रा॑भिर॒ग्निर्मनु॑षः स्वध्व॒रो राजा॑ वि॒शामति॑थि॒श्चारु॑रा॒यवे॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे अहोरात्रों का काटनेवाला सूर्य अपने तेज से सबके अनुकूल प्रकाशित होता है, वैसे राजा सत्य और झूठ कार्य्य करानेवालों के विभाग से प्रजाजनों की पालना करे॥८॥

ए॒वा नो॑ अग्ने अ॒मृते॑षु पूर्व्य॒ धीष्पी॑पाय बृ॒हद्दि॑वेषु॒ मानु॑षा। दुहा॑ना धे॒नुर्वृ॒जने॑षु का॒रवे॒ त्मना॑ श॒तिनं॑ पुरु॒रूप॑मि॒षणि॑॥

विज्ञान चाहनेवाले जनों को शिष्ट महात्मा जनों से पाई हुई बुद्धि को प्राप्त होकर बहुत प्रकार के पदार्थविज्ञान से मनुष्य जन्म के धर्म अर्थ काम और मोक्षरूपी फलों को प्राप्त होना चाहिये॥९॥

व॒यम॑ग्ने॒ अर्व॑ता वा सु॒वीर्यं॒ ब्रह्म॑णा वा चितयेमा॒ जनाँ॒ अति॑। अ॒स्माकं॑ द्यु॒म्नमधि॒ पञ्च॑ कृ॒ष्टिषू॒च्चा स्व१॒॑र्ण शु॑शुचीत दु॒ष्टर॑म्॥

विद्वानों के सङ्गी ज्ञान चाहनेवाले पुरुषों को चाहिये कि आप्त शिष्ट जनों से जैसा विज्ञान प्राप्त हो, वैसा ही औरों को देवें। जैसे हम लोगों के ब्रह्मचर्य विद्या बल शील पुरुषार्थ बढ़ते हैं, वैसे सबके बढ़ें, ऐसी हम लोग इच्छा करें॥१०॥

स नो॑ बोधि सहस्य प्र॒शंस्यो॒ यस्मि॑न्त्सुजा॒ता इ॒षय॑न्त सू॒रयः॑। यम॑ग्ने य॒ज्ञमु॑प॒यन्ति॑ वा॒जिनो॒ नित्ये॑ तो॒के दी॑दि॒वांसं॒ स्वे दमे॑॥

जो विद्वानों के मार्ग से और सुशीलता से नित्य पदार्थों के विज्ञान को प्राप्त हों, वे औरों को भी प्राप्त करावें॥११॥

उ॒भया॑सो जातवेदः स्याम ते स्तो॒तारो॑ अग्ने सू॒रय॑श्च॒ शर्म॑णि। वस्वो॑ रा॒यः पु॑रुश्च॒न्द्रस्य॒ भूय॑सः प्र॒जाव॑तः स्वप॒त्यस्य॑ शग्धि नः॥

जो धर्म से धनादि पदार्थों का सञ्चय करते हैं, उनका अतुल धन उत्तम प्रजा और सुशील अपत्य होते हैं। जो पाण्डित्य और प्रगल्भता को प्राप्त होकर अध्यापक और उपदेशक होते हैं, वे दुःख को नहीं देखते हैं॥१२॥

ये स्तो॒तृभ्यो॒ गोअ॑ग्रा॒मश्व॑पेशस॒मग्ने॑ रा॒तिमु॑पसृ॒जन्ति॑ सू॒रयः॑। अ॒स्माञ्च॒ तांश्च॒ प्र हि नेषि॒ वस्य॒ आ बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

जो उत्तम विद्वान् जन पढ़ानेवाले विद्वानों के लिए अधिकतर विद्या को अच्छे प्रकार देकर उनको श्रीमान् करते हैं, वे हमारे प्रणेता अर्थात् सर्व विषयों को प्राप्त करनेवाले हों॥१३॥इस सूक्त में अग्नि विषय से विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह समझना चाहिये॥यह दूसरे मण्डल में दूसरा सूक्त और इक्कीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

समि॑द्धो अ॒ग्निर्निहि॑तः पृथि॒व्यां प्र॒त्यङ् विश्वा॑नि॒ भुव॑नान्यस्थात्। होता॑ पाव॒कः प्र॒दिवः॑ सुमे॒धा दे॒वो दे॒वान्य॑जत्व॒ग्निरर्ह॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। यदि इस संसार में ईश्वर अग्नि को न रचे तो कोई प्राणी सुख को न प्राप्त हो सके। जैसे विद्वान् विद्वानों का सत्कार करें, वैसे अन्यलोग भी विद्वानों का सत्कार करें॥१॥

नरा॒शंसः॒ प्रति॒ धामा॑न्य॒ञ्जन् ति॒स्रो दिवः॒ प्रति॑ म॒ह्ना स्व॒र्चिः। घृ॒त॒प्रुषा॒ मन॑सा ह॒व्यमु॒न्दन्मू॒र्धन्य॒ज्ञस्य॒ सम॑नक्तु दे॒वान्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि बिजुली प्रसिद्ध और सूर्य रूप से सब व्यवहारों को पूर्ण करता है, वैसे विद्वान् जन विद्या धर्म और सुन्दर शील आदि की प्राप्ति से समस्त आशा जो मनुष्यों की उनको पूर्ण करें॥२॥

ई॒ळि॒तो अ॑ग्ने॒ मन॑सा नो॒ अर्ह॑न्दे॒वान्य॑क्षि॒ मानु॑षा॒त्पूर्वो॑ अ॒द्य। स आ व॑ह म॒रुतां॒ शर्धो॒ अच्यु॑त॒मिन्द्रं॑ नरो बर्हि॒षदं॑ यजध्वम्॥

जो विद्वानों का सत्कार कर विद्या को ग्रहण कराती हुई पवनों में स्थिर होनेवाली बिजुली को ग्रहण कर सकते हैं, वे अक्षयबली होकर सर्वत्र सत्कार को प्राप्त होते हैं॥३॥

देव॑ बर्हि॒र्वर्ध॑मानं सु॒वीरं॑ स्ती॒र्णं रा॒ये सु॒भरं॒ वेद्य॒स्याम्। घृ॒तेना॒क्तं व॑सवः सीदते॒दं विश्वे॑ देवा आदित्या य॒ज्ञिया॑सः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि अवश्य अन्तरिक्षस्थ जल सुगन्ध्यादि पदार्थ युक्त करें, जिससे समस्त प्राणी आरोग्य हों॥४॥

वि श्र॑यन्तामुर्वि॒या हू॒यमा॑ना॒ द्वारो॑ दे॒वीः सु॑प्राय॒णा नमो॑भिः। व्यच॑स्वती॒र्वि प्र॑थन्तामजु॒र्या वर्णं॑ पुना॒ना य॒शसं॑ सु॒वीर॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे कारुकों के बनाये हुए घरों में सुन्दर शोभायुक्त बनाये हुए द्वारे होवें, वैसे विदुषी धर्म्मपरायणा पतिव्रता स्त्रियाँ कीर्त्तिमती और उत्तम सन्तानों की उत्पन्न करनेवाली होती हैं॥५॥

सा॒ध्वपां॑सि स॒नता॑ न उक्षि॒ते उ॒षासा॒नक्ता॑ व॒य्ये॑व रण्वि॒ते। तन्तुं॑ त॒तं सं॒वय॑न्ती समी॒ची य॒ज्ञस्य॒ पेशः॑ सु॒दुघे॒ पय॑स्वती॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। सन्तान और भृत्यजन अपने पालनेवाले स्त्रीपुरुषों के प्रति ऐसी प्रार्थना करें कि तुम हमसे धर्मयुक्त कार्य कराओ॥६॥

दैव्या॒ होता॑रा प्रथ॒मा वि॒दुष्ट॑र ऋ॒जु य॑क्षतः॒ समृ॒चा व॒पुष्ट॑रा। दे॒वान्यज॑न्तावृतु॒था सम॑ञ्जतो॒ नाभा॑ पृथि॒व्या अधि॒ सानु॑षु त्रि॒षु॥

जैसे ब्रह्मचर्य से पूर्ण विद्या और शिक्षा को प्राप्त सुन्दरता से युक्त स्वयंवर विवाहविधि से पाणिग्रहण किये हुए विद्वानों के सङ्गी आप्त शास्त्रज्ञ धर्मात्मा विद्वान् अध्यापक स्त्रीपुरुष सत्कर्मों में वर्त्तते हैं, वैसे सबको प्रयत्न करना चाहिये॥७॥

सर॑स्वती सा॒धय॑न्ती॒ धियं॑ न॒ इळा॑ दे॒वी भार॑ती वि॒श्वतू॑र्तिः। ति॒स्रो दे॒वीः स्व॒धया॑ ब॒र्हिरेदमच्छि॑द्रं पान्तु शर॒णं नि॒षद्य॑॥

एक माता दूसरी पढ़ानेवाली और तीसरी उपदेश करनेवाली स्त्री कन्याओं को सदा समीप में सेवनी चाहिये, जिससे बुद्धि और विद्या नित्य बढ़े॥८॥

पि॒शङ्ग॑रूपः सु॒भरो॑ वयो॒धाः श्रु॒ष्टी वी॒रो जा॑यते दे॒वका॑मः। प्र॒जां त्वष्टा॒ वि ष्य॑तु॒ नाभि॑म॒स्मे अथा॑ दे॒वाना॒मप्ये॑तु॒ पाथः॑॥

जो अच्छा संस्कार किये रोग हरने और बुद्धि देनेवाले उत्तम अन्न का भोजन कर सन्तोनोत्पत्ति करते हैं, उनके सन्तान विद्वानों के प्रिय दीर्घ आयुवाले और सुशील होते हैं॥९॥

वन॒स्पति॑रवसृ॒जन्नुप॑ स्थाद॒ग्निर्ह॒विः सू॑दयाति॒ प्र धी॒भिः। त्रिधा॒ सम॑क्तं नयतु प्रजा॒नन्दे॒वेभ्यो॒ दैव्यः॑ शमि॒तोप॑ ह॒व्यम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे वनस्पति और अग्नि अपने कर्मों से समस्त प्राणियों का उपकार करते हैं, वैसे विद्वान् जन अध्ययन-अध्यापन और उपदेश से सबका उपकार करें॥१०॥

घृ॒तं मि॑मिक्षे घृ॒तम॑स्य॒ योनि॑र्घृ॒ते श्रि॒तो घृ॒तम्व॑स्य॒ धाम॑। अ॒नु॒ष्व॒धमा व॑ह मा॒दय॑स्व॒ स्वाहा॑कृतं वृषभ वक्षि ह॒व्यम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य यज्ञ में अग्नि जैसे वैसे उपकार करनेवाले परोपकार का आश्रय किये हुए औरों को सुखी करते हैं, वैसे आप भी उनसे उपकार को प्राप्त और आनन्दित होते हैं॥११॥इस सूक्त में अग्नि विद्वान् और स्त्रीपुरुषों के आचरण का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह दूसरे मण्डल में तीसरा सूक्त और तेईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

हु॒वे वः॑ सु॒द्योत्मा॑नं सुवृ॒क्तिं वि॒शाम॒ग्निमति॑थिं सुप्र॒यस॑म्। मि॒त्रइ॑व॒ यो दि॑धि॒षाय्यो॒ भूद्दे॒व आदे॑वे॒ जने॑ जा॒तवे॑दाः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य परस्पर विद्या देके जगत् के प्रकाश को धारण कर वा मित्र के समान सुख देनेवाले विद्वानों को जानने योग्य बिजुलीरूप अग्नि की प्रशंसा करते हैं, वे उसके गुणों को जाननेवाले होते हैं॥१॥

इ॒मं वि॒धन्तो॑ अ॒पां स॒धस्थे॑ द्वि॒ताद॑धु॒र्भृग॑वो वि॒क्ष्वा॒३॒॑योः। ए॒ष विश्वा॑न्य॒भ्य॑स्तु॒ भूमा॑ दे॒वाना॑म॒ग्निर॑र॒तिर्जी॒राश्वः॑॥

जो अग्नि अपनी व्याप्ति से प्रजाजनों में प्रविष्ट है, उससे समस्त वेगवान् यन्त्रकलाओं से प्रचलित किये हुए यान शीघ्र चलनेवाले बनाने चाहिये॥२॥

अ॒ग्निं दे॒वासो॒ मानु॑षीषु वि॒क्षु प्रि॒यं धुः॑ क्षे॒ष्यन्तो॒ न मि॒त्रम्। स दी॑दयदुश॒तीरूर्म्या॒ आ द॒क्षाय्यो॒ यो दास्व॑ते॒ दम॒ आ॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो अग्नि मित्र के समान सुख देता और सब प्रजाजनों में प्रदीपसमान सब वस्तुओं को प्रकाशित करता है, उसका विद्वानों को अपने कामों में अनुकूल योग करना चाहिये॥३॥

अ॒स्य र॒ण्वा स्वस्ये॑व पु॒ष्टिः संदृ॑ष्टिरस्य हिया॒नस्य॒ दक्षोः॑। वि यो भरि॑भ्र॒दोष॑धीषु जि॒ह्वामत्यो॒ न रथ्यो॑ दोधवीति॒ वारा॑न्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को जैसे अपने पोषण के लिये अग्निविद्या प्राप्त की जाती है, वैसे औरों के लिये भी करनी चाहिये। जो इन्धनों से बढ़ता है और पदार्थों को जलाता है, वह रथों में युक्त किया हुआ अग्नि शीघ्र गमन कराता है। जैसे वक्ता अपनी जिह्वा को कंपाता है, वैसे अग्नि भूगोलों को कंपाता है॥४॥

आ यन्मे॒ अभ्वं॑ व॒नदः॒ पन॑न्तो॒शिग्भ्यो॒ नामि॑मीत॒ वर्ण॑म्। स चि॒त्रेण॑ चिकिते॒ रंसु॑ भा॒सा जु॑जु॒र्वाँ यो मुहु॒रा युवा॒ भूत्॥

जो अग्नि समस्त अविद्यमान को विद्यमान के समान करता और जैसे जीव वृद्धपन और मरण को प्राप्त होकर फिर उत्पन्न हुआ ज्वान होता है, वैसे जो बार-बार वृद्धि और क्षय को प्राप्त होता है, वह अग्नि व्यवहारों में युक्त करने योग्य है॥५॥

आ यो वना॑ तातृषा॒णो न भाति॒ वार्ण प॒था रथ्ये॑व स्वानीत्। कृ॒ष्णाध्वा॒ तपू॑ र॒ण्वश्चि॑केत॒ द्यौरि॑व॒ स्मय॑मानो॒ नभो॑भिः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे कोई अतितृषायुक्त कहनेवाला जन हँसता हुआ कहे कि जल मार्ग में जाता है, वैसे वनस्थ अग्नि बहुत शब्दायमान होता है॥६॥

स यो व्यस्था॑द॒भि दक्ष॑दु॒र्वीं प॒शुर्नैति॑ स्व॒युरगो॑पाः। अ॒ग्निः शो॒चिष्माँ॑ अत॒सान्यु॒ष्णन्कृ॒ष्णव्य॑थिरस्वदय॒न्न भूम॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो पृथिवी आदि पदार्थों में व्यवस्था को प्राप्त मूर्त्तिमान् पदार्थों का जलानेवाला रक्षकरहित पशु के समान आप जानेवाला प्रकाशमय अग्नि अपने तेज से विथरे हुए त्रसरेणुओं को भी सब ओर से तपाता है, वह अग्नि बलिष्ठ है, यह जानना चाहिये॥७॥

नू ते॒ पूर्व॒स्याव॑सो॒ अधी॑तौ तृ॒तीये॑ वि॒दथे॒ मन्म॑ शंसि। अ॒स्मे अ॑ग्ने सं॒यद्वी॑रं बृ॒हन्तं॑ क्षु॒मन्तं॒ वाजं॑ स्वप॒त्यं र॒यिं दाः॑॥

हे विद्वान्! जिस विद्या पढ़े हुए रक्षा करनेवाले के समीप से तृतीय सवन अर्थात् ब्रह्मचर्य के तीसरे भाग को शीघ्र पूर्ण कर लिये पीछे अग्न्यादि विद्यायें प्राप्त होकर उत्तम धन बल और प्रजावान् हम लोग हों, उसको आप बतलाइये॥८॥

त्वया॒ यथा॑ गृत्सम॒दासो॑ अग्ने॒ गुहा॑ व॒न्वन्त॒ उप॑राँ अ॒भि ष्युः। सु॒वीरा॑सो अभिमाति॒षाहः॒ स्मत्सू॒रिभ्यो॑ गृण॒ते तद्वयो॑ धाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे प्राप्त विद्वानों से विद्या और शिक्षा ग्रहण कर आनन्दित विजयमान और वीरपुरुषों से युक्त प्रशंसनीय जन होते हैं, वैसे अग्निविद्या से युक्त पुरुष अन्धकार को जैसे सूर्य वैसे दुःख का विनाश करते हैं॥९॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह दूसरे मण्डल में चौथा सूक्त और पच्चीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥९॥

होता॑जनिष्ट॒ चेत॑नः पि॒ता पि॒तृभ्य॑ ऊ॒तये॑। प्र॒यक्ष॒ञ्जेन्यं॒ वसु॑ श॒केम॑ वा॒जिनो॒ यम॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सच्चिदानन्दस्वरूप परमेश्वर इस संसार में सबकी रक्षा के लिये अनेक द्रव्यों को रचता है, वैसे विद्वान् जन भी आचरण करें॥१॥

आ यस्मि॑न्त्स॒प्त र॒श्मय॑स्त॒ता य॒ज्ञस्य॑ ने॒तरि॑। म॒नु॒ष्वद्दैव्य॑मष्ट॒मं पोता॒ विश्वं॒ तदि॑न्वति॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सात विध रश्मियोंवाला सूर्य परिमाण से विस्तार को प्राप्त और पवित्र करनेवाला है, उसमें जो चेतन ब्रह्म व्याप्त वर्त्तमान है, वह समस्त सूर्यादिक को व्यवस्था प्राप्त करता [=कराता] है। जैसे मनुष्य शिल्पक्रिया से अनेक वस्तुओं को बनाते हैं, वैसे जगदीश्वर अखिल संसार का विधान करता है॥२॥

द॒ध॒न्वे वा॒ यदी॒मनु॒ वोच॒द्ब्रह्मा॑णि॒ वेरु॒ तत्। परि॒ विश्वा॑नि॒ काव्या॑ ने॒मिश्च॒क्रमि॑वाभवत्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। सूर्य जल को धारण करता है वा विद्वान् जन ब्रह्मविषयादि को कहते हैं, उस सबको व्यापक परमेश्वर साङ्गोपाङ्ग जानता है॥३॥

सा॒कं हि शुचि॑ना॒ शुचिः॑ प्रशा॒स्ता क्रतु॒नाज॑नि। वि॒द्वाँ अ॑स्य व्र॒ता ध्रु॒वा व॒याइ॒वानु॑ रोहते॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो पवित्र विद्वानों के साथ सङ्ग कर, उत्तम बुद्धि को उत्पन्न करके, अज्ञजनों के उपदेशक हो, वेदविहित कर्मों का आचरण कर आप बढ़ते हैं, वे औरों की उन्नति करनेवाले होते हैं॥४॥

ता अ॑स्य॒ वर्ण॑मा॒युवो॒ नेष्टुः॑ सचन्त धे॒नवः॑। कु॒वित्ति॒सृभ्य॒ आ वरं॒ स्वसा॑रो॒ या इ॒दं य॒युः॥

जो बहिन अपने प्रियबन्धु को और कन्या विद्याविषय को प्राप्त होती हैं, वे गौओं के समान उत्तम सुख को उत्पन्न करती हैं॥५॥

यदी॑ मा॒तुरुप॒ स्वसा॑ घृ॒तं भर॒न्त्यस्थि॑त। तासा॑मध्व॒र्युराग॑तौ॒ यवो॑ वृ॒ष्टीव॑ मोदते॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। यदि कन्याजन अध्यापिका विदुषी और माता को प्राप्त होकर विदुषी होती हैं, तो जल से ओषधियों के समान सब ओर से वृद्धि को प्राप्त होती हैं॥६॥

स्वः स्वाय॒ धाय॑से कृणु॒तामृ॒त्विगृ॒त्विज॑म्। स्तोमं॑ य॒ज्ञं चादरं॑ व॒नेमा॑ ररि॒मा व॒यम्॥

जैसे आप अपने हित के लिये प्रवृत्त हों वा विद्वान् जन विद्वानों और यज्ञ करनेवाले विविध प्रकार के क्रियायज्ञ को सिद्ध करते हैं, वैसे हमलोग भी प्रवृत्त हों॥७॥

यथा॑ वि॒द्वाँ अरं॒ कर॒द्विश्वे॑भ्यो यज॒तेभ्यः॑। अ॒यम॑ग्ने॒ त्वे अपि॒ यं य॒ज्ञं च॑कृ॒मा व॒यम्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे आप्त विद्वान् जन जगत् के लिये सत्योपदेश कर मनुष्यों को सत्य बोधवाले करते हैं, वैसे सब आप्त विद्वानों को निरन्तर अनुष्ठान करना-कराना चाहिये॥८॥इस सूक्त में जीव, ईश्वर, विद्वान् और विदुषियों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये॥यह दूसरे मण्डल में पाँचवाँ सूक्त और छब्बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इ॒मां मे॑ अग्ने स॒मिध॑मि॒मामु॑प॒सदं॑ वनेः। इ॒मा ऊ॒ षु श्रु॑धी॒ गिरः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वान्! जैसे अग्नि समिधाओं में बढ़ता है, वैसे हम लोगों को परीक्षा से और हमारे वचनों को सुनकर बढ़ाइये॥१॥

अ॒या ते॑ अग्ने विधे॒मोर्जो॑ नपा॒दश्व॑मिष्टे। ए॒ना सू॒क्तेन॑ सुजात॥

जो विद्या और साधनों से अग्नि का युक्ति के साथ अच्छे प्रकार प्रयोग करते हैं, वे अग्नि के पराक्रम से अपने कामों को सिद्ध कर सकते हैं॥२॥

तं त्वा॑ गी॒र्भिर्गिर्व॑णसं द्रविण॒स्युं द्र॑विणोदः। स॒प॒र्येम॑ सप॒र्यवः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो गुण, कर्म, स्वभाव से अग्नि को विशेष जानकर कार्यसिद्धि के लिये उसका अच्छे प्रकार प्रयोग करते हैं, वे श्रीमान् होते हैं॥३॥

स बो॑धि सू॒रिर्म॒घवा॒ वसु॑पते॒ वसु॑दावन्। यु॒यो॒ध्य१॒॑स्मद्द्वेषां॑सि॥

जो राग-द्वेषरहित गुणग्राही जन होते हैं, वे औरों को भी अपने सदृश करके दाता होते हुए लक्ष्मीवान् होते हैं॥४॥

स नो॑ वृ॒ष्टिं दि॒वस्परि॒ स नो॒ वाज॑मन॒र्वाण॑म्। स नः॑ सह॒स्रिणी॒रिषः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को वैसा यत्न करना चाहिये जिससे अग्नि की उत्तेजना से बहुत उपकार हों॥५॥

ईळा॑नायाव॒स्यवे॒ यवि॑ष्ठ दूत नो गि॒रा। यजि॑ष्ठ होत॒रा ग॑हि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मनुष्यों को दूतरूप अग्नि पृथिवीतल से ऊपर पदार्थों को पहुँचा और जलों को वर्षा कर सबकी रक्षा का निमित्त होता है, वैसे विद्वान् जन उत्तम वचन से सबका हित करनेवाला होता है॥६॥

अ॒न्तर्ह्य॑ग्न॒ ईय॑से वि॒द्वान् जन्मो॒भया॑ कवे। दू॒तो जन्ये॑व॒ मित्र्यः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सत्य का उपदेश और सत्य का आचरण करनेवाला पुरुष सबके प्रिय पियारे काम को चाहनेवाला सबका मित्र शास्त्रज्ञ धर्मात्मा विद्वान् बाहर-भीतर विज्ञान देकर धर्म में नियत करता है, वैसे भीतर-बाहर स्थित परमेश्वर सबके समस्त कामों को जानकर फल देता है॥७॥

स वि॒द्वाँ आ च॑ पिप्रयो॒ यक्षि॑ चिकित्व आनु॒षक्। आ चा॒स्मिन्त्स॑त्सि ब॒र्हिषि॑॥

हे मनुष्यो! आप लोग जो इस जगत् में व्याप्त, प्रिय पदार्थ का देनेवाला और सर्वज्ञ अन्तर्यामी ईश्वर है, उसी की उपासना करें॥८॥इस सूक्त में वह्नि और ईश्वर के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह छठा सूक्त और सत्ताईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

श्रेष्ठं॑ यविष्ठ भार॒ताग्ने॑ द्यु॒मन्त॒मा भ॑र। वसो॑ पुरु॒स्पृहं॑ र॒यिम्॥

जो उत्तम धन लाभ के लिये बहुत यत्न करते हैं, वे धनाढ्य होते हैं॥१॥

मा नो॒ अरा॑तिरीशत दे॒वस्य॒ मर्त्य॑स्य च। पर्षि॒ तस्या॑ उ॒त द्वि॒षः॥

जो द्वेष छोड़ धार्मिक विद्वानों की तथा अविद्वानों के साथ प्रीति उत्पन्न कराते हैं, वे किसी से तिरस्कार को नहीं प्राप्त होते हैं॥२॥

विश्वा॑ उ॒त त्वया॑ व॒यं धारा॑ उद॒न्या॑इव। अति॑ गाहेमहि॒ द्विषः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जल की धारा प्राप्त हुए स्थान को छोड़ दूसरे स्थान को जाती हैं, वैसे शत्रुभाव को छोड़ मित्रभाव को सब मनुष्य प्राप्त होवें॥३॥

शुचिः॑ पावक॒ वन्द्योऽग्ने॑ बृ॒हद्वि रो॑चसे। त्वं घृ॒तेभि॒राहु॑तः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे घी आदि पदार्थों से प्रज्वलित किया हुआ पवित्र करनेवाला अग्नि बहुत प्रकाशित होता है, वैसे सत्कार पाया हुआ विद्वान् जन बहुत उपकार करता है॥४॥

त्वं नो॑ असि भार॒ताग्ने॑ व॒शाभि॑रु॒क्षभिः॑। अ॒ष्टाप॑दीभि॒राहु॑तः॥

जो मनुष्य आठ स्थानों में उच्चारण की हुई वाणी से सत्य का उपदेश करता हुआ गवादि पशुओं की रक्षा से सबकी पालना का विधान करता है, वह सबको रखने के योग्य है॥५॥

द्र्व॑न्नः स॒र्पिरा॑सुतिः प्र॒त्नो होता॒ वरे॑ण्यः। सह॑सस्पु॒त्रो अद्भु॑तः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। अग्नि का भोजन-स्थानी काष्ठ और पीने के अर्थ सब ओषधियों का रस विद्यमान है, यह जान कर काष्ठ और ओषधिसार जल आदि के संयोग से कलाघरों में अग्नि का प्रयोग करना चाहिये॥६॥इस सूक्त में विद्वान् और अग्नि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह दूसरे मण्डल में सप्तम सूक्त और अठ्ठाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

वा॒ज॒यन्नि॑व॒ नू रथा॒न्योगाँ॑ अ॒ग्नेरुप॑ स्तुहि। य॒शस्त॑मस्य मी॒ळ्हुषः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे शिल्पी विद्वान् जन! आप जैसे घोड़ों और बैल आदि से चलनेवाले रथों को चलाते हैं, वैसे ही अति शीघ्र गति से जल के कलाघरों से प्रेरणा पाया अग्नि विमानादि यानों को शीघ्र चलाता है, यह सबके प्रति उपदेश करो॥१॥

यः सु॑नी॒थो द॑दा॒शुषे॑ऽजु॒र्यो ज॒रय॑न्न॒रिम्। चारु॑प्रतीक॒ आहु॑तः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे शिल्पकामों में प्रेरणा किया हुआ अग्नि उत्तम कामों को सिद्ध करता है, वैसे सुन्दर शिक्षा पाये हुए बुद्धिमान् जन बहुत सी उन्नति करते हैं॥२॥

य उ॑ श्रि॒या दमे॒ष्वा दो॒षोषसि॑ प्रश॒स्यते॑। यस्य॑ व्र॒तं न मीय॑ते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि का शील और स्वरूप अनादि अविनाशी वर्त्तमान है, वैसे ईश्वर, जीव और आकाश आदि पदार्थों का शील और स्वरूप नित्य वर्त्तमान है॥३॥

आ यः स्व१॒॑र्ण भा॒नुना॑ चि॒त्रो वि॒भात्य॒र्चिषा॑। अ॒ञ्जा॒नो अ॒जरै॑र॒भि॥

अग्नि यह सूक्ष्म परमाणुरूप पदार्थों में सर्वदा अपने रूप के साथ रहता है। काष्ठ आदि में पदार्थों की वृद्धि और न्यूनता आदि से कोई समय बढ़ता और कभी कमती होता है॥४॥

अत्रि॒मनु॑ स्व॒राज्य॑म॒ग्निमु॒क्थानि॑ वावृधुः। विश्वा॒ अधि॒ श्रियो॑ दधे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वानों की योग्यता है, कि जिन उपदेशों से अग्न्यादि पदार्थविद्या राज्यलक्ष्मी बढ़े, उनसे सबको उद्योगी करें॥५॥

अ॒ग्नेरिन्द्र॑स्य॒ सोम॑स्य दे॒वाना॑मू॒तिभि॑र्व॒यम्। अरि॑ष्यन्तः सचेमह्य॒भि ष्या॑म पृतन्य॒तः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् जन अग्न्यादि विद्या से रक्षित सबके मित्र प्रशंसित सेनावाले होकर मित्र होते हुए धर्म और विद्या की उन्नति करें, वैसे सब मनुष्य प्रयत्न करें॥६॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये॥यह दूसरे अष्टक में उनतीशवाँ वर्ग और आठवाँ सूक्त समाप्त हुआ॥

नि होता॑ होतृ॒षद॑ने॒ विदा॑नस्त्वे॒षो दी॑दि॒वाँ अ॑सदत्सु॒दक्षः॑। अद॑ब्धव्रतप्रमति॒र्वसि॑ष्ठः सहस्रंभ॒रः शुचि॑जिह्वो अ॒ग्निः॥

जो मनुष्य कार्यों में प्रदीप्त नित्य गुणकर्मस्वभावयुक्त पवित्र करनेवाले सकल पदार्थों के धारणकर्त्ता अग्नि को यथावत् प्रयुक्त करते हैं, वे अविनाशी सुखवाले होते हैं॥१॥

त्वं दू॒तस्त्वमु॑ नः पर॒स्पास्त्वं वस्य॒ आ वृ॑षभ प्रणे॒ता। अग्ने॑ तो॒कस्य॑ न॒स्तने॑ त॒नूना॒मप्र॑युच्छ॒न्दीद्य॑द्बोधि गो॒पाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य, अग्नि प्रयोग से प्रेरणा दी हुई नौका समुद्र से पार जैसे पहुँचाती, वैसे दुःखरूपी समुद्र से पार करते हैं, सन्तानों की शिक्षा में और शरीरों की रक्षा करने में प्रवीण और प्रमाद को छोड़ धर्म के अनुष्ठान करनेवाले हैं, वे यहाँ आभ्युदयिक सुख को प्राप्त होते हैं॥२॥

वि॒धेम॑ ते पर॒मे जन्म॑न्नग्ने वि॒धेम॒ स्तोमै॒रव॑रे स॒धस्थे॑। यस्मा॒द्योने॑रु॒दारि॑था॒ यजे॒ तं प्र त्वे ह॒वींषि॑ जुहुरे॒ समि॑द्धे॥

जो शुभ कर्मों को करते हैं वे श्रेष्ठ जन्म को प्राप्त होते हैं। जो अधर्म का आचरण करते हैं, वे नीच जन्म को प्राप्त होते हैं। जैसे विद्वान् जन जलते हुए अग्नि में सुगन्ध्यादि द्रव्य का होम कर संसार का उपकार करते हैं, वैसे वे सबसे उपकार को वर्त्तमान जन्म में वा जन्मान्तर में प्राप्त होते हैं॥३॥

अग्ने॒ यज॑स्व ह॒विषा॒ यजी॑याञ्छ्रु॒ष्टी दे॒ष्णम॒भि गृ॑णीहि॒ राधः॑। त्वं ह्यसि॑ रयि॒पती॑ रयी॒णां त्वं शु॒क्रस्य॒ वच॑सो म॒नोता॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो धनाढ्य धन से परोपकार करें, वे सबके प्यारे होते हैं॥४॥

उ॒भयं॑ ते॒ न क्षी॑यते वस॒व्यं॑ दि॒वेदि॑वे॒ जाय॑मानस्य दस्म। कृ॒धि क्षु॒मन्तं॑ जरि॒तार॑मग्ने कृ॒धि पतिं॑ स्वप॒त्यस्य॑ रा॒यः॥

उसी के कुल से धन नाश नहीं होता, जो और सुपात्रों के लिये संसार का उपकार करने को देता है॥५॥

सैनानी॑केन सुवि॒दत्रो॑ अ॒स्मे यष्टा॑ दे॒वाँ आय॑जिष्ठः स्व॒स्ति। अद॑ब्धो गो॒पा उ॒त नः॑ पर॒स्पा अग्ने॑ द्यु॒मदु॒त रे॒वद्दि॑दीहि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे उत्तम सेना से युक्त राजा दुष्टों को जीत विद्वानों का सत्कार कर और प्रजा की अच्छे प्रकार रक्षा कर सबका ऐश्वर्य बढ़ाता है, वैसे सभों को होना चाहिये॥६॥इस सूक्त में अग्नि के समान विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह नववाँ सूक्त और पहिला वर्ग समाप्त हुआ॥

जो॒हूत्रो॑ अ॒ग्निः प्र॑थ॒मः पि॒तेवे॒ळस्प॒दे मनु॑षा॒ यत्समि॑द्धः। श्रियं॒ वसा॑नो अ॒मृतो॒ विचे॑ता मर्मृ॒जेन्यः॑ श्रव॒स्यः१॒॑ स वा॒जी॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो अग्नि पृथिवी में प्रसिद्ध, शिल्पकार्य्यों के प्रयोग में अच्छे प्रकार लगाया हुआ धन का देनेवाला, स्वरूप से नित्य, चेतन गुणरहित और अति वेगवान् है, वह अच्छे प्रकार प्रयोग किया हुआ पिता के तुल्य शिल्पीजनों को पालता है॥१॥

श्रू॒या अ॒ग्निश्चि॒त्रभा॑नु॒र्हवं॑ मे॒ विश्वा॑भिर्गी॒र्भिर॒मृतो॒ विचे॑ताः। श्या॒वा रथं॑ वहतो॒ रोहि॑ता वो॒तारु॒षाह॑ चक्रे॒ विभृ॑त्रः॥

मनुष्य जिससे बिजुली आदि पदार्थ उत्पन्न होते हैं, सबका जीवन भी होता है, उस अग्नि की विद्या को सब उपायों से ग्रहण करें॥२॥

उ॒त्ता॒नाया॑मजनय॒न्त्सुषू॑तं॒ भुव॑द॒ग्निः पु॑रु॒पेशा॑सु॒ गर्भः॑। शिरि॑णायां चिद॒क्तुना॒ महो॑भि॒रप॑रीवृतो वसति॒ प्रचे॑ताः॥

हे मनुष्यो! जो अग्नि विद्यमान और नष्ट हुई पृथिवी में गर्भरूप विद्यमान है, उसी की विद्या को जानो॥३॥

जिघ॑र्म्य॒ग्निं ह॒विषा॑ घृ॒तेन॑ प्रतिक्षि॒यन्तं॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑। पृ॒थुं ति॑र॒श्चा वय॑सा बृ॒हन्तं॒ व्यचि॑ष्ठ॒मन्नै॑ रभ॒सं दृशा॑नम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो मनुष्य समस्त मूर्तिमान् पदार्थों में ठहरे हुए बिजुलीरूप अग्नि को साधनों से अच्छे प्रकार ग्रहण कर इसमें सुगन्धि आदि पदार्थ का होम करते हैं, वे अनन्त सुख को प्राप्त होते हैं॥४॥

आ वि॒श्वतः॑ प्र॒त्यञ्चं॑ जिघर्म्यर॒क्षसा॒ मन॑सा॒ तज्जु॑षेत। मर्य॑श्रीः स्पृह॒यद्व॑र्णो अ॒ग्निर्नाभि॒मृशे॑ त॒न्वा॒३॒॑ जर्भु॑राणः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो शुद्धान्तःकरण जन सुन्दर शोभा करनेवाले और घृतादि आहुतियों के ग्राहक, सबके धारण करनेवाले, सब रूपों के प्रकाशक और न सहने योग्य अग्नि को सिद्ध करते हैं, वे श्रीमान् होते हैं॥५॥

ज्ञे॒या भा॒गं स॑हसा॒नो वरे॑ण॒ त्वादू॑तासो मनु॒वद्व॑देम। अनू॑नम॒ग्निं जु॒ह्वा॑ वच॒स्या म॑धु॒पृचं॑ धन॒सा जो॑हवीमि॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे आप्त विद्वान् जन अग्न्यादि पदार्थविद्या को जानकर औरों के हित के लिये उपदेश करते हैं, वैसे हमलोग भी विद्या का उपदेश करें॥६॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये॥यह दसवाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

श्रु॒धी हव॑मिन्द्र॒ मा रि॑षण्यः॒ स्याम॑ ते दा॒वने॒ वसू॑नाम्। इ॒मा हि त्वामूर्जो॑ व॒र्धय॑न्ति वसू॒यवः॒ सिन्ध॑वो॒ न क्षर॑न्तः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे समुद्र जल से सबको बढ़ाता है, वैसे प्रधान पुरुषों को चाहिये कि अपने आश्रित सब जनों को दान और मान से बढ़ावें॥१॥

सृ॒जो म॒हीरि॑न्द्र॒ या अपि॑न्वः॒ परि॑ष्ठिता॒ अहि॑ना शूर पू॒र्वीः। अम॑र्त्यं चिद्दा॒सं मन्य॑मान॒मवा॑भिनदु॒क्थैर्वा॑वृधा॒नः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सूर्य के समान उत्तम वाणियों को वर्षाते हैं, और सेवकों को प्रसन्न करते हैं, वे उत्तम प्रतिष्ठित होते हैं॥२॥

उ॒क्थेष्विन्नु शू॑र॒ येषु॑ चा॒कन्स्तोमे॑ष्विन्द्र रु॒द्रिये॑षु च। तुभ्येदे॒ता यासु॑ मन्दसा॒नः प्र वा॒यवे॑ सिस्रते॒ न शु॒भ्राः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पवन के साथ बिजुली फैलती है, वैसे विद्या के साथ पुरुष सुखों के बीच विहार करता है॥३॥

शु॒भ्रं नु ते॒ शुष्मं॑ व॒र्धय॑न्तः शु॒भ्रं वज्रं॑ बा॒ह्वोर्दधा॑नाः। शु॒भ्रस्त्वमि॑न्द्र वावृधा॒नो अ॒स्मे दासी॒र्विशः॒ सूर्ये॑ण सह्याः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो निरन्तर राज्य के बढ़ाने को समर्थ और शस्त्र तथा अस्त्र चलाने में कुशल प्रधान पुरुषों को उन्नति देते हैं, वे शीघ्र प्राधान्य को प्राप्त होते हैं॥४॥

गुहा॑ हि॒तं गुह्यं॑ गू॒ळ्हम॒प्स्वपी॑वृतं मा॒यिनं॑ क्षि॒यन्त॑म्। उ॒तो अ॒पो द्यां त॑स्त॒भ्वांस॒मह॒न्नहिं॑ शूर वी॒र्ये॑ण॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य अन्तरिक्षस्थ जलों में सोते हुए मेघ को हन के सब प्रजा को पुष्ट करता है। वैसे राजा कपट के बीच वर्त्तमान अधर्मी शत्रुजन को छिन्न-भिन्न कर प्रजा को सुखी करे॥५॥

स्तवा॒ नु त॑ इन्द्र पू॒र्व्या म॒हान्यु॒त स्त॑वाम॒ नूत॑ना कृ॒तानि॑। स्तवा॒ वज्रं॑ बा॒ह्वोरु॒शन्तं॒ स्तवा॒ हरी॒ सूर्य॑स्य के॒तू॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। व्यतीत और वर्त्तमान आप्त धर्मात्मा सज्जनों ने जो धर्मयुक्त काम किये वा करते हैं, उन्हीं का अनुष्ठान और जनों को भी करना चाहिये॥६॥

हरी॒ नु त॑ इन्द्र वा॒जय॑न्ता घृत॒श्चुतं॑ स्वा॒रम॑स्वार्ष्टाम्। वि स॑म॒ना भूमि॑रप्रथि॒ष्टारं॑स्त॒ पर्व॑तश्चित्सरि॒ष्यन्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजपुरुष सूर्य के समान प्रजाजनों के उपकार करने वा मेघ के समान आनन्द देने और उत्तम बलवाले हैं, वे ही शत्रुओं को जीत सकते हैं॥७॥

नि पर्व॑तः सा॒द्यप्र॑युच्छ॒न्त्सं मा॒तृभि॑र्वावशा॒नो अ॑क्रान्। दू॒रे पा॒रे वाणीं॑ व॒र्धय॑न्त॒ इन्द्रे॑षितां ध॒मनिं॑ पप्रथ॒न्नि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिन सन्तानों को माता उत्तम शिक्षा और विद्या से प्रमादरहित कर बढ़ाती हैं, वे सुखों को प्राप्त होकर सब ओर से बढ़ते हैं॥८॥

इन्द्रो॑ म॒हां सिन्धु॑मा॒शया॑नं माया॒विनं॑ वृ॒त्रम॑स्फुर॒न्निः। अरे॑जेतां॒ रोद॑सी भिया॒ने कनि॑क्रदतो॒ वृष्णो॑ अस्य॒ वज्रा॑त्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजपुरुषो! जैसे सूर्य अपनी किरणों से समुद्र के जल को मेघमण्डल को पहुँचा और उसे वर्षाकर प्रजाजनों को सुखी करता है, वैसे आप विद्या से अच्छे प्रकार उन्नति-संयुक्त प्रजा कर उसे सुखी करें। जैसे बिजुली के श्रवण से सब डरते हैं, वैसे न्यायाचरण के उपदेश से दुष्टाचरण से सब डरें॥९॥

अरो॑रवी॒द्वृष्णो॑ अस्य॒ वज्रोऽमा॑नुषं॒ यन्मानु॑षो नि॒जूर्वा॑त्। नि मा॒यिनो॑ दान॒वस्य॑ मा॒या अपा॑दयत्पपि॒वान्त्सु॒तस्य॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अन्तरिक्ष में बिजुली के शब्द मेघ को जतलाते हैं, वैसे राजजन दुष्टाचरणों सें दुष्टजनों को सचेत करावें अर्थात् उनके छल-कपटों को जता देवें॥१०॥

पिबा॑पि॒बेदि॑न्द्र शूर॒ सोमं॒ मन्द॑न्तु त्वा म॒न्दिनः॑ सु॒तासः॑। पृ॒णन्त॑स्ते कु॒क्षी व॑र्धयन्त्वि॒त्था सु॒तः पौ॒र इन्द्र॑माव॥

मनुष्य लोग यदि पुष्टि और बुद्धि देनेवाले रोगविनाशक ओषधियों के सार को सेवन करते हैं तो पुरुषार्थी होकर ऐश्वर्य को बढ़ा सकते हैं॥११॥

त्वे इ॒न्द्राप्य॑भूम॒ विप्रा॒ धियं॑ वनेम ऋत॒या सप॑न्तः। अ॒व॒स्यवो॑ धीमहि॒ प्रश॑स्तिं स॒द्यस्ते॑ रा॒यो दा॒वने॑ स्याम॥

मनुष्यों को चाहिये कि सत्य विज्ञानयुक्त बुद्धि से ओषधिविद्या को जान इन ओषधियों का सेवन कर पुरुषार्थ बढ़ा लक्ष्मी का सञ्चय करें॥१२॥

स्याम॒ ते त॑ इन्द्र॒ ये त॑ ऊ॒ती अ॑व॒स्यव॒ ऊर्जं॑ व॒र्धय॑न्तः। शु॒ष्मिन्त॑मं॒ यं चा॒कना॑म देवा॒स्मे र॒यिं रा॑सि वी॒रव॑न्तम्॥

जो भी मनुष्य परस्पर की वृद्धि करते हैं, वे सब ओर से बढ़ते हैं, किसी को अच्छी कामना नहीं छोड़नी चाहिये॥१३॥

रासि॒ क्षयं॒ रासि॑ मि॒त्रम॒स्मे रासि॒ शर्ध॑ इन्द्र॒ मारु॑तं नः। स॒जोष॑सो॒ ये च॑ मन्दसा॒नाः प्र वा॒यवः॑ पा॒न्त्यग्र॑णीतिम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मित्र हो विद्या और विनय को प्राप्त होकर सत्य की कामना करते हैं, वे सबको सुख दे सकते हैं॥१४॥

व्यन्त्विन्नु येषु॑ मन्दसा॒नस्तृ॒पत्सोमं॑ पाहि द्र॒ह्यदि॑न्द्र। अ॒स्मान्त्सु पृ॒त्स्वा त॑रु॒त्राव॑र्धयो॒ द्यां बृ॒हद्भि॑र॒र्कैः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्य जिन विद्वान् जनों में निवास करते और ऐश्वर्य को प्राप्त होकर तृप्त होते हुए औरों को तृप्त करते हैं, उनमें वे सूर्य के समान प्रकाशित होते हैं॥१५॥

बृ॒हन्त॒ इन्नु ये ते॑ तरुत्रो॒क्थेभि॑र्वा सु॒म्नमा॒विवा॑सान्। स्तृ॒णा॒नासो॑ ब॒र्हिः प॒स्त्या॑व॒त्त्वोता॒ इदि॑न्द्र॒ वाज॑मग्मन्॥

वे ही सुख को प्राप्त होते हैं, जो धार्मिक विद्वान् सत्पुरुषों से सुन्दर शिक्षित और रक्षित हों॥१६॥

उ॒ग्रेष्विन्नु शू॑र मन्दसा॒नस्त्रिक॑द्रुकेषु पाहि॒ सोम॑मिन्द्र। प्र॒दोधु॑व॒च्छ्मश्रु॑षु प्रीणा॒नो या॒हि हरि॑भ्यां सु॒तस्य॑ पी॒तिम्॥

जो मनुष्य प्रबल बुद्धिजनों के साथ अच्छे प्रकार कार्यों का प्रयोग करते हैं तो शत्रुओं को कंपाते ओर बड़ी-बड़ी ओषधियों के रस को पीवते हुए अच्छे सिखाये हुए घोड़ों से युक्त रथ से जैसे वैसे शीघ्र सुखों को प्राप्त होते हैं॥१७॥

धि॒ष्वा शवः॑ शूर॒ येन॑ वृ॒त्रम॒वाभि॑न॒द्दानु॑मौर्णवा॒भम्। अपा॑वृणो॒र्ज्योति॒रार्या॑य॒ नि स॑व्य॒तः सा॑दि॒ दस्यु॑रिन्द्र॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजपुरुषों को चाहिये कि जैसे सूर्य अन्धकार को वैसे अन्याय को निवृत्त कर सज्जनों के हृदयों में सुख की प्राप्ति करा निरन्तर बल बढ़ावें॥१८॥

सने॑म॒ ये त॑ ऊ॒तिभि॒स्तर॑न्तो॒ विश्वाः॒ स्पृध॒ आर्ये॑ण॒ दस्यू॑न्। अ॒स्मभ्यं॒ तत्त्वा॒ष्ट्रं वि॒श्वरू॑प॒मर॑न्धयः सा॒ख्यस्य॑ त्रि॒ताय॑॥

जो मनुष्य किये हुए को जाननेवाले विद्वान् को सेनापति का अधिकार कर श्रेष्ठ पुरुषों के साथ कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य कामों को अच्छे प्रकार निश्चय कर प्रजा सुख की सिद्धि करें, वे सब सुखों को प्राप्त होवें॥१९॥

अ॒स्य सु॑वा॒नस्य॑ म॒न्दिन॑स्त्रि॒तस्य॒ न्यर्बु॑दं वावृधा॒नो अ॑स्तः। अव॑र्तय॒त्सूर्यो॒ न च॒क्रं भि॒नद्ब॒लमिन्द्रो॒ अङ्गि॑रस्वान्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजजन जैसे सूर्य असंख्यात लोकों और उनके बीच रहनेवाले पदार्थों की व्यवस्था करता है, वा पवन की प्रेरणा दी हुई बिजुली मेघ को वर्षाती है, वैसे आचरण करते हैं, वे सब से कल्याण को प्राप्त होते हैं॥२०॥

नू॒नं सा ते॒ प्रति॒ वरं॑ जरि॒त्रे दु॑ही॒यदि॑न्द्र॒ दक्षि॑णा म॒घोनी॑। शिक्षा॑ स्तो॒तृभ्यो॒ माति॑ ध॒ग्भगो॑ नो बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

जो सबको विद्या देने और सत्योपदेश करनेवाले के लिये बहुत श्रेष्ठ दक्षिणा देते हैं, वे विद्वान् होकर शूरवीर होते हैं॥२१॥इस सूक्त में राजधर्म विद्वान् और सेनापति के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह दूसरे मण्डल में ग्यारहवाँ सूक्त प्रथम अनुवाक और छठा वर्ग समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

यो जा॒त ए॒व प्र॑थ॒मो मन॑स्वान्दे॒वो दे॒वान्क्रतु॑ना प॒र्यभू॑षत्। यस्य॒ शुष्मा॒द्रोद॑सी॒ अभ्य॑सेतां नृ॒म्णस्य॑ म॒ह्ना स ज॑नास॒ इन्द्रः॑॥

जिस ईश्वर ने सबका प्रकाश करने और सबका धारण करनेवाला अपने प्रकाश से युक्त आकर्षण शक्तियुक्त लोकों की व्यवस्था करनेवाला सूर्यलोक बनाया है, वह ईश्वर सूर्य का भी सूर्य है, यह जानना चाहिये॥१॥

यः पृ॑थि॒वीं व्यथ॑माना॒मदृं॑ह॒द्यः पर्व॑ता॒न्प्रकु॑पिताँ॒ अर॑म्णात्। यो अ॒न्तरि॑क्षं विम॒मे वरी॑यो॒ यो द्यामस्त॑भ्ना॒त्स ज॑नास॒ इन्द्रः॑॥

हे मनुष्यो! जो ईश्वर बिजुली वा सूर्य को न रचे तो चलते हुए बड़े-बड़े भूगोलों को कौन धारण करे, कौन मेघ को वर्षावे और कौन अन्तरिक्ष को अपने प्रकाश से पूरित करे॥२॥

यो ह॒त्वाहि॒मरि॑णात्स॒प्त सिन्धू॒न्यो गा उ॒दाज॑दप॒धा ब॒लस्य॑। यो अश्म॑नोर॒न्तर॒ग्निं ज॒जान॑ सं॒वृक्स॒मत्सु॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑॥

हे मनुष्यो! जो सूर्यलोक मेघ को वर्षाकर समुद्रों को भरता है, सब भूगोलों को अपने प्रति खैंचता है, अपनी किरणों से मेघ और समीपस्थ पाषाण के बीच ऊष्मा को उत्पन्न करता है वह अग्निरूप है, यह जानना चाहिये॥३॥

येने॒मा विश्वा॒ च्यव॑ना कृ॒तानि॒ यो दासं॒ वर्ण॒मध॑रं॒ गुहाकः॑। श्व॒घ्नीव॒ यो जि॑गी॒वाल्ँल॒क्षमाद॑द॒र्यः पु॒ष्टानि॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो ईश्वर कारण से विविध प्रकार के लोकों और पदार्थों को रचता और जो सब कर्मों को लक्ष सा रखता है, वह सबको उपासना करने योग्य है॥४॥

यं स्मा॑ पृ॒च्छन्ति॒ कुह॒ सेति॑ घो॒रमु॒तेमा॑हु॒र्नैषो अ॒स्तीत्ये॑नम्। सो अ॒र्यः पु॒ष्टीर्विज॑इ॒वा मि॑नाति॒ श्रद॑स्मै धत्त॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑॥

जो आश्चर्य गुणकर्मस्वभावयुक्त परमेश्वर है उसको कोई वह कहाँ है, ऐसा कहते हैं, कोई उसको भयङ्कर, कोई शान्त और यह नहीं है ऐसा बहुत प्रकार से कहते हैं। वह सबका आधाभूत हुआ सत्य धर्म और जीवन के उपायों का वेद के द्वारा उपदेश करता है, वह सबको उपासना करने योग्य है॥५॥

यो र॒ध्रस्य॑ चोदि॒ता यः कृ॒शस्य॒ यो ब्र॒ह्मणो॒ नाध॑मानस्य की॒रेः। युक्तग्रा॑व्णो॒ यो॑ऽवि॒ता सु॑शि॒प्रः सु॒तसो॑मस्य॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑॥

हे मनुष्यो! उसी परमेश्वर की उपासना तुम करो कि जो जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलयकर्त्ता तथा सकल विद्यायुक्त वेद का उत्तम ज्ञान करानेवाला है॥६॥

यस्याश्वा॑सः प्र॒दिशि॒ यस्य॒ गावो॒ यस्य॒ ग्रामा॒ यस्य॒ विश्वे॒ रथा॑सः। यः सूर्यं॒ य उ॒षसं॑ ज॒जान॒ यो अ॒पां ने॒ता स ज॑नास॒ इन्द्रः॑॥

हे मनुष्यो! यदि आप लोग वेगादि अनेक गुणयुक्त सर्वमूर्त्तिमान् पदार्थों के आधाररूप शीघ्रगामी विमान आदि यान और वर्षा निमित्त बिजुलीरूप आग्नि को जानें तब तो कौन-कौन उत्तम कार्य सिद्ध न कर सकें॥७॥

यं क्रन्द॑सी संय॒ती वि॒ह्वये॑ते॒ परेऽव॑र उ॒भया॑ अ॒मित्राः॑। स॒मा॒नं चि॒द्रथ॑मातस्थि॒वांसा॒ नाना॑ हवेते॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे दो सेना सम्मुख खड़ी होकर युद्ध करती हैं, वैसे प्रकाश और अप्रकाश वर्त्तमान हैं॥८॥

यस्मा॒न्न ऋ॒ते वि॒जय॑न्ते॒ जना॑सो॒ यं युध्य॑माना॒ अव॑से॒ हव॑न्ते। यो विश्व॑स्य प्रति॒मानं॑ ब॒भूव॒ यो अ॑च्युत॒च्युत्स ज॑नास॒ इन्द्रः॑॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जो परमेश्वर की उपासना नहीं करते, बिजुली की विद्या को नहीं जानते, वे विजयशील नहीं होते। जो यह विश्व और जो सब पदार्थों का रूपमात्र है, वह परमेश्वर और बिजुली का विज्ञान करानेवाला है॥९॥

यः शश्व॑तो॒ मह्येनो॒ दधा॑ना॒नम॑न्यमाना॒ञ्छर्वा॑ ज॒घान॑। यः शर्ध॑ते॒ नानु॒ददा॑ति शृ॒ध्यां यो दस्यो॑र्ह॒न्ता स ज॑नास॒ इन्द्रः॑॥

जो परमेश्वर दुष्टाचारियों को न ताड़ना दे, धार्मिकों का सत्कार न करे और डाकुओं को न मारे तो न्यायव्यवस्था नष्ट हो जाय॥१०॥

यः शम्ब॑रं॒ पर्व॑तेषु क्षि॒यन्तं॑ चत्वारिं॒श्यां श॒रद्य॒न्ववि॑न्दत्। ओ॒जा॒यमा॑नं॒ यो अहिं॑ ज॒घान॒ दानुं॒ शया॑नं॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑॥

जो चालीस वर्ष पर्यन्त वर्षा न हो तो कौन प्राण धर सके। जो सूर्य जल को न खींचे, न धारण करे और न वर्षावे तो कौन बल पाने को योग्य हो॥११॥

यः स॒प्तर॑श्मिर्वृष॒भस्तुवि॑ष्मान॒वासृ॑ज॒त्सर्त॑वे स॒प्त सिन्धू॑न्। यो रौ॑हि॒णमस्फु॑र॒द्वज्र॑बाहु॒र्द्यामा॒रोह॑न्तं॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑॥

जिसमें रक्तादि वर्णयुक्त सात प्रकार के किरण विद्यमान हैं, वही सूर्यलोक वर्षाद्वारा नदी और नदों को अच्छे प्रकार परिपूर्ण करता और फिर ऊपर को जल खींच के धारण करता, फिर वर्षाता है, ऐसे ही ईश्वर के आज्ञारूप नियम से यह संसारचक्र वर्त्तमान है॥१२॥

द्यावा॑ चिदस्मै पृथि॒वी न॑मेते॒ शुष्मा॑च्चिदस्य॒ पर्व॑ता भयन्ते। यः सो॑म॒पा नि॑चि॒तो वज्र॑बाहु॒र्यो वज्र॑हस्तः॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑॥

हे मनुष्यो! जिसके आकर्षण से प्रकाश और क्षिति नमे हुए वर्त्तमान हैं, मेघ भ्रमि रहे हैं, हाथों के समान जो रस को ऊर्ध्व पहुँचाता है, उसका यथावत् अच्छे प्रकार प्रयोग करो॥१३॥

यः सु॒न्वन्त॒मव॑ति॒ यः पञ्च॑न्तं॒ यः शंस॑न्तं॒ यः श॑शमा॒नमू॒ती। यस्य॒ ब्रह्म॒ वर्ध॑नं॒ यस्य॒ सोमो॒ यस्ये॒दं राधः॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑॥

हे मनुष्यो! जिस परमात्मा ने वेदोपदेश द्वारा मनुष्यों की उन्नति की वा जिससे धर्मात्मा जन पलते वा जिससे दुष्टाचरण करनेवाले ताड़ना पाते वा जिसका यह सब जगत् ऐश्वर्यरूप है, उसका ध्यान अपने-अपने आत्माओं में निरन्तर करो॥१४॥

यः सु॑न्व॒ते पच॑ते दु॒ध्र आ चि॒द्वाजं॒ दर्द॑र्षि॒ स किला॑सि स॒त्यः। व॒यं त॑ इन्द्र वि॒श्वह॑ प्रि॒यासः॑ सु॒वीरा॑सो वि॒दथ॒मा व॑देम॥

हे मनुष्यो! जो परमेश्वर मूर्ख अधर्मियों से जाना नहीं जा सकता और वह सब जगत् का याथातथ्य रचनेवाला वा विनाश करनेवाला विज्ञानस्वरूप अविनाशी है, उसी की प्रशंसा और उपासना करो॥१५॥इस सूक्त में सूर्य, ईश्वर और बिजुली के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह बारहवाँ सूक्त और नवमाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

ऋ॒तुर्जनि॑त्री॒ तस्या॑ अ॒पस्परि॑ म॒क्षू जा॒त आवि॑श॒द्यासु॒ वर्ध॑ते। तदा॑ह॒ना अ॑भवत्पि॒प्युषी॒ पयों॒ऽशोः पी॒यूषं॑ प्रथ॒मं तदु॒क्थ्य॑म्॥

मनुष्यों को वसन्तादि ऋतुओं की उत्पन्न करनेवाली बिजुली जाननी चाहिये, जिस बिजुली के प्रभाव से अमृत के समान मेघ जल वर्षाते हैं, जिससे सब प्रजा बढ़ती है, वह जाननी चाहिये॥१॥

स॒ध्रीमा य॑न्ति॒ परि॒ बिभ्र॑तीः॒ पयो॑ वि॒श्वप्स्न्या॑य॒ प्र भ॑रन्त॒ भोज॑नम्। स॒मा॒नो अध्वा॑ प्र॒वता॑मनु॒ष्यदे॒ यस्ताकृ॑णोः प्रथ॒मं सास्यु॒क्थ्यः॑॥

हे मनुष्यो! जो जल पवन के साथ चलता है, जिससे सबका पालन होता है, उसको सदा शोधो, जिससे आप लोग प्रशंसित हों॥२॥

अन्वेको॑ वदति॒ यद्ददा॑ति॒ तद्रू॒पा मि॒नन्तद॑पा॒ एक॑ ईयते। विश्वा॒ एक॑स्य वि॒नुद॑स्तितिक्षते॒ यस्ताकृ॑णोः प्रथ॒मं सास्यु॒क्थ्यः॑॥

हे मनुष्यो! जो अद्वितीय जगदीश्वर हम लोगों के कल्याण के लिये सृष्टि की आदि में वेदों का उपदेश करता, संसार की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करता है, जो अन्तर्यामी अपारशक्ति सब अपवादों को सहता है, उसी सर्वोत्तम प्रशंसा योग्य की आप लोग प्रशंसा करें॥३॥

प्र॒जाभ्यः॑ पु॒ष्टिं वि॒भज॑न्त आसते र॒यिमि॑व पृ॒ष्ठं प्र॒भव॑न्तमाय॒ते। असि॑न्व॒न्दंष्ट्रैः॑ पि॒तुर॑त्ति॒ भोज॑नं॒ यस्ताकृ॑णोः प्रथ॒मं सास्यु॒क्थ्यः॑॥

जो मनुष्य दूसरे मनुष्यों की विद्या और धन की वृद्धि के लिये बद्धपरिकर अर्थात् कटिबद्ध होते हैं, वे सुखी होते हुए प्रशंसनीय हैं॥४॥

अधा॑कृणोः पृथि॒वीं सं॒दृशे॑ दि॒वे यो धौ॑ती॒नाम॑हिह॒न्नारि॑णक्प॒थः। तं त्वा॒ स्तोमे॑भिरु॒दभि॒र्न वा॒जिनं॑ दे॒वं दे॒वा अ॑जन॒न्त्सास्यु॒क्थ्यः॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो! जैसे सविता नदियों के मार्गों को उत्पन्न करता सब मूर्तिमान् द्रव्य को प्रकाशित करता, वैसे न्याय मार्गों को अच्छे प्रकार चला कर विद्या और शिक्षा का प्रकाश तुम करो॥५॥

यो भोज॑नं च॒ दय॑से च॒ वर्ध॑नमा॒र्द्रादा शुष्कं॒ मधु॑मद्दु॒दोहि॑थ। स शे॑व॒धिं नि द॑धिषे वि॒वस्व॑ति॒ विश्व॒स्यैक॑ ईशिषे॒ सास्यु॒क्थ्यः॑॥

हे मनुष्यो! जो पालना करता हुआ ईश्वर समस्त जगत् का निर्माण कर और उसी की रक्षा कर सिद्धि करनेवाले पदार्थों को देकर समस्त विश्व को सुखों से परिपूर्ण करता है, वह एक ही उपासना के योग्य है॥६॥

यः पु॒ष्पिणी॑श्च प्र॒स्व॑श्च॒ धर्म॒णाधि॒ दाने॒ व्य१॒॑वनी॒रधा॑रयः। यश्चास॑मा॒ अज॑नो दि॒द्युतो॑ दि॒व उ॒रुरू॒र्वाँ अ॒भितः॒ सास्यु॒क्थ्यः॑॥

हे मनुष्यो! जिस ईश्वर ने बहुत पुष्प और फलयुक्त ओषधी सबकी आधारभूत पृथिवी और बिजुली आदि पदार्थ उत्पन्न किये हैं, वही आप हम लोगों को उपास्य हैं॥७॥

यो ना॑र्म॒रं स॒हव॑सुं॒ निह॑न्तवे पृ॒क्षाय॑ च दा॒सवे॑शाय॒ चाव॑हः। ऊ॒र्जय॑न्त्या॒ अप॑रिविष्टमा॒स्य॑मु॒तैवाद्य पु॑रुकृ॒त्सास्यु॒क्थ्यः॑॥

जो राजजन भृत्यों को और सेवकों को श्रेष्ठ भोजनादिक देकर आनन्दित करते हैं, वे स्तुति सेवनेवाले होकर बहुत भोगों को प्राप्त होते हैं॥८॥

श॒तं वा॒ यस्य॒ दश॑ सा॒कमाद्य॒ एक॑स्य श्रु॒ष्टौ यद्ध॑ चो॒दमावि॑थ। अ॒र॒ज्जौ दस्यू॒न्त्समु॑नब्द॒भीत॑ये सुप्रा॒व्यो॑ अभवः॒ सास्यु॒क्थ्यः॑॥

जिस किसी से एक सहस्र वीर योद्धा सत्कार करके रक्खे जाते हैं, वह चोरादिकों को निवृत्त कर सकता है॥९॥

विश्वेदनु॑ रोध॒ना अ॑स्य॒ पौंस्यं॑ द॒दुर॑स्मै दधि॒रे कृ॒त्नवे॒ धन॑म्। षळ॑स्तभ्ना वि॒ष्टिरः॒ पञ्च॑ सं॒दृशः॒ परि॑ प॒रो अ॑भवः॒ सास्यु॒क्थ्यः॑॥

जो मनुष्य युक्त आहार-विहार करनेवाले जितेन्द्रिय होते हैं, वे सब ऋतुओं में पाँचों इन्द्रियों से सुखों को प्राप्त होते हैं॥१०॥

सु॒प्र॒वा॒च॒नं तव॑ वीर वी॒र्यं१॒॑ यदेके॑न॒ क्रतु॑ना वि॒न्दसे॒ वसु॑। जा॒तूष्ठि॑रस्य॒ प्र वयः॒ सह॑स्वतो॒ या च॒कर्थ॒ सेन्द्र॒ विश्वा॑स्यु॒क्थ्यः॑॥

जिनके वेद के पारङ्गत अध्यापक विद्वान् प्रेम से उत्तम ज्ञान को देते हैं, वे कभी दुःखी वा निन्दित नहीं होते हैं॥११॥

अर॑मयः॒ सर॑पस॒स्तरा॑य॒ कं तु॒र्वीत॑ये च व॒य्या॑य च स्रु॒तिम्। नी॒चा सन्त॒मुद॑नयः परा॒वृजं॒ प्रान्धं श्रो॒णं श्र॒वय॒न्त्सास्यु॒क्थ्यः॑॥

जैसे शिल्पवेत्ता विद्वान् जन औरों को शिल्पविद्या के दान से उत्कृष्ट करते हुए अन्धे को देखते हुए के समान वा बहिरे को श्रवण करनेवाले के समान बहुश्रुत करते हैं, वे इस संसार में पूज्य होते हैं॥१२॥

अ॒स्मभ्यं॒ तद्व॑सो दा॒नाय॒ राधः॒ सम॑र्थयस्व ब॒हु ते॑ वस॒व्य॑म्। इन्द्र॒ यच्चि॒त्रं श्र॑व॒स्या अनु॒ द्यून्बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

वे ही विद्वान् हैं, जो औरों को शरीर आत्मा बल के योग से समर्थ और धनाढ्य, शूरवीर, पुरुषार्थी करते हैं॥१३॥इस सूक्त में बिजुली, विद्वान् और ईश्वर के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह तेरहवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अध्व॑र्यवो॒ भर॒तेन्द्रा॑य॒ सोम॒माम॑त्रेभिः सिञ्चता॒ मद्य॒मन्धः॑। का॒मी हि वी॒रः सद॑मस्य पी॒तिं जु॒होत॒ वृष्णे॒ तदिदे॒ष व॑ष्टि॥

जो मनुष्य सर्व रोग हरने, बुद्धि और बल के देनेवाले भोजन और पान अर्थात् उत्तम वस्तु पीने की कामना करते हैं, वे बलिष्ठ वीर होते हैं॥१॥

अध्व॑र्यवो॒ यो अ॒पो व॑व्रि॒वांसं॑ वृ॒त्रं ज॒घाना॒शन्ये॑व वृ॒क्षम्। तस्मा॑ ए॒तं भ॑रत तद्व॒शायँ॑ ए॒ष इन्द्रो॑ अर्हति पी॒तिम॑स्य॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो सूर्य के समान विद्या और मेघ के समान सुख की उत्पत्ति करते हैं और सदा पथ्योषधि सेवी हुए ओषधियों का सेवन करते हैं, वे परोपकार करने को भी योग्य होते हैं॥२॥

अध्व॑र्यवो॒ यो दृभी॑कं ज॒घान॒ यो गा उ॒दाज॒दप॒ हि ब॒लं वः। तस्मा॑ ए॒तम॒न्तरि॑क्षे॒ न वात॒मिन्द्रं॒ सोमै॒रोर्णु॑त॒ जूर्न वस्त्रैः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजपुरुष भयानक गोहत्या करनेवालों को मारते हैं और उत्तमों की रक्षा करते हैं, वे निर्भय होते हैं॥३॥

अध्व॑र्यवो॒ य उर॑णं ज॒घान॒ नव॑ च॒ख्वांसं॑ नव॒तिं च॑ बा॒हून्। यो अर्बु॑द॒मव॑ नी॒चा ब॑बा॒धे तमिन्द्रं॒ सोम॑स्य भृ॒थे हि॑नोत॥

हे सेनास्थ मनुष्यो तुमको जो कि अनेकों सहाय युक्त दुष्ट करनेवाले दुराचारियों का मारने और राज्यैश्वर्य का पुष्ट करनेवाला हो, वह सेनापति करना चाहिये॥४॥

अध्व॑र्यवो॒ यः स्वश्नं॑ ज॒घान॒ यः शुष्ण॑म॒शुषं॒ यो व्यं॑सम्। यः पिप्रुं॒ नमु॑चिं॒ यो रु॑धि॒क्रां तस्मा॒ इन्द्रा॒यान्ध॑सो जुहोत॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य जैसे सूर्य मेघ को धारण कर वर्षाता है, वैसे जो कर को लेकर फिर देता है, दुष्टों को रोकवा के श्रेष्ठों को यथा समय रोकता, वह सेनापति होने योग्य है॥५॥

अध्व॑र्यवो॒ यः श॒तं शम्ब॑रस्य॒ पुरो॑ बि॒भेदाश्म॑नेव पू॒र्वीः। यो व॒र्चिनः॑ श॒तमिन्द्रः॑ स॒हस्र॑म॒पाव॑प॒द्भर॑ता॒ सोम॑मस्मै॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो जैसे सूर्य वा बिजुली मेघ की असंख्य नगरियों को छिन्न-भिन्न करता है, पृथिवी पर अपरिमित जल वर्षाता है, वैसे जो प्रजा के लिये ऐश्वर्य का धारण करता है, उसका निरन्तर सत्कार करो॥६॥

अध्व॑र्यवो॒ यः श॒तमा स॒हस्रं॒ भूम्या॑ उ॒पस्थेऽव॑पज्जघ॒न्वान्। कुत्स॑स्या॒योर॑तिथि॒ग्वस्य॑ वी॒रान्न्यावृ॑ण॒ग्भर॑ता॒ सोम॑मस्मै॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो जैसे रूप से छिन्न भिन्न हुआ मेघ असंख्य बिन्दुओं को वर्षाता है, वैसे जो शत्रु सेना पर शस्त्रों को वर्षावे, वह विजय को प्राप्त होवे॥७॥

अध्व॑र्यवो॒ यन्न॑रः का॒मया॑ध्वे श्रु॒ष्टी वह॑न्तो नशथा॒ तदिन्द्रे॑। गभ॑स्तिपूतं भरत श्रु॒तायेन्द्रा॑य॒ सोमं॑ यज्यवो जुहोत॥

हे विद्वानो! जिस प्रकार की विद्या अपने अर्थ चाहो, वैसे दूसरों के लिये भी चाहो, जिससे सब बहुत ऐश्वर्यवाले हों॥८॥

अध्व॑र्यवः॒ कर्त॑ना श्रु॒ष्टिम॑स्मै॒ वने॒ निपू॑तं॒ वन॒ उन्न॑यध्वम्। जु॒षा॒णो हस्त्य॑म॒भि वा॑वशे व॒ इन्द्रा॑य॒ सोमं॑ मदि॒रं जु॑होत॥

जो वैद्य जन सूर्य किरणों से निष्पन्न हुए ओषधि रस को क्रिया से उत्कृष्ट करके आप सेवते तथा औरों के लिये देते हैं, वे शीघ्र अपने कार्य को सिद्ध कर सकते हैं॥९॥

अध्व॑र्यवः॒ पय॒सोध॒र्यथा॒ गोः सोमे॑भिरीं पृणता भो॒जमिन्द्र॑म्। वेदा॒हम॑स्य॒ निभृ॑तं म ए॒तद्दित्स॑न्तं॒ भूयो॑ यज॒तश्चि॑केत॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्य जैसे गौयें घास आदि को खा कर दूध उत्पन्न करती हैं, वैसे महौषधियों का संग्रह कर श्रेष्ठ औषधियों को सिद्ध करें॥१०॥

अध्व॑र्यवो॒ यो दि॒व्यस्य॒ वस्वो॒ यः पार्थि॑वस्य॒ क्षम्य॑स्य॒ राजा॑। तमूर्द॑रं॒ न पृ॑णता॒ यवे॒नेन्द्रं॒ सोमे॑भि॒स्तदपो॑ वो अस्तु॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वान् जन धान्य अन्न से मटका वा डिहरा को जैसे वैसे विद्यार्थियों की बुद्धियों को विद्या और उत्तम शिक्षा से तृप्त करते हैं, वे राजा को सेवने योग्य हों॥११॥

अ॒स्मभ्यं॒ तद्व॑सो दा॒नाय॒ राधः॒ सम॑र्थयस्व ब॒हु ते॑ वस॒व्य॑म्। इन्द्र॒ यच्चि॒त्रं श्र॑व॒स्या अनु॒ द्यून्बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

सज्जनों का धन औरों के सुख के लिये और दुष्टों का धन औरों के दुःख के लिये होता है। जो धन और ऐश्वर्यों की उन्नति के लिये सर्वदा प्रयत्न करते हैं, वे पुष्कल वैभव पाते हैं॥१२॥इस सूक्त में सोम बिजुली राजप्रजा और क्रियाकौशलता के प्रयोजनों के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह चौदहवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र घा॒ न्व॑स्य मह॒तो म॒हानि॑ स॒त्या स॒त्यस्य॒ कर॑णानि वोचम्। त्रिक॑द्रुकेष्वपिबत्सु॒तस्या॒स्य मदे॒ अहि॒मिन्द्रो॑ जघान॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य जैसे सूर्य किरणों से सबके रस को अपने प्रकाश से उन्नत करता वा शोधता है, वैसे ओषधियों के रस को जो कि रोगनिवारण करने से आनन्द देनेवाला है, उसको सेवते वा परमेश्वर के सत्यगुण, कर्म, स्वभाव और साधनों के अनुकूल कर्मों को करते हैं, वे ही शीघ्र सुख को प्राप्त होते हैं॥१॥

अ॒वं॒शे द्याम॑स्तभायद्बृ॒हन्त॒मा रोद॑सी अपृणद॒न्तरि॑क्षम्। स धा॑रयत्पृथि॒वीं प॒प्रथ॑च्च॒ सोम॑स्य॒ ता मद॒ इन्द्र॑श्चकार॥

कोई नास्तिकता को स्वीकार कर यदि ऐसे कहे कि जो ये लोक परस्पर के आकर्षण से स्थिर हैं, इनका कोई और धारण करने वा रचनेवाला नहीं है, उनके प्रति विद्वान् जन ऐसा समाधान देवें कि यदि सूर्यादि लोकों के आकर्षण से ही सब लोक स्थिति पाते हैं, तो सृष्टि के अन्त में अर्थात् जहाँ कि सृष्टि के आगे कुछ नहीं है, वहाँ के लोकों का और लोकों के आकर्षण के बिना आकर्षण होना कैसे सम्भव है। इससे सर्वव्यापक परमेश्वर की आकर्षण शक्ति से ही सूर्यादि लोक अपने रूप और अपनी क्रियाओं को धारण करते हैं। ईश्वर के इन उक्त कर्मों को देख धन्यवादों से ईश्वर की प्रशंसा सर्वदा करनी चाहिये॥२॥

सद्मे॑व॒ प्राचो॒ वि मि॑माय॒ मानै॒र्वज्रे॑ण॒ खान्य॑तृणन्न॒दीना॑म्। वृथा॑सृजत्प॒थिभि॑र्दीर्घया॒थैः सोम॑स्य॒ ता मद॒ इन्द्र॑श्चकार॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो! जिस ईश्वर से पूर्व कल्प की रीति से और परमाणुओं से लोक-लोकान्तरों का निर्माण किया जाता है, जिसका अपना प्रयोजन केवल परोपकार को छोड़कर और कुछ भी नहीं है, उस जगदीश्वर के उक्त काम धन्यवाद के योग्य हैं, उनका तुम स्मरण करो॥३॥

स प्र॑वो॒ळ्हॄन्प॑रि॒गत्या॑ द॒भीते॒र्विश्व॑मधा॒गायु॑धमि॒द्धे अ॒ग्नौ। सं गोभि॒रश्वै॑रसृज॒द्रथे॑भिः॒ सोम॑स्य॒ ता मद॒ इन्द्र॑श्चकार॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे संप्राप्त अग्नि सूखे और गीले पदार्थ को भस्म करता है, वैसे अच्छे प्रकार प्राप्त हुए प्रलय समय में जगदीश्वर सबका प्रलय करता है॥४॥

स ईं॑ म॒हीं धुनि॒मेतो॑ररम्णा॒त्सो अ॑स्ना॒तॄन॑पारयत्स्व॒स्ति। त उ॒त्स्नाय॑ र॒यिम॒भि प्र त॑स्थुः॒ सोम॑स्य॒ ता मद॒ इन्द्र॑श्चकार॥

जो जगदीश्वर जगत् का रचने वा पालना करने वा हननेवाला और मुक्ति में शुद्धाचरण करनेवालों को दुःख से पार करनेवाला है, जो इस शुद्ध ईश्वर में समाधि से न्हाय (स्नानकर) के पवित्र होते हैं, वे सब जगत् में सब जगह प्रतिष्ठा को प्राप्त होते हैं॥५॥

सोद॑ञ्चं॒ सिन्धु॑मरिणान्महि॒त्वा वज्रे॒णान॑ उ॒षसः॒ सं पि॑पेष। अ॒ज॒वसो॑ ज॒विनी॑भिर्विवृ॒श्चन्त्सोम॑स्य॒ ता मद॒ इन्द्र॑श्चकार॥

जैसे सूर्य महत्त्व से अपने प्रकाश से जल को ऊपर पहुँचाता, रात्रि को विनाशता अतिवेग और अपनी चालों से अद्भुत कामों को करता है, वैसे हम लोगों को भी आरम्भ करना चाहिये॥६॥

स वि॒द्वाँ अ॑पगो॒हं क॒नीना॑मा॒विर्भव॒न्नुद॑तिष्ठत्परा॒वृक्। प्रति॑ श्रो॒णः स्था॒द्व्य१॒॑नग॑चष्ट॒ सोम॑स्य॒ ता मद॒ इन्द्र॑श्चकार॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सूर्य्य अपने प्रकाशदान से अन्धकार को निवृत्त कर विचित्र संसार दिखलाता है, वैसे जो विद्वान् जन सत्य विद्या का उपदेश देने से अविद्या को निवृत्त कर विविध पदार्थ विज्ञान को प्रकट करते हैं, वे विश्व के भूषित करनेवाले होते हैं॥७॥

भि॒नद्ब॒लमङ्गि॑रोभिर्गृणा॒नो वि पर्व॑तस्य दृंहि॒तान्यै॑रत्। रि॒णग्रोधां॑सि कृ॒त्रिमा॑ण्येषां॒ सोम॑स्य॒ ता मद॒ इन्द्र॑श्चकार॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे वायु के सहाय से अग्नि अद्भुत कर्मों को करता है, वैसे धार्मिक विद्वान् के सहाय से मनुष्य बड़े-बड़े उत्तम काम कर सकते हैं॥८॥

स्वप्ने॑ना॒भ्युप्या॒ चुमु॑रिं॒ धुनिं॑ च ज॒घन्थ॒ दस्युं॒ प्र द॒भीति॑मावः। र॒म्भी चि॒दत्र॑ विविदे॒ हिर॑ण्यं॒ सोम॑स्य॒ ता मद॒ इन्द्र॑श्चकार॥

जो पुरुषार्थी जन डाकू आदि दुष्टों का निवारण कर श्रेष्ठों को रक्षा के निमित्त इकट्ठे करें, वे जगत् के बीच ऐश्वर्य को पाते हैं॥९॥

नू॒नं सा ते॒ प्रति॒ वरं॑ जरि॒त्रे दु॑ही॒यदि॑न्द्र॒ दक्षि॑णा म॒घोनी॑। शिक्षा॑ स्तो॒तृभ्यो॒ माति॑ ध॒ग्भगो॑ नो बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

हे मनुष्यो! तुमको उत्तम विद्वानों के लिये अभीष्ट दक्षिणा और विद्यार्थियों के लिये शिक्षा देनी चाहिये, जिससे देने और लेनेवाले फलयुक्त हों॥१०॥इस सूक्त में विद्वान्, सूर्य, परमेश्वर, राज्य और दातृकर्म का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह पन्द्रहवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र वः॑ स॒तां ज्येष्ठ॑तमाय सुष्टु॒तिम॒ग्नावि॑व समिधा॒ने ह॒विर्भ॑रे। इन्द्र॑मजु॒र्यं ज॒रय॑न्तमुक्षि॒तं स॒नाद्युवा॑न॒मव॑से हवामहे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे अग्नि और विभाग आदि कर्मों का करनेवाला बिजली रूप अग्नि युक्ति के साथ संयुक्त किया हुआ बहुत ऐश्वर्य को उत्पन्न करता है, वैसे सत्पुरुषों की प्रशंसा सबकी श्रेष्ठता के लिये कल्पना की जाती है॥१॥

यस्मा॒दिन्द्रा॑द्बृह॒तः किं च॒नेमृ॒ते विश्वा॑न्यस्मि॒न्त्संभृ॒ताधि॑ वी॒र्या॑। ज॒ठरे॒ सोमं॑ त॒न्वी॒३॒॑ सहो॒ महो॒ हस्ते॒ वज्रं॒ भर॑ति शी॒र्षणि॒ क्रतु॑म्॥

हे मनुष्यो! जितना स्थूल वस्तु मात्र संसार में है, उतना समस्त बिजली के बिना नहीं है, उसको प्रयत्न से तुम लोग जानो॥२॥

न क्षो॒णीभ्यां॑ परि॒भ्वे॑ त इन्द्रि॒यं न स॑मु॒द्रैः पर्व॑तैरिन्द्र ते॒ रथः॑। न ते॒ वज्र॒मन्व॑श्नोति॒ कश्च॒न यदा॒शुभिः॒ पत॑सि॒ योज॑ना पु॒रु॥

जो मनुष्य अग्नि आदि पदार्थों से युक्त शस्त्र-अस्त्र आदि पदार्थों को सिद्ध करते हैं, वे तिरस्कार को नहीं पहुँचते और जो लोग आकाश, समुद्र, तथा पहाड़ी भूमि में भी रथों को चलाते हैं, वे सुख से मार्ग के पार होते हैं॥३॥

विश्वे॒ ह्य॑स्मै यज॒ताय॑ धृ॒ष्णवे॒ क्रतुं॒ भर॑न्ति वृष॒भाय॒ सश्च॑ते। वृषा॑ यजस्व ह॒विषा॑ वि॒दुष्ट॑रः॒ पिबे॑न्द्र॒ सोमं॑ वृष॒भेण॑ भा॒नुना॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो प्रथम से अपनी बुद्धि को उन्नति देकर विद्वानों का सत्कार करते हैं, वे सब जगत् में सत्कारयुक्त होते हैं॥४॥

वृष्णः॒ कोशः॑ पवते॒ मध्व॑ ऊ॒र्मिर्वृ॑ष॒भान्ना॑य वृष॒भाय॒ पात॑वे। वृष॑णाध्व॒र्यू वृ॑ष॒भासो॒ अद्र॑यो॒ वृष॑णं॒ सोमं॑ वृष॒भाय॑ सुष्वति॥

जैसे मेघ सूर्य से उत्पन्न होकर पुष्कल अन्न का निमित्त होता और सब प्राणियों को तृप्त करता है, वैसे विद्वानों को भी होना चाहिये॥०५॥

वृषा॑ ते॒ वज्र॑ उ॒त ते॒ वृषा॒ रथो॒ वृष॑णा॒ हरी॑ वृष॒भाण्यायु॑धा। वृष्णो॒ मद॑स्य वृषभ॒ त्वमी॑शिष॒ इन्द्र॒ सोम॑स्य वृष॒भस्य॑ तृप्णुहि॥

जिनके सब कामों की सिद्धि करानेवाले साधनोपसाधन दृढ़ वा प्रशंसित काम हैं, वे कामों के साधन कराने को पीड़ित नहीं होते॥६॥

प्र ते॒ नावं॒ न सम॑ने वच॒स्युवं॒ ब्रह्म॑णा यामि॒ सव॑नेषु॒ दाधृ॑षिः। कु॒विन्नो॑ अ॒स्य वच॑सो नि॒बोधि॑ष॒दिन्द्र॒मुत्सं॒ न वसु॑नः सिचामहे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो नौकाओं से समुद्र में रथों से पृथिवी पर और विमानों से आकाश में युद्ध करते हैं, वे सदा ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं॥७॥

पु॒रा सं॑बा॒धाद॒भ्या व॑वृत्स्व नो धे॒नुर्न व॒त्सं यव॑सस्य पि॒प्युषी॑। स॒कृत्सु ते॑ सुम॒तिभिः॑ शतक्रतो॒ सं पत्नी॑भि॒र्न वृष॑णो नसीमहि॥

जो और प्राणियों को पीड़ा से निवृत्त करते हैं, वे आप भी पीड़ा से निवृत्त होते हैं। जैसे क्रियमाण पत्नी के साथ पति आनन्दित होता है, वैसे सज्जन के साथ सब आनन्दित होते हैं॥८॥

नू॒नं सा ते॒ प्रति॒ वरं॑ जरि॒त्रे दु॑ही॒यदि॑न्द्र॒ दक्षि॑णा म॒घोनी॑। शिक्षा॑ स्तो॒तृभ्यो॒ माति॑ ध॒ग्भगो॑ नो बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

जो लोग किसी के उपकार को नहीं रोकते, सत्य उपदेश करते हैं, वे यशस्वी होते हैं॥९॥इस सूक्त में बिजली, विद्वान्, सूर्य और फिर विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह सोलहवाँ सूक्त और अठारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

तद॑स्मै॒ नव्य॑मङ्गिर॒स्वद॑र्चत॒ शुष्मा॒ यद॑स्य प्र॒त्नथो॒दीर॑ते। विश्वा॒ यद्गो॒त्रा सह॑सा॒ परी॑वृता॒ मदे॒ सोम॑स्य दृंहि॒तान्यैर॑यत्॥

हे मनुष्यो! जिस जगदीश्वर ने समस्त भूगोलों के धारण करने को सूर्यमण्डल बनाया है, उसका सदा ध्यान किया करो॥१॥

स भू॑तु॒ यो ह॑ प्रथ॒माय॒ धाय॑स॒ ओजो॒ मिमा॑नो महि॒मान॒माति॑रत्। शूरो॒ यो यु॒त्सु त॒न्वं॑ परि॒व्यत॑ शी॒र्षणि॒ द्यां म॑हि॒ना प्रत्य॑मुञ्चत॥

जो जगदीश्वर धारण करनेवालों का धारणकर्त्ता बलवानों का बलवान् बड़ों का बड़ा और पूज्यों का पूज्य है, उसकी सब उपासना करें॥२॥

अधा॑कृणोः प्रथ॒मं वी॒र्यं॑ म॒हद्यद॒स्याग्रे॒ ब्रह्म॑णा॒ शुष्म॒मैर॑यः। र॒थे॒ष्ठेन॒ हर्य॑श्वेन॒ विच्यु॑ताः॒ प्र जी॒रयः॑ सिस्रते स॒ध्र्य१॒॑क् पृथ॑क्॥

जो इस संसार में सबके बल पराक्रम को बढ़ानेवाले साधनोपसाधनयुक्त अलग-अलग वा मिलकर प्रयत्न करते हैं, वे अन्नादि ऐश्वर्ययुक्त होते हैं॥३॥

अधा॒ यो विश्वा॒ भुव॑ना॒भि म॒ज्मने॑शान॒कृत्प्रव॑या अ॒भ्यव॑र्धत। आद्रोद॑सी॒ ज्योति॑षा॒ वह्नि॒रात॑नो॒त्सीव्य॒न्तमां॑सि॒ दुधि॑ता॒ सम॑व्ययत्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिस जगदीश्वर ने प्रकाश के लिये सूर्य, भोजनों के लिये औषधि, पीने के लिये जल रसों को, निवास के लिये भूमि और कर्म करने के लिये शरीर आदि बनाये हैं, वह पिता के तुल्य सबको सत्कार करने योग्य है॥४॥

स प्रा॒चीना॒न्पर्व॑तान्दृंह॒दोज॑साधरा॒चीन॑मकृणोद॒पामपः॑। अधा॑रयत्पृथि॒वीं वि॒श्वधा॑यस॒मस्त॑भ्नान्मा॒यया॒ द्याम॑व॒स्रसः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य अपने निकट के लोकों को धारण करता, वैसे परमेश्वर सूर्य्यादि समस्त जगत् को धारण करता है॥५॥

सास्मा॒ अरं॑ बा॒हुभ्यां॒ यं पि॒ताकृ॑णो॒द्विश्व॑स्मा॒दा ज॒नुषो॒ वेद॑स॒स्परि॑। येना॑ पृथि॒व्यां नि क्रिविं॑ श॒यध्यै॒ वज्रे॑ण ह॒त्व्यवृ॑णक्तुवि॒ष्वणिः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य मेघ को छिन्न-भिन्न कर जल को उत्पन्न कर सबका सुख सिद्ध करता है, वैसे अध्यापक वा पिता समस्त सुन्दर शिक्षाओं से सन्तानों को सुभूषित कर निरन्तर सुखी करे॥६॥

अ॒मा॒जूरि॑व पि॒त्रोः सचा॑ स॒ती स॑मा॒नादा सद॑स॒स्त्वामि॑ये॒ भग॑म्। कृ॒धि प्र॑के॒तमुप॑ मा॒स्या भ॑र द॒द्धि भा॒गं त॒न्वो॒३॒॑ येन॑ मा॒महः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो कन्या विद्या को पढ़कर गृहाश्रम को प्राप्त हों, वे सत्कार करने योग्यों का सत्कार कर और तिरस्कार करने योग्यों का तिरस्कार कर पुरुषार्थ से ऐश्वर्य को बढ़ावें॥७॥

भो॒जं त्वामि॑न्द्र व॒यं हु॑वेम द॒दिष्ट्वमि॒न्द्रापां॑सि॒ वाजा॑न्। अ॒वि॒ड्ढी॑न्द्र चि॒त्रया॑ न ऊ॒ती कृ॒धि वृ॑षन्निन्द्र॒ वस्य॑सो नः॥

जैसे मित्र मित्रों की स्तुति करते हैं, वैसे पढ़नेवाले पढनेवालों की प्रशंसा करें, ऐसे एक-दूसरे की रक्षा से ऐश्वर्य की उन्नति करें॥८॥

नू॒नं सा ते॒ प्रति॒ वरं॑ जरि॒त्रे दु॑ही॒यदि॑न्द्र॒ दक्षि॑णा म॒घोनी॑। शिक्षा॑ स्तो॒तृभ्यो॒ माति॑ ध॒ग्भगो॑ नो बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

हे विद्वानो! जो धर्मात्मा विदुषी वा पण्डितानी स्त्रियाँ हों, उनसे सब कन्याओं को सुन्दर शिक्षा दिलाओ जिससे कार्य विनाश न हो॥९॥इस सूक्त में विद्वान्, ईश्वर, और विदुषियों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति समझनी चाहिये॥यह सत्रहवाँ सूक्त और बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्रा॒ता रथो॒ नवो॑ योजि॒ सस्नि॒श्चतु॑र्युगस्त्रिक॒शः स॒प्तर॑श्मिः। दशा॑रित्रो मनु॒ष्यः॑ स्व॒र्षाः स इ॒ष्टिभि॑र्म॒तिभी॒ रंह्यो॑ भूत्॥

जो मनुष्य ऐसे यान से जाने-आने को चाहें, वे निर्विघ्न गतिवाले हों॥१॥

सास्मा॒ अरं॑ प्रथ॒मं स द्वि॒तीय॑मु॒तो तृ॒तीयं॒ मनु॑षः॒ स होता॑। अ॒न्यस्या॒ गर्भ॑म॒न्य ऊं॑ जनन्त॒ सो अ॒न्येभिः॑ सचते॒ जेन्यो॒ वृषा॑॥

विद्वान् जन यदि बिजली रूप अग्नि को रथों में अच्छे प्रकार युक्त करें, तो यह समस्त यानों को सब गतियों से चलाता और विजय का हेतु होता है॥२॥

हरी॒ नु कं॒ रथ॒ इन्द्र॑स्य योजमा॒यै सू॒क्तेन॒ वच॑सा॒ नवे॑न। मो षु त्वामत्र॑ ब॒हवो॒ हि विप्रा॒ नि री॑रम॒न्यज॑मानासो अ॒न्ये॥

जो बिजली रथ को नहीं सिद्ध करते हैं, वे सर्वत्र आप न रम सकते हैं और न दूसरों को रमा सकते हैं॥३॥

आ द्वाभ्यां॒ हरि॑भ्यामिन्द्र या॒ह्या च॒तुर्भि॒रा ष॒ड्भिर्हू॒यमा॑नः। आष्टा॒भिर्द॒शभिः॑ सोम॒पेय॑म॒यं सु॒तः सु॑मख॒ मा मृध॑स्कः॥

जो अनेक अग्नि आदि पदार्थों से उत्पन्न किये हुए यन्त्रों से चलाये हुए यानों में स्थित होकर जाते आते हैं, वे स्तुति के साथ प्रकट होते हैं। जो धार्मिकों के साथ विरोध नहीं करते, वे विजयी होते हैं॥४॥

आ विं॑श॒त्या त्रिं॒शता॑ याह्य॒र्वाङा च॑त्वारिं॒शता॒ हरि॑भिर्युजा॒नः। आ प॑ञ्चा॒शता॑ सु॒रथे॑भिरि॒न्द्रा ष॒ष्ट्या स॑प्त॒त्या सो॑म॒पेय॑म्॥

जैसे बीस-तीस-चालीस-पचास-साठ-सत्तर बलवान् घोड़े एक साथ जोड़कर यान को शीघ्र चलाते हैं, उससे अधिक वेग से अग्नि आदि पदार्थ यान को ले जाते हैं॥५॥

आशी॒त्या न॑व॒त्या या॑ह्य॒र्वाङा श॒तेन॒ हरि॑भिरु॒ह्यमा॑नः। अ॒यं हि ते॑ शु॒नहो॑त्रेषु॒ सोम॒ इन्द्र॑ त्वा॒या परि॑षिक्तो॒ मदा॑य॥

जो ओषधियों के सेवन और सुन्दर पथ्य से नीरोगता से आनन्दित होते हुए सौ प्रकार के यानों और यन्त्रों को बनाते हैं, वे नीचे-ऊपर जा सकते हैं॥६॥

मम॒ ब्रह्मे॑न्द्र या॒ह्यच्छा॒ विश्वा॒ हरी॑ धु॒रि धि॑ष्वा॒ रथ॑स्य। पु॒रु॒त्रा हि वि॒हव्यो॑ ब॒भूथा॒स्मिञ्छू॑र॒ सव॑ने मादयस्व॥

सब सज्जनों को सबके प्रति ऐसा कहना चाहिये कि जो हमारे पदार्थ हैं, वे आपके सुख के लिये हों, जैसे तुम लोग हम लोगों को आनन्दित करो, वैसे हम लोग तुमको आनन्दित करें॥७॥

न म॒ इन्द्रे॑ण स॒ख्यं वि यो॑षद॒स्मभ्य॑मस्य॒ दक्षि॑णा दुहीत। उप॒ ज्येष्ठे॒ वरू॑थे॒ गभ॑स्तौ प्रा॒येप्रा॑ये जिगी॒वांसः॑ स्याम॥

जो सत्य प्रेम से जगदीश्वर वा आप्त विद्वानों को प्राप्त होने और सेवन करने की कामना करते हैं और उसके विरोध की इच्छा नहीं चाहते हैं, वे विद्वान् होकर ज्येष्ठ होते हैं अर्थात् अति प्रशंसित होते हैं॥८॥

नू॒नं सा ते॒ प्रति॒ वरं॑ जरि॒त्रे दु॑ही॒यदि॑न्द्र॒ दक्षि॑णा म॒घोनी॑। शिक्षा॑ स्तो॒तृभ्यो॒ माति॑ ध॒ग्भगो॑ नो बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

जो ईश्वर और आप्त विद्वानों की शिक्षा मनुष्यों को प्राप्त होती है, वह शोकरूपी समुद्र से अलग करती है और बहुत ऐश्वर्य का भी अभिमान नहीं कराती है॥९॥यहाँ यान, पदार्थ, ईश्वर, विद्वान् वा उपदेशकों के बोध का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह अठारहवाँ सूक्त और बाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अपा॑य्य॒स्यान्ध॑सो॒ मदा॑य॒ मनी॑षिणः सुवा॒नस्य॒ प्रय॑सः। यस्मि॒न्निन्द्रः॑ प्र॒दिवि॑ वावृधा॒न ओको॑ द॒धे ब्र॑ह्म॒ण्यन्त॑श्च॒ नरः॑॥

विद्वान् जन जिसमें बढ़े हुए विद्या को धारण करते हैं, उसमें हम लोग भी बैठें, इस विज्ञान को स्वीकार करें॥१॥

अ॒स्य म॑न्दा॒नो मध्वो॒ वज्र॑ह॒स्तोऽहि॒मिन्द्रो॑ अर्णो॒वृतं॒ वि वृ॑श्चत्। प्र यद्वयो॒ न स्वस॑रा॒ण्यच्छा॒ प्रयां॑सि च न॒दीनां॒ चक्र॑मन्त॥

जैसे पक्षी जाते आते हैं, वैसे रात्रि दिन वर्त्तमान हैं। जैसे सूर्य इस जगत् का आनन्द देनेवाला है, वैसे सज्जनों को वर्त्तना चाहिये॥२॥

स माहि॑न॒ इन्द्रो॒ अर्णो॑ अ॒पां प्रैर॑यदहि॒हाच्छा॑ समु॒द्रम्। अज॑नय॒त्सूर्यं॑ वि॒दद्गा अ॒क्तुनाह्नां॑ व॒युना॑नि साधत्॥

जो मनुष्य बिजली के समान वेग और आकर्षणयुक्त शत्रुओं के हनने और विद्यादि शुभगुणों को प्रचार करनेवाले हैं, अन्याय और अन्धकार का विनाश करनेवाले संसार का सुख सिद्ध करते हैं, वे सर्वत्र पूज्य होते हैं॥३॥

सो अ॑प्र॒तीनि॒ मन॑वे पु॒रूणीन्द्रो॑ दाशद्दा॒शुषे॒ हन्ति॑ वृ॒त्रम्। स॒द्यो यो नृभ्यो॑ अत॒साय्यो॒ भूत्प॑स्पृधा॒नेभ्यः॒ सूर्य॑स्य सा॒तौ॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो अपरिमित धन को इकट्ठा करते और जगत् के उपकारी सुपात्रों के लिये देते हैं, वे निरन्तर ईर्ष्या वा ईप्सा करने योग्य नहीं हैं॥४॥

स सु॑न्व॒त इन्द्रः॒ सूर्य॒मा दे॒वो रि॑ण॒ङ्मर्त्या॑य स्त॒वान्। आ यद्र॒यिं गु॒हद॑वद्यमस्मै॒ भर॒दंशं॒ नैत॑शो दश॒स्यन्॥

जो मनुष्य किसी की उन्नति के नाश की नहीं इच्छा करते किन्तु सबके ऐश्वर्य को बढ़वाते हैं, वे सूर्य के समान उपकार करनेवाले होते हैं॥५॥

स र॑न्धयत्स॒दिवः॒ सार॑थये॒ शुष्ण॑म॒शुषं॒ कुय॑वं॒ कुत्सा॑य। दिवो॑दासाय नव॒तिं च॒ नवेन्द्रः॒ पुरो॒ व्यै॑र॒च्छम्ब॑रस्य॥

जो मनुष्य दुष्ट बल को और कुशिक्षा को निवार के बल और उत्तम शिक्षाओं से कुसंस्कारों को निवार के सैकड़ों बोधों को उत्पन्न करते हैं, वे सर्वदा पूज्य होते हैं॥६॥

ए॒वा त॑ इन्द्रो॒चथ॑महेम श्रव॒स्या न त्मना॑ वा॒जय॑न्तः। अ॒श्याम॒ तत्साप्त॑माशुषा॒णा न॒नमो॒ वध॒रदे॑वस्य पी॒योः॥

जो मनुष्य कहने योग्य को कहें, पाने योग्य को पावें, नमने योग्य को नमें, मारने योग्य को मारें और जानने योग्य को जानें, वे ही आप्त होते हैं॥७॥

ए॒वा ते॑ गृत्सम॒दाः शू॑र॒ मन्मा॑व॒स्यवो॒ न व॒युना॑नि तक्षुः। ब्र॒ह्म॒ण्यन्त॑ इन्द्र ते॒ नवी॑य॒ इष॒मूर्जं॑ सुक्षि॒तिं सु॒म्नम॑श्युः॥

जो विद्वानों की उत्तम शिक्षा से विज्ञानवान् हों, वे अनेकविध सुख को प्राप्त हों॥८॥

नू॒नं सा ते॒ प्रति॒ वरं॑ जरि॒त्रे दु॑ही॒यदि॑न्द्र॒ दक्षि॑णा म॒घोनी॑। शिक्षा॑ स्तो॒तृभ्यो॒ माति॑ ध॒ग्भगो॑ नो बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिसकी अक्षय दक्षिणा और शिक्षा है, वह श्रेष्ठ और सर्वत्र सत्कार को पावे॥९॥इस सूक्त में विद्वान् सूर्य दाता और दक्षिणा के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह उन्नीसवाँ सूक्त और चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

व॒यं ते॒ वय॑ इन्द्र वि॒द्धि षु णः॒ प्र भ॑रामहे वाज॒युर्न रथ॑म्। वि॒प॒न्यवो॒ दीध्य॑तो मनी॒षा सु॒म्नमिय॑क्षन्त॒स्त्वाव॑तो॒ नॄन्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सत्कार करने योग्यों को सत्कार करते और सत्य व्यवहार से वर्त्ताव वर्त्तते हैं, वे समस्त सुख के धारण करने को योग्य होते हैं॥१॥

त्वं न॑ इन्द्र॒ त्वाभि॑रू॒ती त्वा॑य॒तो अ॑भिष्टि॒पासि॒ जना॑न्। त्वमि॒नो दा॒शुषो॑ वरू॒तेत्थाधी॑र॒भि यो नक्ष॑ति त्वा॥

पिछले मन्त्र से (सुम्नम्) और (प्रभरामहे) इन दोनों पदों की अनुवृत्ति है। जो विद्वानों को प्राप्त होकर प्राणियों के सुख की कामना करते हैं, वे दाता होते हैं॥२॥

स नो॒ युवेन्द्रो॑ जो॒हूत्रः॒ सखा॑ शि॒वो न॒राम॑स्तु पा॒ता। यः शंस॑न्तं॒ यः श॑शमा॒नमू॒ती पच॑न्तं च स्तु॒वन्तं॑ च प्र॒णेष॑त्॥

जो परमेश्वर और आप्त जन सबकी रक्षा करनेवाले हैं, वे सबके मित्र और मङ्गल करनेवाले हैं॥३॥

तमु॑ स्तुष॒ इन्द्रं॒ तं गृ॑णीषे॒ यस्मि॑न्पु॒रा वा॑वृ॒धुः शा॑श॒दुश्च॑। स वस्वः॒ कामं॑ पीपरदिया॒नो ब्र॑ह्मण्य॒तो नूत॑नस्या॒योः॥

जिसके साथ सब बढ़ते और दुःखों को काटते, उसके साथ व्यवहार सब करें॥४॥

सो अङ्गि॑रसामु॒चथा॑ जुजु॒ष्वान्ब्रह्मा॑ तूतो॒दिन्द्रो॑ गा॒तुमि॒ष्णन्। मु॒ष्णन्नु॒षसः॒ सूर्ये॑ण स्त॒वानश्न॑स्य चिच्छिश्नथत्पू॒र्व्याणि॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सूर्य के समान बढ़ाने और छिन्न-भिन्न करनेवाले होकर राज्य को बढाते हैं, वे उचित और अगले सज्जनों की सेवन की हुई लक्ष्मी को प्राप्त होते हैं॥५॥

स ह॑ श्रु॒त इन्द्रो॒ नाम॑ दे॒व ऊ॒र्ध्वो भु॑व॒न्मनु॑षे द॒स्मत॑मः। अव॑ प्रि॒यम॑र्शसा॒नस्य॑ सा॒ह्वाञ्छिरो॑ भरद्दा॒सस्य॑ स्व॒धावा॑न्॥

जो सूर्य के समान सबका सुख सिद्ध करनेवाले विद्वान् हैं, उनकी प्रशंसा क्यों न हो॥६॥

स वृ॑त्र॒हेन्द्रः॑ कृ॒ष्णयो॑नीः पुरंद॒रो दासी॑रैरय॒द्वि। अज॑नय॒न्मन॑वे॒ क्षाम॒पश्च॑ स॒त्रा शंसं॒ यज॑मानस्य तूतोत्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सूर्य के समान सुख वर्षानेवाले न्याय के प्रकाश करने और सब प्रशंसकों के प्रशंसा करनेवाले हैं, वे यहाँ क्यों न बढ़ें॥७॥

तस्मै॑ तव॒स्य१॒॑मनु॑ दायि स॒त्रेन्द्रा॑य दे॒वेभि॒रर्ण॑सातौ। प्रति॒ यद॑स्य॒ वज्रं॑ बा॒ह्वोर्धुर्ह॒त्वी दस्यू॒न्पुर॒ आय॑सी॒र्नि ता॑रीत्॥

जो परिधियों के सहित नगरियों को बनाये और भयंकर चोर आदि को निवारण कर विद्वानों के साथ राज्य की पालना करते हैं, वे सत्य सुख को प्राप्त होते हैं॥८॥

नू॒नं सा ते॒ प्रति॒ वरं॑ जरि॒त्रे दु॑ही॒यदि॑न्द्र॒ दक्षि॑णा म॒घोनी॑। शिक्षा॑ स्तो॒तृभ्यो॒ माति॑ ध॒ग्भगो॑ नो बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

जो निरन्तर देने और लेनेवाले सर्वदा सत्य की शिक्षा देते और किसी के हृदय को वृथा नहीं सन्तापते हैं, वे बड़े होते हैं॥९॥इस सूक्त में इन्द्र-विद्वान्-ईश्वर और सभापति आदि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह बीसवाँ सूक्त और छब्बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

वि॒श्व॒जिते॑ धन॒जिते॑ स्व॒र्जिते॑ सत्रा॒जिते॑ नृ॒जित॑ उर्वरा॒जिते॑। अ॒श्व॒जिते॑ गो॒जिते॑ अ॒ब्जिते॑ भ॒रेन्द्रा॑य॒ सोमं॑ यज॒ताय॑ हर्य॒तम्॥

राजा प्रजाजनों को यह अच्छे प्रकार उचित है कि जो सर्वदा विजयशील ऐश्वर्य की उन्नति करनेवाले जन न्याय से प्रजा में वर्त्तें, उनका सत्कार सर्वदा सब करें॥१॥

अ॒भि॒भुवे॑ऽभिभ॒ङ्गाय॑ वन्व॒तेऽषा॑ळ्हाय॒ सह॑मानाय वे॒धसे॑। तु॒वि॒ग्रये॒ वह्न॑ये दु॒ष्टरी॑तवे सत्रा॒साहे॒ नम॒ इन्द्रा॑य वोचत॥

जो अन्याय से अलग दुष्टाचारियों को ताड़ना देते हैं, श्रेष्ठाचार की सन्धि से सत्पुरुषों का सत्कार करते हैं, वे विवेकी हैं॥२॥

स॒त्रा॒सा॒हो ज॑नभ॒क्षो ज॑नंस॒हश्च्यव॑नो यु॒ध्मो अनु॒ जोष॑मुक्षि॒तः। वृ॒तं॒च॒यः सहु॑रिर्वि॒क्ष्वा॑रि॒त इन्द्र॑स्य वोचं॒ प्र कृ॒तानि॑ वी॒र्या॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो शम-दम और यमादि शुभकर्मों का आचरण करनेवाले जन प्रजा में विद्या बढ़ाते हैं, वे जनों के सेवने योग्य होते हैं॥३॥

अ॒ना॒नु॒दो वृ॑ष॒भो दोध॑तो व॒धो ग॑म्भी॒र ऋ॒ष्वो अस॑मष्टकाव्यः। र॒ध्र॒चो॒दः श्नथ॑नो वीळि॒तस्पृ॒थुरिन्द्रः॑ सुय॒ज्ञ उ॒षसः॒ स्व॑र्जनत्॥

जो मनुष्य अपने से विविध गुण और कर्मों का आचरण श्रेष्ठों का सत्कार और दुष्टों की हिंसा करते हुए सर्वशास्त्रवेत्ता धर्मात्मा हैं, वे सूर्य के समान प्रकाश करनेवाले हों॥४॥

य॒ज्ञेन॑ गा॒तुम॒प्तुरो॑ विविद्रिरे॒ धियो॑ हिन्वा॒ना उ॒शिजो॑ मनी॒षिणः॑। अ॒भि॒स्वरा॑ नि॒षदा॒ गा अ॑व॒स्यव॒ इन्द्रे॑ हिन्वा॒ना द्रवि॑णान्याशत॥

कोई भी जन सत्संग-योगाभ्यास-विद्या और उत्तम बुद्धि के बिना पूर्ण विद्या और धन पाने को योग्य नहीं होता है॥५॥

इन्द्र॒ श्रेष्ठा॑नि॒ द्रवि॑णानि धेहि॒ चित्तिं॒ दक्ष॑स्य सुभग॒त्वम॒स्मे। पोषं॑ रयी॒णामरि॑ष्टिं त॒नूनां॑ स्वा॒द्मानं॑ वा॒चः सु॑दिन॒त्वमह्ना॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वानों को जैसे परमेश्वर ने समस्त वस्तुओं को उत्पन्न कर सबके लिये हित रूप सिद्ध कराई हैं, वैसे सबके कल्याण के लिये नित्य प्रयत्न करना चाहिये॥६॥इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह इक्कीसवाँ सूक्त और सत्ताईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

त्रिक॑द्रुकेषु महि॒षो यवा॑शिरं तुवि॒शुष्म॑स्तृ॒पत्सोम॑मपिब॒द्विष्णु॑नासु॒तं यथाव॑शत्। स ईं॑ ममाद॒ महि॒ कर्म॒ कर्त॑वे म॒हामु॒रुं सैनं॑ सश्चद्दे॒वो दे॒वं स॒त्यमिन्द्रं॑ स॒त्य इन्दुः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य जगदीश्वर ने निर्मित किये लोकों में विद्या और उत्तम यत्न से प्रिय मनोहर भोग कर सकता है, वह अविनाशी परमात्मा को जान वा जना सकता है॥१॥

अध॒ त्विषी॑माँ अ॒भ्योज॑सा॒ क्रिविं॑ यु॒धाभ॑व॒दा रोद॑सी अपृणदस्य म॒ज्मना॒ प्र वा॑वृधे। अध॑त्ता॒न्यं ज॒ठरे॒ प्रेम॑रिच्यत॒ सैनं॑ सश्चद्दे॒वो दे॒वं स॒त्यमिन्द्रं॑ स॒त्य इन्दुः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो जिसने यह सब लोकों का प्रकाश करने और कूप के समान सींचनेवाला बड़ा सूर्य लोक रचा और अपने में धारण किया, जो सबसे अलग व्याप्त भी है, वह नित्य परमेश्वर देव है, उसका नित्य ध्यान करो॥२॥

सा॒कं जा॒तः क्रतु॑ना सा॒कमोज॑सा ववक्षिथ सा॒कं वृ॒द्धो वी॒र्यैः॑ सास॒हिर्मृधो॒ विच॑र्षणिः। दाता॒ राधः॑ स्तुव॒ते काम्यं॒ वसु॒ सैनं॑ सश्चद्दे॒वो दे॒वं स॒त्यमिन्द्रं॑ स॒त्य इन्दुः॑॥

जिसके ज्ञानादि गुणों और उत्क्षेपणादि कर्मों के साथ नित्य सम्बन्ध है, जो विद्या से ज्येष्ठ और अविद्या से कनिष्ठ है, सुख की कामना करता हुआ अनादि अनुत्पन्न अमृत अल्पज्ञ जीवात्मा है, उसको जो शुभाशुभ कर्म फलों के साथ युक्त करता, वह परमेश्वर अखिल जगत् के बीच व्याप्त होता हुआ सबकी रक्षा करता, जीव के साथ ईश का ईश्वर के साथ जीव का व्याप्य व्यापक सेव्य सेवकादि लक्षण सम्बन्ध है, यह जानना चाहिये॥३॥

तव॒ त्यन्नर्यं॑ नृ॒तोऽप॑ इन्द्र प्रथ॒मं पू॒र्व्यं दि॒वि प्र॒वाच्यं॑ कृ॒तम्। यद्दे॒वस्य॒ शव॑सा॒ प्रारि॑णा॒ असुं॑ रि॒णन्न॒पः। भुव॒द्विश्व॑म॒भ्यादे॑व॒मोज॑सा वि॒दादूर्जं॑ श॒तक्र॑तुर्वि॒दादिष॑म्॥

हे जीवो! जिस परमेश्वर के निबन्ध से तुम शरीर इन्द्रियों और प्राणों को प्राप्त हुए, उसको सर्व सामर्थ्य से दिन-रात ध्यावो॥४॥इस सूक्त में सूर्य्य-विद्युत्-ईश्वर और जीवों के गुण कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त से अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये॥। यह बाईसवाँ सूक्त और अट्ठाईसवाँ वर्ग और दूसरा अनुवाक समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

ग॒णानां॑ त्वा ग॒णप॑तिं हवामहे क॒विं क॑वी॒नामु॑प॒मश्र॑वस्तमम्। ज्ये॒ष्ठ॒राजं॒ ब्रह्म॑णां ब्रह्मणस्पत॒ आ नः॑ शृ॒ण्वन्नू॒तिभिः॑ सीद॒ साद॑नम्॥

हे मनुष्यो! जैसे हम लोग सबके अधिपति सर्वज्ञ सर्वराज अन्तर्यामी परमेश्वर की उपासना करते हैं, वैसे तुम भी उपासना करो॥१॥

दे॒वाश्चि॑त्ते असुर्य॒ प्रचे॑तसो॒ बृह॑स्पते य॒ज्ञियं॑ भा॒गमा॑नशुः। उ॒स्राइ॑व॒ सूर्यो॒ ज्योति॑षा म॒हो विश्वे॑षा॒मिज्ज॑नि॒ता ब्रह्म॑णामसि॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो तुम जो प्राण का प्राण सूर्य्य के समान आप ही प्रकाशमान और महात्माओं में महात्मा परमेश्वर है, उसी को सेओ॥२॥

आ वि॒बाध्या॑ परि॒राप॒स्तमां॑सि च॒ ज्योति॑ष्मन्तं॒ रथ॑मृ॒तस्य॑ तिष्ठसि। बृह॑स्पते भी॒मम॑मित्र॒दम्भ॑नं रक्षो॒हणं॑ गोत्र॒भिदं॑ स्व॒र्विद॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सूर्य्य के समान विद्याप्रकाश से अविद्यान्धकार को निकाल कर कारण को लेकर कार्य्य जगत् को यथावत् जानते हैं, वे विद्वान् होते हैं॥३॥

सु॒नी॒तिभि॑र्नयसि॒ त्राय॑से॒ जनं॒ यस्तुभ्यं॒ दाशा॒न्न तमंहो॑ अश्नवत्। ब्र॒ह्म॒द्विष॒स्तप॑नो मन्यु॒मीर॑सि॒ बृह॑स्पते॒ महि॒ तत्ते॑ महित्व॒नम्॥

जो मनुष्य सत्यभाव से जगदीश्वर वा आप्त विद्वान् के सम्बन्ध में अपने आत्मा को चलाते हैं, उनको जगदीश्वर वा धार्मिक विद्वान् पापाचरण से निवृत्त कर शुभ गुण-कर्म-स्वभावों से युक्त कर पवित्र उत्पन्न करता है और जो वेद वा ईश्वर के विरोधी पापाचारी हैं, उनको अधोगति को पहुँचाता है, यही इन दोनों की उपासना और संग से लाभ होता है॥४॥

न तमंहो॒ न दु॑रि॒तं कुत॑श्च॒न नारा॑तयस्तितिरु॒र्न द्व॑या॒विनः॑। विश्वा॒ इद॑स्माद्ध्व॒रसो॒ वि बा॑धसे॒ यं सु॑गो॒पा रक्ष॑सि ब्रह्मणस्पते॥

जो परमेश्वर की आज्ञा वा आप्त विद्वानों के संग का वा अपनी आत्मा की पवित्रता का आचरण करते हैं, वे सब पाप आचरण से अलग हो और धार्मिक होकर निरन्तर सुख को व्याप्त होते हैं॥५॥

त्वं नो॑ गो॒पाः प॑थि॒कृद्वि॑चक्ष॒णस्तव॑ व्र॒ताय॑ म॒तिभि॑र्जरामहे। बृह॑स्पते॒ यो नो॑ अ॒भि ह्वरो॑ द॒धे स्वा तं म॑र्मर्तु दु॒च्छुना॒ हर॑स्वती॥

जिनका मार्ग प्रकाश करने और उपदेश करनेवाला परमात्मा विद्वान् होता है, जो सत्पुरुषों के सङ्ग के प्रीति करनेवाले वर्त्तमान हैं, उनको क्रोध आदि दुर्गुण नहीं प्राप्त होते हैं॥६॥

उ॒त वा॒ यो नो॑ म॒र्चया॒दना॑गसोऽराती॒वा मर्तः॑ सानु॒को वृकः॑। बृह॑स्पते॒ अप॒ तं व॑र्तया प॒थः सु॒गं नो॑ अ॒स्यै दे॒ववी॑तये कृधि॥

हे परमेश्वर! जो हम लोगों को सुमार्ग से सुख को प्राप्त कराते, उनको पहुँचाइये और जो दुष्पथ को पहुँचाते हैं, उनको अलग कीजिये तथा कृपा से शुद्ध सरल धर्मयुक्त मार्ग को प्राप्त कीजिये॥७॥

त्रा॒तारं॑ त्वा त॒नूनां॑ हवाम॒हेऽव॑स्पर्तरधिव॒क्तार॑मस्म॒युम्। बृह॑स्पते देव॒निदो॒ नि ब॑र्हय॒ मा दु॒रेवा॒ उत्त॑रं सु॒म्नमुन्न॑शन्॥

जो अपना उपदेश करने और रक्षा करनेवाला परमात्मा वा आप्त विद्वान् मानते हैं, वे सब ओर से बढ़ते हैं। जो विद्वान् ईश्वर और वेद की निन्दा भविष्यत् का आनन्द नष्ट करनेवाले हों, उनको सब ओर से निवृत्त करावें॥८॥

त्वया॑ व॒यं सु॒वृधा॑ ब्रह्मणस्पते स्पा॒र्हा वसु॑ मनु॒ष्या द॑दीमहि। या नो॑ दू॒रे त॒ळितो॒ या अरा॑तयो॒ऽभि सन्ति॑ ज॒म्भया॒ ता अ॑न॒प्नसः॑॥

यदि विद्वानों के उपदेश को न ग्रहण करें तो मनुष्य दानशील न हों, जो अकर्मठ अर्थात् कर्म नहीं करते कृपण पुरुष और स्त्रीजन हैं, वे बिजली के समान पुरुषार्थयुक्त करने चाहिये॥९॥

त्वया॑ व॒यमु॑त्त॒मं धी॑महे॒ वयो॒ बृह॑स्पते॒ पप्रि॑णा॒ सस्नि॑ना यु॒जा। मा नो॑ दुः॒शंसो॑ अभिदि॒प्सुरी॑शत॒ प्र सु॒शंसा॑ म॒तिभि॑स्तारिषीमहि॥

जो पूर्ण विद्यावाले योगी शुद्धात्मा जनों का संग करते हैं, वे दीर्घजीवी होते हैं, जो विद्वानों के सहचारी होते हैं, उनके लिये दुःख देने को कोई भी समर्थ नहीं हो सकते हैं॥१०॥

अ॒ना॒नु॒दो वृ॑ष॒भो जग्मि॑राह॒वं निष्ट॑प्ता॒ शत्रुं॒ पृत॑नासु सास॒हिः। असि॑ स॒त्य ऋ॑ण॒या ब्र॑ह्मणस्पत उ॒ग्रस्य॑ चिद्दमि॒ता वी॑ळुह॒र्षिणः॑॥

जो देने योग्य पदार्थ को शीघ्र देते, जाने योग्य स्थान को जाते, पाने योग्य पदार्थ को पाते और दण्ड देने योग्य को दण्ड देते हैं, वे सत्य ग्रहण कर सकते हैं॥११॥

अदे॑वेन॒ मन॑सा॒ यो रि॑ष॒ण्यति॑ शा॒सामु॒ग्रो मन्य॑मानो॒ जिघां॑सति। बृह॑स्पते॒ मा प्रण॒क्तस्य॑ नो व॒धो नि क॑र्म म॒न्युं दु॒रेव॑स्य॒ शर्ध॑तः॥

जो राज्यशासन करते हैं, वे निर्बुद्धि हिंसकों को वश करें, यदि वश में न आवें, तो इनको बलात्कारपूर्वक मारें, जिससे न्याय का नाश न हो॥१२॥

भरे॑षु॒ हव्यो॒ नम॑सोप॒सद्यो॒ गन्ता॒ वाजे॑षु॒ सनि॑ता॒ धनं॑धनम्। विश्वा॒ इद॒र्यो अ॑भिदि॒प्स्वो॒३॒॑मृधो॒ बृह॒स्पति॒र्वि व॑वर्हा॒ रथाँ॑इव॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो गुण-कर्म और स्वभावों से विजय को प्राप्त होते हुए विमानादि यानों के तुल्य शीघ्र ऐश्वर्य को प्राप्त होकर समस्त सत्कर्मों में विभाग कर धनादि पदार्थों को देते हैं, वे न्यायाधीश होने के योग्य हैं॥१३॥

तेजि॑ष्ठया तप॒नी र॒क्षस॑स्तप॒ ये त्वा॑ नि॒दे द॑धि॒रे दृ॒ष्टवी॑र्यम्। आ॒विस्तत्कृ॑ष्व॒ यदस॑त्त उ॒क्थ्यं१॒॑ बृह॑स्पते॒ वि प॑रि॒रापो॑ अर्दय॥

मनुष्यों को चाहिये कि निन्दकों की सर्वथा निवारि और स्तुति करनेवालों को बढ़ाय सत्यविद्याओं का प्रकाश करें॥१४॥

बृह॑स्पते॒ अति॒ यद॒र्यो अर्हा॑द्द्यु॒मद्वि॒भाति॒ क्रतु॑म॒ज्जने॑षु। यद्दी॒दय॒च्छव॑स ऋतप्रजात॒ तद॒स्मासु॒ द्रवि॑णं धेहि चि॒त्रम्॥

मनुष्यों को चाहिये कि जो-जो ईश्वर ने वेदद्वारा सत्य का प्रकाश किया, वह-वह सब प्रकाश करें और जो-जो स्वार्थ चाहें, वह-वह सबके लिये चाहें॥१५॥

मा नः॑ स्ते॒नेभ्यो॒ ये अ॒भि द्रु॒हस्प॒दे नि॑रा॒मिणो॑ रि॒पवोऽन्ने॑षु जागृ॒धुः। आ दे॒वाना॒मोह॑ते॒ वि व्रयो॑ हृ॒दि बृह॑स्पते॒ न प॒रः साम्नो॑ विदुः॥

जो चोर द्रोह से पराये पदार्थों की चाहना करते हैं, वे कुछ भी धर्म नहीं जानते हैं॥१६॥

विश्वे॑भ्यो॒ हि त्वा॒ भुव॑नेभ्य॒स्परि॒ त्वष्टाज॑न॒त्साम्नः॑साम्नः क॒विः। स ऋ॑ण॒चिदृ॑ण॒या ब्रह्म॑ण॒स्पति॑र्द्रु॒हो ह॒न्ता म॒ह ऋ॒तस्य॑ ध॒र्तरि॑॥

हे जीव जो सर्वज्ञ सृष्टिकर्त्ता सकल भुवनों का एक स्वामी और सबका धारणकरनेवाला जगदीश्वर है, उसकी आज्ञा में स्थित द्रोहादिकों को दूर से दूर करे॥१७॥

तव॑ श्रि॒ये व्य॑जिहीत॒ पर्व॑तो॒ गवां॑ गो॒त्रमु॒दसृ॑जो॒ यद॑ङ्गिरः। इन्द्रे॑ण यु॒जा तम॑सा॒ परी॑वृतं॒ बृह॑स्पते॒ निर॒पामौ॑ब्जो अर्ण॒वम्॥

जिस ईश्वर ने सूर्यादिक जगत् का निर्माण कर परस्पर सम्बन्ध किया, उसको प्राणप्रिय जानो॥१८॥

ब्रह्म॑णस्पते॒ त्वम॒स्य य॒न्ता सू॒क्तस्य॑ बोधि॒ तन॑यं च जिन्व। विश्वं॒ तद्भ॒द्रं यदव॑न्ति दे॒वा बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

ईश्वर ने जो रक्षितव्य कहा है, उसकी अच्छे प्रकार रक्षा कर मनुष्यों को बहुत सुख पाना चाहिये। जैसे ईश्वर समस्त जगत् की नियमपूर्वक रक्षा करता है, वैसे विद्वानों को भी सबकी रक्षा करनी चाहिये॥१९॥इस सूक्त में ईश्वरादि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये॥यह तेईसवाँ सूक्त और बत्तीसवाँ वर्ग तथा छठा अध्याय समाप्त हुआ॥

सेमाम॑विड्ढि॒ प्रभृ॑तिं॒ य ईशि॑षे॒ऽया वि॑धेम॒ नव॑या म॒हा गि॒रा। यथा॑ नो मी॒ढ्वान्त्स्तव॑ते॒ सखा॒ तव॒ बृह॑स्पते॒ सीष॑धः॒ सोत नो॑ म॒तिम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो लोग विद्या की उन्नति करना चाहें, वे प्रथम वेदादि शास्त्रों को स्वयं पढ़के दूसरों को प्रयत्न के साथ पढावें और पढ़ पढ़ा के पदार्थविज्ञान में आरूढ़ बुद्धि को प्राप्त हों॥१॥

यो नन्त्वा॒न्यन॑म॒न्न्योज॑सो॒ताद॑र्दर्म॒न्युना॒ शम्ब॑राणि॒ वि। प्राच्या॑वय॒दच्यु॑ता॒ ब्रह्म॑ण॒स्पति॒रा चावि॑श॒द्वसु॑मन्तं॒ वि पर्व॑तम्॥

जो राजा और राजजन विद्वान् सत्कर्मी लोगों का सत्कार करते और दुष्ट कर्मवालों को दण्ड देते हैं, वे सूर्य के तुल्य पृथिवी पर सुशोभित होते हैं॥२॥

तद्दे॒वानां॑ दे॒वत॑माय॒ कर्त्व॒मश्र॑थ्नन्दृ॒ळ्हाव्र॑दन्त वीळि॒ता। उद्गा आ॑ज॒दभि॑न॒द्ब्रह्म॑णा ब॒लमगू॑ह॒त्तमो॒ व्य॑चक्षय॒त्स्वः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सूर्य के तुल्य विद्या प्रकाश कर्मवाले अविद्यारूप अन्धकार के निवारक प्रमादी दुष्टों को शिथिल करते हुए श्रेष्ठ विद्वत्ता को ग्रहण करते हैं, वे जगत् के उपकारक होते हैं॥३॥

अश्मा॑स्यमव॒तं ब्रह्म॑ण॒स्पति॒र्मधु॑धारम॒भि यमोज॒सातृ॑णत्। तमे॒व विश्वे॑ पपिरे स्व॒र्दृशो॑ ब॒हु सा॒कं सि॑सिचु॒रुत्स॑मु॒द्रिण॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य मेघ और कूप के तुल्य सब को शुभ शिक्षा से तृप्त करते और सबको एकमन करते हैं, वे मिलकर सबकी उन्नति कर सकते हैं॥४॥

सना॒ ता का चि॒द्भुव॑ना॒ भवी॑त्वा मा॒द्भिः श॒रद्भि॒र्दुरो॑ वरन्त वः। अय॑तन्ता चरतो अ॒न्यद॑न्य॒दिद्या च॒कार॑ व॒युना॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य महीनों और ऋतुओं को विभक्त कर मूर्त्त द्रव्यों का यथावत्स्वरूप दिखाता है, वैसे जो विद्वान् पृथिवी से लेके ईश्वरपर्यन्त पदार्थों को यथावत् शिक्षा से दिखावें, वे लोक में पूजनीय होवें और जो अविद्यायुक्त आलसी लोग कपट आदि से दूषित दुष्ट उपदेश करते वा निकम्मे बैठे रहते हैं, वे किसी को कभी सेवने योग्य नहीं हैं॥५॥

अ॒भि॒नक्ष॑न्तो अ॒भि ये तमा॑न॒शुर्नि॒धिं प॑णी॒नां प॑र॒मं गुहा॑ हि॒तम्। ते वि॒द्वांसः॑ प्रति॒चक्ष्यानृ॑ता॒ पुन॒र्यत॑ उ॒ आय॒न्तदुदी॑युरा॒विश॑म्॥

जो यथार्थ विज्ञान को पाकर अधर्माचरण से पृथक् रहकर अन्यों को पापाचरण से पृथक् कर फिर-फिर धर्म विद्या शरीर आत्मा की पुष्टि में प्रवेश कराते, वे अत्यन्त आनन्द को पाकर औरों को आनन्दित करने को समर्थ होते हैं॥६॥

ऋ॒तावा॑नः प्रति॒चक्ष्यानृ॑ता॒ पुन॒रात॒ आ त॑स्थुः क॒वयो॑ म॒हस्प॒थः। ते बा॒हुभ्यां॑ धमि॒तम॒ग्निमश्म॑नि॒ नकिः॒ षो अ॒स्त्यर॑णो ज॒हुर्हि तम्॥

जो अविद्या और अधर्माचरण का खण्डन श्रेष्ठ मार्ग का सेवन करते हैं, वे हाथों से धौंपने से काष्ठादिस्थ अग्नि को उत्पन्न कर कार्यों को सिद्ध करते और अभीष्ट को प्राप्त होते हैं॥७॥

ऋ॒तज्ये॑न क्षि॒प्रेण॒ ब्रह्म॑ण॒स्पति॒र्यत्र॒ वष्टि॒ प्र तद॑श्नोति॒ धन्व॑ना। तस्य॑ सा॒ध्वीरिष॑वो॒ याभि॒रस्य॑ति नृ॒चक्ष॑सो दृ॒शये॒ कर्ण॑योनयः॥

जैसे वीर पुरुष धनुष आदि शस्त्र और आग्नेयादि अस्त्र से शत्रुओं को पराजित करते हैं, वैसे धर्मात्मा दोषों को जीत लेता है॥८॥

स सं॑न॒यः स वि॑न॒यः पु॒रोहि॑तः॒ स सुष्टु॑तः॒ स यु॒धि ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑। चा॒क्ष्मो यद्वाजं॒ भर॑ते म॒ती धनादित्सूर्य॑स्तपति तप्य॒तुर्वृथा॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विनय आदि से युक्त प्रशंसित गुणकर्मस्वभाववाले दुष्टता के निरोधक और सत्यता के प्रवर्त्तक हैं, वे धर्मयुक्त व्यवहार से राज्य की रक्षा करने को समर्थ होते हैं॥९॥

वि॒भु प्र॒भु प्र॑थ॒मं मे॒हना॑वतो॒ बृह॒स्पतेः॑ सुवि॒दत्रा॑णि॒ राध्या॑। इ॒मा सा॒तानि॑ वे॒न्यस्य॑ वा॒जिनो॒ येन॒ जना॑ उ॒भये॑ भुञ्ज॒ते विशः॑॥

राजजन और प्रजा जनों को योग्य है कि सर्वव्यापक शक्तिमान् विस्तीर्ण सुख देनेवाले ब्रह्म की उपासना कर सब मनुष्यादि प्राणियों के सुख साधक वस्तुओं को संग्रह करके राजप्रजा के सुखों को सिद्ध करें॥१०॥

योऽव॑रे वृ॒जने॑ वि॒श्वथा॑ वि॒भुर्म॒हामु॑ र॒ण्वः शव॑सा व॒वक्षि॑थ। स दे॒वो दे॒वान्प्रति॑ पप्रथे पृ॒थु विश्वेदु॒ ता प॑रि॒भूर्ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑॥

हे मनुष्यो जो परमात्मा अगले पिछले कार्य्य कारणरूप जगत् में परिपूर्ण होके सबका विस्तार करता, सबके लिये सब सुखों के साधनों को देता, वही सबको उपासना करने और मानने योग्य है॥११॥

विश्वं॑ स॒त्यं म॑घवाना यु॒वोरिदाप॑श्च॒न प्र मि॑नन्ति व्र॒तं वा॑म्। अच्छे॑न्द्राब्रह्मणस्पती ह॒विर्नोऽन्नं॒ युजे॑व वा॒जिना॑ जिगातम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सुशिक्षित युक्त किये घोड़े रथ को पहुँचा कर शत्रुओं को पराजित कराते वैसे राज्यैश्वर्य्य को प्राप्त हुए राज प्रजाजन सत्याचरण के विरोधियों को निवृत्त कर प्राण के अभयरूप दान को तुम लोग देओ॥१२॥

उ॒ताशि॑ष्ठा॒ अनु॑ शृण्वन्ति॒ वह्न॑यः स॒भेयो॒ विप्रो॑ भरते म॒ती धना॑। वी॒ळु॒द्वेषा॒ अनु॒ वश॑ ऋ॒णमा॑द॒दिः स ह॑ वा॒जी स॑मि॒थे ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑॥

वह्नि यह घोड़े का गौण नाम है। जैसे अग्नि पहुँचानेवाले होते हैं, वैसे ही घोड़े भी होते हैं। राजपुरुष जिन दुष्टाचारियों को सुनें, उनको वश में करके सब का प्रिय सिद्ध किया करें॥१३॥

ब्रह्म॑ण॒स्पते॑रभवद्यथाव॒शं स॒त्यो म॒न्युर्महि॒ कर्मा॑ करिष्य॒तः। यो गा उ॒दाज॒त्स दि॒वे वि चा॑भजन्म॒हीव॑ री॒तिः शव॑सासर॒त्पृथ॑क्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो पुरुषार्थी अध्यापक लोग अच्छी शिक्षा को पाकर सत्य में प्रीति और असत्य पर क्रोध को धारण करते हैं, वे बड़ी सुशीलता को प्राप्त होके यथेष्ट कार्य को प्राप्त होते हैं॥१४॥

ब्रह्म॑णस्पते सु॒यम॑स्य वि॒श्वहा॑ रा॒यः स्या॑म र॒थ्यो॒३॒॑ वय॑स्वतः। वी॒रेषु॑ वी॒राँ उप॑ पृङ्धि न॒स्त्वं यदीशा॑नो॒ ब्रह्म॑णा॒ वेषि॑ मे॒ हव॑म्॥

जो लोग सुन्दर संयमवाले हों, वे बहुत काल जीवें, जो ब्रह्मचर्य्य का पालन करें, वे आत्मा और शरीर से अच्छे वीर होते हैं॥१५॥

ब्रह्म॑णस्पते॒ त्वम॒स्य य॒न्ता सू॒क्तस्य॑ बोधि॒ तन॑यं च जिन्व। विश्वं॒ तद्भ॒द्रं यदव॑न्ति दे॒वा बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

सब मनुष्यों को उचित है कि सुन्दर नियम से वेद के अर्थों को जान पूर्ण युवावस्था में स्वयंवर विवाह कर धर्म से सन्तानों की उत्पत्ति और रक्षाकर यथावत् ब्रह्मचर्य के साथ सुन्दर शिक्षा दे और विद्वान् करके सुख बढ़ावें॥१६॥इस सूक्त में विद्वान् और ईश्वर के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानो॥यह चौबीसवाँ सूक्त और तीसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

इन्धा॑नो अ॒ग्निं व॑नवद्वनुष्य॒तः कृ॒तब्र॑ह्मा शूशुवद्रा॒तह॑व्य॒ इत्। जा॒तेन॑ जा॒तमति॒ स प्र स॑र्सृते॒ यंयं॒ युजं॑ कृणु॒ते ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे किरण वायु के साथ चलती है, वैसे ही विद्युत् अग्नि सब पदार्थों के साथ चलता है, उसको मनुष्य जहाँ-जहाँ प्रयुक्त करे, वहाँ-वहाँ बड़े काम को सिद्ध करता है॥१॥

वी॒रेभि॑र्वी॒रान्व॑नवद्वनुष्य॒तो गोभी॑ र॒यिं प॑प्रथ॒द्बोध॑ति॒ त्मना॑। तो॒कं च॒ तस्य॒ तन॑यं च वर्धते॒ यंयं॒ युजं॑ कृणु॒ते ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे धन की याचना करता हुआ पुरुष मन को युक्त करता वैसे पुत्रादि के पालन में चित्त देता है, जिस पदार्थ के साथ जिसके योग की योग्यता होती, उसको उसके साथ प्रतिदिन युक्त करता है, वह बहुत उत्तम मनुष्यों को प्राप्त होके विद्या की वृद्धि कर सकता है॥२॥

सिन्धु॒र्न क्षोदः॒ शिमी॑वाँ ऋघाय॒तो वृषे॑व॒ वध्रीँ॑र॒भि व॒ष्ट्योज॑सा। अ॒ग्नेरि॑व॒ प्रसि॑ति॒र्नाह॒ वर्त॑वे॒ यंयं॒ युजं॑ कृणु॒ते ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य पुरुषार्थी समुद्र के तुल्य गम्भीर धनाढ्य वृषभ के तुल्य बलवान् अग्नि के तुल्य शत्रुओं के जलानेवाले सत्य कामनायुक्त होते हैं, वे समस्त शिल्प विद्या को सिद्ध कर सकते हैं॥३॥

तस्मा॑ अर्षन्ति दि॒व्या अ॑स॒श्चतः॒ स सत्व॑भिः प्रथ॒मो गोषु॑ गच्छति। अनि॑भृष्टतविषिर्ह॒न्त्योज॑सा॒ यंयं॒ युजं॑ कृणु॒ते ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑॥

वे ही लोग विजयी होते हैं, जो सब बलों और साधन उपसाधनों से तथा विद्या से युक्त होते हैं॥४॥

तस्मा॒ इद्विश्वे॑ धुनयन्त॒ सिन्ध॒वोऽच्छि॑द्रा॒ शर्म॑ दधिरे पु॒रूणि॑। दे॒वानां॑ सु॒म्ने सु॒भगः॒ स ए॑धते॒ यंयं॒ युजं॑ कृणु॒ते ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑॥

जो मनुष्य विद्वानों के सङ्ग में प्रीति रखने पदार्थों का संयोग विभाग करनेवाले रसायन विद्या में उद्योगी होवें, वे सब पदार्थों से बहुत कार्य सिद्ध कर सकते हैं॥५॥इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त में कहे अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह पच्चीसवाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ॥

ऋ॒जुरिच्छंसो॑ वनवद्वनुष्य॒तो दे॑व॒यन्निददे॑वयन्तम॒भ्य॑सत्। सु॒प्रा॒वीरिद्व॑नवत्पृ॒त्सु दु॒ष्टरं॒ यज्वेदय॑ज्यो॒र्वि भ॑जाति॒ भोज॑नम्॥

जो मनुष्य पण्डिताई को चाहते मूर्खता को छोड़ते और शत्रुओं को जीतते हुए भोग्य पदार्थों को विशेष कर सेवन करते हैं, वे दुःखों को छोड़ देते हैं॥१॥

यज॑स्व वीर॒ प्र वि॑हि मनाय॒तो भ॒द्रं मनः॑ कृणुष्व वृत्र॒तूर्ये॑। ह॒विष्कृ॑णुष्व सु॒भगो॒ यथास॑सि॒ ब्रह्म॑ण॒स्पते॒रव॒ आ वृ॑णीमहे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य अपने मनों को अतिकल्याणकारी मार्ग में प्रवृत्त कर सब कार्यों को सिद्ध करते हैं, वे कृतकृत्य होते हैं॥२॥

स इज्जने॑न॒ स वि॒शा स जन्म॑ना॒ स पु॒त्रैर्वाजं॑ भरते॒ धना॒ नृभिः॑। दे॒वानां॒ यः पि॒तर॑मा॒विवा॑सति श्र॒द्धाम॑ना ह॒विषा॒ ब्रह्म॑ण॒स्पति॑म्॥

जो मनुष्य प्रीतिपूर्वक विद्वानों के अध्यापक और उपदेशक विद्वान् का सेवन करते हैं, वे सर्वत्र सब पदार्थों से निष्पन्न हुए आनन्द को भोगते हैं॥३॥

यो अ॑स्मै ह॒व्यैर्घृ॒तव॑द्भि॒रवि॑ध॒त्प्र तं प्रा॒चा न॑यति॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑। उ॒रु॒ष्यती॒मंह॑सो॒ रक्ष॑ती रि॒षों॒३॒॑होश्चि॑दस्मा उरु॒चक्रि॒रद्भु॑तः॥

जैसे घृत आदि पुष्ट और सुगन्धित द्रव्यों के होम से वायु और वृष्टिजल शुद्ध होके रोगों से प्राणियों को पृथक् कर सबको सुखी करते हैं वैसे उपदेशक लोग अधर्म के निषेधपूर्वक धर्म के ग्रहण से आत्माओं को शुद्ध कर अविद्यादि रोगों को दूर करते हैं, वे कृतकृत्य होते हैं॥४॥इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्वसूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह छब्बीसवाँ सूक्त और पाँचवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इ॒मा गिर॑ आदि॒त्येभ्यो॑ घृ॒तस्नूः॑ स॒नाद्राज॑भ्यो जु॒ह्वा॑ जुहोमि। शृ॒णोतु॑ मि॒त्रो अ॑र्य॒मा भगो॑ नस्तुविजा॒तो वरु॑णो॒ दक्षो॒ अंशः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सूर्य्य के तुल्य तेजस्वी राजा लोग और उनके सभासद् प्रजाजनों की सुख-दुःख युक्त निवेदन की वाणियों को सुन के न्याय करते वे राज्य बढ़ाने को समर्थ होते हैं॥१॥

इ॒मं स्तोमं॒ सक्र॑तवो मे अ॒द्य मि॒त्रो अ॑र्य॒मा वरु॑णो जुषन्त। आ॒दि॒त्यासः॒ शुच॑यो॒ धार॑पूता॒ अवृ॑जिना अनव॒द्या अरि॑ष्टाः॥

सब विद्याप्रिय मनुष्यों को चाहिये कि पूर्ण विद्यावालों को अपने पढ़े की परीक्षा देके अपनी विद्या को निश्चित निर्भ्रम करें और परीक्षक लोग भी पक्षपात को छोड़ के परीक्षा करें क्योंकि ऐसे किये बिना यथावत् विद्या नहीं हो सकती है॥२॥

त आ॑दि॒त्यास॑ उ॒रवो॑ गभी॒रा अद॑ब्धासो॒ दिप्स॑न्तो भूर्य॒क्षाः। अ॒न्तः प॑श्यन्ति वृजि॒नोत सा॒धु सर्वं॒ राज॑भ्यः पर॒मा चि॒दन्ति॑॥

परीक्षा करनेवाले जन श्रेष्ठ और दुष्ट पुरुषों की उत्तम प्रकार परीक्षा करते उत्तम स्वभाववालों के सत्कार और कुत्सित चरित्रवालों के अनादर को करके विद्या की उन्नति निरन्तर करें॥३॥

धा॒रय॑न्त आदि॒त्यासो॒ जग॒त्स्था दे॒वा विश्व॑स्य॒ भुव॑नस्य गो॒पाः। दी॒र्घाधि॑यो॒ रक्ष॑माणा असु॒र्य॑मृ॒तावा॑न॒श्चय॑माना ऋ॒णानि॑॥

इस मन्त्र में (अन्तः,पश्यन्ति) इन दो पदों की अनुवृत्ति पूर्व मन्त्र से आती है। यदि विद्वान् पढ़नेवाले विद्यार्थियों को विद्या न देवें तो वे ऋणी हो जावें, यही ऋण चुकाना है जो स्वयं पढ़ कर दूसरों को पढ़ाना चाहिये॥४॥

वि॒द्यामा॑दित्या॒ अव॑सो वो अ॒स्य यद॑र्यमन्भ॒य आ चि॑न्मयो॒भु। यु॒ष्माकं॑ मित्रावरुणा॒ प्रणी॑तौ॒ परि॒ श्वभ्रे॑व दुरि॒तानि॑ वृज्याम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे विद्वान् लोग सब प्राणियों के भय का विनाश कर सुख पहुँचा के पापों को निवृत्त करते हैं, वैसा निरन्तर करें॥५॥

सु॒गो हि वो॑ अर्यमन्मित्र॒ पन्था॑ अनृक्ष॒रो व॑रुण सा॒धुरस्ति॑। तेना॑दित्या॒ अधि॑ वोचता नो॒ यच्छ॑ता नो दुष्परि॒हन्तु॒ शर्म॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि धर्मात्मा विद्वानों के स्वभाव को ग्रहण कर वेदोक्त सत्य मार्ग में चलें, जिससे सत्यशास्त्र के पढ़ने-पढ़ाने की वृद्धि होवे, वही कर्म सदा सेवने योग्य है॥६॥

पिप॑र्तु नो॒ अदि॑ती॒ राज॑पु॒त्राति॒ द्वेषां॑स्यर्य॒मा सु॒गेभिः॑। बृ॒हन्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य॒ शर्मोप॑ स्याम पुरु॒वीरा॒ अरि॑ष्टाः॥

जैसे न्यायाधीश राजा न्यायघर में बैठ के पुरुषों को दण्ड देवे, वैसे न्यायाधीशा रानी स्त्रियों का न्याय करे। उस न्यायघर में रागद्वेष और प्रीति अप्रीति छोड़के केवल न्याय ही किया करे, अन्य कुछ न करे॥७॥

ति॒स्रो भूमी॑र्धारय॒न् त्रीँरु॒त द्यून्त्रीणि॑ व्र॒ता वि॒दथे॑ अ॒न्तरे॑षाम्। ऋ॒तेना॑दित्या॒ महि॑ वो महि॒त्वं तद॑र्यमन्वरुण मित्र॒ चारु॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो जैसे भूमि और सूर्य्यादि लोक ईश्वर के नियम से बंधे हुए यथावत् अपनी-अपनी क्रिया करते हैं, वैसे मनुष्यों को भी जानना और वर्त्ताव करना चाहिये। इस जगत् में उत्तम मध्यम और अधम तीन प्रकार की भूमि और अग्नि है तथा सूर्य्यलोक भूमिलोक से बड़े-बड़े हैं॥८॥

त्री रो॑च॒ना दि॒व्या धा॑रयन्त हिर॒ण्ययाः॒ शुच॑यो॒ धार॑पूताः। अस्व॑प्नजो अनिमि॒षा अद॑ब्धा उरु॒शंसा॑ ऋ॒जवे॒ मर्त्या॑य॥

जो मनुष्य जीव-प्रकृति और परमेश्वर की तीन प्रकार की विद्या को धारण कर दूसरे को देते, सबको अविद्यारूप निद्रा से उठाके विद्या में जगाते हैं, वे मनुष्यों के मङ्गल करानेवाले होते हैं॥९॥

त्वं विश्वे॑षां वरुणासि॒ राजा॒ ये च॑ दे॒वा अ॑सुर॒ ये च॒ मर्ताः॑। श॒तं नो॑ रास्व श॒रदो॑ वि॒चक्षे॒ऽश्यामायूं॑षि॒ सुधि॑तानि॒ पूर्वा॑॥

जो मनुष्य पूर्ण ब्रह्मचर्य्य का सेवन करके अति विषयासक्ति को छोड़ देते हैं, वे सौ वर्ष से न्यून आयु को नहीं भोगते। इस ब्रह्मचर्य्यसेवन के विना मनुष्य कदापि दीर्घ अवस्थावाले नहीं हो सकते॥१०॥

न द॑क्षि॒णा वि चि॑किते॒ न स॒व्या न प्रा॒चीन॑मादित्या॒ नोत प॒श्चा। पा॒क्या॑ चिद्वसवो धी॒र्या॑ चिद्यु॒ष्मानी॑तो॒ अभ॑यं॒ ज्योति॑रश्याम्॥

हे मनुष्यो जो सूर्य सब दिशाओं में नहीं भ्रमते, जिनके आधार से पृथिवी आदि लोक भ्रमते हैं, उनके विज्ञानपूर्वक परमात्मा को जान के अभयरूप पदको प्राप्त होओ॥११॥

यो राज॑भ्य ऋत॒निभ्यो॑ द॒दाश॒ यं व॒र्धय॑न्ति पु॒ष्टय॑श्च॒ नित्याः॑। स रे॒वान्या॑ति प्रथ॒मो रथे॑न वसु॒दावा॑ वि॒दथे॑षु प्रश॒स्तः॥

जो पुरुष और जो स्त्री पूर्ण विद्यावाले हों, वे न्यायाधीश होकर पुरुष और स्त्रियों की उन्नति करें, वे सब प्रशंसा के योग्य विजय करनेवाले जानने चाहिये॥१२॥

शुचि॑र॒पः सू॒यव॑सा॒ अद॑ब्ध॒ उप॑ क्षेति वृ॒द्धव॑याः सु॒वीरः॑। नकि॒ष्टं घ्न॒न्त्यन्ति॑तो॒ न दू॒राद्य आ॑दि॒त्यानां॒ भव॑ति॒ प्रणी॑तौ॥

जो पवित्र आचरणवाला हिंसादि दोषों से रहित पूर्ण सामग्रीवाला दीर्घजीवी विद्वानों की रक्षा में सदा रहता, उसका समीपस्थ और दूरस्थ शत्रु लोग पराजय कदापि नहीं कर सकते॥१३॥

अदि॑ते॒ मित्र॒ वरु॑णो॒त मृ॑ळ॒ यद्वो॑ व॒यं च॑कृ॒मा कच्चि॒दागः॑। उ॒र्व॑श्या॒मभ॑यं॒ ज्योति॑रिन्द्र॒ मा नो॑ दी॒र्घा अ॒भि न॑श॒न्तमि॑स्राः॥

जिस देश वा नगर में विदुषी स्त्री स्त्रियों का न्याय करनेवाली और पुरुषों का न्याय करनेवाला विद्वान् पुरुष हो, उस देश वा नगर में दिन रात्री निर्भय होते और विशेषकर चोर आदि के भय से रहित सुखपूर्वक रात्री व्यतीत होती है॥१४॥

उ॒भे अ॑स्मै पीपयतः समी॒ची दि॒वो वृ॒ष्टिं सु॒भगो॒ नाम॒ पुष्य॑न्। उ॒भा क्षया॑वा॒जय॑न्याति पृ॒त्सूभावर्धौ॑ भवतः सा॒धू अ॑स्मै॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो स्त्री-पुरुष सूर्यदीप्ति जगत् को जैसे, वैसे सब राज्य को पुष्ट करें और सुन्दर चरित्रोंवाले हों, वे न्यायाधीशपन को प्राप्त होते हैं॥१५॥

या वो॑ मा॒या अ॑भि॒द्रुहे॑ यजत्राः॒ पाशा॑ आदित्या रि॒पवे॒ विचृ॑त्ताः। अ॒श्वीव॒ ताँ अति॑ येषं॒ रथे॒नारि॑ष्टा उ॒रावा शर्म॑न्त्स्याम॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो पण्डित लोग द्रोह को छोड़ के जिनके कोई शत्रु नहीं ऐसे हों, वे दुष्टों को पाशों से बाँधे और उनकी रक्षा करके सब सुखी हों॥१६॥

माहं म॒घोनो॑ वरुण प्रि॒यस्य॑ भूरि॒दाव्न॒ आ वि॑दं॒ शून॑मा॒पेः। मा रा॒यो रा॑जन्त्सु॒यमा॒दव॑ स्थां बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

धनाढ्य लोगों को चाहिये कि राजपुरुषों के साथ विरोध कदापि न करें और न अन्याययुक्त व्यवहार में न्याय से उपार्जन किये धन का कभी खर्च करें और सदैव सर्वव्यापक परमात्मा की आज्ञा में वर्त्तें॥१७॥इस सूक्त में विद्वानों के गुणों आदि का वर्णन होने से इस सूक्त की पूर्वसूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह सत्ताईसवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इ॒दं क॒वेरा॑दि॒त्यस्य॑ स्व॒राजो॒ विश्वा॑नि॒ सन्त्य॒भ्य॑स्तु म॒ह्ना। अति॒ यो म॒न्द्रो य॒जथा॑य दे॒वः सु॑की॒र्तिं भि॑क्षे॒ वरु॑णस्य॒ भूरेः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य की किरण घटपटादि पदार्थों को प्रकाशित करती हैं, वैसे विद्वानों के उपदेश श्रोता लोगों के आत्माओं को प्रकाशित करते हैं॥१॥

तव॑ व्र॒ते सु॒भगा॑सः स्याम स्वा॒ध्यो॑ वरुण तुष्टु॒वांसः॑। उ॒पाय॑न उ॒षसां॒ गोम॑तीनाम॒ग्नयो॒ न जर॑माणा॒ अनु॒ द्यून्॥

विद्यार्थी और उपदेश सुननेवाले मनुष्यों को चाहिये कि सदा विद्वानों का सङ्ग और सेवा करके प्रतिदिन विद्या का ग्रहण करें, जैसे प्रातःकाल के समय में सब पदार्थ सुशोभित होते हैं, वैसे वे भी होवें॥२॥

तव॑ स्याम पुरु॒वीर॑स्य॒ शर्म॑न्नुरु॒शंस॑स्य वरुण प्रणेतः। यू॒यं नः॑ पुत्रा अदितेरदब्धा अ॒भि क्ष॑मध्वं॒ युज्या॑य देवाः॥

हे पुत्रो! जैसे हम लोग उत्तम विद्वान् के सम्बन्ध से नीति विद्या को प्राप्त होके आनन्दित हों, वैसे तुम लोग भी क्षमाशील होके अध्यापकों के अनुकूल आचरण से सुशिक्षित विद्वान् होओ॥३॥

प्र सी॑मादि॒त्यो अ॑सृजद्विध॒र्ताँ ऋ॒तं सिन्ध॑वो॒ वरु॑णस्य यन्ति। न श्रा॑म्यन्ति॒ न वि मु॑चन्त्ये॒ते वयो॒ न प॑प्तू रघु॒या परि॑ज्मन्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। यह सब जगत् वायु और जल के तुल्य चलायमान है। जैसे नदियाँ चलतीं पृथिवी का जल ऊपर जाता वहाँ भी चलायमान होता फिर भूमि पर गिरता। इस प्रकार जीवों की संसार में गति है॥४॥

वि मच्छ्र॑थाय रश॒नामि॒वाग॑ ऋ॒ध्याम॑ ते वरुण॒ खामृ॒तस्य॑। मा तन्तु॑श्छेदि॒ वय॑तो॒ धियं॑ मे॒ मा मात्रा॑ शार्य॒पसः॑ पु॒र ऋ॒तोः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे रस्सी से बंधे हुए घोड़े नियम से चलते हैं, वैसे ही माता-पिता और आचार्य के नियम में बंधे हुए बालक विद्यार्थी विद्या और सुशिक्षा को ग्रहण करें, कभी मादक द्रव्य के सेवन से बुद्धि को नष्ट न करें, विवाह करके सदैव ऋतुगामी हों और सन्तानों के प्रवाह को न तोड़ें॥५॥

अपो॒ सु म्य॑क्ष वरुण भि॒यसं॒ मत्सम्रा॒ळृता॒वोऽनु॑ मा गृभाय। दामे॑व व॒त्साद्वि मु॑मु॒ग्ध्यंहो॑ न॒हि त्वदा॒रे नि॒मिष॑श्च॒नेशे॑॥

अध्यापक और उपदेशक पहले से सबके भय को निकाल विद्या का ग्रहण करावें, बुरे व्यसन छुड़ावें, जिससे उनके दूर वा समीप में कोई धर्म से रोकनेवाला न हो॥६॥

मा नो॑ व॒धैर्व॑रुण॒ ये त॑ इ॒ष्टावेनः॑ कृ॒ण्वन्त॑मसुर भ्री॒णन्ति॑। मा ज्योति॑षः प्रवस॒थानि॑ गन्म॒ वि षू मृधः॑ शिश्रथो जी॒वसे॑ नः॥

जो मनुष्य धर्मात्माओं को नहीं मारते, दुष्टों को ताड़ना देते, किसी के प्रवास को न रोकते और सबके सुख के लिये शत्रुओं को जीतते हैं, वे अतुल सुख को प्राप्त होते हैं॥७॥

नमः॑ पु॒रा ते॑ वरुणो॒त नू॒नमु॒ताप॒रं तु॑विजात ब्रवाम। त्वे हि कं॒ पर्व॑ते॒ न श्रि॒तान्यप्र॑च्युतानि दूळभ व्र॒तानि॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जो इस जगत् में श्रेष्ठ विद्वान् हैं, उनके प्रति सदैव प्रिय वचन कहें और अनुकूल आचरण करें और उनके गुण-कर्म-स्वभावों को अपने में ग्रहण करें॥८॥

परा॑ ऋ॒णा सा॑वी॒रध॒ मत्कृ॑तानि॒ माहं रा॑जन्न॒न्यकृ॑तेन भोजम्। अव्यु॑ष्टा॒ इन्नु भूय॑सीरु॒षास॒ आ नो॑ जी॒वान्व॑रुण॒ तासु॑ शाधि॥

जैसे ईश्वर जिसने जैसा कर्म किया है, उसको वैसा फल देता है, वेद द्वारा सबको शिक्षा करता, वैसे ही विद्वानों को अनुष्ठान करना चाहिये॥९॥

यो मे॑ राज॒न्युज्यो॑ वा॒ सखा॑ वा॒ स्वप्ने॑ भ॒यं भी॒रवे॒ मह्य॒माह॑। स्ते॒नो वा॒ यो दिप्स॑ति नो॒ वृको॑ वा॒ त्वं तस्मा॑द्वरुण पाह्य॒स्मान्॥

जो राजपुरुष प्रजा में निर्भय दुष्टों का निग्रह कर सब प्रजा की रक्षा करते हैं, वे सब दुःखों से रहित हो जाते हैं॥१०॥

माहं म॒घोनो॑ वरुण प्रि॒यस्य॑ भूरि॒दाव्न॒ आ वि॑दं॒ शून॑मा॒पेः। मा रा॒यो रा॑जन्त्सु॒यमा॒दव॑ स्थां बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि अन्याय से बिना आज्ञा परपदार्थ के ग्रहण की इच्छा कभी न करें किन्तु धर्मयुक्त व्यवहार से यथाशक्ति धन संचय करें॥११॥इस सूक्त में विद्वान् और राजा प्रजा के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त में कहे अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह अट्ठाइसवाँ सूक्त और दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

धृत॑व्रता॒ आदि॑त्या॒ इषि॑रा आ॒रे मत्क॑र्त रह॒सूरि॒वागः॑। शृ॒ण्व॒तो वो॒ वरु॑ण॒ मित्र॒ देवा॑ भ॒द्रस्य॑ वि॒द्वाँ अव॑से हुवे वः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो धर्माचरण करनेवाले अधर्म से पृथक् सबको रखने में प्रवर्त्तमान हैं, वे कल्याण को प्राप्त होते हैं॥१॥

यू॒यं दे॑वाः॒ प्रम॑तिर्यू॒यमोजो॑ यू॒यं द्वेषां॑सि सनु॒तर्यु॑योत। अ॒भि॒क्ष॒त्तारो॑ अ॒भि च॒ क्षम॑ध्वम॒द्या च॑ नो मृ॒ळय॑ताप॒रं च॑॥

जो विद्वान् लोग द्वेष को छोड़ के निरन्तर बुद्धि की उन्नति करते, दूसरे के अपराधों को क्षमा करते और सबको सुखी करते हैं, वे इस जगत् में सत्कार के योग्य होते हैं॥२॥

किमू॒ नु वः॑ कृणवा॒माप॑रेण॒ किं सने॑न वसव॒ आप्ये॑न। यू॒यं नो॑ मित्रावरुणादिते च स्व॒स्तिमि॑न्द्रामरुतो दधात॥

जो प्रथम कक्षा के विद्वान् हों, उनको राजा लोग पूछें कि आपकी क्या सेवा हम करें, क्या-क्या तुमको देवें, जिससे विद्या सुशिक्षा और धर्म की उन्नति करो॥३॥

ह॒ये दे॑वा यू॒यमिदा॒पयः॑ स्थ॒ ते मृ॑ळत॒ नाध॑मानाय॒ मह्य॑म्। मा वो॒ रथो॑ मध्यम॒वाळृ॒ते भू॒न्मा यु॒ष्माव॑त्स्वा॒पिषु॑ श्रमिष्म॥

सब मनुष्यों को योग्य है कि विद्याओं को प्राप्त होके सबको सुखी करें और जैसे दृढ़ पुष्ट यान बनें, वैसा प्रयत्न करें, सदा विद्वानों में प्रीति रखके विद्या की उन्नति किया करें॥४॥

प्र व॒ एको॑ मिमय॒ भूर्यागो॒ यन्मा॑ पि॒तेव॑ कित॒वं श॑शा॒स। आ॒रे पाशा॑ आ॒रे अ॒घानि॑ देवा॒ मा माधि॑ पु॒त्रे विमि॑व ग्रभीष्ट॥

सबको प्रशंसा करनी चाहिये कि हे विद्वान् जनो! तुम्हारे संग से हम लोग पापों को छोड़ धर्म का आचरण करनेवाले हों। आप लोग पिता के तुल्य हमको शिक्षा देओ, जिससे हम दुष्टाचरण से दूर रहें॥५॥

अ॒र्वाञ्चो॑ अ॒द्या भ॑वता यजत्रा॒ आ वो॒ हार्दि॒ भय॑मानो व्ययेयम्। त्राध्वं॑ नो देवा नि॒जुरो॒ वृक॑स्य॒ त्राध्वं॑ क॒र्ताद॑व॒पदो॑ यजत्राः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। विद्वानों का यही कर्त्तव्य है कि जो अज्ञान अविद्यादि दोषों से पृथक् रखके सब दुःख से पृथक् कर मनुष्यों को बड़ी अवस्थावाले धर्मात्मा करें॥६॥

माहं म॒घोनो॑ वरुण प्रि॒यस्य॑ भूरि॒दाव्न॒ आ वि॑दं॒ शून॑मा॒पेः। मा रा॒यो रा॑जन्त्सु॒यमा॒दव॑ स्थां बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

विद्वान् और सभापति आदि राजपुरुषों को योग्य है कि उन धर्मसम्बन्धी कार्यों को करें, जिनसे दुःख और दरिद्रता प्राप्त न हों और आपस में मिलके सुन्दर वीरोंवाली प्रजाओं को करें॥७॥इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये॥यह उन्तीसवाँ सूक्त और ग्यारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

ऋ॒तं दे॒वाय॑ कृण्व॒ते स॑वि॒त्र इन्द्रा॑याहि॒घ्ने न र॑मन्त॒ आपः॑। अह॑रहर्यात्य॒क्तुर॒पां किया॒त्या प्र॑थ॒मः सर्ग॑ आसाम्॥

जैसे अन्तरिक्षस्थ वायु में जल ठहरता है, वैसे सूर्य में नहीं ठहरता, सूर्यमण्डल से ही वर्षा द्वारा जल की प्रकटता होती है और यही सूर्य जल को ऊपर खींचता और वर्षाता है। जल की प्रथम सृष्टि अग्नि से ही होती है, ऐसा जानना चाहिये॥१॥

यो वृ॒त्राय॒ सिन॒मत्राभ॑रिष्य॒त्प्र तं जनि॑त्री वि॒दुष॑ उवाच। प॒थो रद॑न्ती॒रनु॒ जोष॑मस्मै दि॒वेदि॑वे॒ धुन॑यो य॒न्त्यर्थ॑म्॥

जैसे सूर्य्य मेघ का बन्धनकर्त्ता है, वैसे ही पृथिवी आदि लोकों का भी है, जैसे सूर्य्यमण्डल प्रतिदिन रसों को खींच कर नियत समय पर वर्षाता है, वैसे इस सूर्य्य के किरण भी प्रत्येक द्रव्य को प्राप्त होते हैं॥२॥

ऊ॒र्ध्वो ह्यस्था॒दध्य॒न्तरि॒क्षेऽधा॑ वृ॒त्राय॒ प्र व॒धं ज॑भार। मिहं॒ वसा॑न॒ उप॒ हीमदु॑द्रोत्ति॒ग्मायु॑धो अजय॒च्छत्रु॒मिन्द्रः॑॥

सूर्य अतिदूरस्थ हो भूमि को धारण करता जल को खींचता है, जैसे यह मेघ को छिन्न-भिन्न कर भूमि पर गिराता है, वैसे ही राजपुरुषों को शत्रु गिराने चाहिये॥३॥

बृह॑स्पते॒ तपु॒षाश्ने॑व विध्य॒ वृक॑द्वरसो॒ असु॑रस्य वी॒रान्। यथा॑ ज॒घन्थ॑ धृष॒ता पु॒रा चि॑दे॒वा ज॑हि॒ शत्रु॑म॒स्माक॑मिन्द्र॥

इस मन्त्र में दो उपमालङ्कार हैं। जो लोग बिजली के तुल्य वेग बलयुक्त होकर शत्रुओं को मारते हैं, वे सूर्य्य के तुल्य राज्य में प्रकाशमान होते हैं॥४॥

अव॑ क्षिप दि॒वो अश्मा॑नमु॒च्चा येन॒ शत्रुं॑ मन्दसा॒नो नि॒जूर्वाः॑। तो॒कस्य॑ सा॒तौ तन॑यस्य॒ भूरे॑र॒स्माँ अ॒र्धं कृ॑णुतादिन्द्र॒ गोना॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजपुरुषों को चाहिये कि जैसे अपने सन्तानों के दुःख दूर कर सम्यक् रक्षा कर बढ़ाते हैं, वैसे ही प्रजा के कण्टकों को निवृत्त कर शिष्टों का सम्यक् पालन कर बढ़ावें॥५॥

प्र हि क्रतुं॑ बृ॒हथो॒ यं व॑नु॒थो र॒ध्रस्य॑ स्थो॒ यज॑मानस्य चो॒दौ। इन्द्रा॑सोमा यु॒वम॒स्माँ अ॑विष्टम॒स्मिन्भ॒यस्थे॑ कृणुतमु लो॒कम्॥

राजपुरुष बहुत बल और धनाढ्य लोग यथेष्ट ऐश्वर्य्य को पाकर किसी को भय न देवें किन्तु सदैव दरिद्री और निर्बलों को सुख में स्थापन करें, निवास करावें॥६॥

न मा॑ तम॒न्न श्र॑म॒न्नोत त॑न्द्र॒न्न वो॑चाम॒ मा सु॑नो॒तेति॒ सोम॑म्। यो मे॑ पृ॒णाद्यो दद॒द्यो नि॒बोधा॒द्यो मा॑ सु॒न्वन्त॒मुप॒ गोभि॒राय॑त्॥

जो राजपुरुष प्रजा में किसी को क्लेशित नहीं करते, विरुद्ध कर्म का आचरण नहीं करते, सबको सुखी करते, उपदेश से बोध कराते, वे सुख के देने से नित्य तृप्त करने योग्य हैं॥७॥

सर॑स्वति॒ त्वम॒स्माँ अ॑विड्ढि म॒रुत्व॑ती धृष॒ती जे॑षि॒ शत्रू॑न्। त्यं चि॒च्छर्ध॑न्तं तविषी॒यमा॑ण॒मिन्द्रो॑ हन्ति वृष॒भं शण्डि॑कानाम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे राजा शत्रुओं को मार कर पुरुषों का सत्कार व न्याय करता है, वैसे ही रानी दुष्टा स्त्रियों को निवृत्त कर सब स्त्रियों की सदा रक्षा करे अर्थात् जैसे पुरुष न्यायाधीश हों, वैसे स्त्रियाँ भी हों॥८॥

यो नः॒ सनु॑त्य उ॒त वा॑ जिघ॒त्नुर॑भि॒ख्याय॒ तं ति॑गि॒तेन॑ विध्य। बृह॑स्पत॒ आयु॑धैर्जेषि॒ शत्रू॑न्द्रु॒हे रीष॑न्तं॒ परि॑ धेहि राजन्॥

प्रजापुरुषों को चाहिये कि अपने दुःखों को राजपुरुषों से निवेदन कर निवृत्त करावें, जो प्रजा की रक्षा में प्रीति से वर्त्तमान हैं, उनको सुख दिलावें और जो हिंसक हैं, उनका निवेदन कर दण्ड दिलावें॥९॥

अ॒स्माके॑भिः॒ सत्व॑भिः शूर॒ शूरै॑र्वी॒र्या॑ कृधि॒ यानि॑ ते॒ कर्त्वा॑नि। ज्योग॑भूव॒न्ननु॑धूपितासो ह॒त्वी तेषा॒मा भ॑रा नो॒ वसू॑नि॥

जब राजाओं में युद्ध प्रवृत्त हो प्रजास्थ मनुष्य उनके प्रति ऐसे कहें कि तुम डरो नहीं, जितने हमलोग हैं, वे सब तुम्हारे सहायक हैं, जो ऐसे आप हम आपस में एक-दूसरे से सहायक न हों तो विजय कहाँ से होवे?॥१०॥

तं वः॒ शर्धं॒ मारु॑तं सुम्न॒युर्गि॒रोप॑ ब्रुवे॒ नम॑सा॒ दैव्यं॒ जन॑म्। यथा॑ र॒यिं सर्व॑वीरं॒ नशा॑महा अपत्य॒साचं॒ श्रुत्यं॑ दि॒वेदि॑वे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे राजपुरुष प्रजा के गुणों को अपने लोगों के प्रति कहें वैसे प्रजा पुरुष राजपुरुषों के गुणों को अपने सब योगियों से कहें, ऐसे परस्पर गुणज्ञानपूर्वक प्रीति को प्राप्त होके नित्य आनन्दित होवें॥११॥इस सूक्त में स्त्री-पुरुष और राज प्रजा के गुणों क वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये॥यह तीसवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒स्माकं॑ मित्रावरुणावतं॒ रथ॑मादि॒त्यै रु॒द्रैर्वसु॑भिः सचा॒भुवा॑। प्र यद्वयो॒ न पप्त॒न्वस्म॑न॒स्परि॑ श्रव॒स्यवो॒ हृषी॑वन्तो वन॒र्षदः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों का अनुकरण करके विमानादि यान बना के पक्षी के तुल्य अन्तरिक्षादि मार्गों में सुख से गमनागमन किया करें॥१॥

अध॑ स्मा न॒ उद॑वता सजोषसो॒ रथं॑ देवासो अ॒भि वि॒क्षु वा॑ज॒युम्। यदा॒शवः॒ पद्या॑भि॒स्तित्र॑तो॒ रजः॑ पृथि॒व्याः सानौ॒ जङ्घ॑नन्त पा॒णिभिः॑॥

जो मनुष्य हाथों में यन्त्रों को स्थिर कर और ताड़ना देकर इनको चलावें, तो वे घोड़े के तुल्य पृथिवी के ऊपर-ऊपर जाने-आने को समर्थ होते हैं॥२॥

उ॒त स्य न॒ इन्द्रो॑ वि॒श्वच॑र्षणिर्दि॒वः शर्धे॑न॒ मारु॑तेन सु॒क्रतुः॑। अनु॒ नु स्था॑त्यवृ॒काभि॑रू॒तिभी॒ रथं॑ म॒हे स॒नये॒ वाज॑सातये॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य अपने प्रताप से सब जगत् की पालना करता, वैसे धार्मिक प्रजा और राजपुरुष अपने राज्य की रक्षा किया करें॥३॥

उ॒त स्य दे॒वो भुव॑नस्य स॒क्षणि॒स्त्वष्टा॒ ग्नाभिः॑ स॒जोषा॑ जूजुव॒द्रथ॑म्। इळा॒ भगो॑ बृहद्दि॒वोत रोद॑सी पू॒षा पुरं॑धिर॒श्विना॒वधा॒ पती॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो बिजली के तुल्य और सुशिक्षित वाणी के तुल्य वर्त्तते हैं, वे अनेक शिल्प विद्या से साध्य यानों को बना के ऐश्वर्य्यवाले होते हैं॥४॥

उ॒त त्ये दे॒वी सु॒भगे॑ मिथू॒दृशो॒षासा॒नक्ता॒ जग॑तामपी॒जुवा॑। स्तु॒षे यद्वां॑ पृथिवि॒ नव्य॑सा॒ वचः॑ स्था॒तुश्च॒ वय॒स्त्रिव॑या उप॒स्तिरे॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे रात-दिन परस्पर मिले हुए वर्त्तते हैं, वैसे ही स्त्री-पुरुष वर्त्तें। जैसे पुरुष ब्रह्मचर्य से विद्या पढ़ के सब पदार्थों के गुण-कर्म-स्वभावों को जानकर विद्वान् होते हैं, वैसे ही स्त्रियाँ भी हों॥५॥

उ॒त वः॒ शंस॑मु॒शिजा॑मिव श्म॒स्यहि॑र्बु॒ध्न्यो॒३॒॑ज एक॑पादु॒त। त्रि॒त ऋ॑भु॒क्षाः स॑वि॒ता चनो॑ दधे॒ऽपां नपा॑दाशु॒हेमा॑ धि॒या शमि॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे ईश्वर अजन्मा कामना के योग्य सत्य गुणकर्मस्वभाववाला सेवने योग्य है, वैसे हम सब जीव लोग हैं, इससे ब्रह्मचर्यादि शुभ कर्म में हमको सदा वर्त्तना चाहिये॥६॥

ए॒ता वो॑ व॒श्म्युद्य॑ता यजत्रा॒ अत॑क्षन्ना॒यवो॒ नव्य॑से॒ सम्। श्र॒व॒स्यवो॒ वाजं॑ चका॒नाः सप्ति॒र्न रथ्यो॒ अह॑ धी॒तिम॑श्याः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को चाहिये कि जिस-जिस पदार्थ की कामना विद्वान् लोग करें, उस-उसकी कामना करें। जैसे विद्वान् लोग उपदेश करें, वैसे उसको सुन निश्चय कर स्वीकार और अनुष्ठान किया करें॥७॥इस मन्त्र में विद्वान् और विदुषी स्त्रियों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त में कहे अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये॥यह इकत्तीसवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒स्य मे॑ द्यावापृथिवी ऋताय॒तो भू॒तम॑वि॒त्री वच॑सः॒ सिषा॑सतः। ययो॒रायुः॑ प्रत॒रं ते इ॒दं पु॒र उप॑स्तुते वसू॒युर्वां॑ म॒हो द॑धे॥

मनुष्यों को भूमि और अग्नि का सेवन जो युक्ति के साथ किया जाता है तो पूर्ण आयु और धन की प्राप्ति हो सकती है॥१॥

मा नो॒ गुह्या॒ रिप॑ आ॒योरह॑न्दभ॒न्मा न॑ आ॒भ्यो री॑रधो दु॒च्छुना॑भ्यः। मा नो॒ वि यौः॑ स॒ख्या वि॒द्धि तस्य॑ नः सुम्नाय॒ता मन॑सा॒ तत्त्वे॑महे॥

सब मनुष्यों को इस प्रकार सदा इच्छा करनी चाहिये कि किसी के सुख की हानि कभी न करनी चाहिये, मित्रता का भङ्ग न करना चाहिये, सब सज्जनों की सदा रक्षा करनी चाहिये, निरन्तर सज्जनों के लिये सुख माँगना चाहिये॥२॥

अहे॑ळता॒ मन॑सा श्रु॒ष्टिमा व॑ह॒ दुहा॑नां धे॒नुं पि॒प्युषी॑मस॒श्चत॑म्। पद्या॑भिरा॒शुं वच॑सा च वा॒जिनं॒ त्वां हि॑नोमि पुरुहूत वि॒श्वहा॑॥

जो समाधानयुक्त अन्तःकरण से औरों के लिये उत्तम शिक्षायुक्त वाणी को शीघ्र प्राप्त कराता है, उसको सब सत्कार करके बढ़ावें॥३॥

रा॒काम॒हं सु॒हवां॑ सुष्टु॒ती हु॑वे शृ॒णोतु॑ नः सु॒भगा॒ बोध॑तु॒ त्मना॑। सीव्य॒त्वपः॑ सू॒च्याच्छि॑द्यमानया॒ ददा॑तु वी॒रं श॒तदा॑यमु॒क्थ्य॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। उस मनुष्य वा स्त्री का अहोभाग्य होता है, जिसको अभीष्ट स्त्री वा पुरुष प्राप्त हो, जैसे गुण-कर्म-स्वभाववाला पुरुष हो वैसी पत्नी भी हो, यदि दोनों विद्वान् स्त्री-पुरुष ऋतु समय को न उल्लंघन कर अर्थात् ऋतु समय के अनुकूल प्रेम से सन्तानोत्पत्ति करें, तो उनकी सन्तान प्रशंसित क्यों न हो, जैसे छिन्न-भिन्न वस्त्र सुई से सिया जाता है, वैसे जिनके मन में परस्पर प्रीति हो, उनका कुल सबका मान्य होता है॥४॥

यास्ते॑ राके सुम॒तयः॑ सु॒पेश॑सो॒ याभि॒र्ददा॑सि दा॒शुषे॒ वसू॑नि। ताभि॑र्नो अ॒द्य सु॒मना॑ उ॒पाग॑हि सहस्रपो॒षं सु॑भगे॒ ररा॑णा॥

यदि सुलक्षणा विदुषी स्त्री श्रेष्ठ विद्वान् जन की पत्नी हो तो धन की और सुख की बहुत प्रकार प्राप्ति हो॥५॥

सिनी॑वालि॒ पृथु॑ष्टुके॒ या दे॒वाना॒मसि॒ स्वसा॑। जु॒षस्व॑ ह॒व्यमाहु॑तं प्र॒जां दे॑वि दिदिड्ढि नः॥

जो विद्वानों के कुल की कन्या विद्वानों की बन्धु ब्रह्मचर्य से विद्या को प्राप्त हुई प्रकाशमान हो उसे पत्नी कर विधि से इसमें सन्तानों को जो उत्पन्न करे, वह पुरुष और वह स्त्री दोनों सुखी हों॥६॥

या सु॑बा॒हुः स्व॑ङ्गु॒रिः सु॒षूमा॑ बहु॒सूव॑री। तस्यै॑ वि॒श्पत्न्यै॑ ह॒विः सि॑नीवा॒ल्यै जु॑होतन॥

पुरुषों को यह जानना चाहिये कि वे ही पत्नी उत्तम होती हैं, जो सर्वाङ्ग सुन्दरी बहुत प्रजा उत्पन्न करनेवाली शुभगुणस्वभावयुक्त हों, उनमें से एक-एक पुरुष को चाहिये कि एक-एक स्त्री के साथ विवाह करके प्रजा उत्पन्न करें॥७॥

या गु॒ङ्गूर्या सि॑नीवा॒ली या रा॒का या सर॑स्वती। इ॒न्द्रा॒णीम॑ह्व ऊ॒तये॑ वरुणा॒नीं स्व॒स्तये॑॥

यदि कोई स्त्री गूँगी और कोई उत्तम सर्वलक्षणसम्पन्न विदुषी हो, उसे ऐश्वर्य और सुख निरन्तर बढ़ाने चाहिये॥८॥इस सूक्त में विद्वानों की मित्रता और स्त्री के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ के साथ पिछले सूक्तार्थ की संगति है, यह जानना चाहिये॥यह बत्तीसवाँ सूक्त पन्द्रहवाँ वर्ग और तीसरा अनुवाक समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

आ ते॑ पितर्मरुतां सु॒म्नमे॑तु॒ मा नः॒ सूर्य॑स्य सं॒दृशो॑ युयोथाः। अ॒भि नो॑ वी॒रो अर्व॑ति क्षमेत॒ प्र जा॑येमहि रुद्र प्र॒जाभिः॑॥

सब मनुष्य परमेश्वर को परमपिता न्यायकारी मानकर सुख बढ़ावें, कभी ईश्वर को मानकर विरुद्ध न हों, सहनशील होकर वीरता सिद्धकर प्रजा के साथ सुखी हों॥१॥

त्वाद॑त्तेभी रुद्र॒ शंत॑मेभिः श॒तं हिमा॑ अशीय भेष॒जेभिः॑। व्य१॒॑स्मद्द्वेषो॑ वित॒रं व्यंहो॒ व्यमी॑वाश्चातयस्वा॒ विषू॑चीः॥

हे वैद्य लोगो! तुम अत्युत्तम ओषधियों से सब के बड़े-बड़े रोगों को निवारण करके रागद्वेषों को और उन्माद आदि दोषों को अलग कर शतवर्ष आयु जिनकी ऐसे मनुष्यों को सिद्ध करो॥२॥

श्रेष्ठो॑ जा॒तस्य॑ रुद्र श्रि॒यासि॑ त॒वस्त॑मस्त॒वसां॑ वज्रबाहो। पर्षि॑ णः पा॒रमंह॑सः स्व॒स्ति विश्वा॑ अ॒भी॑ती॒ रप॑सो युयोधि॥

जो आप रोगरहित शोभते हुए अतीव बलवान् हैं, औरों को रोगरहित करके निरन्तर सुखी करते हैं, वे सबको सर्वदा सत्कार करने योग्य हैं॥३॥

मा त्वा॑ रुद्र चुक्रुधामा॒ नमो॑भि॒र्मा दुष्टु॑ती वृषभ॒ मा सहू॑ती। उन्नो॑ वी॒राँ अ॑र्पय भेष॒जेभि॑र्भि॒षक्त॑मं त्वा भि॒षजां॑ शृणोमि॥

किसी को वैद्य के साथ विरोध कभी न करना चाहिये न इसके साथ ईर्ष्या करनी चाहिये किन्तु प्रीति के साथ सर्वोत्तम वैद्य की सेवा करनी चाहिये, जिससे रोगों से अलग होकर सुख निरन्तर बढ़े॥४॥

हवी॑मभि॒र्हव॑ते॒ यो ह॒विर्भि॒रव॒ स्तोमे॑भी रु॒द्रं दि॑षीय। ऋ॒दू॒दरः॑ सु॒हवो॒ मा नो॑ अ॒स्यै ब॒भ्रुः सु॒शिप्रो॑ रीरधन्म॒नायै॑॥

जो वैद्य जन रोगनिवारण से हमारी बुद्धि को बढ़ाते हैं, उनके साथ हम लोग कभी न विरोध करें॥५॥

उन्मा॑ ममन्द वृष॒भो म॒रुत्वा॒न्त्वक्षी॑यसा॒ वय॑सा॒ नाध॑मानम्। घृणी॑व च्छा॒याम॑र॒पा अ॑शी॒या वि॑वासेयं रु॒द्रस्य॑ सु॒म्नम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो वैद्य हमारे रोगों का निवारण कर मनुष्यों को दीर्घ आयुवाले करते हैं, वे सूर्य्य के समान प्रकाशित कीर्त्तिवाले होते हैं॥६॥

क्व १॒॑ स्य ते॑ रुद्र मृळ॒याकु॒र्हस्तो॒ यो अस्ति॑ भेष॒जो जला॑षः। अ॒प॒भ॒र्ता रप॑सो॒ दैव्य॑स्या॒भी नु मा॑ वृषभ चक्षमीथाः॥

जब अध्यापक वैद्य शिष्यों को पढ़ावे तब अच्छे प्रकार पढ़ाकर फिर परीक्षा करे, जो यथार्थ प्रश्नोत्तर करनेवाला हो, उसको वैद्यकी करने को आज्ञा देओ॥७॥

प्र ब॒भ्रवे॑ वृष॒भाय॑ श्विती॒चे म॒हो म॒हीं सु॑ष्टु॒तिमी॑रयामि। न॒म॒स्या क॑ल्मली॒किनं॒ नमो॑भिर्गृणी॒मसि॑ त्वे॒षं रु॒द्रस्य॒ नाम॑॥

विद्यार्थियों की योग्यता है जो कि विद्या ग्रहण करावे, उसका सदा सत्कार करें, जिसकी वैद्यकशास्त्र में प्रसिद्धि है, उसी से वैद्यविद्या का अध्ययन करना चाहिये॥८॥

स्थि॒रेभि॒रङ्गैः॑ पुरु॒रूप॑ उ॒ग्रो ब॒भ्रुः शु॒क्रेभिः॑ पिपिशे॒ हिर॑ण्यैः। ईशा॑नाद॒स्य भुव॑नस्य॒ भूरे॒र्न वा उ॑ योषद्रु॒द्राद॑सु॒र्य॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो तीव्र और मृदु स्वभाववाले हैं, वे जैसे जगदीश्वर के बनाये हुए भूमि आदि पदार्थ दृढ़ और सुन्दर हैं, वैसे बलिष्ठ प्रशंसनीय सेनाङ्गों से दुष्टों को विजय कर असुरभाव का निवारण करें॥९॥

अर्ह॑न्बिभर्षि॒ साय॑कानि॒ धन्वार्ह॑न्नि॒ष्कं य॑ज॒तं वि॒श्वरू॑पम्। अर्ह॑न्नि॒दं द॑यसे॒ विश्व॒मभ्वं॒ न वा ओजी॑यो रुद्र॒ त्वद॑स्ति॥

जो योग्यता को प्राप्त होकर आयुध सेना राज्य और धन को धारण करने तथा सब धर्मात्माओं पर दया करते हैं, वे बलिष्ठ होते हैं॥१०॥

स्तु॒हि श्रु॒तं ग॑र्त॒सदं॒ युवा॑नं मृ॒गं न भी॒ममु॑पह॒त्नुमु॒ग्रम्। मृ॒ळा ज॑रि॒त्रे रु॑द्र॒ स्तवा॑नो॒ऽन्यं ते॑ अ॒स्मन्नि व॑पन्तु॒ सेनाः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राज्य बढ़ाने की इच्छा करें, वे सिंह के समान शत्रुओं में भयंकर और श्रेष्ठों में आनन्द देनेवालों का राजकार्य्य और सेना में सत्कार कर और उनको आज्ञा दे न्याय से निरन्तर राज्य की पालना करे॥११॥

कु॒मा॒रश्चि॑त्पि॒तरं॒ वन्द॑मानं॒ प्रति॑ नानाम रुद्रोप॒यन्त॑म्। भूरे॑र्दा॒तारं॒ सत्प॑तिं गृणीषे स्तु॒तस्त्वं भे॑ष॒जा रा॑स्य॒स्मे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे अच्छा पुत्र पिता का सत्कार करता वा नमता वा स्तुति करता है, वैसे अच्छा विद्यार्थी पढ़ानेवाले को प्रसन्न करता है॥१२॥

या वो॑ भेष॒जा म॑रुतः॒ शुची॑नि॒ या शंत॑मा वृषणो॒ या म॑यो॒भु। यानि॒ मनु॒रवृ॑णीता पि॒ता न॒स्ता शं च॒ योश्च॑ रु॒द्रस्य॑ वश्मि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि पिता और पितामहों तथा अध्यापक वा अन्य विद्वानों से प्रतिरोग के निवारण के अर्थ ओषधियों को जानकर अपने और दूसरों के रोगों को निवारण करके सबके लिये सुख की आकांक्षा करें॥१३॥

परि॑ णो हे॒ती रु॒द्रस्य॑ वृज्याः॒ परि॑ त्वे॒षस्य॑ दुर्म॒तिर्म॒ही गा॑त्। अव॑ स्थि॒रा म॒घव॑द्भ्यस्तनुष्व॒ मीढ्व॑स्तो॒काय॒ तन॑याय मृळ॥

मनुष्यों को उत्तम शिक्षा से दुष्टमति को तथा वैद्यक रीति से सब रोगों का निवारण कर अपने कुल को सदा सुखी करना चाहिये॥१४॥

ए॒वा ब॑भ्रो वृषभ चेकितान॒ यथा॑ देव॒ न हृ॑णी॒षे न हंसि॑। ह॒व॒न॒श्रुन्नो॑ रुद्रे॒ह बो॑धि बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो वैद्य जन राज्य और न्याय के अधीश हों वे अन्याय से किसी का कुछ भी धन न हरें, न किसी को मारें किन्तु सदा अच्छे पथ्य और ओषधियों के व्यवहार सेवन से बल और पराक्रम को बढ़ावें॥१५॥इस सूक्त में वैद्य, राजपुरुष, और विद्या ग्रहण के व्यवहार वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये॥यह अठारहवाँ वर्ग और तैंतीसवाँ सूक्त समाप्त हुआ॥

धा॒रा॒व॒रा म॒रुतो॑ धृ॒ष्ण्वो॑जसो मृ॒गा न भी॒मास्तवि॑षीभिर॒र्चिनः॑। अ॒ग्नयो॒ न शु॑शुचा॒ना ऋ॑जी॒षिणो॒ भृमिं॒ धम॑न्तो॒ अप॒ गा अ॑वृण्वत॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य पावक के समान पवित्र, जल के समान कोमल, सिंह के समान पराक्रम करनेवाले, वायु के समान बलिष्ठ होकर अन्याय को निवृत्त करें, वे समस्त सुखको प्राप्त हों॥१॥

द्यावो॒ न स्तृभि॑श्चितयन्त खा॒दिनो॒ व्य१॒॑भ्रिया॒ न द्यु॑तयन्त वृ॒ष्टयः॑। रु॒द्रो यद्वो॑ मरुतो रुक्मवक्षसो॒ वृषाज॑नि॒ पृश्न्याः॑ शु॒क्र ऊध॑नि॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो नक्षत्रों के साथ सूर्य्य के समान बद्दलों के साथ बिजली के समान विद्या व्यवहाररूपी प्रकाश में रमते हैं, वे सोने के लिये रात्रि के समान सबके सुख के लिये होते हैं॥२॥

उ॒क्षन्ते॒ अश्वाँ॒ अत्याँ॑इवा॒जिषु॑ न॒दस्य॒ कर्णै॑स्तुरयन्त आ॒शुभिः॑। हिर॑ण्यशिप्रा मरुतो॒ दवि॑ध्वतः पृ॒क्षं या॑थ॒ पृष॑तीभिः समन्यवः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे शिक्षा करनेवाले जन घोड़ों को वा केवट नाव को उत्तम रीति पर चलाते हैं, वैसे राजजन अपनी सेना को पहुँचावें॥३॥

पृ॒क्षे ता विश्वा॒ भुव॑ना ववक्षिरे मि॒त्राय॑ वा॒ सद॒मा जी॒रदा॑नवः। पृष॑दश्वासो अनव॒भ्ररा॑धस ऋजि॒प्यासो॒ न व॒युने॑षु धू॒र्षदः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो दुष्टों के लिये क्रोध करते वा श्रेष्ठों को आनन्द देते हैं, वे बुद्धिमान् होते हैं॥४॥

इन्ध॑न्वभिर्धे॒नुभी॑ र॒प्शदू॑धभिरध्व॒स्मभिः॑ प॒थिभि॑र्भ्राजदृष्टयः। आ हं॒सासो॒ न स्वस॑राणि गन्तन॒ मधो॒र्मदा॑य मरुतः समन्यवः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे आकाशमार्ग से हंस अभीष्ट स्थानों को सुख से जाते हैं, वैसे सुशिक्षित वाणी से विद्यामार्गों को और धर्मपथों से सुखों को नित्य तुम लोग प्राप्त होओ॥५॥

आ नो॒ ब्रह्मा॑णि मरुतः समन्यवो न॒रां न शंसः॒ सव॑नानि गन्तन। अश्वा॑मिव पिप्यत धे॒नुमूध॑नि॒ कर्ता॒ धियं॑ जरि॒त्रे वाज॑पेशसम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य मनुष्यस्वभाव से उत्पन्न हुई प्रशंसा को प्राप्त होके उत्तम विद्या, वाणी और उत्तम बुद्धि को बढ़ाकर सर्वमनुष्यों को सुखों से अलंकृत करें, वे सुखी होते हैं॥६॥

तं नो॑ दात मरुतो वा॒जिनं॒ रथ॑ आपा॒नं ब्रह्म॑ चि॒तय॑द्दि॒वेदि॑वे। इषं॑ स्तो॒तृभ्यो॑ वृ॒जने॑षु का॒रवे॑ स॒निं मे॒धामरि॑ष्टं दु॒ष्टरं॒ सहः॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि सदैव सबके लिये सकल विद्या बतानेवाले से धर्म से संचित किया हुआ धन विद्वानों के देने के लिये अन्न उत्तम प्रज्ञा और पूर्ण बल को माँगें, विद्वान् जन निश्चय से याचकों के लिये उन उक्त पदार्थों को निरन्तर देवें॥७॥

यद्यु॒ञ्जते॑ म॒रुतो॑ रु॒क्मव॑क्ष॒सोऽश्वा॒न्रथे॑षु॒ भग॒ आ सु॒दान॑वः। धे॒नुर्न शिश्वे॒ स्वस॑रेषु पिन्वते॒ जना॑य रा॒तह॑विषे म॒हीमिष॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे अच्छी शिक्षा को प्राप्त विद्वान् जन घोड़े आदि पशुओं को और अग्नि आदि पदार्थों का प्रयोग कार्य सिद्धि के लिये करते हैं, वैसे अनुष्ठान करो, ऐसे करने से जैसे गौ अपने बछड़े को तृप्त करती हैं, वैसे ये प्रयोग करनेवालों को धनी करते हैं॥८॥

यो नो॑ मरुतो वृ॒कता॑ति॒ मर्त्यो॑ रि॒पुर्द॒धे व॑सवो॒ रक्ष॑ता रि॒षः। व॒र्तय॑त॒ तपु॑षा च॒क्रिया॒भि तमव॑ रुद्रा अ॒शसो॑ हन्तना॒ वधः॑॥

राजपुरुषों को हिंसकों से प्रजाजनों को अलग रख शत्रुओं का निवारण कर वा बाँध के धर्म से राज्य का शासन करना चाहिये॥९॥

चि॒त्रं तद्वो॑ मरुतो॒ याम॑ चेकिते॒ पृश्न्या॒ यदूध॒रप्या॒पयो॑ दु॒हुः। यद्वा॑ नि॒दे नव॑मानस्य रुद्रियास्त्रि॒तं जरा॑य जुर॒ताम॑दाभ्याः॥

हे विद्वानो! तुम निन्दा करने योग्य की निन्दा तथा स्तुति करने योग्य की प्रशंसा कर अद्भुत कर्मों को करो, जिससे पूरी आयु भोग वृद्धावस्था पाकर मरण हो, उस अनुष्ठान को करो॥१०॥

तान्वो॑ म॒हो म॒रुत॑ एव॒याव्नो॒ विष्णो॑रे॒षस्य॑ प्रभृ॒थे ह॑वामहे। हिर॑ण्यवर्णान्ककु॒हान्य॒तस्रु॑चो ब्रह्म॒ण्यन्तः॒ शंस्यं॒ राध॑ ईमहे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि परस्पर एक-दूसरे से प्रीति के साथ और दुष्टों में अप्रीति के साथ वर्त्तकर व्यापक ईश्वर की भक्ति में प्रयत्न करें॥११॥

ते दश॑ग्वाः प्रथ॒मा य॒ज्ञमू॑हिरे॒ ते नो॑ हिन्वन्तू॒षसो॒ व्यु॑ष्टिषु। उ॒षा न रा॒मीर॑रु॒णैरपो॑र्णुते म॒हो ज्योति॑षा शुच॒ता गोअ॑र्णसा॥

जो क्रियाकाण्ड में कुशल जितेन्द्रिय जन प्रभातकाल के समान अविन्द्यान्धकार की निवृत्ति करनेवाले मनुष्यों को विद्या और उत्तम शिक्षा से बढ़ाते हैं, वे सबको सत्कार करने योग्य हैं॥१२॥

ते क्षो॒णीभि॑ररु॒णेभि॒र्नाञ्जिभी॑ रु॒द्रा ऋ॒तस्य॒ सद॑नेषु वावृधुः। नि॒मेघ॑माना॒ अत्ये॑न॒ पाज॑सा सुश्च॒न्द्रं वर्णं॑ दधिरे सु॒पेश॑सम्॥

हे मनुष्यो! जैसे पवनों के साथ प्रभात वेला बढ़कर दिन होता और समस्त विविध प्रकार का रूप प्रकट करती है, वैसे तुमको अच्छा अपना रूप धारण कर वायु विद्या का प्रकाश करना चाहिये॥१३॥

ताँ इ॑या॒नो महि॒ वरू॑थमू॒तय॒ उप॒ घेदे॒ना नम॑सा गृणीमसि। त्रि॒तो न यान्पञ्च॒ होतॄ॑न॒भिष्ट॑य आव॒वर्त॒दव॑राञ्च॒क्रियाव॑से॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे कर्मोपासना और ज्ञान विद्या का जाननेवाला अगले-पिछले पवनों को जानकर अपनी और दूसरों की रक्षा के लिये वर्त्तमान है, वैसे हम लोग प्रवृत्त हों॥१४॥

यया॑ र॒ध्रं पा॒रय॒थात्यंहो॒ यया॑ नि॒दो मु॒ञ्चथ॑ वन्दि॒तार॑म्। अ॒र्वाची॒ सा म॑रुतो॒ या व॑ ऊ॒तिरो षु वा॒श्रेव॑ सुम॒तिर्जि॑गातु॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्य जिस क्रिया से अधर्म और निन्दा करनेवाले का त्याग और धर्म वा प्रशंसा करनेवाले का ग्रहण रक्षा बुद्धि की वृद्धि हो, उस क्रिया को निरन्तर करें अर्थात् सदा निन्दा का त्याग और स्तुति का स्वीकार करें॥१५॥इस सूक्त में विद्वान् और पवन के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह चौतीसवाँ सूक्त और इक्कीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

उपे॑मसृक्षि वाज॒युर्व॑च॒स्यां चनो॑ दधीत ना॒द्यो गिरो॑ मे। अ॒पां नपा॑दाशु॒हेमा॑ कु॒वित्स सु॒पेश॑सस्करति॒ जोषि॑ष॒द्धि॥

जो सूर्य जल को खींच और वर्षा कर नदियों को बहाता और अन्नों को उत्पन्न करता, जिसके खाने से प्राणियों को स्वरूपवान् करता है, वह सबको युक्ति के साथ सेवन करने योग्य है॥१॥

इ॒मं स्व॑स्मै हृ॒द आ सुत॑ष्टं॒ मन्त्रं॑ वोचेम कु॒विद॑स्य॒ वेद॑त्। अ॒पां नपा॑दसु॒र्य॑स्य म॒ह्ना विश्वा॑न्य॒र्यो भुव॑ना जजान॥

हे मनुष्यो! जिस जगदीश्वर ने समग्र जगत् बनाया, उसी की स्तुति-प्रार्थना वा उपासना करो॥२॥

सम॒न्या यन्त्युप॑ यन्त्य॒न्याः स॑मा॒नमू॒र्वं न॒द्यः॑ पृणन्ति। तमू॒ शुचिं॒ शुच॑यो दीदि॒वांस॑म॒पां नपा॑तं॒ परि॑ तस्थु॒रापः॑॥

जैसे नदी आप समुद्र को प्राप्त होकर स्थिर और शुद्ध जलवाली होती हैं, जैसे जल मेघमण्डल को प्राप्त होकर दिव्य होते हैं, वैसे स्त्री अभीष्ट पति और पति अभीष्ट स्त्री को पाकर स्थिरचित्त होते हैं॥३॥

तमस्मे॑रा युव॒तयो॒ युवा॑नं मर्मृ॒ज्यमा॑नाः॒ परि॑ य॒न्त्यापः॑। स शु॒क्रेभिः॒ शिक्व॑भी रे॒वद॒स्मे दी॒दाया॑नि॒ध्मो घृ॒तनि॑र्णिग॒प्सु॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे अच्छे प्रकार युवावस्था को प्राप्त युवति स्त्री ब्रह्मचर्य से की विद्या जिन्होंने ऐसे हृदय को प्रिय पूर्ण विद्यावान् युवा पतियों को अच्छे प्रकार परीक्षा कर प्राप्त होती, वैसे पुरुष भी इनको प्राप्त हों, जैसे सूर्य जल को संशोधन कर वृष्टि से सबको सुखी करता है, वैसे अच्छे प्रकार शुद्ध परस्पर प्रीतिमान् विद्वान् विवाह किये हुये स्त्री पुरुष अपने सन्तानों को शुद्ध करने को योग्य हैं॥४॥

अ॒स्मै ति॒स्रो अ॑व्य॒थ्याय॒ नारी॑र्दे॒वाय॑ दे॒वीर्दि॑धिष॒न्त्यन्न॑म्। कृता॑इ॒वोप॒ हि प्र॑स॒र्स्रे अ॒प्सु स पी॒यूषं॑ धयति पूर्व॒सूना॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। तीन प्रकार की निश्चय स्त्रियाँ होती हैं, जो समान पतियोंवाली होकर विधवा हों, तो सन्तानों की उत्पत्ति के लिये अपने समान पुरुषों से वीर्य लेकर धर्म से सन्तानों को उत्पन्न करें। जो सन्तानों की विशेष इच्छा न हो तो ब्रह्मचर्य में स्थिर हों॥५॥

अश्व॒स्यात्र॒ जनि॑मा॒स्य च॒ स्व॑र्द्रु॒हो रि॒षः सं॒पृचः॑ पाहि सू॒रीन्। आ॒मासु॑ पू॒र्षु प॒रो अ॑प्रमृ॒ष्यं नारा॑तयो॒ वि न॑श॒न्नानृ॑तानि॥

जिस कुल के बीच बड़े महात्मा जन उत्पन्न होते हैं, वहाँ सुख बढ़ता है और जहाँ शरीर और आत्मा के बलयुक्त मनुष्य हों, वहाँ शत्रुजन पीड़ा नहीं कर सकते हैं और बलवान् पुरुष झूँठ अधर्मयुक्त कामों का उत्साह नहीं करते हैं॥६॥

स्व आ दमे॑ सु॒दुघा॒ यस्य॑ धे॒नुः स्व॒धां पी॑पाय सु॒भ्वन्न॑मत्ति। सो अ॒पां नपा॑दू॒र्जय॑न्न॒प्स्व१॒॑न्तर्व॑सु॒देया॑य विध॒ते वि भा॑ति॥

जो मनुष्य अपने सम्बन्धियों में कामों की परिपूर्णता के लिये सुन्दर शिक्षित वाणी सुन्दर शुधा हुआ जल और सुन्दर संस्कार किये हुए अन्नों की सेवा करते सुन्दर शिक्षित सेवक के लिये यथायोग्य वस्तु देते और काल पर सब व्यवहारों को सेवते हैं, वे सदा सुखी रहते हैं॥७॥

यो अ॒प्स्वा शुचि॑ना॒ दैव्ये॑न ऋ॒तावाज॑स्र उर्वि॒या वि॒भाति॑। व॒या इद॒न्या भुव॑नान्यस्य॒ प्र जा॑यन्ते वी॒रुध॑श्च प्र॒जाभिः॑॥

जो पवित्र बुद्धि दिव्य कर्म करनेवाले निरन्तर सृष्टिक्रम को जानते हैं, वे सदा आनन्दित होते हैं॥८॥

अ॒पां नपा॒दा ह्यस्था॑दु॒पस्थं॑ जि॒ह्माना॑मू॒र्ध्वो वि॒द्युतं॒ वसा॑नः। तस्य॒ ज्येष्ठं॑ महि॒मानं॒ वह॑न्ती॒र्हिर॑ण्यवर्णाः॒ परि॑ यन्ति य॒ह्वीः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पवन की महिमा को नदियाँ प्राप्त होती हैं, वैसे विद्वान् जन राजा के प्रति वर्त्तें॥९॥

हिर॑ण्यरूपः॒ स हिर॑ण्यसंदृग॒पां नपा॒त्सेदु॒ हिर॑ण्यवर्णः। हि॒र॒ण्यया॒त्परि॒ योने॑र्नि॒षद्या॑ हिरण्य॒दा द॑द॒त्यन्न॑मस्मै॥

जो अग्नि पवन से उत्पन्न हुआ समस्त पदार्थों को दिखानेवाला सब पदार्थों के भीतर रहता हुआ सर्वविद्याओं का निमित्त है, उसको जानकर प्रयोजन सिद्ध करना चाहिये॥१०॥

तद॒स्यानी॑कमु॒त चारु॒ नामा॑पी॒च्यं॑ वर्धते॒ नप्तु॑र॒पाम्। यमि॒न्धते॑ युव॒तयः॒ समि॒त्था हिर॑ण्यवर्णं घृ॒तमन्न॑मस्य॥

हे मनुष्यो! जैसे युवतिजन युवा पुरुष को प्राप्त होकर पुत्र और पौत्रों से बढ़ती है और जो अग्निविद्या को जानते हैं, वे धन धान्यों से बढ़ते हैं॥११॥

अ॒स्मै ब॑हू॒नाम॑व॒माय॒ सख्ये॑ य॒ज्ञैर्वि॑धेम॒ नम॑सा ह॒विर्भिः॑। सं सानु॒ मार्ज्मि॒ दिधि॑षामि॒ बिल्मै॒र्दधा॒म्यन्नैः॒ परि॑ वन्द ऋ॒ग्भिः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मनुष्य बहुतों में से अपने मित्र को तृप्त करते हैं वा उसके लिये अन्नपानादि देते हैं, परस्पर हित का उपदेश करते हैं, वैसे सब भी इतनी विद्याओं को प्राप्त होकर औरों क प्रति उपदेश करें तथा ऐश्वर्य को होके औरों के लिये दें॥१२॥

स ईं॒ वृषा॑जनय॒त्तासु॒ गर्भं॒ स ईं॒ शिशु॑र्धयति॒ तं रि॑हन्ति। सो अ॒पां नपा॒दन॑भिम्लातवर्णो॒ऽन्यस्ये॑वे॒ह त॒न्वा॑ विवेष॥

जो पुरुष अपनी स्त्री में गर्भ धारण कर सन्तान को उत्पन्न वा पालन कर और स्वादिष्ट अन्न खाय शरीर की प्रसन्नाकृति से चेष्टा करते हैं, वे इस संसार में सुखों को प्राप्त होते हैं॥१३॥

अ॒स्मिन्प॒दे प॑र॒मे त॑स्थि॒वांस॑मध्व॒स्मभि॑र्वि॒श्वहा॑ दीदि॒वांस॑म्। आपो॒ नप्त्रे॑ घृ॒तमन्नं॒ वह॑न्तीः स्व॒यमत्कैः॒ परि॑ दीयन्ति य॒ह्वीः॥

जो मनुष्य प्रतिदिन सच्चिदानन्दस्वरूप अपने में स्थित ईश्वर का ध्यान करते हैं, वे परमपद ब्रह्म को प्राप्त होकर आनन्द को प्राप्त होते हैं और उत्तम सुख प्राप्ति से शीघ्र क्षीण नहीं होते॥१४॥

अयां॑समग्ने सुक्षि॒तिं जना॒यायां॑समु म॒घव॑द्भ्यः सुवृ॒क्तिम्। विश्वं॒ तद्भ॒द्रं यदव॑न्ति दे॒वा बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

जो जन धर्म के अनुकूल आचरण करनेवालों की अच्छे प्रकार रक्षा और दुष्टों को दण्ड दे जगत् के कल्याण के लिये बड़े-बड़े उत्तम कर्मों को करें, वे सबको सर्वदा सत्कार करने योग्य हैं॥१५॥इस सूक्त में अग्नि मेघ अपत्य विवाह और विद्वान् के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये॥यह ३५ पैंतीसवाँ सूक्त और २४ चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

तुभ्यं॑ हिन्वा॒नो व॑सिष्ट॒ गा अ॒पोऽधु॑क्षन्त्सी॒मवि॑भि॒रद्रि॑भि॒र्नरः॑। पिबे॑न्द्र॒ स्वाहा॒ प्रहु॑तं॒ वष॑ट्कृतं हो॒त्रादा सोमं॑ प्रथ॒मो य ईशि॑षे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो यज्ञानुष्ठान से जल को शुद्ध कर उससे उत्पन्न हुए ओषधियों के रस को पीकर धर्म के अनुष्ठान से ऐश्वर्य अपने या औरों के लिये बढ़ाते हैं, वे सब ओर से बढ़ते हैं॥१॥

य॒ज्ञैः संमि॑श्लाः॒ पृष॑तीभिर्ऋ॒ष्टिभि॒र्याम॑ञ्छु॒भ्रासो॑ अ॒ञ्जिषु॑ प्रि॒या उ॒त। आ॒सद्या॑ ब॒र्हिर्भ॑रतस्य सूनवः पो॒त्रादा सोमं॑ पिबता दिवो नरः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे पवन अन्तरिक्ष में भ्रमते हुए सब प्राणियों को जिलाते हैं, और प्राणस्वरूप से प्यारे हैं तथा सबसे रस ऊपर को पहुँचा और वर्षा कर सबको आनन्दित करते हैं, वैसे मनुष्यों को होना चाहिये॥२॥

अ॒मेव॑ नः सुहवा॒ आ हि गन्त॑न॒ नि ब॒र्हिषि॑ सदतना॒ रणि॑ष्टन। अथा॑ मन्दस्व जुजुषा॒णो अन्ध॑स॒स्त्वष्ट॑र्दे॒वेभि॒र्जनि॑भिः सु॒मद्ग॑णः॥

जैसे अन्तरिक्ष में स्थित पवन सबको प्राप्त होते और छोड़ते हैं, वैसे विद्वान् धार्मिक जन धर्म को प्राप्त हों तथा दुष्टजन अधर्म को त्याग करें और सत्य का उपदेश दें॥३॥

आ व॑क्षि दे॒वाँ इ॒ह वि॑प्र॒ यक्षि॑ चो॒शन्हो॑त॒र्नि ष॑दा॒ योनि॑षु त्रि॒षु। प्रति॑ वीहि॒ प्रस्थि॑तं सो॒म्यं मधु॒ पिबाग्नी॑ध्रा॒त्तव॑ भा॒गस्य॑ तृप्णुहि॥

जो मनुष्य कर्मोपासना और ज्ञानों में प्रयत्न कर सत्य की कामना करते हुए मनुष्यों को अध्यापन और उपदेश से विद्वान् करते हैं, वे नित्य सुख को प्राप्त होते हैं॥४॥

ए॒ष स्य ते॑ त॒न्वो॑ नृम्ण॒वर्ध॑नः॒ सह॒ ओजः॑ प्र॒दिवि॑ बा॒ह्वोर्हि॒तः। तुभ्यं॑ सु॒तो म॑घव॒न्तुभ्य॒माभृ॑त॒स्त्वम॑स्य॒ ब्राह्म॑णा॒दा तृ॒पत्पि॑ब॥

हे मनुष्यो! जो तुम्हारे के लिये शारीरिक और आत्मीय बल को बढ़ावे, उससे धन और उनकी अच्छे पदार्थों से सेवा करो॥५॥

जु॒षेथां॑ य॒ज्ञं बोध॑तं॒ हव॑स्य मे स॒त्तो होता॑ नि॒विदः॑ पू॒र्व्या अनु॑। अच्छा॒ राजा॑ना॒ नम॑ एत्या॒वृतं॑ प्रशा॒स्त्रादा पि॑बतं सो॒म्यं मधु॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे पढ़ाने वा उपदेश करनेवाले आप लोगों के प्रति प्रीति से विद्यादान और सत्योपदेश के साथ वर्त्तमान हैं, वैसे आप भी वर्त्तें॥६॥इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये॥यह छत्तीसवाँ सूक्त पच्चीसवाँ वर्ग और सप्तमाध्याय समाप्त हुआ॥

मन्द॑स्व हो॒त्रादनु॒ जोष॒मन्ध॒सोऽध्व॑र्यवः॒ स पू॒र्णां व॑ष्ट्या॒सिच॑म्। तस्मा॑ ए॒तं भ॑रत तद्व॒शो द॒दिर्हो॒त्रात्सोमं॑ द्रविणोदः॒ पिब॑ ऋ॒तुभिः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को परस्पर के लिये विद्या धन और धान्य आदि पदार्थ देकर निरन्तर आनन्द करना चाहिये॥१॥

यमु॒ पूर्व॒महु॑वे॒ तमि॒दं हु॑वे॒ सेदु॒ हव्यो॑ द॒दिर्यो नाम॒ पत्य॑ते। अ॒ध्व॒र्युभिः॒ प्रस्थि॑तं सो॒म्यं मधु॑ पो॒त्रात्सोमं॑ द्रविणोदः॒ पिब॑ ऋ॒तुभिः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो अविद्वान् पुरुष विद्वानों के साथ सङ्गति कर अन्न पान आदि की अच्छी परीक्षा करके उसको सेवते हैं, वे सुखी होते हैं॥२॥

मेद्य॑न्तु ते॒ वह्न॑यो॒ येभि॒रीय॒सेऽरि॑षण्यन्वीळयस्वा वनस्पते। आ॒यूया॑ धृष्णो अभि॒गूर्या॒ त्वं ने॒ष्ट्रात्सोमं॑ द्रविणोदः॒ पिब॑ ऋ॒तुभिः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। किसी को बिना उद्यम के न रहना चाहिये और ऋतुओं के प्रति अनुकूल व्यवहार करके सुख बढ़ाना चाहिये॥३॥

अपा॑द्धो॒त्रादु॒त पो॒त्राद॑मत्तो॒त ने॒ष्ट्राद॑जुषत॒ प्रयो॑ हि॒तम्। तु॒रीयं॒ पात्र॒ममृ॑क्त॒मम॑र्त्यं द्रविणो॒दाः पि॑बतु द्रविणोद॒सः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो हवन और अपवित्र को पवित्र करनेवाली प्राप्ति से हित साध सकते हैं, वे प्रीतिमान् होते हैं॥४॥

अ॒र्वाञ्च॑म॒द्य य॒य्यं॑ नृ॒वाह॑णं॒ रथं॑ युञ्जाथामि॒ह वां॑ वि॒मोच॑नम्। पृ॒ङ्क्तं ह॒वींषि॒ मधु॒ना हि कं॑ ग॒तमथा॒ सोमं॑ पिबतं वाजिनीवसू॥

जो शिल्प विद्या के पढ़ाने और पढ़नेवाले काष्ठादिकों से निर्माण किये यानों को अग्नि और जलादि से चला और देशान्तर में जाकर धन को अच्छे प्रकार उन्नत करते हैं, वे निरन्तर सुख पाते हैं॥५॥

जोष्य॑ग्ने स॒मिधं॒ जोष्याहु॑तिं॒ जोषि॒ ब्रह्म॒ जन्यं॒ जोषि॑ सुष्टु॒तिम्। विश्वे॑भि॒र्विश्वाँ॑ ऋ॒तुना॑ वसो म॒ह उ॒शन्दे॒वाँ उ॑श॒तः पा॑यया ह॒विः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे बिजली रूप अग्नि काष्ठ आदि पदार्थों का सेवन करके भी नहीं जलाता, वैसे ही सबके साथ बसकर उनका नाश न करना चाहिये, ऐसे होने पर काम सिद्धि होती है॥६॥इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सैंतीसवाँ सूक्त और प्रथम वर्ग समाप्त हुआ॥

उदु॒ ष्य दे॒वः स॑वि॒ता स॒वाय॑ शश्वत्त॒मं तद॑पा॒ वह्नि॑रस्थात्। नू॒नं दे॒वेभ्यो॒ वि हि धाति॒ रत्न॒मथाभ॑जद्वी॒तिहो॑त्रं स्व॒स्तौ॥

हे मनुष्यो! जो अनादि त्रिगुणात्मक प्रकृतिस्वरूप जगत् का कारण है, उसी से सब जगत् को उत्पन्न कर जो धारण कर रहा है, उससे सब जीव निज-निज शरीर और कर्म को सेवते हैं, जो इस जगत् को जगदीश्वर न उत्पादन करे तो कोई भी जीव शरीरादि न पा सके॥१॥

विश्व॑स्य॒ हि श्रु॒ष्टये॑ दे॒व ऊ॒र्ध्वः प्र बा॒हवा॑ पृ॒थुपा॑णिः॒ सिस॑र्ति। आप॑श्चिदस्य व्र॒त आ निमृ॑ग्रा अ॒यं चि॒द्वातो॑ रमते॒ परि॑ज्मन्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो परमेश्वर भूमि, जल, अग्नि और पवनों को न बनाता तो कुछ भी अपने आप उत्पन्न न हो सके॥२॥

आ॒शुभि॑श्चि॒द्यान्वि मु॑चाति नू॒नमरी॑रम॒दत॑मानं चि॒देतोः॑। अ॒ह्यर्षू॑णां चि॒न्न्य॑याँ अवि॒ष्यामनु॑ व्र॒तं स॑वि॒तुर्मोक्यागा॑त्॥

यदि ईश्वर नियम से पृथिवी को न घुमावे तो सुख देनेवाली रात्रि न सिद्ध हो, पृथिवी में जितना देश सूर्य के निकट होता है, उसमें दिन और दूसरे में रात्रि, ये दोनों निरन्तर वर्त्तमान हैं॥३॥

पुनः॒ सम॑व्य॒द्वित॑तं॒ वय॑न्ती म॒ध्या कर्तो॒र्न्य॑धा॒च्छक्म॒ धीरः॑। उत्सं॒हाया॑स्था॒द्व्यृ१॒॑तूँर॑दर्धर॒रम॑तिः सवि॒ता दे॒व आगा॑त्॥

हे मनुष्यो! ये सब लोक अन्तरिक्ष में ठहरे हुए भ्रमणशील ईश्वर ने नियम को पहुँचाये हुए हैं, उनमें सूर्य के सन्निकट और भ्रमण से छः ऋतु होते हैं, यह जानना चाहिये॥४॥

नानौकां॑सि॒ दुर्यो॒ विश्व॒मायु॒र्वि ति॑ष्ठते प्रभ॒वः शोको॑ अ॒ग्नेः। ज्येष्ठं॑ मा॒ता सू॒नवे॑ भा॒गमाधा॒दन्व॑स्य॒ केत॑मिषि॒तं स॑वि॒त्रा॥

हे मनुष्यो! जो तुम्हारे जन्म हुए तो मरण भी होगा इसके बीच सब ऋतुओं में सुख देनेवाले घरों को बनाकर विद्यावृद्धि के लिये पाठशालायें बनाये, अपने कन्या और पुत्रों को विद्या और उत्तम शिक्षायुक्त कर पूर्ण आयु को भोग के यश का विस्तार करना चाहिये॥५॥

स॒माव॑वर्ति॒ विष्ठि॑तो जिगी॒षुर्विश्वे॑षां॒ काम॒श्चर॑ताम॒माभू॑त्। शश्वाँ॒ अपो॒ विकृ॑तं हि॒त्व्यागा॒दनु॑ व्र॒तं स॑वि॒तुर्दैव्य॑स्य॥

जो मनुष्य सब प्राणियों में सुख-दुःख के व्यवहार में समदर्शी परमेश्वर के उपदेश से विरोध न करनेवाले और पापाचरण को छोड़ निश्चित धर्माचरण को करते हैं, वे निरन्तर सुख को प्राप्त होते हैं॥६॥

त्वया॑ हि॒तमप्य॑म॒प्सु भा॒गं धन्वान्वा मृ॑ग॒यसो॒ वि त॑स्थुः। वना॑नि॒ विभ्यो॒ नकि॑रस्य॒ तानि॑ व्र॒ता दे॒वस्य॑ सवि॒तुर्मि॑नन्ति॥

यदि ईश्वर भूमि आदि स्थान तथा भोग्य-पेय-चूष्य-लेह्य पदार्थों को न बनावे तो कोई भी शरीर और जीवन को धारण नहीं कर सकता, ईश्वर ने जिनके अर्थ जो नियम स्थापन किये हैं, उसके उल्लङ्घन करने को कोई समर्थ नहीं होता॥७॥

या॒द्रा॒ध्यं१॒॑ वरु॑णो॒ योनि॒मप्य॒मनि॑शितं नि॒मिषि॒ जर्भु॑राणः। विश्वो॑ मार्ता॒ण्डो व्र॒जमा प॒शुर्गा॑त्स्थ॒शो जन्मा॑नि सवि॒ता व्याकः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जितने इस जगत् में जीव हैं, वे अपने कर्मजन्य फल को विद्यमान शरीर में और पीछे भी प्राप्त होते हैं। जैसे पशु गोपाल से नियम में रखा हुआ प्राप्तव्य स्थान को प्राप्त होता है, वैसे जगदीश्वर जीवों से अनुष्ठित कर्मों के अनुसार सुख-दुःख और निकृष्ट-मध्यम तथा उत्तम जन्मों को देता है॥८॥

न यस्येन्द्रो॒ वरु॑णो॒ न मि॒त्रो व्र॒तम॑र्य॒मा न मि॒नन्ति॑ रु॒द्रः। नारा॑तय॒स्तमि॒दं स्व॒स्ति हु॒वे दे॒वं स॑वि॒तारं॒ नमो॑भिः॥

इस संसार में कोई पदार्थ ईश्वर के तुल्य नहीं है तो अधिक कैसे हो और कोई भी इसके नियम का उल्लङ्घन नहीं कर सकता है, इस कारण सब मनुष्यों को उसी ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना और उपासना करना चाहिये॥९॥

भगं॒ धियं॑ वा॒जय॑न्तः॒ पुर॑न्धिं॒ नरा॒शंसो॒ ग्नास्पति॑र्नो अव्याः। आ॒ये वा॒मस्य॑ संग॒थे र॑यी॒णां प्रि॒या दे॒वस्य॑ सवि॒तुः स्या॑म॥

हे मनुष्यो! सबकी रक्षा और धारण करनेवाले प्रशंसित सबके स्वामी परमेश्वर की उपासना कर उसकी आज्ञा के आचरण से उसके प्यारे तुम होओ॥१०॥

अ॒स्मभ्यं॒ तद्दि॒वो अ॒द्भ्यः पृ॑थि॒व्यास्त्वया॑ द॒त्तं काम्यं॒ राध॒ आ गा॑त्। शं यत्स्तो॒तृभ्य॑ आ॒पये॒ भवा॑त्युरु॒शंसा॑य सवितर्जरि॒त्रे॥

परमेश्वर ने प्रकृति से महत्तत्त्व, महत्तत्त्व से अहंकार, अहंकार से पञ्चतन्मात्रा, पञ्चतन्मात्राओं से एकादश इन्द्रियाँ और स्थूल पञ्चभूत और ओषधियाँ बनाईं, जिनसे सब प्राणियों का सुख होता है॥११॥इस सूक्त में ईश्वर, सूर्य, और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये॥यह अड़तीसवाँ सूक्त और तीसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

ग्रावा॑णेव॒ तदिदर्थं॑ जरेथे॒ गृध्रे॑व वृ॒क्षं नि॑धि॒मन्त॒मच्छ॑। ब्र॒ह्माणे॑व वि॒दथ॑ उक्थ॒शासा॑ दू॒तेव॒ हव्या॒ जन्या॑ पुरु॒त्रा॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो वह्नि आदि पदार्थ मेघ वा पक्षियों तथा विद्वानों और दूत के समान कार्य्यसिद्धि करनेवाले हैं, उनको जानके प्रयोजनों को सिद्ध करना चाहिये॥१॥

प्रा॒त॒र्यावा॑णा र॒थ्ये॑व वी॒राऽजेव॑ य॒मा वर॒मा स॑चेथे। मेने॑इव त॒न्वा॒३॒॑ शुम्भ॑माने॒ दम्प॑तीव क्रतु॒विदा॒ जने॑षु॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को जैसे सुशिक्षित घोड़ेवाले एक यान में स्थिर होके बकरों के समान वीरता का प्रकाश कर पक्षियों वा स्त्री-पुरुषों के समान शोभा को प्राप्त होते और अच्छे कर्मों को उत्पन्न कराते हैं, वैसे सूर्य और भूमि सबका उपकार करनेवाले वर्त्तमान हैं, यह जानना चाहिये॥२॥

शृङ्गे॑व नः प्रथ॒मा ग॑न्तम॒र्वाक्छ॒फावि॑व॒ जर्भु॑राणा॒ तरो॑भिः। च॒क्र॒वा॒केव॒ प्रति॒ वस्तो॑रुस्रा॒ऽर्वाञ्चा॑ यातं र॒थ्ये॑व शक्रा॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। यदि अग्नि-वायु शिल्प कार्यों में संयुक्त किये जावें तो बहुत कार्य्यों को सिद्ध करें॥३॥

ना॒वेव॑ नः पारयतं यु॒गेव॒ नभ्ये॑व न उप॒धीव॑ प्र॒धीव॑। श्वाने॑व नो॒ अरि॑षण्या त॒नूनां॒ खृग॑लेव वि॒स्रसः॑ पातम॒स्मान्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। कोई भी सृष्टि के पदार्थों के गुण, कर्म और स्वभावों को न जान के पूर्ण विद्यावाला नहीं होता है, इससे सृष्टि की विद्याओं का अच्छे प्रकार प्रचार करना चाहिये॥४॥

वाते॑वाजु॒र्या न॒द्ये॑व री॒तिर॒क्षीइ॑व॒ चक्षु॒षा या॑तम॒र्वाक्। हस्ता॑विव त॒न्वे॒३॒॑ शंभ॑विष्ठा॒ पादे॑व नो नयतं॒ वस्यो॒ अच्छ॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे शरीर के अङ्ग अपने-अपने काम में प्रवर्त्तमान शरीर की रक्षा करते हैं, वैसे वायु आदि पदार्थ सबकी रक्षा करते हैं, यह जानना चाहिये॥५॥

ओष्ठा॑विव॒ मध्वा॒स्ने वद॑न्ता॒ स्तना॑विव पिप्यतं जी॒वसे॑ नः। नासे॑व नस्त॒न्वो॑ रक्षि॒तारा॒ कर्णा॑विव सु॒श्रुता॑ भूतम॒स्मे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो अध्यापक जिह्वा से रस के समान, स्तनों से दुग्ध के समान, नासिका से गन्ध के तुल्य, कान से शब्द के समान समस्त विद्याओं को प्रत्यक्ष कराते हैं, वे जगत्पूज्य होते हैं॥६॥

हस्ते॑व श॒क्तिम॒भि सं॑द॒दी नः॒ क्षामे॑व नः॒ सम॑जतं॒ रजां॑सि। इ॒मा गिरो॑ अश्विना युष्म॒यन्तीः॒ क्ष्णोत्रे॑णेव॒ स्वधि॑तिं॒ सं शि॑शीतम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वानो! जो हाथ की क्रिया को करनेवाले पृथिवी के समान ऐश्वर्य देने अच्छी शिक्षित वाणी के समान पदार्थों को बताने तीक्ष्ण वज्र के समान दारिद्र्य और दुःख का विनाश करनेवाले अग्न्यादि पदार्थ हैं, उनको आज हम लोगों को ग्रहण कराओ॥७॥

ए॒तानि॑ वामश्विना॒ वर्ध॑नानि॒ ब्रह्म॒ स्तोमं॑ गृत्सम॒दासो॑ अक्रन्। तानि॑ नरा जुजुषा॒णोप॑ यातं बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

जो मनुष्य विद्वानों का अनुकरण करें तो वे महात्मा होवें॥८॥इस सूक्त में वायु और अग्नि आदि पदार्थ वा विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह उनतालीसवाँ सूक्त और पाचवाँ वर्ग पूरा हुआ॥

सोमा॑पूषणा॒ जन॑ना रयी॒णां जन॑ना दि॒वो जन॑ना पृथि॒व्याः। जा॒तौ विश्व॑स्य॒ भुव॑नस्य गो॒पौ दे॒वा अ॑कृण्वन्न॒मृत॑स्य॒ नाभि॑म्॥

मनुष्यों को प्रकाश पृथिवी और धनों के निमित्त होकर सबकी रक्षा करनेवाले परमात्मा का विज्ञान करानेवाले प्राण और अपान वर्त्तमान हैं, यह जानना चाहिये॥१॥

इ॒मौ दे॒वौ जाय॑मानौ जुषन्ते॒मौ तमां॑सि गूहता॒मजु॑ष्टा। आ॒भ्यामिन्द्रः॑ प॒क्वमा॒मास्व॒न्तः सो॑मापू॒षभ्यां॑ जनदु॒स्रिया॑सु॥

जो अग्नि सबके भीतर स्थित प्रकाशकारक है, वह जिन चन्द्रमा और ओषधिगणों के बिना अकिंचित् कर होता अर्थात् संसार का सुख करनेवाला नहीं होता, उनको जान कार्य्यसिद्धि करनी चाहिये॥२॥

सोमा॑पूषणा॒ रज॑सो वि॒मानं॑ स॒प्तच॑क्रं॒ रथ॒मवि॑श्वमिन्वम्। वि॒षू॒वृतं॒ मन॑सा यु॒ज्यमा॑नं॒ तं जि॑न्वथो वृषणा॒ पञ्च॑रश्मिम्॥

मनुष्यों को चाहिये कि अन्तरिक्ष में गमन करानेवाले सात कलायन्त्र घुमाने के जिसमें निमित्त, ऐसे शीघ्र गमन करानेवाले रथ को बनाकर सुख पावें॥३॥

दि॒व्य१॒॑न्यः सद॑नं च॒क्र उ॒च्चा पृ॑थि॒व्याम॒न्यो अध्य॒न्तरि॑क्षे। ताव॒स्मभ्यं॑ पुरु॒वारं॑ पुरु॒क्षुं रा॒यस्पोषं॒ वि ष्य॑तां॒ नाभि॑म॒स्मे॥

अग्नि के तीन स्थान हैं, एक ऊपर आकाश में दूसरा पृथिवी में और तीसरा बीच में, उन तीनों में सूर्य्यरूप से अन्तरिक्ष में, निकट स्थित प्रत्यक्ष पृथिवी में और गुप्त अन्तरिक्ष में वर्त्तमान है, उस अग्नि को मनुष्य जानें॥४॥

विश्वा॑न्य॒न्यो भुव॑ना ज॒जान॒ विश्व॑म॒न्यो अ॑भि॒चक्षा॑ण एति। सोमा॑पूषणा॒वव॑तं॒ धियं॑ मे यु॒वाभ्यां॒ विश्वाः॒ पृत॑ना जयेम॥

जो वायु सब लोकों को धरता और जो शब्द प्रयोग वा श्रवण का निमित्त है, उसके विज्ञान कराने से सब मनुष्यों की उन्नति करनी चाहिये॥५॥

धियं॑ पू॒षा जि॑न्वतु विश्वमि॒न्वो र॒यिं सोमो॑ रयि॒पति॑र्दधातु। अव॑तु दे॒व्यदि॑तिरन॒र्वा बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

हे मनुष्यो! जैसे सब पदार्थ धन बुद्धि आरोग्यता और आयु के बढ़ानेवाले हों, वैसे विधान करो, जिससे सब मनुष्य बहुत सुख को प्राप्त होवें॥६॥इस सूक्त में प्राण अपान अग्नि वायु और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये॥यह चालीसवाँ सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ॥

वायो॒ ये ते॑ सह॒स्रिणो॒ रथा॑स॒स्तेभि॒रा ग॑हि। नि॒युत्वा॒न्त्सोम॑पीतये॥

पवन के असंख्य जो वेग आदि कर्म हैं, उनको जानके इधर-उधर मनुष्यों को जाना-आना चाहिये॥१॥

नि॒युत्वा॑न्वाय॒वा ग॑ह्य॒यं शु॒क्रो अ॑यामि ते। गन्ता॑सि सुन्व॒तो गृ॒हम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे पवन नियम से सर्वत्र जाते हैं, वैसे नियमयुक्त कर्मों को कर सुखों को प्राप्त होना चाहिये॥२॥

शु॒क्रस्या॒द्य गवा॑शिर॒ इन्द्र॑वायू नि॒युत्व॑तः। आ या॑तं॒ पिब॑तं नरा॥

जैसे बिजुली और पवन सर्वत्र अभिव्याप्त और सब जगत् की रक्षा करते हैं, वैसे उत्तम काम कर और शुद्ध जल पीके आरोग्यपन और सबकी उन्नति करनी चाहिये॥३॥

अ॒यं वां॑ मित्रावरुणा सु॒तः सोम॑ ऋतावृधा। ममेदि॒ह श्रु॑तं॒ हव॑म्॥

जैसे वायु सबसे रस को ग्रहण कर वर्षाते हैं, वैसे ही सत्य विद्याओं को सुनकर सबके लिये सुख देना चाहिये॥४॥

राजा॑ना॒वन॑भिद्रुहा ध्रु॒वे सद॑स्युत्त॒मे। स॒हस्र॑स्थूण आसाते॥

हे मनुष्यो! वे ही राजा और प्रधान पुरुष धन्यवाद के योग्य होते हैं, जो गुणयुक्त उत्तम सभा में बैठके किसी का पक्षपात कभी न करें॥५॥

ता स॒म्राजा॑ घृ॒तासु॑ती आदि॒त्या दानु॑न॒स्पती॑। सचे॑ते॒ अन॑वह्वरम्॥

हे मनुष्यो! जो सूर्य्य चन्द्रमा सबका प्रकाश करने वा जल के देनेवाले सबके अनुसङ्गी सीधे मार्ग से जाते हैं, वैसे शुद्ध मार्ग में जाओ॥६॥

गोम॑दू॒ षु ना॑स॒त्याऽश्वा॑वद्यातमश्विना। व॒र्ती रु॑द्रा नृ॒पाय्य॑म्॥

मनुष्य यदि वायु और अग्नि के यान से यहाँ-वहाँ जावें, तो परिमित सुख पावें॥७॥

न यत्परो॒ नान्त॑र आद॒धर्ष॑द्वृषण्वसू। दुः॒शंसो॒ मर्त्यो॑ रि॒पुः॥

इस जगत् में वायु और अग्नि को कोई भी लचाय नहीं सकता और न इनका कोई शत्रु के समान नाश करनेवाला है, उस प्रकार से नहीं पराजित होने योग्य मनुष्यों को होना चाहिये॥८॥

ता न॒ आ वो॑ळ्हमश्विना र॒यिं पि॒शङ्ग॑संदृशम्। धिष्ण्या॑ वरिवो॒विद॑म्॥

मनुष्यों को चाहिये कि जिन अग्नि और वायु से पुष्कल धन को प्राप्त होते हैं, उनको यथावत् जानें॥९॥

इन्द्रो॑ अ॒ङ्ग म॒हद्भ॒यम॒भी षदप॑ चुच्यवत्। स हि स्थि॒रो विच॑र्षणिः॥

यदि ब्रह्माण्ड में सूर्य न हो तो किसी का भय न निवृत्त हो, यदि सूर्यलोक अपनी परिधि में स्थिर और दिखानेवाला न हो तो तुल्य आकर्षण और देखना न बने॥१०॥

इन्द्र॑श्च मृ॒ळ्या॑ति नो॒ न नः॑ प॒श्चाद॒घं न॑शत्। भ॒द्रं भ॑वाति नः पु॒रः॥

जो जगदीश्वर घटपटादिकों को जैसे सूर्य वैसे सबके आत्माओं को प्रकाशित करता है, जो उसके भक्त हैं, वे उससे भिन्न की उसके स्थान में नहीं उपासना करते हैं, वे सर्वव्यापक परमेश्वर को जान और वह हमें निरन्तर देखता है ऐसा मानकर अधर्माचरण नहीं करते हैं किन्तु निरन्तर धर्म ही का अनुष्ठान करते हैं, उनके आगामी पापाचरण की निवृत्ति और योगज सिद्धि विज्ञान के होने से मुक्ति होवे ही गी, औरों की नहीं, यह निश्चय है॥११॥

इन्द्र॒ आशा॑भ्य॒स्परि॒ सर्वा॑भ्यो॒ अभ॑यं करत्। जे॒ता शत्रू॒न् विऽच॑र्षणिः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पक्षपातरहित वीरपुरुष दुष्टाचारी और औरों के लिये भय देनेवालों को निवार के प्रजाओं को सुखयुक्त करते हैं, वैसे उपासना किया हुआ सर्वज्ञ ईश्वर सब ओर से दुष्टाचरण से निवृत्त कर श्रेष्ठाचार में प्रवृत्त कर अभय मुक्तिपद को प्राप्त करा कर सब मुक्त जीवों को आनन्दित करता है, इस कारण वही सबको उपासना करने योग्य है॥१२॥

विश्वे॑ देवास॒ आ ग॑त शृणु॒ता म॑ इ॒मं हव॑म्। एदं ब॒र्हिर्नि षी॑दत॥

विद्यार्थी जन पढ़ानेवालों से यह कहें कि आप यहाँ आइये, सर्वोत्तम आसन पर बैठ के हमने जो शास्त्र पढ़े, उनमें परीक्षा कीजिये॥१३॥

ती॒व्रो वो॒ मधु॑माँ अ॒यं शु॒नहो॑त्रेषु मत्स॒रः। ए॒तं पि॑बत॒ काम्य॑म्॥

जो विज्ञान वृद्धों की सेवा करते हैं, वे तीव्रबुद्धि हुए विद्वान् होते हैं॥१४॥

इन्द्र॑ज्येष्ठा॒ मरु॑द्गणा॒ देवा॑सः॒ पूष॑रातयः। विश्वे॒ मम॑ श्रुता॒ हव॑म्॥

जो विद्यादि गुणों में प्रधान पुरुष का सत्कार करते विद्या देते और दूसरों से लेते हैं, वे परीक्षक होके औरों को विद्वान् करते हैं॥१५॥

अम्बि॑तमे॒ नदी॑तमे॒ देवि॑तमे॒ सर॑स्वति। अ॒प्र॒श॒स्ताइ॑व स्मसि॒ प्रश॑स्तिमम्ब नस्कृधि॥

जितनी कुमारी हैं, वे विदुषियों से विद्या अध्ययन करें और वे कुमारी ब्रह्मचारिणी विदुषियों की ऐसी प्रार्थना करें कि आप हम सबों को विद्या और सुशिक्षा से युक्त करें॥१६॥

त्वे विश्वा॑ सरस्वति श्रि॒तायूं॑षि दे॒व्याम्। शु॒नहो॑त्रेषु मत्स्व प्र॒जां दे॑वि दिदिड्ढि नः॥

सब विद्वान् जन अपनी-अपनी विदुषी स्त्रियों के प्रति ऐसा उपदेश देवें कि तुमको सबकी कन्यायें पढ़ानी चाहिये और सबकी स्त्री अच्छे प्रकार सिखानी चाहिये॥१७॥

इ॒मा ब्रह्म॑ सरस्वति जु॒षस्व॑ वाजिनीवति। या ते॒ मन्म॑ गृत्सम॒दा ऋ॑तावरि प्रि॒या दे॒वेषु॒ जुह्व॑ति॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् पुरुष कुमार ब्रह्मचारियों को अच्छी शिक्षा से पढ़ावें, वैसे विदुषी स्त्रियाँ कुमारी ब्रह्मचारिणी स्त्रियों को अच्छी शिक्षा से पढ़ावें॥१८॥

प्रेतां॑ य॒ज्ञस्य॑ शं॒भुवा॑ यु॒वामिदा वृ॑णीमहे। अ॒ग्निं च॑ हव्य॒वाह॑नम्॥

सब मनुष्यों को पुत्रों के अध्यापकों और पुत्री की अध्यापिकाओं को निरन्तर नियुक्त करना चाहिये, जिससे स्त्री-पुरुषों में पूर्ण विद्याओं का प्रचार हो॥१९॥

द्यावा॑ नः पृथि॒वी इ॒मं सि॒ध्रम॒द्य दि॑वि॒स्पृश॑म्। य॒ज्ञं दे॒वेषु॑ यच्छताम्॥

अध्यापक और उपदेशकों से जैसे सूर्य्य और भूमि सबको सर्वथा उन्नति देते हैं, वैसे स्त्री पुरुषों में विद्या अच्छे प्रकार विस्तारनी चाहिये॥२०॥

आ वा॑मु॒पस्थ॑मद्रुहा दे॒वाः सी॑दन्तु य॒ज्ञियाः॑। इ॒हाद्य सोम॑पीतये॥

अध्यापक और उपदेशकों के समीप अन्य निर्दोष विदुषी स्त्री हों, जिससे दोनों स्त्री पुरुषों में विद्या और उत्तम शिक्षा तुल्य हो॥२१॥इस सूक्त में अध्यापक और अध्ययनकर्त्ता, सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, वायु, परमेश्वरोपासना और स्त्री-पुरुष के क्रम का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ सङ्गति समझनी चाहिये॥यह इकतालीसवाँ सूक्त और दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

कनि॑क्रदज्ज॒नुषं॑ प्रब्रुवा॒ण इय॑र्ति॒ वाच॑मरि॒तेव॒ नाव॑म्। सु॒म॒ङ्गल॑श्च शकुने॒ भवा॑सि॒ मा त्वा॒ का चि॑दभि॒भा विश्व्या॑ विदत्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो उपदेशक जैसे बल्ली नाव को पहुँचाती है, वैसे सब मनुष्यों को उपदेश के लिये प्राप्त होता वा उपदेश करता हुआ पक्षी के समान भ्रमता है, उस सुमङ्गलाचरण करनेवाले के लिये कोई कान्ति भङ्ग न हो, इसलिये राजा को उपदेशकों की रक्षा करनी चाहिये॥१॥

मा त्वा॑ श्ये॒न उद्व॑धी॒न्मा सु॑प॒र्णो मा त्वा॑ विद॒दिषु॑मान्वी॒रो अस्ता॑। पित्र्या॒मनु॑ प्र॒दिशं॒ कनि॑क्रदत्सुम॒ङ्गलो॑ भद्रवा॒दी व॑दे॒ह॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे श्येन पक्षी पखेरू अन्य पक्षियों को मारते हैं, वैसे कोई उपदेशक को पीड़ा मत दे, जिससे वह सुख और कुशलता से सर्वत्र उपदेश कर सके॥२॥

अव॑ क्रन्द दक्षिण॒तो गृ॒हाणां॑ सुम॒ङ्गलो॑ भद्रवा॒दी श॑कुन्ते। मा नः॑ स्ते॒न ई॑शत॒ माघशं॑सो बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

शुद्धाचरणों को करनेवाले सत्यवादी महात्मा जहाँ उपदेश करते हैं, वहाँ चोर आदि दुष्ट नष्ट होकर सबको बहुत सुख बढ़ता है॥३॥इस सूक्त में उपदेशक के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह बयालीसवाँ सूक्त और ग्यारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र॒द॒क्षि॒णिद॒भि गृ॑णन्ति का॒रवो॒ वयो॒ वद॑न्त ऋतु॒था श॒कुन्त॑यः। उ॒भे वाचौ॑ वदति साम॒गाइ॑व गाय॒त्रं च॒ त्रैष्टु॑भं॒ चानु॑ राजति॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पक्षी ऋतु-ऋतु में नाना प्रकार के शब्दों का उच्चारण करते हैं, वैसे शिल्पिजन डर को छोड़कर अनेक विद्या के प्रकाशक शब्दों को कहें॥१॥

उ॒द्गा॒तेव॑ शकुने॒ साम॑ गायसि ब्रह्मपु॒त्रइ॑व॒ सव॑नेषु शंससि। वृषे॑व वा॒जी शिशु॑मतीर॒पीत्या॑ स॒र्वतो॑ नः शकुने भ॒द्रमा व॑द वि॒श्वतो॑ नः शकुने॒ पुण्य॒मा व॑द॥

जैसे वेदवक्ता विद्वान् जन नियम से पाठ और वेदोक्त आचार को करते हैं, वैसे उपदेश करनेवाले स्त्रीपुरुष सबकी उन्नति के लिये सर्वदा सत्योपदेश करें, जिससे सबके सुख सब ओर से बढ़ें॥२॥

आ॒वदं॒स्त्वं श॑कुने भ॒द्रमा व॑द तू॒ष्णीमासी॑नः सुम॒तिं चि॑किद्धि नः। यदु॒त्पत॒न्वद॑सि कर्क॒रिर्य॑था बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्याओं को सुनकर मनन करते हुए पढ़ाते और सत्य को जानकर औरों को उपदेश करते हैं, वे सबके कल्याण करनेवाले होते हैं॥३॥इस सूक्त में उपदेशकों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह तेतालीसवाँ सूक्त बारहवाँ वर्ग चौथा अनुवाक और दूसरा मण्डल समाप्त हुआ॥

मण्डलम्

सूक्तम्

सोम॑स्य मा त॒वसं॒ वक्ष्य॑ग्ने॒ वह्निं॑ चकर्थ वि॒दथे॒ यज॑ध्यै। दे॒वाँ अच्छा॒ दीद्य॑द्यु॒ञ्जे अद्रिं॑ शमा॒ये अ॑ग्ने त॒न्वं॑ जुषस्व॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य ऐश्वर्य के करने की इच्छा करें, वे विद्वानों की संगति से शरीर को नीरोग रखकर अपने को विद्वान् बना के अग्नि आदि की पदार्थविद्या से कार्य्यों को सिद्ध करें॥१॥

प्राञ्चं॑ य॒ज्ञं च॑कृम॒ वर्ध॑तां॒ गीः स॒मिद्भि॑र॒ग्निं नम॑सा दुवस्यन्। दि॒वः श॑शासुर्वि॒दथा॑ कवी॒नां गृत्सा॑य चित्त॒वसे॑ गा॒तुमी॑षुः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्य अवश्य विद्या से उत्तम शिक्षा पाई हुई वाणी को बढ़ाकर महान् विद्वानों के समीप से अच्छे शिक्षित होकर पृथिवी के राज्य करने की चाहना करें॥२॥

मयो॑ दधे॒ मेधि॑रः पू॒तद॑क्षो दि॒वः सु॒बन्धु॑र्ज॒नुषा॑ पृथि॒व्याः। अवि॑न्दन्नु दर्श॒तम॒प्स्व१॒॑न्तर्दे॒वासो॑ अ॒ग्निम॒पसि॒ स्वसॄ॑णाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् जन योगविद्या से अपने आत्माओं में ज्ञान का प्रकाश देख औरों को दिखला कर ज्ञान से उन्हें बढ़ाते हैं, वैसे मनुष्यों को जिस प्रकार पुत्रों को विद्या पढ़ाना चाहिये, वैसे ही पुत्रियाँ भी विद्यासम्पन्न करनी चाहियें। जैसे भाई जन विद्याभ्यास करें, वैसे भगिनी भी, ऐसे ही अत्यानन्द मिल सकता है॥३॥

अव॑र्धयन्त्सु॒भगं॑ स॒प्त य॒ह्वीः श्वे॒तं ज॑ज्ञा॒नम॑रु॒षं म॑हि॒त्वा। शिशुं॒ न जा॒तम॒भ्या॑रु॒रश्वा॑ दे॒वासो॑ अ॒ग्निं जनि॑मन्वपुष्यन्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सात स्त्रियाँ एक पुत्र की वृद्धि करती हैं, वैसे जो अग्निविद्या को जानकर ऐश्वर्य्य की उन्नति करते हैं, वे महिमा को प्राप्त होते हैं॥४॥

शु॒क्रेभि॒रङ्गै॒ रज॑ आतत॒न्वान् क्रतुं॑ पुना॒नः क॒विभिः॑ प॒वित्रैः॑। शो॒चिर्वसा॑नः॒ पर्यायु॑र॒पां श्रियो॑ मिमीते बृह॒तीरनू॑नाः॥

हे मनुष्यो! जबतक तुम्हारे दृढ़ अङ्गवाले शरीर, पवित्र बुद्धियाँ, धर्मात्मा आप्त विद्वानों का सङ्ग, जितेन्द्रियता से पूर्ण आयु नहीं होती, तबतक अतुल लक्ष्मी और विद्या भी नहीं होती, ऐसा जानना चाहिये॥५॥

व॒व्राजा॑ सी॒मन॑दती॒रद॑ब्धा दि॒वो य॒ह्वीरव॑साना॒ अन॑ग्नाः। सना॒ अत्र॑ युव॒तयः॒ सयो॑नी॒रेकं॒ गर्भं॑ दधिरे स॒प्त वाणीः॑॥

जो समान रूपवाली स्त्रियाँ अपने-अपने समान पतियों को अपनी इच्छा से प्राप्त होकर परस्पर प्रीति के साथ सन्तानों को उत्पन्न कर और उन की रक्षा कर उनको उत्तम शिक्षा दिलाती हैं वे सुखयुक्त होती हैं। जैसे परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी कर्म्मोपासनाज्ञान प्रकाश करनेवाली तीनों मिल कर और सात वाणी सब व्यवहारों को सिद्ध करती हैं, वैसे विद्वान् स्त्री पुरुष धर्म्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध कर सकते हैं॥६॥

स्ती॒र्णा अ॑स्य सं॒हतो॑ वि॒श्वरू॑पा घृ॒तस्य॒ योनौ॑ स्र॒वथे॒ मधू॑नाम्। अस्थु॒रत्र॑ धे॒नवः॒ पिन्व॑माना म॒ही द॒स्मस्य॑ मा॒तरा॑ समी॒ची॥

जैसे नदी और समुद्र मिलकर रत्नों को उत्पन्न करते हैं, वैसे स्त्री पुरुष सन्तानों को उत्पन्न करें॥७॥

ब॒भ्रा॒णः सू॑नो सहसो॒ व्य॑द्यौ॒द्दधा॑नः शु॒क्रा र॑भ॒सा वपूं॑षि। श्चोत॑न्ति॒ धारा॒ मधु॑नो घृ॒तस्य॒ वृषा॒ यत्र॑ वावृ॒धे काव्ये॑न॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे उत्तम शिक्षा पाये हुए सज्जनों की वाणी जल के समान कोमल और सरस होती हैं, जैसे ब्रह्मचारी बलवान् होता है, वैसे सन्तानों को चाहिये कि विद्या सुशिक्षाओं को अच्छे प्रकार ग्रहण कर बलवान् और सुशील होवें॥८॥

पि॒तुश्चि॒दूध॑र्ज॒नुषा॑ विवेद॒ व्य॑स्य॒ धारा॑ असृज॒द्वि धेनाः॑। गुहा॒ चर॑न्तं॒ सखि॑भिः शि॒वेभि॑र्दि॒वो य॒ह्वीभि॒र्न गुहा॑ बभूव॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अन्धकार में स्थित वस्तु नहीं दीख पड़ती, जैसे दीप से प्राप्त होती, वैसे पिता के शरीर में वर्त्तमान जीव गर्भ में स्थित हुआ नहीं दीखता और जब इसका जन्म होता है तब दीखता है। इस प्रकार जो मङ्गलाचरणों से मित्रों के साथ विद्याओं का ग्रहण करता है, वह आत्मा को जान बड़ा होता है॥९॥

पि॒तुश्च॒ गर्भं॑ जनि॒तुश्च॑ बभ्रे पू॒र्वीरेको॑ अधय॒त्पीप्या॑नाः। वृष्णे॑ स॒पत्नी॒ शुच॑ये॒ सब॑न्धू उ॒भे अ॑स्मै मनु॒ष्ये॒३॒॑ नि पा॑हि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जब माता पिता गर्भ को धारण करते हैं और उस की रक्षा कर दुग्धपान आदि से बढ़ाते हैं, वैसे स्त्री पुरुष प्रीति को बढ़ाकर गर्भ को धारण कर उसे अच्छे प्रकार पाल मनुष्यों के हित के लिये अपने सन्तानों को विद्या ग्रहण करावें॥१०॥

उ॒रौ म॒हाँ अ॑निबा॒धे व॑व॒र्धापो॑ अ॒ग्निं य॒शसः॒ सं हि पू॒र्वीः। ऋ॒तस्य॒ योना॑वशय॒द्दमू॑ना जामी॒नाम॒ग्निर॒पसि॒ स्वसॄ॑णाम्॥

जो निर्विघ्न विद्यार्थी विद्या के ग्रहण करने में प्रयत्न करें, तो दम और शमादि गुणयुक्त होते हुए सब सम्बन्धियों को विद्यायुक्त कर सकें॥११॥

अ॒क्रो न ब॒भ्रिः स॑मि॒थे म॒हीनां॑ दिदृ॒क्षेयः॑ सू॒नवे॒ भाऋ॑जीकः। उदु॒स्रिया॒ जनि॑ता॒ यो ज॒जाना॒पां गर्भो॒ नृत॑मो य॒ह्वो अ॒ग्निः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य जलों के गर्भ को उत्पन्न कर तथा मेघ के साथ अच्छे प्रकार युद्ध कर जल वर्षा कर सबको बढ़ाता है, वैसे सन्तानों को शिक्षा देनेवाले सब जगह विजयी होते हैं॥१२॥

अ॒पां गर्भं॑ दर्श॒तमोष॑धीनां॒ वना॑ जजान सु॒भगा॒ विरू॑पम्। दे॒वास॑श्चि॒न्मन॑सा॒ सं हि ज॒ग्मुः पनि॑ष्ठं जा॒तं त॒वसं॑ दुवस्यन्॥

मनुष्यों को उचित है कि जो अग्नि, वायु, जल और पृथिवी में तथा शरीर ओषधि आदि प्रत्यक्ष परोक्षभूत पदार्थों में व्याप्त, उसको जान उससे सब कार्य्यों को सिद्ध करें॥१३॥

बृ॒हन्त॒ इद्भा॒नवो॒ भाऋ॑जीकम॒ग्निं स॑चन्त वि॒द्युतो॒ न शु॒क्राः। गुहे॑व वृ॒द्धं सद॑सि॒ स्वे अ॒न्तर॑पा॒र ऊ॒र्वे अ॒मृतं॒ दुहा॑नाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो अग्नि सर्वत्र स्थित सूर्य वा भौमरूप से प्रसिद्ध बिजुली रूप से गुप्त मेघादि पदार्थों का निमित्त है, उसको जानकर अभीष्ट सिद्ध करना चाहिये॥१४

ईळे॑ च त्वा॒ यज॑मानो ह॒विर्भि॒रीळे॑ सखि॒त्वं सु॑म॒तिं निका॑मः। दे॒वैरवो॑ मिमीहि॒ सं ज॑रि॒त्रे रक्षा॑ च नो॒ दम्ये॑भि॒रनी॑कैः॥

मनुष्यों को प्रथम श्रेष्ठ अध्यापक ढूँढना चाहिये और फिर उससे समस्त विद्याओं को ढूँढना चाहिये तदनन्तर विचार पीछे साक्षात्कार अर्थात् प्रत्यक्ष करना उसके परे उपयोग करना चाहिये॥१५॥

उ॒प॒क्षे॒तार॒स्तव॑ सुप्रणी॒तेऽग्ने॒ विश्वा॑नि॒ धन्या॒ दधा॑नाः। सु॒रेत॑सा॒ श्रव॑सा॒ तुञ्ज॑माना अ॒भि ष्या॑म पृतना॒यूँरदे॑वान्॥

जो मनुष्य अविद्वानों की उपेक्षा करके विद्वानों का सेवन करते हैं। वे सब ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं॥१६॥

आ दे॒वाना॑मभवः के॒तुर॑ग्ने म॒न्द्रो विश्वा॑नि॒ काव्या॑नि वि॒द्वान्। प्रति॒ मर्ताँ॑ अवासयो॒ दमू॑ना॒ अनु॑ दे॒वान्र॑थि॒रो या॑सि॒ साध॑न्॥

जो विद्वानों के बीच स्थित हो सब शास्त्रों का अध्ययन कर औरों को अध्ययन कराता है, वह सब सुखों को प्राप्त होता है॥१७॥

नि दु॑रो॒णे अ॒मृतो॒ मर्त्या॑नां॒ राजा॑ ससाद वि॒दथा॑नि॒ साध॑न्। घृ॒तप्र॑तीक उर्वि॒या व्य॑द्यौद॒ग्निर्विश्वा॑नि॒ काव्या॑नि वि॒द्वान्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि सूर्यरूप से सबको प्रकाशित करता है, वैसे पूर्ण विद्यायुक्त सभापति राजा धर्म से प्रजाजनों की अच्छे प्रकार पालना कर विद्याओं का प्रकाश करता है, वह सबको सत्कार करने योग्य कैसे न हो॥१८॥

आ नो॑ गहि स॒ख्येभिः॑ शि॒वेभि॑र्म॒हान्म॒हीभि॑रू॒तिभिः॑ सर॒ण्यन्। अ॒स्मे र॒यिं ब॑हु॒लं संत॑रुत्रं सु॒वाचं॑ भा॒गं य॒शसं॑ कृधी नः॥

यदि मनुष्य सुन्दर मित्रों को प्राप्त हो, तो उसको बड़ी लक्ष्मी कैसे न प्राप्त हो॥१९॥

ए॒ता ते॑ अग्ने॒ जनि॑मा॒ सना॑नि॒ प्र पू॒र्व्याय॒ नूत॑नानि वोचम्। म॒हान्ति॒ वृष्णे॒ सव॑ना कृ॒तेमा जन्म॑ञ्जन्म॒न् निहि॑तो जा॒तवे॑दाः॥

हे मनुष्यो! जो कर्म जीवों को करने योग्य, उनसे किये जाते और किये जायेंगे, वे सब सुख-दुःख मिश्रित फल भोगनेवाले होते हैं॥२०॥

जन्म॑न्जन्म॒न् निहि॑तो जा॒तवे॑दा वि॒श्वामि॑त्रेभिरिध्यते॒ अज॑स्रः। तस्य॑ व॒यं सु॑म॒तौ य॒ज्ञिय॒स्यापि॑ भ॒द्रे सौ॑मन॒से स्या॑म॥

सब मनुष्यों को प्रसिद्ध जगत् में सुख-दुःखादि न्यून अधिक फलों को देखकर पहिले जन्म में सञ्चित कर्म फल का अनुमान करना चाहिये, जो परमेश्वर कर्म फल का देनेवाला न हो तो व्यवस्था भी प्राप्त न हो, इसलिये सबको श्रेष्ठ बुद्धि उत्पन्न कर वैर आदि छोड़ सबके साथ सत्य भाव से वर्तना चाहिये॥२१॥

इ॒मं य॒ज्ञं स॑हसाव॒न् त्वं नो॑ देव॒त्रा धे॑हि सुक्रतो॒ ररा॑णः। प्र यं॑सि होतर्बृह॒तीरिषो॒ नोऽग्ने॒ महि॒ द्रवि॑ण॒मा य॑जस्व॥

ईश्वर ने विद्वान् को आज्ञा दी है कि जबतक जीवे तबतक तूं विद्या यज्ञ को मनुष्यों में अच्छे प्रकार विस्तारे और पुष्कल अन्न और उससे धनों को सबके अर्थ दे के सुखी होवे॥२२॥

इळा॑मग्ने पुरु॒दंसं॑ स॒निं गोः श॑श्वत्त॒मं हव॑मानाय साध। स्यान्नः॑ सू॒नुस्तन॑यो वि॒जावाग्ने॒ सा ते॑ सुम॒तिर्भू॑त्व॒स्मे॥

विद्वानों की यही योग्यता है कि सब कुमार और कुमारियों को पण्डित पण्डिता बनावें, जिससे सब विद्या के फल को प्राप्त होकर सुमति हों॥२३॥इस सूक्त में विद्वान् स्त्री पुरुष और विद्या जन्म की प्रशंसा करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये॥यह तीसरे मण्डल में प्रथम सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

वै॒श्वा॒न॒राय॑ धि॒षणा॑मृता॒वृधे॑ घृ॒तं न पू॒तम॒ग्नये॑ जनामसि। द्वि॒ता होता॑रं॒ मनु॑षश्च वा॒घतो॑ धि॒या रथं॒ न कुलि॑शः॒ समृ॑ण्वति॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे ऋत्विग् जन घृत आदि हवि को अच्छे प्रकार शोध कर अग्नि में हवन करने से अग्नि की वृद्धि करते हैं, वैसे अध्यापक और उपदेशक जन शिष्यों तथा श्रोताओं की बुद्धियों को बढ़ावें, जैसे कुल्हाड़ी आदि साधनों से काष्ठ छील कर यान बनाये जाते हैं, वैसे उत्तम शिक्षा और ताड़नाओं से शिष्य लोग [विद्या से] संपन्न किये जावें, जैसे अध्यापक और अध्येता प्रीति से वर्त्तमान हैं, वैसे सबको वर्त्तमान करना चाहिये॥१॥

स रो॑चयज्ज॒नुषा॒ रोद॑सी उ॒भे स मा॒त्रोर॑भवत्पु॒त्र ईड्यः॑। ह॒व्य॒वाळ॒ग्निर॒जर॒श्चनो॑हितो दू॒ळभो॑ वि॒शामति॑थिर्वि॒भाव॑सुः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो ब्रह्मचर्य्य से विद्या और उत्तम शिक्षाओं को प्राप्त सत्पुत्र हो, वह भूमि और आकाश के बीच विराजमान हो सूर्य के समान सब का हितकारी हो॥२॥

क्रत्वा॒ दक्ष॑स्य॒ तरु॑षो॒ विध॑र्मणि दे॒वासो॑ अ॒ग्निं ज॑नयन्त॒ चित्ति॑भिः। रु॒रु॒चा॒नं भा॒नुना॒ ज्योति॑षा म॒हामत्यं॒ न वाजं॑ सनि॒ष्यन्नुप॑ ब्रुवे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। यदि क्रिया कौशलता के साथ अग्नि से उपकार लिया चाहें, तो यह अत्यन्त कार्य्यसिद्धि करनेवाला हो॥३॥

आ म॒न्द्रस्य॑ सनि॒ष्यन्तो॒ वरे॑ण्यं वृणी॒महे॒ अह्र॑यं॒ वाज॑मृ॒ग्मिय॑म्। रा॒तिं भृगू॑णामु॒शिजं॑ क॒विक्र॑तुम॒ग्निं राज॑न्तं दि॒व्येन॑ शो॒चिषा॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो युक्ति से अग्नि को सेवन करें, तो क्या-क्या दिव्य सुख वा वस्तु न सिद्ध करें ?॥४॥

अ॒ग्निं सु॒म्नाय॑ दधिरे पु॒रो जना॒ वाज॑श्रवसमि॒ह वृ॒क्तब॑र्हिषः। य॒तस्रु॑चः सु॒रुचं॑ वि॒श्वदे॑व्यं रु॒द्रं य॒ज्ञानां॒ साध॑दिष्टिम॒पसा॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे ऋत्विग्जन यज्ञों में अग्नि से वायु और वर्षा के जल की शुद्धि आदि काम करते हैं, वैसे शिल्पि आदि जनों को भी पाचक अग्नि से कार्य सिद्ध करने चाहिये॥५॥

पाव॑कशोचे॒ तव॒ हि क्षयं॒ परि॒ होत॑र्य॒ज्ञेषु॑ वृ॒क्तब॑र्हिषो॒ नरः॑। अग्ने॒ दुव॑ इ॒च्छमा॑नास॒ आप्य॒मुपा॑सते॒ द्रवि॑णं धेहि॒ तेभ्यः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वन्! जो तुम्हारे निकट तुम्हारे सेवा करते हुए अग्नि विद्या की याचना करते हैं, उनके प्रति इस विद्या का उपदेश कीजिये, जिससे वे धनाढ्य होवें॥६॥

आ रोद॑सी अपृण॒दा स्व॑र्म॒हज्जा॒तं यदे॑नम॒पसो॒ अधा॑रयन्। सो अ॑ध्व॒राय॒ परि॑ णीयते क॒विरत्यो॒ न वाज॑सातये॒ चनो॑हितः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्युत् रूप अग्नि सूर्य पृथिवी उनमें स्थित और अन्तरिक्षस्थ पदार्थों को प्रकाशित करता है, यदि वह यानों में प्रयुक्त किया जाय तो सबका हितकारी हो॥७॥

न॒म॒स्यत॑ ह॒व्यदा॑तिं स्वध्व॒रं दु॑व॒स्यत॒ दम्यं॑ जा॒तवे॑दसम्। र॒थीर्ऋ॒तस्य॑ बृह॒तो विच॑र्षणिर॒ग्निर्दे॒वाना॑मभवत्पु॒रोहि॑तः॥

हे मनुष्यो! जो बहुत विद्यावाला अहिंसक, जितेन्द्रिय, विद्वानों के बीच विद्वान् हो, वही तुम लोगों को नमस्कार करने और सेवने योग्य भी हो॥८॥

ति॒स्रो य॒ह्वस्य॑ स॒मिधः॒ परि॑ज्मनो॒ऽग्नेर॑पुनन्नु॒शिजो॒ अमृ॑त्यवः। तासा॒मेका॒मद॑धु॒र्मर्त्ये॒ भुज॑मु लो॒कमु॒ द्वे उप॑ जा॒मिमी॑यतुः॥

जो मनुष्य तीन प्रकार के अग्नि को जान के ऊपर-नीचे स्थित जो प्रयोजन उनको सिद्ध करने को प्रवृत्त हों, तो उनको कोई काम असाध्य न हो॥९॥

वि॒शां क॒विं वि॒श्पतिं॒ मानु॑षी॒रिषः॒ सं सी॑मकृण्व॒न्त्स्वधि॑तिं॒ न तेज॑से। स उ॒द्वतो॑ नि॒वतो॑ याति॒ वेवि॑ष॒त्स गर्भ॑मे॒षु भुव॑नेषु दीधरत्॥

जैसे गर्भ अदृश्य होता है, वैसे अग्नि भी सब पदार्थों में वर्त्तमान है, जो मनुष्य इसको साधक करें तो इस अग्नि से युक्त यानों से भूमि और आकाश मार्गों को और नीचे ऊपरली गतियों को कर सकें और प्रजा भी पाल सकें॥१०॥

स जि॑न्वते ज॒ठरे॑षु प्रजज्ञि॒वान्वृषा॑ चि॒त्रेषु॒ नान॑द॒न्न सिं॒हः। वै॒श्वा॒न॒रः पृ॑थृ॒पाजा॒ अम॑र्त्यो॒ वसु॒ रत्ना॒ दय॑मानो॒ वि दा॒शुषे॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को अग्नि में अद्भुत गुण-कर्म-स्वभावों को जान के अतुल लक्ष्मियों को सिद्ध कर अच्छे मार्गों में देनेवालों को देनी चाहिये। जो जाठराग्नि शान्त हो तो किसी के जीवन का संभव न हो और न इसके बिना बल भी कोई पा सकता है॥११॥

वै॒श्वा॒न॒रः प्र॒त्नथा॒ नाक॒मारु॑हद्दि॒वस्पृ॒ष्ठं भन्द॑मानः सु॒मन्म॑भिः। स पू॑र्व॒वज्ज॒नय॑ञ्ज॒न्तवे॒ धनं॑ समा॒नमज्मं॒ पर्ये॑ति॒ जागृ॑विः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। यह अग्नि अपूर्व नहीं है, जो व्यतीत हुए कल्पों में जैसा हुआ वैसा ही अब वर्त्तमान है, भविष्यत्काल में भी होगा। यदि यह सबका प्रकाशक के समान रवि के योग से कार्यकारी वर्त्तमान है तो वह यथावत् जाना और प्रयोग किया हुआ मङ्गल का अच्छे प्रकार देनेवाला होता है॥१२॥

ऋ॒तावा॑नं य॒ज्ञियं॒ विप्र॑मु॒क्थ्य१॒॑मा यं द॒धे मा॑त॒रिश्वा॑ दि॒वि क्षय॑म्। तं चि॒त्रया॑मं॒ हरि॑केशमीमहे सुदी॒तिम॒ग्निं सु॑वि॒ताय॒ नव्य॑से॥

अग्नि के निमित्त कारण को धारण करनेवाला वायु वर्त्तमान है, जिस अन्तरिक्ष में वायु है, वहीं अग्नि भी है, जिससे प्रलय होता वा यज्ञ सिद्ध होते हैं, उस अद्भुत गुण-कर्म-स्वभाववाले अग्नि को नवीनता और विद्या प्राप्ति के लिये विद्वान् जन ढूँढें॥१३॥

शुचिं॒ न याम॑न्निषि॒रं स्व॒र्दृशं॑ के॒तुं दि॒वो रो॑चन॒स्थामु॑ष॒र्बुध॑म्। अ॒ग्निं मू॒र्धानं॑ दि॒वो अप्र॑तिष्कुतं॒ तमी॑महे॒ नम॑सा वा॒जिनं॑ बृ॒हत्॥

मनुष्यों को आप्त विद्वानों से अग्न्यादि विद्या प्राप्त करनी चाहिये, जो जिससे विद्या ग्रहण की इच्छा करे, वह उसका निरन्तर सत्कार करे, सूर्य किसी लोक का परिक्रमण नहीं करता और सबसे बड़ा भी है॥१४॥

म॒न्द्रं होता॑रं॒ शुचि॒मद्व॑याविनं॒ दमू॑नसमु॒क्थ्यं॑ वि॒श्वच॑र्षणिम्। रथं॒ न चि॒त्रं वपु॑षाय दर्श॒तं मनु॑र्हितं॒ सद॒मिद्रा॒य ई॑महे॥

जो इन्द्रियों को दमन करनेवाले विद्वानों के निकट स्थित होकर अग्निविद्या को जानें, तो मनुष्य किस-किस धन को न प्राप्त हों ?॥१५॥इस सूक्त में विद्वान् और अग्नि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह दूसरा सूक्त और उन्नीसवाँ वर्ग पूर्ण हुआ॥

वै॒श्वा॒न॒राय॑ पृथु॒पाज॑से॒ विपो॒ रत्ना॑ विधन्त ध॒रुणे॑षु॒ गात॑वे। अ॒ग्निर्हि दे॒वाँ अ॒मृतो॑ दुव॒स्यत्यथा॒ धर्मा॑णि स॒नता॒ न दू॑दुषत्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि अपने सनातन गुण, कर्म, स्वभावों को सेवता है, कभी दोषी नहीं होता, वैसे विद्वान् जन जिज्ञासुओं के हित के लिये विद्या देके अपने-अपने स्वभावों को भूषित करते हैं, कभी धर्माचरण से दूषित नहीं होते हैं॥१॥

अ॒न्तर्दू॒तो रोद॑सी द॒स्म ई॑यते॒ होता॒ निष॑त्तो॒ मनु॑षः पु॒रोहि॑तः। क्षयं॑ बृ॒हन्तं॒ परि॑ भूषति॒ द्युभि॑र्दे॒वेभि॑र॒ग्निरि॑षि॒तो धि॒याव॑सुः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को देश के अवयवों को प्राप्त होकर उत्तम विद्याध्ययन, अध्यापन और उपदेशादि कर्मों के साथ समस्त मनुष्य सुभूषित करने चाहिये और इससे सबका हित सिद्ध करना चाहिये॥२॥

के॒तुं य॒ज्ञानां॑ वि॒दथ॑स्य॒ साध॑नं॒ विप्रा॑सो अ॒ग्निं म॑हयन्त॒ चित्ति॑भिः। अपां॑सि॒ यस्मि॒न्नधि॑ संद॒धुर्गिर॒स्तस्मि॑न्त्सु॒म्नानि॒ यज॑मान॒ आ च॑के॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। समस्त पदार्थविद्या के बीच अग्नि के तुल्य कोई और पदार्थ कार्यसाधक नहीं है, इससे इस अग्नि का ही परिज्ञान उत्तम यत्न के साथ लोगों को करना चाहिये॥३॥

पि॒ता य॒ज्ञाना॒मसु॑रो विप॒श्चितां॑ वि॒मान॑म॒ग्निर्व॒युनं॑ च वा॒घता॑म्। आ वि॑वेश॒ रोद॑सी॒ भूरि॑वर्पसा पुरुप्रि॒यो भ॑न्दते॒ धाम॑भिः क॒विः॥

जैसे ईश्वर सर्वत्र व्याप्त होकर सबकी व्यवस्था करता है, वैसे अग्नि पृथिव्यादिकों को अभिव्याप्त होकर आकर्षण से सब पदार्थों की व्यवस्था करता है। जैसे अग्नि अच्छे प्रकार युक्त किये हुए विमान को आकाश में शीघ्र चलाता है, वैसे विद्वानों की सेवापूर्वक योगाभ्यास के विज्ञान से सेवा किया हुआ जगदीश्वर चिदाकाश में मुक्तजनों को शीघ्र प्रवेश कर विहार कराता है॥४॥

च॒न्द्रम॒ग्निं च॒न्द्रर॑थं॒ हरि॑व्रतं वैश्वान॒रम॑प्सु॒षदं॑ स्व॒र्विद॑म्। वि॒गा॒हं तूर्णिं॒ तवि॑षीभि॒रावृ॑तं॒ भूर्णिं॑ दे॒वास॑ इ॒ह सु॒श्रियं॑ दधुः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जब तक पदार्थ-विद्या में अग्नि-विद्या न हो, तब तक आभूषणरहित स्त्री के समान नहीं शोभती है॥५॥

अ॒ग्निर्दे॒वेभि॒र्मनु॑षश्च ज॒न्तुभि॑स्तन्वा॒नो य॒ज्ञं पु॑रु॒पेश॑सं धि॒या। र॒थीर॒न्तरी॑यते॒ साध॑दिष्टिभिर्जी॒रो दमू॑ना अभिशस्ति॒चात॑नः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को जो अग्नि सामान्य रूप से सब पदार्थों को पुष्ट करता वा विशेष रूप से उनको नष्ट करता वा पृथिव्यादिकों के भीतर व्याप्त है अर्थात् उनके प्रत्येक परमाणु के साथ है वा जिससे बहुत व्यवहार सिद्ध होते हैं, वह अग्नि विशेषता से जानने योग्य है॥६॥

अग्ने॒ जर॑स्व स्वप॒त्य आयु॑न्यू॒र्जा पि॑न्वस्व॒ समिषो॑ दिदीहि नः। वयां॑सि जिन्व बृह॒तश्च॑ जागृव उ॒शिग्दे॒वाना॒मसि॑ सु॒क्रतु॑र्वि॒पाम्॥

जो मनुष्य अपने सन्तानों को योग्य आहार-विहार से अच्छे प्रकार पाल के उत्तम शिक्षा और विद्या के दान से विद्वान् करते हैं, वे सदैव विद्वानों के सत्सङ्ग की कामना करनेवाले धर्म के चाहनेवाले होकर बुद्धिमान् होते हैं॥७॥

वि॒श्पतिं॑ य॒ह्वमति॑थिं॒ नरः॒ सदा॑ य॒न्तारं॑ धी॒नामु॒शिजं॑ च वा॒घता॑म्। अ॒ध्व॒राणां॒ चेत॑नं जा॒तवे॑दसं॒ प्र शं॑सन्ति॒ नम॑सा जू॒तिभि॑र्वृ॒धे॥

मनुष्यों को आप्त विद्वानों ने [=से] स्तुति किया हुआ महान् प्रजापालक ज्ञानस्वरूप परमेश्वर स्तुति करने योग्य है, इसकी उपासना के विना किसी को पूरा लाभ प्राप्त नहीं होता॥८॥

वि॒भावा॑ दे॒वः सु॒रणः॒ परि॑ क्षि॒तीर॒ग्निर्ब॑भूव॒ शव॑सा सु॒मद्र॑थः। तस्य॑ व्र॒तानि॑ भूरिपो॒षिणो॑ व॒यमुप॑ भूषेम॒ दम॒ आ सु॑वृ॒क्तिभिः॑॥

जैसे विद्वान् जन मनुष्यों के बीच बहुत पुष्टि देने और ऐश्वर्य की प्राप्ति करानेवाले तथा परोपकार से अलङ्कृत हों, वे राज्य के ऐश्वर्य को प्राप्त हों॥९॥

वैश्वा॑नर॒ तव॒ धामा॒न्या च॑के॒ येभिः॑ स्व॒र्विदभ॑वो विचक्षण। जा॒त आपृ॑णो॒ भुव॑नानि॒ रोद॑सी॒ अग्ने॒ ता विश्वा॑ परि॒भूर॑सि॒ त्मना॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य अग्नि के समान धर्म और विद्याओं के प्रकाश करनेवाले सबके बीच प्राणियों के सुख-दुःख की व्यवस्था से अपने समान बुद्धि रखनेवाले हैं, वे सुखी होते हैं॥१०॥

वै॒श्वा॒न॒रस्य॑ दं॒सना॑भ्यो बृ॒हदरि॑णा॒देकः॑ स्वप॒स्यया॑ क॒विः। उ॒भा पि॒तरा॑ म॒हय॑न्नजायता॒ग्निर्द्यावा॑पृथि॒वी भूरि॑रेतसा॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य विद्वानों के तुल्य कर्म और माता-पिताओं का सत्कार करते, वे पृथिवी और सूर्य के समान उत्तम गुणवाले होते हैं॥११॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये॥११॥यह तीसरा सूक्त और इक्कीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

स॒मित्स॑मित्सु॒मना॑ बोध्य॒स्मे शु॒चाशु॑चा सुम॒तिं रा॑सि॒ वस्वः॑। आ दे॑व दे॒वान्य॒जथा॑य वक्षि॒ सखी॒ सखी॑न्त्सु॒मना॑ यक्ष्यग्ने॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो! जैसे समिधों वा होमने योग्य घृतादि पदार्थ से अग्नि बढ़ता है, वैसे अध्यापन और उपदेश से मनुष्यों की बुद्धि बढ़ानी चाहिये और आप लोग सदैव मित्र होकर सबको विद्वान् और श्रीमान् कीजिये॥१॥

यं दे॒वास॒स्त्रिरह॑न्ना॒यज॑न्ते दि॒वेदि॑वे॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॒ग्निः। सेमं य॒ज्ञं मधु॑मन्तं कृधी न॒स्तनू॑नपाद्घृ॒तयो॑निं वि॒धन्त॑म्॥

हे मनुष्यो! जैसे विद्वान् जन अग्न्यादि पदार्थों की विद्याप्राप्ति के लिये जैसी क्रिया करें, वैसे ही तुम भी करो॥२॥

प्र दीधि॑तिर्वि॒श्ववा॑रा जिगाति॒ होता॑रमि॒ळः प्र॑थ॒मं यज॑ध्यै। अच्छा॒ नमो॑भिर्वृष॒भं व॒न्दध्यै॒ स दे॒वान्य॑क्षदिषि॒तो यजी॑यान्॥

जिसकी प्रकाशमान दीप्ति बिजुली के समान विद्या देनेवाले की प्रशंसा करती है, उसका सब विद्यार्थी जन सङ्ग कर दिव्य गुणों को प्राप्त होकर धन-धान्ययुक्त होवें॥३॥

ऊ॒र्ध्वो वां॑ गा॒तुर॑ध्व॒रे अ॑कार्यू॒र्ध्वा शो॒चींषि॒ प्रस्थि॑ता॒ रजां॑सि। दि॒वो वा॒ नाभा॒ न्य॑सादि॒ होता॑ स्तृणी॒महि॑ दे॒वव्य॑चा॒ वि ब॒र्हिः॥

जो यज्ञकर्ता और यज्ञ करानेवाले विद्वान् हों और सुन्दर शुद्ध पदार्थों को अग्नि में छोड़ें, तो क्या-क्या सुख प्राप्त न हों?॥४॥

स॒प्त हो॒त्राणि॒ मन॑सा वृणा॒ना इन्व॑न्तो॒ विश्वं॒ प्रति॑ यन्नृ॒तेन॑। नृ॒पेश॑सो वि॒दथे॑षु॒ प्र जा॒ता अ॒भी॒३॒॑मं य॒ज्ञं वि च॑रन्त पू॒र्वीः॥

जो मनुष्य सुगन्ध्यादियुक्त पदार्थों के अग्नि में छोड़ने से वायु, वृष्टि, जल, ओषधि और अन्नों को अच्छे प्रकार शोधें, तो सब आरोग्यपन को प्राप्त हों॥५॥

आ भन्द॑माने उ॒षसा॒ उपा॑के उ॒त स्म॑येते त॒न्वा॒३॒॑ विरू॑पे। यथा॑ नो मि॒त्रो वरु॑णो॒ जुजो॑ष॒दिन्द्रो॑ म॒रुत्वाँ॑ उ॒त वा॒ महो॑भिः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। यदि ईश्वर रात्रि और दिन न बनावे, तो किसी का व्यवहार यथावत् सिद्ध न हो। जो भगवान् जल, सूर्य्य और वायु को न रचे, तो किसी का जीवन न हो॥६॥

दैव्या॒ होता॑रा प्रथ॒मा न्यृ॑ञ्जे स॒प्त पृ॒क्षासः॑ स्व॒धया॑ मदन्ति। ऋ॒तं शंस॑न्त ऋ॒तमित्त आ॑हु॒रनु॑ व्र॒तं व्र॑त॒पा दीध्या॑नाः॥

जो यज्ञ की आहुतियों से शुद्ध पवन, जल और अन्नादिकों का सेवन करते हैं, वे सुशील होते हुए प्रशंसावाले होकर आनन्द को प्राप्त होते हैं॥७॥

आ भार॑ती॒ भार॑तीभिः स॒जोषा॒ इळा॑ दे॒वैर्म॑नु॒ष्ये॑भिर॒ग्निः। सर॑स्वती सारस्व॒तेभि॑र॒र्वाक् ति॒स्रो दे॒वीर्ब॒र्हिरेदं स॑दन्तु॥

जिन मनुष्यों की विद्वानों की धारणा के अनुकूल धारणा, प्रशंसा के अनुकूल स्तुति, वाणी के अनुकूल वर्त्ताववाली वाणी वर्त्तमान है, वे अन्तरिक्षस्थ शुभ वाणी को प्राप्त होकर आनन्द को प्राप्त होते हैं॥८॥

तन्न॑स्तु॒रीप॒मध॑ पोषयि॒त्नु देव॑ त्वष्ट॒र्वि र॑रा॒णः स्य॑स्व। यतो॑ वी॒रः क॑र्म॒ण्यः॑ सु॒दक्षो॑ यु॒क्तग्रा॑वा॒ जाय॑ते दे॒वका॑मः॥

जो विद्वान् जन हमारे लिये दुःख से तारने और पुष्टि करनेवाले उपदेश को करें, उन्हें शुभ गुण-कर्म-स्वभाव की कामना करनेवाले हम लोग सदैव सेवें, जिससे हमारा कुल उत्कर्ष उन्नति को प्राप्त हो॥९॥

वन॑स्प॒तेऽव॑ सृ॒जोप॑ दे॒वान॒ग्निर्ह॒विः श॑मि॒ता सू॑दयाति। सेदु॒ होता॑ स॒त्यत॑रो यजाति॒ यथा॑ दे॒वानां॒ जनि॑मानि॒ वेद॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य की किरणें दिव्य गुणों को उत्पन्न करतीं और दोषों को दूर करती हैं, वैसे विद्वान् लोग जगत् में गुणों को उत्पन्न करके दोषों को दूर करें॥१०॥

आ या॑ह्यग्ने समिधा॒नो अ॒र्वाङिन्द्रे॑ण दे॒वैः स॒रथं॑ तु॒रेभिः॑। ब॒र्हिर्न॒ आस्ता॒मदि॑तिः सुपु॒त्रा स्वाहा॑ दे॒वा अ॒मृता॑ मादयन्ताम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे बिजुली आदि पदार्थों से चलाये हुए रथ आदि यान भू, समुद्र और अन्तरिक्ष में शीघ्र जाते हैं, वैसे विद्वानों की शिक्षा से विद्याओं को प्राप्त होकर शीघ्र गुरुकुल जाकर और ब्रह्मचारियों को प्राप्त होकर सबको आनन्द करें॥११॥इस सूक्त में वह्नि विद्वान् और वाणी के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये॥११॥यह चौथा सूक्त और तेईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्रत्य॒ग्निरु॒षस॒श्चेकि॑ता॒नोऽबो॑धि॒ विप्रः॑ पद॒वीः क॑वी॒नाम्। पृ॒थु॒पाजा॑ देव॒यद्भिः॒ समि॒द्धोऽप॒ द्वारा॒ तम॑सो॒ वह्नि॑रावः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि प्रातःकाल में सब प्राणियों को जगाता और अन्धकार को निवृत्त करता है, वैसे विद्वान् जन अविद्या में सोते हुए मनुष्यों को जगाते हैं और इनके आत्माओं को अज्ञान के आवरण से अलग करते हैं॥१॥

प्रेद्व॒ग्निर्वा॑वृधे॒ स्तोमे॑भिर्गी॒र्भिः स्तो॑तॄ॒णां न॑म॒स्य॑ उ॒क्थैः। पू॒र्वीर्ऋ॒तस्य॑ सं॒दृश॑श्चका॒नः सं दू॒तो अ॑द्यौदु॒षसो॑ विरो॒के॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे इन्धन और घृतादिकों से अग्नि प्रवृद्ध हो कर प्रकाशित होता, वैसे ब्रह्मचर्य और विद्याभ्यासादिकों से मनुष्यों के आत्मा ज्ञानवृद्ध हो कर सनातन विद्या सबको देकर पूज्यतम होते हैं॥२॥

अधा॑य्य॒ग्निर्मानु॑षीषु वि॒क्ष्व१॒॑पां गर्भो॑ मि॒त्र ऋ॒तेन॒ साध॑न्। आ ह॑र्य॒तो य॑ज॒तः सान्व॑स्था॒दभू॑दु॒ विप्रो॒ हव्यो॑ मती॒नाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! तुम जैसे ईश्वर ने अग्नि सकल प्रजा का प्रकाश करनेवाला स्थापित किया, वैसे विद्या और धर्म के प्रकाश करनेवाले विद्वानों को जानो॥३॥

मि॒त्रो अ॒ग्निर्भ॑वति॒ यत्समि॑द्धो मि॒त्रो होता॒ वरु॑णो जा॒तवे॑दाः। मि॒त्रो अ॑ध्व॒र्युरि॑षि॒रो दमू॑ना मि॒त्रः सिन्धू॑नामु॒त पर्व॑तानाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य नदी, शैल और ओषधि आदिकों को किरणों के द्वारा पुष्ट करने वा उनको सुखानेवाला होता है, वैसे मित्र जन धर्म में पुष्टिकारक और अधर्म से निवर्तक होते हैं॥४॥

पाति॑ प्रि॒यं रि॒पो अग्रं॑ प॒दं वेः पाति॑ य॒ह्वश्चर॑णं॒ सूर्य॑स्य। पाति॒ नाभा॑ स॒प्तशी॑र्षाणम॒ग्निः पाति॑ दे॒वाना॑मुप॒माद॑मृ॒ष्वः॥

हे विद्वान्! जैसे वह्नि चालवाले पृथिवी आदि लोकों की रक्षा और प्रकाश के निमित्त से उनकी रक्षा करनेवाला वर्त्तमान होता है, वैसे आप सबकी रक्षा करनेवाले होओ॥५॥

ऋ॒भुश्च॑क्र॒ ईड्यं॒ चारु॒ नाम॒ विश्वा॑नि दे॒वो व॒युना॑नि वि॒द्वान्। स॒सस्य॒ चर्म॑ घृ॒तव॑त्प॒दं वेस्तदिद॒ग्नी र॑क्ष॒त्यप्र॑युच्छन्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्राणाग्नि शरीर की रक्षा करता है, सोते हुए को जगाता है, वैसे अध्यापक और उपदेशक उत्तम शिक्षा को पाये हुए वाणी के समस्त विज्ञानों की प्राप्ति करा कर मनुष्यों को जगाते हैं॥६॥

आ योनि॑म॒ग्निर्घृ॒तव॑न्तमस्थात्पृ॒थुप्र॑गाणमु॒शन्त॑मुशा॒नः। दीद्या॑नः॒ शुचि॑र्ऋ॒ष्वः पा॑व॒कः पुनः॑ पुनर्मा॒तरा॒ नव्य॑सी कः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्युत् रूप अग्नि पृथिवी आदि पदार्थों में स्थिर और सब ओर से अभिव्याप्त होकर किसी से विरुद्ध नहीं होता, वैसे विद्वान् जन किसी से विरुद्ध आचरण न करें, जैसे अग्नि शुद्ध और दूसरों को शुद्ध करनेवाला है, वैसे पवित्र होता हुआ औरों को पवित्र करे॥७॥

स॒द्यो जा॒त ओष॑धीभिर्ववक्षे॒ यदी॒ वर्ध॑न्ति प्र॒स्वो॑ घृ॒तेन॑। आप॑इव प्र॒वता॒ शुम्भ॑माना उरु॒ष्यद॒ग्निः पि॒त्रोरु॒पस्थे॑॥

यदि अग्नि सूर्यरूप से भूमि के जल को खींच कर वर्षा न करावे तो कोई भी ओषधि न हो। जैसे कोई रूठा हुआ किसीको मारता है, वैसे जलता हुआ अग्नि पाये हुए पदार्थों को जला देता है। और जैसे प्रसन्न होता हुआ मित्र मित्र की रक्षा करता है, वैसे युक्ति से सेवन किया हुआ अग्नि पदार्थों की रक्षा करता है॥८॥

उदु॑ ष्टु॒तः स॒मिधा॑ य॒ह्वो अ॑द्यौ॒द्वर्ष्म॑न्दि॒वो अधि॒ नाभा॑ पृथि॒व्याः। मि॒त्रो अ॒ग्निरीड्यो॑ मात॒रिश्वा ऽऽदू॒तो व॑क्षद्य॒जथा॑य दे॒वान्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे इस ब्रह्माण्ड में सूर्य्यरूप से अग्नि सबको तपाता है, वैसे महान् मित्र अपने मित्रों को आनन्दित करता और दिव्य गुणों की प्राप्ति कराता है॥९॥

उद॑स्तम्भीत्स॒मिधा॒ नाक॑मृ॒ष्वो॒३॒॑ग्निर्भव॑न्नुत्त॒मो रो॑च॒नाना॑म्। यदी॒ भृगु॑भ्यः॒ परि॑ मात॒रिश्वा॒ गुहा॒ सन्तं॑ हव्य॒वाहं॑ समी॒धे॥

जैसे अग्नि बिजुली सूर्य्यरूप से सबको धारण करता है, वैसे उसको मैं धारण करता हूँ॥१०॥

इळा॑मग्ने पुरु॒दंसं॑ स॒निं गोः श॑श्वत्त॒मं हव॑मानाय साध। स्यान्नः॑ सू॒नुस्तन॑यो वि॒जावाग्ने॒ सा ते॑ सुम॒तिर्भू॑त्व॒स्मे॥

विद्वान् जनों को सर्व विद्या मन्थने के सारयुक्त अपनी वाणी और गति का विधान कर औरों की भी वैसे ही करनी चाहिये। जैसे औरों से बुद्धि और उत्तम शिक्षा ग्रहण की जाय वैसे औरों को भी देनी चाहिये, जिससे सब के सन्तान विद्वान् होवें॥११॥इस सूक्त में विद्वान् और अग्नि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह पञ्चम सूक्त और पच्चीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र का॑रवो मन॒ना व॒च्यमा॑ना देव॒द्रीचीं॑ नयत देव॒यन्तः॑। द॒क्षि॒णा॒वाड्वा॒जिनी॒ प्राच्ये॑ति ह॒विर्भर॑न्त्य॒ग्नये॑ घृ॒ताची॑॥

जैसे विद्वान् लोग रात्रि और रात्रि के व्यवहारों को जानते हैं, वैसे औरों को भी जानना चाहिये॥१॥

आ रोद॑सी अपृणा॒ जाय॑मान उ॒त प्र रि॑क्था॒ अध॒ नु प्र॑यज्यो। दि॒वश्चि॑दग्ने महि॒ना पृ॑थि॒व्या व॒च्यन्तां॑ ते॒ वह्न॑यः स॒प्तजि॑ह्वाः॥

जैसे सूर्य, पृथिवी और अग्नि की महिमा वर्त्तमान है, वैसे जो अग्निविद्या और भूगर्भविद्या को जानता है, वह निरन्तर सुखी हो॥२॥

द्यौश्च॑ त्वा पृथि॒वी य॒ज्ञिया॑सो॒ नि होता॑रं सादयन्ते॒ दमा॑य। यदी॒ विशो॒ मानु॑षीर्देव॒यन्तीः॒ प्रय॑स्वती॒रीळ॑ते शु॒क्रम॒र्चिः॥

जब राजा और राजपुरुष विद्या विनय और नीतियों से अपनी प्रजाओं को प्रसन्न करते और जितेन्द्रिय होकर दुष्ट व्यसनों से रहित होते हैं, वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्षों को प्राप्त होते हैं। यहाँ वीर्य और विद्या की उन्नति को उत्तम कारण जानो॥३॥

म॒हान्त्स॒धस्थे॑ ध्रु॒व आ निष॑त्तो॒ऽन्तर्द्यावा॒ माहि॑ने॒ हर्य॑माणः। आस्क्रे॑ स॒पत्नी॑ अ॒जरे॒ अमृ॑क्ते सब॒र्दुघे॑ उरुगा॒यस्य॑ धे॒नू॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो यह सूर्यलोक दीख पड़ता है, वह सबसे बड़ा और अपनी परिधि में निरन्तर वसता हुआ सब भूगोलों को प्रकाशित करता है, जिससे कि दिन-रात्रि होते हैं, उस को जानो॥४॥

व्र॒ता ते॑ अग्ने मह॒तो म॒हानि॒ तव॒ क्रत्वा॒ रोद॑सी॒ आ त॑तन्थ। त्वं दू॒तो अ॑भवो॒ जाय॑मान॒स्त्वं ने॒ता वृ॑षभ चर्षणी॒नाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि के महान् गुण, कर्म, स्वभाव हैं, वैसे गुण-कर्म-स्वभाववाला जो मनुष्य हो, वही राजदूत और मनुष्यों का नायक भी हो॥५॥

ऋ॒तस्य॑ वा के॒शिना॑ यो॒ग्याभि॑र्घृत॒स्नुवा॒ रोहि॑ता धु॒रि धि॑ष्व। अथा व॑ह दे॒वान्दे॑व॒ विश्वा॑न्त्स्वध्व॒रा कृ॑णुहि जातवेदः॥

हे मनुष्यो! जैसे ईश्वर ने सूर्य और बिजुली सबके चलानेवाले ब्रह्माण्ड में धरे स्थापन किये, वैसे तुम लोग अश्वादिकों को धारण करो और इस काम से समस्त गुणों को स्वीकार करो॥६॥

दि॒वश्चि॒दा ते॑ रुचयन्त रो॒का उ॒षो वि॑भा॒तीरनु॑ भासि पू॒र्वीः। अ॒पो यद॑ग्न उ॒शध॒ग्वने॑षु॒ होतु॑र्म॒न्द्रस्य॑ प॒नय॑न्त दे॒वाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सूर्य के समान प्रकाश कराने, दुष्टों को जलाने और श्रेष्ठों की स्तुति प्रशंसा करनेवाले होते हैं, वे बिजुली के समान कार्य के सिद्ध करनेवाले होते हैं॥७॥

उ॒रौ वा॒ ये अ॒न्तरि॑क्षे॒ मद॑न्ति दि॒वो वा॒ ये रो॑च॒ने सन्ति॑ दे॒वाः। ऊमा॑ वा॒ ये सु॒हवा॑सो॒ यज॑त्रा आयेमि॒रे र॒थ्यो॑ अग्ने॒ अश्वाः॑॥

हे मनुष्यो! तुम प्रसिद्ध और अप्रसिद्ध रूप अग्नि की जो कि किरणें और गुण सबके प्रकाश करनेवाले रथादिकों के लिये हितरूप और आकर्षणशक्तियुक्त हैं, उनको जानकर सब प्राणियों की रक्षा करनेवाले होओ॥८॥

ऐभि॑रग्ने स॒रथं॑ याह्य॒र्वाङ् ना॑नार॒थं वा॑ वि॒भवो॒ ह्यश्वाः॑। पत्नी॑वतस्त्रिं॒शतं॒ त्रींश्च॑ दे॒वान॑नुष्व॒धमा व॑ह मा॒दय॑स्व॥

जैसे अग्नि तैंतीस पृथिवी आदि दिव्यगुणी पदार्थों को धारण करता और व्यापक होकर अपने रूप कर देता है, वैसे विद्वान् जन विज्ञान से सबको जानकर तथा औरों के प्रति उपदेश कर आनन्द देते हैं॥९॥

स होता॒ यस्य॒ रोद॑सी चिदु॒र्वी य॒ज्ञंय॑ज्ञम॒भि वृ॒धे गृ॑णी॒तः। प्राची॑ अध्व॒रेव॑ तस्थतुः सु॒मेके॑ ऋ॒ताव॑री ऋ॒तजा॑तस्य स॒त्ये॥

यदि भूमि सूर्य्य उदय को न प्राप्त हों, तो किसी व्यवहार के सिद्ध करने को कोई योग्य न हो और न किसी की वृद्धि हो॥१०॥

इळा॑मग्ने पुरु॒दंसं॑ स॒निं गोः श॑श्वत्त॒मं हव॑मानाय साध। स्यान्नः॑ सू॒नुस्तन॑यो वि॒जावाग्ने॒ सा ते॑ सुम॒तिर्भू॑त्व॒स्मे॥

यदि मनुष्य अग्नि और पृथिवी आदि के स्वरूप को जानकर अच्छे प्रकार कार्यों में प्रयुक्त करें, तो उनमें पुत्र, पौत्र, धन, धान्य, विद्या और ऐश्वर्य समर्थित हों॥११॥। इस सूक्त में विद्वान् और अग्नि का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जानना चाहिये॥यह तृतीय मण्डल में छठवाँ सूक्त सत्ताईसवाँ वर्ग द्वितीय अष्टक में आठवाँ अध्याय और द्वितीय अष्टक समाप्त हुआ॥

प्र य आ॒रुः शि॑तिपृ॒ष्ठस्य॑ धा॒सेरा मा॒तरा॑ विविशुः स॒प्त वाणीः॑। प॒रि॒क्षिता॑ पि॒तरा॒ सं च॑रेते॒ प्र स॑र्स्राते दी॒र्घमायुः॑ प्र॒यक्षे॑॥

जो शरीर में विद्युत् रूप अग्नि फैला न हो, तो वाणी कुछ भी न चले। उस विद्युत् अग्नि का जो ब्रह्मचर्यादि उत्तम कर्मों में यथावत् सेवन करते हैं, वे बड़ी अवस्था को प्राप्त होते हैं॥१॥

दि॒वक्ष॑सो धे॒नवो॒ वृष्णो॒ अश्वा॑ दे॒वीरा त॑स्थौ॒ मधु॑म॒द्वह॑न्तीः। ऋ॒तस्य॑ त्वा॒ सद॑सि क्षेम॒यन्तं॒ पर्येका॑ चरति वर्त॒निं गौः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे असहाय पृथिवी अपने कक्षा मार्ग में नित्य चलती है, वैसे ही सभ्यजनों की वाणी नियम से मिथ्याभाषण को छोड़ सत्य मार्ग में चलती हैं। जो ऐसी वाणी का सेवन करते हैं, उनकी कुछ भी हानि नहीं होती॥२॥

आ सी॑मरोहत्सु॒यमा॒ भव॑न्तीः॒ पति॑श्चिकि॒त्वान्र॑यि॒विद्र॑यी॒णाम्। प्र नील॑पृष्ठो अत॒सस्य॑ धा॒सेस्ता अ॑वासयत्पुरु॒धप्र॑तीकः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य सब प्रजाओं को उठा के अच्छे प्रकार वास कराता है, वैसे ही राजा सुशिक्षित रक्षा की हुई प्रजाओं को भूगोल के सब देशों में वसा के धनाढ्य करे॥३॥

महि॑ त्वा॒ष्ट्रमू॒र्जय॑न्तीरजु॒र्यं स्त॑भू॒यमा॑नं व॒हतो॑ वहन्ति। व्यङ्गे॑भिर्दिद्युता॒नः स॒धस्थ॒ एका॑मिव॒ रोद॑सी॒ आ वि॑वेश॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि सर्वत्र अभिव्याप्त विद्युत् स्वरूप अग्नि के गुण, कर्म, स्वभावों को जानके कार्य्यसिद्धि करें॥४॥

जा॒नन्ति॒ वृष्णो॑ अरु॒षस्य॒ शेव॑मु॒त ब्र॒ध्नस्य॒ शास॑ने रणन्ति। दि॒वो॒रुचः॑ सु॒रुचो॒ रोच॑माना॒ इळा॒ येषां॒ गण्या॒ माहि॑ना॒ गीः॥

जो मनुष्य विद्वानों की शिक्षा में स्थिर होते हैं, वे प्रशंसित विद्वान् होकर महात्मा होते हैं॥५॥

उ॒तो पि॒तृभ्यां॑ प्र॒विदानु॒ घोषं॑ म॒हो म॒हद्भ्या॑मनयन्त शू॒षम्। उ॒क्षा ह॒ यत्र॒ परि॒ धान॑म॒क्तोरनु॒ स्वं धाम॑ जरि॒तुर्व॒वक्ष॑॥

हे मनुष्यो! जैसे ब्रह्मचारी लोग पिता, आचार्य्य आदि महान् पुरुषों के सेवन से विद्यातेज को पाते हैं, वैसे तुम लोग प्रातःकाल ईश्वर की स्तुति आदि से धर्म से हुए सुख को प्राप्त होओ॥६॥

अ॒ध्व॒र्युभिः॑ प॒ञ्चभिः॑ स॒प्त विप्राः॑ प्रि॒यं र॑क्षन्ते॒ निहि॑तं प॒दं वेः। प्राञ्चो॑ मदन्त्यु॒क्षणो॑ अजु॒र्या दे॒वा दे॒वाना॒मनु॒ हि व्र॒ता गुः॥

हे मनुष्यो! जैसे सात ऋत्विज लोग यज्ञ करके प्रजाओं को सुखी करते हैं, वैसे ही उपदेशक विद्वान् लोग सुशील धार्मिक हो के अध्यापन और उपदेश से सब मनुष्यों को आनन्दित करते हैं॥७॥

दैव्या॒ होता॑रा प्रथ॒मा न्यृ॑ञ्जे स॒प्त पृ॒क्षासः॑ स्व॒धया॑ मदन्ति। ऋ॒तं शंस॑न्त ऋ॒तमित्त आ॑हु॒रनु॑ व्र॒तं व्र॑त॒पा दीध्या॑नाः॥

जो विद्वान् लोग धर्मयुक्त व्यवहार से धन धान्यों को प्राप्त हो सत्य को उपदेश कर उसीका आचरण करके सबको शिक्षा करते हैं, वे सबका सत्कार करने योग्य हों॥८॥

वृ॒षा॒यन्ते॑ म॒हे अत्या॑य पू॒र्वीर्वृष्णे॑ चि॒त्राय॑ र॒श्मयः॑ सुया॒माः। देव॑ होतर्म॒न्द्रत॑रश्चिकि॒त्वान्म॒हो दे॒वान्रोद॑सी॒ एह व॑क्षि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य की किरणें प्रकाश से वृष्टि द्वारा सब प्रजा को सुखी करती हैं, वैसे ही विद्वान् लोग सब प्रजा जनों को विद्वान् कर सुन्दर ज्ञानयुक्त करते हैं॥९॥

पृ॒क्षप्र॑यजो द्रविणः सु॒वाचः॑ सुके॒तव॑ उ॒षसो॑ रे॒वदू॑षुः। उ॒तो चि॑दग्ने महि॒ना पृ॑थि॒व्याः कृ॒तं चि॒देनः॒ सं म॒हे द॑शस्य॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो! तुम लोग प्रभातवेला के तुल्य मनुष्यों के आत्माओं को प्रकाशित कर विज्ञान दे और अधर्माचरण को छुड़ा के सब मनुष्यों को सत्यवादी विद्वान् करो, जिससे पृथिवी पर पापाचरण न बढ़े॥१०॥

इळा॑मग्ने पुरु॒दंसं॑ स॒निं गोः श॑श्वत्त॒मं हव॑मानाय साध। स्यान्नः॑ सू॒नुस्तन॑यो वि॒जावाग्ने॒ सा ते॑ सुम॒तिर्भू॑त्व॒स्मे॥

मनुष्यों को चाहिये कि सदैव विद्यायुक्त वाणी और बुद्धि को प्राप्त हो सन्तानों को उत्तम शिक्षा दे के अनादिरूप सुख को प्राप्त होवें और सदैव सत्यवादी विद्वानों की बुद्धि सर्वत्र फैलावें॥११॥इस सूक्त में अग्नि सूर्य्य और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह सातवाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒ञ्जन्ति॒ त्वाम॑ध्व॒रे दे॑व॒यन्तो॒ वन॑स्पते॒ मधु॑ना॒ दैव्ये॑न। यदू॒र्ध्वस्तिष्ठा॒ द्रवि॑णे॒ह ध॑त्ता॒द्यद्वा॒ क्षयो॑ मा॒तुर॒स्या उ॒पस्थे॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्राणी दिन को चाहते हैं, वैसे ही उत्तम विद्वान् लोगों को सब मनुष्य चाहें। सब मिल के प्रीति से उत्तम घर और ऐश्वर्य्य की सिद्धि करें॥१॥

समि॑द्धस्य॒ श्रय॑माणः पु॒रस्ता॒द्ब्रह्म॑ वन्वा॒नो अ॒जरं॑ सु॒वीर॑म्। आ॒रे अ॒स्मदम॑तिं॒ बाध॑मान॒ उच्छ्र॑यस्व मह॒ते सौभ॑गाय॥

इस मन्त्र में पूर्व मन्त्र से (वनस्पते) इस पद की अनुवृत्ति आती है। जो मनुष्य अच्छी शिक्षा से कुबुद्धि का निवारण करते और धनादि ऐश्वर्य के साथ सुशिक्षा, विद्या और धर्म का प्रचार करते हुए सबके कल्याण की इच्छा करें, वे सदैव कल्याणभागी होवें॥२॥

उच्छ्र॑यस्व वनस्पते॒ वर्ष्म॑न्पृथि॒व्या अधि॑। सुमि॑ती मी॒यमा॑नो॒ वर्चो॑ धा य॒ज्ञवा॑हसे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे वट आदि वनस्पति जड़, स्कन्ध, डाली आदि से बढ़ते हैं, वैसे ही पुरुषार्थ के साथ विद्याओं का प्रचार कर मनुष्यों को बढ़ाना चाहिये॥३॥

युवा॑ सु॒वासाः॒ परि॑वीत॒ आगा॒त्स उ॒ श्रेया॑न्भवति॒ जाय॑मानः। तं धीरा॑सः क॒वय॒ उन्न॑यन्ति स्वा॒ध्यो॒३॒॑ मन॑सा देव॒यन्तः॑॥

कोई भी मनुष्य विद्या की उत्तम शिक्षा और ब्रह्मचर्य्य सेवन के विना दीर्घायु और सभा के योग्य विद्वान् नहीं हो सकता और न वह मनुष्य कहीं सत्कार पाने योग्य होता है। जिस मनुष्य की धार्मिक विद्वान् प्रशंसा करते हैं, वही विद्वान् है॥४॥

जा॒तो जा॑यते सुदिन॒त्वे अह्नां॑ सम॒र्य आ वि॒दथे॒ वर्ध॑मानः। पु॒नन्ति॒ धीरा॑ अ॒पसो॑ मनी॒षा दे॑व॒या विप्र॒ उदि॑यर्ति॒ वाच॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। उन्हीं का सुदिन होता है, जो विद्या और उत्तम शिक्षा का संग्रह कर विद्वान् होते हैं। जैसे शूरवीर पुरुष दुष्टों को जीत के धनादि ऐश्वर्य के साथ सब ओर से बढ़ते हैं, वैसे ही विद्या से विद्वान् बढ़ते हैं॥५॥

यान्वो॒ नरो॑ देव॒यन्तो॑ निमि॒म्युर्वन॑स्पते॒ स्वधि॑तिर्वा त॒तक्ष॑। ते दे॒वासः॒ स्वर॑वस्तस्थि॒वांसः॑ प्र॒जाव॑द॒स्मे दि॑धिषन्तु॒ रत्न॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जिनके सङ्ग से अन्य जन सभ्य विद्वान् हों, उन्हीं का सङ्ग तुम लोग भी करो। जिनके समागम से दुर्व्यसन बढ़े, उनको सब लोग त्याग देवें॥६॥

ये वृ॒क्णासो॒ अधि॒ क्षमि॒ निमि॑तासो य॒तस्रु॑चः। ते नो॑ व्यन्तु॒ वार्यं॑ देव॒त्रा क्षे॑त्र॒साध॑सः॥

जैसे कुल्हाड़े से काटे हुए वृक्ष फिर नहीं जमते, वैसे ही विद्या से नष्ट हुई अविद्या नहीं बढ़ती॥७॥

आ॒दि॒त्या रु॒द्रा वस॑वः सुनी॒था द्यावा॒क्षामा॑ पृथि॒वी अ॒न्तरि॑क्षम्। स॒जोष॑सो य॒ज्ञम॑वन्तु दे॒वा ऊ॒र्ध्वं कृ॑ण्वन्त्वध्व॒रस्य॑ के॒तुम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो! जैसे महीने, प्राण और पृथिवी आदि पदार्थ अविरुद्धता के साथ वर्त्तमान रहते हैं, वैसे ही सबको सबके साथ प्रीति उत्पन्न कर, विज्ञान बढ़ा के अहिंसाधर्म की उन्नति करनी चाहिये॥८॥

हं॒साइ॑व श्रेणि॒शो यता॑नाः शु॒क्रा वसा॑नाः॒ स्वर॑वो न॒ आगुः॑। उ॒न्नी॒यमा॑नाः क॒विभिः॑ पु॒रस्ता॑द्दे॒वा दे॒वाना॒मपि॑ यन्ति॒ पाथः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो हंसों के तुल्य मिल के प्रयत्न से सबकी उन्नति कर अपने आप उन्नति को प्राप्त हुए आप्त सत्यवादियों के मार्ग में चल के पराक्रम बढ़ाते हैं, वे ही पूर्ण सुख को भोगते हैं॥९॥

शृङ्गा॑णी॒वेच्छृ॒ङ्गिणां॒ सं द॑दृश्रे च॒षाल॑वन्तः॒ स्वर॑वः पृथि॒व्याम्। वा॒घद्भि॑र्वा विह॒वे श्रोष॑माणा अ॒स्माँ अ॑वन्तु पृत॒नाज्ये॑षु॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो बहुश्रुत विद्वान् लोग अपने आत्मा के तुल्य सबकी रक्षा करते हैं, वे उत्तम कीर्ति से श्रेष्ठाङ्ग मस्तक में वर्त्तमान सब पशुओं के सींगों के तुल्य उत्तम पद को प्राप्त होकर संसार में स्तुति किये हुए के सत्कार को प्राप्त होते हैं॥१०॥

वन॑स्पते श॒तव॑ल्शो॒ वि रो॑ह स॒हस्र॑वल्शा॒ वि व॒यं रु॑हेम। यं त्वाम॒यं स्वधि॑ति॒स्तेज॑मानः प्रणि॒नाय॑ मह॒ते सौभ॑गाय॥

इस मन्त्र मे वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य ब्रह्मचर्य्य, विद्या, सुशिक्षा, धर्म और पुरुषार्थों से युक्त हुए कार्य्यसिद्धि के अर्थ प्रयत्न करते हैं, वे बाँस आदि वृक्षों के तुल्य सब ओर से बढ़ते हैं। जैसे सुन्दर तीक्ष्ण शस्त्रों से शत्रुओं को जीत के अजातशत्रु होते हैं, उनको जैसे विद्युत् मेघ को वैसे शत्रु दलों को जलाने को समर्थ हो के महान् ऐश्वर्य्य को उत्पन्न करें॥११॥इस सूक्त में विद्वान् वेदपाठी और ब्रह्मचारी के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह आठवाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ॥

सखा॑यस्त्वा ववृमहे दे॒वं मर्ता॑स ऊ॒तये॑। अ॒पां नपा॑तं सु॒भगं॑ सु॒दीदि॑तिं सु॒प्रतू॑र्तिमने॒हस॑म्॥

मनुष्यों को चाहिये कि विद्यादि सौभाग्य जानने के लिये मित्रभाव का आश्रय कर और आप्त सत्य वक्ता विद्वान् के शरण को प्राप्त हो के अहिंसाधर्म का संग्रह करें॥१॥

काय॑मानो व॒ना त्वं यन्मा॒तॄरज॑गन्न॒पः। न तत्ते॑ अग्ने प्र॒मृषे॑ नि॒वर्त॑नं॒ यद्दू॒रे सन्नि॒हाभ॑वः॥

जैसे प्यासा जन जल को पा के तृप्त होता, वैसे ही आप्त, अध्यापक और उपदेशक को विद्यार्थी जन प्राप्त हो के सब ओर से सुखी होता है॥२॥

अति॑ तृ॒ष्टं व॑वक्षि॒थाथै॒व सु॒मना॑ असि। प्रप्रा॒न्ये यन्ति॒ पर्य॒न्य आ॑सते॒ येषां॑ स॒ख्ये असि॑ श्रि॒तः॥

जो लोग मित्रभाव से प्यासे के लिये जल के तुल्य विद्या चाहनेवाले के अर्थ विद्या देकर प्रसन्नरूप करते हैं, वे ही जगत् में पूज्य होते हैं॥३॥

ई॒यि॒वांस॒मति॒ स्रिधः॒ शश्व॑ती॒रति॑ स॒श्चतः॑। अन्वी॑मविन्दन्निचि॒रासो॑ अ॒द्रुहो॒ऽप्सु सिं॒हमि॑व श्रि॒तम्॥

जैसे सिंह को देख के हरिण आदि भाग जाते हैं, वैसे ही सुशिक्षायुक्त विद्वान् प्रजाजनों को देखकर पाखण्डी लोग नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं॥४॥

स॒सृ॒वांस॑मिव॒ त्मना॒ग्निमि॒त्था ति॒रोहि॑तम्। ऐनं॑ नयन्मात॒रिश्वा॑ परा॒वतो॑ दे॒वेभ्यो॑ मथि॒तं परि॑॥

इस मन्त्र में [उपमा और] वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो! जैसे प्रयत्न के साथ मन्थन आदि से उत्पन्न हुए अग्नि को वायु बढ़ाता और दूर पहुँचाता है तथा अग्नि प्राप्त हुए पदार्थों को जलाता है और दूरस्थ पदार्थों को नहीं जलाता, इसी प्रकार ब्रह्मचर्य्य, विद्या, योगाभ्यास, धर्मानुष्ठान और सत्पुरुषों के सङ्ग से साक्षात् किया आत्मा और परमात्मा सब दोषों को जला के सुन्दर प्रकाशित ज्ञान को प्रगट करता है॥५॥

तं त्वा॒ मर्ता॑ अगृभ्णत दे॒वेभ्यो॑ हव्यवाहन। विश्वा॒न्यद्य॒ज्ञाँ अ॑भि॒पासि॑ मानुष॒ तव॒ क्रत्वा॑ यविष्ठ्य॥

हे मनुष्यो! जिसके उपदेश से बुद्धि को प्राप्त होकर समग्र सुखों को आप लोग प्राप्त होवें, उसका सब ओर से सत्कार करो॥६॥

तद्भ॒द्रं तव॑ दं॒सना॒ पाका॑य चिच्छदयति। त्वां यद॑ग्ने प॒शवः॑ स॒मास॑ते॒ समि॑द्धमपिशर्व॒रे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे वन में अग्नि के चारों ओर स्थित हुए पशु सिंह आदि से रक्षित होते हैं, वैसे ही विद्वानों के ज्ञान का आश्रय मनुष्यों की सब ओर के भय से रक्षा करता है॥७॥

आ जु॑होता स्वध्व॒रं शी॒रं पा॑व॒कशो॑चिषम्। आ॒शुं दू॒तम॑जि॒रं प्र॒त्नमीड्यं॑ श्रु॒ष्टी दे॒वं स॑पर्यत॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो बिजुली के तुल्य व्यापक, स्वयंप्रकाशरूप, अविद्यादि दोषों का नाश करनेवाला, सनातन, अनादि काल से प्रशंसा करने योग्य परमात्मा है, उसीका नित्य ध्यान करो॥८॥

त्रीणि॑ श॒ता त्री स॒हस्रा॑ण्य॒ग्निं त्रिं॒शच्च॑ दे॒वा नव॑ चासपर्यन्। औक्ष॑न्घृ॒तैरस्तृ॑णन्ब॒र्हिर॑स्मा॒ आदिद्धोता॑रं॒ न्य॑सादयन्त॥

हे मनुष्यो! जिसके आश्रय में तेंतीस हजार तीनसौ बयालीस तत्त्व हैं, जो एक सबको विद्युत् रूप से व्याप्त है, उस अग्नि के आश्रय से आप लोग सब कार्य्य सिद्ध करो॥९॥इस सूक्त में अग्नि और मनुष्यादि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह नवमाँ सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ॥

त्वाम॑ग्ने मनी॒षिणः॑ स॒म्राजं॑ चर्षणी॒नाम्। दे॒वं मर्ता॑स इन्धते॒ सम॑ध्व॒रे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि सूर्य्यादि रूप से सब जगत् को प्रकाशित और उपकृत कर आनन्दित करता है, वैसे ही परमात्मा अन्तर्यामी रूप से जिज्ञासु योगी लोगों के आत्माओं को विशेष और सामान्य से सबके आत्माओं को प्रकाशित कर और जगत् के असंख्य पदार्थों से उपकृत कर इस लोक-परलोक के सुख देने से सदैव सुखी करता है॥१॥

त्वां य॒ज्ञेष्वृ॒त्विज॒मग्ने॒ होता॑रमीळते। गो॒पा ऋ॒तस्य॑ दीदिहि॒ स्वे दमे॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग सत्य भाषणादि धर्म का अनुष्ठान कर और असत्य भाषणादि रूप अधर्म को छोड़ के आपका भजन करते हैं, वे आपको प्राप्त होके सदा आनन्दित हुए इस संसार में वसते हैं॥२॥

स घा॒ यस्ते॒ ददा॑शति स॒मिधा॑ जा॒तवे॑दसे। सो अ॑ग्ने धत्ते सु॒वीर्यं॒ स पु॑ष्यति॥

जैसे प्राणी अग्नि में घृतादि उत्तम द्रव्य का होम कर वायु आदि की शुद्धि होने से सब आनन्द [को] प्राप्त होते हैं, वैसे ही विद्वान् लोग परमात्मा में अपने आत्मा का समर्पण कर समस्त सुखों को प्राप्त होते हैं॥३॥

स के॒तुर॑ध्व॒राणा॑म॒ग्निर्दे॒वेभि॒रा ग॑मत्। अ॒ञ्जा॒नः स॒प्त होतृ॑भिर्ह॒विष्म॑ते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विज्ञान कर सम्यक् सेवन किया अग्नि दिव्य गुणों को देता है, वैसे ही सेवन किये आप्त विद्वान् जन अहिंसादि रूप धर्म को जताकर श्रोताओं के लिये दिव्य सुखों को देते हैं॥४॥

प्र होत्रे॑ पू॒र्व्यं वचो॒ऽग्नये॑ भरता बृ॒हत्। वि॒पां ज्योतीं॑षि॒ बिभ्र॑ते॒ न वे॒धसे॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे यज्ञ करनेवाले यज्ञ के लिये घृत आदि पदार्थों से उत्तम प्रकार पूर्वक पकाये हुए अन्नों से अग्नि की वृद्धि करते हैं, वैसे ही अध्यापक पुरुष अङ्ग और उपाङ्गों के सहित सम्पूर्ण विद्याओं के प्रचार से विद्यार्थी और श्रोतृजनों को तृप्त करें॥५॥

अ॒ग्निं व॑र्धन्तु नो॒ गिरो॒ यतो॒ जाय॑त उ॒क्थ्यः॑। म॒हे वाजा॑य॒ द्रवि॑णाय दर्श॒तः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। अध्यापक और उपदेशक पुरुषों को ऐसा प्रयत्न करना चाहिये जिससे कि पढ़ने और सुननेवाले जनों की उत्तम शिक्षा, विद्या और सभ्यता बढ़े और वे धनवान् होवें॥६॥

अग्ने॒ यजि॑ष्ठो अध्व॒रे दे॒वान्दे॑वय॒ते य॑ज। होता॑ म॒न्द्रो वि रा॑ज॒स्यति॒ स्रिधः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि उत्तम प्रकार से यन्त्रों में संयुक्त किया हुआ शिल्पविद्या आदि व्यवहारों की सिद्धि करके दारिद्र्य का नाश करता है, वैसे ही पूजित हुए विद्वान् पुरुष विद्या का प्रचार करके अविद्या आदि दुष्ट स्वभावों का नाश करते हैं॥७॥

स नः॑ पावक दीदिहि द्यु॒मद॒स्मे सु॒वीर्य॑म्। भवा॑ स्तो॒तृभ्यो॒ अन्त॑मः स्व॒स्तये॑॥

विद्वज्जन जो कि स्वयं पवित्र हैं, उनको चाहिये कि औरों को भी विद्या और उत्तम शिक्षा से पवित्र करें, जिससे सम्पूर्ण पुरुष मित्र होकर सुख करने के लिये समर्थ हों॥८॥

तं त्वा॒ विप्रा॑ विप॒न्यवो॑ जागृ॒वांसः॒ समि॑न्धते। ह॒व्य॒वाह॒मम॑र्त्यं सहो॒वृध॑म्॥

विद्वान् ही लोग विद्वानों के परिश्रम को जान सकते हैं, अन्य जन नहीं, इससे विद्वज्जन विद्वान् पुरुषों ही का सत्कार करें, मूर्खों का नहीं॥९॥इस सूक्त में अग्नि, परमात्मा और विद्वान् के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह दशवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒ग्निर्होता॑ पु॒रोहि॑तोऽध्व॒रस्य॒ विच॑र्षणिः। स वे॑द य॒ज्ञमा॑नु॒षक्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो पुरुष ब्रह्मचर्य और विद्या आदि उत्तम गुणों के ग्रहण करने में तत्पर होते हैं, वे ही अग्नि आदि पदार्थों को जान कर अर्थात् शिल्पविद्या में निपुण होकर संसार में प्रशंसा होने योग्य कर्मवाले होते हैं॥१॥

स ह॑व्य॒वाळम॑र्त्य उ॒शिग्दू॒तश्चनो॑हितः। अ॒ग्निर्धि॒या समृ॑ण्वति॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि अपने व्यापार से दूत के सदृश कार्य्यों को सिद्ध करता है, वैसे ही विद्वान् लोग राज्य के कार्य्य आदिकों को सिद्ध कर सकते हैं॥२॥

अ॒ग्निर्धि॒या स चे॑तति के॒तुर्य॒ज्ञस्य॑ पू॒र्व्यः। अर्थं॒ ह्य॑स्य त॒रणि॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो पुरुष विद्यारूप यज्ञ को उत्तम प्रकार से जानते हैं, उन्हीं पुरुषों की विद्या की उन्नति होने के लिये सेवा करो॥३॥

अ॒ग्निं सू॒नुं सन॑श्रुतं॒ सह॑सो जा॒तवे॑दसम्। वह्निं॑ दे॒वा अ॑कृण्वत॥

विद्वान् लोगों को चाहिये कि अपने पुत्रों के सदृश और लोगों के पुत्रों को समझ कर स्नेह से विद्यायुक्त और बहुत शास्त्रों को सुननेवाले अर्थात् जिन्होंने बहुत शास्त्र सुने हों, ऐसे करके आनन्दसहित करें॥४॥

अदा॑भ्यः पुरए॒ता वि॒शाम॒ग्निर्मानु॑षीणाम्। तूर्णी॒ रथः॒ सदा॒ नवः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वान् लोग जैसे शीघ्रगामी नवीन रथ से शीघ्र अपने वाञ्छित स्थान को कोई एक मनुष्य पहूँचता है, वैसे वैर को त्याग के सब लोगों को अपनी इच्छानुकूल सद्विद्याओं की शीघ्र शिक्षा देकर उनका जन्म सफल करें॥५॥

सा॒ह्वान्विश्वा॑ अभि॒युजः॒ क्रतु॑र्दे॒वाना॒ममृ॑क्तः। अ॒ग्निस्तु॒विश्र॑वस्तमः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो किसी को नहीं मारता उसको मारने की कोई इच्छा नहीं करता, जो पुरुष बहुत शास्त्रों को पढ़ने और सुनने की इच्छा करता है, वह अति बुद्धिमान् होता है, जो जैसी भावना से प्रजा में वर्त्ताव रखता है, उसके साथ प्रजा भी उसी भावना से वर्त्ताव रखती है॥६॥

अ॒भि प्रयां॑सि॒ वाह॑सा दा॒श्वाँ अ॑श्नोति॒ मर्त्यः॑। क्षयं॑ पाव॒कशो॑चिषः॥

जब मनुष्य विद्वानों की विद्यापदवी को प्राप्त होते हैं, तब ही उनके मनोरथ पूर्ण होते हैं॥७॥

परि॒ विश्वा॑नि॒ सुधि॑ता॒ग्नेर॑श्याम॒ मन्म॑भिः। विप्रा॑सो जा॒तवे॑दसः॥

विद्वान् मनुष्यों को चाहिये कि जैसे बुद्धिमान् विद्वान् सृष्टि और आत्मा की विद्या ग्रहण के लिये प्रयत्न करते हैं, वैसे ही विद्यावृद्धि के लिये प्रयत्न करें॥८॥

अग्ने॒ विश्वा॑नि॒ वार्या॒ वाजे॑षु सनिषामहे। त्वे दे॒वास॒ एरि॑रे॥

हे मनुष्यो! जिस धर्मयुक्त पुरुषार्थ में विद्वान् लोग तुमलोगों को प्रेरणा करें तो जैसे हम लोग उनकी आज्ञानुकूल वर्त्ताव करके विद्या और धन को प्राप्त होवें, वैसे ही उन पुरुषों की आज्ञानुसार वर्त्ताव करके आप लोग भी विद्या और धनयुक्त होइये॥९॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् पुरुष के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह ग्यारहवाँ सूक्त और दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इन्द्रा॑ग्नी॒ आ ग॑तं सु॒तं गी॒र्भिर्नभो॒ वरे॑ण्यम्। अ॒स्य पा॑तं धि॒येषि॒ता॥

हे अध्यापक और उपदेशक पुरुषों! जैसे वायु और सूर्य्य सम्पूर्ण जगत् के रक्षाकारक हैं, वैसे ही विद्या और उत्तम शिक्षा से सम्पूर्ण जगत् के रक्षक हूजिये॥१॥

इन्द्रा॑ग्नी जरि॒तुः सचा॑ य॒ज्ञो जि॑गाति॒ चेत॑नः। अ॒या पा॑तमि॒मं सु॒तम्॥

हे अध्यापक और विद्योपदेशक लोगो! जो पुरुष विद्या के उपदेश ग्रहण करने के लिये आप लोगों के शरण आवें, उनकी जैसे वायु सूर्य्य जगत् की रक्षा करते हैं, वैसे निरन्तर पालना करो॥२॥

इन्द्र॑म॒ग्निं क॑वि॒च्छदा॑ य॒ज्ञस्य॑ जू॒त्या वृ॑णे। ता सोम॑स्ये॒ह तृ॑म्पताम्॥

मनुष्यों को चाहिये कि मूर्ख लोगों का सङ्ग त्याग के और विद्वानों का सङ्ग करके उत्तम आचरण करने से इस संसार में ऐश्वर्य्य का संग्रह करके सदा ही आनन्दयुक्त रहैं॥३॥

तो॒शा वृ॑त्र॒हणा॑ हुवे स॒जित्वा॒नाप॑राजिता। इ॒न्द्रा॒ग्नी वा॑ज॒सात॑मा॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा लोग शत्रुओं के जीतने और शत्रुओं से नहीं हारनेवाले न्यायकर्ता पुरुषों का सन्मानपूर्वक स्वीकार करते हैं, उनका सर्वदा विजय होता है॥४॥

प्र वा॑मर्चन्त्यु॒क्थिनो॑ नीथा॒विदो॑ जरि॒तारः॑। इन्द्रा॑ग्नी॒ इष॒ आ वृ॑णे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो पुरुष पृथिवी आदि पदार्थों के गुण कर्म स्वभावों को जानते हैं, वे ही युद्ध और न्यायाचरण कर सकते हैं॥५॥

इन्द्रा॑ग्नी नव॒तिं पुरो॑ दा॒सप॑त्नीरधूनुतम्। सा॒कमेके॑न॒ कर्म॑णा॥

सभाध्यक्षादि मनुष्यों को चाहिये कि परस्पर एक सम्मति से दुष्ट पुरुषों को उत्तम स्थानों से दूर कर और श्रेष्ठ पुरुषों का सत्कार करके धर्म्मपूर्वक व्यवहार से राज्यप्रबन्ध करें॥६॥

इन्द्रा॑ग्नी॒ अप॑स॒स्पर्युप॒ प्र य॑न्ति धी॒तयः॑। ऋ॒तस्य॑ प॒थ्या॒३॒॑ अनु॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे ईश्वर की सृष्टि में सूर्य्य आदि पदार्थ नियम के साथ अपने-अपने मार्गपर चलते हैं, वैसे ही मनुष्य लोग भी धर्मयुक्त मार्ग में चलें॥७॥

इन्द्रा॑ग्नी तवि॒षाणि॑ वां स॒धस्था॑नि॒ प्रयां॑सि च। यु॒वोर॒प्तूर्यं॑ हि॒तम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो वायु और बिजुली के संयोग के समान परस्पर सेना और सेना के स्वामी प्रेमभाव से विरोध छोड़ के वर्त्ताव करें, तो संपूर्ण मनोरथ सिद्ध हों॥८॥

इन्द्रा॑ग्नी रोच॒ना दि॒वः परि॒ वाजे॑षु भूषथः। तद्वां॑ चेति॒ प्र वी॒र्य॑म्॥

जो राजा लोग राज्यकार्य्य में सब प्रकार से निपुण सेना और सेना के स्वामियों को अधिकार देते हैं, उनका सबकाल में विजय ही होता है॥९॥इस सूक्त में इन्द्र अग्नि अध्यापक उपदेशक और सेना तथा सेना के स्वामी के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्वसूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये॥यह तीसरे मण्डल में बारहवाँ सूक्त पहिला अनुवाक और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

प्र वो॑ दे॒वाया॒ग्नये॒ बर्हि॑ष्ठमर्चास्मै। गम॑द्दे॒वेभि॒रा स नो॒ यजि॑ष्ठो ब॒र्हिरा स॑दत्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो लोग आप लोगों का सत्कार करते हैं, उनका आप लोग भी सत्कार करें। जैसे विद्वज्जन विद्वान् पुरुषों से विद्यायुक्त शुभगुणों को ग्रहण करते हैं, उन विद्वज्जनों की आप लोग भी सेवा करें और हम लोगों को उत्तम गुण प्राप्त हों, ऐसी इच्छा करो॥१॥

ऋ॒तावा॒ यस्य॒ रोद॑सी॒ दक्षं॒ सच॑न्त ऊ॒तयः॑। ह॒विष्म॑न्त॒स्तमी॑ळते॒ तं स॑नि॒ष्यन्तोऽव॑से॥

हे मनुष्यो! जिसकी कीर्त्ति आकाश और पृथिवी में व्याप्त, जिसके न्याय से प्रशस्त रक्षा आदि कर्म होते हैं, उसी विद्वान् सभापति की रक्षा आदि के लिये तुम आश्रय करो॥२॥

स य॒न्ता विप्र॑ एषां॒ स य॒ज्ञाना॒मथा॒ हि षः। अ॒ग्निं तं वो॑ दुवस्यत॒ दाता॒ यो वनि॑ता म॒घम्॥

हे मनुष्यो! जो पुरुष अपने आप धर्मात्मा, जितेन्द्रिय, सत्य का प्रचारक, श्रेष्ठगुणों का देने और ग्रहण करनेवाला, स्वभाव का धर्म में प्रवर्त्तनकर्त्ता होवे, उसकी सम्पूर्ण उपायों से सेवा करो॥३॥

स नः॒ शर्मा॑णि वी॒तये॒ऽग्निर्य॑च्छतु॒ शंत॑मा। यतो॑ नः प्रु॒ष्णव॒द्वसु॑ दि॒वि क्षि॒तिभ्यो॑ अ॒प्स्वा॥

गृहस्थ लोगों को चाहिये कि सर्वदा सुखोत्पादक गृहों को निर्मित करके और जल स्थल अन्तरिक्ष मार्ग से गमन के लिये उत्तम वाहन तथा अन्य यन्त्रादि साधनों को रच कर सम्पूर्ण समृद्धियाँ सञ्चित करें, फिर उनसे अपना विज्ञान बढ़ावें॥४॥

दी॒दि॒वांस॒मपू॑र्व्यं॒ वस्वी॑भिरस्य धी॒तिभिः॑। ऋक्वा॑णो अ॒ग्निमि॑न्धते॒ होता॑रं वि॒श्पतिं॑ वि॒शाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! आप लोगों को इस संसार में श्रेष्ठ पुरुषों का आश्रय करना, दुष्टों का सङ्ग त्यागना, विद्या धन की वृद्धि करनी और विद्या विनय से युक्त राजा का सेवन करना योग्य है, ऐसा समझो॥५॥

उ॒त नो॒ ब्रह्म॑न्नविष उ॒क्थेषु॑ देव॒हूत॑मः। शं नः॑ शोचा म॒रुद्वृ॒धोऽग्ने॑ सहस्र॒सात॑मः॥

मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों के शरण जाके प्रथम से ब्रह्मचर्य्य विद्या आदि का ग्रहण तदनन्तर धन ऐश्वर्य्य की वृद्धि के उपाय की प्रार्थना करें और फिर धन को प्राप्त होके उत्तम विद्यावान् पुरुषों और श्रेष्ठ मार्ग में खर्चें॥६॥

नू नो॑ रास्व स॒हस्र॑वत्तो॒कव॑त्पुष्टि॒मद्वसु॑। द्यु॒मद॑ग्ने सु॒वीर्यं॒ वर्षि॑ष्ठ॒मनु॑पक्षितम्॥

मनुष्यों को चाहिये कि परम ऐश्वर्य्ययुक्त ईश्वर वा किसी विद्वान् पुरुष से प्रार्थना करके प्राप्ति के योग्य विद्या ऐश्वर्य्य उत्तम सन्तान श्रेष्ठ बल पुरुषार्थ से बढ़ावें, जिससे सब जनों की शीघ्र वृद्धि कर सकें॥७॥इस सूक्त में विद्वान् और अग्नि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये॥यह तेरहवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ होता॑ म॒न्द्रो वि॒दथा॑न्यस्थात्स॒त्यो यज्वा॑ क॒वित॑मः॒ स वे॒धाः। वि॒द्युद्र॑थः॒ सह॑सस्पु॒त्रो अ॒ग्निः शो॒चिष्के॑शः पृथि॒व्यां पाजो॑ अश्रेत्॥

जो मनुष्य पदार्थविद्या में कुशल होकर हाथ की कारीगरी से यन्त्रकला सिद्ध करके बिजुली से चलाने योग्य वाहनों को रचें, तो वे अत्यन्त सुख को प्राप्त होवें॥१॥

अया॑मि ते॒ नम॑उक्तिं जुषस्व॒ ऋता॑व॒स्तुभ्यं॒ चेत॑ते सहस्वः। वि॒द्वाँ आ व॑क्षि वि॒दुषो॒ नि ष॑त्सि॒ मध्य॒ आ ब॒र्हिरू॒तये॑ यजत्र॥

जैसे विद्यार्थी लोग नमस्कार आदि सेवा से अध्यापकों को प्रसन्न करें, वैसे अध्यापक लोग उत्तमशिक्षारूप विद्यादान से विद्यार्थियों को प्रसन्न सन्तुष्ट करें॥२॥

द्रव॑तां त उ॒षसा॑ वा॒जय॑न्ती॒ अग्ने॒ वात॑स्य प॒थ्या॑भि॒रच्छ॑। यत्सी॑म॒ञ्जन्ति॑ पू॒र्व्यं ह॒र्विर्भि॒रा ब॒न्धुरे॑व तस्थतुर्दुरो॒णे॥

हे मनुष्यो! जैसे ईश्वर से नियत की सन्ध्या और प्रातःसमय की वेला नियम से वर्त्तमान हैं और जैसे चतुर कारीगरों के बनाये गये कलायन्त्रों से युक्त वाहन नियमसहित जाते आते हैं, वैसे ही अपने आप नियमपूर्वक वर्ताव करके नियत यानों को रचके अपनी इच्छानुकूल व्यवहार को उत्तम प्रकार सिद्ध करें॥३॥

मि॒त्रश्च॒ तुभ्यं॒ वरु॑णः सह॒स्वोऽग्ने॒ विश्वे॑ म॒रुतः॑ सु॒म्नम॑र्चन्। यच्छो॒चिषा॑ सहसस्पुत्र॒ तिष्ठा॑ अ॒भि क्षि॒तीः प्र॒थय॒न्त्सूर्यो॒ नॄन्॥

जो मनुष्य अग्नि आदि पदार्थों से विद्या द्वारा उपकार ग्रहण करें, तो वे परस्पर मित्रों के तुल्य सुखभोग करें॥४॥

व॒यं ते॑ अ॒द्य र॑रि॒मा हि काम॑मुत्ता॒नह॑स्ता॒ नम॑सोप॒सद्य॑। यजि॑ष्ठेन॒ मन॑सा यक्षि दे॒वानस्रे॑धता॒ मन्म॑ना॒ विप्रो॑ अग्ने॥

जैसे अध्यापक लोग शिष्यों की विद्याविषयिणी इच्छा को सन्तृप्त करते हैं, वैसे ही विद्यार्थी जन भी अध्यापकों के मनोरथों को सफल करें और सब काल में संपूर्ण पुरुष विद्या आदि शुभगुणों के देनेवाले होवें॥५॥

त्वद्धि पु॑त्र सहसो॒ वि पू॒र्वीर्दे॒वस्य॒ यन्त्यू॒तयो॒ वि वाजाः॑। त्वं दे॑हि सह॒स्रिणं॑ र॒यिं नो॑ऽद्रो॒घेण॒ वच॑सा स॒त्यम॑ग्ने॥

सकल शिष्य अध्यापक राजपुरुष और प्रजाजनों को चाहिये कि वैर आदि दोषों को त्याग परस्पर स्नेह उत्पन्न करके मेल कर असङ्ख्य धन और विज्ञान परस्पर बढ़ावें॥६॥

तुभ्यं॑ दक्ष कविक्रतो॒ यानी॒मा देव॒ मर्ता॑सो अध्व॒रे अक॑र्म। त्वं विश्व॑स्य सु॒रथ॑स्य बोधि॒ सर्वं॒ तद॑ग्ने अमृत स्वदे॒ह॥

सम्पूर्ण मनुष्यों को चाहिये कि जैसे विद्वान् लोग धर्मयोग्य कर्म करें, वैसे वे भी करें और सम्पूर्ण जन एक सम्मति करके इस संसार में विद्या और सुख की उन्नति करें॥७॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह समझनी चाहिये॥यह चौदहवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

वि पाज॑सा पृ॒थुना॒ शोशु॑चानो॒ बाध॑स्व द्वि॒षो र॒क्षसो॒ अमी॑वाः। सु॒शर्म॑णो बृह॒तः शर्म॑णि स्याम॒ग्नेर॒हं सु॒हव॑स्य॒ प्रणी॑तौ॥

विद्वान् लोगों को चाहिये कि स्वयं दोषरहित हो औरों के दोष छुड़ा और गुण देकर विद्या तथा उत्तम शिक्षा से युक्त करें, जिससे कि सकल जन पक्षपातशून्य न्याययुक्त धर्म में दृढ़भाव से प्रवृत्त होवें॥१॥

त्वं नो॑ अ॒स्या उ॒षसो॒ व्यु॑ष्टौ॒ त्वं सूर॒ उदि॑ते बोधि गो॒पाः। जन्मे॑व॒ नित्यं॒ तन॑यं जुषस्व॒ स्तोमं॑ मे अग्ने त॒न्वा॑ सुजात॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे गर्भाशय में वर्त्तमान पुरुष गर्भों के स्वरूप को नहीं जानते हैं, वैसे ही निद्रावस्थापन्न और अविद्या में लिप्त पुरुष विज्ञान से रहित होते हैं और जैसे जन्मधारण होने के अनन्तर शरीरसहित जीवात्मा प्रकट होता है, वैसे ही निद्रा को त्याग के प्रातःकाल में जागृत पुरुषों के सदृश अविद्या को त्याग के विद्या में कुशल जन प्रशंसनीय होते हैं॥२॥

त्वं नृ॒चक्षा॑ वृष॒भानु॑ पू॒र्वीः कृ॒ष्णास्व॑ग्ने अरु॒षो वि भा॑हि। वसो॒ नेषि॑ च॒ पर्षि॒ चात्यंहः॑ कृ॒धी नो॑ रा॒य उ॒शिजो॑ यविष्ठ॥

हे विद्वान् पुरुषो! आप लोगों को चाहिये कि जैसे सूर्य्य अपने किरणों के द्वारा सब जनों का पालन करता है, वैसे विद्या और उत्तम शिक्षा से संपूर्ण प्रजा को विद्या धन से युक्त तथा पाप से निवृत्त करके पुण्य कर्मों में प्रीतिपूर्वक प्रवृत्त करावें॥३॥

अषा॑ळ्हो अग्ने वृष॒भो दि॑दीहि॒ पुरो॒ विश्वाः॒ सौभ॑गा संजिगी॒वान्। य॒ज्ञस्य॑ ने॒ता प्र॑थ॒मस्य॑ पा॒योर्जात॑वेदो बृह॒तः सु॑प्रणीते॥

हे राजपुरुषो! विद्या और विनय से सम्पूर्ण प्रजाओं को प्रसन्न तथा ब्रह्मचर्य्य आदि आश्रमों के निर्वाह से उनमें विद्या उत्तम शिक्षा श्रेष्ठता अतिकाल जीवन आदि बढ़ाय के ऐश्वर्य्यों का आधिक्य कीजिये॥४॥

अच्छि॑द्रा॒ शर्म॑ जरितः पु॒रूणि॑ दे॒वाँ अच्छा॒ दीद्या॑नः सुमे॒धाः। रथो॒ न सस्नि॑र॒भि व॑क्षि॒ वाज॒मग्ने॒ त्वं रोद॑सी नः सु॒मेके॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सुडौल बने हुए और दृढ रथ से अभिवाञ्छित स्थानों को शीघ्र पहुँचते हैं, वैसे ही जो पुरुष आलस्य त्याग कर पुरुषार्थी हैं, वे उत्तम स्थानों की कामना करते हुए विद्वानों के सङ्ग द्वारा श्रेष्ठगुणों से संयुक्त होकर अन्य जनों के लिये भी उपदेश देते हैं, वे पुरुष उत्तम प्रकार सुख भोगते हैं॥५॥

प्र पी॑पय वृषभ॒ जिन्व॒ वाजा॒नग्ने॒ त्वं रोद॑सी नः सु॒दोघे॑। दे॒वेभि॑र्देव सु॒रुचा॑ रुचा॒नो मा नो॒ मर्त॑स्य दुर्म॒तिः परि॑ ष्ठात्॥

जिस देश में विद्वान् लोग प्रीति से सबलोगों को बढ़ाने की इच्छा करते हैं और दुष्ट बुद्धि का नाश करते हैं, वहाँ सबलोग वृद्धि को प्राप्त विज्ञानरूप धनवाले होते हैं॥६॥

इळा॑मग्ने पुरु॒दंसं॑ स॒निं गोः श॑श्वत्त॒मं हव॑मानाय साध। स्यान्नः॑ सू॒नुस्तन॑यो वि॒जावाग्ने॒ सा ते॑ सुम॒तिर्भू॑त्व॒स्मे॥

विद्वानों को चाहिये कि जिज्ञासु जनों के लिये विद्या उत्तमशिक्षा धर्मानुष्ठान तथा ऐश्वर्यवृद्धि सिद्ध करें और जैसे कि सम्पूर्ण मनुष्यों के लड़के लड़कियाँ उत्तम कर्मयुक्त तथा सबके सन्तान विद्या बल युक्त होवें, ऐसा प्रयत्न करें अर्थात् सब स्थान से विद्या ग्रहण करके सबको देवें॥७॥इस सूक्त में विद्वान् अध्यापक अध्येता और अग्नि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये॥यह पन्द्रहवाँ सूक्त और पन्द्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒यम॒ग्निः सु॒वीर्य॒स्येशे॑ म॒हः सौभ॑गस्य। रा॒य ई॑शे स्वप॒त्यस्य॒ गोम॑त॒ ईशे॑ वृत्र॒हथा॑नाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्य लोग जैसे उत्तम प्रकार होम तथा यन्त्र आदि से सिद्ध किये हुए अग्नि से उत्तम बल श्रेष्ठ ऐश्वर्य्य और उत्तम सन्तानों को प्राप्त होके शत्रु लोगों का नाश करते, वैसे ही मनुष्य लोगों को चाहिये कि उत्तम पुरुषार्थ से उत्तम सेना अतुल ऐश्वर्य्य शरीर आत्मा बल से युक्त सन्तानों को प्राप्त होकर शत्रुओं के समान क्रोध आदि दोषों को त्यागें॥१॥

इ॒मं न॑रो मरुतः सश्चता॒ वृधं॒ यस्मि॒न्रायः॒ शेवृ॑धासः। अ॒भि ये सन्ति॒ पृत॑नासु दू॒ढ्यो॑ वि॒श्वाहा॒ शत्रु॑माद॒भुः॥

राजपुरुषों को चाहिये कि जिस प्रकार धन राजस्थिति और प्रतिष्ठा बढ़े और जिस प्रकार सेनाओं में उत्तम वीर पुरुष होवें, वैसा सत्य व्यवहार सदा करें॥२॥

स त्वं नो॑ रा॒यः शि॑शीहि॒ मीढ्वो॑ अग्ने सु॒वीर्य॑स्य। तुवि॑द्युम्न॒ वर्षि॑ष्ठस्य प्र॒जाव॑तोऽनमी॒वस्य॑ शु॒ष्मिणः॑॥

जो मनुष्य धन से सेना श्रेष्ठता प्रजा आरोग्य और बल को बढ़ाते हैं, वे लोग सर्वदा बहुत धनवाले होते हैं॥३॥

चक्रि॒र्यो विश्वा॒ भुव॑ना॒भि सा॑स॒हिश्चक्रि॑र्दे॒वेष्वा दुवः॑। आ दे॒वेषु॒ यत॑त॒ आ सु॒वीर्य॒ आ शंस॑ उ॒त नृ॒णाम्॥

हे मनुष्यो! जिसने सम्पूर्ण लोक तथा मनुष्य आदि प्राणी रचे और उन प्राणियों के जीवनार्थ अन्न आदि पदार्थ रचे और जो विद्वानों से जानने योग्य उस ही परमात्मा का निरन्तर सेवन करना चाहिये॥४॥

मा नो॑ अ॒ग्नेऽम॑तये॒ मावीर॑तायै रीरधः। मागोता॑यै सहसस्पुत्र॒ मा नि॒देऽप॒ द्वेषां॒स्या कृ॑धि॥

ज्ञान सुख की इच्छा करनेवाले पुरुषों को चाहिये कि विद्वानों के समीप प्राप्त होकर बुद्धि वीरता जितेन्द्रियता विद्या उत्तम शिक्षा धर्म और ब्रह्मज्ञान की प्रार्थना करें तथा निन्दा आदि दोष और निन्दक पुरुषों का सङ्ग त्याग के सभ्यता ग्रहण करें॥५॥

श॒ग्धि वाज॑स्य सुभग प्र॒जाव॒तोऽग्ने॑ बृह॒तो अ॑ध्व॒रे। सं रा॒या भूय॑सा सृज मयो॒भुना॒ तुवि॑द्युम्न॒ यश॑स्वता॥

मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों के सङ्ग से यह प्रार्थना करें कि हे विद्वानों! हम लोगों को विद्या विनय और धन सुखों से संयुक्त करो॥६॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुणों के वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये॥यह सोलहवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

स॒मि॒ध्यमा॑नः प्रथ॒मानु॒ धर्मा॒ समु॒क्तभि॑रज्यते वि॒श्ववा॑रः। शो॒चिष्के॑शो घृ॒तनि॑र्णिक्पाव॒कः सु॑य॒ज्ञो अ॒ग्निर्य॒जथा॑य दे॒वान्॥

जो अति गुणों से युक्त अग्नि आदि पदार्थ से कार्य्यों को सिद्ध करें, तो सम्पूर्ण कार्य्य मनुष्य सिद्ध कर सकते हैं॥१॥

यथाय॑जो हो॒त्रम॑ग्ने पृथि॒व्या यथा॑ दि॒वो जा॑तवेदश्चिकि॒त्वान्। ए॒वानेन॑ ह॒विषा॑ यक्षि दे॒वान्म॑नु॒ष्वद्य॒ज्ञं प्र ति॑रे॒मम॒द्य॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य इस सृष्टि में संपूर्ण प्राण आदिकों से भी कार्य्य होने योग्य व्यवहार को सिद्ध करते, वे श्रेष्ठ विज्ञान को प्राप्त होते हैं॥२॥

त्रीण्यायूं॑षि॒ तव॑ जातवेदस्ति॒स्र आ॒जानी॑रु॒षस॑स्ते अग्ने। ताभि॑र्दे॒वाना॒मवो॑ यक्षि वि॒द्वानथा॑ भव॒ यज॑मानाय॒ शं योः॥

जो मनुष्य बहुत काल पर्य्यन्त ब्रह्मचर्य्य नियत भोजन और विहार से आयु बढ़ाने की इच्छा करें तो त्रिगुण अर्थात् तीनसौ वर्ष तक जीवन हो सकता है॥३॥

अ॒ग्निं सु॑दी॒तिं सु॒दृशं॑ गृ॒णन्तो॑ नम॒स्याम॒स्त्वेड्यं॑ जातवेदः। त्वां दू॒तम॑र॒तिं ह॑व्य॒वाहं॑ दे॒वा अ॑कृण्वन्न॒मृत॑स्य॒ नाभि॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो पुरुष अग्नि के सदृश तेजस्वी विज्ञानदाता विद्वान् लोग धर्म अर्थ काम और मोक्ष के साधनों का उपदेश दें, उनकी नित्य नमस्कारपूर्वक सेवा करनी चाहिये॥४॥

यस्त्वद्धोता॒ पूर्वो॑ अग्ने॒ यजी॑यान्द्वि॒ता च॒ सत्ता॑ स्व॒धया॑ च शं॒भुः। तस्यानु॒ धर्म॒ प्र य॑जा चिकि॒त्वोऽथा॑ नो धा अध्व॒रं दे॒ववी॑तौ॥

हे मनुष्यो! जो विद्वान् लोग आप लोगों की अपेक्षा प्राचीन तथा अन्न आदि सामग्रियों से अहिंसाख्य व्यवहार को धारण किया करें, इससे वे सर्वदा सुखभोगी हों॥५॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, ऐसा जानना चाहिये॥यह सत्रहवाँ सूक्त और सत्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

भवा॑ नो अग्ने सु॒मना॒ उपे॑तौ॒ सखे॑व॒ सख्ये॑ पि॒तरे॑व सा॒धुः। पु॒रु॒द्रुहो॒ हि क्षि॒तयो॒ जना॑नां॒ प्रति॑ प्रती॒चीर्द॑हता॒दरा॑तीः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो आप लोगों को चाहिये कि जो विद्वान् लोग मनुष्य आदि प्राणियों में पिता और मित्र के तुल्य वर्त्तावकारी उनका सत्कार और जो द्वेषकारी उनका निरादर करके धर्मवृद्धि करें॥१॥

तपो॒ ष्व॑ग्ने॒ अन्त॑राँ अ॒मित्रा॒न् तपा॒ शंस॒मर॑रुषः॒ पर॑स्य। तपो॑ वसो चिकिता॒नो अ॒चित्ता॒न्वि ते॑ तिष्ठन्ताम॒जरा॑ अ॒यासः॑॥

जो मनुष्य शत्रुओं को पृथक् कर धार्मिक यथार्थवक्ता सत्यवादी पुरुषों का सत्कार करके सब जनों के लिये सुखवृद्धि करते हैं, वे भी सुख पाते हैं॥२॥

इ॒ध्मेना॑ग्न इ॒च्छमा॑नो घृ॒तेन॑ जु॒होमि॑ ह॒व्यं तर॑से॒ बला॑य। याव॒दीशे॒ ब्रह्म॑णा॒ वन्द॑मान इ॒मां धियं॑ शत॒सेया॑य दे॒वीम्॥

जैसे इन्धन और घृत से अग्नि बढ़ती है, वैसे ही ब्रह्मचर्य्य तथा वेद के अभ्यास से बल और विद्या बढ़ती है। जितना वेद से ब्रह्मचर्य्य रखना योग्य है, उतना अभ्यास करना चाहिये॥३॥

उच्छो॒चिषा॑ सहसस्पुत्र स्तु॒तो बृ॒हद्वयः॑ शशमा॒नेषु॑ धेहि। रे॒वद॑ग्ने वि॒श्वामि॑त्रेषु॒ शं योर्म॑र्मृ॒ज्मा ते॑ त॒न्वं१॒॑ भूरि॒ कृत्वः॑॥

हे पुरुषो! आप लोगों को चाहिये कि ब्रह्मचर्य्य द्वारा विद्या और अवस्था बढ़ा सब लोगों के साथ मित्रता करके सकल जनों को अधिक अवस्थायुक्त तथा बहुत विद्यावान् करो॥४॥

कृ॒धि रत्नं॑ सुसनित॒र्धना॑नां॒ स घेद॑ग्ने भवसि॒ यत्समि॑द्धः। स्तो॒तुर्दु॑रो॒णे सु॒भग॑स्य रे॒वत्सृ॒प्रा क॒रस्ना॑ दधिषे॒ वपूं॑षि॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वानो! आप लोगों को चाहिये कि मनुष्यों को उत्तम प्रकार शिक्षा तथा पुरुषार्थ से युक्त और विद्या धनयुक्त करके उत्तम सभ्य चिरञ्जीवी जन बनाइये॥५॥इस सूक्त में विद्वान् और अग्नि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह अठारहवाँ सूक्त और अठारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒ग्निं होता॑रं॒ प्र वृ॑णे मि॒येधे॒ गृत्सं॑ क॒विं वि॑श्व॒विद॒ममू॑रम्। स नो॑ यक्षद्दे॒वता॑ता॒ यजी॑यान्रा॒ये वाजा॑य वनते म॒घानि॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि जिस अधिकार में जिस पुरुष की योग्यता हो, उसी ही के लिये वह अधिकार देवें, क्योंकि ऐसा करने पर धनधान्यरूप ऐश्वर्य्य की वृद्धि हो सकती है॥१॥

प्र ते॑ अग्ने ह॒विष्म॑तीमिय॒र्म्यच्छा॑ सुद्यु॒म्नां रा॒तिनीं॑ घृ॒ताची॑म्। प्र॒द॒क्षि॒णिद्दे॒वता॑तिमुरा॒णः सं रा॒तिभि॒र्वसु॑भिर्य॒ज्ञम॑श्रेत्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि दिन में शयन छोड़ सांसारिक व्यवहार की सिद्धि के लिये परिश्रम कर रात्रि के समय स्वस्थतापूर्वक पञ्चदश १५ घटिका पर्यन्त निद्रालु होवें और दिन भर पुरुषार्थ से धन आदि उत्तम पदार्थों को प्राप्त होकर सुपात्र पुरुष तथा सन्मार्ग में दान देवें॥२॥

स तेजी॑यसा॒ मन॑सा॒ त्वोत॑ उ॒त शि॑क्ष स्वप॒त्यस्य॑ शि॒क्षोः। अग्ने॑ रा॒यो नृत॑मस्य॒ प्रभू॑तौ भू॒याम॑ ते सुष्टु॒तय॑श्च॒ वस्वः॑॥

जो पुरुष ब्रह्मचर्य्य और विद्या से धर्मसम्बन्धी कामों को करके निष्कपट अन्तःकरण तथा आत्मा से प्रयत्न करें, उनको धनपति का अधिकार देना योग्य है॥३॥

भूरी॑णि॒ हि त्वे द॑धि॒रे अनी॒काऽग्ने॑ दे॒वस्य॒ यज्य॑वो॒ जना॑सः। स आ व॑ह दे॒वता॑तिं यविष्ठ॒ शर्धो॒ यद॒द्य दि॒व्यं यजा॑सि॥

जो मनुष्य विद्वानों के सङ्ग से बहुत सी उत्तम प्रकार शिक्षित सेनाओं को ग्रहण करें, वे अतिबल को प्राप्त होके उत्तम गुणों का आकर्षण करें॥४॥

यत्त्वा॒ होता॑रम॒नज॑न्मि॒येधे॑ निषा॒दय॑न्तो य॒जथा॑य दे॒वाः। स त्वं नो॑ अग्नेऽवि॒तेह बो॒ध्यधि॒ श्रवां॑सि धेहि नस्त॒नूषु॑॥

हे विद्वान् मनुष्यो! जिन अधिकारों में आप लोग नियुक्त किये जायें, उन अधिकारों में उत्तम प्रकार वर्त्तमान होके सर्व जनों को श्रेष्ठ बनाइये और जिस शिक्षा से विद्या सभ्यता आरोग्यता और अवस्था बढ़े, ऐसा उपाय निरन्तर करो॥५॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥यह उन्नीसवाँ सूक्त और उन्नीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒ग्निमु॒षस॑म॒श्विना॑ दधि॒क्रां व्यु॑ष्टिषु हवते॒ वह्नि॑रु॒क्थैः। सु॒ज्योति॑षो नः शृण्वन्तु दे॒वाः स॒जोष॑सो अध्व॒रं वा॑वशा॒नाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे वायु संपूर्ण प्रकाशकारी सूर्य आदि पदार्थों के धारण द्वारा सब जीवों का उपकार करता, वैसे विद्वान् पुरुष सम्पूर्ण जनों के साथ वैर छोड़नारूप अहिंसा धर्म के प्रचार के लिये एकसम्मति से सब संसार का उपकार करें॥१॥

अग्ने॒ त्री ते॒ वाजि॑ना॒ त्री ष॒धस्था॑ ति॒स्रस्ते॑ जि॒ह्वा ऋ॑तजात पू॒र्वीः। ति॒स्र उ॑ ते त॒न्वो॑ दे॒ववा॑ता॒स्ताभि॑र्नः पाहि॒ गिरो॒ अप्र॑युच्छन्॥

हे मनुष्यो! आप लोग ब्रह्मचर्य्य अध्ययन और विचार से तीन कर्म करके तीन जन्म स्थान और नामों में कृतकृत्य अर्थात् जन्म सफल करो, पढ़ाने तथा उपदेश से सबकी रक्षा करो और आप स्वयं प्रमादरहित होकर अन्य लोगों को वैसा ही करो॥२॥

अग्ने॒ भूरी॑णि॒ तव॑ जातवेदो॒ देव॑ स्वधावो॒ऽमृत॑स्य॒ नाम॑। याश्च॑ मा॒या मा॒यिनां॑ विश्वमिन्व॒ त्वे पू॒र्वीः सं॑द॒धुः पृ॑ष्टबन्धो॥

हे मनुष्यो! आप लोग सम्पूर्ण संसार ईश्वर से व्याप्य अर्थात् पूरित जानो और छली पुरुषों के छल को नाश तथा परमेश्वर के अर्थ सहित सम्पूर्ण नाम जान के अर्थ के अनुकूल भाव से अपने आचरणों को शुद्ध करो॥३॥

अ॒ग्निर्ने॒ता भग॑इव क्षिती॒नां दैवी॑नां दे॒व ऋ॑तु॒पा ऋ॒तावा॑। स वृ॑त्र॒हा स॒नयो॑ वि॒श्ववे॑दाः॒ पर्ष॒द्विश्वाति॑ दुरि॒ता गृ॒णन्त॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे अग्नि सूर्य्य आदिरूप धारण करके पृथिवी आदि पदार्थों को नियमपूर्वक अपने स्थान में स्थित रखता और जैसे जगदीश्वर सर्वदा संपूर्ण जगत् की व्यवस्था करता है, वैसे ही उपासित हुआ ईश्वर तथा सेवित हुआ विद्वान् पुरुष संपूर्ण पापाचरणों से पृथक् करके दुःखरूप समुद्र के पार पहुँचाता है॥४॥

द॒धि॒क्राम॒ग्निमु॒षसं॑ च दे॒वीं बृह॒स्पतिं॑ सवि॒तारं॑ च दे॒वम्। अ॒श्विना॑ मि॒त्रावरु॑णा॒ भगं॑ च॒ वसू॑न्रु॒द्राँ आ॑दि॒त्याँ इ॒ह हु॑वे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सब मनुष्यों को चाहिये कि जैसे विद्वान् लोग इस सृष्टि के उपकारक पदार्थों से संपूर्ण कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वैसे ही उन पदार्थों के गुणों को जानकर सम्पूर्ण अभीष्ट कार्यों को सिद्ध करें और सर्व जनों से ईश्वर-उपासना करने योग्य है॥५॥इस सूक्त में अग्नि आदि और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह बीसवाँ सूक्त और बीसवाँ वर्ग पूरा हुआ॥

इ॒मं नो॑ य॒ज्ञम॒मृते॑षु धेही॒मा ह॒व्या जा॑तवेदो जुषस्व। स्तो॒काना॑मग्ने॒ मेद॑सो घृ॒तस्य॒ होतः॒ प्राशा॑न प्रथ॒मो नि॒षद्य॑॥

जैसे अन्न जल आदि का दाता पुरुष अन्य पुरुषों को प्रिय होता वैसे विद्या उत्तम शिक्षा और धर्म सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करानेवाला जन इन कर्मों को जानने की इच्छायुक्त पुरुषों का प्रिय होता है॥१॥

घृ॒तव॑न्तः पावक ते स्तो॒काः श्चो॑तन्ति॒ मेद॑सः। स्वध॑र्मन्दे॒ववी॑तये॒ श्रेष्ठं॑ नो धेहि॒ वार्य॑म्॥

जैसे अग्नि जल आदि पदार्थों को अपने कर्म से शुद्ध कर वर्षा आदि रूप से संपूर्ण पदार्थों को सींच कर सब जीवों की रक्षा करते हैं, वैसे ही विद्या और धर्म के उपदेशक लोग संपूर्ण मनुष्यों का पालन करते हैं॥२॥

तुभ्यं॑ स्तो॒का घृ॑त॒श्चुतोऽग्ने॒ विप्रा॑य सन्त्य। ऋषिः॒ श्रेष्ठः॒ समि॑ध्यसे य॒ज्ञस्य॑ प्रावि॒ता भ॑व॥

हे विद्वान् लोगो! जो लोग आपकी स्तुति करते हैं, उन पुरुषों को आप लोग वेद के अर्थ ज्ञानवाले कीजिये, जिससे एक सम्मति से परस्पर रक्षा होवे॥३॥

तुभ्यं॑ श्चोतन्त्यध्रिगो शचीवः स्तो॒कासो॑ अग्ने॒ मेद॑सो घृ॒तस्य॑। क॒वि॒श॒स्तो बृ॑ह॒ता भा॒नुनागा॑ ह॒व्या जु॑षस्व मेधिर॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जल से सींच कर वृक्षों को बढ़ाय फल प्राप्त होते हैं, वैसे ही सत्सङ्ग से सत्पुरुषों का सेवन करके विज्ञान आदि फलों को प्राप्त करें॥४॥

ओजि॑ष्ठं ते मध्य॒तो मेद॒ उद्भृ॑तं॒ प्र ते॑ व॒यं द॑दामहे। श्चोत॑न्ति ते वसो स्तो॒का अधि॑ त्व॒चि प्रति॒ तान्दे॑व॒शो वि॑हि॥

जो पुरुष बहुत ही उत्तम वस्तु जिस पुरुष को देवे, उस पुरुष को चाहिये कि उसे देनेवाले पुरुष को वैसी ही वस्तु देवे और जो लोग विद्वानों के सत्सङ्ग से श्रेष्ठ गुणों को प्राप्त होते हैं, वे संपूर्ण जनों को कोमल स्वभावयुक्त कर सकते हैं॥५॥इस सूक्त में अग्नि और मनुष्यों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह इक्कीसवाँ सूक्त और इक्कीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒यं सो अ॒ग्निर्यस्मि॒न्त्सोम॒मिन्द्रः॑ सु॒तं द॒धे ज॒ठरे॑ वावशा॒नः। स॒ह॒स्रिणं॒ वाज॒मत्यं॒ न सप्तिं॑ सस॒वान्त्सन्त्स्तू॑यसे जातवेदः॥

जो मनुष्य विद्या से अग्नि को चलावें, तो यह अग्नि हजारों घोड़ों के बल को धारण करता है॥१॥

अग्ने॒ यत्ते॑ दि॒वि वर्चः॑ पृथि॒व्यां यदोष॑धीष्व॒प्स्वा य॑जत्र। येना॒न्तरि॑क्षमु॒र्वा॑त॒तन्थ॑ त्वे॒षः स भा॒नुर॑र्ण॒वो नृ॒चक्षाः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो बिजुली नामक तेज सूर्य्य वायु भूमि और जल में तथा अन्य पदार्थों ओषधी आदि में वर्त्तमान, उसको जान के सुख का विस्तार करो॥२॥

अग्ने॑ दि॒वो अर्ण॒मच्छा॑ जिगा॒स्यच्छा॑ दे॒वाँ ऊ॑चिषे॒ धिष्ण्या॒ ये। या रो॑च॒ने प॒रस्ता॒त्सूर्य॑स्य॒ याश्चा॒वस्ता॑दुप॒तिष्ठ॑न्त॒ आपः॑॥

जैसे सूर्य्य अन्धकार का नाश कर दिन को उत्पन्न कर और जल की वृष्टि करके सम्पूर्ण संसार का सुखकारक होता है, वैसे ही विद्वान् लोग अविद्या का नाश विद्या की उत्पत्ति और सुख की वृष्टि करके सबको आनन्दित करते हैं॥३॥

पु॒री॒ष्या॑सो अ॒ग्नयः॑ प्राव॒णेभिः॑ स॒जोष॑सः। जु॒षन्तां॑ य॒ज्ञम॒द्रुहो॑ऽनमी॒वा इषो॑ म॒हीः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि आदि पदार्थ परस्पर मिलकर अनेक कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वैसे ही मित्रभाव से वर्त्तमान रोग से रहित हुए विद्वान् लोग धनधान्य ऐश्वर्य्य और विद्या को प्राप्त होवें॥४॥

इळा॑मग्ने पुरु॒दंसं॑ स॒निं गोः श॑श्वत्त॒मं हव॑मानाय साध। स्यान्नः॑ सू॒नुस्तन॑यो वि॒जावाग्ने॒ सा ते॑ सुम॒तिर्भू॑त्व॒स्मे॥

विद्वान् पुरुष विद्या ग्रहण करने की इच्छा करनेवाले पुरुष के लिये विद्या को सिद्ध करे तथा सबसे गुणों का ग्रहण करे॥५॥इस सूक्त में अग्नि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह बाइसवाँ सूक्त और बाइसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

निर्म॑थितः॒ सुधि॑त॒ आ स॒धस्थे॒ युवा॑ क॒विर॑ध्व॒रस्य॑ प्रणे॒ता। जूर्य॑त्स्व॒ग्निर॒जरो॒ वने॒ष्वत्रा॑ दधे अ॒मृतं॑ जा॒तवे॑दाः॥

हे मनुष्यो! कलायन्त्र आदिकों से युक्त वाहनों में अत्यन्त मथित होकर चलाया गया अग्नि सकल जनों के लिये वाहनों को वेगपूर्वक चलाता है, यह जानना चाहिये॥१॥

अम॑न्थिष्टां॒ भार॑ता रे॒वद॒ग्निं दे॒वश्र॑वा दे॒ववा॑तः सु॒दक्ष॑म्। अग्ने॒ वि प॑श्य बृह॒ताभि रा॒येषां नो॑ ने॒ता भ॑वता॒दनु॒ द्यून्॥

हे मनुष्यो! जैसे शिल्पविद्या के पढ़ने-पढ़ानेवाले लोग पदार्थों के क्रयविक्रय से धनवान् होते हैं, वैसे ही आप लोग भी होइये॥२॥

दश॒ क्षिपः॑ पू॒र्व्यं सी॑मजीजन॒न्त्सुजा॑तं मा॒तृषु॑ प्रि॒यम्। अ॒ग्निं स्तु॑हि दैववा॒तं दे॑वश्रवो॒ यो जना॑ना॒मस॑द्व॒शी॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे हाथों की अङ्गुलियों से बहुत कार्य्यं सिद्ध होते हैं, वैसे ही अग्नि आदिकों से बहुत कार्यों को आप लोग सिद्ध करो॥३॥

नि त्वा॑ दधे॒ वर॒ आ पृ॑थि॒व्या इळा॑यास्प॒दे सु॑दिन॒त्वे अह्ना॑म्। दृ॒षद्व॑त्यां॒ मानु॑ष आप॒यायां॒ सर॑स्वत्यां रे॒वद॑ग्ने दिदीहि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि परस्पर मित्रभाव से वर्त्तमान करके विद्याधर्म सज्जनता और सुखों को बढ़ावें॥४॥

इळा॑मग्ने पुरु॒दंसं॑ स॒निं गोः श॑श्वत्त॒मं हव॑मानाय साध। स्यान्नः॑ सू॒नुस्तन॑यो वि॒जावाग्ने॒ सा ते॑ सुम॒तिर्भू॑त्व॒स्मे॥

मनुष्यों को चाहिये कि परस्पर जनों के प्रति शुभगुणों के ग्रहण और दान का उपदेश दें और अपने सन्तानों को विद्या सुशिक्षा और विज्ञानों को निरन्तर बढ़ावें॥५॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् मनुष्यों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह तेईसवाँ सूक्त और तेईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अग्ने॒ सह॑स्व॒ पृत॑ना अ॒भिमा॑ती॒रपा॑स्य। दु॒ष्टर॒स्तर॒न्नरा॑ती॒र्वर्चो॑ धा य॒ज्ञवा॑हसे॥

राजपुरुषों को चाहिये कि अपनी प्रजा और सेनाओं को बलयुक्त कर और दुष्ट शत्रुओं को राज्य से पृथक् करके प्रजा की वृद्धि के लिये धन और विद्या की निरन्तर उन्नति करें॥१॥

अग्न॑ इ॒ळा समि॑ध्यसे वी॒तिहो॑त्रो॒ अम॑र्त्यः। जु॒षस्व॒ सू नो॑ अध्व॒रम्॥

विद्वानों को चाहिये कि जिससे अपनी वृद्धि हो, उसीसे अन्य जनों की उन्नति करें॥२॥

अग्ने॑ द्यु॒म्नेन॑ जागृवे॒ सह॑सः सूनवाहुत। एदं ब॒र्हिः स॑दो॒ मम॑॥

जो राजपुरुष यश बलयुक्त राजधर्म में कुशल न्यायाधीश हों, वे अखण्डित राज्य की पालना कर सकें॥३॥

अग्ने॒ विश्वे॑भिर॒ग्निभि॑र्दे॒वेभि॑र्महया॒ गिरः॑। य॒ज्ञेषु॒ य उ॑ चा॒यवः॑॥

जो राजपुरुष इस संसार में उत्तम कार्य्यों के कर्त्ता हों, उनका सब लोग सत्कार करें और जो दुष्ट कर्म करते हों, उनका अपमान करें॥४॥

अग्ने॒ दा दा॒शुषे॑ र॒यिं वी॒रव॑न्तं॒ परी॑णसम्। शि॒शी॒हि नः॑ सूनु॒मतः॑॥

जो विद्या और धन के दाता विद्वान् हों, उनके प्रति ऐसा कहना चाहिये कि आप लोग हम लोगों की सब प्रकार वृद्धि करो॥५॥इस सूक्त में अग्नि, राजा और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह चौबीसवाँ सूक्त और चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अग्ने॑ दि॒वः सू॒नुर॑सि॒ प्रचे॑ता॒स्तना॑ पृथि॒व्या उ॒त वि॒श्ववे॑दाः। ऋध॑ग्दे॒वाँ इ॒ह य॑जा चिकित्वः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य संपूर्ण स्वरूपवाले द्रव्यों का प्रकाशक है, वैसे विद्वान् और विद्वानों से प्रेमकारी पुरुष इस संसार में सर्वजनों के आत्माओं के प्रकाशक होते हैं॥१॥

अ॒ग्निः स॑नोति वी॒र्या॑णि वि॒द्वान्त्स॒नोति॒ वाज॑म॒मृता॑य॒ भूष॑न्। स नो॑ दे॒वाँ एह व॑हा पुरुक्षो॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य आकारवाले पदार्थों को उत्तम प्रकार शोभित करता है, वैसे ही विद्वान् लोग विद्या उत्तम शिक्षा और सभ्यता से संपूर्ण मनुष्यों को शोभित करें॥२॥

अ॒ग्निर्द्यावा॑पृथि॒वी वि॒श्वज॑न्ये॒ आ भा॑ति दे॒वी अ॒मृते॒ अमू॑रः। क्षय॒न्वाजैः॑ पुरुश्च॒न्द्रो नमो॑भिः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग पृथिवी के सदृश क्षमाशील, सूर्य्य के सदृश सत्य असत्य के प्रकाशकर्ता, मूढ़ लोगों को उपदेशदाता और सब लोगों को धार्मिक करते हैं, उन लोगों का ही सत्कार करना चाहिये॥३॥

अग्ने॒ इन्द्र॑श्च दा॒शुषो॑ दुरो॒णे सु॒ताव॑तो य॒ज्ञमि॒होप॑ यातम्। अम॑र्धन्ता सोम॒पेया॑य देवा॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जहाँ वायु और बिजुली के तुल्य वर्त्तमान अविद्या के विनाश और विद्या के प्रकाशकर्त्ता धर्म के उपदेशकर्त्ता अध्यापक और उपदेशक होवें, वहाँ संपूर्ण सुख बढ़े॥४॥

अग्ने॑ अ॒पां समि॑ध्यसे दुरो॒णे नित्यः॑ सूनो सहसो जातवेदः। स॒धस्था॑नि म॒हय॑मान ऊ॒ती॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभावयुक्त और सच्चित् आनन्द आदि लक्षण विशिष्ट परमात्मा सम्पूर्ण जगत् को उत्पन्न और रक्षित कर आनन्दित करता है, वैसे ही सत्यवक्ता विद्वान् पुरुषों को चाहिये कि सम्पूर्ण इस संसार को आनन्दयुक्त करें॥५॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पच्चीसवाँ सूक्त और पच्चीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

वै॒श्वा॒न॒रं मन॑सा॒ग्निं नि॒चाय्या॑ ह॒विष्म॑न्तो अनुष॒त्यं स्व॒र्विद॑म्। सु॒दानुं॑ दे॒वं र॑थि॒रं व॑सू॒यवो॑ गी॒र्भी र॒ण्वं कु॑शि॒कासो॑ हवामहे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मनुष्य अग्नि के गुणकर्मस्वभावों का निश्चय करके कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वैसे ही पृथिवी आदि पदार्थों के गुणकर्मस्वभावों के निश्चय और उपकार से कार्य्यों को सिद्ध करो॥१॥

तं शु॒भ्रम॒ग्निमव॑से हवामहे वैश्वान॒रं मा॑त॒रिश्वा॑नमु॒क्थ्य॑म्। बृह॒स्पतिं॒ मनु॑षो दे॒वता॑तये॒ विप्रं॒ श्रोता॑र॒मति॑थिं रघु॒ष्यद॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पूर्ण विद्वान् अतिथि जन श्रोता जनों को ज्ञानयुक्त करता है, उसी प्रकार अग्नि शिल्पी जनों के लिये अत्यन्त धनों को उत्पन्न करता है॥२॥

अश्वो॒ न क्रन्द॒ञ्जनि॑भिः॒ समि॑ध्यते वैश्वान॒रः कु॑शि॒केभि॑र्यु॒गेयु॑गे। स नो॑ अ॒ग्निः सु॒वीर्यं॒ स्वश्व्यं॒ दधा॑तु॒ रत्न॑म॒मृते॑षु॒ जागृ॑विः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो मनुष्य लोग अग्नि को वाहन के चालन आदि कार्यों में संप्रयुक्त करते हैं, तो यह अग्नि किस-किस धन आदि वस्तु की वृद्धि न करे अर्थात् सब वस्तुओं की वृद्धि कर सकता है॥३॥

प्र य॑न्तु॒ वाजा॒स्तवि॑षीभिर॒ग्नयः॑ शु॒भे संमि॑श्लाः॒ पृष॑तीरयुक्षत। बृ॒ह॒दुक्षो॑ म॒रुतो॑ वि॒श्ववे॑दसः॒ प्र वे॑पयन्ति॒ पर्व॑ताँ॒ अदा॑भ्याः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जल में मिले हुए पृथिवी अग्नि वायु वर्त्तमान हैं, वैसे ही जो लोग सेना में मित्र होकर वर्त्तमान होते हैं, उनका निश्चय विजय होता है॥४॥

अ॒ग्नि॒श्रियो॑ म॒रुतो॑ वि॒श्वकृ॑ष्टय॒ आ त्वे॒षमु॒ग्रमव॑ ईमहे व॒यम्। ते स्वा॒निनो॑ रु॒द्रिया॑ व॒र्षनि॑र्णिजः सिं॒हा न हे॒षक्र॑तवः सु॒दान॑वः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि विद्वान् लोगों के सङ्ग से बुद्धिमान् होकर वायु आदि की सम्बन्धिनी पदार्थविद्या की प्रार्थना करें और सिंह के समान पराक्रम को धारण करें॥५॥

व्रातं॑व्रातं ग॒णंग॑णं सुश॒स्तिभि॑र॒ग्नेर्भामं॑ म॒रुता॒मोज॑ ईमहे। पृष॑दश्वासो अनव॒भ्ररा॑धसो॒ गन्ता॑रो य॒ज्ञं वि॒दथे॑षु॒ धीराः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य अग्नि वायु आदि पदार्थों से कार्य्यों के समूह को साधते हैं, वे विद्वान् कहाते हैं॥६॥

अ॒ग्निर॑स्मि॒ जन्म॑ना जा॒तवे॑दा घृ॒तं मे॒ चक्षु॑र॒मृतं॑ म आ॒सन्। अ॒र्कस्त्रि॒धातू॒ रज॑सो वि॒मानोऽज॑स्रो घ॒र्मो ह॒विर॑स्मि॒ नाम॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि बिजुली के सदृश कार्य्य सिद्धि का धारण रोग का नाशकारक भोजन करना और शत्रुओं का निवारण करें, तो बिजुली का फल प्राप्त होवे॥७॥

त्रि॒भिः प॒वित्रै॒रपु॑पो॒द्ध्य१॒॑र्कं हृ॒दा म॒तिं ज्योति॒रनु॑ प्रजा॒नन्। वर्षि॑ष्ठं॒ रत्न॑मकृत स्व॒धाभि॒रादिद्द्यावा॑पृथि॒वी पर्य॑पश्यत्॥

वे ही शुद्ध मनुष्य हैं, जो कि उत्तम बुद्धि को प्राप्त होकर अन्य मनुष्यों को विद्या और विनयों से सन्तुष्ट करके लक्ष्मी आदि की उन्नति सिद्ध करें॥८॥

श॒तधा॑र॒मुत्स॒मक्षी॑यमाणं विप॒श्चितं॑ पि॒तरं॒ वक्त्वा॑नाम्। मे॒ळिं मद॑न्तं पि॒त्रोरु॒पस्थे॒ तं रो॑दसी पिपृतं सत्य॒वाच॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो पूर्ण विद्वान् अतिसूक्ष्म बुद्धियुक्त पृथिवी के सदृश क्षमाशील सूर्य्य के सदृश अन्तःकरण से शुद्ध विद्वान् मनुष्यों में पिता के सदृश वर्त्ताव रक्खे, उसीकी सब लोग अपने आत्मा के तुल्य सेवा करें॥९॥इस सूक्त में विद्वान् अग्नि और वायु के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त में कहे अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह छब्बीसवाँ सूक्त और सत्ताईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र वो॒ वाजा॑ अ॒भिद्य॑वो ह॒विष्म॑न्तो घृ॒ताच्या॑। दे॒वाञ्जि॑गाति सुम्न॒युः॥

जैसे दिन में पदार्थ सूखते और रात्रि में गीले होते हैं, उसी प्रकार जो अपने पदार्थ हैं, वे औरों के और जो औरों के हैं, वे अपने हैं, इस प्रकार सुख की इच्छा से विद्वानों का सङ्ग करना चाहिये॥१॥

ईळे॑ अ॒ग्निं वि॑प॒श्चितं॑ गि॒रा य॒ज्ञस्य॒ साध॑नम्। श्रु॒ष्टी॒वानं॑ धि॒तावा॑नम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे किसी पदार्थ के जोड़ने आदि व्यवहार की सिद्धि के लिये अग्नि मुख्योपकारी है, वैसे ही धर्म, अर्थ, काम और विद्या की प्राप्ति के लिये विद्वान् जन मुख्य हैं, ऐसा जानना चाहिये॥२॥

अग्ने॑ श॒केम॑ ते व॒यं यमं॑ दे॒वस्य॑ वा॒जिनः॑। अति॒ द्वेषां॑सि तरेम॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मोक्ष आदि की जिज्ञासाकारक पुरुषों को चाहिये कि विद्वान् पुरुषों की ऐसे प्रार्थना करें कि जिस प्रकार हम लोग उत्तम नियमों को प्राप्त होकर द्वेष आदि दुष्ट व्यसनों के पार जायें, ऐसी हम लोगों के ऊपर कृपा करिये॥३॥

स॒मि॒ध्यमा॑नो अध्व॒रे॒३॒॑ग्निः पा॑व॒क ईड्यः॑। शो॒चिष्के॑श॒स्तमी॑महे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे इस संसार में अग्निरूप पदार्थ ही सम्पूर्ण पदार्थों से श्रेष्ठ है, इसलिये इस अग्निविषयिणी विद्या की प्रार्थना करनी योग्य है, वैसे ही विद्वान् लोग सम्पूर्ण मनुष्यों में श्रेष्ठ और उनकी विद्याप्राप्ति के लिये प्रार्थना करनी चाहिये॥४॥

पृ॒थु॒पाजा॒ अम॑र्त्यो घृ॒तनि॑र्णि॒क्स्वा॑हुतः। अ॒ग्निर्य॒ज्ञस्य॑ हव्य॒वाट्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे साधन और उपसाधनों से उपकार में लाया गया अग्नि कार्य्यों को सिद्ध करता है, वैसे ही सेवा से संतुष्टता को प्राप्त किये विद्वान् लोग विद्या आदि की सिद्धि को सम्पादन करते हैं॥५॥

तं स॒बाधो॑ य॒तस्रु॑च इ॒त्था धि॒या य॒ज्ञव॑न्तः। आ च॑क्रुर॒ग्निमू॒तये॑॥

हे मनुष्यो! जैसे बुद्धि और कर्म में चतुर पुरुष उत्तम व्यवहारों को सिद्ध करते हैं, वैसे ही धर्म आदि को जानने की इच्छायुक्त पुरुष विद्वान् जन को प्रसन्न करके उत्तम गुणों को ग्रहण करें॥६॥

होता॑ दे॒वो अम॑र्त्यः पु॒रस्ता॑देति मा॒यया॑। वि॒दथा॑नि प्रचो॒दय॑न्॥

हे विद्यार्थी जनो! जो अध्यापक पुरुष आप लोगों के लिये कपट त्याग के विद्या आदि उत्तम गुणों को देकर उत्तम शिक्षा देवे, उसकी आप लोग भी अपने आत्मा के तुल्य सेवा करो॥७॥

वा॒जी वाजे॑षु धीयतेऽध्व॒रेषु॒ प्र णी॑यते। विप्रो॑ य॒ज्ञस्य॒ साध॑नः॥

हे मनुष्यो! जैसे अग्निहोत्र आदि क्रियास्वरूप यज्ञों में मुख्यभाव से अग्नि का आश्रय किया जाता है, वैसे ही विद्या विनय और उत्तम शिक्षा के व्यवहारों में विद्वान् का आश्रय करना चाहिये॥८॥

धि॒या च॑क्रे॒ वरे॑ण्यो भू॒तानां॒ गर्भ॒मा द॑धे। दक्ष॑स्य पि॒तरं॒ तना॑॥

जैसे पति अपनी स्त्री में गर्भ को धारण करके श्रेष्ठ सन्तानों को उत्पन्न करता है, वैसे ही विद्वान् लोग मनुष्यों की बुद्धि में विद्यासम्बन्धी गर्भ की स्थिति करके उत्तम व्यवहारों को उत्पन्न करें॥९॥

नि त्वा॑ दधे॒ वरे॑ण्यं॒ दक्ष॑स्ये॒ळा स॑हस्कृत। अग्ने॑ सुदी॒तिमु॒शिज॑म्॥

जैसे विद्यार्थी जन अध्यापक लोगों की इच्छा के अनुसार कर्म्मों को कर प्रसन्न रखते हैं, वैसे ही अध्यापक लोग विद्यार्थियों की इच्छा के अनुकूल उत्तम गुणों को देकर प्रसन्न करें॥१०॥

अ॒ग्निं य॒न्तुर॑म॒प्तुर॑मृ॒तस्य॒ योगे॑ व॒नुषः॑। विप्रा॒ वाजैः॒ समि॑न्धते॥

जिस समय विद्वान् पुरुषों का सङ्ग होवे, उस समय उत्तम विज्ञान ही की प्रश्न-उत्तरों से याचना करनी चाहिये, इससे अधिक लाभ और न समझना चाहिये॥११॥

ऊ॒र्जो नपा॑तमध्व॒रे दी॑दि॒वांस॒मुप॒ द्यवि॑। अ॒ग्निमी॑ळे क॒विक्र॑तुम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे यज्ञ में अग्नि प्रकाशमान होकर शोभित होता है, वैसे ही विद्या के प्रकाशकर्त्ता व्यवहार में विद्वान् जन प्रकाशित होते हैं॥१२॥

ई॒ळेन्यो॑ नम॒स्य॑स्ति॒रस्तमां॑सि दर्श॒तः। सम॒ग्निरि॑ध्यते॒ वृषा॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य अन्धकार को दूर कर प्रकाश उत्पन्न करता है, वैसे ही यथार्थवक्ता विद्वान् लोग अविद्या का नाश और विद्या का प्रकाश करते हैं॥१३॥

वृषो॑ अ॒ग्निः समि॑ध्य॒तेऽश्वो॒ न दे॑व॒वाह॑नः। तं ह॒विष्म॑न्त ईळते॥

हे मनुष्यो! जैसे बल और वेग से युक्त घोड़े वाहन को शीघ्र ले चलते हैं, वैसे ही अग्नि को भी समझना चाहिये और जैसे इस अग्नि के गुणों को विद्वान् लोग जानते हैं, वैसे आप लोग भी जानिये॥१४॥

वृष॑णं त्वा व॒यं वृ॑ष॒न्वृष॑णः॒ समि॑धीमहि। अग्ने॒ दीद्य॑तं बृ॒हत्॥

हे पढ़ाने और पढ़नेवाले पुरुषो! आप लोगों को चाहिये कि विरोध को त्याग और प्रीति को उत्पन्न करके परस्पर की वृद्धि करो, जिससे विद्या आदि उत्तम गुणों के प्रकाश से सम्पूर्ण मनुष्य बलयुक्त और न्यायकारी होवें॥१५॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त में कहे अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सत्ताईसवाँ सूक्त और तीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अग्ने॑ जु॒षस्व॑ नो ह॒विः पु॑रो॒ळाशं॑ जातवेदः। प्रा॒तः॒सा॒वे धि॑यावसो॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे प्रातःकाल अग्निहोत्र आदि कर्मों में वेदी में स्थापित किया गया अग्नि घृत आदि का सेवन तथा उसको अन्तरिक्ष में फैलाय के जनों को सुख देता है, वैसे ही ब्रह्मचर्य्यधर्म्म में वर्त्तमान विद्यार्थी जन विद्या और विनय का ग्रहण कर संसार में उनका प्रचार करके सकल जनों को सुख देवें॥१॥

पु॒रो॒ळा अ॑ग्ने पच॒तस्तुभ्यं॑ वा घा॒ परि॑ष्कृतः। तं जु॑षस्व यविष्ठ्य॥

जैसे भोजन में प्रीतिकर्त्ता पुरुष अपने लिये उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त अन्न आदि पदार्थों को सिद्ध और उनका भोजन करके आनन्दयुक्त होता है, वैसे ही उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त हवन की सामग्री को प्राप्त होकर अग्नि सम्पूर्ण जनों को आनन्द देता है॥२॥

अग्ने॑ वी॒हि पु॑रो॒ळाश॒माहु॑तं ति॒रोअ॑ह्न्यम्। सह॑सः सू॒नुर॑स्यध्व॒रे हि॒तः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि वायु से उत्पन्न होकर स्वरूपवान् द्रव्य को भस्म करके विभाग करता है, वैसे ही विद्या से पवित्रात्मा पुरुष अविद्या के व्यवहार को भस्म अर्थात् दूर करके सत्य और असत्य का विभाग करता है॥३॥

माध्य॑न्दिने॒ सव॑ने जातवेदः पुरो॒ळाश॑मि॒ह क॑वे जुषस्व। अग्ने॑ य॒ह्वस्य॒ तव॑ भाग॒धेयं॒ न प्र मि॑नन्ति वि॒दथे॑षु॒ धीराः॑॥

जो मनुष्य प्रातःकाल तथा दिन के मध्यभाग समय के होमों को करके उत्तम प्रकार छौंकने आदि से संस्कारयुक्त नित्य नियमित अन्न का भोजन करते हैं, वे ही भाग्यशाली होकर बड़े सुख और निश्चित विजय को प्राप्त होते हैं॥४॥

अग्ने॑ तृ॒तीये॒ सव॑ने॒ हि कानि॑षः पुरो॒ळाशं॑ सहसः सून॒वाहु॑तम्। अथा॑ दे॒वेष्व॑ध्व॒रं वि॑प॒न्यया॒ धा रत्न॑वन्तम॒मृते॑षु॒ जागृ॑विम्॥

जो लोग परमेश्वर आदि पदार्थों के विज्ञान से अहिंसा आदि व्यवहार में वर्त्तमान नियमपूर्वक भोजन विहारयुक्त होकर ऐश्वर्य्य की वृद्धि करने की इच्छा करते हैं, वे सब प्रकार सुखी होते हैं॥५॥

अग्ने॑ वृधा॒न आहु॑तिं पुरो॒ळाशं॑ जातवेदः। जु॒षस्व॑ ति॒रोअ॑ह्न्यम्॥

जैसे बिजुली सब स्थानों में व्याप्त होकर सम्पूर्ण मूर्त्तिमान् पदार्थों का सेवन करती है वा प्रसिद्ध हुई बढ़ती है, वैसे ही विद्याओं में व्यापक विद्वान् जन धर्म की सेवा करते हुए वृद्धि को प्राप्त होते हैं॥६॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह अट्ठाईसवाँ सूक्त और इकत्तीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अस्ती॒दम॑धि॒मन्थ॑न॒मस्ति॑ प्र॒जन॑नं कृ॒तम्। ए॒तां वि॒श्पत्नी॒मा भ॑रा॒ग्निं म॑न्थाम पू॒र्वथा॑॥

जो मनुष्य ऊपर और नीचे के भाग में स्थित मथने की वस्तुओं के द्वारा घिसने से बिजुलीरूप अग्नि को उत्पन्न करें, वे प्रजाओं के पालन करनेवाले सामर्थ्य को प्राप्त होते हैं और जैसे पूर्व काल के कारीगरों ने शिल्पक्रिया से अग्नि आदि सम्बन्धिनी विद्या की सिद्धि की हो, उसही प्रकार से सम्पूर्ण जन इस अग्निविद्या को ग्रहण करें॥१॥

अ॒रण्यो॒र्निहि॑तो जा॒तवे॑दा॒ गर्भ॑इव॒ सुधि॑तो ग॒र्भिणी॑षु। दि॒वेदि॑व॒ ईड्यो॑ जागृ॒वद्भि॑र्ह॒विष्म॑द्भिर्मनु॒ष्ये॑भिर॒ग्निः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य सृष्टि के क्रम से वर्त्तमान अग्नि आदि पदार्थों की प्रतिदिन परीक्षा करें करावें, तो वे क्यों दरिद्र होवें॥२॥

उ॒त्ता॒नाया॒मव॑ भरा चिकि॒त्वान्स॒द्यः प्रवी॑ता॒ वृष॑णं जजान। अ॒रु॒षस्तू॑पो॒ रुश॑दस्य॒ पाज॒ इळा॑यास्पु॒त्रो व॒युने॑ऽजनिष्ट॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य पुत्र को माता के तुल्य अग्निविद्या को धारण करते हैं, वे अपना बल बढ़ाकर विज्ञान को उत्पन्न करते हैं और जब नीचे के भाग में अग्नि ऊपर जल स्थित करके वायु से प्रज्वलित करते हैं, तब अग्नि और जल द्वारा बहुत से कार्य सिद्ध कर सकते हैं॥३॥

इळा॑यास्त्वा प॒दे व॒यं नाभा॑ पृथि॒व्या अधि॑। जात॑वेदो॒ नि धी॑म॒ह्यग्ने॑ ह॒व्याय॒ वोळ्ह॑वे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग इस अग्नि की पृथिवी के ऊपर और अन्तरिक्ष के मध्य में उत्तम प्रकार परीक्षा ले के वाहन आदि चलाने के लिये अग्नि को धारण करते हैं, वे धनयुक्त होते हैं॥४॥

मन्थ॑ता नरः क॒विमद्व॑यन्तं॒ प्रचे॑तसम॒मृतं॑ सु॒प्रती॑कम्। य॒ज्ञस्य॑ के॒तुं प्र॑थ॒मं पु॒रस्ता॑द॒ग्निं न॑रो जनयता सु॒शेव॑म्॥

जो मनुष्य मथ कर अग्नि को उत्पन्न करके कार्य्यों को सिद्ध करने की इच्छा करते हैं, वे संपूर्ण ऐश्वर्य्ययुक्त होते हैं॥५॥

यदी॒ मन्थ॑न्ति बा॒हुभि॒र्वि रो॑च॒तेऽश्वो॒ न वा॒ज्य॑रु॒षो वने॒ष्वा। चि॒त्रो न याम॑न्न॒श्विनो॒रनि॑वृतः॒ परि॑ वृण॒क्त्यश्म॑न॒स्तृणा॒ दह॑न्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। घिसने से बलयुक्त हुआ अग्नि काष्ठ आदि को जलाता और घोड़े के तुल्य वेगवान् होता हुआ अद्भुत कार्य्यों को सिद्ध करता है, यह जानना चाहिये॥६॥

जा॒तो अ॒ग्नी रो॑चते॒ चेकि॑तानो वा॒जी विप्रः॑ कविश॒स्तः सु॒दानुः॑। यं दे॒वास॒ ईड्यं॑ विश्व॒विदं॑ हव्य॒वाह॒मद॑धुरध्व॒रेषु॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो बिजुली संबन्धी विद्या को सिद्ध करें, तो यह विद्या यथार्थवक्ता विद्वान् पुरुष के तुल्य सत्य और योग्य कार्य्यों को सिद्ध करे॥७॥

सीद॑ होतः॒ स्व उ॑ लो॒के चि॑कि॒त्वान्त्सा॒दया॑ य॒ज्ञं सु॑कृ॒तस्य॒ योनौ॑। दे॒वा॒वीर्दे॒वान्ह॒विषा॑ यजा॒स्यग्ने॑ बृ॒हद्यज॑माने॒ वयो॑ धाः॥

जैसे अग्निहोत्र आदि वा शिल्प आदि सङ्गति के योग्य व्यवहार में संयुक्त किया गया अग्नि उत्तम गुणों को प्रकट करता है, वैसे ही विद्वान् पुरुष को चाहिये कि धर्मसम्बन्धी कर्मों से युक्त करके उत्तम सुखों को संसार में फैलावें॥८॥

कृ॒णोत॑ धू॒मं वृष॑णं सखा॒योऽस्रे॑धन्त इतन॒ वाज॒मच्छ॑। अ॒यम॒ग्निः पृ॑तना॒षाट् सु॒वीरो॒ येन॑ दे॒वासो॒ अस॑हन्त॒ दस्यू॑न्॥

हे विद्वान् जनो! काष्ठ अग्नि और जल के संयोग से उत्पन्न हुए धूम से अनेक कार्य्यों को परस्पर मित्रभाव के साथ सिद्ध करो। जैसे धर्मपूर्वक वर्त्ताव रखनेवाले विद्यायुक्त शूरवीर पुरुष दुष्टकर्मकारियों का नाश करके राजा होते हैं, वैसे ही यह अग्नि उत्तम प्रकार यन्त्र आदि से युक्त किया गया दारिद्र्य आदि को नाश करके अनगिनती धन को उत्पन्न करता है॥९॥

अ॒यं ते॒ योनि॑र्ऋ॒त्वियो॒ यतो॑ जा॒तो अरो॑चथाः। तं जा॒नन्न॑ग्न॒ आ सी॒दाथा॑ नो वर्धया॒ गिरः॑॥

मनुष्यों को उचित है कि जिस-जिस कर्म से शरीर आत्मा और ऐश्वर्य्यों की वृद्धि हो, वह-वह कर्म सब काल में करें॥१०॥

तनू॒नपा॑दुच्यते॒ गर्भ॑ आसु॒रो नरा॒शंसो॑ भवति॒ यद्वि॒जाय॑ते। मा॒त॒रिश्वा॒ यदमि॑मीत मा॒तरि॒ वात॑स्य॒ सर्गो॑ अभव॒त्सरी॑मणि॥

जो मनुष्य वायु और अग्नि से कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वे सुखों से संयुक्त होते हैं॥११॥

सु॒नि॒र्मथा॒ निर्म॑थितः सुनि॒धा निहि॑तः क॒विः। अग्ने॑ स्वध्व॒रा कृ॑णु दे॒वान्दे॑वय॒ते य॑ज॥

जैसे विद्या से रचे हुए कलायन्त्रों में रक्खा गया अग्नि अत्यन्त मथने और घिसने से वेग आदि गुणों को उत्पन्न कर बहुत से कार्य्यों को सिद्ध करता है, वैसे ही उत्तम कर्म्मों को करके श्रेष्ठ गुणों को प्राप्त होओ॥१२॥

अजी॑जनन्न॒मृतं॒ मर्त्या॑सोऽस्रे॒माणं॑ त॒रणिं॑ वी॒ळुज॑म्भम्। दश॒ स्वसा॑रो अ॒ग्रुवः॑ समी॒चीः पुमां॑सं जा॒तम॒भि सं र॑भन्ते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे हाथों की अङ्गुलियाँ परस्पर मिली हुई शरीरधारी मनुष्य को कार्य्यों में प्रवृत्त करती हैं, वैसे ही विद्वान् पुरुष अग्नि को क्रिया में लगाते अर्थात् उसके द्वारा कार्य्य सिद्ध करते हैं॥१३॥

प्र स॒प्तहो॑ता सन॒काद॑रोचत मा॒तुरु॒पस्थे॒ यदशो॑च॒दूध॑नि। न नि मि॑षति सु॒रणो॑ दि॒वेदि॑वे॒ यदसु॑रस्य ज॒ठरा॒दजा॑यत॥

जो अग्नि अन्न आदि को शुष्क करनेवाला वायु रूप कारण से प्रसिद्ध प्रकृति नामक कारण से उत्पन्न हुआ है, उसको जानकर बहुत से व्यवहारों को सकल जन प्रसिद्ध करें॥१४॥

अ॒मि॒त्रा॒युधो॑ म॒रुता॑मिव प्र॒याः प्र॑थम॒जा ब्रह्म॑णो॒ विश्व॒मिद्वि॑दुः। द्यु॒म्नव॒द्ब्रह्म॑ कुशि॒कास॒ एरि॑र॒ एक॑एको॒ दमे॑ अ॒ग्निं समी॑धिरे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पवन सम्पूर्ण स्थानों में प्रबलता से प्राप्त होने, अग्नि आदि पदार्थों को प्रज्वलित करने और संसार में व्यापक होनेवाले सम्पूर्ण जीवों के प्राणों की रक्षा करके आनन्द देते हैं, वैसे ही अग्नि आदि पदार्थों की विद्या युक्त पुरुष सम्पूर्ण जनों के लिये आनन्द देते हैं॥१५॥

यद॒द्य त्वा॑ प्रय॒ति य॒ज्ञे अ॒स्मिन्होत॑श्चिकि॒त्वोऽवृ॑णीमही॒ह। ध्रु॒वम॑या ध्रु॒वमु॒ताश॑मिष्ठाः प्रजा॒नन्वि॒द्वाँ उप॑ याहि॒ सोम॑म्॥

जो लोग इस संसार में प्रयत्न से सृष्टि के पदार्थों के विद्याक्रम को जानते हैं, वे निरन्तर उन पदार्थों से उपकार ग्रहण कर सकते हैं, उनके निश्चय से ऐश्वर्य होता है॥१६॥इस सूक्त में अग्नि वायु और विद्वान् के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त में कहे अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह उनतीसवाँ सूक्त द्वितीय अनुवाक और चौतीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

इ॒च्छन्ति॑ त्वा सो॒म्यासः॒ सखा॑यः सु॒न्वन्ति॒ सोमं॒ दध॑ति॒ प्रयां॑सि। तिति॑क्षन्ते अ॒भिश॑स्तिं॒ जना॑ना॒मिन्द्र॒ त्वदा कश्च॒न हि प्र॑के॒तः॥

जो लोग परस्पर मित्रभाव से वर्त्ताव करते हुए प्रयत्न के साथ ऐश्वर्य की इच्छा करते हैं, वे सुख दुःख निन्दा आदि को सह और विद्वानों का सङ्ग करके आनन्द को बढ़ावें॥१॥

न ते॑ दू॒रे प॑र॒मा चि॒द्रजां॒स्या तु प्र या॑हि हरिवो॒ हरि॑भ्याम्। स्थि॒राय॒ वृष्णे॒ सव॑ना कृ॒तेमा यु॒क्ता ग्रावा॑णः समिधा॒ने अ॒ग्नौ॥

मनुष्य यदि शीघ्र चलनेवाले घोड़ों से देशान्तर जाने की इच्छा करें, तो सब समीप ही है। यदि नियम से अग्नि को प्रज्वलित कर उसमें होम करें, तो वर्षा होना सुगम ही जानो॥२॥

इन्द्रः॑ सु॒शिप्रो॑ म॒घवा॒ तरु॑त्रो म॒हाव्रा॑तस्तुविकू॒र्मिर्ऋघा॑वान्। यदु॒ग्रो धा बा॑धि॒तो मर्त्ये॑षु॒ क्व१॒॑त्या ते॑ वृषभ वी॒र्या॑णि॥

जब मनुष्य के अनेक प्रकार की पीड़ायें प्रकट हों, तब बहुत से उपायों को युक्त करें, इस प्रकार पुरुषार्थ से विघ्नों को दूर करके शोभा और बल निरन्तर बढ़ाने योग्य हैं॥३॥

त्वं हि ष्मा॑ च्या॒वय॒न्नच्यु॑ता॒न्येको॑ वृ॒त्रा चर॑सि॒ जिघ्न॑मानः। तव॒ द्यावा॑पृथि॒वी पर्व॑ता॒सोऽनु॑ व्र॒ताय॒ निमि॑तेव तस्थुः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य नियमपूर्वक वर्त्तमान हो के निवारण करने योग्य पदार्थों का निवारण करके रक्षा करने योग्य पदार्थों की रक्षा करता है, वैसे ही आप वर्जने योग्य शत्रुओं का वर्जन करके प्रजाओं की निरन्तर रक्षा कीजिये॥४॥

उ॒ताभ॑ये पुरुहूत॒ श्रवो॑भि॒रेको॑ दृ॒ळ्हम॑वदो वृत्र॒हा सन्। इ॒मे चि॑दिन्द्र॒ रोद॑सी अपा॒रे यत्सं॑गृ॒भ्णा म॑घवन्का॒शिरित्ते॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजा के पुरुषों को चाहिये कि अनेक प्रकार के उपायों से प्रजाओं में उपद्रवों से भय का नाश और सूर्य के तुल्य न्यायविद्या का प्रकाश करें॥५॥

प्र सू त॑ इन्द्र प्र॒वता॒ हरि॑भ्यां॒ प्र ते॒ वज्रः॑ प्रमृ॒णन्ने॑तु॒ शत्रू॑न्। ज॒हि प्र॑ती॒चो अ॑नू॒चः परा॑चो॒ विश्वं॑ स॒त्यं कृ॑णुहि वि॒ष्टम॑स्तु॥

जो मनुष्य दुष्ट आचरण करनेवाले मनुष्य आदि प्राणियों का निवारण करके सत्य का प्रचार करें, वे सुख से आनन्द भोगते हैं॥६॥

यस्मै॒ धायु॒रद॑धा॒ मर्त्या॒याभ॑क्तं चिद्भजते गे॒ह्यं१॒॑ सः। भ॒द्रा त॑ इन्द्र सुम॒तिर्घृ॒ताची॑ स॒हस्र॑दाना पुरुहूत रा॒तिः॥

जो मनुष्य पिता और पितामह का धन आदि जो कि नहीं बटा हुआ, उसकी रक्षा वा सेवा करें और परस्पर दोषों को त्याग के गुणों का ग्रहण करें, वे कल्याण के भागी होवें॥७॥

स॒हदा॑नुं पुरुहूत क्षि॒यन्त॑मह॒स्तमि॑न्द्र॒ सं पि॑ण॒क्कुणा॑रुम्। अ॒भि वृ॒त्रं वर्ध॑मानं॒ पिया॑रुम॒पाद॑मिन्द्र त॒वसा॑ जघन्थ॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य मेघों के आकर्षण और वर्षाने से सम्पूर्ण जगत् को पालता है, वैसे ही दुष्टों के नाश करने और श्रेष्ठ पुरुषों के धारण करने से राजा को सम्पूर्ण प्रजाओं की पालना करनी चाहिये॥८॥

नि सा॑म॒नामि॑षि॒रामि॑न्द्र॒ भूमिं॑ म॒हीम॑पा॒रां सद॑ने ससत्थ। अस्त॑भ्ना॒द्द्यां वृ॑ष॒भो अ॒न्तरि॑क्ष॒मर्ष॒न्त्वाप॒स्त्वये॒ह प्रसू॑ताः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य नियमपूर्वक प्रकाश और भूमि को धारण करता है, वैसे ही न्याय से राजा राज्य को धारण करे और सब काल में प्रजाओं में ही बल बढ़ाया करे॥९॥

अ॒ला॒तृ॒णो ब॒ल इ॑न्द्र ब्र॒जो गोः पु॒रा हन्तो॒र्भय॑मानो॒ व्या॑र। सु॒गान्प॒थो अ॑कृणोन्नि॒रजे॒ गाः प्राव॒न्वाणीः॑ पुरुहू॒तं धम॑न्तीः॥

मनुष्यों को चाहिये कि सदा ही अधर्म के आचरण से डर के धर्म में प्रवृत्त हों और बुरे व्यसनों को त्याग के धर्मयुक्त मार्ग से चलें॥१०॥

एको॒ द्वे वसु॑मती समी॒ची इन्द्र॒ आ प॑प्रौ पृथि॒वीमु॒त द्याम्। उ॒तान्तरि॑क्षाद॒भि नः॑ समी॒क इ॒षो र॒थीः स॒युजः॑ शूर॒ वाजा॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो भूमि के सदृश प्रजाओं के धारण करने और बिजुली के सदृश अतिउत्तम ऐश्वर्य्य के देनेवाले प्रजाजन हों, वे सम्पूर्ण राज्य की रक्षा कर सकें॥११॥

दिशः॒ सूर्यो॒ न मि॑नाति॒ प्रदि॑ष्टा दि॒वेदि॑वे॒ हर्य॑श्वप्रसूताः। सं यदान॒ळध्व॑न॒ आदिदश्वै॑र्वि॒मोच॑नं कृणुते॒ तत्त्व॑स्य॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो पुरुष अविद्या दुष्ट संस्कार और दुःखों को त्याग के जैसे सूर्य्य अन्धकार को दूर करता है वैसे अन्याय को दूर करके सम्पूर्ण दिशाओं में यश को फैलाते हैं, यही इनका कर्त्तव्य कर्म है॥१२॥

दिदृ॑क्षन्त उ॒षसो॒ याम॑न्न॒क्तोर्वि॒वस्व॑त्या॒ महि॑ चि॒त्रमनी॑कम्। विश्वे॑ जानन्ति महि॒ना यदागा॒दिन्द्र॑स्य॒ कर्म॒ सुकृ॑ता पु॒रूणि॑॥

जो परीक्षक लोग प्रातःकाल उठ के प्रयत्न से व्यवहारों को सिद्ध करते हैं, वे इस संसार में ज्ञान विशेष से प्रतिष्ठा को प्राप्त और बल से युक्त होते हैं॥१३॥

महि॒ ज्योति॒र्निहि॑तं व॒क्षणा॑स्वा॒मा प॒क्वं च॑रति॒ बिभ्र॑ती॒ गौः। विश्वं॒ स्वाद्म॒ संभृ॑तमु॒स्रिया॑यां॒ यत्सी॒मिन्द्रो॒ अद॑धा॒द्भोज॑नाय॥

जो बिजुली भूमि जल वायु और अन्तरिक्ष तथा उनके विकारों और पदार्थों में व्यापक हो और सबको धारण कर पालन करती है, उसकी विद्या को सब लोग धारण वा स्वीकार करें॥१४॥

इन्द्र॒ दृह्य॑ यामको॒शा अ॑भूवन्य॒ज्ञाय॑ शिक्ष गृण॒ते सखि॑भ्यः। दु॒र्मा॒यवो॑ दु॒रेवा॒ मर्त्या॑सो निष॒ङ्गिणो॑ रि॒पवो॒ हन्त्वा॑सः॥

मनुष्यों को चाहिये कि सर्वदा सब प्रकार श्रेष्ठ पुरुषों की रक्षा विद्या और शिक्षा का दान और दुष्ट आचरणवालों का नाश करके सदैव बढ़ें॥१५॥

सं घोषः॑ शृण्वेऽव॒मैर॒मित्रै॑र्ज॒ही न्ये॑ष्व॒शनिं॒ तपि॑ष्ठाम्। वृ॒श्चेम॒धस्ता॒द्वि रु॑जा॒ सह॑स्व ज॒हि रक्षो॑ मघवन्र॒न्धय॑स्व॥

हे वीर पुरुषो! जो वाणी शत्रुओं से उच्चारण की जाय, उसको सुन उनके सन्मुख जा और उनके ऊपर शस्त्रों का प्रहार करके उन्हें छिन्न-भिन्न करो, इससे ऐश्वर्यवाले होओ॥१६॥

उद्वृ॑ह॒ रक्षः॑ स॒हमू॑लमिन्द्र वृ॒श्चा मध्यं॒ प्रत्यग्रं॑ शृणीहि। आ कीव॑तः सल॒लूकं॑ चकर्थ ब्रह्म॒द्विषे॒ तपु॑षिं हे॒तिम॑स्य॥

मनुष्यों को चाहिये कि कभी भी धार्मिक पुरुषों के ऊपर शस्त्रों का प्रहार न करें और दुष्ट पुरुषों को शस्त्रों से मारे विना न छोड़ें, ऐसा करने से सब प्रकार सुख की वृद्धि होवे॥१७॥

स्व॒स्तये॑ वा॒जिभि॑श्च प्रणेतः॒ सं यन्म॒हीरिष॑ आ॒सत्सि॑ पू॒र्वीः। रा॒यो व॒न्तारो॑ बृह॒तः स्या॑मा॒स्मे अ॑स्तु॒ भग॑ इन्द्र प्र॒जावा॑न्॥

जो मनुष्य लोग सुख के लिये बहुत से साधनों को एकत्र करते, वे ऐश्वर्य को प्राप्त होके आनन्द को प्राप्त होते हैं॥१८॥

आ नो॑ भर॒ भग॑मिन्द्र द्यु॒मन्तं॒ नि ते॑ दे॒ष्णस्य॑ धीमहि प्ररे॒के। ऊ॒र्वइ॑व पप्रथे॒ कामो॑ अ॒स्मे तमा पृ॑ण वसुपते॒ वसू॑नाम्॥

वही मनुष्य यथार्थवक्ता है, जिसका सर्वस्व दूसरे पुरुषादि के उपकार के लिये होता है, इस विषय में कोई शङ्का नहीं है॥१९॥

इ॒मं कामं॑ मन्दया॒ गोभि॒रश्वै॑श्च॒न्द्रव॑ता॒ राध॑सा प॒प्रथ॑श्च। स्व॒र्यवो॑ म॒तिभि॒स्तुभ्यं॒ विप्रा॒ इन्द्रा॑य॒ वाहः॑ कुशि॒कासो॑ अक्रन्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्या जो लोग आप लोगों को अभिलाषा पूर्ण करने से आनन्द देवें, उनको आप लोग भी आनन्द देवें॥२०॥

आ नो॑ गो॒त्रा द॑र्दृहि गोपते॒ गाः सम॒स्मभ्यं॑ स॒नयो॑ यन्तु॒ वाजाः॑। दि॒वक्षा॑ असि वृषभ स॒त्यशु॑ष्मो॒ऽस्मभ्यं॒ सु म॑घवन्बोधि गो॒दाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सत्य आचरण करनेवाले विद्वान् लोग मनुष्यों के उपदेशकारक होवें, तो उन जनों का कुछ भी सुख अप्राप्त और अरक्ष्य न होवे॥२१॥

शु॒नं हु॑वेम म॒घवा॑न॒मिन्द्र॑म॒स्मिन्भरे॒ नृत॑मं॒ वाज॑सातौ। शृ॒ण्वन्त॑मु॒ग्रमू॒तये॑ स॒मत्सु॒ घ्नन्तं॑ वृ॒त्राणि॑ सं॒जितं॒ धना॑नाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! आप लोग शरीर और आत्मबल से बढ़े असंख्य धन के देने और मनुष्यों में उत्तम शत्रुओं के जीतनेवाले धर्मिष्ठ पुरुष में नम्रस्वभाव और दुष्ट पुरुषों में तीव्रस्वभाव युक्त पालनकर्त्ता स्वामी को अपने ऊपर नियत करके निरन्तर सुख को प्राप्त हूजिये॥२२॥इस सूक्त में इन्द्र और विद्वान् के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त में कहे अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह तीसवाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ॥

शास॒द्वह्नि॑र्दुहि॒तुर्न॒प्त्यं॑ गाद्वि॒द्वाँ ऋ॒तस्य॒ दीधि॑तिं सप॒र्यन्। पि॒ता यत्र॑ दुहि॒तुः सेक॑मृ॒ञ्जन्त्सं श॒ग्म्ये॑न॒ मन॑सा दध॒न्वे॥

हे मनुष्यो! जैसे पिता के समीप से कन्या उत्पन्न होती है, वैसे ही सूर्य्य से प्रातःकाल की वेला प्रकट होती है और जैसे पति अपनी स्त्री में गर्भ को धारण करता है, वैसे कन्या के सदृश वर्त्तमान प्रातःकाल की वेला में सूर्य्य किरणरूप वीर्य्य को धारण करता है, उससे दिवसरूप पुत्र उत्पन्न होता है॥१॥

न जा॒मये॒ तान्वो॑ रि॒क्थमा॑रैक्च॒कार॒ गर्भं॑ सनि॒तुर्नि॒धान॑म्। यदी॑ मा॒तरो॑ ज॒नय॑न्त॒ वह्नि॑म॒न्यः क॒र्ता सु॒कृतो॑र॒न्य ऋ॒न्धन्॥

जैसे माता सन्तानों को उत्पन्न कर उनकी वृद्धि करती है, वैसे ही अग्नि को उत्पन्न करके उसकी वृद्धि करे और वैसे ही प्रत्येक स्त्री सन्तानों की वृद्धि करे॥२॥

अ॒ग्निर्ज॑ज्ञे जु॒ह्वा॒३॒॑ रेज॑मानो म॒हस्पु॒त्राँ अ॑रु॒षस्य॑ प्र॒यक्षे॑। म॒हान्गर्भो॒ मह्या जा॒तमे॑षां म॒ही प्र॒वृद्धर्य॑श्वस्य य॒ज्ञैः॥

जैसे शमी नामक काष्ठ के मध्य से अग्नि प्रकट होकर बड़े-बड़े कार्य्यों को सिद्ध करता है, वैसे ही सुपात्र पुत्र सम्पूर्ण उत्तमकर्मों को करते हैं, इससे ब्रह्मचर्य्य आदि संस्कारों के ही द्वारा सन्तानों को श्रेष्ठ बनाना चाहिये॥३॥

अ॒भि जैत्री॑रसचन्त स्पृधा॒नं महि॒ ज्योति॒स्तम॑सो॒ निर॑जानन्। तं जा॑न॒तीः प्रत्युदा॑यन्नु॒षासः॒ पति॒र्गवा॑मभव॒देक॒ इन्द्रः॑॥

जैसे अन्धकार से ज्योति पृथक् होकर अन्धकार को दूर करती है, वैसे ही अविद्या से पृथक् हुई विद्या अविद्या का नाश करती है और जैसे एक सूर्य्य संपूर्ण किरणों का एक साथ ही पालन करता है, वैसे ही समभाव का आश्रय करके राजा प्रजाओं का पालन करे॥४॥

वी॒ळौ स॒तीर॒भि धीरा॑ अतृन्दन्प्रा॒चाहि॑न्व॒न्मन॑सा स॒प्त विप्राः॑। विश्वा॑मविन्दन्प॒थ्या॑मृ॒तस्य॑ प्रजा॒नन्नित्ता नम॒सा वि॑वेश॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे युक्ति से सेवन किये हुए प्राण और अन्तःकरण दुःख के त्याग और सुख के लाभ के लिये समर्थ होते हैं, वैसे ही विद्वानों के सङ्ग आदि कर्म दुःखों को निवृत्त कराके सुखों को उत्पन्न कराते हैं॥५॥

वि॒दद्यदी॑ स॒रमा॑ रु॒ग्णमद्रे॒र्महि॒ पाथः॑ पू॒र्व्यं स॒ध्र्य॑क्कः। अग्रं॑ नयत्सु॒पद्यक्ष॑राणा॒मच्छा॒ रवं॑ प्रथ॒मा जा॑न॒ती गा॑त्॥

जो स्त्री बिजुली के सदृश विद्याओं में व्याप्त संस्कार और उपस्कार अर्थात् उद्योग आदि कर्म्मों में चतुर उत्तम रीति से बोलने तथा नम्र स्वभाव रखनेवाली होवे, वह सृष्टि के सदृश सुख देनेवाली होती है॥६॥

अग॑च्छदु॒ विप्र॑तमः सखी॒यन्नसू॑दयत्सु॒कृते॒ गर्भ॒मद्रिः॑। स॒सान॒ मर्यो॒ युव॑भिर्मख॒स्यन्नथा॑भव॒दङ्गि॑राः स॒द्यो अर्च॑न्॥

जो ब्रह्मचर्य्य से विद्या और उत्तम शिक्षा को ग्रहण करके युवा पुरुष अपने तुल्य कन्या के साथ सुहृद्भाव और प्रीति को प्राप्त हो के उसको सत्कार करता हुआ विवाहै, वह पुरुष जैसे मेघ से संसार सुख को प्राप्त होता है, वैसे सुख को प्राप्त होवे॥७॥

स॒तःस॑तः प्रति॒मानं॑ पुरो॒भूर्विश्वा॑ वेद॒ जनि॑मा॒ हन्ति॒ शुष्ण॑म्। प्र णो॑ दि॒वः प॑द॒वीर्ग॒व्युरर्च॒न्त्सखा॒ सखीँ॑रमुञ्च॒न्निर॑व॒द्यात्॥

वे ही मनुष्य सुखी होते हैं, जो कार्य्यकारणरूप सृष्टि को जान और संपूर्ण जनों के मित्र हो सम्पूर्ण जनों को पाप के आचरण से पृथक् करके धर्म के आचरण में प्रवृत्त करें, वे ही सत्य मित्र हैं॥८॥

नि ग॑व्य॒ता मन॑सा सेदुर॒र्कैः कृ॑ण्वा॒नासो॑ अमृत॒त्वाय॑ गा॒तुम्। इ॒दं चि॒न्नु सद॑नं॒ भूर्ये॑षां॒ येन॒ मासाँ॒ असि॑षासन्नृ॒तेन॑॥

जो मनुष्य लोग मोक्ष की इच्छा करें, तो विद्वानों का सङ्ग धर्म का अनुष्ठान और अधर्म का त्याग करके शीघ्र ही अन्तःकरण और आत्मा की शुद्धि करें॥९॥

सं॒पश्य॑माना अमदन्न॒भि स्वं पयः॑ प्र॒त्नस्य॒ रेत॑सो॒ दुघा॑नाः। वि रोद॑सी अतप॒द्घोष॑ एषां जा॒ते निः॒ष्ठामद॑धु॒र्गोषु॑ वी॒रान्॥

जो उत्तम विचार करनेवाले धार्मिक विद्वान् पुरुष अपने अनादि काल सिद्ध सामर्थ्य को बढ़ावें, सब लोगों के लिये सत्य और असत्य का उपदेश कर दुष्टता को दूर कर और श्रेष्ठता का धारण करें, वे ही शूरवीर होते हैं, यह जानना चाहिये॥१०॥

स जा॒तेभि॑र्वृत्र॒हा सेदु॑ ह॒व्यैरुदु॒स्रिया॑ असृज॒दिन्द्रो॑ अ॒र्कैः। उ॒रू॒च्य॑स्मै घृ॒तव॒द्भर॑न्ती॒ मधु॒ स्वाद्म॑ दुदुहे॒ जेन्या॒ गौः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य अपने प्रकाश से सम्पूर्ण उत्पन्न हुए सृष्टि के पदार्थों का प्रकाश करता है, वैसे ही विद्वान् पुरुष विज्ञान से सम्पूर्ण पदार्थों को जानकर उसका सर्वत्र प्रकाश करें॥११॥

पि॒त्रे चि॑च्चक्रुः॒ सद॑नं॒ सम॑स्मै॒ महि॒ त्विषी॑मत्सु॒कृतो॒ वि हि ख्यन्। वि॒ष्क॒भ्नन्तः॒ स्कम्भ॑नेना॒ जनि॑त्री॒ आसी॑ना ऊ॒र्ध्वं र॑भ॒सं वि मि॑न्वन्॥

जैसे व्यापक प्रकृति के द्वारा महत्तत्त्व आदि को रचकर सम्पूर्ण जगत् को ईश्वर रचता है, वैसे ही विद्वान् जन पिता के सदृश वर्त्तमान होकर सम्पूर्ण जनों के लिये सुख धारण करते और पदार्थविद्या का प्रत्यक्ष अभ्यास करके शिक्षा देते हैं॥१२॥

म॒ही यदि॑ धि॒षणा॑ शि॒श्नथे॒ धात्स॑द्यो॒वृधं॑ वि॒भ्वं१॒॑ रोद॑स्योः। गिरो॒ यस्मि॑न्ननव॒द्याः स॑मी॒चीर्विश्वा॒ इन्द्रा॑य॒ तवि॑षी॒रनु॑त्ताः॥

जो विद्वान् लोग अनेक प्रकार की विद्याओं से युक्त वाणियों को धारण करके व्यापक परमात्मा के जानने की इच्छा करें, वे बड़े ऐश्वर्य को प्राप्त होवें॥१३॥

मह्या ते॑ स॒ख्यं व॑श्मि श॒क्तीरा वृ॑त्र॒घ्ने नि॒युतो॑ यन्ति पू॒र्वीः। महि॑ स्तो॒त्रमव॒ आग॑न्म सू॒रेर॒स्माकं॒ सु म॑घवन्बोधि गो॒पाः॥

मनुष्य लोगों को चाहिये कि विद्वान् जनों के साथ मित्रता कर सामर्थ्य पूर्ण कर और न्याय से संपूर्ण जनों की रक्षा करके सूर्य्य के प्रकाश के सदृश संसार में विद्या के बोध का प्रकाश करें॥१४॥

महि॒ क्षेत्रं॑ पु॒रुश्च॒न्द्रं वि॑वि॒द्वानादित्सखि॑भ्यश्च॒रथं॒ समै॑रत्। इन्द्रो॒ नृभि॑रजन॒द्दीद्या॑नः सा॒कं सूर्य॑मु॒षसं॑ गा॒तुम॒ग्निम्॥

जैसे विद्या से युक्त बिजुली सूर्य्य भूमि और अग्नि प्रातःकालादि समय में ऐश्वर्य को उत्पन्न कर मित्रों को सुख देते हैं, वैसे ही विद्वान् लोग मनुष्य आदि प्राणियों को सुख देवें॥१५॥

अ॒पश्चि॑दे॒ष वि॒भ्वो॒३॒॑ दमू॑नाः॒ प्र स॒ध्रीची॑रसृजद्वि॒श्वश्च॑न्द्राः। मध्वः॑ पुना॒नाः क॒विभिः॑ प॒वित्रै॒र्द्युभि॑र्हिन्वन्त्य॒क्तुभि॒र्धनु॑त्रीः॥

जो विद्वान् लोग बहुत ऐश्वर्य्यों के जनक पदार्थों को कार्य सिद्धि के लिये उपयोग में लाते तथा विद्वान् जनों के साथ शुद्ध आचरणों को करके सुख और ऐश्वर्य्य दिन रात्रि बढ़ाते, वे भाग्यशाली हैं॥१६॥

अनु॑ कृ॒ष्णे वसु॑धिती जिहाते उ॒भे सूर्य॑स्य मं॒हना॒ यज॑त्रे। परि॒ यत्ते॑ महि॒मानं॑ वृ॒जध्यै॒ सखा॑य इन्द्र॒ काम्या॑ ऋजि॒प्याः॥

जैसे सूर्य अपने प्रताप से भूमि और प्रकाश का आकर्षण करके धारण करता है और जैसे भूमि तथा प्रकाश सम्पूर्ण पदार्थों को धारण करते हैं, वैसे उत्तम पुरुष को चाहिये कि महिमा को धारण और दुर्व्यसनों को त्याग करके मित्रों का सत्कार करें॥१७॥

पति॑र्भव वृत्रहन्त्सू॒नृता॑नां गि॒रां वि॒श्वायु॑र्वृष॒भो व॑यो॒धाः। आ नो॑ गहि स॒ख्येभिः॑ शि॒वेभि॑र्म॒हान्म॒हीभि॑रू॒तिभिः॑ सर॒ण्यन्॥

जो मनुष्य सत्य बोलने शत्रुता को त्यागने अपने प्राण के तुल्य सम्पूर्ण जनों के पालन करने और सूर्य्य के सदृश विद्या धर्म और नम्रता के प्रकाश करनेवाले विद्वान् स्वामी हों, वे श्रेष्ठ होवैं॥१८॥

तम॑ङ्गिर॒स्वन्नम॑सा सप॒र्यन्नव्यं॑ कृणोमि॒ सन्य॑से पुरा॒जाम्। द्रुहो॒ वि या॑हि बहु॒ला अदे॑वीः॒ स्व॑श्च नो मघवन्त्सा॒तये॑ धाः॥

प्रजारूप जनों को चाहिये कि न्याय विनय आदि शुभ गुणों से युक्त राजा आदि जनों का सदा ही सत्कार करें और राजा आदि पुरुषों को चाहिये कि प्रजाजनों का सदा पिता के तुल्य पालन करें और स्त्रियों को विद्यायुक्त करें, इससे अनेक प्रकार से सुख की वृद्धि करें॥१९॥

मिहः॑ पाव॒काः प्रत॑ता अभूवन्त्स्व॒स्ति नः॑ पिपृहि पा॒रमा॑साम्। इन्द्र॒ त्वं र॑थि॒रः पा॑हि नो रि॒षो म॒क्षूम॑क्षू कृणुहि गो॒जितो॑ नः॥

प्रजा और सेना के पुरुषों को चाहिये कि अपने प्रधान पुरुषों से इस प्रकार की याचना करें कि आप लोग हम लोगों से शत्रुओं को जीत-जीत कर सुख उत्पन्न करो। जैसे बिजुली आदि पदार्थ वृष्टि के द्वारा क्षुधा आदि दोष से दूर करके आनन्द देते हैं, वैसे ही हिंसा करनेवाले प्राणियों से शीघ्र दूर कर और रक्षा करके निरन्तर आनन्द दीजिये॥२०॥

अदे॑दिष्ट वृत्र॒हा गोप॑ति॒र्गा अ॒न्तः कृ॒ष्णाँ अ॑रु॒षैर्धाम॑भिर्गात्। प्र सू॒नृता॑ दि॒शमा॑न ऋ॒तेन॒ दुर॑श्च॒ विश्वा॑ अवृणो॒दप॒ स्वाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग सूर्य्य गौओं के पालक और पिता के सदृश सबकी रक्षा करते हैं, वे ही गुरुजन होने योग्य हैं॥२१॥

शु॒नं हु॑वेम म॒घवा॑न॒मिन्द्र॑म॒स्मिन्भरे॒ नृत॑मं॒ वाज॑सातौ। शृ॒ण्वन्त॑मु॒ग्रमू॒तये॑ स॒मत्सु॒ घ्नन्तं॑ वृ॒त्राणि॑ सं॒जितं॒ धना॑नाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। उन्हीं लोगों का निश्चय विजय होता है कि जिनके अत्यन्त धन बलयुक्त और सब वचनों के सुननेवाले श्रेष्ठ पुरुष जो कि संग्रामों में शत्रुओं के मारने जीतनेवाले हों॥२२॥इस मन्त्र में अग्नि, विद्वान्, राजा की सेना, मित्र, वाणी, उपदेशकर्त्ता और प्रजा के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह इक्तीसवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इन्द्र॒ सोमं॑ सोमपते॒ पिबे॒मं माध्य॑न्दिनं॒ सव॑नं॒ चारु॒ यत्ते॑। प्र॒प्रुथ्या॒ शिप्रे॑ मघवन्नृजीषिन्वि॒मुच्या॒ हरी॑ इ॒ह मा॑दयस्व॥

मनुष्यों को चाहिये प्रथम भोजन मध्य दिन के समीप में करें और अग्निहोत्र आदि व्यवहारों में भोजन के समय बलिवैश्वदेव को कर और दूषित वायु को निकाल के आनन्दित हों॥१॥

गवा॑शिरं म॒न्थिन॑मिन्द्र शु॒क्रं पिबा॒ सोमं॑ ररि॒मा ते॒ मदा॑य। ब्र॒ह्म॒कृता॒ मारु॑तेना ग॒णेन॑ स॒जोषा॑ रु॒द्रैस्तृ॒पदा वृ॑षस्व॥

जो मनुष्य अन्य जनों में अपने तुल्य वर्त्तमान होकर उन लोगों के साथ सुख का ग्रहण और सुवर्ण आदि धन की वृद्धि करके तृप्त हुए बलिष्ठ होते, वे ही श्रीमान् होते हैं॥२॥

ये ते॒ शुष्मं॒ ये तवि॑षी॒मव॑र्ध॒न्नर्च॑न्त इन्द्र म॒रुत॑स्त॒ ओजः॑। माध्य॑न्दिने॒ सव॑ने वज्रहस्त॒ पिबा॑ रु॒द्रेभिः॒ सग॑णः सुशिप्र॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! जो आपके मन्त्री लोग सेना, विजय, धन, राज्य, उत्तम शिक्षा, विद्या और धर्म को बढ़ावैं, उनका आप निरन्तर सत्कार उनके साथ राज्य के सुख का सदा भोग करो॥३॥

त इन्न्व॑स्य॒ मधु॑मद्विविप्र॒ इन्द्र॑स्य॒ शर्धो॑ म॒रुतो॒ य आस॑न्। येभि॑र्वृ॒त्रस्ये॑षि॒तो वि॒वेदा॑म॒र्मणो॒ मन्य॑मानस्य॒ मर्म॑॥

जो लोग धन आदि ऐश्वर्य्य से सबके सुख की वृद्धि और दुःखों का निवारण करके सबलोगों को प्रसन्न करते हैं, उनको ही धार्मिक विद्वान् मानना चाहिये॥४॥

म॒नु॒ष्वदि॑न्द्र॒ सव॑नं जुषा॒णः पिबा॒ सोमं॒ शश्व॑ते वी॒र्या॑य। स आ व॑वृत्स्व हर्यश्व य॒ज्ञैः स॑र॒ण्युभि॑र॒पो अर्णा॑ सिसर्षि॥

जो मनुष्य ब्रह्मचर्य विद्या उत्तम शिक्षायुक्त भोजन विहार सत्पुरुषों का सङ्ग और धर्म के सेवन करने से उत्तम आत्मा और परमात्मा के योग से उत्पन्न हुए बल को बढ़ाते हैं, वे लोग सब प्रकार उन्नत होते हैं। जैसे सूर्य्य जल को अन्तरिक्ष के प्रति वायु के साथ ऊपर ले जाता है, वैसे ही विद्वान् लोग सम्पूर्ण जनों को प्रतिष्ठा के साथ उन्नति पर पहुँचाते हैं॥५॥

त्वम॒पो यद्ध॑ वृ॒त्रं ज॑घ॒न्वाँ अत्याँ॑इव॒ प्रासृ॑जः॒ सर्त॒वाजौ। शया॑नमिन्द्र॒ चर॑ता व॒धेन॑ वव्रि॒वांसं॒ परि॑ दे॒वीरदे॑वम्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा आदि वीर पुरुष जैसे सूर्य मेघ को वैसे संग्राम में चलाये शस्त्र और अस्त्रों से शत्रुओं को जीतते हैं, वे ही प्रतापयुक्त होते हैं॥६॥

यजा॑म॒ इन्नम॑सा वृ॒द्धमिन्द्रं॑ बृ॒हन्त॑मृ॒ष्वम॒जरं॒ युवा॑नम्। यस्य॑ प्रि॒ये म॒मतु॑र्य॒ज्ञिय॑स्य॒ न रोद॑सी महि॒मानं॑ म॒माते॑॥

जिस परमेश्वर की अपेक्षा कोई पदार्थ तुल्य वा अधिक नहीं, जो सब से श्रेष्ठ व्यापक विनाशरहित और पूज्य है, उसी परमात्मा की हम लोग निरन्तर उपासना करें॥७॥

इन्द्र॑स्य॒ कर्म॒ सुकृ॑ता पु॒रूणि॑ व्र॒तानि॑ दे॒वा न मि॑नन्ति॒ विश्वे॑। दा॒धार॒ यः पृ॑थि॒वीं द्यामु॒तेमां ज॒जान॒ सूर्य॑मु॒षसं॑ सु॒दंसाः॑॥

परमेश्वर के पवित्र होने से सम्पूर्ण सामर्थ्ययुक्त सबके उत्पन्न वा धारणकर्त्ता परमेश्वर से स्वरूप परिमित सामर्थ्य वा कर्म को कोई भी नाश नहीं कर सक्ता है और जो लोग इस परमेश्वर की सत्यभावना से उपासना करते हैं, वे भी पवित्र होकर सामर्थ्ययुक्त होते हैं॥८॥

अद्रो॑घ स॒त्यं तव॒ तन्म॑हि॒त्वं स॒द्यो यज्जा॒तो अपि॑बो ह॒ सोम॑म्। न द्याव॑ इन्द्र त॒वस॑स्त॒ ओजो॒ नाहा॒ न मासाः॑ श॒रदो॑ वरन्त॥

हे मनुष्यो! जैसे परमेश्वर किसी से द्रोह नहीं करता है, वैसे आप लोग भी हूजिये। जिस परमेश्वर की सृष्टि में सूर्य्य आदि बड़े-बड़े पदार्थ विद्यमान हैं और जिसके स्वरूप वा प्रभाव के अन्त को कोई भी नहीं प्राप्त होता है, वही हम लोगों का इष्टदेव है॥९॥

त्वं स॒द्यो अ॑पिबो जा॒त इ॑न्द्र॒ मदा॑य॒ सोमं॑ पर॒मे व्यो॑मन्। यद्ध॒ द्यावा॑पृथि॒वी आवि॑वेशी॒रथा॑भवः पू॒र्व्यः का॒रुधा॑याः॥

हे मनुष्यो! ब्रह्मचर्य्य से शीघ्र विद्वान् और नियमित आहार-विहार से रोगरहित हो के परमात्मा की आराधना करते हुए सृष्टि और पदार्थविद्याओं में आप सब प्रवेश करें, जिससे जन्म की सफलता हो॥१०॥

अह॒न्नहिं॑ परि॒शया॑न॒मर्ण॑ ओजा॒यमा॑नं तुविजात॒ तव्या॑न्। न ते॑ महि॒त्वमनु॑ भू॒दध॒ द्यौर्यद॒न्यया॑ स्फि॒ग्या॒३॒॑ क्षामव॑स्थाः॥

हे राजपुरुषो! जैसे सूर्य्य अन्तरिक्ष में वर्त्तमान बलवान् मेघ का नाश और भूमि में गिरा कर उसके जल से प्राणियों का पोषण करता है, वैसे ही अधर्म में वर्त्तमान शत्रु का नाश करके उसके ऐश्वर्य्य से राज्य का पालन करो॥११॥

य॒ज्ञो हि त॑ इन्द्र॒ वर्ध॑नो॒ भूदु॒त प्रि॒यः सु॒तसो॑मो मि॒येधः॑। य॒ज्ञेन॑ य॒ज्ञम॑व य॒ज्ञियः॒ सन्य॒ज्ञस्ते॒ वज्र॑महि॒हत्य॑ आवत्॥

हे मनुष्यो! आप लोग जो उत्तम क्रिया से उत्तम क्रियाओं को बढ़ावैं तो आप लोग रक्षित हुए अन्य जनों की भी रक्षा करने के योग्य होवें॥१२॥

य॒ज्ञेनेन्द्र॒मव॒सा च॑क्रे अ॒र्वागैनं॑ सु॒म्नाय॒ नव्य॑से ववृत्याम्। यः स्तोमे॑भिर्वावृ॒धे पू॒र्व्येभि॒र्यो म॑ध्य॒मेभि॑रु॒त नूत॑नेभिः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य व्यतीत हुए व्यवहार के शेष मर्म को जानने मध्यम पुरुषों की रक्षा करने और नवीन प्रयत्न से वृद्धि को प्राप्त होते हैं, वे लोग उसके अनन्तर नवीन-नवीन सुख को प्राप्त होने योग्य होते हैं न कि अन्य आलस्ययुक्त और मूर्ख पुरुष॥१३॥

वि॒वेष॒ यन्मा॑ धि॒षणा॑ ज॒जान॒ स्तवै॑ पु॒रा पार्या॒दिन्द्र॒मह्नः॑। अंह॑सो॒ यत्र॑ पी॒पर॒द्यथा॑ नो ना॒वेव॒ यान्त॑मु॒भये॑ हवन्ते॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि उस वाणी और बुद्धि को ग्रहण करें, जो सब समय में दुष्ट आचरण से पृथक् रखके दुःख से नौका के सदृश पार उतारे॥१४॥

आपू॑र्णो अस्य क॒लशः॒ स्वाहा॒ सेक्ते॑व॒ कोशं॑ सिसिचे॒ पिब॑ध्यै। समु॑ प्रि॒या आव॑वृत्र॒न्मदा॑य प्रदक्षि॒णिद॒भि सोमा॑स॒ इन्द्र॑म्॥

जो लोग धन आदि को प्राप्त हो के औरों के लिये सुपात्र और उत्तम व्यवहार करनेवाले को जानके देते हैं, वे लोग सींचनेवाला घड़े को जैसे वैसे सम्पूर्ण जनों को पूर्ण सुखयुक्त करते हैं॥१५॥

न त्वा॑ गभी॒रः पु॑रुहूत॒ सिन्धु॒र्नाद्र॑यः॒ परि॒ षन्तो॑ वरन्त। इ॒त्था सखि॑भ्य इषि॒तो यदि॒न्द्राऽऽदृ॒ळ्हं चि॒दरु॑जो॒ गव्य॑मू॒र्वम्॥

हे विद्वान् लोगो! जैसे समुद्र और पर्वत सूर्य्य को निवारण नहीं कर सकते, वैसे ही बहुत मित्रोंवाले जन शत्रुओं से निवारण करने से शक्य नहीं होते हैं॥१६॥

शु॒नं हु॑वेम म॒घवा॑न॒मिन्द्र॑म॒स्मिन्भरे॒ नृत॑मं॒ वाज॑सातौ। शृ॒ण्वन्त॑मु॒ग्रमू॒तये॑ स॒मत्सु॒ घ्नन्तं॑ वृ॒त्राणि॑ सं॒जितं॒ धना॑नाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा आदि प्रधान पुरुष, राजविद्या में चतुर, योद्धा, न्यायाधीश पुरुषों, प्राङ्विवाकों (वकीलों) और सेवक पुरुषों का सत्कार करके ग्रहण करें, तो उन राजाओं का सदैव विजय यश कीर्त्ति और ऐश्वर्य्य होता है॥१७॥इस मन्त्र में सोम, मनुष्य, ईश्वर और बिजुली के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह बत्तीसवाँ सूक्त और ग्यारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र पर्व॑तानामुश॒ती उ॒पस्था॒दश्वे॑इव॒ विषि॑ते॒ हास॑माने। गावे॑व शु॒भ्रे मा॒तरा॑ रिहा॒णे विपा॑ट्छुतु॒द्री पय॑सा जवेते॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पर्वतों के मध्य में वर्त्तमान नदियाँ घोड़ों के सदृश दौड़ती और गौओं के सदृश शब्द करती हैं, वैसे ही प्रसन्न और उत्तम गुण कर्म स्वभावयुक्त विद्या की उन्नति की कामना करनेवाली स्त्रियाँ कन्याओं और स्त्रियों को निरन्तर शिक्षा देवैं॥१॥

इन्द्रे॑षिते प्रस॒वं भिक्ष॑माणे॒ अच्छा॑ समु॒द्रं र॒थ्ये॑व याथः। स॒मा॒रा॒णे ऊ॒र्मिभिः॒ पिन्व॑माने अ॒न्या वा॑म॒न्यामप्ये॑ति शुभ्रे॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जवान स्त्रियाँ जवान पतियों को प्राप्त होके गर्भोत्पत्ति की इच्छा करती हैं और नदियाँ समुद्र के प्रति जाती हैं और घोड़े मार्ग में रथ को ले चलते हैं, वैसे ही पढ़ने और उपदेश देनेवालियों को चाहिये कि विद्या और उत्तम शिक्षा के दान से सम्पूर्ण स्त्रियों को उत्तम गुणकर्म स्वभावयुक्त करें॥२॥

अच्छा॒ सिन्धुं॑ मा॒तृत॑मामयासं॒ विपा॑शमु॒र्वीं सु॒भगा॑मगन्म। व॒त्समि॑व मा॒तरा॑ संरिहा॒णे स॑मा॒नं योनि॒मनु॑ सं॒चर॑न्ती॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे समुद्र को नदियाँ और बछड़ों को गौवें और स्त्री पुरुष एक गृह को प्राप्त होते हैं, वैसे ही पढ़ाने और उपदेश देनेवाली स्त्रियाँ हम लोगों को प्राप्त हों और हम लोग जो कन्या और सौभाग्यवाली स्त्रियाँ हों, उनको प्राप्त हों॥३॥

ए॒ना व॒यं पय॑सा॒ पिन्व॑माना॒ अनु॒ योनिं॑ दे॒वकृ॑तं॒ चर॑न्तीः। न वर्त॑वे प्रस॒वः सर्ग॑तक्तः किं॒युर्विप्रो॑ न॒द्यो॑ जोहवीति॥

जैसे जलसहित नदियाँ सबकी उपकार करनेवाली होतीं और कभी जल से हीन नहीं होती हैं, वैसे जो ब्रह्मचर्य से युक्त स्त्री और पुरुष का सन्तान उत्पन्न हो और धर्मसम्बन्धी ब्रह्मचर्य्य से सम्पूर्ण विद्याओं को प्राप्त होकर विद्वान् होता है, वही सबका उपकार कर सकता है॥४॥

रम॑ध्वं मे॒ वच॑से सो॒म्याय॒ ऋता॑वरी॒रुप॑ मुहू॒र्तमेवैः॑। प्र सिन्धु॒मच्छा॑ बृह॒ती म॑नी॒षाव॒स्युर॑ह्वे कुशि॒कस्य॑ सू॒नुः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे नदियाँ समुद्र के सम्मुख जाती हैं, वैसे ही मनुष्य लोग विद्या और धर्मसम्बन्धी व्यवहार को प्राप्त हों, जिससे सुखपूर्वक समय व्यतीत होवै॥५॥

इन्द्रो॑ अ॒स्माँ अ॑रद॒द्वज्र॑बाहु॒रपा॑हन्वृ॒त्रं प॑रि॒धिं न॒दीना॑म्। दे॒वो॑ऽनयत्सवि॒ता सु॑पा॒णिस्तस्य॑ व॒यं प्र॑स॒वे या॑म उ॒र्वीः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य भूमि आदि पदार्थों को आकर्षण से यथास्थान ठहरा और वृष्टि करके ऐश्वर्य को उत्पन्न करता है, वैसे ही हम लोग उत्तम गुणों का आकर्षण और शत्रुओं को जीत करके राज्य की शोभा को प्राप्त करें॥६॥

प्र॒वाच्यं॑ शश्व॒धा वी॒र्यं१॒॑ तदिन्द्र॑स्य॒ कर्म॒ यदहिं॑ विवृ॒श्चत्। वि वज्रे॑ण परि॒षदो॑ जघा॒नाय॒न्नापोऽय॑नमि॒च्छमा॑नाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो धर्मसम्बन्धी काम करके दुष्ट पुरुषों के निवारण के लिये अपना पराक्रम दिखावे, उसके उस कर्म की प्रशंसा सब काल में करनी चाहिये। जो लोग सभा में श्रेष्ठ होवें, वे न्याय से सब लोगों की उन्नति करने की इच्छा करें॥७॥

ए॒तद्वचो॑ जरित॒र्मापि॑ मृष्ठा॒ आ यत्ते॒ घोषा॒नुत्त॑रा यु॒गानि॑। उ॒क्थेषु॑ कारो॒ प्रति॑ नो जुषस्व॒ मा नो॒ नि कः॑ पुरुष॒त्रा नम॑स्ते॥

हे मनुष्यो! जितना भूतकाल गया, उसमें व्यतीत हुए कर्मों के शेष करने योग्य कार्य्य को जान के वर्त्तमान और भविष्यत् काल में जिस प्रकार उन्नति हो के विघ्न निवृत्त होवें, वैसे ही करो॥८॥

ओ षु स्व॑सारः का॒रवे॑ शृणोत य॒यौ वो॑ दू॒रादन॑सा॒ रथे॑न। नि षू न॑मध्वं॒ भव॑ता सुपा॒रा अ॑धोअ॒क्षाः सि॑न्धवः स्रो॒त्याभिः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग दूसरे-दूसरे में प्रसन्न बहुत बातों को सुने हुए पुरुष, औरों से बनाए हुए शीघ्र चलनेवाले वाहनों को देख और वैसे ही बनाय के जलाशयों के आर-पार जाते हुए नम्र होवें, उनको जैसे स्रोता नदियों को, वैसे ऐश्वर्य्य गुण प्राप्त होते हैं॥९॥

आ ते॑ कारो शृणवामा॒ वचां॑सि य॒याथ॑ दू॒रादन॑सा॒ रथे॑न। नि ते॑ नंसै पीप्या॒नेव॒ योषा॒ मर्या॑येव क॒न्या॑ शश्व॒चै ते॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग दूर से आय के विद्वानों के समीप से अनेक प्रकार की विद्याओं को प्राप्त करके नम्र होते हैं, वे विद्यावृद्ध होकर जैसे पतिव्रता स्त्री पति और कन्या अभीष्ट वर को वैसे विद्या को प्राप्त होके आनन्दित होते हैं॥१०॥

यद॒ङ्ग त्वा॑ भर॒ताः सं॒तरे॑युर्ग॒व्यन्ग्राम॑ इषि॒त इन्द्र॑जूतः। अर्षा॒दह॑ प्रस॒वः सर्ग॑तक्त॒ आ वो॑ वृणे सुम॒तिं य॒ज्ञिया॑नाम्॥

जैसे विद्वान् लोग विद्या के पार जाय अर्थात् सम्पूर्ण विद्याओं को पढ़ के बुद्धिमान् होते हैं, वैसे और लोग भी हों, ऐसा करने से सम्पूर्ण जन दुःख के पार जाय अर्थात् दुःख को उल्लङ्घन करके सुखी होवैं॥११॥

अता॑रिषुर्भर॒ता ग॒व्यवः॒ समभ॑क्त॒ विप्रः॑ सुम॒तिं न॒दीना॑म्। प्र पि॑न्वध्वमि॒षय॑न्तीः सु॒राधा॒ आ व॒क्षणाः॑ पृ॒णध्वं॑ या॒त शीभ॑म्॥

मनुष्यों को चाहिये कि नदी और समुद्र आदि जलाशयों को विद्वानों के सदृश पार होके सुख का शीघ्र सेवन करें॥१२॥

उद्व॑ ऊ॒र्मिः शम्या॑ ह॒न्त्वापो॒ योक्त्रा॑णि मुञ्चत। मादु॑ष्कृतौ॒ व्ये॑नसा॒ऽघ्न्यौ शून॒मार॑ताम्॥

जो स्त्री और पुरुष दुःख के बन्धनों को काट और दुष्ट आचरण को त्याग के विद्या की उन्नति करें, तो वे निरन्तर सुख को प्राप्त होवैं॥१३॥इस सूक्त में मेघ, नदी, विद्वान्, मित्र, शिल्पी, नौका आदि स्त्री पुरुष का कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्वसूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह तेतीसवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इन्द्रः॑ पू॒र्भिदाति॑र॒द्दास॑म॒र्कैर्वि॒दद्व॑सु॒र्दय॑मानो॒ वि शत्रू॑न्। ब्रह्म॑जूतस्त॒न्वा॑ वावृधा॒नो भूरि॑दात्र॒ आपृ॑ण॒द्रोद॑सी उ॒भे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य अपने किरणों से भूमि और अन्तरिक्ष को पूर्ण करके अन्धकार को जीतता है, वैसे ही श्रेष्ठ और ऐक्यमत युक्त विचारों से शत्रुओं को जीतै तथा सब काल में शरीर और आत्मा के बल को बढ़ाये और श्रेष्ठ पुरुषों को सत्कार करके दुष्ट जनों का अपमान करैं॥१॥

म॒खस्य॑ ते तवि॒षस्य॒ प्र जू॒तिमिय॑र्मि॒ वाच॑म॒मृता॑य॒ भूष॑न्। इन्द्र॑ क्षिती॒नाम॑सि॒ मानु॑षीणां वि॒शां दैवी॑नामु॒त पू॑र्व॒यावा॑॥

सम्पूर्ण प्रजा और राजजनों को चाहिये कि सब लोगों के स्वामी की आज्ञा का उल्लङ्घन न करैं और सब लोगों के स्वामी को चाहिये कि धर्मयुक्त कर्मों से निरन्तर प्रजाओं का पालन करैं॥२॥

इन्द्रो॑ वृ॒त्रम॑वृणो॒च्छर्ध॑नीतिः॒ प्र मा॒यिना॑ममिना॒द्वर्प॑णीतिः। अह॒न्व्यं॑समु॒शध॒ग्वने॑ष्वा॒विर्धेना॑ अकृणोद्रा॒म्याणा॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य मेघ का नाश करता है, वैसे ही दुष्ट आचरणवाले जनों का नाश और विद्यासम्बन्धी वाणियों का प्रचार करके सब लोगों को सेना और शिक्षा की वृद्धि करनी चाहिये॥३॥

इन्द्रः॑ स्व॒र्षा ज॒नय॒न्नहा॑नि जि॒गायो॒शिग्भिः॒ पृत॑ना अभि॒ष्टिः। प्रारो॑चय॒न्मन॑वे के॒तुमह्ना॒मवि॑न्द॒ज्ज्योति॑र्बृह॒ते रणा॑य॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा लोग सम्पूर्ण जनों से अधिक प्रयत्न युद्धविद्या में करैं, वे उत्तम प्रकार प्रसन्नतायुक्त जो कि युद्ध के लिये पारितोषिक आदि से रुचि दिखाये गये वीर लोग उनके साथ शत्रुओं को जीतकर सूर्य्य के सदृश विजय के प्रकाश को प्रकट करैं॥४॥

इन्द्र॒स्तुजो॑ ब॒र्हणा॒ आ वि॑वेश नृ॒वद्दधा॑नो॒ नर्या॑ पु॒रूणि॑। अचे॑तय॒द्धिय॑ इ॒मा ज॑रि॒त्रे प्रेमं वर्ण॑मतिरच्छु॒क्रमा॑साम्॥

वही पुरुष राज्य में प्रविष्ट हो सकता है कि जो बुद्धियुक्त धार्मिक पुरुषों को सब अधिकारों में नियुक्त कर और सेना की उन्नति करके पिता के सदृश प्रजाओं का पालन कर सकै॥५॥

म॒हो म॒हानि॑ पनयन्त्य॒स्येन्द्र॑स्य॒ कर्म॒ सुकृ॑ता पु॒रूणि॑। वृ॒जने॑न वृजि॒नान्त्सं पि॑पेष मा॒याभि॒र्दस्यूँ॑र॒भिभू॑त्योजाः॥

जैसे राजा और प्रजाजनों को सब लोगों के स्वामी के धर्मयुक्त कर्म स्वीकार करने योग्य हैं, वैसे ही सबके स्वामी राजा को चाहिये कि सब लोगों के उत्तम आचरणों का स्वीकार करै और अनिष्ट आचरणों का स्वीकार कोई न करैं॥६॥

यु॒धेन्द्रो॑ म॒ह्ना वरि॑वश्चकार दे॒वेभ्यः॒ सत्प॑तिश्चर्षणि॒प्राः। वि॒वस्व॑तः॒ सद॑ने अस्य॒ तानि॒ विप्रा॑ उ॒क्थेभिः॑ क॒वयो॑ गृणन्ति॥

उन्हीं लोगों को विद्वान् और धार्मिक जानना चाहिये कि जो राजा आदिकों की झूठी स्तुति को त्याग के धर्मसम्बन्धी कर्मों की प्रशंसा करते हैं और वे ही राजा होने के योग्य हैं कि जो धर्मयुक्त आचरणों को करते हैं॥७॥

स॒त्रा॒साहं॒ वरे॑ण्यं सहो॒दां स॑स॒वांसं॒ स्व॑र॒पश्च॑ दे॒वीः। स॒सान॒ यः पृ॑थि॒वीं द्यामु॒तेमामिन्द्रं॑ मद॒न्त्यनु॒ धीर॑णासः॥

जो असत्य का त्याग और सत्य का ग्रहण करने बल को बढ़ाने और प्रजा के सुख की इच्छा करनेवाला पुरुष बिजुली और पृथिवी आदि के गुणों का विद्या से विभागकर्त्ता हो, उसी परीक्षा करनेवाले जन को बुद्धिमान् वीर लोग प्राप्त होके आनन्द करते हैं और वे भी ऐसे ही पुरुष से आनन्द को प्राप्त हो सकते हैं॥८॥

स॒सानात्याँ॑ उ॒त सूर्यं॑ ससा॒नेन्द्रः॑ ससान पुरु॒भोज॑सं॒ गाम्। हि॒र॒ण्यय॑मु॒त भोगं॑ ससान ह॒त्वी दस्यू॒न्प्रार्यं॒ वर्ण॑मावत्॥

जो लोग उत्तम प्रकार परीक्षा करके भले और बुरे घोड़े, वीरपुरुष, न्यायाधीश, लक्ष्मी और उत्तम भोग का विभाग कर सकें, वे ही पुरुष दुष्ट पुरुषों का नाश कर श्रेष्ठ पुरुषों की रक्षा कर सकैं॥९॥

इन्द्र॒ ओष॑धीरसनो॒दहा॑नि॒ वन॒स्पतीँ॑रसनोद॒न्तरि॑क्षम्। बि॒भेद॑ ब॒लं नु॑नु॒दे विवा॒चोऽथा॑भवद्दमि॒ताभिक्र॑तूनाम्॥

राजा आदि श्रेष्ठ जनों को चाहिये कि प्रतिदिन ओषधियों के रसादि उत्पन्न कर उनके रस का पान विद्यासम्बन्धी वाणी का प्रचार और सब जनों की बुद्धियों का अपनी बुद्धि से भी अधिकता के सहित दमन अर्थात् विषयों से निवृत्ति करैं, जिससे आरोग्य और विद्याओं के प्रभाव प्रतिदिन बढ़ैं॥१०॥

शु॒नं हु॑वेम म॒घवा॑न॒मिन्द्र॑म॒स्मिन्भरे॒ नृत॑मं॒ वाज॑सातौ। शृ॒ण्वन्त॑मु॒ग्रमू॒तये॑ स॒मत्सु॒ घ्नन्तं॑ वृ॒त्राणि॑ सं॒जितं॒ धना॑नाम्॥

मनुष्य लोग दुष्ट और श्रेष्ठ पुरुषों की परीक्षा करने, वादी और प्रतिवादी के वचनों को सुनके न्याय करने पण्डित और मूर्ख जन का आदर और निरादर करने पक्षपात से अलग रहने और सम्पूर्ण जनों के सुख देनेवाले पुरुष को राजा मान के आनन्द करैं॥११॥इस सूक्त में सूर्य्य बिजुली वीर राज्य राजा की सेना और प्रजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥११ यह चौंतीसवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

तिष्ठा॒ हरी॒ रथ॒ आ यु॒ज्यमा॑ना या॒हि वा॒युर्न नि॒युतो॑ नो॒ अच्छ॑। पिबा॒स्यन्धो॑ अ॒भिसृ॑ष्टो अ॒स्मे इन्द्र॒ स्वाहा॑ ररि॒मा ते॒ मदा॑य॥

जो मनुष्य अग्नि आदि पदार्थों से चलनेवाले रथ पर चढ़ के अन्य-अन्य देशों को वायु के सदृश जाते हैं, वे बहुत भक्षण भोजन करने पीने और चूषने योग्य पदार्थों को प्राप्त होते हैं॥१॥

उपा॑जि॒रा पु॑रुहू॒ताय॒ सप्ती॒ हरी॒ रथ॑स्य धू॒र्ष्वा यु॑नज्मि। द्र॒वद्यथा॒ संभृ॑तं वि॒श्वत॑श्चि॒दुपे॒मं य॒ज्ञमा व॑हात॒ इन्द्र॑म्॥

जो लोग वाहनों में बिजुली आदि पदार्थों को संयुक्त करके चलाते हैं, वे किस-किस देश को न जा सकैं ? और उनको कौनसा ऐश्वर्य्य है जो न प्राप्त होवै ?॥२॥

उपो॑ नयस्व॒ वृष॑णा तपु॒ष्पोतेम॑व॒ त्वं वृ॑षभ स्वधावः। ग्रसे॑ता॒मश्वा॒ वि मु॑चे॒ह शोणा॑ दि॒वेदि॑वे स॒दृशी॑रद्धि धा॒नाः॥

जो शिल्पी जन अग्नि जल आदि पदार्थों को उत्तम कलाओं से युक्त वाहनों में संयुक्त करके चलाते हैं, वे दारिद्र्य को छोड़ के धन और धान्य को प्राप्त होते हैं॥३॥

ब्रह्म॑णा ते ब्रह्म॒युजा॑ युनज्मि॒ हरी॒ सखा॑या सध॒माद॑ आ॒शू। स्थि॒रं रथं॑ सु॒खमि॑न्द्राधि॒तिष्ठ॑न्प्रजा॒नन्वि॒द्वाँ उप॑ याहि॒ सोम॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग अग्नि और जल आदि पदार्थों से चलाये गये वाहन पर बैठ अच्छे प्रकार विद्या द्वारा उसको चलाते हुए देशदेशान्तरों में जाय आय और ऐश्वर्य्य को पाय मित्रों का सत्कार करैं, वे ही विद्या और धर्म की वृद्धि कर सकैं॥४॥

मा ते॒ हरी॒ वृष॑णा वी॒तपृ॑ष्ठा॒ नि री॑रम॒न्यज॑मानासो अ॒न्ये। अ॒त्याया॑हि॒ शश्व॑तो व॒यं तेऽरं॑ सु॒तेभिः॑ कृणवाम॒ सोमैः॑॥

जो लोग अग्नि आदि पदार्थों की विद्या को जाने विना इस विद्या के जाननेवाले जनों का उत्साह नहीं बढ़ाते, उनका उल्लङ्घन कर अनादि काल से सिद्ध विद्या के जाननेवाले विद्वानों के शरण जा के शिल्पविद्या से उत्पन्न कार्यों से पूर्ण मनोरथवाले हम लोग होवैं, इस प्रकार इच्छा करके नित्य प्रयत्न करैं॥५॥

तवा॒यं सोम॒स्त्वमेह्य॒र्वाङ् श॑श्वत्त॒मं सु॒मना॑ अ॒स्य पा॑हि। अ॒स्मिन्य॒ज्ञे ब॒र्हिष्या नि॒षद्या॑ दधि॒ष्वेमं ज॒ठर॒ इन्दु॑मिन्द्र॥

हे मनुष्यो! इस सबसे उत्तम शिल्पविद्या से साध्य व्यवहार में चतुर होके अनादि काल से उत्पन्न और प्राचीन विद्वानों से प्राप्त ऐश्वर्य्य को सिद्ध कर इस संसार की रक्षा के लिये स्थित करके योग्य आहार और विहार से आनन्द भोगो॥६॥

स्ती॒र्णं ते॑ ब॒र्हिः सु॒त इ॑न्द्र॒ सोमः॑ कृ॒ता धा॒ना अत्त॑वे ते॒ हरि॑भ्याम्। तदो॑कसे पुरु॒शाका॑य॒ वृष्णे॑ म॒रुत्व॑ते॒ तुभ्यं॑ रा॒ता ह॒वींषि॑॥

सम्पूर्ण जन उत्तम पदार्थों के भोजन करनेवाले हों और अन्याय से इकट्ठे किये हुए किसी भी पदार्थ का भोग न करैं, इस प्रकार वर्त्ताव करने पर धनसामर्थ्य, विद्या और आयु बढ़ते हैं॥७॥

इ॒मं नरः॒ पर्व॑ता॒स्तुभ्य॒मापः॒ समि॑न्द्र॒ गोभि॒र्मधु॑मन्तमक्रन्। तस्या॒गत्या॑ सु॒मना॑ ऋष्व पाहि प्रजा॒नन्वि॒द्वान्प॒थ्या॒३॒॑ अनु॒ स्वाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे वृष्टियों से सबका पालन होता है, वैसे ही विमान आदि वाहन बनानेवाले जन संसार में सबके रक्षा करनेवाले होते हैं॥८॥

याँ आभ॑जो म॒रुत॑ इन्द्र॒ सोमे॒ ये त्वामव॑र्ध॒न्नभ॑वन्ग॒णस्ते॑। तेभि॑रे॒तं स॒जोषा॑ वावशा॒नो॒३॒॑ग्नेः पि॑ब जि॒ह्वया॒ सोम॑मिन्द्र॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो प्राण के सदृश प्रिय और श्रेष्ठ विद्वान् जनों की मनुष्य लोग सेवा करैं तो इन मनुष्यों की वे विद्वान् लोग सब प्रकार वृद्धि करैं और जैसे अग्नि ज्वाला से सम्पूर्ण रसों का पान करता है, वैसे ही तीक्ष्ण क्षुधा के सहित वर्त्तमान पुरुष अन्न का भोजन करै और पान करने योग्य वस्तु का पान करै॥९॥

इन्द्र॒ पिब॑ स्व॒धया॑ चित्सु॒तस्या॒ग्नेर्वा॑ पाहि जि॒ह्वया॑ यजत्र। अ॒ध्व॒र्योर्वा॒ प्रय॑तं शक्र॒ हस्ता॒द्धोतु॑र्वा य॒ज्ञं ह॒विषो॑ जुषस्व॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिन मनुष्यों से उत्तम प्रकार सिद्ध किये हुए अन्न का भोजन और रस का पान कर रोगरहित हो और विद्वानों के साथ मेल करके यज्ञ का सेवन किया जाय, वे सदा सुखी होवैं॥१०॥

शु॒नं हु॑वेम म॒घवा॑न॒मिन्द्र॑म॒स्मिन्भरे॒ नृत॑मं॒ वाज॑सातौ। शृ॒ण्वन्त॑मु॒ग्रमू॒तये॑ स॒मत्सु॒ घ्नन्तं॑ वृ॒त्राणि॑ सं॒जितं॒ धना॑नाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जिन लोगों का निष्फल कर्म नहीं है, उनको सबकी रक्षा के लिये आप लोग स्वीकार करैं॥११॥इस सूक्त में अग्नि आदि पदार्थों और घोड़े के दृष्टान्त से उपदेश करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पैंतीसवाँ सूक्त और अठारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इ॒मामू॒ षु प्रभृ॑तिं सा॒तये॑ धाः॒ शश्व॑च्छश्वदू॒तिभि॒र्याद॑मानः। सु॒तेसु॑ते वावृधे॒ वर्ध॑नेभि॒र्यः कर्म॑भिर्म॒हद्भिः॒ सुश्रु॑तो॒ भूत्॥

जो मनुष्य कार्य्य के विज्ञान का प्रारम्भ करके पर पर अर्थात् बड़े से छोटे उससे और छोटे उससे भी छोटे इत्यादि सूक्ष्म कारण पर्य्यन्त व्यापक परमाणुरूप पदार्थ को जानकर उपयोग करें कार्य में लावें, वे इस संसार में अत्यन्त वृद्धि को प्राप्त होवैं और जो लोग विद्वान् जनों से केवल विद्या की ही याचना करते हैं, वे बहुश्रुत होते हैं॥१॥

इन्द्रा॑य॒ सोमाः॑ प्र॒दिवो॒ विदा॑ना ऋ॒भुर्येभि॒र्वृष॑पर्वा॒ विहा॑याः। प्र॒य॒म्यमा॑ना॒न्प्रति॒ षू गृ॑भा॒येन्द्र॒ पिब॒ वृष॑धूतस्य॒ वृष्णः॑॥

हे मनुष्यो! इस संसार में जैसे श्रेष्ठ यथार्थवक्ता पुरुष दुष्ट व्यवहार का त्याग और श्रेष्ठ आचरण का ग्रहण करके नियमित आहार विहार से रोगरहित और अधिक अवस्थावाले होते हैं, वैसे ही आप लोग भी हूजिये॥२॥

पिबा॒ वर्ध॑स्व॒ तव॑ घा सु॒तास॒ इन्द्र॒ सोमा॑सः प्रथ॒मा उ॒तेमे। यथापि॑बः पू॒र्व्याँ इ॑न्द्र॒ सोमाँ॑ ए॒वा पा॑हि॒ पन्यो॑ अ॒द्या नवी॑यान्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त रसों का पान करैं, उनकी वृद्धि होवै और जो वृद्धि को प्राप्त होकर धर्म का आचरण करैं, वे सम्पूर्ण ऐश्वर्य को प्राप्त होवैं॥३॥

म॒हाँ अम॑त्रो वृ॒जने॑ विर॒प्श्यु१॒॑ग्रं शवः॑ पत्यते धृ॒ष्ण्वोजः॑। नाह॑ विव्याच पृथि॒वी च॒नैनं॒ यत्सोमा॑सो॒ हर्य॑श्व॒मम॑न्दन्॥

मनुष्यों में वही पुरुष श्रेष्ठ होता है, जो शरीर आत्मा सेना मित्र बल आरोग्य धर्म विद्या की वृद्धि करता है, वह छल आदि दोषों का त्याग करके सबका उपकार करता है॥४॥

म॒हाँ उ॒ग्रो वा॑वृधे वी॒र्या॑य स॒माच॑क्रे वृष॒भः काव्ये॑न। इन्द्रो॒ भगो॑ वाज॒दा अ॑स्य॒ गावः॒ प्र जा॑यन्ते॒ दक्षि॑णा अस्य पू॒र्वीः॥

जो विद्यावान् पुरुष श्रेष्ठ और अश्रेष्ठ सुपात्र कुपात्रों की उत्तम प्रकार परीक्षा करके सत्कार और अपकार यथायोग्य करता है, उसी पुरुष के सम्पूर्ण पशु और आनन्द उपकारयुक्त होते हैं॥५॥

प्र यत्सिन्ध॑वः प्रस॒वं यथाय॒न्नापः॑ समु॒द्रं र॒थ्ये॑व जग्मुः। अत॑श्चि॒दिन्द्रः॒ सद॑सो॒ वरी॑या॒न्यदीं॒ सोमः॑ पृ॒णति॑ दु॒ग्धो अं॒शुः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचक लुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य वैर को त्याग के सम्पूर्ण प्राणियों के उपकार करने की इच्छा करैं, उनके प्रति जैसे नदियाँ समुद्र को और जल अन्तरिक्ष के सन्मुख को प्राप्त होते हैं, वैसे सन्मुख जाते हैं, उनसे उत्तम शिक्षा को प्राप्त उत्तम प्रकार से सींचे गये ओषधियों के समूह के सदृश सम्पूर्ण प्राणियों के सुख देने को समर्थ होते हैं॥६॥

स॒मु॒द्रेण॒ सिन्ध॑वो॒ याद॑माना॒ इन्द्रा॑य॒ सोमं॒ सुषु॑तं॒ भर॑न्तः। अं॒शुं दु॑हन्ति ह॒स्तिनो॑ भ॒रित्रै॒र्मध्वः॑ पुनन्ति॒ धार॑या प॒वित्रैः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सब ओर से जल आदि का ग्रहण कर नदियाँ वेग से समुद्र को प्राप्त हो रत्नवाली और शुद्ध जलयुक्त होती हैं, वैसे ही ब्रह्मचर्य्य से विद्याओं को धारण करके तीक्ष्ण बुद्धि से पूर्णज्ञानवाले हो पवित्र हुए और परमेश्वर को प्राप्त होकर सिद्धियों से परिपूर्ण शुद्ध आनन्दी मनुष्य होते हैं॥७॥

ह्र॒दाइ॑व कु॒क्षयः॑ सोम॒धानाः॒ समीं॑ विव्याच॒ सव॑ना पु॒रूणि॑। अन्ना॒ यदिन्द्रः॑ प्रथ॒मा व्याश॑ वृ॒त्रं ज॑घ॒न्वाँ अ॑वृणीत॒ सोम॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो पुरुष गम्भीर अभिप्राय से युक्त सूर्य्य के सदृश प्रतापी ऐश्वर्य्य के धारण करनेवाले अपने और दूसरों के दोषों को नाश करके एश्वर्य्य का स्वीकार करते हैं, वे ही प्रसन्नात्मा होते हैं॥८॥

आ तू भ॑र॒ माकि॑रे॒तत्परि॑ ष्ठाद्वि॒द्मा हि त्वा॒ वसु॑पतिं॒ वसू॑नाम्। इन्द्र॒ यत्ते॒ माहि॑नं॒ दत्र॒मस्त्य॒स्मभ्यं॒ तद्ध॑र्यश्व॒ प्र य॑न्धि॥

विद्वान् जनों को चाहिये कि सम्पूर्ण जनों के प्रति ऐसा उपदेश देवैं कि आप लोग दोषों को त्याग गुणों को धारण और धन और ऐश्वर्य्य को प्राप्त होके अन्य सुपात्र पुरुषों के लिये देवैं॥९॥

अ॒स्मे प्र य॑न्धि मघवन्नृजीषि॒न्निन्द्र॑ रा॒यो वि॒श्ववा॑रस्य॒ भूरेः॑। अ॒स्मे श॒तं श॒रदो॑ जी॒वसे॑ धा अ॒स्मे वी॒राञ्छश्व॑त इन्द्र शिप्रिन्॥

वे ही उत्तम स्वभाववाले यथार्थवक्ता विद्वान् लोग हैं कि जो लक्ष्मी का विभाग करके अर्थात् अन्य जनों को बाँट के फिर आप भोजन करते हैं और मनुष्यों को ब्रह्मचर्य्य के उपदेश से सौ वर्ष की अवस्थावाले करके सम्पूर्ण कर्मों में उत्साही भयरहित और पुरुषार्थी करते हैं॥१०॥

शु॒नं हु॑वेम म॒घवा॑न॒मिन्द्र॑म॒स्मिन्भरे॒ नृत॑मं॒ वाज॑सातौ। शृ॒ण्वन्त॑मु॒ग्रमू॒तये॑ स॒मत्सु॒ घ्नन्तं॑ वृ॒त्राणि॑ सं॒जितं॒ धना॑नाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सम्पूर्ण विद्याविशिष्ट शुभगुणी सबको सुख देनेवाला प्रजाओं के पालन में तत्पर शत्रुओं के नाश करने में उद्यत धर्मी और पुरुषों में श्रेष्ठ पुरुष हो, उसके लिये राज्य में अधिकार दे और उसकी आज्ञा में वर्त्तमान होकर सबलोग अत्यन्त सुख भोग करो॥११॥इस सूक्त में इन्द्र विद्वान् राजा और प्रजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह छत्तीसवाँ सूक्त और बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

वार्त्र॑हत्याय॒ शव॑से पृतना॒षाह्या॑य च। इन्द्र॒ त्वा व॑र्तयामसि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। युद्ध करने की विद्या के शिक्षकों को चाहिये कि सेनाओं के अध्यक्ष और नोकरों को उत्तम प्रकार शिक्षा देवैं, जिससे निश्चित विजय होवै॥१॥

अ॒र्वा॒चीनं॒ सु ते॒ मन॑ उ॒त चक्षुः॑ शतक्रतो। इन्द्र॑ कृ॒ण्वन्तु॑ वा॒घतः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजा आदि जन सदा यथार्थवक्ता पुरुष की शिक्षा में वर्त्तमान होके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध करैं॥२॥

नामा॑नि ते शतक्रतो॒ विश्वा॑भिर्गी॒र्भिरी॑महे। इन्द्रा॑भिमाति॒षाह्ये॑॥

राजमान, विद्या और विनयों से प्रकाशमान, वह राजा, मनुष्यों की पालना करता वह नृप, और भूमि का पालन करता है, वह भूमिप इत्यादि सब राजा के नाम सार्थक हों और जब शत्रुओं के साथ संग्राम होवै तो सब प्रकार से रक्षा करनेवाला राजा होवै, ऐसा होने से निश्चित विजय होता, नहीं तो नहीं होता है॥३॥

पु॒रु॒ष्टु॒तस्य॒ धाम॑भिः श॒तेन॑ महयामसि। इन्द्र॑स्य चर्षणी॒धृतः॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि राजा आदि न्यायकारी जनों का सब प्रकार सत्कार करैं और राजा आदि भी प्रजाजनों का सदा सत्कार करैं, ऐसा करने पर राजा और प्रजा इन दोनों के मङ्गल की उन्नति होती है॥४॥

इन्द्रं॑ वृ॒त्राय॒ हन्त॑वे पुरुहू॒तमुप॑ ब्रुवे। भरे॑षु॒ वाज॑सातये॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जब संग्राम प्रवृत्त होवै तो योधाओं के प्रति अध्यक्ष पुरुषों को चाहिये कि जिस प्रकार विजय हो वैसा उपदेश दें और योद्धा लोग अधिष्ठाता पुरुषों की आज्ञा में सब प्रकार वर्त्तमान होवैं, ऐसा करने से कैसे पराजय हो ?॥५॥

वाजे॑षु सास॒हिर्भ॑व॒ त्वामी॑महे शतक्रतो। इन्द्र॑ वृ॒त्राय॒ हन्त॑वे॥

जिस कर्म में जिसका स्थापन सभा करै, वह पुरुष उस अधिकार की यथायोग्य उन्नति करै और जिस अधिकार में जिसका नियोग होवै, वहाँ जो आज्ञा उसका वह कदाचित् उल्लङ्घन न करै॥६॥

द्यु॒म्नेषु॑ पृत॒नाज्ये॑ पृत्सु॒तूर्षु॒ श्रवः॑सु च। इन्द्र॒ साक्ष्वा॒भिमा॑तिषु॥

जो विद्यमान धन आदि पदार्थ वीर सेना व्याख्यान देनेवाले और युद्ध के अभिमानी अपने प्रिय आनन्दित और पुष्ट पुरुषों के होने पर शत्रुओं के साथ संग्राम करते हैं, वे ही पुरुष निश्चित विजय को प्राप्त होते हैं॥७॥

शु॒ष्मिन्त॑मं न ऊ॒तये॑ द्यु॒म्निनं॑ पाहि॒ जागृ॑विम्। इन्द्र॒ सोमं॑ शतक्रतो॥

सब प्रजा और राजजनों को चाहिये कि सबके अधीश राजा और अन्य अध्यक्षों के प्रति ऐसा कहैं कि आप लोग हम लोगों के रक्षक पुरुषों की और ऐश्वर्य्य की रक्षा में निरालस और उद्यत होवैं॥८॥

इ॒न्द्रि॒याणि॑ शतक्रतो॒ या ते॒ जने॑षु प॒ञ्चसु॑। इन्द्र॒ तानि॑ त॒ आ वृ॑णे॥

वही पुरुष राज्य करने के योग्य है, जो मन्त्रियों के चरित्रों को नेत्र से रूप के सदृश प्रत्यक्ष करता है, जैसे शरीर के इन्द्रिय के गोलक अर्थात् काले तारेवाले नेत्र के संबन्ध से जीव के सम्पूर्ण कार्य्य सिद्ध होते हैं, वैसे राजा मन्त्री और सेना के योग से राजकार्यों को सिद्ध कर सकता है॥९॥

अग॑न्निन्द्र॒ श्रवो॑ बृ॒हद्द्यु॒म्नं द॑धिष्व दु॒ष्टर॑म्। उत्ते॒ शुष्मं॑ तिरामसि॥

उतना ही ऐश्वर्य्य राजा को धारण करना चाहिये कि जितना सेना और प्रजा के पालन के और मन्त्रियों की रक्षा के लिये पूरा होवै, ऐसा करने से बड़ा यश बढ़ै॥१०॥

अ॒र्वा॒वतो॑ न॒ आ ग॒ह्यथो॑ शक्र परा॒वतः॑। उ॒ लो॒को यस्ते॑ अद्रिव॒ इन्द्रे॒ह तत॒ आ ग॑हि॥

जैसे मनुष्य लोग प्रीति से राजा को बुलावैं और वह राजा उन प्रजाजनों के समीप अपने देश से प्राप्त हो और उस देश से अन्य देश में भी जाय, इस प्रकार राजा और प्रजा जन परस्पर स्नेह की वृद्धि के लिये कर्मों को निरन्तर करैं॥११॥इस सूक्त में राजा और प्रजा के कामों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस सूक्त से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सैंतीसवाँ सूक्त और बाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒भि तष्टे॑व दीधया मनी॒षामत्यो॒ न वा॒जी सु॒धुरो॒ जिहा॑नः। अ॒भि प्रि॒याणि॒ मर्मृ॑श॒त्परा॑णि क॒वीँरि॑च्छामि सं॒दृशे॑ सुमे॒धाः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे धुरियों के धारण करनेवाले उत्तम प्रकार शिक्षित घोड़े वाञ्छित कर्मों को सिद्ध करते हैं, वैसे ही साधारण जन विद्वानों की उत्तम बुद्धि को ग्रहण करके बढ़ई के सदृश व्यसनों का छेदन करैं॥१॥

इ॒नोत पृ॑च्छ॒ जनि॑मा कवी॒नां म॑नो॒धृतः॑ सु॒कृत॑स्तक्षत॒ द्याम्। इ॒मा उ॑ ते प्र॒ण्यो॒३॒॑ वर्ध॑माना॒ मनो॑वाता॒ अध॒ नु धर्म॑णि ग्मन्॥

जो पुरुष और स्त्रियाँ धर्म के अनुष्ठानपूर्वक बुद्धिमान् लोगों के लक्षणों को धारण कर प्रश्नोत्तर और अन्तःकरण को शुद्ध करके समर्थ होते हैं, वे पुरुष और वैसी स्त्रियाँ सब प्रकार वृद्धि को प्राप्त होती हैं॥२॥

नि षी॒मिदत्र॒ गुह्या॒ दधा॑ना उ॒त क्ष॒त्राय॒ रोद॑सी॒ सम॑ञ्जन्। सं मात्रा॑भिर्ममि॒रे ये॒मुरु॒र्वी अ॒न्तर्म॒ही समृ॑ते॒ धाय॑से धुः॥

जो स्त्रियाँ ब्रह्मचर्य्य से विद्या के विज्ञानों को प्राप्त होकर पृथिवी आदि पदार्थों से उपकार का ग्रहण कर सकैं, वे रानी होने के योग्य होती हैं॥३॥

आ॒तिष्ठ॑न्तं॒ परि॒ विश्वे॑ अभूष॒ञ्छ्रियो॒ वसा॑नश्चरति॒ स्वरो॑चिः। म॒हत्तद्वृष्णो॒ असु॑रस्य॒ नामा वि॒श्वरू॑पो अ॒मृता॑नि तस्थौ॥

हे मनुष्यो! वायुरूप आधार में वर्त्तमान सूर्य्य आदि लोक जल वृष्टि आदि के द्वारा सब लोगों को आनन्द देते हैं, वैसे ही लक्ष्मी उत्पादन करनेवाला पुरुष सबको शोभित करता है॥४॥

असू॑त॒ पूर्वो॑ वृष॒भो ज्याया॑नि॒मा अ॑स्य शु॒रुधः॑ सन्ति पू॒र्वीः। दिवो॑ नपाता वि॒दथ॑स्य धी॒भिः क्ष॒त्रं रा॑जाना प्र॒दिवो॑ दधाथे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे क्रम से सूर्य्य जल के धारण और वृष्टि से इस संसार का हित करता है, वैसे ही उत्तम गुण और न्यायों के सहित वर्त्तमान हुए राजा आदि लोग उत्तम प्रकार रक्षित राज्य का पालन करैं॥५॥

त्रीणि॑ राजाना वि॒दथे॑ पु॒रूणि॒ परि॒ विश्वा॑नि भूषथः॒ सदां॑सि। अप॑श्य॒मत्र॒ मन॑सा जग॒न्वान्व्र॒ते ग॑न्ध॒र्वाँ अपि॑ वा॒युके॑शान्॥

हे मनुष्यो! आप लोग उत्तम गुण कर्म और स्वभाववाले यथार्थवक्ता विद्वान् पुरुषों की राजसभा विद्यासभा और धर्मसभा नियत कर और सम्पूर्ण राज्यसम्बन्धी कर्मों को यथायोग्य सिद्ध कर सकल प्रजा को निरन्तर सुख दीजिये॥६॥

तदिन्न्व॑स्य वृष॒भस्य॑ धे॒नोरा नाम॑भिर्ममिरे॒ सक्म्यं॒ गोः। अ॒न्यद॑न्यदसु॒र्यं१॒॑ वसा॑ना॒ नि मा॒यिनो॑ ममिरे रू॒पम॑स्मिन्॥

जो मनुष्य इस राज्य का कोमल वचनों से पालन करते हैं, वे मेघ से जल के सदृश अनेक प्रकार के ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं॥७॥

तदिन्न्व॑स्य सवि॒तुर्नकि॑र्मे हिर॒ण्ययी॑म॒मतिं॒ यामशि॑श्रेत्। आ सु॑ष्टु॒ती रोद॑सी विश्वमि॒न्वे अपी॑व॒ योषा॒ जनि॑मानि वव्रे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे चन्द्र आदि लोक सूर्य के प्रकाश का आश्रय करके उत्तम शोभित देख पड़ते हैं और जैसे स्त्री स्नेहपात्र अपने प्रिय और उत्तम लक्षणों से युक्त पति को प्राप्त होकर सन्तानों को उत्पन्न करके आनन्द करती है, वैसे ही पृथिवी के राज्य को प्राप्त होकर दुःखों से रहित हुए राजजन निरन्तर आनन्द करैं॥८॥

यु॒वं प्र॒त्नस्य॑ साधथो म॒हो यद्दैवी॑ स्व॒स्तिः परि॑ णः स्यातम्। गो॒पाजि॑ह्वस्य त॒स्थुषो॒ विरू॑पा॒ विश्वे॑ पश्यन्ति मा॒यिनः॑ कृ॒तानि॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे बुद्धिमान् शिल्पीजन अनेक प्रकार की वस्तुओं को रचके सबको शोभित करते हैं, वैसे ही राजा आदि जन प्रजा में स्वस्थता को स्थिर करके सबके कार्यों को सिद्ध करें॥९॥

शु॒नं हु॑वेम म॒घवा॑न॒मिन्द्र॑म॒स्मिन्भरे॒ नृत॑मं॒ वाज॑सातौ। शृ॒ण्वन्त॑मु॒ग्रमू॒तये॑ स॒मत्सु॒ घ्नन्तं॑ वृ॒त्राणि॑ सं॒जितं॒ धना॑नाम्॥

जो राजा और प्रजाजन परस्पर प्रसन्न परस्पर के सुख और दुःख की वार्त्ताओं को सुनते दुष्ट पुरुषों का ताड़न करते और सत्पुरुषों का सत्कार करते हुए परस्पर के उत्तम कर्मों की प्रशंसा करैं, वे अत्यन्त ऐश्वर्य्य को प्राप्त होकर सुखी होवैं॥१०॥इस सूक्त में विद्वान् शिल्पी सभा राजा प्रजा सूर्य और भूमि आदि के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह ३८ वाँ सूक्त २४ वाँ वर्ग और ३ मण्डल में ३ अनुवाक समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

इन्द्रं॑ म॒तिर्हृ॒द आ व॒च्यमा॒नाच्छा॒ पतिं॒ स्तोम॑तष्टा जिगाति। या जागृ॑विर्वि॒दथे॑ श॒स्यमा॒नेन्द्र॒ यत्ते॒ जाय॑ते वि॒द्धि तस्य॑॥

जिनके हृदय में यथार्थ ज्ञान उत्पन्न होता है, वे सब लोगों के गुण और दोषों को जान गुणों को ग्रहण दोषों का त्याग गुणों की प्रशंसा और दोषों की निन्दा करके उत्तम कर्मों को करें, ऐसा होने से वे इस संसार में प्रशंसायुक्त होवें॥१॥

दि॒वश्चि॒दा पू॒र्व्या जाय॑माना॒ वि जागृ॑विर्वि॒दथे॑ श॒स्यमा॑ना। भ॒द्रा वस्त्रा॒ण्यर्जु॑ना॒ वसा॑ना॒ सेयम॒स्मे स॑न॒जा पित्र्या॒ धीः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही श्रेष्ठ पुरुष हैं, जो कि अपने आत्मा के तुल्य सम्पूर्ण जनों में बुद्धि आदि पदार्थों को उत्पन्न कराने को उद्यत होवें॥२॥

य॒मा चि॒दत्र॑ यम॒सूर॑सूत जि॒ह्वाया॒ अग्रं॒ पत॒दा ह्यस्था॑त्। वपूं॑षि जा॒ता मि॑थु॒ना स॑चेते तमो॒हना॒ तपु॑षो बु॒ध्न एता॑॥

हे मनुष्यो! आप जैसे बिजुली सूर्य का और सूर्य चन्द्रादिक का प्रकाश और अन्धकार का नाश करता है, वैसे ही परस्पर अनुकूल होकर उत्तम व्यवहार में तत्पर होओ॥३॥

नकि॑रेषां निन्दि॒ता मर्त्ये॑षु॒ ये अ॒स्माकं॑ पि॒तरो॒ गोषु॑ यो॒धाः। इन्द्र॑ एषां दृंहि॒ता माहि॑नावा॒नुद्गो॒त्राणि॑ ससृजे दं॒सना॑वान्॥

मनुष्यों को चाहिये कि ऐसा प्रयत्न करें कि जिससे निन्दित न हों और आप दूसरों की स्तुति करनेवाले हों और जैसे सूर्य्य संपूर्ण जगत् का पालन करता है, वैसे रक्षा करनेवाले पितरों की सेवा करनी चाहिये॥४॥

सखा॑ ह॒ यत्र॒ सखि॑भि॒र्नव॑ग्वैरभि॒ज्ञ्वा सत्व॑भि॒र्गा अ॑नु॒ग्मन्। स॒त्यं तदिन्द्रो॑ द॒शभि॒र्दश॑ग्वैः॒ सूर्यं॑ विवेद॒ तम॑सि क्षि॒यन्त॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मित्र के तुल्य वर्त्तमान वायु से बिजुली नामक अग्नि अन्धकार में सूर्य के परिणाम को प्राप्त हो और सबको प्रकाशित कर आनन्द देती है, वैसे ही धार्मिक मित्रों के सहित मित्र विद्वान् शुद्धान्तःकरणता तथा विद्या से प्रकट होकर सबके आत्माओं का प्रकाश करके आनन्द देता है॥५॥

इन्द्रो॒ मधु॒ संभृ॑तमु॒स्रिया॑यां प॒द्वद्वि॑वेद श॒फव॒न्नमे॒ गोः। गुहा॑ हि॒तं गुह्यं॑ गू॒ळ्हम॒प्सु हस्ते॑ दधे॒ दक्षि॑णे॒ दक्षि॑णावान्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे मनुष्य पैरों और पशुखुरों में गमन करके दूसरे स्थान को प्रत्यक्ष करते हैं, वैसे ही बाहर भीतर वर्त्तमान बिजुली को विद्वान् पुरुष हस्तप्राप्त दक्षिणा के सदृश जानकर और हृदय में वर्त्तमान अपने आत्मा और परमात्मा तथा बाह्य सूर्य आदि को जानता है, इसके सहाय से धर्म अर्थ काम और मोक्षों को सब सिद्ध करें॥६॥

ज्योति॑र्वृणीत॒ तम॑सो विजा॒नन्ना॒रे स्या॑म दुरि॒ताद॒भीके॑। इ॒मा गिरः॑ सोमपाः सोमवृद्ध जु॒षस्वे॑न्द्र पुरु॒तम॑स्य का॒रोः॥

हे मनुष्यो! जैसे हम लोग पाप के आचरण से पृथक् होकर धर्म के आचरण और अविद्या से पृथक् होकर विद्या का ग्रहण करके आत्मसम्बन्धी ज्ञान और शिल्प क्रिया कौशल का सेवन करते हैं, वैसे ही आप लोग भी सेवन करनेवाले हूजिये और हम सब लोग दूर और समीप में वर्त्तमान हुए भी मित्रता का त्याग नहीं करें॥७॥

ज्योति॑र्य॒ज्ञाय॒ रोद॑सी॒ अनु॑ ष्यादा॒रे स्या॑म दुरि॒तस्य॒ भूरेः॑। भूरि॑ चि॒द्धि तु॑ज॒तो मर्त्य॑स्य सुपा॒रासो॑ वसवो ब॒र्हणा॑वत्॥

वे ही श्रेष्ठ पुरुष हैं, जो लोग दूर और समीप में वर्त्तमान पुरुषों में कृपा का अनुसन्धान विद्या और उपदेश का प्रचार करके बड़े कठिन बोध की सरलता को उत्पन्न करें, वे ही सब लोगों को सत्कार करने योग्य होवें॥८॥

शु॒नं हु॑वेम म॒घवा॑न॒मिन्द्र॑म॒स्मिन्भरे॒ नृत॑मं॒ वाज॑सातौ। शृ॒ण्वन्त॑मु॒ग्रमू॒तये॑ स॒मत्सु॒ घ्नन्तं॑ वृ॒त्राणि॑ सं॒जितं॒ धना॑नाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। यथार्थवक्ता विद्वान् लोग भूगर्भ बिजुली भूगोल खगोल सृष्टिस्थ पदार्थों की विद्या के उपदेश से पदार्थविद्याओं को प्राप्त कराके सबकी निरन्तर वृद्धि करें॥९॥इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन, निन्दित जनों का निवारण, मित्रता करना, अज्ञान का त्याग कर, विद्या की प्राप्ति की इच्छा करना इत्यादि विषय वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह समझना चाहिये॥यह ऋग्वेदसंहिता में तृतीय अष्टक में दूसरा अध्याय छब्बीसवाँ वर्ग और तृतीय मण्डल में उन्तालीसवाँ सूक्त समाप्त हुआ॥

इन्द्र॑ त्वा वृष॒भं व॒यं सु॒ते सोमे॑ हवामहे। स पा॑हि॒ मध्वो॒ अन्ध॑सः॥

जो प्रजाजन राजा का हृदय से सत्कार करके इस राजा के लिये ऐश्वर्य्य देवें, उनकी राजा अपने आत्मा के सदृश वा जैसे वैद्यजन ओषधियों से रोगी की रक्षा करता है, वैसे रक्षा करे॥१॥

इन्द्र॑ क्रतु॒विदं॑ सु॒तं सोमं॑ हर्य पुरुष्टुत। पिबा वृ॑षस्व॒ तातृ॑पिम्॥

हे राजन्! आप बुद्धि के बढ़ानेवाले खाने तथा पीने योग्य वस्तु का भोजन और पान कर तृप्त होकर बल आरोग्य बुद्धि और नम्रता को बढ़ाइये॥२॥

इन्द्र॒ प्र णो॑ धि॒तावा॑नं य॒ज्ञं विश्वे॑भिर्दे॒वेभिः॑। ति॒रः स्त॑वान विश्पते॥

प्रजाजनों को चाहिये कि राजा को इस प्रकार का उपदेश देवें कि आप हम लोगों के रक्षक हूजिये और ऐसी आज्ञा दीजिये कि आपके सब श्रेष्ठ मध्यम कनिष्ठ कर्मचारी लोग धर्मपूर्वक हम लोगों की निरन्तर रक्षा करें॥३॥

इन्द्र॒ सोमाः॑ सु॒ता इ॒मे तव॒ प्र य॑न्ति सत्पते। क्षयं॑ च॒न्द्रास॒ इन्द॑वः॥

हे राजन्! जितना आपको राज्य का भाग लेना चाहिये, उतना ही ग्रहण कर भोग करिये, न अधिक न न्यून, ऐसा करने से कभी नहीं आपकी हानि होगी॥४॥

द॒धि॒ष्वा ज॒ठरे॑ सु॒तं सोम॑मिन्द्र॒ वरे॑ण्यम्। तव॑ द्यु॒क्षास॒ इन्द॑वः॥

राजा आदि मनुष्यों को सम्पूर्ण पदार्थों के मध्य से उन्हीं पदार्थों का खान और पान करना चाहिये कि जो बुद्धि अवस्था और बल को निरन्तर बढ़ावें॥५॥

गिर्व॑णः पा॒हि नः॑ सु॒तं मधो॒र्धारा॑भिरज्यसे। इन्द्र॒ त्वादा॑त॒मिद्यशः॑॥

हे राजन्! जितना पीने योग्य वस्तु अन्न और धन हम लोगों का आपने स्वीकार किया है, उससे अपनी और हम लोगों की रक्षा कीजिये॥६॥

अ॒भि द्यु॒म्नानि॑ व॒निन॒ इन्द्रं॑ सचन्ते॒ अक्षि॑ता। पी॒त्वी सोम॑स्य वावृधे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सब मनुष्यों को चाहिये कि धर्म्मयुक्त अत्यन्त पुरुषार्थ से नहीं नाश होने योग्य ऐश्वर्य्य को प्राप्त होकर नियमित भोजन और विहार से आरोग्य को उत्पन्न करके संसार में उत्तम कीर्त्ति का विस्तार करैं॥७॥

अ॒र्वा॒वतो॑ न॒ आ ग॑हि परा॒वत॑श्च वृत्रहन्। इ॒मा जु॑षस्व नो॒ गिरः॑॥

हे राजन्! दूर वा समीप में स्थित सेना के अङ्ग शस्त्र आदि से युक्त वीर हम लोग जब आपको पुकारैं, उसी समय आपको आना चाहिये तथा हम लोगों के वचन सुनना और यथार्थ न्याय करना चाहिये॥८॥

यद॑न्त॒रा प॑रा॒वत॑मर्वा॒वतं॑ च हू॒यसे॑। इन्द्रे॒ह तत॒ आ ग॑हि॥

राजा दूर देश में हो और प्रजा सेना और मन्त्री जन अन्यत्र भी वर्त्तमान हों तथापि दूतों के द्वारा सब लोगों के साथ में समीप वर्त्तमान हो सके॥९॥इस सूक्त में राजा और प्रजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चालीसवाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

आ तू न॑ इन्द्र म॒द्र्य॑ग्घुवा॒नः सोम॑पीतये। हरि॑भ्यां याह्यद्रिवः॥

मनुष्यों को चाहिये कि शुभ कार्य्य आदि के उत्सवों में परस्पर एक दूसरे का आह्वान करके अन्न और जल आदिकों से सत्कार करें॥१॥

स॒त्तो होता॑ न ऋ॒त्विय॑स्तिस्ति॒रे ब॒र्हिरा॑नु॒षक्। अयु॑ज्रन्प्रा॒तरद्र॑यः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रभातकाल से मेघ सूर्य्य के प्रकाश का आच्छादन करके छाया को उत्पन्न करते हैं, वैसे ही क्रियाओं को जाननेवाले लोग वस्त्र आदि पदार्थों से शरीरों को ढाँप के अनुकूलता से सुख को उत्पन्न करते हैं॥२॥

इ॒मा ब्रह्म॑ ब्रह्मवाहः क्रि॒यन्त॒ आ ब॒र्हिः सी॑द। वी॒हि शू॑र पुरो॒ळाश॑म्॥

मनुष्यों को चाहिये कि निष्फल क्रियाओं को कभी न करें। जिस-जिस क्रिया से धर्म, अर्थ काम और मोक्ष की सिद्धि हो। उस-उस को प्रयत्न से करो॥३॥

रा॒र॒न्धि सव॑नेषु ण ए॒षु स्तोमे॑षु वृत्रहन्। उ॒क्थेष्वि॑न्द्र गिर्वणः॥

दरिद्र लोगों को चाहिये कि धनयुक्त पुरुषों से सदा याचना करें, जिससे कि वे दरिद्र लोग सुख को प्राप्त होवें॥४॥

म॒तयः॑ सोम॒पामु॒रुं रि॒हन्ति॒ शव॑स॒स्पति॑म्। इन्द्रं॑ व॒त्सं न मा॒तरः॑॥

जैसे गौवें प्रेमभाव का आश्रयण करके बछड़ों में प्रेम धारण करती हैं, वैसे ही राजा आदि अध्यक्ष पुरुष सेनाओं की प्रजाओं के प्रेमभाव से रक्षा करें॥५॥

स म॑न्दस्वा॒ ह्यन्ध॑सो॒ राध॑से त॒न्वा॑ म॒हे। न स्तो॒तारं॑ नि॒दे क॑रः॥

जो मनुष्य स्तुति करने योग्य पुरुषों की निन्दा नहीं करते, वे बड़े ऐश्वर्य को प्राप्त होकर शरीर और आत्मा से सदा ही सुखी होते हैं॥६॥

व॒यमि॑न्द्र त्वा॒यवो॑ ह॒विष्म॑न्तो जरामहे। उ॒त त्वम॑स्म॒युर्व॑सो॥

जो मनुष्य सब लोगों के गुणों की प्रशंसा और दोषों की निन्दा करें, वे विवेकी अर्थात् विचारशील होके गुणों के ग्रहण करने और दोषों के त्याग करने को समर्थ होते हैं॥७॥

मारे अ॒स्मद्वि मु॑मुचो॒ हरि॑प्रिया॒र्वाङ् या॑हि। इन्द्र॑ स्वधावो॒ मत्स्वे॒ह॥

हे मित्रजनों! आप लोग हम लोगों से दूर वा समीप स्थान में वर्त्तमान हुए हम लोगों का कल्याण करो और प्रीति का त्याग मत करो और हम लोग भी आप लोगों में ऐसा ही वर्त्ताव करें, इस प्रकार परस्पर वर्त्ताव करके इस संसार में सुखी होवें॥८॥

अ॒र्वाञ्चं॑ त्वा सु॒खे रथे॒ वह॑तामिन्द्र के॒शिना॑। घृ॒तस्नू॑ ब॒र्हिरा॒सदे॑॥

हे मनुष्यो! दो अग्नियों से चलाये हुए वाहनों पर स्थित होकर नीचे ऊपर और तिरछे देश में जाकर आइये॥९॥इस सूक्त में विद्वान् मनुष्यों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, ऐसा जानना चाहिये॥यह इकतालीसवाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ॥

उप॑ नः सु॒तमा ग॑हि॒ सोम॑मिन्द्र॒ गवा॑शिरम्। हरि॑भ्यां॒ यस्ते॑ अस्म॒युः॥

वे लोग ही सब लोगों के मित्र हैं, कि जो लोग अपने ऐश्वर्य्य से सब लोगों को बुला कर सत्कार करते हैं॥१॥

तमि॑न्द्र॒ मद॒मा ग॑हि बर्हिः॒ष्ठां ग्राव॑भिः सु॒तम्। कु॒विन्न्व॑स्य तृ॒प्णवः॑॥

जो सोमलता आदि ओषधियाँ वृष्टियों से उत्पन्न होतीं रोगविनाशक होने से तृप्तिकारक होतीं और सूक्ष्म अवयवों के द्वारा अन्तरिक्ष को प्राप्त हो के सब स्थानों में फैलती हैं, उनका युक्ति से सेवन करके सदा आनन्द का भोग करना चाहिये॥२॥

इन्द्र॑मि॒त्था गिरो॒ ममाच्छा॑गुरिषि॒ता इ॒तः। आ॒वृते॒ सोम॑पीतये॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वान् लोग अन्य जनों के प्रति इस प्रकार से उपदेश देवें कि हम लोग जिनका बुला कर सत्कार करें, आप लोग भी उन्हीं का सत्कार करें॥३॥

इन्द्रं॒ सोम॑स्य पी॒तये॒ स्तोमै॑रि॒ह ह॑वामहे। उ॒क्थेभिः॑ कु॒विदा॒गम॑त्॥

जो अविद्वान् लोग प्रीति से विद्वान् लोगों को बुलावें, तो वे उनके समीप बहुत वार जावें॥४॥

इन्द्र॒ सोमाः॑ सु॒ता इ॒मे तान्द॑धिष्व शतक्रतो। ज॒ठरे॑ वाजिनीवसो॥

तभी मनुष्य पूर्ण विद्या और ऐश्वर्य्यवाले होवें कि जब सृष्टि में वर्त्तमान पदार्थों की विद्या को जानें॥५॥

वि॒द्मा हि त्वा॑ धनंज॒यं वाजे॑षु दधृ॒षं क॑वे। अधा॑ ते सु॒म्नमी॑महे॥

मनुष्य जिसको सुखों के प्रदानों में योग्य शूरवीर न्यायाधीश जानें, उसी से सुखों की पूर्त्ति करनी चाहिये॥६॥

इ॒ममि॑न्द्र॒ गवा॑शिरं॒ यवा॑शिरं च नः पिब। आ॒गत्या॒ वृष॑भिः सु॒तम्॥

हे मनुष्यो! जिसको सूर्य की किरणें और पवनें पीती हैं, उसी रस का आप लोग पान करके बलिष्ठ होइये॥७॥

तुभ्येदि॑न्द्र॒ स्व ओ॒क्ये॒३॒॑ सोमं॑ चोदामि पी॒तये॑। ए॒ष रा॑रन्तु ते हृ॒दि॥

प्राणी लोग जो खाते और पीते हैं, वह सब पदार्थ रुधिर आदि हो और हृदय में फैलकर मस्तक के द्वारा सर्वत्र फैलता है॥८॥

त्वां सु॒तस्य॑ पी॒तये॑ प्र॒त्नमि॑न्द्र हवामहे। कु॒शि॒कासो॑ अव॒स्यवः॑॥

नवीन विद्वानों से प्राचीन विद्वान् श्रेष्ठ है, ऐसा निश्चय करना चाहिये॥९॥इस सूक्त में इन्द्र विद्वान् और सोम के गुण वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह बैयालीसवाँ सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ॥

आ या॑ह्य॒र्वाङुप॑ वन्धुरे॒ष्ठास्तवेदनु॑ प्र॒दिवः॑ सोम॒पेय॑म्। प्रि॒या सखा॑या॒ वि मु॒चोप॑ ब॒र्हिस्त्वामि॒मे ह॑व्य॒वाहो॑ हवन्ते॥

जो लोग विद्या के प्रकाश को प्राप्त हो विमानादि वाहनों को निर्माण और उसमें अग्नि आदि का प्रयोग करके अन्तरिक्ष में जाते हैं, वे प्रिय आचरण करनेवाले मित्रों को प्राप्त होकर दारिद्र्य का नाश करते हैं॥१॥

आ या॑हि पू॒र्वीरति॑ चर्ष॒णीराँ अ॒र्य आ॒शिष॒ उप॑ नो॒ हरि॑भ्याम्। इ॒मा हि त्वा॑ म॒तयः॒ स्तोम॑तष्टा॒ इन्द्र॒ हव॑न्ते स॒ख्यं जु॑षा॒णाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जिस बुद्धि से सब लोगों के साथ मित्रता हो, उससे युक्त हुए सबके आशीर्वादों को प्राप्त होकर सुख को निरन्तर प्राप्त होइये॥२॥

आ नो॑ य॒ज्ञं न॑मो॒वृधं॑ स॒जोषा॒ इन्द्र॑ देव॒ हरि॑भिर्याहि॒ तूय॑म्। अ॒हं हि त्वा॑ म॒तिभि॒र्जोह॑वीमि घृ॒तप्र॑याः सध॒मादे॒ मधू॑नाम्॥

मनुष्यों को उन लोगों की ही प्रशंसा करनी चाहिये कि जो सबके सुखों की वृद्धि करें॥३॥

आ च॒ त्वामे॒ता वृष॑णा॒ वहा॑तो॒ हरी॒ सखा॑या सु॒धुरा॒ स्वङ्गा॑। धा॒नाव॒दिन्द्रः॒ सव॑नं जुषा॒णः सखा॒ सख्युः॑ शृणव॒द्वन्द॑नानि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे लोग ही मित्र होने योग्य हैं कि जो बड़े दुःख को प्राप्त होकर भी मित्रों का त्याग नहीं करते और जैसे दो वा बहुत घोड़े इकट्ठे होकर यथेष्ट स्थानों में पहुँचाते हैं, वैसे अपने आत्मा के सदृश प्रियजन इच्छा की सिद्धि को प्राप्त होते हैं॥४॥

कु॒विन्मा॑ गो॒पां कर॑से॒ जन॑स्य कु॒विद्राजा॑नं मघवन्नृजीषिन्। कु॒विन्म॒ ऋषिं॑ पपि॒वांसं॑ सु॒तस्य॑ कु॒विन्मे॒ वस्वो॑ अ॒मृत॑स्य॒ शिक्षाः॑॥

हे मनुष्यो! जो लोग आप लोगों को विद्या विनय और उत्तम शिक्षादान से बड़े राजा करते और वेद के अर्थों को समझा के मोक्ष सिद्ध करते हैं, उनको आप अपने आत्मा के सदृश प्रसन्न करें॥५॥

आ त्वा॑ बृ॒हन्तो॒ हर॑यो युजा॒ना अ॒र्वागि॑न्द्र सध॒मादो॑ वहन्तु। प्र ये द्वि॒ता दि॒व ऋ॒ञ्जन्त्याताः॒ सुसं॑मृष्टासो वृष॒भस्य॑ मू॒राः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वान् लोग घोड़ों के सदृश अभीष्ट स्थान में मूढ़ों को पहुँचाते हैं, वे संपूर्ण समृद्धि सिद्ध कर सकते हैं॥६॥

इन्द्र॒ पिब॒ वृष॑धूतस्य॒ वृष्ण॒ आ यं ते॑ श्ये॒न उ॑श॒ते ज॒भार॑। यस्य॒ मदे॑ च्या॒वय॑सि॒ प्र कृ॒ष्टीर्यस्य॒ मदे॒ अप॑ गो॒त्रा व॒वर्थ॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो श्येन पक्षी के सदृश शीघ्र चलने और सबके सुख की कामना करनेवाले पुरुष मनुष्यों को सुख देते हैं, उन लोगों के समीप वर्त्तमान होकर विद्यासम्बन्धी व्यवहार के आनन्द को प्राप्त होओ॥७॥

शु॒नं हु॑वेम म॒घवा॑न॒मिन्द्र॑म॒स्मिन्भरे॒ नृत॑मं॒ वाज॑सातौ। शृ॒ण्वन्त॑मु॒ग्रमू॒तये॑ स॒मत्सु॒ घ्नन्तं॑ वृ॒त्राणि॑ सं॒जितं॒ धना॑नाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों के शरण को पहुँच कर अविद्या और दारिद्र्य का नाश तथा विद्या और लक्ष्मी को उत्पन्न कर निरन्तर आनन्द बढ़ावें॥८॥इस सूक्त में विद्वान् सखि और सोमपानादिकों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह तेंतालीसवाँ सूक्त और सातवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒यं ते॑ अस्तु हर्य॒तः सोम॒ आ हरि॑भिः सु॒तः। जु॒षा॒ण इ॑न्द्र॒ हरि॑भिर्न॒ आ ग॒ह्या ति॑ष्ठ॒ हरि॑तं॒ रथ॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही लोग दयालु हैं कि जो अन्य जनों के ऐश्वर्य्य की वृद्धि की इच्छा करें और ऐश्वर्य्यवालों को आते हुए देख के प्रसन्न होवें॥१॥

ह॒र्यन्नु॒षस॑मर्चयः॒ सूर्यं॑ ह॒र्यन्न॑रोचयः। वि॒द्वांश्चि॑कि॒त्वान्ह॑र्यश्व वर्धस॒ इन्द्र॒ विश्वा॑ अ॒भि श्रियः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य प्रातःकाल के सदृश विद्याओं के प्रकाश में तत्पर और सूर्य के सदृश धर्माचरण की कामना करते हुए प्रयत्न से ऐश्वर्य्य की इच्छा करें, वे सब प्रकार लक्ष्मीयुक्त होकर निरन्तर वृद्धि को प्राप्त होते हैं॥२॥

द्यामिन्द्रो॒ हरि॑धायसं पृथि॒वीं हरि॑वर्पसम्। अधा॑रयद्ध॒रितो॒र्भूरि॒ भोज॑नं॒ ययो॑र॒न्तर्हरि॒श्चर॑त्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग सूर्य के सदृश नियमपूर्वक धर्मयुक्त कर्मों को सिद्ध करते और वायु के सदृश निरन्तर प्रयत्न करते हैं, वे बहुत ऐश्वर्य्य को प्राप्त होकर आनन्दित होते हैं॥™३॥

ज॒ज्ञा॒नो हरि॑तो॒ वृषा॒ विश्व॒मा भा॑ति रोच॒नम्। हर्य॑श्वो॒ हरि॑तं धत्त॒ आयु॑ध॒मा वज्रं॑ बा॒ह्वोर्हरि॑म्॥

विद्वान् लोग जैसे प्रसिद्ध सूर्य्य संपूर्ण जगत् को प्रकाशित करके आप प्रकाशित होता है, वैसे ही सद्विद्या के उपदेश से धर्म का प्रकाश करावें॥४॥

इन्द्रो॑ ह॒र्यन्त॒मर्जु॑नं॒ वज्रं॑ शु॒क्रैर॒भीवृ॑तम्। अपा॑वृणो॒द्धरि॑भि॒रद्रि॑भिः सु॒तमुद्गा हरि॑भिराजत॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग सूर्य्य के सदृश विद्या नम्रता सेना और धन आदि का प्रकाश और अविद्या आदि की निवृत्ति कर जिसका उत्तम सहाय उस राजा के साथ सलाह करके राज्य का पालन करते हैं, वे पूर्ण मनोरथवाले होते हैं॥५॥इस सूक्त में सूर्य्य बिजुली वायु और विद्वान् के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥५॥यह चवालीसवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ म॒न्द्रैरि॑न्द्र॒ हरि॑भिर्या॒हि म॒यूर॑रोमभिः। मा त्वा॒ के चि॒न्नि य॑म॒न्विं न पा॒शिनोऽति॒ धन्वे॑व॒ ताँ इ॑हि॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। राज पुरुषों को चाहिये कि ऐसी सेना ऐसे रथ आदि कि जिनसे युद्धादि व्यवहारसिद्धि के लिये जाने को अति चतुराई के साथ संग्राम करके विजय पावें और जिससे और जन उनको ग्रहण न करें, ऐसा उपाय करें॥१॥

वृ॒त्र॒खा॒दो व॑लंरु॒जः पु॒रां द॒र्मो अ॒पाम॒जः। स्थाता॒ रथ॑स्य॒ हर्यो॑रभिस्व॒र इन्द्रो॑ दृ॒ळ्हा चि॑दारु॒जः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे बिजुली सूर्य और पवन मेघों के अवयवों को काटते हैं, वैसे ही धार्मिक राजा आदि लोग शत्रुओं को काटें॥२॥

ग॒म्भी॒राँ उ॑द॒धीँरि॑व॒ क्रतुं॑ पुष्यसि॒ गा इ॑व। प्र सु॑गो॒पा यव॑सं धे॒नवो॑ यथा ह्र॒दं कु॒ल्या इ॑वाशत॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जिन लोगों की समुद्र के सदृश अचल गम्भीर बुद्धि पृथिवी के सदृश क्षमा और पालने का सामर्थ्य गौ के सदृश दान और नदी के सदृश वृद्धि है, वे ही संपूर्ण सुखों से युक्त होते हैं॥३॥

आ न॒स्तुजं॑ र॒यिं भ॒रांशं॒ न प्र॑तिजान॒ते। वृ॒क्षं प॒क्वं फल॑म॒ङ्कीव॑ धूनु॒हीन्द्र॑ सं॒पार॑णं॒ वसु॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। वे ही धार्मिक पुरुष हैं, जो अन्य लोगों के सुख के लिये लक्ष्मी धारण करके औरों के दुःख नाश करनेवाले होवें॥४॥

स्व॒युरि॑न्द्र स्व॒राळ॑सि॒ स्मद्दि॑ष्टिः॒ स्वय॑शस्तरः। स वा॑वृधा॒न ओज॑सा पुरुष्टुत॒ भवा॑ नः सु॒श्रव॑स्तमः॥

वही चक्रवर्त्ती राजा होने के योग्य होता है कि जो अत्यन्त प्रशंसायुक्त गुण-कर्म और स्वभाववाला है और वही राजा सबका वृद्धिकारक होता है॥५॥इस सूक्त में सूर्य विद्वान् और राजा के गुण वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह पैंतालीसवाँ सूक्त और नववाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

यु॒ध्मस्य॑ ते वृष॒भस्य॑ स्व॒राज॑ उ॒ग्रस्य॒ यूनः॒ स्थवि॑रस्य॒ घृष्वेः॑। अजू॑र्यतो व॒ज्रिणो॑ वी॒र्या॒३॒॑णीन्द्र॑ श्रु॒तस्य॑ मह॒तो म॒हानि॑॥

जो संपूर्ण लक्षणों से युक्त युवा वा वृद्ध भी राजा हो, वैसे ही अपने प्रयत्न से अपने सामर्थ्य का बढ़ानेवाला होवे॥१॥

म॒हाँ अ॑सि महिष॒ वृष्ण्ये॑भिर्धन॒स्पृदु॑ग्र॒ सह॑मानो अ॒न्यान्। एको॒ विश्व॑स्य॒ भुव॑नस्य॒ राजा॒ स यो॒धया॑ च क्ष॒यया॑ च॒ जना॑न्॥

जो लोग शरीर और आत्मा का पूर्ण बल करके शत्रुओं को निवारण करते और सज्जनों का सत्कार करके आनन्द देते हैं, वे श्रेष्ठ होते हैं॥२॥

प्र मात्रा॑भी रिरिचे॒ रोच॑मानः॒ प्र दे॒वेभि॑र्वि॒श्वतो॒ अप्र॑तीतः। प्र म॒ज्मना॑ दि॒व इन्द्रः॑ पृथि॒व्याः प्रोरोर्म॒हो अ॒न्तरि॑क्षादृजी॒षी॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे विकार को नहीं प्राप्त हुई बिजुली गन्धक आदिकों में वर्त्तमान हुई भी कुछ हानि नहीं करती, वैसे ही सब लोगों के साथ मित्रता करके विरोध का त्याग करो॥३॥

उ॒रुं ग॑भी॒रं ज॒नुषा॒भ्यु१॒॑ग्रं वि॒श्वव्य॑चसमव॒तं म॑ती॒नाम्। इन्द्रं॒ सोमा॑सः प्र॒दिवि॑ सु॒तासः॑ समु॒द्रं न स्र॒वत॒ आ वि॑शन्ति॥

जो लोग बिजुली सम्बन्धी विद्या को जानकर उसके द्वारा उपकार ग्रहण कर सकते हैं, वे अनेक प्रकार की लक्ष्मियों को प्राप्त होते हैं॥४॥

यं सोम॑मिन्द्र पृथि॒वीद्यावा॒ गर्भं॒ न मा॒ता बि॑भृ॒तस्त्वा॒या। तं ते॑ हिन्वन्ति॒ तमु॑ ते मृजन्त्यध्व॒र्यवो॑ वृषभ॒ पात॒वा उ॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वान् लोग पृथिवी और सूर्य्य के सदृश सबको विद्या और बल से बढ़ाते और उत्तम शिक्षा से पवित्र करते वे माता के सदृश पालन करनेवाले हैं, ऐसा जानकर वे सब लोगों से सत्कार करने योग्य हैं॥५॥इस सूक्त में राजा बिजुली और पृथिवी आदिकों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह छयालीसवाँ सूक्त और दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

म॒रुत्वाँ॑ इन्द्र वृष॒भो रणा॑य॒ पिबा॒ सोम॑मनुष्व॒धं मदा॑य। आ सि॑ञ्चस्व ज॒ठरे॒ मध्व॑ ऊ॒र्मिं त्वं राजा॑सि प्र॒दिवः॑ सु॒ताना॑म्॥

हे राजन्! आप जो विजय आरोग्य बल और अधिक अवस्था की इच्छा करें, तो ब्रह्मचर्य धनुर्वेदविद्या जितेन्द्रियत्व और नियमित आहार विहार को करिये॥१॥

स॒जोषा॑ इन्द्र॒ सग॑णो म॒रुद्भिः॒ सोमं॑ पिब वृत्र॒हा शू॑र वि॒द्वान्। ज॒हि शत्रूँ॒रप॒ मृधो॑ नुद॒स्वाथाभ॑यं कृणुहि वि॒श्वतो॑ नः॥

जो राजा आदि मनुष्य परस्पर मित्र होकर नियमित भोजन विहार ब्रह्मचर्य्य जितेन्द्रिय होने आदि से पूर्ण शरीर आत्मा के बलवाले हो शत्रुओं को नाश कर और संग्रामों को जीतकर प्रजाओं में सब प्रकार भयरहित करते हैं, वे ही सर्वत्र भयरहित सुख को प्राप्त होते हैं॥२॥

उ॒त ऋ॒तुर्भि॑र्ऋतुपाः पाहि॒ सोम॒मिन्द्र॑ दे॒वेभिः॒ सखि॑भिः सु॒तं नः॑। याँ आभ॑जो म॒रुतो॒ ये त्वान्वह॑न्वृ॒त्रमद॑धु॒स्तुभ्य॒मोजः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजा आदि मनुष्यों! जैसे सूर्य्य वसन्त आदि ऋतुओं से सम्पूर्ण जगत् की रक्षा करता जलादि रसों का आकर्षण और पुनः वृष्टि करके पालन करता है, वैसे ही विद्वान् मित्रों के साथ विचार करके विजय और पुरुषार्थ से सबकी रक्षा कीजिये॥३॥

ये त्वा॑हि॒हत्ये॑ मघव॒न्नव॑र्ध॒न्ये शा॑म्ब॒रे ह॑रिवो॒ ये गवि॑ष्टौ। ये त्वा॑ नू॒नम॑नु॒मद॑न्ति॒ विप्राः॒ पिबे॑न्द्र॒ सोमं॒ सग॑णो म॒रुद्भिः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे नहीं बढ़े हुए मेघ को सूर्य बढ़ाय के और बढ़े हुए का नाश करता है, वैसे ही धार्मिक राजा आदि पुरुष धार्मिक शान्त पुरुषों की रक्षा और दुष्ट पुरुषों का नाश कर स्वयं प्रसन्न होकर प्रजाओं को प्रसन्न करें॥४॥

म॒रुत्व॑न्तं वृष॒भं वा॑वृधा॒नमक॑वारिं दि॒व्यं शा॒समिन्द्र॑म्। वि॒श्वा॒साह॒मव॑से॒ नूत॑नायो॒ग्रं स॑हो॒दामि॒ह तं हु॑वेम॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि उसीको अपना राजा करें कि जिसमें सम्पूर्ण राजा के धर्म अङ्ग और उपाङ्ग सहित वर्त्तमान हैं॥५॥इस सूक्त में राजा और सूर्य्य के गुण वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये॥यह सैंतालीसवाँ सूक्त और ग्यारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

स॒द्यो ह॑ जा॒तो वृ॑ष॒भः क॒नीनः॒ प्रभ॑र्तुमाव॒दन्ध॑सः सु॒तस्य॑। सा॒धोः पि॑ब प्रतिका॒मं यथा॑ ते॒ रसा॑शिरः प्रथ॒मं सो॒म्यस्य॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजा आदि मनुष्यों! जैसे सूर्य्य आदि पदार्थ अपने प्रतापों और ईश्वर के नियोग से सब पदार्थों की रक्षा करके दोषों का नाश करते हैं, वैसे ही साधु पुरुषों की रक्षा करके दुष्ट पुरुषों का नाश करें॥१॥

यज्जाय॑था॒स्तदह॑रस्य॒ कामें॒ऽशोः पी॒यूष॑मपिबो गिरि॒ष्ठाम्। तं ते॑ मा॒ता परि॒ योषा॒ जनि॑त्री म॒हः पि॒तुर्दम॒ आसि॑ञ्च॒दग्रे॑॥

जब स्त्री और पुरुष गर्भ को धारण करें तब दुष्ट अन्न पान आदि का सेवन त्याग श्रेष्ठ अन्न पान गर्भधारण और सन्तान उत्पन्न करके फिर उसका भी इसी प्रकार पालन और वृद्धि करे, जो कि राजा होने को योग्य हो॥२॥

उ॒प॒स्थाय॑ मा॒तर॒मन्न॑मैट्ट ति॒ग्मम॑पश्यद॒भि सोम॒मूधः॑। प्र॒या॒वय॑न्नचर॒द्गृत्सो॑ अ॒न्यान्म॒हानि॑ चक्रे पुरु॒धप्र॑तीकः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य प्रातःकाल की रात्रि को प्राप्त होकर दिन को उत्पन्न करता है, वैसे ही सन्तान की माता को सन्तान का पिता प्राप्त होकर गर्भस्थिति करे और वैसे ही संस्कारों को माता और पिता करें कि जैसे सन्तान उत्तम गुण, कर्म, लक्षण,स्वभावों से युक्त राजकर्मों को करने योग्य होवें॥३॥

उ॒ग्रस्तु॑रा॒षाळ॒भिभू॑त्योजा यथाव॒शं त॒न्वं॑ चक्र ए॒षः। त्वष्टा॑र॒मिन्द्रो॑ ज॒नुषा॑भि॒भूया॒मुष्या॒ सोम॑मपिबच्च॒मूषु॑॥

जो विद्वान् धार्मिक राजा जन हैं, वे चोर आदि दुष्ट जनों का तिरस्कार और मादक द्रव्य अर्थात् उन्मत्तता करनेवाले द्रव्यों के सेवनकर्त्ताओं का दण्ड करके और अपने आप अव्यसनी होकर प्रजाओं के पालन करने को समर्थ होवें, वे ही राज्य की वृद्धि करने के योग्य होवें॥४॥

शु॒नं हु॑वेम म॒घवा॑न॒मिन्द्र॑म॒स्मिन्भरे॒ नृत॑मं॒ वाज॑सातौ। शृ॒ण्वन्त॑मु॒ग्रमू॒तये॑ स॒मत्सु॒ घ्नन्तं॑ वृ॒त्राणि॑ सं॒जितं॒ धना॑नाम्॥

संपूर्ण श्रेष्ठ सभासद् विद्वज्जनों को चाहिये कि अवश्य संपूर्ण शास्त्रों में निपुण उत्तम गुण कर्म और स्वभाववाले राजधर्म में चतुर व उत्तम कुलयुक्त अत्यन्त ऐश्वर्य्यवान् पुरुष को सबका अधीश करके और राज्य की निरन्तर रक्षा करके चौरादिकों का नाश करें॥५॥इस सूक्त में राजधर्म सन्तानोत्पत्ति और राज्यपालन आदि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह अड़तालीसवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

शंसा॑ म॒हामिन्द्रं॒ यस्मि॒न्विश्वा॒ आ कृ॒ष्टयः॑ सोम॒पाः काम॒मव्य॑न्। यं सु॒क्रतुं॑ धि॒षणे॑ विभ्वत॒ष्टं घ॒नं वृ॒त्राणां॑ ज॒नय॑न्त दे॒वाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वान् लोगो! जैसे बड़ा एक सूर्य्य प्रत्येक भूगोल में वर्त्तमान मेघों को नाश करता और प्राणियों के सुख को उत्पन्न करता है, वैसे ही राजा जन दुष्ट पुरुषों का नाश और श्रेष्ठ पुरुषों की इच्छा पूर्ण करके आनन्द देता है॥१॥

यं नु नकिः॒ पृत॑नासु स्व॒राजं॑ द्वि॒ता तर॑ति॒ नृत॑मं हरि॒ष्ठाम्। इ॒नत॑मः॒ सत्व॑भि॒र्यो ह॑ शू॒षैः पृ॑थु॒ज्रया॑ अमिना॒दायु॒र्दस्योः॑॥

हे मनुष्यो! जिस पुरुष को शत्रु का द्विगुना भी बल जीत नहीं सकता और जो अधिक सामर्थ्ययुक्त पुरुष दुष्ट पुरुषों का निरन्तर नाश करता है, उसीको सब सेना का अध्यक्ष करके सदैव विजय करना चाहिये॥२॥

स॒हावा॑ पृ॒त्सु त॒रणि॒र्नार्वा॑ व्यान॒शी रोद॑सी मे॒हना॑वान्। भगो॒ न का॒रे हव्यो॑ मती॒नां पि॒तेव॒ चारुः॑ सु॒हवो॑ वयो॒धाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो घोड़े के सदृश वेग और बलयुक्त योद्धा सूर्य्य और भूमि के सदृश सबका सुख देने और ऐश्वर्य्य के सदृश कार्य्य की सिद्धि करनेवाला पिता के सदृश सबका पालनकर्त्ता होवे, वही राज्याऽभिषेक करने के योग्य होवे॥३॥

ध॒र्ता दि॒वो रज॑सस्पृ॒ष्ट ऊ॒र्ध्वो रथो॒ न वा॒युर्वसु॑भिर्नि॒युत्वा॑न्। क्ष॒पां व॒स्ता ज॑नि॒ता सूर्य॑स्य॒ विभ॑क्ता भा॒गं धि॒षणे॑व॒ वाज॑म्॥

हे मनुष्यो! जो राजा परमेश्वर के सदृश प्रजाओं में वर्त्तमान है, उसीकी निरन्तर सेवा करो॥४॥

शु॒नं हु॑वेम म॒घवा॑न॒मिन्द्र॑म॒स्मिन्भरे॒ नृत॑मं॒ वाज॑सातौ। शृ॒ण्वन्त॑मु॒ग्रमू॒तये॑ स॒मत्सु॒ घ्नन्तं॑ वृ॒त्राणि॑ सं॒जितं॒ धना॑नाम्॥

राजाओं को चाहिये कि प्रजाओं में पिता के और ईश्वर के तुल्य वर्त्तमान होकर संपूर्ण प्रजाओं का पालन करें, ऐसा उपदेश दीजिये॥५॥इस सूक्त में प्रजा और राजा के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह उनचासवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इन्द्रः॒ स्वाहा॑ पिबतु॒ यस्य॒ सोम॑ आ॒गत्या॒ तुम्रो॑ वृष॒भो म॒रुत्वा॑न्। ओरु॒व्यचाः॑ पृणतामे॒भिरन्नै॒रास्य॑ ह॒विस्त॒न्वः१॒॑ काम॑मृध्याः॥

हे मनुष्यो! जो सत्य न्याय से अपने अंश का भोग करके प्रजा के सुख बढ़ाने के लिये अन्याय और दुष्ट पुरुषों का नाश करता है, वह पुरुष समृद्धियुक्त होता है॥१॥

आ ते॑ सप॒र्यू ज॒वसे॑ युनज्मि॒ ययो॒रनु॑ प्र॒दिवः॑ श्रु॒ष्टिमावः॑। इ॒ह त्वा॑ धेयु॒र्हर॑यः सुशिप्र॒ पिबा॒ त्व१॒॑स्य सुषु॑तस्य॒ चारोः॑॥

इस संसार में जो लोग जिनके सेवक उन स्वामियों को चाहिये कि उन सेवकों का पोषण करें और सब लोग परस्पर प्रीति से सुख की उन्नति करें॥२॥

गोभि॑र्मिमि॒क्षुं द॑धिरे सुपा॒रमिन्द्रं॒ ज्यैष्ठ्या॑य॒ धाय॑से गृणा॒नाः। म॒न्दा॒नः सोमं॑ पपि॒वाँ ऋ॑जीषि॒न्त्सम॒स्मभ्यं॑ पुरु॒धा गा इ॑षण्य॥

जैसे सूर्य अपने किरणों से वृष्टि करके सबकी पुष्टि करता है, वैसे ही विद्वान् लोग पढ़ाने और उपदेश से विद्या और सत्य की वृष्टि करके सब मनुष्यों की पुष्टि करें॥३॥

इ॒मं कामं॑ मन्दया॒ गोभि॒रश्वै॑श्च॒न्द्रव॑ता॒ राध॑सा प॒प्रथ॑श्च। स्व॒र्यवो॑ म॒तिभि॒स्तुभ्यं॒ विप्रा॒ इन्द्रा॑य॒ वाहः॑ कुशि॒कासो॑ अक्रन्॥

जो श्रेष्ठ पुरुषों के साथ अनुकूलता से वर्त्तमान होकर परस्पर ऐश्वर्य्य से और पशु आदि धन आदिकों से इच्छा को पूर्ण करें, वे सदा सुखी होवें॥४॥

शु॒नं हु॑वेम म॒घवा॑न॒मिन्द्र॑म॒स्मिन्भरे॒ नृत॑मं॒ वाज॑सातौ। शृ॒ण्वन्त॑मु॒ग्रमू॒तये॑ स॒मत्सु॒ घ्नन्तं॑ वृ॒त्राणि॑ सं॒जितं॒ धना॑नाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही धन्य मनुष्य कि जो विरोध का त्याग करके एक साथ ऐश्वर्य उत्पन्न करते हैं॥५॥इस सूक्त में परस्पर की प्रीति वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह पचासवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

च॒र्ष॒णी॒धृतं॑ म॒घवा॑नमु॒क्थ्य१॒॑मिन्द्रं॒ गिरो॑ बृह॒तीर॒भ्य॑नूषत। वा॒वृ॒धा॒नं पु॑रुहू॒तं सु॑वृ॒क्तिभि॒रम॑र्त्यं॒ जर॑माणं दि॒वेदि॑वे॥

हे राजपुरुषो! बहुत जनों से सत्कृत प्रजाओं के धारण करने में समर्थ जिस राजा की विद्वान् लोग प्रशंसा करें, उसी के आप लोग शरण जाओ॥१॥

श॒तक्र॑तुमर्ण॒वं शा॒किनं॒ नरं॒ गिरो॑ म॒ इन्द्र॒मुप॑ यन्ति वि॒श्वतः॑। वा॒ज॒सनिं॑ पू॒र्भिदं॒ तूर्णि॑म॒प्तुरं॑ धाम॒साच॑मभि॒षाचं॑ स्व॒र्विद॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य लोग संपूर्ण विद्याओं में कुशल सामर्थ्ययुक्त सत्यधारणकर्त्ता दुष्ट पुरुषों के ताड़न करनेवाले राजा के समीप जावें, तो उनका किसी से भी भय नहीं होता है॥२॥

आ॒क॒रे वसो॑र्जरि॒ता प॑नस्यतेऽने॒हसः॒ स्तुभ॒ इन्द्रो॑ दुवस्यति। वि॒वस्व॑तः॒ सद॑न॒ आ हि पि॑प्रि॒ये स॑त्रा॒साह॑मभिमाति॒हनं॑ स्तुहि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे ईश्वर से बिजुली द्वारा उत्पन्न किया गया सूर्य एकत्र वर्त्तमान हुआ सर्वत्र विद्यमान सब वस्तुओं को प्रकाशित करता है, वैसे ही एक स्थान में वर्त्तमान राजा मन्त्री दूत पियादे और सेनादि के प्रबन्ध से संपूर्ण राज्य को विद्या और विनय से प्रकाशित करके ऐश्वर्य के समूह से धर्म की उन्नति के लिये व्यवहार करे॥३॥

नृ॒णामु॑ त्वा॒ नृत॑मं गी॒र्भिरु॒क्थैर॒भि प्र वी॒रम॑र्चता स॒बाधः॑। सं सह॑से पुरुमा॒यो जि॑हीते॒ नमो॑ अस्य प्र॒दिव॒ एक॑ ईशे॥

विद्वानों को चाहिये कि उस ही की प्रशंसा करें कि जो प्रशंसायोग्य कर्मों को करे॥४॥

पू॒र्वीर॑स्य नि॒ष्षिधो॒ मर्त्ये॑षु पु॒रू वसू॑नि पृथि॒वी बि॑भर्ति। इन्द्रा॑य॒ द्याव॒ ओष॑धीरु॒तापो॑ र॒यिं॑ र॑क्षन्ति जी॒रयो॒ वना॑नि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्यों में धन विज्ञान और ओषधि धारण करते, वे ही राजाओं के कर्मचारी होने के योग्य हैं॥५॥

तुभ्यं॒ ब्रह्मा॑णि॒ गिर॑ इन्द्र॒ तुभ्यं॑ स॒त्रा द॑धिरे हरिवो जु॒षस्व॑। बो॒ध्या॒३॒॑पिरव॑सो॒ नूत॑नस्य॒ सखे॑ वसो जरि॒तृभ्यो॒ वयो॑ धाः॥

मनुष्यों को चाहिये कि ऐसी वाणी ग्रहण करें और सुनें कि जिससे धनसंग्रह होता है, सत्य की रक्षा की जाती और जीवन बढ़ता है॥६॥

इन्द्र॑ मरुत्व इ॒ह पा॑हि॒ सोमं॒ यथा॑ शार्या॒ते अपि॑बः सु॒तस्य॑। तव॒ प्रणी॑ती॒ तव॑ शूर॒ शर्म॒न्ना वि॑वासन्ति क॒वयः॑ सुय॒ज्ञाः॥

हे राजन्! जैसे आप अपने राज्य ऐश्वर्य्य न्याय और धर्म की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार के आपके मन्त्री और नौकर आदि होवें, उनका सत्कार आपको सदा ही करना चाहिये॥७॥

स वा॑वशा॒न इ॒ह पा॑हि॒ सोमं॑ म॒रुद्भि॑रिन्द्र॒ सखि॑भिः सु॒तं नः॑। जा॒तं यत्त्वा॒ परि॑ दे॒वा अभू॑षन्म॒हे भरा॑य पुरुहूत॒ विश्वे॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य वायुरूप सहाय से सबकी रक्षा करता है, वैसे ही यथार्थवक्ता मित्रों के साथ राजा संपूर्ण राज्य की रक्षा करे और जो मन्त्री और नौकर राज्य के हितकारी होवें, उनका सब काल में सत्कार करें॥८॥

अ॒प्तूर्ये॑ मरुत आ॒पिरे॒षोऽम॑न्द॒न्निन्द्र॒मनु॒ दाति॑वाराः। तेभिः॑ सा॒कं पि॑बतु वृत्रखा॒दः सु॒तं सोमं॑ दा॒शुषः॒ स्वे स॒धस्थे॑॥

जो मनुष्य सत्य आचरण की प्रेरणा और दुष्ट आचरणों का निषेध और सबको धार्मिक करके आनन्द देवें, उनके साथ राजा आनन्द करे॥९॥

इ॒दं ह्यन्वोज॑सा सु॒तं रा॑धानां पते। पिबा॒ त्व१॒॑स्य गि॑र्वणः॥

हे राजन्! आप निश्चय सब काल में धन और ऐश्वर्य की रक्षा करके और जो प्राप्त राज्य उसकी देखभाल से वृद्धि करके सुखी होइये॥१०॥

यस्ते॒ अनु॑ स्व॒धामस॑त्सु॒ते नि य॑च्छ त॒न्व॑म्। स त्वा॑ ममत्तु सो॒म्यम्॥

हे राजन्! जो आपके अनुकूल और धर्मात्मा होकर प्रजाओं को आनन्दित करे, वह लक्ष्मीवान् से ऐश्वर्य को प्राप्त होवे और आप इन्द्रियजित् होकर प्रजाओं को सिद्ध कीजिये॥११॥

प्र ते॑ अश्नोतु कु॒क्ष्योः प्रेन्द्र॒ ब्रह्म॑णा॒ शिरः॑। प्र बा॒हू शू॑र॒ राध॑से॥

हे राजन्! वही वस्तु आपको खाना तथा पीना चाहिये कि जो पेट में प्राप्त हो तथा विकृत हो रोगों को उत्पन्न करके बुद्धि का न नाश करे और जिससे निरन्तर आपमें बुद्धि बढ़ कर राज्य और ऐश्वर्य्य बढ़े॥१२॥इस सूक्त में राजा और प्रजा के धर्मवर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह इक्यावनवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

धा॒नाव॑न्तं कर॒म्भिण॑मपू॒पव॑न्तमु॒क्थिन॑म्। इन्द्र॑ प्रा॒तर्जु॑षस्व नः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अर्थी जन ऐश्वर्यवाले से याचना करता है, वैसे ही राजा जन राजधर्म जानने के लिये श्रेष्ठ यथार्थवक्ता विद्वानों से याचना करे॥१॥

पु॒रो॒ळाशं॑ पच॒त्यं॑ जु॒षस्वे॒न्द्रा गु॑रस्व च। तुभ्यं॑ ह॒व्यानि॑ सिस्रते॥

हे राजन्! आप रोगनाशक और बुद्धि के बढ़ानेवाले अन्नपान का भोग कर तथा रोगरहित होकर निरन्तर उद्यम को करो, जिससे आपको संपूर्ण सुख प्राप्त होवें॥२॥

पु॒रो॒ळाशं॑ च नो॒ घसो॑ जो॒षया॑से॒ गिर॑श्च नः। व॒धू॒युरि॑व॒ योष॑णाम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजा और प्रजाजन आपस के ऐश्वर्य्य को अपना ही समझें और जैसे स्त्री की कामना करनेवाला पुरुष प्रिया स्त्री को प्राप्त होकर आनन्दित होता है, वैसे ही राजा धर्म करनेवाली प्रजाओं को प्राप्त कर निरन्तर प्रसन्न होवें॥३॥

पु॒रो॒ळाशं॑ सनश्रुत प्रातःसा॒वे जु॑षस्व नः। इन्द्र॒ क्रतु॒र्हि ते॑ बृ॒हन्॥

मनुष्यों को चाहिये कि जिन पुरुषों में जैसी विद्या और शीलता होवे, वैसी ही उन पर उत्तम कृपा करें॥४॥

माध्य॑न्दिनस्य॒ सव॑नस्य धा॒नाः पु॑रो॒ळाश॑मिन्द्र कृष्वे॒ह चारु॑म्। प्र यत्स्तो॒ता ज॑रि॒ता तूर्ण्य॑र्थो वृषा॒यमा॑ण॒ उप॑ गी॒र्भिरीट्टे॑॥

जो राजा के जन ऋत्विजों के सदृश राज्य की वृद्धि करैं, उनको राजा सत्कार से प्रसन्न करे॥५॥

तृ॒तीये॑ धा॒नाः सव॑ने पुरुष्टुत पुरो॒ळाश॒माहु॑तं मामहस्व नः। ऋ॒भु॒मन्तं॒ वाज॑वन्तं त्वा कवे॒ प्रय॑स्वन्त॒ उप॑ शिक्षेम धी॒तिभिः॑॥

जैसे विद्वान् यज्ञ करनेवाले यजमानों के लिये यज्ञ कृत्य की शिक्षा देते हैं, वैसे ही संपूर्ण विद्याओं का हस्त आदि क्रियाओं से प्रत्यक्ष अर्थात् अभ्यास करके अन्य जनों के लिये अध्यापक लोग प्रत्यक्ष करावें॥६॥

पू॒ष॒ण्वते॑ ते चकृमा कर॒म्भं हरि॑वते॒ हर्य॑श्वाय धा॒नाः। अ॒पू॒पम॑द्धि॒ सग॑णो म॒रुद्भिः॒ सोमं॑ पिब वृत्र॒हा शू॑र वि॒द्वान्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्या नम्रता से युक्त हैं, वे श्रेष्ठ राजा के लिये उत्तम पदार्थों को देकर इसका निरन्तर सत्कार करें और वे राजा से भी सर्वदा सत्कार के योग्य हैं॥७॥

प्रति॑ धा॒ना भ॑रत॒ तूय॑मस्मै पुरो॒ळाशं॑ वी॒रत॑माय नृ॒णाम्। दि॒वेदि॑वे स॒दृशी॑रिन्द्र॒ तुभ्यं॒ वर्ध॑न्तु त्वा सोम॒पेया॑य धृष्णो॥

सम्पूर्ण राजजन और प्रजा के जन राज्य की वृद्धि के लिये सम्पूर्ण पदार्थों को इकट्ठे करें, उनसे उत्तम प्रकार परीक्षित वीर सेनाओं को करके और दुष्ट पुरुषों का पराजय और श्रेष्ठ पुरुषों का विजय करके प्रतिदिन आनन्द करना चाहिये॥८॥इस सूक्त में राजा प्रजा और यज्ञान्नसंस्कारादि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जानना चाहिये॥यह बावनवाँ सूक्त और अठारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इन्द्रा॑पर्वता बृह॒ता रथे॑न वा॒मीरिष॒ आ व॑हतं सु॒वीराः॑। वी॒तं ह॒व्यान्य॑ध्व॒रेषु॑ देवा॒ वर्धे॑थां गी॒र्भिरिळ॑या॒ मद॑न्ता॥

हे राजसेनाओं के जन! जैसे मेघ सम्पूर्ण जलाशय और ओषधियों की रक्षा करता है, वैसे ही सेना के पालन करनेवाले पुरुष बहुत सी सामग्रियों से सम्पूर्ण सेनाओं को भोग से परिपूर्ण करिये और सेना बिजुलियों के सदृश शत्रुओं का नाश करैं और सबमें सब युद्ध और राजविद्या में परिपूर्ण होकर सम्पूर्ण मनोरथों को प्राप्त हों॥१॥

तिष्ठा॒ सु कं॑ मघव॒न्मा परा॑ गाः॒ सोम॑स्य॒ नु त्वा॒ सुषु॑तस्य यक्षि। पि॒तुर्न पु॒त्रः सिच॒मा र॑भे त॒ इन्द्र॒ स्वादि॑ष्ठया गि॒रा श॑चीवः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! जैसे पुत्र पिता की सेवा करता है, वैसे ही वृद्ध विद्वानों की सेवा करो और कभी धर्म से पृथक् न होओ, अन्य जनों को सुखी करके सुखी होओ॥२॥

शंसा॑वाध्वर्यो॒ प्रति॑ मे गृणी॒हीन्द्रा॑य॒ वाहः॑ कृणवाव॒ जुष्ट॑म्। एदं ब॒र्हिर्यज॑मानस्य सी॒दाथा॑ च भूदु॒क्थमिन्द्रा॑य श॒स्तम्॥

सब राजा और प्रजा के जनों को चाहिये कि जिन कर्मों से ऐश्वर्य की वृद्धि हो, उन कर्मों का सेवन करें और राजा की आज्ञा में वर्त्तमान होकर प्रशंसा को प्राप्त होवें॥३॥

जा॒येदस्तं॑ मघव॒न्त्सेदु॒ योनि॒स्तदित्त्वा॑ यु॒क्ता हर॑यो वहन्तु। य॒दा क॒दा च॑ सु॒नवा॑म॒ सोम॑म॒ग्निष्ट्वा॑ दू॒तो ध॑न्वा॒त्यच्छ॑॥

जैसे श्रेष्ठ दो घोड़े ले चलनेवाले वाहन से सुखपूर्वक रथ के स्वामी को एक स्थान से दूसरे स्थान को प्राप्त कराते हैं, वैसे ही परस्पर में प्रसन्न और योग्य दो विद्वान् गृहाश्रम को शोभित करने को समर्थ हों॥४॥

परा॑ याहि मघव॒न्ना च॑ या॒हीन्द्र॑ भ्रातरुभ॒यत्रा॑ ते॒ अर्थ॑म्। यत्रा॒ रथ॑स्य बृह॒तो नि॒धानं॑ वि॒मोच॑नं वा॒जिनो॒ रास॑भस्य॥

मनुष्यों को चाहिये कि सर्वत्र भ्रमण कार्य्यसिद्धि के लिये करें और नहीं सदा भ्रमण ही करना किन्तु गृह में स्थित हो सम्पूर्ण बन्धुओं के साथ मेल करके फिर भी ऐश्वर्य्य की प्राप्ति के लिये एक देश से दूसरे देश में जावें और आवें॥५॥

अपाः॒ सोम॒मस्त॑मिन्द्र॒ प्र या॑हि कल्या॒णीर्जा॒या सु॒रणं॑ गृ॒हे ते॑। यत्रा॒ रथ॑स्य बृह॒तो नि॒धानं॑ वि॒मोच॑नं वा॒जिनो॒ दक्षि॑णावत्॥

राजा आदि विमान आदि वाहनों का निर्माण कर और उसमें कलायन्त्रों को रच के तथा अग्नि आदि पदार्थों को स्थित तथा अलग करके अपनी स्त्रियों के सहित गृह में आवें और देशान्तर को जावें, जो स्त्री शूरवीरा हो तो उसके साथ संग्राम के विजय के लिये जावें॥६॥

इ॒मे भो॒जा अङ्गि॑रसो॒ विरू॑पा दि॒वस्पु॒त्रासो॒ असु॑रस्य वी॒राः। वि॒श्वामि॑त्राय॒ दद॑तो म॒घानि॑ सहस्रसा॒वे प्र ति॑रन्त॒ आयुः॑॥

हे राजन्! आप ऐसे वीरों के सहित प्रसन्न पुष्ट और युद्ध विद्या में कुशल सेना की वृद्धि करके सर्वदा विजय को प्राप्त होइये॥७॥

रू॒पंरू॑पं म॒घवा॑ बोभवीति मा॒याः कृ॑ण्वा॒नस्त॒न्वं१॒॑ परि॒ स्वाम्। त्रिर्यद्दि॒वः परि॑ मुहू॒र्तमागा॒त्स्वैर्मन्त्रै॒रनृ॑तुपा ऋ॒तावा॑॥

जो परमेश्वर को लेके पृथिवीपर्यन्त पदार्थों के स्वरूप जानने और शीघ्र अन्य जनों के लिये विज्ञान देने और सूर्य्य के सदृश उत्तम शिक्षा सभ्यता और विनय के प्रकाश करनेवाले होवें, वे विद्याधर्म और राजधर्म के मन्त्र बढ़ाने में नियत करने के योग्य हैं॥८॥

म॒हाँ ऋषि॑र्देव॒जा दे॒वजू॒तोऽस्त॑भ्ना॒त्सिन्धु॑मर्ण॒वं नृ॒चक्षाः॑। वि॒श्वामि॑त्रो॒ यदव॑हत्सु॒दास॒मप्रि॑यायत कुशि॒केभि॒रिन्द्रः॑॥

जैसे सूर्य सब लोकों से बड़ा और सबका धारणकर्त्ता तथा प्रकाश करनेवाला है, वैसे ही सबके जाननेवाले यथार्थवक्ता पुरुष हैं, ऐसा जानना चाहिये॥९॥

हं॒साइ॑व कृणुथ॒ श्लोक॒मद्रि॑भि॒र्मद॑न्तो गी॒र्भिर॑ध्व॒रे सु॒ते सचा॑। दे॒वेभि॑र्विप्रा ऋषयो नृचक्षसो॒ वि पि॑बध्वं कुशिकाः सो॒म्यं मधु॑॥

अत्यन्त विद्वान् जन विद्वानों के प्रति जितेन्द्रियता धर्मात्मता सुशीलता और सभ्यता को ग्रहण करावें कि जिससे वे भी श्रेष्ठ होकर संसार के कल्याण को करें॥१०॥

उप॒ प्रेत॑ कुशिकाश्चे॒तय॑ध्व॒मश्वं॑ रा॒ये प्र मु॑ञ्चता सु॒दासः॑। राजा॑ वृ॒त्रं ज॑ङ्घन॒त्प्रागपा॒गुद॒गथा॑ यजाते॒ वर॒ आ पृ॑थि॒व्याः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानों! जो वीर लोग शत्रुओं का नाश करें, उनके लिये बहुत धन और प्रतिष्ठा को देवें, जिससे सम्पूर्ण दिशाओं में विजय प्रकाशित होवे॥११॥

य इ॒मे रोद॑सी उ॒भे अ॒हमिन्द्र॒मतु॑ष्टवम्। वि॒श्वामि॑त्रस्य रक्षति॒ ब्रह्मे॒दं भार॑तं॒ जन॑म्॥

हे मनुष्यो! जिस परमेश्वर से सम्पूर्ण संसार रचकर रक्षित है, उसकी ही स्तुति प्रार्थना और उपासना निरन्तर करो॥१२॥

वि॒श्वामि॑त्रा अरासत॒ ब्रह्मेन्द्रा॑य व॒ज्रिणे॑। कर॒दिन्नः॑ सु॒राध॑सः॥

जो राजा संपूर्ण प्रजाओं को सुखयुक्त करे, उस ही को प्रजा अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त करें॥१३॥

किं ते॑ कृण्वन्ति॒ कीक॑टेषु॒ गावो॒ नाशिरं॑ दु॒ह्रे न त॑पन्ति घ॒र्मम्। आ नो॑ भर॒ प्रम॑गन्दस्य॒ वेदो॑ नैचाशा॒खं म॑घवन्रन्धया नः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे म्लेच्छ जनों में गौओं की, नास्तिक पुरुषों में धर्म आदि गुणों की वृद्धि नहीं होती और वैसे ही विद्वानों में ईश्वर को नहीं माननेवाले प्रबल न होवें, इससे चाहिये कि मनुष्यों में नास्तिकत्व को सर्वथा वारण करें॥१४॥

स॒स॒र्प॒रीरम॑तिं॒ बाध॑माना बृ॒हन्मि॑माय ज॒मद॑ग्निदत्ता। आ सूर्य॑स्य दुहि॒ता त॑तान॒ श्रवो॑ दे॒वेष्व॒मृत॑मजु॒र्यम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो ब्रह्मचर्य धर्म का अनुष्ठान और पुरुषार्थों से श्रेष्ठ पुरुषों के समीप से विद्या और उत्तम शिक्षा को मनुष्य ग्रहण करें तो उनको कुछ भी सुख अप्राप्त न होवे॥१५॥

स॒स॒र्प॒रीर॑भर॒त्तूय॑मे॒भ्योऽधि॒ श्रवः॒ पाञ्च॑जन्यासु कृ॒ष्टिषु॑। सा प॒क्ष्या॒३॒॑ नव्य॒मायु॒र्दधा॑ना॒ यां मे॑ पलस्तिजमद॒ग्नयो॑ द॒दुः॥

हे मनुष्यो! जो कार्य की सिद्धि और ऐश्वर्य की उत्पन्न करने और अवस्था की बढ़ानेवाली सत्य लक्षणों से स्पष्ट वाली नवीन-नवीन विज्ञान और जीवन धारण करती है, उसको नित्य धारण करो॥१६॥

स्थि॒रौ गावौ॑ भवतां वी॒ळुरक्षो॒ मेषा वि व॑र्हि॒ मा यु॒गं वि शा॑रि। इन्द्रः॑ पात॒ल्ये॑ ददतां॒ शरी॑तो॒ररि॑ष्टनेमे अ॒भि नः॑ सचस्व॥

मनुष्यों को चाहिये कि बड़े उपकार करनेवाले गौ आदि पशुओं का कभी नाश नहीं करें और व्यर्थ समय न बितावें, श्रेष्ठ पुरुषों के साथ सदा ही मेल की रक्षा करें॥१७॥

बलं॑ धेहि त॒नूषु॑ नो॒ बल॑मिन्द्रान॒ळुत्सु॑ नः। बलं॑ तो॒काय॒ तन॑याय जी॒वसे॒ त्वं हि ब॑ल॒दा असि॑॥

हे आचार्य्य! आप जिससे कि शरीर और आत्मा के बल से युक्त हो, इससे हम लोगों में पूर्ण शरीर और आत्मा के बल को धारण करो॥१८॥

अ॒भि व्य॑यस्व खदि॒रस्य॒ सार॒मोजो॑ धेहि स्पन्द॒ने शिं॒शपा॑याम्। अक्ष॑ वीळो वीळित वी॒ळय॑स्व॒ मा यामा॑द॒स्मादव॑ जीहिपो नः॥

हे आचार्य्य! हम लोगों में दृढ़ बल को धारण करो, श्रेष्ठ कर्मों में हम लोगों की प्रेरणा करो और कभी मत त्याग करो॥१९॥

अ॒यम॒स्मान्वन॒स्पति॒र्मा च॒ हा मा च॑ रीरिषत्। स्व॒स्त्या गृ॒हेभ्य॒ आव॒सा आ वि॒मोच॑नात्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अन्न आदि वस्तु सबके रक्षक होवें, वैसे राजा के पुरुष सबके पालनकर्त्ता हों और न्याय का त्याग करके अन्याय कभी न करें॥२०॥

इन्द्रो॒तिभि॑र्बहु॒लाभि॑र्नो अ॒द्य या॑च्छ्रे॒ष्ठाभि॑र्मघवञ्छूर जिन्व। यो नो॒ द्वेष्ट्यध॑रः॒ सस्प॑दीष्ट॒ यमु॑ द्वि॒ष्मस्तमु॑ प्रा॒णो ज॑हातु॥

विद्वान् लोगों को दुष्ट कर्म करनेवाला पुरुष द्वेष करने योग्य और धर्मात्मा सत्कार करने योग्य है। जितने प्रजा की रक्षा करने और दुष्ट पुरुषों के निवारण करने में साधन अपेक्षित होवें, उनको ग्रहण करके श्रेष्ठ पुरुषों का पालन और दुष्टों का निवारण राजा आदि निरन्तर करें॥२१॥

प॒र॒शुं चि॒द्वि त॑पति शिम्ब॒लं चि॒द्वि वृ॑श्चति। उ॒खा चि॑दिन्द्र॒ येष॑न्ती॒ प्रय॑स्ता॒ फेन॑मस्यति॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा लोग श्रेष्ठ वीरों की सेना की रक्षा करते हैं, वे ही विजय को प्राप्त होकर शोभित होते हैं॥२२॥

न साय॑कस्य चिकिते जनासो लो॒धं न॑यन्ति॒ पशु॒ मन्य॑मानाः। नावा॑जिनं वा॒जिना॑ हासयन्ति॒ न ग॑र्द॒भं पु॒रो अश्वा॑न्नयन्ति॥

वे ही राजा के वीर श्रेष्ठ होवें कि जो युद्धविद्या को जान के सेनाओं के अङ्गों की यथावत् रक्षा स्थिर करने और युद्ध कराने को जानते हैं॥२३॥

इ॒मे इ॑न्द्र भर॒तस्य॑ पु॒त्रा अ॑पपि॒त्वं चि॑कितु॒र्न प्र॑पि॒त्वम्। हि॒न्वन्त्यश्व॒मर॑णं॒ न नित्यं॒ ज्या॑वाजं॒ परि॑ णयन्त्या॒जौ॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा आदि अपने नाश और वृद्धि को जानते हैं, सेना में वर्त्तमान साध्यक्ष सेवकों को युद्ध कर्म में चतुर और अनुरक्तों का पुत्र के सदृश पालन करते हैं, उनकी सदा ही वृद्धि होती है, पराजय कहाँ से होवे॥२४॥। इस सूक्त में बिजुली, मेघ, विद्वान्, राजा, प्रजा और सेना के कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह तिरपनवाँ सूक्त और तेईसवाँ वर्ग तीसरे मण्डल में चौथा अनुवाक समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

इ॒मं म॒हे वि॑द॒थ्या॑य शू॒षं शश्व॒त्कृत्व॒ ईड्या॑य॒ प्र ज॑भ्रुः। शृ॒णोतु॑ नो॒ दम्ये॑भि॒रनी॑कैः शृ॒णोत्व॒ग्निर्दि॒व्यैरज॑स्रः॥

जो लोग युद्ध के लिये पूर्ण विद्या और बड़े बल को धारण करें, उनको राजजन सुन के निरन्तर सत्कार करें और उनके कृत्य की निरन्तर उन्नति करें, जिससे कि प्रसन्न हुए वे विजय से राजा को सदा शोभित करें॥१॥

महि॑ म॒हे दि॒वे अ॑र्चा पृथि॒व्यै कामो॑ म इ॒च्छञ्च॑रति प्रजा॒नन्। ययो॑र्ह॒ स्तोमे॑ वि॒दथे॑षु दे॒वाः स॑प॒र्यवो॑ मा॒दय॑न्ते॒ सचा॒योः॥

जो विद्या और राज्य की वृद्धि की कामना करने और अधिक अवस्थावाले युद्धविद्या में निपुण जन, राजा और मन्त्रियों का लक्ष्मी और विजय से सत्कार करें, उन जनों को राजा और मन्त्री भी सदा ही सुखित करें॥२॥

यु॒वोर्ऋ॒तं रो॑दसी स॒त्यम॑स्तु म॒हे षु णः॑ सुवि॒ताय॒ प्र भू॑तम्। इ॒दं दि॒वे नमो॑ अग्ने पृथि॒व्यै स॑प॒र्यामि॒ प्रय॑सा॒ यामि॒ रत्न॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे भूमि और सूर्य सम्पूर्ण संसार का व्यवहार चलाय के लक्ष्मी और अन्न से युक्त करता है, वैसे ही राजा आदि पुरुषों को चाहिये कि प्रयत्न से उत्तम कर्मों का सेवन करके अत्यन्त ऐश्वर्य को प्राप्त होवें॥३॥

उ॒तो हि वां॑ पू॒र्व्या आ॑विवि॒द्र ऋता॑वरी रोदसी सत्य॒वाचः॑। नर॑श्चिद्वां समि॒थे शूर॑सातौ ववन्दि॒रे पृ॑थिवि॒ वेवि॑दानाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही लोग राज्य करने के योग्य हैं कि जो सत्य मानने, सत्य आचरण करने, सत्यवाणी बोलने और इन्द्रियों के जीतनेवाले विद्वान् जन होवें और वे ही रानी योग्य स्त्रियाँ हैं कि जो उक्त प्रकार के पति के सदृश होवें॥४॥

को अ॒द्धा वे॑द॒ क इ॒ह प्र वो॑चद्दे॒वाँ अच्छा॑ प॒थ्या॒३॒॑ का समे॑ति। ददृ॑श्र एषामव॒मा सदां॑सि॒ परे॑षु॒ या गुह्ये॑षु व्र॒तेषु॑॥

इस संसार में विरला ही ऐसा मनुष्य होता है कि जो परमात्मा को जान और उसकी आज्ञा के अनुकूल आचरण स्वीकार करके सत्य का उपदेश देता है, ऐसा कोई विद्वान् जो इस संसार में इस लोक और परलोक का ज्ञाता होवे॥५॥

क॒विर्नृ॒चक्षा॑ अ॒भि षी॑मचष्ट ऋ॒तस्य॒ योना॒ विघृ॑ते॒ मद॑न्ती। नाना॑ चक्राते॒ सद॑नं॒ यथा॒ वेः स॑मा॒नेन॒ क्रतु॑ना संविदा॒ने॥

हे मनुष्यो! जिस परमेश्वर ने अनेक प्रकार के प्रकाश और अप्रकाश से युक्त लोक रचे, वही सबको जानने और सबको देखनेवाला परमात्मा निरन्तर उपासना करने योग्य है॥६

स॒मा॒न्या वियु॑ते दू॒रेअ॑न्ते ध्रु॒वे प॒दे त॑स्थतुर्जाग॒रूके॑। उ॒त स्वसा॑रा युव॒ती भव॑न्ती॒ आदु॑ ब्रुवाते मिथु॒नानि॒ नाम॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रेम से युक्त भगिनीजन मनोवाञ्छित वचनों को कहती हैं और जोड़े वर्त्तमान हैं, वैसे ही दूर और समीप में वर्त्तमान प्रकाश और अप्रकाश से युक्त लोक इस संसार में वर्त्तमान हैं॥७॥

विश्वेदे॒ते जनि॑मा॒ सं वि॑विक्तो म॒हो दे॒वान्बिभ्र॑ती॒ न व्य॑थेते। एज॑द्ध्रु॒वं प॑त्यते॒ विश्व॒मेकं॒ चर॑त्पत॒त्रि विषु॑णं॒ वि जा॒तम्॥

हे मनुष्यो! इन पृथिवी सूर्य्यरूप अधिकरण और अन्तरिक्ष में संपूर्ण पदार्थ वसते और उत्पन्न होते मरते और नाश को प्राप्त होते हैं, ऐसा जानो॥८॥

सना॑ पुरा॒णमध्ये॑म्या॒रान्म॒हः पि॒तुर्ज॑नि॒तुर्जा॒मि तन्नः॑। दे॒वासो॒ यत्र॑ पनि॒तार॒ एवै॑रु॒रौ प॒थि व्यु॑ते त॒स्थुर॒न्तः॥

हे मनुष्यो! जिसमें सम्पूर्ण संसार स्थित है और जिसकी कही हुई मर्य्यादा से चलते हैं, वह सबका पालक उत्पन्न करनेवाला सब पदार्थों से बड़ा अनादि से सिद्ध ब्रह्म उपासना करने योग्य है, जो उसको जाने तो समीप में वर्त्तमान और न जाने तो अत्यन्त दूर वर्त्तमान होता है॥९॥

इ॒मं स्तोमं॑ रोदसी॒ प्र ब्र॑वीम्यृदू॒दराः॑ शृणवन्नग्निजि॒ह्वाः। मि॒त्रः स॒म्राजो॒ वरु॑णो॒ युवा॑न आदि॒त्यासः॑ क॒वयः॑ पप्रथा॒नाः॥

जैसे चक्रवर्त्ती राजा अपनी आज्ञा से सम्पूर्ण न्याय को प्रकाशित करता है, वैसे ही यथार्थवक्ता विद्वान् लोग अध्यापन और उपदेश से परमेश्वर और उसकी आज्ञा को प्रसिद्ध करते हैं और जो लोग अड़तालीस वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य करके पूर्णविद्या युक्त हैं, वे ही इसके कहने सुनने निश्चय और अभ्यास करने और प्रत्यक्ष करने को समर्थ होते हैं॥१०॥

हि॒र॑ण्यपाणिः सवि॒ता सु॑जि॒ह्वस्त्रिरा दि॒वो वि॒दथे॒ पत्य॑मानः। दे॒वेषु॑ च सवितः॒ श्लोक॒मश्रे॒राद॒स्मभ्य॒मा सु॑व स॒र्वता॑तिम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य लोकों का अधिष्ठाता है, वैसे ही विद्वान् सबका अध्यक्ष होवे॥११॥

सु॒कृत्सु॑पा॒णिः स्ववाँ॑ ऋ॒तावा॑ दे॒वस्त्वष्टाव॑से॒ तानि॑ नो धात्। पू॒ष॒ण्वन्त॑ ऋभवो मादयध्वमू॒र्ध्वग्रा॑वाणो अध्व॒रम॑तष्ट॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे धार्मिक विद्वान् लोग मेघों के सदृश सबको आनन्द देते हैं, वैसे ही सब लोग विद्वानों को आनन्द देवें॥१२॥

वि॒द्युद्र॑था म॒रुत॑ ऋष्टि॒मन्तो॑ दि॒वो मर्या॑ ऋ॒तजा॑ता अ॒यासः॑। सर॑स्वती शृणवन्य॒ज्ञिया॑सो॒ धाता॑ र॒यिं स॒हवी॑रं तुरासः॥

जैसे पुरुष लोग विद्या का अभ्यास करें, वैसे ही स्त्रियाँ भी करके लक्ष्मीयुक्त हों। दोनों स्त्री और पुरुष आलस्य का त्याग करके शिल्पविषयक संपूर्ण कर्मों को सिद्ध करो॥१३॥

विष्णुं॒ स्तोमा॑सः पुरुद॒स्मम॒र्का भग॑स्येव का॒रिणो॒ याम॑नि ग्मन्। उ॒रु॒क्र॒मः क॑कु॒हो यस्य॑ पू॒र्वीर्न म॑र्धन्ति युव॒तयो॒ जनि॑त्रीः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग भगवान् की उपासना करनेवाले ईश्वर की आज्ञा के अनुकूल वर्त्तमान, वे ऐश्वर्ययुक्त होकर नहीं नाश होनेवाली बड़ी लक्ष्मियों को प्राप्त हो दुःख के पार जाकर बड़े सुख को प्राप्त होते हैं॥१४॥

इन्द्रो॒ विश्वै॑र्वी॒र्यैः॒३॒॑ पत्य॑मान उ॒भे आ प॑प्रौ॒ रोद॑सी महि॒त्वा। पु॒रं॒द॒रो वृ॑त्र॒हा धृ॒ष्णुषे॑णः सं॒गृभ्या॑ न॒ आ भ॑रा॒ भूरि॑ प॒श्वः॥

जैसे भूमि और सूर्य सब पदार्थों को धारण और उत्तम प्रकार पोषण करके बढ़ाते हैं, वैसे ही राजा आदि अध्यक्ष सब उत्तम गुणों को धारण प्रजा का पोषण, सेना की वृद्धि और शत्रुओं का नाश करके प्रजा की वृद्धि करें॥१५॥

नास॑त्या मे पि॒तरा॑ बन्धु॒पृच्छा॑ सजा॒त्य॑म॒श्विनो॒श्चारु॒ नाम॑। यु॒वं हि स्थो र॑यि॒दौ नो॑ रयी॒णां दा॒त्रं र॑क्षेथे॒ अक॑वै॒रद॑ब्धा॥

जो विद्वान् लोग माता और पिता के सदृश सबके लिये विद्या और धन देनेवाले धर्मपूर्वक आचरण करते हुए अपने समान जातिवाले तथा अन्य जनों की रक्षा करते हैं, वे सबके पूजा करने योग्य होते हैं॥१६॥

म॒हत्तद्वः॑ कवय॒श्चारु॒ नाम॒ यद्ध॑ देवा॒ भव॑थ॒ विश्व॒ इन्द्रे॑। सख॑ ऋ॒भुभिः॑ पुरुहूत प्रि॒येभि॑रि॒मां धियं॑ सा॒तये॑ तक्षता नः॥

उन लोगों के ही नाम प्रशंसा करने योग्य और प्रसिद्ध होवें कि जो विद्वान् और अविद्वानों में मित्रता को प्राप्त होकर धर्म और अधर्म के विचार के लिये उत्तम बुद्धि सबके लिये देते हैं॥१७॥

अ॒र्य॒मा णो॒ अदि॑तिर्य॒ज्ञिया॒सोऽद॑ब्धानि॒ वरु॑णस्य व्र॒तानि॑। यु॒योत॑ नो अनप॒त्यानि॒ गन्तोः॑ प्र॒जावा॑न्नः पशु॒माँ अ॑स्तु गा॒तुः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो! आप लोग हम लोगों को न्यायाधीश और माता के सदृश अन्यायाचरण से अलग करके और सत्य धर्मयुक्त कर्मों को प्राप्त कराके सम्पूर्ण पृथिवी को बहुत प्रजा और असंख्य धनयुक्त करो॥१८॥

दे॒वानां॑ दू॒तः पु॑रु॒ध प्रसू॒तोऽना॑गान्नो वोचतु स॒र्वता॑ता। शृ॒णोतु॑ नः पृथि॒वी द्यौरु॒तापः॒ सूर्यो॒ नक्ष॑त्रैरु॒र्व१॒॑न्तरि॑क्षम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। धर्म्मसभा के अधिकृत लोगों के आधीन में वर्त्तमान उपदेश देनेवाले सबको सत्य और असत्य का उपदेश देकर धर्मात्मा करें और उनके प्रश्नों को सुनके समाधान करें और पृथिवी आदिकों के समीप से क्षमा आदि गुणों का ग्रहण करके अन्यों को ग्रहण करा पाखण्ड का नाश और धर्म को प्राप्त कराके सबको श्रेष्ठ करें॥१९॥

शृ॒ण्वन्तु॑ नो॒ वृष॑णः॒ पर्व॑तासो ध्रु॒वक्षे॑मास॒ इळ॑या॒ मद॑न्तः। आ॒दि॒त्यैर्नो॒ अदि॑तिः शृणोतु॒ यच्छ॑न्तु नो म॒रुतः॒ शर्म॑ भ॒द्रम्॥

मनुष्यों को चाहिये कि सब प्राप्तियों से प्रथम उत्तम शिक्षा तदनन्तर विद्या पुनः सत्सङ्ग से कल्याणकारक आचरण उत्तम बातों का श्रवण और उपदेश करके सबके योग्य अर्थात् भोजन आच्छादन के निर्वाह और कल्याण को सिद्ध करें॥२०॥

सदा॑ सु॒गः पि॑तु॒माँ अ॑स्तु॒ पन्था॒ मध्वा॑ देवा॒ ओष॑धीः॒ संपि॑पृक्त। भगो॑ मे अग्ने स॒ख्ये न मृ॑ध्या॒ उद्रा॒यो अ॑श्यां॒ सद॑नं पुरु॒क्षोः॥

जो विद्वान् लोग वैद्य होकर सर्वदा ओषधियों से रोगों का निवारण करके सबको रोगरहित करें और सदैव मित्रता करके राजा को चाहिये कि दुष्ट डाकू रूप कण्टकों से तथा भय से रहित सरल मार्ग बनावें कि जिन मार्गों में जाकर तथा आकर प्रजायें बहुत धनवाली होवें॥२१॥

स्वद॑स्व ह॒व्या समिषो॑ दिदीह्यस्म॒द्र्य१॒॑क्सं मि॑मीहि॒ श्रवां॑सि। विश्वाँ॑ अग्ने पृ॒त्सु ताञ्जे॑षि॒ शत्रू॒नहा॒ विश्वा॑ सु॒मना॑ दीदिही नः॥

राजा आदि पुरुषों को चाहिये कि बुद्धि के नाश करनेवाले अन्न आदि का त्याग करना कहके विज्ञान बढ़ाय के लोक से वार्ताओं को सुनके सेनाओं की वृद्धि करके और शत्रुओं को जीतकर सब काल में आनन्द और शोक का त्याग करें और धर्म से प्रजाओं का पालन करके विषयों में आसक्ति का त्याग करके आनन्द करना चाहिये॥२२॥इस सूक्त में राजा, विद्वान्, प्रजा, अध्यापक, शिष्य, ईश्वर, श्रोता, वक्ता और शूरवीर के कर्म्म और गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह चौवनवाँ सूक्त और सत्ताईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

उ॒षसः॒ पूर्वा॒ अध॒ यद्व्यू॒षुर्म॒हद्वि ज॑ज्ञे अ॒क्षरं॑ प॒दे गोः। व्र॒ता दे॒वाना॒मुप॒ नु प्र॒भूष॑न्म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

जो बिजुली नामक वस्तु को प्रातःकाल से सेवन करते हैं, उनके सदृश वर्त्तमान एक द्वितीयरहित ब्रह्म प्रकृति आदि पदार्थों में व्याप्त हुआ वह सबको धारण करता है, वही सब करके उपासना करने योग्य है॥१॥

मो षू णो॒ अत्र॑ जुहुरन्त दे॒वा मा पूर्वे॑ अग्ने पि॒तरः॑ पद॒ज्ञाः। पु॒रा॒ण्योः सद्म॑नोः के॒तुर॒न्तर्म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

वे ही इस संसार में विद्वान् जन पिता के सदृश होवें कि जो प्रकृति आदि पदार्थों में व्याप्त सर्वान्तर्य्यामी ब्रह्म को उत्तम प्रकार जान के अन्यों को जनावें॥२॥

वि मे॑ पुरु॒त्रा प॑तयन्ति॒ कामाः॒ शम्यच्छा॑ दीद्ये पू॒र्व्याणि॑। समि॑द्धे अ॒ग्नावृ॒तमिद्व॑देम म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

मनुष्य लोग आलस्य को त्याग के पूर्व पुरुषों करके किये हुये कर्मों का सेवन देवों के देव सबके आधार सत्यस्वरूप और दीपक से घट आदि के सदृश भीतर व्याप्त परमात्मा को साक्षात् देख के अन्य जनों के प्रति उपदेश देवैं॥३॥

स॒मा॒नो राजा॒ विभृ॑तः पुरु॒त्रा शये॑ श॒यासु॒ प्रयु॑तो॒ वनानु॑। अ॒न्या व॒त्सं भर॑ति॒ क्षेति॑ मा॒ता म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

हे मनुष्यो! जिस करके प्रकाशित हुए सूर्य्य आदि प्रकाशित होते हैं, जो अव्यक्त अर्थात् प्रकृति में सबको उत्पन्न करके तथा धारण करके माता के सदृश रक्षा करता है और जो यथार्थवक्ता विद्वानों करके सत्कार करने योग्य है, उस ब्रह्म की आप लोग उपासना करो॥४॥

आ॒क्षित्पूर्वा॒स्वप॑रा अनू॒रुत्स॒द्यो जा॒तासु॒ तरु॑णीष्व॒न्तः। अ॒न्तर्व॑तीः सुवते॒ अप्र॑वीता म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

हे मनुष्यो! जो उत्पन्न, उत्पन्न हो गई और उत्पन्न होनेवाली प्रजाओं में व्याप्त धारण करनेवाला अन्तर्यामी वर्त्तमान है, उस परमात्मा की सेवा करो॥५॥

श॒युः प॒रस्ता॒दध॒ नु द्वि॑मा॒ताऽब॑न्ध॒नश्च॑रति व॒त्स एकः॑। मि॒त्रस्य॒ ता वरु॑णस्य व्र॒तानि॑ म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

हे मनुष्यो! जो कुछ इस संसार में सूर्य्य आदि वस्तु और जो इस संसार में अनेक प्रकार की रचना हैं और जो विचित्ररूप स्वाद आदि वर्त्तमान है और सब अपने-अपने मण्डल में घूमते हैं, प्रलय से प्रथम नहीं नष्ट होते हैं, वे ये परमात्मा के कर्म हैं, यह जानना चाहिये॥६॥

द्वि॒मा॒ता होता॑ वि॒दथे॑षु स॒म्राळन्वग्रं॒ चर॑ति॒ क्षेति॑ बु॒ध्नः। प्र रण्या॑नि रण्य॒वाचो॑ भरन्ते म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

हे मनुष्यो! जो जगदीश्वर सूर्य्य आदि जगत् को निर्माण धारण और प्रकाश करके पालन करता है और जो सर्वत्र वसता हुआ सबको अपने में वसाता है, जिस एक ही को यथार्थ बोलनेवाले विद्वान् लोग सेवते हैं, उस ही की सब लोग उपासना करो॥७॥

शूर॑स्येव॒ युध्य॑तो अन्त॒मस्य॑ प्रती॒चीनं॑ ददृशे॒ विश्व॑मा॒यत्। अ॒न्तर्म॒तिश्च॑रति नि॒ष्षिधं॒ गोर्म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

हे मनुष्यो! जैसे युद्ध करते हुए समीप में वर्त्तमान और शत्रु के नाशक वीरपुरुष के समीप में कायर मनुष्य तिरस्कृत हुए पुरुष के सदृश देखा जाता है, वैसे ही सम्पूर्ण शक्तिवाले अनन्त परमात्मा के समीप में सूर्य्य आदिक जगत् क्षुद्र और तिरस्कृत है और जो जगदीश्वर विद्या के खजाने रूप चारों वेदों वाणी के आभूषण हुओं का शासन करता है, उस ही को इष्ट आप लोग मानो॥८॥

नि वे॑वेति पलि॒तो दू॒त आ॑स्व॒न्तर्म॒हांश्च॑रति रोच॒नेन॑। वपूं॑षि॒ बिभ्र॑द॒भि नो॒ वि च॑ष्टे म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो जगदीश्वर योगियों को वायु के द्वारा वृद्ध दूत के सदृश दूर देश में वर्त्तमान समाचार वा पदार्थ को जनाता है और अन्तर्यामी हुआ अपने प्रकाश से सबको प्रकाशित और जीवों के कर्मों को जानकर फलों को देता है, अन्तःकरण में वर्त्तमान हुआ न्याय्य और अन्याय्य करने और न करने को चिताता है, वही हम लोगों को अतिशय पूजा करने योग्य ब्रह्म वस्तु है, आप लोग भी ऐसा जानो॥९॥

विष्णु॑र्गो॒पाः प॑र॒मं पा॑ति॒ पाथः॑ प्रि॒या धामा॑न्य॒मृता॒ दधा॑नः। अ॒ग्निष्टा विश्वा॒ भुव॑नानि वेद म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो इस संसार का उत्पन्न, धारण, पालन और नाश करनेवाला है और सब जीवों के हित के लिये अनेक प्रकार के पदार्थों का निर्माण करता है, उसही की आप लोग सेवा करो॥१०॥

नाना॑ चक्राते य॒म्या॒३॒॑ वपूं॑षि॒ तयो॑र॒न्यद्रोच॑ते कृ॒ष्णम॒न्यत्। श्यावी॑ च॒ यदरु॑षी च॒ स्वसा॑रौ म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो परमेश्वर पृथिवी और सूर्य्य के घूमने की अवस्था को न करे तो रात्रि और दिन कैसे होवें और जिस जगदीश्वर ने पुरुषार्थ के लिये दिन और शयन करने के लिये रात्रि रची, उस ईश्वर का हृदय में सब ध्यान करो॥११॥

मा॒ता च॒ यत्र॑ दुहि॒ता च॑ धे॒नू स॑ब॒र्दुघे॑ धा॒पये॑ते समी॒ची। ऋ॒तस्य॒ ते सद॑सीळे अ॒न्तर्म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

जो सभ्य जन परमेश्वर से डर के उसकी आज्ञा के अनुसार जैसे रात्रि और दिन संपूर्ण संसार के नियमपूर्वक पालनकर्त्ता होते हैं, वैसे ही सभा में धर्म के विजय और अधर्म के पराजय से प्रजाओं को आनन्दित करें॥१२॥

अ॒न्यस्या॑ व॒त्सं रि॑ह॒ती मि॑माय॒ कया॑ भु॒वा नि द॑धे धे॒नुरूधः॑। ऋ॒तस्य॒ सा पय॑सापिन्व॒तेळा॑ म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

हे मनुष्यो! जो परमात्मा रात्रि और दिन से पृथिवी में वर्त्तमान पदार्थों को शयन और जागरण प्रयोजन जिनका उन प्रकाश और अन्धकार और वृष्टि से गौ के सदृश रक्षा करता है, उसही की पूजा करो॥१३॥

पद्या॑ वस्ते पुरु॒रूपा॒ वपूं॑ष्यू॒र्ध्वा त॑स्थौ॒ त्र्यविं॒ रेरि॑हाणा। ऋ॒तस्य॒ सद्म॒ वि च॑रामि वि॒द्वान्म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

हे मनुष्यो! जैसे दिन अनेक रूपों को दिखाता है, वैसे ही रात्रि सबको घेरती है, ये ही सत्य के कारण से उत्पन्न हुए और उत्पन्न होनेवाले को जानकर सबके बनानेवाले परमेश्वर को सुखपूर्वक जानो॥१४॥

प॒देइ॑व॒ निहि॑ते द॒स्मे अ॒न्तस्तयो॑र॒न्यद्गुह्य॑मा॒विर॒न्यत्। स॒ध्री॒ची॒ना प॒थ्या॒३॒॑ सा विषू॑ची म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मनुष्य लोग दो पैरों से चलते हैं, वैसे ही रात्रि और दिन चलते हैं और जैसे दिन पथ्य है, वैसे रात्रि पथ्य नहीं होती है। इसी प्रकार सर्वान्तर्यामी ब्रह्म को त्याग करके अन्य उपासित हुआ पथ्य नहीं होता है॥१५॥

आ धे॒नवो॑ धुनयन्ता॒मशि॑श्वीः सब॒र्दुघाः॑ शश॒या अप्र॑दुग्धाः। नव्या॑नव्या युव॒तयो॒ भव॑न्तीर्म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रथम अवस्था में वर्त्तमान विद्या पढ़ी हुई बाला भिन्न ब्रह्मचारिणी स्त्रियाँ अपने सदृश पतियों को प्राप्त होकर आनन्दित होती हैं, वैसे ही सब विद्याओं से युक्त वाणियों को प्राप्त होकर विद्वान् लोग सुखी होते हैं॥१६॥

यद॒न्यासु॑ वृष॒भो रोर॑वीति॒ सो अ॒न्यस्मि॑न्यू॒थे नि द॑धाति॒ रेतः॑। स हि क्षपा॑वा॒न्त्स भगः॒ स राजा॑ म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

हे मनुष्यो! जो सूर्य्य रात्रि के अन्त और दिन के आदि में सब प्राणियों को निरन्तर जगाय के शब्द कराय और व्यवहार कराय के लक्ष्मियों को प्राप्त कराता है और रात्रि में चन्द्र आदिकों में किरणों को रख के प्रकाश कराता सो यह प्रकाशमान जगदीश्वर से उत्पन्न किया गया, ऐसा जानना चाहिये॥१७॥

वी॒रस्य॒ नु स्वश्व्यं॑ जनासः॒ प्र नु वो॑चाम वि॒दुर॑स्य दे॒वाः। षो॒ळ्हा यु॒क्ताः पञ्च॑प॒ञ्चा व॑हन्ति म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

हे मनुष्यो! जिसकी प्राप्ति में पाँच प्राण निमित्त और जिसको सब योगी लोग समाधि से जानते हैं, उसीकी उपासना भृत्यों के वीरपन को उत्पन्न करनेवाली है, ऐसा हम लोग उपदेश देवें॥१८॥

दे॒वस्त्वष्टा॑ सवि॒ता वि॒श्वरू॑पः पु॒पोष॑ प्र॒जाः पु॑रु॒धा ज॑जान। इ॒मा च॒ विश्वा॒ भुव॑नान्यस्य म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य जगत् का पालन करता है, वैसे ही जगदीश्वर सूर्य्य आदि अनेक प्रकार संसार को बनाय करके रक्षा करता है, यही परमात्मा का बड़ा आश्चर्य्य कर्म है, ऐसा जानना चाहिये॥१९॥

म॒ही समै॑रच्च॒म्वा॑ समी॒ची उ॒भे ते अ॑स्य॒ वसु॑ना॒ न्यृ॑ष्टे। शृ॒ण्वे वी॒रो वि॒न्दमा॑नो॒ वसू॑नि म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

कोई भी पुरुष परमेश्वर की आज्ञापालन के विना बड़े ऐश्वर्य्य को नहीं प्राप्त होता है और यथार्थवक्ता पुरुषों से सुनने विना परमात्मा का बोध किसी को भी नहीं प्राप्त होता है, जिससे सब लोगों को चाहिये कि परमेश्वर की आज्ञा का पालन करके ऐश्वर्य्यवान् होवें॥२०॥

इ॒मां च॑ नः पृथि॒वीं वि॒श्वधा॑या॒ उप॑ क्षेति हि॒तमि॑त्रो॒ न राजा॑। पु॒रः॒ सदः॑ शर्म॒सदो॒ न वी॒रा म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो धर्मात्मा राजा के सदृश संसार में निवास कराता और धनुर्वेद के जाननेवाले वीर के सदृश विजय दिलाता है, वही ब्रह्म हम लोगों को उपासना करने योग्य है॥२१॥

नि॒ष्षिध्व॑रीस्त॒ ओष॑धीरु॒तापो॑ र॒यिं त॑ इन्द्र पृथि॒वी बि॑भर्ति। सखा॑यस्ते वाम॒भाजः॑ स्याम म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे जगदीश्वर! जिन आपने हम लोगों के सुख के लिये सृष्टि में अनेक प्रकार की ओषधियाँ और जल रचे, उन आपके हम लोग उपासना करनेवाले होवें और आपको छोड़ के दूसरे की उपासना कभी न करें॥२२॥इस सूक्त में दिन, रात्रि, विद्वान्, अन्तरिक्ष, पृथिवी, राजधर्म और ईश्वर के गुणवर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के संगति जाननी चाहिये॥यह ऋग्वेद की संहिता के तीसरे अष्टक में तीसरा अध्याय इकतीसवाँ वर्ग और तीसरे मण्डल में पचपनवाँ सूक्त समाप्त हुआ॥

न ता मि॑नन्ति मा॒यिनो॒ न धीरा॑ व्र॒ता दे॒वानां॑ प्रथ॒मा ध्रु॒वाणि॑। न रोद॑सी अ॒द्रुहा॑ वे॒द्याभि॒र्न पर्व॑ता नि॒नमे॑ तस्थि॒वांसः॑॥

किसी का भी सामर्थ्य नहीं है कि जो ईश्वर के किये हुए नियमों का उल्लङ्घन करै और जिस परमेश्वर के भ्रमरहित सुखरूप कर्म हैं, उसी दयानिधि परमेश्वर की सब लोग उपासना करो॥१॥

षड्भा॒राँ एको॒ अच॑रन्बिभर्त्यृ॒तं वर्षि॑ष्ठ॒मुप॒ गाव॒ आगुः॑। ति॒स्रो म॒हीरुप॑रास्तस्थु॒रत्या॒ गुहा॒ द्वे निहि॑ते॒ दर्श्येका॑॥

हे मनुष्यो! जिस परमेश्वर से प्रकृति आदि भूमि पर्य्यन्त संसार रच धारण कर और उत्तम प्रकार पालन करके व्यवस्थापित अर्थात् ढंग पर चलाया जाता है, वही पूज्य है, ऐसा मानो॥२॥

त्रि॒पा॒ज॒स्यो वृ॑ष॒भो वि॒श्वरू॑प उ॒त त्र्यु॒धा पु॑रु॒ध प्र॒जावा॑न्। त्र्य॒नी॒कः प॑त्यते॒ माहि॑नावा॒न्त्स रे॑तो॒धा वृ॑ष॒भः शश्व॑तीनाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो जगदीश्वर बिजुली के सदृश सब जगह व्यापक होके प्रकाशकर्त्ता धारणकर्त्ता फिर भी न्यायाधीश स्वामी अनन्त महिमा से युक्त और अनादि जीवों का न्यायाधीश वर्त्तमान है, उससे डरके और पापों का त्याग करके प्रीति से धर्म का आचरण कर अपने अन्तःकरण में सब लोग उसी का ध्यान करें॥३॥

अ॒भीक॑ आसां पद॒वीर॑बोध्यादि॒त्याना॑मह्वे॒ चारु॒ नाम॑। आप॑श्चिदस्मा अरमन्त दे॒वीः पृथ॒ग्व्रज॑न्तीः॒ परि॑ षीमवृञ्जन्॥

हे मनुष्या जो सबके सुख की कामना करता है, जिसमें सब जीव और लोकादि पदार्थ पृथक्-पृथक् क्रीड़ा करते ग्रहण करते और त्याग करते हैं, उसको छोड़ के अन्य किसी की भी मत उपासना करो॥४॥

त्री ष॒धस्था॑ सिन्धव॒स्त्रिः क॑वी॒नामु॒त त्रि॑मा॒ता वि॒दथे॑षु स॒म्राट्। ऋ॒ताव॑री॒र्योष॑णास्ति॒स्रो अप्या॒स्त्रिरा दि॒वो वि॒दथे॒ पत्य॑मानाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जिस परमात्मा ने सब प्राणी और प्राणिभिन्नों के निवास के लिये जल स्थल और अन्तरिक्ष रचे, उस स्वामी की पतिव्रता स्त्री के सदृश निरन्तर सेवा करो॥५॥

त्रिरा दि॒वः स॑वित॒र्वार्या॑णि दि॒वेदि॑व॒ आ सु॑व॒ त्रिर्नो॒ अह्नः॑। त्रि॒धातु॑ रा॒य आ सु॑वा॒ वसू॑नि॒ भग॑ त्रातर्धिषणे सा॒तये॑ धाः॥

हे जगदीश्वर! आप कृपा से हम लोगों को धर्म से पुरुषार्थयुक्त करके प्रतिदिन ऐश्वर्य्य प्राप्त कराओ और निरन्तर रक्षा करके सबके सुख के लिये विभागों को कराओ॥६॥

त्रिरा दि॒वः स॑वि॒ता सो॑षवीति॒ राजा॑ना मि॒त्रावरु॑णा सुपा॒णी। आप॑श्चिदस्य॒ रोद॑सी चिदु॒र्वी रत्नं॑ भिक्षन्त सवि॒तुः स॒वाय॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा लोग परमेश्वर के सदृश गुण-कर्म और स्वभावयुक्त हुए प्रजाओं में वर्त्तमान हैं, वे ही चक्रवर्त्ति राज्य और असङ्ख्य धन को प्राप्त होते हैं॥७॥

त्रिरु॑त्त॒मा दू॒णशा॑ रोच॒नानि॒ त्रयो॑ राज॒न्त्यसु॑रस्य वी॒राः। ऋ॒तावा॑न इषि॒रा दू॒ळभा॑स॒स्त्रिरा दि॒वो वि॒दथे॑ सन्तु दे॒वाः॥

जो लोग जगदीश्वर को प्राणों के सदृश प्रिय, राजा के सदृश उपदेशदाता, न्यायाधीश के सदृश नायक, सूर्य के सदृश अपने से प्रकाशमान और सबका प्रकाशकर्त्ता मान निरन्तर भजते हैं, वे ही शत्रुओं के दुःख से जीतने योग्य सत्य के आचरण करने और अन्यों के सुख चाहनेवाले हैं, वे चक्रवर्त्ती राज्य को प्राप्त होकर सूर्य्य के सदृश शोभित होते हैं और वे ही इस संसार में रक्षा के अधिकारी हों॥८॥इस सूक्त में ईश्वर, जगत् और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्तार्थ के साथ संगति समझनी चाहिये॥

प्र मे॑ विवि॒क्वाँ अ॑विदन्मनी॒षां धे॒नुं चर॑न्तीं॒ प्रयु॑ता॒मगो॑पाम्। स॒द्यश्चि॒द्या दु॑दु॒हे भूरि॑ धा॒सेरिन्द्र॒स्तद॒ग्निः प॑नि॒तारो॑ अस्याः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग अधर्म के आचरण से रहित विद्या को ग्रहण करने की इच्छा पूरी करनेवाले उत्तम वाणी का प्रयोग करने और सत्यधर्म का आचरण करते हुए सबकी इच्छा को पूरी करते हैं, वे अत्यन्त सत्कार करने योग्य होवें॥१॥

इन्द्रः॒ सु पू॒षा वृष॑णा सु॒हस्ता॑ दि॒वो न प्री॒ताः श॑श॒यं दु॑दुह्रे। विश्वे॒ यद॑स्यां र॒णय॑न्त दे॒वाः प्र वोऽत्र॑ वसवः सु॒म्नम॑श्याम्॥

इस मन्त्र में उपमावाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो शरीर और आत्मा के बल की कामना करते हैं, वे ही विद्वान् हो शास्त्र और ईश्वर के बोध से युक्त वाणी में रमते हुए बिजुली आदि की विद्या को प्रसिद्ध कर और विजयमान हो अतुल आनन्द को पाय अन्य जनों को पूर्ण आनन्द उत्पन्न करते, वे ही जगत् के पूज्य सबके गुरु होते हैं॥२॥

या जा॒मयो॒ वृष्ण॑ इ॒च्छन्ति॑ श॒क्तिं न॑म॒स्यन्ती॑र्जानते॒ गर्भ॑मस्मिन्। अच्छा॑ पु॒त्रं धे॒नवो॑ वावशा॒ना म॒हश्च॑रन्ति॒ बिभ्र॑तं॒ वपूं॑षि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही कन्यायें सुख को प्राप्त होती हैं कि जो अपने से दुगने विद्या और शरीर बलवाले अपने सदृश प्रेमी पतियों की उत्तम प्रकार परीक्षा करके स्वीकार करती हैं, वैसे ही पुरुष लोग भी प्रेमपात्र स्त्रियों को ग्रहण करते हैं, वे ही परस्पर प्रीतिपूर्वक अनुकूल व्यवहार से वीर्यस्थापन और आकर्षण विद्या को जान गर्भ को धारण उसका उत्तम प्रकार पालन सब संस्कारों को करके बड़े भाग्यवाले पुत्रों को उत्पन्न कर अतुल आनन्द और विजय को प्राप्त होते हैं, इससे विपरीत व्यवहार से नहीं॥३॥

अच्छा॑ विवक्मि॒ रोद॑सी सु॒मेके॒ ग्राव्णो॑ युजा॒नो अ॑ध्व॒रे म॑नी॒षा। इ॒मा उ॑ ते॒ मन॑वे॒ भूरि॑वारा ऊ॒र्ध्वा भ॑वन्ति दर्श॒ता यज॑त्राः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो स्त्री और पुरुष पृथिवी और सूर्य के सदृश संयुक्त हुए वर्त्तमान हैं, वे भाग्यशाली होते हैं। जो स्त्री और पुरुष उत्तम प्रकार परीक्षा करके स्वयंवर विवाह को करैं, वे मेघ के सदृश उत्तम सन्तानों को उत्पन्न करके सब काल में सुखी होते हैं॥४॥

या ते॑ जि॒ह्वा मधु॑मती सुमे॒धा अग्ने॑ दे॒वेषू॒च्यत॑ उरू॒ची। तये॒ह विश्वाँ॒ अव॑से॒ यज॑त्रा॒ना सा॑दय पा॒यया॑ चा॒ मधू॑नि॥

जो स्त्री और पुरुष प्रसन्नता से विवाह किये हुए विद्या बुद्धि और उत्तम वाणी से युक्त इस संसार में गृहाश्रम में वर्त्तमान होकर प्रेम से उत्पन्न होनेवाले पुत्रों को उत्पन्न पालन और उत्तम शिक्षायुक्त करके तथा स्वयंवर विवाह कराके निवास कराते हैं, वे ही गृहाश्रम में मोक्ष के सदृश सुखका अनुभव करते हैं॥५॥

या ते॑ अग्ने॒ पर्व॑तस्येव॒ धारास॑श्चन्ती पी॒पय॑द्देव चि॒त्रा। ताम॒स्मभ्यं॒ प्रम॑तिं जातवेदो॒ वसो॒ रास्व॑ सुम॒तिं वि॒श्वज॑न्याम्॥

स्त्री और पुरुषों को चाहिये कि ब्रह्मचर्य्य से विद्या और उत्तम शिक्षाओं को प्राप्त होकर युवावस्था में तुल्य गुण-कर्म और स्वभावों की परीक्षा करके द्विगुण बल और अवस्थावाले पति और प्रेमपात्र स्त्री को प्राप्त होकर गृहाश्रम में सुख से रहें॥६॥इस सूक्त में वाणी बुद्धि गृहाश्रम और स्त्री पुरुषों के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सत्तावनवाँ सूक्त और दूसरा वर्ग पूरा हुआ॥

धे॒नुः प्र॒त्नस्य॒ काम्यं॒ दुहा॑ना॒न्तः पु॒त्रश्च॑रति॒ दक्षि॑णायाः। आ द्यो॑त॒निं व॑हति शु॒भ्रया॑मो॒षसः॒ स्तोमो॑ अ॒श्विना॑वजीगः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य प्रातःकालों को उत्पन्न करता है, वैसे ही आत्मा में उत्पन्न हुआ बोध पूर्ण मनोरथ को उत्पन्न कर सत्य और असत्य का प्रकाश करता है। जो विद्या धर्म से युक्त वा श्रेष्ठ वाणी जिसको प्राप्त होती है, उसको सनातन ब्रह्म का बोध भी प्राप्त होता है॥१॥

सु॒युग्व॑हन्ति॒ प्रति॑ वामृ॒तेनो॒र्ध्वा भ॑वन्ति पि॒तरे॑व॒ मेधाः॑। जरे॑थाम॒स्मद्वि प॒णेर्म॑नी॒षां यु॒वोरव॑श्चकृ॒मा या॑तम॒र्वाक्॥

जैसे वायु और किरणें सूर्य्य आदि को पहुँचाती हैं, वैसे ही उत्तम बुद्धि के सदृश वर्त्तमान स्त्रियाँ सुख को पहुँचाती हैं। और जो विद्वान् लोग मनुष्यों में पिता के सदृश वर्त्तमान हैं, उनके प्रति सबको चाहिये कि पुत्र के सदृश वर्त्ताव कर और सब व्यवहार को जानके यथावत् करैं॥२॥

सु॒युग्भि॒रश्वैः॑ सु॒वृता॒ रथे॑न॒ दस्रा॑वि॒मं शृ॑णुतं॒ श्लोक॒मद्रेः॑। किम॒ङ्ग वां॒ प्रत्यव॑र्तिं॒ गमि॑ष्ठा॒हुर्विप्रा॑सो अश्विना पुरा॒जाः॥

जो विद्वान् लोग अग्नि आदि विद्या से चलाये वाहनों से व्यवहार करैं, वे किस-किस ऐश्वर्य्य को न प्राप्त होवैं॥३॥

आ म॑न्येथा॒मा ग॑तं॒ कच्चि॒देवै॒र्विश्वे॒ जना॑सो अ॒श्विना॑ हवन्ते। इ॒मा हि वां॒ गोऋ॑जीका॒ मधू॑नि॒ प्र मि॒त्रासो॒ न द॒दुरु॒स्रो अग्रे॑॥

विद्वानों की योग्यता है कि जो प्रीति से धार्मिक उत्तम सेवक विद्यार्थी वा श्रोताजन समीप आवैं, उनको उत्तम विज्ञान आदि देवैं, जिससे सब मनुष्य सबके साथ मित्रों के सदृश वर्त्ताव करैं॥४॥

ति॒रः पु॒रू चि॑दश्विना॒ रजां॑स्याङ्गू॒षो वां॑ मघवाना॒ जने॑षु। एह या॑तं प॒थिभि॑र्देव॒यानै॒र्दस्रा॑वि॒मे वां॑ नि॒धयो॒ मधू॑नाम्॥

जो लोग विद्वानों के मार्गों से पदार्थविद्याओं का खोज करैं, वे सम्पूर्ण विद्याओं को प्राप्त हों तथा जल स्थल और अन्तरिक्षों में जा आ और लक्ष्मीवान् हो दारिद्र्य का तिरस्कार करके धनवान् होते हुए अन्य जनों को भी ऐसे ही करैं॥५॥

पु॒रा॒णमोकः॑ स॒ख्यं शि॒वं वां॑ यु॒वोर्न॑रा॒ द्रवि॑णं ज॒ह्नाव्या॑म्। पुनः॑ कृण्वा॒नाः स॒ख्या शि॒वानि॒ मध्वा॑ मदेम स॒ह नू स॑मा॒नाः॥

जो विद्वान् और अविद्वान् लोग परस्पर मैत्री करैं, वे अनादिसिद्ध कल्याणकारक ब्रह्म ऐश्वर्य और विज्ञान को प्राप्त होकर धार्मिक होते हुए दुष्ट व्यसनों का त्याग करके सदा ही सुखी होवें॥६॥

अश्वि॑ना वा॒युना॑ यु॒वं सु॑दक्षा नि॒युद्भि॑श्च स॒जोष॑सा युवाना। नास॑त्या ति॒रोअ॑ह्न्यं जुषा॒णा सोमं॑ पिबतम॒स्रिधा॑ सुदानू॥

हे मनुष्यो! आप हिंसा आदि अधर्म व्यवहार को त्याग के वायु बिजुली आदि पदार्थविद्याओं को जान अन्य जनों के लिये विद्या आदि दे और पूर्ण ब्रह्मचर्य्य का सेवन करके अतिकाल जीओ॥७॥

अश्वि॑ना॒ परि॑ वा॒मिषः॑ पुरू॒चीरी॒युर्गी॒र्भिर्यत॑माना॒ अमृ॑ध्राः। रथो॑ ह वामृत॒जा अद्रि॑जूतः॒ परि॒ द्यावा॑पृथि॒वी या॑ति स॒द्यः॥

जो लोग विमान आदि यानों को अग्नि आदि से रचते हैं, वे अभीष्ट सुखों को प्राप्त होकर जहाँ इच्छा हो, शीघ्र जा सकते हैं॥८॥

अश्वि॑ना मधु॒षुत्त॑मो यु॒वाकुः॒ सोम॒स्तं पा॑त॒मा ग॑तं दुरो॒णे। रथो॑ ह वां॒ भूरि॒ वर्पः॒ करि॑क्रत्सु॒ताव॑तो निष्कृ॒तमाग॑मिष्ठः॥

जो मनुष्य शिल्पविद्या से अनेक कलायन्त्रों का निर्माण करके वाहन आदि को रचते हैं, वे अपने गृह कुल और देश में पूर्ण ऐश्वर्य कर सकते हैं॥९॥इस सूक्त में अश्वि शब्द से शिल्पीजनों का कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह अट्ठावनवाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ॥

मि॒त्रो जना॑न्यातयति ब्रुवा॒णो मि॒त्रो दा॑धार पृथि॒वीमु॒त द्याम्। मि॒त्रः कृ॒ष्टीरनि॑मिषा॒भि च॑ष्टे मि॒त्राय॑ ह॒व्यं घृ॒तव॑ज्जुहोत॥

जो मनुष्य लोग सत्य का उपदेश करने सत्य विद्या देने मित्रता रखने सबको धारण करनेवाले परमात्मा और सबके व्यवस्थापक राजा का सत्कार करते हैं, वे ही सबके मित्र हैं॥१॥

प्र स मि॑त्र॒ मर्तो॑ अस्तु॒ प्रय॑स्वा॒न्यस्त॑ आदित्य॒ शिक्ष॑ति व्र॒तेन॑। न ह॑न्यते॒ न जी॑यते॒ त्वोतो॒ नैन॒मंहो॑ अश्नो॒त्यन्ति॑तो॒ न दू॒रात्॥

जो मनुष्य यथार्थवक्ता और स्वामी के गुणकर्म और स्वभाव के सदृश अपने गुणकर्म और स्वभावों को करके सत्य न्याय से सबको शिक्षा करते हैं, वे पापरहित धर्मात्मा होकर यथार्थवक्ता और स्वामी से रक्षित हुए दुष्टों से नाश तथा पराजय को प्राप्त नहीं हो सकते और न वे दूर वा समीप से पक्षपात से पाप का सेवन करते हैं॥२॥

अ॒न॒मी॒वास॒ इळ॑या॒ मद॑न्तो मि॒तज्ञ॑वो॒ वरि॑म॒न्ना पृ॑थि॒व्याः। आ॒दि॒त्यस्य॑ व्र॒तमु॑पक्षि॒यन्तो॑ व॒यं मि॒त्रस्य॑ सुम॒तौ स्या॑म॥

जो लोग परमेश्वर और यथार्थवक्ता पुरुषों के साथ मित्रता कर और क्षमा आदि विद्या न्याय के प्रकाश आदि गुणों का स्वीकार करके धर्मयुक्त मार्ग में वर्त्तमान हैं, वे ही परमेश्वर और यथार्थवक्ता पुरुषों के प्रिय होते हैं॥३॥

अ॒यं मि॒त्रो न॑म॒स्यः॑ सु॒शेवो॒ राजा॑ सुक्ष॒त्रो अ॑जनिष्ट वे॒धाः। तस्य॑ व॒यं सु॑म॒तौ य॒ज्ञिय॒स्यापि॑ भ॒द्रे सौ॑मन॒से स्या॑म॥

जैसे ईश्वर और यथार्थवक्ता पुरुष धर्म में वर्त्तमान हुए नमस्कार करने के योग्य होते हैं, वैसे ही न्याय और विनय से राज्य के पालनकर्त्ता राजा लोग सत्कार करने योग्य होवैं और सज्जन लोग परमेश्वर और यथार्थवक्ताओं के कर्मों में वर्त्तमान हैं, वैसे ही हम लोगों को चाहिये कि वर्त्ताव करें॥४॥

म॒हाँ आ॑दि॒त्यो नम॑सोप॒सद्यो॑ यात॒यज्ज॑नो गृण॒ते सु॒शेवः॑। तस्मा॑ ए॒तत्पन्य॑तमाय॒ जुष्ट॑म॒ग्नौ मि॒त्राय॑ ह॒विरा जु॑होत॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही पूज्य सूर्य्य के सदृश विद्या और धर्म के प्रकाश करनेवाले यथार्थवक्ता विद्वान् लोग हैं कि जो उत्तम गुण और कर्मों में सबको प्रेरणा करैं। जैसे ऋत्विक् अर्थात् ऋतु-ऋतु में हवन करनेवाले लोग अग्नि में अच्छे बनाए हुए हवि अर्थात् होम करने योग्य पदार्थ को होम के संसार को प्रसन्न करते हैं, वैसे ही उत्तमगुणों से युक्त विद्यार्थी जनों में विद्या और धर्म को अच्छे प्रकार स्थापन करके सब मनुष्य आदि प्राणियों को सुखी करते हैं॥५॥

मि॒त्रस्य॑ चर्षणी॒धृतोऽवो॑ दे॒वस्य॑ सान॒सि। द्यु॒म्नं चि॒त्रश्र॑वस्तमम्॥

जो लोग अनादिकाल से सिद्ध विद्याधन का ग्रहण करके सम्पूर्ण प्रजाओं की रक्षा करते हैं, वे इसलोक और परलोक में सुख को प्राप्त होते हैं॥६॥

अ॒भि यो म॑हि॒ना दिवं॑ मि॒त्रो ब॒भूव॑ स॒प्रथाः॑। अ॒भि श्रवो॑भिः पृथि॒वीम्॥

हे मनुष्यो! जो बड़े सामर्थ्य से सूर्य्य और पृथिवी आदि विस्तार सहित संसार को रच और अन्तर्य्यामिरूप से सबको जान और धारण करके नियम में लाता है, वही उपासना करने के योग्य है॥७॥

मि॒त्राय॒ पञ्च॑ येमिरे॒ जना॑ अ॒भिष्टि॑शवसे। स दे॒वान्विश्वा॑न्बिभर्ति॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे रोके गये प्राणवायु इन्द्रियों को रोकते हैं, वैसे ही योगीजन समाधि से परमात्मा को प्राप्त होते हैं॥८॥

मि॒त्रो दे॒वेष्वा॒युषु॒ जना॑य वृ॒क्तब॑र्हिषे। इष॑ इ॒ष्टव्र॑ता अकः॥

जो परमात्मा अन्याय से रहित भक्त मनुष्यों को सिद्ध इच्छावाले करता है, वही सब लोगों को ध्यान करने योग्य है॥९॥

इ॒हेह॑ वो॒ मन॑सा ब॒न्धुता॑ नर उ॒शिजो॑ जग्मुर॒भि तानि॒ वेद॑सा। याभि॑र्मा॒याभिः॒ प्रति॑जूतिवर्पसः॒ सौध॑न्वना य॒ज्ञियं॑ भा॒गमा॑न॒श॥

जो मनुष्य इस संसार में सबके साथ भाईपन करके बुद्धि और धन से सुख बढ़ाते, वे पूर्ण मनोरथवाले होते हैं॥१॥

याभिः॒ शची॑भिश्चम॒साँ अपिं॑शत॒ यया॑ धि॒या गामरि॑णीत॒ चर्म॑णः। येन॒ हरी॒ मन॑सा नि॒रत॑क्षत॒ तेन॑ देव॒त्वमृ॑भवः॒ समा॑नश॥

हे मनुष्यो! जैसे बुद्धिमान् लोग यहाँ वर्त्ताव करें, वैसा ही वर्त्ताव करके विद्वान् होओ॥२॥

इन्द्र॑स्य स॒ख्यमृ॒भवः॒ समा॑नशु॒र्मनो॒र्नपा॑तो अ॒पसो॑ दधन्विरे। सौ॒ध॒न्व॒नासो॑ अमृत॒त्वमेरि॑रे वि॒ष्ट्वी शमी॑भिः सु॒कृतः॑ सुकृ॒त्यया॑॥

जो लोग परमेश्वर में प्रीति और उसकी आज्ञा के भङ्ग होने से भय तथा धर्म का आचरण करते हैं, वे ही मोक्ष पदवी को प्राप्त होते हैं॥३॥

इन्द्रे॑ण याथ स॒रथं॑ सु॒ते सचाँ॒ अथो॒ वशा॑नां भवथा स॒ह श्रि॒या। न वः॑ प्रति॒मै सु॑कृ॒तानि॑ वाघतः॒ सौध॑न्वना ऋभवो वी॒र्या॑णि च॥

जो विद्वान् होकर धर्मयुक्त आचरण से प्रयत्न करते हैं, वे लक्ष्मीवान् और अतुल धनों को प्राप्त होकर पराक्रमों को बढ़ाते हैं॥४॥

इन्द्र॑ ऋ॒भुभि॒र्वाज॑वद्भिः॒ समु॑क्षितं सु॒तं सोम॒मा वृ॑षस्वा॒ गभ॑स्त्योः। धि॒येषि॒तो म॑घवन्दा॒शुषो॑ गृ॒हे सौ॑धन्व॒नेभिः॑ स॒ह म॑त्स्वा॒ नृभिः॑॥

राजा को चाहिये कि बुद्धिमान् जनों के सहित प्रजाओं की रक्षा और न्याय से ऐश्वर्य की वृद्धि करके तथा राज्य के कर देनेवालों को आनन्दित करके नायकों के साथ प्रजाओं को सदैव आनन्दित करैं॥५॥

इन्द्र॑ ऋभु॒मान्वाज॑वान्मत्स्वे॒ह नो॒ऽस्मिन्त्सव॑ने॒ शच्या॑ पुरुष्टुत। इ॒मानि॒ तुभ्यं॒ स्वस॑राणि येमिरे व्र॒ता दे॒वानां॒ मनु॑षश्च॒ धर्म॑भिः॥

हे राजन्! आप सदा धर्मात्मा और बुद्धिमानों के सङ्गी और मूर्खों के सङ्ग के त्यागी होकर एक क्षण भी व्यर्थ न व्यतीत करो और जैसे यथार्थवक्ता पुरुष पक्षपात का त्याग करके सबके साथ कपटरहित वर्त्ताव करते हैं, वैसा ही वर्त्ताव करो॥६॥

इन्द्र॑ ऋ॒भुभि॑र्वा॒जिभि॑र्वा॒जय॑न्नि॒ह स्तोमं॑ जरि॒तुरुप॑ याहि य॒ज्ञिय॑म्। श॒तं केते॑भिरिषि॒रेभि॑रा॒यवे॑ स॒हस्र॑णीथो अध्व॒रस्य॒ होम॑नि॥

हे राजन्! आप इस राज्य में मनुष्यों के हित के लिये असङ्ख्य उत्तम कर्मों को करके धार्मिक मन्त्री जन और उपदेशकों के साथ यथार्थवक्ता पुरुषों से किई हुई प्रशंसा को प्राप्त होकर अगले जन्म में भी मोक्ष को प्राप्त हूजिये॥७॥इस सूक्त में राजा, मन्त्री और प्रजा के कृत्यवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह साठवाँ सूक्त और सातवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

उषो॒ वाजे॑न वाजिनि॒ प्रचे॑ताः॒ स्तोमं॑ जुषस्व गृण॒तो म॑घोनि। पु॒रा॒णी दे॑वि युव॒तिः पुर॑न्धि॒रनु॑ व्र॒तं च॑रसि विश्ववारे॥

हे स्त्रियों! जैसे प्रातर्वेला सम्पूर्ण प्राणियों को जगाय के कार्य्यों में प्रवृत्त करती हैं, वैसे ही पतिव्रता होकर पतियों के साथ अनुकूलता से वर्त्ति प्रशंसित होओ॥१॥

उषो॑ दे॒व्यम॑र्त्या॒ वि भा॑हि च॒न्द्रर॑था सू॒नृता॑ ई॒रय॑न्ती। आ त्वा॑ वहन्तु सु॒यमा॑सो॒ अश्वा॒ हिर॑ण्यवर्णां पृथु॒पाज॑सो॒ ये॥

जैसे चन्द्रमारूप रथवाली प्रातःकाल की वेला तेजस्स्वरूप होकर सबको जगाती है, वैसे ही उत्तम पण्डिता स्त्रियाँ अपने अपने पति को सेवा और विनय से सुशील करती हैं॥२॥

उषः॑ प्रती॒ची भुव॑नानि॒ विश्वो॒र्ध्वा ति॑ष्ठस्य॒मृत॑स्य के॒तुः। स॒मा॒नमर्थं॑ चरणी॒यमा॑ना च॒क्रमि॑व नव्य॒स्या व॑वृत्स्व॥

हे उत्तम स्त्रियो! जैसे प्रातःकाल सम्पूर्ण भुवनों के खण्डों को प्रकाशित करते हैं, वैसे ही उत्तम व्यवहारों को प्रकाशित करो॥३॥

अव॒ स्यूमे॑व चिन्व॒ती म॒घोन्यु॒षा या॑ति॒ स्वस॑रस्य॒ पत्नी॑। स्व१॒॑र्जन॑न्ती सु॒भगा॑ सु॒दंसा॒ आन्ता॑द्दि॒वः प॑प्रथ॒ आ पृ॑थि॒व्याः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे स्त्रियो! जैसे दिन का सम्बन्धी प्रातःकाल है, वैसे ही छाया के सदृश अपने-अपने पति के साथ अनुकूल होकर वर्त्ताव करो और जैसे यह प्रकाश पृथिवी के योग से होता है, वैसे पति और पत्नी के सम्बन्ध से सन्तान होते हैं॥४॥

अच्छा॑ वो दे॒वीमु॒षसं॑ विभा॒तीं प्र वो॑ भरध्वं॒ नम॑सा सुवृ॒क्तिम्। ऊ॒र्ध्वं म॑धु॒धा दि॒वि पाजो॑ अश्रे॒त्प्र रो॑च॒ना रु॑रुचे र॒ण्वसं॑दृक्॥

जैसे प्रातःकाल को सेवन करते हुए लोग उत्तम बल को प्राप्त होते हैं, वैसे ही स्नेहपात्र पतिव्रता स्त्री को प्राप्त होकर पुरुष शरीर आत्मबल और आरोग्यपन को प्राप्त होते हैं, जिससे दोनों के सदृश होने पर प्रेम बढ़ै॥५॥

ऋ॒ताव॑री दि॒वो अ॒र्कैर॑बो॒ध्या रे॒वती॒ रोद॑सी चि॒त्रम॑स्थात्। आ॒य॒तीम॑ग्न उ॒षसं॑ विभा॒तीं वा॒ममे॑षि॒ द्रवि॑णं॒ भिक्ष॑माणः॥

जो लोग रात्रि के चौथे पहर में जाग के ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करके उत्तमगुणों और ऐश्वर्य्य को माँगते हैं, वे पुरुषार्थ से अवश्य इसको प्राप्त होते हैं॥६॥

ऋ॒तस्य॑ बु॒ध्न उ॒षसा॑मिष॒ण्यन्वृषा॑ म॒ही रोद॑सी॒ आ वि॑वेश। म॒ही मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य मा॒या च॒न्द्रेव॑ भा॒नुं वि द॑धे पुरु॒त्रा॥

जैसे विद्वानों की वाणी और बुद्धि ऐश्वर्य्य को देनेवाली हो और विद्याओं में प्रवेश करके सुखों को देती है, वैसे ही सर्वत्र प्रविष्ट हुई बिजुली जानी हुई कार्यों में प्रयुक्त होकर ऐश्वर्य्य को उत्पन्न करती है॥७॥इस सूक्त में प्रातःकाल स्त्री बिजुली और शिल्पीजनों के गुणवर्णन करने से इसके अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह इकसठवाँ सूक्त और अष्टम वर्ग समाप्त हुआ॥

इ॒मा उ॑ वां भृ॒मयो॒ मन्य॑माना यु॒वाव॑ते॒ न तुज्या॑ अभूवन्। क्व१॒॑त्यदि॑न्द्रावरुणा॒ यशो॑ वां॒ येन॑ स्मा॒ सिनं॒ भर॑थः॒ सखि॑भ्यः॥

जो अध्यापक और उपदेशक लोग वायु और बिजुली के सदृश उपकार करनेवाले कीर्त्ति से युक्त और प्रिय आचरण करनेवाले होवैं, उनके लिये स्नेह से अन्न आदि देना और उनके साथ सदा ही मित्रता की रक्षा करनी चाहिये॥१॥

अ॒यमु॑ वां पुरु॒तमो॑ रयी॒यञ्छ॑श्वत्त॒ममव॑से जोहवीति। स॒जोषा॑विन्द्रावरुणा म॒रुद्भि॑र्दि॒वा पृ॑थि॒व्या शृ॑णुतं॒ हवं॑ मे॥

जैसे राजा, अध्यापक और उपदेशक लोग सबके रक्षा वृद्धि और विद्या में प्रवेश होने के लिये शिक्षा करते हैं, वैसे ही परस्पर की प्रशंसा से पृथिवी आदिकों में ऐश्वर्यों को प्रयत्न से प्राप्त करके परस्पर में प्रीतिवाले सब मनुष्य होओ॥२॥

अ॒स्मे तदि॑न्द्रावरुणा॒ वसु॑ ष्याद॒स्मे र॒यिर्म॑रुतः॒ सर्व॑वीरः। अ॒स्मान्वरू॑त्रीः शर॒णैर॑वन्त्व॒स्मान्होत्रा॒ भार॑ती॒ दक्षि॑णाभिः॥

हे अध्यापक, उपदेशक और राजा लोगों! जैसे हम लोग धनी लक्ष्मीवान् और विद्वान् होवैं, वैसे ही हम लोगों को प्रेरणा करो॥३॥

बृह॑स्पते जु॒षस्व॑ नो ह॒व्यानि॑ विश्वदेव्य। रास्व॒ रत्ना॑नि दा॒शुषे॑॥

हे अध्यापक! आप हम लोगों के लिये विद्याओं का सेवन करो और हे राजन्! आप विद्या देनेवाले के लिये उत्तम धन दीजिये॥४॥

शुचि॑म॒र्कैर्बृह॒स्पति॑मध्व॒रेषु॑ नमस्यत। अना॒म्योज॒ आ च॑के॥

जो मनुष्य वेदार्थ के जाननेवाले अध्यापक और उपदेशकों का नमस्कार और सत्कार करते हैं, वे पवित्र विद्वान् हुए बल को प्राप्त होते हैं॥५॥

वृ॒ष॒भं च॑र्षणी॒नां वि॒श्वरू॑प॒मदा॑भ्यम्। बृह॒स्पतिं॒ वरे॑ण्यम्॥

जैसे राजा का सत्कार करके प्रजाजन ऐश्वर्य्यवान् होते हैं, वैसे ही राजा लोग प्रजाओं का सत्कार करके कीर्त्तियुक्त होते हैं॥६॥

इ॒यं ते॑ पूषन्नाघृणे सुष्टु॒तिर्दे॑व॒ नव्य॑सी। अ॒स्माभि॒स्तुभ्यं॑ शस्यते॥

जो मनुष्य धर्मसम्बन्धी कर्मों के करने से यशस्वी हैं, उनको सुन और देख के सब लोग प्रसन्न होओ॥७॥

तां जु॑षस्व॒ गिरं॒ मम॑ वाज॒यन्ती॑मवा॒ धिय॑म्। व॒धू॒युरि॑व॒ योष॑णाम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्य लोग, जैसे स्त्री की कामना करनेवाले अपनी-अपनी प्रेमपात्र पत्नी की रक्षा और सेवा करते हैं, वैसे ही शास्त्र से युक्त वाणी का सेवन करके बुद्धि की निरन्तर सेवा करैं॥८॥

यो विश्वा॒भि वि॒पश्य॑ति॒ भुव॑ना॒ सं च॒ पश्य॑ति। स नः॑ पू॒षावि॒ता भु॑वत्॥

जो सबका रचने देखने और कर्मों के फल देनेवाला न्यायाधीश ईश्वर है, वही हम लोगों की रक्षा करने और वृद्धि करनेवाला होवै, ऐसी हम सब लोग अभिलाषा करैं॥९॥

तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि। धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त्॥

जो मनुष्य सबके साक्षी, पिता के सदृश वर्त्तमान, न्यायेश, दयालु, शुद्ध, सनातन, सबके आत्माओं के साक्षी परमात्मा की ही स्तुति और प्रार्थना करके उपासना करते हैं, उनको कृपा का समुद्र सबसे श्रेष्ठ परमेश्वर, दुष्ट आचरण से पृथक् करके श्रेष्ठ आचरण में प्रवृत्त करा और पवित्र तथा पुरुषार्थयुक्त करके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त कराता है॥१०॥

दे॒वस्य॑ सवि॒तुर्व॒यं वा॑ज॒यन्तः॒ पुर॑न्ध्या। भग॑स्य रा॒तिमी॑महे॥

मनुष्य लोग जो बुद्धि को बढ़ाय पुरुषार्थ से धर्म का अनुष्ठान कर और परमेश्वर की आज्ञा के अनुकूल वर्त्ताव करके अपनी शुद्धि के लिये प्रार्थना करैं तो ईश्वर उनको शीघ्र पवित्र और शुद्ध आचरणयुक्त करता है॥११॥

दे॒वं नरः॑ सवि॒तारं॒ विप्रा॑ य॒ज्ञैः सु॑वृ॒क्तिभिः॑। न॒म॒स्यन्ति॑ धि॒येषि॒ताः॥

जो इन्द्रियों को वश में करनेवाले विद्वान् लोग प्रेम और सत्यभाषणादिस्वरूप धर्म से परमेश्वर की उपासना करते हैं, वे सुख से युक्त होते हैं॥१२॥

सोमो॑ जिगाति गातु॒विद्दे॒वाना॑मेति निष्कृ॒तम्। ऋ॒तस्य॒ योनि॑मा॒सद॑म्॥

जो विद्वान् इस अनेक प्रकार के स्वरूपवाले संसार के कारण अव्यक्त को जानता है और इस संसार के रचनेवाले परमात्मा की प्रशंसा करता है, वही ऐश्वर्य्य से युक्त होता है॥१३॥

सोमो॑ अ॒स्मभ्यं॑ द्वि॒पदे॒ चतु॑ष्पदे च प॒शवे॑। अ॒न॒मी॒वा इष॑स्करत्॥

जो वैद्य लोग सब दो पैरवाले अर्थात् मनुष्य आदि और चौपाये गौ आदिकों को रोगरहित करैं, वे सब लोगों को मान करने योग्य होवैं॥१४॥

अ॒स्माक॒मायु॑र्व॒र्धय॑न्न॒भिमा॑तीः॒ सह॑मानः। सोमः॑ स॒धस्थ॒मास॑दत्॥

जो धार्मिक, शूरवीर पुरुष शत्रुओं का नाश और मित्रों की रक्षा करके सब सज्जनों की जीवन और विजय से वृद्धि करते हैं, उनके साथ सदैव मैत्री की सब लोगों को रक्षा करनी चाहिये॥१५॥

आ नो॑ मित्रावरुणा घृ॒तैर्गव्यू॑तिमुक्षतम्। मध्वा॒ रजां॑सि सुक्रतू॥

जो पढ़ाने और उपदेश देनेवाले से उपदेश की गई प्राण अर्थात् पवनसम्बन्धी विद्या को जानकर लोक-लोकान्तर अर्थात् एकदेश से दूसरे देश के व्यवहार से सम्पूर्ण देशों में जाना आना सिद्ध करते हैं, वे जल के सदृश शुद्ध अन्तःकरणवाले जानने योग्य हैं॥१६॥

उ॒रु॒शंसा॑ नमो॒वृधा॑ म॒ह्ना दक्ष॑स्य राजथः। द्राघि॑ष्ठाभिः शुचिव्रता॥

हे मनुष्यो! जो पवित्रता से युक्त यशस्वी जन बल ऐश्वर्य्य और अन्न आदि की वृद्धि और बड़े श्रेष्ठ कर्म्मों से लोकों में प्रकाशित होते हैं, उनकी ही सेवा और सत्कार करो॥१७॥

गृ॒णा॒ना ज॒मद॑ग्निना॒ योना॑वृ॒तस्य॑ सीदतम्। पा॒तं सोम॑मृतावृधा॥

वे ही अध्यापक और उपदेशक होने के योग्य हैं कि जो प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से पृथिवी को लेकर परमेश्वरपर्य्यन्त पदार्थों का साक्षात्कार करके सत्यविद्या के आचरण की वृद्धि जिनको प्रिय, जो धर्मयुक्त मार्ग में जावैं, वे सत्कार करने के योग्य होवैं॥१८॥इस सूक्त में मित्र अध्यापक पढ़नेवाले श्रोता उपदेशक परमात्मा विद्वान् प्राण और उदान आदि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्वसूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, ऐसा जानना चाहिये॥यह तीसरे मण्डल में बासठवाँ सूक्त पाँचवाँ अनुवाक, तीसरे अष्टक में ग्यारहवाँ वर्ग और तृतीय मण्डल समाप्त हुआ॥

मण्डलम्

सूक्तम्

त्वां ह्य॑ग्ने॒ सद॒मित्स॑म॒न्यवो॑ दे॒वासो॑ दे॒वम॑र॒तिं न्ये॑रि॒र इति॒ क्रत्वा॑ न्येरि॒रे। अम॑र्त्यं यजत॒ मर्त्ये॒ष्वा दे॒वमादे॑वं जनत॒ प्रचे॑तसं॒ विश्व॒मादे॑वं जनत॒ प्रचे॑तसम्॥

जो अध्यापक और राजा भौंहें टेढ़ी करके विद्यार्थी मन्त्री और प्रजाजनों को प्रेरणा करें तो उत्तम श्रेष्ठ विद्वान् और धार्मिक होते हैं। जो मरणधर्म वालों में मरणधर्मरहित अपने प्रकाशस्वरूप परमात्मा की उपासना करके सब मनुष्यों को बुद्धिमान् विद्वान् करते हैं, वे ही सब काल में सत्कार करने योग्य और सुखी होते हैं॥१॥

स भ्रात॑रं॒ वरु॑णमग्न॒ आ व॑वृत्स्व दे॒वाँ अच्छा॑ सुम॒तीय॒ज्ञव॑नसं॒ ज्येष्ठं॑ य॒ज्ञव॑नसम्। ऋ॒तावा॑नमादि॒त्यं च॑र्षणी॒धृतं॒ राजा॑नं चर्षणी॒धृत॑म्॥

हे अध्यापक वा राजन्! आप श्रेष्ठ श्रोतृजन वा मन्त्रियों को उत्तम मति और सत्य आचरण से संयुक्त करके संगत कर्मों का सेवन कराओ और सूर्य्य के सदृश विद्या न्याय का प्रकाश निरन्तर करो॥२॥

सखे॒ सखा॑यम॒भ्या व॑वृत्स्वा॒शुं न च॒क्रं रथ्ये॑व॒ रंह्या॒स्मभ्यं॑ दस्म॒ रंह्या॑। अग्ने॑ मृळी॒कं वरु॑णे॒ सचा॑ विदो म॒रुत्सु॑ वि॒श्वभा॑नुषु। तो॒काय॑ तु॒जे शु॑शुचान॒ शं कृ॑ध्य॒स्मभ्यं॑ दस्म॒ शं कृ॑धि॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! आप लोग सब लोगों के साथ मित्र होकर जैसे घोड़े रथ को ले चलते हैं, वैसे मित्रों को उत्तम कर्म्मों में प्रवृत्त करो और श्रेष्ठमार्ग के सदृश हम लोगों को सरल मर्य्यादा में पहुँचाइये। जो लोग इस संसार में सूर्य्य के सदृश उत्तम गुणों से युक्त हुए सब के आत्माओं को प्रकाशित करके सुख को उत्पन्न करें, वे हम लोगों से सत्कार करने योग्य होवें॥३॥

त्वं नो॑ अग्ने॒ वरु॑णस्य वि॒द्वान्दे॒वस्य॒ हेळोऽव॑ यासिसीष्ठाः। यजि॑ष्ठो॒ वह्नि॑तमः॒ शोशु॑चानो॒ विश्वा॒ द्वेषां॑सि॒ प्र मु॑मुग्ध्य॒स्मत्॥

वे ही विद्वान् जन हैं कि जो श्रेष्ठ विद्वान् पुरुष का अनादर नहीं करते हैं और वे ही अध्यापक और उपदेशक कल्याणकारी होते हैं, जो हम लोगों के दोषों को दूर करके पवित्र करते हैं, वे ही हम लोगों से सत्कार करने योग्य हैं॥४॥

स त्वं नो॑ अग्नेऽव॒मो भ॑वो॒ती नेदि॑ष्ठो अ॒स्या उ॒षसो॒ व्यु॑ष्टौ। अव॑ यक्ष्व नो॒ वरु॑णं॒ ररा॑णो वी॒हि मृ॑ळी॒कं सु॒हवो॑ न एधि॥

वह ही अध्यापक वा राजा श्रेष्ठ है कि जो उत्तम शिक्षा से हम लोगों की प्रातःकाल के सदृश रक्षा करे। दुष्ट आचरण से अलग करके श्रेष्ठ आचरण करावे॥५॥

अ॒स्य श्रेष्ठा॑ सु॒भग॑स्य सं॒दृग्दे॒वस्य॑ चि॒त्रत॑मा॒ मर्त्ये॑षु। शुचि॑ घृ॒तं न त॒प्तमघ्न्या॑याः स्पा॒र्हा दे॒वस्य॑ मं॒हने॑व धे॒नोः॥

इस मन्त्र में उपमावाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जिन राजादिकों के अग्नि से तपाये गये स्वच्छ घृत के समान विद्वान् की उत्तम शिक्षित वाणी के मधुर वचनों के समान वचन और परमेश्वर के गुण, कर्म, स्वभावों के समान गुण, कर्म, स्वभाव हैं, वे अति आश्चर्य्यरूप ऐश्वर्य्य राज्य और अद्भुत कीर्ति को प्राप्त होते हैं॥६॥

त्रिर॑स्य॒ ता प॑र॒मा स॑न्ति स॒त्या स्पा॒र्हा दे॒वस्य॒ जनि॑मान्य॒ग्नेः। अ॒न॒न्ते अ॒न्तः परि॑वीत॒ आगा॒च्छुचिः॑ शु॒क्रो अ॒र्यो रोरु॑चानः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वही उत्तम कुल उत्पन्न होता है कि जिसके उत्तम कर्म हों। और जैसे बिजुली आदि अग्नि सीमारहित अन्तरिक्ष में शोभित होता है, वैसे ही जो अनन्त जगदीश्वर का ध्यान करके सब ज्ञानवाला शुद्धियुक्त होकर सम्पूर्ण उत्तम प्रशंसा करने योग्य कर्मों के करने को समर्थ होता है॥७॥

स दू॒तो विश्वेद॒भि व॑ष्टि॒ सद्मा॒ होता॒ हिर॑ण्यरथो॒ रंसु॑जिह्वः। रो॒हिद॑श्वो वपु॒ष्यो॑ वि॒भावा॒ सदा॑ र॒ण्वः पि॑तु॒मती॑व सं॒सत्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार हैं। जैसे दूतजन राजाओं के हित करने की इच्छा करते हैं, वैसे ही जो राजाजन प्रजा का हित निरन्तर करते हैं, वे राजा और सभासद् पुण्य के भजनेवाले होते हैं॥८॥

स चे॑तय॒न्मनु॑षो य॒ज्ञब॑न्धुः॒ प्र तं म॒ह्या र॑श॒नया॑ नयन्ति। स क्षे॑त्यस्य॒ दुर्या॑सु॒ साध॑न्दे॒वो मर्त॑स्य सधनि॒त्वमा॑प॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे यथार्थवादी अध्यापक और उपदेशक लोग उत्तम शिक्षा से विद्यार्थियों के लिये धर्मयुक्त मर्य्यादा को प्राप्त कराते हैं, वैसे ही राजनीति की शिक्षा से राजा के लिये राजधर्म के मार्ग को प्राप्त करो। और जो मन्त्री और प्रजा के सहित राजा व्यसनरहित होकर प्रीति से राजधर्म को करता है, वह ऐश्वर्य्ययुक्त जन और राज्य को प्राप्त होकर सुख से निवास करता है॥९॥

स तू नो॑ अ॒ग्निर्न॑यतु प्रजा॒नन्नच्छा॒ रत्नं॑ दे॒वभ॑क्तं॒ यद॑स्य। धि॒या यद्विश्वे॑ अ॒मृता॒ अकृ॑ण्व॒न्द्यौष्पि॒ता ज॑नि॒ता स॒त्यमु॑क्षन्॥

हे राजा आदि मनुष्यों! जैसे सब जगत् का पालन और उत्पन्न करनेवाला परमात्मा दया से सब जीवों के सुख के लिये अनेक प्रकार के पदार्थों को रच और दे के अभिमान नहीं करता है, वैसे ही आप लोग होइये और ईश्वर के उत्तम गुण, कर्म्म और स्वभावों के तुल्य अपने गुण, कर्म्म और स्वभावों को करके राज्य आदि का पालन करके अन्त में मोक्ष को प्राप्त होओ॥१०॥

स जा॑यत प्रथ॒मः प॒स्त्या॑सु म॒हो बु॒ध्ने रज॑सो अ॒स्य योनौ॑। अ॒पाद॑शी॒र्षा गु॒हमा॑नो॒ अन्ता॒योयु॑वानो वृष॒भस्य॑ नी॒ळे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे अन्तरहित आकाश में प्रकृति से महत् तत्त्व अर्थात् बुद्धि आदि के क्रम से यह संसार उत्पन्न हुआ इस संसार में अवयवों से रहित मिलते हुए जीव परमात्मा के समीप में वर्त्तमान हो, गृहों में उत्पन्न होते शरीर को धारण करते और त्यागते हैं, उस सब के स्वामी का हृदय में ध्यान कर सुखी हूजिये॥११॥

प्र शर्ध॑ आर्त प्रथ॒मं वि॑प॒न्याँ ऋ॒तस्य॒ योना॑ वृष॒भस्य॑ नी॒ळे। स्पा॒र्हो युवा॑ वपु॒ष्यो॑ वि॒भावा॑ स॒प्त प्रि॒यासो॑ऽजनयन्त॒ वृष्णे॑॥

हे मनुष्यो! जैसे प्राण और अन्तःकरण कार्य के साधक और प्रिय होते हैं, वैसे ही पुरुषार्थ से कार्य्य और कारण जानकर और परमेश्वर का ज्ञान करके प्रथम अवस्था में शरीर और आत्मा के बल को प्राप्त होकर सुखों को उत्पन्न करो॥१२॥

अ॒स्माक॒मत्र॑ पि॒तरो॑ मनु॒ष्या॑ अ॒भि प्र से॑दुर्ऋ॒तमा॑शुषा॒णाः। अश्म॑व्रजाः सु॒दुघा॑ व॒व्रे अ॒न्तरुदु॒स्रा आ॑जन्नु॒षसो॑ हुवा॒नाः॥

हे मनुष्यो! जो लोग आप लोगों के पालन करनेवाले ब्रह्मचर्य्य को धारण करके जैसे सूर्य की किरणें मेघों को वर्षाती हैं, वैसे ही बुलाये हुए सत्य का प्रकाश करते हैं, उनका जो सत्कार करता है, वह भाग्यशाली होता है॥१३॥

ते म॑र्मृजत ददृ॒वांसो॒ अद्रिं॒ तदे॑षाम॒न्ये अ॒भितो॒ वि वो॑चन्। प॒श्वय॑न्त्रासो अ॒भि का॒रम॑र्चन्वि॒दन्त॒ ज्योति॑श्चकृ॒पन्त॑ धी॒भिः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो वेद, उपवेद, अङ्ग और उपाङ्गों के पार जाने और शिल्पविद्या के जाननेवाले विद्वान् लोग कृपा से सब को उत्तम प्रकार शिक्षा का उपदेश करके विद्यायुक्त करें, वे सब लोगों से सत्कार करने योग्य होवें॥१४॥

ते ग॑व्य॒ता मन॑सा दृ॒ध्रमु॒ब्धं गा ये॑मा॒नं परि॒ षन्त॒मद्रि॑म्। दृ॒ळ्हं नरो॒ वच॑सा॒ दैव्ये॑न व्र॒जं गोम॑न्तमु॒शिजो॒ वि व॑व्रुः॥

जैसे किरणें मेघ को ऊपर को प्राप्त करती और वर्षाती हैं, वैसे ही विद्वान् जन विचार से दृढ़ ज्ञान को उत्पन्न करते हैं॥१५॥

ते म॑न्वत प्रथ॒मं नाम॑ धे॒नोस्त्रिः स॒प्त मा॒तुः प॑र॒माणि॑ विन्दन्। तज्जा॑न॒तीर॒भ्य॑नूषत॒ व्रा आ॒विर्भु॑वदरु॒णीर्य॒शसा॒ गोः॥

जैसे कामधेनु दुग्ध आदि से इच्छा को पूर्ण करती है, वैसी ही विद्या और उत्तम शिक्षा से युक्त वाणी विद्वानों को प्रसन्न करती है। जो लोग धर्म का आचरण करते हैं, वे यशस्वी होकर सर्वत्र प्रसिद्ध होते हैं॥१६॥

नेश॒त्तमो॒ दुधि॑तं॒ रोच॑त॒ द्यौरुद्दे॒व्या उ॒षसो॑ भा॒नुर॑र्त। आ सूर्यो॑ बृह॒तस्ति॑ष्ठ॒दज्राँ॑ ऋ॒जु मर्ते॑षु वृजि॒ना च॒ पश्य॑न्॥

जैसे सूर्य्य प्रातर्वेला से रात्रि का निवारण करके प्रकाश को उत्पन्न करता है, वैसे ही अध्यापक और उपदेशक व्याप्त भी पदार्थों को देख के नम्रता से मनुष्यों में शरीर [और] आत्मा के बल को बढ़ावे॥१७॥

आदित्प॒श्चा बु॑बुधा॒ना व्य॑ख्य॒न्नादिद्रत्नं॑ धारयन्त॒ द्युभ॑क्तम्। विश्वे॒ विश्वा॑सु॒ दुर्या॑सु दे॒वा मित्र॑ धि॒ये व॑रुण स॒त्यम॑स्तु॥

जो लोग ब्रह्मचर्य्य से विद्या, उत्तम शिक्षा, सत्य और धर्माचरणों को धारण करके अन्य जनों के प्रति उपदेश देते हैं, वे बुद्धि को बढ़ा के सर्वत्र प्रसिद्ध हो के आनन्द से घरों में रहते हैं॥१८॥

अच्छा॑ वोचेय शुशुचा॒नम॒ग्निं होता॑रं वि॒श्वभ॑रसं॒ यजि॑ष्ठम्। शुच्यूधो॑ अतृण॒न्न गवा॒मन्धो॒ न पू॒तं परि॑षिक्तमं॒शोः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे बिजुली समान रूप हुई सब की रक्षा करती है और विरूप होनेपर नाश करती, वह किरणों का नाश नहीं करती और अन्न के सदृश पालन करनेवाली होकर सब को चलाती है, ऐसा जानें॥१९॥

विश्वे॑षा॒मदि॑तिर्य॒ज्ञिया॑नां॒ विश्वे॑षा॒मति॑थि॒र्मानु॑षाणाम्। अ॒ग्निर्दे॒वाना॒मव॑ आवृणा॒नः सु॑मृळी॒को भ॑वतु जा॒तवे॑दाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे यज्ञ के सुगन्धित धूम से शुद्ध हुआ अन्तरिक्ष पूर्णविद्यायुक्त, यथार्थवक्ता उपदेश देनेवाला पुरुष और सूर्य्य सुखदेनेवाले होते हैं, वैसे ही आप लोग सबों के लिये सुख देनेवाले हूजिये॥२०॥इस सूक्त में विद्वानों से जानने योग्य अग्नि वाणी सूर्य बिजुली आदिकों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥२०॥यह प्रथम सूक्त और पन्द्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

यो मर्त्ये॑ष्व॒मृत॑ ऋ॒तावा॑ दे॒वो दे॒वेष्व॑र॒तिर्नि॒धायि॑। होता॒ यजि॑ष्ठो म॒ह्ना शु॒चध्यै॑ ह॒व्यैर॒ग्निर्मनु॑ष ईर॒यध्यै॑॥

हे मनुष्यो! जो जगदीश्वर उत्पत्ति और नाश आदि गुणरहित होने से दिव्यस्वरूप शुद्ध और पवित्र है, उसका प्रेरणा और पवित्रता से भजन करो॥१॥

इ॒ह त्वं सू॑नो सहसो नो अ॒द्य जा॒तो जा॒ताँ उ॒भयाँ॑ अ॒न्तर॑ग्ने। दू॒त ई॑यसे युयुजा॒न ऋ॑ष्व ऋजुमु॒ष्कान्वृष॑णः शु॒क्रांश्च॑॥

हे मनुष्यो! जैसे मध्य में अग्नि सब का पालन और नाश करनेवाला है, वैसे ही इस संसार में विद्वान् पुत्र तो पालन करनेवाला और मूर्ख विनाश करनेवाला होता है। तिससे दीर्घ ब्रह्मचर्य से अपनी सन्तानों को उत्तम करके कृतकृत्यता अर्थात् जन्मसाफल्य जानो॥२॥

अत्या॑ वृध॒स्नू रोहि॑ता घृ॒तस्नू॑ ऋ॒तस्य॑ मन्ये॒ मन॑सा॒ जवि॑ष्ठा। अ॒न्तरी॑यसे अरु॒षा यु॑जा॒नो यु॒ष्मांश्च॑ दे॒वान्विश॒ आ च॒ मर्ता॑न्॥

जो मनुष्य लोग वायु और अग्नि को जलों के साथ वाहन के यन्त्रों में संयुक्त करके चलाते हैं तो वेग और प्रहरण नामक जल और भाफ के गुण, मन के सदृश वाहन आदिकों को चलाते हैं॥३॥

अ॒र्य॒मणं॒ वरु॑णं मि॒त्रमे॑षा॒मिन्द्रा॒विष्णू॑ म॒रुतो॑ अ॒श्विनो॒त। स्वश्वो॑ अग्ने सु॒रथः॑ सु॒राधा॒ एदु॑ वह सुह॒विषे॒ जना॑य॥

हे विद्वन्! आप अग्नि और जलादि पदार्थों को उत्तम प्रकार जान के और कार्य्यों में संयुक्त कर प्रत्यक्ष करके अन्य जनों के लिये उपदेश दीजिये, जिससे कि सब लोग धन धान्य और सुखों से युक्त होवें॥४॥

गोमाँ॑ अ॒ग्नेऽवि॑माँ अ॒श्वी य॒ज्ञो नृ॒वत्स॑खा॒ सद॒मिद॑प्रमृ॒ष्यः। इळा॑वाँ ए॒षो अ॑सुर प्र॒जावा॑न्दी॒र्घो र॒यिः पृ॑थुबु॒ध्नः स॒भावा॑न्॥

मनुष्यों को वही सभाध्यक्ष करना चाहिये कि जो गौओं, भेड़ों और घोड़ों का पालक और दूसरों से नहीं भय करने और दुष्ट जनों को दूर करनेवाला, अच्छे प्रबन्ध से युक्त तथा प्रजावाला हो॥५॥

यस्त॑ इ॒ध्मं ज॒भर॑त्सिष्विदा॒नो मू॒र्धानं॑ वा त॒तप॑ते त्वा॒या। भुव॒स्तस्य॒ स्वत॑वाँ पा॒युर॑ग्ने॒ विश्व॑स्मात्सीमघाय॒त उ॑रुष्य॥

हे मनुष्यो! जो लोग आप लोगों के प्रताप शरीर और राज्य की रक्षा करके दुष्टों का सब प्रकार नाश करते हैं, उनकी निरन्तर रक्षा करो॥६॥

यस्ते॒ भरा॒दन्नि॑यते चि॒दन्नं॑ नि॒शिष॑न्म॒न्द्रमति॑थिमु॒दीर॑त्। आ दे॑व॒युरि॒नध॑ते दुरो॒णे तस्मि॑न्र॒यिर्ध्रु॒वो अ॑स्तु॒ दास्वा॑न्॥

जो मनुष्य जिन मनुष्यों का जैसा उपकार करें, उन मनुष्यों को चाहिये कि उनका वैसा उपकार करें॥७॥

यस्त्वा॑ दो॒षा य उ॒षसि॑ प्र॒शंसा॑त्प्रि॒यं वा॑ त्वा कृ॒णव॑ते ह॒विष्मा॑न्। अश्वो॒ न स्वे दम॒ आ हे॒म्यावा॒न्तमंह॑सः पीपरो दा॒श्वांस॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो लोग दिन और रात्रि आप का उत्साह बढ़ावें, उनको आप लोग घास आदि से घोड़ों को जैसे वैसे आनन्द देओ॥८॥

यस्तुभ्य॑मग्ने अ॒मृता॑य॒ दाश॒द्दुव॒स्त्वे कृ॒णव॑ते य॒तस्रु॑क्। न स रा॒या श॑शमा॒नो वि यो॑ष॒न्नैन॒मंहः॒ परि॑ वरदघा॒योः॥

हे मनुष्यो! आप लोगों में जैसे जो लोग प्रीति करते हैं, वैसे ही उनमें आप लोग स्नेह करें॥९॥

यस्य॒ त्वम॑ग्ने अध्व॒रं जुजो॑षो दे॒वो मर्त॑स्य॒ सुधि॑तं॒ ररा॑णः। प्री॒तेद॑स॒द्धोत्रा॒ सा य॑वि॒ष्ठासा॑म॒ यस्य॑ विध॒तो वृ॒धासः॑॥

जो जिसके सुख को साधे उस पुरुष को चाहिये कि उस उपकार करनेवाले पुरुष को भी सुख देवें॥१०॥

चित्ति॒मचि॑त्तिं चिनव॒द्वि वि॒द्वान्पृ॒ष्ठेव॑ वी॒ता वृ॑जि॒ना च॒ मर्ता॑न्। रा॒ये च॑ नः स्वप॒त्याय॑ देव॒ दितिं॑ च॒ रास्वादि॑तिमुरुष्य॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे ऊँट आदि पीठों से भार को ले चलते हैं, वैसे ही बलवान् पुरुष सब व्यवहार के भार को धारण करते हैं और व्यवहार में जिसका खण्डन और जिसका मण्डन करने योग्य होवे, वह उसका वैसा ही करना चाहिये॥११॥

क॒विं श॑शासुः क॒वयोऽद॑ब्धा निधा॒रय॑न्तो॒ दुर्या॑स्वा॒योः। अत॒स्त्वं दृश्याँ॑ अग्न ए॒तान्प॒ड्भिः प॑श्ये॒रद्भु॑ताँ अ॒र्य एवैः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो अध्यापक और उपदेशक लोग बुद्धिमान् पुरुषों को पढ़ाते और उपदेश देते हैं, उनका सदा ही सत्कार करो, जिससे कि मनुष्य लोग आश्चर्ययुक्त गुण, कर्म और स्वभाववाले होवें॥१२॥

त्वम॑ग्ने वा॒घते॑ सु॒प्रणी॑तिः सु॒तसो॑माय विध॒ते य॑विष्ठ। रत्नं॑ भर शशमा॒नाय॑ घृष्वे पृ॒थुश्च॒न्द्रमव॑से चर्षणि॒प्राः॥

हे राजन्! जो धार्मिक शूरवीर विद्वान् लोग शत्रु के बल के उल्लङ्घन करने, परस्पर पदार्थों के घिसने से बिजुली आदि की विद्या के प्रकाश करने और मनुष्यों की रक्षा करनेवाले मन्त्री आदि नौकर होवें, उनके लिये ऐश्वर्य निरन्तर धारण करो॥१३॥

अधा॑ ह॒ यद्व॒यम॑ग्ने त्वा॒या प॒ड्भिर्हस्ते॑भिश्चकृ॒मा त॒नूभिः॑। रथं॒ न क्रन्तो॒ अप॑सा भु॒रिजो॑र्ऋ॒तं ये॑मुः सु॒ध्य॑ आशुषा॒णाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि आलस्य त्याग के शरीरादिकों से पुरुषार्थ को सदा ही करके प्रजा और राज्य का धर्म से नियम करें, जिससे सब लोग धनयुक्त होवें॥१४॥

अधा॑ मा॒तुरु॒षसः॑ स॒प्त विप्रा॒ जाये॑महि प्रथ॒मा वे॒धसो॒ नॄन्। दि॒वस्पु॒त्रा अङ्गि॑रसो भवे॒माद्रिं॑ रुजेम ध॒निनं॑ शु॒चन्तः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा लोग बुद्धिमान् मन्त्रियों का सत्कार करके रक्षा करते हैं, वे सूर्य्य के सदृश प्रकाशित यशवाले होते हैं और सभी काल में उद्योगियों की रक्षा और दुष्टों का निरन्तर ताड़न करें, जिससे कि सब शुद्ध आचरणवाले होवें॥१५॥

अधा॒ यथा॑ नः पि॒तरः॒ परा॑सः प्र॒त्नासो॑ अग्न ऋ॒तमा॑शुषा॒णाः। शुचीद॑य॒न्दीधि॑तिमुक्थ॒शासः॒ क्षामा॑ भि॒न्दन्तो॑ अरु॒णीरप॑ व्रन्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा और राजपुरुष प्रजाओं में पिता के सदृश वर्त्ताव करके सत्य, न्याय का प्रकाश कर और अविद्या को दूर करके प्रजाओं को शिक्षा देते हैं, वे पवित्र गिने जाते हैं॥१६॥

सु॒कर्मा॑णः सु॒रुचो॑ देव॒यन्तोऽयो॒ न दे॒वा जनि॑मा॒ धम॑न्तः। शु॒चन्तो॑ अ॒ग्निं व॑वृ॒धन्त॒ इन्द्र॑मू॒र्वं गव्यं॑ परि॒षद॑न्तो अग्मन्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। सब मनुष्यों को चाहिये कि धर्मयुक्त कर्मों को करके विद्या और सभा में प्रीति उत्पन्न करके पवित्रता की कामना करते हुए विद्या और जन्म से बढ़नेवाले बिजुली आदि की विद्या को बढ़ाते हुए चक्रवर्त्ती राज्य करके आनन्द का निरन्तर भोग करें॥१७॥

आ यू॒थेव॑ क्षु॒मति॑ प॒श्वो अ॑ख्यद्दे॒वानां॒ यज्जनि॒मान्त्यु॑ग्र। मर्ता॑नां चिदु॒र्वशी॑रकृप्रन्वृ॒धे चि॑द॒र्य उप॑रस्या॒योः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्यों के मध्य में राजा का जन्म वह बड़े पुण्य से उत्पन्न हुआ ऐसा जानना चाहिये। जो राजा विद्यमान न हो तो कोई भी स्वस्थता को नहीं प्राप्त हो और जैसे मेघ के समीप से सब का जीवन और वृद्धि होती है, वैसे ही राजा के समीप से सब प्रजा की वृद्धि और जीवन होता है॥१८॥

अक॑र्म ते॒ स्वप॑सो अभूम ऋ॒तम॑वस्रन्नु॒षसो॑ विभा॒तीः। अनू॑नम॒ग्निं पु॑रु॒धा सु॑श्च॒न्द्रं दे॒वस्य॒ मर्मृ॑जत॒श्चारु॒ चक्षुः॑॥

हे राजन्! जैसे सूर्य्य से उत्पन्न प्रातःकाल सब को शोभित करता है, वैसे ही ब्रह्मचर्य्य से हुए विद्वान् हम लोग आपकी आज्ञानुकूल जैसे वर्ते, वैसे ही आप हम लोगों का हित निरन्तर करो और सब हम लोग परस्पर मेल करके और अन्याय दूर करके धर्मसम्बन्धी कर्मों को प्रवृत्त करें॥१९॥

ए॒ता ते॑ अग्न उ॒चथा॑नि वे॒धोऽवो॑चाम क॒वये॒ ता जु॑षस्व। उच्छो॑चस्व कृणु॒हि वस्य॑सो नो म॒हो रा॒यः पु॑रुवार॒ प्र य॑न्धि॥

राजा को चाहिये कि यथार्थवक्ता ही पुरुषों के वचनों को सुन और उत्तम प्रकार विचार कर सेवन करें, उन यथार्थवक्ता पुरुषों के लिये प्रिय वस्तुओं को देकर वे निरन्तर सन्तुष्ट करने योग्य हैं, इस प्रकार राजा और यथार्थवक्ता पुरुषों की सभा सब मिल कर सब कर्म्मों को सिद्ध करें॥२०॥इस सूक्त में राजा, प्रजा और यथार्थवक्ता पुरुष के कृत्यवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥२०॥यह द्वितीय सूक्त और उन्नीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ वो॒ राजा॑नमध्व॒रस्य॑ रु॒द्रं होता॑रं सत्य॒यजं॒ रोद॑स्योः। अ॒ग्निं पु॒रा त॑नयि॒त्नोर॒चित्ता॒द्धिर॑ण्यरूप॒मव॑से कृणुध्वम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वान् लोगो! राजा और प्रजाजनों के साथ एक सम्मति करके जैसे ईश्वर ने ब्रह्माण्ड के मध्य में सूर्य्य को स्थित करके सब का प्रियसुख साधन किया, वैसे ही हम लोगों के मध्य में उत्तम गुण, कर्म और स्वभावयुक्त को राजा करके हम लोगों के हित को आप लोग सिद्ध करो, जिससे आप लोगों का भी प्रिय सिद्ध होवे॥१॥

अ॒यं योनि॑श्चकृ॒मा यं व॒यं ते॑ जा॒येव॒ पत्य॑ उश॒ती सु॒वासाः॑। अ॒र्वा॒ची॒नः परि॑वीतो॒ नि षी॑दे॒मा उ॑ ते स्वपाक प्रती॒चीः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजा को चाहिये कि ऐसा गृह बनावे कि जो पतिव्रता सुन्दरी मन की प्यारी स्त्री के सदृश सब ऋतुओं में सुख देवे और वहाँ स्थित हुआ ऐसे कर्म करे कि जिन कर्मों से अपनी प्रजा अनुरक्त होवें॥२॥

आ॒शृ॒ण्व॒ते अदृ॑पिताय॒ मन्म॑ नृ॒चक्ष॑से सुमृळी॒काय॑ वेधः। दे॒वाय॑ श॒स्तिम॒मृता॑य शंस॒ ग्रावे॑व॒ सोता॑ मधु॒षुद्यमी॒ळे॥

वह ही राजा उत्तम होता है कि जो मोह आदि दोषों से रहित होकर सब वचनों का सुनने, सत्य और असत्य का देखने और मेघ के सदृश प्रजा में अनेक प्रकार का भोग प्राप्त करानेवाला न्यायाधीश होवे॥३॥

त्वं चि॑न्नः॒ शम्या॑ अग्ने अ॒स्या ऋ॒तस्य॑ बोध्यृतचित्स्वा॒धीः। क॒दा त॑ उ॒क्था स॑ध॒माद्या॑नि क॒दा भ॑वन्ति स॒ख्या गृ॒हे ते॑॥

हे राजन्! आप जब प्रजा के सत्य न्याय को करेंगे, तब ही आपकी आज्ञा के अनुकूल वर्त्ताव करके प्रजा एकसम्मति से होंगीं॥४॥

क॒था ह॒ तद्वरु॑णाय॒ त्वम॑ग्ने क॒था दि॒वे ग॑र्हसे॒ कन्न॒ आगः॑। क॒था मि॒त्राय॑ मी॒ळ्हुषे॑ पृथि॒व्यै ब्रवः॒ कद॑र्य॒म्णे कद्भगा॑य॥

हे विद्वानो! जो राजा श्रेष्ठ वा विद्वानों की निन्दा करे, वह आप लोगों से रोकने योग्य है और सब राजकर्मों की सिद्धि के लिये समयव्यवस्था करनी चाहिये और जब-जब जो-जो कर्म करना हो तब-तब वह-वह कर्म करना चाहिये। इस प्रकार राजा को उपदेश करना चाहिये, जब मित्रद्रोह का आचरण करे तभी उसको शिक्षा देनी चाहिये, ऐसा करने पर राजा और प्रजा दोनों की निरन्तर उन्नति होवे॥५॥

कद्धिष्ण्या॑सु वृधसा॒नो अ॑ग्ने॒ कद्वाता॑य॒ प्रत॑वसे शुभं॒ये। परि॑ज्मने॒ नास॑त्याय॒ क्षे ब्रवः॒ कद॑ग्ने रु॒द्राय॑ नृ॒घ्ने॥

राजा आदि अध्यक्षों के प्रति अध्यापक, उपदेशक और मन्त्रीजन ऐसा उपदेश देवें कि आप लोग बुद्धि के कामों में वृद्ध, बलिष्ठ, उत्तम आचरणवाले, सत्यवादी और दुष्ट पुरुषों के नाश करनेवाले कब होओगे और उत्तम आचरण करने और दुष्ट आचरण के त्याग में विलम्ब न करो॥६॥

क॒था म॒हे पु॑ष्टिंभ॒राय॑ पू॒ष्णे कद्रु॒द्राय॒ सुम॑खाय हवि॒र्दे। कद्विष्ण॑व उरुगा॒याय॒ रेतो॒ ब्रवः॒ कद॑ग्ने॒ शर॑वे बृह॒त्यै॥

अध्यापक लोगों को विद्यार्थियों को पढ़ा के प्रत्येक अठवाड़े, प्रत्येक पक्ष, प्रतिमास, प्रतिछमाही और प्रतिवर्ष परीक्षा यथायोग्य करनी चाहिये, जिससे कि राजकुमारादि सब भ्रमरहित, ज्ञानविशिष्ट, उत्तमस्वभावयुक्त शरीर और आत्मा के बल सहित धर्मिष्ठ सौ वर्ष जीने और न्याय से राज्य के पालन करनेवाले होवें॥७॥

क॒था शर्धा॑य म॒रुता॑मृ॒ताय॑ क॒था सू॒रे बृ॑ह॒ते पृ॒च्छ्यमा॑नः। प्रति॑ ब्र॒वोऽदि॑तये तु॒राय॒ साधा॑ दि॒वो जा॑तवेदश्चिकि॒त्वान्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा लोग वायु के सदृश अपने बल को बढ़ाते, योधा लोगों के शिक्षक और परीक्षकों का सत्कार करते और प्रश्नोत्तर से सब को जान उनके द्वारा कार्य सिद्ध करते हैं, वे सूर्य्य के सदृश ऐश्वर्य के प्रकाशक होते हैं॥८॥

ऋ॒तेन॑ ऋ॒तं निय॑तमीळ॒ आ गोरा॒मा सचा॒ मधु॑मत्प॒क्वम॑ग्ने। कृ॒ष्णा स॒ती रुश॑ता धा॒सिनै॒षा जाम॑र्येण॒ पय॑सा पीपाय॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य ब्रह्मचर्य से विद्या और उत्तम शिक्षा को प्राप्त होके और धर्मयुक्त व्यवहार से धर्म का अन्वेषण और इन्द्रियजित् होने से नियम से भोजन करनेवाले होकर पुरुषार्थ करते हैं, वे स्नेही स्त्री और पुरुष के सदृश आनन्दित होकर सब प्रकार वृद्धि को प्राप्त होते हैं॥९॥

ऋ॒तेन॒ हि ष्मा॑ वृष॒भश्चि॑द॒क्तः पुमाँ॑ अ॒ग्निः पय॑सा पृ॒ष्ठ्ये॑न। अस्प॑न्दमानो अचरद्वयो॒धा वृषा॑ शु॒क्रं दु॑दुहे॒ पृश्नि॒रूधः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे पृथिवी के अर्द्धभाग में बिजुली सूर्य रूप से शोभित होती है और दूसरे भाग में रात्रि के समय छिपी हुई चलती है, वैसे ही शयन और जागरण नियम से कर और पुरुषार्थ करके वीर्य बढ़ाय के सौ वर्ष की अवस्थायुक्त हुए सब को आनन्द दीजिये॥१०॥

ऋ॒तेनाद्रिं॒ व्य॑सन्भि॒दन्तः॒ समङ्गि॑रसो नवन्त॒ गोभिः॑। शु॒नं नरः॒ परि॑ षदन्नु॒षास॑मा॒विः स्व॑रभवज्जा॒ते अ॒ग्नौ॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा आदि वीर क्षत्रिय जैसे पवन से युक्त बिजुलियाँ मेघ को इधर-उधर चलाय और तोड़ पृथिवी पर गिरा के सब को सुख देती हैं और दूसरी बिजुली का विलोडन करके सूर्य्य को उत्पन्न करती हैं, वैसे ही दुष्ट पुरुषों का नाश और न्याय का प्रकाश, बुद्धि का विलोडन और विद्या को उत्पन्न करके सूर्य्य के सदृश प्रकाशमान हुए अतुल सुख को प्राप्त होओ॥११॥

ऋ॒तेन॑ दे॒वीर॒मृता॒ अमृ॑क्ता॒ अर्णो॑भि॒रापो॒ मधु॑मद्भिरग्ने। वा॒जी न सर्गे॑षु प्रस्तुभा॒नः प्र सद॒मित्स्रवि॑तवे दधन्युः॥

इस मन्त्र में उपमा [और] वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो! जैसे शुद्ध जल सुखकारी और अशुद्ध दुःख देनेवाले होते हैं, वैसे ही उत्तम गुणों का सङ्ग आनन्ददायक और दोषों का सङ्ग दुःख देनेवाला होता है। और जैसे ऐश्वर्य्ययुक्त धार्मिकजन कृपा से बुभुक्षित आदि का पालन करता है, वैसे ही सज्जन लोग सब की रक्षा करते हैं॥१२॥

मा कस्य॑ य॒क्षं सद॒मिद्धु॒रो गा॒ मा वे॒शस्य॑ प्रमिन॒तो मापेः। मा भ्रातु॑रग्ने॒ अनृ॑जोर्ऋ॒णं वे॒र्मा सख्यु॒र्दक्षं॑ रि॒पोर्भु॑जेम॥

उन्हीं लोगों को बुद्धिमान् समझना चाहिये कि जो अन्याय से किसी का वस्तु, दुष्टवेश, हिंसा करनेवाले का सङ्ग, न्याय से प्राप्त हुए धन का व्यर्थ खर्च, दुष्ट बन्धु का सङ्ग और शत्रु का विश्वास नहीं करके आनन्द का भोग करें॥१३॥

रक्षा॑ णो अग्ने॒ तव॒ रक्ष॑णेभी रारक्षा॒णः सु॑मख प्रीणा॒नः। प्रति॑ ष्फुर॒ वि रु॑ज वी॒ड्वंहो॑ ज॒हि रक्षो॒ महि॑ चिद्वावृधा॒नम्॥

वे ही राजा लोग यश के भागी हैं कि जो दुष्ट पुरुषों की दुष्टता को दूर कर और श्रेष्ठ पुरुषों की श्रेष्ठता बढ़ा के राज्य का निरन्तर पिता के समान अर्थात् पिता अपने पुत्र की पालना करता, वैसे पालन करें॥१४॥

ए॒भिर्भ॑व सु॒मना॑ अग्ने अ॒र्कैरि॒मान्त्स्पृ॑श॒ मन्म॑भिः शूर॒ वाजा॑न्। उ॒त ब्रह्मा॑ण्यङ्गिरो जुषस्व॒ सं ते॑ श॒स्तिर्दे॒ववा॑ता जरेत॥

हे राजन्! आप यथार्थवक्ता विद्वानों का सङ्ग निरन्तर करिये और उनके उपदेश से न्यायपूर्वक राज्य का पालन करके प्रशंसित हूजिये॥१५॥

ए॒ता विश्वा॑ वि॒दुषे॒ तुभ्यं॑ वेधो नी॒थान्य॑ग्ने नि॒ण्या वचां॑सि। नि॒वच॑ना क॒वये॒ काव्या॒न्यशं॑सिषं म॒तिभि॒र्विप्र॑ उ॒क्थैः॥

वही निश्चित प्रशंसा जानने योग्य है कि जो धार्मिक विद्वानों से की जाय। अध्यापक और उपदेशक जनों को चाहिये कि पढ़ने और उपदेश देनेवालों को सदा ही सत्यवादी और विद्वान् करें॥१६॥इस सूक्त में अग्नि, राजा और प्रज्जदिकों के कृत्य और गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥१६॥यह तीसरा सूक्त और बाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

कृ॒णु॒ष्व पाजः॒ प्रसि॑तिं॒ न पृ॒थ्वीं या॒हि राजे॒वाम॑वाँ॒ इभे॑न। तृ॒ष्वीमनु॒ प्रसि॑तिं द्रूणा॒नोऽस्ता॑सि॒ विध्य॑ र॒क्षस॒स्तपि॑ष्ठैः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजसम्बन्धी जनो! आप लोग पृथिवी के सदृश दृढ़ बल करके, राजा के सदृश न्यायाधीश होकर, पिपासित मृगी के पीछे दौड़ते हुए भेड़िये के सदृश दुष्ट डाकू जो कि अनुधावन करते अर्थात् जो कि पथिकादिकों के पीछे दौड़ते हुए, उनका नाश करो॥१॥

तव॑ भ्र॒मास॑ आशु॒या प॑त॒न्त्यनु॑ स्पृश धृष॒ता शोशु॑चानः। तपूं॑ष्यग्ने जु॒ह्वा॑ पत॒ङ्गानसं॑दितो॒ वि सृ॑ज॒ विष्व॑गु॒ल्काः॥

जो राजजन फुरतीवाले होते हुए शीघ्र कार्य्यकारी हों, वे अखण्डितवीर्य्य अर्थात् पूर्णबलवाले होकर बिजुली के प्रयोगों और ब्रह्मास्त्र आदि अस्त्रों को शत्रुओं के ऊपर कर विजय को प्राप्त हों॥२॥

प्रति॒ स्पशो॒ वि सृ॑ज॒ तूर्णि॑तमो॒ भवा॑ पा॒युर्वि॒शो अ॒स्या अद॑ब्धः। यो नो॑ दू॒रे अ॒घशं॑सो॒ यो अन्त्यग्ने॒ माकि॑ष्टे॒ व्यथि॒रा द॑धर्षीत्॥

हे राजन्! आप उत्तम गुणों को ग्रहण करके और प्रजा का पालन करके जो दूर और समीप में वर्त्तमान डाकू आदि दुष्ट पुरुष उनका नाश करो, जिससे सब को सुख हो॥३॥

उद॑ग्ने तिष्ठ॒ प्रत्या त॑नुष्व॒ न्य१॒॑मित्राँ॑ ओषतात्तिग्महेते। यो नो॒ अरा॑तिं समिधान च॒क्रे नी॒चा तं ध॑क्ष्यत॒सं न शुष्क॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि आलस्य त्याग के पुरुषार्थ का विस्तार करके शत्रुओं को जलावें और अन्धकूप के सदृश कारागृह में उनका बन्धन करें और नीचता को प्राप्त करे [=करायें]। जो लोग ऐसा करते हैं, उनकी राजा गुरु के सदृश सेवा करे॥४॥

ऊ॒र्ध्वो भ॑व॒ प्रति॑ वि॒ध्याध्य॒स्मदा॒विष्कृ॑णुष्व॒ दैव्या॑न्यग्ने। अव॑ स्थि॒रा त॑नुहि यातु॒जूनां॑ जा॒मिमजा॑मिं॒ प्र मृ॑णीहि॒ शत्रू॑न्॥

जो मनुष्य अपने से उत्कृष्ट अर्थात् श्रेष्ठों को देख के प्रसन्न होते, अनुत्कृष्ट अर्थात् दुःखियों को देख के शोक करते, भोगयुक्तों को देख के आनन्दित होते और भोगरहितों को देख के अप्रसन्न होते, वे ही राजकर्मों में स्थिर होते हैं॥५॥

स ते॑ जानाति सुम॒तिं य॑विष्ठ॒ य ईव॑ते॒ ब्रह्म॑णे गा॒तुमैर॑त्। विश्वा॑न्यस्मै सु॒दिना॑नि रा॒यो द्यु॒म्नान्य॒र्यो वि दुरो॑ अ॒भि द्यौ॑त्॥

हे राजन्! जो लोग नित्य मङ्गल आचरण करनेवाले यशयुक्त अनुरक्त अर्थात् स्नेही शूरवीर और राज्यव्यवहार के जाननेवाले आपको चितावें, उनको आप मित्र जानिये॥६॥

सेद॑ग्ने अस्तु सु॒भगः॑ सु॒दानु॒र्यस्त्वा॒ नित्ये॑न ह॒विषा॒ य उ॒क्थैः। पिप्री॑षति॒ स्व आयु॑षि दुरो॒णे विश्वेद॑स्मै सु॒दिना॒ सास॑दि॒ष्टिः॥

हे राजन्! जो लोग नित्य प्रेम से न्याय और विनय के द्वारा राज्य की उन्नति करते और राजा और प्रजा के उपद्रव के विना मङ्गल समय सदा ही प्राप्त कराते हैं, वे राजगृह में अध्यक्ष हों॥७॥

अर्चा॑मि ते सुम॒तिं घोष्य॒र्वाक्सं ते॑ वा॒वाता॑ जरतामि॒यं गीः। स्वश्वा॑स्त्वा सु॒रथा॑ मर्जयेमा॒स्मे क्ष॒त्राणि॑ धारये॒रनु॒ द्यून्॥

जब राजा सभास्थ जनों को पूँछै कि इस अधिकार में कौन पुरुष रखने योग्य है, तब सम्पूर्ण जन धार्मिक योग्य पुरुष के नियत करने में सम्मति देवें। और राजा को भी चाहिये कि योग्य ही पुरुषों को राजकर्म में नियत करे, जिससे कि नित्य प्रशंसा बढ़े॥८॥

इ॒ह त्वा॒ भूर्या च॑रे॒दुप॒ त्मन्दोषा॑वस्तर्दीदि॒वांस॒मनु॒ द्यून्। क्रीळ॑न्तस्त्वा सु॒मन॑सः सपेमा॒भि द्यु॒म्ना त॑स्थि॒वांसो॒ जना॑नाम्॥

हे राजन्! जो आप दुर्व्यसनों का त्याग करके धर्म्मसम्बन्धी कर्म्मों को करें तो हम लोग आपके भक्त निरन्तर होवें, जो अन्याय करो तो आप का शीघ्र त्याग करें॥९॥

यस्त्वा॒ स्वश्वः॑ सुहिर॒ण्यो अ॑ग्न उप॒याति॒ वसु॑मता॒ रथे॑न। तस्य॑ त्रा॒ता भ॑वसि॒ तस्य॒ सखा॒ यस्त॑ आति॒थ्यमा॑नु॒षग्जुजो॑षत्॥

हे राजन्! जो आपके राज्य के उपकार करने और सत्कार करनेवाले हों, उनके ही मित्र और रक्षा करनेवाले हुए चकवर्त्ती हूजिये॥१०॥

म॒हो रु॑जामि ब॒न्धुता॒ वचो॑भि॒स्तन्मा॑ पि॒तुर्गोत॑मा॒दन्वि॑याय। त्वं नो॑ अ॒स्य वच॑सश्चिकिद्धि॒ होत॑र्यविष्ठ सुक्रतो॒ दमू॑नाः॥

हे कुमार और कुमारियो! जैसे हम लोग माता-पिता और आचार्य्य से उत्तम शिक्षा और विद्या [को] प्राप्त होकर आनन्दित होवें, वैसे आप लोग भी हूजिये॥११॥

अस्व॑प्नजस्त॒रण॑यः सु॒शेवा॒ अत॑न्द्रासोऽवृ॒का अश्र॑मिष्ठाः। ते पा॒यवः॑ स॒ध्र्य॑ञ्चो नि॒षद्याग्ने॒ तव॑ नः पान्त्वमूर॥

प्रजाजनों को चाहिये कि सदा ही राजा को उपदेश देवें कि हे राजन्! आपकी ओर से हम लोगों की रक्षा में धार्मिक आलस्यरहित पुरुषार्थी और बलवान् जन नियत हों॥१२॥

ये पा॒यवो॑ मामते॒यं ते॑ अग्ने॒ पश्य॑न्तो अ॒न्धं दु॑रि॒तादर॑क्षन्। र॒रक्ष॒ तान्त्सु॒कृतो॑ वि॒श्ववे॑दा॒ दिप्स॑न्त॒ इद्रि॒पवो॒ नाह॑ देभुः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! जो लोग अपने के सदृश अन्य जनों और आपके पदार्थ को जानते हैं और अपने आत्मा के सदृश अन्यों की रक्षा करते हैं, वे ही यथार्थवक्ता आपके सेवक हों, जिससे कि शत्रुओं का बल नष्ट होवे॥१३॥

त्वया॑ व॒यं स॑ध॒न्य१॒॑स्त्वोता॒स्तव॒ प्रणी॑त्यश्याम॒ वाजा॑न्। उ॒भा शंसा॑ सूदय सत्यतातेऽनुष्ठु॒या कृ॑णुह्यह्रयाण॥

सब नौकरों को चाहिये कि राजा के साथ मित्रता और राजा को चाहिये कि सब लोगों के साथ पिता के सदृश वर्त्ताव रखे और परस्पर एक-दूसरे की प्रशंसा कर दोषों का नाश और सत्यनीति का प्रचार करके जिस-जिस कर्म्म में लज्जा हो, उस उसका त्यागकर चक्रवर्त्ती राज्य का भोग करें॥१४॥

अ॒या ते॑ अग्ने स॒मिधा॑ विधेम॒ प्रति॒ स्तोमं॑ श॒स्यमा॑नं गृभाय। दहा॒शसो॑ र॒क्षसः॑ पा॒ह्य१॒॑स्मान्द्रु॒हो नि॒दो मि॑त्रमहो अव॒द्यात्॥

जो राजा और मन्त्री जन परस्पर सम्मत हुए नम्रता से राज्य की शिक्षा करते हैं तो द्वेष निन्दा और अधर्माचरण से अलग होकर उत्तम शिष्टाचार करते हुए दशों दिशाओं में यश को फैलाते हैं॥१५॥इस सूक्त में राजा और प्रजा के कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥१५॥यह चतुर्थ मण्डल में चतुर्थ सूक्त और तीसरे अष्टक में पच्चीसवाँ वर्ग और चौथा अध्याय समाप्त हुआ॥

वै॒श्वा॒न॒राय॑ मी॒ळ्हुषे॑ स॒जोषाः॑ क॒था दा॑शेमा॒ग्नये॑ बृ॒हद्भाः। अनू॑नेन बृह॒ता व॒क्षथे॒नोप॑ स्तभायदुप॒मिन्न रोधः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग सूर्य और बिजुली के सदृश उत्तम गुणों के प्रकाश करने और जल के रोकनेवाले पदार्थ के सदृश दुष्टों के रोकनेवाले और अपने सदृश सुख, दुःख, हानि और लाभ को जानते हुए राज्य करते हैं, वे दण्ड और न्याय को चला सकते हैं॥१॥

मा नि॑न्दत॒ य इ॒मां मह्यं॑ रा॒तिं दे॒वो द॒दौ मर्त्या॑य स्व॒धावा॑न्। पाका॑य॒ गृत्सो॑ अ॒मृतो॒ विचे॑ता वैश्वान॒रो नृत॑मो य॒ह्वो अ॒ग्निः॥

हे राजा और प्रजाजनो! जो अग्नि आदि के गुणों से युक्त और सब के लिये सुख देनेवाला राजा उत्तम गुणवाला होवे, उसकी निन्दा और दुष्ट की प्रशंसा कभी मत करो॥२॥

साम॑ द्वि॒बर्हा॒ महि॑ ति॒ग्मभृ॑ष्टिः स॒हस्र॑रेता वृष॒भस्तुवि॑ष्मान्। प॒दं न गोरप॑गूळ्हं विवि॒द्वान॒ग्निर्मह्यं॒ प्रेदु॑ वोचन्मनी॒षाम्॥

इस मन्त्र में उपमा [और] वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। वही श्रेष्ठ विद्वान् है कि जो सब के लिये यथार्थज्ञान करावे। जैसे गौ के पैरों के चिह्न को खोज के गौ को प्राप्त होता है, वैसे ही पदार्थविद्या प्राप्त करने योग्य है॥३॥

प्र ताँ अ॒ग्निर्ब॑भसत्ति॒ग्मज॑म्भ॒स्तपि॑ष्ठेन शो॒चिषा॒ यः सु॒राधाः॑। प्र ये मि॒नन्ति॒ वरु॑णस्य॒ धाम॑ प्रि॒या मि॒त्रस्य॒ चेत॑तो ध्रु॒वाणि॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रदीप्त अग्नि प्राप्त हुए शुष्क और गीले पदार्थ को जलाता है, वैसे ही जो पुरुष अपने प्रयोजनसाधक स्वार्थी और अन्य पुरुष के सुखनाश करनेवालों को नाश करता है, वह प्रशंसित होता है॥४॥

अ॒भ्रा॒तरो॒ न योष॑णो॒ व्यन्तः॑ पति॒रिपो॒ न जन॑यो दु॒रेवाः॑। पा॒पासः॒ सन्तो॑ अनृ॒ता अ॑स॒त्या इ॒दं प॒दम॑जनता गभी॒रम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो स्त्री भाई के सदृश अनुकूल नहीं और जो अनुकूल हो तो शत्रु के सदृश विरोध करनेवाली हो और जो घोर पापीजन सब के पीड़ा देनेवाले हों, उनका दूर से त्याग करो॥५॥

इ॒दं मे॑ अग्ने॒ किय॑ते पाव॒कामि॑नते गु॒रुं भा॒रं न मन्म॑। बृ॒हद्द॑धाथ धृष॒ता ग॑भी॒रं य॒ह्वं पृ॒ष्ठं प्रय॑सा स॒प्तधा॑तु॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो अल्पज्ञ और विद्यार्थीजन ज्ञानी विद्वान् के समीप से विज्ञान और धन के साधन की याचना करते हैं, वे विद्वान् होते हैं॥६॥

तमिन्न्वे॒३॒॑व स॑म॒ना स॑मा॒नम॒भि क्रत्वा॑ पुन॒ती धी॒तिर॑श्याः। स॒सस्य॒ चर्म॒न्नधि॒ चारु॒ पृश्ने॒रग्रे॑ रु॒प आरु॑पितं॒ जबा॑रु॥

जो कन्या अपने समान वर और ब्रह्मचारी अपने तुल्य कन्या के साथ विवाह करे तो अन्तरिक्ष के मध्य में ईश्वर से स्थापित सूर्य्य चन्द्रमा और नक्षत्रों के तुल्य शोभित होते हैं॥७॥

प्र॒वाच्यं॒ वच॑सः॒ किं मे॑ अ॒स्य गुहा॑ हि॒तमुप॑ नि॒णिग्व॑दन्ति। यदु॒स्रिया॑णा॒मप॒ वारि॑व॒ व्रन्पाति॑ प्रि॒यं रु॒पो अग्रं॑ प॒दं वेः॥

हे विद्वानो! मेरी और इस जन की बुद्धि में वर्त्तमान चेतन क्या और कैसा है? जो पशुओं के पालन करनेवाला जल के सदृश रक्षा करता और सब से प्रिय देख पड़ता है। और जो आकाश में पक्षी के पैर के सदृश गुप्त है, उसके विज्ञान के लिये हम लोगों के प्रति आप लोग क्या कहते हो॥८॥

इ॒दमु॒ त्यन्महि॑ म॒हामनी॑कं॒ यदु॒स्रिया॒ सच॑त पू॒र्व्यं गौः। ऋ॒तस्य॑ प॒दे अधि॒ दीद्या॑नं॒ गुहा॑ रघु॒ष्यद्र॑घु॒यद्वि॑वेद॥

हे श्रोताजनो! जो बुद्धि की प्रेरणा करने, मन्द और शीघ्र चलनेवाला सत्य परमेश्वर के मध्य में प्रकाशमान बलिष्ठ वाज पक्षी [सेना] के सदृश पराक्रमवाले बछड़े को सुख देती हुई गौ के सदृश सुख देनेवाला वस्तु है, वही आप लोगों का स्वरूप है॥९॥

अध॑ द्युता॒नः पि॒त्रोः सचा॒साम॑नुत॒ गुह्यं॒ चारु॒ पृश्नेः॑। मा॒तुष्प॒दे प॑र॒मे अन्ति॒ षद्गोर्वृष्णः॑ शो॒चिषः॒ प्रय॑तस्य जि॒ह्वा॥

जैसे अन्तरिक्ष और पृथिवी के मध्य में वर्त्तमान सूर्य्य उत्तम प्रकार शोभित है और जैसे विद्वान् की वाणी विद्या का प्रकाश करनेवाली है और जैसे अन्तरिक्ष किसी से भी दूर नहीं है, वैसे ही उत्तम अपना आत्मारूप वस्तु और परमात्मा समीप में वर्त्तमान है, ऐसा जानना चाहिये॥१०॥

ऋ॒तं वो॑चे॒ नम॑सा पृ॒च्छ्यमा॑न॒स्तवा॒शसा॑ जातवेदो॒ यदी॒दम्। त्वम॒स्य क्ष॑यसि॒ यद्ध॒ विश्वं॑ दि॒वि यदु॒ द्रवि॑णं॒ यत्पृ॑थि॒व्याम्॥

हे मनुष्यो! जो ब्रह्म सब स्थान में व्याप्त है और जिसमें सम्पूर्ण पदार्थ वसते हैं, उस सत्यस्वरूप का आप लोगों के प्रति मैं उपदेश करता हूँ, उसी की उपासना करो॥११॥

किं नो॑ अ॒स्य द्रवि॑णं॒ कद्ध॒ रत्नं॒ वि नो॑ वोचो जातवेदश्चिकि॒त्वान्। गुहाध्व॑नः पर॒मं यन्नो॑ अ॒स्य रेकु॑ प॒दं न नि॑दा॒ना अग॑न्म॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वानो! हम लोगों में क्या यश? क्या सुन्दर वस्तु? और कौन लोग हम लोगों की निन्दा करनेवाले? और क्या शङ्का करने योग्य वस्तु? और क्या प्राप्त होने योग्य स्थान है? इनके उत्तर कहो॥१२॥

का म॒र्यादा॑ व॒युना॒ कद्ध॑ वा॒ममच्छा॑ गमेम र॒घवो॒ न वाज॑म्। क॒दा नो॑ दे॒वीर॒मृत॑स्य॒ पत्नीः॒ सूरो॒ वर्णे॑न ततनन्नु॒षासः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्य लोग यथार्थवादी विद्वान् से मनुष्य के करने योग्य कर्म्मों और प्राप्त होने योग्य स्थान को पूछें कि आप सूर्य्य में प्रातःकाल के सदृश हम लोगों को कब विद्वान् करोगे? ऐसा पूछें॥१३॥

अ॒नि॒रेण॒ वच॑सा फ॒ल्ग्वे॑न प्र॒तीत्ये॑न कृ॒धुना॑तृ॒पासः॑। अधा॒ ते अ॑ग्ने॒ किमि॒हा व॑दन्त्यनायु॒धास॒ आस॑ता सचन्ताम्॥

जो श्रोता लोग उपदेश से उत्तर को प्राप्त हुए सन्तुष्ट न होवें, वे तब तक पूछें, जब कि समाधान को प्राप्त होवें, तब उस कर्म का आरम्भ करें॥१४॥

अ॒स्य श्रि॒ये स॑मिधा॒नस्य॒ वृष्णो॒ वसो॒रनी॑कं॒ दम॒ आ रु॑रोच। रुश॒द्वसा॑नः सु॒दृशी॑करूपः क्षि॒तिर्न रा॒या पु॑रु॒वारो॑ अद्यौत्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो अच्छे रूपवान् पृथिवी के सदृश क्षमा आदि गुणवाले और प्रतिष्ठित चक्रवर्त्ती राजाओं की लक्ष्मी से शोभित हुए उत्तम प्रकार शिक्षित बड़ी बलवती बड़ी सेना को बढ़ाते हैं, उनका ही चक्रवर्त्ती राज्य संभावित होता है औरों का नहीं॥१५॥इस सूक्त में बुद्धिमान्, राजा, अध्यापक, उपदेशक, प्रश्नकर्ता और समाधानकर्ता के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥१५॥यह पाँचवाँ सूक्त और तीसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

ऊ॒र्ध्व ऊ॒ षु णो॑ अध्वरस्य होत॒रग्ने॒ तिष्ठ॑ दे॒वता॑ता॒ यजी॑यान्। त्वं हि विश्व॑म॒भ्यसि॒ मन्म॒ प्र वे॒धस॑श्चित्तिरसि मनी॒षाम्॥

हे मनुष्यो! जो लोग विद्वानों के समीप से विद्याओं को प्राप्त होकर सब के रक्षा करने और बुद्धि देनेवाले होवें, उन्हीं लोगों की प्रतिष्ठा करो॥१॥

अमू॑रो॒ होता॒ न्य॑सादि वि॒क्ष्व१॒॑ग्निर्म॒न्द्रो वि॒दथे॑षु॒ प्रचे॑ताः। ऊ॒र्ध्वं भा॒नुं स॑वि॒तेवा॑श्रे॒न्मेते॑व धू॒मं स्त॑भाय॒दुप॒ द्याम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य सूर्य्य के सदृश प्रतापी अग्नि के सदृश दुष्टों के दाहक और न्याय और नम्रता से प्रजाओं में चन्द्रमा के सदृश संग्राम में जीतनेवाले राजा को संस्थापित करें तो कभी दुःख को न प्राप्त होवें॥२॥

य॒ता सु॑जू॒र्णी रा॒तिनी॑ घृ॒ताची॑ प्रदक्षि॒णिद्दे॒वता॑तिमुरा॒णः। उदु॒ स्वरु॑र्नव॒जा नाक्रः प॒श्वो अ॑नक्ति॒ सुधि॑तः सु॒मेकः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। उपदेशक लोग रात्रि और दिन में सभों के करने योग्य सेवा का उपदेश देवें, जिससे कि शयन जागरण आदि से युक्त आहार और विहारों को करके अपने हितों को सिद्ध करनेवाले होवें॥३॥

स्ती॒र्णे ब॒र्हिषि॑ समिधा॒ने अ॒ग्ना ऊ॒र्ध्वो अ॑ध्व॒र्युर्जु॑जुषा॒णो अ॑स्थात्। पर्य॒ग्निः प॑शु॒पा न होता॑ त्रिवि॒ष्ट्ये॑ति प्र॒दिव॑ उरा॒णः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो लोग अहिंसा आदि कर्म्मों को कर और विद्वान् होकर परोपकारी हों, वे अन्तरिक्ष में सूर्य्य के सदृश उत्तम प्रकार प्रकाशित होवें॥४॥

परि॒ त्मना॑ मि॒तद्रु॑रेति॒ होता॒ग्निर्म॒न्द्रो मधु॑वचा ऋ॒तावा॑। द्रव॑न्त्यस्य वा॒जिनो॒ न शोका॒ भय॑न्ते॒ विश्वा॒ भुव॑ना॒ यदभ्रा॑ट्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जिस परमात्मा का सब जगह प्रकाश और जिससे सब डरते हैं, उसके विज्ञान के लिये सत्य का आचरण और योगाभ्यास सब को करना चाहिये॥५॥

भ॒द्रा ते॑ अग्ने स्वनीक सं॒दृग्घो॒रस्य॑ स॒तो विषु॑णस्य॒ चारुः॑। न यत्ते॑ शो॒चिस्तम॑सा॒ वर॑न्त॒ न ध्व॒स्मान॑स्त॒न्वी॒३॒॑ रेप॒ आ धुः॑॥

जिस राजा की पक्षपातरहित प्रवृत्ति और जिसकी विस्तीर्ण नीति अविच्छिन्न वर्त्तमान है, उसके राज्य में कोई भी अपराध करने की इच्छा न करे॥६॥

न यस्य॒ सातु॒र्जनि॑तो॒रवा॑रि॒ न मा॒तरा॑पि॒तरा॒ नू चि॑दि॒ष्टौ। अधा॑ मि॒त्रो न सुधि॑तः पाव॒को॒३॒॑ग्निर्दी॑दाय॒ मानु॑षीषु वि॒क्षु॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जिस पुत्र के विद्यमान रहने पर माता और पिता को दुःख होता और सत्कार नहीं होता है, वह भाग्यहीन निरन्तर पीड़ित होता है और जिस पुत्र की उत्तम सेवा से माता पिता प्रसन्न होते हैं, उसकी प्रजाओं में प्रशंसा और उसको सुख होता है॥७॥

द्विर्यं पञ्च॒ जीज॑नन्त्सं॒वसा॑नाः॒ स्वसा॑रो अ॒ग्निं मानु॑षीषु वि॒क्षु। उ॒ष॒र्बुध॑मथ॒र्यो॒३॒॑ न दन्तं॑ शु॒क्रं स्वासं॑ पर॒शुं न ति॒ग्मम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे अङ्गुलियों से सम्पूर्ण कार्य्य सिद्ध होते हैं, वैसे ही रात्रि के पिछले प्रहर में उठ के प्रजाओं के हित को सिद्ध करो। तीक्ष्ण कुठार के सदृश दुःखों को काट के युवावस्था विशिष्ट स्त्रियाँ शुद्ध मुख और दाँत को करतीं, उनके सदृश प्रजाओं को शुद्ध कर और सुख देकर द्विजों को विद्या के जन्म से युक्त करो॥८॥

तव॒ त्ये अ॑ग्ने ह॒रितो॑ घृत॒स्ना रोहि॑तास ऋ॒ज्वञ्चः॒ स्वञ्चः॑। अ॒रु॒षासो॒ वृष॑ण ऋजुमु॒ष्का आ दे॒वता॑तिमह्वन्त द॒स्माः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग घोड़ों के सदृश अपनी अङ्गुलियों से कर्म्मों को करके ऐश्वर्य्य की वृद्धि करते हैं, वे दुःखों से रहित होते हैं॥९॥

ये ह॒ त्ये ते॒ सह॑माना अ॒यास॑स्त्वे॒षासो॑ अग्ने अ॒र्चय॒श्चर॑न्ति। श्ये॒नासो॒ न दु॑वस॒नासो॒ अर्थं॑ तुविष्व॒णसो॒ मारु॑तं॒ न शर्धः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो लोग क्षमा से युक्त, धर्म्मसम्बन्धी कर्म्म के आचरण से प्रकाशमान, उत्तम यशवाले, घोड़े के सदृश कार्य्यकर्ता और बलवान् हों, वे सत्कार करने योग्य होवें॥१०॥

अका॑रि॒ ब्रह्म॑ समिधान॒ तुभ्यं॒ शंसा॑त्यु॒क्थं यज॑ते॒ व्यू॑ धाः। होता॑रम॒ग्निं मनु॑षो॒ नि षे॑दुर्नम॒स्यन्त॑ उ॒शिजः॒ शंस॑मा॒योः॥

हे विद्वन्! वा राजन्! जो आपके लिये ऐश्वर्य की कामना करते हुए परमेश्वर और विद्वानों को नमस्कार करते हैं, वे निरन्तर प्रशंसित होते हैं॥११॥इस सूक्त में विद्वान् और ईश्वर के गुण वर्णन करने से इस के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥११॥यह छठवाँ सूक्त और पाँचवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒यमि॒ह प्र॑थ॒मो धा॑यि धा॒तृभि॒र्होता॒ यजि॑ष्ठो अध्व॒रेष्वीड्यः॑। यमप्न॑वानो॒ भृग॑वो विरुरु॒चुर्वने॑षु चि॒त्रं वि॒भ्वं॑ वि॒शेवि॑शे॥

हे मनुष्यो! इस संसार में परमेश्वर ही का आप लोगों को ध्यान करना योग्य है और जिसकी उपासना करके सांसारिक और पारमार्थिक सुख को प्राप्त होओगे, वही ईश्वर इस संसार में पूजा करने योग्य जानना चाहिये॥१॥

अग्ने॑ क॒दा त॑ आनु॒षग्भुव॑द्दे॒वस्य॒ चेत॑नम्। अधा॒ हि त्वा॑ जगृभ्रि॒रे मर्ता॑सो वि॒क्ष्वीड्य॑म्॥

हे परमेश्वर! हम लोग आपकी निरन्तर प्रार्थना करें और आपकी कृपा से ये सब मनुष्य आपके भक्त, आपकी आज्ञा के अनुकूल और आपके उपासक कब होंगे। हे कृपालो अन्तर्यामिन्! दया करके सब को अपने में प्रीतिमान् शीघ्र करो॥२॥

ऋ॒तावा॑नं॒ विचे॑तसं॒ पश्य॑न्तो॒ द्यामि॑व॒ स्तृभिः॑। विश्वे॑षामध्व॒राणां॑ हस्क॒र्तारं॒ दमे॑दमे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो लोग चेतनारहित कारण से युक्त प्रत्येक गृह के प्रवेश करनेवाले को जानते हैं, वे सूर्य के प्रकाश में चन्द्र आदिकों के सदृश संसार में प्रकाशित होते हैं॥३॥

आ॒शुं दू॒तं वि॒वस्व॑तो॒ विश्वा॒ यश्च॑र्ष॒णीर॒भि। आ ज॑भ्रुः के॒तुमा॒यवो॒ भृग॑वाणं वि॒शेवि॑शे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सूर्य आदि से बिजुली आदि पदार्थ को ग्रहण करते हैं, वे प्रजा के लिये सुख देनेवाले होते हैं॥४॥

तमीं॒ होता॑रमानु॒षक्चि॑कि॒त्वांसं॒ नि षे॑दिरे। र॒ण्वं पा॑व॒कशो॑चिषं॒ यजि॑ष्ठं स॒प्त धाम॑भिः॥

जो लोग बिजुलीरूप अग्नि को सब पदार्थों से निकालना जानते हैं, वे अत्यन्त सुखी होते हैं॥५॥

तं शश्व॑तीषु मा॒तृषु॒ वन॒ आ वी॒तमश्रि॑तम्। चि॒त्रं सन्तं॒ गुहा॑ हि॒तं सु॒वेदं॑ कूचिद॒र्थिन॑म्॥

जो मनुष्य सर्व पदार्थों में अलग ही अलग वर्त्तमान अग्नि को तत्त्व से जानते हैं, वे सब काम साध सकते हैं॥६॥

स॒सस्य॒ यद्वियु॑ता॒ सस्मि॒न्नूध॑न्नृ॒तस्य॒ धाम॑न्र॒णय॑न्त दे॒वाः। म॒हाँ अ॒ग्निर्नम॑सा रा॒तह॑व्यो॒ वेर॑ध्व॒राय॒ सद॒मिदृ॒तावा॑॥

हे बुद्धिमान् पुरुषो! जो अग्नि शरीर आदि में और निद्रा में प्रसिद्ध होता है, वह बड़ा होने से सर्वत्र व्यापक है॥७॥

वेर॑ध्व॒रस्य॑ दू॒त्या॑नि वि॒द्वानु॒भे अ॒न्ता रोद॑सी संचिकि॒त्वान्। दू॒त ई॑यसे प्र॒दिव॑ उरा॒णो वि॒दुष्ट॑रो दि॒व आ॒रोध॑नानि॥

हे मनुष्यो! जो बिजुली रूप अग्नि सम्पूर्ण शिल्पिजन का दूत के सदृश प्रेरणा करनेवाला, अनादि काल से सिद्ध और सम्पूर्ण पदार्थों में व्याप्त है, उसकी उत्पत्ति और निरोध से बहुत कार्य्यों को सिद्ध करके ऐश्वर्य्य को प्राप्त होओ॥८॥

कृ॒ष्णं त॒ एम॒ रुश॑तः पु॒रो भाश्च॑रि॒ष्ण्व१॒॑र्चिर्वपु॑षा॒मिदेक॑म्। यदप्र॑वीता॒ दध॑ते ह॒ गर्भं॑ स॒द्यश्चि॑ज्जा॒तो भव॒सीदु॑ दू॒तः॥

हे अध्यापक कृपालो! आप बिजुली के तेज की विद्या का हम लोगों के लिये बोध कराइये कि जिस तेज से दूत के सदृश कार्य्यों को हम लोग करावें॥९॥

स॒द्यो जा॒तस्य॒ ददृ॑शान॒मोजो॒ यद॑स्य॒ वातो॑ अनु॒वाति॑ शो॒चिः। वृ॒णक्ति॑ ति॒ग्माम॑त॒सेषु॑ जि॒ह्वां स्थि॒रा चि॒दन्ना॑ दयते॒ वि जम्भैः॑॥

जो शिल्पीजन पदार्थों से बिजुली को उत्पन्न करें तो वह बिजुली देखने योग्य पराक्रम और वेग को दिखा के अनेक प्रकार के ऐश्वर्य्यों को देती है॥१०॥

तृ॒षु यदन्ना॑ तृ॒षुणा॑ व॒वक्ष॑ तृ॒षुं दू॒तं कृ॑णुते य॒ह्वो अ॒ग्निः। वात॑स्य मे॒ळिं स॑चते नि॒जूर्व॑न्ना॒शुं न वा॑जयते हि॒न्वे अर्वा॑॥

जो मनुष्य बिजुली और वायु आदि के योग की विद्या को जानें तो वे दूत और घोड़े के सदृश दूर वाहन और समाचार को पहुँचा सकें॥११॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥११॥यह सातवाँ सूक्त और सातवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

दू॒तं वो॑ वि॒श्ववे॑दसं हव्य॒वाह॒मम॑र्त्यम्। यजि॑ष्ठमृञ्जसे गि॒रा॥

हे मनुष्यो! यही बिजुलीरूप अग्नि दूत के सदृश कार्यों को सिद्ध करनेवाला है, ऐसा आप लोग जानो॥१॥

स हि वेदा॒ वसु॑धितिं म॒हाँ आ॒रोध॑नं दि॒वः। स दे॒वाँ एह व॑क्षति॥

हे मनुष्यो! जो बिजुलीरूप अग्नि श्रेष्ठ भोग और गुणों का दाता सूर्य्य का भी सूर्य्य और सब का धारण करनेवाला व्याप्त है, उसको जानके कार्य्यों को सिद्ध करो॥२॥

स वे॑द दे॒व आ॒नमं॑ दे॒वाँ ऋ॑ताय॒ते दमे॑। दाति॑ प्रि॒याणि॑ चि॒द्वसु॑॥

हे मनुष्यो! सम्पूर्ण पृथिवी आदि श्रेष्ठ पदार्थों के बीच जो अग्निदेव है, उससे इस सब ऐश्वर्य का देनेवाला बड़ा देव जानो॥३॥

स होता॒ सेदु॑ दू॒त्यं॑ चिकि॒त्वाँ अ॒न्तरी॑यते। वि॒द्वाँ आ॒रोध॑नं दि॒वः॥

हे मनुष्यो! जो सम्पूर्ण पदार्थों के मध्य में वर्त्तमान और दूत के सदृश कार्य्यों को सिद्ध करता है और सूर्य आदि को प्रकाशित करता है, वह अवश्य आप लोगों को जानने योग्य है॥४॥

ते स्या॑म॒ ये अ॒ग्नये॑ ददा॒शुर्ह॒व्यदा॑तिभिः। य ईं॒ पुष्य॑न्त इन्ध॒ते॥

जो मनुष्य अग्नि आदि पदार्थों की विद्या की प्राप्ति के लिये बहुत खर्चते हैं, वे सब से सब प्रकार सब सुखों से पुष्ट हुए आनन्दित होते हैं॥५॥

ते रा॒या ते सु॒वीर्यैः॑ सस॒वांसो॒ वि शृ॑ण्विरे। ये अ॒ग्ना द॑धि॒रे दुवः॑॥

मनुष्य जब तक अग्नि आदि पदार्थों की विद्या का श्रवण और सेवन नहीं करते हैं, तब तक धनाढ्य और पूर्ण बलवाले हो नहीं सकते हैं और जैसे सुख से सोते हुए आनन्द को प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार अग्नि आदि विद्या को प्राप्त हुए दारिद्र्य का नाश करके धन और बल से सदा ही सुखी होते हैं॥६॥

अ॒स्मे रायो॑ दि॒वेदि॑वे॒ सं च॑रन्तु पुरु॒स्पृहः॑। अ॒स्मे वाजा॑स ईरताम्॥

मनुष्यों को चाहिये कि सदा ही पुरुषार्थ से धन, अन्न, राज्य, प्रतिष्ठा और विद्या आदि उत्तम गुणों की उन्नति होती है, इस प्रकार निरन्तर इच्छा करनी चाहिये॥७॥

स विप्र॑श्चर्षणी॒नां शव॑सा॒ मानु॑षाणाम्। अति॑ क्षि॒प्रेव॑ विध्यति॥

जो विद्वान् लोग अग्नि आदि विद्या के प्रयोगों से मनुष्यों के दारिद्र्य का नाश करके ऐश्वर्य्य के योग को उत्पन्न करते हैं, वे ही सब लोगों को सत्कार करने योग्य और सभों में भाग्यशाली होते हैं॥८॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥८॥यह अष्टम सूक्त और अष्टम वर्ग समाप्त हुआ॥

अग्ने॑ मृ॒ळ म॒हाँ अ॑सि॒ य ई॒मा दे॑व॒युं जन॑म्। इ॒येथ॑ ब॒र्हिरा॒सद॑म्॥

जो पुरुष विद्वानों के सङ्ग से विद्या की कामना करता और विद्या को प्राप्त होकर मनुष्य आदिकों को सुख देता है, वही आसन आदि से प्रतिष्ठा देने योग्य होता है॥१॥

स मानु॑षीषु दू॒ळभो॑ वि॒क्षु प्रा॒वीरम॑र्त्यः। दू॒तो विश्वे॑षां भुवत्॥

जो विद्वान् लोग सब लोगों के सुखसाधक विद्या के देनेवाले और मनुष्यों को धर्म के आचरण में प्रवेश करानेवाले स्वयं धार्मिक होवें, वे संसार में दुर्लभ हैं॥२॥

स सद्म॒ परि॑ णीयते॒ होता॑ म॒न्द्रो दिवि॑ष्टिषु। उ॒त पोता॒ नि षी॑दति॥

जहाँ पवित्र आनन्दयुक्त और विद्या आदि के देनेवाले लोग हैं, वहीं सम्पूर्ण विनय होता है॥३॥

उ॒त ग्ना अ॒ग्निर॑ध्व॒र उ॒तो गृ॒हप॑ति॒र्दमे॑। उ॒त ब्र॒ह्मा नि षी॑दति॥

जो मनुष्य अग्नि के सदृश पवित्र विद्यावाले और चारों वेदों के ज्ञाता और भी उत्तम कर्म्मों के करनेवाले गृह के स्वामी होवें, वे ही श्रेष्ठ अधिकारों में वर्त्तमान होवें॥४॥

वेषि॒ ह्य॑ध्वरीय॒तामु॑पव॒क्ता जना॑नाम्। ह॒व्या च॒ मानु॑षाणाम्॥

जो उपदेश देनेवाले लोग धर्म्म के उपदेश देनेवालों को उत्पन्न करते और उत्तम प्रकार शिक्षित और उपदेश देने के लिये प्रवृत्त करके मनुष्यों को बोध कराते हैं, वे ही संसार के कल्याण करनेवाले होते हैं॥५॥

वेषीद्व॑स्य दू॒त्यं१॒॑ यस्य॒ जुजो॑षो अध्व॒रम्। ह॒व्यं मर्त॑स्य॒ वोळ्ह॑वे॥

हे राजा लोगो! जो पूर्ण विद्यायुक्त बहुत बोलनेवाले स्नेही और धार्मिक जन हैं और जो लोग राज्य के व्यवहार को धारण कर सकते हैं, उन शूरवीर मित्रों को समाचारप्रापक बना और राज्य के समाचारों को जान के विशेष प्रबन्ध करो॥६॥

अ॒स्माकं॑ जोष्यध्व॒रम॒स्माकं॑ य॒ज्ञम॑ङ्गिरः। अ॒स्माकं॑ शृणुधी॒ हव॑म्॥

हे राजन्! जिससे कि आप हम लोगों की रक्षा करनेवाले प्रिय हैं, इससे अर्थी अर्थात् मुद्दई और प्रत्यर्थी अर्थात् मुद्दायले के वचनों को सुन के निरन्तर न्याय विधान करो॥७॥

परि॑ ते दू॒ळभो॒ रथो॒ऽस्माँ अ॑श्नोतु वि॒श्वतः॑। येन॒ रक्ष॑सि दा॒शुषः॑॥

हे राजन्! जिन साधनों और दृढ़ राजसेना के अङ्गों से प्रजा का सब प्रकार रक्षण होवे, वे ही हम लोगों से भी प्राप्त करने योग्य हैं॥८॥इस सूक्त में अग्नि, राजा, प्रजा और विद्वानों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥८॥यह नवम सूक्त और नवम वर्ग समाप्त हुआ॥

अग्ने॒ तम॒द्याश्वं॒ न स्तोमैः॒ क्रतुं॒ न भ॒द्रं हृ॑दि॒स्पृश॑म्। ऋ॒ध्यामा॑ त॒ ओहैः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्य जैसे घोड़े से मार्ग को शीघ्र जा सकते हैं, वैसे श्रेष्ठ बुद्धि को प्राप्त होकर मोक्षमार्ग को शीघ्र पाने के योग्य हैं॥१॥

अधा॒ ह्य॑ग्ने॒ क्रतो॑र्भ॒द्रस्य॒ दक्ष॑स्य सा॒धोः। र॒थीर्ऋ॒तस्य॑ बृह॒तो ब॒भूथ॑॥

राजा को चाहिये कि सम्पूर्ण बल और विज्ञान से सज्जनों का रक्षण और दुष्ट पुरुषों का ताड़न करके सत्यन्याय की उन्नति निरन्तर करे॥२॥

ए॒भिर्नो॑ अ॒र्कैर्भवा॑ नो अ॒र्वाङ् स्व१॒॑र्ण ज्योतिः॑। अग्ने॒ विश्वे॑भिः सु॒मना॒ अनी॑कैः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा लोग बल, बुद्धि और सज्जनों से सङ्ग उत्तम रक्षा कर और वृद्धि कराके प्रजा का पालन करते हैं, वे सूर्य्य के सदृश प्रकाशित यशयुक्त सदा आनन्दित होते हैं॥३॥

आ॒भिष्टे॑ अ॒द्य गी॒र्भिर्गृ॒णन्तोऽग्ने॒ दाशे॑म। प्र ते॑ दि॒वो न स्त॑नयन्ति॒ शुष्माः॑॥

हे राजन्! जो आप बिजुली के तुल्य मन्त्रियों की रक्षा करके हम लोगों की पालना करें तो हम लोग आपकी प्रजा हुए आज से लेकर आपकी निरन्तर प्रशंसा करें और बहुत धनादि सम्पत्ति देवें॥४॥

तव॒ स्वादि॒ष्ठाग्ने॒ संदृ॑ष्टिरि॒दा चि॒दह्न॑ इ॒दा चि॑द॒क्तोः। श्रि॒ये रु॒क्मो न रो॑चत उपा॒के॥

हे राजन्! जो दिन रात्रि के प्रबन्ध देखने अन्याय का विरोध करने और न्याय की प्रवृत्ति करनेवाला दूत वा मन्त्री होवे, वही पहिले सत्कार करके रक्षा करने योग्य है॥५॥

घृ॒तं न पू॒तं त॒नूर॑रे॒पाः शुचि॒ हिर॑ण्यम्। तत्ते॑ रु॒क्मो न रो॑चत स्वधावः॥

हे राजन्! जो सूर्य्य के सदृश तेजस्वी, धनयुक्त, कुलीन, पवित्र, प्रशंसित, अपराधरहित, श्रेष्ठ शरीरयुक्त, विद्या और अवस्था में वृद्ध होवें, वे आपके और आपके राज्य के रक्षक हों और आप इन लोगों की सम्मति से वर्त्तमान होकर अधिक अवस्थायुक्त हूजिये॥६॥

कृ॒तं चि॒द्धि ष्मा॒ सने॑मि॒ द्वेषोऽग्न॑ इ॒नोषि॒ मर्ता॑त्। इ॒त्था यज॑मानादृतावः॥

हे राजा आदि मनुष्यो! आप लोग शत्रु और मित्रों से उत्तम गुणों को ग्रहण करके सुखों को प्राप्त होइये॥७॥

शि॒वा नः॑ स॒ख्या सन्तु॑ भ्रा॒त्राग्ने॑ दे॒वेषु॑ यु॒ष्मे। सा नो॒ नाभिः॒ सद॑ने॒ सस्मि॒न्नूध॑न्॥

जो राजपुरुष परस्पर मित्रता करके प्रजाओं में पिता के सदृश वर्त्तमान हैं, उन लोगों के साथ जो राजनीति का प्रचार करता है, वही सर्वदा राज्य भोगने के योग्य है॥८॥इस सूक्त में अग्नि, राजा, मन्त्री और प्रजा के कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥८॥यह चतुर्थ मण्डल में दशवाँ सूक्त प्रथम अनुवाक तृतीय अष्टक के पाँचवें अध्याय में दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

भ॒द्रं ते॑ अग्ने सहसि॒न्ननी॑कमुपा॒क आ रो॑चते॒ सूर्य॑स्य। रुश॑द्दृ॒शे द॑दृशे नक्त॒या चि॒दरू॑क्षितं दृ॒श आ रू॒पे अन्न॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा उत्तम प्रकार शिक्षित सेना [तथा] उत्तम गुणों और ऐश्वर्य के सहित प्रजाओं का पालन करता और दुष्टों को पीड़ा देता है, वह चन्द्र और सूर्य के सदृश सर्वत्र प्रकाशित होता है॥१॥

वि षा॑ह्यग्ने गृण॒ते म॑नी॒षां खं वेप॑सा तुविजात॒ स्तवा॑नः। विश्वे॑भि॒र्यद्वा॒वनः॑ शुक्र दे॒वैस्तन्नो॑ रास्व सुमहो॒ भूरि॒ मन्म॑॥

हे राजन्! आप जितेन्द्रिय हो और बुद्धि को प्राप्त होकर कर्म से प्रारम्भ किये हुए कार्य्य को समाप्त करो और सम्पूर्ण विद्वानों के सहित पूर्ण विज्ञान और प्रजाओं के लिये सुख दीजिये॥२॥

त्वद॑ग्ने॒ काव्या॒ त्वन्म॑नी॒षास्त्वदु॒क्था जा॑यन्ते॒ राध्या॑नि। त्वदे॑ति॒ द्रवि॑णं वी॒रपे॑शा इ॒त्थाधि॑ये दा॒शुषे॒ मर्त्या॑य॥

हे राजन्! जो आप विद्वान्, जितेन्द्रिय और न्यायकारी होवें तो आपके अनुकरण से सम्पूर्ण मनुष्य सत्य आचरण में प्रवृत्त हो और ऐश्वर्य्य को प्राप्त होकर सम्पूर्ण प्रजा का हित साध सकें॥३॥

त्वद्वा॒जी वा॑जंभ॒रो विहा॑या अभिष्टि॒कृज्जा॑यते स॒त्यशु॑ष्मः। त्वद्र॒यिर्दे॒वजू॑तो मयो॒भुस्त्वदा॒शुर्जू॑जु॒वाँ अ॑ग्ने॒ अर्वा॑॥

हे मनुष्यो! जो आप लोगों के पुरुषार्थ से बिजुली आदि स्वरूप अग्निविद्या से प्रसिद्ध होवे तो बहुत भारवाले वाहन का पहुँचानेवाला सुख का हेतु और धन उत्पन्न कराने वा शीघ्र ले चलनेवाला होवे॥४॥

त्वाम॑ग्ने प्रथ॒मं दे॑व॒यन्तो॑ दे॒वं मर्ता॑ अमृत म॒न्द्रजि॑ह्वम्। द्वे॒षो॒युत॒मा वि॑वासन्ति धी॒भिर्दमू॑नसं गृ॒हप॑ति॒ममू॑रम्॥

जो लोग विद्वान् होकर गृहस्थों को बोध [करा के], सब के सन्तानों को ब्रह्मचर्य्य से उत्तम शिक्षा और विद्या ग्रहण करा के तथा अविद्या आदि दोषों को दूर करके शम, दम आदि उत्तम गुणों से युक्त करते हैं, वे ही इस संसार में सुन्दर होते हैं॥५॥

आ॒रे अ॒स्मदम॑तिमा॒रे अंह॑ आ॒रे विश्वां॑ दुर्म॒तिं यन्नि॒पासि॑। दो॒षा शि॒वः स॑हसः सूनो अग्ने॒ यं दे॒व आ चि॒त्सच॑से स्व॒स्ति॥

यह हम लोग निश्चय करते हैं कि जो लोग हम लोगों को अधर्मी और दुष्ट बुद्धिवाले पुरुष से दूर करते हैं, वे ही दिन-रात्रि हम लोगों से सत्कार करने योग्य हैं॥६॥इस सूक्त में अग्नि, राजा और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥६॥यह ग्यारहवाँ सूक्त और ग्यारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

यस्त्वाम॑ग्न इ॒नध॑ते य॒तस्रु॒क्त्रिस्ते॒ अन्नं॑ कृ॒णव॒त्सस्मि॒न्नह॑न्। स सु द्यु॒म्नैर॒भ्य॑स्तु प्र॒सक्ष॒त्तव॒ क्रत्वा॑ जातवेदश्चिकि॒त्वान्॥

हे विद्वानो! जो लोग आपके लिये ईश्वरज्ञान, बड़े विहार की विद्या और उत्तमबुद्धि को सब काल में देते हैं, वे यश और धन से युक्त करने चाहिये॥१॥

इ॒ध्मं यस्ते॑ ज॒भर॑च्छश्रमा॒णो म॒हो अ॑ग्ने॒ अनी॑क॒मा स॑प॒र्यन्। स इ॑धा॒नः प्रति॑ दो॒षामु॒षासं॒ पुष्य॑न्र॒यिं स॑चते॒ घ्नन्न॒मित्रा॑न्॥

हे राजन्! जो आपके सेनाध्यक्ष और न्यायाधीश विद्या विनय और धर्म आदि से प्रकाशमान हुए अपनी प्रजाओं का पालन करते और दुष्ट शत्रुओं का नाश करते हुए विजय को प्राप्त होते हैं, उनके लिये आपको चाहिये कि बहुत प्रतिष्ठा और बहुत धन देकर दिन-रात्रि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की उन्नति करें॥२॥

अ॒ग्निरी॑शे बृह॒तः क्ष॒त्रिय॑स्या॒ग्निर्वाज॑स्य पर॒मस्य॑ रा॒यः। दधा॑ति॒ रत्नं॑ विध॒ते यवि॑ष्ठो॒ व्या॑नु॒षङ्मर्त्या॑य स्व॒धावा॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सूर्य्य और बिजुली के सदृश राज्य और ऐश्वर्य्य की उन्नति करते हुए यश को विस्तारते हैं, वे सब से सब प्रकार सत्कार को प्राप्त होते हैं॥३॥

यच्चि॒द्धि ते॑ पुरुष॒त्रा य॑वि॒ष्ठाचि॑त्तिभिश्चकृ॒मा कच्चि॒दागः॑। कृ॒धीष्व१॒॑स्माँ अदि॑ते॒रना॑गा॒न्व्येनां॑सि शिश्रथो॒ विष्व॑गग्ने॥

हे राजन्! जो कदाचित् अज्ञान वा प्रमाद से हम लोग अपराध करें, उनको भी दण्ड के विना क्षमा न कीजिये और हम लोगों को उत्तम शिक्षा से धार्मिक करके पृथिवी के राज्य के अधिकारी करिये॥४॥

म॒हश्चि॑दग्न॒ एन॑सो अ॒भीक॑ ऊ॒र्वाद्दे॒वाना॑मु॒त मर्त्या॑नाम्। मा ते॒ सखा॑यः॒ सद॒मिद्रि॑षाम॒ यच्छा॑ तो॒काय॒ तन॑याय॒ शं योः॥

हे मनुष्यो! जैसे हम लोग विद्वानों के समीप स्थित हों और शिक्षा को प्राप्त होकर पापस्वरूप कर्म्म का त्याग कर अन्यों का भी त्याग करें [=करावैं,] सब के मित्र होकर कुमार और कुमारियों को उत्तम शिक्षा देकर और सम्पूर्ण विद्या प्राप्त करा के सुखयुक्त करें, वैसा आप लोग भी आचरण करो॥५॥

यथा॑ ह॒ त्यद्व॑सवो गौ॒र्यं॑ चित्प॒दि षि॒ताममु॑ञ्चता यजत्राः। ए॒वो ष्व१॒॑स्मन्मु॑ञ्चता॒ व्यंहः॒ प्र ता॑र्यग्ने प्रत॒रं न॒ आयुः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे धार्मिक यथार्थवक्ता विद्वान् लोग पाप के आचरण का त्याग करके सत्य आचरण में अन्यों को अपने सदृश करने की इच्छा करते हैं, वैसा ही आप लोग भी आचरण करो॥६॥इस सूक्त में अग्नि, राजा और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥६॥यह बारहवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्रत्य॒ग्निरु॒षसा॒मग्र॑मख्यद्विभाती॒नां सु॒मना॑ रत्न॒धेय॑म्। या॒तम॑श्विना सु॒कृतो॑ दुरो॒णमुत्सूर्यो॒ ज्योति॑षा दे॒व ए॑ति॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो वायु, बिजुली और सूर्य के गुणयुक्त पुरुष प्रजाओं का पालन करते हैं, वे उस सत्य न्याय से बहुत रत्नों के कोष को प्राप्त हैं॥१॥

ऊ॒र्ध्वं भा॒नुं स॑वि॒ता दे॒वो अ॑श्रेद्द्र॒प्सं दवि॑ध्वद्गवि॒षो न सत्वा॑। अनु॑ व्र॒तं वरु॑णो यन्ति मि॒त्रो यत्सूर्यं॑ दि॒व्या॑रो॒हय॑न्ति॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। इस सृष्टि में परमात्मा ने जैसे सूर्य्य की उत्पत्ति से जल, अग्नि और पवन रचे, वैसे ही पृथिवी आदिकों के भी निमित्तकारण रचे, यह जानना चाहिये॥२॥

यं सी॒मकृ॑ण्व॒न्तम॑से वि॒पृचे॑ ध्रु॒वक्षे॑मा॒ अन॑वस्यन्तो॒ अर्थ॑म्। तं सूर्यं॑ ह॒रितः॑ स॒प्त य॒ह्वीः स्पशं॒ विश्व॑स्य॒ जग॑तो वहन्ति॥

हे मनुष्यो! जैसे किरणें सूर्य्य को अन्धकार के दूर करने के लिये धारण करती हैं, वैसे ही सम्पूर्ण जगत् की अविद्या दूर करने के लिये और विद्या की रक्षा के लिये सब प्रकार सत्य के उपदेश करो॥३॥

वहि॑ष्ठेभिर्वि॒हर॑न्यासि॒ तन्तु॑मव॒व्यय॒न्नसि॑तं देव॒ वस्म॑। दवि॑ध्वतो र॒श्मयः॒ सूर्य॑स्य॒ चर्मे॒वावा॑धु॒स्तमो॑ अ॒प्स्व१॒॑न्तः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे उपदेशक! जैसे सूर्य प्राप्त करानेवाले किरणों के आकर्षणादिकों से अपने प्रकाश का विस्तार करता हुआ, चर्म से देह के सदृश [अन्धकार को] ढाँपता हुआ, अन्तरिक्ष के मध्य में विहार करता है, वैसे ही अविद्या का नाश और विद्या का प्रकाश [=विस्तार] करके इस संसार में विचरिये॥४॥

अना॑यतो॒ अनि॑बद्धः क॒थायं न्य॑ङ्ङुत्ता॒नोऽव॑ पद्यते॒ न। कया॑ याति स्व॒धया॒ को द॑दर्श दि॒वः स्क॒म्भः समृ॑तः पाति॒ नाक॑म्॥

हे विद्वन्! यह सूर्य्य अन्तरिक्ष के मध्य में स्थित हुआ क्यों नीचे नहीं गिरता है? किससे चलता है? और कैसे प्रकाश का धारण करनेवाला और सुखकारक होता है? इस प्रश्न का उत्तर−परमेश्वर ने स्थापित और धारण किया इससे नीचे नहीं गिरता है और अपने समीप वर्त्तमान भूगोलों के साथ अपनी कक्षा में चलता हुआ वर्त्तमान है और सम्पूर्ण समीप में वर्त्तमान पदार्थों के आकर्षण से धारणकर्त्ता और परमेश्वर की व्यवस्था से सुखकारक वर्त्तमान है, यह जानना चाहिये॥५॥इस सूक्त में सूर्य और विद्वानों के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥५॥यह तेरहवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्रत्य॒ग्निरु॒षसो॑ जा॒तवे॑दा॒ अख्य॑द्दे॒वो रोच॑माना॒ महो॑भिः। आ ना॑सत्योरुगा॒या रथे॑ने॒मं य॒ज्ञमुप॑ नो यात॒मच्छ॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो जैसे सूर्य्य प्रातःकाल से शोभित होता है, वैसे ही सत्य के उपदेश से रथ से मार्ग के सदृश विद्या के सुख को प्राप्त कराते हैं, वे इस संसार में कल्याणकारक होते हैं॥१॥

ऊ॒र्ध्वं के॒तुं स॑वि॒ता दे॒वो अ॑श्रे॒ज्ज्योति॒र्विश्व॑स्मै॒ भुव॑नाय कृ॒ण्वन्। आप्रा॒ द्यावा॑पृथि॒वी अ॒न्तरि॑क्षं॒ वि सूर्यो॑ र॒श्मिभि॒श्चेकि॑तानः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वान् लोग सम्पूर्ण विद्याओं को पढ़कर, ब्रह्मचर्य और योगाभ्यास से ज्ञान को प्राप्त होकर, किरणों से सूर्य्य के सदृश जनों के अन्तःकरणों को उपदेश से उज्ज्वल करते हैं, वे ही सब को सत्कार करने योग्य होते हैं॥२॥

आ॒वह॑न्त्यरु॒णीर्ज्योति॒षागा॑न्म॒ही चि॒त्रा र॒श्मिभि॒श्चेकि॑ताना। प्र॒बो॒धय॑न्ती सुवि॒ताय॑ दे॒व्यु१॒॑षा ई॑यते सु॒युजा॒ रथे॑न॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सुन्दर प्रिया उत्तम लक्षणों से युक्त, अद्भुत रूपवाली, पतिव्रता स्त्री पुरुष को प्राप्त होवे, वह प्रातःकाल के सदृश कुल का प्रकाश करती हुई और सन्तानों को उत्तम शिक्षा देती हुई सब को आनन्द देती है॥३॥

आ वां॒ वहि॑ष्ठा इ॒ह ते व॑हन्तु॒ रथा॒ अश्वा॑स उ॒षसो॒ व्यु॑ष्टौ। इ॒मे हि वां॑ मधु॒पेया॑य॒ सोमा॑ अ॒स्मिन्य॒ज्ञे वृ॑षणा मादयेथाम्॥

हे स्त्री पुरुषो! आप लोग यदि रात्रि के चौथे प्रहर में उठ और आवश्यक कृत्य करके वाहन वा पैरों से सूर्योदय से पहिले शुद्ध वायु देश में भ्रमण करें तो आप लोगों को रोग कभी न प्राप्त होवें, जिससे कि बलिष्ठ और अधिक अवस्थावाले हुए इस गृहाश्रम में बड़े आनन्द को भोगो॥४॥

अना॑यतो॒ अनि॑बद्धः क॒थायं न्य॑ङ्ङुत्ता॒नोऽव॑ पद्यते॒ न। कया॑ याति स्व॒धया॒ को द॑दर्श दि॒वः स्क॒म्भः समृ॑तः पाति॒ नाक॑म्॥

हे विद्वन्! जीव यह नीचे की दशा को किस रीति से न प्राप्त होवें जो अविद्या आदि बन्धन का त्याग करे तो, किस कर्म से सुख को प्राप्त होता है जो धर्म का अनुष्ठान करे, कौन कामनाओं से पूर्ण होता है, जो परमात्मा को देखे॥५॥इस सूक्त में अग्नि, विद्वान्, स्त्री और पुरुष के कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥५॥यह चौदहवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒ग्निर्होता॑ नो अध्व॒रे वा॒जी सन्परि॑ णीयते। दे॒वो दे॒वेषु॑ य॒ज्ञियः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि सूर्य्यरूप से सब व्यवहारों को प्राप्त कराता है, वैसे ही विद्वान् सम्पूर्ण मनोरथों को प्राप्त कराता है॥१॥

परि॑ त्रिवि॒ष्ट्य॑ध्व॒रं यात्य॒ग्नी र॒थीरि॑व। आ दे॒वेषु॒ प्रयो॒ दध॑त्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे उत्तम सेना से युक्त सेनाध्यक्ष पुरुष तीन प्रकार के सुख को प्राप्त होता है, वैसे ही अग्निविद्या का जाननेवाला शरीर, आत्मा और इन्द्रियों के आनन्द को प्राप्त होता है॥२॥

परि॒ वाज॑पतिः क॒विर॒ग्निर्ह॒व्यान्य॑क्रमीत्। दध॒द्रत्ना॑नि दा॒शुषे॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे देनेवाले अन्यों के लिये उत्तम वस्तुओं को देते हैं, वैसे ही अग्नि; क्योंकि दूसरे को सुख देने के लिये अग्नि के गुण होते हैं॥३॥

अ॒यं यः सृञ्ज॑ये पु॒रो दै॑ववा॒ते स॑मि॒ध्यते॑। द्यु॒माँ अ॑मित्र॒दम्भ॑नः॥

हे राजन्! जो लोग बड़े संग्राम में तेजस्वी, भयरहित, आगे चलनेवाले और शत्रुओं के नाशकर्त्ता नौकर हों, उनका ही आप पुत्र के सदृश पालन करो॥४॥

अस्य॑ घा वी॒र ईव॑तो॒ऽग्नेरी॑शीत॒ मर्त्यः॑। ति॒ग्मज॑म्भस्य मी॒ळ्हुषः॑॥

सेनापति को चाहिये कि उन्हीं पुरुषों को सेना में भर्ती करें कि जो लोग शत्रुओं को जीत सकें॥५॥

तमर्व॑न्तं॒ न सा॑न॒सिम॑रु॒षं न दि॒वः शिशु॑म्। म॒र्मृ॒ज्यन्ते॑ दि॒वेदि॑वे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य घोड़े के सदृश सन्तानों को शिक्षा देते हैं, वे नित्य सुख को बढ़ाते हैं॥६॥

बोध॒द्यन्मा॒ हरि॑भ्यां कुमा॒रः सा॑हदे॒व्यः। अच्छा॒ न हू॒त उद॑रम्॥

जब कुमार और कुमारियाँ माता और पिता से शिक्षा को प्राप्त हुए आचार्य के कुल को जावें, तब आचार्य के प्रिय आचरण और विनय से उसकी प्रार्थना करके विद्या की याचना करें, जो ऐसा करे, वह श्रेष्ठ घोड़ों से युक्त रथ से जैसे वैसे विद्या के पार को जावे॥७॥

उ॒त त्या य॑ज॒ता हरी॑ कुमा॒रात्सा॑हदे॒व्यात्। प्रय॑ता स॒द्य आ द॑दे॥

जब विद्यार्थी [और विद्यार्थिनी] पढ़ने के लिये जावें, तब उनको चाहिये कि प्रतिज्ञा करें कि हम लोग धर्म्मयुक्त ब्रह्मचर्य्य से आपके अनुकूल वर्त्ताव करके विद्या का अभ्यास करेंगे और मध्य में ब्रह्मचर्य्य व्रत का न लोप करेंगे और अध्यापक लोग यह प्रतिज्ञा करें कि हम निष्कपटता से विद्यादान करेंगे॥८॥

ए॒ष वां॑ देवावश्विना कुमा॒रः सा॑हदे॒व्यः। दी॒र्घायु॑रस्तु॒ सोम॑कः॥

अध्यापक और उपदेशक ऐसा प्रयत्न करें कि जिससे धार्मिक अधिक अवस्थावाले और विद्वान् पढ़नेवाले होवें॥९॥

तं यु॒वं दे॑वावश्विना कुमा॒रं सा॑हदे॒व्यम्। दी॒र्घायु॑षं कृणोतन॥

हे विद्वानो और विदुषियो! आप लोग पढ़ाने के लिये प्रवृत्त हो और उत्तम शिक्षा करके और विद्या के योग को सम्पादन करके सब श्रेष्ठ पुरुषों को बहुत कालपर्य्यन्त जीवनेवाले करो॥१०॥इस सूक्त में अग्नि, राजा अध्यापक और पढ़नेवाले के कर्मों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥१०॥यह पन्द्रहवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ स॒त्यो या॑तु म॒घवाँ॑ ऋजी॒षी द्रव॑न्त्वस्य॒ हर॑य॒ उप॑ नः। तस्मा॒ इदन्धः॑ सुषुमा सु॒दक्ष॑मि॒हाभि॑पि॒त्वं क॑रते गृणा॒नः॥

हे मनुष्यो! जो राजा हम लोगों के बल को बढ़ावे और नीति से प्रजाओं का पालन करे और जिस राजा के पुरुष भी धार्मिक और प्रजा के पालन में प्रिय हों और हम लोगों को प्रेम से संयुक्त करें, उसके लिये हम लोग ऐश्वर्य्य की वृद्धि करें॥१॥

अव॑ स्य शू॒राध्व॑नो॒ नान्ते॒ऽस्मिन्नो॑ अ॒द्य सव॑ने म॒न्दध्यै॑। शंसा॑त्यु॒क्थमु॒शने॑व वे॒धाश्चि॑कि॒तुषे॑ असु॒र्या॑य॒ मन्म॑॥

हे राजन्! जो बुद्धिमान् सब से विद्याओं की कामना करते हुए उपदेशक हों, उनकी निरन्तर रक्षा करो॥२॥

क॒विर्न नि॒ण्यं वि॒दथा॑नि॒ साध॒न्वृषा॒ यत्सेकं॑ विपिपा॒नो अर्चा॑त्। दि॒व इ॒त्था जी॑जनत्स॒प्त का॒रूनह्ना॑ चिच्चक्रुर्व॒युना॑ गृ॒णन्तः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो जन विद्या और पुरुषार्थ को बढ़ाते हैं, वे सात प्रकार के कारीगरों को करके सब कार्य्यों को सिद्ध करा कामसिद्धि कर सकें॥३॥

स्व१॒॑र्यद्वेदि॑ सु॒दृशी॑कम॒र्कैर्महि॒ ज्योती॑ रुरुचु॒र्यद्ध॒ वस्तोः॑। अ॒न्धा तमां॑सि॒ दुधि॑ता वि॒चक्षे॒ नृभ्य॑श्चकार॒ नृत॑मो अ॒भिष्टौ॑॥

नित्य नीति और वीरता से अच्छे प्रकार बढ़े हुए राज्यकर्म्म में राजा और प्रजाओं में सब ओर से सुख प्रतिदिन सूर्यप्रकाश के समान बढ़ता है॥४॥

व॒व॒क्ष इन्द्रो॒ अमि॑तमृजी॒ष्यु१॒॑भे आ प॑प्रौ॒ रोद॑सी महि॒त्वा। अत॑श्चिदस्य महि॒मा वि रे॑च्य॒भि यो विश्वा॒ भुव॑ना ब॒भूव॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सब से जगदीश्वर का बड़प्पन अधिक जानते हैं, वे इस जगत् में प्रतिष्ठा को प्राप्त होते हैं॥५॥

विश्वा॑नि श॒क्रो नर्या॑णि वि॒द्वान॒पो रि॑रेच॒ सखि॑भि॒र्निका॑मैः। अश्मा॑नं चि॒द्ये बि॑भि॒दुर्वचो॑भिर्व्र॒जं गोम॑न्तमु॒शिजो॒ वि व॑व्रुः॥

इस मन्त्र में उपमावाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। सूर्य्य जैसे मेघ का वैसे दुष्टों के निवारण करनेवाले वा गोपाल लोग जैसे व्रज अर्थात् गौओं के बाड़े से गौओं को वैसे अन्याय से पृथक् करनेवाले जिस पुरुष के मित्र होवें, वह मनुष्य राजा होने के योग्य है॥६॥

अ॒पो वृ॒त्रं व॑व्रि॒वांसं॒ परा॑ह॒न्प्राव॑त्ते॒ वज्रं॑ पृथि॒वी सचे॑ताः। प्रार्णां॑सि समु॒द्रिया॑ण्यैनोः॒ पति॒र्भव॒ञ्छव॑सा शूर धृष्णो॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग सूर्य के सदृश प्रजाओं को सुख देते हैं, वे ही राजकर्म्मों में प्रेरणा करने योग्य होते हैं॥७॥

अ॒पो यदद्रिं॑ पुरुहूत॒ दर्द॑रा॒विर्भु॑वत्स॒रमा॑ पू॒र्व्यं ते॑। स नो॑ ने॒ता वाज॒मा द॑र्षि॒ भूरिं॑ गो॒त्रा रु॒जन्नङ्गि॑रोभिर्गृणा॒नः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! जो शुद्धनीतिवाले मनुष्य प्रसिद्ध होवें, उनकी रक्षा करके न्याय से प्रजाओं का पालन करो॥८॥

अच्छा॑ क॒विं नृ॑मणो गा अ॒भिष्टौ॒ स्व॑र्षाता मघव॒न्नाध॑मानम्। ऊ॒तिभि॒स्तमि॑षणो द्यु॒म्नहू॑तौ॒ नि मा॒यावा॒नब्र॑ह्मा॒ दस्यु॑रर्त॥

हे राजन्! आप कपटी, मूर्ख और दुष्ट स्वभाववाले मनुष्यों का नाश करके और धार्मिक विद्वानों का सत्कार करके प्रशंसित हुए हम लोगों के राजा हूजिये॥९॥

आ द॑स्यु॒घ्ना मन॑सा या॒ह्यस्तं॒ भुव॑त्ते॒ कुत्सः॑ स॒ख्ये निका॑मः। स्वे योनौ॒ नि ष॑दतं॒ सरू॑पा॒ वि वां॑ चिकित्सदृत॒चिद्ध॒ नारी॑॥

हे पुरुष! आप निन्दित स्त्री का त्याग करके समान रूपवाली और दोषों के नाश करनेवाली को प्राप्त होओ और दोनों मिल कर प्रीति से अपने गृह में रहो॥१०॥

यासि॒ कुत्से॑न स॒रथ॑मव॒स्युस्तो॒दो वात॑स्य॒ हर्यो॒रीशा॑नः। ऋ॒ज्रा वाजं॒ न गध्यं॒ युयू॑षन्क॒विर्यदह॒न्पार्या॑य॒ भूषा॑त्॥

जो लोग निन्दित कर्म्म और निन्दित जन के सङ्ग का त्याग करके सत्यन्याय से प्रजाओं का पालन करते हुए पुरुषार्थ करें, वे सब प्रकार से शोभित होवें॥११॥

कुत्सा॑य॒ शुष्ण॑म॒शुषं॒ नि ब॑र्हीः प्रपि॒त्वे अह्नः॒ कुय॑वं स॒हस्रा॑। स॒द्यो दस्यू॒न्प्र मृ॑ण कु॒त्स्येन॒ प्र सूर॑श्च॒क्रं वृ॑हताद॒भीके॑॥

हे राजन्! आप वज्र आदि शस्त्रों से दुष्ट चोरों का नाश करके सूर्य्य के सदृश प्रतापी हूजिये॥१२॥

त्वं पिप्रुं॒ मृग॑यं शूशु॒वांस॑मृ॒जिश्व॑ने वैदथि॒नाय॑ रन्धीः। प॒ञ्चा॒शत्कृ॒ष्णा नि व॑पः स॒हस्रात्कं॒ न पुरो॑ जरि॒मा वि द॑र्दः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजा आदि राजपुरुषों को चाहिये कि सेना में हजारों वीरों को रखके और नम्रता से वृद्धावस्था जैसे रूप और बलों को हरती है, वैसे ही शत्रुओं के बल को धीरे-धीरे नष्ट कर शुद्ध नीति का प्रचार करो॥१३॥

सूर॑ उपा॒के त॒न्वं१॒॑ दधा॑नो॒ वि यत्ते॒ चेत्य॒मृत॑स्य॒ वर्पः॑। मृ॒गो न ह॒स्ती तवि॑षीमुषा॒णः सिं॒हो न भी॒म आयु॑धानि॒ बिभ्र॑त्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजन्! जो लोग दीर्घ ब्रह्मचर्य से सूर्य्य के समान तेजस्वी रूपवान् और वेगवान् बलिष्ठ, सिंह के सदृश पराक्रमी, धनुर्वेद के जाननेवाले जन हों; उनकी सेना से शत्रुओं को जीतकर सब स्थानों में उत्तम कीर्ति से विदित हूजिये॥१४॥

इन्द्रं॒ कामा॑ वसू॒यन्तो॑ अग्म॒न्त्स्व॑र्मीळ्हे॒ न सव॑ने चका॒नाः। श्र॒व॒स्यवः॑ शशमा॒नास॑ उ॒क्थैरोको॒ न र॒ण्वा सु॒दृशी॑व पु॒ष्टिः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो धन की कामनावाले होवें, वे शरीर और आत्मा के बल को बढ़ाके युद्ध की विद्या और सामग्री पूर्ण करें॥१५॥

तमिद्व॒ इन्द्रं॑ सु॒हवं॑ हुवेम॒ यस्ता च॒कार॒ नर्या॑ पु॒रूणि॑। यो माव॑ते जरि॒त्रे गध्यं॑ चिन्म॒क्षू वाजं॒ भर॑ति स्पा॒र्हरा॑धाः॥

जो राजा और प्रजाजन एक सम्मति करके उत्तम गुण, कर्म्म और स्वभाव से युक्त राजा को स्वीकार करें तो पूर्ण सुख प्राप्त हो॥१६॥

ति॒ग्मा यद॒न्तर॒शनिः॒ पता॑ति॒ कस्मि॑ञ्चिच्छूर मुहु॒के जना॑नाम्। घो॒रा यद॑र्य॒ समृ॑ति॒र्भवा॒त्यध॑ स्मा नस्त॒न्वो॑ बोधि गो॒पाः॥

हे शूरवीरो! जब बहुत शस्त्रों के संपातयुक्त युद्ध प्रवृत्त होवे, तब अपने और अपने सम्बन्धियों के शरीरों की रक्षा करने और शत्रुओं के नाश करने से विजयी हूजिये॥१७॥

भुवो॑ऽवि॒ता वा॒मदे॑वस्य धी॒नां भुवः॒ सखा॑वृ॒को वाज॑सातौ। त्वामनु॒ प्रम॑ति॒मा ज॑गन्मोरु॒शंसो॑ जरि॒त्रे वि॒श्वध॑ स्याः॥

हे मनुष्यो! जो सब का स्वामी और वीरपुरुष युद्ध में चतुर उपदेश देनेवाले और बुद्धिमानों का रक्षक होवे, उसी को राजा करो॥१८॥

ए॒भिर्नृभि॑रिन्द्र त्वा॒युभि॑ष्ट्वा म॒घव॑द्भिर्मघव॒न्विश्व॑ आ॒जौ। द्यावो॒ न द्यु॒म्नैर॒भि सन्तो॑ अ॒र्यः क्ष॒पो म॑देम श॒रद॑श्च पू॒र्वीः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो लोग धार्मिक शरीर और आत्मा के बल से युक्त सत्य की कामना करते हुए अपने राज्य में हुए धनयुक्त पुरुषों के साथ दृढ़ मेल कर और शत्रुओं को जीत के राज्य की प्रशंसा करते हैं, वे सूर्य्य के प्रकाश के सदृश कीर्तियुक्त और धनी होकर सब काल में आनन्दित होते हैं॥१९॥

ए॒वेदिन्द्रा॑य वृष॒भाय॒ वृष्णे॒ ब्रह्मा॑कर्म॒ भृग॑वो॒ न रथ॑म्। नू चि॒द्यथा॑ नः स॒ख्या वि॒योष॒दस॑न्न उ॒ग्रो॑ऽवि॒ता त॑नू॒पाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे शिल्पीजन विद्या के साथ पदार्थों के संयोग से विमान आदि की रचना करके धनवान् होकर मित्रों का सत्कार करते हैं, वैसे ही राजा से सत्कार किये गये हम लोग राजा से ऐश्वर्य की वृद्धि करके सब राजा आदिकों का सत्कार करें॥२०॥

नू ष्टु॒त इ॑न्द्र॒ नू गृ॑णा॒न इषं॑ जरि॒त्रे न॒द्यो॒३॒॑ न पी॑पेः। अका॑रि ते हरिवो॒ ब्रह्म॒ नव्यं॑ धि॒या स्या॑म र॒थ्यः॑ सदा॒साः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य परीक्षा करनेवाला, सब जगह प्रशंसित और नदी के सदृश प्रजाओं के तृप्तिकर्त्ता, अश्वसमान सुखपूर्वक दूसरे स्थान को पहुँचानेवाला होवे, उसको सर्वाधीश करके नौकरों के सहित हम उसकी आज्ञा के अनुकूल वर्त्ताव करके सब लोग निरन्तर सुखी होवें॥२१॥इस सूक्त में इन्द्र, राजा, मन्त्री और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥२१॥यह सोलहवाँ सूक्त और बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

त्वं म॒हाँ इ॑न्द्र॒ तुभ्यं॑ ह॒ क्षा अनु॑ क्ष॒त्रं मं॒हना॑ मन्यत॒ द्यौः। त्वं वृ॒त्रं शव॑सा जघ॒न्वान्त्सृ॒जः सिन्धूँ॒रहि॑ना जग्रसा॒नान्॥

हे राजसम्बन्धी जनो! जैसे बड़ा सूर्य वृष्टि से नदियों को पूर्ण करता है, वैसे ही धन और ऐश्वर्य्य से राज्य को शोभित करो। राजा की आज्ञा के अनुकूल वर्त्ताव करके बड़े राज्य को सम्पादन करो॥१॥

तव॑ त्वि॒षो जनि॑मन्रेजत॒ द्यौरेज॒द्भूमि॑र्भि॒यसा॒ स्वस्य॑ म॒न्योः। ऋ॒घा॒यन्त॑ सु॒भ्वः१॒॑ पर्व॑तास॒ आर्द॒न्धन्वा॑नि स॒रय॑न्त॒ आपः॑॥

हे राजन्! आप परमेश्वर के सदृश पक्षपात का त्याग करके मनुष्यों में पिता के सदृश वर्त्ताव करो और जैसे जगदीश्वर के भय से सम्पूर्ण जगत् व्यवस्थित रहता है, वैसे ही आप के दण्ड के भय से सब जगत् भोग के लिये कल्पित हो और सूर्य जैसे मेघ को बाधा करता और जलवृष्टि से जगत् को आनन्दित करता है, वैसे ही शत्रुओं को बाधित करके सज्जनों को आनन्द दीजिये॥२॥

भि॒नद्गि॒रिं शव॑सा॒ वज्र॑मि॒ष्णन्ना॑विष्कृण्वा॒नः स॑हसा॒न ओजः॑। वधी॑द्वृ॒त्रं वज्रे॑ण मन्दसा॒नः सर॒न्नापो॒ जव॑सा ह॒तवृ॑ष्णीः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग सूर्य्य के सदृश न्याय से प्रकाश बल से प्रसिद्ध, दुष्टों के नाशकारक और श्रेष्ठ पुरुषों के लिये आनन्ददायक होते हैं, वे ही प्रकट यशवाले होकर इस संसार में और परलोक अर्थात् दूसरे जन्म में अखण्ड आनन्दवाले होते हैं॥३॥

सु॒वीर॑स्ते जनि॒ता म॑न्यत॒ द्यौरिन्द्र॑स्य क॒र्ता स्वप॑स्तमो भूत्। य ईं॑ ज॒जान॑ स्व॒र्यं॑ सु॒वज्र॒मन॑पच्युतं॒ सद॑सो॒ न भूम॑॥

इस मन्त्र में उपमावाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे राजन्! जैसे श्रेष्ठ लोग अति उत्तम राजा को प्राप्त होकर और न्याय का प्रचार करके यशवाले होते हैं, इसी प्रकार यदि आप धर्मयुक्त ब्रह्मचर्य्य से पुत्रेष्टिकर्म्म की रीति से अपनी प्रिया में पुत्र उत्पन्न करें तो वह भी प्रसिद्ध यशवाला होवे॥४॥

य एक॒ इच्च्या॒वय॑ति॒ प्र भूमा॒ राजा॑ कृष्टी॒नां पु॑रुहू॒त इन्द्रः॑। स॒त्यमे॑न॒मनु॒ विश्वे॑ मदन्ति रा॒तिं दे॒वस्य॑ गृण॒तो म॒घोनः॑॥

वही राजा हो सकता है, जो एक भी बहुत शत्रुओं को जीत सकता है और वही विजयी होता है, जो श्रेष्ठ पुरुषों के सङ्ग और उपदेश को प्राप्त होकर धर्मयुक्त न्याय निरन्तर करता है॥५॥

स॒त्रा सोमा॑ अभवन्नस्य॒ विश्वे॑ स॒त्रा मदा॑सो बृह॒तो मदि॑ष्ठाः। स॒त्राभ॑वो॒ वसु॑पति॒र्वसू॑नां॒ दत्रे॒ विश्वा॑ अधिथा इन्द्र कृ॒ष्टीः॥

जो राजा जैसे अपने निमित्त प्रिय की इच्छा करे, वैसे ही प्रजाओं के लिये सुख देवे, उसी के उत्तम सभासद् और अत्यन्त ऐश्वर्य बढ़े॥६॥

त्वमध॑ प्रथ॒मं जाय॑मा॒नोऽमे॒ विश्वा॑ अधिथा इन्द्र कृ॒ष्टीः। त्वं प्रति॑ प्र॒वत॑ आ॒शया॑न॒महिं॒ वज्रे॑ण मघव॒न्वि वृ॑श्चः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो पुरुष प्रथम से ब्रह्मचर्य्य, विद्या, विनय और सुशीलता से सब में उत्तम होता है और जो राज्यपालन और युद्ध करने को जानता है, उसी को राजा करके सुखी होओ॥७॥

स॒त्रा॒हणं॒ दाधृ॑षिं॒ तुम्र॒मिन्द्रं॑ म॒हाम॑पा॒रं वृ॑ष॒भं सु॒वज्र॑म्। हन्ता॒ यो वृ॒त्रं सनि॑तो॒त वाजं॒ दाता॑ म॒घानि॑ म॒घवा॑ सु॒राधाः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो पूर्णविद्यायुक्त, सत्यवादी, प्रगल्भ, बलिष्ठ, शस्त्र और अस्त्रों का चलानेवाला और अभयदाता पुरुष हो; उसी को राज्य के लिये नियत करो॥८॥

अ॒यं वृत॑श्चातयते समी॒चीर्य आ॒जिषु॑ म॒घवा॑ शृ॒ण्व एकः॑। अ॒यं वाजं॑ भरति॒ यं स॒नोत्य॒स्य प्रि॒यासः॑ स॒ख्ये स्या॑म॥

हे राजन्! जो सेनाओं को शिक्षा दिलाता है, विशेष करके युद्ध के समय में उचित बात कहने से योद्धाजनों का उत्साह बढ़ाता है और जो जन सम्मुख आपके दोषों को कहते हैं, उनकी शिक्षा में स्थित होकर, उन्हीं जनों में मित्रता करके सम्पूर्ण कार्य्यों को सिद्ध करो॥९॥

अ॒यं शृ॑ण्वे॒ अध॒ जय॑न्नु॒त घ्नन्न॒यमु॒त प्र कृ॑णुते यु॒धा गाः। य॒दा स॒त्यं कृ॑णु॒ते म॒न्युमिन्द्रो॒ विश्वं॑ दृ॒ळ्हं भ॑यत॒ एज॑दस्मात्॥

हे राजन्! जिस उत्तम कीर्त्ति को आप सुनें और जो लोग राज्यपालन और युद्ध में चतुर हों, उनका स्वीकार करके सत्याचार से वर्ताव कर शान्ति से सज्जनों का अच्छे प्रकार पालन करके दुष्टजनों को निरन्तर दण्ड देवें, तभी सब जन धर्म के मार्ग का त्याग करके इधर-उधर न चलित होवें॥१०॥

समिन्द्रो॒ गा अ॑जय॒त्सं हिर॑ण्या॒ सम॑श्वि॒या म॒घवा॒ यो ह॑ पू॒र्वीः। ए॒भिर्नृभि॒र्नृत॑मो अस्य शा॒कै रा॒यो वि॑भ॒क्ता सं॑भ॒रश्च॒ वस्वः॑॥

जो उत्तम सहाय और उत्तम धन सामग्रीयुक्त तथा शत्रुओं का जीतने और यथायोग्यों के लिये विभाग करके देनेवाला विद्वान् राजा होवे, वही विजय को प्राप्त होकर आनन्द करे॥११॥

किय॑त्स्वि॒दिन्द्रो॒ अध्ये॑ति मा॒तुः किय॑त्पि॒तुर्ज॑नि॒तुर्यो ज॒जान॑। यो अ॑स्य॒ शुष्मं॑ मुहु॒कैरिय॑र्ति॒ वातो॒ न जू॒तः स्त॒नय॑द्भिर॒भ्रैः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य माता और पिता का कितना उपकार है, ऐसा जानकर प्रत्युपकार करते हैं, वे मेघ और वायु से प्रेरित बिजुली के सदृश बल को प्राप्त होकर बारंबार शत्रुओं को जीतकर प्रकट यशवाले होते हैं॥१२॥

क्षि॒यन्तं॑ त्व॒मक्षि॑यन्तं कृणो॒तीय॑र्ति रे॒णुं म॒घवा॑ स॒मोह॑म्। वि॒भ॒ञ्ज॒नुर॒शनि॑माँइव॒ द्यौरु॒त स्तो॒तारं॑ म॒घवा॒ वसौ॑ धात्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! आप जो अपराध करे उसको दण्ड के विना मत छोड़ो और जैसे यजमान विद्वान् जन को यज्ञ में स्वीकार करके धन देके सुख देता है, वैसे ही श्रेष्ठ सभासदों को स्वीकार करके ऐश्वर्य दे सब को आनन्द दीजिये॥१३॥

अ॒यं च॒क्रमि॑षण॒त्सूर्य॑स्य॒ न्येत॑शं रीरमत्ससृमा॒णम्। आ कृ॒ष्ण ईं॑ जुहुरा॒णो जि॑घर्ति त्व॒चो बु॒घ्ने रज॑सो अ॒स्य योनौ॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य कलाकौशल से चक्रयन्त्रों का निर्म्माण करके वेगयुक्त वाहनों को प्राप्त होकर रमण करते हैं, वे ऐश्वर्य को प्राप्त होकर और कुटिलता को त्याग करके सुख को प्राप्त होते हैं॥१४॥

असि॑क्न्यां॒ यज॑मानो॒ न होता॑॥

जिस राजा के प्रजाजनों में प्राणियों वा शयन किये हुओं में दण्ड जागता है, वह अभय का देनेवाला पुरुष किसी से भी भय को नहीं प्राप्त होता है॥१५॥

ग॒व्यन्त॒ इन्द्रं॑ स॒ख्याय॒ विप्रा॑ अश्वा॒यन्तो॒ वृष॑णं वा॒जय॑न्तः। ज॒नी॒यन्तो॑ जनि॒दामक्षि॑तोति॒मा च्या॑वयामोऽव॒ते न कोश॑म्॥

इस मन्त्र में उपमावाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जिनको सुख और ऐश्वर्य्य की इच्छा होवे, वे मेघ के सदृश धन वर्षाने और नित्य रक्षा करनेवाले राजा को मित्रभाव के लिये ग्रहण करें॥१६॥

त्रा॒ता नो॑ बोधि॒ ददृ॑शान आ॒पिर॑भिख्या॒ता म॑र्डि॒ता सो॒म्याना॑म्। सखा॑ पि॒ता पि॒तृत॑मः पितॄ॒णां कर्ते॑मु लो॒कमु॑श॒ते व॑यो॒धाः॥

हे मनुष्यो! जो जगदीश्वर मित्र के तुल्य सब का सुखकर्त्ता, सत्य का उपदेश देनेवाला, उत्पन्न करनेवालों का उत्पन्नकर्त्ता, पालन करनेवालों का पालनकर्त्ता, सब कर्म्मों का देखनेवाला, न्यायाधीश, अन्तर्य्यामी अभिव्याप्त है, उसी को जानकर उपासना करो॥१७॥

स॒खी॒य॒ताम॑वि॒ता बो॑धि॒ सखा॑ गृणा॒न इ॑न्द्र स्तुव॒ते वयो॑ धाः। व॒यं ह्या ते॑ चकृ॒मा स॒बाध॑ आ॒भिः शमी॑भिर्म॒हय॑न्त इन्द्र॥

हे राजन्! यदि राज्य बढ़वाने की आप इच्छा करें तो पक्षपात का त्याग करके सब के साथ मित्र के सदृश वर्त्ताव करिये और श्रेष्ठ पुरुषों की रक्षा करते और दुष्ट पुरुषों को दण्ड देते हुए अपने तेज की प्रसिद्धि करिये॥१८॥

स्तु॒त इन्द्रो॑ म॒घवा॒ यद्ध॑ वृ॒त्रा भूरी॒ण्येको॑ अप्र॒तीनि॑ हन्ति। अ॒स्य प्रि॒यो ज॑रि॒ता यस्य॒ शर्म॒न्नकि॑र्दे॒वा वा॒रय॑न्ते॒ न मर्ताः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा सत्य के उपदेशक अपने प्रियकारक विद्वानों की राजकृत्य में रक्षा करे, उसका पराजय करने को कोई भी नहीं समर्थ होवे॥१९॥

ए॒वा न॒ इन्द्रो॑ म॒घवा॑ विर॒प्शी कर॑त्स॒त्या च॑र्षणी॒धृद॑न॒र्वा। त्वं राजा॑ ज॒नुषां॑ धेह्य॒स्मे अधि॒ श्रवो॒ माहि॑नं॒ यज्ज॑रि॒त्रे॥

जो मनुष्य अन्याय में प्रवर्त्तमान राजा को रोकते हैं, वे सत्य के प्रचार करनेवाले होते हुए बड़े सुख को प्राप्त होते हैं॥२०॥

नू ष्टु॒त इ॑न्द्र॒ नू गृ॑णा॒न इषं॑ जरि॒त्रे न॒द्यो॒३॒॑ न पी॑पेः। अका॑रि ते हरिवो॒ ब्रह्म॒ नव्यं॑ धि॒या स्या॑म र॒थ्यः॑ सदा॒साः॥

हे मनुष्यो! जो अति उत्तम गुण, कर्म, स्वभाव और विद्या से युक्त और प्रजा के हित के लिये धन और अन्नों को बढ़ाता है, उसके अनुकूलपन से वर्त्ताव करके सेना के अङ्गों का दृढ़ सम्पादन करना चाहिये॥२१॥इस सूक्त में इन्द्र, राजा,प्रजा और भृत्यों के गुण वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥२१॥यह सत्रहवाँ सूक्त और चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒यं पन्था॒ अनु॑वित्तः पुरा॒णो यतो॑ दे॒वा उ॒दजा॑यन्त॒ विश्वे॑। अत॑श्चि॒दा ज॑निषीष्ट॒ प्रवृ॑द्धो॒ मा मा॒तर॑ममु॒या पत्त॑वे कः॥

हे मनुष्यो! जिस मार्ग से यथार्थवक्ता पुरुष जावें, उसी मार्ग से आप लोग भी चलो, जो बड़ी वृद्धि भी होवे तो भी माता का अपमान किसी को न करना चाहिये॥१॥

नाहमतो॒ निर॑या दु॒र्गहै॒तत्ति॑र॒श्चता॑ पा॒र्श्वान्निर्ग॑माणि। ब॒हूनि॑ मे॒ अकृ॑ता॒ कर्त्वा॑नि॒ युध्यै॑ त्वेन॒ सं त्वे॑न पृच्छै॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे मैं कर्म नहीं करता हूँ और करके न किये गये न रखता हूँ, मेरे साथ जो युद्ध की इच्छा करे, उसके साथ युद्ध में पूछने योग्य को पूछता हूँ, वैसे इस सब का आचरण करो॥२॥

प॒रा॒य॒तीं मा॒तर॒मन्व॑चष्ट॒ न नानु॑ गा॒न्यनु॒ नू ग॑मानि। त्वष्टु॑र्गृ॒हे अ॑पिब॒त्सोम॒मिन्द्रः॑ शतध॒न्यं॑ च॒म्वोः॑ सु॒तस्य॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सेना के अधीश राजगृह में सत्कार को प्राप्त होकर, नियमित आहार और विहार से पूर्ण बल को करके, दोनों अपनी और शत्रुओं की सेना के मध्य में विवाद का नाश करें वा युद्ध करावें, उनका सदा ही विजय और जैसे रोगग्रस्त माता की सन्तान सेवा करते हैं, वैसे ही सेना का सेवन करते हैं, वे न्याय के अनुगामी होते हैं॥३॥

किं स ऋध॑क्कृणव॒द्यं स॒हस्रं॑ मा॒सो ज॒भार॑ श॒रद॑श्च पू॒र्वीः। न॒ही न्व॑स्य प्रति॒मान॒मस्त्य॒न्तर्जा॒तेषू॒त ये जनि॑त्वाः॥

हे मनुष्यो! जैसे काल, मास आदि अवयवों को धारण करता है और आप अनन्त हुआ संसार में उत्पन्न हुओं में नापनेवाला है, वैसे ही आप लोग भी करो॥४॥

अ॒व॒द्यमि॑व॒ मन्य॑माना॒ गुहा॑क॒रिन्द्रं॑ मा॒ता वी॒र्ये॑णा॒ न्यृ॑ष्टम्। अथोद॑स्थात्स्व॒यमत्कं॒ वसा॑न॒ आ रोद॑सी अपृणा॒ज्जाय॑मानः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो माता सूर्य के सदृश जिन अपने सन्तानों को बोध कराती और दुष्ट आचरणों को दूर करके शिक्षा करती है, तो वे सन्तान उत्तम होते हैं॥५॥

ए॒ता अ॑र्षन्त्यलला॒भव॑न्तीर्ऋ॒ताव॑रीरिव सं॒क्रोश॑मानाः। ए॒ता वि पृ॑च्छ॒ किमि॒दं भ॑नन्ति॒ कमापो॒ अद्रिं॑ परि॒धिं रु॑जन्ति॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! यह नदियाँ मेघों की पुत्रियाँ अर्थात् उनसे उत्पन्न हुई तटों को तोड़ती और अव्यक्त शब्दों को करती हुई प्रातःकालों के सदृश जाती हैं, वैसे ही सेना शत्रुओं के सम्मुख प्राप्त होवें॥६॥

किमु॑ ष्विदस्मै नि॒विदो॑ भन॒न्तेन्द्र॑स्याव॒द्यं दि॑धिषन्त॒ आपः॑। ममै॒तान्पु॒त्रो म॑ह॒ता व॒धेन॑ वृ॒त्रं ज॑घ॒न्वाँ अ॑सृज॒द्वि सिन्धू॑न्॥

इस मन्त्र में अदिति, सूर्य्य और मेघ के अलङ्कार से सेना, सभाध्यक्ष और राजा के कृत्य का वर्णन है। जैसे अन्तरिक्ष के पुत्र के समान वर्त्तमान सूर्य्य मेघ का नाश करके नदियों को बहाता है, वैसे ही विद्वान् का उत्तम प्रकार शिक्षित पुत्र सेना का अध्यक्ष शत्रुओं का नाश करके सेनाओं को ऐश्वर्य्य प्राप्त कराता है॥७॥

मम॑च्च॒न त्वा॑ युव॒तिः प॒रास॒ मम॑च्च॒न त्वा॑ कु॒षवा॑ ज॒गार॑। मम॑च्चि॒दापः॒ शिश॑वे ममृड्यु॒र्मम॑च्चि॒दिन्द्रः॒ सह॒सोद॑तिष्ठत्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग प्रमत्त स्त्रियों में प्रमाद को नहीं प्राप्त होते, वे बली होते हैं और जो पुत्र के सदृश प्रजाओं का पालन करते, वे उत्तम होते हैं॥८॥

मम॑च्च॒न ते॑ मघव॒न्व्यं॑सो निविवि॒ध्वाँ अप॒ हनू॑ ज॒घान॑। अधा॒ निवि॑द्ध॒ उत्त॑रो बभू॒वाञ्छिरो॑ दा॒सस्य॒ सं पि॑णग्व॒धेन॑॥

हे राजन्! जो विरुद्ध कर्म से प्रजाओं में चेष्टा करता है, उस सदा दृढ़ बँधे को शस्त्रों से व्यथित कर सब प्रकार से बाँधो॥९॥

गृ॒ष्टिः स॑सूव॒ स्थवि॑रं तवा॒गाम॑नाधृ॒ष्यं वृ॑ष॒भं तुम्र॒मिन्द्र॑म्। अरी॑ळ्हं व॒त्सं च॒रथा॑य मा॒ता स्व॒यं गा॒तुं त॒न्व॑ इ॒च्छमा॑नम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! जैसे उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त किये हुए अन्न आदि का समय पर नियमित भोजन किया गया शरीर को पुष्ट कर बल को बढ़ाय शत्रुओं का विजयनिमित्तक हो राज्य को बढ़ाता है, वैसे ही आप न्याय से हम लोगों के सुख की वृद्धि करो॥१०॥

उ॒त मा॒ता म॑हि॒षमन्व॑वेनद॒मी त्वा॑ जहति पुत्र दे॒वाः। अथा॑ब्रवीद्वृ॒त्रमिन्द्रो॑ हनि॒ष्यन्त्सखे॑ विष्णो वित॒रं वि क्र॑मस्व॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सन्तानों की योग्यता है कि जैसे विद्वान् माता पिता ब्रह्मचर्य आदि से विद्या का ग्रहण और शरीर के सुख के वर्धन का उपदेश करें, वैसे ही करना चाहिये और जो उत्तम शीलयुक्त पुत्र होते हैं, उन्हीं पर यथार्थवक्ता अध्यापक लोग कृपा करते और दुर्व्यसनियों का त्याग करते हैं॥११॥

कस्ते॑ मा॒तरं॑ वि॒धवा॑मचक्रच्छ॒युं कस्त्वाम॑जिघांस॒च्चर॑न्तम्। कस्ते॑ दे॒वो अधि॑ मार्डी॒क आ॑सी॒द्यत्प्राक्षि॑णाः पि॒तरं॑ पाद॒गृह्य॑॥

हे सन्तानो! जो पुरुष वा स्त्रियाँ आप लोगों के पितरों का नाश करके माताओं को विधवा करें और आप लोगों का भी नाश करें, उनका विश्वास आप लोग न करिये॥१२॥

अव॑र्त्या॒ शुन॑ आ॒न्त्राणि॑ पेचे॒ न दे॒वेषु॑ विविदे मर्डि॒तार॑म्। अप॑श्यं जा॒यामम॑हीयमाना॒मधा॑ मे श्ये॒नो मध्वा ज॑भार॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! जो पुरुष और स्त्रियाँ व्यभिचार करें, उनको तीव्र दण्ड देकर नाश करो॥१३॥इस सूक्त में इन्द्र, मेघ, राजा और विद्वान् के कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥१३॥यह तृतीय अष्टक में पाँचवाँ अध्याय अठारहवाँ सूक्त और छब्बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

ए॒वा त्वामि॑न्द्र वज्रि॒न्नत्र॒ विश्वे॑ दे॒वासः॑ सु॒हवा॑स॒ ऊमाः॑। म॒हामु॒भे रोद॑सी वृ॒द्धमृ॒ष्वं निरेक॒मिद्वृ॑णते वृत्र॒हत्ये॑॥

जो विद्वान् लोग अतिश्रेष्ठ गुणवाले राजा को स्वीकार करें, वे ही पूर्ण सुखवाले होते हैं॥१॥

अवा॑सृजन्त॒ जिव्र॑यो॒ न दे॒वा भुवः॑ स॒म्राळि॑न्द्र स॒त्ययो॑निः। अह॒न्नहिं॑ परि॒शया॑न॒मर्णः॒ प्र व॑र्त॒नीर॑रदो वि॒श्वधे॑नाः॥

इस मन्त्र में उपमावाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे राजन्! आप सत्य आचरण करनेवाले हुए यथार्थ वक्ताओं के सहाय से चक्रवर्त्ती सार्वभौम हूजिये और जैसे सूर्य्य मेघ का नाश करके संसार को सुख देता है, वैसे चोर डाकुओं का नाश करके प्रजाओं को आनन्द दीजिये॥२॥

अतृ॑प्णुवन्तं॒ विय॑तमबु॒ध्यमबु॑ध्यमानं सुषुपा॒णमि॑न्द्र। स॒प्त प्रति॑ प्र॒वत॑ आ॒शया॑न॒महिं॒ वज्रे॑ण॒ वि रि॑णा अप॒र्वन्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य किरणों से मेघ को काट के और पृथिवी पर गिरा के नाना प्रकार के मार्गों में बहाता है, वैसे ही विद्या से अविद्या का नाश करके दण्ड से अधार्मिक पुरुषों को कारगृह अर्थात् जेलखाने में छोड़ के बहुत शाखायुक्त नीति का सर्वत्र प्रचार करे॥३॥

अक्षो॑दय॒च्छव॑सा॒ क्षाम॑ बु॒ध्नं वार्ण वात॒स्तवि॑षीभि॒रिन्द्रः॑। दृ॒ळ्हान्यौ॑भ्नादु॒शमा॑न॒ ओजोऽवा॑भिनत्क॒कुभः॒ पर्व॑तानाम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे वायु अग्नि से सूक्ष्म किये हुए जल को अन्तरिक्ष में पहुँचा और वर्षा कर संसार को आनन्द देता है, वैसे ही सामग्री, विद्या और सेना के सहित राजा दुष्टों को न्यून करके दण्ड और उपदेश से दुष्टों का नाश कर और सज्जनों को सिद्ध करके प्रजाओं को निरन्तर सुख दीजिये॥४॥

अ॒भि प्र द॑द्रु॒र्जन॑यो॒ न गर्भं॒ रथा॑इव॒ प्र य॑युः सा॒कमद्र॑यः। अत॑र्पयो वि॒सृत॑ उ॒ब्ज ऊ॒र्मीन्त्वं वृ॒ताँ अ॑रिणा इन्द्र॒ सिन्धू॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिस राजा की मेघ के सदृश ऊँची और वाहनों के सदृश साथ चलनेवाली सेनायें चलती हैं, उसका सूर्य्य के सदृश विजय होता है॥५॥

त्वं म॒हीम॒वनिं॑ वि॒श्वधे॑नां तु॒र्वीत॑ये व॒य्या॑य॒ क्षर॑न्तीम्। अर॑मयो॒ नम॒सैज॒दर्णः॑ सुतर॒णाँ अ॑कृणोरिन्द्र॒ सिन्धू॑न्॥

हे राजन्! आप जो राज्य को प्राप्त हो, आप ही आनन्दित हो हम लोगों को नहीं आनन्द देवें तो आपका आनन्द शीघ्र नष्ट हो और आप सब लोगों के सुख के लिये नदी, नद, तड़ाग और समुद्र आदिकों के पार उतरने के लिये नौका आदि बना के धनाढ्य निरन्तर करिये॥६॥

प्राग्रुवो॑ नभ॒न्वो॒३॒॑ न वक्वा॑ ध्व॒स्रा अ॑पिन्वद्युव॒तीर्ऋ॑त॒ज्ञाः। धन्वा॒न्यज्राँ॑ अपृणक्तृषा॒णाँ अधो॒गिन्द्रः॑ स्त॒र्यो॒३॒॑ दंसु॑पत्नीः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जिस राजा की नदी के सदृश और शत्रुओं के नाश करनेवाली, अन्न और पान आदि से तृप्त और अपने विवर के ढाँपनेवाली पतिव्रता स्त्रियों के सदृश राजभक्त सेना होवे, वही विजय प्राप्त होने योग्य है॥७॥

पू॒र्वीरु॒षसः॑ श॒रद॑श्च गू॒र्ता वृ॒त्रं ज॑घ॒न्वाँ अ॑सृज॒द्वि सिन्धू॑न्। परि॑ष्ठिता अतृणद्बद्बधा॒नाः सी॒रा इन्द्रः॒ स्रवि॑तवे पृथि॒व्या॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा प्रातःकाल के सदृश उत्तम नीति और नदी के समूह के सदृश सेना को निर्मित करता है, वही पृथिवी के राज्य के योग्य है॥८॥

व॒म्रीभिः॑ पु॒त्रम॒ग्रुवो॑ अदा॒नं नि॒वेश॑नाद्धरिव॒ आ ज॑भर्थ। व्य१॒॑न्धो अ॑ख्य॒दहि॑माददा॒नो निर्भू॑दुख॒च्छित्सम॑रन्त॒ पर्व॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! अपना पुत्र भी बुरे लक्षणोंवाला हो तो नहीं अधिकार देने योग्य है और वर्षाकालों में नदियाँ बढ़ती हैं, वैसे ही प्रजाओं की वृद्धि करनी चाहिये॥९॥

प्र ते॒ पूर्वा॑णि॒ कर॑णानि विप्रावि॒द्वाँ आ॑ह वि॒दुषे॒ करां॑सि। यथा॑यथा॒ वृष्ण्या॑नि॒ स्वगू॒र्तापां॑सि राज॒न्नर्यावि॑वेषीः॥

हे विद्वन् राजन्! आप सदा श्रेष्ठ पुरुषों की शिक्षा में प्रवृत्त हूजिये और जो-जो आपके लिये वे उपदेश देवें, वैसे ही करिये॥१०॥

नू ष्टु॒त इ॑न्द्र॒ नू गृ॑णा॒न इषं॑ जरि॒त्रे न॒द्यो॒३॒॑ न पी॑पेः। अका॑रि ते हरिवो॒ ब्रह्म॒ नव्यं॑ धि॒या स्या॑म र॒थ्यः॑ सदा॒साः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजन्! जो प्रशंसित कर्म्म करें, उनका आप निरन्तर सत्कार करिये और वे आपके अनुकूल हुए और तुम लोग सब धर्म्म, अर्थ और काम के साधक हूजिये॥११॥इस सूक्त में इन्द्र, मेघ, सेना, सेनापति, राजा, प्रजा और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥११॥यह उन्निसवाँ सूक्त और द्वितीय वर्ग समाप्त हुआ॥

आ न॒ इन्द्रो॑ दू॒रादा न॑ आ॒साद॑भिष्टि॒कृदव॑से यासदु॒ग्रः। ओजि॑ष्ठेभिर्नृ॒पति॒र्वज्र॑बाहुः स॒ङ्गे स॒मत्सु॑ तु॒र्वणिः॑ पृत॒न्यून्॥

हे मनुष्यो! सब प्रकार से रक्षा करनेवाले, बड़े बलिष्ठ, विद्या और बलयुक्त श्रेष्ठ सेनाजनों के सहित वर्त्तमान और सङ्ग्राम में जीतनेवाले राजा को स्वीकार करके सब काल में आनन्द करो॥१॥

आ न॒ इन्द्रो॒ हरि॑भिर्या॒त्वच्छा॑र्वाची॒नोऽव॑से॒ राध॑से च। तिष्ठा॑ति व॒ज्री म॒घवा॑ विर॒प्शीमं य॒ज्ञमनु॑ नो॒ वाज॑सातौ॥

जो राजा उत्तम सभा के जनों से प्रजा के सुख के लिये अन्न और धन बहुत करके सङ्ग्राम में जीतनेवाला न्यायकारी होवे, वही राजा होने को योग्य होवे॥२॥

इ॒मं य॒ज्ञं त्वम॒स्माक॑मिन्द्र पु॒रो दध॑त्सनिष्यसि॒ क्रतुं॑ नः। श्व॒ध्नीव॑ वज्रिन्त्स॒नये॒ धना॑नां॒ त्वया॑ व॒यम॒र्य आ॒जिं ज॑येम॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जहाँ राजा मन्त्रियों और मन्त्री राजा को प्रसन्न करके और विभाग कर दे और ग्रहण करके प्रीति से बलिष्ठ हुए ही ऐश्वर्य्य के लिये जैसे भेड़िनी बकरी को मारे, वैसे शत्रुओं का नाश करके विजय से भूषित होते हैं, वहीं सम्पूर्ण सुख होते हैं॥३॥

उ॒शन्नु॒ षु णः॑ सु॒मना॑ उपा॒के सोम॑स्य॒ नु सुषु॑तस्य स्वधावः। पा इ॑न्द्र॒ प्रति॑भृतस्य॒ मध्वः॒ समन्ध॑सा ममदः पृ॒ष्ठ्ये॑न॥

जो राजा प्रेम से भृत्यजनों के समूह की ऐश्वर्य और अन्न आदि से रक्षा करता है, वह कामना की सिद्धि को प्राप्त होकर फिर निरन्तर आनन्द को प्राप्त होता है॥४॥

वि यो र॑र॒प्श ऋषि॑भि॒र्नवे॑भिर्वृ॒क्षो न प॒क्वः सृण्यो॒ न जेता॑। मर्यो॒ न योषा॑म॒भि मन्य॑मा॒नोऽच्छा॑ विवक्मि पुरुहू॒तमिन्द्र॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो यथार्थवक्ता जनों में प्रशंसा को प्राप्त, वृक्ष के सदृश दृढ़ उत्साहरूप फलवान्, अकेला सेना के सदृश जीतनेवाला, पतिव्रता स्त्री के सदृश प्रजा में प्रसन्न होवे, उस प्रशंसित को राजा आप लोग मानो॥५॥

गि॒रिर्न यः स्वत॑वाँ ऋ॒ष्व इन्द्रः॑ स॒नादे॒व सह॑से जा॒त उ॒ग्रः। आद॑र्ता॒ वज्रं॒ स्थवि॑रं॒ न भी॒म उ॒द्नेव॒ कोशं॒ वसु॑ना॒ न्यृ॑ष्टम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो मेघ के सदृश बड़ा प्रजाओं का सुख करने और सनातनधर्म्म का सेवन करनेवाला, बिजुली के सदृश भयंकर, नहीं नाश होनेवाले खजाने से युक्त, शत्रुओं का नाश करनेवाला और बलवान् होवे, वह सब का राजा होने को योग्य है, ऐसा जानिये॥६॥

न यस्य॑ व॒र्ता ज॒नुषा॒ न्वस्ति॒ न राध॑स आमरी॒ता म॒घस्य॑। उ॒द्वा॒वृ॒षा॒णस्त॑विषीव उग्रा॒स्मभ्यं॑ दद्धि पुरुहूत रा॒यः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जिसका उत्तम कुल में जन्म और जिसका कुल प्रशंसित कर्म्म किये गये के समान और जिसका संग्राम में वा विचार में रोकनेवाला नहीं है, वही सुख देनेवाला राजा हम लोगों का होवे, ऐसी हम लोग इच्छा करें॥७॥

ईक्षे॑ रा॒यः क्षय॑स्य चर्षणी॒नामु॒त व्र॒जम॑पव॒र्तासि॒ गोना॑म्। शि॒क्षा॒न॒रः स॑मि॒थेषु॑ प्र॒हावा॒न्वस्वो॑ रा॒शिम॑भिने॒तासि॒ भूरि॑म्॥

वही राजा दिशाओं में यशस्वी होवे कि जो मनुष्यों को विद्या, धन और उत्तम वास देकर संग्रामादिकों में निरन्तर सब की रक्षा करे॥८॥

कया॒ तच्छृ॑ण्वे॒ शच्या॒ शचि॑ष्ठो॒ यया॑ कृ॒णोति॒ मुहु॒ का चि॑दृ॒ष्वः। पु॒रु दा॒शुषे॒ विच॑यिष्ठो॒ अंहोऽथा॑ दधाति॒ द्रवि॑णं जरि॒त्रे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों की योग्यता है कि जैसे यथार्थवक्ता जन पापों का त्याग, धर्म्म का आचरण और यथार्थ ज्ञानस्वरूप ज्ञान को धारण करके जगत् के कल्याण के लिये बहुत ज्ञान को फैलाते हैं, वैसे ही आप लोग आचरण करो॥९॥

मा नो॑ मर्धी॒रा भ॑रा द॒द्धि तन्नः॒ प्र दा॒शुषे॒ दात॑वे॒ भूरि॒ यत्ते॑। नव्ये॑ दे॒ष्णे श॒स्ते अ॒स्मिन्त॑ उ॒क्थे प्र ब्र॑वाम व॒यमि॑न्द्र स्तु॒वन्तः॑॥

हे राजन्! आपके लिये करने योग्य कर्म्म जो-जो कहें उस-उसका आचरण करो और प्रजा, मन्त्री और राज्य की उन्नति के लिये बहुत धन, विद्या और न्याय को फैलाओ॥१०॥

नू ष्टु॒त इ॑न्द्र॒ नू गृ॑णा॒न इषं॑ जरि॒त्रे न॒द्यो॒३॒॑ न पी॑पेः। अका॑रि ते हरिवो॒ ब्रह्म॒ नव्यं॑ धि॒या स्या॑म र॒थ्यः॑ सदा॒साः॥

मन्त्री, सेना और प्रजाजनों को श्रेष्ठ कर्म्म करते हुए राजा की स्तुति जैसी कर्त्तव्य है, वैसी ही राजा को भी इन उत्तम कर्म्मों में प्रवर्त्तमान लोगों की प्रशंसा करनी चाहिये॥११॥इस सूक्त में इन्द्र, राजा, अमात्य और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पिछिले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥११॥यह बीसवाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ॥

आ या॒त्विन्द्रोऽव॑स॒ उप॑ न इ॒ह स्तु॒तः स॑ध॒माद॑स्तु॒ शूरः॑। वा॒वृ॒धा॒नस्तवि॑षी॒र्यस्य॑ पू॒र्वीर्द्यौर्न क्ष॒त्रम॒भिभू॑ति॒ पुष्या॑त्॥

जो राजा बिजुली के सदृश बलिष्ठ, सूर्य्य के सदृश उत्तम प्रकार प्रकाशित, सेना कर निष्कंटक अर्थात् दुष्टजनादिरहित राज्य को पुष्ट करे, वही इस संसार में सम्पूर्ण प्रतिष्ठा और सम्पूर्ण आनन्द को प्राप्त होके शरीर के त्याग के समय मोक्ष को प्राप्त होवे॥१॥

तस्येदि॒ह स्त॑वथ॒ वृष्ण्या॑नि तुविद्यु॒म्नस्य॑ तुवि॒राध॑सो॒ नॄन्। यस्य॒ क्रतु॑र्विद॒थ्यो॒३॒॑ न स॒म्राट् सा॒ह्वान्तरु॑त्रो अ॒भ्यस्ति॑ कृ॒ष्टीः॥

हे मनुष्यो! जिसकी पूर्णबलवाली सेना और बड़ा यश, असंख्य धन, पूर्णविद्या, उत्तम गुण, कर्म्म, स्वभाव और सहाय होवें; वही चक्रवर्त्ती राजा होने के योग्य होता है॥२॥

आ या॒त्विन्द्रो॑ दि॒व आ पृ॑थि॒व्या म॒क्षू स॑मु॒द्रादु॒त वा॒ पुरी॑षात्। स्व॑र्णरा॒दव॑से नो म॒रुत्वा॑न्परा॒वतो॑ वा॒ सद॑नादृ॒तस्य॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! जैसे सूर्य्य अन्तरिक्ष, प्रकाश, भूमि, जल और कार्य्य जगत् को व्याप्त होकर सब की रक्षा करता है, वैसे ही प्रतापी और उत्तम सहाययुक्त होकर और हम लोग की उत्तम प्रकार रक्षा करके प्रकाशित हूजिये॥३॥

स्थू॒रस्य॑ रा॒यो बृ॑ह॒तो य ईशे॒ तमु॑ ष्टवाम वि॒दथे॒ष्विन्द्र॑म्। यो वा॒युना॒ जय॑ति॒ गोम॑तीषु॒ प्र धृ॑ष्णु॒या नय॑ति॒ वस्यो॒ अच्छ॑॥

जो राजा बड़ी सेनाओं से सङ्ग्रामों में विजय को प्राप्त हो तथा बहुत धनों और प्रतिष्ठा को प्राप्त होकर प्रशंसित होता है, उसी की स्तुति करनी चाहिये॥४॥

उप॒ यो नमो॒ नम॑सि स्तभा॒यन्निय॑र्ति॒ वाचं॑ ज॒नय॒न्यज॑ध्यै। ऋ॒ञ्ज॒सा॒नः पु॑रु॒वार॑ उ॒क्थैरेन्द्रं॑ कृण्वीत॒ सद॑नेषु॒ होता॑॥

जो राजा विद्या और उत्तम शिक्षा से युक्त नीति को प्रकट करता, सत्कार करने के योग्यों का सत्कार करता, दुष्टों को दण्ड देता और प्रयत्न करता हुआ राज्य के पालन से ऐश्वर्य्य की उन्नति करता है, वही सर्वत्र सत्कृत होता है॥५॥

धि॒षा यदि॑ धिष॒ण्यन्तः॑ सर॒ण्यान्त्सद॑न्तो॒ अद्रि॑मौशि॒जस्य॒ गोहे॑। आ दु॒रोषाः॑ पा॒स्त्यस्य॒ होता॒ यो नो॑ म॒हान्त्सं॒वर॑णेषु॒ वह्निः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा आदि मनुष्य प्रशंसित पुरुषों की प्रशंसा करावें [=करें] और प्राप्त हुए पुरुषों की रक्षा करें तो वे श्रेष्ठ होवें॥६॥

स॒त्रा यदीं॑ भार्व॒रस्य॒ वृष्णः॒ सिष॑क्ति॒ शुष्मः॑ स्तुव॒ते भरा॑य। गुहा॒ यदी॑मौशि॒जस्य॒ गोहे॒ प्र यद्धि॒ये प्राय॑से॒ मदा॑य॥

जो कर्मचारी लोग धर्म से राज्य का शासन करते हुए राजा के राज्य में सत्य-न्याय से प्रजाओं का पालन करते हैं, वे अतुल आनन्द को प्राप्त होते हैं॥७॥

वि यद्वरां॑सि॒ पर्व॑तस्य वृ॒ण्वे पयो॑भिर्जि॒न्वे अ॒पां जवां॑सि। वि॒दद्गौ॒रस्य॑ गव॒यस्य॒ गोहे॒ यदी॒ वाजा॑य सु॒ध्यो॒३॒॑ वह॑न्ति॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे गवय के साधर्म्य को गौ धारण करती है, वैसे ही धार्मिक पुरुषों के साधर्म्य को राजा लोग धारण करें और जैसे मेघ जलदान से सब को तृप्त करता है, वैसे ही राजा अभयदान से सब को सुख देवे॥८॥

भ॒द्रा ते॒ हस्ता॒ सृकृ॑तो॒त पा॒णी प्र॑य॒न्तारा॑ स्तुव॒ते राध॑ इन्द्र। का ते॒ निष॑त्तिः॒ किमु॒ नो म॑मत्सि॒ किं नोदु॑दु हर्षसे॒ दात॒वा उ॑॥

हे राजन्! जिससे आप हम लोगों को आनन्द देते हो, इससे आनन्दित निरन्तर होते हो और जिससे आप सुवर्ण हस्त में धारण किये हुए दानसहित हस्तयुक्त हुए योग्यों का सत्कार करते हो, इससे आपकी कल्याण करनेवाली नीति है॥९॥

ए॒वा वस्व॒ इन्द्रः॑ स॒त्यः स॒म्राड्ढन्ता॑ वृ॒त्रं वरि॑वः पू॒रवे॑ कः। पुरु॑ष्टुत॒ क्रत्वा॑ नः शग्धि रा॒यो भ॑क्षी॒य तेऽव॑सो॒ दैव्य॑स्य॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सूर्य के सदृश प्रकाशित, न्याययुक्त, अभय का देनेवाला और सब प्रकार से सब का रक्षक नायक होवे, वही चक्रवर्त्ती होने के योग्य होता है॥१०॥

नू ष्टु॒त इ॑न्द्र॒ नू गृ॑णा॒न इषं॑ जरि॒त्रे न॒द्यो॒३॒॑ न पी॑पेः। अका॑रि ते हरिवो॒ ब्रह्म॒ नव्यं॑ धि॒या स्या॑म र॒थ्यः॑ सदा॒साः॥

जो जिसके लिये विद्या को देवे, उसकी सेवा उसको चाहिये कि यथायोग्य करे॥११॥इस सूक्त में इन्द्र, राजा और प्रजा के गुण वर्णन करने से इसके अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥११॥यह इक्कीसवाँ सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

यन्न॒ इन्द्रो॑ जुजु॒षे यच्च॒ वष्टि॒ तन्नो॑ म॒हान्क॑रति शु॒ष्म्या चि॑त्। ब्रह्म॒ स्तोमं॑ म॒घवा॒ सोम॑मु॒क्था यो अश्मा॑नं॒ शव॑सा॒ बिभ्र॒देति॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सूर्य्य मेघ को धारण करता और नाश करता है, वैसे ही जो राजा श्रेष्ठों को धारण करता और दुष्टों को दण्ड देता है, वही हम लोगों के पालन करने योग्य है॥१॥

वृषा॒ वृष॑न्धिं॒ चतु॑रश्रि॒मस्य॑न्नु॒ग्रो बा॒हुभ्यां॒ नृत॑मः॒ शची॑वान्। श्रि॒ये परु॑ष्णीमु॒षमा॑ण॒ ऊर्णां॒ यस्याः॒ पर्वा॑णि स॒ख्याय॑ वि॒व्ये॥

हे मनुष्यो! जो बाहुबल से दुष्टों का तिरस्कार करता हुआ मनुष्यों के उत्तम गुणों से उत्तम और मित्र के सदृश प्रजाओं को पालता है, वही लक्ष्मीवान् प्रजावान् न्यायाधीश राजा होने के योग्य होता है॥२॥

यो दे॒वो दे॒वत॑मो॒ जाय॑मानो म॒हो वाजे॑भिर्म॒हद्भि॑श्च॒ शुष्मैः॑। दधा॑नो॒ वज्रं॑ बा॒ह्वोरु॒शन्तं॒ द्याममे॑न रेजय॒त्प्र भूम॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो योग्य दण्ड से सूर्य्य, प्रकाश और भूगोलों को कम्पाते हुए के सदृश प्रजाओं को अधर्म्माचरण से कम्पाता है, वही पूर्ण विद्वान् राजा होता है॥३॥

विश्वा॒ रोधां॑सि प्र॒वत॑श्च पू॒र्वीर्द्यौर्ऋ॒ष्वाज्जनि॑मन्नेजत॒ क्षाः। आ मा॒तरा॒ भर॑ति शु॒ष्म्या गोर्नृ॒वत्परि॑ज्मन्नोनुवन्त॒ वाताः॑॥

हे मनुष्यो! जो प्रकृतिरूप कारण से उत्पन्न हुआ बड़ा अग्नि सम्पूर्ण भूगोलों का आकर्षण करता है, माता और पिता के सदृश सब का पालन करता और अन्तरिक्ष में घुमाता है, उसको जान के कार्य्य सिद्ध करो॥४॥

ता तू त॑ इन्द्र मह॒तो म॒हानि॒ विश्वे॒ष्वित्सव॑नेषु प्र॒वाच्या॑। यच्छू॑र धृष्णो धृष॒ता द॑धृ॒ष्वानहिं॒ वज्रे॑ण॒ शव॒सावि॑वेषीः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सूर्य्य किरणों से आकर्षण करके सम्पूर्ण भूगोलों को धारण करता है, वैसे ही बड़ी सत्पुरुष आदि सामग्री को करके राजा द्वीप और द्वीपान्तरों में स्थित राज्यों को शासन देवे॥५॥

ता तू ते॑ स॒त्या तु॑विनृम्ण॒ विश्वा॒ प्र धे॒नवः॑ सिस्रते॒ वृष्ण॒ ऊध्नः॑। अधा॑ ह॒ त्वद्वृ॑षमणो भिया॒नाः प्रसिन्ध॑वो॒ जव॑सा चक्रमन्त॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिस राजा की सफल वाणी और धर्मयुक्त कर्म्म वर्तमान है, उससे गौओं से बछड़ों के सदृश प्रजा तृप्त होती है और उससे दुष्ट डरते हैं और यश विस्तृत होता है॥६॥

अत्राह॑ ते हरिव॒स्ता उ॑ दे॒वीरवो॑भिरिन्द्र स्तवन्त॒ स्वसा॑रः। यत्सी॒मनु॒ प्र मु॒चो ब॑द्बधा॒ना दी॒र्घामनु॒ प्रसि॑तिं स्यन्द॒यध्यै॑॥

हे राजा आदि मनुष्यो! जैसे आप लोग ब्रह्मचर्य से विद्याओं को पढ़कर राजनीति से राज्य का पालन करते हैं, वैसे ही आप लोगों की स्त्रियाँ स्त्रियों का न्याय करें। ऐसा करने पर दृढ़ राज्यधर्म्म का प्रबन्ध होता है, ऐसा जानना चाहिये॥७॥

पि॒पी॒ळे अं॒शुर्मद्यो॒ न सिन्धु॒रा त्वा॒ शमी॑ शशमा॒नस्य॑ श॒क्तिः। अ॒स्म॒द्र्य॑क्शुशुचा॒नस्य॑ यम्या आ॒शुर्न र॒श्मिं तु॒व्योज॑सं॒ गोः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे प्रजाजनो! जो लोग अपने राजा को पीड़ा देवें, वे आप लोगों से नाश करने योग्य हैं और जैसे रात्रि[याँ] किरणों को नष्ट करती हैं, वैसे ही धार्म्मिक राजा के बल को प्राप्त होकर शत्रु दूर होते हैं॥८॥

अ॒स्मे वर्षि॑ष्ठा कृणुहि॒ ज्येष्ठा॑ नृ॒म्णानि॑ स॒त्रा स॑हुरे॒ सहां॑सि। अ॒स्मभ्यं॑ वृ॒त्रा सु॒हना॑नि रन्धि ज॒हि वध॑र्व॒नुषो॒ मर्त्य॑स्य॥

हे राजा आदि जनो! आप लोग मिल के प्रजा को पीड़ा देनेवाले के बल का नाश करो और जो आप लोगों के उत्तम वस्तु उनको हम लोगों में धारण कीजिये और जो हम लोगों के उत्तम रत्न उनको आप लोग धरें॥९॥

अ॒स्माक॒मित्सु शृ॑णुहि॒ त्वमि॑न्द्रा॒स्मभ्यं॑ चि॒त्राँ उप॑ माहि॒ वाजा॑न्। अ॒स्मभ्यं॒ विश्वा॑ इषणः॒ पुर॑न्धीर॒स्माकं॒ सु म॑घवन्बोधि गो॒दाः॥

हे मनुष्यो! जो लोग हम लोगों के नीति के अनुकूल वचनों को सुनते और हम लोगों को विद्वान् करते हैं, उन लोगों की सेवा हम लोगों को चाहिये कि निरन्तर करें॥१०॥

नू ष्टु॒त इ॑न्द्र॒ नू गृ॑णा॒न इषं॑ जरि॒त्रे न॒द्यो॒३॒॑ न पी॑पेः। अका॑रि ते हरिवो॒ ब्रह्म॒ नव्यं॑ धि॒या स्या॑म र॒थ्यः॑ सदा॒साः॥

हे विद्वन्! जिससे आप सब के लिये विद्या देते हो, इससे आपके साथ मित्रता करके आपके लिये बहुत धन और अन्न देकर निरन्तर सत्कार करें॥११॥इस सूक्त में इन्द्र, पृथिवी, धारण, भ्रमण, विद्वान्, अध्यापक और उपदेशक के गुण वर्णन करने से इस के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥११॥यह बाइसवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

क॒था म॒हाम॑वृध॒त्कस्य॒ होतु॑र्य॒ज्ञं जु॑षा॒णो अ॒भि सोम॒मूधः॑। पिब॑न्नुशा॒नो जु॒षमा॑णो॒ अन्धो॑ वव॒क्ष ऋ॒ष्वः शु॑च॒ते धना॑य॥

हे विद्वन्! किससे पढ़कर विद्यार्थी कैसे बढ़े? कैसे विद्या का सेवन करे? और कौन विद्वान् होवे? इस प्रश्न का, ब्रह्मचर्य्य से वीर्य्य का निग्रह करके, विद्या की कामना करता हुआ, आचार्य्य के समीप जा और सेवा करके, नियत आहार-विहार युक्त हुआ, रोगरहित होकर, विद्या की प्राप्ति के लिये अत्यन्त प्रयत्न करता है, यह उत्तर है॥१॥

को अ॑स्य वी॒रः स॑ध॒माद॑माप॒ समा॑नंश सुम॒तिभिः॒ को अ॑स्य। कद॑स्य चि॒त्रं चि॑किते॒ कदू॒ती वृ॒धे भु॑वच्छशमा॒नस्य॒ यज्योः॑॥

हे विद्वन् वा राजन्! कौन किसके साथ पढ़े? कौन किसके साथ न्याय करे? वा युद्ध करे? कौन इनमें श्रेष्ठ? इस प्रश्न का जो प्रशंसित कर्म्मों के अनुष्ठान और वृद्धि करनेवाले होवें, यह उत्तर है॥२॥

क॒था शृ॑णोति हू॒यमा॑न॒मिन्द्रः॑ क॒था शृ॒ण्वन्नव॑सामस्य वेद। का अ॑स्य पू॒र्वीरुप॑मातयो ह क॒थैन॑माहुः॒ पपु॑रिं जरि॒त्रे॥

जो विद्यार्थी और राजा के जन यथार्थवक्ता पुरुषों के वचनों के शास्त्रों को उत्तम प्रकार सुन, मान और निश्चय करके पुनः कर्मों का आरम्भ करते हैं, वे ही सम्पूर्ण जानने योग्य को जानते हैं॥३॥

क॒था स॒बाधः॑ शशमा॒नो अ॑स्य॒ नश॑द॒भि द्रवि॑णं॒ दीध्या॑नः। दे॒वो भु॑व॒न्नवे॑दा म ऋ॒तानां॒ नमो॑ जगृ॒भ्वाँ अ॒भि यज्जुजो॑षत्॥

हे अध्यापक वा राजन्! किस प्रकार से इस विद्या वा अभय को प्राप्त होवे? और किस प्रकार से ये विद्वान् होवें? इस प्रश्न का, जो सत्कार से श्रेष्ठ पुरुषों से शिक्षा को ग्रहण करके धर्म्म का सेवन करें, यह उत्तर है॥४॥

क॒था कद॒स्या उ॒षसो॒ व्यु॑ष्टौ दे॒वो मर्त॑स्य स॒ख्यं जु॑जोष। क॒था कद॑स्य स॒ख्यं सखि॑भ्यो॒ ये अ॑स्मि॒न्कामं॑ सु॒युजं॑ तत॒स्रे॥

हे विद्वानो! मनुष्यों को किसके साथ कब मित्रता और किस प्रकार मित्रता का निर्वाह करना चाहिये और मित्रों के साथ कैसे वर्त्तना चाहिये? इस प्रश्न का यह उत्तर है कि जब उत्तम प्रकार परीक्षा करे, तब उसके साथ मित्रता करे और जो इस जगत् में सबके साथ मित्राचार करने की कामना करते हैं, उनके साथ सदा ही मित्रता की रक्षा करनी चाहिये॥५॥

किमादम॑त्रं स॒ख्यं सखि॑भ्यः क॒दा नु ते॑ भ्रा॒त्रं प्र ब्र॑वाम। श्रि॒ये सु॒दृशो॒ वपु॑रस्य॒ सर्गाः॒ स्व१॒॑र्ण चि॒त्रत॑ममिष॒ आ गोः॥

सब मनुष्यों को चाहिये कि यथार्थवक्ता विद्वानों से मित्रता सदा ही करें, जिससे वे उत्तम उपदेश से सब को सृष्टिविद्या के जाननेवाले धर्म्मात्मा करके बहुत ही उत्तम विज्ञान को देकर सुखी करें॥६॥

द्रुहं॒ जिघां॑सन्ध्व॒रस॑मनि॒न्द्रां तेति॑क्ते ति॒ग्मा तु॒जसे॒ अनी॑का। ऋ॒णा चि॒द्यत्र॑ ऋण॒या न॑ उ॒ग्रो दू॒रे अज्ञा॑ता उ॒षसो॑ बबा॒धे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! जो लोग उत्तम प्रकार शिक्षित, श्रेष्ठ, शत्रुओं को शीघ्र पराजय करनेवाली सेनाओं को सिद्ध करें, जिनसे दूर स्थान में भी वर्त्तमान शत्रु लोग डरें, दारिद्र्य और भय को दूरकर अपनी प्रजा को आनन्द देकर दुष्टों का निरन्तर नाश करें, उनका आप सदा ही सत्कार करो॥७॥

ऋ॒तस्य॒ हि शु॒रुधः॒ सन्ति॑ पू॒र्वीर्ऋ॒तस्य॑ धी॒तिर्वृ॑जि॒नानि॑ हन्ति। ऋ॒तस्य॒ श्लोको॑ बधि॒रा त॑तर्द॒ कर्णा॑ बुधा॒नः शु॒चमा॑न आ॒योः॥

हे अध्यापक वा राजन्! जो जितेन्द्रिय दुष्ट आचार के रोकने और सत्य के प्रचार करनेवाले सत्यवाणीयुक्त और बधिर के सदृश वर्त्तमान अज्ञ पुरुषों को बोध देते हुए ब्रह्मचर्य्य आदि उपदेश से अधिक अवस्थावाले करते हुए क्लेश और शत्रुओं के नाश करनेवाले होवें, वे ही अपने आत्मा के सदृश आदर करने योग्य होवें॥८॥

ऋ॒तस्य॑ दृ॒ळ्हा ध॒रुणा॑नि सन्ति पु॒रूणि॑ च॒न्द्रा वपु॑षे॒ वपूं॑षि। ऋ॒तेन॑ दी॒र्घमि॑षणन्त॒ पृक्ष॑ ऋ॒तेन॒ गाव॑ ऋ॒तमा वि॑वेशुः॥

हे मनुष्यो! जैसे जल से प्राणधारण, अन्न आदि की उत्पत्ति और सुन्दर और दीर्घ अवस्था होती है, वैसे ही सत्य आचरण से सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य, विद्या और बहुत काल पर्य्यन्त जीवन होता है, जिससे निरन्तर सत्य ही का आचरण करो॥९॥

ऋ॒तं ये॑मा॒न ऋ॒तमिद्व॑नोत्यृ॒तस्य॒ शुष्म॑स्तुर॒या उ॑ ग॒व्युः। ऋ॒ताय॑ पृ॒थ्वी ब॑हु॒ले ग॑भी॒रे ऋ॒ताय॑ धे॒नू प॑र॒मे दु॑हाते॥

हे मनुष्यो! जो लोग मनुष्य के शरीर को प्राप्त होकर नियम से सत्य आचार, सत्य याञ्चा करके शीघ्र धार्मिक होते हैं, वे भूमि और सूर्य्य के सदृश सब की कामना की पूर्ति कर सकते हैं॥१०॥

नू ष्टु॒त इ॑न्द्र॒ नू गृ॑णा॒न इषं॑ जरि॒त्रे न॒द्यो॒३॒॑ न पी॑पेः। अका॑रि ते हरिवो॒ ब्रह्म॒ नव्यं॑ धि॒या स्या॑म र॒थ्यः॑ सदा॒साः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो जैसे आप लोगों में धर्म्मयुक्त नीति का स्थापन करें, उनकी सेवा करके मित्र हो के सम्पूर्ण विद्याओं को जानिये॥११॥इस सूक्त में प्रश्न उत्तर मैत्री शत्रुओं का निवारण सेना की उन्नति और सत्य आचरण की उत्तमता का वर्णन करने से इस के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥११॥यह तेईसवाँ सूक्त और दशमा वर्ग समाप्त हुआ॥

का सु॑ष्टु॒तिः शव॑सः सू॒नुमिन्द्र॑मर्वाची॒नं राध॑स॒ आ व॑वर्तत्। द॒दिर्हि वी॒रो गृ॑ण॒ते वसू॑नि॒ स गोप॑तिर्नि॒ष्षिधां॑ नो जनासः॥

हे मनुष्यो! जो पूर्ण ब्रह्मचर्य्य को किये हुए का पुत्र और वह स्वयं भी पूर्ण ब्रह्मचर्य्य और विद्या से युक्त और प्रशंसित आचरण करने और सुख देनेवाला होवे, वह ही आप का और हम लोगों का राजा हो॥१॥

स वृ॑त्र॒हत्ये॒ हव्यः॒ स ईड्यः॒ स सुष्टु॑त॒ इन्द्रः॑ स॒त्यरा॑धाः। स याम॒न्ना म॒घवा॒ मर्त्या॑य ब्रह्मण्य॒ते सुष्व॑ये॒ वरि॑वो धात्॥

जो मनुष्य बाल्यावस्था से लेकर उत्तम चेष्टायुक्त, विद्वानों की सेवा करनेवाला, उत्तम प्रकार शिक्षायुक्त, न्यायमार्ग का अनुगामी, धनुर्वेद का जाननेवाला, चतुर और युद्ध में भयरहित होवे, उसी को राजा करो॥२॥

तमिन्नरो॒ वि ह्व॑यन्ते समी॒के रि॑रि॒क्वांस॑स्त॒न्वः॑ कृण्वत॒ त्राम्। मि॒थो यत्त्या॒गमु॒भया॑सो॒ अग्म॒न्नर॑स्तो॒कस्य॒ तन॑यस्य सा॒तौ॥

हे सेना के जनो! जो भृत्यों का रक्षक, उत्साहयुक्त और शूरवीर होवे, उसका सत्कार करके और जो सङ्ग्राम को छोड़के भागते हैं, उनका नहीं सत्कार करके और अत्यन्त दण्ड देकर विजय को प्राप्त होओ॥३॥

क्र॒तू॒यन्ति॑ क्षि॒तयो॒ योग॑ उग्राशुषा॒णासो॑ मि॒थो अर्ण॑सातौ। सं यद्विशोऽव॑वृत्रन्त यु॒ध्मा आदिन्नेम॑ इन्द्रयन्ते अ॒भीके॑॥

योगाभ्यास के विना बुद्धि नहीं बढ़ती है और बुद्धि के विना धन और आत्मा की सिद्धि नहीं होती है और विद्या पुरुषार्थ और न्याय के विना प्रजा का पालन-नहीं कर सकते हैं॥४॥

आदिद्ध॒ नेम॑ इन्द्रि॒यं य॑जन्त॒ आदित्प॒क्तिः पु॑रो॒ळाशं॑ रिरिच्यात्। आदित्सोमो॒ वि प॑पृच्या॒दसु॑ष्वी॒नादिज्जु॑जोष वृष॒भं यज॑ध्यै॥

जो जन उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त अन्नों का पाक करके रुचिपूर्वक भोजन करते हैं, वे बल को प्राप्त होके रोग से रहित होने के योग्य होवें और ऐश्वर्य्य को प्राप्त होके धर्म्म और यथार्थवक्ता पुरुषों की सेवा करें॥५॥

कृ॒णोत्य॑स्मै॒ वरि॑वो॒ य इ॒त्थेन्द्रा॑य॒ सोम॑मुश॒ते सु॒नोति॑। स॒ध्री॒चीने॑न॒ मन॒सावि॑वेन॒न्तमित्सखा॑यं कृणुते स॒मत्सु॑॥

हे राजन्! जो मनुष्य अपने राज्य के भक्त, धर्म्म का सेवन और ऐश्वर्य्य की कामना करने तथा अधर्म्म को छोड़नेवाले, सङ्ग्राम में परस्पर अपने जनों में मैत्री करते हुए विद्वान् जन होवें, वे ही आपको राजशासन में संस्थापन करने योग्य हैं॥६॥

य इन्द्रा॑य सु॒नव॒त्सोम॑म॒द्य पचा॑त्प॒क्तीरु॒त भृ॒ज्जाति॑ धा॒नाः। प्रति॑ मना॒योरु॒चथा॑नि॒ हर्य॒न्तस्मि॑न्दध॒द्वृष॑णं॒ शुष्म॒मिन्द्रः॑॥

जो राजपुरुष राज्य के लिये ऐश्वर्य्य को बल और सेना के लिये भोजन आदि सामग्रियों को धारण करें, वे प्रीतिकारक सुखों को प्राप्त होवें॥७॥

य॒दा स॑म॒र्यं व्यचे॒दृघा॑वा दी॒र्घं यदा॒जिम॒भ्यख्य॑द॒र्यः। अचि॑क्रद॒द्वृष॑णं॒ पत्न्यच्छा॑ दुरो॒ण आ निशि॑तं सोम॒सुद्भिः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पतिव्रता स्त्री सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों की उत्तम प्रकार रक्षा और उन्नति करके पति आदि को आनन्द देती है, वैसे ही विद्या और विनययुक्त राजा अपने प्रजाजनों की अच्छे प्रकार रक्षा और ऐश्वर्य्य की वृद्धि करके सब सज्जनों की रक्षा करता है॥८॥

भूय॑सा व॒स्नम॑चर॒त्कनी॒योऽवि॑क्रीतो अकानिषं॒ पुन॒र्यन्। स भूय॑सा॒ कनी॑यो॒ नारि॑रेचीद्दी॒ना दक्षा॒ वि दु॑हन्ति॒ प्र वा॒णम्॥

जो मनुष्य अनेक प्रकार के व्यापार करनेवाले, अभिमानरहित, बुद्धिमान् हुए, विद्या और शिक्षा से पूर्ण वाणी को करते हैं, वे छोटों को पाल सकते हैं॥९॥

क इ॒मं द॒शभि॒र्ममेन्द्रं॑ क्रीणाति धे॒नुभिः॑। य॒दा वृ॒त्राणि॒ जङ्घ॑न॒दथै॑नं मे॒ पुन॑र्ददत्॥

कौन ऐश्वर्य्य को बढ़ा सके इस प्रश्न का, जो सब प्रकार पुरुषार्थयुक्त, उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी से युक्त है, यह उत्तर है, क्योंकि जो आदि में ऐश्वर्य्य को प्राप्त होवे, वही औरों को देने को योग्य होवे॥१०॥

नू ष्टु॒त इ॑न्द्र॒ नू गृ॑णा॒न इषं॑ जरि॒त्रे न॒द्यो॒३॒॑ न पी॑पेः। अका॑रि ते हरिवो॒ ब्रह्म॒ नव्यं॑ धि॒या स्या॑म र॒थ्यः॑ सदा॒साः॥

हे मनुष्यो! यदि आप लोग धन की इच्छा करो तो धर्म्मयुक्त पुरुषार्थ से योग्य क्रिया को निरन्तर करो॥११॥इस सूक्त में ब्रह्मचर्यवाले के पुत्र की प्रशंसा, अधर्म के त्याग से और उत्तम कर्म से बुद्धि और ऐश्वर्य की वृद्धि, नियमित आहार विहार, शत्रु का विजय और ज्येष्ठ कनिष्ठ का व्यवहार खा गया, इस से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥११॥यह चौबीसवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

को अ॒द्य नर्यो॑ दे॒वका॑म उ॒शन्निन्द्र॑स्य स॒ख्यं जु॑जोष। को वा॑ म॒हेऽव॑से॒ पार्या॑य॒ समि॑द्धे अ॒ग्नौ सु॒तसो॑म ईट्टे॥

जो विद्या और मित्रता की कामना करनेवाला, सम्पूर्ण जगत् का प्रिय आचरण करता और सब का रक्षण करता हुआ अग्नि में होम आदि से प्रजा का हित करे, वही जगत् का हित चाहनेवाला है, यह उत्तर है॥१॥

को ना॑नाम॒ वच॑सा सो॒म्याय॑ मना॒युर्वा॑ भवति॒ वस्त॑ उ॒स्राः। क इन्द्र॑स्य॒ युज्यं॒ कः स॑खि॒त्वं को भ्रा॒त्रं व॑ष्टि क॒वये॒ क ऊ॒ती॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मन, कर्म्म और वचन से नम्र होता है, जो किरणों के तुल्य प्रकाशस्वरूप व्यवहारयुक्त, जो जगदीश्वर के साथ मित्रता करता तथा सबके साथ भ्रातृपन की रक्षा करता और जो विद्वानों के लिये हित करता है, वही सम्पूर्ण इष्टफल को प्राप्त होता है॥२॥

को दे॒वाना॒मवो॑ अ॒द्या वृ॑णीते॒ क आ॑दि॒त्याँ अदि॑तिं॒ ज्योति॑रीट्टे। कस्या॒श्विना॒विन्द्रो॑ अ॒ग्निः सु॒तस्यां॒शोः पि॑बन्ति॒ मन॒सावि॑वेनम्॥

जो विद्वानों के सङ्ग को करते हैं, वे सूर्य आदि के सदृश सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त करा सकते हैं और जो नहीं कामना करने योग्य वस्तु की नहीं कामना करते हैं, वे कामनाओं की सिद्धि से युक्त होते हैं, यह उत्तर है॥३॥

तस्मा॑ अ॒ग्निर्भार॑तः॒ शर्म॑ यंस॒ज्ज्योक्प॑श्या॒त्सूर्य॑मु॒च्चर॑न्तम्। य इन्द्रा॑य सु॒नवा॒मेत्याह॒ नरे॒ नर्या॑य॒ नृत॑माय नृ॒णाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो गृह में निवास के सदृश विद्या में निवास करे और ब्रह्मचर्य्य से खगोल आदि विद्या को प्राप्त होवे और मनुष्यों के लिये हित का उपदेश देवे, वही उत्तम होता सौ वर्ष पर्य्यन्त जीवता और सूर्य्य आदि को देखता हुआ सब सुख को देवे॥४॥

न तं जि॑नन्ति ब॒हवो॒ न द॒भ्रा उ॒र्व॑स्मा॒ अदि॑तिः॒ शर्म॑ यंसत्। प्रि॒यः सु॒कृत्प्रि॒य इन्द्रे॑ मना॒युः प्रि॒यः सु॑प्रा॒वीः प्रि॒यो अ॑स्य सो॒मी॥

जो शत्रुरहित परमेश्वर की उपासना करने और सब के प्रिय साधनेवाले जन होते हैं, उनको कोई भी शत्रु जीत नहीं सकता है और जैसे माता वा श्रेष्ठ गृह को प्राप्त होकर मनुष्य सुख का आचरण करता है, वैसे ही सब सुखों को प्राप्त होकर निरन्तर आनन्दित होता है॥५॥

सु॒प्रा॒व्यः॑ प्राशु॒षाळे॒ष वी॒रः सुष्वेः॑ प॒क्तिं कृ॑णुते॒ केव॒लेन्द्रः॑। नासु॑ष्वेरा॒पिर्न सखा॒ न जा॒मिर्दु॑ष्प्रा॒व्यो॑ऽवह॒न्तेदवा॑चः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजपुरुष उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त अन्न का भोग तथा मित्र और बन्धुओं के सदृश वर्त्ताव करके दुष्ट स्वभाववालों का नाश करते, वे दारिद्र्य और पराजय को नहीं प्राप्त होते हैं॥६॥

न रे॒वता॑ प॒णिना॑ स॒ख्यमिन्द्रोऽसु॑न्वता सुत॒पाः सं गृ॑णीते। आस्य॒ वेदः॑ खि॒दति॒ हन्ति॑ न॒ग्नं वि सुष्व॑ये प॒क्तये॒ केव॑लो भूत्॥

जो राजा धन आदि के लोभ से धनियों के ऊपर प्रसन्न और दरिद्रों के प्रति अप्रसन्न नहीं होता है और जो दुष्टों को उत्तम प्रकार दण्ड देकर श्रेष्ठों की निरन्तर रक्षा करता है, नहीं इस का राज्य कभी खेद को प्राप्त होता है॥७॥

इन्द्रं॒ परेऽव॑रे मध्य॒मास॒ इन्द्रं॒ यान्तोऽव॑सितास॒ इन्द्र॑म्। इन्द्रं॑ क्षि॒यन्त॑ उ॒त युध्य॑माना॒ इन्द्रं॒ नरो॑ वाज॒यन्तो॑ हवन्ते॥

जिसके राज्य में श्रेष्ठ, मध्यस्थ और निकृष्ट अर्थात् नीची श्रेणी में वर्त्तमान धर्म्मात्मा, विद्वान् और अविद्वान् लोग, अपने राज्य के प्रिय, शत्रुओं के नाश करनेवाले, धन और स्वामी के भक्त हैं, वहाँ सदा राज्य बढ़ता है, ऐसा जानना चाहिये॥८॥इस सूक्त में प्रश्न उत्तर राजा उत्तम मध्यम निकृष्ट मनुष्यों के गुणों का वर्णन राजा के मन्त्री के पक्षपात राहित्यरूप आचरण का उपदेश किया, इस से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥८॥यह पच्चीसवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒हं मनु॑रभवं॒ सूर्य॑श्चा॒हं क॒क्षीवाँ॒ ऋषि॑रस्मि॒ विप्रः॑। अ॒हं कुत्स॑मार्जुने॒यं न्यृ॑ञ्जे॒ऽहं क॒विरु॒शना॒ पश्य॑ता मा॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो जगदीश्वर मन्त्रियों अर्थात् विचार करनेवालों में विचार करने और प्रकाश करनेवालों का प्रकाशक, विद्वानों में विद्वान्, अखण्डित न्याययुक्त, सर्वज्ञ और सब का उपकारी है; उस ही का विद्या, धर्म्माचरण और योगाऽभ्यास से प्रत्यक्ष करो॥१॥

अ॒हं भूमि॑मददा॒मार्या॑या॒हं वृ॒ष्टिं दा॒शुषे॒ मर्त्या॑य। अ॒हम॒पो अ॑नयं वावशा॒ना मम॑ दे॒वासो॒ अनु॒ केत॑मायन्॥

हे मनुष्यो! जो न्यायकारी स्वभाववाले के लिये भूमि का राज्य देता, सब के सुख के लिये वृष्टि करता और सब के जीवन के लिये वायु को प्रेरणा करता है और जिसके उपदेश के द्वारा विद्वान् होते हैं, उसी की निरन्तर उपासना करो॥२॥

अ॒हं पुरो॑ मन्दसा॒नो व्यै॑रं॒ नव॑ सा॒कं न॑व॒तीः शम्ब॑रस्य। श॒त॒त॒मं वे॒श्यं॑ स॒र्वता॑ता॒ दिवो॑दासमतिथि॒ग्वं यदाव॑म्॥

हे मनुष्यो! जो जगदीश्वर जगत् की उत्पत्ति के प्रथम चेतनस्वरूप से वर्त्तमान, वह सब जगत् को उत्पन्न करके, सब के साथ सब का सम्बन्ध करके सब का हित करता है॥३॥

प्र सु ष विभ्यो॑ मरुतो॒ विर॑स्तु॒ प्र श्ये॒नः श्ये॒नेभ्य॑ आशु॒पत्वा॑। अ॒च॒क्रया॒ यत्स्व॒धया॑ सुप॒र्णो ह॒व्यं भर॒न्मन॑वे दे॒वजु॑ष्टम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! इस सृष्टि और अन्तरिक्ष में जैसे पक्षी आकाश में जाकर आते हैं, वैसे ही सब लोक और लोकान्तर घूमते हैं, जो सृष्टिविद्या को जानता है, वही मनुष्यादिकों का सुखकारी होता है॥४॥

भर॒द्यदि॒ विरतो॒ वेवि॑जानः प॒थोरुणा॒ मनो॑जवा असर्जि। तूयं॑ ययौ॒ मधु॑ना सो॒म्येनो॒त श्रवो॑ विविदे श्ये॒नो अत्र॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजजनो! आप लोग जब तक वाजपक्षी के सदृश वेग युक्त सेना को नहीं करते हैं, तब तक विजय से धन का लाभ नहीं हो सकता है॥५॥

ऋ॒जी॒पी श्ये॒नो दद॑मानो अं॒शुं प॑रा॒वतः॑ शकु॒नो म॒न्द्रं मद॑म्। सोमं॑ भरद्दादृहा॒णो दे॒वावा॑न्दि॒वो अ॒मुष्मा॒दुत्त॑रादा॒दाय॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे पक्षी पृथिवी से उड़ के अन्तरिक्ष के मार्ग से जाकर और आकर अपने प्रयोजन को सिद्ध करते हैं, वैसे ही देश-देशान्तर में विमान आदि से जाकर अपने प्रयोजन को सिद्ध करो॥६॥

आ॒दाय॑ श्ये॒नो अ॑भर॒त्सोमं॑ स॒हस्रं॑ स॒वाँ अ॒युतं॑ च सा॒कम्। अत्रा॒ पुर॑न्धिरजहा॒दरा॑ती॒र्मदे॒ सोम॑स्य मू॒रा अमू॑रः॥

जो शत्रु के बल से अधिक बल, शत्रु की सामग्री से सैकड़ों गुणी अधिक सामग्री, उत्तम प्रकार शिक्षायुक्त सेना और विद्वानों को अध्यक्ष करके युद्ध करें, वे निश्चय विजय को प्राप्त होवें॥७॥इस सूक्त में ईश्वर और राजसेना के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥७॥यह छब्बीसवाँ सूक्त और पन्द्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

गर्भे॒ नु सन्नन्वे॑षामवेदम॒हं दे॒वानां॒ जनि॑मानि॒ विश्वा॑। श॒तं मा॒ पुर॒ आय॑सीररक्ष॒न्नध॑ श्ये॒नो ज॒वसा॒ निर॑दीयम्॥

मनुष्यों को चाहिये कि सदा सृष्टिविद्या बोध और जन्म-मरण की शरीर सम्बन्धिनी विद्या जानें, जिससे सदैव निर्भयता वर्त्ते॥१॥

न घा॒ स मामप॒ जोषं॑ जभारा॒भीमा॑स॒ त्वक्ष॑सा वी॒र्ये॑ण। ई॒र्मा पुर॑न्धिरजहा॒दरा॑तीरु॒त वाताँ॑ अतर॒च्छूशु॑वानः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य वायु के सदृश बलवान् होकर शत्रुओं को दबाते हैं, वे दुःख को लाँघ और और बुरे कर्म को त्याग के सुखी होते हैं॥२॥

अव॒ यच्छ्ये॒नो अस्व॑नी॒दध॒ द्योर्वि यद्यदि॒ वात॑ ऊ॒हुः पुर॑न्धिम्। सृ॒जद्यद॑स्मा॒ अव॑ ह क्षि॒पज्ज्यां कृ॒शानु॒रस्ता॒ मन॑सा भुर॒ण्यन्॥

जो मनुष्य सत्य के उपदेश करने, सत्य न्याय करने, शत्रुओं के जीतने और प्रजा के पालन करनेवाले राजा को प्राप्त होवें, वे सब प्रकार से सुखी होवें॥३॥

ऋ॒जि॒प्य ई॒मिन्द्रा॑वतो॒ न भु॒ज्युं श्ये॒नो ज॑भार बृह॒तो अधि॒ ष्णोः। अ॒न्तः प॑तत्पत॒त्र्य॑स्य प॒र्णमध॒ याम॑नि॒ प्रसि॑तस्य॒ तद्वेः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे वाज पक्षी अपने पुरुषार्थ से बहुत भोग को प्राप्त होता और शीघ्र चलता है, वैसे ही पुरुषार्थ करनेवाले जन बहुत सुख को प्राप्त होते हैं॥४॥

अध॑ श्वे॒तं क॒लशं॒ गोभि॑र॒क्तमा॑पिप्या॒नं म॒घवा॑ शु॒क्रमन्धः॑। अ॒ध्व॒र्युभिः॒ प्रय॑तं॒ मध्वो॒ अग्र॒मिन्द्रो॒ मदा॑य॒ प्रति॑ ध॒त्पिब॑ध्यै॒ शूरो॒ मदा॑य॒ प्रति॑ ध॒त्पिब॑ध्यै॥

जो नियमित आहार और विहार करने और नहीं हिंसा करनेवाले शूरवीर होवें, वे सदा विजय को प्राप्त होवें॥५॥इस सूक्त में जीव के गुणों के वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥५॥यह सत्ताईसवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

त्वा यु॒जा तव॒ तत्सो॑म स॒ख्य इन्द्रो॑ अ॒पो मन॑वे स॒स्रुत॑स्कः। अह॒न्नहि॒मरि॑णात्स॒प्त सिन्धू॒नपा॑वृणो॒दपि॑हितेव॒ खानि॑॥

इस मन्त्र में उपमावाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सूर्य्य सब के सुख के लिये वर्षा करके सब को आनन्द देता है, वैसे ही विद्वानों की मित्रता सब को आनन्द देनेवाली है, यह जानना चाहिये॥१॥

त्वा यु॒जा नि खि॑द॒त्सूर्य॒स्येन्द्र॑श्च॒क्रं सह॑सा स॒द्य इ॑न्दो। अधि॒ ष्णुना॑ बृह॒ता वर्त॑मानं म॒हो द्रु॒हो अप॑ वि॒श्वायु॑ धायि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वान् राजा से पालित विद्या धर्म्म और ब्रह्मचर्य्य आदि से युक्त अतिकाल पर्य्यन्त जीवनेवाले होवें, वे शत्रुओं के जीतनेवाले होते हैं॥२॥

अह॒न्निन्द्रो॒ अद॑हद॒ग्निरि॑न्दो पु॒रा दस्यू॑न्म॒ध्यन्दि॑नाद॒भीके॑। दु॒र्गे दु॑रो॒णे क्रत्वा॒ न या॒तां पु॒रू स॒हस्रा॒ शर्वा॒ नि ब॑र्हीत्॥

इस मन्त्र में उपमावाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मध्याह्न में सूर्य्य सब को तपाता है, वैसे ही न्यायकारी राजा दुष्ट चोरादिकों को दुःख देता है और अग्नि के सदृश भस्मीभूत करके सम्पूर्ण हिंसा दूर करे॥३॥

विश्व॑स्मात्सीमध॒माँ इ॑न्द्र॒ दस्यू॒न्विशो॒ दासी॑रकृणोरप्रश॒स्ताः। अबा॑धेथा॒ममृ॑णतं॒ नि शत्रू॒नवि॑न्देथा॒मप॑चितिं॒ वध॑त्रैः॥

हे राजा आदि राजजनो! जो साहस कर्म्म करने और जो दुष्ट उपदेश से प्रजा को दोषयुक्त करनेवाले नीच जन होवें, उनको निरन्तर बाधा देओ और श्रेष्ठों का सत्कार करो। ऐसा करने पर आप लोगों का बड़ा सत्कार होगा, यह जानना चाहिये॥४॥

ए॒वा स॒त्यं म॑घवाना यु॒वं तदिन्द्र॑श्च सोमो॒र्वमश्व्यं॒ गोः। आद॑र्दृत॒मपि॑हिता॒न्यश्ना॑ रिरि॒चथुः॒ क्षाश्चि॑त्ततृदा॒ना॥

जो राजा, मन्त्री, सेना और प्रजाजन परस्पर में स्नेह करके राज्य शिक्षा करें तो इनका कोई भी शत्रु नहीं उपस्थित हो॥५॥इस सूक्त में राजा और प्रजादि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥५॥यह अट्ठाईसवाँ सूक्त और सत्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ नः॑ स्तु॒त उप॒ वाजे॑भिरू॒ती इन्द्र॑ या॒हि हरि॑भिर्मन्दसा॒नः। ति॒रश्चि॑द॒र्यः सव॑ना पु॒रूण्या॑ङ्गू॒षेभि॑र्गृणा॒नः स॒त्यरा॑धाः॥

हे मनुष्यो! जो यहाँ प्रशंसित गुण, कर्म्म और स्वभावयुक्त, आपत्काल का निवारण करनेवाला, प्रजा के रक्षण में तत्पर, श्रेष्ठ सहायवाली उत्तम सेना से युक्त, न्यायकारी, धर्म्म से इकट्ठे किये हुए धनवाला और अभिमान से रहित होवे, उसी को राजा मानो॥१॥

आ हि ष्मा॒ याति॒ नर्य॑श्चिकि॒त्वान्हू॒यमा॑नः सो॒तृभि॒रुप॑ य॒ज्ञम्। स्वश्वो॒ यो अभी॑रु॒र्मन्य॑मानः सुष्वा॒णेभि॒र्मद॑ति॒ सं ह॑ वी॒रैः॥

जैसे चार वेदों का जाननेवाला वेद विद्यानिपुण विद्वानों के साथ यज्ञ को प्राप्त होकर स्तुति किया जाता है, वैसे ही श्रेष्ठ लक्षणों से युक्त मन्त्री और भृत्यों के साथ राजा स्तुति किया जाता है॥२॥

श्रा॒वयेद॑स्य॒ कर्णा॑ वाज॒यध्यै॒ जुष्टा॒मनु॒ प्र दिशं॑ मन्द॒यध्यै॑। उ॒द्वा॒वृ॒षा॒णो राध॑से॒ तुवि॑ष्मा॒न्कर॑न्न॒ इन्द्रः॑ सुती॒र्थाभ॑यं च॥

जिस राजा के सत्य और न्याय के उपदेश करनेवाले धार्मिक विद्वान् होवें, वह राजा विद्या और विनय आदि उत्तम गुणों के सहित होता हुआ सब को भयरहित करके निरन्तर प्रसन्न कर सके॥३॥

अच्छा॒ यो गन्ता॒ नाध॑मानमू॒ती इ॒त्था विप्रं॒ हव॑मानं गृ॒णन्त॑म्। उप॒ त्मनि॒ दधा॑नो धु॒र्या॒३॒॑शून्त्स॒हस्रा॑णि श॒तानि॒ वज्र॑बाहुः॥

जो राजा श्रेष्ठ मनुष्यों को ग्रहण करे, वही राज्य बढ़ाने को योग्य होवे॥४॥

त्वोता॑सो मघवन्निन्द्र॒ विप्रा॑ व॒यं ते॑ स्याम सू॒रयो॑ गृ॒णन्तः॑। भे॒जा॒नासो॑ बृ॒हद्दि॑वस्य रा॒य आ॑का॒य्य॑स्य दा॒वने॑ पुरु॒क्षोः॥

हे राजन्! जो आप हम लोगों की सब प्रकार से रक्षा करें तो हम लोग अति उन्नतियुक्त होवें॥५॥इस सूक्त में राजा और प्रजा के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥५॥यह उनत्तीसवाँ सूक्त और अठारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

नकि॑रिन्द्र॒ त्वदुत्त॑रो॒ न ज्यायाँ॑ अस्ति वृत्रहन्। नकि॑रे॒वा यथा॒ त्वम्॥

हे मनुष्यो! जो सबसे श्रेष्ठ होवे, उसी का राजा करो॥१॥

स॒त्रा ते॒ अनु॑ कृ॒ष्टयो॒ विश्वा॑ च॒क्रेव॑ वावृतुः। स॒त्रा म॒हाँ अ॑सि श्रु॒तः॥

हे राजन्! आप न्यायकारी होवें तो सम्पूर्ण प्रजा आपके अनुकूल वर्ताव करें॥२॥

विश्वे॑ च॒नेद॒ना त्वा॑ दे॒वास॑ इन्द्र युयुधुः। यदहा॒ नक्त॒माति॑रः॥

राजा को चाहिये कि भृत्यजन उत्तम शिक्षित और श्रेष्ठ रक्खें, जिससे दिन-रात्रि शत्रु लोग छिपे हुए रहें॥३॥

यत्रो॒त बा॑धि॒तेभ्य॑श्च॒क्रं कुत्सा॑य॒ युध्य॑ते। मु॒षा॒य इ॑न्द्र॒ सूर्य॑म्॥

जो राजा प्रजा की पीड़ा को नहीं निवारण करे और सूर्य के सदृश श्रेष्ठ गुणों से प्रकाशमान न हो और प्रजाओं से कर ग्रहण करे, वह राजा नहीं होवे॥४॥

यत्र॑ दे॒वाँ ऋ॑घाय॒तो विश्वाँ॒ अयु॑ध्य॒ एक॒ इत्। त्वमि॑न्द्र व॒नूँरह॑न्॥

जब-जब दुष्टजन श्रेष्ठों को बाधा देवें, तब-तब आप सम्पूर्ण अधर्म्मियों को अत्यन्त दण्ड दीजिये॥५॥

यत्रो॒त मर्त्या॑य॒ कमरि॑णा इन्द्र॒ सूर्य॑म्। प्रावः॒ शची॑भि॒रेत॑शम्॥

जहाँ राजा श्रेष्ठों का सत्कार और दुष्टों को दण्ड देकर विद्या और विनय को बढ़ाता है, वहाँ सम्पूर्ण प्रजा स्वस्थ होती है॥६॥

किमादु॒तासि॑ वृत्रह॒न्मघ॑वन्मन्यु॒मत्त॑मः। अत्राह॒ दानु॒माति॑रः॥

जो राजा दुष्टों के ऊपर अति क्रोध करने और श्रेष्ठों में अत्यन्त शान्ति रखनेवाला होता है, वही राज्य बढ़ा सकता है॥७॥

ए॒तद्घेदु॒त वी॒र्य१॒॑मिन्द्र॑ च॒कर्थ॒ पौंस्य॑म्। स्त्रियं॒ यद्दु॑र्हणा॒युवं॒ वधी॑र्दुहि॒तरं॑ दि॒वः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य रात्रि का नाश और दिन की उत्पत्ति करके प्राणियों को सुख देता है, वैसे ही दुष्ट आचरणों का नाश और श्रेष्ठों का पालन कर और विद्या को उत्पन्न करके सम्पूर्ण प्रजाओं को सुख देवें॥८॥

दि॒वश्चि॑द्घा दुहि॒तरं॑ म॒हान्म॑ही॒यमा॑नाम्। उ॒षास॑मिन्द्र॒ सं पि॑णक्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजपुरुष और राजा अन्यायरूप अन्धकार को निवृत्त करके विद्या और न्यायरूप सूर्य्य को उत्पन्न करते, वे सूर्य्य के सदृश प्रतापी होते हैं॥९॥

अपो॒षा अन॑सः सर॒त्संपि॑ष्टा॒दह॑ बि॒भ्युषी॑। नि यत्सीं॑ शि॒श्नथ॒द्वृषा॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे रथ का अग्रभाग आगे होता है, वैसे ही सूर्य्य के आगे प्रातःकाल चलता है और जैसे सूर्य्य अन्धकार का नाश करता है, वैसे राजा अन्याय के आचार का नाश करे॥१०॥

ए॒तद॑स्या॒ अनः॑ शये॒ सुसं॑पिष्टं॒ विपा॒श्या। स॒सार॑ सीं परा॒वतः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे श्रेष्ठ वाहन शीघ्र दूर जाते हैं, वैसे ही प्रातःकाल दूर जाता है, ऐसा जानना चाहिये॥११॥

उ॒त सिन्धुं॑ विबा॒ल्यं॑ वितस्था॒नामधि॒ क्षमि॑। परि॑ ष्ठा इन्द्र मा॒यया॑॥

हे मनुष्यो! समुद्र, नदी, नद के पार होने के लिये बुद्धि से नौका आदि को रच के लक्ष्मीवान् होओ॥१२॥

उ॒त शुष्ण॑स्य धृष्णु॒या प्र मृ॑क्षो अ॒भि वेद॑नम्। पुरो॒ यद॑स्य संपि॒णक्॥

वही राजा सम्मत होवे कि जो सेना को बढ़ाय और अन्याय के आचरणों को दूर करके बिन कहे को अच्छा जाननेवाला होवे॥१३॥

उ॒त दा॒सं कौ॑लित॒रं बृ॑ह॒तः पर्व॑ता॒दधि॑। अवा॑हन्निन्द्र॒ शम्ब॑रम्॥

हे मनुष्यो! जैसे सूर्य्य मेघ से जल को पृथिवी में गिरा के सब को जिलाता है, वैसे ही पर्वत के ऊपर स्थित भी डाकुओं को नीचे गिरा के प्रजाओं का पालन करो॥१४॥

उ॒त दा॒सस्य॑ व॒र्चिनः॑ स॒हस्रा॑णि श॒ताव॑धीः। अधि॒ पञ्च॑ प्र॒धीँरि॑व॥

वह राजा जो राजमान राजपुरुषों से यदि दुष्टों का निवारण करके श्रेष्ठों का सत्कार करे तो सम्पूर्ण जगत् उसका सेवक होवे॥१५॥

उ॒त त्यं पु॒त्रम॒ग्रुवः॒ परा॑वृक्तं श॒तक्र॑तुः। उ॒क्थेष्विन्द्र॒ आभ॑जत्॥

जो राजा माता पुत्रों का जैसे वैसे प्रजाओं का पालन करे, उसको प्रजाजन पिता के समान मानें॥१६॥

उ॒त त्या तु॒र्वशा॒यदू॑ अस्ना॒तारा॒ शची॒पतिः॑। इन्द्रो॑ वि॒द्वाँ अ॑पारयत्॥

जिन मनुष्यों को यथार्थवक्ता विद्वान् लोग शिक्षा देवें, वे दुःख के पार जाकर सुखी होते हैं॥१७॥

उ॒त त्या स॒द्य आर्या॑ स॒रयो॑रिन्द्र पा॒रतः॑। अर्णा॑चि॒त्रर॑थावधीः॥

हे राजन्! आप निरन्तर दुष्टों का ताड़न और श्रेष्ठों का सत्कार करो॥१८॥

अनु॒ द्वा ज॑हि॒ता न॑यो॒ऽन्धं श्रो॒णं च॑ वृत्रहन्। न तत्ते॑ सु॒म्नमष्ट॑वे॥

जो राजा अनाथ अन्धादिकों का निरन्तर पालन करे, उसका राज्य और सुख कभी नहीं नष्ट होवे॥१९॥

श॒तम॑श्म॒न्मयी॑नां पु॒रामिन्द्रो॒ व्या॑स्यत्। दिवो॑दासाय दा॒शुषे॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! जो आप बहुत बढ़े हुए मेघों को जैसे सूर्य्य वैसे अनेक शत्रुओं के नगरों को जीत सकें तो राज्यलक्ष्मी और यश को प्राप्त होने के योग्य होवें॥२०॥

अस्वा॑पयद्द॒भीत॑ये स॒हस्रा॑ त्रिं॒शतं॒ हथैः॑। दा॒साना॒मिन्द्रो॑ मा॒यया॑॥

जो सेनापति आदि बुद्धि से शत्रुओं का नाश करें, वे सदा ही सुखी होवें॥२१॥

स घेदु॒तासि॑ वृत्रहन्त्समा॒न इ॑न्द्र॒ गोप॑तिः। यस्ता विश्वा॑नि चिच्यु॒षे॥

जो राजा सूर्य्य के सदृश न्याय के प्रकाश से रागद्वेषवाला होता हुआ सम्पूर्ण राज्य का पालनकर्त्ता है, वही गणना करने योग्य होता है॥२२॥

उ॒त नू॒नं यदि॑न्द्रि॒यं क॑रि॒ष्या इ॑न्द्र॒ पौंस्य॑म्। अ॒द्या नकि॒ष्टदामि॑नत्॥

जो राजा वर्त्तमान समय में बल को बढ़ा सके, वह शत्रुओं से अजित हुआ निश्चय विजय को प्राप्त होवे॥२३॥

वा॒मंवा॑मं त आदुरे दे॒वो द॑दात्वर्य॒मा। वा॒मं पू॒षा वा॒मं भगो॑ वा॒मं दे॒वः करू॑ळती॥

हे राजन्! जो लोग सत्य उपदेश, सत्य न्याय, यथार्थ विद्या और क्रिया की आपको शिक्षा देवें, उन सब का आप निरन्तर सत्कार करो॥२४॥इस सूक्त में सूर्य, मेघ, मनुष्य, विद्वान् और राजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥२४॥यह तीसवाँ सूक्त और तेईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

कया॑ नश्चि॒त्र आ भु॑वदू॒ती स॒दावृ॑धः॒ सखा॑। कया॒ शचि॑ष्ठया वृ॒ता॥

हे राजन्! आपको चाहिये कि हम लोगों के साथ, वैसे कर्म्म करें कि जिनसे हम लोगों की प्रीति बढ़े॥१॥

कस्त्वा॑ स॒त्यो मदा॑नां॒ मंहि॑ष्ठो मत्स॒दन्ध॑सः। दृ॒ळ्हा चि॑दा॒रुजे॒ वसु॑॥

जो मनुष्य ब्रह्मचर्य्य आदि धर्म्माचरण से यथायोग्य आहार और विहार करें तो उनमें कभी दारिद्र्य और रोग नहीं आवे॥२॥

अ॒भी षु णः॒ सखी॑नामवि॒ता ज॑रितॄ॒णाम्। श॒तं भ॑वास्यू॒तिभिः॑॥

जो मनुष्य अपने आत्मा के सदृश सुख-दुःख, हानि और लाभ को औरों के भी जानकर दूसरे के प्रिय के लिये वर्त्ताव करें, उनमें अन्य जन भी मित्रता करें॥३॥

अ॒भी न॒ आ व॑वृत्स्व च॒क्रं न वृ॒त्तमर्व॑तः। नि॒युद्भि॑श्चर्षणी॒नाम्॥

हे राजन्! आप सत्य न्याय में वर्त्ताव करके हम लोगों का भी उसी के अनुसार वर्त्ताव कराइये॥४॥

प्र॒वता॒ हि क्रतू॑ना॒मा हा॑ प॒देव॒ गच्छ॑सि। अभ॑क्षि॒ सूर्ये॒ सचा॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे श्रेष्ठ विद्वान् लोग शुद्ध मार्ग से जाकर पूर्ण बुद्धि को प्राप्त होते हैं, वैसा ही अन्य जन भी वर्त्ताव करके बुद्धि को प्राप्त हों॥५॥

सं यत्त॑ इन्द्र म॒न्यवः॒ सं च॒क्राणि॑ दधन्वि॒रे। अध॒ त्वे अध॒ सूर्ये॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्य! जो तू दुष्ट आचरण करनेवाले पर क्रोध और श्रेष्ठ आचरण करनेवाले के प्रति हर्ष करे तो सूर्य्य के सदृश प्रतापी होवे॥६॥

उ॒त स्मा॒ हि त्वामा॒हुरिन्म॒घवा॑नं शचीपते। दाता॑र॒मवि॑दीधयुम्॥

हे विद्वानो! जो आप लोग धर्म्मयुक्त कर्म्मों का आचरण करें तो आप लोगों में ऐश्वर्य्य और दानकर्म्म कभी न नष्ट होवें॥७॥

उ॒त स्मा॑ स॒द्य इत्परि॑ शशमा॒नाय॑ सुन्व॒ते। पु॒रू चि॑न्मंहसे॒ वसु॑॥

जो मनुष्य यथार्थवक्ता पुरुषों का सत्कार करते हैं, वे शीघ्र गुणवान् होकर ऐश्वर्य्य से युक्त होवें॥८॥

न॒हि ष्मा॑ ते श॒तं च॒न राधो॒ वर॑न्त आ॒मुरः॑। न च्यौ॒त्नानि॑ करिष्य॒तः॥

हे राजन्! जो आप यथायोग्य न्यायकारी होवें तो आपका धन और बल कभी न नष्ट होवे और सैकड़ों प्रकार बढ़े॥९॥

अ॒स्माँ अ॑वन्तु ते श॒तम॒स्मान्त्स॒हस्र॑मू॒तयः॑। अ॒स्मान्विश्वा॑ अ॒भिष्ट॑यः॥

हे राजन्! तभी आप सत्य राजा होवें, जब अपने और पिता के सदृश हम लोगों का पालन और वृद्धि करा के आनन्द देवें॥१०॥

अ॒स्माँ इ॒हा वृ॑णीष्व स॒ख्याय॑ स्व॒स्तये॑। म॒हो रा॒ये दि॒वित्म॑ते॥

हे राजन्! जैसे आप हम लोगों में मित्रता रखते हैं, वैसे हम लोग भी आप में सदा ही मित्र हुए वर्त्ताव करें॥११॥

अ॒स्माँ अ॑विड्ढि वि॒श्वहेन्द्र॑ रा॒या परी॑णसा। अ॒स्मान्विश्वा॑भिरू॒तिभिः॑॥

वही उत्तम राजा और राजपुरुष हैं कि जो सब प्रकार रक्षा से प्रजा को धनाढ्य करें॥१२॥

अ॒स्मभ्यं॒ ताँ अपा॑ वृधि व्र॒जाँ अस्ते॑व॒ गोम॑तः। नवा॑भिरिन्द्रो॒तिभिः॑॥

हे राजन्! जैसे गोपाल गौओं को बढ़ा के दुग्धादिकों से आढ्य होते हैं, वैसे ही हम लोगों की वृद्धि करो और आढ्य होकर सदैव आनन्द कीजिये॥१३॥

अ॒स्माकं॑ धृष्णु॒या रथो॑ द्यु॒माँ इ॒न्द्रान॑पच्युतः। ग॒व्युर॑श्व॒युरी॑यते॥

राजा और प्रजाजन ऐसा मानें कि जो राजा के पदार्थ वे हम लोगों के और जो हम लोगों के वे राजा के हैं॥१४॥

अ॒स्माक॑मुत्त॒मं कृ॑धि॒ श्रवो॑ दे॒वेषु॑ सूर्य। वर्षि॑ष्ठं॒ द्यामि॑वो॒परि॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे आकाश में सूर्य्य बड़ा है, वैसे ही विद्या और विनय की उन्नति से उत्तम ऐश्वर्य्य को उत्पन्न करो॥१५॥इस सूक्त में राजा और प्रजा के धर्म वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥१५॥यह कतीसवाँ सूक्त और छब्बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ तू न॑ इन्द्र वृत्रहन्न॒स्माक॑म॒र्धमा ग॑हि। म॒हान्म॒हीभि॑रू॒तिभिः॑॥

हे राजन्! जो आप हम लोगों की वृद्धि करें तो हम लोग आपकी अतिवृद्धि करें॥१॥

भृमि॑श्चिद्घासि॒ तूतु॑जि॒रा चि॑त्र चि॒त्रिणी॒ष्वा। चि॒त्रं कृ॑णोष्यू॒तये॑॥

हे राजन्! जो आप सब जगह घूमके शीघ्र न्याय करके सब की रक्षा करें तो आपकी आश्चर्यजनक प्रजा अद्भुत ऐश्वर्य की उन्नति करे॥२॥

द॒भ्रेभि॑श्चि॒च्छशी॑यांसं॒ हंसि॒ व्राध॑न्त॒मोज॑सा। सखि॑भि॒र्ये त्वे सचा॑॥

जो धार्मिक थोड़े भी परस्पर मित्र होकर शत्रुओं के साथ युद्ध करें तो बहुत अधर्म्माचारियों को जीतें॥३॥

व॒यमि॑न्द्र॒ त्वे सचा॑ व॒यं त्वा॒भि नो॑नुमः। अ॒स्माँअ॑स्माँ॒ इदुद॑व॥

हे राजन्! जैसे हम लोग आप में सत्यभाव से वर्त्ताव और प्रीति से आप का सत्कार करें, वैसे ही आप हम लोगों की निरन्तर वृद्धि करें॥४॥

स न॑श्चि॒त्राभि॑रद्रिवोऽनव॒द्याभि॑रू॒तिभिः॑। अना॑धृष्टाभि॒रा ग॑हि॥

हे प्रजाजनो! जैसे राजा आप लोगों की सब प्रकार रक्षा करे, वैसे आप लोग भी राजा की सब प्रकार रक्षा करो॥५॥

भू॒यामो॒ षु त्वाव॑तः॒ सखा॑य इन्द्र॒ गोम॑तः। युजो॒ वाजा॑य॒ घृष्व॑ये॥

हे राजन्! जो आप पृथिवी आदि से युक्त हम लोगों को ऐश्वर्य्य के साथ युक्त करें तो हम लोग भी आपके साथ युक्त हों॥६॥

त्वं ह्येक॒ ईशि॑ष॒ इन्द्र॒ वाज॑स्य॒ गोम॑तः। स नो॑ यन्धि म॒हीमिष॑म्॥

जो विद्वान् पुरुषार्थ से बड़े ऐश्वर्य्य को प्राप्त होकर अन्य जनों के लिये देता है, वही सब का ईश्वर होता है॥७॥

न त्वा॑ वरन्ते अ॒न्यथा॒ यद्दित्स॑सि स्तु॒तो म॒घम्। स्तो॒तृभ्य॑ इन्द्र गिर्वणः॥

जो इस संसार में देनेवाला होता है, वही सब का प्रिय होता और कोई भी उसका विरोधी नहीं होता है॥८॥

अ॒भि त्वा॒ गोत॑मा गि॒रानू॑षत॒ प्र दा॒वने॑। इन्द्र॒ वाजा॑य॒ घृष्व॑ये॥

जिसकी प्रशंसा विद्वान् जन करते हैं, वही प्रशंसित मानने के योग्य है॥९॥

प्र ते॑ वोचाम वी॒र्या॒३॒॑ या म॑न्दसा॒न आरु॑जः। पुरो॒ दासी॑र॒भीत्य॑॥

जो राजा शत्रुओं का पराजय कर सके, वही राज्य करने को योग्य हो॥१०॥

ता ते॑ गृणन्ति वे॒धसो॒ यानि॑ च॒कर्थ॒ पौंस्या॑। सु॒तेष्वि॑न्द्र गिर्वणः॥

वे ही प्रशंसा करने योग्य कर्म्म होते हैं कि जिनकी यथार्थवक्ता जन प्रशंसा करें॥११॥

अवी॑वृधन्त॒ गोत॑मा॒ इन्द्र॒ त्वे स्तोम॑वाहसः। ऐषु॑ धा वी॒रव॒द्यशः॑॥

हे राजन्! जो लोग उत्तम कर्म्म से आपकी कीर्ति को बढ़ावें, उनकी कीर्ति आप भी बढ़ाइये॥१२॥

यच्चि॒द्धि शश्व॑ता॒मसीन्द्र॒ साधा॑रण॒स्त्वम्। तं त्वा॑ व॒यं ह॑वामहे॥

हे मनुष्यो! जो परमेश्वर अनादि काल से सिद्ध प्रकृति आदि पदार्थों का स्वामी, उनका धारण करनेवाला, वह कार्य्य का निर्माणकर्ता और कार्य्यों की व्यवस्था करनेवाला अन्तर्यामी है, उसी की सदा उपासना करो॥१३॥

अ॒र्वा॒ची॒नो व॑सो भवा॒स्मे सु म॒त्स्वान्ध॑सः। सोमा॑नामिन्द्र सोमपाः॥

जो राजा प्रजा के पदार्थों की यथायोग्य रक्षा करे, वह आगे के समय में सुख की वृद्धियुक्त होवे॥१४॥

अ॒स्माकं॑ त्वा मती॒नामा स्तोम॑ इन्द्र यच्छतु। अ॒र्वागा व॑र्तया॒ हरी॑॥

जिस विद्या और विनय से युक्त राजा को सब प्रकार प्रशंसा प्राप्त होवे, वही प्रजा को नियमयुक्त कर सके॥१५॥

पु॒रो॒ळाशं॑ च नो॒ घसो॑ जो॒षया॑से॒ गिर॑श्च नः। व॒धू॒युरि॑व॒ योष॑णाम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो राजा स्त्री की कामना करते हुए पति के सदृश प्रजा की वाणियों को सुन के न्याय करता और ऐश्वर्य को धारण करता है, वह राज्य में पूज्य होता है॥१६॥

स॒हस्रं॒ व्यती॑नां यु॒क्ताना॒मिन्द्र॑मीमहे। श॒तं सोम॑स्य खा॒र्यः॑॥

जो धनाढ्य जनों को प्राप्त होकर असङ्ख्य पदार्थों की याचना करते हैं, वे थोड़ा पाते हैं और जो याचना नहीं करते हैं, वे बहुत पाते हैं॥१७॥

स॒हस्रा॑ ते श॒ता व॒यं गवा॒मा च्या॑वयामसि। अ॒स्म॒त्रा राध॑ एतु ते॥

हे धनाढ्य! आपके समीप से हम लोग गौ आदि पदार्थों को प्राप्त होकर औरों के लिये देते हैं और हम लोगों का धन आपको प्राप्त हो॥१८॥

दश॑ ते क॒लशा॑नां॒ हिर॑ण्यानामधीमहि। भू॒रि॒दा अ॑सि वृत्रहन्॥

जो मनुष्य बहुत देनेवाला होता है, उसके मित्र बहुत होते हैं॥१९॥

भूरि॑दा॒ भूरि॑ देहि नो॒ मा द॒भ्रं भूर्या भ॑र। भूरि॒ घेदि॑न्द्र दित्ससि॥

जो बहुत देनेवाला है, वही प्रशंसा को प्राप्त होता है और जो थोड़ा देनेवाला, वह नहीं इस प्रकार प्रशंसित होता है॥२०॥

भू॒रि॒दा ह्यसि॑ श्रु॒तः पु॑रु॒त्रा शू॑र वृत्रहन्। आ नो॑ भजस्व॒ राध॑सि॥

जो इस संसार में बहुत देनेवाला होता है, वही सम्पूर्ण दिशाओं में कीर्तियुक्त होता है॥२१॥

प्र ते॑ ब॒भ्रू वि॑चक्षण॒ शंसा॑मि गोषणो नपात्। माभ्यां॒ गा अनु॑ शिश्रथः॥

हे जिज्ञासु ज्ञान को चाहनेवाले! तू अध्यापक और उपदेशक को पाकर पुरुषार्थ से विद्या और उपदेश को शीघ्र ग्रहण कर, आलस्य मत कर॥२२॥

क॒नी॒न॒केव॑ विद्र॒धे नवे॑ द्रुप॒दे अ॑र्भ॒के। ब॒भ्रू यामे॑षु शोभेते॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वान् अधिक वा न्यून विज्ञान में वा काम में सुशोभित हों, वे जगत् के बीच कल्याण करनेवाले हों॥२३॥

अरं॑ म उ॒स्रया॒म्णेऽर॒मनु॑स्रयाम्णे। ब॒भ्रू यामे॑ष्व॒स्रिधा॑॥

जो अध्यापक और उपदेशक शीतोष्ण देश निवासी मुझको पढ़ा और उपदेश दे सकते हैं, वे सदैव मुझ से सत्कार करने योग्य होते हैं॥२४॥इस सूक्त में इन्द्र राजा प्रजा अध्यापक और उपदेशक के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥२४॥यह ऋग्वेद संहिता के तीसरे अष्टक में छठा अध्याय तीसवाँ वर्ग तथा चतुर्थ मण्डल में बत्तीसवाँ सूक्त और तीसरा अनुवाक पूरा हुआ॥

सूक्तम्

प्र ऋ॒भुभ्यो॑ दू॒तमि॑व॒ वाच॑मिष्य उप॒स्तिरे॒ श्वैत॑रीं धे॒नुमी॑ळे। ये वात॑जूतास्त॒रणि॑भि॒रेवैः॒ परि॒ द्यां स॒द्यो अ॒पसो॑ बभू॒वुः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो पुरुष जैसे त्रसरेणु वायु से क्रिया को निरन्तर करते हैं, वैसे ही विद्वानों से विद्या को प्राप्त होकर पुरुषार्थ सदा करते हैं, वे सर्व विद्याओं से युक्त सुन्दर वाणी को प्राप्त होते हैं॥१॥

य॒दार॒मक्र॑न्नृ॒भवः॑ पि॒तृभ्यां॒ परि॑विष्टी वे॒षणा॑ दं॒सना॑भिः। आदिद्दे॒वाना॒मुप॑ स॒ख्यमा॑य॒न्धीरा॑सः पु॒ष्टिम॑वहन्म॒नायै॑॥

जो मनुष्य बाल्यावस्था में पाँचवें वर्ष से माता की शिक्षा और आठवें वर्ष से लेकर पिता की शिक्षा को और अड़तालीस वर्ष पर्य्यन्त आचार्य्य की शिक्षा को ग्रहण करते हैं, वे ही विद्वान्, बुद्धिमान्, धार्मिक, बहुत काल पर्य्यन्त जीवने और संसार के कल्याण करनेवाले होते हैं॥२॥

पुन॒र्ये च॒क्रुः पि॒तरा॒ युवा॑ना॒ सना॒ यूपे॑व जर॒णा शया॑ना। ते वाजो॒ विभ्वाँ॑ ऋ॒भुरिन्द्र॑वन्तो॒ मधु॑प्सरसो नोऽवन्तु य॒ज्ञम्॥

जो पितृजन अपने सन्तानों को अतिकाल पर्य्यन्त ब्रह्मचर्य्य से उत्तम स्वभाव और विद्यायुक्त करते हैं, वे उन सन्तानों की सेवा से फिर भी वृद्ध हुए युवावस्थावालों के सदृश होते हैं॥३॥

यत्सं॒वत्स॑मृ॒भवो॒ गामर॑क्ष॒न्यत्सं॒वत्स॑मृ॒भवो॒ मा अपिं॑शन्। यत्सं॒वत्स॒मभ॑र॒न्भासो॑ अस्या॒स्ताभिः॒ शमी॑भिरमृत॒त्वमा॑शुः॥

जो विद्वान् पितृजन अपने सन्तानों को ब्रह्मचर्य्य और विद्या [तथा विनय] से विद्या, बल और उत्तम गुण और कर्मों के आचरण [से] युक्त करते हैं, वे अत्यन्त सुख को प्राप्त होते हैं॥४॥

ज्ये॒ष्ठ आ॑ह चम॒सा द्वा क॒रेति॒ कनी॑या॒न्त्रीन्कृ॑णवा॒मेत्या॑ह। क॒नि॒ष्ठ आ॑ह च॒तुर॑स्क॒रेति॒ त्वष्ट॑ ऋभव॒स्तत्प॑नय॒द्वचो॑ वः॥

बन्धुजन विद्वान् होकर परस्पर वार्त्तालाप करें कि जैसे बड़ा आज्ञा करे, वैसे छोटा और जैसे छोटा कहे वैसा ही ज्येष्ठ आचरण करे। जैसे इस मन्त्र में (कनीयान्) यह कर्त्तृ पद एकवचनान्त और (कृणवाम) यह बहुवचनान्त क्रिया नहीं संगत होते हैं, ऐसा जनाना चाहिये अर्थात् अहं कर्त्ता की योग्यता में वयं कर्त्ता के पक्ष से योजना कर समझना चाहिये अथवा जैसे हम लोग परस्पर वार्त्तालाप करें, वैसे ही आप लोगों को भी परस्पर वार्त्तालाप करना चाहिये और जिस प्रकार सत्य और प्रशंसित वचन होवे, उसी प्रकार सब को बोलना चाहिये॥५॥

स॒त्यमू॑चु॒र्नर॑ ए॒वा हि च॒क्रुरनु॑ स्व॒धामृ॒भवो॑ जग्मुरे॒ताम्। वि॒भ्राज॑मानांश्चम॒साँ अहे॒वावे॑न॒त्त्वष्टा॑ च॒तुरो॑ ददृ॒श्वान्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि इस संसार में यथार्थवक्ताओं का अनुकरण करके जैसे क्रम से वर्त्ताव कर दिन वर्षा ऋतु को प्राप्त होते हैं, वैसे ही क्रम से कर्म, उपासना और ज्ञान, सत्यभाषण आदि को बढ़ा के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध कराते हैं, यह जानें॥६॥

द्वाद॑श॒ द्यून्यदगो॑ह्यस्याति॒थ्ये रण॑न्नृ॒भवः॑ स॒सन्तः॑। सु॒क्षेत्रा॑कृण्व॒न्नन॑यन्त॒ सिन्धू॒न्धन्वाति॑ष्ठि॒न्नोष॑धीर्नि॒म्नमापः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वान् जन जैसे सोते हुओं को चेताय के जगाते हैं, वैसे ही अविद्वानों को उत्तम शिक्षा दे विद्वान् करके आनन्द देवें॥७॥

रथं॒ ये च॒क्रुः सु॒वृतं॑ नरे॒ष्ठां ये धे॒नुं वि॑श्व॒जुवं॑ वि॒श्वरू॑पाम्। त आ त॑क्षन्त्वृ॒भवो॑ र॒यिं नः॒ स्वव॑सः॒ स्वप॑सः सु॒हस्ताः॑॥

जो मनुष्य पहिले विद्या को और फिर हस्तक्रिया को ग्रहण करके उत्तम आचरणवाले होते हुए आत्मसम्बन्धी और बाहिर के विशेष ज्ञान को उत्तम प्रकार जाँच के शिल्पविद्यासम्बन्धी कार्य्यों को करते हैं, वे बुद्धिमान् होते हुए ऐश्वर्य्य को प्राप्त होते हैं॥८॥

अपो॒ ह्ये॑षा॒मजु॑षन्त दे॒वा अ॒भि क्रत्वा॒ मन॑सा॒ दीध्या॑नाः। वाजो॑ दे॒वाना॑मभवत्सु॒कर्मेन्द्र॑स्य ऋभु॒क्षा वरु॑णस्य॒ विभ्वा॑॥

जो मनुष्य इस संसार में सृष्टिस्थ पदार्थों की उत्तम परीक्षा से संयोग और विभाग के द्वारा श्रेष्ठ पदार्थ और कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वे विद्वानों में श्रेष्ठ और अत्यन्त धनी होते हैं॥९॥

ये हरी॑ मे॒धयो॒क्था मद॑न्त॒ इन्द्रा॑य च॒क्रुः सु॒युजा॒ ये अश्वा॑। ते रा॒यस्पोषं॒ द्रवि॑णान्य॒स्मे ध॒त्त ऋ॑भवः क्षेम॒यन्तो॒ न मि॒त्रम्॥

हे विद्वानो! आप लोग सृष्टि के क्रम से पदार्थविद्याओं को प्राप्त होकर अन्य जनों को बोध कराय के अपने सदृश करके धनाढ्य करो॥१०॥

इ॒दाह्नः॑ पी॒तिमु॒त वो॒ मदं॑ धु॒र्न ऋ॒ते श्रा॒न्तस्य॑ स॒ख्याय॑ दे॒वाः। ते नू॒नम॒स्मे ऋ॑भवो॒ वसू॑नि तृ॒तीये॑ अ॒स्मिन्त्सव॑ने दधात॥

जो जन वर्त्तमान समय में यथार्थ पुरुषार्थ को करते हैं, वे धनपति होते हैं और जो विद्वानों के सङ्ग को नहीं करते हैं, वे धन से रहित हुए दारिद्र्य को भजते हैं॥११॥इस सूक्त में विद्वान् माता पिता और मनुष्यों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥११॥यह तेतीसवाँ सूक्त और द्वितीय वर्ग समाप्त हुआ॥

ऋ॒भुर्विभ्वा॒ वाज॒ इन्द्रो॑ नो॒ अच्छे॒मं य॒ज्ञं र॑त्न॒धेयोप॑ यात। इ॒दा हि वो॑ धि॒षणा॑ दे॒व्यह्ना॒मधा॑त्पी॒तिं सं मदा॑ अग्मता वः॥

[इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। ] हे मनुष्यो! जैसे आप लोगों को आनन्द प्राप्त होवे, वैसे ही कर्म्म और बुद्धि की वृद्धि को करो और व्यापक ईश्वर की उपासना भी करो॥१॥

वि॒दा॒नासो॒ जन्म॑नो वाजरत्ना उ॒त ऋ॒तुभि॑र्ऋभवो मादयध्वम्। सं वो॒ मदा॒ अग्म॑त॒ सं पुरं॑धिः सु॒वीरा॑म॒स्मे र॒यिमेर॑यध्वम्॥

जो दूसरे विद्यारूप जन्म के होने पर प्राप्त विद्यारूप यौवनावस्थायुक्त होते हैं, वे विद्वान् होकर विद्वानों में मित्रता करते हैं और अविद्वानों के कल्याण के लिये प्रयत्न करते हैं॥२॥

अ॒यं वो॑ य॒ज्ञ ऋ॑भवोऽकारि॒ यमा म॑नु॒ष्वत्प्र॒दिवो॑ दधि॒ध्वे। प्र वोऽच्छा॑ जुजुषा॒णासो॑ अस्थु॒रभू॑त॒ विश्वे॑ अग्रि॒योत वा॑जाः॥

हे बुद्धिमान् विद्यार्थी जनो! जो आप लोगों के लिये विद्या देवें, उनकी कपटरहित प्रीति से सेवा करो और जितेन्द्रिय होकर यथार्थ विद्या को प्राप्त होओ॥३॥

अभू॑दु वो विध॒ते र॑त्न॒धेय॑मि॒दा न॑रो दा॒शुषे॒ मर्त्या॑य। पिब॑त वाजा ऋभवो द॒दे वो॒ महि॑ तृ॒तीयं॒ सव॑नं॒ मदा॑य॥

हे मनुष्यो! जिन लोगों के समीप से विद्या आप लोग ग्रहण करें, उनके लिये रत्न दो, जिससे दोनों जगह विद्या और ऐश्वर्य्य बढ़े॥४॥

आ वा॑जा या॒तोप॑ न ऋभुक्षा म॒हो न॑रो॒ द्रवि॑णसो गृणा॒नाः। आ वः॑ पी॒तयो॑ऽभिपि॒त्वे अह्ना॑मि॒मा अस्तं॑ नव॒स्व॑इव ग्मन्॥

सब मनुष्यों को चाहिये कि ऐसी इच्छा नित्य करें कि हम लोगों को यथार्थवक्ता विद्वान् लोग प्राप्त होवें और दिन-रात्रि ऐश्वर्य्य की प्राप्ति होवे। जैसे नवीन विवाहाश्रम का सेवन करते हैं, वैसे ही स्त्री और पुरुष गृह के कृत्यों का सेवन करें॥५॥

आ न॑पातः शवसो यात॒नोपे॒मं य॒ज्ञं नम॑सा हू॒यमा॑नाः। स॒जोष॑सः सूरयो॒ यस्य॑ च॒ स्थ मध्वः॑ पात रत्न॒धा इन्द्र॑वन्तः॥

मनुष्यों को चाहिये कि परस्पर मित्रता कर शरीर और आत्मा का बल बढ़ाय, विद्याधनरूप ऐश्वर्य्य को प्राप्त हों, उसकी उत्तम प्रकार रक्षा कर और बढ़ाय के इससे सब को सुखी करें॥६॥

स॒जोषा॑ इन्द्र॒ वरु॑णेन॒ सोमं॑ स॒जोषाः॑ पाहि गिर्वणो म॒रुद्भिः॑। अ॒ग्रे॒पाभि॑र्ऋतु॒पाभिः॑ स॒जोषाः॒ ग्रास्पत्नी॑भी रत्न॒धाभिः॑ स॒जोषाः॑॥

हे मनुष्यो! आप लोग श्रेष्ठ पुरुषों के मेल से ऐश्वर्य्य की उन्नति करो और जो विनाश से पहिले और ऋतुओं में रक्षा करते हैं और जो अपनी स्त्री पतिव्रता होती है, उन मनुष्यों और उस स्त्री के साथ तुल्य प्रीति, सुख-दुःख और लाभ का सेवन करते हुए सब के प्रिय होओ॥७॥

स॒जोष॑स आदि॒त्यैर्मा॑दयध्वं स॒जोष॑स ऋभवः॒ पर्व॑तेभिः। स॒जोष॑सो॒ दैव्ये॑ना सवि॒त्रा स॒जोष॑सः॒ सिन्धु॑भी रत्न॒धेभिः॑॥

जो मनुष्य पूर्ण विद्वानों के साथ मेल करके पदार्थविद्या का ग्रहण करते हैं, वे विमान आदि को रचके मेघमण्डल वा उससे ऊपर समुद्र और नदियों में सुख से विहार करने के योग्य होते हैं॥८॥

ये अ॒श्विना॒ ये पि॒तरा॒ य ऊ॒ती धे॒नुं त॑त॒क्षुर्ऋ॒भवो॒ ये अश्वा॑। ये अंस॑त्रा॒ य ऋध॒ग्रोद॑सी॒ ये विभ्वो॒ नरः॑ स्वप॒त्यानि॑ च॒क्रुः॥

जो मनुष्य विद्या और सत्पुरुषों का संग, वृद्धों का सेवन और अपने समीप प्राप्तों की रक्षा करके अपने सन्तानों को श्रेष्ठ करें, वे विस्तारयुक्त सुख को प्राप्त होवें॥९॥

ये गोम॑न्तं॒ वाज॑वन्तं सु॒वीरं॑ र॒यिं ध॒त्थ वसु॑मन्तं पुरु॒क्षुम्। ते अ॑ग्रे॒पा ऋ॑भवो मन्दसा॒ना अ॒स्मे ध॑त्त॒ ये च॑ रा॒तिं गृ॒णन्ति॑॥

हे विद्वानो! आप लोग जिनके लिये सिद्ध करने योग्य पदार्थ से उत्पन्न सुख को प्राप्त होकर अन्य जनों के लिये देते हैं, वे सुपात्रों के लिये दान देने की प्रशंसा करते हैं॥१०॥

नापा॑भूत॒ न वो॑ऽतीतृषा॒मानिः॑शस्ता ऋभवो य॒ज्ञे अ॒स्मिन्। समिन्द्रे॑ण॒ मद॑थ॒ सं म॒रुद्भिः॒ सं राज॑भी रत्न॒धेया॑य देवाः॥

जो लोभ आदि दोषों से रहित हुए राजा और प्रजाजनों के साथ मिल कर गृहाश्रम के व्यवहार की उन्नति करते हैं, वे कहीं तिरस्कृत नहीं होते हैं॥११॥इस सूक्त में मेधावी के गुण वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥११॥यह चौबीसवाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ॥

इ॒होप॑ यात शवसो नपातः॒ सौध॑न्वना ऋभवो॒ माप॑ भूत। अ॒स्मिन्हि वः॒ सव॑ने रत्न॒धेयं॒ गम॒न्त्विन्द्र॒मनु॑ वो॒ मदा॑सः॥

जो लोग उत्साह से ऐश्वर्य्य की वृद्धि करने की इच्छा करते हैं, वे सब जगह सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य को प्राप्त होकर सर्वत्र सत्कारयुक्त और जो आलस्ययुक्त होते हैं, वे दरिद्रपन से अभिभूत अर्थात् सदा तिरस्कृत होते हैं॥१॥

आग॑न्नृभू॒णामि॒ह र॑त्न॒धेय॒मभू॒त्सोम॑स्य॒ सुषु॑तस्य पी॒तिः। सु॒कृ॒त्यया॒ यत्स्व॑प॒स्यया॑ चँ॒ एकं॑ विच॒क्र च॑म॒सं च॑तु॒र्धा॥

जो मनुष्य उत्तम हस्तक्रिया और उत्तम कर्म से सर्वत्र पहुँचानेवाले वाहन आदि को रचते हैं, वे खाने और पीने योग्य पदार्थ और असङ्ख्य धनों को प्राप्त होते हैं॥२॥

व्य॑कृणोत चम॒सं च॑तु॒र्धा सखे॒ वि शि॒क्षेत्य॑ब्रवीत। अथै॑त वाजा अ॒मृत॑स्य॒ पन्थां॑ ग॒णं दे॒वाना॑मृभवः सुहस्ताः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! परमेश्वर आप लोगों के प्रति चार प्रकार के पुरुषार्थ को सिद्ध करो, ऐसा कहता है कि जो परस्पर मित्र होकर कार्य्य की सिद्धि के लिये प्रयत्न करो तो धर्म्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि आप लोगों को विना संशय प्राप्त होवे॥३॥

किं॒मयः॑ स्विच्चम॒स ए॒ष आ॑स॒ यं काव्ये॑न च॒तुरो॑ विच॒क्र। अथा॑ सुनुध्वं॒ सव॑नं॒ मदा॑य पा॒त ऋ॑भवो॒ मधु॑नः सो॒म्यस्य॑॥

कार्य्यों के साधन कैसे और काहे के बने हुए होते हैं, यह पूछा जाता है। जो-जो विद्या और युक्ति से बनाया गया हो, वह-वह साधन कार्य्य की सिद्धि करनेवाला होता है, यह उत्तर है॥४॥

शच्या॑कर्त पि॒तरा॒ युवा॑ना॒ शच्या॑कर्त चम॒सं दे॑व॒पान॑म्। शच्या॒ हरी॒ धनु॑तरावतष्टेन्द्र॒वाहा॑वृभवो वाजरत्नाः॥

हे विद्वानो! आप लोग इस प्रकार यत्न करो जैसे कि मनुष्यों के सन्तान युवावस्था जब तक तब तक प्राप्त पूर्ण विज्ञानवाले होकर पूर्ण युवावस्था में परस्पर प्रीति और अनुमति से स्वयंवर विवाह करके सदा आनन्दित होवें॥५॥

यो वः॑ सु॒नोत्य॑भिपि॒त्वे अह्नां॑ ती॒व्रं वा॑जासः॒ सव॑नं॒ मदा॑य। तस्मै॑ र॒यिमृ॑भवः॒ सर्व॑वीर॒मा त॑क्षत वृषणो मन्दसा॒नाः॥

हे विद्वानो! जो आप लोगों की सेवा तथा आज्ञा के अनुसार कार्य करते हैं, उनको विद्वान् और उत्तम प्रकार शिक्षित करके सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य को प्राप्त कराइये॥६॥

प्रा॒तः सु॒तम॑पिबो हर्यश्व॒ माध्य॑न्दिनं॒ सव॑नं॒ केव॑लं ते। समृ॒भुभिः॑ पिबस्व रत्न॒धेभिः॒ सखीँ॒र्याँ इ॑न्द्र चकृ॒षे सु॑कृ॒त्या॥

जो मनुष्य विद्वानों के मित्र, सब के सुख चाहनेवाले, प्रातःकाल, मध्यकाल और सायंकाल में करने योग्य कर्मों को करके उत्तम कर्म करनेवाले होवें, ये सबके मित्र हुए भाग्यशाली होवें॥७॥

ये दे॒वासो॒ अभ॑वता सुकृ॒त्या श्ये॒नाइ॒वेदधि॑ दि॒वि नि॑षे॒द। ते रत्नं॑ धात शवसो नपातः॒ सौध॑न्वना॒ अभ॑वता॒मृता॑सः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो बाज के सदृश विमान से अन्तरिक्ष में जाते हैं, धर्म के आचरण से विद्वान् होकर अन्य जनों को भी वैसे करते हैं, ऐश्वर्य्य को प्राप्त हो तथा उसका भोग करके अन्त में मोक्ष को प्राप्त होते हैं॥८॥

यत्तृ॒तीयं॒ सव॑नं रत्न॒धेय॒मकृ॑णुध्वं स्वप॒स्या सु॑हस्ताः। तदृ॑भवः॒ परि॑षिक्तं व ए॒तत्सं मदे॑भिरिन्द्रि॒येभिः॑ पिबध्वम्॥

हे मनुष्यो! तुम प्रथम अर्थात् युवावस्था में विद्या का अभ्यास, द्वितीय अर्थात् मध्यम अवस्था में गृहाश्रम और तृतीय में न्याय आदि कर्मों का अनुष्ठान करके पूर्ण ऐश्वर्य्य को प्राप्त होओ॥९॥इस सूक्त में विद्वानों का कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥९॥यह पैंतीसवाँ सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒न॒श्वो जा॒तो अ॑नभी॒शुरु॒क्थ्यो॒३॒॑ रथ॑स्त्रिच॒क्रः परि॑ वर्तते॒ रजः॑। म॒हत्तद्वो॑ दे॒व्य॑स्य प्र॒वाच॑नं॒ द्यामृ॑भवः पृथि॒वीं यच्च॒ पुष्य॑थ॥

हे मनुष्यो! तुम लोग अनेक प्रकार के अनेक कलाचक्रों तथा पशु घोड़ा के वाहन से रहित, अग्नि और जल से चलाये गये विमान आदि वाहनों को बना पृथिवी, जलों और अन्तरिक्ष में जा आकर और ऐश्वर्य्य को प्राप्त होकर पूर्ण सुखवाले होओ॥१॥

रथं॒ चे च॒क्रुः सु॒वृतं॑ सु॒चेत॒सोऽवि॑ह्वरन्तं॒ मन॑स॒स्परि॒ ध्यया॑। ताँ ऊ॒ न्व१॒॑स्य सव॑नस्य पी॒तय॒ आ वो॑ वाजा ऋभवो वेदयामसि॥

हे बुद्धिमानो! जो वाहनो के बनाने और चलाने में चतुर शिल्पीजन होवें, उनका ग्रहण और सत्कार करके शिल्पविद्या की उन्नति करो॥२॥

तद्वो॑ वाजा ऋभवः सुप्रवाच॒नं दे॒वेषु॑ विभ्वो अभवन्महित्व॒नम्। जिव्री॒ यत्सन्ता॑ पि॒तरा॑ सना॒जुरा॒ पुन॒र्युवा॑ना च॒रथा॑य॒ तक्ष॑थ॥

हे बुद्धिमान् जनो! जो आप लोग विद्वानों में स्थित होकर उनसे अध्ययन और उपदेश करें तो ज्ञानवृद्ध होने से युवावस्था को प्राप्त हुए भी वृद्ध होकर सत्कृत होवें॥३॥

एकं॒ वि च॑क्र चम॒सं चतु॑र्वयं॒ निश्चर्म॑णो॒ गाम॑रिणीत धी॒तिभिः॑। अथा॑ दे॒वेष्व॑मृत॒त्वमा॑नश श्रु॒ष्टी वा॑जा ऋभव॒स्तद्व॑ उ॒क्थ्य॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो प्रशंसित कर्मों को करते हैं, वे व्यावहारिक और पारमार्थिक सुख को प्राप्त होकर पण्डितवरों में प्रशंसा को प्राप्त होते हैं॥४॥

ऋ॒भु॒तो र॒यिः प्र॑थ॒मश्र॑वस्तमो॒ वाज॑श्रुतासो॒ यमजी॑जन॒न्नरः॑। वि॒भ्व॒त॒ष्टो वि॒दथे॑षु प्र॒वाच्यो॒ यं दे॑वा॒सोऽव॑था॒ स विच॑र्षणिः॥

वे ही विद्वान् उत्तम हैं कि जो विद्यार्थियों को विद्वान् करते हैं, उन्हीं को पढ़ाना और उपदेश देना चाहिये जो पदार्थविद्या से रहित होवें, वे ही सुखी होते हैं, जो विद्या और धन को प्राप्त होकर धर्मात्मा होवें॥५॥

स वा॒ज्यर्वा॒ स ऋषि॑र्वच॒स्यया॒ स शूरो॒ अस्ता॒ पृत॑नासु दु॒ष्टरः॑। स रा॒यस्पोषं॒ स सु॒वीर्यं॑ दधे॒ यं वाजो॒ विभ्वाँ॑ ऋ॒भवो॒ यमावि॑षुः॥

जो मनुष्य विद्वानों के संग से गुणों के ग्रहण करने की इच्छा करते हैं; वे प्रशंसित, शत्रुओं से नहीं जीतने योग्य, धनाढ्य और पराक्रमी होते हैं॥६॥

श्रेष्ठं॑ वः॒ पेशो॒ अधि॑ धायि दर्श॒तं स्तोमो॑ वाजा ऋभव॒स्तं जु॑जुष्टन। धीरा॑सो॒ हि ष्ठा क॒वयो॑ विप॒श्चित॒स्तान्व॑ ए॒ना ब्रह्म॒णा वे॑दयामसि॥

जो विद्यार्थी जन श्रेष्ठ अध्यापक और विद्वान् यथार्थवक्ता जनों की सेवा करके शिक्षा ग्रहण करें, वे विद्वान् और लक्ष्मीवान् होवें॥७॥

यू॒यम॒स्मभ्यं॑ धि॒षणा॑भ्य॒स्परि॑ वि॒द्वांसो॒ विश्वा॒ नर्या॑णि॒ भोज॑ना। द्यु॒मन्तं॒ वाजं॒ वृष॑शुष्ममुत्त॒ममा नो॑ र॒यिमृ॑भवस्तक्ष॒ता वयः॑॥

जो विद्वान् पढ़ाने और उपदेश करने से मनुष्यों की बुद्धि बढ़ाते हैं, वे सब के हितैषी जानने चाहिये॥८॥

इ॒ह प्र॒जामि॒ह र॒यिं ररा॑णा इ॒ह श्रवो॑ वी॒रव॑त्तक्षता नः। येन॑ व॒यं चि॒तये॒मात्य॒न्यान्तं वाजं॑ चि॒त्रमृ॑भवो ददा नः॥

जब मनुष्य विद्वानों को प्राप्त होवें तब विज्ञान, सत्यश्रवण, धन, उत्तम प्रजा और शूरवीरयुक्त सेना की याचना करें, उनसे यथार्थ विद्या को प्राप्त होकर अन्यों को निरन्तर बोध करावें॥९॥इस सूक्त में विपश्चित् के गुण कृत्य वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥९॥यह छत्तीसवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

उप॑ नो वाजा अध्व॒रमृ॑भुक्षा॒ देवा॑ या॒त प॒थिभि॑र्देव॒यानैः॑। यथा॑ य॒ज्ञं मनु॑षो वि॒क्ष्वा॒३॒॑सु द॑धि॒ध्वे र॑ण्वाः सु॒दिने॒ष्वह्ना॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो जन धार्मिक विद्वानों के मार्ग अर्थात् मर्यादा से चलते हैं, वे प्रजा के हित करने में समर्थ होते हैं॥१॥

ते वो॑ हृ॒दे मन॑से सन्तु य॒ज्ञा जुष्टा॑सो अ॒द्य घृ॒तनि॑र्णिजो गुः। प्र वः॑ सु॒तासो॑ हरयन्त पू॒र्णाः क्रत्वे॒ दक्षा॑य हर्षयन्त पी॒ताः॥

हे मनुष्यो! आप लोग ऐसा पुरुषार्थ करो, जिससे पवित्रता, बुद्धि और चातुर्य्य बढ़े और जो मांस, मद्य के आहार का त्याग करके उत्तम पदार्थ का भोग करते, वे निरन्तर विज्ञान को बढ़ाते हैं॥२॥

त्र्यु॒दा॒यं दे॒वहि॑तं॒ यथा॑ वः॒ स्तोमो॑ वाजा ऋभुक्षणो द॒दे वः॑। जु॒ह्वे म॑नु॒ष्वदुप॑रासु वि॒क्षु यु॒ष्मे सचा॑ बृ॒हद्दि॑वेषु॒ सोम॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे विद्वान् जन आप लोगों के लिये सुख देते हैं और आप लोगों के हित की इच्छा करते हैं, वैसे ही आप लोग भी उनके लिये आचरण करो॥३॥

पीवो॑अश्वाः शु॒चद्र॑था॒ हि भू॒तायः॑शिप्रा वाजिनः सुनि॒ष्काः। इन्द्र॑स्य सूनो शवसो नपा॒तोऽनु॑ वश्चेत्यग्रि॒यं मदा॑य॥

हे राजपुरुषो! आप लोग विस्तीर्ण बल से युक्त और सेना के अङ्गों के सहित विराजमान और ऐश्वर्य्य से शोभित हुए राज्य के आनन्द की वृद्धि के लिये पुरुषार्थ करो, जिससे शत्रुजन आप लोगों का तिरस्कार करने को समर्थ न हो सकें॥४॥

ऋ॒भुमृ॑भुक्षणो र॒यिं वाजे॑ वा॒जिन्त॑मं॒ युज॑म्। इन्द्र॑स्वन्तं हवामहे सदा॒सात॑मम॒श्विन॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! आप लोग स्पर्द्धा से परस्पर बल बढ़ाय के सङ्ग्राम में शत्रुओं को जीतो॥५॥

सेदृ॑भवो॒ यमव॑थ यू॒यमिन्द्र॑श्च॒ मर्त्य॑म्। स धी॒भिर॑स्तु॒ सनि॑ता मे॒धसा॑ता॒ सो अर्व॑ता॥

हे राजसेनाजनो! जो आप लोगों के अध्यक्ष राजा और बुद्धिमान् रक्षक होवें तो आप लोगों का सर्वत्र विजय और सुख निरन्तर बढ़े॥६॥

वि नो॑ वाजा ऋभुक्षणः प॒थश्चि॑तन॒ यष्ट॑वे। अ॒स्मभ्यं॑ सूरयः स्तु॒ता विश्वा॒ आशा॑स्तरी॒षणि॑॥

जो मनुष्य बाल्यावस्था से लेकर विद्वानों की शिक्षा का ग्रहण करें, उनकी सम्पूर्ण इच्छा पूर्ण होवें॥७॥

तं नो॑ वाजा ऋभुक्षण॒ इन्द्र॒ नास॑त्या र॒यिम्। समश्वं॑ चर्ष॒णिभ्य॒ आ पु॒रु श॑स्त म॒घत्त॑ये॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि राजा और राजपुरुषों से धन की उन्नति सदा करें, जिससे बहुत प्रकार का सुख होवे॥८॥इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥८॥यह सैंतीसवाँ सूक्त और दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

उ॒तो हि वां॑ दा॒त्रा सन्ति॒ पूर्वा॒ या पू॒रुभ्य॑स्त्र॒सद॑स्युर्नितो॒शे। क्षे॒त्रा॒सां द॑दथुरुर्वरा॒सां घ॒नं दस्यु॑भ्यो अ॒भिभू॑तिमु॒ग्रम्॥

हे राजा और सेना के अध्यक्ष! आप दोनों उत्तम प्रकार शिक्षित भृत्यों को रख दुष्टों को नाश करके और विजय को प्राप्त होकर न्याय से राज्य का पालन करो॥१॥

उ॒त वा॒जिनं॑ पुरुनि॒ष्षिध्वा॑नं दधि॒क्रामु॑ ददथुर्वि॒श्वकृ॑ष्टिम्। ऋ॒जि॒प्यं श्ये॒नं प्रु॑षि॒तप्सु॑मा॒शुं च॒र्कृत्य॑म॒र्यो नृ॒पतिं॒ न शूर॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजजन शिल्पविद्या से उत्पन्न शस्त्र-अस्त्र और उत्तम प्रकार शिक्षित चार अङ्गों से युक्त सेना को सिद्ध करें तो कहीं भी पराजय न होवे॥२॥

यं सी॒मनु॑ प्र॒वते॑व॒ द्रव॑न्तं॒ विश्वः॑ पू॒रुर्मद॑ति॒ हर्ष॑माणः। प॒ड्भिर्गृध्य॑न्तं मेध॒युं न शूरं॑ रथ॒तुरं॒ वात॑मिव॒ ध्रज॑न्तम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जिस राजा के राज्य में नीचा स्थान जल के सदृश और सब प्रकार से गुणों का पात्र एक होता है, उसके समीप योग्य पुरुष रहते हैं॥३॥

यः स्मा॑रुन्धा॒नो गध्या॑ स॒मत्सु॒ सनु॑तर॒श्चर॑ति॒ गोषु॒ गच्छ॑न्। आ॒विर्ऋ॑जीको वि॒दथा॑ नि॒चिक्य॑त्ति॒रो अ॑र॒तिं पर्याप॑ आ॒योः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! जो जन अपने राज्य में शान्ति करने, शत्रुओं के राज्य में भय देने और बलयुक्त, अधिक अवस्थावाले, प्रसिद्ध कीर्तियुक्त होवें, उन्हीं को शत्रुओं के जीतने के लिये नियुक्त करो॥४॥

उ॒त स्मै॑नं वस्त्र॒मथिं॒ न ता॒युमनु॑ क्रोशन्ति क्षि॒तयो॒ भरे॑षु। नी॒चाय॑मानं॒ जसु॑रिं॒ न श्ये॒नं श्रव॒श्चाच्छा॑ पशु॒मच्च॑ यू॒थम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा प्रजापालन के विना कर लेता है, जिस राजा की प्रजा को दुष्ट जन दुःख देते हैं और जो राजा आप नीच कर्म करनेवाला, वाज पक्षी के सदृश हिंसक, पशु के सदृश मूर्ख और जिस राजा की सेना चोर के सदृश वर्त्तमान है, उसका शीघ्र विनाश होता है, यह निश्चय है॥५॥

उ॒त स्मा॑सु प्रथ॒मः स॑रि॒ष्यन्नि वे॑वेति॒ श्रेणि॑भी॒ रथा॑नाम्। स्रजं॑ कृण्वा॒नो जन्यो॒ न शुभ्वा॑ रे॒णुं रेरि॑हत्कि॒रणं॑ दद॒श्वान्॥

इस मन्त्र में उपमावाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो न्याय से प्रजाओं का पालन करता हुआ सेनाओं में अग्रगामी, धनुर्वेद का जाननेवाला, विजयी, चतुर, विद्वान्, धार्मिक और उत्तम सहाययुक्त राजा होवे, वही यशस्वी होकर महाराज होवे॥६॥

उ॒त स्य वा॒जी सहु॑रिर्ऋ॒तावा॒ शुश्रू॑षमाणस्त॒न्वा॑ सम॒र्ये। तुरं॑ य॒तीषु॑ तु॒रय॑न्नृजि॒प्योऽधि॑ भ्रु॒वोः कि॑रते रे॒णुमृ॒ञ्जन्॥

वही राज्य करने योग्य होवे जो विद्वान्, सब को सहनेवाला, सत्य का सेवी, उत्तम सेना और सरल स्वभावयुक्त होवे॥७॥

उ॒त स्मा॑स्य तन्य॒तोरि॑व॒ द्योर्ऋ॑घाय॒तो अ॑भि॒युजो॑ भयन्ते। य॒दा स॒हस्र॑म॒भि षी॒मयो॑धीद्दु॒र्वर्तुः॑ स्मा भवति भी॒म ऋ॒ञ्जन्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा बिजुली के सदृश दुष्टों का नाश करके धार्मिकों का सत्कार करता है, वह एक भी संख्यारहित वीरों के साथ युद्ध करने योग्य होता है और जब वह राजा न्याय से प्रकट दण्ड देनेवाला होवे, तब सब दुष्ट जन डर के छिप जाते हैं॥८॥

उ॒त स्मा॑स्य पनयन्ति॒ जना॑ जू॒तिं कृ॑ष्टि॒प्रो अ॒भिभू॑तिमा॒शोः। उ॒तैन॑माहुः समि॒थे वि॒यन्तः॒ परा॑ दधि॒क्रा अ॑सरत्स॒हस्रैः॑॥

उसी राजा की विद्वान् जन प्रशंसा करते हैं, जो प्रजा के पालन में तत्पर हुआ सब के व्यवहारों को सिद्ध करता है॥९॥

आ द॑धि॒क्राः शव॑सा॒ पञ्च॑ कृ॒ष्टीः सूर्य॑इव॒ ज्योति॑षा॒पस्त॑तान। स॒ह॒स्र॒साः श॑त॒सा वा॒ज्यर्वा॑ पृ॒णक्तु॒ मध्वा॒ समि॒मा वचां॑सि॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सूर्य्य के प्रकाश के सदृश न्याय से पाँच प्रकार की प्रजाओं का पालन करता है, वह असंख्य आनन्द को प्राप्त होता है॥१०॥इस सूक्त में राजा के गुणधर्म का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥१०॥यह अड़तालीसवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ॒शुं द॑धि॒क्रां तमु॒ नु ष्ट॑वाम दि॒वस्पृ॑थि॒व्या उ॒त च॑र्किराम। उ॒च्छन्ती॒र्मामु॒षसः॑ सूदय॒न्त्वति॒ विश्वा॑नि दुरि॒तानि॑ पर्षन्॥

जो राजा हम लोगों के दुःखों को दूर करके जैसे प्रातःकाल अन्धकार को वैसे अन्याय और दुष्टों का निषेध करता है, उसी की हम लोग प्रशंसा करें॥१॥

म॒हश्च॑र्क॒र्म्यर्व॑तः क्रतु॒प्रा द॑धि॒क्राव्णः॑ पुरु॒वार॑स्य॒ वृष्णः॑। यं पू॒रुभ्यो॑ दीदि॒वांसं॒ नाग्निं द॒दथु॑र्मित्रावरुणा॒ ततु॑रिम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा बुद्धिवाले और बुद्धि के देनेवालों को सदा धारण करता है, वह सूर्य्य के सदृश प्रतापी होता हुआ शीघ्र अपने कार्य्य को सिद्ध कर सकता है॥२॥

यो अश्व॑स्य दधि॒क्राव्णो॒ अका॑री॒त्समि॑द्धे अ॒ग्ना उ॒षसो॒ व्यु॑ष्टौ। अना॑गसं॒ तमदि॑तिः कृणोतु॒ स मि॒त्रेण॒ वरु॑णेना स॒जोषाः॑॥

हे मनुष्यो! जो अग्नि में जल आदि पदार्थों के संयोग करने को जाने और जो सज्जनों के साथ मित्रता कर और प्रातःकाल उठ के श्रेष्ठ कर्मों को करता है, वही सदैव प्रसन्न होता है, यह जानो॥३॥

द॒धि॒क्राव्ण॑ इ॒ष ऊ॒र्जो म॒हो यदम॑न्महि म॒रुतां॒ नाम॑ भ॒द्रम्। स्व॒स्तये॒ वरु॑णं मि॒त्रम॒ग्निं हवा॑मह॒ इन्द्रं॒ वज्र॑बाहुम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो अन्न आदि संस्कार और भोजन के समय की रीतियों को जान और स्वयं आचरण करके अन्यों को उपदेश देते और राजा के साथ विरोध नहीं करके प्रजा के साथ मित्र के सदृश आचरण करते हैं, वे ही प्रशंसा करने योग्य होते हैं॥४॥

इन्द्र॑मि॒वेदु॒भये॒ वि ह्व॑यन्त उ॒दीरा॑णा य॒ज्ञमु॑पप्र॒यन्तः॑। द॒धि॒क्रामु॒ सूद॑नं॒ मर्त्या॑य द॒दथु॑र्मित्रावरुणा नो॒ अश्व॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा और प्रजाजन पक्षपात से रहित, न्याययुक्त धर्म का आचरण करते हैं, वे शत्रुरहित हुए सब के प्रिय होते हैं॥५॥

द॒धि॒क्राव्णो॑ अकारिषं जि॒ष्णोरश्व॑स्य वा॒जिनः॑। सु॒र॒भि नो॒ मुखा॑ कर॒त्प्र ण॒ आयूं॑षि तारिषत्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो राजा सुगन्ध आदि से युक्त घृत आदि के होम से वायु वृष्टि जलादि को पवित्र कर सब के रोगों का निवारण करके अवस्थाओं को बढ़ाता है और प्रयत्न से सब प्रजाओं का पुत्र के सदृश पालन करता है, वह हम लोगों को पिता के सदृश सत्कार करने योग्य है॥६॥इस सूक्त में राजा और प्रजा के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥६॥यह उनतालीसवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

द॒धि॒क्राव्ण॒ इदु॒ नु च॑र्किराम॒ विश्वा॒ इन्मामु॒षसः॑ सूदयन्तु। अ॒पाम॒ग्नेरु॒षसः॒ सूर्य॑स्य॒ बृह॒स्पते॑राङ्गिर॒सस्य॑ जि॒ष्णोः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन् वा राजपुरुषो! आप लोग जैसे प्रातर्वेला सब को चैतन्य करती है, वैसे न्याय से सम्पूर्ण प्रजाओं को चैतन्य करो और जैसे प्रातःकाल का निमित्त सूर्य्य और सूर्य्य का निमित्त बिजुली, बिजुली का निमित्त वायु, वायु का कारण प्रकृति और प्रकृति का अधिष्ठाता परमेश्वर है, वैसे ही प्रजापालननिमित्त भृत्य, भृत्यनिमित्त अध्यक्ष, अध्यक्षों का निमित्त प्रधान और प्रधान का निमित्त राजा होवे॥१॥

सत्वा॑ भरि॒षो ग॑वि॒षो दु॑वन्य॒सच्छ्र॑व॒स्यादि॒ष उ॒षस॑स्तुरण्य॒सत्। स॒त्यो द्र॒वो द्र॑व॒रः प॑तङ्ग॒रो द॑धि॒क्रावेष॒मूर्जं॒ स्व॑र्जनत्॥

प्रजाजनों के साथ जो राजा सत्यवादी, जितेन्द्रिय, सब के सुख की इच्छा करता हुआ, न्यायकारी पिता के सदृश वर्ताव करे, वही प्रजाओं का पालन कर सकता है॥२॥

उ॒त स्मा॑स्य॒ द्रव॑तस्तुरण्य॒तः प॒र्णं न वेरनु॑ वाति प्रग॒र्धिनः॑। श्ये॒नस्ये॑व॒ ध्रज॑तो अङ्क॒सं परि॑ दधि॒क्राव्णः॑ स॒होर्जा तरि॑त्रतः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जिस राजा की वाज पक्षिणी के सदृश सेना पराक्रमवाली है, वह उसके द्वारा प्रजा का पालन करके डाकू चोरों का निवारण करे॥३॥

उ॒त स्य वा॒जी क्षि॑प॒णिं तु॑रण्यति ग्री॒वायां॑ ब॒द्धो अ॑पिक॒क्ष आ॒सनि॑। क्रतुं॑ दधि॒क्रा अनु॑ सं॒तवी॑त्वत्प॒थामङ्कां॒स्यन्वा॒पनी॑फणत्॥

हे मनुष्यो! जैसे सब प्रकार शोभित बन्धन से सन्नद्ध किया घोड़ा शीघ्र चलता है, वैसे ही अग्नि आदि से चलाये गये वाहन से शीघ्र जाओ॥४॥

हं॒सः शु॑चि॒षद्वसु॑रन्तरिक्ष॒सद्धोता॑ वेदि॒षदति॑थिर्दुरोण॒सत्। नृ॒षद्व॑र॒सदृ॑त॒सद्व्यो॑म॒सद॒ब्जा गो॒जा ऋ॑त॒जा अ॑द्रि॒जा ऋ॒तम्॥

जो जीव उत्तम गुण, कर्म और स्वभाववाले ईश्वर की आज्ञा के अनुकूल वर्त्ताव करते हैं, वे ही परमेश्वर के साथ आनन्द को भोगते हैं॥५॥इस सूक्त में राजा और प्रजा के कृत्यों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥५॥यह चालीसवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इन्द्रा॒ को वां॑ वरुणा सु॒म्नमा॑प॒ स्तोमो॑ ह॒विष्माँ॑ अ॒मृतो॒ न होता॑। यो वां॑ हृ॒दि क्रतु॑माँ अ॒स्मदु॒क्तः प॒स्पर्श॑दिन्द्रावरुणा॒ नम॑स्वान्॥

हे अध्यापक और उपदेशको! जो दाता जन के सदृश पुरुषार्थी, बुद्धिमान्, नम्र, शान्त, सत्कार करनेवाले और माता-पिता से उत्तम प्रकार शिक्षित होवें, उनको पढ़ा और उपदेश देकर लक्ष्मीयुक्त और श्रेष्ठ करो॥१॥

इन्द्रा॑ ह॒ यो वरु॑णा च॒क्र आ॒पी दे॒वौ मर्तः॑ स॒ख्याय॒ प्रय॑स्वान्। स ह॑न्ति वृ॒त्रा स॑मि॒थेषु॒ शत्रू॒नवो॑भिर्वा म॒हद्भिः॒ स प्र शृ॑ण्वे॥

हे न्याय करनेवाले राजा और मन्त्रीजनो! जो आप लोगों के सत्कार करने और शत्रुओं के जीतनेवाले महाशय अर्थात् गम्भीर अभिप्रायवाले, मेलयुक्त, आप लोगों की मित्रता में प्रीतिकर्त्ता, विजयी होवें; उनका सत्कार करके रक्षा करो॥२॥

इन्द्रा॑ ह॒ रत्नं॒ वरु॑णा॒ धेष्ठे॒त्था नृभ्यः॑ शशमा॒नेभ्य॒स्ता। यदी॒ सखा॑या स॒ख्याय॒ सोमैः॑ सु॒तेभिः॑ सुप्र॒यसा॑ मा॒दयै॑ते॥

जो राजा और मन्त्रीजन उत्तम गुणवाले मनुष्यों का धन आदि से सत्कार करते हैं, वे ही ऐश्वर्य्य को प्राप्त होकर सदा आनन्दित होते हैं॥३॥

इन्द्रा॑ यु॒वं व॑रुणा दि॒द्युम॑स्मि॒न्नोजि॑ष्ठमुग्रा॒ नि व॑धिष्टं॒ वज्र॑म्। यो नो॑ दु॒रेवो॑ वृ॒कति॑र्द॒भीति॒स्तस्मि॑न्मिमाथाम॒भिभू॒त्योजः॑॥

हे राजा और मन्त्री जनो! आप ब्रह्मचर्य्य, विद्या, सत्याचरण और जितेन्द्रियत्वादि गुणों से अतुल बल को बढ़ाय के शत्रुओं का निवारण और प्रजाओं का अच्छे प्रकार पालन करके निष्कण्टक राज्यानन्द का निरन्तर भोग करें॥४॥

इन्द्रा॑ यु॒वं व॑रुणा भू॒तम॒स्या धि॒यः प्रे॒तारा॑ वृष॒भेव॑ धे॒नोः। सा नो॑ दुहीय॒द्यव॑सेव ग॒त्वी स॒हस्र॑धारा॒ पय॑सा म॒ही गौः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे अध्यापक और उपदेशक जनो! आप सब के लिये ऐसी बुद्धि देओ कि जिससे सब पूर्ण मनोरथवाले होवें॥५॥

तो॒के हि॒ते तन॑य उ॒र्वरा॑सु॒ सूरो॒ दृशी॑के॒ वृष॑णश्च॒ पौंस्ये॑। इन्द्रा॑ नो॒ अत्र॒ वरु॑णा स्याता॒मवो॑भिर्द॒स्मा परि॑तक्म्यायाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजपुरुष जैसे ब्रह्माण्ड में सूर्य्य, वैसे प्रजाओं में पिता के सदृश वर्त्ताव कर और चोरों का निवारण करके न्याय से प्रजाओं का पालन करें॥६॥

यु॒वामिद्ध्यव॑से पू॒र्व्याय॒ परि॒ प्रभू॑ती ग॒विषः॑ स्वापी। वृ॒णी॒महे॑ स॒ख्याय॑ प्रि॒याय॒ शूरा॒ मंहि॑ष्ठा पि॒तरे॑व शं॒भू॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे प्रजाजनो! आप लोग उन्हीं राजा आदिकों को स्वीकार करो कि जो पिता के सदृश सब लोगों के पालन करने को समर्थ होवें॥७॥

ता वां॒ धियोऽव॑से वाज॒यन्ती॑रा॒जिं न ज॑ग्मुर्युव॒यूः सु॑दानू। श्रि॒ये न गाव॒ उप॒ सोम॑मस्थु॒रिन्द्रं॒ गिरो॒ वरु॑णं मे मनी॒षाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे विद्यावाली माता अपने सन्तानों को उत्तम प्रकार शिक्षा दे पालन कर और विद्या से युक्त करके सुखी करती है, वैसे ही राजा प्रजा के प्रति वर्त्ताव करे॥८॥

इ॒मा इन्द्रं॒ वरु॑णं मे मनी॒षा अग्म॒न्नुप॒ द्रवि॑णमि॒च्छमा॑नाः। उपे॑मस्थुर्जो॒ष्टार॑इव॒ वस्वो॑ र॒घ्वीरी॑व॒ श्रव॑सो॒ भिक्ष॑माणाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजन्! जैसे कन्याजन ब्रह्मचर्य्य से ग्रहण की गई विद्या और उत्तम शिक्षा से यशयुक्त और विद्यावाली होकर अपने अनुकूल पतियों को प्राप्त होकर सदा आनन्दित होती हैं, वैसे ही प्रजाओं के साथ आप और आपके साथ प्रजाजन निरन्तर आनन्द करें॥९॥

अश्व्य॑स्य॒ त्मना॒ रथ्य॑स्य पु॒ष्टेर्नित्य॑स्य रा॒यः पत॑यः स्याम। ता च॑क्रा॒णा ऊ॒तिभि॒र्नव्य॑सीभिरस्म॒त्रा रायो॑ नि॒युतः॑ सचन्ताम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे युक्त अर्थात् कार्य में लगे हुए पुरुष सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य को प्राप्त होते हैं, वैसे हम लोग सम्पूर्ण आनन्द को प्राप्त होवें, ऐसी इच्छा करें॥१०॥

आ नो॑ बृहन्ता बृह॒तीभि॑रू॒ती इन्द्र॑ या॒तं व॑रुण॒ वाज॑सातौ। यद्दि॒द्यवः॒ पृत॑नासु प्र॒क्रीळा॒न्तस्य॑ वां स्याम सनि॒तार॑ आ॒जेः॥

हे राजन्! जैसे हम लोग आपके प्रति प्रीति से वर्त्ताव करें, वैसा ही आपको भी चाहिये कि हम लोगों में वर्त्ताव करें॥११॥इस सूक्त में अध्यापक, उपदेशक, राजा, प्रजा और मन्त्री के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥११॥यह इकतालीसवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

मम॑ द्वि॒ता रा॒ष्ट्रं क्ष॒त्रिय॑स्य वि॒श्वायो॒र्विश्वे॑ अ॒मृता॒ यथा॑ नः। क्रतुं॑ सचन्ते॒ वरु॑णस्य दे॒वा राजा॑मि कृ॒ष्टेरु॑प॒मस्य॑ व॒व्रेः॥

हे मनुष्यो! इस संसार में स्वामी और स्वम् अर्थात् अपना ये दो ही पदार्थ वर्त्तमान हैं और जिस देश में दीर्घकालपर्य्यन्त जीवने और न्याययुक्त स्वभाववाले धार्मिक मन्त्री जन सब प्रकार के गुणग्रहणकर्त्ता श्रेष्ठ उपमा से युक्त वर्त्तमान हैं, वहाँ ही रहता हुआ सज्जन सुख का अत्यन्त भोग करता है॥१॥

अ॒हं राजा॒ वरु॑णो॒ मह्यं॒ तान्य॑सु॒र्या॑णि प्रथ॒मा धा॑रयन्त। क्रतुं॑ सचन्ते॒ वरु॑णस्य दे॒वा राजा॑मि कृ॒ष्टेरु॑प॒मस्य॑ व॒व्रेः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सर्वत्र व्याप्त, बुद्धि और धन के देनेवाले जगत् के स्वामी मुझ परमात्मा को भजते हैं, वे सब सुखों को भजते हैं॥२॥

अ॒हमिन्द्रो॒ वरु॑ण॒स्ते म॑हि॒त्वोर्वी ग॑भी॒रे रज॑सी सु॒मेके॑। त्वष्टे॑व॒ विश्वा॒ भुव॑नानि वि॒द्वान्त्समै॑रयं॒ रोद॑सी धा॒रयं॑ च॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे चतुर पण्डित, पूर्ण विद्यावान्, शिल्पी जन उत्तम वस्तुओं को रचते हैं, वैसे ही मुझ से विचित्र उत्तम उत्तम जगत् रचा गया धारण किया जाता है और जैसे मैंने रचा वैसे अन्य जीव का सामर्थ्य रचने का नहीं है, किन्तु मेरे किये हुए कार्य्य से कुछ ग्रहण करके अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार रचते हैं, यह जानना चाहिये॥३॥

अ॒हम॒पो अ॑पिन्वमु॒क्षमा॑णा धा॒रयं॒ दिवं॒ सद॑न ऋ॒तस्य॑। ऋ॒तेन॑ पु॒त्रो अदि॑तेर्ऋ॒तावो॒त त्रि॒धातु॑ प्रथय॒द्वि भूम॑॥

हे मनुष्यो! मेरे विना इस संसार का धारण करनेवाला अन्य कोई भी नहीं है और जैसा तीन अर्थात् सत्त्वादिगुणमय कारण है, वैसे ही इस कार्य्य को देखो॥४॥

मां नरः॒ स्वश्वा॑ वा॒जय॑न्तो॒ मां वृ॒ताः स॒मर॑णे हवन्ते। कृ॒णोम्या॒जिं म॒घवा॒हमिन्द्र॒ इय॑र्मि रे॒णुम॒भिभू॑त्योजाः॥

हे मनुष्यो! जो जन सब वस्तुओं में प्राप्त होनेवाले, सब के अन्तर्यामि और सर्वशक्तिमान् मुझ परमात्मा की संग्राम में प्रार्थना करते हैं, उन्हीं का मैं विजय कराता हूँ और जो धर्म से युद्ध करते हैं, उन्हीं का मैं सहायक होता हूँ॥५॥

अ॒हं ता विश्वा॑ चकरं॒ नकि॑र्मा॒ दैव्यं॒ सहो॑ वरते॒ अप्र॑तीतम्। यन्मा॒ सोमा॑सो म॒मद॒न्यदु॒क्थोभे भ॑येते॒ रज॑सी अपा॒रे॥

हे मनुष्यो! जो पदार्थ प्रत्यक्ष और जो नहीं प्रत्यक्ष हैं, वे सब मुझ से ही बनाये गये, मेरे में अनन्त बल है, मुझको प्राप्त होकर सम्पूर्ण आनन्द को प्राप्त होते हैं और मेरे ही भय से सब लोगों के सहचारी जीव डरते हैं॥६॥

वि॒दुष्टे॒ विश्वा॒ भुव॑नानि॒ तस्य॒ ता प्र ब्र॑वीषि॒ वरु॑णाय वेधः। त्वं वृ॒त्राणि॑ शृण्विषे जघ॒न्वान्त्वं वृ॒ताँ अ॑रिणा इन्द्र॒ सिन्धू॑न्॥

हे परमेश्वर! जिससे आपने कृपा करके हम लोगों के कल्याण के लिये वेदों का उपदेश किया, जिससे हम लोगों के दोष नाश किये गये और वर्षा के द्वारा पालन किया जाता है, उस ही की हम लोग उपासना करते हैं॥७॥

अ॒स्माक॒मत्र॑ पि॒तर॒स्त आ॑सन्त्स॒प्त ऋष॑यो दौर्ग॒हे ब॒ध्यमा॑ने। त आय॑जन्त त्र॒सद॑स्युमस्या॒ इन्द्रं॒ न वृ॑त्र॒तुर॑मर्धदे॒वम्॥

हे मनुष्यो! जिस जगदीश्वर ने सब के रक्षण के लिये ऋतु आदि पदार्थ रचे, उसकी उपासना करके दुःख से जीतने योग्य दुःख को जीतो॥८॥

पु॒रु॒कुत्सा॑नी॒ हि वा॒मदा॑शद्ध॒व्येभि॑रिन्द्रावरुणा॒ नमो॑भिः। अथा॒ राजा॑नं त्र॒सद॑स्युमस्या वृत्र॒हणं॑ ददथुरर्धदे॒वम्॥

हे मनुष्यो! जिसकी कृपा से सम्पूर्ण पृथिवी धान्य से युक्त हुई और सूर्य्य प्रकट हुआ, उसकी निरन्तर उपासना करो॥९॥

रा॒या व॒यं स॑स॒वांसो॑ मदेम ह॒व्येन॑ दे॒वा यव॑सेन॒ गावः॑। तां धे॒नुमि॑न्द्रावरुणा यु॒वं नो॑ वि॒श्वाहा॑ धत्त॒मन॑पस्फुरन्तीम्॥

हे विद्वानो! हम लोगों में वैसी सम्पूर्ण शास्त्रों में कहे पदार्थविषयक वाणी को स्थित करो, जिससे हम लोग सदा ही आनन्दित होवें॥१०॥इस सूक्त में राजा, ईश्वर, ईश्वरोपासना और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥१०॥यह बयालीसवाँ सूक्त और अठारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

क उ॑ श्रवत्कत॒मो य॒ज्ञिया॑नां व॒न्दारु॑ दे॒वः क॑त॒मो जु॑षाते। कस्ये॒मां दे॒वीम॒मृते॑षु॒ प्रेष्ठां॑ हृ॒दि श्रे॑षाम सुष्टु॒तिं सु॑ह॒व्याम्॥

हे विद्वानो! कौन इस संसार में यज्ञ, कौन यज्ञ के करनेवाले, कौन विद्वान्, कौन विद्यायुक्त स्त्री तथा कौन अमृत और कौन सेवने और सुनने योग्य है, यह पूछा है, उत्तर आगे हैं॥१॥

को मृ॑ळाति कत॒म आग॑मिष्ठो दे॒वाना॑मु कत॒मः शंभ॑विष्ठः। रथं॒ कमा॑हुर्द्र॒वद॑श्वमा॒शुं यं सूर्य॑स्य दुहि॒तावृ॑णीत॥

हे विद्वानो! हम लोग किस सुखकारक निरन्तर आनेवाले उत्तम प्रकार कल्याणकारक पदार्थ तथा अग्नि और जल के द्वारा चलनेवाले वाहन को उत्तम प्रकार जानें, इस प्रकार दो मन्त्रों में कहे हुए प्रश्नों के ये उत्तर हैं। जो जैसे प्रातर्वेला उषा सूर्य्य को वैसे अध्यापक से सुनता, वायु के सदृश विद्या का सेवन करता है और पतिव्रता स्त्री के सदृश विद्यायुक्त स्त्री प्रशंसा के योग्य पति को स्वीकार करती है, जो परोपकारी है, वह सुख करनेवाला, बिजुली अतीव आनेवाली, परमेश्वर अत्यन्त कल्याण करनेवाला, विद्वानों के मध्य में विद्वान्, जल-अग्नि [के] कलाकौशल से चलाया गया विमान आदि यान प्रशंसा के योग्य होता है, ऐसा जानो॥२॥

म॒क्षू हि ष्मा॒ गच्छ॑थ॒ ईव॑तो॒ द्यूनिन्द्रो॒ न श॒क्तिं परि॑तक्म्यायाम्। दि॒व आजा॑ता दि॒व्या सु॑प॒र्णा कया॒ शची॑नां भवथः॒ शचि॑ष्ठा॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो बिजुली के सदृश सामर्थ्य को बढ़ाते हैं, वे बुद्धिमान् होकर अतुल लक्ष्मी को संसार में प्राप्त होते हैं॥३॥

का वां॑ भू॒दुप॑मातिः॒ कया॑ न॒ आश्वि॑ना गमथो हू॒यमा॑ना। को वां॑ म॒हश्चि॒त्त्यज॑सो अ॒भीक॑ उरु॒ष्यतं॑ माध्वी दस्रा न ऊ॒ती॥

हे अध्यापक और उपदेशक जनो! तभी आप दोनों की श्रेष्ठ उपमा होती है कि जब हम लोगों को विद्यावान् करो और दुष्ट दोषों को दूर पहुँचाओ॥४॥

उ॒रु वां॒ रथः॒ परि॑ नक्षति॒ द्यामा यत्स॑मु॒द्राद॒भि वर्त॑ते वाम्। मध्वा॑ माध्वी॒ मधु॑ वां प्रुषाय॒न्यत्सीं॑ वां॒ पृक्षो॑ भु॒रज॑न्त प॒क्वाः॥

हे मनुष्यो! जो आप लोगों को विद्वान् करें, उनकी निरन्तर सेवा करो॥५॥

सिन्धु॑र्ह वां र॒सया॑ सिञ्च॒दश्वा॑न्घृ॒णा वयो॑ऽरु॒षासः॒ परि॑ ग्मन्। तदू॒ षु वा॑मजि॒रं चे॑ति॒ यानं॒ येन॒ पती॒ भव॑थः सू॒र्यायाः॑॥

हे अध्यापक और उपदेशक जनो! आप जैसे उत्तम रस युक्त जल से वृक्षों और क्षेत्रादि को उत्तम प्रकार सिञ्चन कर और बढ़ाय के इन से फलों को प्राप्त होते हैं, वैसे ही सब मनुष्यों को पढ़ा उपदेश दे और बुद्धि से बढ़ाय कर सुखरूपी फलयुक्त होओ॥६॥

इ॒हेह॒ यद्वां॑ सम॒ना प॑पृ॒क्षे सेयम॒स्मे सु॑म॒तिर्वा॑जरत्ना। उ॒रु॒ष्यतं॑ जरि॒तारं॑ यु॒वं ह॑ श्रि॒तः कामो॑ नासत्या युव॒द्रिक्॥

हे अध्यापक और उपदेशक जनो! आप लोग इस संसार में जो बुद्धि आप लोगों को प्राप्त होवे उसको सब के लिये देओ और जैसी अपने हित के लिये इच्छा करते हो, वैसी सब के लिये करो॥७॥इस सूक्त में अध्यापक और उपदेशक पढ़ने और उपदेश सुननेवाले के गुण वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥७॥यह तैंतालीसवाँ सूक्त और उन्नीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

तं वां॒ रथं॑ व॒यम॒द्या हु॑वेम पृथु॒ज्रय॑मश्विना॒ संग॑तिं॒ गोः। यः सू॒र्यां वह॑ति वन्धुरा॒युर्गिर्वा॑हसं पुरु॒तमं॑ वसू॒युम्॥

हे मनुष्यो! जिस अग्नि और जल से शिल्पविद्या ही साधन जिसका ऐसा रथ आदि उत्पन्न किया जाता है, वही अपने आत्मा के तुल्य सब को प्रसन्न करता है॥१॥

यु॒वं श्रिय॑मश्विना दे॒वता॒ तां दिवो॑ नपाता वनथः॒ शची॑भिः। यु॒वोर्वपु॑र॒भि पृक्षः॑ सचन्ते॒ वह॑न्ति॒ यत्क॑कु॒हासो॒ रथे॑ वाम्॥

जो विद्वान् जन बुद्धि को प्राप्त होकर अन्य जनों के लिये देते हैं, वे सम्पूर्ण दिशाओं में पूजने अर्थात् सत्कार करने योग्य होते हैं॥२॥

को वा॑म॒द्या क॑रते रा॒तह॑व्य ऊ॒तये॑ वा सुत॒पेया॑य वा॒र्कैः। ऋ॒तस्य॑ वा व॒नुषे॑ पू॒र्व्याय॒ नमो॑ येमा॒नो अ॑श्वि॒ना व॑वर्तत्॥

हे अध्यापक और उपदेशक जनो! जो आप दोनों का सत्कार करें, उनको उत्तम प्रकार शिक्षित और सभ्य अर्थात् सभा के योग्य करो और जिनसे विद्या का ग्रहण कराओ, उनका निरन्तर सत्कार भी करो॥३॥

हि॒र॒ण्यये॑न पुरुभू॒ रथे॑ने॒मं य॒ज्ञं ना॑स॒त्योप॑ यातम्। पिबा॑थ॒ इन्मधु॑नः सो॒म्यस्य॒ दध॑थो॒ रत्नं॑ विध॒ते जना॑य॥

हे मनुष्यो! जो शिल्पविद्या के प्रचार करनेवाले हों, वे ही संसार के सुख करनेवाले होवें॥४॥

आ नो॑ यातं दि॒वो अच्छा॑ पृथि॒व्या हि॑र॒ण्यये॑न सु॒वृता॒ रथे॑न। मा वा॑म॒न्ये नि य॑मन्देव॒यन्तः॒ सं यद्द॒दे नाभिः॑ पू॒र्व्या वा॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सब प्रजा और राजाजन, राजा और राजा के पुरुषों के सङ्ग की सदा ही इच्छा करें और सदैव सुख और दुःख को भोगें॥५॥

नू नो॑ र॒यिं पु॑रु॒वीरं॑ बृ॒हन्तं॒ दस्रा॒ मिमा॑थामु॒भये॑ष्व॒स्मे। नरो॒ यद्वा॑मश्विना॒ स्तोम॒माव॑न्त्स॒धस्तु॑तिमाजमी॒ळ्हासो॑ अग्मन्॥

हे राजन् और मुख्य मन्त्रीजनो! आप दोनों सूर्य्य और चन्द्रमा के सदृश हम लोगों में वर्त्ताव कीजिये और बहुत लक्ष्मी को स्थापित कीजिये, जिससे हम लोग धन से युक्त होवें॥६॥

इ॒हेह॒ यद्वां॑ सम॒ना प॑पृ॒क्षे सेयम॒स्मे सु॑म॒तिर्वा॑जरत्ना। उ॒रु॒ष्यतं॑ जरि॒तारं॑ यु॒वं ह॑ श्रि॒तः कामो॑ नासत्या युव॒द्रिक्॥

मनुष्यों को चाहिये सदा इस संसार में यथार्थवक्ता पुरुषों की बुद्धि की इच्छा करें और सत्य की कामना करें, जिससे सम्पूर्ण इच्छा पूर्ण होवे॥७॥इस सूक्त में अध्यापक, उपदेशक, राजा, अमात्य और सज्जन के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥७॥यह चवालीसवाँ सूक्त और बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

ए॒ष स्य भा॒नुरुदि॑यर्ति यु॒ज्यते॒ रथः॒ परि॑ज्मा दि॒वो अ॒स्य सान॑वि। पृ॒क्षासो॑ अस्मिन्मिथु॒ना अधि॒ त्रयो॒ दृति॑स्तु॒रीयो॒ मधु॑नो॒ वि र॑प्शते॥

हे मनुष्यो! जो प्रकाशमान सूर्य्य ब्रह्माण्ड के मध्य में विराजित है और इसके चारों ओर बहुत भूगोल सम्बन्धयुक्त हैं तथा पृथिवी और चन्द्रलोक एक साथ घूमते हैं और जिसके प्रभाव से वृष्टियाँ होती हैं, इस सम्पूर्ण को जानो॥१॥

उद्वां॑ पृ॒क्षासो॒ मधु॑मन्त ईरते॒ रथा॒ अश्वा॑स उ॒षसो॒ व्यु॑ष्टिषु। अ॒पो॒र्णु॒वन्त॒स्तम॒ आ परी॑वृतं॒ स्व१॒॑र्ण शु॒क्रं त॒न्वन्त॒ आ रजः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! ये सब लोक सूर्य्य के सब ओर घूमते हैं और जैसे सूर्य्य की किरणें भूगोल के आधे भाग में स्थित अन्धकार को निवारण करके प्रकाश उत्पन्न करते हैं, वैसे ही विद्वान् जन विद्या के दान से अविद्या को निवारण करके विद्या को उत्पन्न करें॥२॥

मध्वः॑ पिबतं मधु॒पेभि॑रा॒सभि॑रु॒त प्रि॒यं मधु॑ने युञ्जाथां॒ रथ॑म्। आ व॑र्त॒निं मधु॑ना जिन्वथस्प॒थो दृतिं॑ वहेथे॒ मधु॑मन्तमश्विना॥

हे सेना के ईश और योद्धाजनो! तुम सेनास्थ वीरों के साथ ऐसे भोजन करो और वाहनों को रचो, जिनसे बल की वृद्धि और लक्ष्मी की प्राप्ति हो, जैसे वायु और बिजुली वर्षा करके सबको सुखी करते हैं, वैसे प्रजा को सुखी करो॥३॥

हं॒सासो॒ ये वां॒ मधु॑मन्तो अ॒स्रिधो॒ हिर॑ण्यपर्णा उ॒हुव॑ उष॒र्बुधः॑। उ॒द॒प्रुतो॑ म॒न्दिनो॑ मन्दिनि॒स्पृशो॒ मध्वो॒ न मक्षः॒ सव॑नानि गच्छथः॥

हे राजपुरुषो! आप लोग वाहनों की कलों में अग्निजलादि के संप्रयोग से शीघ्र आ आकर ऐश्वर्य्य की इच्छा करें तो क्या रत्न को न प्राप्त होवें॥४॥

स्व॒ध्व॒रासो॒ मधु॑मन्तो अ॒ग्नय॑ उ॒स्रा ज॑रन्ते॒ प्रति॒ वस्तो॑र॒श्विना॑। यन्नि॒क्तह॑स्तस्त॒रणि॑र्विचक्ष॒णः सोमं॑ सु॒षाव॒ मधु॑मन्त॒मद्रि॑भिः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! आप लोग शिल्पी विद्वानों के सङ्ग से अग्नि आदि और सोमलता आदि पदार्थों को जान के और अच्छे प्रकार प्रयोग करके अभीष्ट कार्य्यों को सिद्ध करो॥५॥

आ॒के॒नि॒पासो॒ अह॑भि॒र्दवि॑ध्वतः॒ स्व१॒॑र्ण शु॒क्रं त॒न्वन्त॒ आ रजः॑। सूर॑श्चि॒दश्वा॑न्युयुजा॒न ई॑यते॒ विश्वाँ॒ अनु॑ स्व॒धया॑ चेतथस्प॒थः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो! जो आप लोग किरणों और सूर्य्य के सदृश वाहनों में अग्नि से जल को विस्तारो तो जल, स्थल और आकाशमार्गों को सुख से जाओ॥६॥

प्र वा॑मवोचमश्विना धियं॒धा रथः॒ स्वश्वो॑ अ॒जरो॒ यो अस्ति॑। येन॑ स॒द्यः परि॒ रजां॑सि या॒थो ह॒विष्म॑न्तं त॒रणिं॑ भो॒जमच्छ॑॥

हे मनुष्यो! विद्वान् हम लोग आप लोगों को जिन शिल्पविद्याओं का ग्रहण करावें, उन विद्याओं से आप लोग विमान आदि वाहनों को रच शीघ्र गमन और आगमन को करके बहुत भोगों को प्राप्त होओ॥७॥इस सूक्त में सूर्य और अग्नि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥७॥यह पैंतालीसवाँ सूक्त और इक्कीसवाँ वर्ग और चौथा अनुवाक समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

अग्रं॑ पिबा॒ मधू॑नां सु॒तं वा॑यो॒ दिवि॑ष्टिषु। त्वं हि पू॑र्व॒पा असि॑॥

हे विद्वन्! जिससे आप सनातन विद्याओं की रक्षा करके सब के लिये देते हो, इससे आप इन क्रियाओं में मुखिया होते हैं॥१॥

श॒तेना॑ नो अ॒भिष्टि॑भिर्नि॒युत्वाँ॒ इन्द्र॑सारथिः। वायो॑ सु॒तस्य॑ तृम्पतम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे वायु के साथ बिजुली, बिजुली के साथ वायु अनेक क्रियाओं को उत्पन्न करते हैं, वैसे पृथिवी और जलादिकों से आप अनेक कार्य्यों को सिद्ध करो॥२॥

आ वां॑ स॒हस्रं॒ हर॑य॒ इन्द्र॑वायू अ॒भि प्रयः॑। वह॑न्तु॒ सोम॑पीतये॥

हे मनुष्यो! जो विद्वान् जन आप लोगों को पढ़ाय और उत्तम प्रकार शिक्षा देकर विद्वान् करते हैं, उनकी निरन्तर सेवा करो॥३॥

रथं॒ हिर॑ण्यवन्धुर॒मिन्द्र॑वायू स्वध्व॒रम्। आ हि स्थाथो॑ दिवि॒स्पृश॑म्॥

हे अध्यापक और उपदेशक जनो! आप लोग प्रीति से सुवर्ण आदि से जड़े हुए वाहनों की विद्या का मनुष्यों के लिये निरन्तर उपदेश देओ कि जिन वाहनों से ये लोग अन्तरिक्ष आदिकों में जा सकें॥४॥

रथे॑न पृथु॒पाज॑सा दा॒श्वांस॒मुप॑ गच्छतम्। इन्द्र॑वायू इ॒हा ग॑तम्॥

जैसे वायु और बिजुली बड़े प्रताप से युक्त वर्त्तमान हैं, वैसे ही राजा और मन्त्रीजन होवें॥५॥

इन्द्र॑वायू अ॒यं सु॒तस्तं दे॒वेभिः॑ स॒जोष॑सा। पिब॑तं दा॒शुषो॑ गृ॒हे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य और पवन सब के उपकार को निरन्तर करते हैं, वैसे ही विद्वानों को करना चाहिये॥६॥

इ॒ह प्र॒याण॑मस्तु वा॒मिन्द्र॑वायू वि॒मोच॑नम्। इ॒ह वां॒ सोम॑पीतये॥

हे मनुष्यो! जो नित्य इधर उधर कार्य्यसिद्धि के लिय जावे और आवे उसी को राजा मानो॥७॥इस सूक्त में बिजुली और वायु के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥७॥यह छियालीसवाँ सूक्त और बाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

वायो॑ शु॒क्रो अ॑यामि ते॒ मध्वो॒ अग्रं॒ दिवि॑ष्टिषु। आ या॑हि॒ सोम॑पीतये स्पा॒र्हो दे॑व नि॒युत्व॑ता॥

जो वायु के सदृश सर्वत्र विहार करके विद्या का ग्रहण करते हैं, वे सर्वत्र ईप्सा करने योग्य होते हैं॥१॥

इन्द्र॑श्च वायवेषां॒ सोमा॑नां पी॒तिम॑र्हथः। यु॒वां हि यन्तीन्द॑वो नि॒म्नमापो॒ न स॒ध्र्य॑क्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे यज्ञ जलों को प्राप्त होते हैं, वैसे ही विद्वान् विद्याव्यवहार के योग्य होते हैं॥२॥

वाय॒विन्द्र॑श्च शु॒ष्मिणा॑ स॒रथं॑ शवसस्पती। नि॒युत्व॑न्ता न ऊ॒तय॒ आ या॑तं॒ सोम॑पीतये॥

हे मनुष्यो! जो राजा के मन्त्री जन बल के बढ़ानेवाले सामर्थ्य युक्त और न्यायकारी होवें, वे आप लोगों के पालन करनेवाले हों॥३॥

या वां॒ सन्ति॑ पुरु॒स्पृहो॑ नि॒युतो॑ दा॒शुषे॑ नरा। अ॒स्मे ता य॑ज्ञवाह॒सेन्द्र॑वायू॒ नि य॑च्छतम्॥

हे राजा और मन्त्री जनो! आप लोगों को चाहिये कि हम प्रजा जनों की इच्छा पूर्ण करें, जिससे हम लोग आप लोगों का पूर्ण काम करें॥४॥इस सूक्त में विद्वान् राजा और अमात्य के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥४॥यह सैंतालीसवाँ सूक्त और तेईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

वि॒हि होत्रा॒ अवी॑ता॒ विपो॒ न रायो॑ अ॒र्यः। वाय॒वा च॒न्द्रेण॒ रथे॑न या॒हि सु॒तस्य॑ पी॒तये॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे बुद्धिमान् वैश्यजन प्रीति से धन की रक्षा करता है, वैसे ही आप और आपके भृत्यजन अच्छी प्रीति से प्रजाओं की निरन्तर रक्षा करो॥१॥

नि॒र्यु॒वा॒णो अश॑स्तीर्नि॒युत्वाँ॒ इन्द्र॑सारथिः। वाय॒वा च॒न्द्रेण॒ रथे॑न या॒हि सु॒तस्य॑ पी॒तये॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे वायु से अग्नि बढ़ती और शीघ्र चलती है, वैसे ही न्याय से पालन की गई प्रजा से राजा वृद्धि को प्राप्त होता है और जो हिंसा नहीं करते हैं, वे शत्रुओं से रहित हुए सब के प्रिय होते हैं॥२॥

अनु॑ कृ॒ष्णे वसु॑धिती ये॒माते॑ वि॒श्वपे॑शसा। वाय॒वा च॒न्द्रेण॒ रथे॑न या॒हि सु॒तस्य॑ पी॒तये॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! जैसे भूमि और सूर्य्य बहुत फल देनेवाले वर्त्तमान और नियम से चलते हैं, वैसे बहुत फलों के देनेवाले होकर विद्या और विनय के नियम से निरन्तर जाइये॥३॥

वह॑न्तु त्वा मनो॒युजो॑ यु॒क्तासो॑ नव॒तिर्नव॑। वाय॒वा च॒न्द्रेण॒ रथे॑न या॒हि सु॒तस्य॑ पी॒तये॑॥

हे राजन्! जो श्रेष्ठ यथार्थवक्ता जन आपके सहायक होवें तो आप जिस-जिस पदार्थ की इच्छा करें, वह-वह सब सिद्ध होवें॥४॥

वायो॑ श॒तं हरी॑णां यु॒वस्व॒ पोष्या॑णाम्। उ॒त वा॑ ते सह॒स्रिणो॒ रथ॒ आ या॑तु॒ पाज॑सा॥

हे राजन्! जो राज्य करने की इच्छा करो तो उत्तम सहायों का ग्रहण करो॥५॥इस सूक्त में राजगुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥५॥यह अड़तालीसवाँ सूक्त और चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इ॒दं वा॑मा॒स्ये॑ ह॒विः प्रि॒यमि॑न्द्राबृहस्पती। उ॒क्थं मद॑श्च शस्यते॥

जो राजा आदि मनुष्य उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त अन्न को खाते हैं तो प्रकाशयुक्त अधिक अवस्थावाले और बलवान् होते हैं॥१॥

अ॒यं वां॒ परि॑ षिच्यते॒ सोम॑ इन्द्राबृहस्पती। चारु॒र्मदा॑य पी॒तये॑॥

जैसे उत्तमान्न सेवन किया जाता, वैसे ही उत्तम रस भी सेवन किया जावे॥२॥

आ न॑ इन्द्राबृहस्पती गृ॒हमिन्द्र॑श्च गच्छतम्। सो॒म॒पा सोम॑पीतये॥

हे राजा, मन्त्री और धनी जनो! जैसे हम लोग आप लोगों को निमन्त्रण देकर अन्न आदि से सत्कार करें, वैसे ही आप हम लोगों का सत्कार करो॥३॥

अ॒स्मे इ॑न्द्राबृहस्पती र॒यिं ध॑त्तं शत॒ग्विन॑म्। अश्वा॑वन्तं सह॒स्रिण॑म्॥

तभी राजा और प्रधानादिकों की प्रशंसा होवे कि जब सब प्रजा को धन और विद्या से युक्त करें॥४॥

इन्द्रा॒बृह॒स्पती॑ व॒यं सु॒ते गी॒र्भिर्ह॑वामहे। अ॒स्य सोम॑स्य पी॒तये॑॥

राजा और प्रजाजनों को चाहिये कि परस्पर के सत्कार से बड़े ऐश्वर्य्य का भोग करें॥५॥

सोम॑मिन्द्राबृहस्पती॒ पिब॑तं दा॒शुषो॑ गृ॒हे। मा॒दये॑थां॒ तदो॑कसा॥

राजा आदि जन जैसे स्वयं विद्यायुक्त, धार्मिक, न्यायकारी और आनन्दित होवें, वैसे प्रजाजनों को भी करें॥६॥इस सूक्त में राजा और प्रजादि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥६॥यह उनचासवाँ सूक्त और पच्चीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

यस्त॒स्तम्भ॒ सह॑सा॒ वि ज्मो अन्ता॒न्बृह॒स्पति॑स्त्रिषध॒स्थो रवे॑ण। तं प्र॒त्नास॒ ऋष॑यो॒ दीध्या॑नाः पु॒रो विप्रा॑ दधिरे म॒न्द्रजि॑ह्वम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सूर्य्य अपनी आकर्षणशक्ति से भूगोलों को धारण करता और भूगोलों में वर्त्तमान पदार्थों को धारण करता है, वैसे ही विद्वान् लोग सब मनुष्यों को धारण करके उनके अन्तःकरणों को प्रकाशित करें॥१॥

धु॒नेत॑यः सुप्रके॒तं मद॑न्तो॒ बृह॑स्पते अ॒भि ये न॑स्तत॒स्रे। पृष॑न्तं सृ॒प्रमद॑ब्धमू॒र्वं बृह॑स्पते॒ रक्ष॑तादस्य॒ योनि॑म्॥

हे मनुष्यो! जो लोग डाकू और चोरादिकों का निवारण कर धार्मिक विद्वानों को सुख दे कर अङ्ग और उपाङ्गों के सहित विद्या के व्यवहार को बढ़ावें, उनका आप लोग सत्कार करें॥२॥

बृह॑स्पते॒ या प॑र॒मा प॑रा॒वदत॒ आ त॑ ऋत॒स्पृशो॒ नि षे॑दुः। तुभ्यं॑ खा॒ता अ॑व॒ता अद्रि॑दुग्धा॒ मध्वः॑ श्चोतन्त्य॒भितो॑ विर॒प्शम्॥

हे मनुष्यो! आप लोग वृद्ध विद्वान् राजा लोगों के समीप से अनादि काल से सिद्ध नीति को ग्रहण करके मेघों के सदृश प्रजाओं को सुख से सींचो॥३॥

बृह॒स्पतिः॑ प्रथ॒मं जाय॑मानो म॒हो ज्योति॑षः पर॒मे व्यो॑मन्। स॒प्तास्य॑स्तुविजा॒तो रवे॑ण॒ वि स॒प्तर॑श्मिरधम॒त्तमां॑सि॥

हे विद्वानो! जैसे सूर्य्य में सात प्रकार के रूपवाले तत्त्व मिले हुए वर्त्तमान हैं, जिन किरणों के द्वारा सब से रसों को ग्रहण करता है, वैसे पाँच ज्ञानेन्द्रिय, मन और आत्मा से सब विद्याओं को ग्रहण करके पढ़ाने और उपदेश करने से सबके अज्ञान को दूर करके विद्या के प्रकाश को उत्पन्न करो॥४॥

स सु॒ष्टुभा॒ स ऋक्व॑ता ग॒णेन॑ व॒लं रु॑रोज फलि॒गं रवे॑ण। बृह॒स्पति॑रु॒स्रिया॑ हव्य॒सूदः॒ कनि॑क्रद॒द्वाव॑शती॒रुदा॑जत्॥

जैसे सूर्य्य वृष्टि के द्वारा सब प्रजाओं की रक्षा करता और बिजुली के शब्द से सब को जनाता है, वैसे ही सब विद्वान् जन विद्या के द्वारा सब के द्वारा सब के आत्माओं को प्रकाशित करें॥५॥

ए॒वा पि॒त्रे वि॒श्वदे॑वाय॒ वृष्णे॑ य॒ज्ञैर्वि॑धेम॒ नम॑सा ह॒विर्भिः॑। बृह॑स्पते सुप्र॒जा वी॒रव॑न्तो व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सूर्य्य मेघ के अलङ्कार से सब का पालन करनेवाला है, वैसे ही हम लोग वर्त्ताव करके अति उत्तम पुरुष और राज्य के स्वामी होवें॥६॥

स इद्राजा॒ प्रति॑जन्यानि॒ विश्वा॒ शुष्मे॑ण तस्थाव॒भि वी॒र्ये॑ण। बृह॒स्पतिं॒ यः सुभृ॑तं बि॒भर्ति॑ वल्गू॒यति॒ वन्द॑ते पूर्व॒भाज॑म्॥

हे मनुष्यो! जो परमेश्वर सम्पूर्ण जगत् को अभिव्याप्त होकर और धारके सूर्य्य को भी धारता है और सम्पूर्ण वेदों का उपदेश देकर प्रशंसित वर्त्तमान है और जिसकी सेवा योगिराज करते हैं, उसी की नित्य उपासना करो॥७॥

स इत्क्षे॑ति॒ सुधि॑त॒ ओक॑सि॒ स्वे तस्मा॒ इळा॑ पिन्वते विश्व॒दानी॑म्। तस्मै॒ विशः॑ स्व॒यमे॒वा न॑मन्ते॒ यस्मि॑न्ब्र॒ह्मा राज॑नि॒ पूर्व॒ एति॑॥

हे मनुष्यो! जो अन्य सब का त्याग करके एक परमेश्वर ही की आप लोग सेवा करें तो आप लोगों में लक्ष्मी, राज्य, प्रतिष्ठा और यश सदा ही निवास करें॥८॥

अप्र॑तीतो जयति॒ सं धना॑नि॒ प्रति॑जन्यान्यु॒त या सज॑न्या। अ॒व॒स्यवे॒ यो वरि॑वः कृ॒णोति॑ ब्र॒ह्मणे॒ राजा॒ तम॑वन्ति दे॒वाः॥

हे मनुष्यो! जो राजा परमात्मा ही की उपासना करता और यथार्थवक्ता विद्वानों की सेवा करता है, वही नहीं नाश होनेवाले राज्य और धन को प्राप्त होकर सदा ही विजयी होता है॥९॥

इन्द्र॑श्च॒ सोमं॑ पिबतं बृहस्पते॒ऽस्मिन्य॒ज्ञे म॑न्दसा॒ना वृ॑षण्वसू। आ वां॑ विश॒न्त्विन्द॑वः स्वा॒भुवो॒ऽस्मे र॒यिं सर्व॑वीरं॒ नि य॑च्छतम्॥

हे राजा और राजोपदेशको! तुम कभी मदकारक वस्तु का सेवन न करो और राज्यपालन तथा सत्योपदेश से ही प्रजाओं का पालन कर सदैव आनन्दित होओ और हम लोगों के लिये सब ऐश्वर्य्य अच्छे प्रकार देओ १०॥॥

बृह॑स्पत इन्द्र॒ वर्ध॑तं नः॒ सचा॒ सा वां॑ सुम॒तिर्भू॑त्व॒स्मे। अ॒वि॒ष्टं धियो॑ जिगृ॒तं पुरन्धीर्जज॒स्तम॒र्यो व॒नुषा॒मरा॑तीः॥

मनुष्यों को चाहिये कि सर्वदा विद्वानों से विद्याप्राप्ति विषयक याचना करें, जिससे उत्तम बुद्धियाँ होवें और शत्रुजन दूर से भागें॥११॥इस सूक्त में विद्वान् राजा और प्रजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥११॥इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमान् विरजानन्द सरस्वती स्वामीजी के शिष्य दयानदसरस्वती स्वामिविरचित संस्कृतार्य्यभाषासुशोभित सुप्रमाणयुक्त ऋग्वेदभाष्य में तृतीय अष्टक के सप्तम अध्याय में सत्ताईसवाँ वर्ग तथा सातवाँ अध्याय और चतुर्थ मण्डल में पाँचवाँ अनुवाक और पचासवाँ सूक्त समाप्त हुआ॥

इ॒दमु॒ त्यत्पु॑रु॒तमं॑ पु॒रस्ता॒ज्ज्योति॒स्तम॑सो व॒युना॑वदस्थात्। नू॒नं दि॒वो दु॑हि॒तरो॑ विभा॒तीर्गा॒तुं कृ॑णवन्नु॒षसो॒ जना॑य॥

हे मनुष्यो! आप लोग पुरुषार्थ से सूर्य्य के प्रकाश के सदृश विज्ञान को प्राप्त होकर, अन्धकार की निवृत्ति के सदृश अविद्या का निवारण करके आनन्दित होओ॥१॥

अस्थु॑रु चि॒त्रा उ॒षसः॑ पु॒रस्ता॑न्मि॒ताइ॑व॒ स्वर॑वोऽध्व॒रेषु॑। व्यू॑ व्र॒जस्य॒ तम॑सो॒ द्वारो॒च्छन्ती॑रव्र॒ञ्छुच॑यः पाव॒काः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे ब्रह्मचारी जनो! जो ब्रह्मचारिणी मेघ के सदृश गम्भीर शब्दयुक्त, थोड़ा बोलनेवाली, पवित्र और विद्यायुक्त होवें, वही प्रथम उत्तम प्रकार परीक्षा करके विवाहने योग्य हैं॥२॥

उ॒च्छन्ती॑र॒द्य चि॑तयन्त भो॒जान्रा॑धो॒देया॑यो॒षसो॑ म॒घोनीः॑। अ॒चि॒त्रे अ॒न्तः प॒णयः॑ सस॒न्त्वबु॑ध्यमाना॒स्तम॑सो॒ विम॑ध्ये॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे पुरुषो! जो कन्या अपने सदृश विदुषी और शुभ गुण, कर्म, स्वभाववाली होवें, वे ही स्त्री होने के लिये स्वीकार करने योग्य हैं॥३॥

कु॒वित्स दे॑वीः स॒नयो॒ नवो॑ वा॒ यामो॑ बभू॒यादु॑षसो वो अ॒द्य। येना॒ नव॑ग्वे॒ अङ्गि॑रे॒ दश॑ग्वे स॒प्तास्ये॑ रेवती रे॒वदू॒ष॥

जो अधिक विद्या, बल, तुल्य रूप, नवीन युवावस्थायुक्त और सुशील, विद्वान् अपने सदृश स्त्री को स्वीकार करे; वह सुखी होवे और जो स्त्री पति की कामना करती हुई धन और विद्या की उन्नति करे; वह सब मनुष्यों को सुखी करने के योग्य होवे॥४॥

यू॒यं हि दे॑वीर्ऋत॒युग्भि॒रश्वैः॑ परिप्रया॒थ भुव॑नानि स॒द्यः। प्र॒बो॒धय॑न्तीरुषसः स॒सन्तं॑ द्वि॒पाच्चतु॑ष्पाच्च॒रथा॑य जी॒वम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो जन उत्तम गुणों से युक्त, विदुषी, सुन्दर, अपने सदृश स्त्रियों को प्राप्त होते हैं; वे सदा ही प्रातःकाल के सदृश प्रकाशमान और सब के बोधक होते हैं॥५॥

क्व॑ स्विदासां कत॒मा पु॑रा॒णी यया॑ वि॒धाना॑ विद॒धुर्ऋ॑भू॒णाम्। शुभं॒ यच्छु॒भ्रा उ॒षस॒श्चर॑न्ति॒ न वि ज्ञा॑यन्ते स॒दृशी॑रजु॒र्याः॥

जैसे सम्पूर्ण प्रातर्वेला तुल्य होती हैं, वैसे ही पतियों के साथ सदृश स्त्रियाँ प्रशंसा करने योग्य होती हैं, वह सदा ही युवावस्था में युवा पुरुषों को प्राप्त होकर आनन्दित हों, नहीं जाना जाता है कि कौन नवीन कौन प्राचीन प्रातर्वेला होती है, वैसे ब्रह्मचर्य्य से युक्त कन्या होती हैं॥६॥

ता घा॒ ता भ॒द्रा उ॒षसः॑ पु॒रासु॑रभि॒ष्टिद्यु॑म्ना ऋ॒तजा॑तसत्याः। यास्वी॑जा॒नः श॑शमा॒न उ॒क्थैः स्तु॒वञ्छंस॒न्द्रवि॑णं स॒द्य आप॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य के साथ प्रातर्वेला सदा वर्त्तमान है, वैसे ही स्वयंवर जिन्होंने किया, ऐसे स्त्री-पुरुष यशस्वी और सत्य आचरणवाले होवें॥७॥

ता आ च॑रन्ति सम॒ना पु॒रस्ता॑त्समा॒नतः॑ सम॒ना प॑प्रथा॒नाः। ऋ॒तस्य॑ दे॒वीः सद॑सो बुधा॒ना गवां॒ न सर्गा॑ उ॒षसो॑ जरन्ते॥

हे मनुष्यो! जो शिक्षा को ग्रहण किये हुए, रूप और कान्ति आदि उत्तम गुणों से युक्त, विदुषी, ब्रह्मचारिणी कन्या होवें; उन्हीं को यथायोग्य विवाहो॥८॥

ता इन्न्वे॒३॒॑व स॑म॒ना स॑मा॒नीरमी॑तवर्णा उ॒षस॑श्चरन्ति। गूह॑न्ती॒रभ्व॒मसि॑तं॒ रुश॑द्भिः शु॒क्रास्त॒नूभिः॒ शुच॑यो रुचा॒नाः॥

जो स्त्रियाँ प्रातर्वेला के सदृश दुःख को नाश करनेवाली और सुख को उत्पन्न करनेवाली हों, वे ही आनन्द देनेवाली होवें॥९॥

र॒यिं दि॑वो दुहितरो विभा॒तीः प्र॒जाव॑न्तं यच्छता॒स्मासु॑ देवीः। स्यो॒नादा वः॑ प्रति॒बुध्य॑मानाः सु॒वीर्य॑स्य॒ पत॑यः स्याम॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो कन्या प्रभात वेला के सदृश उत्तम प्रकार शोभित सुख को उत्पन्न करती हैं, उनके साथ स्वयंवर विवाह से ही मनुष्य श्रीमान् होते हैं॥१०॥

तद्वो॑ दिवो दुहितरो विभा॒तीरुप॑ ब्रुव उषसो य॒ज्ञके॑तुः। व॒यं स्या॑म य॒शसो॒ जने॑षु॒ तद्द्यौश्च॑ ध॒त्तां पृ॑थि॒वी च॑ दे॒वी॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो परस्पर जनों को उपदेश देकर सत्य का ग्रहण कराते हैं, वे सूर्य्य के सदृश प्रकाश करने और भूमि के सदृश प्रजा के धारण करनेवाले होते हैं॥११॥इस सूक्त में प्रातःकाल स्त्री और पुरुष के गुण कर्म वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥११॥यह इक्क्यावनवाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

प्रति॒ ष्या सू॒नरी॒ जनी॑ व्यु॒च्छन्ती॒ परि॒ स्वसुः॑। दि॒वो अ॑दर्शि दुहि॒ता॥

वही स्त्री श्रेष्ठ, जो प्रातर्वेला के सदृश वर्त्तमान है॥१॥

अश्वे॑व चि॒त्रारु॑षी मा॒ता गवा॑मृ॒ताव॑री। सखा॑भूद॒श्विनो॑रु॒षाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो माता और मित्र के सदृश वर्त्तमान प्रातर्वेला है, वह युक्ति से सब पुरुषों से सेवन करने योग्य है॥२॥

उ॒त सखा॑स्य॒श्विनो॑रु॒त मा॒ता गवा॑मसि। उ॒तोषो॒ वस्व॑ ईशिषे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वही स्त्री सुख देनेवाली जो मित्र के सदृश आज्ञा मानने और सेवा करनेवाली है, वही प्रातर्वेला के सदृश कुल की प्रकाशिका होती है॥३॥

या॒व॒यद्द्वे॑षसं त्वा चिकि॒त्वित्सू॑नृतावरि। प्रति॒ स्तोमै॑रुभूत्स्महि॥

जो कभी द्वेष और द्वेष करनेवाले के सङ्ग को नहीं करती और सत्यवाणी और प्रशंसायुक्त है, वही स्त्री श्रेष्ठ है॥४॥

प्रति॑ भ॒द्रा अ॑दृक्षत॒ गवां॒ सर्गा॒ न र॒श्मयः॑। ओषा अ॑प्रा उ॒रु ज्रयः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो स्त्रियाँ किरणों के समान उत्तम व्यवहारों का प्रकाश कराती हैं, वे निरन्तर कल्याण के लिये कुल की उन्नति करनेवाली होती हैं॥५॥

आ॒प॒प्रुषी॑ विभावरि॒ व्या॑व॒र्ज्योति॑षा॒ तमः॑। उषो॒ अनु॑ स्व॒धाम॑व॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रभात वेला अपने प्रकाश से अन्धकार का निवारण करती है, वैसे ही विद्यायुक्त स्त्रियाँ अपने उत्तम स्वभाव से दोषों का निवारण करके उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त अन्न आदि से सब की उत्तम प्रकार रक्षा करें॥६॥

आ द्यां त॑नोषि र॒श्मिभि॒रान्तरि॑क्षमु॒रु प्रि॒यम्। उषः॑ शु॒क्रेण॑ शो॒चिषा॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वही स्त्री बहुत सुख को प्राप्त होती है, जो विद्या, विनय और उत्तम स्वभावादिकों से अपने पति को नित्य प्रसन्न करती है॥७॥इस सूक्त में प्रभातवेला के सदृश स्त्रियों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥७॥यह बावन ५२ वाँ सूक्त और तृतीय वर्ग समाप्त हुआ॥

तद्दे॒वस्य॑ सवि॒तुर्वार्यं॑ म॒हद्वृ॑णी॒महे॒ असु॑रस्य॒ प्रचे॑तसः। छ॒र्दिर्येन॑ दा॒शुषे॒ यच्छ॑ति॒ त्मना॒ तन्नो॑ म॒हाँ उद॑यान्दे॒वो अ॒क्तुभिः॑॥

जो विद्वान् जन मेघ और सूर्य्य के सम्बन्ध की विद्या को जानते हैं, वे दिन और रात्रियों में बड़े कार्य्य को सिद्ध करके आनन्दित होते हैं॥१॥

दि॒वो ध॒र्ता भुव॑नस्य प्र॒जाप॑तिः पि॒शङ्गं॑ द्रा॒पिं प्रति॑ मुञ्चते क॒विः। वि॒च॒क्ष॒णः प्र॒थय॑न्नापृ॒णन्नु॒र्वजी॑जनत्सवि॒ता सु॒म्नमु॒क्थ्य॑म्॥

हे मनुष्यो! जिस परमेश्वर ने प्रजा के धारण प्रकाश और पालन के लिये सूर्य्य बनाया, उसी परमेश्वर की उपासना करके बहुत सुख को प्राप्त होइये॥२॥

आप्रा॒ रजां॑सि दि॒व्यानि॒ पार्थि॑वा॒ श्लोकं॑ दे॒वः कृ॑णुते॒ स्वाय॒ धर्म॑णे। प्र बा॒हू अ॑स्राक्सवि॒ता सवी॑मनि निवे॒शय॑न्प्रसु॒वन्न॒क्तुभि॒र्जग॑त्॥

हे मनुष्यो! जो जगदीश्वर सम्पूर्ण जगत् में अभिव्याप्त हो और उस जगत् को रच के धर्म्म और वेदवाणी का प्रचार करके संसार को व्यवस्थित अर्थात् जैसा चाहिये वैसा नियत करता, उसीको सब का स्वामी जानके निरन्तर उपासना करो॥३॥

अदा॑भ्यो॒ भुव॑नानि प्र॒चाक॑शद्व्र॒तानि॑ दे॒वः स॑वि॒ताभि र॑क्षते। प्रास्रा॑ग्बा॒हू भुव॑नस्य प्र॒जाभ्यो॑ धृ॒तव्र॑तो म॒हो अज्म॑स्य राजति॥

हे मनुष्यो! जिस परमेश्वर ने प्रजाओं में सम्पूर्ण हित सिद्ध किया और जो भीतर-बाहर अभिव्याप्त होके सब के लिये कर्म्मों का फल देता है, वही निरन्तर ध्यान करने योग्य है॥४॥

त्रिर॒न्तरि॑क्षं सवि॒ता म॑हित्व॒ना त्री रजां॑सि परि॒भूस्त्रीणि॑ रोच॒ना। ति॒स्रो दिवः॑ पृथि॒वीस्ति॒स्र इ॑न्वति त्रि॒भिर्व्र॒तैर॒भि नो॑ रक्षति॒ त्मना॑॥

हे मनुष्यो! जो परमेश्वर तीन प्रकार के सम्पूर्ण त्रिगुण अर्थात् सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण स्वरूप जगत् को रच के उत्तम नियमों से पालन करता है, उसी की उपासना करो॥५॥

बृ॒हत्सु॑म्नः प्रसवी॒ता नि॒वेश॑नो॒ जग॑तः स्था॒तुरु॒भय॑स्य॒ यो व॒शी। स नो॑ दे॒वः स॑वि॒ता शर्म॑ यच्छत्व॒स्मे क्षया॑य त्रि॒वरू॑थ॒मंह॑सः॥

हे मनुष्यो! जो जगदीश्वर सब जगत् का नियामक और सब जीवों के निवास के लिये अनेक प्रकार के स्थान का रचनेवाला है, उसको छोड़ के अन्य किसी की भी उपासना न करो॥६॥

आग॑न्दे॒व ऋ॒तुभि॒र्वर्ध॑तु॒ क्षयं॒ दधा॑तु नः सवि॒ता सु॑प्र॒जामिष॑म्। स नः॑ क्ष॒पाभि॒रह॑भिश्च जिन्वतु प्र॒जाव॑न्तं र॒यिम॒स्मे समि॑न्वतु॥

हे मनुष्यो! जो परमात्मा सब दिन, सब रात्रियों में सब जगत् की सब प्रकार से रक्षा करता है, सब पदार्थों को रच के हम लोगों के लिये देकर हम लोगों को निरन्तर आनन्दित करता है, वह हम लोगों को सदा उपासना करने योग्य है॥७॥इस सूक्त में सविता अर्थात् सकल जगत् के उत्पन्न करनेवाले परमात्मा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥७॥यह तिरपनवाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ॥

अभू॑द्दे॒वः स॑वि॒ता वन्द्यो॒ नु न॑ इ॒दानी॒मह्न॑ उप॒वाच्यो॒ नृभिः॑। वि यो रत्ना॒ भज॑ति मान॒वेभ्यः॒ श्रेष्ठं॑ नो॒ अत्र॒ द्रवि॑णं॒ यथा॒ दध॑त्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। नष्ट उनका भाग्य जो सम्पूर्ण ऐश्वर्य और यश के देनेवाले वन्दना करने योग्य तथा स्तुति, उपासना और उपदेश करने योग्य परमात्मा को छोड़ के अन्य की उपासना करते हैं॥१॥

दे॒वेभ्यो॒ हि प्र॑थ॒मं य॒ज्ञिये॑भ्योऽमृत॒त्वं सु॒वसि॑ भा॒गमु॑त्त॒मम्। आदिद्दा॒मानं॑ सवित॒र्व्यू॑र्णुषेऽनूची॒ना जी॑वि॒ता मानु॑षेभ्यः॥

हे मनुष्यो! जो परमात्मा सत्य आचरण में प्रेरणा करता और मुक्तिसुख को देकर सब को आनन्दित करता है, उसी की सदा उपासना करो॥२॥

अचि॑त्ती॒ यच्च॑कृ॒मा दैव्ये॒ जने॑ दी॒नैर्दक्षैः॒ प्रभू॑ती पूरुष॒त्वता॑। दे॒वेषु॑ च सवित॒र्मानु॑षेषु च॒ त्वं नो॒ अत्र॑ सुवता॒दना॑गसः॥

हे विद्वानो! आप लोग जो हम लोग अविद्या से आप लोगों का अपराध करें, वह क्षमा करने योग्य है और हम लोगों को अध्यापन और उपदेश से निरपराधी करो॥३॥

न प्र॒मिये॑ सवि॒तुर्दैव्य॑स्य॒ तद्यथा॒ विश्वं॒ भुव॑नं धारयि॒ष्यति॑। यत्पृ॑थि॒व्या वरि॑म॒न्ना स्व॑ङ्गु॒रिर्वर्ष्म॑न्दि॒वः सु॒वति॑ स॒त्यम॑स्य॒ तत्॥

हे विद्वानो! जो ब्रह्म सब जगत् को धारण करता और सूर्य और वायु से धारण कराता है, वेद के द्वारा सब सत्य का प्रकाश कराता है, उसी की हम लोग उपासना करें॥४॥

इन्द्र॑ज्येष्ठान्बृ॒हद्भ्यः॒ पर्व॑तेभ्यः॒ क्षयाँ॑ एभ्यः सुवसि प॒स्त्या॑वतः। यथा॑यथा प॒तय॑न्तो वियेमि॒र ए॒वैव त॑स्थुः सवितः स॒वाय॑ ते॥

हे भगवन्! आपने सब जीवों के निवासादि व्यवहार के लिये भूमि आदि लोक रचे, इसी से आपके लिये धन्यवादों को समर्पण करके हम लोग आपके ऐश्वर्य्य में निवास करें॥५॥

ये ते॒ त्रिरह॑न्त्सवितः स॒वासो॑ दि॒वेदि॑वे॒ सौभ॑गमासु॒वन्ति॑। इन्द्रो॒ द्यावा॑पृथि॒वी सिन्धु॑र॒द्भिरा॑दि॒त्यैर्नो॒ अदि॑तिः॒ शर्म॑ यंसत्॥

हे मनुष्यो! जिस जगदीश्वर की सृष्टि में हम लोग ऐश्वर्य्यवाले होते हैं और हम लोगों के रक्षा करनेवाले सम्पूर्ण पदार्थ हैं, उसी का हम लोग निरन्तर भजन करें॥६॥इस सूक्त में सविता, ईश्वर, विद्वान् और पदार्थों के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥६॥यह चौवनवाँ सूक्त और पाँचवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

को व॑स्त्रा॒ता व॑सवः॒ को व॑रू॒ता द्यावा॑भूमी अदिते॒ त्रासी॑थां नः। सही॑यसो वरुण मित्र॒ मर्ता॒त्को वो॑ऽध्व॒रे वरि॑वो धाति देवाः॥

जो परमेश्वर की आज्ञा का पालन करता है, वह परमेश्वर से स्वीकार किया जाता है। हे मनुष्यो! जो हमारा और आप लोगों का रक्षक है, वही हम लोगों से सेवा करने योग्य है और जो अहिंसा से सब मनुष्यों को विज्ञान में धारण करते हैं, वह और वे सदा सत्कार करने योग्य हैं॥१॥

प्र ये धामा॑नि पू॒र्व्याण्यर्चा॒न्वि यदु॒च्छान्वि॑यो॒तारो॒ अमू॑राः। वि॒धा॒तारो॒ वि ते द॑धु॒रज॑स्रा ऋ॒तधी॑तयो रुरुचन्त द॒स्माः॥

जो यथार्थवक्ता सब के सुख की इच्छा करनेवाले विद्वान् जन हों, वे ही सब के सब सुखों के करने योग्य होवें॥२॥

प्र प॒स्त्या॒३॒॑मदि॑तिं॒ सिन्धु॑म॒र्कैः स्व॒स्तिमी॑ळे स॒ख्याय॑ दे॒वीम्। उ॒भे यथा॑ नो॒ अह॑नी नि॒पात॑ उ॒षासा॒नक्ता॑ करता॒मद॑ब्धे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे रात्रि और दिन मिले हुए वर्ताव करके सम्पूर्ण व्यवहार में कारण होते हैं, वैसे हम दोनों विशेष करके हित चाहते हुए मित्र के सदृश वर्तमान स्त्री और पुरुष उत्तम गृह और बहुत सुख की सदा उन्नति करें॥३॥

व्य॑र्य॒मा वरु॑णश्चेति॒ पन्था॑मि॒षस्पतिः॑ सुवि॒तं गा॒तुम॒ग्निः। इन्द्रा॑विष्णू नृ॒वदु॒ षु स्तवा॑ना॒ शर्म॑ नो यन्त॒मम॑व॒द्वरू॑थम्॥

हे मनुष्यो! जैसे न्यायकारी विद्वान् लोग अधर्म्मसम्बन्धी मार्ग का त्याग करके धर्मसम्बन्धी मार्ग में चलते हैं, वैसे आप लोग भी चलें॥४॥

आ पर्व॑तस्य म॒रुता॒मवां॑सि दे॒वस्य॑ त्रा॒तुर॑व्रि॒ भग॑स्य। पात्पति॒र्जन्या॒दंह॑सो नो मि॒त्रो मि॒त्रिया॑दु॒त न॑ उरुष्येत्॥

जो मनुष्य सत्य के जानने और उसके आचरण करने की इच्छा करें, वे सत्य ज्ञान को प्राप्त होकर सत्य के आचरण करनेवाले होवें॥५॥

नू रो॑दसी॒ अहि॑ना बु॒ध्न्ये॑न स्तुवी॒त दे॑वी॒ अप्ये॑भिरि॒ष्टैः। स॒मु॒द्रं न सं॒चर॑णे सनि॒ष्यवो॑ घ॒र्मस्व॑रसो न॒द्यो॒३॒॑ अप॑ व्रन्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे मेघों के जलों से पूर्ण नदियाँ आवरणों को काट कर अन्तरिक्ष में जलों को प्राप्त होती हैं, वैसे ही आप लोग विद्या की दीप्ति को प्राप्त होकर सब विद्याओं की प्रशंसा करो॥६॥

दे॒वैर्नो॑ दे॒व्यदि॑ति॒र्नि पा॑तु दे॒वस्त्रा॒ता त्रा॑यता॒मप्र॑युच्छन्। न॒हि मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य धा॒सिमर्हा॑मसि प्र॒मियं॒ सान्व॒ग्नेः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। प्रत्येक मनुष्य को चाहिये कि किसी सज्जन वा किसी पदार्थ का नाश और नशा करनेवाले द्रव्य का सेवन सदा ही न करे और सदा विद्वानों और माता-पिता की शिक्षा को ग्रहण करे॥७॥

अ॒ग्निरी॑शे वस॒व्य॑स्या॒ग्निर्म॒हः सौभ॑गस्य। तान्य॒स्मभ्यं॑ रासते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो! जैसे विद्या से उपजित अर्थात् वश में किया गया अग्नि, कार्य्यों को सिद्ध करके बड़े ऐश्वर्य्य को प्राप्त कराता है, वैसे ही सेवा किये गये आप लोग विद्या और उपदेश आदि कार्य्यों को सिद्ध करके सब को ऐश्वर्य्ययुक्त करो॥८॥

उषो॑ मघो॒न्या व॑ह॒ सूनृ॑ते॒ वार्या॑ पु॒रु। अ॒स्मभ्यं॑ वाजिनीवति॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रभातवेला सब जीवों की प्रिय करनेवाली है, वैसे ही विद्यायुक्त स्त्री सब को प्रिय होती है॥९॥

तत्सु नः॑ सवि॒ता भगो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा। इन्द्रो॑ नो॒ राध॒सा ग॑मत्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे अध्यापक और उपदेशक जनो! जैसे नियम से सूर्य, वायु, प्राण आदि और बिजुली प्राप्त हैं, वैसे ही आप हम लोगों को निरन्तर प्राप्त हूजिये॥१०॥इस सूक्त में विद्वानों के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥१०॥यह पचपनवाँ सूक्त और सप्तम वर्ग समाप्त हुआ॥

म॒ही द्यावा॑पृथि॒वी इ॒ह ज्येष्ठे॑ रु॒चा भ॑वतां शु॒चय॑द्भिर॒र्कैः। वत्सीं॒ वरि॑ष्ठे बृह॒ती वि॑मि॒न्वन्रु॒वद्धो॒क्षा प॑प्रथा॒नेभि॒रेवैः॑॥

जो मनुष्य पृथिवी से लेके सूर्य्यपर्य्यन्त पदार्थों को जानते हैं, वे धनवान् होकर सब को सुखी करें॥१॥

दे॒वी दे॒वेभि॑र्यज॒ते यज॑त्रै॒रमि॑नती तस्थतुरु॒क्षमा॑णे। ऋ॒ताव॑री अ॒द्रुहा॑ दे॒वपु॑त्रे य॒ज्ञस्य॑ ने॒त्री शु॒चय॑द्भिर॒र्कैः॥

जो मनुष्य पृथिवी से लेके प्रकृति अर्थात् प्रधानपर्य्यन्त पदार्थों को उनके गुण, कर्म्म, स्वभाव से यथावत् जान के कार्य्य की सिद्धि के लिये सम्प्रयोग करते हैं, वे सदा ही भाग्यशाली होते हैं॥२॥

स इत्स्वपा॒ भुव॑नेष्वास॒ य इ॒मे द्यावा॑पृथि॒वी ज॒जान॑। उ॒र्वी ग॑भी॒रे रज॑सी सु॒मेके॑ अवं॒शे धीरः॒ शच्या॒ समै॑रत्॥

हे मनुष्यो! जिस जगदीश्वर ने असङ्ख्य भूमि आदि लोक आकाश में रचे और व्यवस्था से चलाये हैं, वह सदा ही उपासना करने योग्य है॥३॥

नू रो॑दसी बृ॒हद्भि॑र्नो॒ वरू॑थैः॒ पत्नी॑वद्भिरि॒षय॑न्ती स॒जोषाः॑। उ॒रू॒ची विश्वे॑ यज॒ते नि पा॑तं धि॒या स्या॑म र॒थ्यः॑ सदा॒साः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य बहुत और बड़े पदार्थों से युक्त बिजुली और भूमि को विशेष करके जानते हैं, वे शीघ्र लक्ष्मीवान् होते हैं॥४॥

प्र वां॒ महि॒ द्यवी॑ अ॒भ्युप॑स्तुतिं भरामहे। शुची॒ उप॒ प्रश॑स्तये॥

जिनके समीप से शिल्प आदि विद्या ग्रहण की जाती हैं, उनका आदर मनुष्य सदा करें॥५॥

पु॒ना॒ने त॒न्वा॑ मि॒थः स्वेन॒ दक्षे॑ण राजथः। ऊ॒ह्याथे॑ स॒नादृ॒तम्॥

जो शिल्पविद्या में निपुण होते हैं, उनका सत्कार यथायोग्य राजा आदि को करना चाहिये॥६॥

म॒ही मि॒त्रस्य॑ साधथ॒स्तर॑न्ती॒ पिप्र॑ती ऋ॒तम्। परि॑ य॒ज्ञं नि षे॑दथुः॥

मनुष्यों को चाहिये सब के आधारभूत सब कार्य्य सिद्ध करनेवाली सूर्य और पृथिवी को जान के अभीष्ट कार्य्यों को सिद्ध करें॥७॥इस सूक्त में सूर्य और पृथिवी के और शिल्पविद्या शिक्षा वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥७॥यह छप्पनवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

क्षेत्र॑स्य॒ पति॑ना व॒यं हि॒तेने॑व जयामसि। गामश्वं॑ पोषयि॒त्न्वा स नो॑ मृळाती॒दृशे॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे उत्तम प्रकार शिक्षित और अनुरक्त सेना से वीरजन विजय को प्राप्त होते हैं, वैसे ही कृषि अर्थात् खेतीकर्म्म में चतुर जन ऐश्वर्य्य को प्राप्त होते हैं॥१॥

क्षेत्र॑स्य पते॒ मधू॑मन्तमू॒र्मिं धे॒नुरि॑व॒ पयो॑ अ॒स्मासु॑ धुक्ष्व। म॒धु॒श्चुतं॑ घृ॒तमि॑व॒ सुपू॑तमृ॒तस्य॑ नः॒ पत॑यो मृळयन्तु॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे बुद्धिमान् खेती करनेवाले जन सुन्दर शुद्ध अन्नों को उत्पन्न करके सब को आनन्द देते हैं, वैसे ही खेती करनेवाले जनों की उत्तम प्रकार रक्षा करके सदा उत्साह युक्त करे॥२॥

मधु॑मती॒रोष॑धी॒र्द्याव॒ आपो॒ मधु॑मन्नो भवत्व॒न्तरि॑क्षम्। क्षेत्र॑स्य॒ पति॒र्मधु॑मान्नो अ॒स्त्वरि॑ष्यन्तो॒ अन्वे॑नं चरेम॥

सब मनुष्यों को चाहिये कि वे जैसे अपने लिये उत्तम पदार्थ चाहते हैं, वैसे ही अन्य जनों के लिये भी इच्छा करें॥३॥

शु॒नं वा॒हाः शु॒नं नरः॑ शु॒नं कृ॑षतु॒ लाङ्ग॑लम्। शु॒नं व॑र॒त्रा ब॑ध्यन्तां शु॒नमष्ट्रा॒मुदि॑ङ्गय॥

खेती करनेवाले जन उत्तम हल आदि सामग्री, वृषभ और बीजों को इकट्ठे करके खेतों को उत्तम प्रकार जोत कर उनमें उत्तम अन्नों को उत्पन्न करें॥४॥

शुना॑सीरावि॒मां वाचं॑ जुषेथां॒ यद्दि॒वि च॒क्रथुः॒ पयः॑। तेने॒मामुप॑ सिञ्चतम्॥

खेती करनेवाले जन प्रथम खेती के करने की विद्या को ग्रहण करके पश्चात् यथायोग्य खेती कर धन और धान्य से युक्त सदा हों॥५॥

अ॒र्वाची॑ सुभगे भव॒ सीते॒ वन्दा॑महे त्वा। यथा॑ नः सु॒भगास॑सि॒ यथा॑ नः सु॒फलास॑सि॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो! जैसे उत्तम प्रकार सम्पादित खेत की धरती उत्तम अन्नों को उत्पन्न करती है, वैसे ही ब्रह्मचर्य्य से विद्या को प्राप्त हुआ जन उत्तम सन्तानों को उत्पन्न करता है और जैसे भूमि का राज्य ऐश्वर्य्यकारक है, वैसे परस्पर प्रसन्न स्त्री और पुरुष बड़े ऐश्वर्य्यवाले होते हैं॥६॥

इन्द्रः॒ सीतां॒ नि गृ॑ह्णातु॒ तां पू॒षानु॑ यच्छतु। स नः॒ पय॑स्वती दुहा॒मुत्त॑रामुत्तरां॒ समा॑म्॥

सब कृषिकर्म करनेवाले जन विद्वान् क्षेत्र जोतनेवालों का अनुकरण करके कृषि की वृद्धि को उत्पन्न करें॥७॥

शु॒नं नः॒ फाला॒ वि कृ॑षन्तु॒ भूमिं॑ शु॒नं की॒नाशा॑ अ॒भि य॑न्तु वा॒हैः। शु॒नं प॒र्जन्यो॒ मधु॑ना॒ पयो॑भिः॒ शुना॑सीरा शु॒नम॒स्मासु॑ धत्तम्॥

कृषिकर्म्म करनेवाले मनुष्यों को चाहिये कि उत्तम फाल आदि वस्तुओं को बनाय के हल आदि से भूमि को उत्तम करके अर्थात् गोड़ के उत्तम सुख को प्राप्त हों, वैसे ही अन्य राजा आदि के लिये सुख देवें॥८॥इस सूक्त में कृषिकर्म के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥८॥यह सत्तावनवाँ सूक्त और नवम वर्ग समाप्त हुआ॥

स॒मु॒द्रादू॒र्मिर्मधु॑माँ॒ उदा॑र॒दुपां॒शुना॒ सम॑मृत॒त्वमा॑नट्। घृ॒तस्य॒ नाम॒ गुह्यं॒ यदस्ति॑ जि॒ह्वा दे॒वाना॑म॒मृत॑स्य॒ नाभिः॑॥

हे मनुष्यो! भूमि के समीप से सूर्य्य के प्रताप से वायु के द्वारा जितना जल आकाश में जाता है, वहाँ ईश्वर की सृष्टि के क्रम से मधुर आदि गुणों से युक्त होके और वह वर्ष के अमृतस्वरूप होता है, यह जानो॥१॥

व॒यं नाम॒ प्र ब्र॑वामा घृ॒तस्या॒स्मिन्य॒ज्ञे धा॑रयामा॒ नमो॑भिः। उप॑ ब्र॒ह्मा शृ॑णवच्छ॒स्यमा॑नं॒ चतुः॑शृङ्गोऽवमीद्गौ॒र ए॒तत्॥

हे मनुष्यो! चारवेद का जाननेवाला यथार्थवक्ता जन जैसा उपदेश करे और जिस सिद्धान्त का निश्चय करे, वैसे सिद्धान्त का हम लोग भी उपदेश और निश्चय करें॥२॥

च॒त्वारि॒ शृङ्गा॒ त्रयो॑ अस्य॒ पादा॒ द्वे शी॒र्षे स॒प्त हस्ता॑सो अस्य। त्रिधा॑ ब॒द्धो वृ॑ष॒भो रो॑रवीति म॒हो दे॒वो मर्त्याँ॒ आ वि॑वेश॥

हे मनुष्यो! इस परमेश्वर से व्याप्त संसार में यज्ञ के चार वेद और नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात; विश्व, तैजस, प्राज्ञ, तुरीय और धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष आदि शृङ्ग हैं। तीन सवन अर्थात् त्रैकालिक यज्ञकर्म; तीन काल; कर्म, उपासना, ज्ञान; मन, वाणी, शरीर इत्यादि पाद हैं। दो व्यवहार और परमार्थ; नित्य, कार्य्य; शब्दस्वरूप उदगयन और प्रायणीय; अध्यापक और उपदेशक इत्यादि शिर हैं। गायत्री आदि सात छन्द सात विभक्तियाँ, सात प्राण, पाँच कर्म्मेन्द्रिय शरीर और आत्मा इत्यादि [सात] हस्त हैं। तीन मन्त्र, ब्राह्मण, कल्प; और हृदय, कण्ठ, शिर में; श्रवण, मनन, निदिध्यासनों में; ब्रह्मचर्य्य, श्रेष्ठ कर्म, उत्तम विचारों के बीच सिद्ध यह व्यवहार महान् सत्कर्त्तव्य और मनुष्यों के बीच प्रविष्ट है, यह सब जानें॥३॥

त्रिधा॑ हि॒तं प॒णिभि॑र्गु॒ह्यमा॑नं॒ गवि॑ दे॒वासो॑ घृ॒तमन्व॑विन्दन्। इन्द्र॒ एकं॒ सूर्य॒ एकं॑ जजान वे॒नादेकं॑ स्व॒धया॒ निष्ट॑तक्षुः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे श्रेष्ठ व्यवहारों के साथ वर्त्तमान विद्वान् जन, उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी और बुद्धि को तथा बिजुली आदि की विद्या को प्राप्त हो परमेश्वर को जान और उसकी आज्ञा पालन करके सुख का विस्तार करते हैं, वैसे ही सब लोग अच्छा आचरण करें॥४॥

ए॒ता अ॑र्षन्ति॒ हृद्या॑त्समु॒द्राच्छ॒तव्र॑जा रि॒पुणा॒ नाव॒चक्षे॑। घृ॒तस्य॒ धारा॑ अ॒भि चा॑कशीमि हिर॒ण्ययो॑ वेत॒सो मध्य॑ आसाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो! जैसे आकाश से गिरी हुई वर्षा सब जगत् का पालन करती हैं, वैसे ही आप लोगों से निकली हुई विज्ञान की वाणियाँ सब जगत् की रक्षा करती हैं॥५॥

स॒म्यक्स्र॑वन्ति स॒रितो॒ न धेना॑ अ॒न्तर्हृ॒दा मन॑सा पू॒यमा॑नाः। ए॒ते अ॑र्षन्त्यू॒र्मयो॑ घृ॒तस्य॑ मृ॒गाइ॑व क्षिप॒णोरीष॑माणाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सत्य कहते हैं वे ही पवित्रात्मा होके जल के सदृश शान्त होते हुए मृगों के सदृश शीघ्र ही अपेक्षित सुख को प्राप्त होते हैं॥६॥

सिन्धो॑रिव प्राध्व॒ने शू॑घ॒नासो॒ वात॑प्रमियः पतयन्ति य॒ह्वाः। घृ॒तस्य॒ धारा॑ अरु॒षो न वा॒जी काष्ठा॑ भि॒न्दन्नू॒र्मिभिः॒ पिन्व॑मानः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जिन विद्वानों के नदियों के प्रवाह सदृश उत्तम उपदेश प्रचरित होते और घोड़ों के समान दुःखों के पार कराते हैं, वे ही बड़े श्रेष्ठ पुरुष हैं॥७॥

अ॒भि प्र॑वन्त॒ सम॑नेव॒ योषाः॑ कल्या॒ण्यः१॒॑ स्मय॑मानासो अ॒ग्निम्। घृ॒तस्य॒ धाराः॑ स॒मिधो॑ नसन्त॒ ता जु॑षा॒णो ह॑र्यति जा॒तवे॑दाः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोमालङ्कार हैं। जैसे अग्नि और इन्धन के संयोग से प्रकाश होता है, वैसे उत्तम अध्यापक और पढ़नेवाले के सम्बन्ध से विद्या का प्रकाश होता है। और जैसे स्वयंवर जिन्होंने किया ऐसे स्त्री-पुरुष परस्पर के सुख की कामना करते हैं, वैसे ही उत्पन्न हुई विद्या जिनको ऐसे योगी जन सब का सुख उत्पन्न कराते हैं॥८॥

क॒न्या॑इव वह॒तुमेत॒वा उ॑ अ॒ञ्ज्य॑ञ्जा॒ना अ॒भि चा॑कशीमि। यत्र॒ सोमः॑ सू॒यते॒ यत्र॑ य॒ज्ञो घृ॒तस्य॒ धारा॑ अ॒भि तत्प॑वन्ते॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे स्वयंवर करनेवाली कन्या अपने सदृश पति को प्राप्त होने की दिन-रात्रि परीक्षा करती है और ऐसे ही पुरुष परीक्षा करता है, वैसे अध्यापक और उपदेशक परीक्षक होवें और जिस कर्म्म से ऐश्वर्य्य और क्रिया की शुद्धि होवे, वही वचन कहने योग्य है॥९॥

अ॒भ्य॑र्षत सुष्टु॒तिं गव्य॑मा॒जिम॒स्मासु॑ भ॒द्रा द्रवि॑णानि धत्त। इ॒मं य॒ज्ञं न॑यत दे॒वता॑ नो घृ॒तस्य॒ धारा॒ मधु॑मत्पवन्ते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। उन्हीं विद्वानों की प्रशंसा होती है, जो सब मनुष्यों में उपदेश द्वारा उत्तम गुणों को धारण करते हैं॥१०॥

धाम॑न्ते॒ विश्वं॒ भुव॑न॒मधि॑ श्रि॒तम॒न्तः स॑मु॒द्रे ह्य॒द्य१॒॑न्तरायु॑षि। अ॒पामनी॑के समि॒थे य आभृ॑त॒स्तम॑श्याम॒ मधु॑मन्तं त ऊ॒र्मिम्॥

हे मनुष्यो! जो जगदीश्वर जगत् को अभिव्याप्त होके सब को धारण कर और उत्तम प्रकार रक्षा करके अन्तर्य्यामिरूप से सर्वत्र व्याप्त है और जिसकी कृपा से विज्ञान, बहुत कालपर्य्यन्त जीवन और विजय प्राप्त होता है, उसी की निरन्तर सेवा करो॥११॥इस सूक्त में जल मेघ सूर्य वाणी विद्वान् और ईश्वर के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछिले सूक्तार्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये॥११॥यह श्रीमान् परमहंसपरिव्राजकाचार्य परमविद्वान् श्रीमद्विरजानन्दसरस्वती स्वामीजी के शिष्य श्रीमान् दयानदसरस्वती स्वामीजी के बनाए हुए, संस्कृत और आर्य्यभाषा से सुशोभित, ऋग्वेदभाष्य के चतुर्थमण्डल में पञ्चम अनुवाक, अट्ठावनवाँ सूक्त और ग्यारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥इति चतुर्थं मण्डलम्॥

मण्डलम्

सूक्तम्

अबो॑ध्य॒ग्निः स॒मिधा॒ जना॑नां॒ प्रति॑ धे॒नुमि॑वाय॒तीमु॒षास॑म्। य॒ह्वाइ॑व॒ प्र व॒यामु॒ज्जिहा॑नाः॒ प्र भा॒नवः॑ सिस्रते॒ नाक॒मच्छ॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो अग्न्यादि पदार्थों की विद्या को ग्रहण कर कार्य्यों में अच्छे प्रकार युक्त करते हैं, वे दुःखरहित हुए वृक्षों के समान बढ़ते हैं॥१॥

अबो॑धि॒ होता॑ य॒जथा॑य दे॒वानू॒र्ध्वो अ॒ग्निः सु॒मनाः॑ प्रा॒तर॑स्थात्। समि॑द्धस्य॒ रुश॑ददर्शि॒ पाजो॑ म॒हान्दे॒वस्तम॑सो॒ निर॑मोचि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य उत्तम आचरण से अग्नि सदृश ऊपर को जानेवाले होते हैं, वे अविद्या से निवृत्त होकर यशस्वी होते हैं॥२॥

यदीं॑ ग॒णस्य॑ रश॒नामजी॑गः॒ शुचि॑रङ्क्ते॒ शुचि॑भि॒र्गोभि॑र॒ग्निः। आद्दक्षि॑णा युज्यते वाज॒यन्त्यु॑त्ता॒नामू॒र्ध्वो अ॑धयज्जु॒हूभिः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो समुदाय के संतोष को उत्पन्न करते हैं, वे किरणों से सूर्य जैसे वैसे सर्वत्र यश से प्रकाशित होते हैं॥३॥

अ॒ग्निमच्छा॑ देवय॒तां मनां॑सि॒ चक्षूं॑षीव॒ सूर्ये॒ सं च॑रन्ति। यदीं॒ सुवा॑ते उ॒षसा॒ विरू॑पे श्वे॒तो वा॒जी जा॑यते॒ अग्रे॒ अह्ना॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे दिन वैसे विद्वान् जन और जैसे रात्रि वैसे अविद्वान् हैं॥४॥

जनि॑ष्ट॒ हि जेन्यो॒ अग्रे॒ अह्नां॑ हि॒तो हि॒तेष्व॑रु॒षो वने॑षु। दमे॑दमे स॒प्त रत्ना॒ दधा॑नो॒ऽग्निर्होता॒ नि ष॑सादा॒ यजी॑यान्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे दिन के आरम्भ में प्रभातसमय सब का हितकारी होता है, वैसे ही श्रेष्ठ कर्म करनेवाला यजमान सब का हितैषी होता है॥५॥

अ॒ग्निर्होता॒ न्य॑सीद॒द्यजी॑यानु॒पस्थे॑ मा॒तुः सु॑र॒भा उ॑ लो॒के। युवा॑ क॒विः पु॑रुनिः॒ष्ठ ऋ॒तावा॑ ध॒र्ता कृ॑ष्टी॒नामु॒त मध्य॑ इ॒द्धः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि मातारूप वायु में विराजता हुआ बिजुलीरूप से सब को सुख देता है, वैसे ही धार्मिक विद्वान् सब को आनन्द दिलाने के योग्य है॥६॥

प्र णु त्यं विप्र॑मध्व॒रेषु॑ सा॒धुम॒ग्निं होता॑रमीळते॒ नमो॑भिः। आ यस्त॒तान॒ रोद॑सी ऋ॒तेन॒ नित्यं॑ मृजन्ति वा॒जिनं॑ घृ॒तेन॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् जन अग्नि को कार्य्यों में संप्रयुक्त अर्थात् काम में लाकर धन और धान्य से युक्त होते हैं, वैसे ही इसकी विद्या को कार्यों में संयुक्त करके प्रत्यक्ष विद्यायुक्त होते हैं॥७॥

मा॒र्जा॒ल्यो॑ मृज्यते॒ स्वे दमू॑नाः कविप्रश॒स्तो अति॑थिः शि॒वो नः॑। स॒हस्र॑शृङ्गो वृष॒भस्तदो॑जा॒ विश्वाँ॑ अग्ने॒ सह॑सा॒ प्रास्य॒न्यान्॥

वे ही अतिथि होवें जो इन्द्रियों के दमन करने और मङ्गलाचरण करनेवाले धर्म्मिष्ठ विद्वान् और सब के प्रिय साधन में प्रीति करनेवाले होवें और जैसे अग्नि सब का शुद्ध करनेवाला है, वैसे ही सम्पूर्ण जगत् के पवित्र करनेवाले अतिथि जन हैं॥८॥

प्र स॒द्यो अ॑ग्ने॒ अत्ये॑ष्य॒न्याना॒विर्यस्मै॒ चारु॑तमो ब॒भूथ॑। ई॒ळेन्यो॑ वपु॒ष्यो॑ वि॒भावा॑ प्रि॒यो वि॒शामति॑थि॒र्मानु॑षीणाम्॥

जो मनुष्य नित्य भ्रमण करते और प्राप्त हुए जनों को उपदेश कर और नहीं प्राप्त हुओं को उपदेश के लिये प्राप्त होते तथा सब के हितैषी बड़े विद्वान् और यथार्थवादी हैं, वे ही अतिथि होने के योग्य हैं॥९॥

तुभ्यं॑ भरन्ति क्षि॒तयो॑ यविष्ठ ब॒लिम॑ग्ने॒ अन्ति॑त॒ ओत दू॒रात्। आ भन्दि॑ष्ठस्य सुम॒तिं चि॑किद्धि बृ॒हत्ते॑ अग्ने॒ महि॒ शर्म॑ भ॒द्रम्॥

जिससे अतिथि जन सब मनुष्यों के सत्य उपदेश से परम उपकार को करते हैं, इससे वे अन्न, पान, स्थान, प्रिय वचन और धन आदि से सत्कार करने योग्य होते हैं॥१०॥

आद्य रथं॑ भानुमो भानु॒मन्त॒मग्ने॒ तिष्ठ॑ यज॒तेभिः॒ सम॑न्तम्। वि॒द्वान्प॑थी॒नामु॒र्व१॒॑न्तरि॑क्ष॒मेह दे॒वान्ह॑वि॒रद्या॑य वक्षि॥

गृहस्थों को चाहिये कि दूर स्थित भी उत्तम अतिथियों को उत्तम वाहनों पर बैठाकर उपदेश के लिये लावें और अन्न आदि से उनका सत्कार करें॥११॥

अवो॑चाम क॒वये॒ मेध्या॑य॒ वचो॑ व॒न्दारु॑ वृष॒भाय॒ वृष्णे॑। गवि॑ष्ठिरो॒ नम॑सा॒ स्तोम॑म॒ग्नौ दि॒वी॑व रु॒क्ममु॑रु॒व्यञ्च॑मश्रेत्॥

उन पुरुषों को ही विद्वान् अतिथि जन विशेष उपदेश देवें कि जो पवित्रात्मा विद्या में प्रीति करने और उत्तम क्रियाओं के जानने की इच्छा करनेवाले होवें और जो इन बातों से विपरीत अर्थात् रहित हों उनको अधिकार की योग्यता अर्थात् विशेष उपदेश के समझने का सामर्थ्य साधारण उपदेश के द्वारा प्राप्त करा के अधिकारी करें॥१२॥इस सूक्त में उपदेश सुनने और उपदेश के सुनानेवाले का गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह प्रथम सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

कु॒मा॒रं मा॒ता यु॑व॒तिः समु॑ब्धं॒ गुहा॑ बिभर्ति॒ न द॑दाति पि॒त्रे। अनी॑कमस्य॒ न मि॒नज्जना॑सः पु॒रः प॑श्यन्ति॒ निहि॑तमर॒तौ॥

जो कुमार और कुमारी ब्रह्मचर्य्य से विद्या पढ़के और सन्तान के उत्पन्न करने की रीति को जान के पूर्ण अवस्था अर्थात् विवाह करने के योग्य अवस्था होने पर स्वयंवर नामक विवाह को करके सन्तान की उत्पत्ति करते हैं तो वे सदा आनन्दित होते हैं॥१॥

कमे॒तं त्वं यु॑वते कुमा॒रं पेषी॑ बिभर्षि॒ महि॑षी जजान। पू॒र्वार्हि गर्भः॑ श॒रदो॑ व॒वर्धाप॑श्यं जा॒तं यदसू॑त मा॒ता॥

हे कन्याओ! तुम बाल्यावास्था में सोलह वर्ष के प्रथम और पच्चीस वर्ष के प्रथम कुमारजनो! विवाह को न करो। जो इस प्रकार से ब्रह्मचर्य्य के करने के अनन्तर विवाह को करें उनके सन्तान उत्तम रूप और गुणों से युक्त बहुत कालपर्य्यन्त जीवनेवाले और शिष्ट जनों से उत्तम प्रकार मान पानेवाले होते हैं॥२॥

हिर॑ण्यदन्तं॒ शुचि॑वर्णमा॒रात्क्षेत्रा॑दपश्य॒मायु॑धा॒ मिमा॑नम्। द॒दा॒नो अ॑स्मा अ॒मृतं॑ वि॒पृक्व॒त्किं माम॑नि॒न्द्राः कृ॑णवन्ननु॒क्थाः॥

हे मनुष्यो! पूर्ण शास्त्र नियत ब्रह्मचर्य्य, शिक्षा, विद्या, युवावस्था और परस्पर प्रीति के बिना सन्तानों का विवाह न करें। इस प्रकार करते हुए सब जन अति उत्तम सन्तानों को प्राप्त होकर अति ही आनन्द को प्राप्त होते हैं, जो इस प्रकार प्रसिद्ध होते हैं, उनके समीप दारिद्र्य मूर्खता वा दरिद्री और अविद्वान् जन कुछ भी विघ्न नहीं कर सकते हैं॥३॥

क्षेत्रा॑दपश्यं सनु॒तश्चर॑न्तं सु॒मद्यू॒थं न पु॒रु शोभ॑मानम्। न ता अ॑गृभ्र॒न्नज॑निष्ट॒ हि षः पलि॑क्नी॒रिद्यु॑व॒तयो॑ भवन्ति॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! यदि आप लोग अपने सन्तानों को अतिकाल पर्यन्त ब्रह्मचर्य्य करावें तो वे धर्मिष्ठ बुद्धियुक्त और चिरञ्जीवी हुए आप लोगों के लिये अतीव सुख देवें॥४॥

के मे॑ मर्य॒कं वि य॑वन्त॒ गोभि॒र्न येषां॑ गो॒पा अर॑णश्चि॒दास॑। य ईं॑ जगृ॒भुरव॒ ते सृ॑ज॒न्त्वाजा॑ति प॒श्व उप॑ नश्चिकि॒त्वान्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों के प्रति यह पूछें कौन हम लोगों के थोड़े ज्ञानवाले सन्तानों को उत्तम बुद्धिवाले कर सकें, वे विद्वान् यह उत्तर देवें कि जो यथार्थवादी हों, वे ही उक्त काम को कर सकें, अन्य जन नहीं॥५॥

व॒सां राजा॑नं वस॒तिं जना॑ना॒मरा॑तयो॒ नि द॑धु॒र्मर्त्ये॑षु। ब्रह्मा॒ण्यत्रे॒रव॒ तं सृ॑जन्तु निन्दि॒तारो॒ निन्द्या॑सो भवन्तु॥

हे मनुष्यो! जो निकृष्ट कर्म्म करने और दूसरे के द्रव्य के हरनेवाले द्वेषकर्त्ता हों, उनको दण्ड देकर निर्जन देश में बाँधो और जो स्तुति करनेवाले धर्म्मिष्ठ होवें, उनको समीप में निवास देकर सदा सत्कार करो॥६॥

शुन॑श्चि॒च्छेपं॒ निदि॑तं स॒हस्रा॒द्यूपा॑दमुञ्चो॒ अश॑मिष्ट॒ हि षः। ए॒वास्मद॑ग्ने॒ वि मु॑मुग्धि॒ पाशा॒न्होत॑श्चिकित्व इ॒ह तू नि॒षद्य॑॥

विद्वानों का यही आवश्यक कर्म्म है, जो सब मनुष्यों को अविद्या और अधर्म्माचरण से अलग कर विद्वान् धार्मिक बना उनका दुःखबन्धन छुड़ाना निरन्तर करना चाहिये॥७॥

हृ॒णी॒यमा॑नो॒ अप॒ हि मदैयेः॒ प्र मे॑ दे॒वानां॑ व्रत॒पा उ॑वाच। इन्द्रो॑ वि॒द्वाँ अनु॒ हि त्वा॑ च॒चक्ष॒ तेना॒हम॑ग्ने॒ अनु॑शिष्ट॒ आगा॑म्॥

जो मनुष्य दुष्ट गुण, कर्म, स्वभाववाले हों वे दूर रखने योग्य हैं और जो धर्मिष्ठ सत्य का उपदेश करें, उनके सङ्ग से शिष्ट अर्थात् श्रेष्ठ होके सुख को प्राप्त होवें॥८॥

वि ज्योति॑षा बृह॒ता भा॑त्य॒ग्निरा॒विर्विश्वा॑नि कृणुते महि॒त्वा। प्रादे॑वीर्मा॒याः स॑हते दु॒रेवाः॒ शिशी॑ते॒ शृङ्गे॒ रक्ष॑से वि॒निक्षे॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य अन्धकार का वारण कर और प्रकाश को उत्पन्न करके भय का निवारण करता है, वैसे ही विद्वान् जन घोर अज्ञान का निवारण करके विद्यारूप सूर्य को उत्पन्न करके सब के आत्माओं को प्रकाशित करें॥९॥

उ॒त स्वा॒नासो॑ दि॒वि ष॑न्त्व॒ग्नेस्ति॒ग्मायु॑धा॒ रक्ष॑से॒ हन्त॒वा उ॑। मदे॑ चिदस्य॒ प्र रु॑जन्ति॒ भामा॒ न व॑रन्ते परि॒बाधो॒ अदे॑वीः॥

हे विद्वानो! आप लोग जैसे धनुर्वेद को पढ़े हुए शस्त्र और अस्त्रों के प्रक्षेप अर्थात् चलाने रूप युद्ध में चतुर जन अग्निसम्बन्धी अस्त्रादिकों से शत्रुओं का निवारण करके विजय को प्रकाशित करते हैं, वैसे ही अत्यन्त विद्या के पढ़ाने और उपदेश करने से अविद्याकृत प्रमादों का निवारण करके विद्याकृत श्रेष्ठ गुणों का प्रकाश करो॥१०॥

ए॒तं ते॒ स्तोमं॑ तुविजात॒ विप्रो॒ रथं॒ न धीरः॒ स्वपा॑ अतक्षम्। यदीद॑ग्ने॒ प्रति॒ त्वं दे॑व॒ हर्याः॒ स्व॑र्वतीर॒प ए॑ना जयेम॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे विद्वान् जन धर्म्मयुक्त कामनाओं को करके विजयी होते हैं, वैसे ही आप लोग भी आचरण करो॥११

तु॒वि॒ग्रीवो॑ वृष॒भो वा॑वृधा॒नो॑ऽश॒त्र्व१॒॑र्यः सम॑जाति॒ वेदः॑। इती॒मम॒ग्निम॒मृता॑ अवोचन्ब॒र्हिष्म॑ते॒ मन॑वे॒ शर्म॑ यंसद्ध॒विष्म॑ते॒ मन॑वे॒ शर्म॑ यंसत्॥

सब विद्वान् जन ही सब विद्यार्थियों के लिये उत्तम शिक्षा देकर शत्रुता को छुड़ा के सब प्रकार के सुख को प्राप्त होवें॥१२॥इस सूक्त में युवावस्था में विवाह और विद्वान् के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह द्वितीय सूक्त और पन्द्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

त्वम॑ग्ने॒ वरु॑णो॒ जाय॑से॒ यत्त्वं मि॒त्रो भ॑वसि॒ यत्समि॑द्धः। त्वे विश्वे॑ सहसस्पुत्र दे॒वास्त्वमिन्द्रो॑ दा॒शुषे॒ मर्त्या॑य॥

हे राजन्! जिसके आप मित्र वा जिससे आप विरुद्ध और उदासीन होते हैं, वह आपके साथ सदैव मित्रता रक्खे और आप भी उसके साथ रक्खें॥१॥

त्वम॑र्य॒मा भ॑वसि॒ यत्क॒नीनां॒ नाम॑ स्वधाव॒न्गुह्यं॑ बिभर्षि। अ॒ञ्जन्ति॑ मि॒त्रं सुधि॑तं॒ न गोभि॒र्यद्दम्प॑ती॒ सम॑नसा कृ॒णोषि॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। वही राजा श्रेष्ठ है, जो प्रजाओं का यथार्थ न्याय करता है और जैसे मित्र मित्र को प्रसन्न करता है, वैसे ही राजा प्रजाओं को प्रसन्न करे॥२॥

तव॑ श्रि॒ये म॒रुतो॑ मर्जयन्त॒ रुद्र॒ यत्ते॒ जनि॑म॒ चारु॑ चि॒त्रम्। प॒दं यद्विष्णो॑रुप॒मं नि॒धायि॒ तेन॑ पासि॒ गुह्यं॒ नाम॒ गोना॑म्॥

हे राजन्! इसी से आपके जन्म का साफल्य होवे, जिससे आप ईश्वर के सदृश पक्षपात का त्याग करके प्रजाओं का पालन करो॥३॥

तव॑ श्रि॒या सु॒दृशो॑ देव दे॒वाः पु॒रू दधा॑ना अ॒मृतं॑ सपन्त। होता॑रम॒ग्निं मनु॑षो॒ नि षे॑दुर्दश॒स्यन्त॑ उ॒शिजः॒ शंस॑मा॒योः॥

हे मनुष्यो! आप यथार्थवक्ता विद्वानों के सङ्ग से विद्याओं को ग्रहण कर लक्ष्मीवान् हों और इस संसार में सुख भोगकर अन्त अर्थात् मरणसमय में मुक्ति को भी प्राप्त होओ॥४॥

न त्वद्धोता॒ पूर्वो॑ अग्ने॒ यजी॑या॒न्न काव्यैः॑ प॒रो अ॑स्ति स्वधावः। वि॒शश्च॒ यस्या॒ अति॑थि॒र्भवा॑सि॒ स य॒ज्ञेन॑ वनवद्देव॒ मर्ता॑न्॥

जो राजा धर्मयुक्त व्यवहार से प्रजाओं का पालन करे, वही राज्य करने के योग्य होता है॥५॥

व॒यम॑ग्ने वनुयाम॒ त्वोता॑ वसू॒यवो॑ ह॒विषा॒ बुध्य॑मानाः। व॒यं स॑म॒र्ये वि॒दथे॒ष्वह्नां॑ व॒यं रा॒या स॑हसस्पुत्र॒ मर्ता॑न्॥

हे मनुष्यो! विद्वानों से श्रेष्ठ गुणों की आप लोग प्रार्थना करें तो स्वयं प्रजायें धनवती होवें॥६॥

यो न॒ आगो॑ अ॒भ्येनो॒ भरा॒त्यधीद॒घम॒घशं॑से दधात। ज॒ही चि॑कित्वो अ॒भिश॑स्तिमे॒तामग्ने॒ यो नो॑ म॒र्चय॑ति द्व॒येन॑॥

हे राजन्! जो प्रजा को दोष देनेवाले होवें, उनको सदा ही दण्ड दीजिये और जो श्रेष्ठ आचरण करनेवाले होवें, उनको मानो अर्थात् सत्कार करो॥७॥

त्वाम॒स्या व्युषि॑ देव॒ पूर्वे॑ दू॒तं कृ॑ण्वा॒ना अ॑यजन्त ह॒व्यैः। सं॒स्थे यद॑ग्न॒ ईय॑से रयी॒णां दे॒वो मर्तै॒र्वसु॑भिरि॒ध्यमा॑नः॥

हे राजन्! जो आप विद्या और विनय से न्यायपूर्वक प्रजाओं का निरन्तर पालन करें तो आप को यश, धन, राज्य की उन्नति और उत्तम पुरुष प्राप्त होवें॥८॥

अव॑ स्पृधि पि॒तरं॒ योधि॑ वि॒द्वान्पु॒त्रो यस्ते॑ सहसः सून ऊ॒हे। क॒दा चि॑कित्वो अ॒भि च॑क्षसे॒ नोऽग्ने॑ क॒दाँ ऋ॑त॒चिद्या॑तयासे॥

जो कन्या और बालकों को माता-पिता ब्रह्मचर्य से विद्या प्राप्त करावें और पूर्ण युवावस्था में विवाह करावें तो वे अत्यन्त सुख को प्राप्त होवें॥९॥

भूरि॒ नाम॒ वन्द॑मानो दधाति पि॒ता व॑सो॒ यदि॒ तज्जो॒षया॑से। कु॒विद्दे॒वस्य॒ सह॑सा चका॒नः सु॒म्नम॒ग्निर्व॑नते वावृधा॒नः॥

हे सन्तानो! जो आप लोगों के माता-पिता दूसरे विद्यारूप जन्म नामक द्विज ऐसा नाम विधान करते हैं, उनका सेवन निरन्तर तुम लोग करो॥१०॥

त्वम॒ङ्ग ज॑रि॒तारं॑ यविष्ठ॒ विश्वा॑न्यग्ने दुरि॒ताति॑ पर्षि। स्ते॒ना अ॑दृश्रन्रि॒पवो॒ जना॒सोऽज्ञा॑तकेता वृजि॒ना अ॑भूवन्॥

हे उत्तम सन्तानो! आप लोग दुष्ट आचरणों का त्याग, माता-पितादि का सत्कार और चौरी कर्म्म आदि का निवारण करके पुण्य यशवाले हूजिये॥११॥

इ॒मे यामा॑सस्त्व॒द्रिग॑भूव॒न्वस॑वे वा॒ तदिदागो॑ अवाचि। नाहा॒यम॒ग्निर॒भिश॑स्तये नो॒ न रीष॑ते वावृधा॒नः परा॑ दात्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो विद्वान् जन किसी को भी बिना अपराध के नहीं दोष देते हैं, उनको अपने समीप से दूर मत निकालो॥१२॥इस सूक्त में राजा और प्रजा को चोरी और अन्य अपराध आदि के निवारण आदि के कहने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह तीसरा सूक्त और सत्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

त्वाम॑ग्ने॒ वसु॑पतिं॒ वसू॑नाम॒भि प्र म॑न्दे अध्व॒रेषु॑ राजन्। त्वया॒ वाजं॑ वाज॒यन्तो॑ जयेमा॒भि ष्या॑म पृत्सु॒तीर्मर्त्या॑नाम्॥

जिनके अधिष्ठाता मुखिया धार्मिक और विद्वान् जन होवें, उनका सदा ही विजय, राज्य की वृद्धि और अतुल लक्ष्मी होती है॥१॥

ह॒व्य॒वाळ॒ग्निर॒जरः॑ पि॒ता नो॑ वि॒भुर्वि॒भावा॑ सु॒दृशी॑को अ॒स्मे। सु॒गा॒र्ह॒प॒त्याः समिषो॑ दिदीह्यस्म॒द्र्य१॒॑क्सं मि॑मीहि॒ श्रवां॑सि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! जैसे बिजुली और भूमि में प्रसिद्ध हुए रूप से अग्नि सब का उपकार करता है और जैसे परमेश्वर असंख्यात पदार्थों के उत्पन्न करने से पितरों के सदृश सब का पालन करता है, वैसे ही आप हूजिये॥२॥

वि॒शां क॒विं वि॒श्पतिं॒ मानु॑षीणां॒ शुचिं॑ पाव॒कं घृ॒तपृ॑ष्ठम॒ग्निम्। नि होता॑रं विश्व॒विदं॑ दधिध्वे॒ स दे॒वेषु॑ वनते॒ वार्या॑णि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो अग्नि के सदृश प्रतापी, जगदीश्वर के सदृश न्यायकारी, विद्वान् और उत्तम लक्षणोंवाला राजा होता है, वही चक्रवर्त्ती राजा होने योग्य है॥३॥

जु॒षस्वा॑ग्न॒ इळ॑या स॒जोषा॒ यत॑मानो र॒श्मिभिः॒ सूर्य॑स्य। जु॒षस्व॑ नः स॒मिधं॑ जातवेद॒ आ च॑ दे॒वान्ह॑वि॒रद्या॑य वक्षि॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो! जैसे सूर्य्य के प्रकाश से सब जीवों के करने योग्य कर्म्म सिद्ध होते हैं, वैसे ही यथार्थवक्ता पुरुषों से राजा के सर्व न्याययुक्त प्रजापालन आदि कर्म्म होते हैं॥४॥

जुष्टो॒ दमू॑ना॒ अति॑थिर्दुरो॒ण इ॒मं नो॑ य॒ज्ञमुप॑ याहि वि॒द्वान्। विश्वा॑ अग्ने अभि॒युजो॑ वि॒हत्या॑ शत्रूय॒तामा भ॑रा॒ भोज॑नानि॥

जो राजा दुष्टों का नाश करके न्याय से प्रजाओं का पालन करता है, वह बहुत ही प्रजा का प्रिय होता है॥५॥

व॒धेन॒ दस्युं॒ प्र हि चा॒तय॑स्व॒ वयः॑ कृण्वा॒नस्त॒न्वे॒३॒॑ स्वायै॑। पिप॑र्षि॒ यत्स॑हसस्पुत्र दे॒वान्त्सो अ॑ग्ने पाहि नृतम॒ वाजे॑ अ॒स्मान्॥

हे राजन्! आप सदा चोर डाकुओं का नाश कर धार्मिकों का पालन करें और शत्रुओं को जीतें॥६॥

व॒यं ते॑ अग्न उ॒क्थैर्वि॑धेम व॒यं ह॒व्यैः पा॑वक भद्रशोचे। अ॒स्मे र॒यिं वि॒श्ववा॑रं॒ समि॑न्वा॒स्मे विश्वा॑नि॒ द्रवि॑णानि धेहि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रजा और मन्त्रीजन राजलक्ष्मी को बढ़ावें, वैसे ही राजा इन लोगों के लिये धन बढ़ावे। इस प्रकार न्याय से पिता और पुत्र के सदृश वर्त्ताव करके यशस्वी होवें॥७॥

अ॒स्माक॑मग्ने अध्व॒रं जु॑षस्व॒ सह॑सः सूनो त्रिषधस्थ ह॒व्यम्। व॒यं दे॒वेषु॑ सु॒कृतः॑ स्याम॒ शर्म॑णा नस्त्रि॒वरू॑थेन पाहि॥

सब जन राजा के प्रति यह कहें कि हे राजन्! आप हम लोगों का पालन यथावत् करिये, आपसे रक्षित हम लोग निरन्तर धर्माचरणयुक्त होकर आपकी उन्नति को जैसे [=जिस प्रकार] करें॥८॥

विश्वा॑नि नो दु॒र्गहा॑ जातवेदः॒ सिन्धुं॒ न ना॒वा दु॑रि॒ताति॑ पर्षि। अग्ने॑ अत्रि॒वन्नम॑सा गृणा॒नो॒३॒॑स्माकं॑ बोध्यवि॒ता त॒नूना॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा अध्यापक और उपदेशक जन सब लोगों को दुःख से पार पहुँचाते हैं, वे अतुल सुख को प्राप्त होते हैं॥९॥

यस्त्वा॑ हृ॒दा की॒रिणा॒ मन्य॑मा॒नोऽम॑र्त्यं॒ मर्त्यो॒ जोह॑वीमि। जात॑वेदो॒ यशो॑ अ॒स्मासु॑ धेहि प्र॒जाभि॑रग्ने अमृत॒त्वम॑श्याम्॥

जैसे प्रजायें राजा के हित को सिद्ध करती हैं, वैसे ही राजा प्रजा के सुख की इच्छा करें। इस प्रकार परस्पर प्रीति से अतुल सुख को प्राप्त होवें॥१०॥

यस्मै॒ त्वं सु॒कृते॑ जातवेद उ लो॒कम॑ग्ने कृ॒णवः॑ स्यो॒नम्। अ॒श्विनं॒ स पु॒त्रिणं॑ वी॒रव॑न्तं॒ गोम॑न्तं र॒यिं न॑शते स्व॒स्ति॥

हे राजन्! जो आप विद्या और विनय से प्रजाओं को पुत्र आदि ऐश्वर्य्यों से युक्त करें तो ये प्रजायें आपका अति सत्कार करें॥११॥इस सूक्त में राजा और प्रजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चौथा सूक्त और उन्नीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सुस॑मिद्धाय शो॒चिषे॑ घृ॒तं ती॒व्रं जु॑होतन। अ॒ग्नये॑ जा॒तवे॑दसे॥

जो अध्यापक जन पवित्र अन्तःकरणवालों में विद्या का संस्कार डालते हैं, वे सूर्य्य के सदृश प्रताप से युक्त होते हैं॥१॥

नरा॒शंसः॑ सुषूदती॒मं य॒ज्ञमदा॑भ्यः। क॒विर्हि मधु॑हस्त्यः॥

हे विद्वान्! जैसे गौ सब के सुख के लिये दुग्ध देती है, वैसे सब के सुख के लिये सत्यविद्या के उपदेशों को निरन्तर वर्षाइये॥२॥

ई॒ळि॒तो अ॑ग्न॒ आ व॒हेन्द्रं॑ चि॒त्रमि॒ह प्रि॒यम्। सु॒खै रथे॑भिरू॒तये॑॥

हे राजन्! आप बड़े ऐश्वर्य्य को प्राप्त होके प्रजा के रक्षण के लिये सर्वत्र भ्रमण कीजिये॥३॥

ऊर्ण॑म्रदा॒ वि प्र॑थस्वा॒भ्य१॒॑र्का अ॑नूषत। भवा॑ नः शुभ्र सा॒तये॑॥

राजा और राजपुरुष विभाग करके अपने-अपने अंश अर्थात् हिस्से को ग्रहण करें और प्रजाओं के भाग प्रजाओं के लिये देवें॥४॥

देवी॑र्द्वारो॒ वि श्र॑यध्वं सुप्राय॒णा न॑ ऊ॒तये॑। प्रप्र॑ य॒ज्ञं पृ॑णीतन॥

यदि तुल्य गुण, कर्म, स्वभाववाले स्त्री-पुरुष विवाह करके गृहाश्रम का आरम्भ करें तो पूर्ण सुख पावें॥५॥

सु॒प्रती॑के वयो॒वृधा॑ य॒ह्वी ऋ॒तस्य॑ मा॒तरा॑। दो॒षामु॒षास॑मीमहे॥

जैसे रात्रि और दिन एक साथ ही वर्त्तमान हैं, वैसे ही जिन्होंने विवाह किया, ऐसे स्त्री पुरुष वर्त्ताव करें॥६॥

वात॑स्य॒ पत्म॑न्नीळि॒ता दैव्या॒ होता॑रा॒ मनु॑षः। इ॒मं नो॑ य॒ज्ञमा ग॑तम्॥

हे स्त्री-पुरुषो! आप दोनों धर्म्मसम्बन्धी कर्म्म के आचरण से प्रशंसित होकर इस गृहाश्रमव्यवहार को सिद्ध करो॥७॥

इळा॒ सर॑स्वती म॒ही ति॒स्रो दे॒वीर्म॑यो॒भुवः॑। ब॒र्हिः सी॑दन्त्व॒स्रिधः॑॥

हे स्त्री और पुरुषो! आप लोग विद्या उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी और भूमि के राज्य को सुख के लिये प्राप्त हूजिये॥८॥

शि॒वस्त्व॑ष्टरि॒हा ग॑हि वि॒भुः पोष॑ उ॒त त्मना॑। य॒ज्ञेय॑ज्ञे न॒ उद॑व॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! आप लोग परमेश्वर के सदृश वर्त्ताव करके सब के कल्याण को करो॥९॥

यत्र॒ वेत्थ॑ वनस्पते दे॒वानां॒ गुह्या॒ नामा॑नि। तत्र॑ ह॒व्यानि॑ गामय॥

जो विद्वानों के हृदयों में स्थित और विद्या के प्रभाव से उत्पन्न हुए नामों को जानते हैं, वे बहुत सुख मनुष्यों को प्राप्त कराते हैं॥१०॥

स्वाहा॒ग्नये॒ वरु॑णाय॒ स्वाहेन्द्रा॑य म॒रुद्भ्यः॑। स्वाहा॑ दे॒वेभ्यो॑ ह॒विः॥

मनुष्य विद्या और श्रेष्ठ कर्म्म से अग्नि की विद्या को ग्रहण कर विद्वानों का सत्कार करके मनुष्यों के हित को निरन्तर करें॥११॥इस सूक्त में विद्वान्, राजा, गृहाश्रम, राजप्रजाविषय और विद्याग्रहण का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पाँचवाँ सूक्त और इक्कीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒ग्निं तं म॑न्ये॒ यो वसु॒रस्तं॒ यं यन्ति॑ धे॒नवः॑। अस्त॒मर्व॑न्त आ॒शवोऽस्तं॒ नित्या॑सो वा॒जिन॒ इषं॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र॥

हे मनुष्यो! यदि आप बिजुली आदि रूपवान् और सब कहीं अभिव्याप्त अग्नि को युक्ति से चलावें तो यह स्वयं वेगवान् होकर औरों को भी शीघ्र चलाता है॥१॥

सो अ॒ग्निर्यो वसु॑र्गृ॒णे सं यमा॒यन्ति॑ धे॒नवः॑। समर्व॑न्तो रघु॒द्रुवः॒ सं सु॑जा॒तासः॑ सू॒रय॒ इषं॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र॥

हे मनुष्यो! आप लोग अग्नि आदि पदार्थ के विज्ञान से चतुर होकर अध्यापकों के लिये ऐश्वर्य्य की प्राप्ति कराइये॥२॥

अ॒ग्निर्हि वा॒जिनं॑ वि॒शे ददा॑ति वि॒श्वच॑र्षणिः। अ॒ग्नी रा॒ये स्वा॒भुवं॒ स प्री॒तो या॑ति॒ वार्य॒मिषं॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र॥

हे मनुष्यो! अग्नि ही उत्तम प्रकार साधित किया गया सुख देनेवाला होता है, जिससे आप लोग ऐश्वर्य की वृद्धि करो॥३॥

आ ते॑ अग्न इधीमहि द्यु॒मन्तं॑ देवा॒जर॑म्। यद्ध॒ स्या ते॒ पनी॑यसी स॒मिद्दी॒दय॑ति॒ द्यवीषं॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र॥

हे विद्वन्! जिस अग्नि आदि की विद्या को आप जानते हैं और जिस विद्या से आपकी प्रशंसा होती है, उसका हम लोगों को बोध दीजिये॥४॥

आ ते॑ अग्न ऋ॒चा ह॒विः शुक्र॑स्य शोचिषस्पते। सुश्च॑न्द्र॒ दस्म॒ विश्प॑ते॒ हव्य॑वा॒ट् तुभ्यं॑ हूयत॒ इषं॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र॥

जो विद्वान् लोग अग्नि आदिकों से कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, उनके काम सिद्ध होते हैं॥५॥

प्रो त्ये अ॒ग्नयो॒ऽग्निषु॒ विश्वं॑ पुष्यन्ति॒ वार्य॑म्। ते हि॑न्विरे॒ त इ॑न्विरे॒ त इ॑षण्यन्त्यानु॒षगिषं॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र॥

हे मनुष्यो! जो पृथिवी आदि में अग्नि आदि पदार्थ हैं, उनको जान के फिर ईश्वर को जानो॥६॥

तव॒ त्ये अ॑ग्ने अ॒र्चयो॒ महि॑ व्राधन्त वा॒जिनः॑। ये पत्व॑भिः श॒फानां॑ व्र॒जा भु॒रन्त॒ गोना॒मिषं॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र॥

जैसे घोड़े और गाएँ पैरों से दौड़ती हैं, वैसे ही अग्नि के तेज शीघ्र चलते हैं और जो अग्न्यादिकों के संप्रयोग करने को जानते हैं, उन की सब प्रकार वृद्धि होती है॥७॥

नवा॑ नो अग्न॒ आ भ॑र स्तो॒तृभ्यः॑ सुक्षि॒तीरिषः॑। ते स्या॑म॒ य आ॑नृ॒चुस्त्वादू॑तासो॒ दमे॑दम॒ इषं॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र॥

वही राजा प्रशंसनीय होता है, जो [उत्तम] भृत्य और अतुल ऐश्वर्य्य को सब के सुख के लिये धारण करता है और दूत और चारों अर्थात् गुप्त संदेश देनेवालों से सब राज्य का समाचार जान के यथायोग्य प्रबन्ध करता है॥८॥

उ॒भे सु॑श्चन्द्र स॒र्पिषो॒ दर्वी॑ श्रीणीष आ॒सनि॑। उ॒तो न॒ उत्पु॑पूर्या उ॒क्थेषु॑ शवसस्पत॒ इषं॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र॥

जो राजा सेना के भोजन के उत्तम प्रबन्ध को आरोग्य के लिये वैद्यों को रखता है, वही प्रशंसित होकर राज्य बढ़ाता है॥९॥

ए॒वाँ अ॒ग्निम॑जुर्यमुर्गी॒र्भिर्य॒ज्ञेभि॑रानु॒षक्। दध॑द॒स्मे सु॒वीर्य॑मु॒त त्यदा॒श्वश्व्य॒मिषं॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र॥

हे राजन्! जो अग्नि आदि की विद्या को जान के अनेक विमान आदि वाहनों को बनाते हैं, उनके लिये अन्न आदि देकर निरन्तर सत्कार कीजिये॥१०॥इस सूक्त में अग्नि, विद्वान् और राजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह छठा सूक्त और तेईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सखा॑यः॒ सं वः॑ स॒म्यञ्च॒मिषं॒ स्तोमं॑ चा॒ग्नये॑। वर्षि॑ष्ठाय क्षिती॒नामू॒र्जो नप्त्रे॒ सह॑स्वते॥

हे मनुष्यो! इस संसार में आप लोग मित्रभाव से वर्ताव करके मनुष्य आदि प्रजा के हित के लिये अग्नि आदि की विद्या को प्राप्त होके अन्य जनों के लिये शिक्षा दीजिये॥१॥

कुत्रा॑ चि॒द्यस्य॒ समृ॑तौ र॒ण्वा नरो॑ नृ॒षद॑ने। अर्ह॑न्तश्चि॒द्यमि॑न्ध॒ते सं॑ज॒नय॑न्ति ज॒न्तवः॑॥

जो जीव सब मनुष्यों के हित में वर्त्तमान हुए यथाशक्ति परोपकार करते हैं, वे योग्य हैं॥

सं यदि॒षो वना॑महे॒ सं ह॒व्या मानु॑षाणाम्। उ॒त द्यु॒म्नस्य॒ शव॑स ऋ॒तस्य॑ र॒श्मिमा द॑दे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वान् जन पक्षपात को छोड़ के यथायोग्य व्यवहार कर मनुष्यों के आत्माओं में विद्याप्रकाश को धारण करें तो सब योग्य होते हैं॥३॥

स स्मा॑ कृणोति के॒तुमा नक्तं॑ चिद्दू॒र आ स॒ते। पा॒व॒को यद्वन॒स्पती॒न्प्र स्मा॑ मि॒नात्य॒जरः॑॥

हे मनुष्यो! विद्वान् दूर भी वर्त्तमान हुए रात्रि दिन अग्नि वा वनस्पतियों के सदृश परोपकारी होते हैं, वे संसार के भूषण अंलकार होते हैं॥४॥

अव॑ स्म॒ यस्य॒ वेष॑णे॒ स्वेदं॑ प॒थिषु॒ जुह्व॑ति। अ॒भीमह॒ स्वजे॑न्यं॒ भूमा॑ पृ॒ष्ठेव॑ रुरुहुः॥

जो मनुष्य मार्ग में व्याप्त व्यवहारों को जान कर कार्यों को सिद्ध करते हैं, वे सुखों को प्राप्त होते हैं॥५॥

यं मर्त्यः॑ पुरु॒स्पृहं॑ वि॒दद्विश्व॑स्य॒ धाय॑से। प्र स्वाद॑नं पितू॒नामस्त॑तातिं चिदा॒यवे॑॥

मनुष्य को जिस उत्तम वस्तु और ज्ञान की प्राप्ति होवे, उस उसको सब के सुख के लिये धारण करे॥६॥

स हि ष्मा॒ धन्वाक्षि॑तं॒ दाता॒ न दात्या प॒शुः। हिरि॑श्मश्रुः॒ शुचि॑दन्नृ॒भुरनि॑भृष्टतविषिः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे नहीं देनेवाला धान्य को कटवा कर भूसे को अलग करके अन्न का ग्रहण करता है और जैसे पशु खुरों से धान्य आदि को तोड़ता है, वैसे ही राजा साहस करनेवाले दुष्ट मनुष्यों का निरन्तर ताड़न करे॥७॥

शुचिः॑ ष्म॒ यस्मा॑ अत्रि॒वत्प्र स्वधि॑तीव॒ रीय॑ते। सु॒षूर॑सूत मा॒ता क्रा॒णा यदा॑न॒शे भग॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो माता-पिता ब्रह्मचर्य्य किये हुए विधिपूर्वक सन्तानों को उत्पन्न करें तो सुख और ऐश्वर्य्य को प्राप्त होवें॥८॥

आ यस्ते॑ सर्पिरासु॒तेऽग्ने॒ शमस्ति॒ धाय॑से। ऐषु॑ द्यु॒म्नमु॒त श्रव॒ आ चि॒त्तं मर्त्ये॑षु धाः॥

जो कोई किसी के लिये विद्या धन और विज्ञान को धारण करता है तो उसके लिये उपकार किया भी पुरुष प्रत्युपकार के लिये वैसे ही सत्कार को करे॥९॥

इति॑ चिन्म॒न्युम॒ध्रिज॒स्त्वादा॑त॒मा प॒शुं द॑दे। आद॑ग्ने॒ अपृ॑ण॒तोऽत्रिः॑ सासह्या॒द्दस्यू॑नि॒षः सा॑सह्या॒न्नॄन्॥

जो राजजन क्रोधादि और दुष्ट व्यसनों का निवारण करके चोर डाकुओं को जीत कर श्रेष्ठ पुरुषों से किये गये अपमान को सहें, वे अखण्डित राज्य युक्त होते हैं॥१०॥इस सूक्त में मित्रत्व, विद्वान्, राजा और अग्नि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सप्तम सूक्त और पच्चीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

त्वाम॑ग्न ऋता॒यवः॒ समी॑धिरे प्र॒त्नं प्र॒त्नास॑ ऊ॒तये॑ सहस्कृत। पु॒रु॒श्च॒न्द्रं य॑ज॒तं वि॒श्वधा॑यसं॒ दमू॑नसं गृ॒हप॑तिं॒ वरे॑ण्यम्॥

हे मनुष्यो! जो आप लोगों की विद्या और दान आदिकों से वृद्धि करते हैं, उनका आप लोग निरन्तर सत्कार करो॥१॥

त्वाम॑ग्ने॒ अति॑थिं पू॒र्व्यं विशः॑ शो॒चिष्के॑शं गृ॒हप॑तिं॒ नि षे॑दिरे। बृ॒हत्के॑तुं पुरु॒रूपं॑ धन॒स्पृतं॑ सु॒शर्मा॑णं॒ स्वव॑सं जर॒द्विष॑म्॥

गृहस्थ जन सदा ही प्रजा का पालन, अतिथि की सेवा, उत्तम गृह तथा विद्या का प्रचार, बुद्धि की वृद्धि, सब प्रकार से रक्षा तथा राग और द्वेष का त्याग निरन्तर करें॥२॥

त्वाम॑ग्ने॒ मानु॑षीरीळते॒ विशो॑ होत्रा॒विदं॒ विवि॑चिं रत्न॒धात॑मम्। गुहा॒ सन्तं॑ सुभग वि॒श्वद॑र्शतं तुविष्व॒णसं॑ सु॒यजं॑ घृत॒श्रिय॑म्॥

हे मनुष्यो! आप लोग जिस बिजुली रूप अग्नि से जीवन और चेतनता होती है, तद्वत् राजा को जान के सुख बढ़ाओ॥३॥

त्वाम॑ग्ने धर्ण॒सिं वि॒श्वधा॑ व॒यं गी॒र्भिर्गृ॒णन्तो॒ नम॒सोप॑ सेदिम। स नो॑ जुषस्व समिधा॒नो अ॑ङ्गिरो दे॒वो मर्त॑स्य य॒शसा॑ सुदी॒तिभिः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सब प्रकार से यह सब का स्वभाव है, जो जिस भाव से जिसको प्राप्त होवे सेवन करे, वैसा ही भाव और सेवन उसका होता है॥४॥

त्वम॑ग्ने पुरु॒रूपो॑ वि॒शेवि॑शे॒ वयो॑ दधासि प्र॒त्नथा॑ पुरुष्टुत। पु॒रूण्यन्ना॒ सह॑सा॒ वि रा॑जसि॒ त्विषिः॒ सा ते॑ तित्विषा॒णस्य॒ नाधृषे॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! आप लोग जैसे अग्नि सब जगत् को धारण करता है, वैसे सब मनुष्यों को विद्या के प्रकाश में धारण करो॥५॥

त्वाम॑ग्ने समिधा॒नं य॑विष्ठ्य दे॒वा दू॒तं च॑क्रिरे हव्य॒वाह॑नम्। उ॒रु॒ज्रय॑सं घृ॒तयो॑नि॒माहु॑तं त्वे॒षं चक्षु॑र्दधिरे चोद॒यन्म॑ति॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्य विद्वानों के सङ्ग के बिना अग्नियों के गुण और अग्नि आदि संयोग के गुणों को जानने योग्य नहीं होते हैं॥६॥

त्वाम॑ग्ने प्र॒दिव॒ आहु॑तं घृ॒तैः सु॑म्ना॒यवः॑ सुष॒मिधा॒ समी॑धिरे। स वा॑वृधा॒न ओष॑धीभिरुक्षि॒तो॒३॒॑भि ज्रयां॑सि॒ पार्थि॑वा॒ वि ति॑ष्ठसे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे विद्वान् जन सब पदार्थों से बिजुली की विद्या को उत्पन्न करते हैं, वैसे विद्वान् जन सब से गुणों को ग्रहण करते हैं॥७॥इस सूक्त में अग्नि, और विद्वान् के गुण वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य महाविद्वान् श्रीमद्विरजानन्दसरस्वती स्वामीजी के शिष्य श्री दयानदसरस्वती स्वामिविरचित उत्तम प्रमाणयुक्त संस्कृत और आर्य्यभाषाविभूषित ऋग्वेदभाष्य में तृतीयाष्टक में अष्टम अध्याय और छब्बीसवाँ वर्ग, तीसरा अष्टक तथा पञ्चम मण्डल में अष्टम सूक्त समाप्त हुआ॥

त्वाम॑ग्ने ह॒विष्म॑न्तो दे॒वं मर्ता॑स ईळते। मन्ये॑ त्वा जा॒तवे॑दसं॒ स ह॒व्या व॑क्ष्यानु॒षक्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो अग्नि आदि के गुणों को ढूँढ़ते हैं, वे ही विद्या के अनुकूल व्यवहारों को उत्पन्न करते हैं॥१॥

अ॒ग्निर्होता॒ दास्व॑तः॒ क्षय॑स्य वृ॒क्तब॑र्हिषः। यं य॒ज्ञास॒श्चर॑न्ति॒ यं सं वाजा॑सः श्रव॒स्यवः॑॥

मनुष्य बड़े अवकाशवाले गृहों को रच के पुरुषार्थ से पदार्थविद्या को प्राप्त हों॥२॥

उ॒त स्म॒ यं शिशुं॑ यथा॒ नवं॒ जनि॑ष्टा॒रणी॑। ध॒र्तारं॒ मानु॑षीणां वि॒शाम॒ग्निं स्व॑ध्व॒रम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे माता-पिता श्रेष्ठ सन्तान को उत्पन्न करके सुख को प्राप्त होते हैं, वैसे विद्वान् जन बिजुलीरूप अग्नि को उत्पन्न करके ऐश्वर्य्य को प्राप्त होते हैं॥३॥

उ॒त स्म॑ दुर्गृभीयसे पु॒त्रो न ह्वा॒र्याणा॑म्। पु॒रू यो दग्धासि॒ वनाग्ने॑ प॒शुर्न यव॑से॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो पदार्थविद्या के ग्रहण के लिये पुत्र और गौ के सदृश वर्त्तमान है, वही अग्नि आदि की विद्या को जान सकता है॥४॥

अध॑ स्म॒ यस्या॒र्चयः॑ स॒म्यक्सं॒यन्ति॑ धू॒मिनः॑। यदी॒मह॑ त्रि॒तो दि॒व्युप॒ ध्माते॑व॒ धम॑ति॒ शिशी॑ते ध्मा॒तरी॑ यथा॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! सब पदार्थविद्याओं से पहले अग्निविद्या जाननी चाहिये॥५॥

तवा॒हम॑ग्न ऊ॒तिभि॑र्मि॒त्रस्य॑ च॒ प्रश॑स्तिभिः। द्वे॒षो॒युतो॒ न दु॑रि॒ता तु॒र्याम॒ मर्त्या॑नाम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे मित्र मित्र की प्रशंसा करता और शत्रुजन हित का नाश करते हैं, वैसे ही मित्रता करके मनुष्यों के दुःखों का हम नाश करें॥६॥

तं नो॑ अग्ने अ॒भी नरो॑ र॒यिं स॑हस्व॒ आ भ॑र। स क्षे॑पय॒त्स पो॑षय॒द्भुव॒द्वाज॑स्य सा॒तय॑ उ॒तैधि॑ पृ॒त्सु नो॑ वृ॒धे॥

सुकर्म्मों के जानने की इच्छा करनेवालों को चाहिये कि विद्वानों के प्रति यह प्रार्थना करें कि आप लोग हम लोगों को श्रेष्ठ गुणों में प्रेरित करो और ब्रह्मचर्य्य आदि से पुष्ट करो और सत्य और असत्य के विभाग करनेवाले और युद्धविद्या में चतुर जन हम लोगों की निरन्तर रक्षा करें॥७॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह नवमा सूक्त और पहला वर्ग समाप्त हुआ॥

अग्न॒ ओजि॑ष्ठ॒मा भ॑र द्यु॒म्नम॒स्मभ्य॑मध्रिगो। प्र नो॑ रा॒या परी॑णसा॒ रत्सि॒ वाजा॑य॒ पन्था॑म्॥

जो मनुष्य अन्य जनों के श्रेष्ठ उपदेश से पुण्यकीर्त्ति को बढ़ाते, वे धर्म्म सम्बन्धी यशवाले होते हैं॥१॥

त्वं नो॑ अग्ने अद्भुत॒ क्रत्वा॒ दक्ष॑स्य मं॒हना॑। त्वे अ॑सु॒र्य१॒॑मारु॑हत्क्रा॒णा मि॒त्रो न य॒ज्ञियः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। वही उत्तम विद्वान् होता है, जो सब के सत्कार के लिये विद्या का उपदेश देता है॥२॥

त्वं नो॑ अग्न एषां॒ गयं॑ पु॒ष्टिं च॑ वर्धय। ये स्तोमे॑भिः॒ प्र सू॒रयो॒ नरो॑ म॒घान्या॑न॒शुः॥

विद्वानों को चाहिये कि यथार्थवक्ताओं के सहित सब मनुष्यों के सुख और बल को बढ़ावें॥३॥

ये अ॑ग्ने चन्द्र ते॒ गिरः॑ शु॒म्भन्त्यश्व॑राधसः। शुष्मे॑भिः शु॒ष्मिणो॒ नरो॑ दि॒वश्चि॒द्येषां॑ बृ॒हत्सु॑की॒र्तिर्बोध॑ति॒ त्मना॑॥

जो विद्वान् सदृश गुण, कर्म और स्वभाववाले मित्र होकर अग्नि आदि पदार्थों की विद्याओं को परस्पर जनाते हैं, वे सिद्ध मनोरथवाले होते हैं॥४॥

तव॒ त्ये अ॑ग्ने अ॒र्चयो॒ भ्राज॑न्तो यन्ति धृष्णु॒या। परि॑ज्मानो॒ न वि॒द्युतः॑ स्वा॒नो रथो॒ न वा॑ज॒युः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो जन यथार्थ शिल्पविद्या को जानते हैं, वे सर्वत्र व्याप्त बिजुली के समान विमान आदि वाहनों के सदृश शीघ्रगामी हो और सब प्रकार से धन को प्राप्त होकर बहुत सुख को प्राप्त होते हैं॥५॥

नू नो॑ अग्न ऊ॒तये॑ स॒बाध॑सश्च रा॒तये॑। अ॒स्माका॑सश्च सू॒रयो॒ विश्वा॒ आशा॑स्तरी॒षणि॑॥

वे ही चतुर विद्वान् हैं, जो विमान आदि वाहनों को रच के भूगोल में चारों ओर घुमाते हैं, वे प्रशंसित दानवाले होते हैं॥६॥

त्वं नो॑ अग्ने अङ्गिरः स्तु॒तः स्तवा॑न॒ आ भ॑र। होत॑र्विभ्वा॒सहं॑ र॒यिं स्तो॒तृभ्यः॒ स्तव॑से च न उ॒तैधि॑ पृ॒त्सु नो॑ वृ॒धे॥

विद्यार्थियों को चाहिये कि विद्वानों की इस प्रकार प्रार्थना करें कि हे भगवानो! अर्थात् विद्यारूप ऐश्वर्य्ययुक्त महाशयो! आप लोग हम लोगों को ब्रह्मचर्य्य करा और उत्तम शिक्षा तथा विद्या देके और संग्रामों को जीतकर हम लोगों की निरन्तर वृद्धि करिये॥७॥इस सूक्त में अग्निशब्दार्थ विद्वान् और विद्यार्थी के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह दशवाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

जन॑स्य गो॒पा अ॑जनिष्ट॒ जागृ॑विर॒ग्निः सु॒दक्षः॑ सुवि॒ताय॒ नव्य॑से। घृ॒तप्र॑तीको बृह॒ता दि॑वि॒स्पृशा॑ द्यु॒मद्वि भा॑ति भर॒तेभ्यः॒ शुचिः॑॥

विद्वानों को चाहिये कि अग्नि आदि पदार्थों के गुण अवश्य जानें॥१॥

य॒ज्ञस्य॑ के॒तुं प्र॑थ॒मं पु॒रोहि॑तम॒ग्निं नर॑स्त्रिषध॒स्थे समी॑धिरे। इन्द्रे॑ण दे॒वैः स॒रथं॒ स ब॒र्हिषि॒ सीद॒न्नि होता॑ य॒जथा॑य सु॒क्रतुः॑॥

जो विद्वान् जन विद्या, धर्म और पुरुषार्थ में स्वयं वर्त्ताव करके अन्यों का उसके अनुसार वर्त्ताव कराते हैं, वे ही सब को बोध देनेवाले होते हैं॥२॥

असं॑मृष्टो जायसे मा॒त्रोः शुचि॑र्म॒न्द्रः क॒विरुद॑तिष्ठो वि॒वस्व॑तः। घृ॒तेन॑ त्वावर्धयन्नग्न आहुत धू॒मस्ते॑ के॒तुर॑भवद्दि॒वि श्रि॒तः॥

जो बालक वा कन्या विद्वानों वा पढ़ी हुई स्त्रियों से ब्रह्मचर्य्यपूर्वक विद्या को प्राप्त होकर पवित्र होते, वे संसार को शोभित करनेवाले होते हैं॥३॥

अ॒ग्निर्नो॑ य॒ज्ञमुप॑ वेतु साधु॒याग्निं नरो॒ वि भ॑रन्ते गृ॒हेगृ॑हे। अ॒ग्निर्दू॒तो अ॑भवद्धव्य॒वाह॑नो॒ऽग्निं वृ॑णा॒ना वृ॑णते क॒विक्र॑तुम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो अग्नि के सदृश तेजस्वी, सज्जनों के सदृश उपकार करने और प्रत्येक जन के लिये मङ्गल देनेवाले हैं, वे सर्वदा सत्कार करने योग्य हैं॥४॥

तुभ्ये॒दम॑ग्ने॒ मधु॑मत्तमं॒ वच॒स्तुभ्यं॑ मनी॒षा इ॒यम॑स्तु॒ शं हृ॒दे। त्वां गिरः॒ सिन्धु॑मिवा॒वनी॑र्म॒हीरा पृ॑णन्ति॒ शव॑सा व॒र्धय॑न्ति च॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्यार्थीजनो! जैसे नदियाँ समुद्र को शोभित करती हैं, वैसे ही विद्या और नम्रता से युक्त वाणियाँ आप लोगों को शोभित करें, जिनके प्रताप से आप लोगों के मुखों से सत्य और सब का हितकारक वचन सर्वदा ही निकले॥५॥

त्वाम॑ग्ने॒ अङ्गि॑रसो॒ गुहा॑ हि॒तमन्व॑विन्दञ्छिश्रिया॒णं वने॑वने। य जा॑यसे म॒थ्यमा॑नः॒ सहो॑ म॒हत्त्वामा॑हुः॒ सह॑सस्पु॒त्रम॑ङ्गिरः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे योगी जन संयम अर्थात् इन्द्रियों को अन्य विषयों से रोकने से परमात्मा को प्राप्त होकर नित्य आनन्दित होते हैं, वैसे इसको प्राप्त होकर आप लोग आनन्दित हूजिये॥६॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह ग्यारहवाँ सूक्त और तृतीय वर्ग समाप्त हुआ॥

प्राग्नये॑ बृह॒ते य॒ज्ञिया॑य ऋ॒तस्य॒ वृष्णे॒ असु॑राय॒ मन्म॑। घृ॒तं न य॒ज्ञ आ॒स्ये॒३॒॑ सुपू॑तं॒ गिरं॑ भरे वृष॒भाय॑ प्रती॒चीम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों से जैसे अग्निविद्या के ज्ञान के लिये प्रयत्न किया जाता है, उनको चाहिये कि वैसे ही पृथिवी आदि पदार्थों की विद्या के ज्ञान के लिये प्रयत्न करें॥१॥

ऋ॒तं चि॑कित्व ऋ॒तमिच्चि॑किद्ध्यृ॒तस्य॒ धारा॒ अनु॑ तृन्धि पू॒र्वीः। नाहं या॒तुं सह॑सा॒ न द्व॒येन॑ ऋ॒तं स॑पाम्यरु॒षस्य॒ वृष्णः॑॥

हे मनुष्यो! जैसे विद्वान् जन असत्य का खण्डन करके सत्य को धारण करते हैं और अविद्या का त्याग करके विद्या को धारण करते हैं, वैसे ही आप लोग भी करो॥२॥

कया॑ नो अग्न ऋ॒तय॑न्नृ॒तेन॒ भुवो॒ नवे॑दा उ॒चथ॑स्य॒ नव्यः॑। वेदा॑ मे दे॒व ऋ॑तु॒पा ऋ॑तू॒नां नाहं पतिं॑ सनि॒तुर॒स्य रा॒यः॥

हे मनुष्यो! सत्य के आचरण से ही पृथ्वी का राज्य प्राप्त होता है और पृथ्वी के राज्य और लक्ष्मी से सब को सुख होता है॥३॥

के ते॑ अग्ने रि॒पवे॒ बन्ध॑नासः॒ के पा॒यवः॑ सनिषन्त द्यु॒मन्तः॑। के धा॒सिम॑ग्ने॒ अनृ॑तस्य पान्ति॒ क आस॑तो॒ वच॑सः सन्ति गो॒पाः॥

हे विद्वन्! राजन्! आप को चाहिये कि इस प्रकार का कर्म्म करें, जिससे शत्रुओं का नाश, प्रजा का पालन होवे, यह इस का उत्तर है॥४॥

सखा॑यस्ते॒ विषु॑णा अग्न ए॒ते शि॒वासः॒ सन्तो॒ अशि॑वा अभूवन्। अधू॑र्षत स्व॒यमे॒ते वचो॑भिर्ऋजूय॒ते वृ॑जि॒नानि॑ ब्रु॒वन्तः॑॥

मनुष्यों को यह योग्यता है कि जो मित्रजन शत्रु होवें, वे निरादर करने योग्य हैं और जो शत्रु मित्र होवें, वे सत्कार करने योग्य हैं॥५॥

यस्ते॑ अग्ने॒ नम॑सा य॒ज्ञमीट्ट॑ ऋ॒तं स पा॑त्यरु॒षस्य॒ वृष्णः॑। तस्य॒ क्षयः॑ पृ॒थुरा सा॒धुरे॑तु प्र॒सर्स्रा॑णस्य॒ नहु॑षस्य॒ शेषः॑॥

हे मनुष्यो! जो विद्वानों की सेवा और धर्म की रक्षा करता है, उसके रक्षण को आप लोग करके शेष सुख को प्राप्त हूजिये॥६॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह बारहवाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ॥

अर्च॑न्तस्त्वा हवाम॒हेऽर्च॑न्तः॒ समि॑धीमहि। अग्ने॒ अर्च॑न्त ऊ॒तये॑॥

हे विद्वानो! हम लोग आप लोगों के सत्कार से उत्तम शिक्षा और विद्या को प्राप्त होकर आनन्दित होवें॥१॥

अ॒ग्नेः स्तोमं॑ मनामहे सि॒ध्रम॒द्य दि॑वि॒स्पृशः॑। दे॒वस्य॑ द्रविण॒स्यवः॑॥

जिनकी धन की इच्छा होवे, वे अग्नि आदि पदार्थों के विज्ञान को ग्रहण करें॥२॥

अ॒ग्निर्जु॑षत नो॒ गिरो॒ होता॒ यो मानु॑षे॒ष्वा। स य॑क्ष॒द्दैव्यं॒ जन॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो अग्नि न हो तो कोई भी जीव जिह्वा न चला सके॥३॥

त्वम॑ग्ने स॒प्रथा॑ असि॒ जुष्टो॒ होता॒ वरे॑ण्यः। त्वया॑ य॒ज्ञं वि त॑न्वते॥

मनुष्य लोग यथार्थवक्ता विद्वानों के संग से धर्म्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि करनेवाले यज्ञ का विस्तार करें॥४॥

त्वाम॑ग्ने वाज॒सात॑मं॒ विप्रा॑ वर्धन्ति॒ सुष्टु॑तम्। स नो॑ रास्व सु॒वीर्य॑म्॥

हे मनुष्यो! जो आप लोगों की यथार्थवक्ता विद्वान् जन सब प्रकार से वृद्धि करें तो आप लोगों का अतुल प्रताप बढ़े॥५॥

अग्ने॑ ने॒मिर॒राँ इ॑व दे॒वाँस्त्वं प॑रि॒भूर॑सि। आ राध॑श्चि॒त्रमृ॑ञ्जसे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे अरादिकों से चक्र उत्तम प्रकार शोभित होता है, वैसे ही विद्वानों और उत्तम गुणों से मनुष्य शोभित होते हैं॥६॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह तेरहवाँ सूक्त और पाँचवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒ग्निं स्तोमे॑न बोधय समिधा॒नो अम॑र्त्यम्। ह॒व्या दे॒वेषु॑ नो दधत्॥

हे मनुष्यो! प्रयत्न से अग्नि आदि पदार्थों की विद्या को प्राप्त होओ॥१॥

तम॑ध्व॒रेष्वी॑ळते दे॒वं मर्ता॒ अम॑र्त्यम्। यजि॑ष्ठं॒ मानु॑षे॒ जने॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य अग्नि आदि पदार्थ के सदृश पदार्थविद्या को ग्रहण करते हैं, वे सब प्रकार सुखी होते हैं॥२॥

तं हि शश्व॑न्त॒ ईळ॑ते स्रु॒चा दे॒वं घृ॑त॒श्चुता॑। अ॒ग्निं ह॒व्याय॒ वोळ्ह॑वे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे शिल्पीजन अग्नि आदि तत्त्वों की विद्या को प्राप्त होकर और अनेक कार्य्यों को सिद्ध करके प्रयोजनों को सिद्ध करते हैं, वैसे मनुष्य परमात्मा को यथावत् जान के अपनी इच्छाओं को सिद्ध करें॥३॥

अ॒ग्निर्जा॒तो अ॑रोचत॒ घ्नन्दस्यू॒ञ्ज्योति॑षा॒ तमः॑। अवि॑न्द॒द्गा अ॒पः स्वः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि अन्धकार का निवारण करके प्रकाशित होता है, वैसे राजा दुष्ट चोरों का निवारण करके विशेष शोभित होवें॥४॥

अ॒ग्निमी॒ळेन्यं॑ क॒विं घृ॒तपृ॑ष्ठं सपर्यत। वेतु॑ मे शृ॒णव॒द्धव॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य अग्नि आदि पदार्थों की विद्या का अभ्यास करें, वे निरन्तर सुख को सेवें॥५॥

अ॒ग्निं घृ॒तेन॑ वावृधुः॒ स्तोमे॑भिर्वि॒श्वच॑र्षणिम्। स्वा॒धीभि॑र्वच॒स्युभिः॑॥

जैसे ईंधन आदि से अग्नि बढ़ता है, वैसे ही सत्सङ्ग से विज्ञान बढ़ता है॥६॥इस सूक्त में अग्नि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चतुर्दश सूक्त और पञ्चम मण्डल में प्रथम अनुवाक और छठा वर्ग समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

प्र वे॒धसे॑ क॒वये॒ वेद्या॑य॒ गिरं॑ भरे य॒शसे॑ पू॒र्व्याय॑। घृ॒तप्र॑सत्तो॒ असु॑रः सु॒शेवो॑ रा॒यो ध॒र्ता ध॒रुणो॒ वस्वो॑ अ॒ग्निः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो! जो अग्नि आदि पदार्थों की विद्या असाधारण अर्थात् विलक्षण है, उसको उत्तम लक्षणवाले बुद्धिमान् विद्यार्थियों के लिये ग्रहण कराइये॥१॥

ऋ॒तेन॑ ऋ॒तं ध॒रुणं॑ धारयन्त य॒ज्ञस्य॑ शा॒के प॑र॒मे व्यो॑मन्। दि॒वो धर्म॑न्ध॒रुणे॑ से॒दुषो॒ नॄञ्जा॒तैरजा॑ताँ अ॒भि ये न॑न॒क्षुः॥

वे ही मनुष्य विद्वान् हैं, जो पूर्व और आगे वर्त्तमान विद्वानों को मिलकर परमेश्वर, प्रकृति और जीव के कार्य्य की विद्या को जानते हैं॥२॥

अं॒हो॒युव॑स्त॒न्व॑स्तन्वते॒ वि वयो॑ म॒हद्दु॒ष्टरं॑ पू॒र्व्याय॑। स सं॒वतो॒ नव॑जातस्तुतुर्यात्सिं॒हं न क्रु॒द्धम॒भितः॒ परि॑ ष्ठुः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य पाप को दूर करके धर्म का आचरण करते हैं, वे शरीर और आत्मा के सुख और जीवन की वृद्धि कराते हैं। और जैसे क्रुद्ध सिंह प्राप्त हुए प्राणियों का नाश करता है, वैसे प्राप्त हुए दुर्गुणों का सब जन नाश करें॥३॥

मा॒तेव॒ यद्भर॑से पप्रथा॒नो जनं॑जनं॒ धाय॑से॒ चक्ष॑से च। वयो॑वयो जरसे॒ यद्दधा॑नः॒ परि॒ त्मना॒ विषु॑रूपो जिगासि॥

जो विद्वान् जन माता के सदृश विद्यार्थियों की रक्षा करते, सब की उन्नति करने की इच्छा करते और ब्रह्मचर्य तथा अवस्था के बढ़ने में कारणरूप कार्य्यों का उपदेश करते हैं, वे संसार के आदर करने योग्य होते हैं॥४॥

वाजो॒ नु ते॒ शव॑सस्पा॒त्वन्त॑मु॒रुं दोधं॑ ध॒रुणं॑ देव रा॒यः। प॒दं न ता॒युर्गुहा॒ दधा॑नो म॒हो रा॒ये चि॒तय॒न्नत्रि॑मस्पः॥

हे मनुष्यो! जैसे चोर, चोर के पाद के चिह्न को ढूँढ के ग्रहण करता है, वैसे ही आत्माओं में सत्य को धारण कर और कामना की पूर्ति करके सब को प्रसन्न करें॥५॥इस सूक्त में विद्वान् और अग्नि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पन्द्रहवाँ सूक्त और सप्तम वर्ग समाप्त हुआ॥

बृ॒हद्वयो॒ हि भा॒नवेऽर्चा॑ दे॒वाया॒ग्नये॑। यं मि॒त्रं न प्रश॑स्तिभि॒र्मर्ता॑सो दधि॒रे पु॒रः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे मित्र, मित्र को धारण करके सुख की वृद्धि को प्राप्त होता है, वैसे ही अग्नि आदि पदार्थों की विद्या को प्राप्त होकर विद्वान् जन आनन्द से वृद्धि को प्राप्त होते हैं॥१॥

स हि द्युभि॒र्जना॑नां॒ होता॒ दक्ष॑स्य बा॒ह्वोः। वि ह॒व्यम॒ग्निरा॑नु॒षग्भगो॒ न वार॑मृण्वति॥

जो विद्वान् जन अपने आत्मा के सदृश सब मनुष्यों को जान और विद्या को प्राप्त करा के उन्नति करने की इच्छा करते हैं, वे ही भाग्यशाली वर्तमान हैं॥२॥

अ॒स्य स्तोमे॑ म॒घोनः॑ स॒ख्ये वृ॒द्धशो॑चिषः। विश्वा॒ यस्मि॑न्तुवि॒ष्वणि॒ सम॒र्ये शुष्म॑माद॒धुः॥

जो मित्र होकर शरीर और आत्मा के बल को धारण करके प्रयत्न करते हैं, वे सङ्ग्रामादिकों में विजय को प्राप्त होकर प्रशंसित लक्ष्मीवान् होते हैं॥३॥

अधा॒ ह्य॑ग्न एषां सु॒वीर्य॑स्य मं॒हना॑। तमिद्य॒ह्वं न रोद॑सी॒ परि॒ श्रवो॑ बभूवतुः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो बड़ी, उत्तम प्रकार शिक्षित सेना को प्राप्त होते हैं, उनके ही राज्य का ऐश्वर्य बढ़ता है॥४॥

नू न॒ एहि॒ वार्य॒मग्ने॑ गृणा॒न आ भ॑र। ये व॒यं ये च॑ सू॒रयः॑ स्व॒स्ति धाम॑हे॒ सचो॒तैधि॑ पृ॒त्सु नो॑ वृ॒धे॥

जो मनुष्यों के लिये निरन्तर सुख देते हैं, उनके साथ मनुष्य सदा उन्नति करें॥५॥इस सूक्त में बिजुली का विषय संग्रामविजय और राज्यैश्वर्य के वर्द्धन का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सोलहवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ य॒ज्ञैर्दे॑व॒ मर्त्य॑ इ॒त्था तव्यां॑समू॒तये॑। अ॒ग्निं कृ॒ते स्व॑ध्व॒रे पू॒रुरी॑ळी॒ताव॑से॥

जो विद्वानों के सङ्ग में प्रीति करनेवाले मनुष्य अग्नि आदि पदार्थों की विद्या को प्राप्त हो कर श्रेष्ठ कर्म को करते हैं, वे सब प्रकार से रक्षित होते हैं॥१॥

अस्य॒ हि स्वय॑शस्तर आ॒सा वि॑धर्म॒न्मन्य॑से। तं नाकं॑ चि॒त्रशो॑चिषं म॒न्द्रं प॒रो म॑नी॒षया॑॥

हे विद्वन्! आप सदा ही धर्म्मयुक्त यश को बढ़ानेवाले कर्म्म को करें, जिससे अत्यन्त सुख को प्राप्त होवें॥२॥

अ॒स्य वासा उ॑ अ॒र्चिषा॒ य आयु॑क्त तु॒जा गि॒रा। दि॒वो न यस्य॒ रेत॑सा बृ॒हच्छोच॑न्त्य॒र्चयः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जिन विद्वानों के सूर्य्य के प्रकाश के सदृश विद्या यशः और कीर्ति विलास को प्राप्त होते हैं, वे ही बड़े विज्ञान को उत्पन्न करते हैं॥३॥

अ॒स्य क्रत्वा॒ विचे॑तसो द॒स्मस्य॒ वसु॒ रथ॒ आ। अधा॒ विश्वा॑सु॒ हव्यो॒ऽग्निर्वि॒क्षु प्र श॑स्यते॥

जैसे प्रजा में अग्नि विराजता है, वैसे ही विद्या और विनय से युक्त बुद्धिमान् पुरुष शोभित होते हैं॥४॥

नू न॒ इद्धि वार्य॑मा॒सा स॑चन्त सू॒रयः॑। ऊर्जो॑ नपाद॒भिष्ट॑ये पा॒हि श॒ग्धि स्व॒स्तय॑ उ॒तैधि॑ पृ॒त्सु नो॑ वृ॒धे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य विद्वानों के अनुकरण को करें तो उत्तम गुणों की प्राप्ति, बल की वृद्धि और सुखपूर्वक विजय को करते हैं॥५॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सत्रहवाँ सूक्त और नववाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्रा॒तर॒ग्निः पु॑रुप्रि॒यो वि॒शः स्त॑वे॒ताति॑थिः। विश्वा॑नि॒ यो अम॑र्त्यो ह॒व्या मर्ते॑षु॒ रण्य॑ति॥

हे मनुष्यो! जो अतिथि आत्मा का जाननेवाला, सत्य का उपदेशक, विद्वान्, विद्वानों का प्रिय, परमात्मा के सदृश सब के हित को चाहनेवाला नित्य क्रीड़ा करता है, वह ही सत्कार करने योग्य है॥१॥

द्वि॒ताय॑ मृ॒क्तवा॑हसे॒ स्वस्य॒ दक्ष॑स्य मं॒हना॑। इन्दुं॒ स ध॑त्त आनु॒षक्स्तो॒ता चि॑त्ते अमर्त्य॥

जो मनुष्य यथार्थवक्ता अतिथियों का सत्कार करते हैं, वे सत्य विज्ञान को प्राप्त हो कर सर्वदा आनन्दित होते हैं॥२॥

तं वो॑ दी॒र्घायु॑शोचिषं गि॒रा हु॑वे म॒घोना॑म्। अरि॑ष्टो॒ येषां॒ रथो॒ व्य॑श्वदाव॒न्नीय॑ते॥

जो अहिंसादि धर्म से युक्त मनुष्य अतिकालपर्य्यन्त जीवनेवाले धार्मिक अतिथियों की सेवा करते हैं, वे भी दीर्घायु और लक्ष्मीवान् होकर आनन्दित होते हैं॥३॥

चि॒त्रा वा॒ येषु॒ दीधि॑तिरा॒सन्नु॒क्था पान्ति॒ ये। स्ती॒र्णं ब॒र्हिः स्व॑र्णरे॒ श्रवां॑सि दधिरे॒ परि॑॥

जो विद्या के उत्तम गुणों से पूर्ण, सब के हित चाहनेवाले, पुरुषार्थी अर्थात् उत्साही और पक्षपात से रहित अतिथिजन उपदेश से सब की रक्षा करते हैं, वे संसार के कल्याण करनेवाले होते हैं॥४॥

ये मे॑ पञ्चा॒शतं॑ द॒दुरश्वा॑नां स॒धस्तु॑ति। द्यु॒मद॑ग्ने॒ महि॒ श्रवो॑ बृ॒हत्कृ॑धि म॒घोनां॑ नृ॒वद॑मृत नृ॒णाम्॥

हे मनुष्यो! जो अतिथिजन पदार्थविद्या को देवें, उनका सत्कार यथायोग्य करो॥५॥इस सूक्त में अग्निवत् अतिथि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह अठारहवाँ सूक्त और दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒भ्य॑व॒स्थाः प्र जा॑यन्ते॒ प्र व॒व्रेर्व॒व्रिश्चि॑केत। उ॒पस्थे॑ मा॒तुर्वि च॑ष्टे॥

ऐसा नहीं कोई भी प्राणी है कि जिसकी उत्तम, मध्यम और अधम दशायें न होवें और जो माता पिता और आचार्य से शिक्षित है, वही अपनी दशाओं को सुधार सकता है॥१॥

जु॒हु॒रे वि चि॒तय॒न्तोऽनि॑मिषं नृ॒म्णं पा॑न्ति। आ दृ॒ळ्हां पुरं॑ विविशुः॥

जो सरल स्वभाववाले और सत्य के बोधक प्रतिक्षण पुरुषार्थ करते हैं, वे राज्य और ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं॥२॥

आ श्वै॑त्रे॒यस्य॑ ज॒न्तवो॑ द्यु॒मद्व॑र्धन्त कृ॒ष्टयः॑। नि॒ष्कग्री॑वो बृ॒हदु॑क्थ ए॒ना मध्वा॒ न वा॑ज॒युः॥

हे मनुष्यो! इस संसार में जितने पदार्थ हैं, वे सब जल ही से होते हैं अर्थात् सब का बीज जल ही है, ऐसा जान कर सब सुखों को प्राप्त होओ॥३॥

प्रि॒यं दु॒ग्धं न काम्य॒मजा॑मि जा॒म्योः सचा॑। घ॒र्मो न वाज॑जठ॒रोऽद॑ब्धः॒ शश्व॑तो॒ दभः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सूर्य्य के प्रकाश के सदृश विद्या से व्याप्त, दुग्ध के सदृश प्रिय वचनवाले और धर्म्म की कामना करते हुए जन हैं, वे पृथ्वी के सदृश सब के रक्षक होते हैं॥४॥

क्रीळ॑न्नो रश्म॒ आ भु॑वः॒ सं भस्म॑ना वा॒युना॒ वेवि॑दानः। ता अ॑स्य सन्धृ॒षजो॒ न ति॒ग्माः सुसं॑शिता व॒क्ष्यो॑ वक्षणे॒स्थाः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे विद्वानो! जैसे सूर्य की किरणें सर्वत्र फैली हुई सब को सुख देती हैं, वैसे ही सब स्थानों में भ्रमण तथा उपदेश करते हुए आप सब को आनन्द दीजिये॥५॥इस सूक्त में विद्वानों के सिद्ध करने योग्य उपदेश विषय का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह उन्नीसवाँ सूक्त और ग्यारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

यम॑ग्ने वाजसातम॒ त्वं चि॒न्मन्य॑से र॒यिम्। तं नो॑ गी॒र्भिः श्र॒वाय्यं॑ देव॒त्रा प॑नया॒ युज॑म्॥

यही धर्मयुक्त व्यवहार है कि जैसे इच्छा अपने लिये होती है, वैसे ही दूसरे के लिये करे और जैसे प्राणी अपने लिये दुःख की नहीं इच्छा करते हैं और सुख की प्रार्थना करते हैं, वैसे ही अन्य के लिये भी उनको वर्त्ताव करना चाहिये॥१॥

ये अ॑ग्ने॒ नेरय॑न्ति ते वृ॒द्धा उ॒ग्रस्य॒ शव॑सः। अप॒ द्वेषो॒ अप॒ ह्वरो॒ऽन्यव्र॑तस्य सश्चिरे॥

वे ही वृद्ध हैं, जो सत्य बोलते और सब का उपकार करके अपने सदृश सुख देते और कभी धर्म्म से विरुद्ध आचरण नहीं करते हैं॥२॥

होता॑रं त्वा वृणीम॒हेऽग्ने॒ दक्ष॑स्य॒ साध॑नम्। य॒ज्ञेषु॑ पू॒र्व्यं गि॒रा प्रय॑स्वन्तो हवामहे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मनुष्य परोपकारी का प्रीति से बहुत आदर करते हैं, वैसे ही विद्वान् जनों से सब उत्तम कर्म्म किये जाते हैं॥३॥

इ॒त्था यथा॑ त ऊ॒तये॒ सह॑सावन्दि॒वेदि॑वे। रा॒य ऋ॒ताय॑ सुक्रतो॒ गोभिः॑ ष्याम सध॒मादो॑ वी॒रैः स्या॑म सध॒मादः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो साहस से पुरुषार्थ करते हुए वीर जनों की सेना को ग्रहण करके ऐश्वर्य्य की प्राप्ति के लिये प्रयत्न करते हैं, वे ही सुखी होते हैं॥४॥इस सूक्त में अग्नि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह बीसवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

म॒नु॒ष्वत्त्वा॒ नि धी॑महि मनु॒ष्वत्समि॑धीमहि। अग्ने॑ मनु॒ष्वद॑ङ्गिरो दे॒वान्दे॑वय॒ते य॑ज॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य विचारशील होकर श्रेष्ठ गुणों की कामना करते हैं, वे अग्नि आदि पदार्थों की विद्या को जानें॥१॥

त्वं हि मानु॑षे॒ जनेऽग्ने॒ सुप्री॑त इ॒ध्यसे॑। स्रुच॑स्त्वा यन्त्यानु॒षक्सुजा॑त॒ सर्पि॑रासुते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! आप लोग जैसे अग्नि इन्धन और घृत आदिकों को प्राप्त होकर वृद्धि को प्राप्त होता है, वैसे ही विद्या और उत्तम गुणों को प्राप्त होकर निरन्तर वृद्धि को प्राप्त हूजिये॥२॥

त्वां विश्वे॑ स॒जोष॑सो दे॒वासो॑ दू॒तम॑क्रत। स॒प॒र्यन्त॑स्त्वा कवे य॒ज्ञेषु॑ दे॒वमी॑ळते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो जन अग्नि से दूतकर्म अर्थात् नौकर के सदृश काम कराते हैं, वे सब स्थानों में प्रशंसित ऐश्वर्य्यवाले होते हैं॥३॥

दे॒वं वो॑ देवय॒ज्यया॒ग्निमी॑ळीत॒ मर्त्यः॑। समि॑द्धः शुक्र दीदिह्यृ॒तस्य॒ योनि॒मास॑दः स॒सस्य॒ योनि॒मास॑दः॥

जो मनुष्य विद्वानों के सङ्ग से कार्य्य और कारणस्वरूप सृष्टि अर्थात् सत्त्व, रज और तमोगुण को साम्यावस्थारूप प्रधान को जान के कार्य को सिद्ध करते हैं, वे सृष्टि के क्रम को जान के दुःख को कभी नहीं प्राप्त होते हैं॥४॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह इक्कीसवाँ सूक्त और त्रयोदशवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र वि॑श्वसामन्नत्रि॒वदर्चा॑ पाव॒कशो॑चिषे। यो अ॑ध्व॒रेष्वीड्यो॒ होता॑ म॒न्द्रत॑मो वि॒शि॥

मनुष्यों को चाहिये कि धार्मिक जनों का ही सत्कार करें, अन्य जनों का नहीं॥१॥

न्य१॒॑ग्निं जा॒तवे॑दसं॒ दधा॑ता दे॒वमृ॒त्विज॑म्। प्र य॒ज्ञ ए॑त्वानु॒षग॒द्या दे॒वव्य॑चस्तमः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे यज्ञ करनेवाले यज्ञ को पूर्ण करते हैं, वैसे ही अग्नि शिल्पविद्या के कृत्य की सिद्धि को पूर्ण करता है॥२॥

चि॒कि॒त्विन्म॑नसं त्वा दे॒वं मर्ता॑स ऊ॒तये॑। वरे॑ण्यस्य॒ तेऽव॑स इया॒नासो॑ अमन्महि॥

मनुष्यों को चाहिये कि सदा ही विद्वानों के सङ्ग से पदार्थविद्या का खोज करें॥३॥

अग्ने॑ चिकि॒द्ध्य१॒॑स्य न॑ इ॒दं वचः॑ सहस्य। तं त्वा॑ सुशिप्र दम्पते॒ स्तोमै॑र्वर्ध॒न्त्यत्र॑यो गी॒र्भिः शु॑म्भ॒न्त्यत्र॑यः॥

जैसे पुरुषार्थी मनुष्य सबकी वृद्धि करते हैं और उपदेशक जन सब जनों को पवित्र करते हैं, वैसे ही सब मनुष्य आचरण करें॥४॥इस सूक्त में अग्नि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह बाईसवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अग्ने॒ सह॑न्त॒मा भ॑र द्यु॒म्नस्य॑ प्रा॒सहा॑ र॒यिम्। विश्वा॒ यश्च॑र्ष॒णीर॒भ्या॒३॒॑सा वाजे॑षु सा॒सह॑त्॥

जिसकी विजय की इच्छा होवे, यह शूरवीरों की सेना उत्तम प्रकार शिक्षा की गई रक्खे और वीररस के उपदेश से उत्साह दिलाकर शत्रुओं के साथ लड़ावे॥१॥

तम॑ग्ने पृतना॒षहं॑ र॒यिं स॑हस्व॒ आ भ॑र। त्वं हि स॒त्यो अद्भु॑तो दा॒ता वाज॑स्य॒ गोम॑तः॥

जो राजा सत्यवादी विद्वानों और विचित्र विद्यायुक्त दृढ़ और उदार अर्थात् उत्तम आशययुक्त शूरवीरों का धारण पोषण करे, वही विजय और लक्ष्मी को प्राप्त होवे॥२॥

विश्वे॒ हि त्वा॑ स॒जोष॑सो॒ जना॑सो वृ॒क्तब॑र्हिषः। होता॑रं॒ सद्म॑सु प्रि॒यं व्यन्ति॒ वार्या॑ पु॒रु॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! जो राज्य की उन्नति में प्रीति करनेवाले और धर्म्मिष्ठ भृत्य आपको प्राप्त होवें, उन सबका सत्कार करके निरन्तर रक्षा करो॥३॥

स हि ष्मा॑ वि॒श्वच॑र्षणिर॒भिमा॑ति॒ सहो॑ द॒धे। अग्न॑ ए॒षु क्षये॒ष्वा रे॒वन्नः॑ शुक्र दीदिहि द्यु॒मत्पा॑वक दीदिहि॥

जो मनुष्य पूर्ण शरीर और आत्मा के बल को धारण करते हैं, वे सब के लिये सुख दे सकते हैं॥४॥इस सूक्त में अग्नि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह तेईसवाँ सूक्त और पन्द्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अग्ने॒ त्वं नो॒ अन्त॑म उ॒त त्रा॒ता शि॒वो भ॑वा वरू॒थ्यः॑॥वसु॑र॒ग्निर्वसु॑श्रवा॒ अच्छा॑ नक्षि द्यु॒मत्त॑मं र॒यिं दाः॑॥

हे राजन्! जैसे परमात्मा सब में अभिव्याप्त सबका रक्षक और सबके लिये मङ्गलदाता, सब पदार्थों का दाता और सुखकारी है, वैसे ही राजा को होना चाहिये॥१॥

अग्ने॒ त्वं नो॒ अन्त॑म उ॒त त्रा॒ता शि॒वो भ॑वा वरू॒थ्यः॑॥वसु॑र॒ग्निर्वसु॑श्रवा॒ अच्छा॑ नक्षि द्यु॒मत्त॑मं र॒यिं दाः॑॥

हे राजन्! जैसे परमात्मा सब में अभिव्याप्त सबका रक्षक और सबके लिये मङ्गलदाता, सब पदार्थों का दाता और सुखकारी है, वैसे ही राजा को होना चाहिये॥२॥

स नो॑ बोधि श्रु॒धी हव॑मुरु॒ष्या णो॑ अघाय॒तः स॑मस्मात्॥तं त्वा॑ शोचिष्ठ दीदिवः सु॒म्नाय॑ नू॒नमी॑महे॒ सखि॑भ्यः॥

सब प्रजा और राजजनों को चाहिये कि राजा के प्रति यह कहें कि आप सब अपराधों से स्वयं पृथक् हो के और हम लोगों की रक्षा करके विद्या का प्रचार और धार्मिक मित्रों के लिये सुख की वृद्धि करके दुष्टों को निरन्तर दण्ड दीजिये॥३॥

स नो॑ बोधि श्रु॒धी हव॑मुरु॒ष्या णो॑ अघाय॒तः स॑मस्मात्॥तं त्वा॑ शोचिष्ठ दीदिवः सु॒म्नाय॑ नू॒नमी॑महे॒ सखि॑भ्यः॥

सब प्रजा और राजजनों को चाहिये कि राजा के प्रति यह कहें कि आप सब अपराधों से स्वयं पृथक् हो के और हम लोगों की रक्षा करके विद्या का प्रचार और धार्मिक मित्रों के लिये सुख की वृद्धि करके दुष्टों को निरन्तर दण्ड दीजिये॥४॥इस सूक्त में अग्निपदवाच्य ईश्वर अर्थात् राजा और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चौबीसवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अच्छा॑ वो अ॒ग्निमव॑से दे॒वं गा॑सि॒ स नो॒ वसुः॑। रास॑त्पु॒त्र ऋ॑षू॒णामृ॒तावा॑ पर्षति द्वि॒षः॥

जैसे विद्वानों का श्रेष्ठ पुत्र विद्वान् होकर तथा लोभ आदि दोषों का त्याग करके पितृ आदिकों को सुख देता है, वैसे ही अग्नि उत्तम प्रकार सिद्धि किया गया सबको सुख देता है॥१॥

स हि स॒त्यो यं पूर्वे॑ चिद्दे॒वास॑श्चि॒द्यमी॑धि॒रे। होता॑रं म॒न्द्रजि॑ह्व॒मित्सु॑दी॒तिभि॑र्वि॒भाव॑सुम्॥

जिस राजा का यथार्थवक्ता जन सत्कार करें, वही निरन्तर राज्य की रक्षा और वृद्धि करने को योग्य हो॥२॥

स नो॑ धी॒ती वरि॑ष्ठया॒ श्रेष्ठ॑या च सुम॒त्या। अग्ने॑ रा॒यो दि॑दीहि नः सुवृ॒क्तिभि॑र्वरेण्य॥

जो उत्तम बुद्धि की इच्छा करते वा उत्तम बुद्धि को अन्य जनों के लिये देते हैं, वे ही सब लोगों से सत्कार करने योग्य हैं॥३॥

अ॒ग्निर्दे॒वेषु॑ राजत्य॒ग्निर्मर्ते॑ष्वावि॒शन्। अ॒ग्निर्नो॑ हव्य॒वाह॑नो॒ऽग्निं धी॒भिः स॑पर्यत॥

हे विद्वानो! जो अनेक प्रकार का अग्नि आप लोगों से जाना जाये अर्थात् अनेक प्रकार के अग्नि का आप लोगों को परिज्ञान हो तो क्या-क्या सुख न पाया जाये॥४॥

अ॒ग्निस्तु॒विश्र॑वस्तमं तु॒विब्र॑ह्माणमुत्त॒मम्। अ॒तूर्तं॑ श्राव॒यत्प॑तिं पु॒त्रं द॑दाति दा॒शुषे॑॥

हे मनुष्यो! उन लोगों का ही आप लोग सत्कार करो, जो सबको विद्वान् और धार्मिक करते हैं॥५॥

अ॒ग्निर्द॑दाति॒ सत्प॑तिं सा॒साह॒ यो यु॒धा नृभिः॑। अ॒ग्निरत्यं॑ रघु॒ष्यदं॒ जेता॑र॒मप॑राजितम्॥

हे विद्वानो! जैसे ईश्वर धर्मिष्ठ जनों के लिये धर्म्मात्मा राजा को देता है और जैसे उत्तम सेना विद्वान् शूरवीर और धर्म्मात्मा सेनाध्यक्ष को प्राप्त होकर शत्रुओं को जीतती है, वैसे ही वह सब लोगों को आदर करने योग्य है॥६॥

यद्वाहि॑ष्ठं॒ तद॒ग्नये॑ बृ॒हद॑र्च विभावसो। महि॑षीव॒ त्वद्र॒यिस्त्वद्वाजा॒ उदी॑रते॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पतिव्रता रानी अपने पति का निरन्तर सत्कार करती और उससे उत्पन्न हुए अत्यन्त सुख को प्राप्त होती है, वैसे ही मनुष्य विद्वानों का आदर करके उनसे उत्पन्न हुई अर्थात् उनके सम्बन्ध से प्रकट हुई बुद्धि को प्राप्त होकर निरन्तर सुखी हो॥७॥

तव॑ द्यु॒मन्तो॑ अ॒र्चयो॒ ग्रावे॑वोच्यते बृ॒हत्। उ॒तो ते॑ तन्य॒तुर्य॑था स्वा॒नो अ॑र्त॒ त्मना॑ दि॒वः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मेघ के सदृश गम्भीर शब्द से गूढ़ अर्थों के उपदेश देते और बिजुली के सदृश पुरुषार्थ करते हैं, वे सम्पूर्ण सुखों को प्राप्त होते हैं॥८॥

ए॒वाँ अ॒ग्निं व॑सू॒यवः॑ सहसा॒नं व॑वन्दिम। स नो॒ विश्वा॒ अति॒ द्विषः॒ पर्ष॑न्ना॒वेव॑ सु॒क्रतुः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे बड़ी नौका से समुद्र आदि के पार सुखपूर्वक जाते हैं, वैसे ही विद्वानों के सङ्ग से सब दोषों से साधारणापन से दूर को प्राप्त होते हैं॥९॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पच्चीसवाँ सूक्त और अठारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अग्ने॑ पावक रो॒चिषा॑ म॒न्द्रया॑ देव जि॒ह्वया॑। आ दे॒वान्व॑क्षि॒ यक्षि॑ च॥

जो प्रीति से सत्य उपदेशों को कर और विद्वान् तथा श्रेष्ठ गुणों को प्राप्त होकर अन्यों को प्राप्त कराते हैं, वे ही आदर करने योग्य होते हैं॥१॥

तं त्वा॑ घृतस्नवीमहे॒ चित्र॑भानो स्व॒र्दृश॑म्। दे॒वाँ आ वी॒तये॑ वह॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो बहुत उत्तम गुणयुक्त अग्नि को मनुष्य विशेष करके जानें तो बहुत सुख को प्राप्त हों॥२॥

वी॒तिहो॑त्रं त्वा कवे द्यु॒मन्तं॒ समि॑धीमहि। अग्ने॑ बृ॒हन्त॑मध्व॒रे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि शिल्पविद्या की सिद्धि के लिये अग्नि का सम्प्रयोग अवश्य करें॥३॥

अग्ने॒ विश्वे॑भि॒रा ग॑हि दे॒वेभि॑र्ह॒व्यदा॑तये। होता॑रं त्वा वृणीमहे॥

मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों का सत्कार कर उन्हें बुलावें और विद्वान् जन भी विद्वानों के साथ प्राप्त होकर निरन्तर सत्य का उपदेश करें॥४॥

यज॑मानाय सुन्व॒त आग्ने॑ सु॒वीर्यं॑ वह। दे॒वैरा स॑त्सि ब॒र्हिषि॑॥

हे मनुष्यो! पालन करनेवाले जन के लिये आप लोग सुख सदा ही दीजिये और सब [प्रजा] की सभा से सब व्यवहारों का निश्चय कीजिये॥५॥

स॒मि॒धा॒नः स॑हस्रजि॒दग्ने॒ धर्मा॑णि पुष्यसि। दे॒वानां॑ दू॒त उ॒क्थ्यः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्य विद्या से अग्नि के गुणों को जान के कार्य्य की सिद्धि के लिये जिस अग्नि का सम्प्रयोग करते हैं, वह अग्नि मनुष्य के तुल्य कार्य्य की सिद्धि को करता है॥६॥

न्य१॒॑ग्निं जा॒तवे॑दसं होत्र॒वाहं॒ यवि॑ष्ठ्यम्। दधा॑ता दे॒वमृ॒त्विज॑म्॥

जैसे शिल्पविद्या के जाननेवाले जन अपने कार्य्य को सिद्ध करते हैं, वैसे ही अग्नि आदि भी कार्य की सिद्धि करते हैं॥७॥

प्र य॒ज्ञ ए॑त्वानु॒षग॒द्या दे॒वव्य॑चस्तमः। स्तृ॒णी॒त ब॒र्हिरा॒सदे॑॥

जो मनुष्य श्रेष्ठों की सङ्गति करके शिल्पविद्या की उन्नति करते हैं, वे सबके हितैषी होते हैं॥८॥

एदं म॒रुतो॑ अ॒श्विना॑ मि॒त्रः सी॑दन्तु॒ वरु॑णः। दे॒वासः॒ सर्व॑या वि॒शा॥

राजा और श्रेष्ठ जन न्यायासन पर विराज के अन्याय और पक्षपात का त्याग और न्याय करके प्रजाओं के प्रिय होवें॥९॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह छब्बीसवाँ सूक्त और बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अन॑स्वन्ता॒ सत्प॑तिर्मामहे मे॒ गावा॒ चेति॑ष्ठो॒ असु॑रो म॒घोनः॑। त्रै॒वृ॒ष्णो अ॑ग्ने द॒शभिः॑ स॒हस्रै॒र्वैश्वा॑नर॒ त्र्य॑रुणश्चिकेत॥

जो पुरुष शकट आदि वाहनों के चलाने में चतुर और अनेक सहस्रों पुरुषों के साथ मेल करते हैं, वे धन-धान्य और पशुओं से युक्त होते हैं॥१॥

यो मे॑ श॒ता च॑ विंश॒तिं च॒ गोनां॒ हरी॑ च यु॒क्ता सु॒धुरा॒ ददा॑ति। वैश्वा॑नर॒ सुष्टु॑तो वावृधा॒नोऽग्ने॒ यच्छ॒ त्र्य॑रुणाय॒ शर्म॑॥

हे मनुष्यो! जो गौ, घोड़ा और हस्ति आदि पशुओं के पालन करनेवाले होवें, उनके लिये यथायोग्य मासिक [वृत्ति] दीजिये॥२॥

ए॒वा ते॑ अग्ने सुम॒तिं च॑का॒नो नवि॑ष्ठाय नव॒मं त्र॒सद॑स्युः। यो मे॒ गिर॑स्तुविजा॒तस्य॑ पू॒र्वीर्यु॒क्तेना॒भि त्र्य॑रुणो गृ॒णाति॑॥

हे विद्वन्! आप और मैं जो हमारे समीप से गुणों के ग्रहण करने की इच्छा करता है, उसको हम दोनों विद्याग्रहण करावें॥३॥

यो म॒ इति॑ प्र॒वोच॒त्यश्व॑मेधाय सू॒रये॑। दद॑दृ॒चा स॒निं य॒ते दद॑न्मे॒धामृ॑ताय॒ते॥

उपदेशक जन जब अन्य जनों के प्रति उपदेश देवें, तब इस प्रकार वेद और शास्त्रों में कहे और यथार्थवक्ताओं से आचरण किये गये इस विषय का हम आप लोगों के लिये उपदेश देवें, इस प्रकार प्रत्युपदेश कहें॥४॥

यस्य॑ मा परु॒षाः श॒तमु॑द्ध॒र्षय॑न्त्यु॒क्षणः॑। अश्व॑मेधस्य॒ दानाः॒ सोमा॑इव॒ त्र्या॑शिरः॥

जो विद्या की इच्छा करें, वे सबकी मर्म्म भेदनेवाली वाणियों को सहें और चन्द्रमा के सदृश शान्त होके विद्या और विनय को ग्रहण करें॥५॥

इन्द्रा॑ग्नी शत॒दाव्न्यश्व॑मेधे सु॒वीर्य॑म्। क्ष॒त्रं धा॑रयतं बृ॒हद्दि॒वि सूर्य॑मिवा॒जर॑म्॥

हे राजा आदि जनो! प्रयत्न से आप लोग यथार्थवक्ता, बहुत अध्यापक और उपदेशकों को अपने और दूसरे के राज्य में प्रचार कराइये जिससे आप लोगों का राज्य नाशरहित होवे॥६॥इस सूक्त में अग्नि विद्वान् और राजा के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सत्ताईसवाँ सूक्त और इक्कीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

समि॑द्धो अ॒ग्निर्दि॒वि शो॒चिर॑श्रेत्प्र॒त्यङ्ङु॒षस॑मुर्वि॒या वि भा॑ति। एति॒ प्राची॑ वि॒श्ववा॑रा॒ नमो॑भिर्दे॒वाँ ईळा॑ना ह॒विषा॑ घृ॒ताची॑॥

हे मनुष्यो! जो यह सूर्य्य देख पड़ता है, वह अनेक तत्त्वों के द्वारा ईश्वर से बनाया गया और बिजुली के आश्रित है और जिसके प्रभाव से पूर्व आदि दिशायें विभक्त की जाती हैं और रात्रियाँ होती हैं, उस अग्निरूप सूर्य को जान के सम्पूर्ण कृत्य सिद्ध करो॥१॥

स॒मि॒ध्यमा॑नो अ॒मृत॑स्य राजसि ह॒विष्कृ॒ण्वन्तं॑ सचसे स्व॒स्तये॑। विश्वं॒ स ध॑त्ते॒ द्रवि॑णं॒ यमिन्व॑स्याति॒थ्यम॑ग्ने॒ नि च॑ धत्त॒ इत्पु॒रः॥

हे विद्वान् जनो! आप लोग विद्या और विनय से प्रकाशमान अतिथियों की दशा को धारण किये हुए सब स्थानों में भ्रमण करके सम्पूर्ण जनों के लिये सत्य का उपदेश देते हुए यश को निरन्तर पसारिये॥२॥

अग्ने॒ शर्ध॑ मह॒ते सौभ॑गाय॒ तव॑ द्यु॒म्नान्यु॑त्त॒मानि॑ सन्तु। सं जा॑स्प॒त्यं सु॒यम॒मा कृ॑णुष्व शत्रूय॒ताम॒भि ति॑ष्ठा॒ महां॑सि॥

हे धर्मिष्ठो! हम लोग आपके लिये बड़े ऐश्वर्य्य की इच्छा करें और आप दोनों स्त्री और पुरुष जितेन्द्रिय, धर्म्मात्मा, बलवान् और पुरुषार्थी होकर सम्पूर्ण दुष्टों की सेना को जीतिये॥३॥

समि॑द्धस्य॒ प्रम॑ह॒सोऽग्ने॒ वन्दे॒ तव॒ श्रिय॑म्। वृ॒ष॒भो द्यु॒म्नवाँ॑ असि॒ सम॑ध्व॒रेष्वि॑ध्यसे॥

जो राजा अग्नि आदि के गुणों से युक्त हुआ अच्छे न्याय को यथावत् करता है, वह यज्ञों में अग्नि के सदृश सर्वत्र प्रकट यशवाला होता है॥४॥

समि॑द्धो अग्न आहुत दे॒वान्य॑क्षि स्वध्वर। त्वं हि ह॑व्य॒वाळसि॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य आदि रूप से अग्नि सब की रक्षा करता है, वैसा ही राजा होता है॥५॥

आ जु॑होता दुव॒स्यता॒ग्निं प्र॑य॒त्य॑ध्व॒रे। वृ॒णी॒ध्वं ह॑व्य॒वाह॑नम्॥

विद्यार्थिजन, जैसे विद्वान् जन शिल्पविद्या को स्वीकार करते हैं, वैसे ही स्वयं भी स्वीकार करें॥६॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह अठ्ठाईसवाँ सूक्त और बाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

त्र्य॑र्य॒मा मनु॑षो दे॒वता॑ता॒ त्री रो॑च॒ना दि॒व्या धा॑रयन्त। अर्च॑न्ति त्वा म॒रुतः॑ पू॒तद॑क्षा॒स्त्वमे॑षा॒मृषि॑रिन्द्रासि॒ धीरः॑॥

जो तीन कर्म्म, उपासना और ज्ञान को धारण करके पवित्र होते हैं, वे ही बलवान् होकर सत्कृत होते हैं॥१॥

अनु॒ यदीं॑ म॒रुतो॑ मन्दसा॒नमार्च॒न्निन्द्रं॑ पपि॒वांसं॑ सु॒तस्य॑। आद॑त्त॒ वज्र॑म॒भि यदहिं॒ हन्न॒पो य॒ह्वीर॑सृज॒त्सर्त॒वा उ॑॥

जो मनुष्य राजा का सत्कार करते हैं, उनका राजा भी सत्कार करे और जैसे सूर्य मेघ का नाश कर और जल का प्रवाह करके सर्व जगत् की रक्षा करता है, वैसे राजा दुष्टों का नाश करके श्रेष्ठ की रक्षा करे॥२॥

उ॒त ब्र॑ह्माणो मरुतो मे अ॒स्येन्द्रः॒ सोम॑स्य॒ सुषु॑तस्य पेयाः। तद्धि ह॒व्यं मनु॑षे॒ गा अवि॑न्द॒दह॒न्नहिं॑ पपि॒वाँ इन्द्रो॑ अस्य॥

जो मनुष्य सब वेदों को पढ़कर नहीं खाने और नहीं पीने योग्य वस्तु का वर्ज्जन करके न्यायाधीश के सदृश न्याय और सूर्य्य के सदृश सत्य और असत्य का प्रकाश करते हैं, वे महाशय होते हैं॥३॥

आद्रोद॑सी वित॒रं वि ष्क॑भायत्संविव्या॒नश्चि॑द्भि॒यसे॑ मृ॒गं कः॑। जिग॑र्ति॒मिन्द्रो॑ अप॒जर्गु॑राणः॒ प्रति॑ श्व॒सन्त॒मव॑ दान॒वं ह॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा सूर्य्य के सदृश राज्य को धारण करते हैं, जैसे सिंह मृग को व्याकुल करता है, वैसे दुष्टों को व्याकुल करते हैं, वैसा ही बर्त्ताव करके यश को प्रकट करें॥४॥

अध॒ क्रत्वा॑ मघव॒न्तुभ्यं॑ दे॒वा अनु॒ विश्वे॑ अददुः सोम॒पेय॑म्। यत्सूर्य॑स्य ह॒रितः॒ पत॑न्तीः पु॒रः स॒तीरुप॑रा॒ एत॑शे॒ कः॥

हे मनुष्यो! सूर्य्यमण्डल में अनेक तत्त्वों के विद्यमान होने से अनेक रूप देख पढ़ते हैं, यह जानना चाहिये॥५॥

नव॒ यद॑स्य नव॒तिं च॑ भो॒गान्त्सा॒कं वज्रे॑ण म॒घवा॑ विवृ॒श्चत्। अर्च॒न्तीन्द्रं॑ म॒रुतः॑ स॒धस्थे॒ त्रैष्टु॑भेन॒ वच॑सा बाधत॒ द्याम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! आप काम की आसक्ति का त्याग करके और न्याय से सबका सत्कार करके असङ्ख्य भोगों को प्रजाओं के लिये धारण कीजिये॥६॥

सखा॒ सख्ये॑ अपच॒त्तूय॑म॒ग्निर॒स्य क्रत्वा॑ महि॒षा त्री श॒तानि॑। त्री सा॒कमिन्द्रो॒ मनु॑षः॒ सरां॑सि सु॒तं पि॑बद्वृत्र॒हत्या॑य॒ सोम॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य ऊपर, नीचे और मध्यभाग में वर्त्तमान स्थूल पदार्थों का प्रकाश करता है, वैसे उत्तम, मध्यम और अधम व्यवहारों को राजा प्रकट करे और सबके साथ मित्र के सदृश वर्त्ताव करे॥७॥

त्री यच्छ॒ता म॑हि॒षाणा॒मघो॒ मास्त्री सरां॑सि म॒घवा॑ सो॒म्यापाः॑। का॒रं न विश्वे॑ अह्वन्त दे॒वा भर॒मिन्द्रा॑य॒ यदहिं॑ ज॒घान॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पुरुषार्थी जन को सब स्वीकार करते हैं, वैसे ही सूर्य ईश्वरीय नियमों से नियत जलरस का ग्रहण करता है, जैसे जन बड़े पदार्थों की उत्तेजना से सैकड़ों काम सिद्ध करते हैं, वैसे ही राजा प्रजाजनों से बड़े राजकार्य्य को सिद्ध करे॥८॥

उ॒शना॒ यत्स॑ह॒स्यै॒३॒॑रया॑तं गृ॒हमि॑न्द्र जूजुवा॒नेभि॒रश्वैः॑। व॒न्वा॒नो अत्र॑ स॒रथं॑ ययाथ॒ कुत्से॑न दे॒वैरव॑नोर्ह॒ शुष्ण॑म्॥

जो राजा आदि मनुष्य उत्तम प्रकार श्रेष्ठ होवें, वे विमान आदि वाहनों को बना सकें और दुष्ट जनों के मारने को समर्थ होवें॥९॥

प्रान्यच्च॒क्रम॑वृहः॒ सूर्य॑स्य॒ कुत्सा॑या॒न्यद्वरि॑वो॒ यात॑वेऽकः। अ॒नासो॒ दस्यूँ॑रमृणो व॒धेन॒ नि दु॑र्यो॒ण आ॑वृणङ्मृ॒ध्रवा॑चः॥

हे राजन्! जैसे सूर्य्य अपने चक्र का आकर्षण से वर्त्ताव करता है, वैसे ही विमान आदि वाहनों से राज्य का अनुवर्त्तन करो और चोर तथा दुष्ट वाणीवालों का नाश करके राज्य में नहीं चोरी करनेवाले और श्रेष्ठ वचनोंवाले जनों का सम्पादन कीजिये॥१०॥

स्तोमा॑सस्त्वा॒ गौरि॑वीतेरवर्ध॒न्नर॑न्धयो वैदथि॒नाय॒ पिप्रु॑म्। आ त्वामृ॒जिश्वा॑ स॒ख्याय॑ चक्रे॒ पच॑न्प॒क्तीरपि॑बः॒ सोम॑मस्य॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! जो उत्तम गुणों से आपकी वृद्धि करते और आपको मित्र जानते हैं, उनको मित्र करके आप ऐश्वर्य की वृद्धि करो॥११॥

नव॑ग्वासः सु॒तसो॑मास॒ इन्द्रं॒ दश॑ग्वासो अ॒भ्य॑र्चन्त्य॒र्कैः। गव्यं॑ चिदू॒र्वम॑पि॒धान॑वन्तं॒ तं चि॒न्नरः॑ शशमा॒ना अप॑ व्रन्॥

जो नवीन विद्या का ग्रहण करना चाहते और ऐश्वर्य्य की इच्छा करने और इन्द्रियों के जीतनेवाले विद्वान् जन अज्ञानी जनों को बोध देकर विद्वान् करते हैं, वे ही सत्कार करने योग्य होते हैं॥१२॥

क॒थो नु ते॒ परि॑ चराणि वि॒द्वान्वी॒र्या॑ मघव॒न्या च॒कर्थ॑। या चो॒ नु नव्या॑ कृ॒णवः॑ शविष्ठ॒ प्रेदु॒ ता ते॑ वि॒दथे॑षु ब्रवाम॥

मनुष्यों को चाहिये कि सदा ही नवीन-नवीन विद्या और नवीन-[नवीन] कार्य्य को सिद्ध करके ऐश्वर्य्य को प्राप्त होवें, इसी प्रकार अन्यों के प्रति उपदेश करें॥१३॥

ए॒ता विश्वा॑ चकृ॒वाँ इ॑न्द्र॒ भूर्यप॑रीतो ज॒नुषा॑ वी॒र्ये॑ण। या चि॒न्नु व॑ज्रिन्कृ॒णवो॑ दधृ॒ष्वान्न ते॑ व॒र्ता तवि॑ष्या अस्ति॒ तस्याः॑॥

जो राजा आदि जन हैं, वे ब्रह्मचर्य्य से विद्याओं को प्राप्त होकर चवालीस वर्ष की अवस्था से युक्त हुए समावर्त्तन करके अर्थात् गृहस्थाश्रम को विधिपूर्वक ग्रहण कर स्वयंवर विवाह कर और सेना की वृद्धि करके प्रजा की सब प्रकार से रक्षा करें॥१४॥

इन्द्र॒ ब्रह्म॑ क्रि॒यमा॑णा जुषस्व॒ या ते॑ शविष्ठ॒ नव्या॒ अक॑र्म। वस्त्रे॑व भ॒द्रा सुकृ॑ता वसू॒यू रथं॒ न धीरः॒ स्वपा॑ अतक्षम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! वंश और धन की आशा से आप लोग आलस्य से पुरुषार्थ का न त्याग करो, किन्तु नित्य पुरुषार्थ की वृद्धि से ऐश्वर्य्य की वृद्धि करके वस्त्र और रथ से जैसे वैसे सुख का भोग करके नवीन यश प्रकट करो॥१५॥इस सूक्त में इन्द्र और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह उनतीसवाँ सूक्त और पच्चीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

क्व१॒॑ स्य वी॒रः को अ॑पश्य॒दिन्द्रं॑ सु॒खर॑थ॒मीय॑मानं॒ हरि॑भ्याम्। यो रा॒या व॒ज्री सु॒तसो॑ममि॒च्छन्तदोको॒ गन्ता॑ पुरुहू॒त ऊ॒ती॥

हे विद्वन्! कौन बिजुली आदि की विद्या के प्राप्त होने को अधिकारी हैं, इस प्रकार पूछता हूँ; जो विद्वानों के सङ्ग से यथार्थवक्ता जनों की रीति से विद्या और हस्तक्रिया को ग्रहण करके नित्य प्रयत्न करें, यह उत्तर है॥१॥

अवा॑चचक्षं प॒दम॑स्य स॒स्वरु॒ग्रं नि॑धा॒तुरन्वा॑यमि॒च्छन्। अपृ॑च्छम॒न्याँ उ॒त ते म॑ आहु॒रिन्द्रं॒ नरो॑ बुबुधा॒ना अ॑शेम॥

जब शिल्प आदि के जानने की इच्छा करनेवाले जन विद्वानों के प्रति पूछें, तब उनके प्रति यथार्थ उत्तर देवें, इस प्रकार परस्पर मित्र हुए बिजुली आदि की विद्या की उन्नति करें॥२॥

प्र नु व॒यं सु॒ते या ते॑ कृ॒तानीन्द्र॒ ब्रवा॑म॒ यानि॑ नो॒ जुजो॑षः। वेद॒दवि॑द्वाञ्छृ॒णव॑च्च वि॒द्वान्वह॑ते॒ऽयं म॒घवा॒ सर्व॑सेनः॥

दो उपाय विद्या की प्राप्ति के लिए जानने चाहियें, उनमें प्रथम उपाय यह कि विद्या का अध्यापक यथार्थवक्ता होवे तथा सुनने और पढ़नेवाला पवित्र, कपटरहित और पुरुषार्थी होवे। दूसरा उपाय यह है कि श्रेष्ठ विद्वानों का कर्म्म देख कर आप भी वैसा ही कर्म्म करे, ऐसा करने पर सब को विद्या का लाभ होवे॥३॥

स्थि॒रं मन॑श्चकृषे जा॒त इ॑न्द्र॒ वेषीदेको॑ यु॒धये॒ भूय॑सश्चित्। अश्मा॑नं चि॒च्छव॑सा दिद्युतो॒ वि वि॒दो गवा॑मू॒र्वमु॒स्रिया॑णाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य और मेघ परस्पर युद्ध करते हैं, वैसे राजा शत्रु के साथ संग्राम करे और जैसे सूर्य्य किरणों से सब कार्य्य को सिद्ध करता है, वैसे राजा सेना और मन्त्रीजनों से सम्पूर्ण राजकृत्य सिद्ध करे॥४॥

प॒रो यत्त्वं प॑र॒म आ॒जनि॑ष्ठाः परा॒वति॒ श्रुत्यं॒ नाम॒ बिभ्र॑त्। अत॑श्चि॒दिन्द्रा॑दभयन्त दे॒वा विश्वा॑ अ॒पो अ॑जयद्दा॒सप॑त्नीः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे दूरस्थित भी सूर्य्य अपने प्रकाश से प्रसिद्ध होता है, वैसे ही दूर वर्त्तमान भी यथार्थवक्ता जन प्रकाशित यशवाले होते हैं॥५॥

तुभ्येदे॒ते म॒रुतः॑ सु॒शेवा॒ अर्च॑न्त्य॒र्कं सु॒न्वन्त्यन्धः॑। अहि॑मोहा॒नम॒प आ॒शया॑नं॒ प्र मा॒याभि॑र्मा॒यिनं॑ सक्ष॒दिन्द्रः॑॥

वे ही विद्वान् जन जगत् के सुख करनेवाले होते हैं, जो सूर्य्य और मेघ के समान जगत् के सुख करनेवाले हैं तथा अपने समान दूसरों के सुख करनेवाले होते हैं॥६॥

वि षू मृधो॑ ज॒नुषा॒ दान॒मिन्व॒न्नह॒न्गवा॑ मघवन्त्संचका॒नः। अत्रा॑ दा॒सस्य॒ नमु॑चेः॒ शिरो॒ यदव॑र्तयो॒ मन॑वे गा॒तुमि॒च्छन्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजजनो! जो सूर्य मेघ को जीत कर जगत् को सुख देता है, वैसे दुष्ट शत्रुओं को जीत कर प्रजाओं को सुख दीजिये॥७॥

युजं॒ हि मामकृ॑था॒ आदिदि॑न्द्र॒ शिरो॑ दा॒सस्य॒ नमु॑चेर्मथा॒यन्। अश्मा॑नं चित्स्व॒र्यं१॒॑ वर्त॑मानं॒ प्र च॒क्रिये॑व॒ रोद॑सी म॒रुद्भ्यः॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे राजजनो! आप लोग जैसे सूर्य्य मेघ को वर्षाय जगत् के सुख को और पवन से भूगोलों को घुमा के दिन रात्रि करता है, वैसे ही विद्या और विनय की राज्य में वृष्टि कर अपने-अपने कर्म में सब को चलाय के सुख और विजय को उत्पन्न करो॥८॥

स्त्रियो॒ हि दा॒स आयु॑धानि च॒क्रे किं मा॑ करन्नब॒ला अ॑स्य॒ सेनाः॑। अ॒न्तर्ह्यख्य॑दु॒भे अ॑स्य॒ धेने॒ अथोप॒ प्रैद्यु॒धये॒ दस्यु॒मिन्द्रः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही जन दास हैं कि जिनकी स्त्रियाँ ही शत्रु के सदृश विजय को देनेवाली वर्त्तमान होवें और जैसे सूर्य्य और मेघ का सङ्ग्राम है, वैसे ही दुष्टजनों के साथ राजा का सङ्ग्राम हो॥९॥

समत्र॒ गावो॒ऽभितो॑ऽनवन्ते॒हेह॑ व॒त्सैर्वियु॑ता॒ यदास॑न्। सं ता इन्द्रो॑ असृजदस्य शा॒कैर्यदीं॒ सोमा॑सः॒ सुषु॑ता॒ अम॑न्दन्॥

जैसे बछड़ों से वियुक्त गौएँ नहीं शोभित होती हैं, वैसे ही सन्तानों के सदृश वर्त्तमान सघन अवयवों से रहित मेघ नहीं शोभित होता है॥१०॥

यदीं॒ सोमा॑ ब॒भ्रुधू॑ता॒ अम॑न्द॒न्नरो॑रवीद्वृष॒भः साद॑नेषु। पु॒रं॒द॒रः प॑पि॒वाँ इन्द्रो॑ अस्य॒ पुन॒र्गवा॑मददादु॒स्रिया॑णाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा सूर्य्य [और] मेघ के स्वभाव के सदृश स्वभाववाला हुआ धर्म्मशास्त्र में कहे हुए अष्ट मास परिमाण परिमित प्रजाओं से कर लेता है और चार मास यथेष्ट पदार्थों को देता है, इस प्रकार सब प्रजाओं को प्रसन्न करता है, वही सब प्रकार से ऐश्वर्यवान् होता है॥११॥

भ॒द्रमि॒दं रु॒शमा॑ अग्ने अक्र॒न्गवां॑ च॒त्वारि॒ दद॑तः स॒हस्रा॑। ऋ॒णं॒च॒यस्य॒ प्रय॑ता म॒घानि॒ प्रत्य॑ग्रभीष्म॒ नृत॑मस्य नृ॒णाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सूर्य सहस्रों किरणों को देकर सम्पूर्ण जगत् को आनन्दित करता है, वैसे ही राजा असंख्य उत्तम गुणों को देकर प्रजाओं को निरन्तर प्रसन्न करे॥१२॥

सु॒पेश॑सं॒ माव॑ सृज॒न्त्यस्तं॒ गवां॑ स॒हस्रै॑ रु॒शमा॑सो अग्ने। ती॒व्रा इन्द्र॑मममन्दुः सु॒तासो॒ऽक्तोर्व्यु॑ष्टौ॒ परि॑तक्म्यायाः॥

हे मनुष्यो! जो बिजुली और सूर्यरूप अग्नि युक्तिपूर्वक आप लोगों से सेवन किया जाये तो दिन और रात्रि सुखपूर्वक व्यतीत होवे॥१३॥

औच्छ॒त्सा रात्री॒ परि॑तक्म्या॒ याँ ऋ॑णंच॒ये राज॑नि रु॒शमा॑नाम्। अत्यो॒ न वा॒जी र॒घुर॒ज्यमा॑नो ब॒भ्रुश्च॒त्वार्य॑सनत्स॒हस्रा॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वानो! आप लोग रात्रि और दिन के कृत्यों को जान कर और स्वयं करके, उत्तम परीक्षा करके राजा आदिकों के लिये उन कृत्यों का उपदेश दीजिये, जिससे ये सब सुखी हों और जैसे शीघ्र चलनेवाला घोड़ा दौड़ता है, वैसे ही दिन और रात्रि व्यतीत होता है, यह जानना चाहिये॥१४॥

चतुः॑सहस्रं॒ गव्य॑स्य प॒श्वः प्रत्य॑ग्रभीष्म रु॒शमे॑ष्वग्ने। घ॒र्मश्चि॑त्त॒प्तः प्र॒वृजे॒ य आसी॑दय॒स्मय॒स्तम्वादा॑म॒ विप्राः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य शीत और उष्ण का सेवन युक्ति से करने को जानते हैं और इसकी विद्या को परस्पर देते हैं, वे सर्वदा रोगरहित होते हैं॥१५॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह तीसवाँ सूक्त और अठ्ठाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इन्द्रो॒ रथा॑य प्र॒वतं॑ कृणोति॒ यम॒ध्यस्था॑न्म॒घवा॑ वाज॒यन्त॑म्। यू॒थेव॑ प॒श्वो व्यु॑नोति गो॒पा अरि॑ष्टो याति प्रथ॒मः सिषा॑सन्॥

इस मन्त्र में [उपमा और] वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो राजा रथ आदि के चलने के लिये मार्गों को सुडौल बनाय के उन मार्गों से रथ आदि वाहनों पर चढ़ के तथा जाय और आय के पशुओं का पालन करनेवाला पशुओं को जैसे वैसे शत्रुओं को रोक के प्रजाओं का निरन्तर पालन करता है, वही सब प्रकार वृद्धि को प्राप्त होता है॥१॥

आ प्र द्र॑व हरिवो॒ मा वि वे॑नः॒ पिश॑ङ्गराते अ॒भि नः॑ सचस्व। न॒हि त्वदि॑न्द्र॒ वस्यो॑ अ॒न्यदस्त्य॑मे॒नाँश्चि॒ज्जनि॑वतश्चकर्थ॥

जो अतिकालपर्य्यन्त जीवने, बल बढ़ाने, राज्य करने और वृद्धि करने के लिये यत्न करता है, वही कृतकृत्य होता है॥२॥

उद्यत्सहः॒ सह॑स॒ आज॑निष्ट॒ देदि॑ष्ट॒ इन्द्र॑ इन्द्रि॒याणि॒ विश्वा॑। प्राचो॑दयत्सु॒दुघा॑ व॒व्रे अ॒न्तर्वि ज्योति॑षा संववृ॒त्वत्तमो॑ऽवः॥

जो राजा बल से बल और धन से धन को उत्पन्न करके, न्याय के प्रकाश से अन्यायरूप अन्धकार का निवारण कर, पूर्ण मनोरथों से युक्त प्रजाओं को करके विद्या आदि उत्तम गुणों के ग्रहण के लिये प्रेरणा करता है, वही अखण्ड ऐश्वर्य्यवाला सदा होता है॥३॥

अन॑वस्ते॒ रथ॒मश्वा॑य तक्ष॒न्त्वष्टा॒ वज्रं॑ पुरुहूत द्यु॒मन्त॑म्। ब्र॒ह्माण॒ इन्द्रं॑ म॒हय॑न्तो अ॒र्कैरव॑र्धय॒न्नह॑ये॒ हन्त॒वा उ॑॥

राजाओं की योग्यता है कि जो अन्तःकरण से राज्य की उन्नति करने की इच्छा करें, वे सदा ही सत्कार करने योग्य हैं॥४॥

वृष्णे॒ यत्ते॒ वृष॑णो अ॒र्कमर्चा॒निन्द्र॒ ग्रावा॑णो॒ अदि॑तिः स॒जोषाः॑। अ॒न॒श्वासो॒ ये प॒वयो॑ऽर॒था इन्द्रे॑षिता अ॒भ्यव॑र्तन्त॒ दस्यू॑न्॥

जो राजाजन मेघ के सदृश सुख वर्षाने और आकाश के सदृश नहीं हिलनेवाले, अग्नि आदिकों के वाहनों को रच के इधर-उधर भ्रमण करके दुष्ट चोरों का नाश करके प्रजाओं को प्रसन्न करें, वे भाग्यशाली होते हैं॥५॥

प्र ते॒ पूर्वा॑णि॒ कर॑णानि वोचं॒ प्र नूत॑ना मघव॒न्या च॒कर्थ॑। शक्ती॑वो॒ यद्वि॒भरा॒ रोद॑सी उ॒भे जय॑न्न॒पो मन॑वे॒ दानु॑चित्राः॥

हे राजा आदि जनो! जो विद्वान् जन आप लोगों के लिये अनादिकाल से सिद्ध राजनीति और विजय के उपायों की शिक्षा करें, उनको अपने आत्मा के सदृश आप लोग सत्कार करें॥६॥

तदिन्नु ते॒ कर॑णं दस्म वि॒प्राहिं॒ यद्घ्नन्नोजो॒ अत्रामि॑मीथाः। शुष्ण॑स्य चि॒त्परि॑ मा॒या अ॑गृभ्णाः प्रपि॒त्वं यन्नप॒ दस्यूँ॑रसेधः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वन्! जैसे ईश्वर ने सूर्य्य और मेघ का सम्बन्ध रचा, वैसे ही अन्य भी बहुत सम्बन्ध रचे, यह जानना चाहिये॥७॥

त्वम॒पो यद॑वे तु॒र्वशा॒यार॑मयः सु॒दुघाः॑ पा॒र इ॑न्द्र। उ॒ग्रम॑यात॒मव॑हो ह॒ कुत्सं॒ सं ह॒ यद्वा॑मु॒शनार॑न्त दे॒वाः॥

ऐश्वर्य्यवाला मनुष्य अन्य जनों के लिये धन और धान्य आदिक देवें और जहाँ विद्वान् रमें, वहाँ ही सम्पूर्ण जन क्रीड़ा करें॥८॥

इन्द्रा॑कुत्सा॒ वह॑माना॒ रथे॒ना वा॒मत्या॒ अपि॒ कर्णे॑ वहन्तु। निः षी॑म॒द्भ्यो धम॑थो॒ निः ष॒धस्था॑न्म॒घोनो॑ हृ॒दो व॑रथ॒स्तमां॑सि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो अग्नि और जल का संयोग कर शब्द कर और भाफ से यन्त्र कलाओं को ताड़ित करके वाहनादिकों को चलावें तो आप अपने को और मित्रों को धन से युक्त करके दुःखों के पार जावें और अन्यों को भी पार करें॥९॥

वात॑स्य यु॒क्तान्त्सु॒युज॑श्चि॒दश्वा॑न्क॒विश्चि॑दे॒षो अ॑जगन्नव॒स्युः। विश्वे॑ ते॒ अत्र॑ म॒रुतः॒ सखा॑य॒ इन्द्र॒ ब्रह्मा॑णि॒ तवि॑षीमवर्धन्॥

हे ऐश्वर्य्य की इच्छा रखनेवाले पुरुष! जो अग्नि आदि पदार्थों की विद्या से विचित्र आश्चर्य्यजनक वाहन आदि कार्य्यों की सिद्धि कर सकते हैं, उनके साथ मित्रता करके और उनसे विद्या को प्राप्त हो अभीष्ट कार्य्यों को सिद्धि करते हुए आप अत्यन्त ऐश्वर्य्य को प्राप्त होवें॥१०॥

सूर॑श्चि॒द्रथं॒ परि॑तक्म्यायां॒ पूर्वं॑ कर॒दुप॑रं जूजु॒वांस॑म्। भर॑च्च॒क्रमेत॑शः॒ सं रि॑णाति पु॒रो दध॑त्सनिष्यति॒ क्रतुं॑ नः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो मनुष्य कलाकौशल से वाहनों के यन्त्रों को रच के जल और अग्नि के अत्यन्त योग से चक्रों को उत्तम प्रकार चलाय कार्य्यों को सिद्ध करें तो जैसे सूर्य्य और पवन मेघ को वैसे बहुत भारयुक्त वाहन को अन्तरिक्ष जल और स्थल में पहुँचाने को समर्थ होवें॥११॥

आयं ज॑ना अभि॒चक्षे॑ जगा॒मेन्द्रः॒ सखा॑यं सु॒तसो॑ममि॒च्छन्। वद॒न्ग्रावाव॒ वेदिं॑ भ्रियाते॒ यस्य॑ जी॒रम॑ध्व॒र्यव॒श्चर॑न्ति॥

जो जन विद्या की प्राप्ति तथा विद्या देने के लिये सम्पूर्ण जनों के साथ मित्रता करके मिलें, वे सम्पूर्ण विद्या के प्राप्त होने को समर्थ होवें॥१२॥

ये चा॒कन॑न्त चा॒कन॑न्त॒ नू ते मर्ता॑ अमृत॒ मो ते अंह॒ आर॑न्। वा॒व॒न्धि यज्यूँ॑रु॒त तेषु॑ धे॒ह्योजो॒ जने॑षु॒ येषु॑ ते॒ स्याम॑॥

हे विद्वान् जनो! जो जन विद्या, सत्य आचरण तथा परोपकार की और अधर्म्म आचरण के त्याग की कामना करके सब के उपकार की इच्छा करें, वे धन्यवादयुक्त होवें और हम लोग भी ऐसे होवें, ऐसी इच्छा करें॥१३॥इस सूक्त में इन्द्र और शिल्पविद्या के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह इकतीसवाँ सूक्त और इकतीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अद॑र्द॒रुत्स॒मसृ॑जो॒ वि खानि॒ त्वम॑र्ण॒वान्ब॑द्बधा॒नाँ अ॑रम्णाः। म॒हान्त॑मिन्द्र॒ पर्व॑तं॒ वि यद्वः सृ॒जो वि धारा॒ अव॑ दान॒वं ह॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजा जैसे सूर्य्य गिराये हुए मेघ से नदी और समुद्र आदिकों को पूर्ण करता और तटों को तोड़ता है, वैसे ही अन्याय को गिरा और न्याय से प्रजा का पालन करके दुष्टों का नाश करें॥१॥

त्वमुत्साँ॑ ऋ॒तुभि॑र्बद्बधा॒नाँ अरं॑ह॒ ऊधः॒ पर्व॑तस्य वज्रिन्। अहिं॑ चिदुग्र॒ प्रयु॑तं॒ शया॑नं जघ॒न्वाँ इ॑न्द्र॒ तवि॑षीमधत्थाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे खेती करनेवाले जन कूपों से जल को क्षेत्रों के प्रति प्राप्त कर अन्न उत्पन्न करके सब ऋतुओं में सुख और ऐश्वर्य्य की वृद्धि करते हैं, वैसे ही आप प्रजाओं की उन्नति कीजिये॥२॥

त्यस्य॑ चिन्मह॒तो निर्मृ॒गस्य॒ वध॑र्जघान॒ तवि॑षीभि॒रिन्द्रः॑। य एक॒ इद॑प्र॒तिर्मन्य॑मान॒ आद॑स्माद॒न्यो अ॑जनिष्ट॒ तव्या॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य मेघ को जीतकर अपने प्रताप को प्रकट करके सब प्राणियों का पालन करता है, वैसे ही धनुर्वेद की विद्या को जाननेवाला एक भी अनेकों को जीतकर प्रजाओं का पालन करे॥३॥

त्यं चि॑देषां स्व॒धया॒ मद॑न्तं मि॒हो नपा॑तं सु॒वृधं॑ तमो॒गाम्। वृष॑प्रभर्मा दान॒वस्य॒ भामं॒ वज्रे॑ण व॒ज्री नि ज॑घान॒ शुष्ण॑म्॥

इस मन्त्र में [उपमा और] वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे राजन्! जैसे सूर्य्य अति विस्तारयुक्त मेघ का नाश कर भूमि में गिरा के जगत् की रक्षा करता है, वैसे ही अतिप्रबल भी शत्रुओं का नाश कर नीचे गिरा के न्याय से प्रजाओं का पालन कीजिये॥४॥

त्यं चि॑दस्य॒ क्रतु॑भि॒र्निष॑त्तमम॒र्मणो॑ वि॒ददिद॑स्य॒ मर्म॑। यदीं॑ सुक्षत्र॒ प्रभृ॑ता॒ मद॑स्य॒ युयु॑त्सन्तं॒ तम॑सि ह॒र्म्ये धाः॥

जो पदार्थों के गुप्त स्वरूपों को जान के बुद्धि से शिल्पविद्या की वृद्धि करते हैं, वे उत्तम राज्य और ऐश्वर्ययुक्त होते हैं॥५॥

त्यं चि॑दि॒त्था क॑त्प॒यं शया॑नमसू॒र्ये तम॑सि वावृधा॒नम्। तं चि॑न्मन्दा॒नो वृ॑ष॒भः सु॒तस्यो॒च्चैरिन्द्रो॑ अप॒गूर्या॑ जघान॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य मेघ का नाश करता है अन्धकार का वारण करके, वैसे ही राजा को चाहिये कि दुष्टों का नाश और श्रेष्ठों का पालन करे॥६॥

उद्यदिन्द्रो॑ मह॒ते दा॑न॒वाय॒ वध॒र्यमि॑ष्ट॒ सहो॒ अप्र॑तीतम्। यदीं॒ वज्र॑स्य॒ प्रभृ॑तौ द॒दाभ॒ विश्व॑स्य ज॒न्तोर॑ध॒मं च॑कार॥

हे राजा आदि जनो! आप लोग सूर्य्य के सदृश वर्त्ताव करके राज्य की अधमदशा का निवारण करें॥७॥

त्यं चि॒दर्णं॑ मधु॒पं शया॑नमसि॒न्वं व॒व्रं मह्याद॑दु॒ग्रः। अ॒पाद॑म॒त्रं म॑ह॒ता व॒धेन॒ नि दु॑र्यो॒ण आ॑वृणङ्मृ॒ध्रवा॑चम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्य! जैसे बिजुली मेघ को भूमि में गिराती है, वैसे आप दुष्टों के [=को] नीच दशा को प्राप्त करिये [=कराइये]॥८॥

को अ॑स्य॒ शुष्मं॒ तवि॑षीं वरात॒ एको॒ धना॑ भरते॒ अप्र॑तीतः। इ॒मे चि॑दस्य॒ ज्रय॑सो॒ नु दे॒वी इन्द्र॒स्यौज॑सो भि॒यसा॑ जिहाते॥

हे मनुष्यो! जो दो प्रकार का अग्नि−एक तो प्रसिद्ध सूर्य्य पृथ्वी में प्रसिद्धरूप और दूसरा गुप्त बिजुलीरूप ये ही दोनों सब जगत् को धारण करके चलाते हैं॥९॥

न्य॑स्मै दे॒वी स्वधि॑तिर्जिहीत॒ इन्द्रा॑य गा॒तुरु॑श॒तीव॑ येमे। सं यदोजो॑ यु॒वते॒ विश्व॑माभि॒रनु॑ स्व॒धाव्ने॑ क्षि॒तयो॑ नमन्त॥

जैसे बह्मचर्य्य को धारण को हुई ब्रह्मचारिणी कन्या पूर्ण चौबीस वर्ष की अवस्था से युक्त हुई पति की कामना करती हुई गुण, कर्म्म और स्वभाव के सदृश और प्रिय स्वामी का ग्रहण करती है, वैसे ही बिजुली आदि रूप अग्नि सम्पूर्ण संसार को धारण करता है और जैसे गुणवान् जनों को मनुष्य नमते हैं, वैसे ही उत्तम लक्षणों से युक्त स्त्री-पुरुषों को सम्पूर्ण जन नमते हैं॥१०॥

एकं॒ नु त्वा॒ सत्प॑तिं॒ पाञ्च॑जन्यं जा॒तं शृ॑णोमि य॒शसं॒ जने॑षु। तं मे॑ जगृभ्र आ॒शसो॒ नवि॑ष्ठं दो॒षा वस्तो॒र्हव॑मानास॒ इन्द्र॑म्॥

ब्रह्मचर्य्य को वेदोक्त समयानुसार धारण किये हुई कन्या प्रसिद्ध जिसका यश ऐसे श्रेष्ठ पुरुष, उत्तम स्वभाववाले और उत्तम गुण और रूप से युक्त, प्रीति करनेवाले स्वामी के अर्थात् पति के ग्रहण करने की इच्छा करे, वैसे ही ब्रह्मचारी भी अपने सदृश ही जो ब्रह्मचारिणी स्त्री उसका ग्रहण करे॥११॥

ए॒वा हि त्वामृ॑तु॒था या॒तय॑न्तं म॒घा विप्रे॑भ्यो॒ दद॑तं शृ॒णोमि॑। किं ते॑ ब्र॒ह्माणो॑ गृहते॒ सखा॑यो॒ ये त्वा॒या नि॑द॒धुः काम॑मिन्द्र॥

स्त्री, ऋतु-ऋतु के मध्य में जाने की कामनावाला है वीर्य्य जिसका ऐसे ऊर्ध्वरेता वीर्य्य को वृथा न छोड़नेवाले, ब्रह्मचर्य्य को धारण किये हुए, उत्तम स्वभाववाले और विद्यायुक्त उत्तम यशवाले जन को पतिपने के लिये स्वीकार करे, उसके साथ यथावत् वर्त्ताव करके, पूर्ण मनोरथ करनेवाली और सौभाग्य से युक्त होवे॥१२॥इस सूक्त में इन्द्र और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह बत्तीसवाँ सूक्त और तेतीसवाँ वर्ग, चौथे अष्टक में प्रथम अध्याय और पञ्चम मण्डल में द्वितीय अनुवाक समाप्त हुआ॥इस अध्याय में अग्नि विद्वान् और इन्द्रादिकों के गुणों का वर्णन होने से इस अध्याय में कहे हुए अर्थों की पहिले अध्यायों में कहे हुए अर्थों के साथ सङ्गति है, ऐसा जानना चाहिये॥

सूक्तम्

महि॑ म॒हे त॒वसे॑ दीध्ये॒ नॄनिन्द्रा॑ये॒त्था त॒वसे॒ अत॑व्यान्। यो अ॑स्मै सुम॒तिं वाज॑सातौ स्तु॒तो जने॑ सम॒र्य॑श्चि॒केत॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य जिस मनुष्य के लिये सुखविषयक उपकार करे, वह उसके लिये प्रत्युपकार निरन्तर करे॥१॥

स त्वं न॑ इन्द्र धियसा॒नो अ॒र्कैर्हरी॑णां वृष॒न्योक्त्र॑मश्रेः। या इ॒त्था म॑घव॒न्ननु॒ जोषं॒ वक्षो॑ अ॒भि प्रार्यः स॑क्षि॒ जना॑न्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। वही उत्तम विद्वान् है, जो मनुष्यों की बुद्धि को योगाभ्यास आदि से बढ़ावे और सब काल में नीति के अनुसार कर्म्म करके प्रजाओं को प्रसन्न करे॥२॥

न ते त॑ इन्द्रा॒भ्य१॒॑स्मदृ॒ष्वायु॑क्तासो अब्र॒ह्मता॒ यदस॑न्। तिष्ठा॒ रथ॒मधि॒ तं व॑ज्रह॒स्ता र॒श्मिं दे॑व यमसे॒ स्वश्वः॑॥

हे ऐश्वर्य्य से युक्त! जो अयोग्य व्यवहारवाले होवें वे हम लोगों के और आपके दूर वसें और आप वाहनों के चलाने की विद्या को विशेष करके जानें तो युद्ध में भी सामर्थ्य को प्राप्त होवें॥३॥

पु॒रू यत्त॑ इन्द्र॒ सन्त्यु॒क्था गवे॑ च॒कर्थो॒र्वरा॑सु॒ युध्य॑न्। त॒त॒क्षे सूर्या॑य चि॒दोक॑सि॒ स्वे वृषा॑ स॒मत्सु॑ दा॒सस्य॒ नाम॑ चित्॥

हे राजन्! जितनी उत्तम सामग्रियाँ होवें, उनको सेना में युद्ध के लिये स्थापित कीजिये और जो गृह के लिये वस्तु होवें, उनको गृह में स्थापित कीजिये॥४॥

व॒यं ते त॑ इन्द्र॒ ये च॒ नरः॒ शर्धो॑ जज्ञा॒ना या॒ताश्च॒ रथाः॑। आस्माञ्ज॑गम्यादहिशुष्म॒ सत्वा॒ भगो॒ न हव्यः॑ प्रभृ॒थेषु॒ चारुः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजन्! जब हम लोग आपके और आप हम लोगों के मित्र होवें, तभी हम लोगों का ऐश्वर्य्य बड़े और जैसे ऐश्वर्य्य सब का प्रिय है, वैसे ही धर्म्म, प्रिय [=प्रिय धर्म] सदा रक्षा करने योग्य है॥५॥

प॒पृ॒क्षेण्य॑मिन्द्र॒ त्वे ह्योजो॑ नृ॒म्णानि॑ च नृ॒तमा॑नो॒ अम॑र्तः। स न॒ एनीं॑ वसवानो र॒यिं दाः॒ प्रार्यः स्तु॑षे तुविम॒घस्य॒ दान॑म्॥

हे मनुष्यो! आप लोग विद्वानों के प्रति पूँछने योग्य प्रश्नों को कर, बल को बढ़ाय और ऐश्वर्य्य की वृद्धि करके उत्तम मार्ग में दान देकर प्रशंसित विद्या और आचरणयुक्त होवें॥६॥

ए॒वा न॑ इन्द्रो॒तिभि॑रव पा॒हि गृ॑ण॒तः शू॑र का॒रून्। उ॒त त्वचं॒ दद॑तो॒ वाज॑सातौ पिप्री॒हि मध्वः॒ सुषु॑तस्य॒ चारोः॑॥

हे राजन्! आप शूरवीर विद्वान् शिल्पीजनों की रक्षा कर प्रजाओं का निरन्तर पालन करके सङ्ग्राम में शत्रुओं को जीत कर प्राप्त हूजिये॥७॥

उ॒त त्ये मा॑ पौरुकु॒त्स्यस्य॑ सू॒रेस्त्र॒सद॑स्योर्हिर॒णिनो॒ ररा॑णाः। वह॑न्तु मा॒ दश॒ श्येता॑सो अस्य गैरिक्षि॒तस्य॒ क्रतु॑भि॒र्नु स॑श्चे॥

जो सत्य धारण करनेवाले और सत्पुरुष जिनके मित्र ऐसे जन बुद्धि को बढ़ाते हुए दुष्टों का निवारण करते हैं, उनके साथ मैं मेल करता हूँ॥८॥

उ॒त त्ये मा॑ मारु॒ताश्व॑स्य॒ शोणाः॒ क्रत्वा॑मघासो वि॒दथ॑स्य रा॒तौ। स॒हस्रा॑ मे॒ च्यव॑तानो॒ ददा॑न आनू॒कम॒र्यो वपु॑षे॒ नार्च॑त्॥

हे मनुष्यो! जो हम लोगों के अभीष्ट की सिद्धि करते हैं, उनके अभीष्ट की हम लोग भी सिद्धि करें, इस प्रकार स्वामी और सेवक भी वर्त्ताव करें॥९॥

उ॒त त्ये मा॑ ध्व॒न्य॑स्य॒ जुष्टा॑ लक्ष्म॒ण्य॑स्य सु॒रुचो॒ यता॑नाः। म॒ह्ना रा॒यः सं॒वर॑णस्य॒ ऋषे॑र्व्र॒जं न गावः॒ प्रय॑ता॒ अपि॑ ग्मन्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य प्रयत्न से नहीं प्राप्त हुए की प्राप्ति और प्राप्त हुए की रक्षा करते हैं, वे जैसे बछड़ों को गौवें वैसे धन को प्राप्त होते हैं॥१०॥इस सूक्त में इन्द्र और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह तेंतीसवाँ सूक्त और द्वितीय वर्ग समाप्त हुआ॥

अजा॑तशत्रुम॒जरा॒ स्व॑र्व॒त्यनु॑ स्व॒धामि॑ता द॒स्ममी॑यते। सु॒नोत॑न॒ पच॑त॒ ब्रह्म॑वाहसे पुरुष्टु॒ताय॑ प्रत॒रं द॑धातन॥

हे मनुष्यो! जो वैररहित अत्यन्त उत्तम गुणों से युक्त और सब का हितकारी पुरुष अथवा इस प्रकार की स्त्री हो, उन दोनों का निरन्तर सत्कार करना योग्य है॥१॥

आ यः सोमे॑न ज॒ठर॒मपि॑प्र॒ताम॑न्दत म॒घवा॒ मध्वो॒ अन्ध॑सः। यदीं॑ मृ॒गाय॒ हन्त॑वे म॒हाव॑धः स॒हस्र॑भृष्टिमु॒शना॑ व॒धं यम॑त्॥

जो मनुष्य वैद्यकशास्त्र की रीति से सोमलता आदि ओषधियों के रस के साथ संस्कारयुक्त किये गये अन्नों का भोग करते हैं, वे अतुल सुख को प्राप्त होते हैं॥२॥

यो अ॑स्मै घ्रं॒स उ॒त वा॒ य ऊध॑नि॒ सोमं॑ सु॒नोति॒ भव॑ति द्यु॒माँ अह॑। अपा॑प श॒क्रस्त॑त॒नुष्टि॑मूहति त॒नूशु॑भ्रं म॒घवा॒ यः क॑वास॒खः॥

जो मनुष्य दिन और रात्रि पुरुषार्थ करते हैं, वे निरन्तर सुखी होते हैं॥३॥

यस्याव॑धीत्पि॒तरं॒ यस्य॑ मा॒तरं॒ यस्य॑ श॒क्रो भ्रात॑रं॒ नात॑ ईषते। वेतीद्व॑स्य॒ प्रय॑ता यतंक॒रो न किल्बि॑षादीषते॒ वस्व॑ आक॒रः॥

जो पिता, माता और भ्रातृ आदि पालन करें, उनके पुत्र आदि को चाहिये कि निरन्तर सत्कार करें और जो पापाचरण का त्याग करके धर्म्म का आचरण करते हैं, वे सब काल में सुखी होते हैं॥४॥

न प॒ञ्चभि॑र्द॒शभि॑र्वष्ट्या॒रभं॒ नासु॑न्वता सचते॒ पुष्य॑ता च॒न। जि॒नाति॒ वेद॑मु॒या हन्ति॑ वा॒ धुनि॒रा दे॑व॒युं भ॑जति॒ गोम॑ति व्र॒जे॥

जो आलस्ययुक्त जन पुरुषार्थ को नहीं करते हैं, वे अभीष्ट सिद्धि को नहीं प्राप्त होते हैं॥५॥

वि॒त्वक्ष॑णः॒ समृ॑तौ चक्रमास॒जोऽसु॑न्वतो॒ विषु॑णः सुन्व॒तो वृ॒धः। इन्द्रो॒ विश्व॑स्य दमि॒ता वि॒भीष॑णो यथाव॒शं न॑यति॒ दास॒मार्यः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आर्यों तथा उत्तम गुण, कर्म्म और स्वभाववालों का शूद्र सेवक होता है, वैसे ही उत्तम गुण और कर्म्म से युक्त राजा की प्रजा सेवन करनेवाली होती है॥६॥

समीं॑ प॒णेर॑जति॒ भोज॑नं मु॒षे वि दा॒शुषे॑ भजति सू॒नरं॒ वसु॑। दु॒र्गे च॒न ध्रि॑यते॒ विश्व॒ आ पु॒रु जनो॒ यो अ॑स्य॒ तवि॑षी॒मचु॑क्रुधत्॥

जो राजा चोर, डाकू आदि जनों के लिये कठिन दण्ड और श्रेष्ठ जनों के लिये प्रतिष्ठा देता है, उसका राज्य धन आदि से युक्त हुआ वृद्धि को प्राप्त होता और उसका इस संसार में यश और परलोक में सुख होता है॥७॥

सं यज्जनौ॑ सु॒धनौ॑ वि॒श्वश॑र्धसा॒ववे॒दिन्द्रो॑ म॒घवा॒ गोषु॑ शु॒भ्रिषु॑। युजं॒ ह्य१॒॑न्यमकृ॑त प्रवेप॒न्युदीं॒ गव्यं॑ सृजते॒ सत्व॑भि॒र्धुनिः॑॥

राजा को चाहिये कि अपने राज्य में उत्तम धनी, विद्वान् तथा अध्यापक और उपदेशकों की उत्तम प्रकार रक्षा करके उनसे व्यवहार धन और विद्या की उन्नति करे॥८॥

स॒ह॒स्र॒सामाग्नि॑वेशिं गृणीषे॒ शत्रि॑मग्न उप॒मां के॒तुम॒र्यः। तस्मा॒ आपः॑ सं॒यतः॑ पीपयन्त॒ तस्मि॑न्क्ष॒त्रमम॑वत्त्वे॒षम॑स्तु॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा होने की इच्छा करे तो सर्व शास्त्रों में प्रविष्ट हुई स्वच्छ और उत्तम गुणों से युक्त बुद्धि को प्राप्त होकर जैसे पितृजन पुत्रों का पालन करते वैसे प्रजाओं का पालन करे, ऐसा करने पर श्रेष्ठ राज्य बढ़े॥९॥इस सूक्त में इन्द्र विद्वान् और प्रजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चौंतीसवाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ॥

यस्ते॒ साधि॒ष्ठोऽव॑स॒ इन्द्र॒ क्रतु॒ष्टमा भ॑र। अ॒स्मभ्यं॑ चर्षणी॒सहं॒ सस्निं॒ वाजे॑षु दु॒ष्टर॑म्॥

वही राजा उत्तम होवे जो दीर्घ ब्रह्मचर्य्य से यथार्थवक्ता जनों से विद्या और विनय को ग्रहण करके न्याय से राज्य की शिक्षा देवे॥१॥

यदि॑न्द्र ते॒ चत॑स्रो॒ यच्छू॑र॒ सन्ति॑ ति॒स्रः। यद्वा॒ पञ्च॑ क्षिती॒नामव॒स्तत्सु न॒ आ भ॑र॥

वही राज्य बढ़ाने को समर्थ होवे कि जो राज्य के अङ्ग सब पूर्ण उत्तम प्रकार ग्रहण करे॥२॥

आ तेऽवो॒ वरे॑ण्यं॒ वृष॑न्तमस्य हूमहे। वृष॑जूति॒र्हि ज॑ज्ञि॒ष आ॒भूभि॑रिन्द्र तु॒र्वणिः॑॥

हे राजन्! जिससे आप उत्तम गुण, कर्म्म और स्वभाववाले हो और पितृजन जैसे सन्तानों को वैसे हम लोगों का पालन करते हो, इससे आपको राजा हम लोग मानते हैं॥३॥

वृषा॒ ह्यसि॒ राध॑से जज्ञि॒षे वृष्णि॑ ते॒ शवः॑। स्वक्ष॑त्रं ते धृ॒षन्मनः॑ सत्रा॒हमि॑न्द्र॒ पौंस्य॑म्॥

प्रजाओं को चाहिये कि जो बलवान्, पूर्ण विद्या, विनय और बल से युक्त, शूरता आदि गुणों से धृष्ट, सदा न्याय और धर्म्माचरणयुक्त हो, उसी को राजा मानें॥४॥

त्वं तमि॑न्द्र॒ मर्त्य॑ममित्र॒यन्त॑मद्रिवः। स॒र्व॒र॒था श॑तक्रतो॒ नि या॑हि शवसस्पते॥

हे राजन्! जो अन्याय से आपका शत्रु होवे, उसके शासन के लिये बल के सहित आप नित्य प्राप्त हूजिये॥५॥

त्वामिद्वृ॑त्रहन्तम॒ जना॑सो वृ॒क्तब॑र्हिषः। उ॒ग्रं पू॒र्वीषु॑ पू॒र्व्यं हव॑न्ते॒ वाज॑सातये॥

हे मनुष्यो! जो प्रतिष्ठित क्षत्रियों के कुल में उत्पन्न हुआ, विद्या और विनय आदि से युक्त और प्रजा के पालन में तत्पर इच्छा जिसकी ऐसा होवे, उसको राजा मानो॥६॥

अ॒स्माक॑मिन्द्र दु॒ष्टरं॑ पुरो॒यावा॑नमा॒जिषु॑। स॒यावा॑नं॒ धने॑धने वाज॒यन्त॑मवा॒ रथ॑म्॥

हे राजन्! जो आप लोग हम लोगों के नगर और राज्य की यथावत् रक्षा करने को समर्थ होवें तो हम लोगों के राजा होवें॥७॥

अ॒स्माक॑मि॒न्द्रेहि॑ नो॒ रथ॑मवा॒ पुरं॑ध्या। व॒यं श॑विष्ठ॒ वार्यं॑ दि॒वि श्रवो॑ दधीमहि दि॒वि स्तोमं॑ मनामहे॥

वही प्रजा का प्रिय होता है, जो राजा न्याय से प्रजाओं का उत्तम प्रकार पालन करके विद्या और उत्तम शिक्षा की प्रजाओं में प्रवृत्ति करे॥८॥इस सूक्त में इन्द्र राजा प्रजा और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पैंतीसवाँ सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ॥

स आ ग॑म॒दिन्द्रो॒ यो वसू॑नां॒ चिके॑त॒द्दातुं॒ दाम॑नो रयी॒णाम्। ध॒न्व॒च॒रो न वंस॑गस्तृषा॒णश्च॑कमा॒नः पि॑बतु दु॒ग्धमं॒शुम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जो धन देने, विचार करने, सत्य की कामना करने और मर्य्यादा को चाहनेवाला होवे, उसी को राजा मानें॥१॥

आ ते॒ हनू॑ हरिवः शूर॒ शिप्रे॒ रुह॒त्सोमो॒ न पर्व॑तस्य पृ॒ष्ठे। अनु॑ त्वा राज॒न्नर्व॑तो॒ न हि॒न्वन् गी॒र्भिर्म॑देम पुरुहूत॒ विश्वे॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा सत्सङ्ग करता है, वह पर्वत में सोमलता के सदृश सब ओर से वृद्धि को प्राप्त होता है॥२॥

च॒क्रं न वृ॒त्तं पु॑रुहूत वेपते॒ मनो॑ भि॒या मे॒ अम॑ते॒रिद॑द्रिवः। रथा॒दधि॑ त्वा जरि॒ता स॑दावृध कु॒विन्नु स्तो॑षन्मघवन्पुरू॒वसुः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा चोर और साहस करनेवाले जनों का प्रयत्न से न निवारण करे और श्रेष्ठ जनों का न सत्कार करे तो भय के उद्भव से प्रजायें व्याकुल होवें॥३॥

ए॒ष ग्रावे॑व जरि॒ता त॑ इ॒न्द्रेय॑र्ति॒ वाचं॑ बृ॒हदा॑शुषा॒णः। प्र स॒व्येन॑ मघव॒न्यंसि॑ रा॒यः प्र द॑क्षि॒णिद्ध॑रिवो॒ मा वि वे॑नः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो बड़े विद्वान् जन वाणी को ग्रहण कर वा ग्रहण कराय के इन्द्रियों के निग्रह करनेवाले होते हैं, वे निष्फल मनोरथवाले नहीं होते हैं, किन्तु सत्यकाम और असत्य के द्वेषी निरन्तर वर्त्तमान हैं॥४॥

वृषा॑ त्वा॒ वृष॑णं वर्धतु॒ द्यौर्वृषा॒ वृष॑भ्यां वहसे॒ हरि॑भ्याम्। स नो॒ वृषा॒ वृष॑रथः सुशिप्र॒ वृष॑क्रतो॒ वृषा॑ वज्रि॒न्भरे॑ धाः॥

हे मनुष्यो! जो विद्वान् तुम लोगों को सर्वदा बढ़ाते हैं, उनको आप संग्राम में विजय के लिये प्रेरणा दीजिये॥५॥

यो रोहि॑तौ वा॒जिनौ॑ वा॒जिनी॑वान्त्रि॒भिः श॒तैः सच॑मना॒वदि॑ष्ट। यूने॒ सम॑स्मै क्षि॒तयो॑ नमन्तां श्रु॒तर॑थाय मरुतो दुवो॒या॥

जो विमान आदि वाहन के कार्य्यों में अग्नि आदि पदार्थों का संप्रयोग करते हैं, वे जितने तीन सौ घोड़ों से वाहन शीघ्र पहुँचाते हैं, उतना बल उस कला में होता है और जो इस प्रकार शिल्पविद्या के कृत्यों में प्रसिद्ध होते हैं, उनका सत्कार सब करते हैं॥६॥इस सूक्त में इन्द्र विद्वान् और शिल्पी के कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह छत्तीसवाँ सूक्त और सप्तम वर्ग समाप्त हुआ॥

सं भा॒नुना॑ यतते॒ सूर्य॑स्या॒जुह्वा॑नो घृ॒तपृ॑ष्ठः॒ स्वञ्चाः॑। तस्मा॒ अमृ॑ध्रा उ॒षसो॒ व्यु॑च्छा॒न्य इन्द्रा॑य सु॒नवा॒मेत्याह॑॥

हे मनुष्यो! जो बिजुली, सूर्य्य के प्रकाश के साथ वर्त्तमान है, उसको आदि लेकर विद्या का जो उपदेश देवे, वह हम लोगों की उन्नति करनेवाला होता है, यह हम लोग जानें॥१॥

समि॑द्धाग्निर्वनवत्स्ती॒र्णब॑र्हिर्यु॒क्तग्रा॑वा सु॒तसो॑मो जराते। ग्रावा॑णो॒ यस्ये॑षि॒रं वद॒न्त्यय॑दध्व॒र्युर्ह॒विषाव॒ सिन्धु॑म्॥

हे विद्वानो! जो अग्नि सम्पूर्ण पदार्थों में व्याप्त और बहुत उत्तम गुण और क्रियावान् है, उसको जानकर कार्य्यों को सिद्ध करो॥२॥

व॒धूरि॒यं पति॑मि॒च्छन्त्ये॑ति॒ य ईं॒ वहा॑ते॒ महि॑षीमिषि॒राम्। आस्य॑ श्रवस्या॒द्रथ॒ आ च॑ घोषात्पु॒रू स॒हस्रा॒ परि॑ वर्तयाते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे किया ब्रह्मचर्य्य जिन्होंने ऐसे स्त्री और पुरुष परस्पर पति और स्त्रीभाव की इच्छा करते हैं तथा परस्पर प्रसन्न प्रिय होकर संयुक्त हुए गृहाश्रम के व्यवहार को उत्तम रीति से पूर्ण करते हैं, वैसे ही जल और अग्नि संप्रयुक्त किये गये सम्पूर्ण व्यवहार को सिद्ध करते हैं और बहुत कोशों से भी मुहूर्त्तमात्र से वाहन आदि को शीघ्र पहुँचाते हैं, यह सब को जानना चाहिये॥३॥

न स राजा॑ व्यथते॒ यस्मि॒न्निन्द्र॑स्ती॒व्रं सोमं॒ पिब॑ति॒ गोस॑खायम्। आ स॑त्व॒नैरज॑ति॒ हन्ति॑ वृ॒त्रं क्षेति॑ क्षि॒तीः सु॒भगो॒ नाम॒ पुष्य॑न्॥

जिस राजा के वश में भूमि, जल, अग्नि और पवन हैं, उस राजा को किसी शत्रु आदि से भय कभी नहीं होता और वह राजा यशस्वी और प्रसिद्ध इस जगत् में होता है॥४॥

पुष्या॒त्क्षेमे॑ अ॒भि योगे॑ भवात्यु॒भे वृतौ॑ संय॒ती सं ज॑याति। प्रि॒यः सूर्ये॑ प्रि॒यो अ॒ग्ना भ॑वाति॒ य इन्द्रा॑य सु॒तसो॑मो॒ ददा॑शत्॥

जो मनुष्य अग्नि आदि विद्या की कामना करते हुए योगक्षेम के साधन में चतुर, दाता और न्याय में प्रीति करनेवाले होवें, वे ही दुष्टों को जीतने को समर्थ होवें॥५॥इस सूक्त में इन्द्र, शिल्पी, विद्वान् और युवावस्था में विवाह का वर्णन, शीघ्र वाहन का चलाना और बिजुली की विद्या का वर्णन किया, इस से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सैंतीसवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

उ॒रोष्ट॑ इन्द्र॒ राध॑सो वि॒भ्वी रा॒तिः श॑तक्रतो। अधा॑ नो विश्वचर्षणे द्यु॒म्ना सु॑क्षत्र मंहय॥

जो पूर्णविद्या से युक्त, असंख्य धन देने और सम्पूर्ण व्यवहारों को जाननेवाला, अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त उत्तम स्वभाव और नम्रता से युक्त होवे, वह राजा प्रजाओं के पालन करने को समर्थ होवे॥१॥

यदी॑मिन्द्र श्र॒वाय्य॒मिषं॑ शविष्ठ दधि॒षे। प॒प्र॒थे दी॑र्घ॒श्रुत्त॑मं॒ हिर॑ण्यवर्ण दु॒ष्टर॑म्॥

हे राजन्! जो पूर्णविद्या से युक्त, धन-धान्य, पशु और प्रजाओं का बढ़ाने और ब्रह्मचर्य्य से बड़ा पराक्रमवाला है, उसी को राजकर्म्मचारी कीजिये॥२॥

शुष्मा॑सो॒ ये ते॑ अद्रिवो मे॒हना॑ केत॒सापः॑। उ॒भा दे॒वाव॒भिष्ट॑ये दि॒वश्च॒ ग्मश्च॑ राजथः॥

जैसे सूर्य्य और चन्द्रमा सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करते हैं, वैसे ही प्रजा और राजा मिल के सम्पूर्ण राजधर्म्म को प्रकाशित करें॥३॥

उ॒तो नो॑ अ॒स्य कस्य॑ चि॒द्दक्ष॑स्य॒ तव॑ वृत्रहन्। अ॒स्मभ्यं॑ नृ॒म्णमा भ॑रा॒स्मभ्यं॑ नृमणस्यसे॥

वही श्रेष्ठ मनुष्यों में मुख्य हो, जो राज्य के रक्षण में तत्पर होकर वर्त्ताव करे॥४॥

नू त॑ आ॒भिर॒भिष्टि॑भि॒स्तव॒ शर्म॑ञ्छतक्रतो। इन्द्र॒ स्याम॑ सुगो॒पाः शूर॒ स्याम॑ सुगो॒पाः॥

हे राजन्! हम लोग सत्य प्रतिज्ञा और प्रीति से आपके गृह, शरीर, राज्य और सेना के सदा ही रक्षक होके कृतकृत्य होवें॥५॥इस सूक्त में इन्द्र विद्वान् राजा और प्रजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह अड़तीसवाँ सूक्त और नववाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

यदि॑न्द्र चित्र मे॒हनास्ति॒ त्वादा॑तमद्रिवः। राध॒स्तन्नो॑ विदद्वस उभयाह॒स्त्या भ॑र॥

वही राजा धन से युक्त वा कुशली होवे, जो वृष्टि के सदृश अन्यों के मनोरथों को वर्षावे॥१॥

यन्मन्य॑से॒ वरे॑ण्य॒मिन्द्र॑ द्यु॒क्षं तदा भ॑र। वि॒द्याम॒ तस्य॑ ते व॒यमकू॑पारस्य दा॒वने॑॥

हे विद्वन्! आप जिस-जिस उत्तम विषय को जानते हैं, उसका हम लोगों के प्रति उपदेश कीजिये, जिससे हम लोग आपके राजकार्य्य को पूर्णरूप से करने को समर्थ होवें॥२॥

यत्ते॑ दि॒त्सु प्र॒राध्यं॒ मनो॒ अस्ति॑ श्रु॒तं बृ॒हत्। तेन॑ दृ॒ळ्हा चि॑दद्रिव॒ आ वाजं॑ दर्षि सा॒तये॑॥

जिससे मनुष्य ब्रह्मचर्य्य, विद्या, योगाभ्यास और सत्यभाषण आदि के आचरण से सम्पूर्ण विद्याओं से युक्त मन को सिद्ध कर धर्म से सम्पूर्ण जनों के हित के लिये दुष्टों को दण्ड देता है, इससे वह अति उत्तम है॥३॥

मंहि॑ष्ठं वो म॒घोनां॒ राजा॑नं चर्षणी॒नाम्। इन्द्र॒मुप॒ प्रश॑स्तये पू॒र्वीभि॑र्जुजुषे॒ गिरः॑॥

हे मनुष्यो! जो राजा और जो प्रजाजन परस्पर अनुकूलता अर्थात् प्रीतिपूर्वक वर्त्ताव रखते, वे सदा आनन्दित होते हैं॥४॥

अस्मा॒ इत्काव्यं॒ वच॑ उ॒क्थमिन्द्रा॑य॒ शंस्य॑म्। तस्मा॑ उ॒ ब्रह्म॑वाहसे॒ गिरो॑ वर्ध॒न्त्यत्र॑यो॒ गिरः॑ शुम्भ॒न्त्यत्र॑यः॥

हे मनुष्यो! जो विद्वान् जन वाणियों को विद्याभ्यास से शुद्ध करते हैं, वे कवित्व और ऐश्वर्य्य को प्राप्त होते हैं॥५॥इस सूक्त में इन्द्र राजा प्रजा और विद्वानों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह उनचालीसवाँ सूक्त और दशम वर्ग समाप्त हुआ॥

आ या॒ह्यद्रि॑भिः सु॒तं सोमं॑ सोमपते पिब। वृष॑न्निन्द्र॒ वृष॑भिर्वृत्रहन्तम॥

जो ऐश्वर्य्य की इच्छा करें, वे अवश्य बल और बुद्धि की वृद्धि करें॥१॥

वृषा॒ ग्रावा॒ वृषा॒ मदो॒ वृषा॒ सोमो॑ अ॒यं सु॒तः। वृष॑न्निन्द्र॒ वृष॑भिर्वृत्रहन्तम॥

जो मेघ आदि पदार्थ हैं, उनसे मनुष्य बहुत कार्य्यों को सिद्ध कर सकते हैं॥२॥

वृषा॑ त्वा॒ वृष॑णं हुवे॒ वज्रि॑ञ्चि॒त्राभि॑रू॒तिभिः॑। वृष॑न्निन्द्र॒ वृष॑भिर्वृत्रहन्तम॥

मनुष्यों को चाहिये कि सूर्य्य के सदृश वर्त्तमान और सब प्रकार गुणों से सम्पन्न बलिष्ठ, न्यायकारी राजा को स्वीकार करें, जिससे सब प्रकार से रक्षा होवे॥३॥

ऋ॒जी॒षी व॒ज्री वृ॑ष॒भस्तु॑रा॒षाट्छु॒ष्मी राजा॑ वृत्र॒हा सो॑म॒पावा॑। यु॒क्त्वा हरि॑भ्या॒मुप॑ यासद॒र्वाङ्माध्यं॑दिने॒ सव॑ने मत्स॒दिन्द्रः॑॥

वही राजा प्रशंसित होवे, जो राज्य के अङ्गों और विद्याओं को ग्रहण करके प्रजापालन के लिये प्रयत्न करे॥४॥

यत्त्वा॑ सूर्य॒ स्व॑र्भानु॒स्तम॒सावि॑ध्यदासु॒रः। अक्षे॑त्रवि॒द्यथा॑ मु॒ग्धो भुव॑नान्यदीधयुः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे बिजुली गुप्त हुई अन्धकार में नहीं प्रकाशित होती है, वैसे ही विद्यारहित मूर्खजन का आत्मा नहीं प्रकाशित होता है और जैसे सूर्य्य के प्रकाश से सम्पूर्ण लोक प्रकाशित होते हैं, वैसे ही विद्वान् का आत्मा सम्पूर्ण सत्य और असत्य व्यवहारों को प्रकाशित करता है॥५॥

स्व॑र्भानो॒रध॒ यदि॑न्द्र मा॒या अ॒वो दि॒वो वर्त॑माना अ॒वाह॑न्। गू॒ळ्हं सूर्यं॒ तम॒साप॑व्रतेन तु॒रीये॑ण॒ ब्रह्म॑णाविन्द॒दत्रिः॑॥

जैसे गुप्त बिजुली के प्रकाश बड़े कार्य को सिद्ध करते हैं, वैसे ही विद्वानों की बुद्धियाँ सम्पूर्ण विज्ञान कार्य्यों को सिद्ध करती हैं॥६॥

मा मामि॒मं तव॒ सन्त॑मत्र इर॒स्या द्रु॒ग्धो भि॒यसा॒ नि गा॑रीत्। त्वं मि॒त्रो अ॑सि स॒त्यरा॑धा॒स्तौ मे॒हाव॑तं॒ वरु॑णश्च॒ राजा॑॥

हे धर्मिष्ठ राजा और सेना के स्वामी! अन्याय से किसी के पदार्थ को भी न ग्रहण करें, भय और न्याय के अच्छे प्रकार चलाने से राजधर्म से पृथक् न होवें और सदा ही सत्य धर्म में प्रिय हुए मित्र के सदृश प्रजाओं का पालन करो॥७॥

ग्राव्णो॑ ब्र॒ह्मा यु॑युजा॒नः स॑प॒र्यन् की॒रिणा॑ दे॒वान्नम॑सोप॒शिक्ष॑न्। अत्रिः॒ सूर्य॑स्य दि॒वि चक्षु॒राधा॒त्स्व॑र्भानो॒रप॑ मा॒या अ॑घुक्षत्॥

हे मनुष्यो! जो विद्वानों की सेवा करनेवाला, योगी, विद्या के प्रचार में प्रिय, विद्वान् होवे, वह जैसे बिजुली सूर्य और मेघ के सम्बन्ध से सृष्टि की पालना और दुःख का निवारण होता है, वैसे ही अध्यापक और अध्येता के सम्बन्ध से विद्या की रक्षा और अविद्या का निवारण करता है॥८॥

यं वै सूर्यं॒ स्व॑र्भानु॒स्तम॒सावि॑ध्यदासु॒रः। अत्र॑य॒स्तमन्व॑विन्दन्न॒ह्य१॒॑न्ये अश॑क्नुवन्॥

हे मनुष्यो! जैसे मेघ सूर्य्य को ढाप के अन्धकार को उत्पन्न करता है, वैसे ही अविद्या आत्मा का आवरण करके अज्ञान को उत्पन्न करती है और जैसे सूर्य मेघ का नाश और अन्धकार का निवारण करके प्रकाश करता है, वैसे ही प्राप्त हुई विद्या अविद्या का नाश करके विज्ञान के प्रकाश को उत्पन्न करती है, इस विवेचन को विद्वान् जन जानते हैं, अन्य नहीं॥९॥इस सूक्त में इन्द्र मेघ सूर्य विद्वान् अविद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चालीसवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

को नु वां॑ मित्रावरुणावृता॒यन्दि॒वो वा॑ म॒हः पार्थि॑वस्य वा॒ दे। ऋ॒तस्य॑ वा॒ सद॑सि॒ त्रासी॑थां नो यज्ञाय॒ते वा॑ पशु॒षो न वाजा॑न्॥

हे विद्वानो! जो आप लोग पृथिवी आदि पदार्थों की विद्या को जानते हैं, तो हम लोगों को उपदेश देवें और सभा में बैठ के सत्य न्याय को करें॥१॥

ते नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो अर्य॒मायुरिन्द्र॑ ऋभु॒क्षा म॒रुतो॑ जुषन्त। नमो॑भिर्वा॒ ये दध॑ते सुवृ॒क्तिं स्तोमं॑ रु॒द्राय॑ मी॒ळ्हुषे॑ स॒जोषाः॑॥

उन्हीं विद्वानों को उत्तम समझना चाहिये जो अपने सदृश सब प्राणियों में वर्त्ताव करें॥२॥

आ वां॒ येष्ठा॑श्विना हु॒वध्यै॒ वात॑स्य॒ पत्म॒न्रथ्य॑स्य पु॒ष्टौ। उ॒त वा॑ दि॒वो असु॑राय॒ मन्म॒ प्रान्धां॑सीव॒ यज्य॑वे भरध्वम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पढ़ने और पढ़ानेवाले विद्या के प्रचार के लिये प्रयत्न करते हैं, वैसे ही सब मनुष्यों को चाहिये कि निरन्तर प्रयत्न करें॥३॥

प्र स॒क्षणो॑ दि॒व्यः कण्व॑होता त्रि॒तो दि॒वः स॒जोषा॒ वातो॑ अ॒ग्निः। पू॒षा भगः॑ प्रभृ॒थे वि॒श्वभो॑जा आ॒जिं न ज॑ग्मुरा॒श्व॑श्वतमाः॥

हे मनुष्यो! आप लोग अग्नि आदि पदार्थों से दारिद्र्य का नाश करके धनवान् हूजिये॥४॥

प्र वो॑ र॒यिं यु॒क्ताश्वं॑ भरध्वं रा॒य एषेऽव॑से दधीत॒ धीः। सु॒शेव॒ एवै॑रौशि॒जस्य॒ होता॒ ये व॒ एवा॑ मरुतस्तु॒राणा॑म्॥

हे मनुष्यो! आप लोग अग्नि आदि पदार्थों की विद्या से धनवान् होकर सत्यता से सब अनाथों का पालन करो और दुष्टों का ताड़न करो॥५॥

प्र वो॑ वा॒युं र॑थ॒युजं॑ कृणुध्वं॒ प्र दे॒वं विप्रं॑ पनि॒तार॑म॒र्कैः। इ॒षु॒ध्यव॑ ऋत॒सापः॒ पुरं॑धी॒र्वस्वी॑र्नो॒ अत्र॒ पत्नी॒रा धि॒ये धुः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे पतिव्रता पत्नी पति आदि को सुख देती हैं, वैसे ही वायु के समान वेगयुक्त रथ को और धार्मिक विद्वानों को धारण कर सब को सुखयुक्त करो॥६॥

उप॑ व॒ एषे॒ वन्द्ये॑भिः शू॒षैः प्र य॒ह्वी दि॒वश्चि॒तय॑द्भिर॒र्कैः। उ॒षासा॒नक्ता॑ वि॒दुषी॑व॒ विश्व॒मा हा॑ वहतो॒ मर्त्या॑य य॒ज्ञम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे बड़ी विद्यायुक्त स्त्री सब जगह विद्यायुक्त स्त्रियों और विद्वानों में सत्कारयुक्त हो और सम्पूर्ण उत्तम गुणों को धारण करके विद्यायुक्त पति आदि की वृद्धि करती है, वैसे ही रात्रि और दिन सब व्यवहारों को धारण करके सब जगत् की वृद्धि करते हैं॥७॥

अ॒भि वो॑ अर्चे पो॒ष्याव॑तो॒ नॄन्वास्तो॒ष्पतिं॒ त्वष्टा॑रं॒ ररा॑णः। धन्या॑ स॒जोषा॑ धि॒षणा॒ नमो॑भि॒र्वन॒स्पतीँ॒रोष॑धी रा॒य एषे॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे तीव्र बुद्धि और विद्या से युक्त मनुष्य वैद्यक विद्या को जान कर मनुष्य आदिकों का पालन करते हैं, वैसे ही सब के हित की इच्छा करनेवाले मनुष्यों का सदा ही सत्कार करिये॥८॥

तु॒जे न॒स्तने॒ पर्व॑ताः सन्तु॒ स्वैत॑वो॒ ये वस॑वो॒ न वी॒राः। प॒नि॒त आ॒प्त्यो य॑ज॒तः सदा॑ नो॒ वर्धा॑न्नः॒ शंसं॒ नर्यो॑ अ॒भिष्टौ॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो जन वीरजनों के सदृश शत्रुओं के निवारण करने, मेघ के सदृश देनेवाले और वायु के सदृश वेगयुक्त विद्वान् हम लोगों की नित्य वृद्धि करें, उनकी हम लोग भी वृद्धि करें॥९॥

वृष्णो॑ अस्तोषि भू॒म्यस्य॒ गर्भं॑ त्रि॒तो नपा॑तम॒पां सु॑वृ॒क्ति। गृ॒णी॒ते अ॒ग्निरे॒तरी॒ न शू॒षैः शो॒चिष्के॑शो॒ नि रि॑णाति॒ वना॑॥

वही पुरुष बहुत धन और आदर को प्राप्त होता है कि जो सृष्टिक्रम की विद्या को जान कर कार्य्य की सिद्धि के लिये यत्न करता है॥१०॥

क॒था म॒हे रु॒द्रिया॑य ब्रवाम॒ कद्रा॒ये चि॑कि॒तुषे॒ भगा॑य। आप॒ ओष॑धीरु॒त नो॑ऽवन्तु॒ द्यौर्वना॑ गि॒रयो॑ वृ॒क्षके॑शाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सब मनुष्य अपने और अन्यों के रक्षण के लिये विद्वानों को मिल के प्रश्न और उत्तर से सत्य विद्याओं को प्राप्त हो और अन्यों के लिये उपदेश देकर ऐश्वर्य्य की वृद्धि कब करें, इस प्रकार नित्य उत्साह करें॥११॥

शृ॒णोतु॑ न ऊ॒र्जां पति॒र्गिरः॒ स नभ॒स्तरी॑याँ इषि॒रः परि॑ज्मा। शृ॒ण्वन्त्वापः॒ पुरो॒ न शु॒भ्राः परि॒ स्रुचो॑ बबृहा॒णस्याद्रेः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। वे ही जन विद्वान् होने योग्य हैं जो विद्वानों से पढ़ी हुई विद्या की परीक्षा को प्रसन्नता से देते हैं और वे ही अध्यापक विद्यार्थियों को विद्वान् कर सकते हैं, जो प्रीति से उत्तम प्रकार पढ़ा के विरोधियों के सदृश परीक्षा लेते हैं। जो इस प्रकार दोनों प्रयत्न करते हैं, वे नदी की उन्नति के समान अच्छे प्रकार बढ़ते हैं॥१२॥

वि॒दा चि॒न्नु म॑हान्तो॒ ये व॒ एवा॒ ब्रवा॑म दस्मा॒ वार्यं॒ दधा॑नाः। वय॑श्च॒न सु॒भ्व१॒॑ आव॑ यन्ति क्षु॒भा मर्त॒मनु॑यतं वध॒स्नैः॥

हे मनुष्यो! जैसे विद्वान् जन शुभ कर्म्म को करें और उपदेश देवें, वैसे ही आप लोग आचरण करो और जो मनुष्य को क्लेश देते हैं, उनको दण्ड दीजिये॥१३॥

आ दैव्या॑नि॒ पार्थि॑वानि॒ जन्मा॒पश्चाच्छा॒ सुम॑खाय वोचम्। वर्ध॑न्तां॒ द्यावो॒ गिर॑श्च॒न्द्राग्रा॑ उ॒दा व॑र्धन्ताम॒भिषा॑ता॒ अर्णाः॑॥

इस मन्त्र में [वाचकलुप्तो]पमालङ्कार है। हे मनुष्यो! आप लोग धर्म्मयुक्त कर्म्मों और श्रेष्ठ गुणों को ग्रहण करके अपनी कामनाओं और वाणी को शोभित करो, जैसे जल से नदियाँ और समुद्र बढ़ते हैं, वैसे ही धर्म्मयुक्त पुरुषार्थ से मनुष्य बढ़ते हैं॥१४॥

प॒देप॑दे मे जरि॒मा नि धा॑यि॒ वरू॑त्री वा श॒क्रा या पा॒युभि॑श्च। सिष॑क्तु मा॒ता म॒ही र॒सा नः॒ स्मत्सू॒रिभि॑र्ऋजु॒हस्त॑ ऋजु॒वनिः॑॥

हे मनुष्यो! जैसे माता सन्तानों की रक्षा करती है, वैसे ही विद्वानों के संग से प्राप्त और उत्तम प्रकार शिक्षित विद्या विद्वानों की सब प्रकार रक्षा करती है॥१५॥

क॒था दा॑शेम॒ नम॑सा सु॒दानू॑नेव॒या म॒रुतो॒ अच्छो॑क्तौ॒प्रश्र॑वसो म॒रुतो॒ अच्छो॑क्तौ। मा नोऽहि॑र्बु॒ध्न्यो॑ रि॒षे धा॑द॒स्माकं॑ भूदुपमाति॒वनिः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! आप लोग विद्वानों के प्रति प्रश्न करके कि हम लोग क्या देवें और किससे क्या ग्रहण करें, ऐसा निश्चय करके व्यवहार करो और जैसे मेघ स्वयं छिन्न-भिन्न होके अन्यों की रक्षा करता है, वैसे ही विद्वान् जन स्वयं दूसरे से अपकार किये हुये से छिन्न-भिन्न होकर भी अन्यों का सदा उपकार करते हैं॥१६॥

इति॑ चि॒न्नु प्र॒जायै॑ पशु॒मत्यै॒ देवा॑सो॒ वन॑ते॒ मर्त्यो॑ व॒ आदे॑वासो वनते॒ मर्त्यो॑ वः। अत्रा॑ शि॒वां त॒न्वो॑ धा॒सिम॒स्या ज॒रां चि॑न्मे॒ निर्ऋ॑तिर्जग्रसीत॥

हे विद्वान् जनो! आप लोग ऐसा प्रयत्न करो जिससे मनुष्यों की अवस्था बढ़े, जब तक मनुष्य वृद्ध नहीं होते, तब तक ये परीक्षक भी नहीं होते हैं॥१७॥

तां वो॑ देवाः सुम॒तिमू॒र्जय॑न्ती॒मिष॑मश्याम वसवः॒ शसा॒ गोः। सा नः॑ सु॒दानु॑र्मृ॒ळय॑न्ती दे॒वी प्रति॒ द्रव॑न्ती सुवि॒ताय॑ गम्याः॥

मनुष्य सदा उत्तम प्रकार घृत आदि के संस्कार से युक्त बुद्धि और बल के बढानेवाले अन्न का सदा भोग करें, जिससे बुद्धि यश और धन बढ़े॥१८॥

अ॒भि न॒ इळा॑ यू॒थस्य॑ मा॒ता स्मन्न॒दीभि॑रु॒र्वशी॑ वा गृणातु। उ॒र्वशी॑ वा बृहद्दि॒वा गृ॑णा॒नाभ्यू॑र्ण्वा॒ना प्र॑भृ॒थस्या॒योः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! आप लोग जो सत्यभाषण से युक्त वाणी को धारण करें तो आप लोगों की अवस्था बढ़े॥१९॥

सिष॑क्तु न ऊर्ज॒व्य॑स्य पु॒ष्टेः॥

जो जगत् का उपकार करनेवाला होता है, वही सम्पूर्ण विद्याओं के सम्बन्ध करने योग्य होता है॥२०॥इस सूक्त में विश्वेदेवों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह इकतालीसवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र शंत॑मा॒ वरु॑णं॒ दीधि॑ती॒ गीर्मि॒त्रं भग॒मदि॑तिं नू॒नम॑श्याः। पृष॑द्योनिः॒ पञ्च॑होता शृणो॒त्वतू॑र्तपन्था॒ असु॑रो मयो॒भुः॥

सब चर और अचर पदार्थों में आकाश के संयोग से वाणी वर्त्तमान है, उसको विद्वान् ही जान और कार्य्यों में व्यवहार में ला सकते हैं॥१॥

प्रति॑ मे॒ स्तोम॒मदि॑तिर्जगृभ्यात्सू॒नुं न मा॒ता हृद्यं॑ सु॒शेव॑म्। ब्रह्म॑ प्रि॒यं दे॒वहि॑तं॒ यदस्त्य॒हं मि॒त्रे वरु॑णे॒ यन्म॑यो॒भु॥

हे मनुष्यो! जो जगदीश्वर प्रेमभाव से स्तुति किया गया और जो उसकी आज्ञा का सेवन किया हो तो वह जैसे कृपा करनेवाली माता शीघ्र उत्पन्न हुए बालक पर वैसे धार्मिक उपासक जन पर दया करता है, जो जगदीश्वर सर्वत्र व्याप्त हुआ भी प्राणादिकों में पाया जाता है, उस सब काल में सुख देनेवाले परमात्मा की हम उपासना करें॥२॥

उदी॑रय क॒वित॑मं कवी॒नामु॒नत्तै॑नम॒भि मध्वा॑ घृ॒तेन॑। स नो॒ वसू॑नि॒ प्रय॑ता हि॒तानि॑ च॒न्द्राणि॑ दे॒वः स॑वि॒ता सु॑वाति॥

हे विद्वान् अध्यापक पुरुषो! आप लोग जो निश्चय करके सब से उत्तम, सम्पूर्ण विद्याओं से युक्त, श्रेष्ठ विद्वान् होवे, उसको गृहाश्रम न कर, ऐसा उपदेश दीजिये। जिससे संसार में वर्त्तमान मनुष्यों का बड़ा सुख बढ़े, क्योंकि जो निश्चय करके पूर्ण विद्यायुक्त होकर गृहाश्रम को करे, वह बहुत व्यापारवान् होने से, वीर्य्य आदि के नाश होने से, थोड़ी अवस्थायुक्त होकर निरन्तर मनुष्यों के हित करने को नहीं समर्थ होवे॥३॥

समि॑न्द्र णो॒ मन॑सा नेषि॒ गोभिः॒ सं सू॒रिभि॑र्हरिवः॒ सं स्व॒स्ति। सं ब्रह्म॑णा दे॒वहि॑तं॒ यदस्ति॒ सं दे॒वानां॑ सुम॒त्या य॒ज्ञिया॑नाम्॥

हे मनुष्यो! आप लोग सत्यवाणी, विद्वानों का सङ्ग, वेदविद्या और श्रेष्ठ बुद्धि के सहित उत्तम प्रकार शोभित हुए अभीष्ट सुख को प्राप्त हूजिये॥४॥

दे॒वो भगः॑ सवि॒ता रा॒यो अंश॒ इन्द्रो॑ वृ॒त्रस्य॑ सं॒जितो॒ धना॑नाम्। ऋ॒भु॒क्षा वाज॑ उ॒त वा॒ पुरं॑धि॒रव॑न्तु नो अ॒मृता॑सस्तु॒रासः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य अपने सदृश अन्यों के भी सुख-दुःख, हानि-लाभ, प्रतिष्ठा और अप्रतिष्ठा को मानते हैं, वे ही प्रशंसा के योग्य होते हैं॥५॥

म॒रुत्व॑तो॒ अप्र॑तीतस्य जि॒ष्णोरजू॑र्यतः॒ प्र ब्र॑वामा कृ॒तानि॑। न ते॒ पूर्वे॑ मघव॒न्नाप॑रासो॒ न वी॒र्यं१॒॑ नूत॑नः॒ कश्च॒नाप॑॥

विद्वानों को चाहिये कि उन्हीं प्रशंसित कर्मवालों के कृत्यों को अन्य जनों के लिये उपदेश देवें, जिनके कर्म अप्रतिहत अर्थात् नष्ट नहीं होते हैं॥६॥

उप॑ स्तुहि प्रथ॒मं र॑त्न॒धेयं॒ बृह॒स्पतिं॑ सनि॒तारं॒ धना॑नाम्। यः शंस॑ते स्तुव॒ते शंभ॑विष्ठः पुरू॒वसु॑रा॒गम॒ज्जोहु॑वानम्॥

वे ही जन प्रशंसा करने योग्य होते हैं, जो सब पदार्थ बाँट अर्थात् विभाग करके खाते हैं॥७॥

तवो॒तिभिः॒ सच॑माना॒ अरि॑ष्टा॒ बृह॑स्पते म॒घवा॑नः सु॒वीराः॑। ये अ॑श्व॒दा उ॒त वा॒ सन्ति॑ गो॒दा ये व॑स्त्र॒दाः सु॒भगा॒स्तेषु॒ रायः॑॥

जो धार्मिक राजा से रक्षा किये गये प्रशंसित धनों से युक्त दाताजन हैं, वे ही यशस्वी होके धनाढ्य होते हैं॥८॥

वि॒स॒र्माणं॑ कृणुहि वि॒त्तमे॑षां॒ ये भु॒ञ्जते॒ अपृ॑णन्तो न उ॒क्थैः। अप॑व्रतान्प्रस॒वे वा॑वृधा॒नान्ब्र॑ह्म॒द्विषः॒ सूर्या॑द्यावयस्व॥

हे मनुष्यो! जो लोग शुद्ध आचरणों से रहितों को शुद्ध आचरणों के सहित और अविद्वानों को विद्वान् करके नास्तिकों को रोक के अधर्म्म के आचरण से पृथक् होके निरन्तर सुखी करते, वे निरन्तर आदर करने योग्य होते हैं॥९॥

य ओह॑ते र॒क्षसो॑ दे॒ववी॑तावच॒क्रेभि॒स्तं म॑रुतो॒ नि या॑त। यो वः॒ शमीं॑ शशमा॒नस्य॒ निन्दा॑त्तु॒च्छ्यान्कामा॑न्करते सिष्विदा॒नः॥

हे राजा आदि मनुष्यो! जो बुरी शिक्षा से मनुष्यों को दूषित करते और निन्दा तथा विषयों की आसक्ति में प्रवृत्त कराते हैं, उनको निरन्तर दण्ड दीजिये॥१०॥

तमु ष्टुहि यः स्वि॒षुः सु॒धन्वा॒ यो विश्व॑स्य॒ क्षय॑ति भेष॒जस्य॑। यक्ष्वा॑ म॒हे सौ॑मन॒साय॑ रु॒द्रं नमो॑भिर्दे॒वमसु॑रं दुवस्य॥

हे राजन्! जो शस्त्र और अस्त्रों के चलाने के लिये युद्धविद्या में चतुर, वैद्यविद्या में निपुण और दुष्टों के दण्ड देनेवाले जन होवें, उनकी स्तुति कर अच्छे कर्म्मों में नियुक्त कर और अच्छे प्रकार सेवन कर समस्त राजकृत्यों को पूर्ण करो॥११॥

दमू॑नसो अ॒पसो॒ ये सु॒हस्ता॒ वृष्णः॒ पत्नी॑र्न॒द्यो॑ विभ्वत॒ष्टाः। सर॑स्वती बृहद्दि॒वोत रा॒का द॑श॒स्यन्ती॑र्वरिवस्यन्तु शु॒भ्राः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। कन्या और वर जब ब्रह्मचर्य्य से विद्यायें पूर्ण, युवावस्था और परस्पर की परीक्षा होवे, तब स्वयंवर विवाह से पति और पत्नी होकर सौभाग्यवान् होते हैं॥१२॥

प्र सू म॒हे सु॑शर॒णाय॑ मे॒धां गिरं॑ भरे॒ नव्य॑सीं॒ जाय॑मानाम्। य आ॑ह॒ना दु॑हि॒तुर्व॒क्षणा॑सु रू॒पा मि॑ना॒नो अकृ॑णोदि॒दं नः॑॥

हे मनुष्यो! समान रूपवाली कन्या को देखके ही उसका सदृश पति कराने के समान बुद्धि और शिक्षित वाणी को बढ़ाय के गृहाश्रम से उत्पन्न हुए सुख को सब मनुष्यों के लिये आप लोग प्राप्त कराओ॥१३॥

प्र सु॑ष्टु॒तिः स्त॒नय॑न्तं रु॒वन्त॑मि॒ळस्पतिं॑ जरितर्नू॒नम॑श्याः। यो अ॑ब्दि॒माँ उ॑दनि॒माँ इय॑र्ति॒ प्र वि॒द्युता॒ रोद॑सी उ॒क्षमा॑णः॥

हे मनुष्यो! जो मेघ भूमि में वर्त्तमान जीवों का पालन करनेवाला, बिजुली के साथ वृष्टि करता और शब्द करता हुआ भूमि को प्राप्त होता है, उसको जान के अन्यों को जनाइये॥१४॥

ए॒ष स्तोमो॒ मारु॑तं॒ शर्धो॒ अच्छा॑ रु॒द्रस्य॑ सू॒नूँर्यु॑व॒न्यूँरुद॑श्याः। कामो॑ रा॒ये ह॑वते मा स्व॒स्त्युप॑ स्तुहि॒ पृष॑दश्वाँ अ॒यासः॑॥

हे मनुष्यो! आप लोग वह्नि और मेघविद्या को जानकर पूर्ण मनोरथवाले हूजिये॥१५॥

प्रैष स्तोमः॑ पृथि॒वीम॒न्तरि॑क्षं॒ वन॒स्पतीँ॒रोष॑धी रा॒ये अ॑श्याः। दे॒वोदे॑वः सु॒हवो॑ भूतु॒ मह्यं॒ मा नो॑ मा॒ता पृ॑थि॒वी दु॑र्म॒तौ धा॑त्॥

सब स्त्री और पुरुष विद्वान् होकर बिजुली और मेघ आदि की विद्या को ग्रहण करें जिससे यह विद्या आप लोगों की माता के सदृश पालना करे और जैसे माता उत्तम शिक्षा से अपने सन्तानों को उत्तम करती है, वैसे ही मेघवृष्टिविद्या से युक्त भूमि उत्तम अन्न आदिकों को उत्पन्न करती है॥१६॥

उ॒रौ दे॑वा अनिबा॒धे स्या॑म॥

अध्यापक विद्वान् जनों को चाहिये कि सम्पूर्ण विद्या के प्रतिबन्धकों का निवारण करके सम्पूर्ण जनों को विद्वान् करें॥१७॥

सम॒श्विनो॒रव॑सा॒ नूत॑नेन मयो॒भुवा॑ सु॒प्रणी॑ती गमेम। आ नो॑ र॒यिं व॑हत॒मोत वी॒राना विश्वा॑न्यमृता॒ सौभ॑गानि॥

हे मनुष्यो! विद्वानों से रक्षित और बोध को प्राप्त हुए आप लोग लक्ष्मी और मनुष्यों के सहाय से सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों को प्राप्त हूजिये॥१८॥इस सूक्त में विश्वेदेव रुद्र और विद्वानों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह बयालीसवाँ सूक्त और उन्नीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ धे॒नवः॒ पय॑सा॒ तूर्ण्य॑र्था॒ अम॑र्धन्ती॒रुप॑ नो यन्तु॒ मध्वा॑। म॒हो रा॒ये बृ॑ह॒तीः स॒प्त विप्रो॑ मयो॒भुवो॑ जरि॒ता जो॑हवीति॥

जो मनुष्य यथार्थवक्ता विद्वानों के सङ्ग से शास्त्रों के विषय से युक्त वाणियों को ग्रहण करके उनकी कृपा से अन्यों के लिये उपदेश देवें, वे भी श्रेष्ठ होते हैं॥१॥

आ सु॑ष्टु॒ती नम॑सा वर्त॒यध्यै॒ द्यावा॒ वाजा॑य पृथि॒वी अमृ॑ध्रे। पि॒ता मा॒ता मधु॑वचाः सु॒हस्ता॒ भरे॑भरे नो य॒शसा॑वविष्टाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे माता और पिता अपने सन्तानों को उत्तम प्रकार शिक्षा देकर और वृद्धि करके विजयकारी करते हैं, वैसे ही प्राप्त हुई सूर्य्य और पृथिवी की विद्या सर्वत्र विजय को प्राप्त होती हैं॥२॥

अध्व॑र्यवश्चकृ॒वांसो॒ मधू॑नि॒ प्र वा॒यवे॑ भरत॒ चारु॑ शु॒क्रम्। होते॑व नः प्रथ॒मः पा॑ह्य॒स्य देव॒ मध्वो॑ ररि॒मा ते॒ मदा॑य॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे हवन करनेवाला होम से सब के हित को सिद्ध करता है, वैसे ही सब के हित के लिये वायु और जल की विद्या को विस्तारिये, जिससे सब हम लोग आनन्दित हुए वर्त्ताव करें॥३॥

दश॒ क्षिपो॑ युञ्जते बा॒हू अद्रिं॒ सोम॑स्य॒ या श॑मि॒तारा॑ सु॒हस्ता॑। मध्वो॒ रसं॑ सु॒गभ॑स्तिर्गिरि॒ष्ठां चनि॑श्चदद्दुदुहे शु॒क्रमं॒शुः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मनुष्य आदि प्राणी अङ्गुलियों से पदार्थों को ग्रहण करते और त्यागते हैं, वैसे ही सूर्य्य किरणों से भूमि के नीचे से जल को ग्रहण करके फेंकता अर्थात् वृष्टि करता है, ऐसा जानो॥४॥

असा॑वि ते जुजुषा॒णाय॒ सोमः॒ क्रत्वे॒ दक्षा॑य बृह॒ते मदा॑य। हरी॒ रथे॑ सु॒धुरा॒ योगे॑ अ॒र्वागिन्द्र॑ प्रि॒या कृ॑णुहि हू॒यमा॑नः॥

हे मनुष्यो! जिससे बुद्धि, बल, आनन्द और पुरुषार्थ बढ़े और अग्नि और घोड़े आदि के चलाने की विद्या प्राप्त होवे, वह कर्म्म सदा करना चाहिये॥५॥

आ नो॑ म॒हीम॒रम॑तिं स॒जोषा॒ ग्नां दे॒वीं नम॑सा रा॒तह॑व्याम्। मधो॒र्मदा॑य बृह॒तीमृ॑त॒ज्ञामाग्ने॑ वह प॒थिभि॑र्देव॒यानैः॑॥

वे ही विद्वान् होते हैं जो सब प्रकार से सब काल में विद्या की याचना करते हैं और वे ही विद्वान् हैं, जो धर्मयुक्त मार्ग से विरुद्ध कुछ भी आचरण नहीं करते हैं॥६॥

अ॒ञ्जन्ति॒ यं प्र॒थय॑न्तो॒ न विप्रा॑ व॒पाव॑न्तं॒ नाग्निना॒ तप॑न्तः। पि॒तुर्न पु॒त्र उ॒पसि॒ प्रेष्ठ॒ आ घ॒र्मो अ॒ग्निमृ॒तय॑न्नसादि॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे अध्यापक विद्वानो! तुम लोग जो जितेन्द्रिय उत्तम स्वभावयुक्त शीत-उष्ण, सुख-दुःख, आनन्द, शोक, निन्दा-स्तुति आदि द्वन्द्व को सहनेवाले अभिमान और मोह से रहित सत्य आचरणकर्त्ता और परोपकारप्रिय ब्रह्मचारी विद्यार्थी होवें, उनको पुरुषार्थ से विद्वान् करिये॥७॥

अच्छा॑ म॒ही बृ॑ह॒ती शंत॑मा॒ गीर्दू॒तो न ग॑न्त्व॒श्विना॑ हु॒वध्यै॑। म॒यो॒भुवा॑ स॒रथा या॑तम॒र्वाग्ग॒न्तं नि॒धिं धुर॑मा॒णिर्न नाभि॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। वे ही मनुष्य हैं जिनको जैसे राजा को दूत वैसे सम्पूर्ण शास्त्रों में प्रवीण वाणी प्राप्त होवे और वे ही भाग्यशाली हैं, जिनको धर्मयुक्त पुरुषार्थ से अतुल ऐश्वर्य्य प्राप्त होवे॥८॥

प्र तव्य॑सो॒ नम॑उक्तिं तु॒रस्या॒हं पू॒ष्ण उ॒त वा॒योर॑दिक्षि। या राध॑सा चोदि॒तारा॑ मती॒नां या वाज॑स्य द्रविणो॒दा उ॒त त्मन्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् जन विद्या के उपदेश और दान से मनुष्यों को उत्तम प्रकार शिक्षित करते हैं, वैसे ही तुम लोग भी करो॥९॥

आ नाम॑भिर्म॒रुतो॑ वक्षि॒ विश्वा॒ना रू॒पेभि॑र्जातवेदो हुवा॒नः। य॒ज्ञं गिरो॑ जरि॒तुः सु॑ष्टु॒तिं च॒ विश्वे॑ गन्त मरुतो॒ विश्व॑ ऊ॒ती॥

हे विद्वन्! आप सम्पूर्ण नाम और रूप आदिकों से सम्पूर्ण पदार्थों को सम्पूर्ण मनुष्यों के लिये साक्षात् कराओ, जिससे सब मनुष्य प्रशंसित होकर सब को प्रशंसित विद्यायुक्त सम्पादित करें॥१०॥

आ नो॑ दि॒वो बृ॑ह॒तः पर्व॑ता॒दा सर॑स्वती यज॒ता ग॑न्तु य॒ज्ञम्। हवं॑ दे॒वी जु॑जुषा॒णा घृ॒ताची॑ श॒ग्मां नो॒ वाच॑मुश॒ती शृ॑णोतु॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। उन्हीं को श्रेष्ठ वाणी प्राप्त होती है, जो सत्य की कामना करनेवाले, महाशय, परोपकारप्रिय, धर्मिष्ठ और विद्यार्थियों के परीक्षक होवें॥११॥

आ वे॒धसं॒ नील॑पृष्ठं बृ॒हन्तं॒ बृह॒स्पतिं॒ सद॑ने सादयध्वम्। सा॒दद्यो॑निं॒ दम॒ आ दी॑दि॒वांसं॒ हिर॑ण्यवर्णमरु॒षं स॑पेम॥

वे ही मनुष्य राज्य करने और बढ़ाने को समर्थ होवें, जो धर्मिष्ठ और किये हुए उपकारों को जाननेवाले, कुलीन विद्वानों को सभा में स्थित करें तथा वहाँ स्थापनसमय में सपथों से आप लोग अन्याय को कभी मत करो, ऐसा प्रलम्भन करावें॥१२॥

आ ध॑र्ण॒सिर्बृ॒हद्दि॑वो॒ ररा॑णो॒ विश्वे॑भिर्ग॒न्त्वोम॑भिर्हुवा॒नः। ग्ना वसा॑न॒ ओष॑धी॒रमृ॑ध्रस्त्रि॒धातु॑शृङ्गो वृष॒भो व॑यो॒धाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वान् तीन गुणों से युक्त प्रकृति के जानने, वाणी के जानने, नहीं हिंसा करने, औषधों से रोगों के निवारने और ब्रह्मचर्य्य आदि के बोध से अवस्था के बढ़ानेवाले होते हैं, वे ही संसार के पूज्य होते हैं॥१३॥

मा॒तुष्प॒दे प॑र॒मे शु॒क्र आ॒योर्वि॑प॒न्यवो॑ रास्पि॒रासो॑ अग्मन्। सु॒शेव्यं॒ नम॑सा रा॒तह॑व्याः॒ शिशुं॑ मृजन्त्या॒यवो॒ न वा॒से॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे माता शीघ्र उत्पन्न हुए बालक को उत्तम प्रकार शुद्ध करके उत्तम स्थान में रक्षा करती है, वैसे ही जो योगाभ्यास में चित्त को शुद्ध करते हैं, वे ऐश्वर्य्य के सहित सुख को प्राप्त होते हैं॥१४॥

बृ॒हद्वयो॑ बृह॒ते तुभ्य॑मग्ने धिया॒जुरो॑ मिथु॒नासः॑ सचन्त। दे॒वोदे॑वः सु॒हवो॑ भूतु॒ मह्यं॒ मा नो॑ मा॒ता पृ॑थि॒वी दु॑र्म॒तौ धा॑त्॥

हे मनुष्यो! जो अवस्था और विद्या में वृद्ध आप लोगों को विद्याओं से सम्बन्धित करते हैं और माता के सदृश कृपा से रक्षा करते हैं, वे आप लोगों के पूज्य हों॥१५॥

उ॒रौ दे॑वा अनिबा॒धे स्या॑म॥

विद्वानों को चाहिये कि सब मनुष्य जैसे विघ्नरहित होवें, वैसा करें॥१६॥

सम॒श्विनो॒रव॑सा॒ नूत॑नेन मयो॒भुवा॑ सु॒प्रणी॑ती गमेम। आ नो॑ र॒यिं व॑हत॒मोत वी॒राना विश्वा॑न्यमृता॒ सौभ॑गानि॥

जो अध्यापक और उपदेशक जन सब मनुष्यों को नवीन और प्राचीन विद्या से युक्त कर ऐश्वर्य्य को प्राप्त कराते हैं, वे सदा ही प्रशंसित होते हैं॥१७॥इस सूक्त में सम्पूर्ण विद्वानों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह तेतालीसवाँ सूक्त और बाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

तं प्र॒त्नथा॑ पू॒र्वथा॑ वि॒श्वथे॒मथा॑ ज्ये॒ष्ठता॑तिं बर्हि॒षदं॑ स्व॒र्विद॑म्। प्र॒ती॒ची॒नं वृ॒जनं॑ दोहसे गि॒राशुं जय॑न्त॒मनु॒ यासु॒ वर्ध॑से॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो प्राचीन रीति से प्राचीन उत्तम राजाओं के तुल्य पिता के सदृश राज्य का उत्तम प्रकार पालन करके पूर्ण बलयुक्त सेना को कर शीघ्र विजय को प्राप्त हुई प्रजाओं को सुख के अनुकूल वर्त्तावें, उन्हीं को उत्तम अधिकार में नियुक्त करिये, जिससे राजा और प्रजा का निरन्तर सुख बढ़े॥१॥

श्रि॒ये सु॒दृशी॒रुप॑रस्य॒ याः स्व॑र्वि॒रोच॑मानः क॒कुभा॑मचो॒दते॑। सु॒गो॒पा अ॑सि॒ न दभा॑य सुक्रतो प॒रो मा॒याभि॑र्ऋ॒त आ॑स॒ नाम॑ ते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य दिशाओं का प्रकाशक हुआ सब प्रजाओं को सुख देने के लिये वृष्टि करनेवाला होता है, वैसे ही सब प्रजाओं को न्याय से प्रकाशित करके विद्या और सुख का बढ़ानेवाला राजा होता है॥२॥

अत्यं॑ ह॒विः स॑चते॒ सच्च॒ धातु॒ चारि॑ष्टगातुः॒ स होता॑ सहो॒भरिः॑। प्र॒सर्स्रा॑णो॒ अनु॑ ब॒र्हिर्वृषा॒ शिशु॒र्मध्ये॒ युवा॒जरो॑ वि॒स्रुहा॑ हि॒तः॥

हे राजन्! जैसे हवन करनेवाला सुगन्धि आदि से युक्त, अग्नि में हवन किये हुए द्रव्य से वायु, वृष्टि और जल की शुद्धि के द्वारा संसार में सुख का उपकार करता है, वैसे न्याय और कीर्ति की वासना से युक्त दी हुई विद्या से राज्य देश को सुखी करिये॥३॥

प्र व॑ ए॒ते सु॒युजो॒ याम॑न्नि॒ष्टये॒ नीची॑र॒मुष्मै॑ य॒म्य॑ ऋता॒वृधः॑। सु॒यन्तु॑भिः सर्वशा॒सैर॒भीशु॑भिः॒ क्रिवि॒र्नामा॑नि प्रव॒णे मु॑षायति॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सूर्य्य सब के सुख के लिये जल को खींचता है, वैसे ही राजा न्यायमार्ग से सम्पूर्ण प्रजाओं को चलाता हुआ उत्तम विज्ञान से युक्त भृत्यों के सहित सब मनुष्यों के हित का सम्पादन करता है॥४॥

सं॒जर्भु॑राण॒स्तरु॑भिः सुते॒गृभं॑ वया॒किनं॑ चि॒त्तग॑र्भासु सु॒स्वरुः॑। धा॒र॒वा॒केष्वृ॑जुगाथ शोभसे॒ वर्ध॑स्व॒ पत्नी॑र॒भि जी॒वो अ॑ध्व॒रे॥

जो मनुष्य स्थावर, जङ्गमरूप प्रजाओं से उपकार ग्रहण कर सकें, वे सदा ही आनन्दित होवें॥५॥

या॒दृगे॒व ददृ॑शे ता॒दृगु॑च्यते॒ सं छा॒यया॑ दधिरे सि॒ध्रया॒प्स्वा। म॒हीम॒स्मभ्य॑मुरु॒षामु॒रु ज्रयो॑ बृ॒हत्सु॒वीर॒मन॑पच्युतं॒ सहः॑॥

जो अन्य जनों में विद्या के बल और धन के संचय को स्थापित करते हैं और जिनसे जैसा आत्मा में वर्त्तमान है, वैसा मन में और जैसा मन में वैसा वाणी से कहा जाता है, वे ही यथार्थवक्ता जानने योग्य हैं॥६॥

वेत्यग्रु॒र्जनि॑वा॒न्वा अति॒ स्पृधः॑ समर्य॒ता मन॑सा॒ सूर्यः॑ क॒विः। घ्रं॒सं रक्ष॑न्तं॒ परि॑ वि॒श्वतो॒ गय॑म॒स्माकं॒ शर्म॑ वनव॒त्स्वाव॑सुः॥

जो मनुष्य विद्या और विनय को प्राप्त, दुष्टों में उग्र और धार्मिको में शान्त और सदा ही दुष्टों के साथ युद्ध करने से प्रजाओं की रक्षा करता हुआ सुख में वास करावे, वह सूर्य्य के सदृश प्रकाशित यशवाला हो॥७॥

ज्यायां॑सम॒स्य य॒तुन॑स्य के॒तुन॑ ऋषिस्व॒रं च॑रति॒ यासु॒ नाम॑ ते। या॒दृश्मि॒न्धायि॒ तम॑प॒स्यया॑ विद॒द्य उ॑ स्व॒यं वह॑ते॒ सो अरं॑ करत्॥

जो मनुष्य यथार्थवक्ता जन के समीप से प्राप्त हुए बोध से स्वयं उत्तम होकर अन्यों को उत्तम प्रकार भूषित करें, वे सुख को प्राप्त होते हैं॥८॥

स॒मु॒द्रमा॑सा॒मव॑ तस्थे अग्रि॒मा न रि॑ष्यति॒ सव॑नं॒ यस्मि॒न्नाय॑ता। अत्रा॒ न हार्दि॑ क्रव॒णस्य॑ रेजते॒ यत्रा॑ म॒तिर्वि॒द्यते॑ पूत॒बन्ध॑नी॥

जो प्रजाओं के मध्य में अन्तरिक्ष के सदृश सुखरूपी अवकाश देनेवाले और नहीं हिंसा करनेवाले बुद्धिमान् उपदेशक विद्यमान हैं, वे ही सुखयुक्त होते हैं॥९॥

सहि क्ष॒त्रस्य॑ मन॒सस्य॒ चित्ति॑भिरेवाव॒दस्य॑ यज॒तस्य॒ सध्रेः॑। अ॒व॒त्सा॒रस्य॑ स्पृणवाम॒ रण्व॑भिः॒ शवि॑ष्ठं॒ वाजं॑ वि॒दुषा॑ चि॒दर्ध्य॑म्॥

जो मनुष्य दिन-रात्रि राज्य की उन्नति करने की इच्छा करते हैं, वे महाराज होते हैं॥१०॥

श्ये॒न आ॑सा॒मदि॑तिः क॒क्ष्यो॒३॒॑ मदो॑ वि॒श्ववा॑रस्य यज॒तस्य॑ मा॒यिनः॑। सम॒न्यम॑न्यमर्थय॒न्त्येत॑वे वि॒दुर्वि॒षाणं॑ परि॒पान॒मन्ति॒ ते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वान् जन दुष्ट बुद्धिवालों को श्रेष्ठ बुद्धियुक्त करते हैं और श्येन पक्षी के सदृश दुष्टों का नाश करते हैं, वे जन कल्याणकारक हैं॥११॥

स॒दा॒पृ॒णो य॑ज॒तो वि द्विषो॑ वधीद्बाहुवृ॒क्तः श्रु॑त॒वित्तर्यो॑ वः॒ सचा॑। उ॒भा स वरा॒ प्रत्ये॑ति॒ भाति॑ च॒ यदीं॑ ग॒णं भज॑ते सुप्र॒याव॑भिः॥

जो बहुत शास्त्रों को सुननेवाले, न्याय का आचरण करनेवाले जन दुष्टों का नाश करते हुए श्रेष्ठों का पालन करते हैं, वे सदा प्रसन्न होते हैं॥१२॥

सु॒तं॒भ॒रो यज॑मानस्य॒ सत्प॑ति॒र्विश्वा॑सा॒मूधः॒ स धि॒यामु॒दञ्च॑नः। भर॑द्धे॒नू रस॑विच्छिश्रिये॒ पयो॑ऽनुब्रुवा॒णो अध्ये॑ति॒ न स्व॒पन्॥

वही उत्तम पुरुष है, जो कृतज्ञ और यथार्थवक्ता जनों की सेवा में प्रिय, सम्पूर्ण मनुष्यों के लिये बुद्धि देने और गो के सदृश सत्य उपदेश का वर्षानेवाला और अविद्या आदि क्लेशों से पृथक् वर्त्तमान है, वही सब से मेल करने योग्य है॥१३॥

यो जा॒गार॒ तमृचः॑ कामयन्ते॒ यो जा॒गार॒ तमु॒ सामा॑नि यन्ति। यो जा॒गार॒ तम॒यं सोम॑ आह॒ तवा॒हम॑स्मि स॒ख्ये न्यो॑काः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो वेदविद्या को प्राप्त होने की इच्छा करते हैं, उनको ही वेदविद्या प्राप्त होती और जो मनुष्य आदिकों के साथ मित्रता करता है, वह बहुत सुख को प्राप्त होता है॥१४॥

अ॒ग्निर्जा॑गार॒ तमृचः॑ कामयन्ते॒ऽग्निर्जा॑गार॒ तमु॒ सामा॑नि यन्ति। अ॒ग्निर्जा॑गार॒ तम॒यं सोम॑ आह॒ तवा॒हम॑स्मि स॒ख्ये न्यो॑काः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य आलस्य से रहित पुरुषार्थी धार्मिक होते और जितेन्द्रिय विद्यार्थी होते हैं, उन्हीं को विद्या और उत्तम शिक्षा प्राप्त होती है॥१५॥इस सूक्त में सूर्य मेघ और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चवालीसवाँ सूक्त, तीसरा अनुवाक और पच्चीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

वि॒दा दि॒वो वि॒ष्यन्नद्रि॑मु॒क्थैरा॑य॒त्या उ॒षसो॑ अ॒र्चिनो॑ गुः। अपा॑वृत व्र॒जिनी॒रुत्स्व॑र्गा॒द्वि दुरो॒ मानु॑षीर्दे॒व आ॑वः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो प्रभातकाल और सूर्य्य के सदृश मनुष्यरूप प्रजाओं में विद्या और धर्म्म के प्रकाश करनेवाले होवें, वे ही अध्यापक और उपदेशक होवें॥१॥

वि सूर्यो॑ अ॒मतिं॒ न श्रियं॑ सा॒दोर्वाद्गवां॑ मा॒ता जा॑न॒ती गा॑त्। धन्व॑र्णसो न॒द्यः१॒॑ खादो॑अर्णाः॒ स्थूणे॑व॒ सुमि॑ता दृंहत॒ द्यौः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो सूर्य्य के सदृश विद्या माता के सदृश कृपा, नदी के सदृश उपकार और खम्भ के सदृश धारणा करते हैं, वे ही श्रीमान् और सदा सुखी होते हैं॥२॥

अ॒स्मा उ॒क्थाय॒ पर्व॑तस्य॒ गर्भो॑ म॒हीनां॑ ज॒नुषे॑ पू॒र्व्याय॑। वि पर्व॑तो॒ जिही॑त॒ साध॑त॒ द्यौरा॒विवा॑सन्तो दसयन्त॒ भूम॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्यार्थियों में विद्या के गर्भ की धारण करते हैं, वे मेघ के सदृश सब के सुखकारक होते हैं॥३॥

सू॒क्तेभि॑र्वो॒ वचो॑भिर्दे॒वजु॑ष्टै॒रिन्द्रा॒ न्व१॒॑ग्नी अव॑से हु॒वध्यै॑। उ॒क्थेभि॒र्हि ष्मा॑ क॒वयः॑ सुय॒ज्ञा आ॒विवा॑सन्तो म॒रुतो॒ यज॑न्ति॥

जो विद्वान् जन सब के लिये सुख, विद्या और विज्ञान का सेवन करते हुए अग्नि आदि की विद्या को सब के लिये देते हैं, वे ही उत्तम होते हैं॥४॥

एतो॒ न्व१॒॑द्य सु॒ध्यो॒३॒॑ भवा॑म॒ प्र दु॒च्छुना॑ मिनवामा॒ वरी॑यः। आ॒रे द्वेषां॑सि सनु॒तर्द॑धा॒माया॑म॒ प्राञ्चो॒ यज॑मान॒मच्छ॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य विज्ञान को बढ़ाते, दुष्टों का निवारण करते और द्वेष आदि दोषों से रहित हुए सनातन सत्य को धारण करते हैं, वे अत्यन्त प्रशंसा के योग्य होते हैं॥५॥

एता॒ धियं॑ कृ॒णवा॑मा सखा॒योऽप॒ या मा॒ताँ ऋ॑णु॒त व्र॒जं गोः। यया॒ मनु॑र्विशिशि॒प्रं जि॒गाय॒ यया॑ व॒णिग्व॒ङ्कुरापा॒ पुरी॑षम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि परस्पर में मित्र होकर बुद्धि को बढ़ाय औरों के लिये विशेष ज्ञान अच्छे प्रकार देवें, जैसे वैश्य धन को प्राप्त होकर बढ़ता है, वैसे उत्तम बुद्धि को पाकर बढ़े॥६॥

अनू॑नो॒दत्र॒ हस्त॑यतो॒ अद्रि॒रार्च॒न्येन॒ दश॑ मा॒सो नव॑ग्वाः। ऋ॒तं य॒ती स॒रमा॒ गा अ॑विन्द॒द्विश्वा॑नि स॒त्याङ्गि॑राश्चकार॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सर्वदा सत्य आचरण से युक्त होकर सब के उपकार को सिद्ध करते हैं, वे इस संसार में धर्मात्मा गिने जाते हैं॥७॥

विश्वे॑ अ॒स्या व्युषि॒ माहि॑नायाः॒ सं यद्गोभि॒रङ्गि॑रसो॒ नव॑न्त। उत्स॑ आसां पर॒मे स॒धस्थ॑ ऋ॒तस्य॑ प॒था स॒रमा॑ विद॒द्गाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रभातवेला में प्राणी प्रसन्न होते हैं, वैसे ही सन्देहरहित होकर मनुष्य आनन्दित होते हैं॥८॥

आ सूर्यो॑ यातु स॒प्ताश्वः॒ क्षेत्रं॒ यद॑स्योर्वि॒या दी॑र्घया॒थे। र॒घुः श्ये॒नः प॑तय॒दन्धो॒ अच्छा॒ युवा॑ क॒विर्दी॑दय॒द्गोषु॒ गच्छ॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जिस सूर्य्य में सात तत्त्व हैं और जो अपने चक्र को छोड़ के इधर-उधर नहीं जाता है और बहुत भूगोलों के मध्य में एक ही प्रकाशित है, वैसे ही सब पुरुष होवें॥९॥

आ सूर्यो॑ अरुहच्छु॒क्रमर्णोऽयु॑क्त॒ यद्ध॒रितो॑ वी॒तपृ॑ष्ठाः। उ॒द्ना न नाव॑मनयन्त॒ धीरा॑ आशृण्व॒तीरापो॑ अ॒र्वाग॑तिष्ठन्॥

जो मनुष्य सूर्य्य और जल आदि की विद्याओं को जान के नौका आदि को चलावें, वे लक्ष्मीवान् होते हैं॥१०॥

धियं॑ वो अ॒प्सु द॑धिषे स्व॒र्षां ययात॑र॒न्दश॑ मा॒सो नव॑ग्वाः। अ॒या धि॒या स्या॑म दे॒वगो॑पा अ॒या धि॒या तु॑तुर्या॒मात्यंहः॑॥

जो बुद्धिमान्, धनवान् और बल से युक्त होकर सब की रक्षा करते हैं, वे दुःखों के पार होते हैं॥११॥इस सूक्त में सूर्य और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पैंतालीसवाँ सूक्त और सत्ताईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

हयो॒ न वि॒द्वाँ अ॑युजि स्व॒यं धु॒रि तां व॑हामि प्र॒तर॑णीमव॒स्युव॑म्। नास्या॑ वश्मि वि॒मुचं॒ नावृतं॒ पुन॑र्वि॒द्वान्प॒थः पु॑रए॒त ऋ॒जु ने॑षति॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे विद्वानों से उत्तम प्रकार शिक्षित घोड़े कार्यों को सिद्ध करते हैं, वैसे ही प्राप्त हुई विद्या और शिक्षा जिनको, ऐसे मनुष्य कार्य्य की सिद्धि को प्राप्त होते हैं॥१॥

अग्र॒ इन्द्र॒ वरु॑ण॒ मित्र॒ देवाः॒ शर्धः॒ प्र य॑न्त॒ मारु॑तो॒त वि॑ष्णो। उ॒भा नास॑त्या रु॒द्रो अध॒ ग्नाः पू॒षा भगः॒ सर॑स्वती जुषन्त॥

हे मनुष्यो! आप लोगों को चाहिये कि विद्या, शरीर, बल और योग की वृद्धि करके अग्नि आदि विद्या को स्वीकार करें॥२॥

इ॒न्द्रा॒ग्नी मि॒त्रावरु॒णादि॑तिं॒ स्वः॑ पृथि॒वीं द्यां म॒रुतः॒ पर्व॑ताँ अ॒पः। हु॒वे विष्णुं॑ पू॒षणं॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिं॒ भ॒गं नु शंसं॑ सवि॒तार॑मू॒तये॑॥

मनुष्यों को विद्युद्विद्या अवश्य स्वीकार करनी चाहिये॥३॥

उ॒त नो॒ विष्णु॑रु॒त वातो॑ अ॒स्रिधो॑ द्रविणो॒दा उ॒त सोमो॒ मय॑स्करत्। उ॒त ऋ॒भव॑ उ॒त रा॒ये नो॑ अ॒श्विनो॒त त्वष्टो॒त विभ्वानु॑ मंसते॥

जो मनुष्य ईश्वर आदि पदार्थों का सेवन करते हैं, वे जानने योग्य पदार्थों के जाननेवाले होते हैं॥४॥

उ॒त त्यन्नो॒ मारु॑तं॒ शर्ध॒ आ ग॑मद्दिविक्ष॒यं य॑ज॒तं ब॒र्हिरा॒सदे॑। बृह॒स्पतिः॒ शर्म॑ पू॒षोत नो॑ यमद्वरू॒थ्यं१॒॑ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा॥

जो मनुष्य वायु के गुणों को विशेषकर जानें, वे सब प्रकार से धन को प्राप्त होवें॥५॥

उ॒त त्ये नः॒ पर्व॑तासः सुश॒स्तयः॑ सुदी॒तयो॑ न॒द्य१॒॑स्त्राम॑णे भुवन्। भगो॑ विभ॒क्ता शव॒साव॒सा ग॑मदुरु॒व्यचा॒ अदि॑तिः श्रोतु मे॒ हव॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मेघ के सदृश संसार के पालन करनेवाले प्रशंसित न्याय का विधान कर सम्पूर्ण प्रजा की विनती सुन के न्याय करें, वे विनययुक्त होते हैं॥६॥

दे॒वानां॒ पत्नी॑रुश॒तीर॑वन्तु नः॒ प्राव॑न्तु नस्तु॒जये॒ वाज॑सातये। याः पार्थि॑वासो॒ या अ॒पामपि॑ व्र॒ते ता नो॑ देवीः सुहवाः॒ शर्म॑ यच्छत॥

जैसे राजा लोग पुरुषों का न्याय करें, वैसे ही स्त्रियों के न्याय को रानियाँ करें॥७॥

उ॒त ग्ना व्य॑न्तु दे॒वप॑त्नीरिन्द्रा॒ण्य१॒॑ग्नाय्य॒श्विनी॒ राट्। आ रोद॑सी वरुणा॒नी शृ॑णोतु॒ व्यन्तु॑ दे॒वीर्य ऋ॒तुर्जनी॑नाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपालङ्कार है। जैसे राजाओं के समीप पुरुष मन्त्री होते हैं, वैसे रानियों के समीप स्त्रियाँ मन्त्री होवें॥८॥यह श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य महाविद्वान् विरजानन्द सरस्वती स्वामीजी के शिष्य श्रीमद्दयानद सरस्वती स्वामीजी से रचे हुए, उत्तम प्रमाणयुक्त ऋग्वेदभाष्य के पाँचवें मण्डल में छयालीसवाँ सूक्त और चतुर्थ अष्टक में द्वितीय अध्याय और अट्ठाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र॒यु॒ञ्ज॒ती दि॒व ए॑ति ब्रुवा॒णा म॒ही मा॒ता दु॑हि॒तुर्बो॒धय॑न्ती। आ॒विवा॑सन्ती युव॒तिर्म॑नी॒षा पि॒तृभ्य॒ आ सद॑ने॒ जोहु॑वाना॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो माता पाँचवें वर्ष के प्रारम्भ होने तक सन्तानों को बोध देकर पाँचवें वर्ष में पिता को सौंपती है और पिता भी तीन वर्ष पर्य्यन्त शिक्षा देकर आचार्य्य को पुत्रों को और आचार्य्य की स्त्री को कन्याओं को ब्रह्मचर्य से विद्याग्रहण के लिये सौंपता है और वे आचार्यादि भी नियत समयपर्य्यन्त ब्रह्मचर्य्य को समाप्त करा के और विद्याओं को प्राप्त करा के तथा व्यवहार की शिक्षा देकर गृहाश्रम में प्रविष्ट कराते हैं, वे आचार्य और आचार्य्या कुल के भूषक और शोभाकारक होते हैं॥१॥

अ॒जि॒रास॒स्तद॑प॒ ईय॑माना आतस्थि॒वांसो॑ अ॒मृत॑स्य॒ नाभि॑म्। अ॒न॒न्तास॑ उ॒रवो॑ वि॒श्वतः॑ सीं॒ परि॒ द्यावा॑पृथि॒वी य॑न्ति॒ पन्थाः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो आकाश आदि अनन्त पदार्थ हैं, उनमें वर्त्तमान असंख्य परमाणु और [वे] कारण के मध्य में कारण से उत्पन्न हुए सूर्य्य और प्रकाश के सदृश विस्तीर्ण हैं॥२॥

उ॒क्षा स॑मु॒द्रो अ॑रु॒षः सु॑प॒र्णः पूर्व॑स्य॒ योनिं॑ पि॒तुरा वि॑वेश। मध्ये॑ दि॒वो निहि॑तः॒ पृश्नि॒रश्मा॒ वि च॑क्रमे॒ रज॑सस्पा॒त्यन्तौ॑॥

हे मनुष्यो! आप लोग कार्य्य और कारण को जानकर उनके संयोग से उत्पन्न हुए वस्तुओं को कार्य्यों में उपयुक्त करके अपने अभीष्ट की सिद्धि करें॥३॥

च॒त्वार॑ ईं बिभ्रति क्षेम॒यन्तो॒ दश॒ गर्भं॑ च॒रसे॑ धापयन्ते। त्रि॒धात॑वः पर॒मा अ॑स्य॒ गावो॑ दि॒वश्च॑रन्ति॒ परि॑ स॒द्यो अन्ता॑न्॥

हे मनुष्यो! इस संसार के धारण करनेवाले पृथिवी, जल, तेज और पवन हैं और वे कारण से उत्पन्न हो के उपयुक्त होते हैं॥४॥

इ॒दं वपु॑र्नि॒वच॑नं जनास॒श्चर॑न्ति॒ यन्न॒द्य॑स्त॒स्थुरापः॑। द्वे यदीं॑ बिभृ॒तो मा॒तुर॒न्ये इ॒हेह॑ जा॒ते य॒म्या॒३॒॑ सब॑न्धू॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे रात्रि-दिन क्रम से व्यवहार करते हैं, वैसे क्रम से आहार-विहार करके शरीर की रक्षा करनी चाहिये॥५॥

वि त॑न्वते॒ धियो॑ अस्मा॒ अपां॑सि॒ वस्त्रा॑ पु॒त्राय॑ मा॒तरो॑ वयन्ति। उ॒प॒प्र॒क्षे वृष॑णो॒ मोद॑माना दि॒वस्प॒था व॒ध्वो॑ य॒न्त्यच्छ॑॥

जो स्त्री और पुरुष ब्रह्मचर्य्य से विद्याओं को पढ़ कर युवावस्था में वर्त्तमान गृहाश्रम की कामना करते हुए परस्पर प्रीति से स्वयंवर विवाह करके धर्म से सन्तानों को उत्पन्न कर और उत्तम प्रकार शिक्षा देकर शरीर और आत्मा के बल का विस्तार करते हैं और जैसे वस्त्रों से शरीर को वैसे गृहाश्रम के व्यवहार का आच्छादन करके आनन्द करते हैं॥६॥

तद॑स्तु मित्रावरुणा॒ तद॑ग्ने॒ शं योर॒स्मभ्य॑मि॒दम॑स्तु श॒स्तम्। अ॒शी॒महि॑ गा॒धमु॒त प्र॑ति॒ष्ठां नमो॑ दि॒वे बृ॑ह॒ते साद॑नाय॥

जो मनुष्य यथार्थवक्ता विद्वानों और अध्यापकों का सत्कार करते हैं, वे ही सुख को प्राप्त होते हैं॥७॥इस सूक्त में स्त्री पुरुषादि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सैंतालीसवाँ सूक्त और पहिला वर्ग समाप्त हुआ॥

कदु॑ प्रि॒याय॒ धाम्ने॑ मनामहे॒ स्वक्ष॑त्राय॒ स्वय॑शसे म॒हे व॒यम्। आ॒मे॒न्यस्य॒ रज॑सो॒ यद॒भ्र आँ अ॒पो वृ॑णा॒ना वि॑त॒नोति॑ मा॒यिनी॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि निरन्तर इस प्रकार से इच्छा करें, जिससे राज्य, यश और धर्म्म बढ़े, वैसे ही स्वीकार करके अनुष्ठान करें॥१॥

ता अ॑त्नत व॒युनं॑ वी॒रव॑क्षणं समा॒न्या वृ॒तया॒ विश्व॒मा रजः॑। अपो॒ अपा॑ची॒रप॑रा॒ अपे॑जते॒ प्र पूर्वा॑भिस्तिरते देव॒युर्जनः॑॥

हे मनुष्यो! आप लोग विद्वानों के सङ्ग की कामना करते हुए सम्पूर्ण विद्याओं को ग्रहण कीजिए॥२॥

आ ग्राव॑भिरह॒न्ये॑भिर॒क्तुभि॒र्वरि॑ष्ठं॒ वज्र॒मा जि॑घर्ति मा॒यिनि॑। श॒तं वा॒ यस्य॑ प्र॒चर॒न्त्स्वे दमे॑ संव॒र्तय॑न्तो॒ वि च॑ वर्तय॒न्नहा॑॥

जो स्त्री और पुरुष भयरहित हों तो सूर्य्य और बिजुली के सदृश दिन-रात्रि पुरुषार्थ को करके ऐश्वर्य्य से प्रकाशित हों॥३॥

ताम॑स्य री॒तिं प॑र॒शोरि॑व॒ प्रत्यनी॑कमख्यं भु॒जे अ॑स्य॒ वर्प॑सः। सचा॒ यदि॑ पितु॒मन्त॑मिव॒ क्षयं॒ रत्नं॒ दधा॑ति॒ भर॑हूतये वि॒शे॥

प्रजा की पालना के लिये गूढनीति से राजा व्यवहारों का अनुष्ठान करे और सब की पालना यथार्थभाव से करे॥४॥

स जि॒ह्वया॒ चतु॑रनीक ऋञ्जते॒ चारु॒ वसा॑नो॒ वरु॑णो॒ यत॑न्न॒रिम्। न तस्य॑ विद्म पुरुष॒त्वता॑ व॒यं यतो॒ भगः॑ सवि॒ता दाति॒ वार्य॑म्॥

जिसकी उत्तम सेना है, वही राजा प्रशंसित होता है॥५॥इस सूक्त में विद्वान् और राजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह अड़तालीसवाँ सूक्त और द्वितीय वर्ग समाप्त हुआ॥

दे॒वं वो॑ अ॒द्य स॑वि॒तार॒मेषे॒ भगं॑ च॒ रत्नं॑ वि॒भज॑न्तमा॒योः। आ वां॑ नरा पुरुभुजा ववृत्यां दि॒वेदि॑वे चिदश्विना सखी॒यन्॥

जो मनुष्य मित्र होकर दूसरे के लिये सुख की इच्छा करें, वे सदा ही आदर करने योग्य होवें॥१॥

प्रति॑ प्र॒याण॒मसु॑रस्य वि॒द्वान्त्सू॒क्तैर्दे॒वं स॑वि॒तारं॑ दुवस्य। उप॑ ब्रुवीत॒ नम॑सा विजा॒नञ्ज्येष्ठं॑ च॒ रत्नं॑ वि॒भज॑न्तमा॒योः॥

हे मनुष्यो! सूर्य्य ही मेघ आदिकों का उत्पन्न करनेवाला है, उसकी विद्या का उपदेश दीजिये॥२॥

अ॒द॒त्र॒या द॑यते॒ वार्या॑णि पू॒षा भगो॒ अदि॑ति॒र्वस्त॑ उ॒स्रः। इन्द्रो॒ विष्णु॒र्वरु॑णो मि॒त्रो अ॒ग्निरहा॑नि भ॒द्रा ज॑नयन्त द॒स्माः॥

जैसे माता अनुग्रह से अन्न-पान आदि के दान से सन्तानों का पालन करती है, वैसे ही सूर्य्य आदि पदार्थ दिन और रात्रि से सब की रक्षा करते हैं॥३॥

तन्नो॑ अन॒र्वा स॑वि॒ता वरू॑थं॒ तत्सिन्ध॑व इ॒षय॑न्तो॒ अनु॑ ग्मन्। उप॒ यद्वोचे॑ अध्व॒रस्य॒ होता॑ रा॒यः स्या॑म॒ पत॑यो॒ वाज॑रत्नाः॥

हे मनुष्यो! जो तुम सूर्य्य आदि के सदृश निरन्तर पुरुषार्थी होओ तो लक्ष्मीवान् होओ॥४॥

प्र ये वसु॑भ्य॒ ईव॒दा नमो॒ दुर्ये मि॒त्रे वरु॑णे सू॒क्तवा॑चः। अवै॒त्वभ्वं॑ कृणु॒ता वरी॑यो दि॒वस्पृ॑थि॒व्योरव॑सा मदेम॥

हे मनुष्यो! पुरुषार्थ से लक्ष्मी को और उससे अन्न आदि को इकट्ठा कर बड़े सुख को प्राप्त होकर सब का रक्षण करो॥५॥इस सूक्त में सूर्य और विद्वानों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह उनचासवाँ सूक्त और तीसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

विश्वो॑ दे॒वस्य॑ ने॒तुर्मर्तो॑ वुरीत स॒ख्यम्। विश्वो॑ रा॒य इ॑षुध्यति द्यु॒म्नं वृ॑णीत पु॒ष्यसे॑॥

सब मनुष्यों को चाहिये कि विद्या धन और शरीरपुष्टि की प्राप्ति के लिये विद्वानों की शिक्षा, शरीर और आत्मा से परिश्रम निरन्तर करें॥१॥

ते ते॑ देव नेत॒र्ये चे॒माँ अ॑नु॒शसे॑। ते रा॒या ते ह्या॒३॒॑पृचे॒ सचे॑महि सच॒थ्यैः॑॥

हे विद्वन्! आप इन वर्त्तमान और समीप में स्थित जनों को शिक्षा दीजिये और विद्वानों के साथ मिल के विद्याओं को प्राप्त हूजिये॥२॥

अतो॑ न॒ आ नॄनति॑थी॒नतः॒ पत्नी॑र्दशस्यत। आ॒रे विश्वं॑ पथे॒ष्ठां द्वि॒षो यु॑योतु॒ यूयु॑विः॥

मनुष्यों को चाहिये कि धार्मिक अतिथियों की उत्तम प्रकार सेवा कर मिल के विवेक को प्राप्त होकर द्वेष आदि दोषों को दूर करें॥३॥

यत्र॒ वह्नि॑र॒भिहि॑तो दु॒द्रव॒द्द्रोण्यः॑ प॒शुः। नृ॒मणा॑ वी॒रप॒स्त्योऽर्णा॒ धीरे॑व॒ सनि॑ता॥

इस मन्त्र में [उपमा और] वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो अग्नि के सदृश तेजस्वी और वेग से युक्त होवें, वे सत्य और असत्य के विभाग करनेवाले होवें॥४॥

ए॒ष ते॑ देव नेता॒ रथ॒स्पतिः॒ शं र॒यिः। शं रा॒ये शं स्व॒स्तय॑ इषः॒स्तुतो॑ मनामहे देव॒स्तुतो॑ मनामहे॥

जो विद्वानों में प्रशंसित और कल्याणकारक पदार्थ होवें उनको हम लोग ग्रहण करें॥५॥इस सूक्त में विद्वानों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पचासवाँ सूक्त और चतुर्थ वर्ग समाप्त हुआ॥

अग्ने॑ सु॒तस्य॑ पी॒तये॒ विश्वै॒रूमे॑भि॒रा ग॑हि। दे॒वेभि॑र्ह॒व्यदा॑तये॥

जो विद्वान् जन अत्यन्त विद्वान् के साथ सम्पूर्ण जनों को उत्तम प्रकार बोध देवें तो सब आनन्दित होवें॥१॥

ऋत॑धीतय॒ आ ग॑त॒ सत्य॑धर्माणो अध्व॒रम्। अ॒ग्नेः पि॑बत जि॒ह्वया॑॥

हे मनुष्यो! आप लोग सत्यधर्म्म के धारण से अत्यन्त सुख को प्राप्त हूजिये॥२॥

विप्रे॑भिर्विप्र सन्त्य प्रात॒र्याव॑भि॒रा ग॑हि। दे॒वेभिः॒ सोम॑पीतये॥

जब विद्वानों के साथ विद्वानों का सङ्ग होता है, तब ऐश्वर्य्य का प्रादुर्भाव होता है॥३॥

अ॒यं सोम॑श्च॒मू सु॒तोऽम॑त्रे॒ परि॑ षिच्यते। प्रि॒य इन्द्रा॑य वा॒यवे॑॥

जो वैद्यजन ओषधियों के सारभागों को निकाल कर रोगरहित मनुष्यों को करें तो सब ऐश्वर्य्यों से युक्त होते हैं॥४॥

वाय॒वा या॑हि वी॒तये॑ जुषा॒णो ह॒व्यदा॑तये। पिबा॑ सु॒तस्यान्ध॑सो अ॒भि प्रयः॑॥

हे विद्वन्! आप रोग और प्रमाद के नाश करने और बुद्धि के बढ़ानेवाले अन्न को खाइये और रस को पीजिये॥५॥

इन्द्र॑श्च वायवेषां सु॒तानां॑ पी॒तिम॑र्हथः। ताञ्जु॑षेथामरे॒पसा॑व॒भि प्रयः॑॥

जहाँ राजा और मन्त्री धार्मिक होवें, वहाँ सम्पूर्ण योग्यता होवे॥६॥

सु॒ता इन्द्रा॑य वा॒यवे॒ सोमा॑सो॒ दध्या॑शिरः। नि॒म्नं न य॑न्ति॒ सिन्ध॑वो॒ऽभि प्रयः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे नदियाँ समुद्र को प्राप्त होती हैं, वैसे ही बड़ी ओषधियों के सेवन करनेवाले सुख को प्राप्त होते हैं॥७॥

स॒जूर्विश्वे॑भिर्दे॒वेभि॑र॒श्विभ्या॑मु॒षसा॑ स॒जूः। आ या॑ह्यग्ने अत्रि॒वत्सु॒ते र॑ण॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो! जो बिजुली सब पदार्थों में व्याप्त है, उसको विशेष करके जानिये॥८॥

स॒जूर्मि॒त्रावरु॑णाभ्यां स॒जूः सोमे॑न॒ विष्णु॑ना। आ या॑ह्यग्ने अत्रि॒वत्सु॒ते र॑ण॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य प्राण और अपान आदि में स्थित बिजुली की विद्या को जानें तो बहुत सुख को प्राप्त होवें॥९॥

स॒जूरा॑दि॒त्यैर्वसु॑भिः स॒जूरिन्द्रे॑ण वा॒युना॑। आ या॑ह्यग्ने अत्रि॒वत्सु॒ते र॑ण॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो मन सम्बन्धी बिजुलीरूप अग्नि आकाश में स्थित हुआ वर्त्तमान है, उसको जान कर कार्य्यों में उपयोग करिये॥१०॥

स्व॒स्ति नो॑ मिमीताम॒श्विना॒ भगः॑ स्व॒स्ति दे॒व्यदि॑तिरन॒र्वणः॑। स्व॒स्ति पू॒षा असु॑रो दधातु नः स्व॒स्ति द्यावा॑पृथि॒वी सु॑चे॒तुना॑॥

जो मनुष्य पदार्थविद्या से जिन पदार्थों को उपयुक्त करें अर्थात् काम में लावें, वे इनसे उपकार ग्रहण करने को समर्थ होवें॥११॥

स्व॒स्तये॑ वा॒युमुप॑ ब्रवामहै॒ सोमं॑ स्व॒स्ति भुव॑नस्य॒ यस्पतिः॑। बृह॒स्पतिं॒ सर्व॑गणं स्व॒स्तये॑ स्व॒स्तय॑ आदि॒त्यासो॑ भवन्तु नः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्य परस्पर पदार्थविद्या को सुन और अभ्यास करके विद्वान् होवें॥१२॥

विश्वे॑ दे॒वा नो॑ अ॒द्या स्व॒स्तये॑ वैश्वान॒रो वसु॑र॒ग्निः स्व॒स्तये॑। दे॒वा अ॑वन्त्वृ॒भवः॑ स्व॒स्तये॑ स्व॒स्ति नो॑ रु॒द्रः पा॒त्वंह॑सः॥

विद्वानों की योग्यता है कि उपदेश और अध्यापन से सब मनुष्यों की निरन्तर रक्षा करके वृद्धि करावें॥१३॥

स्व॒स्ति मि॑त्रावरुणा स्व॒स्ति प॑थ्ये रेवति। स्व॒स्ति न॒ इन्द्र॑श्चा॒ग्निश्च॑ स्व॒स्ति नो॑ अदिते कृधि॥

जो सब जीवों के लिये सुख देता है, वही विद्वान् प्रशंसित होता है॥१४॥

स्व॒स्ति पन्था॒मनु॑ चरेम सूर्याचन्द्र॒मसा॑विव। पुन॒र्दद॒ताघ्न॑ता जान॒ता सं ग॑मेमहि॥

हे मनुष्यो! जैसे सूर्य्य और चन्द्रमा नियम से दिनरात्रि चलते हैं, वैसे न्याय के मार्ग को प्राप्त हूजिये और सज्जनों के साथ समागम करिये॥१५॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह इक्यावनवाँ सूक्त और सप्तम वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र श्या॑वाश्व धृष्णु॒यार्चा॑ म॒रुद्भि॒र्ऋक्व॑भिः। ये अ॑द्रो॒घम॑नुष्व॒धं श्रवो॒ मद॑न्ति य॒ज्ञियाः॑॥

जो मनुष्य सत्कार करने योग्यों का सत्कार करते हैं, वे सब सत्कृत होते हैं॥॥१॥

ते हि स्थि॒रस्य॒ शव॑सः॒ सखा॑यः॒ सन्ति॑ धृष्णु॒या। ते याम॒न्ना धृ॑ष॒द्विन॒स्त्मना॑ पान्ति॒ शश्व॑तः॥

विद्वानों का ही मित्रपन और रक्षण स्थिर होता है, अन्य किसी का नहीं॥२॥

ते स्य॒न्द्रासो॒ नोक्षणोऽति॑ ष्कन्दन्ति॒ शर्व॑रीः। म॒रुता॒मधा॒ महो॑ दि॒वि क्ष॒मा च॑ मन्महे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य दिन-रात्रि पुरुषार्थ करते हैं, वे दुःख का उल्लङ्घन करते हैं॥३॥

म॒रुत्सु॑ वो दधीमहि॒ स्तोमं॑ य॒ज्ञं च॑ धृष्णु॒या। विश्वे॒ ये मानु॑षा यु॒गा पान्ति॒ मर्त्यं॑ रि॒षः॥

जो देव और मनुष्यसम्बन्धी युगों और वर्षों को जानते हैं, वे गणितविद्या के जाननेवाले होते हैं॥४॥

अर्ह॑न्तो॒ ये सु॒दान॑वो॒ नरो॒ असा॑मिशवसः। प्र य॒ज्ञं य॒ज्ञिये॑भ्यो दि॒वो अ॑र्चा म॒रुद्भ्यः॑॥

मनुष्य जितने बल बढ़ाने की इच्छा करें, उतना ही बढ़ सकता है॥५॥

आ रु॒क्मैरा यु॒धा नर॑ ऋ॒ष्वा ऋ॒ष्टीर॑सृक्षत। अन्वे॑नाँ॒ अह॑ वि॒द्युतो॑ म॒रुतो॒ जज्झ॑तीरिव भा॒नुर॑र्त॒ त्मना॑ दि॒वः॥

विद्वान् जन मनुष्यों के लिये बिजुली आदि विद्याओं को प्राप्त करावें॥६॥

ये वा॑वृ॒धन्त॒ पार्थि॑वा॒ य उ॒राव॒न्तरि॑क्ष॒ आ। वृ॒जने॑ वा न॒दीनां॑ स॒धस्थे॑ वा म॒हो दि॒वः॥

जो पृथिवी आदिकों की विद्या को जानते हैं, वे सब प्रकार वृद्धि को प्राप्त होते हैं॥७॥

शर्धो॒ मारु॑त॒मुच्छं॑स स॒त्यश॑वस॒मृभ्व॑सम्। उ॒त स्म॒ ते शु॒भे नरः॒ प्र स्य॒न्द्रा यु॑जत॒ त्मना॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि उत्तम बल और परमात्मा की निरन्तर प्रशंसा करें॥८॥

उ॒त स्म॒ ते परु॑ष्ण्या॒मूर्णा॑ वसत शु॒न्ध्यवः॑। उ॒त प॒व्या रथा॑ना॒मद्रिं॑ भिन्द॒न्त्योज॑सा॥

जैसे मेघ वर्षते हुए पृथिवी को विदीर्ण करते हैं, वैसे ही श्रेष्ठ पुरुषों का सङ्ग अशुद्धि का नाश करता है॥९॥

आप॑थयो॒ विप॑थ॒योऽन्त॑स्पथा॒ अनु॑पथाः। ए॒तेभि॒र्मह्यं॒ नाम॑भिर्य॒ज्ञं वि॑ष्टा॒र ओ॑हते॥

हे मनुष्यो! आप लोग सम्पूर्ण विद्याओं और उनसे उत्पन्न क्रिया हुए क्रिया कौशल मार्गों को यथावत् प्रत्यक्ष करके अन्यों को भी उत्तम प्रकार जनाओ सिखलाओ॥१०॥

अधा॒ नरो॒ न्यो॑ह॒तेऽधा॑ नि॒युत॑ ओहते। अधा॒ पारा॑वता॒ इति॑ चि॒त्रा रू॒पाणि॒ दर्श्या॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि पहिले ब्रह्मचर्य्य से विद्याओं को पढ़कर उसके अनन्तर कार्य्यों के रचने में प्रवीणता को प्रत्यक्ष करके फिर अनुमान से दूर में स्थित अदृश्य पदार्थों के विज्ञान को करके आश्चर्य्ययुक्त कार्य्य करें॥११॥

छ॒न्दः॒स्तुभः॑ कुभ॒न्यव॒ उत्स॒मा की॒रिणो॑ नृतुः। ते मे॒ के चि॒न्न ता॒यव॒ ऊमा॑ आसन्दृ॒शि त्वि॒षे॥

हे मनुष्यो! जो अन्य जनों के विक्षेप और चोरी न करके जैसे पिपासा से व्याकुल के लिये जल वैसे शान्ति के देनेवाले होकर सब के शरीर और आत्मा के बल को बढ़ाते हैं, वे ही श्रेष्ठ यथार्थवक्ता होते हैं॥१२॥

य ऋ॒ष्वा ऋ॒ष्टिवि॑द्युतः क॒वयः॒ सन्ति॑ वे॒धसः॑। तमृ॑षे॒ मारु॑तं ग॒णं न॑म॒स्या र॒मया॑ गि॒रा॥

जो महाशय यथार्थवक्त जनों की सेवा और सत्कार कर उत्तम शिक्षा को प्राप्त होकर सत्य और असत्य के विवेक के लिये उपदेश करके सब मनुष्यों को आनन्दित करते हैं, वे सब लोगों से सत्कार पाने योग्य होते हैं॥१३॥

अच्छ॑ ऋषे॒ मारु॑तं ग॒णं दा॒ना मि॒त्रं न यो॒षणा॑। दि॒वो वा॑ धृष्णव॒ ओज॑सा स्तु॒ता धी॒भिरि॑षण्यत॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। सम्पूर्ण अध्यापक और पढ़नेवाले मित्र के सदृश परस्पर वर्त्ताव करके वायु आदि पदार्थों की विद्या का अच्छे प्रकार ग्रहण करें॥१४॥

नू म॑न्वा॒न ए॑षां दे॒वाँ अच्छा॒ न व॒क्षणा॑। दा॒ना स॑चेत सू॒रिभि॒र्याम॑श्रुतेभिर॒ञ्जिभिः॑॥

जो मनुष्य विद्वानों के सङ्ग को प्रिय मानने और विद्या के दान में रुचि करनेवाले होवें, वे ही शीघ्र विद्या को प्राप्त होवें॥१५॥

प्र ये मे॑ बन्ध्वे॒षे गां वोच॑न्त सू॒रयः॒ पृश्निं॑ वोचन्त मा॒तर॑म्। अधा॑ पि॒तर॑मि॒ष्मिणं॑ रु॒द्रं वो॑चन्त॒ शिक्व॑सः॥

मनुष्यों को इस प्रकार जानना चाहिये कि जो हम लोगों के लिये विद्या और उत्तम शिक्षा को देवें, वे हम लोगों से सदा आदर करने योग्य होवें॥१६॥

स॒प्त मे॑ स॒प्त शा॒किन॒ एक॑मेका श॒ता द॑दुः। य॒मुना॑या॒मधि॑ श्रु॒तमुद्राधो॒ गव्यं॑ मृजे॒ नि राधो॒ अश्व्यं॑ मृजे॥

इस संसार में मूढ, मूढतर, मूढतम, विद्वान्, विद्वत्तर, विद्वत्तम और अनूचान ये सात प्रकार के मनुष्य होते हैं॥१७॥इस सूक्त में वायु और विश्वेदेव के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह बावनवाँ सूक्त और दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

को वे॑द॒ जान॑मेषां॒ को वा॑ पु॒रा सु॒म्नेष्वा॑स म॒रुता॑म्। यद्यु॑यु॒ज्रे कि॑ला॒स्यः॑॥

मनुष्य और वायु आदि पदार्थों के लक्षण और लक्ष्यों को विद्वान् जन ही जानने को समर्थ हो सकते हैं, अन्य नहीं॥१॥

ऐतान्रथे॑षु त॒स्थुषः॒ कः शु॑श्राव क॒था य॑युः। कस्मै॑ सस्रुः सु॒दासे॒ अन्वा॒पय॒ इळा॑भिर्वृ॒ष्टयः॑ स॒ह॥

कोई ही मनुष्य सम्पूर्ण शिल्पविद्या के व्यवहार करने को समर्थ होता है, जो व्याप्त और बहुत उत्तम गुणवाले बिजुली आदि पदार्थों को यथावत् जानता है॥२॥

ते म॑ आहु॒र्य आ॑य॒युरुप॒ द्युभि॒र्विभि॒र्मदे॑। नरो॒ मर्या॑ अरे॒पस॑ इ॒मान्पश्य॒न्निति॑ ष्टुहि॥

जो विद्वान् जन दिन-रात्रि परिश्रम से विद्या को प्राप्त होकर अन्यों को उपदेश देवें, उनको यथार्थवक्ता जानना चाहिये॥३॥

ये अ॒ञ्जिषु॒ ये वाशी॑षु॒ स्वभा॑नवः स्र॒क्षु रु॒क्मेषु॑ खा॒दिषु॑। श्रा॒या रथे॑षु॒ धन्व॑सु॥

जो मनुष्य पुरुषार्थी होवें, वे सब प्रकार से सत्कार को प्राप्त हुए लक्ष्मीवान् होते हैं॥४॥

यु॒ष्माकं॑ स्मा॒ रथाँ॒ अनु॑ मु॒दे द॑धे मरुतो जीरदानवः। वृ॒ष्टी द्यावो॑ य॒तीरि॑व॥

हे मनुष्यो! जैसे मैं अभ्यास से विद्या के प्रकाशों को यज्ञ से वृष्टि को धारण करता हूँ, वैसे आप लोग भी इनको धारण कीजिये॥५॥

आ यं नरः॑ सु॒दान॑वो ददा॒शुषे॑ दि॒वः कोश॒मचु॑च्यवुः। वि प॒र्जन्यं॑ सृजन्ति॒ रोद॑सी॒ अनु॒ धन्व॑ना यन्ति वृ॒ष्टयः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही मनुष्य उत्तम दाता हैं, जो यज्ञ, जङ्गलों की रक्षा और जलाशयों के निर्म्माण से बहुत वर्षाओं को कराते हैं॥६॥

त॒तृ॒दा॒नाः सिन्ध॑वः॒ क्षोद॑सा॒ रजः॒ प्र स॑स्रुर्धे॒नवो॑ यथा। स्य॒न्ना अश्वा॑इ॒वाध्व॑नो वि॒मोच॑ने॒ वि यद्वर्त॑न्त ए॒न्यः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे दुग्ध देनेवाली गौवें दुग्ध की वृष्टि करती हैं, वैसे ही नदी, तड़ाग, समुद्र आदि और अन्य जलाशय पृथिवी में वृष्टि करते हैं॥७॥

आ या॑त मरुतो दि॒व आन्तरि॑क्षाद॒मादु॒त। माव॑ स्थात परा॒वतः॑॥

वे ही मनुष्य कामना की सिद्धि को प्राप्त होते हैं, जो विरोध का त्याग करके विद्वान् होते हैं॥८॥

मा वो॑ र॒सानि॑तभा॒ कुभा॒ क्रुमु॒र्मा वः॒ सिन्धु॒र्नि री॑रमत्। मा वः॒ परि॑ ष्ठात्स॒रयुः॑ पुरी॒षिण्य॒स्मे इत्सु॒म्नम॑स्तु वः॥

मनुष्यों को चाहिये कि इस प्रकार का पुरुषार्थ करें कि जिस प्रकार सम्पूर्ण पदार्थ सुख देनेवाले होवें॥९॥

तं वः॒ शर्धं॒ रथा॑नां त्वे॒षं ग॒णं मारु॑तं॒ नव्य॑सीनाम्। अनु॒ प्र य॑न्ति वृ॒ष्टयः॑॥

जो विद्वानों की नवीन-नवीन नीति को प्राप्त होते हैं, वे बल को प्राप्त होते हैं॥१०॥

शर्धं॑शर्धं व एषां॒ व्रातं॑व्रातं ग॒णंग॑णं सुश॒स्तिभिः॑। अनु॑ क्रामेम धी॒तिभिः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य पूर्ण बल को करें तो बहुत बलिष्ठों का भी उत्क्रमण करें॥११॥

कस्मा॑ अ॒द्य सुजा॑ताय रा॒तह॑व्याय॒ प्र य॑युः। ए॒ना यामे॑न म॒रुतः॑॥

विद्या आदि उत्तम गुणों के दान के विना विद्वानों की प्रशंसा नहीं होती है॥१२॥

येन॑ तो॒काय॒ तन॑याय धा॒न्यं१॒॑ बीजं॒ वह॑ध्वे॒ अक्षि॑तम्। अ॒स्मभ्यं॒ तद्ध॑त्तन॒ यद्व॒ ईम॑हे॒ राधो॑ वि॒श्वायु॒ सौभ॑गम्॥

जो मनुष्य सन्तानों की रक्षा के लिये धान्य आदि वस्तु की उत्तम प्रकार रक्षा करते हैं, वे नाश रहित सुख को प्राप्त होते हैं॥१३॥

अती॑याम नि॒दस्ति॒रः स्व॒स्तिभि॑र्हि॒त्वाव॒द्यमरा॑तीः। वृ॒ष्ट्वी शं योराप॑ उ॒स्रि भे॑ष॒जं स्याम॑ मरुतः स॒ह॥

मनुष्यों को चाहिये कि निन्दक, निन्दा और पापी [तथा] पाप को छोड़ शत्रुओं को जीतकर, ओषधि आदि के सेवन से शरीर रोगरहित कर, विद्या और योगाभ्यास से आत्मा की उन्नति करके निरन्तर सुख प्राप्त करें॥१४॥

सु॒दे॒वः स॑महासति सु॒वीरो॑ नरो मरुतः॒ स मर्त्यः॑। यं त्राय॑ध्वे॒ स्याम॒ ते॥

मनुष्यों को चाहिये कि अति उन्नत होकर निर्बल प्राणियों की सदा ही रक्षा करें॥१५॥

स्तु॒हि भो॒जान्त्स्तु॑व॒तो अ॑स्य॒ याम॑नि॒ रण॒न्गावो॒ न यव॑से। य॒तः पूर्वाँ॑इव॒ सखीँ॒रनु॑ ह्वय गि॒रा गृ॑णीहि का॒मिनः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वन्! जो प्रशंसा करने योग्य और सब के मित्र और सत्य की कामना करनेवाले होवें, उनका सदा ही सत्कार करो॥१६॥इस सूक्त में प्रश्न उत्तर और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह तिरपनवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र शर्धा॑य॒ मारु॑ताय॒ स्वभा॑नव इ॒मां वाच॑मनजा पर्वत॒च्युते॑। घ॒र्म॒स्तुभे॑ दि॒व आ पृ॑ष्ठ॒यज्व॑ने द्यु॒म्नश्र॑वसे॒ महि॑ नृ॒म्णम॑र्चत॥

हे विद्वानो! आप लोग सदा ही ज्ञानरहित पुरुषों को विद्या के दान से ज्ञानवान् करो, सत्य और असत्य का विचार करके सत्य का ग्रहण कराय के असत्य का त्याग कराइये और सब के सुख के लिये ऐश्वर्य्य को इकट्ठा करो॥१॥

प्र वो॑ मरुतस्तवि॒षा उ॑द॒न्यवो॑ वयो॒वृधो॑ अश्व॒युजः॒ परि॑ज्रयः। सं वि॒द्युता॒ दध॑ति॒ वाश॑ति त्रि॒तः स्वर॒न्त्यापो॒ऽवना॒ परि॑ज्रयः॥

जो मनुष्य बिजुली आदि की विद्या को जानते हैं, वे सम्पूर्ण सुख को सब के लिये धारण करते हैं॥२॥

वि॒द्युन्म॑हसो॒ नरो॒ अश्म॑दिद्यवो॒ वात॑त्विषो म॒रुतः॑ पर्वत॒च्युतः॑। अ॒ब्द॒या चि॒न्मुहु॒रा ह्रा॑दुनी॒वृतः॑ स्त॒नय॑दमा रभ॒सा उदो॑जसः॥

जो बिजुली, मेघ, वायु और शब्द आदि की विद्या को जाननेवाले हैं, वे सब प्रकार से लक्ष्मीवान् होते हैं॥३॥

व्य१॒॑क्तून्रु॑द्रा॒ व्यहा॑नि शिक्वसो॒ व्य१॒॑न्तरि॑क्षं॒ वि रजां॑सि धूतयः। वि यदज्राँ॒ अज॑थ॒ नाव॑ ईं यथा॒ वि दु॒र्गाणि॑ मरुतो॒ नाह॑ रिष्यथ॥

मनुष्यों को चाहिये कि वायुविद्या को अवश्य जानें॥४॥

तद्वी॒र्यं॑ वो मरुतो महित्व॒नं दी॒र्घं त॑तान॒ सूर्यो॒ न योज॑नम्। एता॒ न यामे॒ अगृ॑भीतशोचि॒षोऽन॑श्वदां॒ यन्न्यया॑तना गि॒रिम्॥

जो लोग सूर्य और मेघों के गुणों को जान कर सामर्थ्य और धन को इकट्ठा करते हैं, वे परोपकारी होते हैं॥५॥

अभ्रा॑जि॒ शर्धो॑ मरुतो॒ यद॑र्ण॒सं मोष॑था वृ॒क्षं क॑प॒नेव॑ वेधसः। अध॑ स्मा नो अ॒रम॑तिं सजोषस॒श्चक्षु॑रिव॒ यन्त॒मनु॑ नेषथा सु॒गम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सब के शरीर और आत्मा के बल को प्रकाशित करते हैं, वे धन्य हैं और जो श्रेष्ठ विद्या और गुणों को चुराते, उनको धिक्कार धिक्कार॥६॥

न स जी॑यते मरुतो॒ न ह॑न्यते॒ न स्रे॑धति॒ न व्य॑थते॒ न रि॑ष्यति। नास्य॒ राय॒ उप॑ दस्यन्ति॒ नोतय॒ ऋषिं॑ वा॒ यं राजा॑नं वा॒ सुषू॑दथ॥

हे मनुष्यो! जो वृद्धावस्था वा मरणावस्था रहित, सत्, चित् और आनन्दस्वरूप, नित्य गुण, कर्म्म और स्वभाववाला जगदीश्वर है, उसकी सब आप लोग उपासना करो॥७॥

नि॒युत्व॑न्तो ग्राम॒जितो॒ यथा॒ नरो॑ऽर्य॒मणो॒ न म॒रुतः॑ कव॒न्धिनः॑। पिन्व॒न्त्युत्सं॒ यदि॒नासो॒ अस्व॑र॒न्व्यु॑न्दन्ति पृथि॒वीं मध्वो॒ अन्ध॑सा॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो जल के सदृश शान्ति करनेवाले और सामर्थ्य को बढ़ाते हुए विजय को प्राप्त होते हैं, वे लक्ष्मी को प्राप्त होते हैं॥८॥

प्र॒वत्व॑ती॒यं पृ॑थि॒वी म॒रुद्भ्यः॑ प्र॒वत्व॑ती॒ द्यौर्भ॑वति प्र॒यद्भ्यः॑। प्र॒वत्व॑तीः प॒थ्या॑ अ॒न्तरि॑क्ष्याः प्र॒वत्व॑न्तः॒ पर्व॑ता जी॒रदा॑नवः॥

मनुष्यों को चाहिये कि पृथिवी के समीप से जितना हो सकता है, उतना उपकार ग्रहण करें॥९॥

यन्म॑रुतः सभरसः स्वर्णरः॒ सूर्य॒ उदि॑ते॒ मद॑था दिवो नरः। न वोऽश्वाः॑ श्रथय॒न्ताह॒ सिस्र॑तः स॒द्यो अ॒स्याध्व॑नः पा॒रम॑श्नुथ॥

जो मनुष्य सूर्य्योदय से पहले उठ के जब तक सोवैं नहीं तब तक प्रयत्न करते हैं, दुःख और दारिद्र्य के अन्त को प्राप्त होकर सुखी और लक्ष्मीवान् होते हैं॥१०॥

अंसे॑षु व ऋ॒ष्टयः॑ प॒त्सु खा॒दयो॒ वक्षः॑सु रु॒क्मा म॑रुतो॒ रथे॒ शुभः॑। अ॒ग्निभ्रा॑जसो वि॒द्युतो॒ गभ॑स्त्योः॒ शिप्राः॑ शी॒र्षसु॒ वित॑ता हिर॒ण्ययीः॑॥

जो राजपुरुष अहर्निश राजकार्य्यों में प्रवीण, दुर्व्यसनों से विरक्त और साङ्गोपाङ्ग राजसामग्रीवाले हों, वे सदैव प्रतिष्ठा को प्राप्त होते हैं॥११॥

तं नाक॑म॒र्यो अगृ॑भीतशोचिषं॒ रुश॒त्पिप्प॑लं मरुतो॒ वि धू॑नुथ। सम॑च्यन्त वृ॒जनाति॑त्विषन्त॒ यत्स्वर॑न्ति॒ घोषं॒ वित॑तमृता॒यवः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य ईश्वर के सदृश न्यायकारी सम्पूर्ण जगत् के उपकार करनेवाले और उपदेशक हैं, वे संसार के भूषक हैं॥१२॥

यु॒ष्माद॑त्तस्य मरुतो विचेतसो रा॒यः स्या॑म र॒थ्यो॒३॒॑ वय॑स्वतः। न यो युच्छ॑ति ति॒ष्यो॒३॒॑ यथा॑ दि॒वो॒३॒॑स्मे रा॑रन्त मरुतः सह॒स्रिण॑म्॥

मनुष्यों को चाहिये कि सदा धनाढ्यपन का खोज करें और प्रमाद न करें॥१३॥

यू॒यं र॒यिं म॑रुतः स्पा॒र्हवी॑रं यू॒यमृषि॑मवथ॒ साम॑विप्रम्। यू॒यमर्व॑न्तं भर॒ताय॒ वाजं॑ यू॒यं ध॑त्थ॒ राजा॑नं श्रुष्टि॒मन्त॑म्॥

मनुष्यों को चाहिये कि उत्तम सहाय से लक्ष्मी, विद्वान्, सेना और राजा को धारण करें॥१४॥

तद्वो॑ यामि॒ द्रवि॑णं सद्यऊतयो॒ येना॒ स्व१॒॑र्ण त॒तना॑म॒ नॄँर॒भि। इ॒दं सु मे॑ मरुतो हर्यता॒ वचो॒ यस्य॒ तरे॑म॒ तर॑सा श॒तं हिमाः॑॥

हे विद्वानो! आप लोग यश, धन, सुख, सत्य, वचन और बल को बढ़ाय दुःखों के पार हूजिये॥१५॥इस सूक्त में बिजुली और सुख के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चौवनवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्रय॑ज्यवो म॒रुतो॒ भ्राज॑दृष्टयो बृ॒हद्वयो॑ दधिरे रु॒क्मव॑क्षसः। ईय॑न्ते॒ अश्वैः॑ सु॒यमे॑भिरा॒शुभिः॒ शुभं॑ या॒तामनु॒ रथा॑ अवृत्सत॥

हे मनुष्यो! आप लोग ब्रह्मचर्य आदि से अति काल पर्य्यन्त जीवनवाले योगी पुरुषार्थी होइये॥१॥

स्व॒यं द॑धिध्वे॒ तवि॑षीं॒ यथा॑ वि॒द बृ॒हन्म॑हान्त उर्वि॒या वि रा॑जथ। उ॒तान्तरि॑क्षं ममिरे॒ व्योज॑सा॒ शुभं॑ या॒तामनु॒ रथा॑ अवृत्सत॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! ब्रह्मचर्य्य से शरीर और आत्मा के बल को धारण करके और क्रियाकुशलता को जान के जैसे ईश्वर अन्तरिक्ष में सम्पूर्ण पदार्थों को उत्पन्न करता है, वैसे ही आप लोग अनेक व्यवहारों को सिद्ध कीजिये॥२॥

सा॒कं जा॒ताः सु॒भ्वः॑ सा॒कमु॑क्षि॒ताः श्रि॒ये चि॒दा प्र॑त॒रं वा॑वृधु॒र्नरः॑। वि॒रो॒किणः॒ सूर्य॑स्येव र॒श्मयः॒ शुभं॑ या॒तामनु॒ रथा॑ अवृत्सत॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! आप लोग सूर्य्य की किरणों के सदृश एक साथ ही पुरुषार्थ के लिये उद्यत हूजिये और जैसे कल्याण करनेवालों के रथों के पीछे भृत्यजन वर्त्तमान होते हैं, वैसे ही धर्म के पीछे वर्त्तमान हूजिये॥३॥

आ॒भू॒षेण्यं॑ वो मरुतो महित्व॒नं दि॑द्द॒क्षेण्यं॒ सूर्य॑स्येव॒ चक्ष॑णम्। उ॒तो अ॒स्माँ अ॑मृत॒त्वे द॑धातन॒ शुभं॑ या॒तामनु॒ रथा॑ अवृत्सत॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य सूर्य्य के सदृश न्याय के प्रकाशक, अन्यायरूपी अन्धकार के रोकनेवाले, धर्ममार्ग के अनुगामी होवें, उनकी सदा ही आप लोग प्रशंसा करो॥४॥

उदी॑रयथा मरुतः समुद्र॒तो यू॒यं वृ॒ष्टिं व॑र्षयथा पुरीषिणः। न वो॑ दस्रा॒ उप॑ दस्यन्ति धे॒नवः॒ शुभं॑ या॒तामनु॒ रथा॑ अवृत्सत॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमाङ्कार है। हे विद्वान् जनो! जैसे पवन अन्तरिक्ष से वृष्टि करके सम्पूर्ण प्राणियों को तृप्त करके दुःख का नाश करते हैं, वैसे ही सत्यविद्या के उपदेश की वृष्टि से अविद्यारूप अन्धकार से हुए दुःख का निवारण कीजिये॥५॥

यदश्वा॑न्धू॒र्षु पृष॑ती॒रयु॑ग्ध्वं हिर॒ण्यया॒न्प्रत्यत्काँ॒ अमु॑ग्ध्वम्। विश्वा॒ इत्स्पृधो॑ मरुतो॒ व्य॑स्यथ॒ शुभं॑ या॒तामनु॒ रथा॑ अवृत्सत॥

जो मनुष्य अग्नि, वायु और जल आदिकों को वाहनों में उत्तम प्रकार युक्त करते हैं, वे विजय के लिये समर्थ होकर धर्मसम्बन्धी मार्ग के अनुगामी होते हैं॥६॥

न पर्व॑ता॒ न न॒द्यो॑ वरन्त वो॒ यत्राचि॑ध्वं मरुतो॒ गच्छ॒थेदु॒ तत्। उ॒त द्यावा॑पृथि॒वी या॑थना॒ परि॒ शुभं॑ या॒तामनु॒ रथा॑ अवृत्सत॥

जो मनुष्य पृथिवी आदि की विद्या से तथा सृष्टि के क्रम से कार्य्यों को सिद्ध करें, उनको दारिद्र्य कभी प्राप्त नहीं होवे॥७॥

यत्पू॒र्व्यं म॑रुतो॒ यच्च॒ नूत॑नं॒ यदु॒द्यते॑ वसवो॒ यच्च॑ श॒स्यते॑। विश्व॑स्य॒ तस्य॑ भवथा॒ नवे॑दसः॒ शुभं॑ या॒तामनु॒ रथा॑ अवृत्सत॥

जो शिक्षा और विद्या के दण्ड से संसार की रक्षा करते हैं, वे ही प्रशंसित होकर कल्याण को प्राप्त होते हैं॥८॥

मृ॒ळत॑ नो मरुतो॒ मा व॑धिष्टना॒स्मभ्यं॒ शर्म॑ बहु॒लं वि य॑न्तन। अधि॑ स्तो॒त्रस्य॑ स॒ख्यस्य॑ गातन॒ शुभं॑ या॒तामनु॒ रथा॑ अवृत्सत॥

मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों से प्रार्थना करके श्रेष्ठ गुणों को ग्रहण करें और सब जगह मित्रता करके सब के लिये सुख प्राप्त कराया जावे॥९॥

यू॒यम॒स्मान्न॑यत॒ वस्यो॒ अच्छा॒ निरं॑ह॒तिभ्यो॑ मरुतो गृणा॒नाः। जु॒षध्वं॑ नो ह॒व्यदा॑तिं यजत्रा व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम्॥

जिज्ञासुजन विद्वानों की प्रार्थना इस प्रकार करें कि आप लोग हम लोगों को दुष्ट आचरण से अलग करके धर्मयुक्त मार्ग को प्राप्त कराइये॥१०॥इस सूक्त में मरुत नाम से विद्वान् आदि के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पचपनवाँ सूक्त और अठारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अग्ने॒ शर्ध॑न्त॒मा ग॒णं पि॒ष्टं रु॒क्मेभि॑र॒ञ्जिभिः॑। विशो॑ अ॒द्य म॒रुता॒मव॑ ह्वये दि॒वश्चि॑द्रोच॒नादधि॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य वायु और मनुष्यों के गुणों को जानते हैं, वे सत्कार करनेवाले होते हैं॥१॥

यथा॑ चि॒न्मन्य॑से हृ॒दा तदिन्मे॑ जग्मुरा॒शसः॑। ये ते॒ नेदि॑ष्ठं॒ हव॑नान्या॒गम॒न्तान्व॑र्ध भीमसं॑दृशः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्य लोग परस्पर के उपकार से सुखी हों॥२॥

मी॒ळ्हुष्म॑तीव पृथि॒वी परा॑हता॒ मद॑न्त्येत्य॒स्मदा। ऋक्षो॒ न वो॑ मरुतः॒ शिमी॑वाँ॒ अमो॑ दु॒ध्रो गौरि॑व भीम॒युः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो प्रयत्न करते हुए कर्म्मों को करते हैं, वे सदा सुखी होते हैं॥३॥

नि ये रि॒णन्त्योज॑सा॒ वृथा॒ गावो॒ न दु॒र्धुरः॑। अश्मा॑नं चित्स्व॒र्यं१॒॑ पर्व॑तं गि॒रिं प्र च्या॑वयन्ति॒ याम॑भिः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सूर्य की किरणें मेघ को नीचे गिराती हैं, वैसे विद्वान् लोग दोषों को दूर करते हैं॥४॥

उत्ति॑ष्ठ नू॒नमे॑षां॒ स्तोमैः॒ समु॑क्षितानाम्। म॒रुतां॑ पुरु॒तम॒मपू॑र्व्यं॒ गवां॒ सर्ग॑मिव ह्वये॥

मनुष्यों को चाहिये कि सृष्टि के क्रम को जानकर सम्पूर्ण आनन्द को प्राप्त हों॥५॥

यु॒ङ्ग्ध्वं ह्यरु॑षी॒ रथे॑ यु॒ङ्ग्ध्वं रथे॑षु रो॒हितः॑। यु॒ङ्ग्ध्वं हरी॑ अजि॒रा धु॒रि वोळ्ह॑वे॒ वहि॑ष्ठा धु॒रि वोळ्ह॑वे॥

मनुष्यों को चाहिये कि अग्नि आदि पदार्थों को वाहन आदि के चलाने के लिए निरन्तर युक्त करें॥६॥

उ॒त स्य वा॒ज्य॑रु॒षस्तु॑वि॒ष्वणि॑रि॒ह स्म॑ धायि दर्श॒तः। मा वो॒ यामे॑षु मरुतश्चि॒रं क॑र॒त्प्र तं रथे॑षु चोदत॥

जो अग्निविद्या को धारण करते हैं, उनका सब समय में सत्कार करो॥७॥

रथं॒ नु मारु॑तं व॒यं श्र॑व॒स्युमा हु॑वामहे। आ यस्मि॑न्त॒स्थौ सु॒रणा॑नि॒ बिभ्र॑ती॒ सचा॑ म॒रुत्सु॑ रोद॒सी॥

जैसे पवन भूमि आदि को धारण करते हैं, वैसे ही विद्वान् जन सब मनुष्यों को धारण करें॥८॥

तं वः॒ शर्धं॑ रथे॒शुभं॑ त्वे॒षं प॑न॒स्युमा हु॑वे। यस्मि॒न्त्सुजा॑ता सु॒भगा॑ मही॒यते॒ सचा॑ म॒रुत्सु॑ मीळ्हु॒षी॥

जिस कुल में किया ब्रह्मचर्य्य जिन्होंने ऐसे स्त्री और पुरुष वर्त्तमान हैं, उसी कुल को भाग्यशाली जानना चाहिये॥९॥इस सूक्त में विद्वान् तथा वायु के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह छप्पनवाँ सूक्त और बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

आ रु॑द्रास॒ इन्द्र॑वन्तः स॒जोष॑सो॒ हिर॑ण्यरथाः सुवि॒ताय॑ गन्तन। इ॒यं वो॑ अ॒स्मत्प्रति॑ हर्यते म॒तिस्तृ॒ष्णजे॒ न दि॒व उत्सा॑ उद॒न्यवे॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पिपासा से व्याकुल के लिये जल शान्तिकारक होता है, वैसे विद्वान् जन जानने की इच्छा करनेवालों के लिए शान्ति के देनेवाले होते हैं॥१॥

वाशी॑मन्त ऋष्टि॒मन्तो॑ मनी॒षिणः॑ सु॒धन्वा॑न॒ इषु॑मन्तो निष॒ङ्गिणः॑। स्वश्वाः॑ स्थ सु॒रथाः॑ पृश्निमातरः स्वायु॒धा म॑रुतो याथना॒ शुभ॑म्॥

मनुष्यों को चाहिये कि विद्या आदि श्रेष्ठ गुणों को ग्रहण करके सदा ही विजय से युक्त हों॥२॥

धू॒नु॒थ द्यां पर्व॑तान्दा॒शुषे॒ वसु॒ नि वो॒ वना॑ जिहते॒ याम॑नो भि॒या। को॒पय॑थ पृथि॒वीं पृ॑श्निमातरः शु॒भे यदु॑ग्राः॒ पृष॑ती॒रयु॑ग्ध्वम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पवन पृथिवी, मेघ और वन आदिकों को कंपाते हैं और जैसे शत्रुजन शत्रुओं को क्रुद्ध करते हैं, वैसे ही विद्वान् जन पदार्थों को मथकर बिजुली आदि को कंपाते हैं और कार्य्यों में युक्त करते हैं॥३॥

वात॑त्विषो म॒रुतो॑ व॒र्षनि॑र्णिजो य॒माइ॑व॒ सुस॑दृशः सु॒पेश॑सः। पि॒शङ्गा॑श्वा अरु॒णाश्वा॑ अरे॒पसः॒ प्रत्व॑क्षसो महि॒ना द्यौरि॑वो॒रवः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य सूर्य्य के सदृश आत्मा से प्रकाशित और न्यायाधीशों के सदृश व्यवहार करनेवाले विमान आदि वाहन से युक्त हैं, उनका निरन्तर सत्कार करो॥४॥

पु॒रु॒द्र॒प्सा अ॑ञ्जि॒मन्तः॑ सु॒दान॑वस्त्वे॒षसं॑दृशो अनव॒भ्ररा॑धसः। सु॒जा॒तासो॑ ज॒नुषा॑ रु॒क्मव॑क्षसो दि॒वो अ॒र्का अ॒मृतं॒ नाम॑ भेजिरे॥

जो जन उत्तम गुण, कर्म्म और स्वभाव को सब प्रकार ग्रहण करते हैं, वे सब प्रकार से सुखी होते हैं॥५॥

ऋ॒ष्टयो॑ वो मरुतो॒ अंस॑यो॒रधि॒ सह॒ ओजो॑ बा॒ह्वोर्वो॒ बलं॑ हि॒तम्। नृ॒म्णा शी॒र्षस्वायु॑धा॒ रथे॑षु वो॒ विश्वा॑ वः॒ श्रीरधि॑ त॒नूषु॑ पिपिशे॥

जो मनुष्य शरीर और आत्मा से बलिष्ठ और आयुधों की विद्या में निपुण होकर उत्तम वाहन आदि सामग्रियों से युक्त हुए पुरुषार्थ करते हैं, वे धनवान् होते हैं॥६॥

गोम॒दश्वा॑व॒द्रथ॑वत्सु॒वीरं॑ च॒न्द्रव॒द्राधो॑ मरुतो ददा नः। प्रश॑स्तिं नः कुणुत रुद्रियासो भक्षी॒य वोऽव॑सो॒ दैव्य॑स्य॥

जब मनुष्य सत्पुरुषों का सङ्ग करें, तब इस लोक में सम्पूर्ण ऐश्वर्य और परलोक में धर्म्म के अनुष्ठान करने की याचना करें॥७॥

ह॒ये नरो॒ मरु॑तो मृ॒ळता॑ न॒स्तुवी॑मघासो॒ अमृ॑ता॒ ऋत॑ज्ञाः। सत्य॑श्रुतः॒ कव॑यो॒ युवा॑नो॒ बृह॑द्गिरयो बृ॒हदु॒क्षमा॑णाः॥

जो मनुष्य यथार्थवक्ता विद्वानों का सेवन करते हैं, वे सत्य विद्या को प्राप्त होकर सदा ही प्रसन्न होते हैं॥८॥इस सूक्त में रुद्र और वायु के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सत्तावनवाँ सूक्त और बाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

तमु॑ नू॒नं तवि॑षीमन्तमेषां स्तु॒षे ग॒णं मारु॑तं॒ नव्य॑सीनाम्। य आ॒श्व॑श्वा॒ अम॑व॒द्वह॑न्त उ॒तेशि॑रे अ॒मृत॑स्य स्व॒राजः॑॥

जो कार्य्य और कारणस्वरूप संसार के गुण, कर्म्म और स्वभावों को जानते हैं, वे गृह के सदृश सब को सुखी कर सकते हैं॥१॥

त्वे॒षं ग॒णं त॒वसं॒ खादि॑हस्तं॒ धुनि॑व्रतं मा॒यिनं॒ दाति॑वारम्। म॒यो॒भुवो॒ ये अमि॑ता महि॒त्वा वन्द॑स्व विप्र तुवि॒राध॑सो॒ नॄन्॥

मनुष्यों को चाहिये कि योग्य धार्मिक विद्वानों का ही सत्कार करें, जिससे सुख बढ़े॥२॥

आ वो॑ यन्तूदवा॒हासो॑ अ॒द्य वृ॒ष्टिं ये विश्वे॑ म॒रुतो॑ जु॒नन्ति॑। अ॒यं यो अ॒ग्निर्म॑रुतः॒ समि॑द्ध ए॒तं जु॑षध्वं कवयो युवानः॥

जो वृष्टि करनेवाले वायु और अग्नि आदि को विशेष करके जानते हैं, वे इनको वृष्टि करने के लिये प्रेरणा करने को समर्थ होते हैं॥३॥

यू॒यं राजा॑न॒मिर्यं॒ जना॑य विभ्वत॒ष्टं ज॑नयथा यजत्राः। यु॒ष्मदे॑ति मुष्टि॒हा बा॒हुजू॑तो यु॒ष्मत्सद॑श्वो मरुतः सु॒वीरः॑॥

मनुष्य सम्पूर्ण उपायों से धर्मयुक्त गुण, कर्म और स्वभाववाले राजा और उसी प्रकार के सहायों को उत्पन्न करें॥४॥

अ॒राइ॒वेदच॑रमा॒ अहे॑व॒ प्रप्र॑ जायन्ते॒ अक॑वा॒ महो॑भिः। पृश्नेः॑ पु॒त्रा उ॑प॒मासो॒ रभि॑ष्ठाः॒ स्वया॑ म॒त्या म॒रुतः॒ सं मि॑मिक्षुः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे वाहन के चक्रों के अङ्ग और दिन, क्रम से वर्त्तमान हैं और जैसे पवन जा, आकर वर्षाते हैं, वैसे ही मनुष्यों को चाहिये कि क्रम से वर्त्ताव करके बुद्धि से सुख की वृष्टि सब के सुख के लिये करें॥५॥

यत्प्राया॑सिष्ट॒ पृष॑तीभि॒रश्वै॑र्वीळुप॒विभि॑र्मरुतो॒ रथे॑भिः। क्षोद॑न्त॒ आपो॑ रिण॒ते वना॒न्यवो॒स्रियो॑ वृष॒भः क्र॑न्दतु॒ द्यौः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो आप लोग वायु के सदृश शीघ्र गमन और जल के सदृश तृप्ति करने रूप कार्य को करें तो सम्पूर्ण सुखों को प्राप्त हों॥६॥

प्रथि॑ष्ट॒ याम॑न्पृथि॒वी चि॑देषां॒ भर्ते॑व॒ गर्भं॒ स्वमिच्छवो॑ धुः। वाता॒न्ह्यश्वा॑न्धु॒र्या॑युयु॒ज्रे व॒र्षँ स्वेदं॑ चक्रिरे रु॒द्रिया॑सः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य पृथिवी के सदृश क्षमाशील और विस्तीर्ण विद्यावाले वाहनों के पवन रूप घोड़ों को संयुक्त करके और वृष्टि के कारणों का निर्माण करके कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वे सम्पूर्ण सुख कर सकते हैं॥७॥

ह॒ये नरो॒ मरु॑तो मृ॒ळता॑ न॒स्तुवी॑मघासो॒ अमृ॑ता॒ ऋत॑ज्ञाः। सत्य॑श्रुतः॒ कव॑यो॒ युवा॑नो॒ बृह॑द्गिरयो बृ॒हदु॒क्षमा॑णाः॥

जो मनुष्य सम्पूर्ण सत्य विद्याओं को प्राप्त होकर यथार्थवक्ता, परमात्मा और उसकी आज्ञा का सेवन करते हुए महाशय पूर्ण शरीर और आत्मा के बल से युक्त अध्यापन और उपदेश से हम लोगों की वृद्धि करते हैं, वे ही सदा हम लोगों से सत्कार करने योग्य हैं॥८॥इस सूक्त में विद्वान् तथा वायु के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह अट्ठावनवाँ सूक्त और तेईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र वः॒ स्पळ॑क्रन्त्सुवि॒ताय॑ दा॒वनेऽर्चा॑ दि॒वे प्र पृ॑थि॒व्या ऋ॒तं भ॑रे। उ॒क्षन्ते॒ अश्वा॒न्तरु॑षन्त॒ आ रजोऽनु॒ स्वं भा॒नुं श्र॑थयन्ते अर्ण॒वैः॥

हे राजन्! जो मनुष्य शिल्पविद्या से विमानादि को रच के अन्तरिक्षादि मार्गों में जा आ कर सब के सुख के लिये ऐश्वर्य्य का आश्रयण करते हैं, वे संसार के विभूषक होते हैं॥१॥

अमा॑देषां भि॒यसा॒ भूमि॑रेजति॒ नौर्न पू॒र्णा क्ष॑रति॒ व्यथि॑र्य॒ती। दू॒रे॒दृशो॒ ये चि॒तय॑न्त॒ एम॑भिर॒न्तर्म॒हे वि॒दथे॑ येतिरे॒ नरः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे शूरवीर जनों के समीप से डरनेवाले जन भागते हैं, वैसे ही वायु और सूर्य से भूमि काँपती और चलती है और जैसे पदार्थों से पूर्ण नौका अग्नि आदि के योग से समुद्र के पार को शीघ्र जाती है, वैसे विद्या के पार मनुष्य जावें और जैसे वीर संग्राम में प्रयत्न करते हैं, वैसे ही अन्य मनुष्यों को प्रयत्न करना चाहिये॥२॥

गवा॑मिव श्रि॒यसे॒ शृङ्ग॑मुत्त॒मं सूर्यो॒ न चक्षू॒ रज॑सो वि॒सर्ज॑ने। अत्या॑इव सु॒भ्व१॒॑श्चार॑वः स्थन॒ मर्या॑इव श्रि॒यसे॑ चेतथा नरः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य किरणों, सूर्य्य, घोड़े और मनुष्यों के सदृश प्रकाश, दान, वेग और विवेक को सेवते हैं, वे ही उत्तम सुख को प्राप्त होते हैं॥३॥

को वो॑ म॒हान्ति॑ मह॒तामुद॑श्नव॒त्कस्काव्या॑ मरुतः॒ को ह॒ पौंस्या॑। यू॒यं ह॒ भूमिं॑ कि॒रणं॒ न रे॑जथ॒ प्र यद्भर॑ध्वे सुवि॒ताय॑ दा॒वने॑॥

इस मन्त्र में प्रश्न और उत्तर हैं−कौन यथार्थवक्ता जनों के समीप से बड़े विज्ञानों को प्राप्त होता है और कौन आप्तजनों के कर्म्मों को और कौन वीरों के बलों को प्राप्त होता है, इन प्रश्नों का उत्तर यह है कि पवित्र अन्तःकरण युक्त और धर्म्म के सुनने की इच्छा करनेवाले धर्मिष्ठ पुरुषार्थी और ब्रह्मचारी हैं॥४॥

अश्वा॑इ॒वेद॑रु॒षासः॒ सब॑न्धवः॒ शूरा॑इव प्र॒युधः॒ प्रोत यु॑युधुः। मर्या॑इव सु॒वृधो॑ वावृधु॒र्नरः॒ सूर्य॑स्य॒ चक्षुः॒ प्र मि॑नन्ति वृ॒ष्टिभिः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो घोड़ों के सदृश बलिष्ठ, शूरवीरों के सदृश भयरहित, मनुष्यों के सदृश विचारशील और सूर्य के सदृश अविद्यारूपी अन्धकार के निवारक हैं, वे सब के कल्याण के लिये होते हैं॥५॥

ते अ॑ज्ये॒ष्ठा अक॑निष्ठास उ॒द्भिदोऽम॑ध्यमासो॒ मह॑सा॒ वि वा॑वृधुः। सु॒जा॒तासो॑ ज॒नुषा॒ पृश्नि॑मातरो दि॒वो मर्या॒ आ नो॒ अच्छा॑ जिगातन॥

जो मनुष्यों में यथायोग्य उत्तम शिक्षा हो तो कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम जन विचारशील होकर यथायोग्य जगत् की उन्नति कर सकें॥६॥

वयो॒ न ये श्रेणीः॑ प॒प्तुरोज॒सान्ता॑न्दि॒वो बृ॑ह॒तः सानु॑न॒स्परि॑। अश्वा॑स एषामु॒भये॒ यथा॑ वि॒दुः प्र पर्व॑तस्य नभ॒नूँर॑चुच्यवुः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पक्षी पङ्क्तिबद्ध हुए शीघ्र जाते हैं, वैसे ही उत्तम प्रकार शिक्षायुक्त नौकर और घोड़े आदि वाहन तीनों मार्गों में शीघ्र जाते हैं॥७॥

मिमा॑तु॒ द्यौरदि॑तिर्वी॒तये॑ नः॒ सं दानु॑चित्रा उ॒षसो॑ यतन्ताम्। आचु॑च्यवुर्दि॒व्यं कोश॑मे॒त ऋषे॑ रु॒द्रस्य॑ म॒रुतो॑ गृणा॒नाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो जन बिजुली, प्रातःकाल और ऋषि के सदृश धन के कोश को इकट्ठा करते हैं, वे प्रतिष्ठित होते हैं॥८॥इस सूक्त में पवन और बिजुली के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह उनसठवाँ सूक्त और चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

ईळे॑ अ॒ग्निं स्वव॑सं॒ नमो॑भिरि॒ह प्र॑स॒त्तो वि च॑यत्कृ॒तं नः॑। रथै॑रिव॒ प्र भ॑रे वाज॒यद्भिः॑ प्रदक्षि॒णिन्म॒रुतां॒ स्तोम॑मृध्याम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। विद्वान् जन को चाहिये कि विद्वानों के सङ्ग से अग्नि आदि विद्या को प्रकट करा के प्रसन्नता सम्पादित करे॥१॥

आ ये त॒स्थुः पृष॑तीषु श्रु॒तासु॑ सु॒खेषु॑ रु॒द्रा म॒रुतो॒ रथे॑षु। वना॑ चिदुग्रा जिहते॒ नि वो॑ भि॒या पृ॑थि॒वी चि॑द्रेजते॒ पर्व॑तश्चित्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! उत्तम विद्याओं और उत्तम वाहनों पर स्थित होकर शीघ्र जाने के लिये समर्थ हूजिये॥२॥

पर्व॑तश्चि॒न्महि॑ वृ॒द्धो बि॑भाय दि॒वश्चि॒त्सानु॑ रेजत स्व॒ने वः॑। यत्क्रीळ॑थ मरुत ऋष्टि॒मन्त॒ आप॑इव स॒ध्र्य॑ञ्चो धवध्वे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य विद्या के व्यवहार की सिद्धि के लिये क्रीड़ा करते हैं तथा मित्र होकर कार्य की सिद्धि करते हैं, वे सब प्रकार आनन्दित होते हैं॥३॥

व॒राइ॒वेद्रै॑व॒तासो॒ हिर॑ण्यैर॒भि स्व॒धाभि॑स्त॒न्वः॑ पिपिश्रे। श्रि॒ये श्रेयां॑सस्त॒वसो॒ रथे॑षु स॒त्रा महां॑सि चक्रिरे त॒नूषु॑॥

जो मनुष्य के शरीर का आश्रय करके लक्ष्मी की इच्छा करते हैं, वे दारिद्र्य का नाश करते हैं॥४॥

अ॒ज्ये॒ष्ठासो॒ अक॑निष्ठास ए॒ते सं भ्रात॑रो वावृधुः॒ सौभ॑गाय। युवा॑ पि॒ता स्वपा॑ रु॒द्र ए॑षां सु॒दुघा॒ पृश्निः॑ सु॒दिना॑ म॒रुद्भ्यः॑॥

जो मनुष्य पूर्ण युवावस्था में विद्याओं को समाप्त कर और सुशीलता को स्वीकार कर बहुत ही उत्तम हुए उत्तम स्वभावयुक्त स्त्रियों को विवाह द्वारा स्वीकार करके प्रयत्न करते हैं, वे ऐश्वर्य्य को प्राप्त होकर आनन्दित होते हैं॥५॥

यदु॑त्त॒मे म॑रुतो मध्य॒मे वा॒ यद्वा॑व॒मे सु॑भगासो दि॒वि ष्ठ। अतो॑ नो रुद्रा उ॒त वा॒ न्व१॒॑स्याग्ने॑ वि॒त्ताद्ध॒विषो॒ यद्यजा॑म॥

जो मनुष्य उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ व्यवहारों में यथायोग्य वर्त्ताव करके उत्तम ऐश्वर्य्यवाले होते हैं, उनका सब लोग सत्कार करें॥६॥

अ॒ग्निश्च॒ यन्म॑रुतो विश्ववेदसो दि॒वो वह॑ध्व॒ उत्त॑रा॒दधि॒ ष्णुभिः॑। ते म॑न्दसा॒ना धुन॑यो रिशादसो वा॒मं ध॑त्त॒ यज॑मानाय सुन्व॒ते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही महात्मा हैं, जो सब के लिये सत्य को धारण करते हैं॥७॥

अग्ने॑ म॒रुद्भिः॑ शु॒भय॑द्भि॒र्ऋक्व॑भिः॒ सोमं॑ पिब मन्दसा॒नो ग॑ण॒श्रिभिः॑। पा॒व॒केभि॑र्विश्वमि॒न्वेभि॑रा॒युभि॒र्वैश्वा॑नर प्र॒दिवा॑ के॒तुना॑ स॒जूः॥

मनुष्यों की योग्यता है कि सदा यथार्थवक्ता विद्वानों के साथ मिलकर विद्या, अवस्था और बुद्धि को बढ़ाकर औषध के सदृश आहार और विहार को करके उत्तम आचरण सर्वदा करें॥८॥इस सूक्त में वायु, अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह साठवाँ सूक्त और पच्चीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

के ष्ठा॑ नरः॒ श्रेष्ठ॑तमा॒ य एक॑एक आय॒य। प॒र॒मस्याः॑ परा॒वतः॑॥

कौन अत्यन्त श्रेष्ठ मनुष्य होते हैं? जो सर्वदा अत्यन्त श्रेष्ठ कर्म्मों को करें॥१॥

क्व१॒॑ वोऽश्वाः॒ क्वा॒३॒॑भीश॑वः क॒थं शे॑क क॒था य॑य। पृ॒ष्ठे सदो॑ न॒सोर्यमः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जब कोई विद्वानों को पूछे तब वे उत्तर दें और पक्षपात को छोड़कर न्यायाधीशों के सदृश होवें, तब सम्पूर्ण बोध को प्राप्त होवें॥२॥

ज॒घने॒ चोद॑ एषां॒ वि स॒क्थानि॒ नरो॑ यमुः। पु॒त्र॒कृ॒थे न जन॑यः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे उत्पन्न करनेवाले माता-पिता सुन्दर नियम से सन्तानोत्पत्ति करके इनको उत्तम प्रकार नियमयुक्त करके उत्तम प्रकार शिक्षित करें, वैसे सब करें॥३॥

परा॑ वीरास एतन॒ मर्या॑सो॒ भद्र॑जानयः। अ॒ग्नि॒तपो॒ यथास॑थ॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो बन्धन के साधन और पाप के आचरण का त्याग कर और त्याग करा के और मुक्ति के साधन को ग्रहण कर और ग्रहण करा के सब को आनन्दित करते हैं, उनको सब आनन्दित करें॥४॥

सन॒त्साश्व्यं॑ प॒शुमु॒त गव्यं॑ श॒ताव॑यम्। श्या॒वाश्व॑स्तुताय॒ या दोर्वी॒रायो॑प॒बर्बृ॑हत्॥

वही स्त्री प्रशंसित होती है, जो अपने पति को काम में आसक्त करके बल का नाश नहीं करती है और गृहस्थित घोड़े आदि का पालन करके बढ़ाती है॥५॥

उ॒त त्वा॒ स्त्री शशी॑यसी पुं॒सो भ॑वति॒ वस्य॑सी। अदे॑वत्रादरा॒धसः॑॥

वही स्त्री पति से आदर करने योग्य होती है जो अन्यायाचरण और नहीं आदर करने योग्य के आदर करने से रहित हुई पति को सुखी करती है, वही पति से निरन्तर आदर करने योग्य होती है॥६॥

वि या जा॒नाति॒ जसु॑रिं॒ वि तृष्य॑न्तं॒ वि का॒मिन॑म्। दे॒व॒त्रा कृ॑णु॒ते मनः॑॥

जो स्त्री पुरुषार्थी, धार्मिक, लोभी और कामातुर पति को जानकर दोषों के निवारण और गुणों के ग्रहण करने के लिये प्रेरणा करती है, वही पति आदि की कल्याण करनेवाली होती है॥७॥

उ॒त घा॒ नेमो॒ अस्तु॑तः॒ पुमाँ॒ इति॑ ब्रुवे प॒णिः। स वैर॑देय॒ इत्स॒मः॥

जो आलस्ययुक्त जन श्रेष्ठ कर्म्मों में नहीं प्रवृत्त होता है और दूसरा विद्वान् पुरुष सत्य और असत्य को जानकर सत्य का आचरण नहीं करता है, वे दोनों तुल्य अधर्मात्मा हैं, यह जानना चाहिये॥८॥

उ॒त मे॑ऽरपद्युव॒तिर्म॑म॒न्दुषी॒ प्रति॑ श्या॒वाय॑ वर्त॒निम्। वि रोहि॑ता पुरुमी॒ळ्हाय॑ येमतु॒र्विप्रा॑य दी॒र्घय॑शसे॥

जो स्त्री-पुरुष परस्पर तुल्य गुण, कर्म और स्वभाववाले हों तो श्रेष्ठ मार्ग, अत्यन्त कीर्त्ति और आनन्द को प्राप्त हों॥९॥

यो मे॑ धेनू॒नां श॒तं वैद॑दश्वि॒र्यथा॒ दद॑त्। त॒र॒न्तइ॑व मं॒हना॑॥

जो मनुष्य सैकड़ों वा हजारों का देनेवाला होता है और दुग्ध देनेवाली गौओं की रक्षा करता है, वह नौका से नदी वा समुद्र को तरता है, वैसे ही बुद्धिमान् स्त्री और पुरुष दुःखरूपी सागर को धर्म के आचरण से तरते हैं॥१०॥

य ईं॒ वह॑न्त आ॒शुभिः॒ पिब॑न्तो मदि॒रं मधु॑। अत्र॒ श्रवां॑सि दधिरे॥

जो शीघ्र सुखकारक और बुद्धिवर्धक वस्तुओं का सेवन करते हैं, वे यहाँ लक्ष्मीवान् होते हैं॥११॥

येषां॑ श्रि॒याधि॒ रोद॑सी वि॒भ्राज॑न्ते॒ रथे॒ष्वा। दि॒वि रु॒क्मइ॑वो॒परि॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो धर्मयुक्त पुरुषार्थ से धन आदि को इकट्ठे करते हैं, वे सूर्य्य के किरणों के सदृश प्रकाशित यशवाले होते हैं॥१२॥

युवा॒ स मारु॑तो ग॒णस्त्वे॒षर॑थो॒ अने॑द्यः। शु॒भं॒यावाप्र॑तिष्कुतः॥

जो मनुष्य सम्पूर्ण स्त्रीपुरुषों को यौवनावस्थायुक्त और विद्वान् करते हैं, वे प्रशंसा करने योग्य, कल्याणकारी और दृढ़ होते हैं॥१३॥

को वे॑द नू॒नमे॑षां॒ यत्रा॒ मद॑न्ति॒ धूत॑यः। ऋ॒तजा॑ता अरे॒पसः॑॥

हे मनुष्यो! अपराध-अनपराध तथा सत्य और असत्य को कौन जानता है, यह हम पूछते हैं। जो प्रमाद से रहित और परमेश्वरभक्त होते हैं॥१४॥

यू॒यं मर्तं॑ विपन्यवः प्रणे॒तार॑ इ॒त्था धि॒या। श्रोता॑रो॒ याम॑हूतिषु॥

जो विद्वान् जन धर्मयुक्त व्यवहारों में मनुष्यों को प्रेरणा करके बुद्धिमान् करते हैं, वे धन्य होते हैं॥१५॥

ते नो॒ वसू॑नि॒ काम्या॑ पुरुश्च॒न्द्रा रि॑शादसः। आ य॑ज्ञियासो ववृत्तन॥

हे मनुष्यो! वे ही इस संसार में परोपकार के लिये वर्त्तमान हैं, जो न्याय से द्रव्य का संग्रह करते हैं॥१६॥

ए॒तं मे॒ स्तोम॑मूर्म्ये दा॒र्भ्याय॒ परा॑ वह। गिरो॑ देवि र॒थीरि॑व॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे प्राणियों के सुख के लिये रात्रि है, वैसे ही पति आदिकों के सुख के लिये श्रेष्ठ स्त्री होती है॥१७॥

उ॒त मे॑ वोचता॒दिति॑ सू॒तसो॑मे॒ रथ॑वीतौ। न कामो॒ अप॑ वेति मे॥

सब मनुष्यों को चाहिये कि विद्वान् जनों के प्रति यह प्रार्थना करें कि आप लोग हम लोगों को ऐसे उपदेश करो, जिससे हम लोगों की इच्छायें सिद्ध होवें॥१८॥

ए॒ष क्षे॑ति॒ रथ॑वीतिर्म॒घवा॒ गोम॑ती॒रनु॑। पर्व॑ते॒ष्वप॑श्रितः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य मेघ का कारण होकर पृथक्स्वरूप है, वैसे ही विद्वान् सर्वत्र वास करता हुआ भी मोहरहित होता है॥१९॥इस सूक्त में प्रश्न, उत्तर और वायु आदि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह इकसठवाँ सूक्त और उनतीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

ऋ॒तेन॑ ऋ॒तमपि॑हितं ध्रु॒वं वां॒ सूर्य॑स्य॒ यत्र॑ विमु॒चन्त्यश्वा॑न्। दश॑ श॒ता स॒ह त॑स्थु॒स्तदेकं॑ दे॒वानां॒ श्रेष्ठं॒ वपु॑षामपश्यम्॥

हे मनुष्यो! जो यह सूर्य्यलोक है, वह परमेश्वर से अनेक तत्त्वों द्वारा रचा गया है, इस कारण अनेक गुणों से युक्त है, उसको तुम लोग यथावत् जानो॥१॥

तत्सु वां॑ मित्रावरुणा महि॒त्वमी॒र्मा त॒स्थुषी॒रह॑भिर्दुदुह्रे। विश्वाः॑ पिन्वथः॒ स्वस॑रस्य॒ धेना॒ अनु॑ वा॒मेकः॑ प॒विरा व॑वर्त॥

हे अध्यापक और उपदेशक जनो! आप दोनों मनुष्यों को रात्रि-दिन, प्राण, उदान और बिजुली की विद्याओं को ग्रहण कराइये, जिससे सम्पूर्ण प्रजायें आनन्दित होवें॥२॥

अधा॑रयतं पृथि॒वीमु॒त द्यां मित्र॑राजाना वरुणा॒ महो॑भिः। व॒र्धय॑त॒मोष॑धीः॒ पिन्व॑तं॒ गा अव॑ वृ॒ष्टिं सृ॑जतं जीरदानू॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजा और मन्त्रीजनो! आप दोनों प्राण और सूर्य्य के सदृश वर्त्ताव कर पृथिवी के राज्य का पालन कर वैद्य और ओषधियों की वृद्धि कर और वृष्टि की उन्नति करके सबके सुख के लिये वर्त्ताव कीजिये॥३॥

आ वा॒मश्वा॑सः सु॒युजो॑ वहन्तु य॒तर॑श्मय॒ उप॑ यन्त्व॒र्वाक्। घृ॒तस्य॑ नि॒र्णिगनु॑ वर्तते वा॒मुप॒ सिन्ध॑वः प्र॒दिवि॑ क्षरन्ति॥

जो मनुष्य वाहनों में यन्त्रकलाओं को रच के नीचे अग्नि और ऊपर जल स्थापित करके और फिर उस अग्नि को प्रदीप्त करके मार्गों में चलावें तो बहुत लक्ष्मियाँ इनको प्राप्त हों॥४॥

अनु॑ श्रु॒ताम॒मतिं॒ वर्ध॑दु॒र्वीं ब॒र्हिरि॑व॒ यजु॑षा॒ रक्ष॑माणा। नम॑स्वन्ता धृतद॒क्षाधि॒ गर्ते॒ मित्रासा॑थे वरु॒णेळा॑स्व॒न्तः॥

हे विद्वानो! जैसे प्राण और उदान आदि पवन सब जगत् की रक्षा करते हैं, वैसे आप लोग रक्षा करें॥५॥

अक्र॑विहस्ता सु॒कृते॑ पर॒स्पा यं त्रासा॑थे वरु॒णेळा॑स्व॒न्तः। राजा॑ना क्ष॒त्रमहृ॑णीयमाना स॒हस्र॑स्थूणं बिभृथः स॒ह द्वौ॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजा और मन्त्रीजन! आप स्वयं धर्मात्मा होकर सहस्र शाखा जिसकी, ऐसे राज्य के रक्षण के लिये दुष्टों को दण्ड देकर और श्रेष्ठों का सत्कार करके यशस्वी होवें॥६॥

हिर॑ण्यनिर्णि॒गयो॑ अस्य॒ स्थूणा॒ वि भ्रा॑जते दि॒व्य१॒॑श्वाज॑नीव। भ॒द्रे क्षेत्रे॒ निमि॑ता॒ तिल्वि॑ले वा स॒नेम॒ मध्वो॒ अधि॑गर्त्यस्य॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो मनुष्य श्रेष्ठ व्यवहार में विराजमान बिजुली आदि की विद्या को ग्रहण करते हुए गृह के कृत्य में यथावत् न्याय को करते हैं, विभाग कर और विभाग देकर कृत्यकृत्य होते हैं, वे नीतिवाले होते हैं॥७॥

हिर॑ण्यरूपमु॒षसो॒ व्यु॑ष्टा॒वयः॑स्थूण॒मुदि॑ता॒ सूर्य॑स्य। आ रो॑हथो वरुण मित्र॒ गर्त॒मत॑श्चक्षाथे॒ अदि॑तिं॒ दितिं॑ च॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य के उदय होने पर अन्धकार निवृत्त होता और प्रकाश होता है, वैसे ही कार्य्य और कारणरूप विद्या के जाननेवाले राजा और मन्त्रीजन मित्र के सदृश वर्त्ताव करके दृढ़ न्याय का प्रचार करावें॥८॥

यद्बंहि॑ष्ठं॒ नाति॒विधे॑ सुदानू॒ अच्छि॑द्रं॒ शर्म॑ भुवनस्य गोपा। तेन॑ नो मित्रावरुणावविष्टं॒ सिषा॑सन्तो जिगी॒वांसः॑ स्याम॥

विद्वान् जन अति उत्तम गृहों को रचकर और वहाँ विचार करके विजय, विद्या और क्रिया को प्राप्त होते हैं॥९॥इस सूक्त में सूर्य, प्राण, उदान और राजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमद्विरजानन्दसरस्वती स्वामीजी के शिष्य श्रीमद्दयानदसरस्वतीस्वामिविरचित उत्तम प्रमाणयुक्त ऋग्वेदभाष्य में चतुर्थाष्टक में तीसरा अध्याय इकतीसवाँ वर्ग और पञ्चम मण्डल में बासठवाँ सूक्त समाप्त हुआ॥

ऋत॑स्य गोपा॒वधि॑ तिष्ठथो॒ रथं॒ सत्य॑धर्माणा पर॒मे व्यो॑मनि। यमत्र॑ मित्रावरु॒णाव॑थो यु॒वं तस्मै॑ वृ॒ष्टिर्मधु॑मत्पिन्वते दि॒वः॥

जहाँ धार्मिक विद्वान् पुत्र की जैसे वैसे प्रजा की पालना करनेवाला राजा आदि होते हैं, वहाँ उचित काल में वृष्टि और उचित काल में मृत्यु होता है॥१॥

स॒म्राजा॑व॒स्य भुव॑नस्य राजथो॒ मित्रा॑वरुणा वि॒दथे॑ स्व॒र्दृशा॑। वृ॒ष्टिं वां॒ राधो॑ अमृत॒त्वमी॑महे॒ द्यावा॑पृथि॒वी वि च॑रन्ति त॒न्यवः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे वायु और बिजुली वर्षा करके सब मनुष्यों को धन और धान्य से युक्त करते हैं, वैसे धार्मिक राजा और मन्त्री प्रजाओं को ऐश्वर्य्ययुक्त करें॥२॥

स॒म्राजा॑ उ॒ग्रा वृ॑ष॒भा दि॒वस्पती॑ पृथि॒व्या मि॒त्रावरु॑णा॒ विच॑र्षणी। चि॒त्रेभि॑र॒भ्रैरुप॑ तिष्ठथो॒ रवं॒ द्यां व॑र्षयथो॒ असु॑रस्य मा॒यया॑॥

हे प्रजाजनो! जो राजा और मन्त्री आदि जन न्याय और विनय से प्रकाशमान, दुष्टों में तेजस्वी और कठोर दण्ड के देनेवाले, सूर्य्य और वायु के सदृश मनोरथों की वृष्टि करतेवाले हैं, वे यशस्वी और प्रजाओं के प्रिय होते हैं॥३॥

मा॒या वां॑ मित्रावरुणा दि॒वि श्रि॒ता सूर्यो॒ ज्योति॑श्चरति चि॒त्रमायु॑धम्। तम॒भ्रेण॑ वृ॒ष्ट्या गू॑हथो दि॒वि पर्ज॑न्य द्र॒प्सा मधु॑मन्त ईरते॥

जो राजा और मन्त्री जन सूर्य्य और चन्द्रमा के सदृश तीव्र और शान्तस्वभाववाले, बुद्धिमान्, वृष्टि के सदृश प्रजाओं का पालन करते हैं, वे सब काल में सुख की वृद्धि करते हैं॥४॥

रथं॑ युञ्जते म॒रुतः॑ शु॒भे सु॒खं शूरो॒ न मि॑त्रावरुणा॒ गवि॑ष्टिषु। रजां॑सि चि॒त्रा वि च॑रन्ति त॒न्यवो॑ दि॒वः स॑म्राजा॒ पय॑सा न उक्षतम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो शूरवीर जनों के सदृश सुखकारक रथ पर चढ़कर यथेष्ट स्थान में घूमते हैं, वे अभीष्ट पदार्थ को प्राप्त होते हैं॥५॥

वाचं॒ सु मि॑त्रावरुणा॒विरा॑वतीं प॒र्जन्य॑श्चि॒त्रां व॑दति॒ त्विषी॑मतीम्। अ॒भ्रा व॑सत म॒रुतः॒ सु मा॒यया॒ द्यां व॑र्षयतमरु॒णाम॑रे॒पस॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य विद्या से युक्त वाणी को प्राप्त होकर मेघ के सदृश मनोरथों की वृष्टि करते हैं, वे बुद्धि से विद्वान् करके [=बनाके] अपराधरहित करते हैं॥६॥

धर्म॑णा मित्रावरुणा विपश्चिता व्र॒ता र॑क्षेथे॒ असु॑रस्य मा॒यया॑। ऋ॒तेन॒ विश्वं॒ भुव॑नं॒ वि रा॑जथः॒ सूर्य॒मा ध॑त्थो दि॒वि चित्र्यं॒ रथ॑म्॥

जो मनुष्य धर्मसम्बन्धी सत्यभाषण आदि व्रत वा कर्मों को करते हैं, वे सूर्य के सदृश सत्य से प्रकाशित होते हैं॥७॥इस सूक्त में मित्रावरुण और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पिछले सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह त्रेसठवाँ सूक्त और पहिला वर्ग समाप्त हुआ॥

वरु॑णं वो रि॒शाद॑समृ॒चा मि॒त्रं ह॑वामहे। परि॑ व्र॒जेव॑ बा॒ह्वोर्ज॑ग॒न्वांसा॒ स्व॑र्णरम्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो! जैसे विद्वान् जन प्रीति से आप लोगों का ग्रहण करते हैं, वैसे इनको आप लोग भी स्वीकार करिये॥१

ता बा॒हवा॑ सुचे॒तुना॒ प्र य॑न्तमस्मा॒ अर्च॑ते। शेवं॒ हि जा॒र्यं॑ वां॒ विश्वा॑सु॒ क्षासु॒ जोगु॑वे॥

जो मनुष्य सब पृथिवी पर विद्या और बाहुबल से उत्तम पुरुषों के लिये सुख देते हैं, उनके लिये हम लोग भी सुख देवें॥२॥

यन्नू॒नम॒श्यां गतिं॑ मि॒त्रस्य॑ यायां प॒था। अस्य॑ प्रि॒यस्य॒ शर्म॒ण्यहिं॑सानस्य सश्चिरे॥

सब मनुष्य विद्वानों का अनुकरण कर और धर्ममार्ग से चलकर उत्तम गति को प्राप्त होवें॥३॥

यु॒वाभ्यां॑ मित्रावरुणोप॒मं धे॑यामृ॒चा। यद्ध॒ क्षये॑ म॒घोनां॑ स्तोतॄ॒णां च॑ स्पू॒र्धसे॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सब मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों की उपमा को ग्रहण करें॥४॥

आ नो॑ मित्र सुदी॒तिभि॒र्वरु॑णश्च स॒धस्थ॒ आ। स्वे क्षये॑ म॒घोनां॒ सखी॑नां च वृ॒धसे॑॥

वे ही मित्र श्रेष्ठ हैं, जो परस्पर की उन्नति के लिये सुख दुःख और सङ्ग में प्रयत्न करते हैं॥५॥

यु॒वं नो॒ येषु॑ वरुण क्ष॒त्रं बृ॒हच्च॑ बिभृ॒थः। उ॒रु णो॒ वाज॑सातये कृ॒तं रा॒ये स्व॒स्तये॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि विरोध का त्याग कर और उत्तम प्रकार मिलने से उद्यम करके विजय और धन आदि को प्राप्त करें॥६॥

उ॒च्छन्त्यां॑ मे यज॒ता दे॒वक्ष॑त्रे॒ रुश॑द्गवि। सु॒तं सोमं॒ न ह॒स्तिभि॒रा प॒ड्भिर्धा॑वतं नरा॒ बिभ्र॑तावर्च॒नान॑सम्॥

हे पुरुषार्थी राजजनो! प्रजाओं का न्याय से पालन करके विद्वानों के धन को प्राप्त होओ॥७॥इस सूक्त में प्राण और उदान के सदृश वर्तमान तथा विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चौसठवाँ सूक्त और द्वितीय वर्ग समाप्त हुआ॥

यश्चि॒केत॒ स सु॒क्रतु॑र्देव॒त्रा स ब्र॑वीतु नः। वरु॑णो॒ यस्य॑ दर्श॒तो मि॒त्रो वा॒ वन॑ते॒ गिरः॑॥

हे मनुष्यो! जो हम लोगों के मध्य में अधिक विद्वान् होवे, वही उपदेश करे और जो अधिक ज्ञानवान् होवे, वह सत्य और असत्य को अलग करे॥१॥

ता हि श्रेष्ठ॑वर्चसा॒ राजा॑ना दीर्घ॒श्रुत्त॑मा। ता सत्प॑ती ऋता॒वृध॑ ऋ॒तावा॑ना॒ जने॑जने॥

जो मनुष्य बहुश्रुत, पूर्ण विद्यावाले, सत्य धर्म्म में निष्ठा करनेवाले और जो विद्या की प्रवृत्ति में प्रीति करनेवाले हों, वे ही उपदेशक अध्यापक होवें॥२॥

ता वा॑मिया॒नोऽव॑से॒ पूर्वा॒ उप॑ ब्रुवे॒ सचा॑। स्वश्वा॑सः॒ सु चे॒तुना॒ वाजाँ॑ अ॒भि प्र दा॒वने॑॥

जैसे उपदेशक जन उपदेश देवें, वैसे ही जिनको उपदेश दिया जाये वे औरों को भी उपदेश करें॥३॥

मि॒त्रो अं॒होश्चि॒दादु॒रु क्षया॑य गा॒तुं व॑नते। मि॒त्रस्य॒ हि प्र॒तूर्व॑तः सुम॒तिरस्ति॑ विध॒तः॥

वे ही मित्र हैं, जो निष्कपटता से और शुद्ध भाव से परस्पर के जनों के साथ वर्तमान हैं॥४॥

व॒यं मि॒त्रस्याव॑सि॒ स्याम॑ स॒प्रथ॑स्तमे। अ॒ने॒हस॒स्त्वोत॑यः स॒त्रा वरु॑णशेषसः॥

मनुष्यों को चाहिये कि सदा कृतज्ञता करें और कृतघ्नता का दूर से त्याग करें॥५॥

यु॒वं मि॑त्रे॒मं जनं॒ यत॑थः॒ सं च॑ नयथः। मा म॒घोनः॒ परि॑ ख्यतं॒ मो अ॒स्माक॒मृषी॑णां गोपी॒थे न॑ उरुष्यतम्॥

हे विद्वानो! आप लोग सब लोगों को प्रयत्न से युक्त करके सुख को प्राप्त कराइये और हे विद्यार्थीजनो वा श्रोतृजनो! आप लोग हम अध्यापक और उपदेशकों का अपमान मत करो, इस प्रकार वर्त्ताव कर सत्य धर्म का सेवन हम लोग करें॥६॥इस सूक्त में मित्रावरुणपदवाच्य अध्यापक और अध्ययन करने तथा उपदेश करने और उपदेश देने योग्यों के कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पैंसठवाँ सूक्त और तीसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

आ चि॑कितान सु॒क्रतू॑ दे॒वौ म॑र्त रि॒शाद॑सा। वरु॑णाय ऋ॒तपे॑शसे दधी॒त प्रय॑से म॒हे॥

वही विद्वान् होता है, जो विद्वानों का सङ्ग करके बुद्धि को बढ़ाता है॥१॥

ता हि क्ष॒त्रमवि॑ह्रुतं स॒म्यग॑सु॒र्य१॒॑माशा॑ते। अध॑ व्र॒तेव॒ मानु॑षं॒ स्व१॒॑र्ण धा॑यि दर्श॒तम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। सब मनुष्य धर्म पथ से सुख और कर्म्म को धारण करें॥२॥

ता वा॒मेषे॒ रथा॑नामु॒र्वीं गव्यू॑तिमेषाम्। रा॒तह॑व्यस्य सुष्टु॒तिं द॒धृक्स्तोमै॑र्मनामहे॥

हे मनुष्यो! जो जगत् के कल्याण के लिये सृष्टिक्रम से पदार्थविद्या को प्रकाशित करते हैं, वे धन्य होते हैं॥३॥

अधा॒ हि काव्या॑ यु॒वं दक्ष॑स्य पू॒र्भिर॑द्भुता। नि के॒तुना॒ जना॑नां चि॒केथे॑ पूतदक्षसा॥

विद्वानों को यह योग्य है कि स्वयं पूर्ण विद्वान् होके अज्ञजनों को अध्यापन और उपदेश से उपकृत करें॥४॥

तदृ॒तं पृ॑थिवि बृ॒हच्छ्र॑वए॒ष ऋषी॑णाम्। ज्र॒य॒सा॒नावरं॑ पृ॒थ्वति॑ क्षरन्ति॒ याम॑भिः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो स्त्रियाँ विद्यायुक्त होकर सत्य, धर्म्म और उत्तम स्वभाव को स्वीकार करके मेघ के सदृश सुखों की वृष्टि करती हैं तो वे बड़े सुख को प्राप्त होती हैं॥५॥

आ यद्वा॑मीयचक्षसा॒ मित्र॑ व॒यं च॑ सू॒रयः॑। व्यचि॑ष्ठे बहु॒पाय्ये॒ यते॑महि स्व॒राज्ये॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि मित्रता करके अपने और दूसरे के राज्य की न्याय से रक्षा करके धर्म की उन्नति करें॥६॥इस सूक्त में मित्र और श्रेष्ठ विद्वान् के और विद्यायुक्त स्त्री के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह छासठवाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ॥

बळि॒त्था दे॑वा निष्कृ॒तमादि॑त्या यज॒तं बृ॒हत्। वरु॑ण॒ मित्रार्य॑म॒न्वर्षि॑ष्ठं क्ष॒त्रमा॑शाथे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् जन इस संसार में धर्म्म युक्त कर्म्मों को करें, वैसे राज्य का राजा आदि पालन करें॥१॥

आ यद्योनिं॑ हिर॒ण्ययं॒ वरु॑ण॒ मित्र॒ सद॑थः। ध॒र्तारा॑ चर्षणी॒नां य॒न्तं सु॒म्नं रि॑शादसा॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् जन तेजःस्वरूप बिजुलीरूप सूर्य्य आदि कारण को जान के उपकार करते हैं, वैसे ही इसको करके मनुष्य सुख को प्राप्त हों॥२॥

विश्वे॒ हि वि॒श्ववे॑दसो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा। व्र॒ता प॒देव॑ सश्चिरे॒ पान्ति॒ मर्त्यं॑ रि॒षः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे प्राणी पैरों से अभीष्ट एक स्थान से दूसरे स्थान को जाके अपने प्रयोजन को सिद्ध करते हैं वैसे ही सत्यभाषण आदि कर्म्मों को धर्म्ममार्ग के लिए प्राप्त होकर अभीष्ट आनन्द को सिद्ध करो॥३॥

ते हि स॒त्या ऋ॑त॒स्पृश॑ ऋ॒तावा॑नो॒ जने॑जने। सु॒नी॒थासः॑ सु॒दान॑वों॒ऽहोश्चि॑दुरु॒चक्र॑यः॥

जो स्वयं धर्मयुक्त गुण, कर्म और स्वभाववाले हुए दुष्ट आचरण से पृथक् वर्त्ताव करके अन्य मनुष्यों को तादृश अर्थात् अपने समान करते हैं, वे धन्यवाद के योग्य हैं॥४॥

को नु वां॑ मि॒त्रास्तु॑तो॒ वरु॑णो वा त॒नूना॑म्। तत्सु वा॒मेष॑ते म॒तिरत्रि॑भ्य॒ एष॑ते म॒तिः॥

जो मनुष्य अध्यापक और उपदेशकों को प्राप्त होकर उनके उपदेश और विद्या को ग्रहण करके उनसे बुद्धि और उत्तम क्रिया का स्वीकार करते हैं, वे प्रसिद्ध स्तुतिवाले होते हैं॥५॥इस सूक्त में मित्रावरुण और विद्वानों के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सड़सठवाँ सूक्त और पाँचवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र वो॑ मि॒त्राय॑ गायत॒ वरु॑णाय वि॒पा गि॒रा। महि॑क्षत्रावृ॒तं बृ॒हत्॥

जो अध्यापक और उपदेशक जन सब मनुष्यों को विद्यादि से पवित्र करते हैं, वे मनुष्यों से सर्वदा सत्कार करने योग्य हैं॥१॥

स॒म्राजा॒ या घृ॒तयो॑नी मि॒त्रश्चो॒भा वरु॑णश्च। दे॒वा दे॒वेषु॑ प्रश॒स्ता॥

जो विद्वानों में विद्वान् राजपुरुष चक्रवर्त्तिराज्य को सिद्ध कर सकते हैं, वे ही यशस्वी होते हैं॥२॥

ता नः॑ शक्तं॒ पार्थि॑वस्य म॒हो रा॒यो दि॒व्यस्य॑। महि॑ वां क्ष॒त्रं दे॒वेषु॑॥

हे राजपुरुषो! आप लोग जो अपने राज्य वा विद्वानों से रक्षा करें तो वह पृथिवी में विदित हुआ समर्थ होवे॥३॥

ऋ॒तमृ॒तेन॒ सप॑न्तेषि॒रं दक्ष॑माशाते। अ॒द्रुहा॑ दे॒वौ व॑र्धेते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों के सदृश क्रिया करके सदा ही वृद्धि करें॥४॥

वृ॒ष्टिद्या॑वा री॒त्या॑पे॒षस्पती॒ दानु॑मत्याः। बृ॒हन्तं॒ गर्त॑माशाते॥

जो मनुष्य वृष्टि आदि में कारण सूर्य्य, वायु और बिजुली आदि को जानें तो उस कार्य्य को कर सकें॥५॥इस सूक्त में मित्र श्रेष्ठ और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह अड़सठवाँ सूक्त और छठवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

त्री रो॑च॒ना व॑रुण॒ त्रीँरु॒त द्यून्त्रीणि॑ मित्र धारयथो॒ रजां॑सि। वा॒वृ॒धा॒नाव॒मतिं॑ क्ष॒त्रिय॒स्यानु॑ व्र॒तं रक्ष॑माणावजु॒र्यम्॥

इस संसार में तीन प्रकार का प्रकाश है−एक सूर्य का, दूसरा बिजुली का, तीसरा पृथिवी में वर्त्तमान अग्नि का उन तीनों को जो क्षत्रिय आदि जानें, वे अक्षय राज्य करने को समर्थ होवें॥१॥

इरा॑वतीर्वरुण धे॒नवो॑ वां॒ मधु॑मद्वां॒ सिन्ध॑वो मित्र दुह्रे। त्रय॑स्तस्थुर्वृष॒भास॑स्तिसृ॒णां धि॒षणा॑नां रेतो॒धा वि द्यु॒मन्तः॑॥

हे सब के मित्र जनो! आप लोग गौ के सदृश सुख के देनेवाले, नदी के सदृश मल के दूर करने, बुद्धि के देने और कामनाओं की सिद्धि के देनेवाले हूजिये॥२॥

प्रा॒तर्दे॒वीमदि॑तिं जोहवीमि म॒ध्यंदि॑न॒ उदि॑ता॒ सूर्य॑स्य। रा॒ये मि॑त्रावरुणा स॒र्वता॒तेळे॑ तो॒काय॒ तन॑याय॒ शं योः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य कुटम्ब के पालन के लिये श्रेष्ठ पुरुषों की शिक्षा और वृद्धि के लिये सर्वदा प्रयत्न करते हैं, वे विद्वानों के कुल को करते हैं॥३॥

या ध॒र्तारा॒ रज॑सो रोच॒नस्यो॒तादि॒त्या दि॒व्या पार्थि॑वस्य। न वां॑ दे॒वा अ॒मृता॒ आ मि॑नन्ति व्र॒तानि॑ मित्रावरुणा ध्रु॒वाणि॑॥

हे मनुष्यो! जो वायु बिजुली और सूर्य्य सम्पूर्ण लोक के धारण करनेवाले हैं, वे परमेश्वर से धारण किये गये हैं, ऐसा जानकर सम्पूर्ण ईश्वर ने ही धारण किया, ऐसा जानना चाहिये॥४॥इस सूक्त में प्राण उदान और बिजुली के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह उनहत्तरवाँ सूक्त और सप्तम वर्ग समाप्त हुआ॥

पु॒रू॒रुणा॑ चि॒द्ध्यस्त्यवो॑ नू॒नं वां॑ वरुण। मित्र॒ वंसि॑ वां सुम॒तिम्॥

हे मनुष्यो! जो रक्षक राजपुरुष प्रजाओं की अत्यन्त रक्षा करते हैं, वे ही प्रजापुरुषों से सेवा करने योग्य हैं॥१॥

ता वां॑ स॒म्यग॑द्रुह्वा॒णेष॑मश्याम॒ धाय॑से। व॒यं ते रु॑द्रा स्याम॥

वे ही अध्यापक और उपदेशक कृतक्रिय होवें, जो क्रोध और लोभ आदि दोषों से रहित होवें और जो उनसे पढ़ते हैं, वे विद्या के धारण में प्रयत्न करते हुए होवें॥२॥

पा॒तं नो॑ रुद्रा पा॒युभि॑रु॒त त्रा॑येथां सुत्रा॒त्रा। तु॒र्याम॒ दस्यू॑न्त॒नूभिः॑॥

हे मनुष्यो! जो सभा और सेना के स्वामी निरन्तर प्रजाओं की रक्षा करें, उन का रक्षण प्रजा करें॥३॥

मा कस्या॑द्भुतक्रतू य॒क्षं भु॑जेमा त॒नूभिः॑। मा शेष॑सा॒ मा तन॑सा॥

विद्वान् जन ऐसा उपदेश करें जिससे कि किसी से दान कोई भी नहीं ग्रहण करे, वैसे ही माता और पिता से पुत्र, पौत्र आदि भी दान की रुचि न करें॥४॥इस सूक्त में प्राण उदान और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सत्तरवाँ सूक्त और अष्टम वर्ग समाप्त हुआ॥

आ नो॑ गन्तं रिशादसा॒ वरु॑ण॒ मित्र॑ ब॒र्हणा॑। उपे॒मं चारु॑मध्व॒रम्॥

जो विद्वान् जन व्यवहार नामक यज्ञ को करें तो हम लोगों की उन्नति के लिये समर्थ हों॥१॥

विश्व॑स्य॒ हि प्र॑चेतसा॒ वरु॑ण॒ मित्र॒ राज॑थः। ई॒शा॒ना पि॑प्यतं॒ धियः॑॥

हे मनुष्यो! जैसे अन्तरिक्ष में सूर्य्य और चन्द्रमा प्रकाशित होते हैं, वैसे मनुष्यों की बुद्धियों को बढ़ाइये॥२॥

उप॑ नः सु॒तमा ग॑तं॒ वरु॑ण॒ मित्र॑ दा॒शुषः॑। अ॒स्य सोम॑स्य पी॒तये॑॥

मनुष्य धार्मिक विद्वानों को बुलाकर सदा उनका सत्कार करें॥३॥इस सूक्त में मित्र श्रेष्ठ और विद्वानों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह इकहत्तरवाँ सूक्त और नववाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ मि॒त्रे वरु॑णे व॒यं गी॒र्भिर्जु॑हुमो अत्रि॒वत्। नि ब॒र्हिषि॑ सदतं॒ सोम॑पीतये॥

जो मित्र के सदृश वर्त्ताव करके संपूर्ण जगत् का सत्कार करते हैं, उनके अनुसार सबको वर्त्तना चाहिये॥१॥

व्र॒तेन॑ स्थो ध्रु॒वक्षे॑मा॒ धर्म॑णा यात॒यज्ज॑ना। नि ब॒र्हिषि॑ सदतं॒ सोम॑पीतये॥

जो मनुष्य निश्चित धर्म्म व्रत और शील को धारण करते हैं, वे दृढ़ सुख से युक्त होते हैं॥२॥

मि॒त्रश्च॑ नो॒ वरु॑णश्च जु॒षेतां॑ य॒ज्ञमि॒ष्टये॑। नि ब॒र्हिषि॑ सदतं॒ सोम॑पीतये॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मित्र के सदृश वर्त्ताव करके वाञ्छित सुख से सिद्ध करने की इच्छा करते हैं, वे गणना करने योग्य होते हैं॥३॥इस सूक्त में मित्र और श्रेष्ठ विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह ऋग्वेद में बहत्तरवाँ सूक्त पञ्चम अनुवाक चतुर्थ अष्टक में दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

यद॒द्य स्थः प॑रा॒वति॒ यद॑र्वा॒वत्य॑श्विना। यद्वा॑ पु॒रू पु॑रुभुजा॒ यद॒न्तरि॑क्ष॒ आ ग॑तम्॥

जो ब्रह्मचर्य्य से विद्या को पढ़कर परस्पर प्रीति से गृहारम्भ करें, वे स्त्री-पुरुष शिल्प विद्या को भी सिद्ध कर सकें॥१॥

इ॒ह त्या पु॑रु॒भूत॑मा पु॒रू दंसां॑सि॒ बिभ्र॑ता। व॒र॒स्या या॒म्यध्रि॑गू हु॒वे तु॒विष्ट॑मा भु॒जे॥

जहाँ स्त्री और पुरुष तुल्य गुण, कर्म्म, स्वभाव और सुरूपवान् हैं, वहाँ सम्पूर्ण पदार्थविद्या होती है॥२॥

ई॒र्मान्यद्वपु॑षे॒ वपु॑श्च॒क्रं रथ॑स्य येमथुः। पर्य॒न्या नाहु॑षा यु॒गा म॒ह्ना रजां॑सि दीयथः॥

हे मनुष्यो! जैसे रथ के पहिये घूमते हैं, वैसे दिन-रात्रि कालसम्बन्धी चक्र घूमता है, जिससे क्षण आदि तथा युग, कल्प और महाकल्प आदि सम्बन्धी गणितविद्या सिद्ध होती है, ऐसा जानो॥३॥

तदू॒ षु वा॑मे॒ना कृ॒तं विश्वा॒ यद्वा॒मनु॒ ष्टवे॑। नाना॑ जा॒ताव॑रे॒पसा॒ सम॒स्मे बन्धु॒मेय॑थुः॥

हे मनुष्यो! जैसे मैं वायु और बिजुली की विद्या को जानूँ, वैसे ही आप लोग भी जानिये॥४॥

आ यद्वां॑ सू॒र्या रथं॒ तिष्ठ॑द्रघु॒ष्यदं॒ सदा॑। परि॑ वामरु॒षा वयो॑ घृ॒णा व॑रन्त आ॒तपः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रातःकाल सब प्रकार से प्रिय और सुखकारक है, वैसे परस्पर प्रीतियुक्त स्त्री पुरुष प्रसन्न [रहते] हैं॥५॥

यु॒वोरत्रि॑श्चिकेतति॒ नरा॑ सु॒म्नेन॒ चेत॑सा। घ॒र्मं यद्वा॑मरे॒पसं॒ नास॑त्या॒स्ना भु॑र॒ण्यति॑॥

जो पुरुष विद्वानों के सङ्ग से अध्ययन और अध्यापन रूप यज्ञ का विस्तार करते हैं, वे संसार के उपकारक हैं॥६॥

उ॒ग्रो वां॑ ककु॒हो य॒यिः शृ॒ण्वे यामे॑षु संत॒निः। यद्वां॒ दंसो॑भिरश्वि॒नात्रि॑र्नराव॒वर्त॑ति॥

जो मनुष्य सूर्य्य और चन्द्रमा के सदृश नियम से वर्त्ताव करके कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वे सर्वदा उन्नत होते हैं॥७॥

मध्व॑ ऊ॒ षु म॑धूयुवा॒ रुद्रा॒ सिष॑क्ति पि॒प्युषी॑। यत्स॑मु॒द्राति॒ पर्ष॑थः प॒क्वाः पृक्षो॑ भरन्त वाम्॥

हे मनुष्यो! जैसे सूर्य्य और वायु वृष्टि से सब को सींचते और पके हुए फलों को उत्पन्न करते हैं, वैसे आप लोग भी आचरण करो॥८॥

स॒त्यमिद्वा उ॑ अश्विना यु॒वामा॑हुर्मयो॒भुवा॑। ता याम॑न्याम॒हूत॑मा॒ याम॒न्ना मृ॑ळ॒यत्त॑मा॥

जैसे भूमि और मेघ सब प्राणियों के सुखकारक हैं, वैसे ही अध्यापक और उपदेशक जन अत्यन्त सुखकारक हों॥९॥

इ॒मा ब्रह्मा॑णि॒ वर्ध॑ना॒श्विभ्यां॑ सन्तु॒ शंत॑मा। या तक्षा॑म॒ रथाँ॑इ॒वावो॑चाम बृ॒हन्नमः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! आप जैसे वस्त्र आदि से वाहनों को उढ़ाकर शृङ्गारयुक्त करते हैं, वैसे ही धन और धान्यों को उत्तम प्रकार ग्रहण करके उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त करें और शुद्ध अन्न के भोग से बड़े विज्ञान को प्राप्त होकर अन्य जनों को भी इस का उपदेश करें॥१०॥इस सूक्त में अन्तरिक्ष पृथिवी और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह तिहत्तरवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

कूष्ठो॑ देवावश्विना॒द्या दि॒वो म॑नावसू। तच्छ्र॑वथो वृषण्वसू॒ अत्रि॑र्वा॒मा वि॑वासति॥

हे विद्वानो! जो आप लोगों का सेवन करते हैं वे बहुश्रुत, विचारशील विद्वान् जन सम्पूर्ण श्रेष्ठ कर्म्मों का सेवन करते हैं और वे दुःख से रहित होते हैं॥१॥

कुह॒ त्या कुह॒ नु श्रु॒ता दि॒वि दे॒वा नास॑त्या। कस्मि॒न्ना य॑तथो॒ जने॒ को वां॑ न॒दीनां॒ सचा॑॥

जिज्ञासु जनों को चाहिये कि विद्वानों के समीप जाकर बिजुली आदि की विद्याओं को पूछें॥२॥

कं या॑थः॒ कं ह॑ गच्छथः॒ कमच्छा॑ युञ्जाथे॒ रथ॑म्। कस्य॒ ब्रह्मा॑णि रण्यथो व॒यं वा॑मुश्मसी॒ष्टये॑॥

हे मनुष्यो! विद्वान् जन जिसको प्राप्त होवें और युक्त होते तथा इच्छा करते हैं, उसी की आप लोग इच्छा करो॥३॥

पौ॒रं चि॒द्ध्यु॑द॒प्रुतं॒ पौर॑ पौ॒राय॒ जिन्व॑थः। यदीं॑ गृभी॒तता॑तये सिं॒हमि॑व द्रु॒हस्प॒दे॥

हे मनुष्यो! जैसे एक नगर के वासी जन परस्पर सुख की उन्नति करते हैं, वैसे ही अन्य देशवासी भी करें॥४॥

प्र च्यवा॑नाज्जुजु॒रुषो॑ व॒व्रिमत्कं॒ न मु॑ञ्चथः। युवा॒ यदी॑ कृ॒थः पुन॒रा काम॑मृण्वे व॒ध्वः॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे वृद्धावस्थाओं में रूप का त्याग करके वृद्धावस्था को प्राप्त होते हैं, वैसे ही दोषों के जाननेवाले गुणों का त्याग कर के दोषों को ग्रहण करते हैं॥५॥

अस्ति॒ हि वा॑मि॒ह स्तो॒ता स्मसि॑ वां सं॒दृशि॑ श्रि॒ये। नू श्रु॒तं म॒ आ ग॑त॒मवो॑भिर्वाजिनीवसू॥

जो विद्वानों के गुणों की स्तुति करते हैं, वे गुणों से युक्त हो और विद्वानों की समता को प्राप्त होकर श्रीमान् होते हैं॥६॥

को वा॑म॒द्य पु॑रू॒णामा व॑व्ने॒ मर्त्या॑नाम्। को विप्रो॑ विप्रवाहसा॒ को य॒ज्ञैर्वा॑जिनीवसू॥

जो विद्या की याचना करते हैं वे विद्वान् के समीप प्राप्त होकर प्रश्न और उत्तरों से आनन्द कर के लाभ को प्राप्त होवें, वे अन्यों को भी प्राप्त करा सकें॥७॥

आ वां॒ रथो॒ रथा॑नां॒ येष्ठो॑ यात्वश्विना। पु॒रू चि॑दस्म॒युस्ति॒र आ॑ङ्गू॒षो मर्त्ये॒ष्वा॥

हे मनुष्यो! जैसे अध्यापक और उपदेशक, शिल्पी जन उत्तम वाहनों को रचते हैं, वैसे सुख के साधनों को आप लोग उत्पन्न कीजिये॥८॥

शमू॒ षु वां॑ मधूयुवा॒स्माक॑मस्तु चर्कृ॒तिः। अ॒र्वा॒ची॒ना वि॑चेतसा॒ विभिः॑ श्ये॒नेव॑ दीयतम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। वे ही विद्वान् हैं, जो अपने ऐश्वर्य्य को अन्य जनों के सुख के लिये नियुक्त करते हैं, जैसे पक्षियों के साथ श्येन पक्षी शीघ्र चलता है, वैसे इनके साथ विद्यार्थी जन पूर्ण रीति से चलें॥९॥

अश्वि॑ना॒ यद्ध॒ कर्हि॑ चिच्छुश्रू॒यात॑मि॒मं हव॑म्। वस्वी॑रू॒ षु वां॒ भुजः॑ पृ॒ञ्चन्ति॒ सु वां॒ पृचः॑॥

जो विद्वान् जन विद्यार्थियों की परीक्षा करते हैं, उनको विद्यार्थीजन विद्वान् होकर प्रसन्न करते हैं॥१०॥इस सूक्त में अध्यापक, उपदेशक और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चौहत्तरवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्रति॑ प्रि॒यत॑मं॒ रथं॒ वृष॑णं वसु॒वाह॑नम्। स्तो॒ता वा॑मश्विना॒वृषिः॒ स्तोमे॑न॒ प्रति॑ भूषति॒ माध्वी॒ मम॑ श्रुतं॒ हव॑म्॥

जो अध्यापन और उपदेश करते हैं, वे योग्य समय में परीक्षा भी करें॥१॥

अ॒त्याया॑तमश्विना ति॒रो विश्वा॑ अ॒हं सना॑। दस्रा॒ हिर॑ण्यवर्तनी॒ सुषु॑म्ना॒ सिन्धु॑वाहसा॒ माध्वी॒ मम॑ श्रुतं॒ हव॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जिन विद्वानों से विद्याओं को आप लोग पढ़ो, वे जब-जब परीक्षा करें, तब-तब तिरस्कार के साथ वर्त्तमान को धारण करें, जिससे सब को अच्छे प्रकार विद्या प्राप्त होवे॥२॥

आ नो॒ रत्ना॑नि॒ बिभ्र॑ता॒वश्वि॑ना॒ गच्छ॑तं यु॒वम्। रुद्रा॒ हिर॑ण्यवर्तनी जुषा॒णा वा॑जिनीवसू॒ माध्वी॒ मम॑ श्रुतं॒ हव॑म्॥

वे ही भाग्यशाली होवें, जो यथार्थवक्ता विद्वानों के समीप जाकर वा उनको बुलाकर प्रयत्न से विद्या का अभ्यास कर के परीक्षा देते हैं॥३॥

सु॒ष्टुभो॑ वां वृषण्वसू॒ रथे॒ वाणी॒च्याहि॑ता। उ॒त वां॑ ककु॒हो मृ॒गः पृक्षः॑ कृणोति वापु॒षो माध्वी॒ मम॑ श्रुतं॒ हव॑म्॥

वही बड़ा होता है, जो विद्वानों के समीप से विद्या और सुशीलता को ग्रहण करता है॥४॥

बो॒धिन्म॑नसा र॒थ्ये॑षि॒रा ह॑वन॒श्रुता॑। विभि॒श्च्यवा॑नमश्विना॒ नि या॑थो॒ अद्व॑याविनं॒ माध्वी॒ मम॑ श्रुतं॒ हव॑म्॥

जो मनुष्य शुद्ध अन्तःकरणवाले, प्राप्त हुई शिल्पविद्या जिनको ऐसे और कपटरहित होकर विद्यार्थियों के परीक्षक हैं, वे जगत् के मङ्गलकारक होते हैं॥५॥

आ वां॑ नरा मनो॒युजोऽश्वा॑सः प्रुषि॒तप्स॑वः। वयो॑ वहन्तु पी॒तये॑ स॒ह सु॒म्नेभि॑रश्विना॒ माध्वी॒ मम॑ श्रुतं॒ हव॑म्॥

जो मनुष्य पदार्थविद्या से शिल्पसिद्ध कार्य्यों को सिद्ध करें तो अधिक धनी होवें॥६॥

अश्वि॑ना॒वेह ग॑च्छतं॒ नास॑त्या॒ मा वि वे॑नतम्। ति॒रश्चि॑दर्य॒या परि॑ व॒र्तिर्या॑तमदाभ्या॒ माध्वी॒ मम॑ श्रुतं॒ हव॑म्॥

हे स्त्रीपुरुषो! आप दोनों गृहस्थ मार्ग में वर्त्ताव करके धर्म्म से सन्तान और ऐश्वर्य की इच्छा करो तथा अध्यापन और परीक्षा सदा ही करो॥७॥

अ॒स्मिन्य॒ज्ञे अ॑दाभ्या जरि॒तारं॑ शुभस्पती। अ॒व॒स्युम॑श्विना यु॒वं गृ॒णन्त॒मुप॑ भूषथो॒ माध्वी॒ मम॑ श्रुतं॒ हव॑म्॥

जो स्त्री पुरुष गृहाश्रम में वर्त्तमान उत्तम आचरणवाले स्तुतियों से स्तुति करनेवाले गृह के कृत्यों को शोभित करते हैं तथा अध्यापन और परीक्षा से विद्या का उन्नति करते हैं, वे ही इस जगत् में प्रशंसित होते हैं॥८॥

अभू॑दु॒षा रुश॑त्पशु॒राग्निर॑धाय्यृ॒त्वियः॑। अयो॑जि वां वृषण्वसू॒ रथो॑ दस्रा॒वम॑र्त्यो॒ माध्वी॒ मम॑ श्रुतं॒ हव॑म्॥

सदा स्त्री-पुरुष ऋतुगामी होवें, सदा शरीर के आरोग्य और पुष्टि को करें तथा विद्या की उन्नति करके आनन्द की उन्नति करें॥९॥इस सूक्त में अश्विपदवाच्य विद्वान् स्त्री-पुरुष के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पचहत्तरवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ भा॑त्य॒ग्निरु॒षसा॒मनी॑क॒मुद्विप्रा॑णां देव॒या वाचो॑ अस्थुः। अ॒र्वाञ्चा॑ नू॒नं र॑थ्ये॒ह या॑तं पीपि॒वांस॑मश्विना घ॒र्ममच्छ॑॥

हे बुद्धिमान् जनो! जैसे बिजुली आदि अग्नि बहुत कार्य्यों को सिद्ध करता है, वैसे ही स्त्रीपुरुष मिलकर गृहकृत्यों को सिद्ध करें॥१॥

न सं॑स्कृ॒तं प्र मि॑मीतो॒ गमि॒ष्ठान्ति॑ नू॒नम॒श्विनोप॑स्तुते॒ह। दिवा॑भिपि॒त्वेऽव॒साग॑मिष्ठा॒ प्रत्यव॑र्तिं दा॒शुषे॒ शंभ॑विष्ठा॥

जो गृहस्थ जन-किया है संस्कार जिनका, ऐसे पदार्थों का वृथा नहीं नाश करते हैं, वे लक्ष्मीवान् होते हैं॥२॥

उ॒ता या॑तं संग॒वे प्रा॒तरह्नो॑ म॒ध्यंदि॑न॒ उदि॑ता॒ सूर्य॑स्य। दिवा॒ नक्त॒मव॑सा॒ शंत॑मेन॒ नेदानीं॑ पी॒तिर॒श्विना त॑तान॥

किया विवाह जिन्होंने वे स्त्री-पुरुष प्रातः, मध्याह्न, सायं समयों में दिन-रात्रि को कल्याण करनेवाले कर्म्मों को सुखों से प्राप्त हों, कभी आलस्य मत करें॥३॥

इ॒दं हि वां॑ प्र॒दिवि॒ स्थान॒मोक॑ इ॒मे गृ॒हा अ॑श्विने॒दं दु॑रो॒णम्। आ नो॑ दि॒वो बृ॑ह॒तः पर्व॑ता॒दाद्भ्यो या॑त॒मिष॒मूर्जं॒ वह॑न्ता॥

जो गृहस्थ जन गृहाश्रम के कर्म्मों को पूर्ण रीति से करते हैं, वे सब सुखों को प्राप्त होते हैं॥४॥

सम॒श्विनो॒रव॑सा॒ नूत॑नेन मयो॒भुवा॑ सु॒प्रणी॑ती गमेम। आ नो॑ र॒यिं व॑हत॒मोत वी॒राना विश्वा॑न्यमृता॒ सौभ॑गानि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो लोग यथार्थवक्ताओं के उपदेश से राजा की न्यायव्यवस्था के साथ वर्त्ताव करके न्याय से उत्तम पुरुषों को और सम्पूर्ण ऐश्वर्यों को प्राप्त होते हैं, वे अभीष्ट पदार्थों की सिद्धि को प्राप्त होते हैं॥५॥इस सूक्त में अग्नि, अश्वि, राजा और उपदेशक के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह छहत्तरवाँ सूक्त और सत्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्रा॒त॒र्यावा॑णा प्रथ॒मा य॑जध्वं पु॒रा गृध्रा॒दर॑रुषः पिबातः। प्रा॒तर्हि य॒ज्ञम॒श्विना॑ द॒धाते॒ प्र शं॑सन्ति क॒वयः॑ पूर्व॒भाजः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो राजा और उपदेशक जन दिन में शयनरहित और जिनकी विद्वान् जन स्तुति करते हैं, उनके सत्सङ्ग से आप लोग काङ्क्षासिद्धि करो॥१॥

प्रा॒तर्य॑जध्वम॒श्विना॑ हिनोत॒ न सा॒यम॑स्ति देव॒या अजु॑ष्टम्। उ॒तान्यो अ॒स्मद्य॑जते॒ वि चावः॒ पूर्वः॑पूर्वो॒ यज॑मानो॒ वनी॑यान्॥

मनुष्यों को चाहिये कि प्रतिदिन रात्रि के चौथे शेष प्रहर में उठकर जैसे नियम से अन्तरिक्ष और पृथिवी वर्त्तमान हैं, वैसे वर्त्ताव करके सब की रक्षा करें॥२॥

हिर॑ण्यत्व॒ङ्मधु॑वर्णो घृ॒तस्नुः॒ पृक्षो॒ वह॒न्ना रथो॑ वर्तते वाम्। मनो॑जवा अश्विना॒ वात॑रंहा॒ येना॑तिया॒थो दु॑रि॒तानि॒ विश्वा॑॥

जो मनुष्य विमानादिकों को अग्नि और जलादिकों से चलावें तो वे विमान आदि मन और वायु के सदृश शीघ्र जा कर लौट आवें॥३॥

यो भूयि॑ष्ठं॒ नास॑त्याभ्यां वि॒वेष॒ चनि॑ष्ठं पि॒त्वो रर॑ते विभा॒गे। स तो॒कम॑स्य पीपर॒च्छमी॑भि॒रनू॑र्ध्वभासः॒ सद॒मित्तु॑तुर्यात्॥

जो अग्नि और जल से बहुत कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वे जगत् का रक्षण करके सम्पूर्ण दुःख के नाश करने योग्य हैं॥४॥

सम॒श्विनो॒रव॑सा॒ नूत॑नेन मयो॒भुवा॑ सु॒प्रणी॑ती गमेम। आ नो॑ र॒यिं व॑हत॒मोत वी॒राना विश्वा॑न्यमृता॒ सौभ॑गानि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे यथार्थवक्ता जन सब के साथ वर्त्ताव करें, वैसे इन सब लोगों को वर्त्ताव करना चाहिये॥५॥इस सूक्त में अग्नि, जल, विद्वान् और राजा के कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सतहत्तरवाँ सूक्त और अठारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अश्वि॑ना॒वेह ग॑च्छतं॒ नास॑त्या॒ मा वि वे॑नतम्। हं॒सावि॑व पतत॒मा सु॒ताँ उप॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विमान से हंस के सदृश अन्तरिक्ष में जा आकर विरुद्ध आचरण का त्याग करके सत्य की कामना करते हैं, वे बहुत सुख को प्राप्त होते हैं॥१॥

अश्वि॑ना हरि॒णावि॑व गौ॒रावि॒वानु॒ यव॑सम्। हं॒सावि॑व पतत॒मा सु॒ताँ उप॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य जल और बिजुली को सिद्ध करते हैं, वे हरिण के सदृश शीघ्र जाने के योग्य हैं॥२॥

अश्वि॑ना वाजिनीवसू जु॒षेथां॑ य॒ज्ञमि॒ष्टये॑। हं॒सावि॑व पतत॒मा सु॒ताँ उप॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। उपदेशक जन सम्पूर्ण शिक्षा करने योग्य मनुष्यों को पुत्र के सदृश मान कर और सब जगह भ्रमण कर के सत्य उपदेश से कृतकृत्य करें॥३॥

अत्रि॒र्यद्वा॑मव॒रोह॑न्नृ॒बीस॒मजो॑हवी॒न्नाध॑मानेव॒ योषा॑। श्ये॒नस्य॑ चि॒ज्जव॑सा॒ नूत॑ने॒नाग॑च्छतमश्विना॒ शंत॑मेन॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वानों के अनुकरण से सरल स्वभाव को स्वीकार करके प्रयत्न करते हैं, वे सर्वदा सुखी होते हैं॥४॥

वि जि॑हीष्व वनस्पते॒ योनिः॒ सूष्य॑न्त्याइव। श्रु॒तं मे॑ अश्विना॒ हवं॑ स॒प्तव॑ध्रिं च मुञ्चतम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। आप लोग यथार्थवक्ता अध्यापक और उपदेशकों की इच्छा करिये और जैसे गर्भवती स्त्री बालक का त्याग करती है, वैसे ही अन्तःकरणः से अविद्या को दूर करिये॥५॥

भी॒ताय॒ नाध॑मानाय॒ ऋष॑ये स॒प्तव॑ध्रये। मा॒याभि॑रश्विना यु॒वं वृ॒क्षं सं च॒ वि चा॑चथः॥

विद्वानों की योग्यता है कि बुद्धि के देने से अविद्यादि भय के कारण डरे हुओं को भयरहित करके तथा संसार में मोह और अधर्म्म के योग से वियुक्त करके सुखी करें॥६॥

यथा॒ वातः॑ पुष्क॒रिणीं॑ समि॒ङ्गय॑ति स॒र्वतः॑। ए॒वा ते॒ गर्भ॑ एजतु नि॒रैतु॒ दश॑मास्यः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो स्त्रीपुरुष ब्रह्मचर्य्य से विद्या को पढ़ के विवाह करें तो दशवें मास में प्रसव हो, ऐसा जानना चाहिये॥७॥

यथा॒ वातो॒ यथा॒ वनं॒ यथा॑ समु॒द्र एज॑ति। ए॒वा त्वं द॑शमास्य स॒हावे॑हि ज॒रायु॑णा॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। वही गर्भ और उसमें स्थित बालक उत्तम होता है, जो दशवें महीने में होता है॥८॥

दश॒ मासा॑ञ्छशया॒नः कु॑मा॒रो अधि॑ मा॒तरि॑। नि॒रैतु॑ जी॒वो अक्ष॑तो जी॒वो जीव॑न्त्या॒ अधि॑॥

वे ही सन्तान उत्तम होते हैं कि जो दश महीने पूर्ण हों, जबतक तबतक गर्भ में स्थित होकर प्रकट होते हैं॥९॥इस सूक्त में अश्विपदवाच्य स्त्रीपुरुष के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह अठहत्तरवाँ सूक्त और बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

म॒हे नो॑ अ॒द्य बो॑ध॒योषो॑ रा॒ये दि॒वित्म॑ती। यथा॑ चिन्नो॒ अबो॑धयः स॒त्यश्र॑वसि वा॒य्ये सुजा॑ते॒ अश्व॑सूनृते॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे प्रातर्वेला दिन को उत्पन्न कर के सब को जगाती है, वैसे ही विद्यायुक्त स्त्री अपने सन्तानों को अविद्या के सदृश वर्त्तमान निद्रा से उठा कर विद्या को जनाती है॥१॥

या सु॑नी॒थे शौ॑चद्र॒थे व्यौच्छो॑ दुहितर्दिवः। सा व्यु॑च्छ॒ सही॑यसि स॒त्यश्र॑वसि वा॒य्ये सुजा॑ते॒ अश्व॑सूनृते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रातर्वेला सब को सुख में वसाती है, वैसे ही श्रेष्ठ स्त्री आनन्दयुक्त गृहाश्रम में सबको वसाती है॥२॥

सा नो॑ अ॒द्याभ॒रद्व॑सु॒र्व्यु॑च्छा दुहितर्दिवः। यो व्यौच्छः॒ सही॑यसि स॒त्यश्र॑वसि वा॒य्ये सुजा॑ते॒ अश्व॑सूनृते॥

जो स्त्रियाँ प्रातर्वेला के सदृश श्रेष्ठ गुणवाली हों तो सब को आनन्द में वसाने के योग्य होती हैं॥३॥

अ॒भि ये त्वा॑ विभावरि॒ स्तोमै॑र्गृ॒णन्ति॒ वह्न॑यः। म॒घैर्म॑घोनि सु॒श्रियो॒ दाम॑न्वन्तः सुरा॒तयः॒ सुजा॑ते॒ अश्व॑सूनृते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वही प्रशंसित स्त्री है, जो पिता और पति के कुल में श्रेष्ठ आचरण से पिता और पति के कुल को प्रकाशित करे॥४॥

यच्चि॒द्धि ते॑ ग॒णा इ॒मे छ॒दय॑न्ति म॒घत्त॑ये। परि॑ चि॒द्वष्ट॑यो दधु॒र्दद॑तो॒ राधो॒ अह्र॑यं॒ सुजा॑ते॒ अश्व॑सूनृते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रातःकाल के किरणसमूह अपने तेज से सब को ढाँपते हैं, वैसे ही शुभगुणवाली स्त्रियाँ अपने शुभगुणों से सब को आच्छादित करती हैं॥५॥

ऐषु॑ धा वी॒रव॒द्यश॒ उषो॑ मघोनि सू॒रिषु॑। ये नो॒ राधां॒स्यह्र॑या म॒घवा॑नो॒ अरा॑सत॒ सुजा॑ते॒ अश्व॑सूनृते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वही प्रशंसित स्त्री है जो पिता और पति के कुल में श्रेष्ठ आचरण से पिता और पति के कुल को प्रकाशित करे॥६॥

तेभ्यो॑ द्यु॒म्नं बृ॒हद्यश॒ उषो॑ मघो॒न्या व॑ह। ये नो॒ राधां॒स्यश्व्या॑ ग॒व्या भज॑न्त सू॒रयः॒ सुजा॑ते॒ अश्व॑सूनृते॥

जो विद्वान् जन सब के सुख के लिये पदार्थों की वृद्धि करते हैं, वे प्रातःकाल के सदृश प्रकाशित यशवाले होकर सुखी होते हैं॥७॥

उ॒त नो॒ गोम॑ती॒रिष॒ आ व॑हा दुहितर्दिवः। सा॒कं सूर्य॑स्य र॒श्मिभिः॑ शु॒क्रैः शोच॑द्भिर॒र्चिभिः॒ सुजा॑ते॒ अश्व॑सूनृते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य की किरणों से उत्पन्न उषा उपकार करनेवाली होती है, वैसे ही शुभ गुण, कर्म और स्वभावों के सहित स्त्री आनन्द की उपकार करनेवाली होती है॥८॥

व्यु॑च्छा दुहितर्दिवो॒ मा चि॒रं त॑नुथा॒ अपः॑। नेत्त्वा॑ स्ते॒नं यथा॑ रि॒पुं तपा॑ति॒ सूरो॑ अ॒र्चिषा॒ सुजा॑ते॒ अश्व॑सूनृते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो स्त्री और पुरुष मन्द, आलसी और चोर नहीं होते हैं, वे सूर्य्य के सदृश प्रकाशित होते हैं॥९॥

ए॒ताव॒द्वेदु॑ष॒स्त्वं भूयो॑ वा॒ दातु॑मर्हसि। या स्तो॒तृभ्यो॑ विभावर्यु॒च्छन्ती॒ न प्र॒मीय॑से॒ सुजा॑ते॒ अश्व॑सूनृते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे स्त्रीजनो! जैसे उषर्वेला थोड़ी भी बड़े आनन्दों को देती है, वैसे तुम होओ॥१०॥इस सूक्त में प्रातः और स्त्री के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह उनाशीवाँ सूक्त और बाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

द्यु॒तद्या॑मानं बृह॒तीमृ॒तेन॑ ऋ॒ताव॑रीमरु॒णप्सुं॑ विभा॒तीम्। दे॒वीमु॒षसं॒ स्व॑रा॒वह॑न्तीं॒ प्रति॒ विप्रा॑सो म॒तिभि॑र्जरन्ते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे बुद्धिमान् पति उषःकाल आदि पदार्थों की विद्या को जान कर क्षणभर भी काल व्यर्थ नहीं व्यतीत करते हैं, वैसे ही स्त्रियाँ भी व्यर्थ समय न व्यतीत करें॥१॥

ए॒षा जनं॑ दर्श॒ता बो॒धय॑न्ती सु॒गान्प॒थः कृ॑ण्व॒ती या॒त्यग्रे॑। बृ॒ह॒द्र॒था बृ॑ह॒ती वि॑श्वमि॒न्वोषा ज्योति॑र्यच्छ॒त्यग्रे॒ अह्ना॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो स्त्रियाँ प्रभातवेला के सदृश अपने पति आदि को सूर्य्योदय से पहिले जगातीं, गृह और बाहर के मार्गों को साफ करतीं, आते हुए पतियों के हाथ जोड़ के आगे खड़ी होतीं और सब काल में विज्ञान को देती हैं, वे ही देश और कुल को शोभन करनेवाली हैं॥२॥

ए॒षा गोभि॑ररु॒णेभि॑र्युजा॒नास्रे॑धन्ती र॒यिमप्रा॑यु चक्रे। प॒थो रद॑न्ती सुवि॒ताय॑ दे॒वी पु॑रुष्टु॒ता वि॒श्ववा॑रा॒ वि भा॑ति॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पतिव्रता, विद्यायुक्त और चतुर स्त्री गृह को प्रकाशित करनेवाली होती है, वैसे ही प्रातर्वेला ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करनेवाली है॥३॥

ए॒षा व्ये॑नी भवति द्वि॒बर्हा॑ आविष्कृण्वा॒ना त॒न्वं॑ पु॒रस्ता॑त्। ऋ॒तस्य॒ पन्था॒मन्वे॑ति सा॒धु प्र॑जान॒तीव॒ न दिशो॑ मिनाति॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सती स्त्री गृहाश्रम के मार्ग को प्रकाशित करके सम्पूर्ण सुखों को प्रकट करती है, वैसे ही प्रातर्वेला वर्त्तमान है॥४॥

ए॒षा शु॒भ्रा न त॒न्वो॑ विदा॒नोर्ध्वेव॑ स्ना॒ती दृ॒शये॑ नो अस्थात्। अप॒ द्वेषो॒ बाध॑माना॒ तमां॑स्यु॒षा दि॒वो दु॑हि॒ता ज्योति॒षागा॑त्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे कुलीन स्त्री जलादिकों और इन्द्रियों के निग्रहों से बाहर और भीतर से शुद्ध, गृहस्थान्धकार को निवृत्त करती हुई, सब के शरीर की रक्षा करती है और गृह के कृत्यों में चतुर है, वैसे ही प्रातर्वेला होती है॥५॥

ए॒षा प्र॑ती॒ची दु॑हि॒ता दि॒वो नॄन्योषे॑व भ॒द्रा नि रि॑णीते॒ अप्सः॑। व्यू॒र्ण्व॒ती दा॒शुषे॒ वार्या॑णि॒ पुन॒र्ज्योति॑र्युव॒तिः पू॒र्वथा॑कः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो स्त्रियाँ शुभ आचरणवालीं और युवावस्था को प्राप्त हुईं अपने सदृश पतियों को प्राप्त होकर सम्पूर्ण गृहकृत्यों को व्यवस्थापित करती हैं, वे प्रातर्वेला के सदृश अत्यन्त शोभित होती हैं॥६॥

यु॒ञ्जते॒ मन॑ उ॒त यु॑ञ्जते॒ धियो॒ विप्रा॒ विप्र॑स्य बृह॒तो वि॑प॒श्चितः॑। वि होत्रा॑ दधे वयुना॒विदेक॒ इन्म॒ही दे॒वस्य॑ सवि॒तुः परि॑ष्टुतिः॥

अनेक विद्याबृंहित, बुद्धि आदि पदार्थों के अधिष्ठान, जगदीश्वर के बीच जो मन और बुद्धि को निरन्तर स्थापन करते हैं, वे समस्त ऐहिक और पारलौकिक सुख को प्राप्त होते हैं॥१॥

विश्वा॑ रू॒पाणि॒ प्रति॑ मुञ्चते क॒विः प्रासा॑वीद्भ॒द्रं द्वि॒पदे॒ चतु॑ष्पदे। वि नाक॑मख्यत्सवि॒ता वरे॒ण्योऽनु॑ प्र॒याण॑मु॒षसो॒ वि रा॑जति॥

हे मनुष्यो! जिस जगदीश्वर ने विचित्र और अनेक प्रकार के जगत् को सम्पूर्ण प्राणियों के सुख के लिये रचा, उसी जगदीश्वर की आप लोग उपासना करो॥२॥

यस्य॑ प्र॒याण॒मन्व॒न्य इद्य॒युर्दे॒वा दे॒वस्य॑ महि॒मान॒मोज॑सा। यः पार्थि॑वानि विम॒मे स एत॑शो॒ रजां॑सि दे॒वः स॑वि॒ता म॑हित्व॒ना॥

हे मनुष्यो! जो सूर्य्य आदिकों के धारण करनेवालों का धारण करनेवाला और देनेवालों का देनेवाला, बड़ों और प्रकृतिरूप कारण से सम्पूर्ण जगत् को रचता है और जिसके पीछे अर्थात् आश्रय से सब जीवते और स्थित हैं, वही सम्पूर्ण जगत् का रचनेवाला ईश्वर ध्यान करने योग्य है॥३॥

उ॒त या॑सि सवित॒स्त्रीणि॑ रोच॒नोत सूर्य॑स्य र॒श्मिभिः॒ समु॑च्यसि। उ॒त रात्री॑मुभ॒यतः॒ परी॑यस उ॒त मि॒त्रो भ॑वसि देव॒ धर्म॑भिः॥

हे मनुष्यो! जो सब का स्वामी, ईश्वर तीन-बिजुली, सूर्य्य और चन्द्रमा रूप बड़े दीपों को रच के सर्वत्र व्याप्त और सब का मित्र हुआ और सूर्य्य आदि को अभिव्याप्त हो और धारण कर के प्रकाशित करता है, वही सब प्रकार पूज्य है अर्थात् उपासना करने योग्य है॥४॥

उ॒तेशि॑षे प्रस॒वस्य॒ त्वमेक॒ इदु॒त पू॒षा भ॑वसि देव॒ याम॑भिः। उ॒तेदं विश्वं॒ भुव॑नं॒ वि रा॑जसि श्या॒वाश्व॑स्ते सवितः॒ स्तोम॑मानशे॥

हे मनुष्यो! जिसके महत्त्व के जनाने के लिये सूर्य्य आदि लोक दृष्टान्त हैं, उसी सम्पूर्ण परमैश्वर्य के देनेवाले का तुम ध्यान करो॥५॥इस सूक्त में सत्य व्यवहार में प्रेरणा करनेवाले ईश्वर के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह इक्यासीवाँ सूक्त और चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

तत्स॑वि॒तुर्वृ॑णीमहे व॒यं दे॒वस्य॒ भोज॑नम्। श्रेष्ठं॑ सर्व॒धात॑मं॒ तुरं॒ भग॑स्य धीमहि॥

जो मनुष्य सबसे उत्तम जगदीश्वर की उपासना करके अन्य की उपासना का त्याग करते हैं, वे सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य से युक्त होते हैं॥१॥

अस्य॒ हि स्वय॑शस्तरं सवि॒तुः कच्च॒न प्रि॒यम्। न मि॒नन्ति॑ स्व॒राज्य॑म्॥

जो परमात्मा के बीच अज्ञान का नाश करते हैं, वे यशस्वी होकर राज्य को प्राप्त होते हैं॥२॥

स हि रत्ना॑नि दा॒शुषे॑ सु॒वाति॑ सवि॒ता भगः॑। तं भा॒गं चि॒त्रमी॑महे॥

जो मनुष्य सम्पूर्ण रत्नों के देनेवाले परमात्मा की सेवा करते हैं, वे अद्भुत ऐश्वर्य्य को प्राप्त होते हैं॥३॥

अ॒द्या नो॑ देव सवितः प्र॒जाव॑त्सावीः॒ सौभ॑गम्। परा॑ दुः॒ष्वप्न्यं॑ सुव॥

जो परमेश्वर की प्रार्थना करके धर्म्मयुक्त पुरुषार्थ करते हैं, वे बहुत ऐश्वर्य्यवाले होकर दुःख और दारिद्र्य से रहित होते हैं॥४॥

विश्वा॑नि देव सवितर्दुरि॒तानि॒ परा॑ सुव। यद्भ॒द्रं तन्न॒ आ सु॑व॥

हे परमेश्वर! आप कृपा से जितने हम लोगों में दुष्ट आचरण हैं, उनको अलग करके धर्म्मयुक्त गुण, कर्म्म और स्वभावों को स्थापित कीजिये॥५॥

अना॑गसो॒ अदि॑तये दे॒वस्य॑ सवि॒तुः स॒वे। विश्वा॑ वा॒मानि॑ धीमहि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् जन इस ईश्वर से रचे हुए संसार में सृष्टिक्रम से विद्या के द्वारा कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वैसे ही अन्य जनों को भी चाहिये कि सिद्ध करें॥६॥

आ वि॒श्वदे॑वं॒ सत्प॑तिं सू॒क्तैर॒द्या वृ॑णीमहे। स॒त्यस॑वं सवि॒तार॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि परमेश्वर को छोड़कर किसी अन्य का आश्रय नहीं करें॥७॥

य इ॒मे उ॒भे अह॑नी पु॒र एत्यप्र॑युच्छन्। स्वा॒धीर्दे॒वः स॑वि॒ता॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे परमेश्वर अपने नियमों की यथायोग्य रक्षा करता है, वैसे ही मनुष्य भी श्रेष्ठ नियमों की यथावत् रक्षा करें॥८॥

य इ॒मा विश्वा॑ जा॒तान्या॑श्रा॒वय॑ति॒ श्लोके॑न। प्र च॑ सु॒वाति॑ सवि॒ता॥

हे मनुष्यो! जो जगदीश्वर वेद के द्वारा मनुष्यों के लिये सम्पूर्ण विद्याओं का उपदेश करता है, वही परमगुरु मानने योग्य है॥९॥इस सूक्त में ईश्वर और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह बयासीवाँ सूक्त और छब्बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अच्छा॑ वद त॒वसं॑ गी॒र्भिरा॒भिः स्तु॒हि प॒र्जन्यं॒ नम॒सा वि॑वास। कनि॑क्रदद्वृष॒भो जी॒रदा॑नू॒ रेतो॑ दधा॒त्योष॑धीषु॒ गर्भ॑म्॥

मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों से मेघविद्या का यथावत् विज्ञान करें॥१॥

वि वृ॒क्षान् ह॑न्त्यु॒त ह॑न्ति र॒क्षसो॒ विश्वं॑ बिभाय॒ भुव॑नं म॒हाव॑धात्। उ॒ताना॑गा ईषते॒ वृष्ण्या॑वतो॒ यत्प॒र्जन्यः॑ स्त॒नय॒न् हन्ति॑ दु॒ष्कृतः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य पालन करने योग्यों का पालन करते हैं और नाश करने योग्यों का नाश करते हैं, वे राजसत्ता से युक्त होते हैं॥२॥

र॒थीव॒ कश॒याश्वाँ॑ अभिक्षि॒पन्ना॒विर्दू॒तान्कृ॑णुते व॒र्ष्याँ॒३॒॑ अह॑। दू॒रात्सिं॒हस्य॑ स्त॒नथा॒ उदी॑रते॒ यत्प॒र्जन्यः॑ कृणु॒ते व॒र्ष्यं१॒॑ नभः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सारथी घोड़ों को यथेष्ट स्थान में ले जाने को समर्थ होता है, वैसे ही मेघ जलों को इधर-उधर ले जाता है॥३॥

प्र वाता॒ वान्ति॑ प॒तय॑न्ति वि॒द्युत॒ उदोष॑धी॒र्जिह॑ते॒ पिन्व॑ते॒ स्वः॑। इरा॒ विश्व॑स्मै॒ भुव॑नाय जायते॒ यत्प॒र्जन्यः॑ पृथि॒वीं रेत॒साव॑ति॥

मनुष्य लोगों को चाहिये कि जिस मेघ से सबका पालन होता है, उसकी वृद्धि वृक्षों के लगने, वनों की रक्षा करने और होम करने से सिद्ध करें, जिससे सब का पालन सुख से होवे॥४॥

यस्य॑ व्र॒ते पृ॑थि॒वी नन्न॑मीति॒ यस्य॑ व्र॒ते श॒फव॒ज्जर्भु॑रीति। यस्य॑ व्र॒त ओष॑धीर्वि॒श्वरू॑पाः॒ स नः॑ पर्जन्य॒ महि॒ शर्म॑ यच्छ॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो वृष्टियाँ न होवें तो किसी का भी जीवन न होवे॥५॥

दि॒वो नो॑ वृ॒ष्टिं म॑रुतो ररीध्वं॒ प्र पि॑न्वत॒ वृष्णो॒ अश्व॑स्य॒ धाराः॑। अ॒र्वाङे॒तेन॑ स्तनयि॒त्नुनेह्य॒पो नि॑षि॒ञ्चन्नसु॑रः पि॒ता नः॑॥

हे विद्वानो! जिन कर्म्मों से वृष्टि अधिक होवे, उन कर्म्मों का सेवन कीजिये॥६॥

अ॒भि क्र॑न्द स्त॒नय॒ गर्भ॒मा धा॑ उद॒न्वता॒ परि॑ दीया॒ रथे॑न। दृतिं॒ सु क॑र्ष॒ विषि॑तं॒ न्य॑ञ्चं स॒मा भ॑वन्तू॒द्वतो॑ निपा॒दाः॥

जो निश्चय[पूर्वक] जल से संसार को पुष्ट करता है और दुःख का नाश करता तथा फलों को उत्पन्न करता है, वह मेघ विश्वंभर है, ऐसा जानना चाहिये॥७॥

म॒हान्तं॒ कोश॒मुद॑चा॒ नि षि॑ञ्च॒ स्यन्द॑न्तां कु॒ल्या विषि॑ताः पु॒रस्ता॑त्। घृ॒तेन॒ द्यावा॑पृथि॒वी व्यु॑न्धि सुप्रपा॒णं भ॑वत्व॒घ्न्याभ्यः॑॥

हे मनुष्यो! जो बिजुली, सूर्य्य और वायु मेघ के कारण हैं, उनको यथायोग्य प्रयुक्त कीजिये जिससे वृष्टि द्वारा गौ आदि पशुओं का यथावत् पालन होवे॥८॥

यत्प॑र्जन्य॒ कनि॑क्रदत्स्त॒नय॒न् हंसि॑ दु॒ष्कृतः॑। प्रती॒दं विश्वं॑ मोदते॒ यत्किं च॑ पृथि॒व्यामधि॑॥

मेघ से ही सम्पूर्ण प्राणी आनन्दित होते हैं, इससे यह मेघ को बनानारूप कर्म्म परमेश्वर का धन्यवाद के योग्य है, यह सब लोग जानो॥९॥

अव॑र्षीर्व॒र्षमुदु॒ षू गृ॑भा॒याक॒र्धन्वा॒न्यत्ये॑त॒वा उ॑। अजी॑जन॒ ओष॑धी॒र्भोज॑नाय॒ कमु॒त प्र॒जाभ्यो॑ऽविदो मनी॒षाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जगदीश्वर वर्षाओं से प्रजा के हित को सिद्ध करता है, वैसे ही धार्मिक राजा प्रजाओं के लिये सुख और अध्यापक बुद्धि को उत्पन्न करे॥१०॥इस सूक्त में मेघ और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह तिरासीवाँ सूक्त और अठ्ठाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

बळि॒त्था पर्व॑तानां खि॒द्रं बि॑भर्षि पृथिवि। प्र या भूमिं॑ प्रवत्वति म॒ह्ना जि॒नोषि॑ महिनि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे भूमि पर पर्वत स्थिर होकर वर्त्तमान हैं, वैसे जिनके हृदय में धर्म आदि श्रेष्ठ व्यवहार हैं, वे आदर करने योग्य होते हैं॥१॥

स्तोमा॑सस्त्वा विचारिणि॒ प्रति॑ ष्टोभन्त्य॒क्तुभिः॑। प्र या वाजं॒ न हेष॑न्तं पे॒रुमस्य॑स्यर्जुनि॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे विद्वान् जन स्तुति करने योग्य जनों की स्तुति करते हैं, वैसे ही विद्यायुक्त स्त्री प्रशंसा करने योग्य की प्रशंसा करती है॥२॥

दृ॒ळ्हा चि॒द्या वन॒स्पती॑न्क्ष्म॒या दर्ध॒र्ष्योज॑सा। यत्ते॑ अ॒भ्रस्य॑ वि॒द्युतो॑ दि॒वो वर्ष॑न्ति वृ॒ष्टयः॑॥

जो स्त्री पृथिवी के सदृश क्षमा से युक्त और पुत्र-पौत्रादि से युक्त होती है, वह वृष्टि के सदृश सुखों को वर्षानेवाली होती है॥३॥इस सूक्त में मेघ विद्वान् और स्त्री के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चौरासीवाँ सूक्त और उनतीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र स॒म्राजे॑ बृ॒हद॑र्चा गभी॒रं ब्रह्म॑ प्रि॒यं वरु॑णाय श्रु॒ताय॑। वि यो ज॒घान॑ शमि॒तेव॒ चर्मो॑प॒स्तिरे॑ पृथि॒वीं सूर्या॑य॥

जो मनुष्य यजमान के सदृश राजा को सुखी करते हैं, वे बड़े ऐश्वर्य्य को प्राप्त होते हैं॥१॥

वने॑षु॒ व्य१॒॑न्तरि॑क्षं ततान॒ वाज॒मर्व॑त्सु॒ पय॑ उ॒स्रिया॑सु। हृ॒त्सु क्रतुं॒ वरु॑णो अ॒प्स्व१॒॑ग्निं दि॒वि सूर्य॑मदधा॒त्सोम॒मद्रौ॑॥

हे विद्वानो! जिस जगदीश्वर ने सम्पूर्ण जगत् को विस्तृत किया, उसी का निरन्तर ध्यान करो॥२॥

नी॒चीन॑बारं॒ वरु॑णः॒ कव॑न्धं॒ प्र स॑सर्ज॒ रोद॑सी अ॒न्तरि॑क्षम्। तेन॒ विश्व॑स्य॒ भुव॑नस्य॒ राजा॒ यवं॒ न वृ॒ष्टिर्व्यु॑नत्ति॒ भूम॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! आप लोग जगत् के रचनेवाले जगदीश्वर की उपासना करके और राजा होकर जैसे धान्य आदि का मेघ वैसे प्रजाओं का पालन कीजिये॥३॥

उ॒नत्ति॒ भूमिं॑ पृथि॒वीमु॒त द्यां य॒दा दु॒ग्धं वरु॑णो॒ वष्ट्यादित्। सम॒भ्रेण॑ वसत॒ पर्व॑तासस्तविषी॒यन्तः॑ श्रथयन्त वी॒राः॥

वे ही राजा श्रेष्ठ हैं, जो प्रजा के हित की कामना करते हैं और जैसे मेघ सब के सुखों की वृष्टि करते हैं, वैसे ही राजा लोग प्रजाओं की कामनाओं को पूर्ण करें॥४॥

इ॒मामू॒ ष्वा॑सु॒रस्य॑ श्रु॒तस्य॑ म॒हीं मा॒यां वरु॑णस्य॒ प्र वो॑चम्। माने॑नेव तस्थि॒वाँ अ॒न्तरि॑क्षे॒ वि यो म॒मे पृ॑थि॒वीं सूर्ये॑ण॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो मेघ की विद्या के जाननेवाले की वाणी और बुद्धि की प्रशंसा करता है और जो परमेश्वर सम्पूर्ण जगत् को रचता है, उन दोनों का सदा सत्कार करो॥५॥

इ॒मामू॒ नु क॒वित॑मस्य मा॒यां म॒हीं दे॒वस्य॒ नकि॒रा द॑धर्ष। एकं॒ यदु॒द्ना न पृ॒णन्त्येनी॑रासि॒ञ्चन्ती॑र॒वन॑यः समु॒द्रम्॥

जो मनुष्य बड़े विद्वानों के समीप से बड़ी बुद्धि और वाणी को प्राप्त होकर अन्यों के लिये प्राप्त कराते हैं, वे ही संसार में धन्य होते हैं॥६॥

अ॒र्य॒म्यं॑ वरुण मि॒त्र्यं॑ वा॒ सखा॑यं वा॒ सद॒मिद्भ्रात॑रं वा। वे॒शं वा॒ नित्यं॑ वरु॒णार॑णं वा॒ यत्सी॒माग॑श्चकृ॒मा शि॒श्रथ॒स्तत्॥

हे विद्वान् जनो! अज्ञान वा प्रमाद से श्रेष्ठ पुरुषों से हम लोग जो प्रमाद करें, उस सम्पूर्ण को आप निवृत्त कीजिये॥७॥

कि॒त॒वासो॒ यद्रि॑रि॒पुर्न दी॒वि यद्वा॑ घा स॒त्यमु॒त यन्न वि॒द्म। सर्वा॒ ता वि ष्य॑ शिथि॒रेव॑ दे॒वाधा॑ ते स्याम वरुण प्रि॒यासः॑॥

हे मनुष्यो! जो छली मनुष्य जुआ आदि कर्म्म करें, वे ताड़ना करने योग्य और जो सत्य आचरण करें, वे सत्कार करने योग्य हैं॥८॥इस सूक्त में राजा, ईश्वर, मेघ और विद्वान् के गुण कर्म वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पच्चासीवाँ सूक्त और एकतीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इन्द्रा॑ग्नी॒ यमव॑थ उ॒भा वाजे॑षु॒ मर्त्य॑म्। दृ॒ळ्हा चि॒त्स प्र भे॑दति द्यु॒म्ना वाणी॑रिव त्रि॒तः॥

जहाँ धार्मिक, विद्वान्, शूरवीर, बलिष्ठ और शिक्षक हैं, वहाँ पर कोई भी नहीं दुःख को प्राप्त होता है॥१॥

या पृत॑नासु दु॒ष्टरा॒ या वाजे॑षु श्र॒वाय्या॑। या पञ्च॑ चर्ष॒णीर॒भी॑न्द्रा॒ग्नी ता ह॑वामहे॥

राजा और सेनापति को चाहिये कि उत्तम प्रकार परीक्षा करके सेना के अध्यक्ष भृत्यों को रक्खें, जिससे सर्वदा विजय होवे॥२॥

तयो॒रिदम॑व॒च्छव॑स्ति॒ग्मा दि॒द्युन्म॒घोनोः॑। प्रति॒ द्रुणा॒ गभ॑स्त्यो॒र्गवां॑ वृत्र॒घ्न एष॑ते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजपुरुषो! जैसे सूर्य्य मेघ का नाश करके प्रजाओं का पालन करता है, वैसे ही आप लोग दुष्टों का नाश करके प्रजाओं की निरन्तर रक्षा कीजिये॥३॥

ता वा॒मेषे॒ रथा॑नामिन्द्रा॒ग्नी ह॑वामहे। पती॑ तु॒रस्य॒ राध॑सो वि॒द्वांसा॒ गिर्व॑णस्तमा॥

मनुष्यों को चाहिये कि वायु और बिजुली के सदृश श्रेष्ठ गुणों से व्याप्त विद्वानों के सङ्ग से विद्या और शिक्षा को प्राप्त होकर प्रजाओं में मित्र के सदृश वर्त्ताव करें॥४॥

ता वृ॒धन्ता॒वनु॒ द्यून्मर्ता॑य दे॒वाव॒दभा॑। अर्ह॑न्ता चित्पु॒रो द॒धेंऽशे॑व दे॒वावर्व॑ते॥

जो मनुष्य दिनरात्रि मनुष्यों के हित के लिये प्रयत्न करते हैं, वे ही सब से आदर करने योग्य हैं॥५॥

ए॒वेन्द्रा॒ग्निभ्या॒महा॑वि ह॒व्यं शू॒ष्यं॑ घृ॒तं न पू॒तमद्रि॑भिः। ता सू॒रिषु॒ श्रवो॑ बृ॒हद्र॒यिं गृ॒णत्सु॑ दिधृत॒मिषं॑ गृ॒णत्सु॑ दिधृतम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो विद्वानों में आप लोग निवास करें तो बिजुली और मेघ आदि की विद्या को जानें॥६॥इस सूक्त में इन्द्र, अग्नि और बिजुली के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह छियाशीवाँ सूक्त और बत्तीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र वो॑ म॒हे म॒तयो॑ यन्तु॒ विष्ण॑वे म॒रुत्व॑ते गिरि॒जा ए॑व॒याम॑रुत्। प्र शर्धा॑य॒ प्रय॑ज्यवे सुखा॒दये॑ त॒वसे॑ भ॒न्ददि॑ष्टये॒ धुनि॑व्रताय॒ शव॑से॥

जैसे बिजुलीरूप अग्नि को मेघोत्पन्न गर्जनादि प्रभाव प्राप्त होते हैं, क्योंकि वे गर्जनादि प्रभाव अग्नि और वायु से सिद्ध होने योग्य हैं, वैसे बुद्धिमान् पुरुषों को अन्य पुरुष प्राप्त होते हैं। और गुण प्राप्त करानेवाला पुरुष गुणी पुरुष को ढूँढता है और अति उत्तम बल को भी प्राप्त होता है॥१॥

प्र ये जा॒ता म॑हि॒ना ये च॒ नु स्व॒यं प्र वि॒द्मना॑ ब्रु॒वत॑ एव॒याम॑रुत्। क्रत्वा॒ तद्वो॑ मरुतो॒ नाधृषे॒ शवो॑ दा॒ना म॒ह्ना तदे॑षा॒मधृ॑ष्टासो॒ नाद्र॑यः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य सब के उपकार को करके प्राणवत् प्रिय होते हैं, वे ही जगत् के उपकार करनेवाले होते हैं॥२॥

प्र ये दि॒वो बृ॑ह॒तः शृ॑ण्वि॒रे गि॒रा सु॒शुक्वा॑नः सु॒भ्व॑ एव॒याम॑रुत्। न येषा॒मिरी॑ स॒धस्थ॒ ईष्ट॒ आ अ॒ग्नयो॒ न स्ववि॑द्युतः॒ प्र स्प॒न्द्रासो॒ धुनी॑नाम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो विद्या की कामना करनेवाले जन बड़ी विद्याओं को प्राप्त होकर बिजुली आदि पदार्थों को स्वाधीन करते हैं, वे ही सिद्ध इच्छावाले होते हैं॥३॥

स च॑क्रमे मह॒तो निरु॑रुक्र॒मः स॑मा॒नस्मा॒त्सद॑स एव॒याम॑रुत्। य॒दायु॑क्त॒ त्मना॒ स्वादधि॒ ष्णुभि॒र्विष्प॑र्धसो॒ विम॑हसो॒ जिगा॑ति॒ शेवृ॑धो॒ नृभिः॑॥

जो मनुष्य विद्वान् पुरुष के द्वारा परमेश्वर के योग का अभ्यास करते हैं, वे सुख के धारण करनेवाले होते हैं॥४॥

स्व॒नो न वोऽम॑वान्रेजय॒द्वृषा॑ त्वे॒षो य॒यिस्त॑वि॒ष ए॑व॒याम॑रुत्। येना॒ सह॑न्त ऋ॒ञ्जत॒ स्वरो॑चिषः॒ स्थार॑श्मानो हिर॒ण्ययाः॑ स्वायु॒धास॑ इ॒ष्मिणः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो प्रकाशित धर्म्मयुक्त व्यवहारवाले तथा शम, दम आदि से युक्त, तेजस्वी, बलवाले और युद्धविद्या में कुशल होवें, वे ही विजयी होते हैं॥५॥

अ॒पा॒रो वो॑ महि॒मा वृ॑द्धशवसस्त्वे॒षं शवो॑ऽवत्वेव॒याम॑रुत्। स्थाता॑रो॒ हि प्रसि॑तौ सं॒दृशि॒ स्थन॒ ते न॑ उरुष्यता नि॒दः शु॑शु॒क्वांसो॒ नाग्नयः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो निन्दक अर्थात् मिथ्यावादी होवें, उनको सदा बन्धन में प्रविष्ट करिये और जो महाशय, परोपकारी स्तुति करने और सत्य बोलनेवाले होवें, उनका सदा सत्कार करिये॥६॥

ते रु॒द्रासः॒ सुम॑खा अ॒ग्नयो॑ यथा तुविद्यु॒म्ना अ॑वन्त्वेव॒याम॑रुत्। दी॒र्घं पृ॒थु प॑प्रथे॒ सद्म॒ पार्थि॑वं॒ येषा॒मज्मे॒ष्वा म॒हः शर्धां॒स्यद्भु॑तैनसाम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य अग्नि के सदृश पाप के नाश करने, सत्य के प्रकाश करने और दुष्टों के रुलानेवाले, श्रेष्ठों के पालक हैं, वे ही अधिक कीर्त्तिवाले होते हैं॥७॥

अ॒द्वे॒षो नो॑ मरुतो गा॒तुमेत॑न॒ श्रोता॒ हवं॑ जरि॒तुरे॑व॒याम॑रुत्। विष्णो॑र्म॒हः स॑मन्यवो युयोतन॒ स्मद्र॒थ्यो॒३॒॑ न दं॒सनाप॒ द्वेषां॑सि सनु॒तः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वान् और उपदेशक जन मनुष्यों को द्वेष आदि दोष से रहित करते हैं, वे व्यापक ईश्वर के पद को प्राप्त होते हैं॥८॥

गन्ता॑ नो य॒ज्ञं य॑ज्ञियाः सु॒शमि॒ श्रोता॒ हव॑मर॒क्ष ए॑व॒याम॑रुत्। ज्येष्ठा॑सो॒ न पर्व॑तासो॒ व्यो॑मनि यू॒यं तस्य॑ प्रचेतसः॒ स्यात॑ दु॒र्धर्त॑वो नि॒दः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वान् जनो! आप लोग विद्या के प्रचारनामक व्यवहार के प्रचार से धर्मसम्बन्धी कार्यों को करके अन्यों से भी कराओ और निन्दा आदि दोषों से मनुष्यों को पृथक् करके परमेश्वर की ओर प्रवृत्त करो और स्वयं भी ऐसे होओ॥९॥इस सूक्त में वायु, विद्वान् और परमेश्वर की उपासना का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमद्विरजानन्द सरस्वती स्वामीजी के शिष्य श्रीमद्दयानदसरस्वती स्वामी विरचित संस्कृतार्य्यभाषाविभूषित सुप्रमाणयुक्त ऋग्वेदभाष्य में सतासीवाँ सूक्त चौतीसवाँ वर्ग तथा पञ्चम मण्डल में छठा अनुवाक और पञ्चम मण्डल भी समाप्त हुआ॥

मण्डलम्

सूक्तम्

त्वं ह्य॑ग्ने प्रथ॒मो म॒नोता॒स्या धि॒यो अभ॑वो दस्म॒ होता॑। त्वं सीं॑ वृषन्नकृणोर्दु॒ष्टरी॑तु॒ सहो॒ विश्व॑स्मै॒ सह॑से॒ सह॑ध्यै॥

जो विद्वान् जन मूर्ख लोगों से किये हुए अपराधों को सहकर सम्पूर्ण जनों के सुख के लिये प्रयत्न करते हैं, वही सब के हितकारी होते हैं॥१॥

अधा॒ होता॒ न्य॑सीदो॒ यजी॑यानि॒ळस्प॒द इ॒षय॒न्नीड्यः॒ सन्। तं त्वा॒ नरः॑ प्रथ॒मं दे॑व॒यन्तो॑ म॒हो रा॒ये चि॒तय॑न्तो॒ अनु॑ ग्मन्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य विद्वानों की कामना करके अग्नि आदि की विद्या को ग्रहण करने की इच्छा करते हैं, वे विज्ञानयुक्त होते हैं॥२॥

वृ॒तेव॒ यन्तं॑ ब॒हुभि॑र्वस॒व्यै॒३॒॑स्त्वे र॒यिं जा॑गृ॒वांसो॒ अनु॑ ग्मन्। रुश॑न्तम॒ग्निं द॑र्श॒तं बृ॒हन्तं॑ व॒पाव॑न्तं वि॒श्वहा॑ दीदि॒वांस॑म्॥

जो निरन्तर सर्वत्र चलते हुए सब के प्रकाशक और सम्पूर्ण पदार्थों में व्यापक और पदार्थों के जलानेवाले बिजुली आदि स्वरूप अग्नि को जानकर कार्य्यों में उपयुक्त करते हैं, वे अत्यन्त लक्ष्मी को प्राप्त होते हैं॥३॥

प॒दं दे॒वस्य॒ नम॑सा॒ व्यन्तः॑ श्रव॒स्यवः॒ श्रव॑ आप॒न्नमृ॑क्तम्। नामा॑नि चिद् दधिरे य॒ज्ञिया॑नि भ॒द्रायां॑ ते रणयन्त॒ संदृ॑ष्टौ॥

जो मनुष्य अग्नि आदि पदार्थों के गुण कर्म्म और स्वभावों को जान कर कार्यों को सिद्ध करते हैं, वे अतुल आनन्द को प्राप्त कर सुख के विषय में रमते हैं॥४॥

त्वां व॑र्धन्ति क्षि॒तयः॑ पृथि॒व्यां त्वां राय॑ उ॒भया॑सो॒ जना॑नाम्। त्वं त्रा॒ता त॑रणे॒ चेत्यो॑ भूः पि॒ता मा॒ता सद॒मिन्मानु॑षाणाम्॥

जो पृथिवी आदिकों में वर्त्तमान बिजुलीरूप अग्नि का उत्तम प्रकार प्रयोग करते हैं, वे सब के सुख देनेवाले होते हैं॥५॥

स॒प॒र्येण्यः॒ स प्रि॒यो वि॒क्ष्व१॒॑ग्निर्होता॑ म॒न्द्रो नि ष॑सादा॒ यजी॑यान्। तं त्वा॑ व॒यं दम॒ आ दी॑दि॒वांस॒मुप॑ ज्ञु॒बाधो॒ नम॑सा सदेम॥

जो अग्नि आदि की विद्या को जानते हैं, वे सुख को प्राप्त होते हैं॥६॥

तं त्वा॑ व॒यं सु॒ध्यो॒३॒॑ नव्य॑मग्ने सुम्ना॒यव॑ ईमहे देव॒यन्तः॑। त्वं विशो॑ अनयो॒ दीद्या॑नो दि॒वो अ॑ग्ने बृह॒ता रो॑च॒नेन॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वान् जनों के सदृश अग्नि का अनुचरण करते हैं, वे कृतकार्य्य होते हैं॥७॥

वि॒शां क॒विं वि॒श्पतिं॒ शश्व॑तीनां नि॒तोश॑नं वृष॒भं च॑र्षणी॒नाम्। प्रेती॑षणिमि॒षय॑न्तं पाव॒कं राज॑न्तम॒ग्निं य॑ज॒तं र॑यी॒णाम्॥

जो मनुष्य अग्नि का शरीर के सदृश सेवन करते हैं, वे प्रजा के स्वामी होते हैं॥८॥

सो अ॑ग्न ईजे शश॒मे च॒ मर्तो॒ यस्त॒ आन॑ट् स॒मिधा॑ ह॒व्यदा॑तिम्। य आहु॑तिं॒ परि॒ वेदा॒ नमो॑भि॒र्विश्वेत्स वा॒मा द॑धते॒ त्वोतः॑॥

हे मनुष्यो! जो प्रशंसित कार्य्यों का करनेवाला अग्नि है, उसको विशेष कर जानिये॥९॥

अ॒स्मा उ॑ ते॒ महि॑ म॒हे वि॑धेम॒ नमो॑भिरग्ने स॒मिधो॒त ह॒व्यैः। वेदी॑ सूनो सहसो गी॒र्भिरु॒क्थैरा ते॑ भ॒द्रायां॑ सुम॒तौ य॑तेम॥

हे मनुष्यो! आप लोग इस प्राणियों के समुदाय के लिये सामग्री से यज्ञ करें॥१०॥

आ यस्त॒तन्थ॒ रोद॑सी॒ वि भा॒सा श्रवो॑भिश्च श्रव॒स्य१॒॑स्तरु॑त्रः। बृ॒हद्भि॒र्वाजैः॒ स्थवि॑रेभिर॒स्मे रे॒वद्भि॑रग्ने वित॒रं वि भा॑हि॥

जो विद्वान् जन उत्तम विद्या से अग्नि के प्रभाव को जानें तो विस्मय को प्राप्त होकर चकित होवें॥११॥

नृ॒वद्व॑सो॒ सद॒मिद्धे॑ह्य॒स्मे भूरि॑ तो॒काय॒ तन॑याय प॒श्वः। पू॒र्वीरिषो॑ बृह॒तीरा॒रेअ॑घा अ॒स्मे भ॒द्रा सौ॑श्रव॒सानि॑ सन्तु॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। वे ही विद्वान् हैं, जो मातापिताओं के समान सांसारिक जनों के लिये हितकारक वस्तुओं को देते हैं॥१२॥

पु॒रूण्य॑ग्ने पुरु॒धा त्वा॒या वसू॑नि राजन्व॒सुता॑ ते अश्याम्। पु॒रूणि॒ हि त्वे पु॑रुवार॒ सन्त्यग्ने॒ वसु॑ विध॒ते राज॑नि॒ त्वे॥

वे ही राजा उत्तम हैं जो परमेश्वर के सदृश पक्षपात का त्याग करके पुत्र के सदृश प्रजाओं का पालन करते हैं और वे ही प्रजाजन श्रेष्ठ होते हैं जो राजा और ईश्वर के भक्त हैं॥१३॥इस सूक्त में अग्नि, विद्वान् और ईश्वर के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥इस अध्याय में मित्रावरुण, अश्वि, सूर्य, वायु और अग्नि आदि के गुणवर्णन करने से इस अध्याय में कहे हुए अर्थ की इससे पूर्व अध्याय के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह श्रीमत्परहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमद्विरजानन्द सरस्वती स्वामी जी के शिष्य श्रीमद्दयानन्द सरस्वती स्वामिविरचित संस्कृतार्य्यभाषाविभूषित ऋग्वेदभाष्य में चतुर्थ अष्टक में चतुर्थ अध्याय, छत्तीसवाँ वर्ग और छठे मण्डल में प्रथम सूक्त भी समाप्त हुआ॥

त्वं हि क्षैत॑व॒द्यशोऽग्ने॑ मि॒त्रो न पत्य॑से। त्वं वि॑चर्षणे॒ श्रवो॒ वसो॑ पु॒ष्टिं न पु॑ष्यसि॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पृथिवी में उत्पन्न हुए शुष्क वस्तु रस से रहित होते हैं, वैसे विद्यारहित और धर्म्मरहित जन दयारहित और कोमलतारहित होते हैं॥२॥

त्वां हि ष्मा॑ चर्ष॒णयो॑ य॒ज्ञेभि॑र्गी॒र्भिरीळ॑ते। त्वां वा॒जी या॑त्यवृ॒को र॑ज॒स्तूर्वि॒श्वच॑र्षणिः॥

जो मनुष्य जिस विद्वान् का सेवन करते हैं, वह उनके लिये विद्या देवे॥२॥

स॒जोष॑स्त्वा दि॒वो नरो॑ य॒ज्ञस्य॑ के॒तुमि॑न्धते। यद्ध॒ स्य मानु॑षो॒ जनः॑ सुम्ना॒युर्जु॒ह्वे अ॑ध्व॒रे॥

उसी का सङ्ग मनुष्यों को करना चाहिये, जिसकी धार्मिक विद्वान् जन प्रशंसा करें॥३॥

ऋध॒द्यस्ते॑ सु॒दान॑वे धि॒या मर्तः॑ श॒शम॑ते। ऊ॒ती ष बृ॑ह॒तो दि॒वो द्वि॒षो अंहो॒ न त॑रति॥

जो मनुष्य धर्मात्मा जनों के लिये सुख देनेवाले होवें, वे जैसे धार्मिक जन पाप का नाश करते हैं, वैसे ही शत्रुओं का उल्लङ्घन करते हैं॥४॥

स॒मिधा॒ यस्त॒ आहु॑तिं॒ निशि॑तिं॒ मर्त्यो॒ नश॑त्। व॒याव॑न्तं॒ स पु॑ष्यति॒ क्षय॑मग्ने श॒तायु॑षम्॥

जो मनुष्य विद्वानों की सेवा से उत्तम गुण, कर्म्म और स्वभाववालों को प्राप्त होते हैं, वे सुख की वृद्धि और अतिकाल पर्य्यन्त जीवन से युक्त और अच्छे गृहोंवाले होकर शरीर और आत्मा से पुष्ट होते हैं॥५॥

त्वे॒षस्ते॑ धू॒म ऋ॑ण्वति दि॒वि षञ्छु॒क्र आत॑तः। सूरो॒ न हि द्यु॒ता त्वं कृ॒पा पा॑वक॒ रोच॑से॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे विद्वान् जनो! जिस अग्नि के धूम से वायु आदि पदार्थ शुद्ध होते हैं और जो सूर्य्य आदि का कारण है, उसकी विद्या को प्राप्त होकर उत्तम गुणों में आप लोग प्रकाशित हूजिये॥६॥

अधा॒ हि वि॒क्ष्वीड्योऽसि॑ प्रि॒यो नो॒ अति॑थिः। र॒ण्वः पु॒री॑व॒ जूर्यः॑ सू॒नुर्न त्र॑य॒याय्यः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे अतिथिजन प्रजाजनों से सत्कार करने योग्य होते और जैसे यहाँ माता और पिता से सन्तान पालन करने योग्य होते हैं, वैसे ही धार्म्मिक विद्वान् जन सत्कार करने योग्य होते हैं॥७॥

क्रत्वा॒ हि द्रोणे॑ अ॒ज्यसेऽग्ने॑ वा॒जी न कृत्व्यः॑। परि॑ज्मेव स्व॒धा गयोऽत्यो॒ न ह्वा॒र्यः शिशुः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वान् जन सम्पूर्ण अज्ञ जनों के लिये बुद्धि देकर श्रेष्ठ मार्ग में प्राप्त कराते हैं और माता-पिता बालक को जैसे वैसे शिक्षा करते हैं, वे अन्न आदि से सत्कार करने योग्य होते हैं॥८॥

त्वं त्या चि॒दच्यु॒ताग्ने॑ प॒शुर्न यव॑से। धामा॑ ह॒ यत् ते॑ अजर॒ वना॑ वृ॒श्चन्ति॒ शिक्व॑सः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जिन अध्यापकों को गौओं को जैसे बछड़े प्राप्त होकर दुग्ध के सदृश विद्या को ग्रहण करते हैं और जो विद्वान् जन अग्नि के सदृश दोषों का नाश करते हैं, वे संसार के कल्याण करनेवाले होते हैं॥९॥

वेषि॒ ह्य॑ध्वरीय॒तामग्ने॒ होता॒ दमे॑ वि॒शाम्। स॒मृधो॑ विश्पते कृणु जु॒षस्व॑ ह॒व्यम॑ङ्गिरः॥

हे मनुष्यो! जैसे अग्नि यज्ञ करनेवालों और प्रजाओं के कार्य्यों को सिद्ध करता है, वैसे ही विद्वान् जन सब के प्रयोजनों को सिद्ध करते हैं॥१०॥

अच्छा॑ नो मित्रमहो देव दे॒वानग्ने॒ वोचः॑ सुम॒तिं रोद॑स्योः। वी॒हि स्व॒स्तिं सु॑क्षि॒तिं दि॒वो नॄन्द्वि॒षो अंहां॑सि दुरि॒ता त॑रेम॒ ता त॑रेम॒ तवाव॑सा तरेम॥

मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों को मिल कर और बल को प्राप्त होकर शत्रुओं को जीत कर दुःखरूप सागर से पार हों॥११॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह द्वितीय सूक्त और द्वितीय वर्ग समाप्त हुआ॥

अग्ने॒ स क्षे॑षदृत॒पा ऋ॑ते॒जा उ॒रु ज्योति॑र्नशते देव॒युष्टे॑। यं त्वं मि॒त्रेण॒ वरु॑णः स॒जोषा॒ देव॒ पासि॒ त्यज॑सा॒ मर्त॒मंहः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे ईश्वर से रचा गया सूर्य्य सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, वैसे ही विद्वानों के सङ्ग से हुए विद्वान् सब के आत्माओं को प्रकाशित करते हैं और जैसे सूर्य्य अन्धकार का नाश करके दिन को प्रकट करता है, वैसे ही विद्या को प्राप्त हुआ धार्मिक विद्वान् अविद्या का नाश करके विद्या को प्रकट करता है॥१॥

ई॒जे य॒ज्ञेभिः॑ शश॒मे शमी॑भिर्ऋ॒धद्वा॑राया॒ग्नये॑ ददाश। ए॒वा च॒न तं य॒शसा॒मजु॑ष्टि॒र्नांहो॒ मर्तं॑ नशते॒ न प्रदृ॑प्तिः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सत्यभाषण आदि धर्म्म के अनुष्ठान करनेवाले योगी अभय देनेवाले हैं, वे पाप और मोह का त्याग करके विज्ञान को प्राप्त होकर सुखी होते हैं॥२॥

सूरो॒ न यस्य॑ दृश॒तिर॑रे॒पा भी॒मा यदेति॑ शुच॒तस्त॒ आ धीः। हेष॑स्वतः शु॒रुधो॒ नायम॒क्तोः कुत्रा॑ चिद्र॒ण्वो व॑स॒तिर्व॑ने॒जाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जिस विद्वान् की सूर्य्य की ज्योति वा बिजुली के सदृश बुद्धि है, वही सम्पूर्ण, जितना योग्य उतने, विज्ञान को प्राप्त होता है॥३॥

ति॒ग्मं चि॒देम॒ महि॒ वर्पो॑ अस्य॒ भस॒दश्वो॒ न य॑मसा॒न आ॒सा। वि॒जेह॑मानः पर॒शुर्न जि॒ह्वां द्र॒विर्न द्रा॑वयति॒ दारु॒ धक्ष॑त्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वन्! जैसे उत्तम प्रकार से शिक्षित घोड़ा मनुष्य को मार्ग में पहुँचाता है, वैसे धर्ममार्ग को हम लोगों को पहुँचाइये और जैसे बढ़ई परशुसे काष्ठ को काटता है, वैसे हम लोगों के दोषों को काटिये और जैसे तालु से उत्पन्न आर्द्ररस जिह्वा को प्राप्त होता है, वैसे विद्या के रस को प्राप्त कराइये तथा जैसे अग्नि काष्ठों को जलाता है, वैसे ही हमारे दुर्व्यसनों को जलाइये॥४॥

स इदस्ते॑व॒ प्रति॑ धादसि॒ष्यञ्छिशी॑त॒ तेजोऽय॑सो॒ न धारा॑म्। चि॒त्रध्र॑जतिरर॒तिर्यो अ॒क्तोर्वेर्न द्रु॒षद्वा॑ रघु॒पत्म॑जंहाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य अग्नि को बांध और तीक्ष्ण करके युद्ध आदि कार्य्यों में प्रयुक्त करते हैं तो पक्षि के सदृश आकाश में जाने को समर्थ होवें॥५॥

स ईं॑ रे॒भो न प्रति॑ वस्त उ॒स्राः शो॒चिषा॑ रारपीति मि॒त्रम॑हाः। नक्तं॒ य ई॑मरु॒षो यो दिवा॒ नॄनम॑र्त्यो अरु॒षो यो दिवा॒ नॄन्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सूर्य जल का आकर्षण कर और उस जल को वर्षाय के प्राणियों के लिये सुख देता है, वैसे विद्वान् पुरुष गुणों का आकर्षण कर और गुणों को दे करके सब जिज्ञासु जनों को सुख देता है॥६॥

दि॒वो न यस्य॑ विध॒तो नवी॑नो॒द्वृषा॑ रु॒क्ष ओष॑धीषु नूनोत्। घृणा॒ न यो ध्रज॑सा॒ पत्म॑ना॒ यन्ना रोद॑सी॒ वसु॑ना॒ दं सु॒पत्नी॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो अग्नि पृथिवी आदिकों में पूर्ण हुआ घिसने आदि से प्रकाशित होवे, वह मनुष्यों के अनेक प्रकार के कार्य्यों को करनेवाला होता है॥७॥

धायो॑भिर्वा॒ यो युज्ये॑भिर॒र्कैर्वि॒द्युन्न द॑विद्यो॒त्स्वेभिः॒ शुष्मैः॑। शर्धो॑ वा॒ यो म॒रुतां॑ त॒तक्ष॑ ऋ॒भुर्न त्वे॒षो र॑भसा॒नो अ॑द्यौत्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो बिजुली के सदृश प्रतापी, बलवान्, पदार्थों के संयोग और वियोग की विद्या में चतुर, बुद्धिमान्, विद्वान्, धर्मात्मा, इन्द्रियों को जीतनेवाला और प्रजापालनप्रिय क्षत्रिय होवे, वही राजा होने के योग्य होवे॥८॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह तीसरा सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ॥

यथा॑ होत॒र्मनु॑षो दे॒वता॑ता य॒ज्ञेभिः॑ सूनो सहसो॒ यजा॑सि। ए॒वा नो॑ अ॒द्य स॑म॒ना स॑मा॒नानु॒शन्न॑ग्न उश॒तो य॑क्षि दे॒वान्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् यज्ञ के करनेवाले जन अङ्ग और उपाङ्गों के सहित साधनों से यज्ञ को शोभित करते हैं, वैसे ही शूरवीर बलवान् योद्धा और विद्वान् जनों से राजा संग्राम को जीतें॥१॥

स नो॑ वि॒भावा॑ च॒क्षणि॒र्न वस्तो॑र॒ग्निर्व॒न्दारु॒ वेद्य॒श्चनो॑ धात्। वि॒श्वायु॒र्यो अ॒मृतो॒ मर्त्ये॑षूष॒र्भुद्भूदति॑थिर्जा॒तवे॑दाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो जगदीश्वर सूर्य्य के सदृश अपने से प्रकाशित, जानने योग्य, अजर, अमर, अतिथि के सदृश सत्कार करने योग्य और सर्वत्र व्याप्त है, उसकी सब उपासना करें॥२॥

द्यावो॒ न यस्य॑ प॒नय॒न्त्यभ्वं॒ भासां॑सि वस्ते॒ सूर्यो॒ न शु॒क्रः। वि य इ॒नोत्य॒जरः॑ पाव॒कोऽश्न॑स्य चिच्छिश्नथत्पू॒र्व्याणि॑॥

हे मनुष्यो! जो परमेश्वर प्रकाशकों का प्रकाशक, नित्यों का नित्य और चेतनों का चेतन है, उसी का भजन करो॥३॥

व॒द्मा हि सू॑नो॒ अस्य॑द्म॒सद्वा॑ च॒क्रे अ॒ग्निर्ज॒नुषाज्मान्न॑म्। स त्वं न॑ ऊर्जसन॒ ऊर्जं॑ धा॒ राजे॑व जेरवृ॒के क्षे॑ष्य॒न्तः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यो! जो विद्वान् जन हैं, वे ईश्वर के सदृश पक्षपात से रहित और धर्म्ममार्ग में निवास करते हुए परमेश्वर का भजन करें॥४॥

निति॑क्ति॒ यो वा॑र॒णमन्न॒मत्ति॑ वा॒युर्न राष्ट्र्यत्ये॑त्य॒क्तून्। तु॒र्याम॒ यस्त॑ आ॒दिशा॒मरा॑ती॒रत्यो॒ न ह्रुतः॒ पत॑तः परि॒ह्रुत्॥

हे मनुष्यो! जो शुद्ध खाने और पीने योग्य पदार्थ का सेवन करता है, वायु के सदृश बलिष्ठ और ईश्वर के सदृश पक्षपात से रहित होकर न्याय की अपेक्षा से विपरीत दशा को प्राप्त हुओं का मारनेवाला हो, उसी को राजा मानो॥५॥

आ सूर्यो॒ न भा॑नु॒मद्भि॑र॒र्कैरग्ने॑ त॒तन्थ॒ रोद॑सी॒ वि भा॒सा। चि॒त्रो न॑य॒त्परि॒ तमां॑स्य॒क्तः शो॒चिषा॒ पत्म॑न्नौशि॒जो न दीय॑न्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सूर्य्य अपने प्रकाश से समीप में वर्त्तमान पदार्थों को प्रकाशित करके रात्रि का निवारण करता है, वैसे ही उत्तम गुणों को प्रकाशित करके अज्ञानान्धकार का निवारण करिये॥६॥

त्वां हि म॒न्द्रत॑ममर्कशो॒कैर्व॑वृ॒महे॒ महि॑ नः॒ श्रोष्य॑ग्ने। इन्द्रं॒ न त्वा॒ शव॑सा दे॒वता॑ वा॒युं पृ॑णन्ति॒ राध॑सा॒ नृत॑माः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो अन्नादिकों से अत्यन्त आनन्द देनेवाले, मनुष्यों में उत्तम मनुष्य, सम्पूर्ण संसार को उत्तम बुद्धियुक्त करते हैं, वे सत्कार करने के योग्य होते हैं॥७॥

नू नो॑ अग्नेऽवृ॒केभिः॑ स्व॒स्ति वेषि॑ रा॒यः प॒थिभिः॒ पर्ष्यंहः॑। ता सू॒रिभ्यो॑ गृण॒ते रा॑सि सु॒म्नं मदे॑म श॒तहि॑माः सु॒वीराः॑॥

हे मनुष्यो! चोरी और चोर के सङ्ग और अन्याय से पाप के आचरण का त्याग करके सुख को प्राप्त होकर सौ वर्ष युक्त होओ॥८॥इस सूक्त में अग्नि, ईश्वर और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चौथा सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ॥

हु॒वे वः॑ सू॒नुं सह॑सो॒ युवा॑न॒मद्रो॑घवाचं म॒तिभि॒र्यवि॑ष्ठम्। य इन्व॑ति॒ द्रवि॑णानि॒ प्रचे॑ता वि॒श्ववा॑राणि पुरु॒वारो॑ अ॒ध्रुक्॥

हे मनुष्यो! आप लोगों को चाहिये कि जो पक्षपात से रहित वादयुक्त, द्रोह से रहित और बुद्धिमानों के सङ्ग का सेवन करनेवाले और बहुत विद्वानों से आदर किये गये और और ब्रह्मचर्य्य से पूर्ण युवावस्थावाले विद्वान् हों, उन्हीं का उपदेश ग्रहण करें॥१॥

त्वे वसू॑नि पुर्वणीक होतर्दो॒षा वस्तो॒रेरि॑रे य॒ज्ञिया॑सः। क्षामे॑व॒ विश्वा॒ भुव॑नानि॒ यस्मि॒न्त्सं सौभ॑गानि दधि॒रे पा॑व॒के॥

राजा के रक्षक रहने पर ही प्रजाजन प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त होते और ऐश्वर्य्य को प्राप्त होकर सुखयुक्त होते हैं॥२॥

त्वं वि॒क्षु प्र॒दिवः॑ सीद आ॒सु क्रत्वा॑ र॒थीर॑भवो॒ वार्या॑णाम्। अत॑ इनोषि विध॒ते चि॑कित्वो॒ व्या॑नु॒षग्जा॑तवेदो॒ वसू॑नि॥

वही राजा होने के योग्य होवे, जो राजविद्या को अच्छे प्रकार जाने॥३॥

यो नः॒ सनु॑त्यो अभि॒दास॑दग्ने॒ यो अन्त॑रो मित्रमहो वनु॒ष्यात्। तम॒जरे॑भि॒र्वृष॑भि॒स्तव॒ स्वैस्तपा॑ तपिष्ठ॒ तप॑सा॒ तप॑स्वान्॥

हे मनुष्यो! जो आप लोगों से याचना करे, उस सुपात्र के लिये यथाशक्ति दान करिये और जो पीड़ा देवे, उसको पीड़ित करो और तपस्वी होकर धर्म का ही आचरण करो॥४॥

यस्ते॑ य॒ज्ञेन॑ स॒मिधा॒ य उ॒क्थैर॒र्केभिः॑ सूनो सहसो॒ ददा॑शत्। स मर्त्ये॑ष्वमृत॒ प्रचे॑ता रा॒या द्यु॒म्नेन॒ श्रव॑सा॒ वि भा॑ति॥

जो प्रशंसित कर्म्म और गुणों के सहित जन इस संसार में प्रयत्न करते हैं, वे विद्या, यश और धन से युक्त होकर संसार में प्रसिद्ध होते हैं॥५॥

स तत्कृ॑धीषि॒तस्तूय॑मग्ने॒ स्पृधो॑ बाधस्व॒ सह॑सा॒ सह॑स्वान्। यच्छ॒स्यसे॒ द्युभि॑र॒क्तो वचो॑भि॒स्तज्जु॑षस्व जरि॒तुर्घोषि॒ मन्म॑॥

जो विद्वान् और ईश्वर से प्रेरित हुए शीघ्र आलस्य का त्याग करके दिन रात्रि धर्म्म, अर्थ और मोक्ष की सिद्धि के लिये प्रयत्न करते हैं, वे योग्य होकर दुःखों को बाधित करते हैं॥६॥

अ॒श्याम॒ तं काम॑मग्ने॒ तवो॒ती अ॒श्याम॑ र॒यिं र॑यिवः सु॒वीर॑म्। अ॒श्याम॒ वाज॑म॒भि वा॒जय॑न्तो॒ऽश्याम॑ द्यु॒म्नम॑जरा॒जरं॑ ते॥

मनुष्यों को ऐसी इच्छा करनी चाहिये कि हम लोग यथार्थ वक्ता जन के उपदेश से इच्छा की सिद्धि, बहुत धन, वीर पुरुषों और नहीं नष्ट होनेवाले यश को प्राप्त होवें॥७॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पाँचवाँ सूक्त और सातवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र नव्य॑सा॒ सह॑सः सू॒नुमच्छा॑ य॒ज्ञेन॑ गा॒तुमव॑ इ॒च्छमा॑नः। वृ॒श्चद्व॑नं कृ॒ष्णया॑मं॒ रुश॑न्तं वी॒ती होता॑रं दि॒व्यं जि॑गाति॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! आप लोग ब्रह्मचर्य्य से बलिष्ठ होकर सन्तानों को उत्पन्न करो जिससे रोगरहित, बलयुक्त और उत्तम स्वभावयुक्त सन्तान होकर आप लोगों को निरन्तर सुखयुक्त करें॥१॥

स श्वि॑ता॒नस्त॑न्य॒तू रो॑चन॒स्था अ॒जरे॑भि॒र्नान॑दद्भि॒र्यवि॑ष्ठः। यः पा॑व॒कः पु॑रु॒तमः॑ पु॒रूणि॑ पृ॒थून्य॒ग्निर॑नु॒याति॒ भर्व॑न्॥

हे विद्वन्! जो आप अङ्ग और उपाङ्ग के सहित बिजुली की विद्या को जानें तो बहुत सुख को प्राप्त होवें॥३॥

वि ते॒ विष्व॒ग्वात॑जूतासो अग्ने॒ भामा॑सः शुचे॒ शुच॑यश्चरन्ति। तु॒वि॒म्र॒क्षासो॑ दि॒व्या नव॑ग्वा॒ वना॑ वनन्ति धृष॒ता रु॒जन्तः॑॥

हे मनुष्यो! जो बिजुली के सदृश पवित्र, दुष्टों में क्रोध करनेवाले, श्रेष्ठों के साथ मेल करने और नवीन विद्या को प्राप्त होनेवाले होवें, वे सब स्थानों में विचरते हुए अन्यों को जनावें॥३॥

ये ते॑ शु॒क्रासः॒ शुच॑यः शुचिष्मः॒ क्षां वप॑न्ति॒ विषि॑तासो॒ अश्वाः॑। अध॑ भ्र॒मस्त॑ उर्वि॒या वि भा॑ति या॒तय॑मानो॒ अधि॒ सानु॒ पृश्नेः॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि अपने समीप में पवित्र और यथार्थ वक्ता पुरुषों की सदा रक्षा करें अथवा आप भी उनका सङ्ग करें॥४॥

अध॑ जि॒ह्वा पा॑पतीति॒ प्र वृष्णो॑ गोषु॒युधो॒ नाशनिः॑ सृजा॒ना। शूर॑स्येव॒ प्रसि॑तिः क्षा॒तिर॒ग्नेर्दु॒र्वर्तु॑र्भी॒मो द॑यते॒ वना॑नि॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो मनुष्य धर्म्म से पतित न होकर धार्म्मिकों में शान्त और दुष्टों में अग्नि के सदृश भयंकर होते हैं, वे ही बलवान् गिने जाते हैं॥५॥

आ भा॒नुना॒ पार्थि॑वानि॒ ज्रयां॑सि म॒हस्तो॒दस्य॑ धृष॒ता त॑तन्थ। स बा॑ध॒स्वाप॑ भ॒या सहो॑भिः॒ स्पृधो॑ वनु॒ष्यन् व॒नुषो॒ नि जू॑र्व॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो प्रेम से मित्र होकर जैसे सूर्य्य अन्धकार को, वैसे भयों को दूर करके संग्रामों को जीतते हैं, वे प्रतिष्ठित होते हैं॥६॥

स चि॑त्र चि॒त्रं चि॒तय॑न्तम॒स्मे चित्र॑क्षत्र चि॒त्रत॑मं वयो॒धाम्। च॒न्द्रं र॒यिं पु॑रु॒वीरं॑ बृ॒हन्तं॒ चन्द्र॑ च॒न्द्राभि॑र्गृण॒ते यु॑वस्व॥

जो मनुष्य अद्भुत गुण, कर्म्म और स्वभावों का स्वीकार करके तथा अन्य जनों को ग्रहण कराय के धनाढ्य कराते हैं, वे अद्भुत स्तुतिवाले होते हैं॥७॥इस सूक्त में अग्नि तथा विद्वान् के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह छठा सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

मू॒र्धानं॑ दि॒वो अ॑र॒तिं पृ॑थि॒व्या वै॑श्वान॒रमृ॒त आ जा॒तम॒ग्निम्। क॒विं स॒म्राज॒मति॑थिं॒ जना॑नामा॒सन्ना पात्रं॑ जनयन्त दे॒वाः॥

जो मनुष्य परमात्मा के सदृश न्यायकारी होकर तथा अग्नि के सदृश विद्या और विनय से प्रकाशित हुए चकवर्त्तित्व को प्राप्त होते हैं, वे सुख देने को योग्य होते हैं॥१॥

नाभिं॑ य॒ज्ञानां॒ सद॑नं रयी॒णां म॒हामा॑हा॒वम॒भि सं न॑वन्त। वै॒श्वा॒न॒रं र॒थ्य॑मध्व॒राणां॑ य॒ज्ञस्य॑ के॒तुं ज॑नयन्त दे॒वाः॥

जो मनुष्य सर्वत्र व्याप्त और सम्पूर्ण कार्य्यों की सिद्धि के करनेवाले अग्नि को अच्छे प्रकार जान कर वाहनों को प्रकट करते हैं, वे कार्य्यसिद्धि को प्राप्त होते हैं॥२॥

त्वद्विप्रो॑ जायते वा॒ज्य॑ग्ने॒ त्वद्वी॒रासो॑ अभिमाति॒षाहः॑। वैश्वा॑नर॒ त्वम॒स्मासु॑ धेहि॒ वसू॑नि राजन्त्स्पृह॒याय्या॑णि॥

वही राजा होने को योग्य है जिसके सङ्ग दुष्ट जन भी श्रेष्ठ, कायर भी शूरवीर और कृपण भी दाता होते हैं॥३॥

त्वां विश्वे॑ अमृत॒ जाय॑मानं॒ शिशुं॒ न दे॒वा अ॒भि सं न॑वन्ते। तव॒ क्रतु॑भिरमृत॒त्वमा॑य॒न्वैश्वा॑नर॒ यत्पि॒त्रोरदी॑देः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य माता और पिता से जन्म को प्राप्त होकर आठवें वर्ष से प्रारम्भ करके आचार्य से विद्या के ग्रहण से द्वितीय जन्म को प्राप्त होते हैं, वे स्तुति करने योग्य हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध करने को समर्थ होते हैं॥४॥

वैश्वा॑नर॒ तव॒ तानि॑ व्र॒तानि॑ म॒हान्य॑ग्ने॒ नकि॒रा द॑धर्ष। यज्जाय॑मानः पि॒त्रोरु॒पस्थेऽवि॑न्दः के॒तुं व॒युने॒ष्वह्ना॑म्॥

जो मनुष्य दूसरे विद्यारूप जन्म को प्राप्त होवें, तो उनके सफल कर्म्म होते हैं, ऐसा जानना चाहिये॥५॥

वै॒श्वा॒न॒रस्य॒ विमि॑तानि॒ चक्ष॑सा॒ सानू॑नि दि॒वो अ॒मृत॑स्य के॒तुना॑। तस्येदु॒ विश्वा॒ भुव॒नाधि॑ मू॒र्धनि॑ व॒याइ॑व रुरुहुः स॒प्त वि॒स्रुहः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वान् जन परमेश्वर से रचे गए, पक्षियों सदृश अन्तरिक्ष में चलते हुए लोकों और उनकी गति को बुद्धि से विशेष करके जाने, वह विद्वानों के मस्तक के सदृश प्रशंसा करने योग्य होता है॥६॥

वि यो रजां॒स्यमि॑मीत सु॒क्रतु॑र्वैश्वान॒रो वि दि॒वो रो॑च॒ना क॒विः। परि॒ यो विश्वा॒ भुव॑नानि पप्र॒थेऽद॑ब्धो गो॒पा अ॒मृत॑स्य रक्षि॒ता॥

हे मनुष्यो! जिस जगदीश्वर ने सम्पूर्ण लोक निर्मित किये हैं तथा जो सब का रक्षक है, उसकी सब उपासना करें॥७॥इस सूक्त में सब के हित करनेवाला, विद्वान् और ईश्वर के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सातवाँ सूक्त और नवमा वर्ग समाप्त हुआ॥

पृ॒क्षस्य॒ वृष्णो॑ अरु॒षस्य॒ नू सहः॒ प्र नु वो॑चं वि॒दथा॑ जा॒तवे॑दसः। वै॒श्वा॒न॒राय॑ म॒तिर्नव्य॑सी॒ शुचिः॒ सोम॑इव पवते॒ चारु॑र॒ग्नये॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जिन मनुष्यों की सोमलतारूप ओषधि के सदृश पवित्र करनेवाली बुद्धि, अतुल बल और अग्निविद्या होती है, वे ही आनन्दित होते हैं॥१॥

स जाय॑मानः पर॒मे व्यो॑मनि व्र॒तान्य॒ग्निर्व्र॑त॒पा अ॑रक्षत। व्य१॒॑न्तरि॑क्षममिमीत सु॒क्रतु॑र्वैश्वान॒रो म॑हि॒ना नाक॑मस्पृशत्॥

हे मनुष्यो! जिस परमेश्वर ने अपने में सूर्य्य आदि लोकों के निर्म्माण से सब का उपकार किया, उसके सत्य कर्म्मों का अनुष्ठान करके उपासना करो अर्थात् उसी का भजन करो॥२॥

व्य॑स्तभ्ना॒द् रोद॑सी मि॒त्रो अद्भु॑तोऽन्त॒र्वाव॑दकृणो॒ज्ज्योति॑षा॒ तमः॑। वि चर्म॑णीव धि॒षणे॑ अवर्तयद्वैश्वान॒रो विश्व॑मधत्त॒ वृष्ण्य॑म्॥

इस मन्त्र में उपमावाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो! जो जगदीश्वर से बनाया गया यह सूर्य्य चर्म्म रोगों को, वैसे आकर्षण से लोकों को धारण करता है तथा नियम से चलाता और चलता है, वही जगत् के उपकार के लिये समर्थ होता है॥३॥

अ॒पामु॒पस्थे॑ महि॒षा अ॑गृभ्णत॒ विशो॒ राजा॑न॒मुप॑ तस्थुर्ऋ॒ग्मिय॑म्। आ दू॒तो अ॒ग्निम॑भरद्वि॒वस्व॑तो वैश्वान॒रं मा॑त॒रिश्वा॑ परा॒वतः॑॥

जैसे वायु दूर वर्त्तमान भी सूर्य्य के तेज को धारण करता है, वैसे उत्तम राजा दूर स्थित भी प्रजाओं का पोषण करे॥४॥

यु॒गेयु॑गे विद॒थ्यं॑ गृ॒णद्भ्योऽग्ने॑ र॒यिं य॒शसं॑ धेहि॒ नव्य॑सीम्। प॒व्येव॑ राजन्न॒घशं॑समजर नी॒चा नि वृ॑श्च व॒निनं॒ न तेज॑सा॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य किरणों से संयुक्त मेघ का नाश करता है और जैसे वज्र विदारण करने योग्य पदार्थ को विदारण करता, वैसे राजा चोर आदि दुष्ट जनों का छेदन करके धार्मिक जनों के लिये धन आदि ऐश्वर्य्य को धारण करे॥५॥

अ॒स्माक॑मग्ने म॒घव॑त्सु धार॒याऽना॑मि क्ष॒त्रम॒जरं॑ सु॒वीर्य॑म्। व॒यं ज॑येम श॒तिनं॑ सह॒स्रिणं॒ वैश्वा॑नर॒ वाज॑मग्ने॒ तवो॒तिभिः॑॥

जो राजा और सेना के अध्यक्ष धार्मिक, विद्वान्, न्यायकारी और जितेन्द्रिय हों तो उनका सर्वत्र विजय होता है॥६॥

अद॑ब्धेभि॒स्तव॑ गो॒पाभि॑रिष्टे॒ऽस्माकं॑ पाहि त्रिषधस्थ सू॒रीन्। रक्षा॑ च नो द॒दुषां॒ शर्धो॑ अग्ने॒ वैश्वा॑नर॒ प्र च॑ तारीः॒ स्तवा॑नः॥

हे राजजन! जैसे सूर्य्य ऊपर, नीचे और मध्यस्थ लोकों को प्रकाशित करता है, वैसे ही प्रजाजनों की आप सब प्रकार से रक्षा कीजिये और जैसे इस राज्य में विद्वान् बढ़ें, वैसे कार्य करिये॥७॥इस सूक्त में विद्या और विनय से प्रकाशमान, विद्वान्, सूर्य्य और राजा आदि के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह आठवाँ सूक्त और दसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अह॑श्च कृ॒ष्णमह॒रर्जु॑नं च॒ वि व॑र्तेते॒ रज॑सी वे॒द्याभिः॑। वै॒श्वा॒न॒रो जाय॑मानो॒ न राजावा॑तिर॒ज्ज्योति॑षा॒ग्निस्तमां॑सि॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे रात्रिदिन संयुक्त हैं, वैसे ही राजा और प्रजा अनुकूल हों और जैसे सूर्य्य प्रकाश से अन्धकार को निवृत्त करता है, वैसे ही राजा विद्या और विनय के प्रकाश से अविद्यारूप अन्धकार को निवृत्त करे॥१॥

नाहं तन्तुं॒ न वि जा॑ना॒म्योतुं॒ न यं वय॑न्ति सम॒रेऽत॑मानाः। कस्य॑ स्वित्पु॒त्र इ॒ह वक्त्वा॑नि प॒रो व॑दा॒त्यव॑रेण पि॒त्रा॥

विद्वानों का यह सिद्धान्त है कि जो दो से उत्पन्न होता है, जिसके दो माता और दो पिता हैं, वह किसका पुत्र है, यह हम लोग नहीं जानते हैं, ऐसा प्रश्न है। इस में सिद्धान्त यह है कि जैसे उत्पन्न करनेवाले माता पिता का पुत्र है, वैसे ही आचार्य और विद्या का भी वह द्विज पुत्र है, ऐसा सब लोग जानो॥२॥

स इत्तन्तुं॒ स वि जा॑ना॒त्योतुं॒ स वक्त्वा॑न्यृतु॒था व॑दाति। य ईं॒ चिके॑तद॒मृत॑स्य गो॒पा अ॒वश्चर॑न्प॒रो अ॒न्येन॒ पश्य॑न्॥

जो ब्रह्मचर्य्य के द्वारा यथार्थवक्ताओं से विद्या और शिक्षा को प्राप्त होते हैं, वे ही इस जगत् के पूर्ण कारण के पूर्ण कारण को जानने को समर्थ होते हैं॥३॥

अ॒यं होता॑ प्रथ॒मः पश्य॑ते॒ममि॒दं ज्योति॑र॒मृतं॒ मर्त्ये॑षु। अ॒यं स ज॑ज्ञे ध्रु॒व आ निष॒त्तोऽम॑र्त्यस्त॒न्वा॒३॒॑ वर्ध॑मानः॥

हे मनुष्यो! इस शरीर में दो चेतन नित्य हुए जीवात्मा और परमात्मा वर्त्तमान हैं। उन दोनों में एक अल्प, और अल्पदेशस्थ जीव है, वह शरीर को धारण करके प्रकट होता, वृद्धि को प्राप्त होता और परिणाम को प्राप्त होता तथा हीन दशा को प्राप्त होता, पाप और पुण्य के फल का भोग करता है। द्वितीय परमेश्वर ध्रुव, निश्चल, सर्वज्ञ, कर्म्मफल के सम्बन्ध से रहित है, ऐसा तुम लोग निश्चय करो॥४॥

ध्रु॒वं ज्योति॒र्निहि॑तं दृ॒शये॒ कं मनो॒ जवि॑ष्ठं प॒तय॑त्स्व॒न्तः। विश्वे॑ दे॒वाः सम॑नसः॒ सके॑ता॒ एकं॒ क्रतु॑म॒भि वि य॑न्ति सा॒धु॥

हे मनुष्यो! इस शरीर में सच्चिदानन्दस्वरूप अपने से प्रकाशित ब्रह्म, द्वितीय जीव, तृतीय मन, चौथी इन्द्रियाँ, पाँचवें प्राण, छठा शरीर वर्त्तमान है, ऐसा होने पर सम्पूर्ण व्यवहार सिद्ध होते हैं। जिनके मध्य से सब का आधार ईश्वर, देह, अन्तःकरण प्राण और इन्द्रियों का धारण करनेवाला और जीवादिकों का अधिष्ठान शरीर है, यह जानो॥५॥

वि मे॒ कर्णा॑ पतयतो॒ वि चक्षु॒र्वी॒३॒॑दं ज्योति॒र्हृद॑य॒ आहि॑तं॒ यत्। वि मे॒ मन॑श्चरति दू॒रआ॑धीः॒ किं स्वि॑द्व॒क्ष्यामि॒ किमु॒ नू म॑निष्ये॥

हे विद्वान् जनो! मैं और जो मेरे साधन हैं, उस सब व्यवहार को मेरे लिये जनाइये॥६॥

विश्वे॑ दे॒वा अ॑नमस्यन्भिया॒नास्त्वाम॑ग्ने॒ तम॑सि तस्थि॒वांस॑म्। वै॒श्वा॒न॒रो॑ऽवतू॒तये॒ नोऽम॑र्त्योऽवतू॒तये॑ नः॥

हे मनुष्यो! जैसे प्राण और बिजुली को प्राप्त होकर सम्पूर्ण पृथिवी आदिकों की स्थिति है और जैसे अग्नि से सम्पूर्ण प्राणी डरते हैं, वैसे ही सर्वत्र व्यापी और सब के अन्तर्यामी परमात्मा को मान के पाप के आचरण से विद्वान् जन डरते हैं, इस निमित्त से सब जन इससे डरें॥७॥इस सूक्त में दिनरात्रि, अपत्य, जीव, परमात्मादिकों की स्थिति का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह नवम सूक्त और ग्यारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

पु॒रो वो॑ म॒न्द्रं दि॒व्यं सु॑वृ॒क्तिं प्र॑य॒ति य॒ज्ञे अ॒ग्निम॑ध्व॒रे द॑धिध्वम्। पु॒र उ॒क्थेभिः॒ स हि नो॑ वि॒भावा॑ स्वध्व॒रा क॑रति जा॒तवे॑दाः॥

हे मनुष्यो! जैसे यज्ञ करनेवाले यज्ञ में अग्नि को प्रथम उत्तम प्रकार स्थापित करके उस अग्नि में आहुति देकर संसार का उपकार करते हैं, वैसे ही आत्मा के आगे परमात्मा को संस्थापित करके वहाँ मन आदि का हवन करके और प्रत्यक्ष करके उसके उपदेश से जगत् का उपकार करो॥१॥

तमु॑ द्युमः पुर्वणीक होत॒रग्ने॑ अ॒ग्निभि॒र्मनु॑ष इधा॒नः। स्तोमं॒ यम॑स्मै म॒मते॑व शू॒षं घृ॒तं न शुचि॑ म॒तयः॑ पवन्ते॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्य जिससे पदार्थों को सिद्ध करते हैं, वह कार्य्यसाधक अग्नि सब को जानने योग्य है॥२॥

पी॒पाय॒ स श्रव॑सा॒ मर्त्ये॑षु॒ यो अ॒ग्नये॑ द॒दाश॒ विप्र॑ उ॒क्थैः। चि॒त्राभि॒स्तमू॒तिभि॑श्चि॒त्रशो॑चिर्व्र॒जस्य॑ सा॒ता गोम॑तो दधाति॥

हे मनुष्यो! जिस अग्नि में अद्भुत गुण, कर्म्म, स्वभाव हैं, उसको अच्छे प्रकार जान कर संप्रयोग करो अर्थात् काम में लाओ॥३॥

आ यः प॒प्रौ जाय॑मान उ॒र्वी दू॑रे॒दृशा॑ भा॒सा कृ॒ष्णाध्वा॑। अध॑ ब॒हु चि॒त्तम॒ ऊर्म्या॑यास्ति॒रः शो॒चिषा॑ ददृशे पाव॒कः॥

मनुष्यों को चाहिये कि अवश्य बिजुलीरूप अग्नि को जानें॥४॥

नू न॑श्चि॒त्रं पु॑रु॒वाजा॑भिरू॒ती अग्ने॑ र॒यिं म॒घव॑द्भ्यश्च धेहि। ये राध॑सा॒ श्रव॑सा॒ चात्य॒न्यान्त्सु॒वीर्ये॑भिश्चा॒भि सन्ति॒ जना॑न्॥

हे मनुष्यो! जो आप लोगों के लिये विद्या और लक्ष्मी को धारण करते हैं, उनकी आप लोग अत्यन्त प्रतिष्ठा करो॥५॥

इ॒मं य॒ज्ञं चनो॑ धा अग्न उ॒शन्यं त॑ आसा॒नो जु॑हु॒ते ह॒विष्मा॑न्। भ॒रद्वा॑जेषु दधिषे सुवृ॒क्तिमवी॒र्वाज॑स्य॒ गध्य॑स्य सा॒तौ॥

जो परोपकार करते हैं, उनको ही अभीष्ट स्वार्थसिद्धि होती है॥६॥

वि द्वेषां॑सीनु॒हि व॒र्धयेळां॒ मदे॑म श॒तहि॑माः सु॒वीराः॑॥

विद्वानों को चाहिये कि वह कर्म्म करें और करावें, जिससे मनुष्यों के दोषों की निवृत्ति और बुद्धि, बल तथा अवस्था की वृद्धि होवे॥७॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह दशवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

यज॑स्व होतरिषि॒तो यजी॑या॒नग्ने॒ बाधो॑ म॒रुतां॒ न प्रयु॑क्ति। आ नो॑ मि॒त्रावरु॑णा॒ नास॑त्या॒ द्यावा॑ हो॒त्राय॑ पृथि॒वी व॑वृत्याः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वान् जन प्राण और उदान वायु के सदृश प्रिय और पुरुषार्थी होते हैं, वे सब के लिये सुख प्राप्त कराने योग्य होते हैं॥१॥

त्वं होता॑ म॒न्द्रत॑मो नो अ॒ध्रुग॒न्तर्दे॒वो वि॒दथा॒ मर्त्ये॑षु। पा॒व॒कया॑ जु॒ह्वा॒३॒॑ वह्नि॑रा॒साग्ने॒ यज॑स्व त॒न्वं१॒॑ तव॒ स्वाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे बिजुली, सूर्य्य और भूमि में हुए तेजस्वी पदार्थों के रूप से अग्नि सम्पूर्ण जगत् का उपकार करता है, वैसे ही विद्वान् जन जगत् को आनन्दित करते हैं॥२॥

धन्या॑ चि॒द्धि त्वे धि॒षणा॒ वष्टि॒ प्र दे॒वाञ्जन्म॑ गृण॒ते यज॑ध्यै। वेपि॑ष्ठो॒ अङ्गि॑रसां॒ यद्ध॒ विप्रो॒ मधु॑च्छ॒न्दो भन॑ति रे॒भ इ॒ष्टौ॥

जो बुद्धि और विद्वानों के सङ्ग से विद्या की कामना करते और अन्यों को उपदेश देते हैं, वे धन्य हैं॥२॥

अदि॑द्युत॒त्स्वपा॑को वि॒भावाग्ने॒ यज॑स्व॒ रोद॑सी उरू॒ची। आ॒युं न यं नम॑सा रा॒तह॑व्या अ॒ञ्जन्ति॑ सुप्र॒यसं॒ पञ्च॒ जनाः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जिस प्रकार से पाँच प्राण शरीर को धारण करते हैं, वैसे ही नियमित आहार और विहार करनेवाले जन शरीर की अति कालपर्य्यन्त रक्षा करते हैं, वैसे ही विद्वानों के उपदेश विद्या को अतिकाल पर्य्यन्त स्थिर होनेवाली करते हैं॥४॥

वृ॒ञ्जे ह॒ यन्नम॑सा ब॒र्हिर॒ग्नावया॑मि॒ स्रुग्घृ॒तव॑ती सुवृ॒क्तिः। अम्य॑क्षि॒ सद्म॒ सद॑ने पृथि॒व्या अश्रा॑यि य॒ज्ञः सूर्ये॒ न चक्षुः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे हवन करनेवाले जन अग्नि में स्रुवा से घृत छोड़ते हैं, वैसे विद्वान् जन अन्य की बुद्धि में विद्या को छोड़ें और जैसे सूर्य्य के प्रकाश में नेत्र व्याप्त होता है, वैसे ही हवन किया गया द्रव्य अन्तरिक्ष मे व्याप्त होता है॥५॥

द॒श॒स्या नः॑ पुर्वणीक होतर्दे॒वेभि॑रग्ने अ॒ग्निभि॑रिधा॒नः। रा॒यः सू॑नो सहसो वावसा॒ना अति॑ स्रसेम वृ॒जनं॒ नांहः॑॥

हे मनुष्यो! जैसे अग्नि इन्धनों से बढ़ता है, वैसे आप लोग पुरुषार्थ से बढ़िये और जैसे मनुष्य शत्रु का शीघ्र त्याग करते हैं, वैसे अन्यायाचरणरूप पाप का शीघ्र त्याग करो॥६॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह ग्यारहवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

मध्ये॒ होता॑ दुरो॒णे ब॒र्हिषो॒ राळ॒ग्निस्तो॒दस्य॒ रोद॑सी॒ यज॑ध्यै। अ॒यं स सू॒नुः सह॑स ऋ॒तावा॑ दू॒रात्सूर्यो॒ न शो॒चिषा॑ ततान॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो वेदविहित यज्ञ आदि कर्म्मों के करनेवाले जन सूर्य्य के सदृश उत्तम कर्म्मों के प्रकाशक होवें, वे सब के सुख बढ़ाने को समर्थ हो सकते हैं॥१॥

आ यस्मि॒न्त्वे स्वपा॑के यजत्र॒ यक्ष॑द्राजन्त्स॒र्वता॑तेव॒ नु द्यौः। त्रि॒ष॒धस्थ॑स्तत॒रुषो॒ न जंहो॑ ह॒व्या म॒घानि॒ मानु॑षा॒ यज॑ध्यै॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जहाँ सूर्य्य के सदृश प्रतापी राजा होता है, वहाँ सम्पूर्ण सुख होते हैं॥२॥

तेजि॑ष्ठा॒ यस्या॑र॒तिर्व॑ने॒राट् तो॒दो अध्व॒न्न वृ॑धसा॒नो अ॑द्यौत्। अ॒द्रो॒घो न द्र॑वि॒ता चे॑तति॒ त्मन्नम॑र्त्योऽव॒र्त्र ओष॑धीषु॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जिस राजा की तेजस्विनी प्रकृति और प्रेरणा होवे, वह द्रोहरहित हुआ जैसे ओषधियाँ दुःखको, वैसे सब के दुःख का निवारण करता है, वही कृतकृत्य होता है॥३॥

सास्माके॑भिरे॒तरी॒ न शू॒षैर॒ग्निः ष्ट॑वे॒ दम॒ आ जा॒तवे॑दाः। द्र्व॑न्नो व॒न्वन् क्रत्वा॒ नार्वो॒स्रः पि॒तेव॑ जार॒यायि॑ य॒ज्ञैः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे प्रशंसा करने योग्य गृह में सुख से निवास होता है, वैसे ही पिता के सदृश पालन करनेवाले राजा के होने पर प्रजा सुखपूर्वक निवास करती है और जैसे बुद्धि से जितेन्द्रिय होकर और पृथिवी के राज्य को प्राप्त होकर अनाथों की रक्षा करता है, वैसे ही विद्वानों को चाहिये कि सत्य उपदेश से सब जगत् की रक्षा करें॥४॥

अध॑ स्मास्य पनयन्ति॒ भासो॒ वृथा॒ यत्तक्ष॑दनु॒याति॑ पृ॒थ्वीम्। स॒द्यो यः स्य॒न्द्रो विषि॑तो॒ धवी॑यानृ॒णो न ता॒युरति॒ धन्वा॑ राट्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वान् जनो! जो आप लोग बिजुली की विद्या को जानकर यन्त्रों से घर्षित कर इस को उत्पन्न करके इस बिजुली के साथ मनुष्य आदिकों को युक्त करें तो यह अति कम्पानेवाली और वेगवती होवे और स्वच्छ काच के स्वभ्र पट्टे के अन्तर्गत मनुष्य को अलग करावें तो यह बिजुली शीघ्र भूमि में प्राप्त होती हैं, सो यह सर्वत्र व्याप्त और प्रशंसा करने योग्य गुणवाली है, जिससे राजा लोग शत्रुओं को सहज से जीतकर धनवान् होते हैं॥५॥

स त्वं नो॑ अर्व॒न्निदा॑या॒ विश्वे॑भिरग्ने अ॒ग्निभि॑रिधा॒नः। वेषि॑ रा॒यो वि या॑सि दु॒च्छुना॒ मदे॑म श॒तहि॑माः सु॒वीराः॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि सम्पूर्ण अग्नि आदि पदार्थों से कार्य्यों को सिद्ध करके जो न्याय की आज्ञा से विरुद्ध प्रजाजन हैं, उनको ताड़न करके शान्त सम्पादित करें, क्योंकि इस प्रकार न्याय के आचरण से सम्पूर्ण जन सौ वर्ष युक्त होते हैं॥६॥इस सूक्त में विद्वान्, राजा और प्रजा के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह बारहवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

त्वद् विश्वा॑ सुभग॒ सौभ॑गा॒न्यग्ने॒ वि य॑न्ति व॒निनो॒ न व॒याः। श्रु॒ष्टी र॒यिर्वाजो॑ वृत्र॒तूर्ये॑ दि॒वो वृ॒ष्टिरीड्यो॑ री॒तिर॒पाम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य अन्तरिक्ष से वृष्टि करके सम्पूर्ण जगत् को तृप्त करता है, वैसे ही राजा न्याय से युक्त पुरुषार्थ से ऐश्वर्य्यों को बढ़ा कर प्रजाओं को निरन्तर तृप्त करे॥१॥

त्वं भगो॑ न॒ आ हि रत्न॑मि॒षे परि॑ज्मेव क्षयसि द॒स्मव॑र्चाः। अग्ने॑ मि॒त्रो न बृ॑ह॒त ऋ॒तस्याऽसि॑ क्ष॒त्ता वा॒मस्य॑ देव॒ भूरेः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वान् जन प्राणों के सदृश धन और ऐश्वर्य्य की शोभा को धारण करते हैं, वे मित्र के सदृश वर्त्ताव करके सब को सुखी करें॥२॥

स सत्प॑तिः॒ शव॑सा हन्ति वृ॒त्रमग्ने॒ विप्रो॒ वि प॒णेर्भ॑र्ति॒ वाज॑म्। यं त्वं प्र॑चेत ऋतजात रा॒या स॒जोषा॒ नप्त्रा॒पां हि॒नोषि॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो बुद्धिमान् जन सूर्य्य के सदृश विद्या को प्रकाशित करके अविद्या का नाश करते हैं, वे अतुल सुख को प्राप्त होते हैं॥३॥

यस्ते॑ सूनो सहसो गी॒र्भिरु॒क्थैर्य॒ज्ञैर्मर्तो॒ निशि॑तिं वे॒द्यान॑ट्। विश्वं॒ स दे॑व॒ प्रति॒ वार॑मग्ने ध॒त्ते धा॒न्यं१॒॑ पत्य॑ते वस॒व्यैः॑॥

हे मनुष्यो! पूर्ण ब्रह्मचर्य्य से शरीर और आत्मा के बल को पूर्ण करके सन्तानों की उत्पत्ति करो॥४॥

ता नृभ्य॒ आ सौ॑श्रव॒सा सु॒वीराग्ने॑ सूनो सहसः पु॒ष्यसे॑ धाः। कृ॒णोषि॒ यच्छव॑सा॒ भूरि॑ प॒श्वो वयो॒ वृका॑या॒रये॒ जसु॑रये॥

जो राजा दुष्ट चोरादिकों का निवारण करके प्रजाओं को पुष्ट करता है, वह सब का हितैषी होता है॥५॥

व॒द्मा सू॑नो सहसो नो॒ विहा॑या॒ अग्ने॑ तो॒कं तन॑यं वा॒जिनो॑ दाः। विश्वा॑भिर्गी॒र्भिर॒भि पू॒र्तिम॑श्यां॒ मदे॑म श॒तहि॑माः सु॒वीराः॑॥

हे विद्वान् जनो! आप अध्यापन और उपदेश से सम्पूर्ण गृहस्थों के पुत्र और पुत्रियों को उत्तम प्रकार शिक्षित करके विद्या से सुखयुक्त करो, जिससे दीर्घ अवस्थावाले होकर ये सन्तान भी ऐसा ही आचरण करें॥६॥इस सूक्त में अग्नि, विद्वान् और राजा के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह तेरहवाँ सूक्त और पन्द्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒ग्ना यो मर्त्यो॒ दुवो॒ धियं॑ जु॒जोष॑ धी॒तिभिः॑। भस॒न्नु ष प्र पू॒र्व्य इषं॑ वुरी॒ताव॑से॥

जो मनुष्य आलस्य आदि दोषों का त्याग कर धर्म्म से पुरुषार्थ करते हैं, वे सम्पूर्ण इष्ट सुख को प्राप्त होते हैं॥१॥

अ॒ग्निरिद्धि प्रचे॑ता अ॒ग्निर्वे॒धस्त॑म॒ ऋषिः॑। अ॒ग्निं होता॑रमीळते य॒ज्ञेषु॒ मनु॑षो॒ विशः॑॥

हे मनुष्यो! सब आप लोगों का परमेश्वर ही स्तुति करने, मानने, हृदय में धारण करने और उपासना करने योग्य है, ऐसा सब लोग निश्चय करो॥२॥

नाना॒ ह्य१॒॑ग्नेऽव॑से॒ स्पर्ध॑न्ते॒ रायो॑ अ॒र्यः। तूर्व॑न्तो॒ दस्यु॑मा॒यवो॑ व्र॒तैः सीक्ष॑न्तो अव्र॒तम्॥

जो दुष्टों के निवारण में प्रयत्न करते हैं, वे मनुष्य धनवान् होते हैं॥३॥

अ॒ग्निर॒प्सामृ॑ती॒षहं॑ वी॒रं द॑दाति॒ सत्प॑तिम्। यस्य॒ त्रस॑न्ति॒ शव॑सः सं॒चक्षि॒ शत्र॑वो भि॒या॥

जो ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय और विद्वान् होकर शरीर और आत्मा के सामर्थ्य को नहीं दूर करते हैं, उनसे शत्रुजन डर के भागते हैं अथवा वश को प्राप्त होते हैं॥४॥

अ॒ग्निर्हि वि॒द्मना॑ नि॒दो दे॒वो मर्त॑मुरु॒ष्यति॑। स॒हावा॒ यस्यावृ॑तो र॒यिर्वाजे॒ष्ववृ॑तः॥

सब पदार्थों को उत्पन्न करती हुई बिजुली को मनुष्य जानें, जिस विज्ञान से आग्नेयादि नामक अस्त्र सिद्ध होते हैं, उसका सब काल में खोज करो॥५॥

अच्छा॑ नो मित्रमहो देव दे॒वानग्ने॒ वोचः॑ सुम॒तिं रोद॑स्योः। वी॒हि स्व॒स्तिं सु॑क्षि॒तिं दि॒वो नॄन्द्वि॒षो अंहां॑सि दुरि॒ता त॑रेम॒ ता त॑रेम॒ तवाव॑सा तरेम॥

हे विद्वान् जनो! जितनी विद्या को आप लोग प्राप्त होओ उतनी का अन्य जनों के लिये यथावत् उपदेश करो और सत्य उपदेश से मनुष्यों के दुष्ट व्यसनों को दूर करो और आप अधर्म्म के आचरण से पृथक् वर्त्ताव करो और सत्संग तथा पुरुषार्थ से शुद्ध होकर दुःखों से पार होकर सुख को प्राप्त होओ॥६॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चौदहवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इ॒ममू॒ षु वो॒ अति॑थिमुष॒र्बुधं॒ विश्वा॑सां वि॒शां पति॑मृञ्जसे गि॒रा। वेतीद्दि॒वो ज॒नुषा॒ कच्चि॒दा शुचि॒र्ज्योक्चि॑दत्ति॒ गर्भो॒ यदच्यु॑तम्॥

हे मनुष्यो! जैसे अतिथि सत्कार करने योग्य है, वैसे ही पदार्थविद्या का जाननेवाला सत्कार करने योग्य है, जो सब के अन्तःस्थ नित्य बिजुली की ज्योति को जानते हैं, वे अभीप्सित सुख को प्राप्त होते हैं॥१॥

मि॒त्रं न यं सुधि॑तं॒ भृग॑वो द॒धुर्वन॒स्पता॒वीड्य॑मू॒र्ध्वशो॑चिषम्। स त्वं सुप्री॑तो वी॒तह॑व्ये अद्भुत॒ प्रश॑स्तिभिर्महयसे दि॒वेदि॑वे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे मित्र कार्य्यों को सिद्ध करता है, वैसे ही अग्नि उत्तम प्रकार प्रयोग किया कार्य्यों को सिद्ध करता है॥२॥

स त्वं दक्ष॑स्यावृ॒को वृ॒धो भू॑र॒र्यः पर॒स्यान्त॑रस्य॒ तरु॑षः। रा॒यः सू॑नो सहसो॒ मर्त्ये॒ष्वा छ॒र्दिर्य॑च्छ वी॒तह॑व्याय स॒प्रथो॑ भ॒रद्वा॑जाय स॒प्रथः॑॥

जो मनुष्य सब प्रकार से बल के वृद्धि करें तो लक्ष्मीयुक्त कैसे न हों॥३॥

द्यु॒ता॒नं वो॒ अति॑थिं॒ स्व॑र्णरम॒ग्निं होता॑रं॒ मनु॑षः स्वध्व॒रम्। विप्रं॒ न द्यु॒क्षव॑चसं सुवृ॒क्तिभि॑र्हव्य॒वाह॑मर॒तिं दे॒वमृ॑ञ्जसे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे बुद्धिमान् जन यथायोग्य कर्म्मों को करने को समर्थ होता है, वैसे ही युक्ति से अच्छे प्रकार प्रयोग किया अग्नि सम्पूर्ण व्यापार सिद्ध करने को समर्थ होता है॥४॥

पा॒व॒कया॒ यश्चि॒तय॑न्त्या कृ॒पा क्षाम॑न्रुरु॒च उ॒षसो॒ न भा॒नुना॑। तूर्व॒न्न याम॒न्नेत॑शस्य॒ नू रण॒ आ यो घृ॒णे न त॑तृषा॒णो अ॒जरः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सूर्य्य के किरण प्रातःकाल को प्रकाशित करते हैं, वैसे ही विद्वान् जन सब के अन्तः करणों को प्रकाशित करें॥५॥

अ॒ग्निम॑ग्निं वः स॒मिधा॑ दुवस्यत प्रि॒यंप्रि॑यं वो॒ अति॑थिं गृणी॒षणि॑। उप॑ वो गी॒र्भिर॒मृतं॑ विवासत दे॒वो दे॒वेषु॒ वन॑ते॒ हि वार्यं॑ दे॒वो दे॒वेषु॒ वन॑ते॒ हि नो॒ दुवः॑॥

हे मनुष्यो! आप लोग जैसे विद्वान् का, वैसे अग्नि का भी मेल करावें, जिससे अभीष्ट कार्य्य सिद्ध होवे॥६॥

समि॑द्धम॒ग्निं स॒मिधा॑ गि॒रा गृ॑णे॒ शुचिं॑ पाव॒कं पु॒रो अ॑ध्व॒रे ध्रु॒वम्। विप्रं॒ होता॑रं पुरु॒वार॑म॒द्रुहं॑ क॒विं सु॒म्नैरी॑महे जा॒तवे॑दसम्॥

हे मनुष्यो! आप लोग सत्य के प्रकाशक विद्वानों से विद्या की याचना करो तथा इस विद्या को प्राप्त होकर अन्यों को देओ॥७॥

त्वां दू॒तम॑ग्ने अ॒मृतं॑ यु॒गेयु॑गे हव्य॒वाहं॑ दधिरे पा॒युमीड्य॑म्। दे॒वास॑श्च॒ मर्ता॑सश्च॒ जागृ॑विं वि॒भुं वि॒श्पतिं॒ नम॑सा॒ नि षे॑दिरे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! आप लोग प्रतिदिन सर्वव्यापी, न्यायेश, दयालु, सब धन्यवादों के योग्य, परमात्मा ही की उपासना करो॥८॥

वि॒भूष॑न्नग्न उ॒भयाँ॒ अनु॑ व्र॒ता दू॒तो दे॒वानां॒ रज॑सी॒ समी॑यसे। यत्ते॑ धी॒तिं सु॑म॒तिमा॑वृणी॒महेऽध॑ स्मा नस्त्रि॒वरू॑थः शि॒वो भ॑व॥

जो मनुष्य जगत् के रचनेवाले ईश्वर की आज्ञा के अनुकूल वर्त्ताव करते हैं तथा उसके गुण, कर्म्म और स्वभावों के सदृश अपने गुण, कर्म्म और स्वभावों को करते हैं, उनको वह जैसे दूत, वैसे सब विद्या के समाचार को जनाता हुआ सहज से मुक्ति के पदको प्राप्त कराता है, इससे सब काल में ही इसकी उपासना करनी चाहिये॥९॥

तं सु॒प्रती॑कं सु॒दृशं॒ स्वञ्च॒मवि॑द्वांसो वि॒दुष्ट॑रं सपेम। स य॑क्ष॒द् विश्वा॑ व॒युना॑नि वि॒द्वान्प्र ह॒व्यम॒ग्निर॒मृते॑षु वोचत्॥

जो परमात्मा को नहीं जानते और उसकी आज्ञा के अनुकूल आचरण नहीं करते हैं, उनको धिक् है धिक् है और जो उसकी उपासना करते हैं, वे धन्य हैं। और जो हम लोगों के लिये वेदद्वारा सम्पूर्ण विज्ञानों का उपदेश देता है, उसी की हम सब लोग उपासना करें॥१०॥

तम॑ग्ने पास्यु॒त तं पि॑पर्षि॒ यस्त॒ आन॑ट्क॒वये॑ शूर धी॒तिम्। य॒ज्ञस्य॑ वा॒ निशि॑तिं॒ वोदि॑तिं वा॒ तमित्पृ॑णक्षि॒ शव॑सो॒त रा॒या॥

जो सत्यभाव से जगदीश्वर की उपासना करते हैं, उनकी ईश्वर सब प्रकार से रक्षा कर धर्म्मयुक्त गुण, कर्म और स्वभावों में प्रेरणा कर तथा शरीर और आत्मा का बल अच्छे प्रकार देकर मोक्ष को प्राप्त कराता है॥११॥

त्वम॑ग्ने वनुष्य॒तो नि पा॑हि॒ त्वमु॑ नः सहसावन्नव॒द्यात्। सं त्वा॑ ध्वस्म॒न्वद॒भ्ये॑तु॒ पाथः॒ सं र॒यिः स्पृ॑ह॒याय्यः॑ सह॒स्री॥

हे मनुष्यो! जो धर्म्म से याचना किया गया जगदीश्वर अधर्म के आचरण से अलग करके धर्म्म को प्राप्त कराता है और जो अनित्य सुखको भी देता है, उसी को रक्षक, सब ऐश्वर्य्य देनेवाला तथा इष्ट देव जानो॥१२॥

अ॒ग्निर्होता॑ गृ॒हप॑तिः॒ स राजा॒ विश्वा॑ वेद॒ जनि॑मा जा॒तवे॑दाः। दे॒वाना॑मु॒त यो मर्त्या॑नां॒ यजि॑ष्ठः॒ स प्र य॑जतामृ॒तावा॑॥

हे मनुष्यो! जो सम्पूर्ण जगत् और जीवों के कर्म्मों को जानकर फलों को देता है, वही सत्य राजा है, ऐसा जानना चाहिये॥१३॥

अग्ने॒ यद॒द्य वि॒शो अ॑ध्वरस्य होतः॒ पाव॑कशोचे॒ वेष्ट्वं हि यज्वा॑। ऋ॒ता य॑जासि महि॒ना वि यद्भूर्ह॒व्या व॑ह यविष्ठ॒ या ते॑ अ॒द्य॥

हे मनुष्यो! जो सम्पूर्ण सृष्टि को एकत्रित करता है और जो व्यापक अहिंसा आदि धर्म्म के अनुष्ठान के लिये आज्ञा देता है, वह ही सब से उपासना करने योग्य है॥१४॥

अ॒भि प्रयां॑सि॒ सुधि॑तानि॒ हि ख्यो नि त्वा॑ दधीत॒ रोद॑सी॒ यज॑ध्यै। अवा॑ नो मघव॒न्वाज॑साता॒वग्ने॒ विश्वा॑नि दुरि॒ता त॑रेम॒ ता त॑रेम॒ तवाव॑सा तरेम॥

हे मनुष्यो! जो अन्न और पानादिक जीवन के हितकारक पदार्थों को धारण करता, अन्तर्यामी होने से सत्य का उपदेश करता, उसके आश्रय से ही सम्पूर्ण दुःखों के पार प्राप्त होओ॥१५॥

अग्ने॒ विश्वे॑भिः स्वनीक दे॒वैरूर्णा॑वन्तं प्रथ॒मः सी॑द॒ योनि॑म्। कु॒ला॒यिनं॑ घृ॒तव॑न्तं सवि॒त्रे य॒ज्ञं न॑य॒ यज॑मानाय सा॒धु॥

हे विद्यायुक्त राजजनो! आप लोग विद्वानों के सहाय से न्याय के गृहों में ठहर के न्याय करिये और सब मनुष्यों को न्यायमार्ग पर चलाइये, जिससे सब श्रेष्ठ मार्ग में स्थित होकर परोपकारी होवें॥१६॥

इ॒ममु॒ त्यम॑थर्व॒वद॒ग्निं म॑न्थन्ति वे॒धसः॑। यम॑ङ्कू॒यन्त॒मान॑य॒न्नमू॑रं श्या॒व्या॑भ्यः॥

जो विद्वान् जन भूमि, अन्तरिक्ष, वायु, आकाश और सूर्य्य आदि से मन्थन करके बिजुली को निकालते हैं, वे अनेक कार्य्यों के सिद्ध करने को समर्थ होते हैं॥१७॥

जनि॑ष्वा दे॒ववी॑तये स॒र्वता॑ता स्व॒स्तये॑। आ दे॒वान् व॑क्ष्य॒मृताँ॑ ऋता॒वृधो॑ य॒ज्ञं दे॒वेषु॑ पिस्पृशः॥

विद्वानों को चाहिये कि सृष्टि में वर्त्तमान पदार्थों से विद्या के द्वारा श्रेष्ठ भोगों को प्राप्त होकर अपने लिये अनेक प्रकार के सुख को उत्पन्न करें॥१८॥

व॒यमु॑ त्वा गृहपते जनाना॒मग्ने॒ अक॑र्म स॒मिधा॑ बृ॒हन्त॑म्। अ॒स्थू॒रि नो॒ गार्ह॑पत्यानि सन्तु ति॒ग्मेन॑ न॒स्तेज॑सा॒ सं शि॑शाधि॥

हे गृहस्थजनो! आप लोग आलस्य का त्याग करके सृष्टिक्रम से विद्या की उन्नति करके अन्य विद्यार्थियों को विद्या ग्रहण कराइये, जिससे सब सुख बढ़े॥१९॥इस सूक्त में अग्नि, विद्वान्, ईश्वर और गृहस्थ के कार्य्यों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पन्द्रहवाँ सूक्त और बीसवाँ वर्ग और छठे मण्डल का पहिला अनुवाक समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

त्वम॑ग्ने य॒ज्ञानां॒ होता॒ विश्वे॑षां हि॒तः। दे॒वेभि॒र्मानु॑षे॒ जने॑॥

हे विद्वानो! जैसे ईश्वर सब का हितकारी और सम्पूर्ण सुखों का देनेवाला तथा विद्वानों के सङ्ग से जानने योग्य है, वैसे आप लोग भी अनुष्ठान करो॥१॥

स नो॑ म॒न्द्राभि॑रध्व॒रे जि॒ह्वाभि॑र्यजा म॒हः। आ दे॒वान्व॑क्षि॒ यक्षि॑ च॥

विद्वान् जन विद्या की प्राप्ति के लिये सब को सदा उपदेश देवें, जिससे श्रेष्ठ गुणोंवाले मनुष्य होवें॥२॥

वेत्था॒ हि वे॑धो॒ अध्व॑नः प॒थश्च॑ दे॒वाञ्ज॑सा। अग्ने॑ य॒ज्ञेषु॑ सुक्रतो॥

इस संसार में जो मनुष्य धर्म्म, अर्थ, काम और मोक्ष के मार्गों को जानें, वे ही अन्यों को भी उपदेश देवें, न कि इतर अज्ञ जन॥३॥

त्वामी॑ळे॒ अध॑ द्वि॒ता भ॑र॒तो वा॒जिभिः॑ शु॒नम्। ई॒जे य॒ज्ञेषु॑ य॒ज्ञिय॑म्॥

विद्वानों को चाहिये कि परस्पर विद्या की उन्नति करके अन्यों को ग्रहण करावें॥४॥

त्वमि॒मा वार्या॑ पु॒रु दिवो॑दासाय सुन्व॒ते। भ॒रद्वा॑जाय दा॒शुषे॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि सत्य के उपदेशकों और विद्या के प्रचारकों का सदा ही सत्कार करें, अन्य जनों का नहीं॥५॥

त्वं दू॒तो अम॑र्त्य॒ आ व॑हा॒ दैव्यं॒ जन॑म्। शृ॒ण्वन् विप्र॑स्य सुष्टु॒तिम्॥

हे परीक्षा करनेवाले! आप लोग पक्षपात का त्याग करके विद्यार्थियों की यथावत् परीक्षा करके विद्यायुक्त कीजिये॥६॥

त्वाम॑ग्ने स्वा॒ध्यो॒३॒॑ मर्ता॑सो दे॒ववी॑तये। य॒ज्ञेषु॑ दे॒वमी॑ळते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्यार्थियों को चाहिये कि विद्या की प्राप्ति के लिये विद्वानों का सेवन करें और जैसे सृष्टि के पदार्थों में अग्नि प्रशंसित है, वैसे ही मनुष्यों में धार्मिक विद्वान् हैं, यह जानना चाहिये॥७॥

तव॒ प्र य॑क्षि सं॒दृश॑मु॒त क्रतुं॑ सु॒दान॑वः। विश्वे॑ जुषन्त का॒मिनः॑॥

हे विद्वानो! जैसे विद्या की कामना करनेवाले आप लोगों की कामना करते हैं, वैसे ही आप लोग विद्यार्थियों की कामना करो॥८॥

त्वं होता॒ मनु॑र्हितो॒ वह्नि॑रा॒सा वि॒दुष्ट॑रः। अग्ने॒ यक्षि॑ दि॒वो विशः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे प्रजाजनो! जैसे राजा आप लोगों की कामना करता और सुख देने की इच्छा करता है, वैसे आप लोग भी उस राजा की कामना करके उसके लिये निरन्तर सुख दीजिये॥९॥

अग्न॒ आ या॑हि वी॒तये॑ गृणा॒नो ह॒व्यदा॑तये। नि होता॑ सत्सि ब॒र्हिषि॑॥

जहाँ विद्वान् जन विद्या की वृद्धि करने की इच्छा करते हैं, वहाँ सब सुखी होते हैं॥१०॥

तं त्वा॑ स॒मिद्भि॑रङ्गिरो घृ॒तेन॑ वर्धयामसि। बृ॒हच्छो॑चा यविष्ठ्य॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा आदि जन जैसे घृत से अग्नि की, वैसे शिक्षा और सत्कार से शूर जनों की वृद्धि करते हैं, वे सदा विजय को प्राप्त होते हैं॥११॥

नः॑ पृ॒थु श्र॒वाय्य॒मच्छा॑ देव विवाससि। बृ॒हद॑ग्ने सु॒वीर्य॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो जिसका उपकार करते हैं, वे उनके सत्कार करने योग्य होते हैं॥१२॥

त्वाम॑ग्ने॒ पुष्क॑रा॒दध्यथ॑र्वा॒ निर॑मन्थत। मू॒र्ध्नो विश्व॑स्य वा॒घतः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वान् जनो! जैसे पदार्थविद्या के जाननेवाले जन सूर्य्य आदि के समीप से बिजुली को ग्रहण करके कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वैसे ही आप लोग भी सिद्ध करो॥१३॥

तमु॑ त्वा द॒ध्यङ्ङृषिः॑ पु॒त्र ई॑धे॒ अथ॑र्वणः। वृ॒त्र॒हणं॑ पुरन्द॒रम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वान् जनो! जैसे ईश्वर ने प्रकाशस्वरूप और सम्पूर्ण जगत् का उपकारक सूर्य्य रचा है, वैसे विद्या से प्रकाशित जनों को विद्वान् करो॥१४॥

तमु॑ त्वा पा॒थ्यो वृषा॒ समी॑धे दस्यु॒हन्त॑मम्। ध॒नं॒ज॒यं रणे॑रणे॥

हे मनुष्यो! यदि आप लोग बिजुली की विद्या को प्राप्त होकर युद्ध करो तो आप लोगों का बहुत धन और ऐश्वर्य्यों का देनेवाला मैं बिजुली आदि से विजय कराऊँ॥१५॥

एह्यू॒ षु ब्रवा॑णि॒ तेऽग्न॑ इ॒त्थेत॑रा॒ गिरः॑। ए॒भिर्व॑र्धास॒ इन्दु॑भिः॥

जो मनुष्य, हम लोग विद्याओं को पढ़कर सब को उपदेश देवें, इस प्रकार इच्छा करते हैं, वे हम लोगों को प्राप्त होवें॥१६॥

यत्र॒ क्व॑ च ते॒ मनो॒ दक्षं॑ दधस॒ उत्त॑रम्। तत्रा॒ सदः॑ कृणवसे॥

हे मनुष्यो! जहाँ जगदीश्वर वा योगाभ्यास में आप लोगों का अन्तःकरण पवित्र होकर कार्य्य की सिद्धि को करता है, वहाँ ही आप लोग भी प्रवृत्ति करिये॥१७॥

न॒हि ते॑ पू॒र्तम॑क्षि॒पद्भुव॑न्नेमानां वसो। अथा॒ दुवो॑ वनवसे॥

जो मनुष्य सत्य आचरण को करते हैं, उनकी कामना की पूर्ति कभी भी नहीं नष्ट की जाती है॥१८॥

आग्निर॑गामि॒ भार॑तो वृत्र॒हा पु॑रु॒चेत॑नः। दिवो॑दासस्य॒ सत्प॑तिः॥

जैसे इस देह में साधन और उपसाधनों के सहित जीव बहुत कर्म्मों को करता है, वैसे ही विद्वान् सम्पूर्ण कर्म्मों को सिद्ध करता है॥१९॥

स हि विश्वाति॒ पार्थि॑वा र॒यिं दाश॑न्महित्व॒ना। व॒न्वन्नवा॑तो॒ अस्तृ॑तः॥

हे मनुष्यो! जो अग्नि बहुत सुख को देता है, उसका क्यों नहीं सेवन किया जावे॥२०॥

स प्र॑त्न॒वन्नवी॑य॒साग्ने॑ द्यु॒म्नेन॑ सं॒यता॑। बृ॒हत्त॑तन्थ भा॒नुना॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सूर्य्य के सदृश यशस्वी होते हैं, वे नवीन-नवीन प्रतिष्ठा को प्राप्त होते हैं॥२१॥

प्र वः॑ सखायो अ॒ग्नये॒ स्तोमं॑ य॒ज्ञं च॑ धृष्णु॒या। अर्च॒ गाय॑ च वे॒धसे॑॥

सूर्य्य ही यज्ञफलों की प्राप्ति का साधक है, वैसे यथार्थ कहने और करनेवाले धर्म्मात्मा जन परोपकार में कुशल होते हैं, ऐसा जानकर संसार में वर्त्ताव करे॥२॥

हि यो मानु॑षा यु॒गा सीद॒द्धोता॑ क॒विक्र॑तुः। दू॒तश्च॑ हव्य॒वाह॑नः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो अग्नि धार्मिक और विद्वानों के कार्य्यों का करनेवाला होता है, उसको विद्वान् जन कार्य्यों की सिद्धि के लिये सम्प्रयुक्त करें॥२३॥

ता राजा॑ना॒ शुचि॑व्रतादि॒त्यान्मारु॑तं ग॒णम्। वसो॒ यक्षी॒ह रोद॑सी॥

जो मनुष्य पढ़ाने और पढ़नेवाले आदिकों की सेवा करके पदार्थविद्या को ग्रहण करते हैं, वे सुखी होते हैं॥२४॥

वस्वी॑ ते अग्ने॒ संदृ॑ष्टिरिषय॒ते मर्त्या॑य। ऊर्जो॑ नपाद॒मृत॑स्य॥

जिस विद्वान् का विद्यादर्शन-विद्या निष्फल नहीं होता और जिससे पढ़कर विद्यार्थी जन विद्वान् होते हैं, उसका सदा सत्कार करो॥२५॥

क्रत्वा॒ दा अ॑स्तु॒ श्रेष्ठो॒ऽद्य त्वा॑ व॒न्वन्त्सु॒रेक्णाः॑। मर्त॑ आनाश सुवृ॒क्तिम्॥

वे ही उत्तम जन गणनीय हैं, जो विज्ञान को देते हैं॥२६॥

ते ते॑ अग्ने॒ त्वोता॑ इ॒षय॑न्तो॒ विश्व॒मायुः॑। तर॑न्तो अ॒र्यो अरा॑तीर्व॒न्वन्तो॑ अ॒र्यो अरा॑तीः॥

जो ब्रह्मचर्य आदि से रोगों को दूर करके चिरञ्जीवी होवें, वे धार्मिक सम्पूर्ण कार्य्यों में अध्यक्ष हों॥२७॥

अ॒ग्निस्ति॒ग्मेन॑ शो॒चिषा॒ यास॒द् विश्वं॒ न्य१॒॑त्रिण॑म्। अ॒ग्निर्नो॑ वनते र॒यिम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजा को चाहिये कि अधिकारियों के नियत करने में प्रजा की सम्मति भी ग्रहण करे, ऐसा होने पर कभी भी उपद्रव नहीं होता है॥२८॥

सु॒वीरं॑ र॒यिमा भ॑र॒ जात॑वेदो॒ विच॑र्षणे। ज॒हि रक्षां॑सि सुक्रतो॥

राजा को चाहिये कि सदा ही धन आदि से धार्मिक विद्वान् और क्षत्रिय कुल में हुए वीरों की उत्तम प्रकार रक्षा करे और दुष्टों का सदा तिरस्कार करे॥२९॥

त्वं नः॑ पा॒ह्यंह॑सो॒ जात॑वेदो अघाय॒तः। रक्षा॑ णो ब्रह्मणस्कवे॥

हे राजन् वा विद्वन्! आप दोनों हम लोगों का अधर्म्माचरण और अधर्म्म का आचरण करते हुए से अलग करके सुख को बढ़ाइये॥३०॥

यो नो॑ अग्ने दु॒रेव॒ आ मर्तो॑ व॒धाय॒ दाश॑ति। तस्मा॑न्नः पा॒ह्यंह॑सः॥

हे न्यायाधीश! जो करने के विना अपराध को स्थापित करते हैं, उनके लिये तीव्र दण्ड को दीजिये॥३१॥

त्वं तं दे॑व जि॒ह्वया॒ परि॑ बाधस्व दु॒ष्कृत॑म्। मर्तो॒ यो नो॒ जिघां॑सति॥

हे राजन् वा विद्वन्! जो न्यायधर्म का त्याग करके पक्षपात से अधर्म्म करता है, उसको शीघ्र निरन्तर दण्ड दीजिये॥३२॥

भ॒रद्वा॑जाय स॒प्रथः॒ शर्म॑ यच्छ सहन्त्य। अग्ने॒ वरे॑ण्यं॒ वसु॑॥

हे श्रेष्ठ गृहस्थ! आप सदा ही सुपात्र धार्मिकजन के लिये दान दीजिये॥३३॥

अ॒ग्निर्वृ॒त्राणि॑ जङ्घनद्द्रविण॒स्युर्वि॑प॒न्यया॑। समि॑द्धः शु॒क्र आहु॑तः॥

जो निरन्तर उद्यम करते वे दारिद्र्य का नाश करते हैं॥३४॥

गर्भे॑ मा॒तुः पि॒तुष्पि॒ता वि॑दिद्युता॒नो अ॒क्षरे॑। सीद॑न्नृ॒तस्य॒ योनि॒मा॥

हे मनुष्यो! जो उत्पन्न करने वालों का उत्पादक, प्रकाशकों का प्रकाशक है, उसकी सब लोग उपासना करें॥३५॥

ब्रह्म॑ प्र॒जाव॒दा भ॑र॒ जात॑वेदो॒ विच॑र्षणे। अग्ने॒ यद्दी॒दय॑द्दि॒वि॥

हे मनुष्यो! जो अग्नि में, जो सूर्य्य में और जो बिजुली में तेज है, उसके विज्ञान से धन और धान्य की उन्नति करिये॥३६॥

उप॑ त्वा र॒ण्वसं॑दृशं॒ प्रय॑स्वन्तः सहस्कृत। अग्ने॑ ससृ॒ज्महे॒ गिरः॑॥

मनुष्यों को चाहिये कि जैसे अपने प्रयोजन की प्रिय वाणी हृदय को प्रिय होती है, वैसे अन्य जनों के प्रयोजन को भी समझें॥३७॥

उप॑च्छा॒यामि॑व॒ घृणे॒रग॑न्म॒ शर्म॑ ते व॒यम्। अग्ने॒ हिर॑ण्यसंदृशः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वन्! हम लोग सब ऋतुओं में हुए सूर्य्य को जैसे वैसे प्रकाशमान आपके गृह को प्राप्त होकर छाया के सदृश सेवन करें॥३८॥

य उ॒ग्रइ॑व शर्य॒हा ति॒ग्मशृ॑ङ्गो॒ न वंस॑गः। अग्ने॒ पुरो॑ रु॒रोजि॑थ॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा आदि अधिकारी जन सूर्य्य जैसे वैसे तेजस्वी होवें, वे शत्रुओं के जीतने को समर्थ होवें॥३९॥

आ यं हस्ते॒ न खा॒दिनं॒ शिशुं॑ जा॒तं न बिभ्र॑ति। वि॒शाम॒ग्निं स्व॑ध्व॒रम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो हाथ में आँवले को जैसे वैसे, गोदी में लड़के को जैसे वैसे अग्निविद्या को जानते हैं, वे प्रजा के स्वामी होते हैं॥४०॥

प्र दे॒वं दे॒ववी॑तये॒ भर॑ता वसु॒वित्त॑मम्। आ स्वे योनौ॒ नि षी॑दतु॥

हे मनुष्यो! आप श्रेष्ठ गुणों की प्राप्ति के लिये अग्नि आदि पदार्थों को जानिये॥४१॥

आ जा॒तं जा॒तवे॑दसि प्रि॒यं शि॑शी॒ताति॑थिम्। स्यो॒न आ गृ॒हप॑तिम्॥

जो व्याप्त बिजली को प्रज्वलित कराते हैं, वे सब स्थानों में विजय आदि को प्राप्त होते हैं॥४२॥

अग्ने॑ यु॒क्ष्वा हि ये तवाश्वा॑सो देव सा॒धवः॑। अरं॒ वह॑न्ति म॒न्यवे॑॥

जो विद्वान् जन अग्नि आदि का योजन वाहनों में करते हैं, वे पूर्ण मनोरथवाले होते हैं॥४३॥

अच्छा॑ नो या॒ह्या व॑हा॒भि प्रयां॑सि वी॒तये॑। आ दे॒वान्त्सोम॑पीतये॥

मनुष्यों को चाहिये कि सत्कार के लिये विद्वानों का आह्वान करें॥४४॥

उद॑ग्ने भारत द्यु॒मदज॑स्रेण॒ दवि॑द्युतत्। शोचा॒ वि भा॑ह्यजर॥

जैसे ब्रह्माण्ड में सूर्य्य निरन्तर प्रकाशित होता है, वैसे ही विद्वान् जन सत्य व्यवहार में प्रकाशित हों॥४५॥

वी॒ती यो दे॒वं मर्तो॑ दुव॒स्येद॒ग्निमी॑ळीताध्व॒रे ह॒विष्मा॑न्। होता॑रं सत्य॒यजं॒ रोद॑स्योरुत्ता॒नह॑स्तो॒ नम॒सा वि॑वासेत्॥

हे मनुष्यो! जिस जगदीश्वर की योगी जन उपासना करते हैं, उसकी आप लोग भी उपासना करो॥४६॥

आ ते॑ अग्न ऋ॒चा ह॒विर्हृ॒दा त॒ष्टं भ॑रामसि। ते ते॑ भवन्तू॒क्षण॑ ऋष॒भासो॑ व॒शा उ॒त॥

जो सत्यभाव से और अन्तःकरण से जगदीश्वर की आज्ञा का सेवन करते हैं, वे सब प्रकार से उत्कृष्ट होते हैं॥४७॥

अ॒ग्निं दे॒वासो॑ अग्रि॒यमि॒न्धते॑ वृत्र॒हन्त॑मम्। येना॒ वसू॒न्याभृ॑ता तृ॒ळहा रक्षां॑सि वा॒जिना॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे यज्ञ करनेवाले जन यज्ञ में वेदी पर अग्नि को प्रज्वलित करके हवन की सामग्री छोड़ के संसार का उपकार करते हैं, वैसे ही योग से युक्त संन्यासी जन परमात्मा को सब के हृदय मे अच्छे प्रकार प्रकाशित करके दोषों का नाश करते हैं॥४८॥इस सूक्त में अग्नि, विद्वान् और ईश्वर के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥इस अध्याय में अग्नि, विश्वेदेव, सूर्य्य, इन्द्र, वैश्वानर, वायु, यज्ञ, राजधर्म्म, विद्वान् और ईश्वर के गुणवर्णन करने से इस अध्याय के अर्थ की इससे पूर्व अध्याय के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमद्विरजानन्दसरस्वती स्वामी जी के शिष्य परम विद्वान् श्रीमद्दयानन्द सरस्वती स्वामी से रचे गये ऋग्वेदभाष्य में चतुर्थ अष्टक में पाँचवाँ अध्याय, तीसवाँ वर्ग और छठे मण्डल में सोलहवाँ सूक्त भी समाप्त हुआ॥

पिबा॒ सोम॑म॒भि यमु॑ग्र॒ तर्द॑ ऊ॒र्वं गव्यं॒ महि॑ गृणा॒न इ॑न्द्र। वि यो धृ॑ष्णो॒ वधि॑षो वज्रहस्त॒ विश्वा॑ वृ॒त्रम॑मि॒त्रिया॒ शवो॑भिः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य ब्रह्मचर्य्य, विद्या और सत्कर्म्म से दुष्टों को दूर करके श्रेष्ठों को स्वीकार करते हैं, वे शत्रुओं का नाश करते हैं॥१॥

स ईं॑ पाहि॒ य ऋ॑जी॒षी तरु॑त्रो॒ यः शिप्र॑वान्वृष॒भो यो म॑ती॒नाम्। यो गो॑त्र॒भिद्व॑ज्र॒भृद्यो ह॑रि॒ष्ठाः स इ॑न्द्र चि॒त्राँ अ॒भि तृ॑न्धि॒ वाजा॑न्॥

हे राजन्! जो प्रजा के रक्षक, दुष्टों के हिंसक जन होवें, उनका आप सत्कार करिये॥२॥

ए॒वा पा॑हि प्र॒त्नथा॒ मन्द॑तु त्वा श्रु॒धि ब्रह्म॑ वावृ॒धस्वो॒त गी॒र्भिः। आ॒विः सूर्यं॑ कृणु॒हि पी॑पि॒हीषो॑ ज॒हि शत्रूँ॑र॒भि गा इ॑न्द्र तृन्धि॥

जो श्रद्धा से परमेश्वर की उपासना करके विद्यार्थियों की परीक्षा करते हैं, वे जगत् के प्रिय होते हैं॥३॥

ते त्वा॒ मदा॑ बृ॒हदि॑न्द्र स्वधाव इ॒मे पी॒ता उ॑क्षयन्त द्यु॒मन्त॑म्। म॒हामनू॑नं त॒वसं॒ विभू॑तिं मत्स॒रासो॑ जर्हृषन्त प्र॒साह॑म्॥

जिन सज्जनों का राजा सत्कार करें, वे राजाओं को भी प्रसन्न करें॥४॥

येभिः॒ सूर्य॑मु॒षसं॑ मन्दसा॒नोऽवा॑स॒योऽप॑ दृ॒ळ्हानि॒ दर्द्र॑त्। म॒हामद्रिं॒ परि॒ गा इ॑न्द्र॒ सन्तं॑ नु॒त्था अच्यु॑तं॒ सद॑सः॒ परि॒ स्वात्॥

वही राजा श्रेष्ठ होता है, जो दुष्टों को विदीर्ण करके श्रेष्ठों की सभा से सम्पूर्ण प्रजाओं का शासन करता है॥५॥

तव॒ क्रत्वा॒ तव॒ तद्दं॒सना॑भिरा॒मासु॑ प॒क्वं शच्या॒ नि दी॑धः। और्णो॒र्दुर॑ उ॒स्रिया॑भ्यो॒ वि दृ॒ळ्होदू॒र्वाद्गा अ॑सृजो॒ अङ्गि॑रस्वान्॥

जो मनुष्य विद्वानों से शिक्षा को प्राप्त होकर सब का सत्कार करते हैं, वे राज्य को प्राप्त होकर सूर्य्य के सदृश प्रकाशित होते हैं॥६॥

प॒प्राथ॒ क्षां महि॒ दंसो॒ व्यु१॒॑र्वीमुप॒ द्यामृ॒ष्वो बृ॒हदि॑न्द्र स्तभायः। अधा॑रयो॒ रोद॑सी दे॒वपु॑त्रे प्र॒त्ने मा॒तरा॑ य॒ह्वी ऋ॒तस्य॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सूर्य्य भूगोलों को धारण करके पिता के सदृश सम्पूर्ण प्रजाओं का पालन करता है, वैसे ही आप लोग यहाँ वर्त्ताव करो॥७॥

अध॑ त्वा॒ विश्वे॑ पु॒र इ॑न्द्र दे॒वा एकं॑ त॒वसं॑ दधिरे॒ भरा॑य। अदे॑वो॒ यद॒भ्यौहि॑ष्ट दे॒वान्त्स्व॑र्षाता वृणत॒ इन्द्र॒मत्र॑॥

जो मनुष्य परमात्मा ही की उपासना करते हैं, वे अत्यन्त ऐश्वर्य्य को प्राप्त होते हैं और जो विद्या से हीन होकर विद्वानों के साथ कुतर्क करता है, वह कुछ भी यहाँ नहीं पाता है॥८॥

अध॒ द्यौश्चि॑त्ते॒ अप॒ सा नु वज्रा॑द्द्वि॒तान॑मद्भि॒यसा॒ स्वस्य॑ म॒न्योः। अहिं॒ यदिन्द्रो॑ अ॒भ्योह॑सानं॒ नि चि॑द्वि॒श्वायुः॑ श॒यथे॑ ज॒घान॑॥

हे मनुष्यो! आप लोग सूर्य्य और मेघ सदृश वर्त्ताव करके परस्पर पालन करो॥९॥

अध॒ त्वष्टा॑ ते म॒ह उ॑ग्र॒ वज्रं॑ स॒हस्र॑भृष्टिं ववृतच्छ॒ताश्रि॑म्। निका॑मम॒रम॑णसं॒ येन॒ नव॑न्त॒महिं॒ सं पि॑णगृजीषिन्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे वीरपुरुषो! जैसे धनुर्वेद के जाननेवाले वीरपुरुष शस्त्रों को धारण करें, वैसे आप लोग भी धारण करो॥१०॥

वर्धा॒न्यं विश्वे॑ म॒रुतः॑ स॒जोषाः॒ पच॑च्छ॒तं म॑हि॒षाँ इ॑न्द्र॒ तुभ्य॑म्। पू॒षा विष्णु॒स्त्रीणि॒ सरां॑सि धावन्वृत्र॒हणं॑ मदि॒रमं॒शुम॑स्मै॥

जैसे प्रजाजन राजा और राज्य को बढ़ावें, वैसे राजा इनकी निरन्तर वृद्धि करे॥११॥

आ क्षोदो॒ महि॑ वृ॒तं न॒दीनां॒ परि॑ष्ठितमसृज ऊ॒र्मिम॒पाम्। तासा॒मनु॑ प्र॒वत॑ इन्द्र॒ पन्थां॒ प्रार्द॑यो॒ नीची॑र॒पसः॑ समु॒द्रम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा आदि जन सूर्य्य के सदृश वर्त्तमान हैं, वे प्रजापालन और शत्रु के निवारण करने को समर्थ होते हैं॥१२॥

ए॒वा ता विश्वा॑ चकृ॒वांस॒मिन्द्रं॑ म॒हामु॒ग्रम॑जु॒र्यं स॑हो॒दाम्। सु॒वीरं॑ त्वा स्वायु॒धं सु॒वज्र॒मा ब्रह्म॒ नव्य॒मव॑से ववृत्यात्॥

पिता के सदृश प्रजाओं के पालन, धनुर्वेद, राजनीति और युद्धविद्या में कुशल राजा की सब लोग वृद्धि करें और इन लोगों की यह राजा निरन्तर वृद्धि करे॥१३॥

स नो॒ वाजा॑य॒ श्रव॑स इ॒षे च॑ रा॒ये धे॑हि द्यु॒मत॑ इन्द्र॒ विप्रा॑न्। भ॒रद्वा॑जे नृ॒वत॑ इन्द्र सू॒रीन्दि॒वि च॑ स्मैधि॒ पार्ये॑ न इन्द्र॥

राजाओं को योग्य है कि सम्पूर्ण अधिकारों में सम्पूर्ण विद्याओं में चतुर, धार्म्मिक, कुलीन और राजभक्तों को संस्थापित करके सब प्रकार से राज्य की उन्नति करें॥१४॥

अ॒या वाजं॑ दे॒वहि॑तं सनेम॒ मदे॑म श॒तहि॑माः सु॒वीराः॑॥

राजा को चाहिये कि विद्वानों का सङ्ग और विनय से राज्यपालन के लिये उत्तम वीर जनों को अधिकृत करें॥१५॥इस सूक्त में अग्नि, विद्वान्, राजा, मन्त्री और प्रजा के कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सत्रहवाँ सूक्त और तीसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

तमु॑ ष्टुहि॒ यो अ॒भिभू॑त्योजा व॒न्वन्नवा॑तः पुरुहू॒त इन्द्रः॑। अषा॑ळ्हमु॒ग्रं सह॑मानमा॒भिर्गी॒र्भिर्व॑र्ध वृष॒भं च॑र्षणी॒नाम्॥

हे राजन्! आप सदा स्तुति करने योग्य की स्तुति करिये, निन्दा करने योग्य की निन्दा करिये तथा सत्कार करने योग्य का सत्कार करिये और दण्ड देने योग्य को दण्ड दीजिये॥१॥

स यु॒ध्मः सत्वा॑ खज॒कृत्स॒मद्वा॑ तुविम्र॒क्षो न॑दनु॒माँ ऋ॑जी॒षी। बृ॒हद्रे॑णु॒श्च्यव॑नो॒ मानु॑षीणा॒मेकः॑ कृष्टी॒नाम॑भवत्स॒हावा॑॥

राजा को चाहिये कि राजकर्म्मचारी को उत्तम प्रकार परीक्षा करके राज्य व्यवहार में नियुक्त करे, जिससे प्रजा के सुख की वृद्धि हो॥२॥

त्वं ह॒ नु त्यद॑दमयो॒ दस्यूँ॒रेकः॑ कृ॒ष्टीर॑वनो॒रार्या॑य। अस्ति॑ स्वि॒न्नु वी॒र्यं१॒॑ तत्त॑ इन्द्र॒ न स्वि॑दस्ति॒ तदृ॑तु॒था वि वो॑चः॥

राजाओं का यह मुख्य कर्म्म है कि सम्पूर्ण दुष्ट चोरों का निवारण करके प्रजाओं का पालन करें॥३॥

सदिद्धि ते॑ तुविजा॒तस्य॒ मन्ये॒ सहः॑ सहिष्ठ तुर॒तस्तु॒रस्य॑। उ॒ग्रमु॒ग्रस्य॑ त॒वस॒स्तवी॒योऽर॑ध्रस्य रध्र॒तुरो॑ बभूव॥

सब मनुष्यों को चाहिये कि जिसमें जैसे गुण, कर्म्म और स्वभाव होवें, वैसे ही मानें॥४॥

तन्नः॑ प्र॒त्नं स॒ख्यम॑स्तु यु॒ष्मे इ॒त्था वद॑द्भिर्व॒लमङ्गि॑रोभिः। हन्न॑च्युतच्युद्दस्मे॒षय॑न्तमृ॒णोः पुरो॒ वि दुरो॑ अस्य॒ विश्वाः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि यथाशक्ति उत्तमों के साथ मित्रता ही करें, वह कभी नष्ट न होवे, ऐसा प्रयत्न करें और जैसे सूर्य्य सब को प्रकाशित करता है, वैसे राजा न्याय से सम्पूर्ण राज्य को प्रकाशित करे॥५॥

स हि धी॒भिर्हव्यो॒ अस्त्यु॒ग्र ई॑शान॒कृन्म॑ह॒ति वृ॑त्र॒तूर्ये॑। स तो॒कसा॑ता॒ तन॑ये॒ स व॒ज्री वि॑तन्त॒साय्यो॑ अभवत्स॒मत्सु॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजा को चाहिये कि सब कर्म्मचारियों को योग्य सिद्ध करे, जिससे सर्वदा विजय होवे॥६॥

स म॒ज्मना॒ जनि॑म॒ मानु॑षाणा॒मम॑र्त्येन॒ नाम्नाति॒ प्र स॑र्स्रे। स द्यु॒म्नेन॒ स शव॑सो॒त रा॒या स वी॒र्ये॑ण॒ नृत॑मः॒ समो॑काः॥

राजा को चाहिये कि जैसे प्रजा और राजा के जन प्रसिद्धि, बल, धन, यश और पराक्रम को प्राप्त होवें, वैसे प्रयत्न करें॥७॥

स यो न मु॒हे न मिथू॒ जनो॒ भूत्सु॒मन्तु॑नामा॒ चुमु॑रिं॒ धुनिं॑ च। वृ॒णक्पिप्रुं॒ शम्ब॑रं॒ शुष्ण॒मिन्द्रः॑ पु॒रां च्यौ॒त्नाय॑ श॒यथा॑य॒ नू चि॑त्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य मेघ का निर्म्माण करके और वर्षाय के [=बरसा कर] बद्ध नहीं होता है, वैसे ही मनुष्य धर्म्मयुक्त कार्य्यों को करके सज्जनों के साथ वर्त्ताव करके मोहित नहीं होते, किन्तु सुखी होते हैं॥८॥

उ॒दाव॑ता॒ त्वक्ष॑सा॒ पन्य॑सा च वृत्र॒हत्या॑य॒ रथ॑मिन्द्र तिष्ठ। धि॒ष्व वज्रं॒ हस्त॒ आ द॑क्षिण॒त्राभि प्र म॑न्द पुरुदत्र मा॒याः॥

जो उत्कृष्टता से सम्पूर्ण विषयों को जाननेवाली बुद्धियों को प्राप्त होकर शस्त्र और अस्त्रों को धारण करके युद्ध के लिये जाते हैं, वे विजय को प्राप्त होते हैं॥९॥

अ॒ग्निर्न शुष्कं॒ वन॑मिन्द्र हे॒ती रक्षो॒ नि ध॑क्ष्य॒शनि॒र्न भी॒मा। ग॒म्भी॒रय॑ ऋ॒ष्वया॒ यो रु॒रोजाध्वा॑नयद्दुरि॒ता द॒म्भय॑च्च॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजा आदि जनो! जैसे अग्नि ज्वाला से सूखे और गीले भी वन को जलाता है, वैसे उत्तम प्रकार शिक्षित तथा बड़ी सेना से शत्रुओं को भय करिये और शत्रुओं को जलाइये॥१०॥

आ स॒हस्रं॑ प॒थिभि॑रिन्द्र रा॒या तुवि॑द्युम्न तुवि॒वाजे॑भिर॒र्वाक्। या॒हि सू॑नो सहसो॒ यस्य॒ नू चि॒ददे॑व॒ ईशे॑ पुरुहूत॒ योतोः॑॥

हे राजन्! आप विद्या और विनय के मार्ग से प्रजाओं का पिता के सदृश पालन करके यशस्वी होकर सत्य और असत्य का यथावत् निर्णय करिये॥११॥

प्र तु॑विद्यु॒म्नस्य॒ स्थवि॑रस्य॒ घृष्वे॑र्दि॒वो र॑रप्शे महि॒मा पृ॑थि॒व्याः। नास्य॒ शत्रु॒र्न प्र॑ति॒मान॑मस्ति॒ न प्र॑ति॒ष्ठिः पु॑रुमा॒यस्य॒ सह्योः॑॥

जो विद्या में वृद्ध, अमित प्रशंसा और महिमावाले, सत्य की कामना करते हुए, बहुत बुद्धिमान् और शम, दम आदि गुणों से युक्त होवें, उनका कोई भी न शत्रु, न बराबर और न उनसे अधिक प्रतिष्ठित होता है॥१२॥

प्र तत्ते॑ अ॒द्या कर॑णं कृ॒तं भू॒त्कुत्सं॒ यदा॒युम॑तिथि॒ग्वम॑स्मै। पु॒रू स॒हस्रा॒ नि शि॑शा अ॒भि क्षामुत्तूर्व॑याणं धृष॒ता नि॑नेथ॥

जहाँ राजा आदि जन अधिक अवस्थावाले अतिथि जनों के सेवक, पक्षपात का त्याग करके प्रजा के पालक हैं, वहाँ सम्पूर्ण कार्य्य सिद्ध होते हैं॥१३॥

अनु॒ त्वाहि॑घ्ने॒ अध॑ देव दे॒वा मद॒न्विश्वे॑ क॒वित॑मं कवी॒नाम्। करो॒ यत्र॒ वरि॑वो बाधि॒ताय॑ दि॒वे जना॑य त॒न्वे॑ गृणा॒नः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य उत्तम, यथार्थवक्ता, विद्वानों का उत्तम प्रकार सेवन कर विद्याओं को प्राप्त होकर अन्यों को जानते हैं, वे प्रसन्न होते हैं॥१४॥

अनु॒ द्यावा॑पृथि॒वी तत्त॒ ओजोऽम॑र्त्या जिहत इन्द्र दे॒वाः। कृ॒ष्वा कृ॑त्नो॒ अकृ॑तं॒ यत्ते॒ अस्त्यु॒क्थं नवी॑यो जनयस्व य॒ज्ञैः॥

हे मनुष्यो! आप लोग भूमि और बिजुली आदि की विद्या से नवीन-नवीन कार्य को सिद्ध करिये॥१५॥इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान् और राजा के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह अठारहवाँ सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ॥

म॒हाँ इन्द्रो॑ नृ॒वदा च॑र्षणि॒प्रा उ॒त द्वि॒बर्हा॑ अमि॒नः सहो॑भिः। अ॒स्म॒द्र्य॑ग्वावृधे वी॒र्या॑यो॒रुः पृ॒थुः सुकृ॑तः क॒र्तृभि॑र्भूत्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे मित्र-मित्र के साथ कार्य की सिद्धि के निमित्त प्रयत्न करता है, वैसे ही ईश्वर से निर्मित बिजुली वा सूर्य सम्पूर्ण कर्मकारियों का सहयोगी होता है॥१॥

इन्द्र॑मे॒व धि॒षणा॑ सा॒तये॑ धाद्बृ॒हन्त॑मृ॒ष्वम॒जरं॒ युवा॑नम्। अषा॑ळ्हेन॒ शव॑सा शूशु॒वांसं॑ स॒द्यश्चि॒द्यो वा॑वृ॒धे असा॑मि॥

जैसे बड़े मित्र को प्राप्त होकर मनुष्य वृद्धि को प्राप्त होते हैं, वैसे ही बिजुली की विद्या को प्राप्त होकर अतुल वृद्धि को प्राप्त होते हैं॥२॥

पृ॒थू क॒रस्ना॑ बहु॒ला गभ॑स्ती अस्म॒द्र्य१॒॑क्सं मि॑मीहि॒ श्रवां॑सि। यू॒थेव॑ प॒श्वः प॑शु॒पा दमू॑ना अ॒स्माँ इ॑न्द्रा॒भ्या व॑वृत्स्वा॒जौ॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। वे ही लक्ष्मीवान् होते हैं, जो आलस्य का त्याग करके सदा सत्कर्म के लिये प्रयत्न करते हैं और जैसे पशुओं के पालनेवाले पशुओं का पालन करके समृद्ध अर्थात् धनवान् होते हैं, वैसे ही पुरुषार्थी जन दारिद्र्य का विनाश करके धन के स्वामी होते हैं॥३॥

तं व॒ इन्द्रं॑ च॒तिन॑मस्य शा॒कैरि॒ह नू॒नं वा॑ज॒यन्तो॑ हुवेम। यथा॑ चि॒त्पूर्वे॑ जरि॒तार॑ आ॒सुरने॑द्या अनव॒द्या अरि॑ष्टाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे प्रशंसा करने योग्य यथार्थवक्ता पुरुष धर्मयुक्त कर्मों में वर्ताव करके कृतकृत्य होते हैं, वैसे ही वर्ताव करके सब मनुष्य कृतकार्य होवें॥४॥

धृ॒तव्र॑तो धन॒दाः सोम॑वृद्धः॒ स हि वा॒मस्य॒ वसु॑नः पुरु॒क्षुः। सं ज॑ग्मिरे प॒थ्या॒३॒॑ रायो॑ अस्मिन्त्समु॒द्रे न सिन्ध॑वो॒ याद॑मानाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे नदियाँ वेग से समुद्र को प्राप्त होकर स्थिर होती हैं, वैसे ही धार्मिक तथा उद्योगी पुरुष की लक्ष्मी सेवा करती है॥५॥

शवि॑ष्ठं न॒ आ भ॑र शूर॒ शव॒ ओजि॑ष्ठ॒मोजो॑ अभिभूत उ॒ग्रम्। विश्वा॑ द्यु॒म्ना वृष्ण्या॒ मानु॑षाणाम॒स्मभ्यं॑ दा हरिवो माद॒यध्यै॑॥

हे राजन्! आप राज्य के पालने योग्य गुणों को धारण करके न्याय से राज्य का पालन करिये॥६॥

यस्ते॒ मदः॑ पृतना॒षाळमृ॑ध्र॒ इन्द्र॒ तं न॒ आ भ॑र शूशु॒वांस॑म्। येन॑ तो॒कस्य॒ तन॑यस्य सा॒तौ मं॑सी॒महि॑ जिगी॒वांस॒स्त्वोताः॑॥

हे प्रजाजनो! आप लोग राजा के प्रति यह कहो कि हम लोगों के सन्तान जिस प्रकार उत्तम शिक्षित हों, वैसे नियमों को करिये जिससे विजय और आनन्द बढ़े॥७॥

आ नो॑ भर॒ वृष॑णं॒ शुष्म॑मिन्द्र धन॒स्पृतं॑ शूशु॒वासं॑ सु॒दक्ष॑म्। येन॒ वंसा॑म॒ पृत॑नासु॒ शत्रू॒न्तवो॒तिभि॑रु॒त जा॒मीँरजा॑मीन्॥

राजाओं को चाहिये कि ऐसा प्रयत्न करें जिससे मित्र और शत्रु पृथक्-पृथक् प्रतीत होवें और वैसी ही सेना रखनी चाहिये जिससे शत्रु नष्ट होवें॥८॥

आ ते॒ शुष्मो॑ वृष॒भ ए॑तु प॒श्चादोत्त॒राद॑ध॒रादा पु॒रस्ता॑त्। आ वि॒श्वतो॑ अ॒भि समे॑त्व॒र्वाङिन्द्र॑ द्यु॒म्नं स्व॑र्वद्धेह्य॒स्मे॥

हे राजा और प्रजाजनो! जैसे सब दिशाओं से सम्पूर्ण जनों को सुख और यश प्राप्त होवें, वैसे यत्न का अनुष्ठान करिये॥९॥

नृ॒वत्त॑ इन्द्र॒ नृत॑माभिरू॒ती वं॑सी॒महि॑ वा॒मं श्रोम॑तेभिः। ईक्षे॒ हि वस्व॑ उ॒भय॑स्य राज॒न्धा रत्नं॒ महि॑ स्थू॒रं बृ॒हन्त॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजजनों तथा प्रजाजनों और राजा को चाहिये कि प्रशस्तों से प्रशंसित विद्या और बहुत धन की निरन्तर वृद्धि करें॥१०॥

म॒रुत्व॑न्तं वृष॒भं वा॑वृधा॒नमक॑वारिं दि॒व्यं शा॒समिन्द्र॑म्। वि॒श्वा॒साह॒मव॑से॒ नूत॑नायो॒ग्रं स॑हो॒दामि॒ह तं हु॑वेम॥

राजजनों और प्रजाजनों को चाहिये कि सब के रक्षण के लिये सब से उत्तम गुण, कर्म और स्वभाववाले राजा को स्वीकार करें और वह राजा सब की सम्मति से सत्य, न्याय का निरन्तर आचरण करे॥११॥

जनं॑ वज्रि॒न्महि॑ चि॒न्मन्य॑मानमे॒भ्यो नृभ्यो॑ रन्धया॒ येष्वस्मि॑। अधा॒ हि त्वा॑ पृथि॒व्यां शूर॑सातौ॒ हवा॑महे॒ तन॑ये॒ गोष्व॒प्सु॥

हे राजसम्बन्धी जनो! जो मिथ्या अभिमान करनेवाला जन श्रेष्ठ पुरुषों को पीड़ा देवे, उसको दण्ड दीजिये और युद्धविद्या से सम्पूर्ण जनों का रक्षण करिये, जिससे भूमि में आप लोगों की प्रशंसा प्रसिद्ध होवे॥१२॥

व॒यं त॑ ए॒भिः पु॑रुहूत स॒ख्यैः शत्रोः॑शत्रो॒रुत्त॑र॒ इत्स्या॑म। घ्नन्तो॑ वृ॒त्राण्यु॒भया॑नि शूर रा॒या म॑देम बृह॒ता त्वोताः॑॥

जो राजा और राजप्रजाजन मित्र के सदृश होवें तो सम्पूर्ण शत्रुओं को जीत कर बड़ी राज्यलक्ष्मी से प्रकाशित होवें॥१३॥इस सूक्त में इन्द्र, राजा और प्रजाजनों के कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह उन्नीसवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

द्यौर्न य इ॑न्द्रा॒भि भूमा॒र्यस्त॒स्थौ र॒यिः शव॑सा पृ॒त्सु जना॑न्। तं नः॑ स॒हस्र॑भरमुर्वरा॒सां द॒द्धि सू॑नो सहसो वृत्र॒तुर॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य बिजुली के सदृश पराक्रमी और सूर्य के सदृश प्रतापयुक्त हुए सङ्ग्रामों में साहसिक होवें, वे विजयवान् होवें॥१॥

दि॒वो न तुभ्य॒मन्वि॑न्द्र स॒त्रासु॒र्यं॑ दे॒वेभि॑र्धायि॒ विश्व॑म्। अहिं॒ यद्वृ॒त्रम॒पो व॑व्रि॒वांसं॒ हन्नृ॑जीषि॒न्विष्णु॑ना सचा॒नः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सूर्य आठ महीने में जल के रसों को आकर्षण के द्वारा हरण करके चातुर्मास्य में वर्षाता है, वैसे ही राजा आठ महीने करों को ग्रहण कर अभय की वृष्टि करके प्रजा का पालन करे॥२॥

तूर्व॒न्नोजी॑यान्त॒वस॒स्तवी॑यान्कृ॒तब्र॒ह्मेन्द्रो॑ वृ॒द्धम॑हाः। राजा॑भव॒न्मधु॑नः सो॒म्यस्य॒ विश्वा॑सां॒ यत्पु॒रां द॒र्त्नुमाव॑त्॥

हे मनुष्यो! जो पराक्रमी, बली जनों में बली, विद्वानों में विद्वान्, वृद्ध जनों में वृद्ध और जीतते हुए भृत्यों का सत्कार करनेवाला होवे, उसी का राज्य में अभिषिक्त करके सुखी हूजिये॥३॥

श॒तैर॑पद्रन्प॒णय॑ इ॒न्द्रात्र॒ दशो॑णये क॒वये॒ऽर्कसा॑तौ। व॒धैः शुष्ण॑स्या॒शुष॑स्य मा॒याः पि॒त्वो नारि॑रेची॒त्किं च॒न प्र॥

हे मनुष्यो! जो धर्ममार्ग का त्याग करके उन्मार्ग में चलते हैं, उनको राजा नित्य दण्ड देवे और दो दश इन्द्रियों से अधर्म का त्याग करके धर्म का आचरण करते हैं, उन का निरन्तर सत्कार करे॥४॥

म॒हो द्रु॒हो अप॑ वि॒श्वायु॑ धायि॒ वज्र॑स्य॒ यत्पत॑ने॒ पादि॒ शुष्णः॑। उ॒रु ष स॒रथं॒ सार॑थये क॒रिन्द्रः॒ कुत्सा॑य॒ सूर्य॑स्य सा॒तौ॥

राजा को चाहिये कि द्रोह आदि दोषों का त्याग करके ब्रह्मचर्य आदि से सम्पूर्ण जनों को अधिक अवस्थावाले करके, रथ आदि सेना के अङ्गों को सूर्य के तुल्य प्रकाशित करके, सत्य और असत्य के विभाग से प्रजाओं का पालन करे॥५॥

प्र श्ये॒नो न म॑दि॒रमं॒शुम॑स्मै॒ शिरो॑ दा॒सस्य॒ नमु॑चेर्मथा॒यन्। प्राव॒न्नमीं॑ सा॒प्यं स॒सन्तं॑ पृ॒णग्रा॒या समि॒षा सं स्व॒स्ति॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजाओं का यह उचित कर्म है कि जो मादक द्रव्य का सेवन करें उनको अत्यन्त दण्ड देके, यथायोग्य सत्कार से अप्रमादियों का सत्कार करें, वे साम्राज्य करने को योग्य होवें॥६॥

वि पिप्रो॒रहि॑मायस्य दृ॒ळ्हाः पुरो॑ वज्रि॒ञ्छव॑सा॒ न द॑र्दः। सुदा॑म॒न्तद्रेक्णो॑ अप्रमृ॒ष्यमृ॒जिश्व॑ने दा॒त्रं दा॒शुषे॑ दाः॥

राजा को चाहिये कि छल आदि का त्याग कर और अपने नगरों को दृढ़ करके कभी छेदन न करे और सुपात्र के लिये दान दे और कुपात्र का तिरस्कार करे॥७॥

स वे॑त॒सुं दश॑मायं॒ दशो॑णिं॒ तूतु॑जि॒मिन्द्रः॑ स्वभि॒ष्टिसु॑म्नः। आ तुग्रं॒ शश्व॒दिभं॒ द्योत॑नाय मा॒तुर्न सी॒मुप॑ सृजा इ॒यध्यै॑॥

वही राजा धनवान् होवे कि जो दश इन्द्रियों से उत्तम कर्म और विज्ञान को बढ़ा के अभीष्ट सुख की निरन्तर उन्नति करे और माता के सदृश प्रजाओं का पालन करे॥८॥

स ईं॒ स्पृधो॑ वनते॒ अप्र॑तीतो॒ बिभ्र॒द्वज्रं॑ वृत्र॒हणं॒ गभ॑स्तौ। तिष्ठ॒द्धरी॒ अध्यस्ते॑व॒ गर्ते॑ वचो॒युजा॑ वहत॒ इन्द्र॑मृ॒ष्वम्॥

राजा सदा ही अपने विचार को छिपावे, जब कार्य सिद्ध होवे तभी लोग प्रकट जानें और शस्त्रों को धारण कर सेनाओं को उत्तम प्रकार शिक्षा देकर बड़े ऐश्वर्य को प्राप्त होवे॥९॥

स॒नेम॒ तेऽव॑सा॒ नव्य॑ इन्द्र॒ प्र पू॒रवः॑ स्तवन्त ए॒ना य॒ज्ञैः। स॒प्त यत्पुरः॒ शर्म॒ शार॑दी॒र्दर्द्धन्दासीः॑ पुरु॒कुत्सा॑य॒ शिक्ष॑न्॥

हे मनुष्यो! जैसे राजा विनय से वर्त्तमान है, वैसे ही सब वर्त्तमान होवें और पुरुषार्थ से सुन्दर पुरों का निर्माण करके उन सब ऋतुओं में सुख देनेवालों में निवास करते हुए दुःखों को दूर फेंकें॥१०॥

त्वं वृ॒ध इ॑न्द्र पू॒र्व्यो भू॑र्वरिव॒स्यन्नु॒शने॑ का॒व्याय॑। परा॒ नव॑वास्त्वमनु॒देयं॑ म॒हे पि॒त्रे द॑दाथ॒ स्वं नपा॑तम्॥

जो राजा सब का यथायोग्य सत्कार करता है, वह पिता के तुल्य होता है॥११॥

त्वं धुनि॑रिन्द्र॒ धुनि॑मतीर्ऋ॒णोर॒पः सी॒रा न स्रव॑न्तीः। प्र यत्स॑मु॒द्रमति॑ शूर॒ पर्षि॑ पा॒रया॑ तु॒र्वशं॒ यदुं॑ स्व॒स्ति॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजन्! आप मङ्गल और सुख के देनेवाले शब्दों से युक्त और आनन्दित प्रजाओं को करें, जैसे नदियाँ समुद्र को प्राप्त होकर स्थिर होती हैं, वैसे प्रजायें आपको प्राप्त होकर निश्चल होवें, ऐसा करिये॥१२॥

तव॑ ह॒ त्यदि॑न्द्र॒ विश्व॑मा॒जौ स॒स्तो धुनी॒चुमु॑री॒ या ह॒ सिष्व॑प्। दी॒दय॒दित्तुभ्यं॒ सोमे॑भिः सु॒न्वन्द॒भीति॑रि॒ध्मभृ॑तिः प॒क्थ्य१॒॑र्कैः॥

हे राजन्! आप बहुत बोलनेवाले, भोक्ता, वीर जनों का सत्कार करके सेनाओं को प्रबल करिये॥१३॥इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान्, राजा और प्रजा के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह बीसवाँ सूक्त और दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इ॒मा उ॑ त्वा पुरु॒तम॑स्य का॒रोर्हव्यं॑ वीर॒ हव्या॑ हवन्ते। धियो॑ रथे॒ष्ठाम॒जरं॒ नवी॑यो र॒यिर्विभू॑तिरीयते वच॒स्या॥

जो पुरुष प्रशंसा करने योग्य बुद्धि को स्वीकार करके उससे वृद्धावस्था और रोग से रहित अत्यन्त लक्ष्मी और ऐश्वर्य को प्राप्त होता है, उस शिल्पीजनप्रिय राजा का सत्कार करना चाहिये॥१॥

तमु॑ स्तुष॒ इन्द्रं॒ यो विदा॑नो॒ गिर्वा॑हसं गी॒र्भिर्य॒ज्ञवृ॑द्धम्। यस्य॒ दिव॒मति॑ म॒ह्ना पृ॑थि॒व्याः पु॑रुमा॒यस्य॑ रिरि॒चे म॑हि॒त्वम्॥

जो मनुष्य अत्यन्त ऐश्वर्य के बढ़ानेवाले सूर्यके सदृश प्रकाशमान राजा को सत्य का उपदेश करें, वे महिमा को प्राप्त होकर दुःख से अतिरिक्त होते हैं॥२॥

स इत्तमो॑ऽवयु॒नं त॑त॒न्वत्सूर्ये॑ण व॒युन॑वच्चकार। क॒दा ते॒ मर्ता॑ अ॒मृत॑स्य॒ धामेय॑क्षन्तो॒ न मि॑नन्ति स्वधावः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य अहिंसा धर्म को स्वीकार कर और विज्ञान बढ़ाय के परमेश्वर की प्राप्ति की चिकीर्षा करते हैं, वे विस्तीर्ण सुख को प्राप्त होते हैं॥३॥

यस्ता च॒कार॒ स कुह॑ स्वि॒दिन्द्रः॒ कमा जनं॑ चरति॒ कासु॑ वि॒क्षु। कस्ते॑ य॒ज्ञो मन॑से॒ शं वरा॑य॒ को अ॒र्क इ॑न्द्र कत॒मः स होता॑॥

हे विद्वान्! उन बुद्धि की वृद्धियों को कौन कर सके, उपकार के लिये बुद्धियों में कौन चलता है, कौन आदर करने योग्य और कौन दाता होता है, इन प्रश्नों के समाधानों को कहिये॥४॥

इ॒दा हि ते॒ वेवि॑षतः पुरा॒जाः प्र॒त्नास॑ आ॒सुः पु॑रुकृ॒त्सखा॑यः। ये म॑ध्य॒मास॑ उ॒त नूत॑नास उ॒ताव॒मस्य॑ पुरुहूत बोधि॥

हे मनुष्यो! जो आप लोगों के साथ मैत्री का आचरण करते हैं, वे वृद्ध, वृद्धतर तथा मध्यम और भी तुल्य अवस्थावाले होवें, उन में मित्रता की निश्चय रक्षा करिये, ऐसा होने पर निश्चित राज्य की वृद्धि होती है, यह ही पूर्वमन्त्र में कहे हुए प्रश्नों का उत्तर है॥५॥

तं पृ॒च्छन्तोऽव॑रासः॒ परा॑णि प्र॒त्ना त॑ इन्द्र॒ श्रुत्यानु॑ येमुः। अर्चा॑मसि वीर ब्रह्मवाहो॒ यादे॒व वि॒द्म तात्त्वा॑ म॒हान्त॑म्॥

हे मनुष्यो! आप लोगों को मित्रतापूर्वक मेल कर तथा पूर्व और पर विज्ञानों को प्राप्त होकर अत्यन्त सुख को प्राप्त होना चाहिये॥६॥

अ॒भि त्वा॒ पाजो॑ र॒क्षसो॒ वि त॑स्थे॒ महि॑ जज्ञा॒नम॒भि तत्सु ति॑ष्ठ। तव॑ प्र॒त्नेन॒ युज्ये॑न॒ सख्या॒ वज्रे॑ण धृष्णो॒ अप॒ ता नु॑दस्व॥

हे राजजन! जो राजपुरुष दुष्टों के लिये दण्ड देते और श्रेष्ठों को पालन करते हैं, उनका आप सत्कार करिये॥७॥

स तु श्रु॑धीन्द्र॒ नूत॑नस्य ब्रह्मण्य॒तो वी॑र कारुधायः। त्वं ह्या॒३॒॑पिः प्र॒दिवि॑ पितॄ॒णां शश्व॑द्ब॒भूथ॑ सु॒हव॒ एष्टौ॑॥

वही उत्तम विद्वान् है, जो ज्ञानवृद्ध जनों से विद्यासम्बन्धी वचनों को सुन के उत्तम शिल्पजनों की रक्षा करके सदा अपेक्षित पदार्थ की प्राप्ति से सुखी होता है॥८॥

प्रोतये॒ वरु॑णं मि॒त्रमिन्द्रं॑ म॒रुतः॑ कृ॒ष्वाव॑से नो अ॒द्य। प्र पू॒षणं॒ विष्णु॑म॒ग्निं पुरं॑धिं सवि॒तार॒मोष॑धीः॒ पर्व॑तांश्च॥

हे विद्वान्जनो! हम लोगों के लिये जैसे पृथिवी आदि पदार्थ सुखकारक होवें, वैसे करिये॥९॥

इ॒म उ॑ त्वा पुरुशाक प्रयज्यो जरि॒तारो॑ अ॒भ्य॑र्चन्त्य॒र्कैः। श्रु॒धी हव॒मा हु॑व॒तो हु॑वा॒नो न त्वावाँ॑ अ॒न्यो अ॑मृत॒ त्वद॑स्ति॥

हे मनुष्यो! जैसे विद्वान् जन परमात्मा की स्तुति और प्रार्थना करके उपासना करते हैं, वैसे आप भी उपासना करो और उसके सदृश वा उससे अधिक कोई भी नहीं है, ऐसा जानो॥१०॥

नू म॒ आ वाच॒मुप॑ याहि वि॒द्वान्विश्वे॑भिः सूनो सहसो॒ यज॑त्रैः। ये अ॑ग्निजि॒ह्वा ऋ॑त॒साप॑ आ॒सुर्ये मनुं॑ च॒क्रुरुप॑रं॒ दसा॑य॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्य सदा ही सत्यवादी विद्वानों को उत्तम प्रकार मिलें और प्रतिज्ञा से सत्य का आचरण करें॥११॥

स नो॑ बोधि पुरए॒ता सु॒गेषू॒त दु॒र्गेषु॑ पथि॒कृद्विदा॑नः। ये अश्र॑मास उ॒रवो॒ वहि॑ष्ठा॒स्तेभि॑र्न इन्द्रा॒भि व॑क्षि॒ वाज॑म्॥

वही विद्वान् है जो सबका मङ्गलकारी, स्वयं धर्ममार्ग को प्राप्त होकर औरों को धर्ममार्ग में चलनेवाले करे, जो सदा सत्संग करता है, वही सब से उत्तम होकर विज्ञान देने को योग्य होता है॥१२॥इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान्, ईश्वर और राजा के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह इक्कीसवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

य एक॒ इद्धव्य॑श्चर्षणी॒नामिन्द्रं॒ तं गी॒र्भिर॒भ्य॑र्च आ॒भिः। यः पत्य॑ते वृष॒भो वृष्ण्या॑वान्त्स॒त्यः सत्वा॑ पुरुमा॒यः सह॑स्वान्॥

हे मनुष्यो! जो अद्वितीय, सब से उत्तम, सच्चिदानन्दस्वरूप, न्यायकारी और सब का स्वामी है, उसका त्याग करके अन्य की उपासना कभी न करो॥१॥

तमु॑ नः॒ पूर्वे॑ पि॒तरो॒ नव॑ग्वाः स॒प्त विप्रा॑सो अ॒भि वा॒जय॑न्तः। न॒क्ष॒द्दा॒भं ततु॑रिं पर्वते॒ष्ठामद्रो॑घवाचं म॒तिभिः॒ शवि॑ष्ठम्॥

हे मनुष्यो! तुम, जिसकी योगीजन योग से उपासना करते हैं, उसी का योगाभ्यास से ध्यान करो॥२॥

तमी॑मह॒ इन्द्र॑मस्य रा॒यः पु॑रु॒वीर॑स्य नृ॒वतः॑ पुरु॒क्षोः। यो अस्कृ॑धोयुर॒जरः॒ स्व॑र्वा॒न्तमा भ॑र हरिवो माद॒यध्यै॑॥

सब मनुष्य विज्ञान आदि की प्राप्ति के लिये परमात्मा से ही याचना करें॥३॥

तन्नो॒ वि वो॑चो॒ यदि॑ ते पु॒रा चि॑ज्जरि॒तार॑ आन॒शुः सु॒म्नमि॑न्द्र। कस्ते॑ भा॒गः किं वयो॑ दुध्र खिद्वः॒ पुरु॑हूत पुरूवसोऽसुर॒घ्नः॥

हे विद्वन्! आपको वह विज्ञान हम लोगों के लिये देने योग्य है, जिससे विद्वान् जन आनन्द करते हैं॥४॥

तं पृ॒च्छन्ती॒ वज्र॑हस्तं रथे॒ष्ठामिन्द्रं॒ वेपी॒ वक्व॑री॒ यस्य॒ नू गीः। तु॒वि॒ग्रा॒भं तु॑विकू॒र्मिं र॑भो॒दां गा॒तुमि॑षे॒ नक्ष॑ते॒ तुम्र॒मच्छ॑॥

कन्या को चाहिये कि सब बातों को पूँछ कर हृदयप्रिय पति को स्वीकार करे॥५॥

अ॒या ह॒ त्यं मा॒यया॑ वावृधा॒नं म॑नो॒जुवा॑ स्वतवः॒ पर्व॑तेन। अच्यु॑ता चिद्वीळि॒ता स्वो॑जो रु॒जो वि दृ॒ळ्हा धृ॑ष॒ता वि॑रप्शिन्॥

हे स्त्री पुरुषो! आप दोनों प्रेम से मिल के गृहाश्रम के कृत्यों में हर्ष से रोग निवृत्ति तथा प्रीति से मेल करके सन्तानों को उत्पन्न करो॥६॥

तं वो॑ धि॒या नव्य॑स्या॒ शवि॑ष्ठं प्र॒त्नं प्र॑त्न॒वत्प॑रितंस॒यध्यै॑। स नो॑ वक्षदनिमा॒नः सु॒वह्मेन्द्रो॒ विश्वा॒न्यति॑ दु॒र्गहा॑णि॥

हे मनुष्यो! जो परमात्मा हम सब लोगों के सम्पूर्ण दुःखों को बुद्धिदान से दूर करके अधर्माचरण से संकोचित करता है, उस परमात्मा का आत्मा से निरन्तर ध्यान करो॥७॥

आ जना॑य॒ द्रुह्व॑णे॒ पार्थि॑वानि दि॒व्यानि॑ दीपयो॒ऽन्तरि॑क्षा। तपा॑ वृषन्वि॒श्वतः॑ शो॒चिषा॒ तान्ब्र॑ह्म॒द्विषे॑ शोचय॒ क्षाम॒पश्च॑॥

हे विद्वान् जनो! आप लोग पृथिवी आदि पदार्थों को जानकर अन्यों को जनाइये और दुष्ट जनों को उपदेश से पवित्र करिये॥८॥

भुवो॒ जन॑स्य दि॒व्यस्य॒ राजा॒ पार्थि॑वस्य॒ जग॑तस्त्वेषसंदृक्। धि॒ष्व वज्रं॒ दक्षि॑ण इन्द्र॒ हस्ते॒ विश्वा॑ अजुर्य दयसे॒ वि मा॒याः॥

वही राजा उत्तम है जो न्यायशील, धार्मिक, जितेन्द्रिय होकर सम्पूर्ण जगत् का पिता के समान पालन करके सम्पूर्ण विद्याओं को अच्छे प्रकार देता है॥९॥

आ सं॒यत॑मिन्द्र णः स्व॒स्तिं श॑त्रु॒तूर्या॑य बृह॒तीममृ॑ध्राम्। यया॒ दासा॒न्यार्या॑णि वृ॒त्रा करो॑ वज्रिन्त्सु॒तुका॒ नाहु॑षाणि॥

हे राजन्! आप सत्यविद्या के दान और उपदेश से शूद्र के कुल में उत्पन्न हुओं को भी द्विज करिये और सब प्रकार से ऐश्वर्य को प्राप्त कराय तथा शत्रुओं का निवारण करके सुख की वृद्धि कीजिये॥१०॥

स नो॑ नि॒युद्भिः॑ पुरुहूत वेधो वि॒श्ववा॑राभि॒रा ग॑हि प्रयज्यो। न या अदे॑वो॒ वर॑ते॒ न दे॒व आभि॑र्याहि॒ तूय॒मा म॑द्र्य॒द्रिक्॥

जो रीति विद्वानों की है उसको अविद्वान् जन नहीं स्वीकार करते हैं, इससे विद्वानों और अविद्वानों का पृथक् प्रस्थान है, यह जानना चाहिये॥११॥इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान्, ईश्वर, राजा और प्रजा के धर्म का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह बाईसवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सु॒त इत्त्वं निमि॑श्ल इन्द्र॒ सोमे॒ स्तोमे॒ ब्रह्म॑णि श॒स्यमा॑न उ॒क्थे। यद्वा॑ यु॒क्ताभ्यां॑ मघव॒न्हरि॑भ्यां॒ बिभ्र॒द्वज्रं॑ बा॒ह्वोरि॑न्द्र॒ यासि॑॥

जो राजा नहीं प्रमाद करते, पिता के सदृश प्रजाओं का पालन करते और शस्त्रों को धारण करते हुए तथा दुष्टों का निवारण करते हुए हैं, उनका राज्य स्थिर होता है॥१॥

यद्वा॑ दि॒वि पार्ये॒ सुष्वि॑मिन्द्र वृत्र॒हत्येऽव॑सि॒ शूर॑सातौ। यद्वा॒ दक्ष॑स्य बि॒भ्युषो॒ अबि॑भ्य॒दर॑न्धयः॒ शर्ध॑त इन्द्र॒ दस्यू॑न्॥

वही राजा होने को योग्य होवे कि जो युद्ध में अपनी सेना की रक्षा करे और शत्रु तथा चोरों का नाश करे॥२॥

पाता॑ सु॒तमिन्द्रो॑ अस्तु॒ सोमं॑ प्रणे॒नीरु॒ग्रो ज॑रि॒तार॑मू॒ती। कर्ता॑ वी॒राय॒ सुष्व॑य उ लो॒कं दाता॒ वसु॑ स्तुव॒ते की॒रये॑ चित्॥

हे मनुष्यो! उसी को राजा मानो, जो सम्पूर्ण शास्त्रों का जाननेवाला, पुरुषार्थी, धार्मिक और इन्द्रियों को वश में रखनेवाला होवे॥३॥

गन्तेया॑न्ति॒ सव॑ना॒ हरि॑भ्यां ब॒भ्रिर्वज्रं॑ प॒पिः सोमं॑ द॒दिर्गाः। कर्ता॑ वी॒रं नर्यं॒ सर्व॑वीरं॒ श्रोता॒ हवं॑ गृण॒तः स्तोम॑वाहाः॥

हे मनुष्यो! जो सम्पूर्ण राजकर्मों में निपुण हो, उसको राजा करके न्याय से राज्य का पालन करो॥४॥

अस्मै॑ व॒यं यद्वा॒वान॒ तद्वि॑विष्म॒ इन्द्रा॑य॒ यो नः॑ प्र॒दिवो॒ अप॒स्कः। सु॒ते सोमे॑ स्तु॒मसि॒ शंस॑दु॒क्थेन्द्रा॑य॒ ब्रह्म॒ वर्ध॑नं॒ यथास॑त्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो धन के सदृश सब के बढ़ानेवाले हैं, वे अत्यन्त ऐश्वर्य को प्राप्त होकर प्रयत्न करते हैं॥५॥

ब्रह्मा॑णि॒ हि च॑कृ॒षे वर्ध॑नानि॒ ताव॑त्त इन्द्र म॒तिभि॑र्विविष्मः। सु॒ते सोमे॑ सुतपाः॒ शंत॑मानि॒ रान्द्र्या॑ क्रियास्म॒ वक्ष॑णानि य॒ज्ञैः॥

मनुष्यों को चाहिये कि उत्तम आचरण को देख के वैसा ही आचरण करें और सब मिल के ऐश्वर्य को प्राप्त होकर न्याय से प्रजा की रक्षा करें॥६॥

स नो॑ बोधि पुरो॒ळाशं॒ ररा॑णः॒ पिबा॒ तु सोमं॒ गोऋ॑जीकमिन्द्र। एदं ब॒र्हिर्यज॑मानस्य सीदो॒रुं कृ॑धि त्वाय॒त उ॑ लो॒कम्॥

जो लोग रोग के हरनेवाले भोजनों और जलपानादि को देते हैं और परोपकार करते हैं, वे प्रशंसा करने योग्य हैं॥७॥

स म॑न्दस्वा॒ ह्यनु॒ जोष॑मुग्र॒ प्र त्वा॑ य॒ज्ञास॑ इ॒मे अ॑श्नुवन्तु। प्रेमे हवा॑सः पुरुहू॒तम॒स्मे आ त्वे॒यं धीरव॑स इन्द्र यम्याः॥

हे मनुष्यो! जिन कर्मों और जिस बुद्धि से विज्ञान और आनन्द बढ़ते हैं, उनकी आप लोग वृद्धि करिये॥८॥

तं वः॑ सखायः॒ सं यथा॑ सु॒तेषु॒ सोमे॑भिरीं पृणता भो॒जमिन्द्र॑म्। कु॒वित्तस्मा॒ अस॑ति नो॒ भरा॑य॒ न सुष्वि॒मिन्द्रोऽव॑से मृधाति॥

जो मनुष्य राग और द्वेष का त्याग करके परस्पर रक्षण करते हैं, वे सुख को प्राप्त होते हैं॥९॥

ए॒वेदिन्द्रः॑ सु॒ते अ॑स्तावि॒ सोमे॑ भ॒रद्वा॑जेषु॒ क्षय॒दिन्म॒घोनः॑। अस॒द्यथा॑ जरि॒त्र उ॒त सू॒रिरिन्द्रो॑ रा॒यो वि॒श्ववा॑रस्य दा॒ता॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य इस संसार में धर्मयुक्त कर्म्म करते हैं, वे सर्वदा स्तुति किये जाते हैं, जैसा देना प्रियकारक होता है, वैसा लेना नहीं प्रियकारक होता है॥१०॥इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान्, राजा और प्रजा के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह ऋग्वेदभाष्य के छठे मण्डल में दूसरा अनुवाक, तेईसवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

वृषा॒ मद॒ इन्द्रे॒ श्लोक॑ उ॒क्था सचा॒ सोमे॑षु सुत॒पा ऋ॑जी॒षी। अ॒र्च॒त्र्यो॑ म॒घवा॒ नृभ्य॑ उ॒क्थैर्द्यु॒क्षो राजा॑ गि॒रामक्षि॑तोतिः॥

हे मनुष्यो! जो उत्तम कामों को करके सत्यवादी, इन्द्रियों को जीतनेवाला, पिता के समान प्रजापालक वर्त्तमान हो, वही सर्वत्र प्रकाशित कीर्त्तिवाला हो॥१॥

ततु॑रिर्वी॒रो नर्यो॒ विचे॑ताः॒ श्रोता॒ हवं॑ गृण॒त उ॒र्व्यू॑तिः। वसुः॒ शंसो॑ न॒रां का॒रुधा॑या वा॒जी स्तु॒तो वि॒दथे॑ दाति॒ वाज॑म्॥

हे मनुष्यो! तुम लोग जो मनुष्यों में उत्तम, अधिक बल और बुद्धि युक्त, यथार्थ का सुननेवाला तथा संग्राम में युद्धविद्या का देनेवाला है, उस ही का सदा सत्कार करो॥२॥

अक्षो॒ न च॒क्र्योः॑ शूर बृ॒हन्प्र ते॑ म॒ह्ना रि॑रिचे॒ रोद॑स्योः। वृ॒क्षस्य॒ नु ते॑ पुरुहूत व॒या व्यू॒३॒॑तयो॑ रुरुहुरिन्द्र पू॒र्वीः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे पहियों की धारण करनेवाली धुरी वृक्ष की शाखाओं के समान बढ़ती है और अन्तरिक्ष में स्थित होती हैं, वैसे सूर्य के चारों ओर सम्पूर्ण भूगोल घूमते हैं और वैसे ही न्याय के मार्ग से प्रजायें चलती हैं॥३॥

शची॑वतस्ते पुरुशाक॒ शाका॒ गवा॑मिव स्रु॒तयः॑ सं॒चर॑णीः। व॒त्सानां॒ न त॒न्तय॑स्त इन्द्र॒ दाम॑न्वन्तो अदा॒मानः॑ सुदामन्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। वे ही राजाजन प्रशंसित प्रतापवाले होते हैं, जो अन्याय और पीड़ा आदि के बन्धन से प्रजाओं को छुड़ा कर धर्ममार्ग में चलाते हैं और जैसे बछड़ों की बढ़ानेवाली गौ होती हैं, वैसे ही प्रजा के बढ़ानेवाले राजपुरुष हों॥४॥

अ॒न्यद॒द्य कर्व॑रम॒न्यदु॒ श्वोऽस॑च्च॒ सन्मुहु॑राच॒क्रिरिन्द्रः॑। मि॒त्रो नो॒ अत्र॒ वरु॑णश्च पू॒षार्यो वश॑स्य पर्ये॒तास्ति॑॥

हे मनुष्यो! जो राजा प्रतिदिन बारबार सत्य कर्म का आचरण करता है, वह सब के न्याय करने में पक्षपात का त्याग करके मित्र के सदृश होता है और सब इसके वश में होते हैं॥५॥

वि त्वदापो॒ न पर्व॑तस्य पृ॒ष्ठादु॒क्थेभि॑रिन्द्रानयन्त य॒ज्ञैः। तं त्वा॒भिः सु॑ष्टु॒तिभि॑र्वा॒जय॑न्त आ॒जिं न ज॑ग्मुर्गिर्वाहो॒ अश्वाः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजन्! जैसे पर्वत के ऊपर वर्त्तमान जल शीघ्र जाकर जलाशय को प्राप्त होता है, वैसे जो आपकी प्रजाओं के हित के चाहनेवाले जन आपको प्राप्त होते हैं, उनके सहित ही आप सदा उन्नत हूजिये॥६॥

न यं जर॑न्ति श॒रदो॒ न मासा॒ न द्याव॒ इन्द्र॑मवक॒र्शय॑न्ति। वृ॒द्धस्य॑ चिद्वर्धतामस्य त॒नूः स्तोमेभि॑रु॒क्थैश्च॑ श॒स्यमा॑ना॥

वही विद्वान् वृद्ध होकर वृद्धि को प्राप्त होता है जो सब को अच्छे, बुद्धिमान्, सुशील तथा धर्म्माचरण करनेवाला करता है और जो निर्विकार और जन्म, मरण, बुढ़ापा आदि दोषों से रहित परमात्मा की उपासना करते हैं, वे प्रशंसा करने योग्य होते हैं॥७॥

न वी॒ळवे॒ नम॑ते॒ न स्थि॒राय॒ न शर्ध॑ते॒ दस्यु॑जूताय स्त॒वान्। अज्रा॒ इन्द्र॑स्य गि॒रय॑श्चिदृ॒ष्वा ग॑म्भी॒रे चि॑द्भवति गा॒धम॑स्मै॥

जैसे बिजुलियाँ अथाह गुणवाली हैं, वैसे ही परमात्मा के असङ्ख्य गुण हैं और जो परमात्मा और यथार्थवक्ता जनों को त्याग करके दुष्टों का संग करते हैं, वे सब काल में दुःखी होते हैं॥८॥

ग॒म्भी॒रेण॑ न उ॒रुणा॑मत्रि॒न्प्रेषो य॑न्धि सुतपाव॒न्वाजा॑न्। स्था ऊ॒ षु ऊ॒र्ध्व ऊ॒ती अरि॑षण्यन्न॒क्तोर्व्यु॑ष्टौ॒ परि॑तक्म्यायाम्॥

जो यम और नियमों से युक्त हुए कार्य की सिद्धि के लिये दिन-रात्रि प्रयत्न करें, वे उत्तम होते हैं॥९॥

सच॑स्व ना॒यमव॑से अ॒भीक॑ इ॒तो वा॒ तमि॑न्द्र पाहि रि॒षः। अ॒मा चै॑न॒मर॑ण्ये पाहि रि॒षो मदे॑म श॒तहि॑माः सु॒वीराः॑॥

जो विद्वान् जन हैं, वे दूर वा समीप में वर्त्तमान हुए न्यायचरण और योगाभ्यास से बुद्धि को बढ़ाये हुए बस्ती और जङ्गलों में पुरुषार्थ से प्रजाजनों की रक्षा करें॥१०॥इस सूक्त में राजा, विद्वान् और ईश्वर के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह चौबीसवाँ सूक्त और अठारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

या त॑ ऊ॒तिर॑व॒मा या प॑र॒मा या म॑ध्य॒मेन्द्र॑ शुष्मि॒न्नस्ति॑। ताभि॑रू॒ षु वृ॑त्र॒हत्ये॑ऽवीर्न ए॒भिश्च॒ वाजै॑र्म॒हान्न॑ उग्र॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! जो आप प्रजाओं की सब प्रकार से रक्षा करें तो प्रजा भी आपकी सब प्रकार से रक्षा करेगी॥१॥

आभिः॒ स्पृधो॑ मिथ॒तीररि॑षण्यन्न॒मित्र॑स्य व्यथया म॒न्युमि॑न्द्र। आभि॒र्विश्वा॑ अभि॒युजो॒ विषू॑ची॒रार्या॑य॒ विशोऽव॑ तारी॒र्दासीः॑॥

वे ही सेना के स्वामी सत्कार करने योग्य हैं, जो अपनी सेना को उत्तम प्रकार शिक्षा दें तथा उत्तम प्रकार रक्षा कर और सत्कार करके युद्धविद्या में चतुर करके डाकुओं और अन्यायकारी शत्रुओं को निवारण करके अच्छी प्रजाओं की निरन्तर रक्षा करें॥२॥

इन्द्र॑ जा॒मय॑ उ॒त येऽजा॑मयोऽर्वाची॒नासो॑ व॒नुषो॑ युयु॒ज्रे। त्वमे॑षां विथु॒रा शवां॑सि ज॒हि वृष्ण्या॑नि कृणु॒ही परा॑चः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही मन्त्री उत्तम हैं, जो धार्मिक प्रजाओं की पुत्र के सदृश रक्षा करते हैं और दुष्टों को दण्ड देते हैं और अपनी सेनाओं को बढ़ाय के शत्रुओं की सेना को पराजित करते हैं॥३॥

शूरो॑ वा॒ शूरं॑ वनते॒ शरी॑रैस्तनू॒रुचा॒ तरु॑षि॒ यत्कृ॒ण्वैते॑। तो॒के वा॒ गोषु॒ तन॑ये॒ यद॒प्सु वि क्रन्द॑सी उ॒र्वरा॑सु॒ ब्रवै॑ते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सङ्ग्राम में शूरजन शूरवीरों का विभाग करके युद्ध करते हैं, वैसे ही राजा और अमात्य श्रेष्ठ और अधमों का विभाग करके अधिकारों में युक्त करके आज्ञा देवें और जैसे खेती की विद्या से खेतीहारों को जनावें, वैसे ही अपने सन्तानों को उत्तम शिक्षा से विद्या ग्रहण के लिये ब्रह्मचर्य में प्रवृत्त करावें॥४॥

न॒हि त्वा॒ शूरो॒ न तु॒रो न धृ॒ष्णुर्न त्वा॑ यो॒धो मन्य॑मानो यु॒योध॑। इन्द्र॒ नकि॑ष्ट्वा॒ प्रत्य॑स्त्येषां॒ विश्वा॑ जा॒तान्य॒भ्य॑सि॒ तानि॑॥

राजा और राजपुरुषों को चाहिए कि विशेष करके सेनाजनों से ऐसा पराक्रम और विज्ञान बढ़ावें, जिससे कोई भी युद्ध करने की इच्छा न करे॥५॥

स प॑त्यत उ॒भयो॑र्नृ॒म्णम॒योर्यदी॑ वे॒धसः॑ समि॒थे हव॑न्ते। वृ॒त्रे वा॑ म॒हो नृ॒वति॒ क्षये॑ वा॒ व्यच॑स्वन्ता॒ यदि॑ वितन्त॒सैते॑॥

जो राजा पक्षपात का त्याग करके शत्रु और मित्र का सत्य न्याय करता है और सब अधिकारों में धार्मिक, बुद्धिमानों जनों को रखता है और सब प्रकार से सेना में कुलीन, दृढ़ राजभक्तों को नियुक्त करता है, वही सर्वदा विजयी होता है॥६॥

अध॑ स्मा ते चर्ष॒णयो॒ यदेजा॒निन्द्र॑ त्रा॒तोत भ॑वा वरू॒ता। अ॒स्माका॑सो॒ ये नृत॑मासो अ॒र्य इन्द्र॑ सू॒रयो॑ दधि॒रे पु॒रो नः॑॥

हे राजन्! विश्वासयुक्त, कुलीन, मुख्य राज्य में हुए जनों को इस राज्य और सेना के मध्य में रक्षा के निमित्त नियुक्त करिये और उनकी रक्षा निरन्तर करिये॥७॥

अनु॑ ते दायि म॒ह इ॑न्द्रि॒याय॑ स॒त्रा ते॒ विश्व॒मनु॑ वृत्र॒हत्ये॑। अनु॑ क्ष॒त्रमनु॒ सहो॑ यज॒त्रेन्द्र॑ दे॒वेभि॒रनु॑ ते नृ॒षह्ये॑॥

हे क्षत्रियकुल में उत्पन्न हुए जन! आप उत्तम कर्मों को करिये और उनके साथ अनुकूल हुए उनका धन आदि से निरन्तर सत्कार करिये और सदा ही सत्य के उपदेशक विद्वानों के सङ्ग से सम्पूर्ण राजविद्या को जानकर निरन्तर प्रचार करिये॥८॥

ए॒वा नः॒ स्पृधः॒ सम॑जा स॒मत्स्विन्द्र॑ रार॒न्धि मि॑थ॒तीरदे॑वीः। वि॒द्याम॒ वस्तो॒रव॑सा गृ॒णन्तो॑ भ॒रद्वा॑जा उ॒त त॑ इन्द्र नू॒नम्॥

जो राजा अच्छे योद्धा वीरों को प्रथम ही उत्तम प्रकार शिक्षा देकर युद्धों में प्रेरणा करता है, उस सब प्रकार से रक्षा करनेवाले राजा का सब शूरवीर जन आश्रय करते [हैं]॥९॥इस सूक्त में इन्द्र, शूरवीर, सेनापति और राजा के कृत्य का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये। यह पच्चीसवाँ सूक्त और बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

श्रु॒धी न॑ इन्द्र॒ ह्वया॑मसि त्वा म॒हो वाज॑स्य सा॒तौ वा॑वृषा॒णाः। सं यद्विशोऽय॑न्त॒ शूर॑साता उ॒ग्रं नोऽवः॒ पार्ये॒ अह॑न्दाः॥

राजाओं को यह अतियोग्य है कि [जो] प्रजा कहे उसको ध्यान से सुनें, जिससे राजा और प्रजाजनों का विरोध न होवे और प्रतिदिन सुख बढ़े॥१॥

त्वां वा॒जी ह॑वते वाजिने॒यो म॒हो वाज॑स्य॒ गध्य॑स्य सा॒तौ। त्वां वृ॒त्रेष्वि॑न्द्र॒ सत्प॑तिं॒ तरु॑त्रं॒ त्वां च॑ष्टे मुष्टि॒हा गोषु॒ युध्य॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! जहाँ-जहाँ प्रजाजन आपको प्राप्त होने की इच्छा करते हैं, वहाँ-वहाँ आप उपस्थित हूजिये॥२॥

त्वं क॒विं चो॑दयो॒ऽर्कसा॑तौ॒ त्वं कुत्सा॑य॒ शुष्णं॑ दा॒शुषे॑ वर्क्। त्वं शिरो॑ अम॒र्मणः॒ परा॑हन्नतिथि॒ग्वाय॒ शंस्यं॑ करि॒ष्यन्॥

राजा विद्या और विनय आदि श्रेष्ठ गुणों से युक्त जनों को राजकार्यों में युक्त करे और उन्नति को करता हुआ विद्या आदि का दाता होकर प्रशंसा को प्राप्त होवे॥३॥

त्वं रथं॒ प्र भ॑रो यो॒धमृ॒ष्वमावो॒ युध्य॑न्तं वृष॒भं दश॑द्युम्। त्वं तुग्रं॑ वेत॒सवे॒ सचा॑ह॒न्त्वं तुजिं॑ गृ॒णन्त॑मिन्द्र तूतोः॥

जो राजा रथ और युद्धकुशल वीरों को बढ़ाता है, वह अत्यन्त सुख को प्राप्त होता है॥४॥

त्वं तदु॒क्थमि॑न्द्र ब॒र्हणा॑ कः॒ प्र यच्छ॒ता स॒हस्रा॑ शूर॒ दर्षि॑। अव॑ गि॒रेर्दासं॒ शम्ब॑रं ह॒न्प्रावो॒ दिवो॑दासं चि॒त्राभि॑रू॒ती॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! आप सर्वदा प्रजा की वृद्धि, दुष्टों का नाश और विद्वानों की सेवा करो, जिससे असङ्ख्य सुख होवे॥५॥

त्वं श्र॒द्धाभि॑र्मन्दसा॒नः सोमै॑र्द॒भीत॑ये॒ चुमु॑रिमिन्द्र सिष्वप्। त्वं र॒जिं पिठी॑नसे दश॒स्यन्ष॒ष्टिं स॒हस्रा॒ शच्या॒ सचा॑हन्॥

हे राजन्! सदा ही पूर्ण प्रीति और न्याय से प्रजापालन करो और हजारों धार्मिक विद्वानों को अधिकारों में स्थापित करके यश बढ़ाओ॥६॥

अ॒हं च॒न तत्सू॒रिभि॑रानश्यां॒ तव॒ ज्याय॑ इन्द्र सु॒म्नमोजः॑। त्वया॒ यत्स्तव॑न्ते सधवीर वी॒रास्त्रि॒वरू॑थेन॒ नहु॑षा शविष्ठ॥

जो विद्वानों के सङ्ग से पुरुषार्थी होकर प्रशंसा करने योग्य, धर्मयुक्त कर्म को करते हैं, वे बली होकर उत्तम सुख को प्राप्त होते हैं॥७॥

व॒यं ते॑ अ॒स्यामि॑न्द्र द्यु॒म्नहू॑तौ॒ सखा॑यः स्याम महिन॒ प्रेष्ठाः॑। प्रात॑र्दनिः क्षत्र॒श्रीर॑स्तु॒ श्रेष्ठो॑ घ॒ने वृ॒त्राणां॑ स॒नये॒ धना॑नाम्॥

जो राजा गुणग्राही, पुरुषार्थी, श्रेष्ठ जनों का पालन करने और दुष्ट जनों का निवारण करनेवाला तथा सबका मित्र होवे, उसके साथ सज्जनों को चाहिये कि मित्रता करें॥८॥इस सूक्त में इन्द्र, परीक्षक, श्रेष्ठ, राजा और प्रजा के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह छब्बीसवाँ सूक्त और बाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

किम॑स्य॒ मदे॒ किम्व॑स्य पी॒ताविन्द्रः॒ किम॑स्य स॒ख्ये च॑कार। रणा॑ वा॒ ये नि॒षदि॒ किं ते अ॑स्य पु॒रा वि॑विद्रे॒ किमु॒ नूत॑नासः॥

इस मन्त्र में सोमलताआदि के रस के पानविषयक प्रश्न हैं, उनके उत्तर अगले मन्त्र में जानने चाहिये॥१॥

सद॑स्य॒ मदे॒ सद्व॑स्य पी॒ताविन्द्रः॒ सद॑स्य स॒ख्ये च॑कार। रणा॑ वा॒ ये नि॒षदि॒ सत्ते अ॑स्य पु॒रा वि॑विद्रे॒ सदु॒ नूत॑नासः॥

मनुष्य लोग मादक द्रव्य के सेवन का त्याग करके सर्वदा बुद्धि, बल, आयु और पराक्रम के बढ़ानेवालों का सेवन करें, जिससे सदा ही सुख बढ़े॥२॥

न॒हि नु ते॑ महि॒मनः॑ समस्य॒ न म॑घवन्मघव॒त्त्वस्य॑ वि॒द्म। न राध॑सोराधसो॒ नूत॑न॒स्येन्द्र॒ नकि॑र्ददृश इन्द्रि॒यं ते॑॥

हे मनुष्यो! जिसकी महिमा के समान महिमा, ऐश्वर्यसामर्थ्य के समान सामर्थ्य और स्वरूप नहीं विद्यमान है, उसी सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, जगदीश्वर का निरन्तर ध्यान करो॥३॥

ए॒तत्यत्त॑ इन्द्रि॒यम॑चेति॒ येनाव॑धीर्व॒रशि॑खस्य॒ शेषः॑। वज्र॑स्य॒ यत्ते॒ निह॑तस्य॒ शुष्मा॑त्स्व॒नाच्चि॑दिन्द्र पर॒मो द॒दार॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा बिजुली के समान पराक्रमी, विज्ञान को बढ़ानेवाला, न्याय के व्यवहार में सूर्य के सदृश प्रकाशित होता है, वही राजाओं में शिरोमणि समझना चाहिए॥४॥

वधी॒दिन्द्रो॑ व॒रशि॑खस्य॒ शेषो॑ऽभ्याव॒र्तिने॑ चायमा॒नाय॒ शिक्ष॑न्। वृ॒चीव॑तो॒ यद्ध॑रियू॒पीया॑यां॒ हन्पूर्वे॒ अर्धे॑ भि॒यसाप॑रो॒ दर्त्॥

जो मनुष्य पूर्व अवस्था में विद्वानों से विद्या ग्रहण करके बुरे व्यसनों का त्याग करके उत्तमस्वभावयुक्त होते हैं, वे अधर्माचरण से डरते हैं॥५॥

त्रिं॒शच्छ॑तं व॒र्मिण॑ इन्द्र सा॒कं य॒व्याव॑त्यां पुरुहूत श्रव॒स्या। वृ॒चीव॑न्तः॒ शर॑वे॒ पत्य॑मानाः॒ पात्रा॑ भिन्दा॒ना न्य॒र्थान्या॑यन्॥

हे राजन्! जो वीरपुरुष, राजविद्या में निपुण, कार्यों के आरम्भ में दृढ़प्रयोजन सिद्धवस्त्रोंवाले होवें, वे आपसे सेना में सत्कारपूर्वक रखने योग्य हैं॥६॥

यस्य॒ गावा॑वरु॒षा सू॑यव॒स्यू अ॒न्तरू॒ षु चर॑तो॒ रेरि॑हाणा। स सृञ्ज॑याय तु॒र्वशं॒ परा॑दाद्वृ॒चीव॑तो दैववा॒ताय॒ शिक्ष॑न्॥

जो राजा नीति और सेना की वृद्धि करता है, वह अखण्डित राज्य को प्राप्त होता है॥७॥

द्व॒याँ अ॑ग्ने र॒थिनो॑ विंश॒तिं गा व॒धूम॑न्तो म॒घवा॒ मह्यं॑ स॒म्राट्। अ॒भ्या॒व॒र्ती चा॑यमा॒नो द॑दाति दू॒णाशे॒यं दक्षि॑णा पार्थ॒वाना॑म्॥

जो राजा कुलीन, विद्या और व्यवहार में निपुण, धार्मिक राजा और प्रजाजनों को भय रहित करता है, वह अतुल प्रतिष्ठा को प्राप्त होता है॥८॥इस सूक्त में इन्द्र, ईश्वर, राजा और प्रजा के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सत्ताईसवाँ सूक्त और चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ गावो॑ अग्मन्नु॒त भ॒द्रम॑क्र॒न्त्सीद॑न्तु गो॒ष्ठे र॒णय॑न्त्व॒स्मे। प्र॒जाव॑तीः पुरु॒रूपा॑ इ॒ह स्यु॒रिन्द्रा॑य पू॒र्वीरु॒षसो॒ दुहा॑नाः॥

जो वृक्षों के लगाने और सुगन्ध आदि से युक्त धूम से पवन के किरणों को शुद्ध करें तो ये सब को सुखयुक्त करते हैं॥१॥

इन्द्रो॒ यज्व॑ने पृण॒ते च॑ शिक्ष॒त्युपेद्द॑दाति॒ न स्वं मु॑षायति। भूयो॑भूयो र॒यिमिद॑स्य व॒र्धय॒न्नभि॑न्ने खि॒ल्ये नि द॑धाति देव॒युम्॥

वे ही विद्वान् यथार्थवक्ता हैं, जो निष्कपटता से वार-वार प्रतिदिन विद्याकोश को योग्य के लिये देते हैं॥२॥

न ता न॑शन्ति॒ न द॑भाति॒ तस्क॑रो॒ नासा॑मामि॒त्रो व्यथि॒रा द॑धर्षति। दे॒वाँश्च॒ याभि॒र्यज॑ते॒ ददा॑ति च॒ ज्योगित्ताभिः॑ सचते॒ गोप॑तिः स॒ह॥

हे मनुष्यो! सब के लिये अधिक सुख करने, नहीं नष्ट होने और निरन्तर बढ़नेवाले और चोर आदिकों से हरने के अयोग्य विद्यादान ही है, यह जानो॥३॥

न ता अर्वा॑ रे॒णुक॑काटो अश्नुते॒ न सं॑स्कृत॒त्रमुप॑ यन्ति॒ ता अ॒भि। उ॒रु॒गा॒यमभ॑यं॒ तस्य॒ ता अनु॒ गावो॒ मर्त॑स्य॒ वि च॑रन्ति॒ यज्व॑नः॥

हे मनुष्यो! जो अशुद्ध व्यवहार और विहार करनेवाले, लम्पट, चुगुल और कुसङ्गी हैं, उनको विद्या कभी नहीं प्राप्त होती है और जो पवित्र आहार और विहार करनेवाले, जितेन्द्रिय, यथार्थवक्ता, सत्सङ्गी, पुरुषार्थी हैं, उनको विद्या प्राप्त होती है, ऐसा जानिये॥४॥

गावो॒ भगो॒ गाव॒ इन्द्रो॑ मे अच्छा॒न् गावः॒ सोम॑स्य प्रथ॒मस्य॑ भ॒क्षः। इ॒मा या गावः॒ स ज॑नास॒ इन्द्र॑ इ॒च्छामीद्धृ॒दा मन॑सा चि॒दिन्द्र॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य आत्मा और अन्तःकरण से विद्या की प्राप्ति की इच्छा करते हैं, वे सब सुख का भोग करते हैं॥५॥

यू॒यं गा॑वो मेदयथा कृ॒शं चि॑दश्री॒रं चि॑त्कृणुथा सु॒प्रती॑कम्। भ॒द्रं गृ॒हं कृ॑णुथ भद्रवाचो बृ॒हद्वो॒ वय॑ उच्यते स॒भासु॑॥

जो मनुष्य कोमल, सत्य, धर्मयुक्त वाणी तथा सर्व ऋतुओं में सुख करनेवाले घर को, सभा को और अधिक अवस्था को करते हैं, वे संसार में कल्याण करनेवाले होते हैं॥६॥

प्र॒जाव॑तीः सू॒यव॑सं रि॒शन्तीः॑ शु॒द्धा अ॒पः सु॑प्रपा॒णे पिब॑न्तीः। मा वः॑ स्ते॒न ई॑शत॒ माघशं॑सः॒ परि॑ वो हे॒ती रु॒द्रस्य॑ वृज्याः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो पिता के सदृश प्रजाओं का पालन करते और शुद्ध भोजन और विहारवाली करके पुरुषार्थ करते और चोर आदि दुष्टों का छेदन करते हैं, वे राजा, अमात्य और भृत्य प्रशंसा करने योग्य होते हैं॥७॥

उपे॒दमु॑प॒पर्च॑नमा॒सु गोषूप॑ पृच्यताम्। उप॑ ऋष॒भस्य॒ रेत॒स्युपे॑न्द्र॒ तव॑ वी॒र्ये॑॥

जो राजा आदि मनुष्य विद्वान् होकर सभा में परस्पर की एक सम्मति करके विरोध के नाश करने से एकता में प्रयत्न करते हैं, वे अखण्डित सामर्थ्यवाले होते हैं॥८॥इस सूक्त में गो, इन्द्र, विद्या, प्रजा और राजा के धर्म का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥इस अध्याय में इन्द्र, सोम, सूर्य, प्रातःकाल, राज्य, विश्वेदेव, योधा, मित्रत्व, जगदीश्वर, अग्नि, अन्तरिक्ष, पृथिवी, राजा, प्रजा, पवन, कारीगर, न्यायेश, उपदेशक, वाणी और विद्या के गुणवर्णन करने से इस अध्याय के अर्थ की इससे पूर्व अध्याय के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य विरजानन्द सरस्वती स्वामी जी के शिष्य श्रीमान् दयानन्द सरस्वती स्वामी से रचित उत्तम प्रमाणों से युक्त, ऋग्वेदभाष्य के चतुर्थ अष्टक में छठा अध्याय, पच्चीसवाँ वर्ग और छठे मण्डल में अट्ठाईसवाँ सूक्त समाप्त हुआ॥

इन्द्रं॑ वो॒ नरः॑ स॒ख्याय॑ सेपुर्म॒हो यन्तः॑ सुम॒तये॑ चका॒नाः। म॒हो हि दा॒ता वज्र॑हस्तो॒ अस्ति॑ म॒हामु॑ र॒ण्वमव॑से यजध्वम्॥

हे मनुष्यो! जो आप लोगों के साथ मित्रत्व के लिये दृढ़ शपथ करके तन, मन और धनों से उपकार के लिये प्रयत्न करते हैं, उनका आप लोग सर्वदा सत्कार करिये तथा इनके साथ मित्रपन में बर्ताव करिये॥१॥

आ यस्मि॒न्हस्ते॒ नर्या॑ मिमि॒क्षुरा रथे॑ हिर॒ण्यये॑ रथे॒ष्ठाः। आ र॒श्मयो॒ गभ॑स्त्योः स्थू॒रयो॒राध्व॒न्नश्वा॑सो॒ वृष॑णो युजा॒नाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा शस्त्र और अस्त्र के जाननेवाले, श्रेष्ठ धार्मिक, शूर तथा विमान आदि वाहनों के बनानेवाले शिल्पियों और बिजुली आदि की विद्या को जाननेवाले विद्वानों का सत्कार करके रक्षा करता है, उसी के सूर्य के किरणों के समान यश बढ़ते हैं॥२॥

श्रि॒ये ते॒ पादा॒ दुव॒ आ मि॑मिक्षुर्धृ॒ष्णुर्व॒ज्री शव॑सा॒ दक्षि॑णावान्। वसा॑नो॒ अत्कं॑ सुर॒भिं दृ॒शे कं स्व१॒॑र्ण नृ॑तविषि॒रो ब॑भूथ॥

हे राजन्! जिन आपके आश्रय से अत्यन्त लक्ष्मी, घास, ओढ़ना, वाहन, सुख और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है, वह आप हम लोगों से कैसे नहीं सेवन करने योग्य हैं॥३॥

स सोम॒ आमि॑श्लतमः सु॒तो भू॒द्यस्मि॑न्प॒क्तिः प॒च्यते॒ सन्ति॑ धा॒नाः। इन्द्रं॒ नरः॑ स्तु॒वन्तो॑ ब्रह्मका॒रा उ॒क्था शंस॑न्तो दे॒ववा॑ततमाः॥

जो वह धार्मिक राजा न होवे तो सब व्यवहार लोप होवें। जिसके होने पर धन-धान्य और ऐश्वर्य को धारण करती हैं, वे धर्मयुक्त प्रजायें होती हैं॥४॥

न ते॒ अन्तः॒ शव॑सो धाय्य॒स्य वि तु बा॑बधे॒ रोद॑सी महि॒त्वा। आ ता सू॒रिः पृ॑णति॒ तूतु॑जानो यू॒थेवा॒प्सु स॒मीज॑मान ऊ॒ती॥

हे मनुष्यो! जो अनन्त गुण, कर्म और स्वभावयुक्त और सब का प्रबन्ध करनेवाला, उपासना किया हुआ सुख का देनेवाला ईश्वर है, वही सब से उपासना करने योग्य है॥५॥

ए॒वेदिन्द्रः॑ सु॒हव॑ ऋ॒ष्वो अ॑स्तू॒ती अनू॑ती हिरिशि॒प्रः सत्वा॑। ए॒वा हि जा॒तो अस॑मात्योजाः पु॒रू च॑ वृ॒त्रा ह॑नति॒ नि दस्यू॑न्॥

वही बड़ा राजा है, जो नीति के जाननेवालों की रक्षा करके धर्मिष्ठ प्रजाओं का पालन करके चोर आदि पापियों को नहीं ग्रहण करता है, वही सज्जनों से सेवन करने योग्य है॥६॥इस सूक्त में इन्द्र, मित्रपन, देनेवाले और युद्ध करनेवाले तथा ईश्वर के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह उनतीसवाँ सूक्त और पहिला वर्ग समाप्त हुआ॥

भूय॒ इद्वा॑वृधे वी॒र्या॑यँ॒ एको॑ अजु॒र्यो द॑यते॒ वसू॑नि। प्र रि॑रिचे दि॒व इन्द्रः॑ पृथि॒व्या अ॒र्धमिद॑स्य॒ प्रति॒ रोद॑सी उ॒भे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा सूर्य के समान श्रेष्ठ गुणों, श्रेष्ठ सहायों और उत्तम सामग्री से प्रकाशमान यशस्वी होता है और जैसे सूर्य सम्पूर्ण भूगोलों के सम्मुख स्थित भूगोल के अर्द्धभागों का प्रकाश करता है, वैसे ही न्याय और अन्याय के बीच में से न्याय का ही प्रकाश करे और सब के लिये दोनों को देवे॥१॥

अधा॑ मन्ये बृ॒हद॑सु॒र्य॑मस्य॒ यानि॑ दा॒धार॒ नकि॒रा मि॑नाति। दि॒वेदि॑वे॒ सूर्यो॑ दर्श॒तो भू॒द्वि सद्मा॑न्युर्वि॒या सु॒क्रतु॑र्धात्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य प्रतिदिन मेघ को धारण करके वर्षा के पृथिवी और पृथिवीस्थ पदार्थों का नाश नहीं करके धारण करता है, वैसे ही राज्य को धारण करके सुख को वर्षा के प्रजा के साथ न्यायकर्मों को राजा धारण करे॥२॥

अ॒द्या चि॒न्नू चि॒त्तदपो॑ न॒दीनां॒ यदा॑भ्यो॒ अर॑दो गा॒तुमि॑न्द्र। नि पर्व॑ता अद्म॒सदो॒ न से॑दु॒स्त्वया॑ दृ॒ळ्हानि॑ सुक्रतो॒ रजां॑सि॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे राजन्!जैसे सूर्य सम्पूर्ण पदार्थों से आठ महीने रस धारण करके मेघमण्डल में स्थापित करके वर्षाओं में वर्षाके प्रजाओं को सुखी करता है, वैसे आप आठ मासों में प्रजाओं से कर लेकर वर्षाकाल में देवें॥३॥

स॒त्यमित्तन्न त्वावाँ॑ अ॒न्यो अ॒स्तीन्द्र॑ दे॒वो न मर्त्यो॒ ज्याया॑न्। अह॒न्नहिं॑ परि॒शया॑न॒मर्णोऽवा॑सृजो अ॒पो अच्छा॑ समु॒द्रम्॥

हे मनुष्यो! जिस जगदीश्वर ने जगत् के पालन के लिये आकर्षण करने और वृष्टि तथा प्रकाश करनेवाला सूर्य्य और मेघ बनाया, इस कारण से जगदीश्वर के तुल्य कोई भी नहीं है, फिर अधिक कहाँ से हो, यह सत्य जानिये॥४॥

त्वम॒पो वि दुरो॒ विषू॑ची॒रिन्द्र॑ दृ॒ळ्हम॑रुजः॒ पर्व॑तस्य। राजा॑भवो॒ जग॑तश्चर्षणी॒नां सा॒कं सूर्यं॑ ज॒नय॒न्द्यामु॒षास॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो सूर्य आदि का उत्पन्न करनेवाला, प्रकाशक और धारण करनेवाला तथा सम्पूर्ण पदार्थों में व्याप्त जगदीश्वर है, उसकी आत्मा के साथ निरन्तर उपासना करो॥५॥इस सूक्त में इन्द्र, राजा, सूर्य, और ईश्वर के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह तीसवाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

अभू॒रेको॑ रयिपते रयी॒णामा हस्त॑योरधिथा इन्द्र कृ॒ष्टीः। वि तो॒के अ॒प्सु तन॑ये च॒ सूरेऽवो॑चन्त चर्ष॒णयो॒ विवा॑चः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। परमेश्वर का स्वभाव है कि जो सत्य का उपदेश देते हैं, उनको सदा उत्साहित करता और रक्षा में धारण करता और ऐश्वर्य्य को प्राप्त कराता है और जैसे विनय से युक्त एक भी राजा राज्यपालन करने को समर्थ होता है, वैसे ही सर्वशक्तिमान् परमात्मा सम्पूर्ण सृष्टि की सदा रक्षा करता है॥१॥

त्वद्भि॒येन्द्र॒ पार्थि॑वानि॒ विश्वाच्यु॑ता चिच्च्यावयन्ते॒ रजां॑सि। द्यावा॒क्षामा॒ पर्व॑तासो॒ वना॑नि॒ विश्वं॑ दृ॒ळ्हं भ॑यते॒ अज्म॒न्ना ते॑॥

हे मनुष्यो! जैसे न्यायकारी वीरपुरुष से कायर जन डरते हैं, वैसे ही बिजुली से सब प्राणी डरते हैं॥२॥

त्वं कुत्से॑ना॒भि शुष्ण॑मिन्द्रा॒शुषं॑ युध्य॒ कुय॑वं॒ गवि॑ष्टौ। दश॑ प्रपि॒त्वे अध॒ सूर्य॑स्य मुषा॒यश्च॒क्रमवि॑वे॒ रपां॑सि॥

हे राजन्! आप अधर्मी शत्रु के साथ ही युद्ध करिये, धर्मात्मा के साथ न करिये, ऐसा करने पर जिस प्रकार सूर्य्य के चारों ओर भूगोल चक्र के समान घूमते हैं, वैसे ही प्रजाजन आपको देखकर पुरुषार्थ से चलेंगे॥३॥

त्वं श॒तान्यव॒ शम्ब॑रस्य॒ पुरो॑ जघन्थाप्र॒तीनि॒ दस्योः॑। अशि॑क्षो॒ यत्र॒ शच्या॑ शचीवो॒ दिवो॑दासाय सुन्व॒ते सु॑तक्रे भ॒रद्वा॑जाय गृण॒ते वसू॑नि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा सूर्य्य के सदृश न्याय का प्रकाश करनेवाला और मेघ के सदृश विद्या आदि के प्रचार के लिये बहुत धन का देनेवाला होता है, वही सर्वत्र विजय को प्राप्त होता है॥४॥

स स॑त्यसत्वन्मह॒ते रणा॑य॒ रथ॒मा ति॑ष्ठ तुविनृम्ण भी॒मम्। या॒हि प्र॑पथि॒न्नव॒सोप॑ म॒द्रिक्प्र च॑ श्रुत श्रावय चर्ष॒णिभ्यः॑॥

जो राजा सत्यवादियों से राजनीति के कृत्य को सुनकर अन्यों को सुना कर शुद्धचित्तवाला सब के रक्षण के लिये दुष्टों का पराजय करता है, वही बहुत लक्ष्मीवाला होता है॥५॥इस सूक्त में इन्द्र और राजा के कृत्य का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यही इकतीसवाँ सूक्त और तृतीय वर्ग समाप्त हुआ॥

अपू॑र्व्या पुरु॒तमा॑न्यस्मै म॒हे वी॒राय॑ त॒वसे॑ तु॒राय॑। वि॒र॒प्शिने॑ व॒ज्रिणे॒ शंत॑मानि॒ वचां॑स्या॒सा स्थवि॑राय तक्षम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वानों को चाहिये कि सदा ही सब के लिये सत्य उपदेश करना चाहिये, जिससे अतुल सुख होवे॥१॥

स मा॒तरा॒ सूर्ये॑णा कवी॒नामवा॑सयद्रु॒जदद्रिं॑ गृणा॒नः। स्वा॒धीभि॒र्ऋक्व॑भिर्वावशा॒न उदु॒स्रिया॑णामसृजन्नि॒दान॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! जैसे सूर्य्य किरणों से सबको प्रकाशित करता है, वैसे ही विनय आदिकों से सम्पूर्ण राज्य को प्रकाशित करिये और जैसे श्रेष्ठ पुत्र माता-पिता की सेवा करते हैं, वैसे ही राजधर्म का सेवन करिये॥२॥

स वह्नि॑भि॒र्ऋक्व॑भि॒र्गोषु॒ शश्व॑न्मि॒तज्ञु॑भिः पुरु॒कृत्वा॑ जिगाय। पुरः॑ पुरो॒हा सखि॑भिः सखी॒यन्दृ॒ळ्हा रु॑रोज क॒विभिः॑ क॒विः सन्॥

जो मनुष्य प्रशंसित, बलिष्ठ, थोड़े बोलनेवाले, विद्वान् मित्रों के साथ मित्रता कर राज्य को प्राप्त होकर दुष्टों का नाश करके धार्मिकों की रक्षा करते हैं, वे कृतकृत्य होते हैं॥३॥

स नी॒व्या॑भिर्जरि॒तार॒मच्छा॑ म॒हो वाजे॑भिर्म॒हद्भि॑श्च॒ शुष्मैः॑। पु॒रु॒वीरा॑भिर्वृषभ क्षिती॒नामा गि॑र्वणः सुवि॒ताय॒ प्र या॑हि॥

जो मनुष्य धार्मिक, बलिष्ठ और उत्तम प्रकार से शिक्षित पुरुषों की सेनाओं से विजय के लिये प्रयत्न करे, वह निश्चय कर विजय को प्राप्त होवे॥४॥

स सर्गे॑ण॒ शव॑सा त॒क्तो अत्यै॑र॒प इन्द्रो॑ दक्षिण॒तस्तु॑रा॒षाट्। इ॒त्था सृ॑जा॒ना अन॑पावृ॒दर्थं॑ दि॒वेदि॑वे विविषुरप्रमृ॒ष्यम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य अधर्म्म से करने योग्य अनर्थ को नहीं करता है, वह सूर्य्य के सदृश प्रकाशित यशवाला होता है और जैसे सूर्य्य वृष्टि करके सब को हर्षित करता, वैसे ही राजा शुभगुणों की वर्षा करके सब को आनन्दित करे॥५॥इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान् और राजा के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह बत्तीसवाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ॥

य ओजि॑ष्ठ इन्द्र॒ तं सु नो॑ दा॒ मदो॑ वृषन्त्स्वभि॒ष्टिर्दास्वा॑न्। सौव॑श्व्यं॒ यो व॒नव॒त्स्वश्वो॑ वृ॒त्रा स॒मत्सु॑ सा॒सह॑द॒मित्रा॑न्॥

जो अभय देनेवाला और सङ्ग्रामों में जीतनेवाला तथा दिन-रात अपने बल को बढ़ाता है, वही सब को सुखी करने को योग्य है॥१॥

त्वां ही॒३॒॑न्द्राव॑से॒ विवा॑चो॒ हव॑न्ते चर्ष॒णयः॒ शूर॑सातौ। त्वं विप्रे॑भि॒र्वि प॒णीँर॑शाय॒स्त्वोत॒ इत्सनि॑ता॒ वाज॒मर्वा॑॥

जो राजा धार्मिक विद्वानों के साथ राज्य का पालन करे तो उसकी कौन नहीं प्रशंसा करे॥२॥

त्वं ताँ इ॑न्द्रो॒भयाँ॑ अ॒मित्रा॒न्दासा॑ वृ॒त्राण्यार्या॑ च शूर। वधी॒र्वने॑व॒ सुधि॑तेभि॒रत्कै॒रा पृ॒त्सु द॑र्षि नृ॒णां नृ॑तम॥

जो राजा उत्तम, अनुत्तम, धार्मिक और अधार्मिकों का परीक्षा से विभाग करके उत्तमों की रक्षा करता और दुष्टों को दण्ड देता है, वही सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य को प्राप्त होता है॥३॥

स त्वं न॑ इ॒न्द्राक॑वाभिरू॒ती सखा॑ वि॒श्वायु॑रवि॒ता वृ॒धे भूः॑। स्व॑र्षाता॒ यद्ध्वया॑मसि त्वा॒ युध्य॑न्तो ने॒मधि॑ता पृ॒त्सु शू॑र॥

हे राजन्! जैसे मित्र मित्रके लिये प्रिय आचरण करता है, वैसे ही प्रजा के लिये हित धारण करिये और जहाँ-जहाँ प्रजायें पुकारें, वहाँ-वहाँ उपस्थित हूजिये और शत्रुओं के जीतने में प्रयत्न करिये॥४॥

नू॒नं न॑ इन्द्राप॒राय॑ च स्या॒ भवा॑ मृळी॒क उ॒त नो॑ अ॒भिष्टौ॑। इ॒त्था गृ॒णन्तो॑ म॒हिन॑स्य॒ शर्म॑न्दि॒वि ष्या॑म॒ पार्ये॑ गो॒षत॑माः॥

जो राजा अपने और दूसरे का पक्षपाती न होकर प्रजा के रक्षण में यत्न करनेवाला होवे तो सम्पूर्ण प्रजा प्रेम के स्थान में बँधी हुई होकर राजा की दिन-रात स्तुति करे॥५॥इस सूक्त में इन्द्र, राजा और प्रजा के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह तेंतीसवाँ सूक्त और पाँचवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सं च॒ त्वे ज॒ग्मुर्गिर॑ इन्द्र पू॒र्वीर्वि च॒ त्वद्य॑न्ति वि॒भ्वो॑ मनी॒षाः। पु॒रा नू॒नं च॑ स्तु॒तय॒ ऋषी॑णां पस्पृ॒ध्र इन्द्रे॒ अध्यु॑क्था॒र्का॥

हे राजन्! इस संसार में कोई योग्य, कोई अयोग्य जन होते हैं, उन में प्रशंसा करने योग्य सज्जनों के साथ मेल करके उत्तम सहायवाले हुए धर्म्म से राज्यपालन निरन्तर करिये॥१॥

पु॒रु॒हू॒तो यः पु॑रुगू॒र्त ऋभ्वाँ॒ एकः॑ पुरुप्रश॒स्तो अस्ति॑ य॒ज्ञैः। रथो॒ न म॒हे शव॑से युजा॒नो॒३॒॑स्माभि॒रिन्द्रो॑ अनु॒माद्यो॑ भूत्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे घोड़ों और अग्नि आदिकों से युक्त रथ अभीष्ट कार्य्यों को करता है, वैसे ही उत्तम सहायों के सहित राजा राज्य के कार्य्यों को पूर्ण करने को समर्थ होता है॥२॥

न यं हिंस॑न्ति धी॒तयो॒ न वाणी॒रिन्द्रं॒ नक्ष॒न्तीद॒भि व॒र्धय॑न्तीः। यदि॑ स्तो॒तारः॑ श॒तं यत्स॒हस्रं॑ गृ॒णन्ति॒ गिर्व॑णसं॒ शं तद॑स्मै॥

हे मनुष्यो! जिसको शत्रु से की हुई विरुद्ध क्रियायें और निन्दित वाणियाँ नहीं पीड़ित करती हैं, उस हर्ष और शोक से सहित राजा को अतुल सुख प्राप्त होता है॥३॥

अस्मा॑ ए॒तद्दि॒व्य१॒॑र्चेव॑ मा॒सा मि॑मि॒क्ष इन्द्रे॒ न्य॑यामि॒ सोमः॑। जनं॒ न धन्व॑न्न॒भि सं यदापः॑ स॒त्रा वा॑वृधु॒र्हव॑नानि य॒ज्ञैः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सत्कार करने योग्य का सत्कार और निर्जल स्थान में हुए को जल का मिलना सुखकारक होता है, वैसे ही यज्ञ का अनुष्ठान और श्रेष्ठ ऐश्वर्य्य सब के आनन्दकारक होते हैं॥४॥

अस्मा॑ ए॒तन्मह्यां॑ङ्गू॒षम॑स्मा॒ इन्द्रा॑य स्तो॒त्रं म॒तिभि॑रवाचि। अस॒द्यथा॑ मह॒ति वृ॑त्र॒तूर्य॒ इन्द्रो॑ वि॒श्वायु॑रवि॒ता वृ॒धश्च॑॥

जो अविद्वान् हों, वे विद्वानों के अनुकरण से अपना वर्त्ताव उत्तम करें॥५॥इस सूक्त में इन्द्र, राजा और प्रजा के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चौंतीसवाँ सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ॥

क॒दा भु॑व॒न्रथ॑क्षयाणि॒ ब्रह्म॑ क॒दा स्तो॒त्रे स॑हस्रपो॒ष्यं॑ दाः। क॒दा स्तोमं॑ वासयोऽस्य रा॒या क॒दा धियः॑ करसि॒ वाज॑रत्नाः॥

सब सभा में बैठनेवाले, विद्वान् जन और उपदेशक जन राजा से यह कहें कि आप कब सेना के अङ्गों और पुष्टि करनेवाले ऐश्वर्य्य और उत्तम बुद्धियों को करेंगे॥१॥

कर्हि॑ स्वि॒त्तदि॑न्द्र॒ यन्नृभि॒र्नॄन्वी॒रैर्वी॒रान्नी॒ळया॑से॒ जया॒जीन्। त्रि॒धातु॒ गा अधि॑ जयासि॒ गोष्विन्द्र॑ द्यु॒म्नं स्व॑र्वद्धेह्य॒स्मे॥

हे राजन्! आप विद्वानों के साथ विद्वानों का तथा शूरवीर जनों के साथ शूरवीरों का अच्छे प्रकार ग्रहण करके तथा सङ्ग्रामों को जीत कर और पृथिवी के राज्य को प्राप्त कर न्यायाचरण से प्रजाओं का पालन करके बड़े यश वा धन को बढ़ाइये॥२॥

कर्हि॑ स्वि॒त्तदि॑न्द्र॒ यज्ज॑रि॒त्रे वि॒श्वप्सु॒ ब्रह्म॑ कृ॒णवः॑ शविष्ठ। क॒दा धियो॒ न नि॒युतो॑ युवासे क॒दा गोम॑घा॒ हव॑नानि गच्छाः॥

हे राजन्! आप सम्पूर्ण धन, पूर्ण बुद्धियाँ और उत्तम क्रियाओं को कब करियेगा? अर्थात् शीघ्र इनको करिये॥३॥

स गोम॑घा जरि॒त्रे अश्व॑श्चन्द्रा॒ वाज॑श्रवसो॒ अधि॑ धेहि॒ पृक्षः॑। पी॒पि॒हीषः॑ सु॒दुघा॑मिन्द्र धे॒नुं भ॒रद्वा॑जेषु सु॒रुचो॑ रुरुच्याः॥

हे राजन्! अपनी प्रजाओं में पूर्ण विद्या और सम्पूर्ण धन को धारण कर और शरीर के आरोग्यपन को बढ़ा के धर्म्म में रुचि करिये॥४॥

तमा नू॒नं वृ॒जन॑म॒न्यथा॑ चि॒च्छूरो॒ यच्छ॑क्र॒ वि दुरो॑ गृणी॒षे। मा निर॑रं शुक्र॒दुघ॑स्य धे॒नोरा॑ङ्गिर॒सान्ब्रह्म॑णा विप्र जिन्व॥

जो राजा आदि जन प्रजाओं को सुख से शोभित कर अन्याय से अन्यथा आचरण नहीं करते, वे सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य से युक्त होते हैं॥५॥इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान्, राजा और प्रजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पैंतीसवाँ सूक्त और सातवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

स॒त्रा मदा॑स॒स्तव॑ वि॒श्वज॑न्याः स॒त्रा रायोऽध॒ ये पार्थि॑वासः। स॒त्रा वाजा॑नामभवो विभ॒क्ता यद्दे॒वेषु॑ धा॒रय॑था असु॒र्य॑म्॥

हे मनुष्यो! जो इस संसार में बुद्धि और आनन्द के बढ़ानेवाले, विद्या और धनादि से युक्त और विद्वानों के साथ सत्सङ्ग करनेवाले हैं, उनको धारण करके सत्य और असत्य के विभाग करनेवाले हूजिये॥१॥

अनु॒ प्र ये॑जे॒ जन॒ ओजो॑ अस्य स॒त्रा द॑धिरे॒ अनु॑ वी॒र्या॑य। स्यू॒म॒गृभे॒ दुध॒येऽर्व॑ते च॒ क्रतुं॑ वृञ्ज॒न्त्यपि॑ वृत्र॒हत्ये॑॥

जो मनुष्य न्याय और दया से युक्त बुद्धि को धारण कर, धर्म्मयुक्त कर्म्मों को कर, दुष्टता को दूर कर और युद्ध में विजय प्राप्त करके श्रेष्ठों की सङ्गति करते हैं, वे दिनरात्रि बुद्धि को बढ़ा सकते हैं॥२॥

तं स॒ध्रीची॑रू॒तयो॒ वृष्ण्या॑नि॒ पौंस्या॑नि नि॒युतः॑ सश्चु॒रिन्द्र॑म्। स॒मु॒द्रं न सिन्ध॑व उ॒क्थशु॑ष्मा उरु॒व्यच॑सं॒ गिर॒ आ वि॑शन्ति॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे नीचे चलनेवाली नदियाँ समुद्र को सब ओर से प्राप्त होती हैं, वैसे ही धार्मिक राजा को सम्पूर्ण बल, सब रक्षायें और उत्तम प्रकार शिक्षित वाणियाँ भी प्राप्त होती हैं॥३॥

स रा॒यस्खामुप॑ सृजा गृणा॒नः पु॑रुश्च॒न्द्रस्य॒ त्वमि॑न्द्र॒ वस्वः॑। पति॑र्बभू॒थास॑मो॒ जना॑ना॒मेको॒ विश्व॑स्य॒ भुव॑नस्य॒ राजा॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजा लोगो! जैसे ईश्वर पक्षपात का त्याग करके सब का न्याय से पालन करनेवाला है, वैसे ही होकर आप लोग धन के स्वामी हूजिये॥४॥

स तु श्रु॑धि॒ श्रुत्या॒ यो दु॑वो॒युर्द्यौर्न भूमा॒भि रायो॑ अ॒र्यः। असो॒ यथा॑ नः॒ शव॑सा चका॒नो यु॒गेयु॑गे॒ वय॑सा॒ चेकि॑तानः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे परीक्षक विद्यार्थियों के अध्ययन की परीक्षा करके विद्वान् करता है, वैसे ही राजा यथार्थ न्याय को करके प्रजाओं को प्रसन्न करे॥५॥इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान् और राजा के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह छत्तीसवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒र्वाग्रथं॑ वि॒श्ववा॑रं त उ॒ग्रेन्द्र॑ यु॒क्तासो॒ हर॑यो वहन्तु। की॒रिश्चि॒द्धि त्वा॒ हव॑ते॒ स्व॑र्वानृधी॒महि॑ सध॒माद॑स्ते अ॒द्य॥

जो राजा धार्मिक और अनुकूल मनुष्यों को सत्कार करता है, उसकी सब धर्मिष्ठ विद्वान् सदा सेवा करते हैं॥१॥

प्रो द्रोणे॒ हर॑यः॒ कर्मा॑ग्मन्पुना॒नास॒ ऋज्य॑न्तो अभूवन्। इन्द्रो॑ नो अ॒स्य पू॒र्व्यः प॑पीयाद्द्यु॒क्षो मद॑स्य सो॒म्यस्य॒ राजा॑॥

जो राजा आदि श्रेष्ठ जन स्वयं पवित्र और श्रेष्ठ स्वभाववाले और सरल होकर श्रेष्ठ कर्म्मों को करके न्याय से हम लोगों की रक्षा करते हैं, वे हम लोगों से सत्कार करने योग्य हैं॥२॥

आ॒स॒स्रा॒णासः॑ शवसा॒नमच्छेन्द्रं॑ सुच॒क्रे र॒थ्या॑सो॒ अश्वाः॑। अ॒भि श्रव॒ ऋज्य॑न्तो वहेयु॒र्नू चि॒न्नु वा॒योर॒मृतं॒ वि द॑स्येत्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे प्रजाजनो! जैसे राजा आप लोगों की वृद्धि करे, वैसे आप लोग भी इसकी वृद्धि करिये और सब योगाभ्यास करके प्राणों में वर्त्तमान परमात्मा को जान कर दुःखों का नाश करो॥३॥

वरि॑ष्ठो अस्य॒ दक्षि॑णामिय॒र्तीन्द्रो॑ म॒घोनां॑ तुविकू॒र्मित॑मः। यया॑ वज्रिवः परि॒यास्यंहो॑ म॒घा च॑ धृष्णो॒ दय॑से॒ वि सू॒रीन्॥

वही राजा स्थिर राज्य करने योग्य है जो विद्वानों और धार्मिक जनों पर दया करता और दुष्ट व्यसनों का त्याग करता है तथा पुरुषार्थी होकर दूतरूप चक्षुवाला हुआ प्रजाके पालन में यत्नवाला होता है॥४॥

इन्द्रो॒ वाज॑स्य॒ स्थवि॑रस्य दा॒तेन्द्रो॑ गी॒र्भिर्व॑र्धतां वृ॒द्धम॑हाः। इन्द्रो॑ वृ॒त्रं हनि॑ष्ठो अस्तु॒ सत्वा ता सू॒रिः पृ॑णति॒ तूतु॑जानः॥

हे मनुष्यो! जो अभय का देनेवाला, विद्या में वृद्धों और आप्तों का सेवक, दुष्टों का मारनेवाला, शीघ्रकर्त्ता, विद्वान् मनुष्य हो, उसी को तुम लोग राजा मानो॥५॥इस सूक्त में इन्द्र, राजा और प्रजा के कर्म्मों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सैंतीसवाँ सूक्त और नवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अपा॑दि॒त उदु॑ नश्चि॒त्रत॑मो म॒हीं भ॑र्षद्द्यु॒मती॒मिन्द्र॑हूतिम्। पन्य॑सीं धी॒तिं दैव्य॑स्य॒ याम॒ञ्जन॑स्य रा॒तिं व॑नते सु॒दानुः॑॥

हे मनुष्यो! जिस यथार्थवक्ता विद्वान् की सब के ऊपर दया, विद्यादान, निष्कपटता और उत्तम दृष्टि वर्त्तमान है, वही सब से सत्कार करने योग्य होता है॥१॥

दू॒राच्चि॒दा व॑सतो अस्य॒ कर्णा॒ घोषा॒दिन्द्र॑स्य तन्यति ब्रुवा॒णः। एयमे॑नं दे॒वहू॑तिर्ववृत्यान्म॒द्र्य१॒॑गिन्द्र॑मि॒यमृ॒च्यमा॑ना॥

हे मनुष्यो! जिसका आत्मा श्रोत्रों के द्वारा विद्या से तृप्त होवे और जिसको सम्पूर्ण विद्या से युक्त वाणी प्राप्त होवे, उसी का उत्तम प्रकार सेवन करके पूर्ण विद्या को प्राप्त हूजिये॥२॥

तं वो॑ धि॒या प॑र॒मया॑ पुरा॒जाम॒जर॒मिन्द्र॑म॒भ्य॑नूष्य॒र्कैः। ब्रह्मा॑ च॒ गिरो॑ दधि॒रे सम॑स्मिन्म॒हांश्च॒ स्तोमो॒ अधि॑ वर्ध॒दिन्द्रे॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य विद्वानों के उपदेश और पुरुषार्थ से बिजुली आदि की विद्यायुक्त बुद्धि की स्वीकार करते हैं, वे यहाँ स्तुति करने योग्य होते हैं॥३॥

वर्धा॒द्यं य॒ज्ञ उ॒त सोम॒ इन्द्रं॒ वर्धा॒द्ब्रह्म॒ गिर॑ उ॒क्था च॒ मन्म॑। वर्धाहै॑नमु॒षसो॒ याम॑न्न॒क्तोर्वर्धा॒न्मासाः॑ श॒रदो॒ द्याव॒ इन्द्र॑म्॥

हे मनुष्यो! जैसे विद्वानों का सत्कार और सङ्गतिस्वरूप व्यवहार, बिजुली आदि की विद्या को तथा अत्यन्त ऐश्वर्य्य और पूर्ण आयु को बढ़ाता है, वैसे ही आप लोग सम्पूर्ण श्रेष्ठ व्यवहारों को दिनरात्रि बढ़ाइये॥४॥

ए॒वा ज॑ज्ञा॒नं सह॑से॒ असा॑मि वावृधा॒नं राध॑से च श्रु॒ताय॑। म॒हामु॒ग्रमव॑से विप्र नू॒नमा वि॑वासेम वृत्र॒तूर्ये॑षु॥

जब मनुष्य सम्पूर्ण श्रेष्ठ गुण, कर्म्म और स्वभावों में वर्त्तमान शूरवीर विद्वान् की सेवा कर और विद्या को ग्रहण करके बल आदि को बढ़ावें तो वे कौन सा उत्तम कार्य्य न सिद्ध कर सकें॥५॥इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान्, उत्तम बुद्धि और वाणी के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्वसूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह अड़तीसवाँ सूक्त और दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

म॒न्द्रस्य॑ क॒वेर्दि॒व्यस्य॒ वह्ने॒र्विप्र॑मन्मनो वच॒नस्य॒ मध्वः॑। अपा॑ न॒स्तस्य॑ सच॒नस्य॑ दे॒वेषो॑ युवस्व गृण॒ते गोअ॑ग्राः॥

हे विद्वन्! आप ऐसा प्रयत्न करिये, जिससे हम लोगों को दिव्य सुख, दिव्य विद्या और दिव्य ऐश्वर्य्य प्राप्त होवे॥१॥

अ॒यमु॑शा॒नः पर्यद्रि॑मु॒स्रा ऋ॒तधी॑तिभिर्ऋत॒युग्यु॑जा॒नः। रु॒जदरु॑ग्णं॒ वि व॒लस्य॒ सानुं॑ प॒णीँर्वचो॑भिर॒भि यो॑ध॒दिन्द्रः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वान् जनो! जैसे सूर्य्य अपनी किरणों से भूमि से जल का आकर्षण कर धारण कर और मेघ के आकार का नाश करके पृथिवी के ऊपर गिराय सम्पूर्ण व्यवहारों को सिद्ध करता है, वैसे ही विद्वानों से श्रेष्ठ विद्याओं का आकर्षण कर, धारण करके उत्तम विद्यार्थियों में वर्षाय और अविद्या का नाश करके विज्ञान से धर्म्म, अर्थ काम और मोक्ष के व्यवहारों को सिद्ध करो॥२॥

अ॒यं द्यो॑तयद॒द्युतो॒ व्य१॒॑क्तून्दो॒षा वस्तोः॑ श॒रद॒ इन्दु॑रिन्द्र। इ॒मं के॒तुम॑दधु॒र्नू चि॒दह्नां॒ शुचि॑जन्मन उ॒षस॑श्चकार॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वान् जनो! आप लोग जैसे सूर्य्य, अप्रकाशक भूमि आदि का प्रकाश करने और आनन्द करनेवाला पवित्र क्षण आदि समयों का निर्म्माण करता है, वैसे मनुष्यों के आत्माओं के प्रकाशक हुए विद्या की वृद्धि करनेवाले कर्म्मों को निष्पन्न कीजिये और कर्मों का प्रचार कराइये॥३॥

अ॒यं रो॑चयद॒रुचो॑ रुचा॒नो॒३॒॑यं वा॑सय॒द्व्यृ१॒॑तेन॑ पू॒र्वीः। अ॒यमी॑यत ऋत॒युग्भि॒रश्वैः॑ स्व॒र्विदा॒ नाभि॑ना चर्षणि॒प्राः॥

जो विद्वान् जन सूर्य्य के सदृश प्रकाशात्मा होकर और अविद्या का विनाश कर मनुष्यों को विद्या से प्रकाशित करते हैं और सत्य आचरण के प्रति आकर्षित करते हैं, वे धन्य हैं॥४॥

नू गृ॑णा॒नो गृ॑ण॒ते प्र॑त्न राज॒न्निषः॑ पिन्व वसु॒देया॑य पू॒र्वीः। अ॒प ओष॑धीरवि॒षा वना॑नि॒ गा अर्व॑तो॒ नॄनृ॒चसे॑ रिरीहि॥

जो राजा सत्यवादी है और सत्य बोलनेवालों को प्रसन्न करता है और विद्वानों से विद्या और विनय को प्राप्त होकर सदा ही प्रजा के सुख चाहता है तथा यज्ञ और उत्तम सुगन्धित फल पुष्प से युक्त वृक्षों से और लता आदिकों से सब को सुखयुक्त करता हुआ, जल, ओषधि, वृक्ष, गौ, घोड़ा और मनुष्यों के सुख की वृद्धि के लिये परमेश्वर वा विद्वानों से याचना करता है, वही इस लोक और परलोक के अनन्त आनन्द को प्राप्त होता है॥५॥इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान्, सूर्य और राजा के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह उनचालीसवाँ सूक्त और ग्यारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इन्द्र॒ पिब॒ तुभ्यं॑ सु॒तो मदा॒याव॑ स्य॒ हरी॒ वि मु॑चा॒ सखा॑या। उ॒त प्र गा॑य ग॒ण आ नि॒षद्याथा॑ य॒ज्ञाय॑ गृण॒ते वयो॑ धाः॥

हे राजन्! आप सोमलता आदि बड़ी ओषधियों के रस का पान कर, रोगरहित होकर, सत्य और असत्य का निर्णय कर, सब मित्रों की स्तुति करके, विद्वानों की सभा में स्थित होकर और सत्य, न्याय का प्रचार करके, दीर्घ ब्रह्मचर्य्य से विद्याग्रहण के लिये सम्पूर्ण बालिका और बालकों को प्रवृत्त कराके सम्पूर्ण प्रजाओं को अधिक अवस्थावाली करिये॥१॥

अस्य॑ पिब॒ यस्य॑ जज्ञा॒न इ॑न्द्र॒ मदा॑य॒ क्रत्वे॒ अपि॑बो विरप्शिन्। तमु॑ ते॒ गावो॒ नर॒ आपो॒ अद्रि॒रिन्दुं॒ सम॑ह्यन्पी॒तये॒ सम॑स्मै॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! जिस भोजन और पान से बुद्धि और बल बढ़े, उसका भोजन और उसका पान करिए और उसका भोजन और पान कराइये और उसका पान न करिये और न कराइये, जिससे बुद्धिभ्रंश होवे॥२॥

समि॑द्धे अ॒ग्नौ सु॒त इ॑न्द्र॒ सोम॒ आ त्वा॑ वहन्तु॒ हर॑यो॒ वहि॑ष्ठाः। त्वा॒य॒ता मन॑सा जोहवी॒मीन्द्रा या॑हि सुवि॒ताय॑ म॒हे नः॑॥

हे राजन्! आप उत्तम मनुष्यों के साथ वैद्यों की उत्तम प्रकार परीक्षा कर, उत्तम रसों और अन्नों को सम्पन्न कर उनका भोजन कर, एकमत कर और प्रजाजनों की रक्षा करके अत्यन्त ऐश्वर्य्य को प्राप्त होकर हम लोगों को भी धनयुक्त करिये॥३॥

आ या॑हि॒ शश्व॑दुश॒ता य॑या॒थेन्द्र॑ म॒हा मन॑सा सोम॒पेय॑म्। उप॒ ब्रह्मा॑णि शृणव इ॒मा नोऽथा॑ ते य॒ज्ञस्त॒न्वे॒३॒॑ वयो॑ धात्॥

हे विद्वान् राजा आदि जनो! आप लोग विद्वानों के साथ मेल कर, बुद्धि और बल के बढ़ानेवाले आहार और विहार को कर, परस्पर विचार करके ब्रह्मचर्य्य आदि से अवस्था को बढ़ावें, जिससे सब महाशय आप्त होवें॥४॥

यदि॑न्द्र दि॒वि पार्ये॒ यदृध॒ग्यद्वा॒ स्वे सद॑ने॒ यत्र॒ वासि॑। अतो॑ नो य॒ज्ञमव॑से नि॒युत्वा॑न्त्स॒जोषाः॑ पाहि गिर्वणो म॒रुद्भिः॑॥

हे राजन्! आपको चाहिये कि सदा ही राज्य का उत्तम प्रकार रक्षण, सत्य का प्रचार और अपने सदृश सब का ज्ञान और ईश्वर के सदृश पक्षपात का त्याग करके महाशय धार्म्मिक श्रेष्ठ जनों के साथ प्रजा का पालन निरन्तर करें॥५॥इस सूक्त में इन्द्र, सोम, ओषधि, राजा और प्रजा के कृत्य का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चालीसवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अहे॑ळमान॒ उप॑ याहि य॒ज्ञं तुभ्यं॑ पवन्त॒ इन्द॑वः सु॒तासः॑। गावो॒ न व॑ज्रि॒न्त्स्वमोको॒ अच्छेन्द्रा ग॑हि प्रथ॒मो य॒ज्ञिया॑नाम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजन्! प्रजाजनों से उत्तम गुणों के योग के कारण सब से सत्कार किये गये राज्य-पालन नामक व्यवहार को यथावत् प्राप्त हूजिये और जैसे गौवें अपने बछड़े और स्थानों को प्राप्त होती हैं, वैसे प्रजा के पालन के लिये विनय को प्राप्त हूजिये॥१॥

या ते॑ का॒कुत्सुकृ॑ता॒ या वरि॑ष्ठा॒ यया॒ शश्व॒त्पिब॑सि॒ मध्व॑ ऊ॒र्मिम्। तया॑ पाहि॒ प्र ते॑ अध्व॒र्युर॑स्था॒त्सं ते॒ वज्रो॑ वर्ततामिन्द्र ग॒व्युः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजा और राजा के सभासद् उत्तम प्रकार संस्कार की विद्या से युक्त, सत्यभाषण से उज्ज्वलित वाणियों को प्राप्त होकर उनसे प्रजापालन आदि व्यवहारों को निरन्तर सिद्ध करें॥२॥

ए॒ष द्र॒प्सो वृ॑ष॒भो वि॒श्वरू॑प॒ इन्द्रा॑य॒ वृष्णे॒ सम॑कारि॒ सोमः॑। ए॒तं पि॑ब हरिवः स्थातरुग्र॒ यस्येशि॑षे प्र॒दिवि॒ यस्ते॒ अन्न॑म्॥

जिस राजा के अनेक प्रकार के उत्तम प्रबन्ध, उत्तम ओषधियाँ, उत्तम सेना और धार्मिक विद्वान् अधिकारी हैं, वही सम्पूर्ण प्रतिष्ठा को प्राप्त होता है॥३॥

सु॒तः सोमो॒ असु॑तादिन्द्र॒ वस्या॑न॒यं श्रेया॑ञ्चिकि॒तुषे॒ रणा॑य। ए॒तं ति॑तिर्व॒ उप॑ याहि य॒ज्ञं तेन॒ विश्वा॒स्तवि॑षी॒रा पृ॑णस्व॥

जो राजा छोटे भी सङ्ग्राम के लिये बड़ी सामग्री को इकट्ठी करते हैं, वे शत्रुओं को जीतते हुए सम्पूर्ण प्रजाओं को निरन्तर सुखी करने के योग्य हैं॥४॥

ह्वया॑मसि॒ त्वेन्द्र॑ याह्य॒र्वाङरं॑ ते॒ सोम॑स्त॒न्वे॑ भवाति। शत॑क्रतो मा॒दय॑स्वा सु॒तेषु॒ प्रास्माँ अ॑व॒ पृत॑नासु॒ प्र वि॒क्षु॥

जो राजा अपने ऐश्वर्य्य से सम्पूर्ण प्रजाओं की न्याय से रक्षा करता है, वह प्रशंसित, अधिक अवस्थावाला और आनन्दयुक्त वा आनन्द करानेवाला भी होता है॥५॥इस सूक्त में इन्द्र, राजा और सोम के रस का गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह इकतालीसवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्रत्य॑स्मै॒ पिपीष॑ते॒ विश्वा॑नि वि॒दुषे॑ भर। अ॒रं॒ग॒माय॒ जग्म॒येऽप॑श्चाद्दध्वने॒ नरे॑॥

जो राजा विद्वानों के लिये सम्पूर्ण धन वा सामर्थ्य को धारण करता है और जो विद्वान् राजा आदि के हित के लिये प्रयत्न करते हैं, वे सर्वदा उन्नत होते हैं॥१॥

एमे॑नं प्र॒त्येत॑न॒ सोमे॑भिः सोम॒पात॑मम्। अम॑त्रेभिर्ऋजी॒षिण॒मिन्द्रं॑ सु॒तेभि॒रिन्दु॑भिः॥

हे राजा और प्रजाजनो! आप लोग यथार्थवक्ता तथा राजा आदि विद्वानों में विश्वास करिये और वे आप लोगों में विश्वास करें, इस प्रकार दोनों और आनन्द बढ़े॥२॥

यदी॑ सु॒तेभि॒रिन्दु॑भिः॒ सोमे॑भिः प्रति॒भूष॑थ। वेदा॒ विश्व॑स्य॒ मेधि॑रो धृ॒षत्तन्त॒मिदेष॑ते॥

जो उत्तम-उत्तम मनुष्यों का सत्कार करते हैं, वे सबको श्रेष्ठ गुणों से शोभित करते हैं॥३॥

अ॒स्माअ॑स्मा॒ इदन्ध॒सोऽध्व॑र्यो॒ प्र भ॑रा सु॒तम्। कु॒वित्स॑मस्य॒ जेन्य॑स्य॒ शर्ध॑तो॒ऽभिश॑स्तेरव॒स्पर॑त्॥

जो विद्वान् सब के लिये सम्पूर्ण उत्तम पदार्थों को समर्पित करते हैं और जितने सामर्थ्य का धारण करते हैं, उतना सब औरों के रक्षण के लिये करते हैं, उन सब को भाग्यशाली गिनना चाहिये॥४॥इस सूक्त में इन्द्र, राजा, विद्वान् और प्रजा के कृत्य का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह बयालीसवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

यस्य॒ त्यच्छम्ब॑रं॒ मदे॒ दिवो॑दासाय र॒न्धयः॑। अ॒यं स सोम॑ इन्द्र ते सु॒तः पिब॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजा आदि जनो! आप धार्म्मिक जनों को पीड़ा देनेवाले मनुष्यों को यथावत् दण्ड दीजिये और वैद्यकशास्त्र में कही हुई रीति से बड़ी ओषधियों के रस को निकाल कर उसका सेवन कर रोगरहित होकर सम्पूर्ण प्रजाओं को रोगरहित करिये॥१॥

यस्य॑ तीव्र॒सुतं॒ मदं॒ मध्य॒मन्तं॑ च॒ रक्ष॑से। अ॒यं स सोम॑ इन्द्र ते सु॒तः पिब॑॥

हे विद्यायुक्त राजन्! आप वैसी ही ओषधियों को प्रकट करिये जिससे सब का सुख बढ़े॥२॥

यस्य॒ गा अ॒न्तरश्म॑नो॒ मदे॑ दृ॒ळ्हा अ॒वासृ॑जः। अ॒यं स सोम॑ इन्द्र ते सु॒तः पिब॑॥

हे विद्वानो! जिनके परमाणु मेघमण्डल में भी वर्त्तमान हैं, ओषधियों से उसका निर्म्माण वैद्यक रीति से कर और उसका सेवन करके रोगरहित हूजिये॥३॥

यस्य॑ मन्दा॒नो अन्ध॑सो॒ माघो॑नं दधि॒षे शवः॑। अ॒यं स सोम॑ इन्द्र ते सु॒तः पिब॑॥

हे मनुष्यो! जिससे बल, बुद्धि और सुख बढ़े, उसी रस और अन्न का निरन्तर सेवन करो॥४॥इस सूक्त में इन्द्र, सोम और विद्वान् के गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जानी चाहिये॥यह ऋग्वेद के छठे मण्डल में तृतीय अनुवाक, तेंतीसवाँ सूक्त और चौथे अष्टक में सातवें अध्याय में पन्द्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

यो र॑यिवो र॒यिन्त॑मो॒ यो द्यु॒म्नैर्द्यु॒म्नव॑त्तमः। सोमः॑ सु॒तः स इ॑न्द्र॒ तेऽस्ति॑ स्वधापते॒ मदः॑॥

हे राजा आदि जनो! आप लोगों को चाहिये कि अपने राज्य में बहुत धनाढ्य विद्वानों का सत्कार करके रक्षा करें, जिससे निरन्तर लक्ष्मी बढ़े॥१॥

यः श॒ग्मस्तु॑विशग्म ते रा॒यो दा॒मा म॑ती॒नाम्। सोमः॑ सु॒तः स इ॑न्द्र॒ तेऽस्ति॑ स्वधापते॒ मदः॑॥

जो मनुष्य धन आदि ऐश्वर्य्य से धर्म्म और विद्या की उन्नति करते हैं, वे ही बहुत सुख और धनवाले होते हैं॥२॥

येन॑ वृ॒द्धो न शव॑सा तु॒रो न स्वाभि॑रू॒तिभिः॑। सोमः॑ सु॒तः स इ॑न्द्र॒ तेऽस्ति॑ स्वधापते॒ मदः॑॥

हे मनुष्यो! जिस पुरुषार्थ से विद्वान् होकर युवा भी वृद्ध होते हैं, उसको निरन्तर सञ्चित कीजिये अर्थात् सह कीजिये॥३॥

त्यमु॑ वो॒ अप्र॑हणं गृणी॒षे शव॑स॒स्पति॑म्। इन्द्रं॑ विश्वा॒साहं॒ नरं॒ मंहि॑ष्ठं वि॒श्वच॑र्षणिम्॥

हे मनुष्यो! आप लोगों को उसकी प्रशंसा करनी चाहिये जो नित्य न्यायकारी, सबका सहनेवाला, महाशय, युद्ध आदि राजकर्म्मों में निपुण, दुष्टों का विदारक, दृढ़ उत्साही, मनुष्य होवे॥४॥

यं व॒र्धय॒न्तीद्गिरः॒ पतिं॑ तु॒रस्य॒ राध॑सः। तमिन्न्व॑स्य॒ रोद॑सी दे॒वी शुष्मं॑ सपर्यतः॥

जो मनुष्य श्रेष्ठ गुण, कर्म्म और स्वभावों में वृद्धि को प्राप्त जन की वृद्धि करते हैं, वे पञ्चतत्त्वमय राज्य का भोग करते हैं॥५॥

तद्व॑ उ॒क्थस्य॑ ब॒र्हणेन्द्रा॑योपस्तृणी॒षणि॑। विपो॒ न यस्यो॒तयो॒ वि यद्रोह॑न्ति स॒क्षितः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो विद्वानों के सदृश प्रजा के रक्षण से ऐश्वर्य्य को बढ़ाते हैं, वे सब प्रकार से बढ़ते हैं॥६॥

अवि॑द॒द्दक्षं॑ मि॒त्रो नवी॑यान्पपा॒नो दे॒वेभ्यो॒ वस्यो॑ अचैत्। स॒स॒वान्त्स्तौ॒लाभि॑र्धौ॒तरी॑भिरुरु॒ष्या पा॒युर॑भव॒त्सखि॑भ्यः॥

हे मनुष्यो! जो सब का मित्र, युवा, धन-धान्य आदि से युक्त, सब का रक्षक, बड़ी सेनावाला, विद्वान् राजा होवे, वही धार्म्मिकों के रक्षण के लिये सत्य बल को प्राप्त होवे॥७॥

ऋ॒तस्य॑ प॒थि वे॒धा अ॑पायि श्रि॒ये मनां॑सि दे॒वासो॑ अक्रन्। दधा॑नो॒ नाम॑ म॒हो वचो॑भि॒र्वपु॑र्दृ॒शये॑ वे॒न्यो व्या॑वः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि सर्वदा धर्ममार्ग में चलकर धन की उन्नति के लिये मनों को निश्चित करें और धन से प्राप्त हुए धन से अनाथों का पालन, विद्या और धन की वृद्धि तथा औषधदान और मार्ग शुद्धि करके सब दिशाओं में प्रशंसा विस्तारें॥८॥

द्यु॒मत्त॑मं॒ दक्षं॑ धेह्य॒स्मे सेधा॒ जना॑नां पू॒र्वीररा॑तीः। वर्षी॑यो॒ वयः॑ कृणुहि॒ शची॑भि॒र्धन॑स्य सा॒ताव॒स्माँ अ॑विड्ढि॥

प्रजाजनों को राजा की ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये कि हे राजन्! आप जो हम लोगों को बलयुक्त, कृपणता से रहित और ब्रह्मचर्य्य आदि से दीर्घ अवस्थावाले पुरुषार्थी और सब प्रकार से रक्षा करके भयरहित करके धर्म्म, अर्थ, काम और मोक्ष के साधन में प्रवेश कराइये तो आपकी हम लोग सर्वदा वृद्धि करें॥९॥

इन्द्र॒ तुभ्य॒मिन्म॑घवन्नभूम व॒यं दा॒त्रे ह॑रिवो॒ मा वि वे॑नः। नकि॑रा॒पिर्द॑दृशे मर्त्य॒त्रा किम॒ङ्ग र॑ध्र॒चोद॑नं त्वाहुः॥

हे राजा और प्रजा जनो! जैसे आप लोग आपस के लिये धन आदि से और सुख दान से सबको श्रेष्ठ कर्म्मों में प्रेरणा करिये, वैसे मिल के सत्य, न्यायपालन का अनुष्ठान करिये॥१०॥

मा जस्व॑ने वृषभ नो ररीथा॒ मा ते॑ रे॒वतः॑ स॒ख्ये रि॑षाम। पू॒र्वीष्ट॑ इन्द्र नि॒ष्षिधो॒ जने॑षु ज॒ह्यसु॑ष्वी॒न्प्र वृ॒हापृ॑णतः॥

हे राजन्! जो हम लोगों को पीड़ा देवें उनके आधीन मत करिये और कल्याण में क्रियाओं को प्राप्त कराइये, वैसे हम लोग भी इस सब को आपके लिये करें। इस प्रकार मित्र होकर अभीष्ट मनोरथों को सब हम लोग प्राप्त होवें॥११॥

उद॒भ्राणी॑व स्त॒नय॑न्निय॒र्तीन्द्रो॒ राधां॒स्यश्व्या॑नि॒ गव्या॑। त्वम॑सि प्र॒दिवः॑ का॒रुधा॑या॒ मा त्वा॑दा॒मान॒ आ द॑भन्म॒घोनः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जिसकी मेघों की घटाओं के समान बलवती सेना, बिजुली के समान पराक्रमयुक्त वर्त्तमान है और जिससे सब गुणी संग्रह किये जाते हैं; वही धन, धान्य, राज्य और पशु आदि पदार्थों को प्राप्त होता है॥१२॥

अध्व॑र्यो वीर॒ प्र म॒हे सु॒ताना॒मिन्द्रा॑य भर॒ स ह्य॑स्य॒ राजा॑। यः पू॒र्व्याभि॑रु॒त नूत॑नाभिर्गी॒र्भिर्वा॑वृ॒धे गृ॑ण॒तामृषी॑णाम्॥

वही राज्य पालन करने और बढ़ाने को समर्थ होता है, जो यथार्थवक्ताओं के सहित, उत्तम प्रकार शिक्षित और न्यायेश होवे और वही विद्वान् होता है, जो शिष्ट जनों से नित्य उपदेश सुनता है॥१३॥

अ॒स्य मदे॑ पु॒रु वर्पां॑सि वि॒द्वानिन्द्रो॑ वृ॒त्राण्य॑प्र॒ती ज॑घान। तमु॒ प्र हो॑षि॒ मधु॑मन्तमस्मै॒ सोमं॑ वी॒राय॑ शि॒प्रिणे॒ पिब॑ध्यै॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सूर्य्य के सदृश न्याय और विजय के प्रकाशक, युक्त आहार और विहारवाले और महौषधियों के रस को पीनेवाले हैं, वे अनेक प्रकार के पदार्थों को प्राप्त होकर इस जगत् में आनन्द करते हैं॥१४॥

पाता॑ सु॒तमिन्द्रो॑ अस्तु॒ सोमं॒ हन्ता॑ वृ॒त्रं वज्रे॑ण मन्दसा॒नः। गन्ता॑ य॒ज्ञं प॑रा॒वत॑श्चि॒दच्छा॒ वसु॑र्धी॒नाम॑वि॒ता का॒रुधा॑याः॥

जो राजा आदि मनुष्य वैद्यकशास्त्र की रीति से उत्पन्न किये ओषधियों के रस को पीते हैं तथा शस्त्र और अस्त्र की विद्या से दुष्टों का निवारण करके न्यायप्रचार नामक कर्म्म का प्रचार करके सत्कर्म्म के करने और शिल्पविद्या के जाननेवालों को सह करके आलस्य का त्याग करके श्रेष्ठ कर्म्मों में प्रवृत्त होते, वे ही यहाँ प्रशंसनीय होते हैं॥१५॥

इ॒दं त्यत्पात्र॑मिन्द्र॒पान॒मिन्द्र॑स्य प्रि॒यम॒मृत॑मपायि। मत्स॒द्यथा॑ सौमन॒साय॑ दे॒वं व्य१॒॑स्मद्द्वेषो॑ यु॒यव॒द्व्यंहः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जिससे मन में प्रमाद और द्वेष न होवे, उसी का पान करना चाहिये और जैसे अपने आत्मा की सब रक्षा करते हैं, वैसे अन्य सबों की रक्षा करें॥१६॥

ए॒ना म॑न्दा॒नो ज॒हि शू॑र॒ शत्रू॑ञ्जा॒मिमजा॑मिं मघवन्न॒मित्रा॑न्। अ॒भि॒षे॒णाँ अ॒भ्या॒३॒॑देदि॑शाना॒न्परा॑च इन्द्र॒ प्र मृ॑णा ज॒ही च॑॥

हे राजन् सेना के स्वामिन्! आप ब्रह्मचर्य और सोमलता के रस के पान आदि से स्वयं आनन्दित हुए वीरों को आनन्द देकर सम्पूर्ण शत्रुओं को जीतो॥१७॥

आ॒सु ष्मा॑ णो मघवन्निन्द्र पृ॒त्स्व१॒॑स्मभ्यं॒ महि॒ वरि॑वः सु॒गं कः॑। अ॒पां तो॒कस्य॒ तन॑यस्य जे॒ष इन्द्र॑ सू॒रीन्कृ॑णु॒हि स्मा॑ नो अ॒र्धम्॥

राजा वैसा यत्न करे जैसे अपनी सेनायें उत्तम प्रकार शिक्षित, जीतनेवाली और बलयुक्त होवें और सम्पूर्ण बालक और कन्यायें ब्रह्मचर्य्य से विद्यायुक्त होकर समृद्धि को प्राप्त हुए सत्य, न्याय और धर्म का निरन्तर सेवन करें॥१८॥

आ त्वा॒ हर॑यो॒ वृष॑णो युजा॒ना वृष॑रथासो॒ वृष॑रश्म॒योऽत्याः॑। अ॒स्म॒त्राञ्चो॒ वृष॑णो वज्र॒वाहो॒ वृष्णे॒ मदा॑य सु॒युजो॑ वहन्तु॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजा को चाहिये कि उत्तम प्रकार परीक्षा करके उत्तम गुण, कर्म्म और स्वभाववाले मनुष्यों को राज्य कर्म्म के अधिकारों में नियुक्त करे तथा आप भी श्रेष्ठ गुण, कर्म्म और स्वभाववाला होवे॥१९॥

आ ते॑ वृष॒न्वृष॑णो॒ द्रोण॑मस्थुर्घृत॒प्रुषो॒ नोर्मयो॒ मद॑न्तः। इन्द्र॒ प्र तुभ्यं॒ वृष॑भिः सु॒तानां॒ वृष्णे॑ भरन्ति वृष॒भाय॒ सोम॑म्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजन्! जो सत्यभाव से आपके राज्य के हित करने की इच्छा करते हैं, उनको आप सुखी रखिये और जैसे वायु से जल के तरङ्ग हैं, वैसे ही सत्संग से बुद्धियाँ बढ़ती हैं, ऐसा जानो॥२०॥

वृषा॑सि दि॒वो वृ॑ष॒भः पृ॑थि॒व्या वृषा॒ सिन्धू॑नां वृष॒भः स्तिया॑नाम्। वृष्णे॑ त॒ इन्दु॑र्वृषभ पीपाय स्वा॒दू रसो॑ मधु॒पेयो॒ वरा॑य॥

हे राजन्! जो आप बिजुली, भूमि, नदी, समुद्र, अन्तरिक्ष, स्थावर और जङ्गम पदार्थों की विद्या और उपयोग को जानिये तो आपको बड़ा आनन्द प्राप्त होवे॥२१॥

अ॒यं दे॒वः सह॑सा॒ जाय॑मान॒ इन्द्रे॑ण यु॒जा प॒णिम॑स्तभायत्। अ॒यं स्वस्य॑ पि॒तुरायु॑धा॒नीन्दु॑रमुष्णा॒दशि॑वस्य मा॒याः॥

हे राजन्! जो धर्म्मयुक्त व्यवहार को स्वयं करके सर्वत्र प्रचार करते हैं और युद्धविद्या में और उपदेश में कुशल हुए अमङ्गल का सब प्रकार नाश करके कल्याण को उत्पन्न करते हैं, वे आपसे सत्कार को प्राप्त हों॥२२॥

अ॒यम॑कृणोदु॒षसः॑ सु॒पत्नी॑र॒यं सूर्ये॑ अदधा॒ज्ज्योति॑र॒न्तः। अ॒यं त्रि॒धातु॑ दि॒वि रो॑च॒नेषु॑ त्रि॒तेषु॑ विन्दद॒मृतं॒ निगू॑ळ्हम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो इस जगत् में विवाहित एक स्त्री के ग्रहणरूप व्रतधारी, विद्या और अविद्या के प्रकाशक, कार्य्य-कारण स्वरूप गुप्त पदार्थों की विद्या के जाननेवाले होवें; वे सूर्य्य, ईश्वर और यथार्थवक्ता जन के सदृश मन्तव्य होवें॥२३॥

अ॒यं द्यावा॑पृथि॒वी वि ष्क॑भायद॒यं रथ॑मयुनक्स॒प्तर॑श्मिम्। अ॒यं गोषु॒ शच्या॑ प॒क्वम॒न्तः सोमो॑ दाधार॒ दश॑यन्त्र॒मुत्स॑म्॥

हे विद्वान् जनो! जो सूर्य्य के सदृश न्याय को, पृथिवी के सदृश क्षमा को, सब के धारण और दुग्ध आदि रसों को और सब जगत् को यथावत् निर्माण करके धारण करता है, वैसे आप लोग भी इस सब को धारण करिये॥२४॥इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान् और ईश्वर के गुण कर्मों के वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चवालीसवाँ सूक्त और बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

य आन॑यत्परा॒वतः॒ सुनी॑ती तु॒र्वशं॒ यदु॑म्। इन्द्रः॒ स नो॒ युवा॒ सखा॑॥

हे मनुष्यो! तुम उस राजा के साथ मैत्री करो, जो सत्य न्याय से दूर देश में स्थित भी विद्या, विनय और परोपकार में कुशल, श्रेष्ठ मनुष्य को सुनकर अपने समीप लाता है, उस राजा के साथ मित्र हुए वर्त्ताव करो॥१॥

अ॒वि॒प्रे चि॒द्वयो॒ दध॑दना॒शुना॑ चि॒दर्व॑ता। इन्द्रो॒ जेता॑ हि॒तं धन॑म्॥

जो विद्वान् राजा बालकों और अज्ञों में अध्यापन और उपदेश के प्रचार से विद्या को धारण करता है, वह यशस्वी होकर विना सेना के भी राज्य को प्राप्त होता है॥२॥

म॒हीर॑स्य॒ प्रणी॑तयः पू॒र्वीरु॒त प्रश॑स्तयः। नास्य॑ क्षीयन्त ऊ॒तयः॑॥

जो राजाजन नित्य बड़ी राजधर्म्मनीति को धारण करके पुत्र के सदृश प्रजाओं का पालन करते हैं, उनका नाशरहित यश होता है॥३॥

सखा॑यो॒ ब्रह्म॑वाह॒सेऽर्च॑त॒ प्र च॑ गायत। स हि नः॒ प्रम॑तिर्म॒ही॥

हे मनुष्यो! आप लोग परस्पर मित्र होकर परमेश्वर और सब के कल्याण के लिये प्रवृत्त यथार्थवक्ता तथा उपदेशक का सदा ही सत्कार करो, जिससे हम लोगों को उत्तम बुद्धि और वाणी प्राप्त होवे॥४॥

त्वमेक॑स्य वृत्रहन्नवि॒ता द्वयो॑रसि। उ॒तेदृशे॒ यथा॑ व॒यम्॥

हे राजन्! जैसे हम लोग पक्षपात का त्याग करके अपने और अन्य जन का यथावत् न्याय करें, वैसे ही आप करिये। ऐसे धर्म्मयुक्त व्यवहार में वर्त्तमान हम लोगों की सदा ही वृद्धि और मोक्ष होते हैं॥५॥

नय॒सीद्वति॒ द्विषः॑ कृ॒णोष्यु॑क्थशं॒सिनः॑। नृभिः॑ सु॒वीर॑ उच्यसे॥

हे राजन्! जो आप नम्रतायुक्त, विद्वान् होवें तो वेद में कहे हुए धर्म्म से द्वेष करनेवालों को भी उपदेश वा विनय से वेदोक्त धर्म्म में प्रीतिकरनेवाले कर सकते हो॥६॥

ब्र॒ह्माणं॒ ब्रह्म॑वाहसं गी॒र्भिः सखा॑यमृ॒ग्मिय॑म्। गां न दो॒हसे॑ हुवे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे विद्वान् जन वेदपारगन्ता, आप्त, विद्वान् का आश्रय लेकर सभ्य विपश्चित् होते हैं, वैसे इनके सङ्ग से तुम भी विद्वान् वा चतुर होओ॥७॥

यस्य॒ विश्वा॑नि॒ हस्त॑योरू॒चुर्वसू॑नि॒ नि द्वि॒ता। वी॒रस्य॑ पृतना॒षहः॑॥

जो राजा विद्या और विनय से पुत्र के सदृश प्रजाओं की पालना करे तो सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य और सम्पूर्ण सुख उसके आधीन ही होवे, जिससे उत्तम मन्त्री और प्रशंसित सेना को प्राप्त होकर राजा प्रजाजनों के कल्याण को कर सकता है॥८॥

वि दृ॒ळ्हानि॑ चिदद्रिवो॒ जना॑नां शचीपते। वृ॒ह मा॒या अ॑नानत॥

वह राजा, आचार्य्य वा अध्यापक उत्तम होवे, जो छल आदि दोषों का निवारण करके मनुष्यों को धर्म्म के आचरण से युक्त निरन्तर करे॥९॥

तमु॑ त्वा सत्य सोमपा॒ इन्द्र॑ वाजानां पते। अहू॑महि श्रव॒स्यवः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन् वा विद्वन्! आप श्रेष्ठ गुण, कर्म्म और स्वभाव से युक्त होकर प्रजा के पालन में तत्पर सुशील और इन्द्रियों के जीतनेवाले जब तक होंगे, तबतक हम लोग आपको मानेंगे॥१०॥

तमु॑ त्वा॒ यः पु॒रासि॑थ॒ यो वा॑ नू॒नं हि॒ते धने॑। हव्यः॒ स श्रु॑धी॒ हव॑म्॥

हे मनुष्यो! जो राजा सब के हित की इच्छा करे और सब को धन और ऐश्वर्य्य से युक्त करता है, वह बलिष्ठ और निर्बलों की बातों की प्रीति से सुन कर यथार्थ न्याय करता है, उसी का सब लोग निरन्तर सत्कार करें॥११॥

धी॒भिरर्व॑द्भि॒रर्व॑तो॒ वाजाँ॑ इन्द्र श्र॒वाय्या॑न्। त्वया॑ जेष्म हि॒तं धन॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जब राजा आदि जन एक सम्मति कर उत्तम सेना के अङ्गों को सम्पादन कर और अन्यायकारी दुष्टों को जीत कर न्याय से प्राप्त हुए धन से सब का हित करें, तभी अपने हित की सिद्धि से युक्त होवें॥१२॥

अभू॑रु वीर गिर्वणो म॒हाँ इ॑न्द्र॒ धने॑ हि॒ते। भरे॑ वितन्त॒साय्यः॑॥

जो राजा सब के हित के प्राप्त होने की इच्छा करता हुआ पुरुषों में ज्ञानी, किये हुए को जाननेवाला और योद्धाओं का प्रिय होवे, उसके सदा ही विजय से प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य्य बढ़े॥१३॥

या त॑ ऊ॒तिर॑मित्रहन्म॒क्षूज॑वस्त॒मास॑ति। तया॑ नो हिनुही॒ रथ॑म्॥

जो राजा वेग आदि गुणों से युक्त रक्षा से प्रजाओं को प्रसन्न करके उन्नति करे, वही निरन्तर वृद्धि को प्राप्त होवे॥१४॥

स रथे॑न र॒थीत॑मो॒ऽस्माके॑नाभि॒युग्व॑ना। जेषि॑ जिष्णो हि॒तं धन॑म्॥

जो राजा प्रशंसनीय वाहन आदि से बहुत धन को जीतता है, वह प्रशंसनीय होता है॥१५॥

य एक॒ इत्तमु॑ ष्टुहि कृष्टी॒नां विच॑र्षणिः। पति॑र्ज॒ज्ञे वृष॑क्रतुः॥

हे प्रजाजनो! जो सम्पूर्ण विद्या और श्रेष्ठ गुण, कर्म, स्वभाववाला निरन्तर न्याय से प्रजाओं के पालन में तत्पर होवे, उसको राजा मानो, दूसरे क्षुद्राशय को नहीं॥१६॥

यो गृ॑ण॒तामिदासि॑था॒पिरू॒ती शि॒वः सखा॑। स त्वं न॑ इन्द्र मृळय॥

हे राजन्! जो आप शत्रुरहित और संसार के मित्र, सब के मङ्गल करनेवाले प्रजाओं में हूजिये तो शीघ्र धर्म्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध करिये॥१७॥

धि॒ष्व वज्रं॒ गभ॑स्त्यो रक्षो॒हत्या॑य वज्रिवः। सा॒स॒ही॒ष्ठा अ॒भि स्पृधः॑॥

हे राजन् वा सेना के जनो! आप लोग शस्त्र और अस्त्रों के चलाने में चतुर होकर डाकू आदि शत्रुओं का नाश करके सहनशील हूजिये॥१८॥

प्र॒त्नं र॑यी॒णां युजं॒ सखा॑यं कीरि॒चोद॑नम्। ब्रह्म॑वाहस्तमं हुवे॥

जो सम्पूर्ण जनों के हितकारक, अत्यन्त विद्वान्, सत्य के ग्रहण और असत्य के त्याग के लिये अध्यापन और उपदेश से प्रेरणा करनेवाले, स्थिर मित्र का सत्कार करके प्रशंसा करते हैं, वे ही गुणग्राहक होते हैं॥१९॥

स हि विश्वा॑नि॒ पार्थि॑वाँ॒ एको॒ वसू॑नि॒ पत्य॑ते। गिर्व॑णस्तमो॒ अध्रि॑गुः॥

हे मनुष्यो! जो विलक्षण बुद्धि और विद्या से युक्त, पृथिवी आदि पदार्थों की विद्या का जाननेवाला, प्रशंसा करने योग्य गुण, कर्म, और स्वभावयुक्त और सत्य आचरण करनेवाला जन होवे, उसी को राजा करो॥२०॥

स नो॑ नि॒युद्भि॒रा पृ॑ण॒ कामं॒ वाजे॑भिर॒श्विभिः॑। गोम॑द्भिर्गोपते धृ॒षत्॥

हे राजन्! जो आप हम लोगों के मनोरथ की पूर्त्ति करिये तो हम लोग भी आपकी इच्छा की पूर्त्ति करें॥२१॥

तद्वो॑ गाय सु॒ते सचा॑ पुरुहू॒ताय॒ सत्व॑ने। शं यद्गवे॒ न शा॒किने॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सम्पूर्ण विद्याओं के पार जानेवाले के अध्यापन और उपदेशरूप कर्म्म से सब का मङ्गल बढ़ता है, वैसे ही उत्तम राजा से प्रजा का सुख उन्नत होता है॥२२॥

न घा॒ वसु॒र्नि य॑मते दा॒नं वाज॑स्य॒ गोम॑तः। यत्सी॒मुप॒ श्रव॒द्गिरः॑॥

जो मनुष्य विद्या और अभयदान देता और सम्पूर्ण विद्वानों से सत्य सुनता है, वह इस संसार में विघ्नों से नहीं मारा जाता है॥२३॥

कु॒वित्स॑स्य॒ प्र हि व्र॒जं गोम॑न्तं दस्यु॒हा गम॑त्। शची॑भि॒रप॑ नो वरत्॥

जो राजा दुष्टजनों को दूर करके न्याय व्यवहार के प्रचार के लिये उत्तम जनों का स्वीकार करता है, वह बड़े सत्य और असत्य का विचार करनेवाला होता है॥२४॥

इ॒मा उ॑ त्वा शतक्रतो॒ऽभि प्र णो॑नुवु॒र्गिरः॑। इन्द्र॑ व॒त्सं न मा॒तरः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजन्! जैसे गौवें प्रेम से अपने बछड़ों को प्रसन्न करती हैं, वैसे ही उत्तम प्रकार शिक्षित वाणियाँ सब को आनन्द देती हैं, ऐसा जानो॥२५॥

दू॒णाशं॑ स॒ख्यं तव॒ गौर॑सि वीर गव्य॒ते। अश्वो॑ अश्वाय॒ते भ॑व॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे गौओं में बैल और घोड़ियों में घोड़ा प्रसन्न सदा ही होता है, वैसे ही सज्जनों की मित्रता अविनाशिनी होती है, ऐसा सब लोग जानें॥२६॥

स म॑न्दस्वा॒ ह्यन्ध॑सो॒ राध॑से त॒न्वा॑ म॒हे। न स्तो॒तारं॑ नि॒दे क॑रः॥

हे राजा और प्रजाजनो! आप लोग अन्न आदि से सब को आनन्दित करिये और निन्दा न करने योग्यों की मत निन्दा करिये तथा ऐश्वर्य्य की वृद्धि के लिये निरन्तर प्रयत्न करिये॥२७॥

इ॒मा उ॑ त्वा सु॒तेसु॑ते॒ नक्ष॑न्ते गिर्वणो॒ गिरः॑। व॒त्सं गावो॒ न धे॒नवः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो श्रेष्ठ आचरण करनेवाले हैं, उनको गौ जैसे बछड़े को, वैसे सम्पूर्ण विद्या और वाणियाँ प्राप्त होती हैं॥२८॥

पु॒रू॒तमं॑ पुरू॒णां स्तो॑तॄ॒णां विवा॑चि। वाजे॑भिर्वाजय॒ताम्॥

वे ही बहुतों में उत्तम हैं जो विद्या, विनय और धर्म्माचरण को प्राप्त हुए हैं॥२९॥

अ॒स्माक॑मिन्द्र भूतु ते॒ स्तोमो॒ वाहि॑ष्ठो॒ अन्त॑मः। अ॒स्मान्रा॒ये म॒हे हि॑नु॥

हे राजन्! जो ऐश्वर्य्य आपका वह प्रजा का, और जो प्रजा का वह आपका हो ऐसा करने के विना राजा और प्रजा की उन्नति का नहीं सम्भव है॥३०॥

अधि॑ बृ॒बुः प॑णी॒नां वर्षि॑ष्ठे मू॒र्धन्न॑स्थात्। उ॒रुः कक्षो॒ न गा॒ङ्ग्यः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पृथिवियों में जाती हुई नदी के मध्यस्थ टापू और तट समीप में वर्त्तमान हैं, वैसे ही व्यापारियों के समीप में शिल्पीजन वर्त्तमान होवें॥३१॥

यस्य॑ वा॒योरि॑व द्र॒वद्भ॒द्रा रा॒तिः स॑ह॒स्रिणी॑। स॒द्यो दा॒नाय॒ मंह॑ते॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्या आदि के दान में प्रिय जन होवें, वे वायु के सदृश पूर्ण अभीष्ट सुख को प्राप्त होते हैं और जो शिल्पविद्या की वृद्धि करते हैं, वे असङ्ख्य धन को प्राप्त होते हैं॥३२॥

तत्सु नो॒ विश्वे॑ अ॒र्य आ सदा॑ गृणन्ति का॒रवः॑। बृ॒बुं स॑हस्र॒दात॑मं सू॒रिं स॑हस्र॒सात॑मम्॥

जो जन क्रिया में निपुण विद्वानों और कारीगरों की प्रशंसा करते हैं, वे असङ्ख्य धन को प्राप्त होकर असङ्ख्य धन देने योग्य होते हैं॥३३॥इस सूक्त में राजनीति, धन के जीतनेवाले, मित्रपन, वेद के जाननेवाले, ऐश्वर्य्य से युक्त, दाता, कारीगर और स्वामी के कृत्य का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पैंतालीसवाँ सूक्त और छब्बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

त्वामिद्धि हवा॑महे सा॒ता वाज॑स्य का॒रवः॑। त्वां वृ॒त्रेष्वि॑न्द्र॒ सत्प॑तिं॒ नर॒स्त्वां काष्ठा॒स्वर्व॑तः॥

हे धन से युक्त! जो आप हम लोगों के सहायक होवें तो आपके धन से हम लोग शिल्पविद्या से अनेक पदार्थों को रचकर आपको बड़ा धनी करें॥१॥

स त्वं न॑श्चित्र वज्रहस्त धृष्णु॒या म॒हः स्त॑वा॒नो अ॑द्रिवः। गामश्वं॑ र॒थ्य॑मिन्द्र॒ सं कि॑र स॒त्रा वाजं॒ न जि॒ग्युषे॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजा आदि मनुष्यो! जैसे जीतनेवाले योद्धा जन सङ्ग्राम में विजय को प्राप्त होकर धन और प्रतिष्ठा को प्राप्त होते हैं, वैसे ही शिल्पविद्या में चतुर जन बड़े ऐश्वर्य्य को प्राप्त होते हैं॥२॥

यः स॑त्रा॒हा विच॑र्षणि॒रिन्द्रं॒ तं हू॑महे व॒यम्। सह॑स्रमुष्क॒ तुवि॑नृम्ण॒ सत्प॑ते॒ भवा॑ स॒मत्सु॑ नो वृ॒धे॥

उसी की हम लोग प्रशंसा करते हैं, जो प्रतिदिन हम लोगों की रक्षा करता है और उसी की हम लोग सङ्ग्राम में रक्षा करें॥३॥

बाध॑से॒ जना॑न्वृष॒भेव॑ म॒न्युना॒ घृषौ॑ मी॒ळ्ह ऋ॑चीषम। अ॒स्माकं॑ बोध्यवि॒ता म॑हाध॒ने त॒नूष्व॒प्सु सूर्ये॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजन्! हम लोग दुष्टों के बाधने के लिये और सङ्ग्राम में अपने लोगों की रक्षा के लिये आपका स्वीकार करें तथा आप हम लोगों को सत्य न्यायकृत्य सदा ही जनाइये॥४॥

इन्द्र॒ ज्येष्ठं॑ न॒ आ भ॑रँ॒ ओजि॑ष्ठं॒ पपु॑रि॒ श्रवः॑। येने॒मे चि॑त्र वज्रहस्त॒ रोद॑सी॒ ओभे सु॑शिप्र॒ प्राः॥

हे राजन्! आप ऐसे गुण, कर्म्म और स्वभाव का स्वीकर करें, जिससे न्याय, भूमि, राज्य, सेना और विजय को धारण करने को समर्थ होवें॥५॥

त्वामु॒ग्रमव॑से चर्षणी॒सहं॒ राज॑न्दे॒वेषु॑ हूमहे। विश्वा॒ सु नो॑ विथु॒रा पि॑ब्द॒ना व॑सो॒ऽमित्रा॑न्त्सु॒षहा॑न्कृधि॥

जो राजा मन्त्री और प्रजाजनों के सुख और दुःख को अपने सदृश जान कर जैसे शत्रुओं का पराभव होवे वैसा उपाय करनेवाला होवे, उसी को सब लोग पिता के सदृश मानें॥६॥

यदि॑न्द्र॒ नाहु॑षी॒ष्वाँ ओजो॑ नृ॒म्णं च॑ कृ॒ष्टिषु॑। यद्वा॒ पञ्च॑ क्षिती॒नां द्यु॒म्नमा भ॑र स॒त्रा विश्वा॑नि॒ पौंस्या॑॥

हे राजन्! जो आप सम्पूर्ण प्रजाओं को धन-धान्य और विद्या से युक्त करिये तो पञ्चतत्त्वनामक राज्य को प्राप्त होकर धवलित यश को प्राप्त हूजिये॥७॥

यद्वा॑ तृ॒क्षौ म॑घवन्द्रु॒ह्यावा जने॒ यत्पू॒रौ कच्च॒ वृष्ण्य॑म्। अ॒स्मभ्यं॒ तद्रि॑रीहि॒ सं नृ॒षाह्ये॒ऽमित्रा॑न्पृ॒त्सु तु॒र्वणे॑॥

हे राजन्! जब आप उत्तम मनुष्यों में प्रतिष्ठा और दुष्टों में तिरस्कार धारण करें, तभी शत्रुओं के विजय के लिये योग्य होवें॥८॥

इन्द्र॑ त्रि॒धातु॑ शर॒णं त्रि॒वरू॑थं स्वस्ति॒मत्। छ॒र्दिर्य॑च्छ म॒घव॑द्भ्यश्च॒ मह्यं॑ च या॒वया॑ दि॒द्युमे॑भ्यः॥

मनुष्यों को चाहिये कि जो सब ऋतुओं में सुखकारक, धन धान्य से युक्त, वृक्ष, पुष्प, फल, शुद्ध वायु जल तथा धार्मिक और धनाढ्यों से युक्त गृह उसको बनाकर वहाँ निवास करें, जिससे सर्वदा आरोग्य से सुख बढ़े॥९॥

ये ग॑व्य॒ता मन॑सा॒ शत्रु॑माद॒भुर॑भिप्र॒घ्नन्ति॑ धृष्णु॒या। अध॑ स्मा नो मघवन्निन्द्र गिर्वणस्तनू॒पा अन्त॑मो भव॥

हे राजन्! जो ठग आदि दुष्ट शत्रुओं के बाँधनेवाले तथा प्रजाओं के पालन में तत्पर धार्मिक जन हों, उनके विश्वास से राज्य के कृत्यों को शोभित करिये॥१०॥

अध॑ स्मा नो वृ॒धे भ॒वेन्द्र॑ ना॒यम॑वा यु॒धि। यद॒न्तरि॑क्षे प॒तय॑न्ति प॒र्णिनो॑ दि॒द्यव॑स्ति॒ग्ममू॑र्धानः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! आप विमान आदि वाहनों को स्थापित कर पक्षियों के सदृश अन्तरिक्ष मार्ग से गमन और आगमन करके तथा उत्तम पुरुषों के साथ विजय को प्राप्त होकर सब से श्रेष्ठ हूजिये॥११॥

यत्र॒ शूरा॑सस्त॒न्वो॑ वितन्व॒ते प्रि॒या शर्म॑ पितॄ॒णाम्। अध॑ स्मा यच्छ त॒न्वे॒३॒॑ तने॑ च छ॒र्दिर॒चित्तं॑ या॒वय॒ द्वेषः॑॥

हे राजन्! शूरवीर धार्मिक जनों की सत्कारपूर्वक उत्तम प्रकार रक्षा कर शत्रुओं का निवारण कर उत्तम गृहों में पितरों और स्वामी जनों के लिये सुन्दर भोगों को देकर अपने यश का विस्तार करो॥१२॥

यदि॑न्द्र॒ सर्गे॒ अर्व॑तश्चो॒दया॑से महाध॒ने। अ॒स॒म॒ने अध्व॑नि वृजि॒ने प॒थि श्ये॒नाँइ॑व श्रवस्य॒तः॥

हे राजन्! युद्ध के विना भी जब जब कार्य्य के लिये गमन आप करें तब तब शीघ्र ही जाना चाहिये और शिथिलता पैरों से वा वाहन से जाने में नहीं करनी चाहिये॥१३॥

सिन्धूँ॑रिव प्रव॒ण आ॑शु॒या य॒तो यदि॒ क्लोश॒मनु॒ ष्वणि॑। आ ये वयो॒ न वर्वृ॑त॒त्यामि॑षि गृभी॒ता बा॒ह्वोर्गवि॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! तुम जैसे जल ऊँचे स्थान से नीचे के स्थान को शीघ्र जाता है और जैसे बाज आदि पक्षी माँस के लिये शीघ्र जाते हैं, वैसे भूमि, अन्तरिक्ष वा जल में वाहनों से शीघ्र जाओ॥१४॥इस सूक्त में राजा, वीर, सङ्ग्राम, गृह, शूरवीर और यान कृत्य के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह छयालीसवाँ सूक्त और उनतीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

स्वा॒दुष्किला॒यं मधु॑माँ उ॒तायं ती॒व्रः किला॒यं रस॑वाँ उ॒तायम्। उ॒तो न्व१॒॑स्य प॑पि॒वांस॒मिन्द्रं॒ न कश्च॒न स॑हत आह॒वेषु॑॥

जो ब्रह्मचर्य्य, जितेन्द्रियत्व और युक्त आहार-विहारों से शरीर और आत्मा के बल से युक्त होते हैं, उनको सङ्ग्रामों में सहने को शत्रु समर्थ नहीं हो सकते हैं॥१॥

अ॒यं स्वा॒दुरि॒ह मदि॑ष्ठ आस॒ यस्येन्द्रो॑ वृत्र॒हत्ये॑ म॒माद॑। पु॒रूणि॒ यश्च्यौ॒त्ना शम्ब॑रस्य॒ वि न॑व॒तिं नव॑ च दे॒ह्यो॒३॒॑हन्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जिसका उत्तम स्वाद और जिससे बल बुद्धि तथा पराक्रम बढ़ते हैं, उसके सेवन से शत्रुओं को जीत कर निष्कण्टक राज्य का सेवन करो॥२॥

अ॒यं मे॑ पी॒त उदि॑यर्ति॒ वाच॑म॒यं म॑नी॒षामु॑श॒तीम॑जीगः। अ॒यं षळु॒र्वीर॑मिमीत॒ धीरो॒ न याभ्यो॒ भुव॑नं॒ कच्च॒नारे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जिस पिये हुए से वाणी, बुद्धि, शरीर बढ़े और जिससे शास्त्र उत्तम प्रकार ग्रहण किये जायें, इसका ही सेवन करना चाहिये, न कि बुद्धि आदिकों के नाश करनेवाले का॥३॥

अ॒यं स यो व॑रि॒माणं॑ पृथि॒व्या व॒र्ष्माणं॑ दि॒वो अकृ॑णोद॒यं सः। अ॒यं पी॒यूषं॑ ति॒सृषु॑ प्र॒वत्सु॒ सोमो॑ दाधारो॒र्व१॒॑न्तरि॑क्षम्॥

हे मनुष्यो! जो सोमलतारूप ओषधि का रस वायु के साथ भूमि को, किरणों के साथ सूर्य्य को धारण करता है, उसको ग्रहण और सेवन करके सब रोगरहित होओ॥४॥

अ॒यं वि॑दच्चित्र॒दृशी॑क॒मर्णः॑ शु॒क्रस॑द्मनामु॒षसा॒मनी॑के। अ॒यं म॒हान्म॑ह॒ता स्कम्भ॑ने॒नोद्द्याम॑स्तभ्नाद्वृष॒भो म॒रुत्वा॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वान् जनो! आप लोग सूर्य्य के सदृश प्रातःकाल से लेकर प्रयत्न से विद्याओं को प्रकाशित करके सुख को प्राप्त होओ॥५॥

धृ॒षत्पि॑ब क॒लशे॒ सोम॑मिन्द्र वृत्र॒हा शू॑र सम॒रे वसू॑नाम्। माध्यं॑दिने॒ सव॑न॒ आ वृ॑षस्व रयि॒स्थानो॑ र॒यिम॒स्मासु॑ धेहि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! जैसे मध्याह्न में वर्त्तमान सूर्य्य सम्पूर्ण समीप में वर्त्तमान जगत् को प्रकाशित करता है, वैसे न्याय में वर्त्तमान हुए आप वादी और प्रतिवादी जनों की व्यवस्था करके राजनीति से न्याय को प्रकाशित कीजिये॥६॥

इन्द्र॒ प्र णः॑ पुरए॒तेव॑ पश्य॒ प्र नो॑ नय प्रत॒रं वस्यो॒ अच्छ॑। भवा॑ सुपा॒रो अ॑तिपार॒यो नो॒ भवा॒ सुनी॑तिरु॒त वा॒मनी॑तिः॥

जो राजा मनुष्यों की परीक्षा लेनेवाला और सब को न्याय मार्ग से ऐश्वर्य्य को प्राप्त कराने और दुःख और सङ्ग्राम से पार पहुँचानेवाला और सदा धर्मपूर्वक नीतियुक्त होवे, वही इस संसार में प्रशंसा को पावे॥७॥

उ॒रुं नो॑ लो॒कमनु॑ नेषि वि॒द्वान्त्स्व॑र्व॒ज्ज्योति॒रभ॑यं स्व॒स्ति। ऋ॒ष्वा त॑ इन्द्र॒ स्थवि॑रस्य बा॒हू उप॑ स्थेयाम शर॒णा बृ॒हन्ता॑॥

राजा बड़े प्रयत्न से अपने आधीन प्रजाओं को विद्या और अभय सुख से युक्त करे, जिससे सब प्रजा अनुकूल होवें॥८॥

वरि॑ष्ठे न इन्द्र व॒न्धुरे॑ धा॒ वहि॑ष्ठयोः शताव॒न्नश्व॑यो॒रा। इष॒मा व॑क्षी॒षां वर्षि॑ष्ठां॒ मा न॑स्तारीन्मघव॒न्रायो॑ अ॒र्यः॥

प्रजा और सेना के जनों को चाहिये कि राजा को ऐसी प्रेरणा करें कि आप हम लोगों को उत्तम वाहनों में उत्तम प्रकार बैठाकर अधिक धन प्राप्त कराइये, जिससे हम लोगों के वञ्चन को कभी मनुष्य न करें अर्थात् हम लोगों को कभी न ठगें॥९॥

इन्द्र॑ मृ॒ळ मह्यं॑ जी॒वातु॑मिच्छ चो॒दय॒ धिय॒मय॑सो॒ न धारा॑म्। यत्किं चा॒हं त्वा॒युरि॒दं वदा॑मि॒ तज्जु॑षस्व कृ॒धि मा॑ दे॒वव॑न्तम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजन्! जैसे सब जन सुवर्ण आदि धन की इच्छा करते हैं, वैसे ही आप अपनी प्रजा के पालन की इच्छा करिये और सम्पूर्ण प्रजायें जैसे उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी, यथार्थ ज्ञान, अवस्था और विद्वानों के सङ्ग को प्राप्त होवें, वैसे करिये॥१०॥

त्रा॒तार॒मिन्द्र॑मवि॒तार॒मिन्द्रं॒ हवे॑हवे सु॒हवं॒ शूर॒मिन्द्र॑म्। ह्वया॑मि श॒क्रं पु॑रुहू॒तमिन्द्रं॑ स्व॒स्ति नो॑ म॒घवा॑ धा॒त्विन्द्रः॑॥

जो मनुष्य जैसे सर्वत्र सहायक परमेश्वर को पुकारते हैं, वे वैसे ही राजा का भी सर्वत्र आश्रयण करें॥११॥

इन्द्रः॑ सु॒त्रामा॒ स्ववाँ॒ अवो॑भिः सुमृळी॒को भ॑वतु वि॒श्ववे॑दाः। बाध॑तां॒ द्वेषो॒ अभ॑यं कृणोतु सु॒वीर्य॑स्य॒ पत॑यः स्याम॥

हे मनुष्यो! जो राजा सम्पूर्ण विद्या और किये हुए पूर्ण ब्रह्मचर्य्य से युक्त बहुत मित्रोंवाला और अपने सदृश श्रेष्ठ का रक्षक, दुष्टों को दण्ड देनेवाला, सब प्रकार से निर्भयता करता है, उसकी रक्षा सब को चाहिये कि सब प्रकार से करें॥१२॥

तस्य॑ व॒यं सु॑म॒तौ य॒ज्ञिय॒स्यापि॑ भ॒द्रे सौ॑मन॒से स्या॑म। स सु॒त्रामा॒ स्ववाँ॒ इन्द्रो॑ अ॒स्मे आ॒राच्चि॒द्द्वेषः॑ सनु॒तर्यु॑योतु॥

हे राजा और प्रजाजनो! जिस शुद्ध, न्याय और श्रेष्ठ गुणों में राजा वर्त्ताव करे, वैसे इस विषय में हम लोग भी वर्त्ताव करें और सब मिलकर मनुष्यों से दोषों को दूर करके गुणों को संयुक्त करके सब काल में न्याय और धर्म्म के पालन करनेवाले होवें॥१३॥

अव॒ त्वे इ॑न्द्र प्र॒वतो॒ नोर्मिर्गिरो॒ ब्रह्मा॑णि नि॒युतो॑ धवन्ते। उ॒रू न राधः॒ सव॑ना पु॒रूण्य॒पो गा व॑ज्रिन्युवसे॒ समिन्दू॑न्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो ब्रह्मचर्य्य आदि श्रेष्ठ कर्मों को करते हैं, उनको नीचे के स्थान को जल जैसे और पुरुषार्थी को लक्ष्मी जैसे वैसे सम्पूर्ण विद्या, सम्पूर्ण ऐश्वर्य और सम्पूर्ण आनन्द प्राप्त होते हैं॥१४॥

क ईं॑ स्तव॒त्कः पृ॑णा॒त्को य॑जाते॒ यदु॒ग्रमिन्म॒घवा॑ वि॒श्वहावे॑त्। पादा॑विव प्र॒हर॑न्न॒न्यम॑न्यं कृ॒णोति॒ पूर्व॒मप॑रं॒ शची॑भिः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वान् जनो! हम लोग आप लोगों से पूछते हैं कि इस संसार में कौन ईश्वर की प्रशंसा करता, कौन सब का न्याय से पालन करता और कौन विद्वानों का सत्कार करता है, इन प्रश्नों का क्रम से उत्तर−जो विद्या के योग से धन से युक्त है, वह सर्वदा परमेश्वर ही की स्तुति करता है और जो न्यायकारी राजा पक्षपात का त्याग कर अपराधी को दण्ड देता और धार्मिक का सत्कार करता है, वह सर्वरक्षक है और जो स्वयं विद्वान् गुण और दोषों का जाननेवाला है, वही विद्वानों का सत्कार करने योग्य है, ये उत्तर हैं॥१५॥

शृ॒ण्वे वी॒र उ॒ग्रमु॑ग्रं दमा॒यन्न॒न्यम॑न्यमतिनेनी॒यमा॑नः। ए॒ध॒मा॒न॒द्विळु॒भय॑स्य॒ राजा॑ चोष्कू॒यते॒ विश॒ इन्द्रो॑ मनु॒ष्या॑न्॥

हे मनुष्यो! जो मनुष्य दुष्टों-दुष्टों को ताड़न करता, श्रेष्ठों-श्रेष्ठों का सत्कार करता, अन्य की वृद्धि देख कर द्वेष करनेवालों को दण्ड देता और प्रसन्नों का सत्कार करता हुआ सम्पूर्ण वादी और प्रतिवादी के वचनों को यथावत् सुन के सत्य न्याय को करता है, वही राजा होने के योग्य है॥१६॥

परा॒ पूर्वे॑षां स॒ख्या वृ॑णक्ति वि॒तर्तु॑राणो॒ अप॑रेभिरेति। अना॑नुभूतीरवधून्वा॒नः पू॒र्वीरिन्द्रः॑ श॒रद॑स्तर्तरीति॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा वृद्ध जनों के मित्रपन का त्याग करके नीच मित्रों को प्राप्त होता है, वह कल्याण से च्युत होता है और जो अनभिज्ञ मित्रों का त्याग करके अभिज्ञों को मित्र करता है, वही पूर्ण आयु भर सुख से पार होता है॥१७॥

रू॒पंरू॑पं॒ प्रति॑रूपो बभूव॒ तद॑स्य रू॒पं प्र॑ति॒चक्ष॑णाय। इन्द्रो॑ मा॒याभिः॑ पुरु॒रूप॑ ईयते यु॒क्ता ह्य॑स्य॒ हर॑यः श॒ता दश॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! बिजुली पदार्थ के प्रति तद्रूप होती है, वैसे ही जीव शरीर-शरीर के प्रति तत्स्वभाववाला होता है और जब बाह्य विषय के देखने की इच्छा करता है, तब उसको देख के तत्स्वरूपज्ञान इस जीव को होता है और जो जीव के शरीर में बिजुली के सहित असङ्ख्य नाड़ी हैं, उन नाड़ियों से यह सब शरीर के समाचार को जानता है॥१८॥

यु॒जा॒नो ह॒रिता॒ रथे॒ भूरि॒ त्वष्टे॒ह रा॑जति। को वि॒श्वाहा॑ द्विष॒तः पक्ष॑ आसत उ॒तासी॑नेषु सू॒रिषु॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! सदा ही मूर्खों का पक्ष त्याग के विद्वानों के पक्ष में वर्त्ताव करिये और जैसे अच्छा सारथी घोड़ों को अच्छे प्रकार [वश में करके] रथ में जोड़ कर सुख से गमन आदि कार्यों को सिद्ध करता है, वैसे जितेन्द्रिय जीव सम्पूर्ण अपने प्रयोजनों को सिद्ध कर सकता है और जैसे कोई दुष्ट सारथी घोड़ों से युक्त रथ में स्थित होकर दुःखी होता है, वैसे ही अजित इन्द्रियाँ जिसमें ऐसे शरीर में स्थित होकर जीव दुःखी होता है॥१९॥

अ॒ग॒व्यू॒ति क्षेत्र॒माग॑न्म देवा उ॒र्वी स॒ती भूमि॑रंहूर॒णाभू॑त्। बृह॑स्पते॒ प्र चि॑कित्सा॒ गवि॑ष्टावि॒त्था स॒ते ज॑रि॒त्र इ॑न्द्र॒ पन्था॑म्॥

हे मनुष्यो! जो श्रेष्ठ वैद्य होवें उनके साथ मित्रता से रोग रहित, अधिक अवस्थावाले, बलिष्ठ, विद्वान् हो और भूमि के राज्य को प्राप्त होकर जहाँ कहीं विमान आदि वाहनों से जा-आ कर विद्वानों के मार्ग का आश्रयण करो॥२०॥

दि॒वेदि॑वे स॒दृशी॑र॒न्यमर्धं॑ कृ॒ष्णा अ॑सेध॒दप॒ सद्म॑नो॒ जाः। अह॑न्दा॒सा वृ॑ष॒भो व॑स्न॒यन्तो॒दव्र॑जे व॒र्चिनं॒ शम्ब॑रं च॥

हे मनुष्यो! जैसे सूर्य और मेघ समस्त पृथिवी का आकर्षण कर प्रकाश और जलयुक्त करते हैं वा जैसे सूर्य इस पृथिवी के अर्द्धभाग को प्रकाशित करता और वर्षा को करता है तथा अन्धकार का निवारण कर सबको सुखी करता है, वैसे ही राजा और प्रजाजन सत्य को खैंच असत्य को त्याग कर अन्याय का निवारण कर न्याय का प्रचार कर और उत्तम विद्या के उपदेशों की वृष्टि कर सब मनुष्यों को सुखी करें॥२१॥

प्र॒स्तो॒क इन्नु राध॑सस्त इन्द्र॒ दश॒ कोश॑यी॒र्दश॑ वा॒जिनो॑ऽदात्। दिवो॑दासादतिथि॒ग्वस्य॒ राधः॑ शाम्ब॒रं वसु॒ प्रत्य॑ग्रभीष्म॥

हे राजन्! जो आपके राज्य में असङ्ख्य धनों को देने, वृष्टि करने तथा अतिथियों के सङ्ग का सेवन करनेवाला जन होवे, उसकी रक्षा को आप करिये और जो हम लोगों को धन प्राप्त होवे, उसको आपके लिये हम लोग देवें और जो आपको प्राप्त होवे उसको हम लोगों के लिये दीजिये॥२२॥

दशाश्वा॒न्दश॒ कोशा॒न्दश॒ वस्त्राधि॑भोजना। दशो॑ हिरण्यपि॒ण्डान्दिवो॑दासादसानिषम्॥

जो धार्मिक, शूरवीर और शत्रुओं के जीतनेवाले, राजभक्त और प्रजा के पालन में तत्पर विद्वान् मन्त्रीजन होवें, वे घोड़े आदि सम्पूर्ण पदार्थों को दशगुने राजा के समीप से प्राप्त होवें॥२३॥

दश॒ रथा॒न्प्रष्टि॑मतः श॒तं गा अथ॑र्वभ्यः। अ॒श्व॒थः पा॒यवे॑ऽदात्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा आदि जन पालन करने योग्य के लिये पशु रथ आदि के रक्षण के अधिकार को देते हैं, वे अच्छी सामग्री से युक्त होते हैं॥२४॥

महि॒ राधो॑ वि॒श्वज॑न्यं॒ दधा॑नान्भ॒रद्वा॑जान्त्सार्ञ्ज॒यो अ॒भ्य॑यष्ट॥

जो ब्रह्मचर्य्य से शरीर और आत्मा को बलिष्ठ कर और सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य को बढ़ाय के उत्तम पुरुषों को ग्रहण करता है, वही राजा राज्य के बढ़ाने के योग्य होवे॥२५॥

वन॑स्पते वी॒ड्व॑ङ्गो॒ हि भू॒या अ॒स्मत्स॑खा प्र॒तर॑णः सु॒वीरः॑। गोभिः॒ संन॑द्धो असि वी॒ळय॑स्वास्था॒ता ते॑ जयतु॒ जेत्वा॑नि॥

मनुष्यों को चाहिये कि धार्मिक बलवान् के साथ मित्रता करें, जिससे सर्वदा विजय हो॥२६॥

दि॒वस्पृ॑थि॒व्याः पर्योज॒ उद्भृ॑तं॒ वन॒स्पति॑भ्यः॒ पर्याभृ॑तं॒ सहः॑। अ॒पामो॒ज्मानं॒ परि॒ गोभि॒रावृ॑त॒मिन्द्र॑स्य॒ वज्रं॑ ह॒विषा॒ रथं॑ यज॥

जो मनुष्य सब ओर से बल को ग्रहण करके जलों के बलकारी मेघ को जैसे वैसे सुख को वर्षाते हैं, वे सब प्रकार से सत्कृत होते हैं॥२७॥

इन्द्र॑स्य॒ वज्रो॑ म॒रुता॒मनी॑कं मि॒त्रस्य॒ गर्भो॒ वरु॑णस्य॒ नाभिः॑। सेमां नो॑ ह॒व्यदा॑तिं जुषा॒णो देव॑ रथ॒ प्रति॑ ह॒व्या गृ॑भाय॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वान् जनो! बिजुली आदि पदार्थों और सम्पूर्ण मूर्त्त द्रव्यों के मध्य में वर्त्तमान कर्म्मों से युक्त सेना को करके विजय से शोभित हूजिये॥२८॥

उप॑ श्वासय पृथि॒वीमु॒त द्यां पु॑रु॒त्रा ते॑ मनुतां॒ विष्ठि॑तं॒ जग॑त्। स दु॑न्दुभे स॒जूरिन्द्रे॑ण दे॒वैर्दू॒राद्दवी॑यो॒ अप॑ सेध॒ शत्रू॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो! जैसे ईश्वर ने पृथिवी और सूर्यादि सम्पूर्ण संसार को अपनी सत्ता से स्थापित किया, वैसे ही बिजुली सम्पूर्ण द्रव्यों में अभिव्याप्त होकर मध्य में प्रविष्ट है, ईश्वर की उपासना और बिजुली आदि के प्रयोगों से दूर पर स्थित भी शत्रुओं को जीत कर सब को जिलाओ॥२९॥

आ क्र॑न्दय॒ बल॒मोजो॑ न॒ आ धा॒ निः ष्ट॑निहि दुरि॒ता बाध॑मानः। अप॑ प्रोथ दुन्दुभे दु॒च्छुना॑ इ॒त इन्द्र॑स्य मु॒ष्टिर॑सि वी॒ळय॑स्व॥

हे राजन्! आप ऐसे बल को धारण करिये जिससे दुष्ट व्यसन, और दुष्ट शत्रु नष्ट होवें और प्रजाओं के पोषण करने को समर्थ होवें॥३०॥

आमूर॑ज प्र॒त्याव॑र्तये॒माः के॑तु॒मद्दु॑न्दु॒भिर्वा॑वदीति। समश्व॑पर्णा॒श्चर॑न्ति नो॒ नरो॒ऽस्माक॑मिन्द्र र॒थिनो॑ जयन्तु॥

हे राजा आदि जनो! तुम लोग दुन्दुभि आदि वाजनों से भूषित, हर्ष वा पुष्टि से युक्त सेनाओं को अच्छे प्रकार रख कर इनसे दूरस्थ भी शत्रुओं को अच्छे प्रकार जीतकर प्रजाओं को धर्मयुक्त व्यवहार से पालन करो॥३१॥इस सूक्त में सोम, प्रश्नोत्तर, बिजुली, राजा, प्रजा, सेना और वाजनों से भूषित कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥इस अध्याय में इन्द्र, सोम, ईश्वर, राजा, प्रजा, मेघ, सूर्य, वीर, सेना, यान, यज्ञ, मित्र, ऐश्वर्य्य, प्रज्ञा, बिजुली, बुद्धिमान्, वाणी, सत्य, बल, पराक्रम, राजनीति, सङ्ग्राम और शत्रुविजय आदि गुणों का वर्णन होने से इस अध्याय की पूर्वाध्याय के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीमद् विरजानन्द सरस्वती स्वामी के शिष्य श्रीमद्दयानन्दसरस्वती स्वामिविरचित, सुप्रमाणयुक्त, आर्यभाषाविभूषित, ऋग्वेदभाष्य के चौथे अष्टक में सप्तम अध्याय पैंतीसवाँ वर्ग और छठे मण्डल में सैंतालीसवाँ सूक्त भी समाप्त हुआ॥

य॒ज्ञाय॑ज्ञा वो अ॒ग्नये॑ गि॒रागि॑रा च॒ दक्ष॑से। प्रप्र॑ व॒यम॒मृतं॑ जा॒तवे॑दसं प्रि॒यं मि॒त्रं न शं॑सिषम्॥

हे मनुष्यो! जैसे विद्वान् जन आप लोगों की प्रीति उत्पन्न करें, वैसे आप भी हमारे कार्य साधने के लिये प्रीति उत्पन्न कीजिये॥१॥

ऊ॒र्जो नपा॑तं॒ स हि॒नायम॑स्म॒युर्दाशे॑म ह॒व्यदा॑तये। भुव॒द्वाजे॑ष्ववि॒ता भुव॑द्वृ॒ध उ॒त त्रा॒ता त॒नूना॑म्॥

हे प्रजासेनाजनो! जो राजा सङ्ग्राम वा असङ्ग्राम में सबकी रक्षा करनेवाला निरन्तर हो, तनुकूल वर्ताव कर हम लोग उसके लिये पुष्कल सुख देवें॥२॥

वृषा॒ ह्य॑ग्ने अ॒जरो॑ म॒हान्वि॒भास्य॒र्चिषा॑। अज॑स्रेण शो॒चिषा॒ शोशु॑चच्छुचे सुदी॒तिभिः॒ सु दी॑दिहि॥

हे राजन्! आपको चाहिये कि निरन्तर विद्या और विनय के प्रकाश से और दुष्ट व्यसनों के नाश से प्रजा की निरन्तर पालना करो॥३॥

म॒हो दे॒वान्यज॑सि॒ यक्ष्या॑नु॒षक्तव॒ क्रत्वो॒त दं॒सना॑। अ॒र्वाचः॑ सीं कृणुह्य॒ग्नेऽव॑से॒ रास्व॒ वाजो॒त वं॑स्व॥

जो मूर्खों को विद्वान् करते हैं, वे महत् अनुकूल सुख को प्राप्त होते हैं॥४॥

यमापो॒ अद्र॑यो॒ वना॒ गर्भ॑मृ॒तस्य॒ पिप्र॑ति। सह॑सा॒ यो म॑थि॒तो जाय॑ते॒ नृभिः॑ पृथि॒व्या अधि॒ सान॑वि॥

हे मनुष्यो! जो सब में व्याप्त होकर रहनेवाले अग्नि को विद्वान् जन प्राप्त होते और मथि के प्रदीप्त करते हैं, वे भूमि के राज्य करने में अधिष्ठाता होते हैं॥५॥

आ यः प॒प्रौ भा॒नुना॒ रोद॑सी उ॒भे धू॒मेन॑ धावते दि॒वि। ति॒रस्तमो॑ ददृश॒ ऊर्म्या॒स्वा श्या॒वास्व॑रु॒षो वृषा श्या॒वा अ॑रु॒षो वृषा॑॥

जिस बिजुलीरूप आग से भूमि और सूर्य्य दिखाते हैं, जिससे अधिक वेगवान् कोई नहीं तथा जो अन्धकार की निवृत्ति करनेवाला है, उसका अच्छे प्रकार प्रयोग करो॥६॥

बृ॒हद्भि॑रग्ने अ॒र्चिभिः॑ शु॒क्रेण॑ देव शो॒चिषा॑। भ॒रद्वा॑जे समिधा॒नो य॑विष्ठ्य रे॒वन्नः॑ शुक्र दीदिहि द्यु॒मत्पा॑वक दीदिहि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वान् जन सूर्य के समान शुभ गुणों में बल वा सुशीलता से लक्ष्मी को प्राप्त होकर प्रकाशित होते हैं, वे सत्कार करने योग्य हैं॥७॥

विश्वा॑सां गृ॒हप॑तिर्वि॒शाम॑सि॒ त्वम॑ग्ने॒ मानु॑षीणाम्। श॒तं पू॒र्भिर्य॑विष्ठ पा॒ह्यंह॑सः समे॒द्धारं॑ श॒तं हिमाः॑ स्तो॒तृभ्यो॒ ये च॒ दद॑ति॥

हे राजन्! जो इस प्रजा में विद्या और धर्म आदि शुभ गुणों को ग्रहण कराते हैं, उनका तुम निरन्तर सत्कार करो और वे आपका भी सत्कार करें॥८॥

त्वं न॑श्चि॒त्र ऊ॒त्या वसो॒ राधां॑सि चोदय। अ॒स्य रा॒यस्त्वम॑ग्ने र॒थीर॑सि वि॒दा गा॒धं तु॒चे तु नः॑॥

हे विद्वन्! आप जैसे इन हमारे सन्तानों की बुद्धि के विलोडने से विद्या प्राप्ति हो, वैसे अनुविधान कीजिये तथा जैसे पुरुषार्थी जन धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये प्रेरणा करता है, वैसे ही आप शिक्षा दीजिये॥९॥

पर्षि॑ तो॒कं तन॑यं प॒र्तृभि॒ष्ट्वमद॑ब्धै॒रप्र॑युत्वभिः। अग्ने॒ हेळां॑सि॒ दैव्या॑ युयोधि॒ नोऽदे॑वानि॒ ह्वरां॑सि च॥

जो अध्यापक वा उपदेशक पढ़ाने तथा उपदेश करने से शुभ गुणों को ग्रहण करा कर सब के दोषों का निवारण कराते हैं, वे ही सदा सत्कार करने योग्य होते हैं॥१०॥

आ स॑खायः सब॒र्दुघां॑ धे॒नुम॑जध्व॒मुप॒ नव्य॑सा॒ वचः॑। सृ॒जध्व॒मन॑पस्फुराम्॥

जो सुहृद् होकर सत्य, सुन्दर शिक्षायुक्त वाणी और विद्या को विद्यार्थियों को ग्रहण कराते हैं, वे संसार के शुद्ध करनेवाले होते हैं॥११॥

या शर्धा॑य॒ मारु॑ताय॒ स्वभा॑नवे॒ श्रवोऽमृ॑त्यु॒ धुक्ष॑त। या मृ॑ळी॒के म॒रुतां॑ तु॒राणां॒ या सु॒म्नैरे॑व॒याव॑री॥

वे ही स्त्रियाँ धन्य हैं, जो अपने सन्तानों को विद्या और सुन्दर शिक्षायुक्त करने व कराने को निरन्तर प्रयत्न करती हैं॥१२॥

भ॒रद्वा॑जा॒याव॑ धुक्षत द्वि॒ता। धे॒नुं च॑ वि॒श्वदो॑हस॒मिषं॑ च वि॒श्वभो॑जसम्॥

जो स्त्रीजन सत्यभाषणयुक्त वाणी और सर्वोत्तम सत्य विद्या को सन्तानों के लिये देती हैं, वे ही देवी विदुषी स्त्रियाँ बहुत मान करने के योग्य होती हैं॥१३॥

तं व॒ इन्द्रं॒ न सु॒क्रतुं॒ वरु॑णमिव मा॒यिन॑म्। अ॒र्य॒मणं॒ न म॒न्द्रं सृ॒प्रभो॑जसं॒ विष्णुं॒ न स्तु॑ष आ॒दिशे॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य सूर्य्य के समान विद्याप्रकाशक, व्याध के समान दुष्टों के मारनेवाले, आप्त विद्वान् के समान न्याय के करनेवाले, ईश्वर के समान सर्व के पालनेवाले, सत्य के उपदेश करनेवाले तथा धर्म करनेवाले मनुष्य की प्रशंसा करते हैं, वे ही इस संसार में परीक्षा करनेवाले होते हैं॥१४॥

त्वे॒षं शर्धो॒ न मारु॑तं तुवि॒ष्वण्य॑न॒र्वाणं॑ पू॒षणं॒ सं यथा॑ श॒ता। सं स॒हस्रा॒ कारि॑षच्चर्ष॒णिभ्य॒ आँ आ॒विर्गू॒ळ्हा वसू॑ करत्सु॒वेदा॑ नो॒ वसू॑ करत्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे विद्वान् जन विज्ञानदान से गुप्त विद्याओं को तुम्हारे लिये प्रकट करते हैं और आपके शारीरिक और आत्मिक बल को बढ़ाते हैं, वैसे इनको तुम बढ़ाओ॥१५॥

आ मा॑ पूष॒न्नुप॑ द्रव॒ शंसि॑षं॒ नु ते॑ अपिक॒र्ण आ॑घृणे। अ॒घा अ॒र्यो अरा॑तयः॥

हे पालनीय जन! आप रक्षा के लिये मेरे समीप आओ, मैं सत्योपदेश से तुम्हें विचक्षण करूँ तथा हम सब लोग मिल के दुष्टों का विनाश करें॥१६॥

म का॑क॒म्बीर॒मुद्वृ॑हो॒ वन॒स्पति॒मश॑स्ती॒र्वि हि नीन॑शः। मोत सूरो॒ अह॑ ए॒वा च॒न ग्री॒वा आ॒दध॑ते॒ वेः॥

किसी मनुष्य को श्रेष्ठ वृक्ष वा वनस्पति न नष्ट करने चाहियें, किन्तु इनमें जो दोष हों, उनको निवारण करके इन्हें उत्तम सिद्ध करने चाहियें, हे मनुष्य! जैसे श्येन वाज पक्षी और पखेरूओं की गर्दनें पकड़ घोटता है, वैसे किसी को दुःख न देओ॥१७॥

दृते॑रिव तेऽवृ॒कम॑स्तु स॒ख्यम्। अच्छि॑द्रस्य दध॒न्वतः॒ सुपू॑र्णस्य दध॒न्वतः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे मेघ और भूमि का मित्रवत् व्यवहार है, वैसे ही धार्मिक विद्वानों की मित्रता अजर-अमर वर्त्तमान है॥१८॥

प॒रो हि मर्त्यै॒रसि॑ स॒मो दे॒वैरु॒त श्रि॒या। अ॒भि ख्यः॑ पूष॒न्पृत॑नासु न॒स्त्वमवा॑ नू॒नं यथा॑ पु॒रा॥

जो विद्वानों के तुल्य है वह विद्वान्, जो मनुष्यों के तुल्य है वह मध्यम, और जो पशुओं के तुल्य है वह अधम मनुष्य है, इसको सब जानें॥१९॥

वा॒मी वा॒मस्य॑ धूतयः॒ प्रणी॑तिरस्तु सू॒नृता॑। दे॒वस्य॑ वा मरुतो॒ मर्त्य॑स्य वेजा॒नस्य॑ प्रयज्यवः॥

आप्त राजा मन्त्रियों को उपदेश देवे कि आप लोग न्यायकारी तथा धर्मात्मा होकर पुत्र के समान प्रजाजनों को पालें॥२०॥

स॒द्यश्चि॒द्यस्य॑ चर्कृ॒तिः परि॒ द्यां दे॒वो नैति॒ सूर्यः॑। त्वे॒षं शवो॑ दधिरे॒ नाम॑ य॒ज्ञियं॑ म॒रुतो॑ वृत्र॒हं शवो॒ ज्येष्ठं॑ वृत्र॒हं शवः॑॥

जो राजा विद्या और विनय से युक्त, पुरुषार्थी, दृढप्रतिज्ञा करनेवाला, जितेन्द्रिय, धार्मिक, सत्यवादी होकर धार्म्मिक विद्वानों को अधिकार में संस्थापन कर पुत्र के समान प्रजाजनों को पालता है, उसकी इस जगत् में सूर्य्य के समान कीर्ति फैलती है॥२१॥

स॒कृद्ध॒ द्यौर॑जायत स॒कृद्भूमि॑रजायत। पृश्न्या॑ दु॒ग्धं स॒कृत्पय॒स्तद॒न्यो नानु॑ जायते॥

हे विद्वानो! जिस ईश्वर ने सूर्य आदि जगत् एकवार उत्पन्न किया, वह इस सृष्टि के साथ नहीं उत्पन्न होता, किन्तु इस सृष्टि से भिन्न अर्थात् भेद को प्राप्त होकर सबको शीघ्र उत्पन्न करता है, उसी का ध्यान तुम लोग करो॥२२॥इस सूक्त में अग्नि, मरुत्, पूषा, पृश्नि, सूर्य, भूमि, विद्वान्, राजा और प्रजा के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह अड़तालीसवाँ सूक्त और चतुर्थ वर्ग समाप्त हुआ॥

स्तु॒षे जनं॑ सुव्र॒तं नव्य॑सीभिर्गी॒र्भिर्मि॒त्रावरु॑णा सुम्न॒यन्ता॑। त आ ग॑मन्तु॒ त इ॒ह श्रु॑वन्तु सुक्ष॒त्रासो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॒ग्निः॥

हे मनुष्यो! जो तुमको नवीन-नवीन विद्या का उपदेश करते हैं, उनको बुलाकर वा उनसे मेलकर उनसे सुनकर विद्याओं को प्राप्त होओ॥१॥

वि॒शोवि॑श॒ ईड्य॑मध्व॒रेष्वदृ॑प्तक्रतुमर॒तिं यु॑व॒त्योः। दि॒वः शिशुं॒ सह॑सः सू॒नुम॒ग्निं य॒ज्ञस्य॑ के॒तुम॑रु॒षं यज॑ध्यै॥

हे मनुष्यो! जो ब्रह्मचर्य्य से युवा अवस्था को प्राप्त स्त्री-पुरुषों के उत्तम बल से उत्पन्न, अग्नि के समान तेजस्वी हो, उसको राजा वा अधिकारी करो॥२॥

अ॒रु॒षस्य दुहि॒तरा॒ विरू॑पे॒ स्तृभि॑र॒न्या पि॑पि॒शे सूरो॑ अ॒न्या। मि॒थस्तुरा॑ वि॒चर॑न्ती पाव॒के मन्म॑ श्रु॒तं न॑क्षत ऋ॒च्यमा॑ने॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्यरूप अग्नि के रात्रि-दिन पुत्री के समान वर्त्तमान हैं तथा दोनों विलक्षण सदा सम्बन्ध करनेवाले होते हैं, वैसे ही विचित्र वस्त्र और आभूषणवाले, विविध विद्यायुक्त और प्रशंसित होते हुए विद्या विज्ञान और धर्मोन्नति में सम्बन्ध और प्रीति करनेवाले स्त्री-पुरुष हों॥३॥

प्र वा॒युमच्छा॑ बृह॒ती म॑नी॒षा बृ॒हद्र॑यिं वि॒श्ववा॑रं रथ॒प्राम्। द्यु॒तद्या॑मा नि॒युतः॒ पत्य॑मानः क॒विः क॒विमि॑यक्षसि प्रयज्यो॥

जो मनुष्य शुद्ध बुद्धि और योगाभ्यास से सर्व सुख देने तथा सर्व जगत् के धारण करनेवाले पवन को प्राणायाम में वश करते हैं, वे सर्वसुख को प्राप्त होते हैं॥४॥

स मे॒ वपु॑श्छदयद॒श्विनो॒र्यो रथो॑ वि॒रुक्मा॒न्मन॑सा युजा॒नः। येन॑ नरा नासत्येष॒यध्यै॑ व॒र्तिर्या॒थस्तन॑याय॒ त्मने॑ च॥

हे मनुष्यो! जिस वायु से योगीजन विविध प्रकार के विज्ञान को प्राप्त होते हैं तथा जिससे सब जगत् वा सब प्राणी जीते हैं, उसके अभ्यास से परमात्मा को जान कर मुक्ति-पथ से आनन्द को प्राप्त होओ॥५॥

पर्ज॑न्यवाता वृषभा पृथि॒व्याः पुरी॑षाणि जिन्वत॒मप्या॑नि। सत्य॑श्रुतः कवयो॒ यस्य॑ गी॒र्भिर्जग॑तः स्थात॒र्जग॒दा कृ॑णुध्वम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य पवन के समान जगत् के हित करनेवाले तथ सत्य के सुननेवाले हैं, वे ही जगत् को जान कर औरों को इस जगत् का ज्ञान दे सकते हैं॥६॥

पावी॑रवी क॒न्या॑ चि॒त्रायुः॒ सर॑स्वती वी॒रप॑त्नी॒ धियं॑ धात्। ग्नाभि॒रच्छि॑द्रं शर॒णं स॒जोषा॑ दुरा॒धर्षं॑ गृण॒ते शर्म॑ यंसत्॥

जो विदुषी शुभगुण, कर्म, स्वभाववाली कन्या हो, उसी को वीर पुरुष विवाहे, जिसका सङ्ग वा प्रीति कभी नष्ट न हो तथा जो सर्वदा सुख दे, वह पत्नी पति से सर्वदा सत्कार करने योग्य है॥७॥

प॒थस्प॑थः॒ परि॑पतिं वच॒स्या कामे॑न कृ॒तो अ॒भ्या॑नळ॒र्कम्। स नो॑ रासच्छु॒रुध॑श्च॒न्द्राग्रा॒ धियं॑धियं सीषधाति॒ प्र पू॒षा॥

हे मनुष्यो! जो तुमको सन्मार्ग दिखाकर दुष्ट मार्गों का निवारण कर सत्याचरण करनेवाले स्वामी का सेवन करा और दुष्टपति का निवारण कराके बुद्धि को बढ़ाता है, वही तुम लोगों को सत्कार करने योग्य होता है॥८॥

प्र॒थ॒म॒भाजं॑ य॒शसं॑ वयो॒धां सु॑पा॒णिं दे॒वं सु॒गभ॑स्ति॒मृभ्व॑म्। होता॑ यक्षद्यज॒तं प॒स्त्या॑नाम॒ग्निस्त्वष्टा॑रं सु॒हवं॑ वि॒भावा॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य विद्यावृद्ध, अग्नि के समान अविद्याजन्य दुःख के जलानेवाले विद्वानों की सेवा करते हैं, वे घर में दीपक के समान उपदेश देने योग्यों को आत्माओं के प्रकाश करने को योग्य हैं॥९॥

भुव॑नस्य पि॒तरं॑ गी॒र्भिरा॒भी रु॒द्रं दिवा॑ व॒र्धया॑ रु॒द्रम॒क्तौ। बृ॒हन्त॑मृ॒ष्वम॒जरं॑ सुषु॒म्नमृध॑ग्घुवेम क॒विने॑षि॒तासः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सब मनुष्य विद्वान् से प्रेरणा को पाये हुए विद्या और नम्रता के व्यवहार में वृद्ध होकर सब जगत् के पालनेवाले परमात्मा की सत्य व्यवहार से प्रशंसा करें, जिससे अविनाशी सुख को सब प्राप्त हों॥१०॥

आ यु॑वानः कवयो यज्ञियासो॒ मरु॑तो ग॒न्त गृ॑ण॒तो व॑र॒स्याम्। अ॒चि॒त्रं चि॒द्धि जिन्व॑था वृ॒धन्त॑ इ॒त्था नक्ष॑न्तो नरो अङ्गिर॒स्वत्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य विद्वान् तथा युवावस्थावाले होकर और अच्छी क्रिया कर सब को बढ़ाते हैं, वे वृद्धियुक्त होते हैं॥११॥

प्र वी॒राय॒ प्र त॒वसे॑ तु॒रायाजा॑ यू॒थेव॑ पशु॒रक्षि॒रस्त॑म्। स पि॑स्पृशति त॒न्वि॑ श्रु॒तस्य॒ स्तृभि॒र्न नाकं॑ वच॒नस्य॒ विपः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्य, जैसे भेड़ बकरी दौड़ के अपने झुण्ड को वा जैसे सायङ्काल में गोपाल घरको, वैसे समस्त विद्या के श्रवण को प्राप्त होता है॥१२॥

यो रजां॑सि विम॒मे पार्थि॑वानि॒ त्रिश्चि॒द्विष्णु॒र्मन॑वे बाधि॒ताय॑। तस्य॑ ते॒ शर्म॑न्नुपद॒द्यमा॑ने रा॒या म॑देम त॒न्वा॒३॒॑ तना॑ च॥

हे मनुष्यो! जो जगदीश्वर सब जगत् का निर्माण करके मनुष्यादिकों का उपकार करता है, उसके आश्रय से ही हम लोग धनवान् और बहुत आयुवाले हों॥१३॥

तन्नोऽहि॑र्बु॒ध्न्यो॑ अ॒द्भिर॒र्कैस्तत्पर्व॑त॒स्तत्स॑वि॒ता चनो॑ धात्। तदोष॑धीभिर॒भि रा॑ति॒षाचो॒ भगः॒ पुरं॑धिर्जिन्वतु॒ प्र रा॒ये॥

हे मनुष्यो! जैसे परमेश्वर ने प्राणियों के उपकार के लिये जगत् बनाया, वैसे इससे तुम लोग पुष्कल उपकार ग्रहण करो॥१४॥

नू नो॑ र॒यिं र॒थ्यं॑ चर्षणि॒प्रां पु॑रु॒वीरं॑ म॒ह ऋ॒तस्य॑ गो॒पाम्। क्षयं॑ दाता॒जरं॒ येन॒ जना॒न्त्स्पृधो॒ अदे॑वीर॒भि च॒ क्रमा॑म॒ विश॒ आदे॑वीर॒भ्य१॒॑श्नवा॑म॥

वे ही देनेवाले उत्तम हैं, जो धर्म से धनादिकों को सञ्चित कर विद्यादिसद्गुणरूप परोपकार के लिये देते हैं और वही धन है, जिससे विदुषी वा अविदुषी प्रजाएँ अत्यन्त सुख पाय हर्षित हों॥१५॥इस सूक्त में समस्त विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह ऋग्वेद के छठे मण्डल में चतुर्थ अनुवाक, उनचासवाँ सूक्त तथा चतुर्थ अष्टक के आठवें अध्याय में सातवाँ वर्ग पूरा हुआ॥

सूक्तम्

हु॒वे वो॑ दे॒वीमदि॑तिं॒ नमो॑भिर्मृळी॒काय॒ वरु॑णं मि॒त्रम॒ग्निम्। अ॒भि॒क्ष॒दाम॑र्य॒मणं॑ सु॒शेवं॑ त्रा॒तॄन्दे॒वान्त्स॑वि॒तारं॒ भगं॑ च॥

जो विद्वान् जन सुपात्रों के लिये भिक्षा देते और सब को पुरुषार्थी कर उनके लिये विदुषी माता वा वरुण आदि को लेते हैं, वे जगत् के हितैषी हैं॥१॥

सु॒ज्योति॑षः सूर्य॒ दक्ष॑पितॄननागा॒स्त्वे सु॑महो वीहि दे॒वान्। द्वि॒जन्मा॑नो॒ य ऋ॑त॒सापः॑ स॒त्याः स्व॑र्वन्तो यज॒ता अ॑ग्निजि॒ह्वाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सूर्य के समान विद्या और धर्म के प्रकाश करनेवाले अध्यापक, उपदेशक वा विद्वानों की सेवा करते हैं, वे भी वैसे ही होते हैं॥२॥

उ॒त द्या॑वापृथिवी क्ष॒त्रमु॒रु बृ॒हद्रो॑दसी शर॒णं सु॑षुम्ने। म॒हस्क॑रथो॒ वरि॑वो॒ यथा॑ नो॒ऽस्मे क्षया॑य धिषणे अने॒हः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो अध्यापन और उपदेश करनेवाले जन सूर्य और भूमि के तुल्य सब को विद्यादान, धारण और शरण देते हैं तथा जो सत्य, यथार्थवक्ता और विद्वानों की सेवा करते हैं, वे सर्वथा माननीय होते हैं॥३॥

आ नो॑ रु॒द्रस्य॑ सूनवो॑ नमन्ताम॒द्या हू॒तासो॒ वस॒वोऽधृ॑ष्टाः। यदी॒मर्भे॑ मह॒ति वा॑ हि॒तासो॑ बा॒धे म॒रुतो॒ अह्वा॑म दे॒वान्॥

जो विद्वान् जन, चक्रवर्ती राजा वा क्षुद्रजन में पक्षपात छोड़ कर हित के लिये वर्त्तमान, नम्र, विद्वानों के प्रिय मनुष्य हैं, वे यहाँ भाग्यशाली होते हैं॥४॥

मि॒म्यक्ष॒ येषु॑ रोद॒सी नु दे॒वी सिष॑क्ति पू॒षा अ॑भ्यर्ध॒यज्वा॑। श्रु॒त्वा हवं॑ मरुतो॒ यद्ध॑ या॒थ भूमा॑ रेजन्ते॒ अध्व॑नि॒ प्रवि॑क्ते॥

हे विद्वानो! तुम सूर्य्य और पृथिवी के तुल्य प्रकाश और क्षमाशील होकर सबके प्रश्नों को सुनकर समाधान देओ, जैसे भूमि आदि लोक अपने-अपने मार्ग में नियम से जाते हैं, वैसे नियम से धर्ममार्ग में जाओ॥५॥

अ॒भि त्यं वी॒रं गिर्व॑णसम॒र्चेन्द्रं॒ ब्रह्म॑णा जरित॒र्नवे॑न। श्रव॒दिद्धव॒मुप॑ च॒ स्तवा॑नो॒ रास॒द्वाजाँ॒ उप॑ म॒हो गृ॑णा॒नः॥

हे विद्वन्! आप सब के प्रश्नों को सुनकर समाधान देते हुए और अन्नादि पदार्थों की प्राप्ति कराते हुए धार्मिक वीरों को और धनाढ्यों को सर्वदा शिक्षा देवें, जिससे इनका ऐश्वर्य अन्याय मार्ग में नष्ट न हो॥६॥

ओ॒मान॑मापो मानुषी॒रमृ॑क्तं॒ धात॑ तो॒काय॒ तन॑याय॒ शं योः। यू॒यं हि ष्ठा भि॒षजो॑ मा॒तृत॑मा॒ विश्व॑स्य स्था॒तुर्जग॑तो॒ जनि॑त्रीः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे अध्यापक और उपदेशको! तुम अपवित्र जन को सत्य ग्रहण कराकर शुद्ध करो तथा सब जगत् की रक्षा करने के निमित्त अविद्यारूपी रोग के निवारण करनेवाले होते हुए सब को माता के तुल्य पालो॥७॥

आ नो॑ दे॒वः स॑वि॒ता त्राय॑माणो॒ हिर॑ण्यपाणिर्यज॒तो ज॑गम्यात्। यो दत्र॑वाँ उ॒षसो॒ न प्रती॑कं व्यूर्णु॒ते दा॒शुषे॒ वार्या॑णि॥

हे मनुष्यो! जो दानशील प्रभातवेला के समान सुन्दर प्रकाश करनेवाले जन सब के लिये विद्या और अभयदान देते हैं, वे संसार में श्रेष्ठ गिने जाते हैं॥८॥

उ॒त त्वं सू॑नो सहसो नो अ॒द्या दे॒वाँ अ॒स्मिन्न॑ध्व॒रे व॑वृत्याः। स्याम॒हं ते॒ सद॒मिद्रा॒तौ तव॑ स्याम॒ग्नेऽव॑सा सु॒वीरः॑॥

हे विद्वन्! यदि आप सब हमको सुख पहुँचाइये तो हम विद्या देनेवाले महावीर होकर आपकी सेवा को निरन्तर करें॥९॥

उ॒त त्या मे॒ हव॒मा ज॑ग्म्यातं॒ नास॑त्या धी॒भिर्यु॒वम॒ङ्ग वि॑प्रा। अत्रिं॒ न म॒हस्तम॑सोऽमुमुक्तं॒ तूर्व॑तं नरा दुरि॒ताद॒भीके॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्योदय को प्राप्त होकर सब पदार्थ अन्धकार से छूट जाते हैं, वैसे धार्मिक विद्वान् को प्राप्त होकर अविद्या से मनुष्य मुक्त होते हैं॥१०॥

ते नो॑ रा॒यो द्यु॒मतो॒ वाज॑वतो दा॒तारो॑ भूत नृ॒वतः॑ पुरु॒क्षोः। द॒श॒स्यन्तो॑ दि॒व्याः पार्थि॑वासो॒ गोजा॑ता॒ अप्या॑ मृ॒ळता॑ च देवाः॥

हे विद्वानो! तुम निरन्तर प्राप्त होने योग्य विद्या और धनों को प्राप्त होकर सब मनुष्यों को सुखी करो॥११॥

ते नो॑ रु॒द्रः सर॑स्वती स॒जोषा॑ मी॒ळ्हुष्म॑न्तो॒ विष्णु॑र्मृळन्तु वा॒युः। ऋ॒भु॒क्षा वाजो॒ दैव्यो॑ विधा॒ता प॒र्जन्या॒वाता॑ पिप्यता॒मिषं॑ नः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो! जैसे ईश्वर से निर्मित किये हुए पृथिवी आदि पदार्थ प्राणियों को सुखी करते हैं, वैसे ही तुम विद्यादान से सब को सुखी करो॥१२॥

उ॒त स्य दे॒वः स॑वि॒ता भगो॑ नो॒ऽपां नपा॑दवतु॒ दानु॒ पप्रिः॑। त्वष्टा॑ दे॒वेभि॒र्जनि॑भिः स॒जोषा॒ द्यौर्दे॒वेभिः॑ पृथि॒वी स॑मु॒द्रैः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे ईश्वर से रचे हुए सूर्यादि पदार्थ सब मनुष्य आदि प्राणियों के कार्यसिद्धि के निमित्त हैं, वैसे आप लोग भी सब की कार्यसिद्धि करनेवाले हों॥१३॥

उ॒त नोऽहि॑र्बु॒ध्न्यः॑ शृणोत्व॒ज एक॑पात्पृथि॒वी स॑मु॒द्रः। विश्वे॑ दे॒वा ऋ॑ता॒वृधो॑ हुवा॒नाः स्तु॒ता मन्त्राः॑ कविश॒स्ता अ॑वन्तु॥

हे मनुष्यो! तुम-जो जन्म-मरणादि व्यवहार से रहित जगदीश्वर है, उसकी कृपा और पुरुषार्थ से तथा सम्पूर्ण पृथिवी आदि पदार्थों के विज्ञान से अपनी उन्नति निरन्तर करो॥१४॥

ए॒वा नपा॑तो॒ मम॒ तस्य॑ धी॒भिर्भ॒रद्वा॑जा अ॒भ्य॑र्चन्त्य॒र्कैः। ग्ना हु॒तासो॒ वस॒वोऽधृ॑ष्टा॒ विश्वे॑ स्तु॒तासो॑ भूता यजत्राः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्यार्थी विद्या और प्रगल्भता की इच्छा करते हैं, वे यथार्थवक्ता तथा ईश्वर के गुण कर्म और स्वभावों को धारण कर इष्ट मति और विद्या को प्राप्त होते हैं॥१५॥इस सूक्त में विश्वे देवों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पचासवाँ सूक्त और पन्द्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

उदु॒ त्यच्चक्षु॒र्महि॑ मि॒त्रयो॒राँ एति॑ प्रि॒यं वरु॑णयो॒रद॑ब्धम्। ऋ॒तस्य॒ शुचि॑ दर्श॒तमनी॑कं रु॒क्मो न दि॒व उदि॑ता॒ व्य॑द्यौत्॥

जो मनुष्य धर्म से यान पाने की इच्छा करते हैं, वे सूर्य के प्रकाश के तुल्य विज्ञान को प्राप्त होते हैं, जो सत्य पदार्थ की विद्या की उन्नति करते हैं, वे सर्वत्र सत्कृत होते हैं॥१॥

वेद॒ यस्त्रीणि॑ वि॒दथा॑न्येषां दे॒वानां॒ जन्म॑ सनु॒तरा च॒ विप्रः॑। ऋ॒जु मर्ते॑षु वृजि॒ना च॒ पश्य॑न्न॒भि च॑ष्टे॒ सूरो॑ अ॒र्य एवा॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य मनुष्यों के विद्याजन्म को जानते हैं, वे मनुष्यों में पूर्ण शरीर और आत्मा के बल को पाय सब पदार्थों के जानने योग्य होते हैं, जो कर्म उपासना और ज्ञानों को प्राप्त होते हैं, वे स्वामी होते हैं॥२॥

स्तु॒ष उ॑ वो म॒ह ऋ॒तस्य॑ गो॒पानदि॑तिं मि॒त्रं वरु॑णं सुजा॒तान्। अ॒र्य॒मणं॒ भग॒मद॑ब्धधीती॒नच्छा॑ वोचे सध॒न्यः॑ पाव॒कान्॥

जो मनुष्य विद्वानों की प्रशंसा कर वा विद्वानों का सङ्ग कर सकल प्रकृति आदि पदार्थविद्या आदि पदार्थों को जान कर औरों को पढ़ाते हैं, वे सबके पवित्र करनेवाले हैं॥३॥

रि॒शाद॑सः॒ सत्प॑तीँ॒रद॑ब्धान्म॒हो राज्ञः॑ सुवस॒नस्य॑ दा॒तॄन्। यूनः॑ सुक्ष॒त्रान्क्षय॑तो दि॒वो नॄना॑दि॒त्यान्या॒म्यदि॑तिं दुवो॒यु॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो चोर आदि के निकासने और धर्मात्माओं के पालनेवाले, हिंसादि दोषों से रहित, सब के लिये सुख से निवास देनेवाले, पूर्ण विद्यायुक्त, जितेन्द्रिय, न्याय से पिता के समान प्रजा के पालनेवाले, पूर्ण यौवनयुक्त, दुष्ट व्यसनों से रहित, गुणग्राही जन हों; उन्हीं को तुम स्वामी मानो और क्षुद्र हृदयवालों को न मानो॥४॥

द्यौ॒३॒॑ष्पितः॒ पृथि॑वि॒ मात॒रध्रु॒गग्ने॑ भ्रातर्वसवो मृ॒ळता॑ नः। विश्व॑ आदित्या अदिते स॒जोषा॑ अ॒स्मभ्यं॒ शर्म॑ बहु॒लं वि य॑न्त॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिनका सूर्य के समान सुन्दर शिक्षा से पालनेवाला पिता, पृथिवी के समान सहनशीलता आदि गुण और विद्यायुक्त माता, अग्नि के समान प्रकाशमान भ्राता वर्त्तमान है, वही सुखी होता है तथा जिसे पूर्ण विद्यावान् जन सन्मार्ग को पूँछते [=देते] हैं, वैसे ही विद्या पढ़नेवाले पढ़ानेवालों का निरन्तर सत्कार करते हैं॥५॥

मा नो॒ वृका॑य वृ॒क्ये॑ समस्मा अघाय॒ते री॑रधता यजत्राः। यू॒यं हि ष्ठा र॒थ्यो॑ नस्त॒नूनां॑ यू॒यं दक्ष॑स्य॒ वच॑सो बभू॒व॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सब मनुष्यों को चोर आदि दुष्टों का व्यवहार कभी नहीं कर्त्तव्य है और जो धर्मात्मा, अजातशत्रु अर्थात् जिनके शत्रु नहीं हुआ तथा सबकी रक्षा करनेवाले हों, उनकी तुम निरन्तर सेवा करो॥६॥

मा व॒ एनो॑ अ॒न्यकृ॑तं भुजेम॒ मा तत्क॑र्म वसवो॒ यच्चय॑ध्वे। विश्व॑स्य॒ हि क्षय॑थ विश्वदेवाः स्व॒यं रि॒पुस्त॒न्वं॑ रीरिषीष्ट॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो! तुम किसी दुष्ट का अनुकरण मत करो, अपने शरीर को नष्ट मत करो तथा और के किये हुए अपराध के सङ्ग मत होओ॥७॥

नम॒ इदु॒ग्रं नम॒ आ वि॑वासे॒ नमो॑ दाधार पृथि॒वीमु॒त द्याम्। नमो॑ दे॒वेभ्यो॒ नम॑ ईश एषां कृ॒तं चि॒देनो॒ नम॒सा वि॑वासे॥

हे मनुष्यो! सब से नमस्कार करने योग्य परमेश्वर के सहायरूप से हम लोग उत्तम क्रिया को धारण कर और दुष्टता को निवार विद्वानों के लिये हित सिद्ध कर सबका उपकार सदैव करें॥८॥

ऋ॒तस्य॑ वो र॒थ्यः॑ पू॒तद॑क्षानृ॒तस्य॑ पस्त्य॒सदो॒ अद॑ब्धान्। ताँ आ नमो॑भिरुरु॒चक्ष॑सो॒ नॄन्विश्वा॑न्व॒ आ न॑मे म॒हो य॑जत्राः॥

हे मनुष्यो! तुम सब से उत्कृष्ट विद्यावाले, धर्मिष्ठ, परोपकारी जनों ही को सदा नमो, तथा इन से विनय (नम्रता) को प्राप्त होओ॥९॥

ते हि श्रेष्ठ॑वर्चस॒स्त उ॑ नस्ति॒रो विश्वा॑नि दुरि॒ता नय॑न्ति। सु॒क्ष॒त्रासो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॒ग्निर्ऋ॒तधी॑तयो वक्म॒राज॑सत्याः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिससे विद्वान् धर्मात्मा जन निष्कपटता से औरों के हित साधनेवाले, विद्यादान और उपदेश द्वारा सब दुष्ट आचरणों को निवार के सत्य आचरण में प्रवृत्त करनेवाले हैं, इसी से सत्कार करने योग्य हैं॥१०॥

ते न॒ इन्द्रः॑ पृथि॒वी क्षाम॑ वर्धन्पू॒षा भगो॒ अदि॑तिः॒ पञ्च॒ जनाः॑। सु॒शर्मा॑णः॒ स्वव॑सः सुनी॒था भव॑न्तु नः सुत्रा॒त्रासः॑ सुगो॒पाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिससे विद्वान् जन बिजुली, भूमि, अन्तरिक्ष, प्राण, ऐश्वर्य और माता के तुल्य सब के बढ़ाने पालनेवाले हैं, इसी से पूज्य होते हैं॥११॥

नू स॒द्मानं॑ दि॒व्यं नंशि॑ देवा॒ भार॑द्वाजः सुम॒तिं या॑ति॒ होता॑। आ॒सा॒नेभि॒र्यज॑मानो मि॒येधै॑र्दे॒वानां॒ जन्म॑ वसू॒युर्व॑वन्द॥

हे मनुष्यो! जो राजा के विद्या और जन्म की प्रशंसा करते, वे शुद्ध सुख को प्राप्त होते हैं, जैसे बहुत विद्वानों के साथ यज्ञ करनेवाला यज्ञ को सुभूषित कर समस्त जगत् का उपकार करता है, वैसे ही विद्वान् जन पढ़ाने और उपदेशों से सब को प्राज्ञ (उत्तम ज्ञाता) कर प्रशंसा को प्राप्त होते हैं॥१२॥

अप॒ त्यं वृ॑जि॒नं रि॒पुं स्ते॒नम॑ग्ने दुरा॒ध्य॑म्। द॒वि॒ष्ठम॑स्य सत्पते कृ॒धी सु॒गम्॥

हे मनुष्या! तुम विद्या का अभ्यास कर शरीर और आत्मा के बल से युक्त होते हुए दुःसाध्य भी शत्रुओं को सुसाध्य अर्थात् उत्तमता से सूधे करो, जिससे वे दूर स्थित ही भय से सद्धर्म के अनुष्ठान करनेवाले हों॥१३॥

ग्रावा॑णः सोम नो॒ हि कं॑ सखित्व॒नाय॑ वाव॒शुः। ज॒ही न्य१॒॑त्रिणं॑ प॒णिं वृको॒ हि षः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। यदि धर्मात्मा विद्वान् जन धर्मिष्ठ विद्वानों के साथ मित्रता रखते हैं तो वे निरन्तर सुख को प्राप्त होकर मेघ के समान सबको बढ़ाके दुष्ट आचरण करनेवाले छलियों को शीघ्र मारते हैं॥१४॥

यू॒यं हि ष्ठा सु॑दानव॒ इन्द्र॑ज्येष्ठा अ॒भिद्य॑वः। कर्ता॑ नो॒ अध्व॒न्ना सु॒गं गो॒पा अ॒मा॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य दुर्गम मार्गों को सुगम करते हैं और उत्तम घरों को बनाकर आप तथा औरों को निवास करते कराते हैं, वे ही जगत् में सुख करनेवाले होते हैं॥१५॥

अपि॒ पन्था॑मगन्महि स्वस्ति॒गाम॑ने॒हस॑म्। येन॒ विश्वाः॒ परि॒ द्विषो॑ वृ॒णक्ति॑ वि॒न्दते॒ वसु॑॥

राजादि मनुष्य ऐसे मार्गों को बनावें, जिनमें जाते हुओं को चोरों का भय न हो और द्रव्य का लाभ भी हो॥१६॥इस सूक्त में विश्वे देवों के कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह इक्यावनवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

न तद्दि॒वा न पृ॑थि॒व्यानु॑ मन्ये॒ न य॒ज्ञेन॒ नोत शमी॑भिरा॒भिः। उ॒ब्जन्तु॒ तं सु॒भ्वः१॒॑ पर्व॑तासो॒ नि ही॑यतामतिया॒जस्य॑ य॒ष्टा॥

जो सुख मेघों से उत्पन्न होता है, वह सुख न दिवस में, न पृथिवी, न सङ्गति, न कर्म से होता है, इससे यज्ञ करनेवाला ही सुखभागी होता है॥१॥

अति॑ वा॒ यो म॑रुतो॒ मन्य॑ते नो॒ ब्रह्म॑ वा॒ यः क्रि॒यमा॑णं॒ निनि॑त्सात्। तपूं॑षि॒ तस्मै॑ वृजि॒नानि॑ सन्तु ब्रह्म॒द्विष॑म॒भि तं शो॑चतु॒ द्यौः॥

हे विद्वानो! जो मनुष्य अतिमान, धनादिकों से द्वेष और अच्छे सज्जनों की निन्दा करते हैं, वे दण्ड देने, निन्दा करने और शोक करने योग्य होते हैं॥२॥

किम॒ङ्ग त्वा॒ ब्रह्म॑णः सोम गो॒पां किम॒ङ्ग त्वा॑हुरभिशस्ति॒पां नः॑। किम॒ङ्ग नः॑ पश्यसि नि॒द्यमा॑नान्ब्रह्म॒द्विषे॒ तपु॑षिं हे॒तिम॑स्य॥

हे मनुष्यो! तुम इस धन के रक्षक क्यों नहीं होते हो, स्तुति (प्रशंसा) करनेवाले हम लोगों को निन्दा करनेवाले भ्रम से मत देखो, निश्चय धनपति तथा वेदविद्या से द्वेष करते हैं, उनका सङ्ग युद्ध विना मत करो॥३॥

अव॑न्तु॒ मामु॒षसो॒ जाय॑माना॒ अव॑न्तु मा॒ सिन्ध॑वः॒ पिन्व॑मानाः। अव॑न्तु मा॒ पर्व॑तासो ध्रु॒वासोऽव॑न्तु मा पि॒तरो॑ दे॒वहू॑तौ॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! तुम इस प्रकार युक्त आहार-विहार करो, जिससे सब सृष्टिस्थ पदार्थ दुःख देनेवाले न हों और शुभ गुणों को तुम लोग प्राप्त होओ॥४॥

वि॒श्व॒दानीं॑ सु॒मन॑सः स्याम॒ पश्ये॑म॒ नु सूर्य॑मु॒च्चर॑न्तम्। तथा॑ कर॒द्वसु॑पति॒र्वसू॑नां दे॒वाँ ओहा॒नोऽव॒साग॑मिष्ठः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे प्रीति से अध्यापक और उपदेशक विद्यार्थियों को और उपदेश सुननेवालों को विद्वान् करके सुखी करते हैं, वैसे ही पढ़नेवालों और उपदेश सुननेवालों को चाहिये कि विद्वान् होकर भी इनका सदा सत्कार करें॥५॥

इन्द्रो॒ नेदि॑ष्ठ॒मव॒साग॑मिष्ठः॒ सर॑स्वती॒ सिन्धु॑भिः॒ पिन्व॑माना। प॒र्जन्यो॑ न॒ ओष॑धीभिर्मयो॒भुर॒ग्निः सु॒शंसः॑ सु॒हवः॑ पि॒तेव॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा न्याय और पुरुषार्थ से प्रजा की निरन्तर रक्षा करता है, उसकी पिता के समान प्रजाजन पालना करते हैं॥६॥

विश्वे॑ देवास॒ आ ग॑त शृणु॒ता म॑ इ॒मं हव॑म्। एदं ब॒र्हिर्नि षी॑दत॥

इस मन्त्र में ‘नेदिष्ठम्’ यह पद पिछले मन्त्र से अनुवृत्ति में आता है। विद्यार्थियों को चाहिये कि परीक्षा करनेवाले विद्वानों की प्रार्थना कर परीक्षा में सुनाने योग्य समस्त सुना और पढ़ा विषय उनके समीप में निवेदन करें तथा वे परीक्षक भी अच्छे प्रकार परीक्षा कर गुण और दोषों का उपदेश दें, ऐसा करने पर पढ़ना निर्दोष हो॥७॥

यो वो॑ देवा घृ॒तस्नु॑ना ह॒व्येन॑ प्रति॒भूष॑ति। तं विश्व॒ उप॑ गच्छथ॥

हे मनुष्यो! जो सत्य विद्यादान से सब तुम लोगों को सुभूषित करता है, उसे तुम सब प्रतिभूषित करो अर्थात् बदले में सुशोभित करो॥८॥

उप॑ नः सू॒नवो॒ गिरः॑ शृ॒ण्वन्त्व॒मृत॑स्य॒ ये। सु॒मृ॒ळी॒का भ॑वन्तु नः॥

पितृजनों को राजनीति वा अपने कुल में यह दृढ़ नियम करना चाहिये कि जितने हमारे सन्तान हैं, वे ब्रह्मचर्य्य से विद्याओं के समस्त ग्रहण के लिये ब्रह्मचर्य्य आश्रम को करें, जो इसका विनाश करे, उसे राजा वा कुलीन निरन्तर दण्ड देवें॥९॥

विश्वे॑ दे॒वा ऋ॑ता॒वृध॑ ऋ॒तुभि॑र्हवन॒श्रुतः॑। जु॒षन्तां॒ युज्यं॒ पयः॑॥

जो अध्ययन करने और परीक्षा कराने को चाहें वे मद करने, कुत्सित बुद्धि वा नाश करनेवाले पदार्थों को छोड़ के दुग्ध आदि बुद्धि के बढ़ानेवाले उत्तम पदार्थों को सेवें॥१०॥

स्तो॒त्रमिन्द्रो॑ म॒रुद्ग॑ण॒स्त्वष्टृ॑मान्मि॒त्रो अ॑र्य॒मा। इ॒मा ह॒व्या जु॑षन्त नः॥

वे ही मनुष्य चाहे हुए पदार्थों को पा सकते हैं, जो सब के लिये श्रेष्ठ पुरुष को अधिष्ठाता करते हैं॥११॥

इ॒मं नो॑ अग्ने अध्व॒रं होत॑र्वयुन॒शो य॑ज। चि॒कि॒त्वान्दैव्यं॒ जन॑म्॥

हे राजा प्रजाजन! आप जो हमारे बीच शुभ गुणकर्मस्वभावयुक्त हो, उसी को राज्य करने में अच्छे प्रकार युक्त करो॥१२॥

विश्वे॑ देवाः शृणु॒तेमं हवं॑ मे॒ ये अ॒न्तरि॑क्षे॒ य उप॒ द्यवि॒ ष्ठ। ये अ॑ग्निजि॒ह्वा उ॒त वा॒ यज॑त्रा आ॒सद्या॒स्मिन्ब॒र्हिषि॑ मादयध्वम्॥

मनुष्यों को सदैव जो विमानस्थ, अन्तरिक्ष में, वा जो बिजुली की विद्या में कुशल हैं और जो पढ़ाने वा परीक्षा करने में निपुण, धर्मिष्ठ, आप्त विद्वान् हों; उनके निकट जाकर और उनको अपने समीप बुलाकर सत्कार कर इनसे सुनना चाहिये और सुना हुआ सुनाना चाहिये, जिससे सुनने में वा विज्ञान में श्रम न हो॥१३॥

विश्वे॑ दे॒वा मम॑ शृण्वन्तु य॒ज्ञिया॑ उ॒भे रोद॑सी अ॒पां नपा॑च्च॒ मन्म॑। मा वो॒ वचां॑सि परि॒चक्ष्या॑णि वोचं सु॒म्नेष्विद्वो॒ अन्त॑मा मदेम॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जिन विद्वानों का वचन असत्य नहीं होता तथा जिनका सङ्ग सर्वदा सुख और विज्ञान का बढ़ानेवाला है और जो भूमि और सूर्य के तुल्य सब के पालनेवाले और विवाद सुनकर पक्षपात को छोड़ न्याय करनेवाले हों, उनके निकट स्थित होकर सदैव आनन्द को प्राप्त होओ॥१४॥

ये के च॒ ज्मा म॒हिनो॒ अहि॑माया दि॒वो ज॑ज्ञि॒रे अ॒पां स॒धस्थे॑। ते अ॒स्मभ्य॑मि॒षये॒ विश्व॒मायुः॒ क्षप॑ उ॒स्रा व॑रिवस्यन्तु दे॒वाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो इस वर्त्तमान समय में दिन-रात्रि मनुष्यों के आरोग्य, आयु और विज्ञान के बढ़ाने और मेघ के समान पुष्टि करनेवाले हों, वे ही सब से सत्कार करने योग्य हैं॥१५॥

अग्नी॑पर्जन्या॒वव॑तं॒ धियं॑ मे॒ऽस्मिन्हवे॑ सुहवा सुष्टु॒तिं नः॑। इळा॑म॒न्यो ज॒नय॒द्गर्भ॑म॒न्यः प्र॒जाव॑ती॒रिष॒ आ ध॑त्तम॒स्मे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो वह्नि और मेघ के समान सब की बुद्धि के बढ़ानेवाले वा रक्षा करनेवाले, सब प्रजाजनों को सुख में धारण करते हैं, वे जैसे मेघ पृथिवी पर गर्भ को धारण कर ओषधियों को उत्पन्न करता और जैसे अग्नि वाणी का विधान करता अर्थात् बिजुलीरूप होकर तड़कता है, वैसे वे सुखों का विधान करनेवाले होते हैं, यह आप जानो॥१६॥

स्ती॒र्णे ब॒र्हिषि॑ समिधा॒ने अ॒ग्नौ सू॒क्तेन॑ म॒हा नम॒सा वि॑वासे। अ॒स्मिन्नो॑ अ॒द्य वि॒दथे॑ यजत्रा॒ विश्वे॑ देवा ह॒विषि॑ मादयध्वम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे इन्धनों से प्रदीप्त अग्नि में वेदमन्त्रों से सुगन्ध्यादियुक्त होम किया पदार्थ सब जगत् को सुखी करता है, वैसे सुपात्र में विद्वानों की बोई हुई विद्या सब जगत् को आनन्दित करती है॥१७॥इस सूक्त में विश्वेदेवों के गुणों का वर्णन होने से इससूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह बावनवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

व॒यमु॑ त्वा पथस्पते॒ रथं॒ न वाज॑सातये। धि॒ये पू॑षन्नयुज्महि॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य उत्तम बुद्धि पाने के लिये विद्वानों की सेवा करते हैं, वे वेगवान् रथ से एक स्थान से दूसरे स्थान के समान एक विद्या से दूसरी विद्या को शीघ्र प्राप्त होते हैं॥१॥

अ॒भि नो॒ नर्यं॒ वसु॑ वी॒रं प्रय॑तदक्षिणम्। वा॒मं गृ॒हप॑तिं नय॥

हे विद्वन् वा विदुषी! आप हम लोगों के लिये उत्तम पति, उत्तम भार्या, प्रशंसित धन की प्राप्ति करा के उत्तम शिक्षा से धर्म्म आचरण की प्राप्ति कराइये॥२॥

अदि॑त्सन्तं चिदाघृणे॒ पूष॒न्दाना॑य चोदय। प॒णेश्चि॒द्वि म्र॑दा॒ मनः॑॥

हे अध्यापक, उपदेशक वा राजन्! विद्यादि शुभगुणों की प्रवृत्ति के लिये न देनेवालों को भी दान करने के लिये प्रेरणा देओ और जुआ खेलनेवाले पाखण्डियों को मारो अर्थात् ताड़ना देओ॥३॥

वि प॒थो वाज॑सातये चिनु॒हि वि मृधो॑ जहि। साध॑न्तामुग्र नो॒ धियः॑॥

हे राजन्! आप उत्तम निर्भय मार्गों को बनाओ, उन में विपथगामियों को मारो, जिससे सब की बुद्धि उत्तम कर्मों की उन्नति करने के लिये प्रवृत्त हों॥४॥

परि॑ तृन्धि पणी॒नामार॑या॒ हृद॑या कवे। अथे॑म॒स्मभ्यं॑ रन्धय॥

[हे राजन्! आप] जो अपवित्र शिक्षा देनेवाले और छली पुरुष अपने राज्य में हों, उनको अच्छे प्रकार दण्डो, जिससे न्यायमार्ग के बीच हम लोग सुखी हों॥५॥

वि पू॑ष॒न्नार॑या तुद प॒णेरि॑च्छ हृ॒दि प्रि॒यम्। अथे॑म॒स्मभ्यं॑ रन्धय॥

हे राजन्! आप दुष्टों को दण्ड देकर श्रेष्ठों का सत्कार कर सब को श्रेष्ठ कर्मों में प्रेरणा देओ॥६॥

आ रि॑ख किकि॒रा कृ॑णु पणी॒नां हृद॑या कवे। अथे॑म॒स्मभ्यं॑ रन्धय॥

राजा वादी और प्रतिवादी अर्थात् झगड़ालु प्रतिझगड़ालूओं का लिखापढ़ी पूर्वक न्याय करे॥७॥

यां पू॑षन्ब्रह्म॒चोद॑नी॒मारां॒ बिभ॑र्ष्याघृणे। तया॑ समस्य॒ हृद॑य॒मा रि॑ख किकि॒रा कृ॑णु॥

हे राजन्! आप विद्या और धन की प्राप्ति की प्रेरणा के समान राजनीति को धारण करो, जिससे सब की न्यायव्यवस्था हो॥८॥

या ते॒ अष्ट्रा॒ गोओ॑प॒शाघृ॑णे पशु॒साध॑नी। तस्या॑स्ते सु॒म्नमी॑महे॥

हे मनुष्यो! जिस क्रिया से पशु बढ़ें, उस क्रिया को बढ़ाकर सुख को माँगो॥९॥

उ॒त नो॑ गो॒षणिं॒ धिय॑मश्व॒सां वा॑ज॒सामु॒त। नृ॒वत्कृ॑णुहि वी॒तये॑॥

मनुष्यों को गौ, अश्व और धन-धान्य की वृद्धि के लिये पुरुषार्थी जनों के समान महान् पुरुषार्थ करना योग्य है॥१०॥इस सूक्त में राजमार्ग, डाकुओं का निवारण, उत्तम दक्षिणा देनेवालों को प्रेरणा, दुष्टों को मारना, श्रेष्ठों की पालना और पशुओं का बढ़ाना कहा है, इस कारण इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी योग्य है॥यह त्रेपनवाँ सूक्त और अठारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सं पू॑षन्वि॒दुषा॑ नय॒ यो अञ्ज॑सानु॒शास॑ति। य ए॒वेदमिति॒ ब्रव॑त्॥

हे विद्वन्! हम लोगों को जो सत्यविद्या का उपदेश करें, उनका सत्कार कर उनके सङ्ग से हम लोग विद्वान् होकर उपदेशकर्त्ता हों॥१॥

समु॑ पू॒ष्णा ग॑मेमहि॒ यो गृ॒हाँ अ॑भि॒शास॑ति। इ॒म ए॒वेति॑ च॒ ब्रव॑त्॥

जो विद्वान् जन निश्चय से पृथिव्यादि पदार्थों की विद्या को, अध्यापन और उपदेश से तथा हस्तक्रिया से साक्षात् कर सके तथा राजनीति आदि व्यवहारों की अनुकूलता से शिक्षा दे, उसी विद्वान् का सङ्ग हम लोग सदा करें॥२॥

पू॒ष्णश्च॒क्रं न रि॑ष्यति॒ न कोशोऽव॑ पद्यते। नो अ॑स्य व्यथते प॒विः॥

जिस विद्वान् का पूर्ण बल है, जिसका एकछत्र राज्य है, जिसका कोश सब ओर से पूरा होता और शत्रुओं में जिसका शस्त्र नहीं नष्ट होता है, उसके राज्य में सब जन निर्भय होकर बसें॥३॥

यो अ॑स्मै ह॒विषावि॑ध॒न्न तं पू॒षापि॑ मृष्यते। प्र॒थ॒मो वि॑न्दते॒ वसु॑॥

हे मनुष्यो! जो पहिले से शिल्पविद्या को पाकर क्रिया से पदार्थों का निर्माण करता है, वह बहुत धन को प्राप्त होता है, उसके सदृश पुष्ट कोई नहीं होता है॥४॥

पू॒षा गा अन्वे॑तु नः पू॒षा र॑क्ष॒त्वर्व॑तः। पू॒षा वाजं॑ सनोतु नः॥

जो पहिले औरों का उपकार करता वा पदार्थों को इकट्टा करता है, वह सब के सहाय से भूमि के राज्य आदि को प्राप्त होता है॥५॥

पूष॒न्ननु॒ प्र गा इ॑हि॒ यज॑मानस्य सुन्व॒तः। अ॒स्माकं॑ स्तुव॒तामु॒त॥

हे शिल्पी विद्वान् जन! आप राजधनादि के सहाय से हम से वा शिक्षा देनेवालों से विद्याओं को पाकर भूमिराज्य को प्राप्त होओ॥६॥

माकि॑र्नेश॒न्माकीं॑ रिष॒न्माकीं॒ सं शा॑रि॒ केव॑टे। अथारि॑ष्टाभि॒रा ग॑हि॥

हे मनुष्यो! जो नष्ट कर्म नहीं करता न किसी को नष्ट करता है तथा कुँए के जल से भी किसी को नहीं पीड़ा देता, वही सब से सङ्ग करने योग्य और न हिंसा करनेवाला होता है॥७॥

शृ॒ण्वन्तं॑ पू॒षणं॑ व॒यमिर्य॒मन॑ष्टवेदसम्। ईशा॑नं रा॒य ई॑महे॥

जो सुपात्र और कुपात्र, विद्वान् और अविद्वान् तथा धार्मिक और अधार्मिक की परीक्षा करनेवाला हो, उसी के सकाश से पुरुषार्थ से धन पाना चाहिये॥८॥

पूष॒न्तव॑ व्र॒ते व॒यं न रि॑ष्येम॒ कदा॑ च॒न। स्तो॒तार॑स्त इ॒ह स्म॑सि॥

जो सत्यविद्याओं की प्रशंसा करनेवाले मनुष्य हों, वे विद्वानों के काम में हिंसा करनेवाले न हों॥९॥

परि॑ पू॒षा प॒रस्ता॒द्धस्तं॑ दधातु॒ दक्षि॑णम्। पुन॑र्नो न॒ष्टमाज॑तु॥

इस लोक में जो देनेवाला है, वही उत्तम है, जो लेनेवाला है, वह अधम है और जो चोरी से प्राप्त करनेवाला है, वह निकृष्ट है, यह जानना चाहिये॥१०॥इस सूक्त में विद्वानों का सङ्ग, शिल्पियों की प्रशंसा, उत्तम गुणों की याचना, हिंसा छोड़ना और दान की प्रशंसा कही है, इससे इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चौवनवाँ सूक्त और बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

एहि॒ वां वि॑मुचो नपा॒दाघृ॑णे॒ सं स॑चावहै। र॒थीर्ऋ॒तस्य॑ नो भव॥

जो विद्वान् सत्य की पालना करनेवाला, सत्य का उपदेशक हो वह और सुननेवाला, मित्र होकर तथा सत्यविद्या को प्राप्त होकर औरों को भी विद्या को प्राप्त करावें॥१॥

र॒थीत॑मं कप॒र्दिन॒मीशा॑नं॒ राध॑सो म॒हः। रा॒यः सखा॑यमीमहे॥

हे मनुष्यो! जो ब्रह्मचारी होकर विद्या पढ़ा हुआ पुरुषार्थी तथा बहुत धन का स्वामी है, उसी से विद्या पढ़कर धन को प्राप्त होओ॥२॥

रा॒यो धारा॑स्याघृणे॒ वसो॑ रा॒शिर॑जाश्व। धीव॑तोधीवतः॒ सखा॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य प्राज्ञ पुरुषों के मित्र, पदार्थविद्याओं के जाननेवाले तथा धनाढ्य हों, वे सबके सुख देनेवाले होते हैं॥३॥

पू॒षणं॒ न्व१॒॑जाश्व॒मुप॑ स्तोषाम वा॒जिन॑म्। स्वसु॒र्यो जा॒र उ॒च्यते॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजा आदि मनुष्यो! जैसे सूर्य्य रात्रि का निवारण करनेवाला है, वैसे ही प्रजाजनों में जारकर्म में वर्त्तमान मनुष्यों का निवारण करो॥४॥

मा॒तुर्दि॑धि॒षुम॑ब्रवं॒ स्वसु॑र्जा॒रः शृ॑णोतु नः। भ्रातेन्द्र॑स्य॒ सखा॒ मम॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे अग्नि का मित्र वायु है, और रात्रि का निवारण करनेवाला सूर्य भी है, वैसे ही धार्मिक मेरे मित्र और मैं भी उनका मित्र होकर रात्रि के समान वर्त्तमान अविद्या का हम सब निवारण करें॥५॥

आजासः॑ पू॒षणं॒ रथे॑ निशृ॒म्भास्ते ज॑न॒श्रिय॑म्। दे॒वं व॑हन्तु॒ बिभ्र॑तः॥

हे विद्वानो! तुम शरीर और आत्मा की पुष्टि करनेवाले पदार्थों को जानकर और उनसे उपयोग लेकर ऐश्वर्य्य को प्राप्त होओ॥६॥इस मन्त्र में पूषा और आदित्य के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पचपनवाँ सूक्त और इक्कीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

य ए॑नमा॒दिदे॑शति कर॒म्भादिति॑ पू॒षण॑म्। न तेन॑ दे॒व आ॒दिशे॑॥

जो मनुष्य सत्य का उपदेश करते हैं, वे सब आनन्द को प्राप्त होते हैं॥१॥

उ॒त धा॒ स र॒थीत॑मः॒ सख्या॒ सत्प॑तिर्यु॒जा। इन्द्रो॑ वृ॒त्राणि॑ जिघ्नते॥

हे मनुष्यो! जो सत्य तथा सत्पुरुषों के साथ मित्रता तथा दुष्टों के साथ उदासीनता करते हैं, वे दुष्टों को निवार कर श्रेष्ठों का स्वीकार कर सकते हैं॥२॥

उ॒तादः प॑रु॒षे गवि॒ सूर॑श्च॒क्रं हि॑र॒ण्यय॑म्। न्यै॑रयद्र॒थीत॑मः॥

जो मनुष्य कठोर भाषण को छोड़ कोमल भाषण करता है, वह सदा आनन्दी होता है॥३॥

यद॒द्य त्वा॑ पुरुष्टुत॒ ब्रवा॑म दस्र मन्तुमः। तत्सु नो॒ मन्म॑ साधय॥

मनुष्यों को सर्वदा सम्मुख वा अन्यत्र सत्य ही कहना चाहिये, जिससे सत्य ज्ञान सर्वत्र बढ़े॥४॥

इ॒मं च॑ नो ग॒वेष॑णं सा॒तये॑ सीषधो ग॒णम्। आ॒रात्पू॑षन्नसि श्रु॒तः॥

हे विद्वन्! जिससे आप आप्त विद्वानों के गुणों से युक्त हैं, इससे हम मनुष्यों के सङ्घों को विद्वान् करो॥५॥

आ ते॑ स्व॒स्तिमी॑मह आ॒रेअ॑घा॒मुपा॑वसुम्। अ॒द्या च॑ स॒र्वता॑तये॒ श्वश्च॑ स॒र्वता॑तये॥

हे विद्वन्! जिससे आप पापाचरण से अलग तथा सबके कल्याण करनेवाले हैं, इससे आपके लिये सदैव सुख की इच्छा हम लोग करें॥६॥इस सूक्त में उपदेशक, श्रोता और पूषा शब्द के अर्थ का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह छप्पनवाँ सूक्त और बाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इन्द्रा॒ नु पू॒षणा॑ व॒यं स॒ख्याय॑ स्व॒स्तये॑। हु॒वेम॒ वाज॑सातये॥

जो सब में मित्रता विधान कर सबके सुख की चाहना करते हैं, उन्हीं को हम लोग स्वीकार करें॥१॥

सोम॑म॒न्य उपा॑सद॒त्पात॑वे च॒म्वोः॑ सु॒तम्। क॒र॒म्भम॒न्य इ॑च्छति॥

हे विद्वान् जनो! जैसे सूर्य और चन्द्रमा द्यावा और पृथिवी के बीच वर्त्तमान होते हुए हैं, इन दोनों में से सूर्य्य रस को लेता है और चन्द्रमा रस को देता है, वैसे ही तुम सब वर्त्तो॥२॥

अ॒जा अ॒न्यस्य॒ वह्न॑यो॒ हरी॑ अ॒न्यस्य॒ संभृ॑ता। ताभ्यां॑ वृ॒त्राणि॑ जिघ्नते॥

हे मनुष्यो! मिले हुए भूमि और बिजुली की उत्तेजना से तुम धनों को प्राप्त होओ॥३॥

यदिन्द्रो॒ अन॑य॒द्रितो॑ म॒हीर॒पो वृष॑न्तमः। तत्र॑ पू॒षाभ॑व॒त्सचा॑॥

हे मनुष्यो! जो बिजुली पृथिवी और जल के बीच स्थिर हुई सबको समय समय पर प्रतिस्थान पहुँचाती है, उसके साथ पृथिवी वर्त्तमान है, उसको जान कलायन्त्रों से उसे उठा सब कामों को सिद्ध करो॥४॥

तां पू॒ष्णः सु॑म॒तिं व॒यं वृ॒क्षस्य॒ प्र व॒यामि॑व। इन्द्र॑स्य॒ चा र॑भामहे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! तुम भूगर्भविद्या और विद्युद्विद्या को प्राप्त होकर कार्यसिद्धि के लिये क्रिया का आरम्भ करो॥५॥

उत्पू॒षणं॑ युवामहे॒ऽभीशूँ॑रिव॒ सार॑थिः। म॒ह्या इन्द्रं॑ स्व॒स्तये॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। यदि मनुष्य भूमि और बिजुली का विभाग करे तो बहुत सुख पावें॥६॥इस सूक्त में भूमि और बिजुली के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सत्तावनवाँ सूक्त और तेईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

शु॒क्रं ते॑ अ॒न्यद्य॑ज॒तं ते॑ अ॒न्यद्विषु॑रूपे॒ अह॑नी॒ द्यौरि॑वासि। विश्वा॒ हि मा॒या अव॑सि स्वधावो भ॒द्रा ते॑ पूषन्नि॒ह रा॒तिर॑स्तु॥

हे मनुष्यो! जो पुरुष दिन-रात्रि के समान क्रम से कामों को सिद्ध करते हैं, वे सब सामग्री को पाकर सूर्य्य के प्रकाश के समान उत्तम कीर्तिवाले होते हैं॥१॥

अ॒जाश्वः॑ पशु॒पा वाज॑पस्त्यो धियंजि॒न्वो भुव॑ने॒ विश्वे॒ अर्पि॑तः। अष्ट्रां॑ पू॒षा शि॑थि॒रामु॒द्वरी॑वृजत्सं॒चक्षा॑णो॒ भुव॑ना दे॒व ई॑यते॥

जो मनुष्य भुवनस्थ सब पदार्थों को मिले वा मिले जान कर कार्य्यों को करते हैं, वे बुद्धिमान् होते हैं॥२॥

यास्ते॑ पूष॒न्नावो॑ अ॒न्तः स॑मु॒द्रे हि॑र॒ण्ययी॑र॒न्तरि॑क्षे॒ चर॑न्ति। ताभि॑र्यासि दू॒त्यां सूर्य॑स्य॒ कामे॑न कृत॒ श्रव॑ इ॒च्छमा॑नः॥

जो मनुष्य सुदृढ़ नावें और भूविमानों को भूमि और अन्तरिक्ष में चलनेवाले यानों को अन्तरिक्ष में चलने को रचते और उनसे देश-देशान्तरों को जाय आकर अपनी इच्छा को पूरी करते हैं, वे ही सूर्य्य के समान प्रकाशित कीर्तिवाले होते हैं॥३॥

पू॒षा सु॒बन्धु॑र्दि॒व आ पृ॑थि॒व्या इ॒ळस्पति॑र्म॒घवा॑ द॒स्मव॑र्चाः। यं दे॒वासो॒ अद॑दुः सू॒र्यायै॒ कामे॑न कृ॒तं त॒वसं॒ स्वञ्च॑म्॥

जो ब्रह्मचर्य्य से पूर्ण युवावस्था को प्राप्त हुए अपने सदृश बहुओं को प्राप्त होकर ऋतुगामी अर्थात् ऋतुकाल में स्त्रीभोग करनेवाले होकर सुन्दर पुष्ट अङ्ग और बुद्धि बल विद्या और शिक्षा को प्राप्त हों, वे ही भूगर्भ वा विद्युदादि विद्या को प्राप्त हो सकते हैं और क्षुद्राशय नहीं॥४॥इस सूक्त में विद्वानों के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह अट्ठावनवाँ सूक्त और चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र नु वो॑चा सु॒तेषु॑ वां वी॒र्या॒३॒॑ यानि॑ च॒क्रथुः॑। ह॒तासो॑ वां पि॒तरो॑ दे॒वश॑त्रव॒ इन्द्रा॑ग्नी॒ जीव॑थो यु॒वम्॥

जो मनुष्य उत्पन्न हुए मनुष्यों में पराक्रम की उन्नति करते हैं, उनके शत्रु विलय (नाश) को प्राप्त होते हैं॥१॥

बळि॒त्था म॑हि॒मा वा॒मिन्द्रा॑ग्नी॒ पनि॑ष्ठ॒ आ। स॒मा॒नो वां॑ जनि॒ता भ्रात॑रा यु॒वं य॒मावि॒हेह॑मातरा॥

जो अध्यापक और उपदेशक बिजुली और सूर्य्य के तुल्य विद्याओं में व्याप्त तथा परोपकारी हैं, वे सत्य महिमावाले होते हैं॥२॥

ओ॒कि॒वांसा॑ सु॒ते सचाँ॒ अश्वा॒ सप्ती॑इ॒वाद॑ने। इन्द्रा॒ न्व१॒॑ग्नी अव॑से॒ह व॒ज्रिणा॑ व॒यं दे॒वा ह॑वामहे॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो विद्वान् जन सदा मिले हुए वायु और बिजुली इन दोनों पदार्थों को जानते हैं, वे इस संसार में अद्भुत क्रियाओं को कर सकते हैं॥३॥

य इ॑न्द्राग्नी सु॒तेषु॑ वां॒ स्तव॒त्तेष्वृ॑तावृधा। जो॒ष॒वा॒कं वद॑तः पज्रहोषिणा॒ न दे॑वा भ॒सथ॑श्च॒न॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! सर्व पदार्थों में प्रविष्ट वायु और बिजुली को जानकर ऐश्वर्य को प्राप्त होकर रूखी असत्य किया और लोक विद्वेषी जनों को जान सबके उपकार के लिये सत्य प्रिय वाक्य सर्वदा कहो॥४॥

इन्द्रा॑ग्नी॒ को अ॒स्य वां॒ देवौ॒ मर्त॑श्चिकेतति। विषू॑चो॒ अश्वा॑न्युयुजा॒न ई॑यत॒ एकः॑ समा॒न आ रथे॑॥

हे विद्वानो! कौन यहाँ पदार्थविद्या का जाननेवाला, विमान आदि यानों का निर्माण करनेवाला शीघ्रगामी हो, इसका उत्तर पीछे दिया यह तुम सुनो॥५॥

इन्द्रा॑ग्नी अ॒पादि॒यं पूर्वागा॑त्प॒द्वती॑भ्यः। हि॒त्वी शिरो॑ जि॒ह्वया॒ वाव॑द॒च्चर॑त्त्रिं॒शत्प॒दा न्य॑क्रमीत्॥

हे विद्वानो! आप यदि बिजुली की विद्या को अच्छे प्रकार ग्रहण करो तो सब यानों से शीघ्र जाने को तथा और काम सिद्ध कर सकते हो॥६॥

इन्द्रा॑ग्नी॒ आ हि त॑न्व॒ते नरो॒ धन्वा॑नि बा॒ह्वोः। मा नो॑ अ॒स्मिन्म॑हाध॒ने परा॑ वर्क्तं॒ गवि॑ष्टिषु॥

जो राजा प्रजाजन बिजुली आदि से आग्नेयादि अस्त्रों को बनाय संग्राम के जीतनेवाले होते हैं, वे इस संसार में राज्यैश्वर्य्य से सुख बढ़ा सकते हैं॥७॥

इन्द्रा॑ग्नी॒ तप॑न्ति मा॒घा अ॒र्यो अरा॑तयः। अप॒ द्वेषां॒स्या कृ॑तं युयु॒तं सूर्या॒दधि॑॥

हे राजसहित राजप्रजा जनो! जो आप लोग सूर्यादिकों से बिजुली ग्रहण करना जानो तो शत्रुजनों को जीतकर द्वेषी जनों के दूर करने को समर्थ होओ॥८॥

इन्द्रा॑ग्नी यु॒वोरपि॒ वसु॑ दि॒व्यानि॒ पार्थि॑वा। आ न॑ इ॒ह प्र य॑च्छतं र॒यिं वि॒श्वायु॑पोषसम्॥

हे मनुष्यो! जो सभा सेनापति बिजुली की विद्या को जान कर तुम्हारे लिये देते हैं, वे पूर्ण आयु करनेवाले धर्म से प्राप्त समग्र ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं॥९॥

इन्द्रा॑ग्नी उक्थवाहसा॒ स्तोमे॑भिर्हवनश्रुता। विश्वा॑भिर्गी॒र्भिरा ग॑तम॒स्य सोम॑स्य पी॒तये॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही बिजुली की विद्या को जानने योग्य होते हैं, जो विद्वानों से विद्या पाने का प्रयत्न करते हैं॥१०॥इस सूक्त में इन्द्र और अग्नि के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह उनसठवाँ सूक्त और छब्बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

श्नथ॑द्वृ॒त्रमु॒त स॑नोति॒ वाज॒मिन्द्रा॒ यो अ॒ग्नी सहु॑री सप॒र्यात्। इ॒र॒ज्यन्ता॑ वस॒व्य॑स्य॒ भूरेः॒ सह॑स्तमा॒ सह॑सा वाज॒यन्ता॑॥

हे मनुष्यो! जो आप वायु और बिजुली की विद्या को जानो तो महान् ऐश्वर्यवाले होकर महान् राज्यके स्वामी होओ॥१॥

ता यो॑धिष्टम॒भि गा इ॑न्द्र नू॒नम॒पः स्व॑रु॒षसो॑ अग्न ऊ॒ळ्हाः। दिशः॒ स्व॑रु॒षस॑ इन्द्र चि॒त्रा अ॒पो गा अ॑ग्ने युवसे नि॒युत्वा॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य वायु और बिजुली के तुल्य पराक्रमी होकर युद्ध का आचरण करें, वे उषाकाल को जैसे सूर्य उसी के समान प्रजाओं को न्याय से प्रकाश को प्राप्त कराय कर और सर्व दिशाओं में कीर्तिवाले हो अद्भुत वाणी, बलों और भूमि के राज्य को प्राप्त होते हैं॥२॥

आ वृ॑त्रहणा वृत्र॒हभिः॒ शुष्मै॒रिन्द्र॑ या॒तं नमो॑भिरग्ने अ॒र्वाक्। यु॒वं राधो॑भि॒रक॑वेभिरि॒न्द्राग्ने॑ अ॒स्मे भ॑वतमुत्त॒मेभिः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा और राजमन्त्री वायु और बिजुली के समान उपकारी हों, वे असङ्ख्य धन को प्राप्त हों॥५॥

ता हु॑वे॒ ययो॑रि॒दं प॒प्ने विश्वं॑ पु॒रा कृ॒तम्। इ॒न्द्रा॒ग्नी न म॑र्धतः॥

हे मनुष्यो! जिन वायु और बिजुली से सब जगत् व्यवहार करता है तथा जो संसार में स्थिर हो किसी को नष्ट नहीं करते हैं और विकार को प्राप्त हुए वे नष्ट करते हैं, मनुष्यों को चाहिये कि उनको जान कर यथावत् उपकार करें॥४॥

उ॒ग्रा वि॑घ॒निना॒ मृध॑ इन्द्रा॒ग्नी ह॑वामहे। ता नो॑ मृळात ई॒दृशे॑॥

मनुष्यों को वायु और बिजुली यथावत् जान और उनका संप्रयोग कर सङ्ग्रामों को जीत सुख पाना चाहिये॥५॥

ह॒तो वृ॒त्राण्यार्या॑ ह॒तो दासा॑नि॒ सत्प॑ती। ह॒तो विश्वा॒ अप॒ द्विषः॑॥

हे मनुष्यो! जो श्रेष्ठ गुणकर्मस्वभाववाले मनुष्य, सत्य धर्मनिष्ठ, आप्त सज्जनों के पालने और दुष्टों को हरनेवाले हों, उनका सदा सत्कार करो॥६॥

इन्द्रा॑ग्नी यु॒वामि॒मे॒३॒॑भि स्तोमा॑ अनूषत। पिब॑तं शंभुवा सु॒तम्॥

हे सभासेनाधीशो! आप लोग पथ्य आचार से सदा ओषधियों के रस को पीके अरोगी होकर प्रशंसित कर्मों को करो॥७॥

या वां॒ सन्ति॑ पुरु॒स्पृहो॑ नि॒युतो॑ दा॒शुषे॑ नरा। इन्द्रा॑ग्नी॒ ताभि॒रा ग॑तम्॥

जो मनुष्य परोपकार करने की इच्छा करते हैं, वे ही सत्पुरुष होते हैं॥८॥

ताभि॒रा ग॑च्छतं न॒रोपे॒दं सव॑नं सु॒तम्। इन्द्रा॑ग्नी॒ सोम॑पीतये॥

यजमान जन विद्वानों को बुलाकर सदैव सत्कार करें और सत्कार पाये हुए वे लोग भी यजमानों को धर्मपथ को प्राप्त करावें॥९॥

तमी॑ळिष्व॒ यो अ॒र्चिषा॒ वना॒ विश्वा॑ परि॒ष्वज॑त्। कृ॒ष्णा कृ॒णोति॑ जि॒ह्वया॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य के प्रकाश से सब पदार्थ यथावत् दीखते हैं, वैसे ही विद्या से सब पदार्थ प्रकाशित होते हैं॥१०॥

य इ॒द्ध आ॒विवा॑सति सु॒म्नमिन्द्र॑स्य॒ मर्त्यः॑। द्यु॒म्नाय॑ सु॒तरा॑ अ॒पः॥

मनुष्य जैसे प्रदीप्त अग्नि में सुगन्ध्यादि पदार्थों की हवि होमकर सिद्धकाम होते हैं, वैसे जो यश से धर्मकीर्त्ति वा स्वर्ग के लिये प्रयत्न करते हैं, वे निरन्तर श्रीमान् होते हैं॥११॥

ता नो॒ वाज॑वती॒रिष॑ आ॒शून्पि॑पृत॒मर्व॑तः। इन्द्र॑म॒ग्निं च॒ वोळ्ह॑वे॥

हे मनुष्यो! तुम बिजुली आदि पदार्थों से विमान आदि यानों को चलाकर इच्छाओं को पूर्ण करो॥१२॥

उ॒भा वा॑मिन्द्राग्नी आहु॒वध्या॑ उ॒भा राध॑सः स॒ह मा॑द॒यध्यै॑। उ॒भा दा॒तारा॑वि॒षां र॑यी॒णामु॒भा वाज॑स्य सा॒तये॑ हुवे वाम्॥

जो मनुष्य वायु और बिजुली को यथावत् जान के कार्य्यों में उनका अच्छे प्रकार प्रयोग करते हैं, वे श्रीपति होते हैं॥१३॥

आ नो॒ गव्ये॑भि॒रश्व्यै॑र्वस॒व्यै॒३॒॑रुप॑ गच्छतम्। सखा॑यौ दे॒वौ स॒ख्याय॑ शं॒भुवे॑न्द्रा॒ग्नी ता ह॑वामहे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य विद्वानों के मित्र होकर पदार्थविद्या सिद्ध करने की इच्छा करते हैं, वे अवश्य विज्ञान को प्राप्त होते हैं॥१४॥

इन्द्रा॑ग्नी शृणु॒तं हवं॒ यज॑मानस्य सुन्व॒तः। वी॒तं ह॒व्यान्या ग॑तं॒ पिब॑तं सो॒म्यं मधु॑॥

सब मनुष्यों को चाहिये कि आमन्त्रण से विद्वानों को बुलाकर इनका सत्कार कर इनसे अपनी विद्या की परीक्षा कराय अधिक विद्या ग्रहण करें॥१५॥इस सूक्त में इन्द्र और अग्नि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह साठवाँ सूक्त और उनतीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इ॒यम॑ददाद्रभ॒समृ॑ण॒च्युतं॒ दिवो॑दासं वध्र्य॒श्वाय॑ दा॒शुषे॑। या शश्व॑न्तमाच॒खादा॑व॒सं प॒णिं ता ते॑ दा॒त्राणि॑ तवि॒षा स॑रस्वति॥

जो स्त्री विद्या शिक्षायुक्त वाणी को ग्रहण करती है, वह अनादिभूत वेदविद्या को जानने योग्य होती है, वह जिसके साथ विवाह करे, उसका अहोभाग्य होता है, यह जानने योग्य है॥१॥

इ॒यं शुष्मे॑भिर्बिस॒खाइ॑वारुज॒त्सानु॑ गिरी॒णां त॑वि॒षेभि॑रू॒र्मिभिः॑। पा॒रा॒व॒त॒घ्नीमव॑से सुवृ॒क्तिभिः॒ सर॑स्वती॒मा वि॑वासेम धी॒तिभिः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे कमलनाल तन्तुओं को खोदनेवाला कमलनाल तन्तुओं को प्राप्त होता है, वैसे ही पुरुषार्थी मनुष्य उत्तम विद्या को प्राप्त होते हैं और जैसे बिजुली मेघ के अङ्गों को छिन्न-भिन्न करती है, वैसे ही सुन्दर शिक्षित वाणी अविद्या के अङ्गों और संशयों का नाश करती है॥२॥

सर॑स्वति देव॒निदो॒ नि ब॑र्हय प्र॒जां विश्व॑स्य॒ बृस॑यस्य मा॒यिनः॑। उ॒त क्षि॒तिभ्यो॒ऽवनी॑रविन्दो वि॒षमे॑भ्यो अस्रवो वाजिनीवति॥

वही पण्डिता स्त्री श्रेष्ठ है, जो विद्वान् और विद्या के निन्दकों को निकाल विद्या के प्रशंसकों (बड़ाई करनेवालों) का सत्कार करती है और जो भूगर्भादि विद्या जाननेवाली समस्त प्रजा को विद्याऽभिमुख करती है॥३॥

प्र णो॑ दे॒वी सर॑स्वती॒ वाजे॑भिर्वा॒जिनी॑वती। धी॒नाम॑वि॒त्र्य॑वतु॥

माताजनों को चाहिये कि अपने सन्तानों को बाल्यावस्था में अच्छी शिक्षा देकर विद्या से विद्वान् कर उनके साथ अतुल सुख भोगें॥४॥

यस्त्वा॑ देवि सरस्वत्युपब्रू॒ते धने॑ हि॒ते। इन्द्रं॒ न वृ॑त्र॒तूर्ये॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे पुरुषो! जैसे पतिव्रता विदुषी स्त्रियाँ तुम लोगों को सत्य ग्रहण कराकर प्रिय वचन कहती हैं, वैसे इनके साथ तुम भी हित करो॥५॥

त्वं दे॑वि सरस्व॒त्यवा॒ वाजे॑षु वाजिनि। रदा॑ पू॒षेव॑ नः स॒निम्॥

हे वरानने=सुन्दर मुखवाली! तुम पृथिवी के समान सबका धारण करो और प्रज्ञा देओ॥६॥

उ॒त स्या नः॒ सर॑स्वती घो॒रा हिर॑ण्यवर्तनिः। वृ॒त्र॒घ्नी व॑ष्टि सुष्टु॒तिम्॥

जो बिजुली की चमक दमक के समान सुन्दर शोभावाली विदुषी स्त्री घर के कार्यों की प्रकाश करनेवाली तथा सन्तानों की विद्या की कामना करती है, वही यहाँ सौभाग्यवती होती है॥७॥

यस्या॑ अन॒न्तो अह्रु॑तस्त्वे॒षश्च॑रि॒ष्णुर॑र्ण॒वः। अम॒श्चर॑ति॒ रोरु॑वत्॥

हे मनुष्यो! जितना आकाश है, उतना ही शब्द अनन्त है, जैसे समुद्र में जल पूरा है, वैसे आकाश में शब्द है, यह जानो॥८॥

सा नो॒ विश्वा॒ अति॒ द्विषः॒ स्वसॄ॑र॒न्या ऋ॒ताव॑री। अत॒न्नहे॑व॒ सूर्यः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो वाणी अच्छे प्रकार प्रयोग की हुई सुख और अन्यथा कही हुई दुःख प्रदान करती है। जो सत्यवादी हैं, वे ही मिथ्या कहना नहीं चाहते, जैसे सूर्य समस्त मूर्त्तिमान् द्रव्यों को प्रकाशित करता है, वैसे ही यह वाणी सब व्यवहारों को प्रकाशित करती है॥९॥

उ॒त नः॑ प्रि॒या प्रि॒यासु॑ स॒प्तस्व॑सा॒ सुजु॑ष्टा। सर॑स्वती॒ स्तोम्या॑ भूत्॥

जो मनुष्य सब ओर से शुद्धि करनेवाली सत्य वाणी को जानते हैं, वे ही प्रशंसा करने योग्य होते हैं॥१०॥

आ॒प॒प्रुषी॒ पार्थि॑वान्यु॒रु रजो॑ अ॒न्तरि॑क्षम्। सर॑स्वती नि॒दस्पा॑तु॥

हे मनुष्यो! जो वाणी सर्वत्र आकाश में व्याप्त है, उसको जान के इससे किसी की भी निन्दा अर्थात् गुणों में दोषारोपण और दोषों में गुणारोपण कभी न करो॥११॥

त्रि॒ष॒धस्था॑ स॒प्तधा॑तुः॒ पञ्च॑ जा॒ता व॒र्धय॑न्ती। वाजे॑वाजे॒ हव्या॑ भूत्॥

जो विद्वान् जन वाणी के योग को जानते हैं तो क्या-क्या बढ़ा नहीं सकते हैं॥१२॥

प्र या म॑हि॒म्ना म॒हिना॑सु॒ चेकि॑ते द्यु॒म्नेभि॑र॒न्या अ॒पसा॑म॒पस्त॑मा। रथ॑इव बृह॒ती वि॒भ्वने॑ कृ॒तोप॒स्तुत्या॑ चिकि॒तुषा॒ सर॑स्वती॥

हे मनुष्यो! विद्या, सुशिक्षा, सत्सङ्ग, सत्यभाषण और योगाभ्यासादिकों से निष्पन्न हुई वाणी यह व्याप्त वा समर्थ है, उसको तुम जानो॥१३॥

सर॑स्वत्य॒भि नो॑ नेषि॒ वस्यो॒ माप॑ स्फरीः॒ पय॑सा॒ मा न॒ आ ध॑क्। जु॒षस्व॑ नः स॒ख्या वे॒श्या॑ च॒ मा त्वत्क्षेत्रा॒ण्यर॑णानि गन्म॥

हे मनुष्यो! जो विदुषी स्त्रियाँ जैसे विद्या और उत्तम शिक्षा से युक्त वाणी सर्वत्र अच्छे प्रकार रक्षाकर सर्वथा वृद्धि देती है वा जो सत्यभाषण आदि से दुःख को नहीं प्राप्त कराती, उसके तुल्य वर्त्तमान हैं, वे हम लोगों को शोकादिकों से अलग कर मित्रता से अच्छे प्रकार सेवन करती और सर्वदैव आनन्दित करती हैं॥१४॥इस सूक्त में वाणी के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह श्रीमत्पमहंस परिव्राजकाचार्य परमविद्वान् श्रीमान् विरजानन्द सरस्वती स्वामीजी के शिष्य श्रीमान् दयानन्द सरस्वती स्वामी से विरचित सुप्रमाणयुक्त तथा संस्कृत और आर्यभाषा से विभूषित ऋग्वेदभाष्य में चतुर्थ अष्टक में अष्टम अध्याय और बत्तीसवाँ वर्ग और चतुर्थ अष्टक भी तथा छठे मण्डल में पञ्चम अनुवाक और एकसठवाँ सूक्त भी समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

स्तु॒षे नरा॑ दि॒वो अ॒स्य प्र॒सन्ता॒ऽश्विना॑ हुवे॒ जर॑माणो अ॒र्कैः। या स॒द्य उ॒स्रा व्युषि॒ ज्मो अन्ता॒न्युयू॑षतः॒ पर्यु॒रू वरां॑सि॥

हे मनुष्यो! जो अन्तरिक्ष और विद्युत् सर्वाधिकरण और सब पदार्थों के बीच ठहरे हुए वर्त्तमान हैं, उनके बीच बिजुली विभाग करनेवाली और अन्तरिक्ष आधार वर्त्तमान है, उनके गुणों को सब जानो॥१॥

ता य॒ज्ञमा शुचि॑भिश्चक्रमा॒णा रथ॑स्य भा॒नुं रु॑रुचू॒ रजो॑भिः। पु॒रू वरां॒स्यमि॑ता॒ मिमा॑ना॒ऽपो धन्वा॒न्यति॑ याथो॒ अज्रा॑न्॥

हे मनुष्यो! यदि तुम वायु और बिजुली को यथावत् जानो तो अमित आनन्द को प्राप्त होओ॥२॥

ता ह॒ त्यद्व॒र्तिर्यदर॑ध्रमुग्रे॒त्था धिय॑ ऊहथुः॒ शश्व॒दश्वैः॑। मनो॑जवेभिरिषि॒रैः श॒यध्यै॒ परि॒ व्यथि॑र्दा॒शुषो॒ मर्त्य॑स्य॥

हे मनुष्यो! जब तुम वायु और बिजुली के गुणों को जानोगे, तभी पूर्ण ऐश्वर्य को पाओगे॥३॥

ता नव्य॑सो॒ जर॑माणस्य॒ मन्मोप॑ भूषतो युयुजा॒नस॑प्ती। शुभं॒ पृक्ष॒मिष॒मूर्जं॒ वह॑न्ता॒ होता॑ यक्षत्प्र॒त्नो अ॒ध्रुग्युवा॑ना॥

हे मनुष्यो! जो वायु और बिजुली विज्ञान के विषय, घोड़े के समान शीघ्र जानेवाले और सब उत्तम-उत्तम पदार्थों की प्राप्ति करानेवाले हैं, उनसे चाहे हुए कार्य्यों को सिद्ध करो॥४॥

ता व॒ल्गू द॒स्रा पु॑रु॒शाक॑तमा प्र॒त्ना नव्य॑सा॒ वच॒सा वि॑वासे। या शंस॑ते स्तुव॒ते शंभ॑विष्ठा बभू॒वतु॑र्गृण॒ते चि॒त्ररा॑ती॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो वायु और बिजुली कारणरूप से सनातन और कार्यरूप से नूतन, बहुत शक्तिमान्, वेगादि गुणयुक्त, कल्याणकारी वर्त्तमान हैं, उनको यथावत् जानो॥५॥

ता भु॒ज्युं विभि॑र॒द्भ्यः स॑मु॒द्रात्तुग्र॑स्य सू॒नुमू॑हथू॒ रजो॑भिः। अ॒रे॒णुभि॒र्योज॑नेभिर्भु॒जन्ता॑ पत॒त्रिभि॒रर्ण॑सो॒ निरु॒पस्था॑त्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो बिजुली और वायु विमान आदि यानों को अन्तरिक्ष में पक्षियों के समान चलानेवाले वेग से पहुँचाते हैं, उनको समीपस्थ कर अभीष्ट सुखों को प्राप्त होओ॥६॥

वि ज॒युषा॑ रथ्या यात॒मद्रिं॑ श्रु॒तं हवं॑ वृषणा वध्रिम॒त्याः। द॒श॒स्यन्ता॑ श॒यवे॑ पिप्यथुर्गामिति॑ च्यवाना सुम॒तिं भु॑रण्यू॥

हे मनुष्यो! जो विमान आदि को चलाने वा सङ्ग्राम में जय कराने वा प्रज्ञा और बल के देने, वर्षा करनेवाले तथा सोने जागने और वाणी के हेतु हैं, उनको जान कार्य्यसिद्धि के लिये अच्छे प्रकार प्रयोग करो॥७॥

यद्रो॑दसी प्र॒दिवो॒ अस्ति॒ भूमा॒ हेळो॑ दे॒वाना॑मु॒त म॑र्त्य॒त्रा। तदा॑दित्या वसवो रुद्रियासो रक्षो॒युजे॒ तपु॑र॒घं द॑धात॥

हे मनुष्यो! जो ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त, सब को धारण करने वा सब का नियम करनेवाला है, उसको धारण कर और अच्छे प्रकार ध्यान कर सुखी होओ और जो ऐसा नहीं करता है, उस पर कठोर दण्ड धरो॥८॥

य ईं॒ राजा॑नावृतु॒था वि॒दध॒द्रज॑सो मि॒त्रो वरु॑ण॒श्चिके॑तत्। ग॒म्भी॒राय॒ रक्ष॑से हे॒तिम॑स्य॒ द्रोघा॑य चि॒द्वच॑स॒ आन॑वाय॥

जैसे सूर्य्य चन्द्रमा ऋतुओं को बाँट और अन्धकार निवारण कर जगत् को सुखी करते हैं, वैसे ही विद्यादि शुभगुणों का प्रचार संसार में अच्छे प्रकार समर्थन, सत्य और असत्य का विभाग और अविद्यान्धकार का निवारण कर विद्वान् जन सबको आनन्दित करते हैं॥९॥

अन्त॑रैश्च॒क्रैस्तन॑याय व॒र्तिर्द्यु॒मता या॑तं नृ॒वता॒ रथे॑न। सनु॑त्येन॒ त्यज॑सा॒ मर्त्य॑स्य वनुष्य॒तामपि॑ शी॒र्षा व॑वृक्तम्॥

यदि सभासेनापति, मनुष्य-सन्तानों का ब्रह्मचर्य और विद्याभ्यास आदि का प्रबन्ध करें तो सब विद्वान् होकर अनेक उत्तम कार्य करने और दुष्टों तथा शत्रुओं के निवारने को समर्थ हों॥१०॥

आ प॑र॒माभि॑रु॒त म॑ध्य॒माभि॑र्नि॒युद्भि॑र्यातमव॒माभि॑र॒र्वाक्। दृ॒ळ्हस्य॑ चि॒द्गोम॑तो॒ वि व्र॒जस्य॒ दुरो॑ वर्तं गृण॒ते चि॑त्रराती॥

हे राज प्रजाजनो! जैसे सब भूगोल वायु की गतियों के साथ जाते-आते हैं और जैसे शिल्पीजन विमान से मेघमण्डल पर जाते हैं, वैसे ही तुम भी अनुष्ठान करो॥११॥इस सूक्त में अश्वियों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह बासठवाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

क्व१॒॑त्या व॒ल्गू पु॑रुहू॒ताद्य दू॒तो न स्तोमो॑ऽविद॒न्नम॑स्वान्। आ यो अ॒र्वाङ्नास॑त्या व॒वर्त॒ प्रेष्ठा॒ ह्यस॑थो अस्य॒ मन्म॑न्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो इस जगत् के विज्ञान के निमित्त प्रयत्न करते हैं, वे कहीं भी दुःखित नहीं होते हैं॥१॥

अरं॑ मे गन्तं॒ हव॑नाया॒स्मै गृ॑णा॒ना यथा॒ पिबा॑थो॒ अन्धः॑। परि॑ ह॒ त्यद्व॒र्तिर्या॑थो रि॒षो न यत्परो॒ नान्त॑रस्तुतु॒र्यात्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजजनों से वैसा प्रबन्ध किया जाये, जैसे मार्गों में कोई भी चोर और शत्रु किसी को पीड़ा न दे॥२॥

अका॑रि वा॒मन्ध॑सो॒ वरी॑म॒न्नस्ता॑रि ब॒र्हिः सु॑प्राय॒णत॑मम्। उ॒त्ता॒नह॑स्तो युव॒युर्व॑व॒न्दा वां॒ नक्ष॑न्तो॒ अद्र॑य आञ्जन्॥

जो होम से वायु आदि पदार्थों को शुद्धकर विमान आदि यानों से अन्तरिक्ष में जाते तथा सुख और उत्तम गुणों को व्याप्त होते हुए मेघ के समान सबके सुख और उन्नतियों को चाहते हैं, वे उत्तम सुख पाते हैं॥३॥

ऊ॒र्ध्वो वा॑म॒ग्निर॑ध्व॒रेष्व॑स्था॒त्प्र रा॒तिरे॑ति जू॒र्णिनी॑ घृ॒ताची॑। प्र होता॑ गू॒र्तम॑ना उरा॒णोऽयु॑क्त॒ यो नास॑त्या॒ हवी॑मन्॥

हे सभासेनाधीशो! जो मनुष्य राजव्यवहार में सत्य और उत्साह से प्रवृत्त होते हैं, उनका सत्कार आप लोग करें॥४॥

अधि॑ श्रि॒ये दु॑हि॒ता सूर्य॑स्य॒ रथं॑ तस्थौ पुरुभुजा श॒तोति॑म्। प्र मा॒याभि॑र्मायिना भूत॒मत्र॒ नरा॑ नृतू॒ जनि॑मन्य॒ज्ञिया॑नाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो उषा के समान यानादि साधनों से राज्यश्री की प्राप्ति के लिये विद्वानों के विद्याजन्म को कराते हैं, वे असङ्ख्य रक्षा को प्राप्त होके इस जगत् में अधिष्ठाता होते हैं॥५॥

यु॒वं श्री॒भिर्द॑र्श॒ताभि॑रा॒भिः शु॒भे पु॒ष्टिमू॑हथुः सू॒र्यायाः॑। प्र वां॒ वयो॒ वपु॒षेऽनु॑ पप्त॒न्नक्ष॒द्वाणी॒ सुष्टु॑ता धिष्ण्या वाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! यदि तुम लोग राज्य करने की और राज्यलक्ष्मी को प्राप्त करने की इच्छा करते हो तो प्रयत्न से और समस्त धन आदि से विद्यायुक्त वाणी को प्राप्त होओ और जैसे पक्षी अपने आश्रय को प्राप्त होते हैं, इसी प्रकार तुम धर्मयुक्त नीति को प्राप्त होकर जैसे उषाकाल दिन को, वैसे यश को प्रकाशित करो॥३॥

आ वां॒ वयोऽश्वा॑सो॒ वहि॑ष्ठा अ॒भि प्रयो॑ नासत्या वहन्तु। प्र वां॒ रथो॒ मनो॑जवा असर्जी॒षः पृ॒क्ष इ॒षिधो॒ अनु॑ पू॒र्वीः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो आप लोग अग्न्यादि पदार्थों के प्रयोगों को जानो तो विमानादि यानों से पक्षियों के समान अन्तरिक्ष में जा सको, जिससे चाहे हुए पदार्थों को प्राप्त होकर सर्वदा आनन्दित होओ॥७॥

पु॒रु हि वां॑ पुरुभुजा दे॒ष्णं धे॒नुं न॒ इषं॑ पिन्वत॒मस॑क्राम्। स्तुत॑श्च वां माध्वी सुष्टु॒तिश्च॒ रसा॑श्च॒ ये वा॒मनु॑ रा॒तिमग्म॑न्॥

जो राजा और प्रजाजन परस्पर के उपकार के लिये प्रयत्न करें तो इनको सर्व प्रशंसा और सकल ऐश्वर्य भी प्राप्त होवे॥८॥

उ॒त म॑ ऋ॒ज्रे पुर॑यस्य र॒घ्वी सु॑मी॒ळ्हे श॒तं पे॑रु॒के च॑ प॒क्वा। शा॒ण्डो दा॑द्धिर॒णिनः॒ स्मद्दि॑ष्टी॒न्दश॑ व॒शासो॑ अभि॒षाच॑ ऋ॒ष्वान्॥

हे मनुष्यो! जो मेरे वशीभूत, प्रीतियुक्त, महान् सहायक होते हैं, उनके आधीन मैं भी होऊँ, इस प्रकार परस्पर का वशभाव हुए पीछे उत्तम असङ्ख्य कार्य्य कर सकूँ॥९॥

सं वां॑ श॒ता ना॑सत्या स॒हस्राश्वा॑नां पुरु॒पन्था॑ गि॒रे दा॑त्। भ॒रद्वा॑जाय वीर॒ नू गि॒रे दा॑द्ध॒ता रक्षां॑सि पुरुदंससा स्युः॥

हे राजा और सेनापतियो! जो धार्मिक न्याय से राज्य की पालना करने और शत्रुओं से अपनी सेना की रक्षा करने के लिये यत्न करे, उसके लिये असङ्ख्य धन और प्रतिष्ठा निरन्तर करो॥१०॥

आ वां॑ सु॒म्ने वरि॑मन्त्सू॒रिभिः॑ ष्याम्॥

राजा और सेनापतियों को सर्वदा धार्मिक विद्वान् का सत्कार करना चाहिये, जिससे ये सब के सुख की उन्नति दिलावें॥११॥इस सूक्त में अश्वियों का गुणवर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह त्रेसठवाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ॥

उदु॑ श्रि॒य उ॒षसो॒ रोच॑माना॒ अस्थु॑र॒पां नोर्मयो॒ रुश॑न्तः। कृ॒णोति॒ विश्वा॑ सु॒पथा॑ सु॒गान्यभू॑दु॒ वस्वी॒ दक्षि॑णा म॒घोनी॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे पुरुषो! जैसे प्रभातवेलाएँ रुचि करनेवाली होती हैं, वैसी हुई स्त्रियाँ श्रेष्ठ हैं वा जैसे जलतरंगें तटों को छिन्नभिन्न करती हैं, वैसे ही जो स्त्रियाँ दुःखों को छिन्न-भिन्न करती हैं और जो दिन के तुल्य समस्त गृहकृत्यों को प्रकाशित करती हैं, वे ही सर्वदा मङ्गलकारिणी होती हैं॥१॥

भ॒द्रा द॑दृक्ष उर्वि॒या वि भा॒स्युत्ते॑ शो॒चिर्भा॒नवो॒ द्याम॑पप्तन्। आ॒विर्वक्षः॑ कृणुषे शु॒म्भमा॒नोषो॑ देवि॒ रोच॑माना॒ महो॑भिः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे स्त्रियो! तुम चतुरता से सब पति आदि को सन्तोष देकर, घर के कामों को यथावत् अनुष्ठान कर, अतिविषयासक्ति को छोड़ और सुन्दर शोभायुक्त होकर सदैव पुरुषार्थ से धर्मयुक्त कामों को सूर्य के समान प्रकाशित करो॥२॥

वह॑न्ति सीमरु॒णासो॒ रुश॑न्तो॒ गावः॑ सु॒भगा॑मुर्वि॒या प्र॑था॒नाम्। अपे॑जते॒ शूरो॒ अस्ते॑व॒ शत्रू॒न्बाध॑ते॒ तमो॑ अजि॒रो न वोळ्हा॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो! जो प्रभातवेला के समान सुप्रकाश, सुरूपवती, सूर्य किरणों के तुल्य घर के कामों की व्यवस्था का निर्वाह करनेवाली, शूरवीर के समान व्यथा अर्थात् परिश्रम की थकावट न माननेवाली स्त्रियाँ हों, उनका निरन्तर सत्कार कर सौभाग्युक्त करो॥३॥

सु॒गोत ते॑ सु॒पथा॒ पर्व॑तेष्ववा॒ते अ॒पस्त॑रसि स्वभानो। सा न॒ आ व॑ह पृथुयामन्नृष्वे र॒यिं दि॑वो दुहितरिष॒यध्यै॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अच्छी नीतिवाले राजजन पर्वतों में भी अच्छे मार्गों को बनाकर सब मार्ग चलनेवालों को सुखी करते हैं वा जैसे उषा (प्रभातवेला) मार्गों को प्रकाशित करती है, वैसे ही उत्तम परस्पर प्रसन्न स्त्री पुरुष धर्ममार्ग का संशोधन कर परोपकार का प्रकाश कराते हैं॥४॥

सा व॑ह॒ योक्षभि॒रवा॒तोषो॒ वरं॒ वह॑सि॒ जोष॒मनु॑। त्वं दि॑वो दुहित॒र्या ह॑ दे॒वी पू॒र्वहू॑तौ मं॒हना॑ दर्श॒ता भूः॑॥

जैसे उषा रात्रि के अनुकूल वर्त्तमान नियम से अपने काम को करती है, वैसे ही नियमयुक्त स्त्री अपने घर के कामों को करे तथा ब्रह्मचर्य के अनन्तर अपने मन के प्यारे पति को विवाह कर प्रसन्न होती हुई पति को निरन्तर प्रसन्न करे, ऐसे ही पति भी उस अनुकूल आचरण करनेवाली को सदैव आनन्दित करे॥५॥

उत्ते॒ वय॑श्चिद्वस॒तेर॑पप्त॒न्नर॑श्च॒ ये पि॑तु॒भाजो॒ व्यु॑ष्टौ। अ॒मा स॒ते व॑हसि॒ भूरि॑ वा॒ममुषो॑ देवि दा॒शुषे॒ मर्त्या॑य॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो वधू और वर स्वयंवर विवाह से परस्पर प्रसन्न होकर विवाह करते हैं, वे सूर्य्य और उषा के समान गृहाश्रम को उत्तम आचार से अच्छे प्रकार प्रकाशित कर सर्वदा आनन्दित होते हैं॥६॥इस सूक्त में उषा और सूर्य के तुल्य स्त्रियों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चौसठवाँ सूक्त और पाँचवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

ए॒षा स्या नो॑ दुहि॒ता दि॑वो॒जाः क्षि॒तीरु॒च्छन्ती॒ मानु॑षीरजीगः। या भा॒नुना॒ रुश॑ता रा॒म्यास्वज्ञा॑यि ति॒रस्तम॑सश्चिद॒क्तून्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो कन्या उषा के तुल्य वा बिजुली के तुल्य अच्छे प्रकाश को प्राप्त, विद्या-विनय और हाव-भाव, कटाक्षों से पति आदि को आनन्दित करती है वा जैसे सूर्य्य रात्रि को दूर कर सब प्रजा को प्रकाशित करता है, वैसे घर से अविद्या और अन्धकार निवार विद्या से सब को प्रकाशित करती है, वही उत्तम स्त्री होती है॥१॥

वि तद्य॑युररुण॒युग्भि॒रश्वै॑श्चि॒त्रं भा॑न्त्यु॒षस॑श्च॒न्द्रर॑थाः। अग्रं॑ य॒ज्ञस्य॑ बृह॒तो नय॑न्ती॒र्वि ता बा॑धन्ते॒ तम॒ ऊर्म्या॑याः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! तुम अपने सदृश गुण-कर्म-स्वभावयुक्त प्रभातवेलाओं के समान आनन्द देनेवाली, विद्या और नम्रता आदि गुणों से सुशील, ब्रह्मचारिणी कन्याओं को प्राप्त होकर उनको निरन्तर आनन्द देकर आप आनन्द को प्राप्त होओ॥२॥

श्रवो॒ वाज॒मिष॒मूर्जं॒ वह॑न्ती॒र्नि दा॒शुष॑ उषसो॒ मर्त्या॑य। म॒घोनी॑र्वी॒रव॒त्पत्य॑माना॒ अवो॑ धात विध॒ते रत्न॑म॒द्य॥

हे मनुष्यो! जो उषा के समान वर्त्तमान, सत्यशास्त्र श्रवणादियुक्त, बलिष्ठ, विचक्षण (चित्र-विचित्र बुद्धियुक्त) धन और ऐश्वर्य्य की बढ़ानेवाली, रक्षा में तत्पर, विदुषी स्त्रियाँ हों, उनके बीच से अपनी-अपनी प्रिया भार्या को सब ग्रहण करें॥३॥

इ॒दा हि वो॑ विध॒ते रत्न॒मस्ती॒दा वी॒राय॑ दा॒शुष॑ उषासः। इ॒दा विप्रा॑य॒ जर॑ते॒ यदु॒क्था नि ष्म॒ माव॑ते वहथा पु॒रा चि॑त्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो उषा के समान वर्त्तमान भार्यायें तुम लोगों को प्राप्त हों तो इसी जन्म में सब सुख तुम लोगों को प्राप्त हों, क्योंकि अविरोध से वर्त्तमान स्त्री-पुरुषों को सदैव यश प्राप्त होते हैं॥४॥

इ॒दा हि त॑ उषो अद्रिसानो गो॒त्रा गवा॒मङ्गि॑रसो गृ॒णन्ति॑। व्य१॒॑र्केण॑ बिभिदु॒र्ब्रह्म॑णा च स॒त्या नृ॒णाम॑भवद्दे॒वहू॑तिः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे किरणें प्रभातवेला से सूर्य्यप्रकाश की निमित्त हैं, वैसे ही सत्य व्यवहारों को सिद्ध करने और दुष्ट व्यवहारों का निरोध करनेवाली उषा है, वैसी श्रेष्ठ स्त्री होती है॥५॥

उ॒च्छा दि॑वो दुहितः प्रत्न॒वन्नो॑ भरद्वाज॒वद्वि॑ध॒ते म॑घोनि। सु॒वीरं॑ र॒यिं गृ॑ण॒ते रि॑रीह्युरुगा॒यमधि॑ धेहि॒ श्रवो॑ नः॥

हे वीरपुरुष! जैसे बिजुली का प्रकाश संप्रयोग किया हुआ सत्य ऐश्वर्य्य को उत्पन्न करता है, वैसे ही शुभ आचरण करनेवाली पत्नी घर का सौभाग्य बढ़ाती है और जैसे आचार्य प्रति समय सुन्दर शिक्षा और विद्या को विद्यार्थियों को ग्रहण कराते हैं, वैसे ही विद्वान् स्त्री पुरुष अपने सन्तानों को विद्या और सुन्दर शिक्षा ग्रहण करावें॥६॥इस सूक्त में उषा के तुल्य स्त्रीजनों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पैंसठवाँ सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ॥

वपु॒र्नु तच्चि॑कि॒तुषे॑ चिदस्तु समा॒नं नाम॑ धे॒नु पत्य॑मानम्। मर्ते॑ष्व॒न्यद्दो॒हसे॑ पी॒पाय॑ स॒कृच्छु॒क्रं दु॑दुहे॒ पृश्नि॒रूधः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे पुरुष! जैसे रात्रि और समीप में मायारूपी अन्तरिक्ष वर्षा से होता अर्थात् मेघ से ढपा हुआ अन्तरिक्ष अन्धकारयुक्त होता है, वैसे ही समान गुणकर्मस्वभावयुक्त स्त्री पति के सुख के लिये समर्थ होती है, जैसे गौ बछड़ों को पालती है, वैसे विदुषी माता सन्तानों की यथावत् रक्षा कर सकती है॥१॥

ये अ॒ग्नयो॒ न शोशु॑चन्निधा॒ना द्विर्यत्त्रिर्म॒रुतो॑ वावृ॒धन्त॑। अ॒रे॒णवो॑ हिर॒ण्यया॑स एषां सा॒कं नृ॒म्णैः पौंस्ये॑भिश्च भूवन्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो अग्नि के समान पवित्र हुए पवित्र करनेवाले, वृद्धि को प्राप्त हुए, बढ़ानेवाले, पवन के समान बलिष्ठ और चक्रवर्त्ती राजा के समान लक्ष्मी के साथ वर्त्तमान विद्वान् हों, उन्हीं को तुम सेवो॥२॥

रु॒द्रस्य॒ ये मी॒ळ्हुषः॒ सन्ति॑ पु॒त्रा यांश्चो॒ नु दाधृ॑वि॒र्भर॑ध्यै। वि॒दे हि मा॒ता म॒हो म॒ही षा सेत्पृश्निः॑ सु॒भ्वे॒३॒॑ गर्भ॒माधा॑त्॥

वे ही मनुष्य कल्याणरूप होते हैं, जिनके माता पिता ऐसे हैं कि जिन्होंने पूरा ब्रह्मचर्य किया हो॥३॥

न य ईष॑न्ते ज॒नुषोऽया॒ न्व१॒॑न्तः सन्तो॑ऽव॒द्यानि॑ पुना॒नाः। निर्यद्दु॒ह्रे शुच॒योऽनु॒ जोष॒मनु॑ श्रि॒या तन्व॑मु॒क्षमा॑णाः॥

जो मनुष्य ब्रह्मचर्यादि व्रतों को छोड़ मूढ़ होकर, शीघ्र विवाह कर, नपुंसक के अर्थात् हीजड़ा के समान होकर, निर्बल, रोगी, और लम्पट, मनुष्यों के बीच जिसकी कहावत हो रही हो तथा दुष्टव्यसन जिसको होता है, ऐसे पुरुष सौ वर्ष से पहिले ही शरीर को नष्ट-भ्रष्ट कर मनुष्य शरीर के फल को न पाकर दुर्भाग्यवश से निष्फल होते हैं॥४॥

म॒क्षू न येषु॑ दो॒हसे॑ चिद॒या आ नाम॑ धृ॒ष्णु मारु॑तं॒ दधा॑नाः। न ये स्तौ॒ना अ॒यासो॑ म॒ह्ना नू चि॑त्सु॒दानु॒रव॑ यासदु॒ग्रान्॥

हे मनुष्यो! इस जगत् में दो प्रकार के मनुष्य हैं−एक शक्ति और विद्या से हीन, दुष्ट कर्म करनेवाले हैं, दूसरे शक्तिमान्, श्रेष्ठ कर्म धारण करनेवाले हैं, उनमें जो दुष्कर्म करनेवालों का सत्कार नहीं करते और श्रेष्ठों का सत्कार करते हैं, वे शीघ्र महान् चाहे हुए सुख को पाते हैं॥५॥

त इदु॒ग्राः शव॑सा धृ॒ष्णुषे॑णा उ॒भे यु॑जन्त॒ रोद॑सी सु॒मेके॑। अध॑ स्मैषु रोद॒सी स्वशो॑चि॒राम॑वत्सु तस्थौ॒ न रोकः॑॥

जो मनुष्य बिजुली और पृथिवी की विद्या को लेकर दृढ़ सेनावाले होते हैं, उनको शत्रुजन रोक नहीं सकते तथा जो उत्तम घरों में निवास करते हैं, वे प्रकाशित बुद्धिवाले होते हैं॥६॥

अ॒ने॒नो वो॑ मरुतो॒ यामो॑ अस्त्वन॒श्वश्चि॒द्यमज॒त्यर॑थीः। अ॒न॒व॒सो अ॑नभी॒शू र॑ज॒स्तूर्वि रोद॑सी प॒थ्या॑ याति॒ साध॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! तुम पक्षपातरूपी पाप को छोड़ के निर्बलों की निरन्तर रक्षा कर भूगर्भविद्या और विद्युद्विद्या को अच्छे प्रकार सिद्ध कर भूमि और उदक तथा अन्तरिक्ष के मार्गों को उत्तम यानों से जाकर आओ॥७॥

नास्य॑ व॒र्ता न त॑रु॒ता न्व॑स्ति॒ मरु॑तो॒ यमव॑थ॒ वाज॑सातौ। तो॒के वा॒ गोषु॒ तन॑ये॒ यम॒प्सु स व्र॒जं दर्ता॒ पार्ये॒ अध॒ द्योः॥

हे मनुष्यो! जिनके विद्वान् जन रक्षा करनेवाले हों, उनको कहीं से भय नहीं प्राप्त होता, जैसे सूर्य से वर्षा होकर जगत् निर्भय होता है, वैसे ही धार्मिक विद्वानों के सङ्ग से समस्त राज्य निर्भय होता है॥८॥

प्र चि॒त्रम॒र्कं गृ॑ण॒ते तु॒राय॒ मारु॑ताय॒ स्वत॑वसे भरध्वम्। ये सहां॑सि॒ सह॑सा॒ सह॑न्ते॒ रेज॑ते अग्ने पृथि॒वी म॒खेभ्यः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे चलती हुई भूमि यज्ञसामग्री को उत्पन्न करती है, वैसे ही बड़े-बड़े शूरवीर विद्वानों के लिये अन्नादि पदार्थ और अस्त्र-शस्त्र समूह तथा उनकी विद्या की निरन्तर उन्नति करो, ऐसा होने से योग्य शत्रुओं को सहने और पराजय करने का सामर्थ्य उत्पन्न होता है, यह जानो॥९॥

त्विषी॑मन्तो अध्व॒रस्ये॑व दि॒द्युत्तृ॑षु॒च्यव॑सो जु॒ह्वो॒३॒॑ नाग्नेः। अ॒र्चत्र॑यो॒ धुन॑यो॒ न वी॒रा भ्राज॑ज्जन्मानो म॒रुतो॒ अधृ॑ष्टाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजा आदि जनो! जैसे यज्ञ के बीच वर्त्तमान लपट शीघ्र ही अन्तरिक्ष को जाती है, वैसे शिक्षा के बीच वर्त्तमान जन शीघ्र विजय के लिये जा सकते हैं, जैसे जुहूओं से अग्नि प्रदीप्त की जाती है, वैसे शिक्षा और सत्कार से वीरों की सेना को प्रदीप्त करनी चाहिये, जैसे अग्नि की लपटें और शब्द होते हैं, वैसे ही तुम्हारी सेना के प्रकाश और शब्द बहुत हों॥१०॥

तं वृ॒धन्तं॒ मारु॑तं॒ भ्राज॑दृष्टिं रु॒द्रस्य॑ सू॒नुं ह॒वसा वि॑वासे। दि॒वः शर्धा॑य॒ शुच॑यो मनी॒षा गि॒रयो॒ नाप॑ उ॒ग्रा अ॑स्पृध्रन्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो मनुष्य मेघ के समान उन्नति करने, प्रजा के पालने, जल के समान पुष्टि करनेवाले, पवित्र आशययुक्त, तेजस्वी और मनोहर बल के बढ़ानेवाले हों, उनके साथ यदि राजा राज्यशिक्षा करे तो कहीं पराजय और अपकीर्ति न हो॥११॥इस सूक्त में पवनों के गुणों के समान विद्वानों और वीरों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह छियासठवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

विश्वे॑षां वः स॒तां ज्येष्ठ॑तमा गी॒र्भिर्मि॒त्रावरु॑णा वावृ॒धध्यै॑। सं या र॒श्मेव॑ य॒मतु॒र्यमि॑ष्ठा॒ द्वा जनाँ॒ अस॑मा बा॒हुभिः॒ स्वैः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो विद्या और उत्तम शील आदि गुणों से श्रेष्ठ, अधर्म से निवृत्त कर धर्म के बीच प्रवृत्त करानेवाले, अध्यापन और उपदेश से सूर्य के समान उत्तम बुद्धि के प्रकाश करनेवाले हों, उन्हीं का सदा सत्कार करो॥१॥

इ॒यं मद्वां॒ प्र स्तृ॑णीते मनी॒षोप॑ प्रि॒या नम॑सा ब॒र्हिरच्छ॑। य॒न्तं नो॑ मित्रावरुणा॒वधृ॑ष्टं छ॒र्दिर्यद्वां॑ वरू॒थ्यं॑ सुदानू॥

हे मनुष्यो! जिनके सङ्ग से हमको उत्तम बुद्धि और घर प्राप्त होते हैं, उनको सदैव तुम मानो॥२॥

आ या॑तं मित्रावरुणा सुश॒स्त्युप॑ प्रि॒या नम॑सा हू॒यमा॑ना। सं याव॑प्नः॒स्थो अ॒पसे॑व॒ जना॑ञ्छ्रुधीय॒तश्चि॑द्यतथो महि॒त्वा॥

हे मनुष्यो! तुम अध्यापक और उपदेशकों को सदा सत्कार से बुलाकर उनका सत्कार कर विद्या और सत्योपदेश को संसार के बीच विस्तारो। हे अध्यापक और उपदेशको! तुम प्रयत्न से माता और पिता के समान मनुष्यों को उत्तम शिक्षा देकर विद्यावान् सर्वोपकार करनेवालों को सिद्ध करो॥३॥

अश्वा॒ न या वा॒जिना॑ पू॒तब॑न्धू ऋ॒ता यद्गर्भ॒मदि॑ति॒र्भर॑ध्यै। प्र या महि॑ म॒हान्ता॒ जाय॑माना घो॒रा मर्ता॑य रि॒पवे॒ नि दी॑धः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो कुलीन, जिनका महान् पक्ष, विद्वान् माता पिता से उत्पन्न हुए, उत्तम शिक्षायुक्त, महाशय, माता के तुल्य मनुष्यों पर कृपा करते, वा पढ़ाने और उपदेश करने से सब पर उपकार करते, तथा दुष्टों को रोकते हुए विद्वान् होते हैं, उन्हीं की सेवा, सङ्ग, उन्हीं से उपदेश और विद्या पढ़ना निरन्तर करो॥४॥

विश्वे॒ यद्वां॑ मं॒हना॒ मन्द॑मानाः क्ष॒त्रं दे॒वासो॒ अद॑धुः स॒जोषाः॑। परि॒ यद्भू॒थो रोद॑सी चिदु॒र्वी सन्ति॒ स्पशो॒ अद॑ब्धासो॒ अमू॑राः॥

वे ही आप्त विद्वान् जन हैं, जिनका पढ़ाना, उपदेश और सङ्ग शीघ्र सफल होता है, जिनके सङ्ग से हिंसा आदि दोषरहित विद्वान् होकर पक्षपात को छोड़ सब प्राणियों को अपने आत्मा के तुल्य सुख देते हैं॥५॥

ता हि क्ष॒त्रं धा॒रये॑थे॒ अनु॒ द्यून्दृं॒हेथे॒ सानु॑मुप॒मादि॑व॒ द्योः। दृ॒ळ्हो नक्ष॑त्र उ॒त वि॒श्वदे॑वो॒ भूमि॒माता॒न्द्यां धा॒सिना॒योः॥

हे मनुष्यो! जो अध्यापक और उपदेशक प्रतिदिन सूर्य के समान विद्याव्यवहार को सम्यक् प्रकाशित कर राज्य, धन और आयु को बढ़ाते, सब को सुख की धारणा कराते, जिनको प्राप्त होकर सब जन विद्वान् होते हैं, उनका सङ्ग निरन्तर करो॥६॥

ता वि॒ग्रं धै॑थे ज॒ठरं॑ पृ॒णध्या॒ आ यत्सद्म॒ सभृ॑तयः पृ॒णन्ति॑। न मृ॑ष्यन्ते युव॒तयोऽवा॑ता॒ वि यत्पयो॑ विश्वजिन्वा॒ भर॑न्ते॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे समान गुण, कर्म, स्वभाव रूप स्त्री-पुरुष अत्यन्त प्रीति से विवाह कर कभी विरोध नहीं करते हैं, वैसे ही विद्वान् जन और विद्यार्थीजन विद्वेष नहीं करते हैं, ऐसे प्रेम के साथ वर्त्तमान सब सदैव आनन्दित होते हैं॥७॥

ता जि॒ह्वया॒ सद॒मेदं सु॑मे॒धा आ यद्वां॑ स॒त्यो अ॑र॒तिर्ऋ॒ते भूत्। तद्वां॑ महि॒त्वं घृ॑तान्नावस्तु यु॒वं दा॒शुषे॒ वि च॑यिष्ट॒मंहः॑॥

हे मनुष्यो! जिनकी उत्तेजना से तुम लोग विद्या को प्राप्त होओ वा उपदेश ग्रहण करो, उनका धन्यवाद आदि से निरन्तर सत्कार करो, जिनके सङ्ग से मनुष्य सत्य आचरणवाले उत्तम ज्ञाता होते हैं, वे ही महाशय हैं॥८॥

प्र यद्वां॑ मित्रावरुणा स्पू॒र्धन्प्रि॒या धाम॑ यु॒वधि॑ता मि॒नन्ति॑। न ये दे॒वास॒ ओह॑सा॒ न मर्ता॒ अय॑ज्ञसाचो॒ अप्यो॒ न पु॒त्राः॥

जो मनुष्य अध्यापक और उपदेशकों का अप्रिय आचरण नहीं करते हैं, वे सत्पुत्रों के समान होते हैं और जो अप्रिय का आचरण करते हैं, वे शत्रुओं के तुल्य होते हैं॥९॥

वि यद्वाचं॑ की॒स्तासो॒ भर॑न्ते॒ शंस॑न्ति॒ के चि॑न्नि॒विदो॑ मना॒नाः। आद्वां॑ ब्रवाम स॒त्यान्यु॒क्था नकि॑र्दे॒वेभि॑र्यतथो महि॒त्वा॥

राजा और राजजनों और प्रजास्थ विद्वानों के द्वारा कौन विद्वान् अच्छी शिक्षा देने योग्य हैं, जो निष्कपटता से अपनी शक्ति के अनुकूल पढ़ाने से विद्या प्रचार न करें। और जो प्रीति के साथ विद्याओें को पाकर सर्वत्र प्रचार करते हैं, वे ही सदा सत्कार करने योग्य हैं॥१०॥

अ॒वोरि॒त्था वां॑ छ॒र्दिषो॑ अ॒भिष्टौ॑ यु॒वोर्मि॑त्रावरुणा॒वस्कृ॑धोयु। अनु॒ यद्गावः॑ स्फु॒रानृ॑जि॒प्यं धृ॒ष्णुं यद्रणे॒ वृष॑णं यु॒नज॑न्॥

हे अध्यापक और उपदेशको! जो विद्यार्थी जन तुम्हारे काम को अपने काम के समान जानते हैं, वे ही दीर्घ आयुवाले, प्रशंसित विद्यायुक्त, धार्मिक परोपकारी होते हैं॥११॥इस सूक्त में प्राण और उदान के समान अध्यापक और उपदेशकों के गुणों का वर्णन होने से सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सड़सठवाँ सूक्त और दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

श्रु॒ष्टी वां॑ य॒ज्ञ उद्य॑तः स॒जोषा॑ मनु॒ष्वद्वृ॒क्तब॑र्हिषो॒ यज॑ध्यै। आ य इन्द्रा॒वरु॑णावि॒षे अ॒द्य म॒हे सु॒म्नाय॑ म॒ह आ॑व॒वर्त॑त्॥

हे पढ़ाने और उपदेश करनेवालो! जो आप लोगों के सुख के लिये प्रयत्न करते हुए पुरुषार्थी, प्रीतिमान्, शीघ्रकारी वर्त्तमान हैं; उन पवित्र, जितेन्द्रिय, धार्मिक विद्यार्थियों को निरन्तर सत्य का उपदेश करो॥१॥

ता हि श्रेष्ठा॑ दे॒वता॑ता तु॒जा शूरा॑णां॒ शवि॑ष्ठा॒ ता हि भू॒तम्। म॒घोनां॒ मंहि॑ष्ठा तुवि॒शुष्म॑ ऋ॒तेन॑ वृत्र॒तुरा॒ सर्व॑सेना॥

हे मनुष्यो! जो सत्य न्याय से प्रजा की पालना करने में प्रयत्न करते हुए, सब प्रकार की विद्या और सर्वोत्तम सेनाओं से युक्त, दुष्टों की हिंसा से श्रेष्ठ, धनाढ्य और वीर-पुरुषों की रक्षा करनेवाले होवें, वे धन्यवाद के योग्य हैं॥२॥

ता गृ॑णीहि नम॒स्ये॑भिः शू॒षैः सु॒म्नेभि॒रिन्द्रा॒वरु॑णा चका॒ना। वज्रे॑णा॒न्यः शव॑सा॒ हन्ति॑ वृ॒त्रं सिष॑क्त्य॒न्यो वृ॒जने॑षु॒ विप्रः॑॥

जो सभापति और सेनापति, सूर्य और वायु के समान प्रजा के पालनेवाले, उत्तम सेनाजनों से दुष्टों को निवारनेवाले, मेघों के समान प्रजाजनों को कामनाओं से पूरित करते हैं, वे सब से सत्कार करने योग्य हैं॥३॥

ग्नाश्च॒ यन्नर॑श्च वावृ॒धन्त॒ विश्वे॑ दे॒वासो॑ न॒रां स्वगू॑र्ताः। प्रैभ्य॑ इन्द्रावरुणा महि॒त्वा द्यौश्च॑ पृथिवि भूतमु॒र्वी॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! जो विद्या, धर्म और विनय से बढ़ते हैं, उन उद्यमियों के साथ इन प्रजाजनों की पालना करो॥४॥

स इत्सु॒दानुः॒ स्ववाँ॑ ऋ॒तावेन्द्रा॒ यो वां॑ वरुण॒ दाश॑ति॒ त्मन्। इ॒षा स द्वि॒षस्त॑रे॒द्दास्वा॒न्वंस॑द्र॒यिं र॑यि॒वत॑श्च॒ जना॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सूर्य्य वर्षा करा कर और वायु प्राण धारणा करा कर ये दोनों सब प्राणियों को निर्भय करते हैं, वैसे जो सङ्ग्राम के बीच अच्छे प्रकार सन्मुख हैं, उनसे पाये हुए धन का यथावत् विभाग कर सोलहवाँ भाग भृत्यों के लिये देते हैं तथा वहाँ सङ्ग्राम में जो योद्धा जीते, उनके लिये उससे सोलहवाँ भाग देते हैं, वे ही विजयी होकर आपस में प्रसन्न होते हैं॥५॥

यं यु॒वं दा॒श्व॑ध्वराय देवा र॒यिं ध॒त्थो वसु॑मन्तं पुरु॒क्षुम्। अ॒स्मे स इ॑न्द्रावरुणा॒वपि॑ ष्या॒त्प्र यो भ॒नक्ति॑ व॒नुषा॒मश॑स्तीः॥

हे सभासेनाधीशो! जो तुम लोग उत्तम बुद्धि और अतुल लक्ष्मी को हम लोगों में धरो तो हम लोग सदैव विजयी होकर विजय, राज्य और ऐश्वर्य्य को बढ़ावें॥६॥

उ॒त नः॑ सुत्रा॒त्रो दे॒वगो॑पाः सू॒रिभ्य॑ इन्द्रावरुणा र॒यिः ष्या॑त्। येषां॒ शुष्मः॒ पृत॑नासु सा॒ह्वान्प्र स॒द्यो द्यु॒म्ना ति॒रते॒ ततु॑रिः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो सूर्य के समान प्रतापी, पवन के समान बलवान्, विद्यावान् के समान नम्रता और शूरवीरों की रक्षा करनेवाले हों, वे सर्वत्र शीघ्र शत्रुओं को जीत के यशस्वी होकर धनवान् होते हैं॥७॥

नू न॑ इन्द्रावरुणा गृणा॒ना पृ॒ङ्क्तं र॒यिं सौ॑श्रव॒साय॑ देवा। इ॒त्था गृ॒णन्तो॑ म॒हिन॑स्य॒ शर्धो॒ऽपो न ना॒वा दु॑रि॒ता त॑रेम॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो राजप्रजाजन आपस में प्रीतिवाले होकर अन्नादि पदार्थों के लिये धन इकट्ठा करते हैं, वे सूर्य और चन्द्रमा के तुल्य प्रतापी होकर जैसे बड़ी नौका से दुःख से तरने योग्य समुद्रों को जन पार होते हैं, वैसे ही बड़े बड़े दुःख और दारिद्र्यों को शीघ्र तरते हैं॥८॥

प्र स॒म्राजे॑ बृह॒ते मन्म॒ नु प्रि॒यमर्च॑ दे॒वाय॒ वरु॑णाय स॒प्रथः॑। अ॒यं य उ॒र्वी म॑हि॒ना महि॑व्रतः॒ क्रत्वा॑ वि॒भात्य॒जरो॒ न शो॒चिषा॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वान्जनो! जो सूर्य के तुल्य, जीव के तुल्य वा परमात्मा के तुल्य शुभ गुण कर्म स्वभावों से देदीप्यमान, विद्या और विनय से युक्त, उत्तम यत्न के साथ वाणी मन और शरीर से पिता के समान प्रजाजनों की पालना करने को प्रयत्न करता है, उस चक्रवर्ती, सर्वोत्कृष्ट, विद्वान् और सत्कार करने योग्य राजा के लिये राज्य में सत्य नीति को आप लोग समझावें, जिससे यह सर्वत्र धर्मयुक्त यशवाला हो॥९॥

इन्द्रा॑वरुणा सुतपावि॒मं सु॒तं सोमं॑ पिबतं॒ मद्यं॑ धृतव्रता। यु॒वो रथो॑ अध्व॒रं दे॒ववी॑तये॒ प्रति॒ स्वस॑र॒मुप॑ याति पी॒तये॑॥

हे राजप्रजाजनो! तुम प्रतिदिन सोमलता आदि से उत्पन्न किये हुए सर्व रोगों के हरने, बल बुद्धि, पराक्रम बढ़ानेवाले, हिंसारहित, महौषधियों के रस को पीकर धर्मात्मा होओ॥१०॥

इन्द्रा॑वरुणा॒ मधु॑मत्तमस्य॒ वृष्णः॒ सोम॑स्य वृष॒णा वृ॑षेथाम्। इ॒दं वा॒मन्धः॒ परि॑षिक्तम॒स्मे आ॒सद्या॒स्मिन्ब॒र्हिषि॑ मादयेथाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सोमलतादि रसयुक्त अन्न वा पान से आप आनन्दित होकर हमको आनन्दित करते हैं, वे ही सब से सत्कार करने योग्य होते हैं॥११॥इस सूक्त में वरुण के समान राजप्रजा के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह अड़सठवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ

सं वां॒ कर्म॑णा॒ समि॒षा हि॑नो॒मीन्द्रा॑विष्णू॒ अप॑सस्पा॒रे अ॒स्य। जु॒षेथां॑ य॒ज्ञं द्रवि॑णं च धत्त॒मरि॑ष्टैर्नः प॒थिभिः॑ पा॒रय॑न्ता॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे अध्यापक और उपदेशको! जैसे वायु और बिजुली विमानादिकों में अच्छे प्रकार जोड़े हुए गतिरूप कर्म के विषय को स्थान से पार पहुँचाते हैं, वैसे उनकी विद्या में तुमको प्रेरणा देकर जिस प्रकार हम लोग बढ़ावें उस प्रकार बढ़कर निर्विघ्न मार्गों से हम लोगों को लेजाके धन और यश की प्राप्ति निरन्तर कराइये, उन आप लोगों की सेवा हम लोग निरन्तर करें॥१॥

या विश्वा॑सां जनि॒तारा॑ मती॒नामिन्द्रा॒विष्णू॑ क॒लशा॑ सोम॒धाना॑। प्र वां॒ गिरः॑ श॒स्यमा॑ना अवन्तु॒ प्र स्तोमा॑सो गी॒यमा॑नासो अ॒र्कैः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो! जो वायु और बिजुली बुद्धि बढ़ाने और सब विद्याओं के धारण करनेवाले वर्त्तमान हैं, उनके अच्छे प्रकार प्रयोग से अर्थात् कार्यों में लाने से विद्या, शिक्षा तथा वाणियों की अच्छे प्रकार रक्षा करो॥२॥

इन्द्रा॑विष्णू मदपती मदाना॒मा सोमं॑ यातं॒ द्रवि॑णो॒ दधा॑ना। सं वा॑मञ्जन्त्व॒क्तुभि॑र्मती॒नां सं स्तोमा॑सः श॒स्यमा॑नास उ॒क्थैः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो वायु और बिजुली के समान सब के आनन्द के बढ़ानेवाले, मनुष्यों से प्रशस्त किये जाते और विद्या वा धन को अच्छे प्रकार देते हुए प्रयत्न करते हैं, वे ही राजकर्म के योग्य होते हैं॥३॥

आ वा॒मश्वा॑सो अभिमाति॒षाह॒ इन्द्रा॑विष्णू सध॒मादो॑ वहन्तु। जु॒षेथां॒ विश्वा॒ हव॑ना मती॒नामुप॒ ब्रह्मा॑णि शृणुतं॒ गिरो॑ मे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! यदि बुद्धिमान्, अतीव बलवान् और शत्रुओं के बल के सहनेवाले मनुष्य आपको प्राप्त होवें तो वे सब ऐश्वर्य्य और विद्या को संसार में विस्तारें॥४॥

इन्द्रा॑विष्णू॒ तत्प॑न॒याय्यं॑ वां॒ सोम॑स्य॒ मद॑ उ॒रु च॑क्रमाथे। अकृ॑णुतम॒न्तरि॑क्षं॒ वरी॒योऽप्र॑थतं जी॒वसे॑ नो॒ रजां॑सि॥

हे राजप्रजाजनो! जैसे यज्ञ से शोधे हुए वायु और बिजुली समस्त चराचर जगत् को प्रशंसा के योग्य और नीरोग करते हैं, वैसे विधान कर उससे हमारे ऐश्वर्य्य और जीवन को अधिक करो॥५॥

इन्द्रा॑विष्णू ह॒विषा॑ वावृधा॒नाग्रा॑द्वाना॒ नम॑सा रातहव्या। घृता॑सुती॒ द्रवि॑णं धत्तम॒स्मे स॑मु॒द्रः स्थः॑ क॒लशः॑ सोम॒धानः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे ऋत्विग् और यजमान आदि जनो! सुगन्धि और घृतादि पदार्थों के होम से वायु और सूर्य को शुद्ध कर सब के भाग्य की सिद्धि कर सब के सुख के बढ़ानेवाले होओ॥६॥

इन्द्रा॑विष्णू॒ पिब॑तं॒ मध्वो॑ अ॒स्य सोम॑स्य दस्रा ज॒ठरं॑ पृणेथाम्। आ वा॒मन्धां॑सि मदि॒राण्य॑ग्म॒न्नुप॒ ब्रह्मा॑णि शृणुतं॒ हवं॑ मे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य औषधों से शरीर के रोगों को तथा विद्या, सत्सङ्ग और धर्म के अनुष्ठान से आत्मा के रोगों को निवार के वायु और बिजुली के समान बलिष्ठ हो विद्याभ्यास करके विद्यार्थियों की परीक्षा करते हैं, वे सब के दुःखों को निवृत्त कर आनन्द दे सकते हैं॥७॥

उ॒भा जि॑ग्यथु॒र्न परा॑ जयेथे॒ न परा॑ जिग्ये कत॒रश्च॒नैनोः॑। इन्द्र॑श्च विष्णो॒ यदप॑स्पृधेथां त्रे॒धा स॒हस्रं॒ वि तदै॑रयेथाम्॥

हे सेनाबल के अधीशो! यदि आप लोग सर्वदा सेना की उन्नति के लिये और युद्धविद्या की वृद्धि के लिये प्रयत्न कीजिये तो सर्वत्र जीतिये कहीं भी न पराजित हूजिये॥८॥इस सूक्त में इन्द्र और विष्णु के समान सभा और सेनेश आदि के कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह उनहत्तरवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

घृ॒तव॑ती॒ भुव॑नानामभि॒श्रियो॒र्वी पृ॒थ्वी म॑धु॒दुघे॑ सु॒पेश॑सा। द्यावा॑पृथि॒वी वरु॑णस्य॒ धर्म॑णा॒ विष्क॑भिते अ॒जरे॒ भूरि॑रेतसा॥

हे मनुष्यो! आप भूगर्भ और बिजुली की विद्या को जानो और जो दो पदार्थ सूर्य्य तथा वायु से धारण किये हुए हैं, उनसे बल की वृद्धि और कामना की पूर्णता करो॥१॥

अस॑श्चन्ती॒ भूरि॑धारे॒ पय॑स्वती घृ॒तं दु॑हाते सु॒कृते॒ शुचि॑व्रते। राज॑न्ती अ॒स्य भुव॑नस्य रोदसी अ॒स्मे रेतः॑ सिञ्चतं॒ यन्मनु॑र्हितम्॥

हे मनुष्यो! सूर्य्य और भूमि ही सब जगत् की रक्षा के निमित्त, बहुत उदक आदि पदार्थयुक्त और सब के काम को पूर्ण करते हैं, उनको यथावत् जानकर कार्य्य की सिद्धि के लिये अच्छे प्रकार उनका प्रयोग करो॥२॥

यो वा॑मृ॒जवे॒ क्रम॑णाय रोदसी॒ मर्तो॑ द॒दाश॑ धिषणे॒ स सा॑धति। प्र प्र॒जाभि॑र्जायते॒ धर्म॑ण॒स्परि॑ यु॒वोः सि॒क्ता विषु॑रूपाणि॒ सव्र॑ता॥

हे मनुष्यो! जो भूगर्भविद्या और द्यावापृथिवी के कर्मों को जानते हैं; वे प्रजा, पशु, विद्या और राज्य से युक्त होते हैं॥३॥

घृ॒तेन॒ द्यावा॑पृथि॒वी अ॒भीवृ॑ते घृत॒श्रिया॑ घृत॒पृचा॑ घृता॒वृधा॑। उ॒र्वी पृ॒थ्वी हो॑तृ॒वूर्ये॑ पु॒रोहि॑ते॒ ते इद्विप्रा॑ ईळते सु॒म्नमि॒ष्टये॑॥

हे मनुष्यो! जैसे उत्तम बुद्धिमान् जन बिजुली और अन्तरिक्ष की विद्या को जान के कार्यों में लगाते हैं, वैसे तुम भी उनका प्रयोग करो॥४॥

मधु॑ नो॒ द्यावा॑पृथि॒वी मि॑मिक्षतां मधु॒श्चुता॑ मधु॒दुघे॒ मधु॑व्रते। दधा॑ने य॒ज्ञं द्रवि॑णं च दे॒वता॒ महि॒ श्रवो॒ वाज॑म॒स्मे सु॒वीर्य॑म्॥

हे मनुष्यो! जैसे भूमि और सूर्य्य सत्य कर्मयुक्त, इच्छा पूरी करने और मधुरादि रस देने, धन, अन्न, बल और विज्ञान के बढ़ानेवाले हों, वैसे अनुष्ठान करो॥५॥

ऊर्जं॑ नो॒ द्यौश्च॑ पृथि॒वी च॑ पिन्वतां पि॒ता मा॒ता वि॑श्व॒विदा॑ सु॒दंस॑सा। सं॒र॒रा॒णे रोद॑सी वि॒श्वशं॑भुवा स॒निं वाजं॑ र॒यिम॒स्मे समि॑न्वताम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! आप, जो सूर्य पिता के समान, जो पृथिवी माता के समान ये दोनों सर्व सुख देने वा धन और ऐश्वर्य्य की प्राप्ति कराने वा मङ्गल करानेवाले उत्तम क्रियायुक्त और बल वा पराक्रम देनेवाले वर्त्तमान हैं, उनको उत्तम यत्न के साथ कैसे न जानो॥६॥इस सूक्त में द्यावापृथिवी और उनके समान अध्यापक और उपदेश वा ऋत्विक्, और यजमानों के काम का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सत्तरवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

उदु॒ ष्य दे॒वः स॑वि॒ता हि॑र॒ण्यया॑ बा॒हू अ॑यंस्त॒ सव॑नाय सु॒क्रतुः॑। घृ॒तेन॑ पा॒णी अ॒भि प्रु॑ष्णुते म॒खो युवा॑ सु॒दक्षो॒ रज॑सो॒ विध॑र्मणि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वान् अति बल से युक्त भुजाओंवाला, अत्यन्त बुद्धिमान्, विशेषता से धर्मात्मा होकर ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये निरन्तर उद्यम करता है, वह ऐश्वर्य को प्राप्त होकर फिर से सब प्रजा के धर्म में प्रवेश कर जैसे यज्ञ सुख देता है, वैसे सुखी करता है॥१॥

दे॒वस्य॑ व॒यं स॑वि॒तुः सवी॑मनि॒ श्रेष्ठे॑ स्याम॒ वसु॑नश्च दा॒वने॑। यो विश्व॑स्य द्वि॒पदो॒ यश्चतु॑ष्पदो नि॒वेश॑ने प्रस॒वे चासि॒ भूम॑नः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो! जैसे इस जगत् में जगदीश्वर अभिव्याप्त होकर सब की रक्षा करता है, वैसे ही इस जगत् में व्याप्त होकर विद्या और विनय से समस्त राज्य को पुत्र के समान पालो॥२॥

अद॑ब्धेभिः सवितः पा॒युभि॒ष्ट्वं शि॒वेभि॑र॒द्य परि॑ पाहि नो॒ गय॑म्। हिर॑ण्यजिह्वः सुवि॒ताय॒ नव्य॑से॒ रक्षा॒ माकि॑र्नो अ॒घशं॑स ईशत॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा प्रयत्न के साथ प्रजाओं की अच्छे प्रकार रक्षा कर डाकुओं को मारे, वही नवीन-नवीन ऐश्वर्य्य को उत्पन्न कर निरन्तर प्रजाजनों का प्यारा और धार्मिक हो॥३॥

उदु॒ ष्य दे॒वः स॑वि॒ता दमू॑ना॒ हिर॑ण्यपाणिः प्रतिदो॒षम॑स्थात्। अयो॑हनुर्यज॒तो म॒न्द्रजि॑ह्व॒ आ दा॒शुषे॑ सुवति॒ भूरि॑ वा॒मम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे ईश्वर से नियुक्त किया सूर्यलोक प्रतिक्षण अपनी क्रिया को नही छोड़ता, वैसे ही जो राजा न्याय से राज्य पालने के लिये प्रतिक्षण उद्योग करता है, एक क्षण भी व्यर्थ नहीं खोता तथा सब मनुष्यों को उत्तम कर्मों के बीच आप वर्त्ताव कर उन्हें प्रेरणा देता है, वही शम-दम आदि शुभ गुणों से युक्त राजा होने योग्य है, यह सब जानें॥४॥

उदू॑ अयाँ उपव॒क्तेव॑ बा॒हू हि॑र॒ण्यया॑ सवि॒ता सु॒प्रती॑का। दि॒वो रोहां॑स्यरुहत्पृथि॒व्या अरी॑रमत्प॒तय॒त्कच्चि॒दभ्व॑म्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे राजन्! आप कब सूर्य के समान न्याय और विनय से प्रकाशित सुन्दर दृढ़ अङ्गयुक्त, श्रेष्ठ धर्मज्ञ विद्वानों के समान वक्ता होओ। जैसे इस जगत् में सर्वोपकार के लिये ईश्वर ने सूर्य बनाया है, वैसे ही सब के सुख के लिये राजा बनाया है॥५॥

वा॒मम॒द्य स॑वितर्वा॒ममु॒ श्वो दि॒वेदि॑वे वा॒मम॒स्मभ्यं॑ सावीः। वा॒मस्य॒ हि क्षय॑स्य देव॒ भूरे॑र॒या धि॒या वा॑म॒भाजः॑ स्याम॥

हे राजन्! जिससे आप हम प्रजाजनों के लिये प्रशंसनीय सुख को उत्पन्न करते और रक्षा का विधान करते हो, वैसे हम लोग सुख से धन, घर और प्रशंसित कामों के सेवनेवाले होकर आपकी आज्ञा में नित्य वर्तें॥६॥इस सूक्त में सविता, राजा और प्रजा के कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह इकहत्तरवाँ सूक्त और पन्द्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इन्द्रा॑सोमा॒ महि॒ तद्वां॑ महि॒त्वं यु॒वं म॒हानि॑ प्रथ॒मानि॑ चक्रथुः। यु॒वं सूर्यं॑ विवि॒दथु॑र्यु॒वं स्व१॒॑र्विश्वा॒ तमां॑स्यहतं नि॒दश्च॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे प्रजाजनो! जैसे सूर्य को प्राप्त होकर चन्द्र आदि लोक प्रकाशित होते हैं, वैसे ही अध्यापक और उपदेशकों का सङ्ग कर सब प्रकाशित आत्मावाले हों॥१॥

इन्द्रा॑सोमा वा॒सय॑थ उ॒षास॒मुत्सूर्यं॑ नयथो॒ ज्योति॑षा स॒ह। उप॒ द्यां स्क॒म्भथुः॒ स्कम्भ॑ने॒नाप्र॑थतं पृथि॒वीं मा॒तरं॒ वि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे अध्यापक और उपदेशको! जैसे बिजुली और पवन सूर्य्य आदि लोकों का निवास कराते हैं, वैसे ही प्रजाजनों को अच्छे उपदेश से सुख में बसाओ॥२॥

इन्द्रा॑सोमा॒वहि॑म॒पः प॑रि॒ष्ठां ह॒थो वृ॒त्रमनु॑ वां॒ द्यौर॑मन्यत। प्रार्णां॑स्यैरयतं न॒दीना॒मा स॑मु॒द्राणि॑ पप्रथुः पु॒रूणि॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे अध्यापक और उपदेशको! जैसे वायु और बिजुली मेघ को नष्ट-भ्रष्ट कर जल को वर्षाते हैं, वैसे कुत्सित शिक्षा को विनष्ट कर अच्छी शिक्षा की वर्षा करो॥३॥

इन्द्रा॑सोमा प॒क्वमा॒मास्व॒न्तर्नि गवा॒मिद्द॑धथुर्व॒क्षणा॑सु। ज॒गृ॒भथु॒रन॑पिनद्धमासु॒ रुश॑च्चि॒त्रासु॒ जग॑तीष्व॒न्तः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो बिजुली और सोम के समान सब में दृढ़ ज्ञान स्थापन कर नदी के प्रवाह के तुल्य आगे चलाते हैं, वे संसार में कल्याण करनेवाले होते हैं॥४॥

इन्द्रा॑सोमा यु॒वम॒ङ्ग तरु॑त्रमपत्य॒साचं॒ श्रुत्यं॑ रराथे। यु॒वं शुष्मं॒ नर्यं॑ चर्ष॒णिभ्यः॒ सं वि॑व्यथुः पृतना॒षाह॑मुग्रा॥

हे अध्यापक वा उपदेशको! आप लोग पवन और बिजुली के समान सर्वत्र अनुकूलता से सङ्गवाले होते हुए उत्तम सन्तानों को उत्पन्न कर मनुष्यों के हित करनेवाले शरीर और आत्मा के बल को उत्पन्न करें, जिससे शत्रुओं की सेना को सह सकें॥५॥इस सूक्त में इन्द्र, सोम, अध्यापक और उपदेशकों के काम का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह बहत्तरवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

यो अ॑द्रि॒भित्प्र॑थम॒जा ऋ॒तावा॒ बृह॒स्पति॑राङ्गिर॒सो ह॒विष्मा॑न्। द्वि॒बर्ह॑ज्मा प्राघर्म॒सत्पि॒ता न॒ आ रोद॑सी वृष॒भो रो॑रवीति॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा, मेघ का सूर्य जैसे शत्रुओं का विदीर्ण करनेवाला, ज्येष्ठ, महात्मा, धर्मात्मा जनों की पालना करनेवाला, प्रजावान्, पृथिवी पर सुख वर्षानेहारा होकर प्रजाओं में न्याय का निरन्तर उपदेश करे, वही पृथिवी के तुल्य क्षमाशील और प्रतापवान् तथा प्रजाजनों में पिता के समान वर्त्ते॥१॥

जना॑य चि॒द्य ईव॑त उ लो॒कं बृह॒स्पति॑र्दे॒वहू॑तौ च॒कार॑। घ्नन्वृ॒त्राणि॒ वि पुरो॑ दर्दरीति॒ जय॒ञ्छत्रूँ॑र॒मित्रा॑न्पृ॒त्सु साह॑न्॥

हे राजन्! जो न्याय से प्रजा पालने के लिये प्रसन्न, पूर्णशरीरात्मबलयुक्त वीर, विद्वान् होवें, वे सेनापति हों; जिससे शत्रुओं के जीतने और उनकी सेना के सहने और उसे छिन्न-भिन्न करने तथा विजय और धन को पाने को समर्थ हों॥२॥

बृह॒स्पतिः॒ सम॑जय॒द्वसू॑नि म॒हो व्र॒जान् गोम॑तो दे॒व ए॒षः। अ॒पः सिषा॑स॒न्त्स्व१॒॑रप्र॑तीतो॒ बृह॒स्पति॒र्हन्त्य॒मित्र॑म॒र्कैः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा सूर्य के समान विद्या, विनय और अच्छे सहाय से प्रकाशमान, प्रजाजनों की पालना करता और सब के लिये अभयदान देता हुआ दुष्टकर्म करनेवालों की निवृत्ति करता है, वही यहाँ राजाओं में महान् राजा होता है॥३॥इस सूक्त में बृहस्पति के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह तिहत्तरवाँ सूक्त और सत्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सोमा॑रुद्रा धा॒रये॑थामसु॒र्यं१॒॑ प्र वा॑मि॒ष्टयोऽर॑मश्नुवन्तु। दमे॑दमे स॒प्त रत्ना॒ दधा॑ना॒ शं नो॑ भूतं द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो राजा चन्द्रमा के तुल्य और जो वैद्य प्राण के तुल्य सब को निर्भय और नीरोग करें, वे सब सुखों को प्राप्त होते हैं, जो प्रजा के घर-घर में धन और आरोग्य को बढ़ावें, वे द्विपगवालों और चार पगवालों से बहुत सुखों को प्राप्त होते हैं॥१॥

सोमा॑रुद्रा॒ वि वृ॑हतं॒ विषू॑ची॒ममी॑वा॒ या नो॒ गय॑मावि॒वेश॑। आ॒रे बा॑धेथां॒ निर्ऋ॑तिं परा॒चैर॒स्मे भ॒द्रा सौ॑श्रव॒सानि॑ सन्तु॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा और वैद्यवर रोगों को शरीर के प्रवेश से पहिले ही दूर करते हैं तथा कुनीति और कुपथ्य को भी पहिले दूर करते हैं, उनके पुरुषार्थ से सब मनुष्य बहुत धन-धान्य और आरोग्यपनों को प्राप्त होते हैं॥२॥

सोमा॑रुद्रा यु॒वमे॒तान्य॒स्मे विश्वा॑ त॒नूषु॑ भेष॒जानि॑ धत्तम्। अव॑ स्यतं मु॒ञ्चतं॒ यन्नो॒ अस्ति॑ त॒नूषु॑ ब॒द्धं कृ॒तमेनो॑ अ॒स्मत्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! आप वैद्यविद्या का प्रचार कर हमारे शरीरों को नीरोग कर और पुरुषार्थ में प्रवेश करके दुःखों को अलग कर अच्छे वैद्यों का सत्कार करो॥३॥

ति॒ग्मायु॑धौ ति॒ग्महे॑ती सु॒शेवौ॒ सोमा॑रुद्रावि॒ह सु मृ॑ळतं नः। प्र नो॑ मुञ्चतं॒ वरु॑णस्य॒ पाशा॑द्गोपा॒यतं॑ नः सुमन॒स्यमा॑ना॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे महौषाधि और बहिः प्राण वायु सबकी सदा पालना करते हैं, वैसे उत्तम राजा और वैद्यजन समस्त उपद्रव और रोगों से निरन्तर रक्षा करते हैं॥४॥इस सूक्त में ओषधि और प्राण के समान वैद्य और राजा के कामों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चौहत्तरवाँ सूक्त और अठारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

जी॒मूत॑स्येव भवति॒ प्रती॑कं॒ यद्व॒र्मी याति॑ स॒मदा॑मु॒पस्थे॑। अना॑विद्धया त॒न्वा॑ जय॒ त्वं स त्वा॒ वर्म॑णो महि॒मा पि॑पर्तु॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मेघ के समान सुन्दर कवचों को धारण कर युद्ध करते हैं, वे घाव से रहित शरीरवाले हुए वैरियों को जीत सकते हैं, जिस-जिस प्रकार से शरीर में घाव करनेवाले नोकदार शस्त्र न प्राप्त हों, उन-उन उपायों का वीरजन सदैव आश्रय करें॥१॥

धन्व॑ना॒ गा धन्व॑ना॒जिं ज॑येम॒ धन्व॑ना ती॒व्राः स॒मदो॑ जयेम। धनुः॒ शत्रो॑रपका॒मं कृ॑णोति॒ धन्व॑ना॒ सर्वाः॑ प्र॒दिशो॑ जयेम॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य धनुर्वेद को पढ़ के पूरा शस्त्र और अस्त्र बनाने का अभ्यास कर प्रयोग करने को जानते हैं, वे ही सर्वत्र विजयी होते हैं॥२॥

व॒क्ष्यन्ती॒वेदा ग॑नीगन्ति॒ कर्णं॑ प्रि॒यं सखा॑यं परिषस्वजा॒ना। योषे॑व शिङ्क्ते॒ वित॒ताधि॒ धन्व॒ञ्ज्या इ॒यं सम॑ने पा॒रय॑न्ती॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे वीरपुरुषो! जैसे प्रिय मित्र पति के साथ स्त्री प्यारी सम्बद्ध अर्थात् प्रेम की डोरी से बंधी हुई है और जैसे विद्यार्थिनों कन्याओं के साथ पढ़ानेवाली विदुषी स्त्री बंधी हुई दुःख से और अविद्या से पार पहुँचती है, वैसे ही यह धनुष् की प्रत्यञ्चा युद्ध से पार पहुँचा कर सदैव सुखी करती है॥३॥

ते आ॒चर॑न्ती॒ सम॑नेव॒ योषा॑ मा॒तेव॑ पु॒त्रं बि॑भृतामु॒पस्थे॑। अप॒ शत्रू॑न्विध्यतां संविदा॒ने आर्त्नी॑ इ॒मे वि॑ष्फु॒रन्ती॑ अ॒मित्रा॑न्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे वीरजनो! जैसे समान प्रीति की सेवनेवाली पत्नी पति को तथा माता पुत्र को निरन्तर सुखी करती है, वैसे शस्त्र और अस्त्रों से शत्रुओं को निवारो॥४॥

ब॒ह्वी॒नां पि॒ता ब॒हुर॑स्य पु॒त्रश्चि॒श्चा कृ॑णोति॒ सम॑नाव॒गत्य॑। इ॒षु॒धिः सङ्काः॒ पृत॑नाश्च॒ सर्वाः॑ पृ॒ष्ठे निन॑द्धो जयति॒ प्रसू॑तः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे वीरपुरुषो! यदि धनुष् को तुम धारण करो तो शत्रुओं को विदीर्ण करके पुत्रों के प्रति पिता जैसे वैसे प्रजा पालन करके समस्त शत्रुसेनाओं को जीत सको॥५॥

रथे॒ तिष्ठ॑न्नयति वा॒जिनः॑ पु॒रो यत्र॑यत्र का॒मय॑ते सुषार॒थिः। अ॒भीशू॑नां महि॒मानं॑ पनायत॒ मनः॑ प॒श्चादनु॑ यच्छन्ति र॒श्मयः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजा आदि वीरपुरुषो! तुम जितेन्द्रिय होकर अपने कार्य के पार रथ से अच्छे सारथी के समान जाओ तथा प्रधान के अनुकूल जानेवाले बड़े व्यवहार को करके सुन्दर शिक्षा को भृत्यों को पहुँचा कर कामसिद्धि करो॥६॥

ती॒व्रान्घोषा॑न्कृण्वते॒ वृष॑पाण॒योऽश्वा॒ रथे॑भिः स॒ह वा॒जय॑न्तः। अ॒व॒क्राम॑न्तः॒ प्रप॑दैर॒मित्रा॑न् क्षि॒णन्ति॒ शत्रूँ॒रन॑पव्ययन्तः॥

हे राजपुरुषो! तुम घोड़ों को अच्छे प्रकार शिक्षा देकर तथा अग्नि आदि का संप्रयोग और शत्रुओं को आक्रमण कर जीतो॥७॥

र॒थ॒वाह॑नं ह॒विर॑स्य॒ नाम॒ यत्रायु॑धं॒ निहि॑तमस्य॒ वर्म॑। तत्रा॒ रथ॒मुप॑ श॒ग्मं स॑देम वि॒श्वाहा॑ व॒यं सु॑मन॒स्यमा॑नाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! तुम लोग अच्छे विचार के साथ अग्नि आदि के सम्प्रयोग से बनाये हुए आयुधों से युक्त उत्तम यान द्वारा सर्वदैव शत्रुओं को ताड़ना देओ॥८॥

स्वा॒दु॒षं॒सदः॑ पि॒तरो॑ वयो॒धाः कृ॑च्छ्रे॒श्रितः॒ शक्ती॑वन्तो गभी॒राः। चि॒त्रसे॑ना॒ इषु॑बला॒ अमृ॑ध्राः स॒तोवी॑रा उ॒रवो॑ व्रातसा॒हाः॥

हे विद्वान् मनुष्यो! तुम सभ्य, पिता के समान प्रजाजनों की पालना करनेवाले, बहुत अवस्था से युक्त और दुःख को पाकर न कंपनेवाले, सामर्थ्यवान्, गम्भीर आशय, अद्भुत सेना तथा शस्त्र और अस्त्रों की विद्या में कुशल, बल से युक्त, शत्रुसमूह के सहनेवाले और बहुत गुण कर्मों से युक्त राजा को ही राज्याभिषिञ्चन काम में अभिषिक्त करो॥९॥

ब्राह्म॑णासः॒ पित॑रः॒ सोम्या॑सः शि॒वे नो॒ द्यावा॑पृथि॒वी अ॑ने॒हसा॑। पू॒षा नः॑ पातु दुरि॒तादृ॑तावृधो॒ रक्षा॒ माकि॑र्नो अ॒घशं॑स ईशत॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो विद्वान् जन तुम लोगों को विद्या और विनय देवें तथा बिजुली और भूगर्भविद्या से सुख से सम्पन्न करें और अधर्माचरण से अलग रक्खें तथा जो राजा चोर आदि दुष्टों से निरन्तर रक्षा करे, उस सब की तुम निरन्तर सेवा करो॥१०॥

सु॒प॒र्णं व॑स्ते मृ॒गो अ॑स्या॒ दन्तो॒ गोभिः॒ संन॑द्धा पतति॒ प्रसू॑ता। यत्रा॒ नरः॒ सं च॒ वि च॒ द्रव॑न्ति॒ तत्रा॒स्मभ्य॒मिष॑वः॒ शर्म॑ यंसन्॥

हे मनुष्यो! जो भूमि परमेश्वर ने पालना के लिये बनाई है और मृग के समान शीघ्र जाती है तथा जिसके लिये सङ्ग्राम होता है, उसकी प्राप्ति के निमित्त वीरता का संग्रह करो॥११॥

ऋजी॑ते॒ परि॑ वृङ्धि॒ नोऽश्मा॑ भवतु नस्त॒नूः। सोमो॒ अधि॑ ब्रवीतु॒ नोऽदि॑तिः॒ शर्म॑ यच्छतु॥

राजा ऐसा प्रयत्न करे जैसे दीर्घ ब्रह्मचर्य्य से, विषायसक्ति के त्याग से और व्यायाम से क्षत्रियों के शरीर पाषाण के तुल्य कठिन हों और उपदेशक भी सबको ऐसा ही उपदेश करें, जिससे सब दृढ़ शरीर आत्मावाले हों॥१२॥

आ ज॑ङ्घन्ति॒ सान्वे॑षां ज॒घनाँ॒ उप॑ जिघ्नते। अश्वा॑जनि॒ प्रचे॑त॒सोऽश्वा॑न्त्स॒मत्सु॑ चोदय॥

सङ्ग्राम में राजा के अभाव में रानी सेनापति हो और जैसे राजा युद्ध कराने को वीरों को प्रेरणा दे, वैसे ही वह भी आचरण करे॥१३॥

अहि॑रिव भो॒गैः पर्ये॑ति बा॒हुं ज्याया॑ हे॒तिं प॑रि॒बाध॑मानः। ह॒स्त॒ध्नो विश्वा॑ व॒युना॑नि वि॒द्वान्पुमा॒न्पुमां॑सं॒ परि॑ पातु वि॒श्वतः॑॥

हे वीरो! जो राजा समस्त मेघ के समान भोगवृष्टि करता है तथा समग्रविद्यायुक्त होता हुआ सब की सब ओर से तृप्ति करता है, उसकी सब जन सब ओर से निरन्तर रक्षा करें॥१४॥

आला॑क्ता॒ या रुरु॑शी॒र्ष्ण्यथो॒ यस्या॒ अयो॒ मुख॑म्। इ॒दं प॒र्जन्य॑रेतस॒ इष्वै॑ दे॒व्यै बृ॒हन्नमः॑॥

हे मनुष्यो! जो रानी धुनर्वेद जानती हुई शस्त्र-अस्त्र फेंकनेवाली है, उसका वीरों को निरन्तर सत्कार करना चाहिये॥१५॥

अव॑सृष्टा॒ परा॑ पत॒ शर॑व्ये॒ ब्रह्म॑संशिते। गच्छा॒मित्रा॒न्प्र प॑द्यस्व॒ मामीषां॒ कं च॒नोच्छि॑षः॥

सेनापति पहिले सेना को अच्छी शिक्षा देकर जब सङ्ग्राम में उपस्थित हो, तब अपनी सेना को आज्ञा दे कि शत्रुओं के बीच से एक को भी न छोड़॥१६॥

यत्र॑ बा॒णाः सं॒पत॑न्ति कुमा॒रा वि॑शि॒खाइ॑व। तत्रा॑ नो॒ ब्रह्म॑ण॒स्पति॒रदि॑तिः॒ शर्म॑ यच्छतु वि॒श्वाहा॒ शर्म॑ यच्छतु॥

हे राजन्! जब सङ्ग्राम के लिये सेना जावे, तब किसी पदार्थ के विना किसी भृत्य को क्लेश न हो, वैसा अनुष्ठान कीजिये, ऐसे किये पीछे आपका ध्रुव विजय हो॥१७॥

मर्मा॑णि ते॒ वर्म॑णा छादयामि॒ सोम॑स्त्वा॒ राजा॒मृते॒नानु॑ वस्ताम्। उ॒रोर्वरी॑यो॒ वरु॑णस्ते कृणोतु॒ जय॑न्तं॒ त्वानु॑ दे॒वा म॑दन्तु॥

सेनाध्यक्षों को चाहिये कि सब वीरों के शरीरों की रक्षा करनेवाले कवचों को यथावत् करें और सर्वाधीश राजा अमृतात्मक अर्थात् अमृत के समान भोग सब सबके लिये देवे तथा वस्त्र और शस्त्र आदि पदार्थ भी देवे और युद्ध करते हुए सब को सब अध्यक्ष हर्ष देवें और उत्साहित करें तथा आप भी हर्ष पावें और उत्साह करें, ऐसा करने पर क्योंकर हार हो॥१८॥

यो नः॒ स्वो अर॑णो॒ यश्च॒ निष्ट्यो॒ जिघां॑सति। दे॒वास्तं सर्वे॑ धूर्वन्तु॒ ब्रह्म॒ वर्म॒ ममान्त॑रम्॥

सेनापति के जो अपने भृत्य उत्साह से युद्ध न करें और जो अपने नौकरों के मारने की इच्छा करें, उन सब को विद्वान् और अधीश शीघ्र मारें तथा युद्ध के समय सब वीर परमेश्वर ही को अपना रक्षा करनेवाला जानें॥१९॥इस सूक्त में वर्म अर्थात् कवच बख्तर आदि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह श्रीमान् परमहंसपरिव्राजकाचार्य्य परमविद्वान् श्रीमद्विरजानन्दसरस्वती स्वामीजी के शिष्य श्रीमान् दयानन्दसरस्वतीस्वामी जी के बनाये हुए संस्कृत और आर्यभाषा से सुभूषित अच्छे-अच्छे प्रमाणों से युक्त, ऋग्वेदभाष्य के छठे मण्डल में छठा अनुवाक और पचहत्तरवाँ सूक्त और छठा मण्डल भी तथा पञ्चमाष्टक के प्रथमाध्याय में बाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

मण्डलम्

सूक्तम्

अ॒ग्निं नरो॒ दीधि॑तिभिर॒रण्यो॒र्हस्त॑च्युती जनयन्त प्रश॒स्तम्। दू॒रे॒दृशं॑ गृ॒हप॑तिमथ॒र्युम्॥

हे विद्वान् जनो! जैसे घिसी हुई अरणियों से अग्नि उत्पन्न होता है, वैसे सब पार्थिव द्रव्य वा वायुसम्बन्धी द्रव्यों के घिसने से जो सर्वत्र व्याप्त हुई विद्युत् उत्पन्न होती है, वह दूर देशों में समाचारादि पहुँचने रूप व्यवहारों को सिद्ध कर सकती है। इस विद्युत् विद्या से गृहस्थों का बड़ा उपकार होता है॥१॥

तम॒ग्निमस्ते॒ वस॑वो॒ न्यृ॑ण्वन्त्सुप्रति॒चक्ष॒मव॑से॒ कुत॑श्चित्। द॒क्षाय्यो॒ यो दम॒ आस॒ नित्यः॑॥

हे विद्वानो! जो यह नित्यस्वरूप विद्युत् अग्नि स्थूल द्रव्यों को घर बना के नित्य स्वरूप से स्थित है, उस अग्नि को विद्या और क्रियाओं से प्रकट कर तथा कलायन्त्रों में संयुक्त कर के बहुत अन्न, धन और रक्षा को प्राप्त होओ॥२॥

प्रेद्धो॑ अग्ने दीदिहि पु॒रो नोऽज॑स्रया सू॒र्म्या॑ यविष्ठ। त्वां शश्व॑न्त॒ उप॑ यन्ति॒ वाजाः॑॥

हे विद्वानो! जो अग्नि अनादिस्वरूप प्रकृति के अवयवों में विद्युद्रूप से व्याप्त है, जिसकी विद्या से बहुत से व्यवहार सिद्ध होते हैं, उसको निरन्तर प्रकाशित कर धनधान्यादि ऐश्वर्य्य को प्राप्त होओ॥३॥

प्र ते अ॒ग्नयो॒ऽग्निभ्यो॒ वरं॒ निः सु॒वीरा॑सः शोशुचन्त द्यु॒मन्तः॑। यत्रा॒ नरः॑ स॒मास॑ते सुजा॒ताः॥

जो मनुष्य अग्नि से अग्नि को उत्पन्न कर सिद्ध कामनावाले होके सर्वोत्तम सुख पाते हैं, वे जगत् में अच्छे प्रसिद्ध होते हैं॥४॥

दा नो॑ अग्ने धि॒या र॒यिं सु॒वीरं॑ स्वप॒त्यं स॑हस्य प्रश॒स्तम्। न यं यावा॒ तर॑ति यातु॒मावा॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो! जिसे अग्नि-विद्या से सुन्दर सन्तान, उत्तम शूरवीर जन श्रेष्ठ धन और यानों का बड़ा वेग उत्पन्न हो, उस विद्या को उत्तम विचार और अनेक प्रकार की क्रियाओं से प्रकट करो॥५॥

उप॒ यमेति॑ युव॒तिः सु॒दक्षं॑ दो॒षा वस्तो॑र्ह॒विष्म॑ती घृ॒ताची॑। उप॒ स्वैन॑म॒रम॑तिर्वसू॒युः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो दिन रात उद्यम और विद्या के द्वारा अग्निविद्या को प्रकट करते हैं, वे परस्पर प्रीति रखनेवाले की पुरुषों के तुल्य बड़े आनन्द को प्राप्त होते हैं॥६॥

विश्वा॑ अ॒ग्नेऽप॑ द॒हारा॑ती॒र्येभि॒स्तपो॑भि॒रद॑हो॒ जरू॑थम्। प्र नि॑स्व॒रं चा॑तय॒स्वामी॑वाम्॥

हे विद्वानो! जो आप अग्नि के प्रभाव को जान के आग्नेयास्त्र आदिकों को बना के संग्राम में प्रवृत्त हों तो अनेक शत्रुओं की सेनाएँ शीघ्र भस्म होवें, जैसे उत्तम वैद्य अपने शरीर को रोगरहित करके अन्यों को रोगरहित करता है, वैसे ही आप लोग अग्निविद्या के प्रभाव से रोगरूप शत्रुओं का निवारण करो॥७॥

आ यस्ते॑ अग्न इध॒ते अनी॑कं॒ वसि॑ष्ठ॒ शुक्र॒ दीदि॑वः॒ पाव॑क। उ॒तो न॑ ए॒भिः स्त॒वथै॑रि॒ह स्याः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजपुरुष अग्निविद्या से आग्नेयास्त्रादि को बना के अपनी सेना को अच्छे प्रकार प्रकाशित करके न्याय से प्रजा के पालक हों, वे दीर्घ समय तक राज्य को पाके महान् ऐश्वर्यवाले होते हैं॥८॥

वि ये ते॑ अग्ने भेजि॒रे अनी॑कं॒ मर्ता॒ नरः॒ पित्र्या॑सः पुरु॒त्रा। उ॒तो न॑ ए॒भिः सु॒मना॑ इ॒ह स्याः॑॥

हे राजन्! जो अग्निविद्या में कुशल, आपकी सेना के प्रकाशक, वीर पुरुष, धार्मिक, विद्वान् अधिकारी हों, उनके साथ आप न्याय से हमारे पालक हूजिये॥९॥

इ॒मे नरो॑ वृत्र॒हत्ये॑षु॒ शूरा॒ विश्वा॒ अदे॑वीर॒भि स॑न्तु मा॒याः। ये मे॒ धियं॑ प॒नय॑न्त प्रश॒स्ताम्॥

हे राजन्! जो शत्रुओं के छलों से ठगे हुए न हों, संग्रामों में उत्साह को प्राप्त, शूरतायुक्त युद्ध करें, सब ओर से गुणों को ग्रहण कर दोषों को त्यागें, वे ही आपके मन्त्री हों॥१०॥

मा शूने॑ अग्ने॒ नि ष॑दाम नृ॒णां माशेष॑सो॒ऽवीर॑ता॒ परि॑ त्वा। प्र॒जाव॑तीषु॒ दुर्या॑सु दुर्य॥

हे क्षत्रिय-कुल में हुए राजपुरुषो! तुम कातर मत होओ। विरोध से परस्पर युद्ध करके निःशेष मत होओ। सनातन राजनीति से प्रजाओं का पालन कर कीर्त्तिवाले होओ॥११॥

यम॒श्वी नित्य॑मुप॒याति॑ य॒ज्ञं प्र॒जाव॑न्तं स्वप॒त्यं क्षयं॑ नः। स्वज॑न्मना॒ शेष॑सा वावृधा॒नम्॥

हे मनुष्यो! जो अग्नि प्रकट हुए द्वितीय जन्म से प्रजा, सुन्दर सन्तानों और घर को प्राप्त कराता है, उसको प्रसिद्ध करो॥१२॥

पा॒हि नो॑ अग्ने र॒क्षसो॒ अजु॑ष्टात्पा॒हि धू॒र्तेरर॑रुषो अघा॒योः। त्वा यु॒जा पृ॑तना॒यूँर॒भि ष्या॑म्॥

वही राजा अध्यापक उपदेशक वा कर्म करनेहारा श्रेष्ठ होता है, जो आप धर्मात्मा होकर अन्यों को भी धार्मिक करे॥१३॥

सेद॒ग्निर॒ग्नीँरत्य॑स्त्व॒न्यान्यत्र॑ वा॒जी तन॑यो वी॒ळुपा॑णिः। स॒हस्र॑पाथा अ॒क्षरा॑ स॒मेति॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सुपुत्र पितरों को प्राप्त होता है, वैसे अग्नि अग्नियों को प्राप्त होता है तथा प्रसिद्ध होकर अपने स्वरूप कारण को प्राप्त होकर स्थिर होता है, जो लोग अभिव्याप्त बिजुली के प्रकट करने को जानते हैं, वे असंख्य ऐश्वर्य्य को प्राप्त होते हैं॥१४॥

सेद॒ग्निर्यो व॑नुष्य॒तो नि॒पाति॑ समे॒द्धार॒मंह॑स उरु॒ष्यात्। सु॒जा॒तासः॒ परि॑ चरन्ति वी॒राः॥

जो मनुष्य अच्छी विद्या से अग्नि का सेवन कर कार्यसिद्ध के लिये संयुक्त करते हैं, वे दुःख और दरिद्रता से रहित, कीर्त्तिवाले हुए विजय के सुख को निरन्तर प्राप्त होते हैं॥१५॥

अ॒यं सो अ॒ग्निराहु॑तः पुरु॒त्रा यमीशा॑नः॒ समिदि॒न्धे ह॒विष्मा॑न्। परि॒ यमेत्य॑ध्व॒रेषु॒ होता॑॥

हे विद्वानो! ईश्वर ने जिसलिये बनाया है, जिसलिये ऋत्विज् और यजमान सेवन करते हैं, तदर्थ वह अग्नि तुम लोगों से बहुत व्यवहारों में प्रयुक्त किया हुआ अनेक कार्य्यों का सिद्ध करनेवाला होता है॥१६॥

त्वे अ॑ग्न आ॒हव॑नानि॒ भूरी॑शा॒नास॒ आ जु॑हुयाम॒ नित्या॑। उ॒भा कृ॒ण्वन्तो॑ वह॒तू मि॒येधे॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो यजमान और ऋत्विजों के तुल्य सब मनुष्यों का अच्छी शिक्षा से उपकार करते हैं, उनकी शिक्षा का सब लोग अनुष्ठान करें॥१७॥

इ॒मो अ॑ग्ने वी॒तत॑मानि ह॒व्याज॑स्रो वक्षि दे॒वता॑ति॒मच्छ॑। प्रति॑ न ईं सुर॒भीणि॑ व्यन्तु॥

मनुष्य जैसे अग्नि में उत्तम हविष्यों का होम कर जल आदि को शुद्ध करके सब के उपकार को सिद्ध करते हैं, वैसे वर्त्ताव करना चाहिये॥१८॥

मा नो॑ अग्ने॒ऽवीर॑ते॒ परा॑ दा दु॒र्वास॒सेऽम॑तये॒ मा नो॑ अ॒स्यै। मा नः॑ क्षु॒धे मा र॒क्षस॑ ऋतावो॒ मा नो॒ दमे॒ मा वन॒ आ जु॑हूर्थाः॥

हे विद्वानो! तुम लोग हमारी कातरता, दरिद्रता, मूढ़ता, क्षुधा, तृषा, दुष्टों के सङ्ग और घर वा जङ्गल में पीड़ा का निवारण कर सुखी करो॥१९॥

नू मे॒ ब्रह्मा॑ण्यग्न॒ उच्छ॑शाधि॒ त्वं दे॑व म॒घव॑द्भ्यः सुषूदः। रा॒तौ स्या॑मो॒भया॑स॒ आ ते॑ यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

राजादि पुरुषों को चाहिये कि धनाढ्यों से दरिद्रों को भी अच्छी शिक्षा देके धनाढ्य करें तथा विद्वान् और अविद्वानों का मेल करा के परस्पर उन्नति करावें और परस्पर दुःख का निवारण कर सुखों से संयुक्त करें॥२०॥

त्वम॑ग्ने सु॒हवो॑ र॒ण्वसं॑दृक्सुदी॒ती सू॑नो सहसो दिदीहि। मा त्वे सचा॒ तन॑ये॒ नित्य॒ आ ध॒ङ्मा वी॒रो अ॒स्मन्नर्यो॒ वि दा॑सीत्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो! जैसे हमारे बन्धु लोग हमारे विरोधी नहीं होते, जैसे माता में पुत्र, पुत्र के विषय में माता प्रेम के साथ वर्त्तती है, वैसे ही आप भी हमारे साथ वर्तिये॥२१॥

मा नो॑ अग्ने दुर्भृ॒तये॒ सचै॒षु दे॒वेद्धे॑ष्व॒ग्निषु॒ प्र वो॑चः। मा ते॑ अ॒स्मान्दु॑र्म॒तयो॑ भृ॒माच्चि॑द्दे॒वस्य॑ सूनो सहसो नशन्त॥

सब मनुष्यों को योग्य है कि सब से शुभ गुण सुन्दर बुद्धि और उत्तम विद्या का ग्रहण करें, दोषों को कदापि ग्रहण न करें॥२२॥

स मर्तो॑ अग्ने स्वनीक रे॒वानम॑र्त्ये॒ य आ॑जु॒होति॑ ह॒व्यम्। स दे॒वता॑ वसु॒वनिं॑ दधाति॒ यं सू॒रिर॒र्थी पृ॒च्छमा॑न॒ एति॑॥

जो मनुष्य अग्निविद्या को जान के इस अग्नि में सुगन्ध्यादि का होम करते और इससे कार्यों को सिद्ध करते हैं और जो पूछ अच्छे प्रकार विचार और ध्यान कर के परमात्मा को जानते हैं, उनको अग्नि, धनाढ्य और परमात्मा विज्ञानवान् करता है॥२३॥

म॒हो नो॑ अग्ने सुवि॒तस्य॑ वि॒द्वान्र॒यिं सू॒रिभ्य॒ आ व॑हा बृ॒हन्त॑म्। येन॑ व॒यं स॑हसाव॒न्मदे॒मावि॑क्षितास॒ आयु॑षा सु॒वीराः॑॥

जो मनुष्य विद्वानों से बड़ी विद्या को ग्रहण करते हैं, वे सब काल में वृद्धि को प्राप्त होते हुए पूर्ण लक्ष्मी और दीर्घ अवस्था को पाते हैं॥२४॥

नू मे॒ ब्रह्मा॑ण्यग्न॒ उच्छ॑शाधि॒ त्वं दे॑व म॒घव॑द्भ्यः सुषूदः। रा॒तौ स्या॑मो॒भया॑स॒ आ ते॑ यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

हे राजपुरुष! आप न्यायपूर्वक हम सब लोगों को शिक्षा कीजिये, हम से यथायोग्य कर लिया कीजिये, पक्षपात छोड़ के सब के साथ वर्तिये, जिससे राजपुरुष और हम प्रजाजन सदा सुखी हों॥२५॥इस सूक्त में अग्नि, विद्वान्, श्रोता, उपदेशक, ईश्वर और राजप्रजा के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥इस अध्याय में अश्वि, द्यावापृथिवी, अग्नि, विद्युत्, उषःकाल, सेनायुद्ध, मित्रावरुण, इन्द्रावरुण, इन्द्रावैष्णव, द्यावापृथिवी, सविता, इन्द्रासोम, यज्ञ, सोमारुद्र, धनुष् आदि और अग्नि आदि के गुणों का वर्णन होने से इस अध्याय के अर्थ की पूर्व अध्याय के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये। यह श्रीमत् परमविद्वान् परमहंस परिव्राजकाचार्य्य विरजानन्द सरस्वती स्वामी जी के शिष्य परमहंस परिव्राजाकाचार्य श्रीमद्दयानन्द सरस्वती स्वामि से विरचित संस्कृतार्यभाषा से समन्वित सुप्रमाणयुक्त ऋग्वेदभाष्य में पञ्चमाष्टक में प्रथम अध्याय और सत्ताईसवाँ वर्ग तथा सप्तम मण्डल में प्रथम सूक्त भी समाप्त हुआ॥

जु॒षस्व॑ नः स॒मिध॑मग्ने अ॒द्य शोचा॑ बृ॒हद्य॑ज॒तं धू॒ममृ॒ण्वन्। उप॑ स्पृश दि॒व्यं सानु॒ स्तूपैः॒ सं र॒श्मिभि॑स्ततनः॒ सूर्य॑स्य॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो! जैसे अग्नि समिधाओं से प्रदीप्त होता, वैसे हमको विद्या से प्रदीप्त कीजिये। जैसे सूर्य की किरणें सब का स्पर्श करती हैं, वैसे आप लोगों के उपदेश हम को प्राप्त होवें॥१॥

नरा॒शंस॑स्य महि॒मान॑मेषा॒मुप॑ स्तोषाम यज॒तस्य॑ य॒ज्ञैः। ये सु॒क्रत॑वः॒ शुच॑यो धियं॒धाः स्वद॑न्ति दे॒वा उ॒भया॑नि ह॒व्या॥

हे मनुष्यो! तुम को चाहिये कि सदैव विद्वानों के अनुकरण से शरीर और आत्मा के बल को बढ़ानेवाले खानपानों का सेवन किया करो, जिससे तुम्हारी महिमा बढ़े॥२॥

ई॒ळेन्यं॑ वो॒ असु॑रं सु॒दक्ष॑म॒न्तर्दू॒तं रोद॑सी सत्य॒वाच॑म्। म॒नु॒ष्वद॒ग्निं मनु॑ना॒ समि॑द्धं॒ सम॑ध्व॒राय॒ सद॒मिन्म॑हेम॥

हे मनुष्यो! जो मेघ के तुल्य उपकारक, अग्नि के तुल्य प्रकाशित विद्यावाले, धर्मात्मा, विद्वानों का सत्कार करते हैं, वे सर्वत्र सत्कार पाते हैं॥३॥

स॒प॒र्यवो॒ भर॑माणा अभि॒ज्ञु प्र वृ॑ञ्जते॒ नम॑सा ब॒र्हिर॒ग्नौ। आ॒जुह्वा॑ना घृ॒तपृ॑ष्ठं॒ पृष॑द्व॒दध्व॑र्यवो ह॒विषा॑ मर्जयध्वम्॥

इस मन्त्र में [उपमा]वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वान् लोग यजमानों के तुल्य मनुष्यों के अन्तःकरण और आत्माओं को अध्यापन और उपदेश से शुद्ध करते हैं, वे आप शुद्ध होकर सब के उपकारक होते हैं॥४॥

स्वा॒ध्यो॒३॒॑ वि दुरो॑ देव॒यन्तोऽशि॑श्रयू रथ॒युर्दे॒वता॑ता। पू॒र्वी शिशुं॒ न मा॒तरा॑ रिहा॒णे सम॒ग्रुवो॒ न सम॑नेष्वञ्जन्॥

इस मन्त्र में उपमावाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सम्यक् विचार करते हुए, विद्वानों के सङ्ग में प्रीति रखनेवाले यज्ञ के तुल्य परोपकारी, माता-पिता के तुल्य सब की उन्नति करते और संग्रामों को जीतते हुए, न्याय से प्रजाओं का पालन करते हैं, वे सदा सुखी होते हैं॥५॥

उ॒त योष॑णे दि॒व्ये म॒ही न॑ उ॒षासा॒नक्ता॑ सू॒दुघे॑व धे॒नुः। ब॒र्हि॒षदा॑ पुरुहू॒ते म॒घोनी॒ आ य॒ज्ञिये॑ सुवि॒ताय॑ श्रयेताम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो स्त्रियाँ उत्तम विद्या और गुणों से युक्त, रात्रि दिन के तुल्य सुख देनेवाली सत्य वाणी के तुल्य प्रिय बोलनेवाली हों, उन्हीं का तुम लोग आश्रय करो॥६॥

विप्रा॑ य॒ज्ञेषु॒ मानु॑षेषु का॒रू मन्ये॑ वां जा॒तवे॑दसा॒ यज॑ध्यै। ऊ॒र्ध्वं नो॑ अध्व॒रं कृ॑तं॒ हवे॑षु॒ ता दे॒वेषु॑ वनथो॒ वार्या॑णि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे ब्रह्मचर्यसेवन से विद्या को प्राप्त हुए क्रिया में कुशल विद्वान् स्त्रीपुरुष सब घर के कामों को शोभित करने को समर्थ होते हैं और वे सङ्ग करने योग्य होते हैं, वैसे तुम लोग भी होओ॥७॥

आ भार॑ती॒ भार॑तीभिः स॒जोषा॒ इळा॑ दे॒वैर्म॑नु॒ष्ये॑भिर॒ग्निः। सर॑स्वती सारस्व॒तेभि॑र॒र्वाक् ति॒स्रो दे॒वीर्ब॒र्हिरेदं स॑दन्तु॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! यदि तुम लोग प्रशंसित वाणी और बुद्धि को प्राप्त हो तो सूर्य के तुल्य प्रकाशित होकर इस जगत् में कल्याण करनेवाले होओ॥८॥

तन्न॑स्तु॒रीप॒मध॑ पोषयि॒त्नु देव॑ त्वष्ट॒र्वि र॑रा॒णः स्य॑स्व। यतो॑ वी॒रः क॑र्म॒ण्यः॑ सु॒दक्षो॑ यु॒क्तग्रा॑वा॒ जाय॑ते दे॒वका॑मः॥

सब मनुष्यों को उचित है कि सब लाभों से विद्यालाभ को उत्तम मान के उसको प्राप्त हों, सदैव जो विद्वानों का सङ्ग करके सदा कर्मों का अनुष्ठान करनेवाला होता है, वह श्रेष्ठ आत्मा के बलवाला होता है॥९॥

वन॑स्प॒तेऽव॑ सृ॒जोप॑ दे॒वान॒ग्निर्ह॒विः श॑मि॒ता सू॑दयाति। सेदु॒ होता॑ स॒त्यत॑रो यजाति॒ यथा॑ दे॒वानां॒ जनि॑मानि॒ वेद॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे विद्वानो! यदि आप लोग सूर्य जैसे वर्षा को, होता जैसे यज्ञ को और विद्वान् जैसे विद्या को, वैसे पढ़ाने और उपदेश से सर्वोपकार को सिद्ध करें तो आप के तुल्य कोई लोग नहीं हो, यह हम जानते हैं॥१०॥

आ या॑ह्यग्ने समिधा॒नो अ॒र्वाङिन्द्रे॑ण दे॒वैः स॒रथं॑ तु॒रेभिः॑। ब॒र्हिर्न॒ आस्ता॒मदि॑तिः सुपु॒त्रा स्वाहा॑ दे॒वा अ॒मृता॑ मादयन्ताम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो! जैसे सूर्य्य का प्रकाश दिव्य गुण के साथ नीचे भी स्थित हम सबों को प्राप्त होता है और जैसे सत्यविद्या से युक्त और उत्तम सन्तानवाली माता सुखपूर्वक स्थित होती है, वैसे ही अविद्वान् हम सबों को आप प्राप्त होकर अच्छी शिक्षा दीजिये तथा सुखी कीजिये॥११॥इस सूक्त में [अग्नि], मनुष्य, बिजुली, विद्वान्, अध्यापक, उपदेशक, उत्तम वाणी, पुरुषार्थ, विद्वानों का उपदेश तथा स्त्री आदि के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह दूसरा सूक्त और दूसरा वर्ग भी समाप्त हुआ॥

अ॒ग्निं वो॑ दे॒वम॒ग्निभिः॑ स॒जोषा॒ यजि॑ष्ठं दू॒तम॑ध्व॒रे कृ॑णुध्वम्। यो मर्त्ये॑षु॒ निध्रु॑विर्ऋ॒तावा॒ तपु॑र्मूर्धा घृ॒तान्नः॑ पाव॒कः॥

हे विद्वानो! जो विद्युत् सर्वत्र स्थित, विभाग करनेवाली प्रकाशित गुणों से युक्त साधनों से प्रकट हुई वर्त्तमान है, उसी को तुम लोग दूत के तुल्य बना कर युद्धादि कार्य्यों को सिद्ध करो॥१॥

प्रोथ॒दश्वो॒ न यव॑सेऽवि॒ष्यन्य॒दा म॒हः सं॒वर॑णा॒द्व्यस्था॑त्। आद॑स्य॒ वातो॒ अनु॑ वाति शो॒चिरध॑ स्म ते॒ व्रज॑नं कृ॒ष्णम॑स्ति॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जब मनुष्य लोग अग्नियान से गमन और विद्युत् से समाचारों को ग्रहण करें तब ये शीघ्र कार्य्यों को सिद्ध कर सकते हैं॥२॥

उद्यस्य॑ ते॒ नव॑जातस्य॒ वृष्णोऽग्ने॒ चर॑न्त्य॒जरा॑ इधा॒नाः। अच्छा॒ द्याम॑रु॒षो धू॒म ए॑ति॒ सं दू॒तो अ॑ग्न॒ ईय॑से॒ हि दे॒वान्॥

हे विद्वन्! यदि आप विद्युत् की विद्या को जानें तो आप किस-किस कार्य को सिद्ध न कर सकें॥३॥

वि यस्य॑ ते पृथि॒व्यां पाजो॒ अश्रे॑त्तृ॒षु यदन्ना॑ स॒मवृ॑क्त॒ जम्भैः॑। सेने॑व सृ॒ष्टा प्रसि॑तिष्ट एति॒ यवं॒ न द॑स्म जु॒ह्वा॑ विवेक्षि॥

जो विद्वान् लोग विद्युद्विद्या को जानते हैं, वे उत्तम सेना के तुल्य शत्रुओं को शीघ्र जीत सकते हैं। जैसे घी आदि से अग्नि प्रज्वलित होता, वैसे घर्षण आदि से विद्युत् अग्नि प्रकट करना चाहिये॥४॥

तमिद्दो॒षा तमु॒षसि॒ यवि॑ष्ठम॒ग्निमत्यं॒ न म॑र्जयन्त॒ नरः॑। नि॒शिशा॑ना॒ अति॑थिमस्य॒ योनौ॑ दी॒दाय॑ शो॒चिराहु॑तस्य॒ वृष्णः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो तीव्र घर्षणादिकों से दिन-रात विद्युत् अग्नि को प्रकट करते हैं, वे जैसे घोड़े से, वैसे शीघ्र स्थानान्तर के जाने को समर्थ होते हैं॥५॥

सु॒सं॒दृक्ते॑ स्वनीक॒ प्रती॑कं॒ वि यद्रु॒क्मो न रोच॑स उपा॒के। दि॒वो न ते॑ तन्य॒तुरे॑ति॒ शुष्म॑श्चि॒त्रो न सूरः॒ प्रति॑ चक्षि भा॒नुम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजन्! यदि आप विद्युद् विद्या को जानें तो सूर्य्य के तुल्य सुन्दर सेनादिकों से प्रकाशित हुए सर्वत्र विजय, कीर्ति और राजाओं में सुशोभित होवें॥६॥

यथा॑ वः॒ स्वाहा॒ग्नये॒ दाशे॑म॒ परीळा॑भिर्घृ॒तव॑द्भिश्च ह॒व्यैः। तेभि॑र्नो अग्ने॒ अमि॑तै॒र्महो॑भिः श॒तं पू॒र्भिराय॑सीभि॒र्नि पा॑हि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे ऋत्विक् और यजमान लोग घृतादि से अग्नि को बढ़ाते हैं, वैसे ही राजा प्रजाओं को और प्रजाएँ राजा को न्याय विनयादि से बढ़ा के अपरिमित सुखों को प्राप्त होते हैं॥७॥

या वा॑ ते॒ सन्ति॑ दा॒शुषे॒ अधृ॑ष्टा॒ गिरो॑ वा॒ याभि॑र्नृ॒वती॑रुरु॒ष्याः। ताभि॑र्नः सूनो सहसो॒ नि पा॑हि॒ स्मत्सू॒रीञ्ज॑रि॒तॄञ्जा॑तवेदः॥

मनुष्य लोग जब तक विद्या, शिक्षा, विनयों को ग्रहण कर अन्यों को नहीं ग्रहण कराते, तब तक प्रजाओं का पालन करने को नहीं समर्थ होते हैं, जब तक धर्मात्मा विद्वानों के राज्य में अधिकार न हों, तब तक यथावत् प्रजा का पालन होना दुर्घट है॥८॥

निर्यत्पू॒तेव॒ स्वधि॑तिः॒ शुचि॒र्गात्स्वया॑ कृ॒पा त॒न्वा॒३॒॑ रोच॑मानः। आ यो मा॒त्रोरु॒शेन्यो॒ जनि॑ष्ट देव॒यज्या॑य सु॒क्रतुः॑ पाव॒कः॥

इस मन्त्र में उपमावाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो! जिसको वज्र के समान दृढ़, अग्नि के समान पवित्र, कृपालु, दर्शनीय शरीर, विद्वान् धर्मात्मा जानो, उसी को इनमें से राजा मानो॥९॥

ए॒ता नो॑ अग्ने॒ सौभ॑गा दिदी॒ह्यपि॒ क्रतुं॑ सु॒चेत॑सं वतेम। विश्वा॑ स्तो॒तृभ्यो॑ गृण॒ते च॑ सन्तु यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

हे राजन्! आप सब मनुष्यों के सौभाग्यों को बढ़ा के बुद्धि को प्राप्त करो। हे प्रजापुरुषो! आप लोग राजा और राज्य की सदैव रक्षा करो॥१०॥इस सूक्त में अग्नि, विद्वान्, राजा और प्रजा के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥१०॥यह तृतीय सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र वः॑ शु॒क्राय॑ भा॒नवे॑ भरध्वं ह॒व्यं म॒तिं चा॒ग्नये॒ सुपू॑तम्। यो दैव्या॑नि॒ मानु॑षा ज॒नूंष्य॒न्तर्विश्वा॑नि वि॒द्मना॒ जिगा॑ति॥

हे विद्वानो! जो तुम्हारे लिये उत्तम द्रव्यों तथा सब के हितकारी जन्मों और विज्ञानों का उपदेश करने को प्रवृत्त होता है, उसकी तुम लोग निरन्तर रक्षा करो॥१॥

स गृत्सो॑ अ॒ग्निस्तरु॑णश्चिदस्तु॒ यतो॒ यवि॑ष्ठो॒ अज॑निष्ट मा॒तुः। सं यो वना॑ यु॒वते॒ शुचि॑द॒न्भूरि॑ चि॒दन्ना॒ समिद॑त्ति स॒द्यः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे अपने पुत्र पूर्ण युवावस्थावाले ब्रह्मचर्य्य में सम्यक् स्थापन कर विद्यायुक्त, अति बलवान्, सुरूपवान्, सुख भोगनेवाले, धार्मिक, दीर्घ अवस्थावाले, बुद्धिमान् होवें, वैसा अनुष्ठान करो॥२॥

अ॒स्य दे॒वस्य॑ सं॒सद्यनी॑के॒ यं मर्ता॑सः श्ये॒तं ज॑गृ॒भ्रे। नि यो गृभं॒ पौरु॑षेयीमु॒वोच॑ दु॒रोक॑म॒ग्निरा॒यवे॑ शुशोच॥

विद्वानों को चाहिये कि अच्छे प्रकार परीक्षा कर सभासदों और अध्यक्षों को नियत करें। जो बलवान् और अधिक अवस्थावाले हों, वे ही राज्य को अच्छे प्रकार भूषित कर सकते हैं॥३॥

अ॒यं क॒विरक॑विषु॒ प्रचे॑ता॒ मर्ते॑ष्व॒ग्निर॒मृतो॒ नि धा॑यि। स मा नो॒ अत्र॑ जुहुरः सहस्वः॒ सदा॒ त्वे सु॒मन॑सः स्याम॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो यह दीर्घ ब्रह्मचर्य के साथ विद्वानों से विद्या को ग्रहण करता है, वही विद्वान् प्रशंसित बुद्धिवाला, मनुष्यों में महान् कल्याणकारी हो। उसके प्रति सब मनुष्य यदि मित्रता से वर्तें तो अविद्वान् भी बुद्धिमान् होवें॥४॥

आ यो योनिं॑ दे॒वकृ॑तं स॒साद॒ क्रत्वा॒ ह्य१॒॑ग्निर॒मृताँ॒ अता॑रीत्। तमोष॑धीश्च व॒निन॑श्च॒ गर्भं॒ भूमि॑श्च वि॒श्वधा॑यसं बिभर्ति॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि समिधा और होमने योग्य पदार्थों से बढ़ता है, वैसे ही जो पाठशाला में जा आचार्य को प्रसन्न कर ब्रह्मचर्य से विद्या का अभ्यास करते हैं, वे ओषधियों के तुल्य अविद्यारूप रोग के निवारक, सूर्य के तुल्य धर्म के प्रकाशक और पृथिवी के समान सब के धारण वा पोषणकर्त्ता होते हैं॥५॥

ईशे॒ ह्य१॒॑ग्निर॒मृत॑स्य॒ भूरे॒रीशे॑ रा॒यः सु॒वीर्य॑स्य॒ दातोः॑। मा त्वा॑ व॒यं स॑हसावन्न॒वीरा॒ माप्स॑वः॒ परि॑ षदाम॒ मादु॑वः॥

हे मनुष्यो! जो अमृतरूप ईश्वर का विज्ञान, विविध सुखों से तृप्त करनेवाली परिपूर्ण लक्ष्मी को तुम्हारे लिये देता है, उसके समीप वीरता, सुन्दरपन और सेवा को छोड़ के निठुर, कृतघ्नी मत होओ॥६॥

प॒रि॒षद्यं॒ ह्यर॑णस्य॒ रेक्णो॒ नित्य॑स्य रा॒यः पत॑यः स्याम। न शेषो॑ अग्ने अ॒न्यजा॑तम॒स्त्यचे॑तानस्य॒ मा प॒थो वि दु॑क्षः॥

हे मनुष्यो! धर्मयुक्त पुरुषार्थ से जिस धन को प्राप्त हो उसी को अपना धन मानो, किन्तु अन्याय से उपार्जित धन को अपना मत मानो। ज्ञानियों के मार्ग को पाखण्ड के उपदेश से मत दूषित करो, जैसे धर्मयुक्त पुरुषार्थ से धन प्राप्त हो, वैसे ही प्रयत्न करो॥७॥

न॒हि ग्रभा॒यार॑णः सु॒शेवो॒ऽन्योद॑र्यो॒ मन॑सा॒ मन्त॒वा उ॑। अधा॑ चि॒दोकः॒ पुन॒रित्स ए॒त्या नो॑ वा॒ज्य॑भी॒षाळे॑तु॒ नव्यः॑॥

हे मनुष्यो! अन्य गोत्र में अन्य पुरुष से उत्पन्न हुए बालक को पुत्र करने के लिये नहीं ग्रहण करना चाहिये क्योंकि वह घर आदि का दायभागी नहीं हो सकता, किन्तु जो अपने शरीर से उत्पन्न वा अपने गोत्र से लिया हुआ हो, वही पुत्र वा पुत्र का प्रतिनिधि होवे॥८॥

त्वम॑ग्ने वनुष्य॒तो नि पा॑हि॒ त्वमु॑ नः सहसावन्नव॒द्यात्। सं त्वा॑ ध्वस्म॒न्वद॒भ्ये॑तु॒ पाथः॒ सं र॒यिः स्पृ॑ह॒याय्यः॑ सह॒स्री॥

हे राजन्! यदि आप से रक्षा चाहते हुए प्रजाजनों की निरन्तर रक्षा करें और आप स्वयं अधर्माचरण से पृथक् वर्त्तें तो आप को अतुल धनधान्य प्राप्त होवें॥९॥

ए॒ता नो॑ अग्ने॒ सौभ॑गा दिदी॒ह्यपि॒ क्रतुं॑ सु॒चेत॑सं वतेम। विश्वा॑ स्तो॒तृभ्यो॑ गृण॒ते च॑ सन्तु यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

हे राजन्! यदि आप सब मनुष्यों को ब्रह्मचर्य्य के साथ विद्यादान दिलावें, ऋत्विजों और यजमानों को सर्वदा रक्षा करें तो स्वस्थता से पूर्ण राज्य के ऐश्वर्य्य को प्राप्त हों॥१०॥इस सूक्त में अग्नि, विद्वान्, राजा, वीर और प्रजा की रक्षा आदि कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह चौथा सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ॥

प्राग्नये॑ त॒वसे॑ भरध्वं॒ गिरं॑ दि॒वो अ॑र॒तये॑ पृथि॒व्याः। यो विश्वे॑षाम॒मृता॑नामु॒पस्थे॑ वैश्वान॒रो वा॑वृ॒धे जा॑गृ॒वद्भिः॑॥

यदि सब मनुष्य सब के धर्त्ता योगियों को प्राप्त होने योग्य परमेश्वर की उपासना करें तो वे सब ओर से वृद्धि को प्राप्त हों॥१॥

पृ॒ष्टो दि॒वि धाय्य॒ग्निः पृ॑थि॒व्यां ने॒ता सिन्धू॑नां वृष॒भः स्तिया॑नाम्। स मानु॑षीर॒भि विशो॒ वि भा॑ति वैश्वान॒रो वा॑वृधा॒नो वरे॑ण॥

हे मनुष्यो! जो सब प्रजा का नियम व्यवस्था में स्थापक, सूर्यादि प्रजा का प्रकाशक, सब का उपास्य देव, वह पूछने, सुनने, जानने, विचारने और मानने योग्य है॥२॥

त्वद्भि॒या विश॑ आय॒न्नसि॑क्नीरसम॒ना जह॑ती॒र्भोज॑नानि। वैश्वा॑नर पू॒रवे॒ शोशु॑चानः॒ पुरो॒ यद॑ग्ने द॒रय॒न्नदी॑देः॥

हे मनुष्यो! जिस परमेश्वर के भय से वायु आदि पदार्थ अपने-अपने काम में नियुक्त होते हैं, उसके सत्य-न्याय के भय से सब जीव अधर्म से भय कर धर्म में रुचि करते हैं। जिसके प्रभाव से पृथिवी सूर्य्य आदि लोक अपनी अपनी परिधि में नियम से भ्रमते हैं, अपने स्वरूप का धारण कर जगत् का उपकार करते हैं, वही परमात्मा सब को ध्यान करने योग्य है॥३॥

तव॑ त्रि॒धातु॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौर्वैश्वा॑नर व्र॒तम॑ग्ने सचन्त। त्वं भा॒सा रोद॑सी॒ आ त॑त॒न्थाज॑स्रेण शो॒चिषा॒ शोशु॑चानः॥

हे मनुष्यो! जिसके आधार में पृथिवी सूर्य स्थित होके अपना कार्य करते हैं, कठोपनिषद् में लिखा है कि उस परमात्मा को जानने के लिये सूर्य, चन्द्रमा, बिजुली वा अग्नि आदि कुछ प्रकाश नहीं कर सकते, किन्तु उसी प्रकाशित परमेश्वर के प्रकाश से सब प्रकाशित होते हैं॥४॥

त्वाम॑ग्ने ह॒रितो॑ वावशा॒ना गिरः॑ सचन्ते॒ धुन॑यो घृ॒ताचीः॑। पतिं॑ कृष्टी॒नां र॒थ्यं॑ रयी॒णां वै॑श्वान॒रमु॒षसां॑ के॒तुमह्ना॑म्॥

हे मनुष्यो! जिस में सब दिशा, वेदवाणी, पवन और रात्री आदि काल के अवयव सम्बद्ध हैं, उसी समग्र ऐश्वर्य के देनेवाले सूर्य के तुल्य स्वयं प्रकाशित परमात्मा का नित्य ध्यान करो॥५॥

त्वे अ॑सु॒र्यं१॒॑ वस॑वो॒ न्यृ॑ण्व॒न्क्रतुं॒ हि ते॑ मित्रमहो जु॒षन्त॑। त्वं दस्यूँ॒रोक॑सो अग्न आज उ॒रु ज्योति॑र्ज॒नय॒न्नार्या॑य॥

हे मनुष्यो! योगीजन जिस परमेश्वर में स्थिर होकर इष्ट काम को सिद्ध करते हैं, उसी परमात्मा के ध्यान से सब कामनाओं को तुम लोग भी प्राप्त होओ॥६॥

स जाय॑मानः पर॒मे व्यो॑मन्वा॒युर्न पाथः॒ परि॑ पासि स॒द्यः। त्वं भुव॑ना ज॒नय॑न्न॒भि क्र॒न्नप॑त्याय जातवेदो दश॒स्यन्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो अपत्य के लिये माता के तुल्य कृपालु, रक्षक, योगी के तुल्य सब काम देनेवाला, सब विश्व का कर्त्ता, सब का रक्षक ईश्वर है, उसी की नित्य उपासना करो॥७॥

ताम॑ग्ने अ॒स्मे इष॒मेर॑यस्व॒ वैश्वा॑नर द्यु॒मतीं॑ जातवेदः। यया॒ राधः॒ पिन्व॑सि विश्ववार पृ॒थु श्रवो॑ दा॒शुषे॒ मर्त्या॑य॥

हे मनुष्यो! जिसकी उपासना से विद्वान् लोग पूर्ण विद्या को प्राप्त होते हैं, जो उपासना किया हुआ समस्त ऐश्वर्य को देता है, उसी की नित्य सेवा करो॥८॥

तं नो॑ अग्ने म॒घव॑द्भ्यः पुरु॒क्षुं र॒यिं नि वाजं॒ श्रुत्यं॑ युवस्व। वैश्वा॑नर॒ महि॑ नः॒ शर्म॑ यच्छ रु॒द्रेभि॑रग्ने॒ वसु॑भिः स॒जोषाः॑॥

हे मनुष्यो! जो परमात्मा धन ऐश्वर्य्य और प्रशंसा के योग्य विज्ञान और राज्य को पुरुषार्थियों के लिये देता है, उसी की प्रीतिपूर्वक निरन्तर उपासना किया करो॥९॥इस सूक्त में ईश्वर के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह पाँचवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र स॒म्राजो॒ असु॑रस्य॒ प्रश॑स्तिं पुं॒सः कृ॑ष्टी॒नाम॑नु॒माद्य॑स्य। इन्द्र॑स्येव॒ प्र त॒वस॑स्कृ॒तानि॒ वन्दे॑ दा॒रुं वन्द॑मानो विवक्मि॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो शुभ गुण, कर्म और स्वभावों से युक्त वन्दनीय और प्रशंसा के योग्य हो, उस चक्रवर्ती राजा की शुभकर्मों से हुई प्रशंसा करो॥१॥

क॒विं के॒तुं धा॒सिं भा॒नुमद्रे॑र्हि॒न्वन्ति॒ शं रा॒ज्यं रोद॑स्योः। पु॒रं॒द॒रस्य॑ गी॒र्भिरा वि॑वासे॒ऽग्नेर्व्र॒तानि॑ पू॒र्व्या म॒हानि॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जिसके उत्तम कर्म राज्य और विद्वानों को बढ़ाते हैं और राज्य को सुखयुक्त करते हैं, उसी प्रकार सबको करना चाहिये॥२॥

न्य॑क्र॒तून्ग्र॒थिनो॑ मृ॒ध्रवा॑चः प॒णीँर॑श्र॒द्धाँ अ॑वृ॒धाँ अ॑य॒ज्ञान्। प्रप्र॒ तान्दस्यूँ॑र॒ग्निर्वि॑वाय॒ पूर्व॑श्चका॒राप॑राँ॒ अय॑ज्यून्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो! तुम लोग सत्य के उपदेश और शिक्षा से सब अविद्वानों को बोधित करो, जिससे ये अन्यों को भी विद्वान् करें॥३॥

यो अ॑पा॒चीने॒ तम॑सि॒ मद॑न्तीः॒ प्राची॑श्च॒कार॒ नृत॑मः॒ शची॑भिः। तमीशा॑नं॒ वस्वो॑ अ॒ग्निं गृ॑णी॒षेऽना॑नतं द॒मय॑न्तं पृत॒न्यून्॥

जो मनुष्यों में उत्तम राजा प्रजाओं के साथ पिता के तुल्य वर्त्तता है, जैसे निद्रा में सुखी होता है, वैसे सब प्रजाओं को आनन्द देता हुआ शत्रुओं को निवृत्त करता है, जो युद्ध में भय से शत्रुओं के साथ नम्र नहीं होता और धन का बढ़ानेवाला है, उसी राजा का हम लोग सदा सत्कार करें॥४॥

यो दे॒ह्यो॒३॒॑अन॑मयद्वध॒स्नैर्यो अ॒र्यप॑त्नीरु॒षस॑श्च॒कार॑। स नि॒रुध्या॒ नहु॑षो य॒ह्वो अ॒ग्निर्विश॑श्चक्रे बलि॒हृतः॒ सहो॑भिः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे प्रजाजनो! जो अत्यन्त विद्वान् दुष्टाचारियों और अन्याय के वर्त्ताव को रोक जितेन्द्रिय होके न्यायपूर्वक प्रजा से कर लेता है, वह सब को बढ़ाने योग्य होता है॥५॥

यस्य॒ शर्म॒न्नुप॒ विश्वे॒ जना॑स॒ एवै॑स्त॒स्थुः सु॑म॒तिं भिक्ष॑माणाः। वै॒श्वा॒न॒रो वर॒मा रोद॑स्यो॒राग्निः स॑साद पि॒त्रोरु॒पस्थ॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वही राजा नित्य बढ़ता है, जिसके समीप विद्यावर्धक, विद्वान् मन्त्री सदा रहें। जो सत्यवक्ता के उपदेश को नित्य स्वीकार करता है, वह सूर्य के तुल्य भूगोल में प्रकाशमान होकर प्रशस्त राज्य को प्राप्त होता है॥६॥

आ दे॒वो द॑दे बु॒ध्न्या॒३॒॑ वसू॑नि वैश्वान॒र उदि॑ता॒ सूर्य॑स्य। आ स॑मु॒द्रादव॑रा॒दा पर॑स्मा॒दाग्निर्द॑दे दि॒व आ पृ॑थि॒व्याः॥

यदि विद्वान् लोग सत्य भाव से न्याय का संग्रह कर प्रजाओं का पुत्र के तुल्य पालन करें तो वे प्रजा में सूर्य के तुल्य प्रकाशित कीर्तिवाले होकर सब के लिये सुख देने को समर्थ होते हैं॥७॥इस सूक्त में वैश्वानर के दृष्टान्त से राजा के कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह छठा सूक्त और नववाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र वो॑ दे॒वं चि॑त्सहसा॒नम॒ग्निमश्वं॒ न वा॒जिनं॑ हिषे॒ नमो॑भिः। भवा॑ नो दू॒तो अ॑ध्व॒रस्य॑ वि॒द्वान्त्मना॑ दे॒वेषु॑ विविदे मि॒तद्रुः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो प्रजा के किये आक्षेपों को सहता, घोड़े के तुल्य सब कार्य्यों को शीघ्र व्याप्त होता, विद्वानों में विद्वान्, दूत के तुल्य समाचार पहुँचानेवाला हो, उसी को राजा करो॥१॥

आ या॑ह्यग्ने प॒थ्या॒३॒॑ अनु॒ स्वा म॒न्द्रो दे॒वानां॑ स॒ख्यं जु॑षा॒णः। आ सानु॒ शुष्मै॑र्न॒दय॑न्पृथि॒व्या जम्भे॑भि॒र्विश्व॑मु॒शध॒ग्वना॑नि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो बिजुली के तुल्य पराक्रमी, सूर्य के तुल्य प्रतापी, अपनी अनुकूल प्रजाओं को न्याय से आनन्दित करता है, वही उत्तम राजा होता है॥२॥

प्रा॒चीनो॑ य॒ज्ञः सुधि॑तं॒ हि ब॒र्हिः प्री॑णी॒ते अ॒ग्निरी॑ळि॒तो न होता॑। आ मा॒तरा॑ वि॒श्ववा॑रे हुवा॒नो यतो॑ यविष्ठ जज्ञि॒षे सु॒शेवः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे होमकर्त्ता वेदविहित यज्ञ और उसकी सामग्री की कामना करता है, वैसे ही जो पितृजनों की प्रशंसा करते हुए सेवन करते हैं, वे इस जगत् में कृतज्ञ होते हैं॥३॥

स॒द्यो अ॑ध्व॒रे र॑थि॒रं ज॑नन्त॒ मानु॑षासो॒ विचे॑तसो॒ य ए॑षाम्। वि॒शाम॑धायि वि॒श्पति॑र्दुरो॒णे॒३॒॑ग्निर्म॒न्द्रो मधु॑वचा ऋ॒तावा॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिसको उत्तम शिक्षा से विद्या ग्रहण कराके विद्वान् लोग पण्डित करते हैं, वह योग्य होकर घर में दीप के तुल्य प्रजाओं में न्याय का प्रकाशक होता है॥४॥

असा॑दि वृ॒तो वह्नि॑राजग॒न्वान॒ग्निर्ब्र॒ह्मा नृ॒षद॑ने विध॒र्ता। द्यौश्च॒ यं पृ॑थि॒वी वा॑वृ॒धाते॒ आ यं होता॒ यज॑ति वि॒श्ववा॑रम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि यथावत् सम्प्रयोग किया हुआ सब कार्य्यों को सिद्ध करता है, वैसे ही सत्कार कर स्वीकार किये वेद के विद्वान् लोग धर्मार्थ-काम-मोक्ष पदार्थों को सबको प्राप्त कराते हैं॥५॥

ए॒ते द्यु॒म्नेभि॒र्विश्व॒माति॑रन्त॒ मन्त्रं॒ ये वारं॒ नर्या॒ अत॑क्षन्। प्र ये विश॑स्ति॒रन्त॒ श्रोष॑माणा॒ आ ये मे॑ अ॒स्य दीध॑यन्नृ॒तस्य॑॥

जो मनुष्य सुन्दर विचार के साथ स्वीकार करने योग्य पदार्थों को प्राप्त होते और नित्य विद्वानों के वचनों के श्रोता होकर सत्य झूठ का विवेक कर असत्य छोड़ सत्य का ग्रहण कर यशस्वी धनाढ्य होते हैं, वही इस जगत् में सत्कार के योग्य होते हैं॥६॥

नू त्वाम॑ग्न ईमहे॒ वसि॑ष्ठा ईशा॒नं सू॑नो सहसो॒ वसू॑नाम्। इषं॑ स्तो॒तृभ्यो॑ म॒घव॑द्भ्य आनड्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

जो विद्वानों के लिये धन देता है और विद्या की याचना करता है, जिसकी रक्षा आप्त करते हैं, वह सदा रक्षा को प्राप्त, बढ़ता हुआ सब ऐश्वर्य्य से युक्त होता है॥७॥इस सूक्त में अग्नि के दृष्टान्त से राजादि के गुणों का वर्णन होने से सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह सातवाँ सूक्त और दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इ॒न्धे राजा॒ सम॒र्यो नमो॑भि॒र्यस्य॒ प्रती॑क॒माहु॑तं घृ॒तेन॑। नरो॑ ह॒व्येभि॑रीळते स॒बाध॒ आग्निरग्र॑ उ॒षसा॑मशोचि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो जिस के भृत्य उपकार करनेवाले हों, वे उपकार को प्राप्त हुए से सदा सत्कार पाने योग्य हैं॥१॥

अ॒यमु॒ ष्य सुम॑हाँ अवेदि॒ होता॑ म॒न्द्रो मनु॑षो य॒ह्वो अ॒ग्निः। वि भा अ॑कः ससृजा॒नः पृ॑थि॒व्यां कृ॒ष्णप॑वि॒रोष॑धीभिर्ववक्षे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सूर्य के तुल्य उपकारक होते हैं, वे ही अच्छे प्रकार सत्कार पाने योग्य होते हैं॥२॥

कया॑ नो अग्ने॒ वि व॑सः सुवृ॒क्तिं कामु॑ स्व॒धामृ॑णवः श॒स्यमा॑नः। क॒दा भ॑वेम॒ पत॑यः सुदत्र रा॒यो व॒न्तारो॑ दु॒ष्टर॑स्य सा॒धोः॥

हे राजन्! यदि आप हमारा यथावत् पालन कर धनाढ्य करें तो हम भी आप सज्जन की निरन्तर उन्नति करें॥३॥

प्रप्रा॒यम॒ग्निर्भ॑र॒तस्य॑ शृण्वे॒ वि यत्सूर्यो॒ न रोच॑ते बृ॒हद्भाः। अ॒भि यः पू॒रुं पृत॑नासु त॒स्थौ द्यु॑ता॒नो दैव्यो॒ अति॑थिः शुशोच॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो राजा लोग सत्कर्म करनेवालों का ही सत्कार करें और दुष्टाचारियों को दण्ड देवें वे ही सूर्य के तुल्य प्रकाशमान अतिथियों के समान सत्कार करने योग्य होते हुए सर्वदा विजयी होकर प्रसिद्ध कीर्त्तिवाले होते हैं॥४॥

अस॒न्नित्त्वे आ॒हव॑नानि॒ भूरि॒ भुवो॒ विश्वे॑भिः सु॒मना॒ अनी॑कैः। स्तु॒तश्चि॑दग्ने शृण्विषे गृणा॒नः स्व॒यं व॑र्धस्व त॒न्वं॑ सुजात॥

हे राजन्! यदि आप प्रशंसित धर्मयुक्त कर्मों को करें तो सर्वत्र विजय को प्राप्त होते हुए आप वृद्धि को प्राप्त होके सब प्रजाओं को बढ़ावें॥५॥

इ॒दं वचः॑ शत॒साः संस॑हस्र॒मुद॒ग्नये॑ जनिषीष्ट द्वि॒बर्हाः॑। शं यत्स्तो॒तृभ्य॑ आ॒पये॒ भवा॑ति द्यु॒मद॑मीव॒चात॑नं रक्षो॒हा॥

हे प्रजाजनो! जैसे सभापति राजा सब के लिये मधुर कोमल वचन और उत्तम सुख देकर दुःख दूर करता है, वैसे ही तुम लोग भी राजा के लिये असंख्य पदार्थों को देकर प्रमाद और रोग रहित करके अधिकरतर धन देओ॥६॥

नू त्वाम॑ग्न ईमहे॒ वसि॑ष्ठा ईशा॒नं सू॑नो सहसो॒ वसू॑नाम्। इषं॑ स्तो॒तृभ्यो॑ म॒घव॑द्भ्य आनड्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

हे राजन्! आप विद्वानों के लिये श्रेष्ठ वस्तु, धनवानों के लिये प्रतिष्ठा देते हो आप और राजपुरुष हमारी निरन्तर रक्षा करते हैं, इसलिये आपके हम सेवक होवें॥७॥इस सूक्त में अग्नि के दृष्टान्त से राजा के कर्त्तव्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह आठवाँ सूक्त और ग्यारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अबो॑धि जा॒र उ॒षसा॑मु॒पस्था॒द्धोता॑ म॒न्द्रः क॒वित॑मः पाव॒कः। दधा॑ति के॒तुमु॒भय॑स्य ज॒न्तोर्ह॒व्या दे॒वेषु॒ द्रवि॑णं सु॒कृत्सु॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वान् जैसे रात्रि को सूर्य निवारण कर प्रकाश को उत्पन्न करता, वैसे अविद्या का निवारण करके विद्या को प्रकट करते हैं, वे जैसे धर्मात्मा न्यायाधीश राजा पुण्यात्माओं में प्रेम धारण करता है, वैसे शमदमादि युक्त श्रोताओं में प्रीति को विधान करें॥१॥

स सु॒क्रतु॒र्यो वि दुरः॑ पणी॒नां पु॑ना॒नो अ॒र्कं पु॑रु॒भोज॑सं नः। होता॑ म॒न्द्रो वि॒शां दमू॑नास्ति॒रस्तमो॑ ददृशे रा॒म्याणा॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोमालङ्कार है। जो सभ्य राजा लोग सूर्य के तुल्य न्याय के प्रकाशक, अविद्यारूप अन्धकार के निवारक, दुष्टों का दमन और श्रेष्ठ धार्मिकों का सत्कार करनेवाले होते हुए धर्मसम्बन्धी मार्ग को पवित्र करते हैं, वे ही सब को सत्कार करने योग्य होते हैं॥२॥

अमू॑रः क॒विरदि॑तिर्वि॒वस्वा॑न्त्सुसं॒सन्मि॒त्रो अति॑थिः शि॒वो नः॑। चि॒त्रभा॑नुरु॒षसां॑ भा॒त्यग्रे॒ऽपां गर्भः॑ प्र॒स्व१॒॑ आ वि॑वेश॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो विद्वानों में मुखिया, सूर्य के तुल्य सत्य-न्याय का प्रकाशक, अविद्यादि दोषों से रहित, धर्मात्मा, विद्वान्, पुत्र के तुल्य प्रजाओं का पालन करता है, वही अतिथि के तुल्य सत्कार करने योग्य होता है॥३॥

ई॒ळेन्यो॑ वो॒ मनु॑षो यु॒गेषु॑ समन॒गा अ॑शुचज्जा॒तवे॑दाः। सु॒सं॒दृशा॑ भा॒नुना॒ यो वि॒भाति॒ प्रति॒ गावः॑ समिधा॒नं बु॑धन्त॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सूर्य्य के सदृश शुभ गुणों का ग्रहण कराके मनुष्यों को प्रकाशित करते हैं, वे प्रशंसा करने योग्य होते हैं॥४॥

अग्ने॑ या॒हि दू॒त्यं१॒॑ मा रि॑षण्यो दे॒वाँ अच्छा॑ ब्रह्म॒कृता॑ ग॒णेन॑। सर॑स्वतीं म॒रुतो॑ अ॒श्विना॒पो यक्षि॑ दे॒वान् र॑त्न॒धेया॑य॒ विश्वा॑न्॥

हे मनुष्यो! जैसे विद्वान् लोग अग्निरूप दूत से बहुत कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वैसे कार्य को सिद्धि करके किसी को मत मारो, पदार्थविद्या, धन वा धान्य से कोश को पूर्ण कर सब को सुखी करो॥५॥

त्वाम॑ग्ने समिधा॒नो वसि॑ष्ठो॒ जरू॑थं ह॒न्यक्षि॑ रा॒ये पुरं॑धिम्। पु॒रु॒णी॒था जा॑तवेदो जरस्व यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

जो राजा के सहित सम्य लोग, सूर्य मेघ को जैसे, वैसे अविद्या और दुष्टाचारों का नाश करते हैं, सब को धर्मयुक्त मार्ग को प्राप्त कराते, वे सब के यथावत् रक्षक होते हैं॥६॥इस सूक्त में अग्नि के दृष्टान्त से विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह नववाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

उ॒षो न जा॒रः पृ॒थु पाजो॑ अश्रे॒द्दवि॑द्युत॒द्दीद्य॒च्छोशु॑चानः। वृषा॒ हरिः॒ शुचि॒रा भा॑ति भा॒सा धियो॑ हिन्वा॒न उ॑श॒तीर॑जीगः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे उत्तम शिक्षा को प्राप्त विद्वान् यथावत् कार्य्यों को सिद्ध करते, वैसे ही विद्युत् आदि पदार्थ सम्प्रयोग में लाये हुए सब व्यवहारों को सिद्ध करते हैं॥१॥

स्व१॒॑र्ण वस्तो॑रु॒षसा॑मरोचि य॒ज्ञं त॑न्वा॒ना उ॒शिजो॒ न मन्म॑। अ॒ग्निर्जन्मा॑नि दे॒व आ वि वि॒द्वान्द्र॒वद्दू॒तो दे॑व॒यावा॒ वनि॑ष्ठः॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो जिज्ञासु विद्वानों से शिक्षा को प्राप्त होके विधि और क्रिया से अग्नि आदि पदार्थों से समस्त व्यवहारों को सिद्ध करते हैं, वे प्रसिद्ध धनवान् होते हैं॥२॥

अच्छा॒ गिरो॑ म॒तयो॑ देव॒यन्ती॑र॒ग्निं य॑न्ति॒ द्रवि॑णं॒ भिक्ष॑माणाः। सु॒सं॒दृशं॑ सु॒प्रती॑कं॒ स्वञ्चं॑ हव्य॒वाह॑मर॒तिं मानु॑षाणाम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे कन्या दीर्घ ब्रह्मचर्य के साथ विदुषी हो और अग्नि आदि की विद्या को प्राप्त हो के पुरुषों में से उत्तम-उत्तम पतियों को चाहती हुई अपने-अपने अभीष्ट स्वामी को प्राप्त होती हैं, वैसे पुरुषों को भी अपने अनुकूल स्त्रियों को प्राप्त होना चाहिये॥३॥

इन्द्रं॑ नो अग्ने॒ वसु॑भिः स॒जोषा॑ रु॒द्रं रु॒द्रेभि॒रा व॑हा बृ॒हन्त॑म्। आ॒दि॒त्येभि॒रदि॑तिं वि॒श्वज॑न्यां॒ बृह॒स्पति॒मृक्व॑भिर्वि॒श्ववा॑रम्॥

जो ही पृथिव्यादि विद्या के साथ बिजुली की विद्या को, प्राणविद्या के साथ जीवविद्या को, कालविद्या के साथ प्रकृति के विज्ञान को और वेदविद्या से परमात्मा के विज्ञान कराने को समर्थ होता है, उसी का सब लोग विद्या प्राप्ति के लिये आश्रय करें॥४॥

म॒न्द्रं होता॑रमु॒शिजो॒ यवि॑ष्ठम॒ग्निं विश॑ ईळते अध्व॒रेषु॑। स हि क्षपा॑वाँ॒ अभ॑वद्रयी॒णामत॑न्द्रो दू॒तो य॒जथा॑य दे॒वान्॥

जो अग्नि, दूत के तुल्य सब विद्याओं का सङ्ग करनेवाला होता है, उसका सब मनुष्य खोज करें, जिससे सब गुणों की प्राप्ति हो॥५॥इस सूक्त में अग्नि, विद्वान् और विदुषी के कर्त्तव्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह दशवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

म॒हाँ अ॑स्यध्व॒रस्य॑ प्रके॒तो न ऋ॒ते त्वद॒मृता॑ मादयन्ते। आ विश्वे॑भिः स॒रथं॑ याहि दे॒वैर्न्य॑ग्ने॒ होता॑ प्रथ॒मः स॑दे॒ह॥

हे मनुष्यो! जिसके विना न विद्या, न सुख प्राप्त होता है, जो विद्वानों का सङ्ग, योगाभ्यास और धर्माचरण से प्राप्त होने योग्य है, उसी जगदीश्वर की सदा उपासना करो॥१॥

त्वामी॑ळते अजि॒रं दू॒त्या॑य ह॒विष्म॑न्तः॒ सद॒मिन्मानु॑षासः। यस्य॑ दे॒वैरास॑दो ब॒र्हिर॒ग्नेऽहा॑न्यस्मै सु॒दिना॑ भवन्ति॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सामग्रीवाले अग्निविद्या को प्राप्त होके निरन्तर आनन्दित होते हैं, वैसे ईश्वर को प्राप्त होके निरन्तर श्रीमान् होते हैं॥२॥

त्रिश्चि॑द॒क्तोः प्र चि॑कितु॒र्वसू॑नि॒ त्वे अ॒न्तर्दा॒शुषे॒ मर्त्या॑य। म॒नु॒ष्वद॑ग्न इ॒ह य॑क्षि दे॒वान्भवा॑ नो दू॒तो अ॑भिशस्ति॒पावा॑॥

जिसके सङ्ग से मनुष्यों को दिव्य गुण और पुष्कल धन प्राप्त होते हैं, इस जगत् में उसी की स्तुति कर, जो दूत के तुल्य परोपकारी होता है, वह सब को सत्य जताने को समर्थ होता है॥३॥

अ॒ग्निरी॑शे बृह॒तो अ॑ध्व॒रस्या॒ग्निर्विश्व॑स्य ह॒विषः॑ कृ॒तस्य॑। क्रतुं॒ ह्य॑स्य॒ वस॑वो जु॒षन्ताथा॑ दे॒वा द॑धिरे हव्य॒वाह॑म्॥

हे मनुष्यो! जो विद्युत् बड़े-बड़े कार्य्यों को सिद्ध करती, जिसके सम्बन्ध से योगाभ्यास कर के मनुष्य बुद्धि को प्राप्त होता, उसी अग्नि का सब लोग युक्ति से सेवन करें॥४॥

आग्ने॑ वह हवि॒रद्या॑य दे॒वानिन्द्र॑ज्येष्ठास इ॒ह मा॑दयन्ताम्। इ॒मं य॒ज्ञं दि॒वि दे॒वेषु॑ धेहि यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

हे विद्वानो! जैसे अग्नि सूर्यादिरूप से सब को आनन्दित करता है, वैसे इस जगत् में तुम सब लोगों की रक्षा कर और कर्त्तव्य को कराके अभीष्ट लोगों को प्राप्त कराओ॥५॥इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों का कृत्य वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह ग्यारहवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अग॑न्म म॒हा नम॑सा॒ यवि॑ष्ठं॒ यो दी॒दाय॒ समि॑द्धः॒ स्वे दु॑रो॒णे। चि॒त्रभा॑नुं॒ रोद॑सी अ॒न्तरु॒र्वी स्वा॑हुतं वि॒श्वतः॑ प्र॒त्यञ्च॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वानों को उचित है कि सब को ऐसा उपदेश करें कि जैसे हम लोग सब के अन्तःस्थित विद्युत् अग्नि को जानें, वैसे तुम लोग भी जानो॥१॥

स म॒ह्ना विश्वा॑ दुरि॒तानि॑ सा॒ह्वान॒ग्निः ष्ट॑वे॒ दम॒ आ जा॒तवे॑दाः। स नो॑ रक्षिषद्दुरि॒ताद॑व॒द्याद॒स्मान्गृ॑ण॒त उ॒त नो॑ म॒घोनः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे घर में प्रज्वलित किया अग्नि अन्धकार और शीत की निवृत्ति करता है, वैसे ही उपासना किया परमेश्वर अज्ञान और अधर्म्माचरण को दूर कर धर्म और विद्या ग्रहण में प्रवृत्ति कराके सम्यक् रक्षा करता है॥२॥

त्वं वरु॑ण उ॒त मि॒त्रो अ॑ग्ने॒ त्वां व॑र्धन्ति म॒तिभि॒र्वसि॑ष्ठाः। त्वे वसु॑ सुषण॒नानि॑ सन्तु यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे विद्वानों से सम्यक् बढ़ाया हुआ अग्नि दरिद्रता का विनाश करता है, वैसे ही उपासना किया परमेश्वर अज्ञान को निवृत्त करता है। जैसे आप्त लोग सब की सदा रक्षा करते हैं, वैसे परमात्मा सब संसार की रक्षा करता है॥३॥इस सूक्त में अग्नि, ईश्वर और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह बारहवाँ सूक्त और पन्द्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्राग्नये॑ विश्व॒शुचे॑ धियं॒धे॑ऽसुर॒घ्ने मन्म॑ धी॒तिं भ॑रध्वम्। भरे॑ ह॒विर्न ब॒र्हिषि॑ प्रीणा॒नो वै॑श्वान॒राय॒ यत॑ये मती॒नाम्॥

इस मन्त्र में [उपमा]वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे गृहस्थो! जो अग्नि के तुल्य विद्या और सत्य धर्म के प्रकाशक, अधर्म के खण्डन और धर्म के मण्डन से सब के शुद्धिकर्त्ता, बुद्धिमान्, निश्चित ज्ञान देनेवाले, अविद्वत्ता के विनाशक, मनुष्यों को विज्ञान और धर्म का धारण कराते हुए संन्यासी हों, उनके सङ्ग से सब तुम लोग बुद्धि को धारण कर निस्सन्देह होओ। जैसे राजा युद्ध की सामग्री को शोभित करता है, वैसे उत्तम संन्यासी जन सुख की सामग्री को शोभित करते हैं॥१॥

त्वम॑ग्ने शो॒चिषा॒ शोशु॑चान॒ आ रोद॑सी अपृणा॒ जाय॑मानः। त्वं दे॒वाँ अ॒भिश॑स्तेरमुञ्चो॒ वैश्वा॑नर जातवेदो महि॒त्वा॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे अग्नि आप शुद्ध हुआ सब को शुद्ध करता है, वैसे संन्यासी लोग स्वयं पवित्र हुए सब को पवित्र करते हैं॥२॥

जा॒तो यद॑ग्ने॒ भुव॑ना॒ व्यख्यः॑ प॒शून्न गो॒पा इर्यः॒ परि॑ज्मा। वैश्वा॑नर॒ ब्रह्म॑णे विन्द गा॒तुं यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

इस मन्त्र में [उपमा]वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो सूर्य के तुल्य, परोपकार, विद्या और उपदेश जिनके प्रसिद्ध हैं, वे जैसे गौएँ बछड़ों की रक्षा करती, वैसे विद्यादान से सब की रक्षा करनेवाले सर्वदा घूमते हुए वेद, ईश्वर को जानने के लिये राज्यरक्षणार्थ राजा के तुल्य न्यायशील होकर सब सुखों को बोध कराते वे सदा सब को सत्कार करने योग्य होते हैं॥३॥इस सूक्त में अग्नि के दृष्टान्त से संन्यासियों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह तेरहवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

स॒मिधा॑ जा॒तवे॑दसे दे॒वाय॑ दे॒वहू॑तिभिः। ह॒विर्भिः॑ शु॒क्रशो॑चिषे नम॒स्विनो॑ व॒यं दा॑शेमा॒ग्नये॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे दीक्षित लोग अग्निहोत्रादि यज्ञ में घृत की आहुतियों से होम किये अग्नि से जगत् का हित करते हैं, वैसे ही हम अनियत तिथिवाले संन्यासियों की सेवा से मनुष्यों का कल्याण करें॥१॥

व॒यं ते॑ अग्ने स॒मिधा॑ विधेम व॒यं दा॑शेम सुष्टु॒ती य॑जत्र। व॒यं घृ॒तेना॑ध्वरस्य होतर्व॒यं दे॑व ह॒विषा॑ भद्रशोचे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे गृहस्थ लोग प्रीति से संन्यासियों की सेवा करें, वैसे ही प्रीति से संन्यासी भी इनके कल्याण के अर्थ सत्य का उपदेश करें॥२॥

आ नो॑ दे॒वेभि॒रुप॑ दे॒वहू॑ति॒मग्ने॑ या॒हि वष॑ट्कृतिं जुषा॒णः। तुभ्यं॑ दे॒वाय॒ दाश॑तः स्याम यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

गृहस्थों को चाहिये कि सदैव पूर्ण विद्यावाले संन्यासियों का निमन्त्रण द्वारा प्रार्थना वा सत्कार करें, जिससे वे समीप आये हुए उनकी रक्षा और निरन्तर उपदेश करें॥३॥इस सूक्त में अग्नि के दृष्टान्त से यति और गृहस्थ के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चौदहवाँ सूक्त और सत्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

उ॒प॒सद्या॑य मी॒ळ्हुष॑ आ॒स्ये॑ जुहुता ह॒विः। यो नो॒ नेदि॑ष्ठ॒माप्य॑म्॥

हे मनुष्यो! जो यति समीप प्राप्त हो उसका तुम सब लोग सत्कार करो और अन्नादि का भोजन कराओ॥१॥

यः पञ्च॑ चर्ष॒णीर॒भि नि॑ष॒साद॒ दमे॑दमे। क॒विर्गृ॒हप॑ति॒र्युवा॑॥

संन्यासी जन सदा सब जगह भ्रमण करे और गृहस्थ इस विरक्त का सत्कार करे और इससे उपदेश सुने॥२॥

स नो॒ वेदो॑ अ॒मात्य॑म॒ग्नी र॑क्षतु वि॒श्वतः॑। उ॒तास्मान् पा॒त्वंह॑सः॥

गृहस्थ लोग ऐसी इच्छा करें कि संन्यासी जन हमको ऐसा उपदेश करे कि जिससे हम लोग धन के रक्षक हुए अधर्म के आचरण से पृथक् रहें॥३॥

नवं॒ नु स्तोम॑म॒ग्नये॑ दि॒वः श्ये॒नाय॑ जीजनम्। वस्वः॑ कु॒विद्व॒नाति॑ नः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो अतिथि लोग श्येन पक्षी के तुल्य शीघ्र चलनेवाले, पाखण्ड के नाशक, द्रव्य और विद्या के उपदेशक संन्यासधर्म युक्त हों, उनका गृहस्थ सत्कार करें॥४॥

स्पा॒र्हा यस्य॒ श्रियो॑ दृ॒शे र॒यिर्वी॒रव॑तो यथा। अग्रे॑ य॒ज्ञस्य॒ शोच॑तः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। उसी का धन सफल है, जिसने न्याय से उपार्जन किया धन धर्मयुक्त व्यवहार में व्यय किया होवे॥५॥

सेमां वे॑तु॒ वष॑ट्कृतिम॒ग्निर्जु॑षत नो॒ गिरः॑। यजि॑ष्ठो हव्य॒वाह॑नः॥

हे मनुष्यो! जो अग्नि सम्यक् प्रयुक्त किया हुआ हमारी क्रियाओं का सेवन करता वह तुम लोगों को सेवने योग्य है॥६॥

नि त्वा॑ नक्ष्य विश्पते द्यु॒मन्तं॑ देव धीमहि। सु॒वीर॑मग्न आहुत॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे हम लोग आपको न्याय से राज्य पालनरूप व्यवहार में सदा स्थित करें, वैसे आप हमको धर्मयुक्त व्यवहार में प्रतिष्ठित कीजिये॥७॥

क्षप॑ उ॒स्रश्च॑ दीदिहि स्व॒ग्नय॒स्त्वया॑ व॒यम्। सु॒वीर॒स्त्वम॑स्म॒युः॥

हे राजा और राजपुरुषो! जैसे प्रतिदिन सूर्य प्रकाशित होता है, वैसे तुम लोग सदा प्रकाशित होओ॥८॥

उप॑ त्वा सा॒तये॒ नरो॒ विप्रा॑सो यन्ति धी॒तिभिः॑। उपाक्ष॑रा सह॒स्रिणी॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अंगूठा और अङ्गुलियों से अक्षरों को जान कर विद्वान् होता है, वैसे ही विद्वान् लोग शोधन कर विद्या के रहस्यों को प्राप्त हों॥९॥

अ॒ग्नी रक्षां॑सि सेधति शु॒क्रशो॑चि॒रम॑र्त्यः। शुचिः॑ पाव॒क ईड्यः॑॥

जैसे राजा अन्याय का निवारण कर न्याय का प्रकाश करता है, वैसे विद्युत् दरिद्रता का विनाश कर लक्ष्मी को प्रकट करता है॥१०॥

स नो॒ राधां॒स्या भ॒रेशा॑नः सहसो यहो। भग॑श्च दातु॒ वार्य॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्निविद्या से धनधान्य सम्बन्धी ऐश्वर्य को मनुष्य प्राप्त होते हैं, वैसे ही उत्तम राज्य प्रबन्ध से मनुष्य धनाढ्य और सुखी होते हैं॥११॥

त्वम॑ग्ने वी॒रव॒द्यशो॑ दे॒वश्च॑ सवि॒ता भगः॑। दिति॑श्च दाति॒ वार्य॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा अच्छे प्रकार सम्प्रयुक्त अग्नि आदि के तुल्य प्रजाओं में उद्योग से और अच्छी नीति से ऐश्वर्य कराके दुःख को खण्डित करता है, वही यशस्वी होता है॥१२॥

अग्ने॒ रक्षा॑ णो॒ अंह॑सः॒ प्रति॑ ष्म देव॒ रीष॑तः। तपि॑ष्ठैर॒जरो॑ दह॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि शीत और अन्धकार से रक्षा करता है, वैसे राजा आदि विद्वान् हिंसादि पापरूप आचरण से सब को पृथक् रखते हैं॥१३॥

अधा॑ म॒ही न॒ आय॒स्यना॑धृष्टो॒ नृपी॑तये। पूर्भ॑वा श॒तभु॑जिः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जहाँ शुभ गुणकर्मस्वभावयुक्त राजा पुरुषों और वैसे गुणोंवाली राणी स्त्रियों का न्याय और पालन करें, वहाँ सब काल में विद्या, आनन्द, अवस्था और ऐश्वर्य बढ़ें॥१४॥

त्वं नः॑ पा॒ह्यंह॑सो॒ दोषा॑वस्तरघाय॒तः। दिवा॒ नक्त॑मदाभ्य॥

जैसे राजा पुरुषों की निरन्तर रक्षा करे, वैसे राणी प्रजा की स्त्रियों की नित्य रक्षा करे॥१५॥इस सूक्त में अग्नि के दृष्टान्त से राजा और रानी के कृत्यों का वर्णन करने से इस सूक्त की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पन्द्रहवाँ सूक्त और बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

ए॒ना वो॑ अ॒ग्निं नम॑सो॒र्जो नपा॑त॒मा हु॑वे। प्रि॒यं चेति॑ष्ठमर॒तिं स्व॑ध्व॒रं विश्व॑स्य दू॒तम॒मृत॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे राजा सत्योपदेशकों का प्रचार करे, वैसे उपदेशक अपने कर्त्तव्य को प्रीति से यथावत् पूरा करें॥१॥

स यो॑जते अरु॒षा वि॒श्वभो॑जसा॒ स दु॑द्रव॒त्स्वा॑हुतः। सु॒ब्रह्मा॑ य॒ज्ञः सु॒शमी॒ वसू॑नां दे॒वं राधो॒ जना॑नाम्॥

जो राजा प्रजापालन के अर्थ सदा सुस्थिर है, उसको जो दुःख निवारण के लिये बुलावें उनको शीघ्र प्राप्त होकर सुखी करता है, उत्तम आचरणोंवाला विद्वान् होता हुआ प्रतिक्षण प्रजा के हित की इच्छा करता है, वही सब को पूजनीय होता है॥२॥

उद॑स्य शो॒चिर॑स्थादा॒जुह्वा॑नस्य मी॒ळ्हुषः॑। उद्धू॒मासो॑ अरु॒षासो॑ दिवि॒स्पृशः॒ सम॒ग्निमि॑न्धते॒ नरः॑॥

हे मनुष्यो! तुम लोग ऊर्ध्वगामी धूमध्वजावाले तेजोमय वृष्टि आदि से प्रजा के रक्षक अग्नि को सम्यक् प्रयुक्त करो, जिस से तुम्हारे कार्यों की सिद्धि होवे॥३॥

तं त्वा॑ दू॒तं कृ॑ण्महे य॒शस्त॑मं दे॒वाँ आ वी॒तये॑ वह। विश्वा॑ सूनो सहसो मर्त॒भोज॑ना॒ रास्व॒ तद्यत्त्वेम॑हे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सब कार्यों के साधक विद्युत् अग्नि के दूत और राजकार्यों के साधक विद्या वा विनय से युक्त पुरुष को राजा करते हैं, वे सब ऐश्वर्य और पालन को प्राप्त होते हैं॥४॥

त्वम॑ग्ने गृ॒हप॑ति॒स्त्वं होता॑ नो अध्व॒रे। त्वं पोता॑ विश्ववार॒ प्रचे॑ता॒ यक्षि॒ वेषि॑ च॒ वार्य॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। पूर्व मन्त्र से यहाँ (ईमहे) पद की अनुवृत्ति आती है। जैसे अग्नि घर का पालक, सुखदाता, यज्ञ में पवित्रकर्त्ता, शरीर में चेतनता करानेवाला, सब विश्व का सङ्ग करता और व्याप्त होता है, वैसे ही मनुष्य होवें॥५॥

कृ॒धि रत्नं॒ यज॑मानाय सुक्रतो॒ त्वं हि र॑त्न॒धा असि॑। आ न॑ ऋ॒ते शि॑शीहि॒ विश्व॑मृ॒त्विजं॑ सु॒शंसो॒ यश्च॒ दक्ष॑ते॥

इस संसार में जो पुरुष धनाढ्य हो, वह निर्धनों को उद्योग कराके निरन्तर पालन करे। जो सत् श्रेष्ठ कर्मों में बढ़ते उन्नत होते हैं, उन को धन्यवाद और धनादि पदार्थों के दान से उत्साहयुक्त करे॥६॥

त्वे अ॑ग्ने स्वाहुत प्रि॒यासः॑ सन्तु सू॒रयः॑। य॒न्तारो॒ ये म॒घवा॑नो॒ जना॑नामू॒र्वान्दय॑न्त॒ गोना॑म्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे राजा सब में दया का विधान कर और विद्वानों का सत्कार करके अपने राज्य में धनाढ्यों को बसावे, वैसे प्रजाजन भी राजा के हितैषी होवें॥७॥

येषा॒मिळा॑ घृ॒तह॑स्ता दुरो॒ण आँ अपि॑ प्रा॒ता नि॒षीद॑ति। ताँस्त्रा॑यस्व सहस्य द्रु॒हो नि॒दो यच्छा॑ नः॒ शर्म॑ दीर्घ॒श्रुत्॥

हे राजन्! जो सत्यवाणीवाले, वेदज्ञाता हों, उनको नित्य सुख दीजिये और जो द्रोहादि दोषयुक्त आप्तों के निन्दक हैं, उनको शीघ्र दण्ड दीजिये॥८॥

स म॒न्द्रया॑ च जि॒ह्वया॒ वह्नि॑रा॒सा वि॒दुष्ट॑रः। अग्ने॑ र॒यिं म॒घव॑द्भ्यो न॒ आ व॑ह ह॒व्यदा॑तिं च सूदय॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि सब पृथिव्यादि तत्त्वों से हीरा आदि रत्नों को सब ओर से पका के देता है, वैसे राजा, धनाढ्यों के सम्बन्ध से निर्धन को धनवान् कराके सुख प्राप्त करे, सत्य मधुर वाणी से प्रजाजनों को शिक्षा करे, जिससे ये अयुक्त व्यवहार में धनहानि न करें॥९॥

ये राधां॑सि॒ दद॒त्यश्व्या॑ म॒घा कामे॑न॒ श्रव॑सो म॒हः। ताँ अंह॑सः पिपृहि प॒र्तृभि॒ष्ट्वं श॒तं पू॒र्भिर्य॑विष्ठ्य॥

हे राजन्! जो धर्मात्मा उद्योगी जनों को उनसे श्रम करा के धन और अन्न देते हैं, उन नगरी और पालकों के साथ वर्त्तमानों को अधर्माचरण से पृथक् रक्खो, जिससे धर्मपूर्वक उद्योग से पुष्कल धन और अन्न पाकर जगत् के हितार्थ निरन्तर दान करें॥१०॥

दे॒वो वो॑ द्रविणो॒दाः पू॒र्णां वि॑वष्ट्या॒सिच॑म्। उद्वा॑ सि॒ञ्चध्व॒मुप॑ वा पृणध्व॒मादिद्वो॑ दे॒व ओ॑हते॥

जो विद्वान् लोग मनुष्यों की कामना पूर्ण करते हैं, उनको सब सुखी करें॥११॥

तं होता॑रमध्व॒रस्य॒ प्रचे॑तसं॒ वह्निं॑ दे॒वा अ॑कृण्वत। दधा॑ति॒ रत्नं॑ विध॒ते सु॒वीर्य॑म॒ग्निर्जना॑य दा॒शुषे॑॥

हे विद्वानो! जो जितेन्द्रिय, तीव्रबुद्धिवाले, विद्या ग्रहण के अर्थ प्रवृत्त विद्यार्थी हों, उनको अहिंसाशील, बुद्धिमान्, विद्या और धर्म के धारक करो॥१२॥इस सूक्त में अग्नि, विद्वान्, राजा, यजमान, पुरोहित, उपदेशक और विद्यार्थी के कृत्य का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सोलहवाँ सूक्त और बाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अग्ने॒ भव॑ सुष॒मिधा॒ समि॑द्ध उ॒त ब॒र्हिरु॑र्वि॒या वि स्तृ॑णीताम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे इन्धनों से अग्नि प्रदीप्त होता, वर्षा जल से पृथिवी को आच्छादित करता है, वैसे ही ब्रह्मचर्य्य, सुशीलता और पुरुषार्थ से विद्यार्थी जन सुप्रकाशित होकर जिज्ञासुओं के हृदयों में विद्या का विस्तार करते हैं॥१॥

उ॒त द्वार॑ उश॒तीर्वि श्र॑यन्तामु॒त दे॒वाँ उ॑श॒त आ व॑हे॒ह॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्यार्थी विद्या की कामना से आप्त अध्यापकों का सेवन करते, जिन उत्तम विद्यार्थियों को अध्यापक चाहते, वे परस्पर कामना करते हुए विद्या की उन्नति कर सकते हैं॥२॥

अग्ने॑ वी॒हि ह॒विषा॒ यक्षि॑ दे॒वान्त्स्व॑ध्व॒रा कृ॑णुहि जातवेदः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्यार्थिजन जैसे विद्युत् मार्ग को शीघ्र व्याप्त होते, वैसे पुरुषार्थ से शीघ्र विद्याओं को प्राप्त हों और अध्यापक पुरुष उनको शीघ्र विद्वान् करें॥३॥

स्व॒ध्व॒रा क॑रति जा॒तवे॑दा॒ यक्ष॑द्दे॒वाँ अ॒मृता॑न्पि॒प्रय॑च्च॥

जिन अध्यापकों के विद्यार्थी शीघ्र विद्वन्, सुशील, धार्मिक होते हैं, वे ही अध्यापक प्रशंसनीय होते हैं॥४॥

वंस्व॒ विश्वा॒ वार्या॑णि प्रचेतः स॒त्या भ॑वन्त्वा॒शिषो॑ नो अ॒द्य॥

हे अध्यापक! आप विवेक से सत्य शास्त्रों को पढ़ाइये और सुशिक्षा करिये, जिससे हम लोग सत्य कामनावाले हों॥५॥

त्वामु॒ ते द॑धिरे हव्य॒वाहं॑ दे॒वासो॑ अग्न ऊ॒र्ज आ नपा॑तम्॥

जैसे अग्निविद्या जाननेवाले ऋत्विज् अग्नि की सेवा करते हैं, वैसे ही विद्यार्थी जन अध्यापक की सेवा करें॥६॥

ते ते॑ दे॒वाय॒ दाश॑तः स्याम म॒हो नो॒ रत्ना॒ वि द॑ध इया॒नः॥

जैसे अध्यापक जन प्रीति के साथ विद्यायें देवें, वैसे विद्यार्थी जन वाणी, मन शरीर और धनों से अध्यापकों को तृप्त करें॥७॥इस सूक्त में अध्यापक और विद्यार्थियों के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये। यह ऋग्वेद के सप्तम मण्डल में पहिला अनुवाक और सत्रहवाँ सूक्त तथा पाँचवें अष्टक के द्वितीयाध्याय में तेईसवाँ वर्ग पूरा हुआ॥

सूक्तम्

त्वे ह॒ यत्पि॒तर॑श्चिन्न इन्द्र॒ विश्वा॑ वा॒मा ज॑रि॒तारो॒ अस॑न्वन्। त्वे गावः॑ सु॒दुघा॒स्त्वे ह्यश्वा॒स्त्वं वसु॑ देवय॒ते वनि॑ष्ठः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। यदि राजा सूर्य के समान विद्या और न्याय का प्रकाशक हो तो सम्पूर्ण राज्य कामना से अलङ्कृत होकर राजा को पूर्ण कामनावाला करे तथा धार्मिक जन धर्म का आचरण करें और अधार्मिक जन भी पापाचरण को छोड़ धर्मात्मा होवें॥१॥

राजे॑व॒ हि जनि॑भिः॒ क्षेष्ये॒वाव॒ द्युभि॑र॒भि वि॒दुष्क॒विः सन्। पि॒शा गिरो॑ मघव॒न्गोभि॒रश्वै॑स्त्वाय॒तः शि॑शीहि रा॒ये अ॒स्मान्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य सब पदार्थों के साथ प्रकाशित होता है, वैसे जो राजा प्रकाशमान हो और जो हम लोगों को सत्य के चाहनेवालों को प्रसन्न करता है, वह भी सदा प्रसन्न हो॥२॥

इ॒मा उ॑ त्वा पस्पृधा॒नासो॒ अत्र॑ म॒न्द्रा गिरो॑ देव॒यन्ती॒रुप॑ स्थुः। अ॒र्वाची॑ ते प॒थ्या॑ रा॒य ए॑तु॒ स्याम॑ ते सुम॒तावि॑न्द्र॒ शर्म॑न्॥

हे राजन्! यदि आप सर्वविद्यायुक्त, सुशिक्षित, मधुर, श्लक्ष्ण, सत्यवाणियों को धारण करो तो तुम्हारी नीति सब को पथ्य हो, सब प्रजाजन अनुरागयुक्त होवें॥३॥

धे॒नुं न त्वा॑ सू॒यव॑से॒ दुदु॑क्ष॒न्नुप॒ ब्रह्मा॑णि ससृजे॒ वसि॑ष्ठः। त्वामिन्मे॒ गोप॑तिं॒ विश्व॑ आ॒हा न॒ इन्द्रः॑ सुम॒तिं ग॒न्त्वच्छ॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। यदि आप हम लोगों को विद्वानों की सम्मति में वर्त्तकर राज्यशासन करें वा जो कोई प्रजा जन स्वकीय सुख दुःख प्रकाश करनेवाले वचन को सुनावे, उस सब को सुन कर यथावत् समाधान दें तो आप को सब हम लोग गौ दूध से जैसे, वैसे राज्यैश्वर्य से उन्नत करें॥४॥

अर्णां॑सि चित्पप्रथा॒ना सु॒दास॒ इन्द्रो॑ गा॒धान्य॑कृणोत्सुपा॒रा। शर्ध॑न्तं शि॒म्युमु॒चथ॑स्य॒ नव्यः॒ शापं॒ सिन्धू॑नामकृणो॒दश॑स्तीः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजा! जैसे सूर्य वा बिजुली समुद्रस्थ जलों को सुख से पार जाने योग्य करता है, वैसे ही व्यवहारों को भी परिमाण युक्त और सुगम कर दुष्टों का नाश और श्रेष्ठों का सम्मान कर दुष्टों की अधर्म क्रियाओं को निन्दित आप सदा करें॥५॥

पु॒रो॒ळा इत्तु॒र्वशो॒ यक्षु॑रासीद्रा॒ये मत्स्या॑सो॒ निशि॑ता॒ अपी॑व। श्रु॒ष्टिं च॑क्रु॒र्भृग॑वो द्रु॒ह्यव॑श्च॒ सखा॒ सखा॑यमतर॒द्विषू॑चोः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजन्! जो सब शुभ कर्म्मों में आगे, अच्छे प्रकार सिद्धि की उन्नति करनेवाले, बड़े मगरमच्छों के समान गम्भीर आशयवाले, शीघ्रकारी एक दूसरे में मित्रता रखनेवाले हों, उन अतीव बुद्धिमानों का सत्कार कर राज्यकार्य्यों में नियुक्त करो॥६॥

आ प॒क्थासो॑ भला॒नसो॑ भन॒न्तालि॑नासो विषा॒णिनः॑ शि॒वासः॑। आ योऽन॑यत्सध॒मा आर्य॑स्य ग॒व्या तृत्सु॑भ्यो अजगन्यु॒धा नॄन्॥

हे राजन्! जो तपस्वी पुरुषार्थी वक्ता जन उत्तम रूपवाले मङ्गल जिनके आचरण युद्ध विद्या में कुशल आर्यजन आपको जिस-जिस का उपदेश दें, उस-उस को अप्रमत्त होते हुए सदा ठानो अर्थात् सर्वदैव उसका आचरण करो॥७॥

दु॒रा॒ध्यो॒३॒॑ अदि॑तिं स्रे॒वय॑न्तोऽचे॒तसो॒ वि ज॑गृभ्रे॒ परु॑ष्णीम्। म॒ह्नावि॑व्यक्पृथि॒वीं पत्य॑मानः प॒शुष्क॒विर॑शय॒च्चाय॑मानः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! वे ही इस संसार में पशु के तुल्य पामरजन हैं, जो स्त्री में आसक्त हैं॥८॥

ई॒युरर्थं॒ न न्य॒र्थं परु॑ष्णीमा॒शुश्च॒नेद॑भिपि॒त्वं ज॑गाम। सु॒दास॒ इन्द्रः॑ सु॒तुकाँ॑ अ॒मित्रा॒नर॑न्धय॒न्मानु॑षे॒ वध्रि॑वाचः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजजनो! जैसे न्यायाधीश राजा न्याय से प्राप्त पदार्थ को लेता और अन्याय से उत्पन्न हुए पदार्थ को छोड़ता तथा श्रेष्ठों की सम्यक् रक्षा कर दुष्टों को दण्ड देता है, वही उत्तम होता है॥९॥

ई॒युर्गावो॒ न यव॑सा॒दगो॑पा यथाकृ॒तम॒भि मि॒त्रं चि॒तासः॑। पृश्नि॑गावः॒ पृश्नि॑निप्रेषितासः श्रु॒ष्टिं च॑क्रुर्नि॒युतो॒ रन्त॑यश्च॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे चरवाहों से रहित गौयें अपने बछड़ों को और वायु अन्तरिक्षस्थ किरणों को और मित्र मित्र को प्राप्त होता है, वैसे ही अपने किये हुए शुभ अशुभ कर्मों को जीव ईश्वरव्यवस्था से प्राप्त होते हैं॥१०॥

एकं॑ च॒ यो विं॑श॒तिं च॑ श्रव॒स्या वै॑क॒र्णयो॒र्जना॒न्राजा॒ न्यस्तः॑। द॒स्मो न सद्म॒न्नि शि॑शाति ब॒र्हिः शूरः॒ सर्ग॑मकृणो॒दिन्द्र॑ एषाम्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो राजा मनुष्यों के पुत्र के समान पालता, अहिंसक के समान सब को आनन्दित कराता और सूर्य के समान न्यायविद्या और बलों को प्रकाशित कर शत्रुओं को जीतता है, वही सब सुखों को प्राप्त होता है॥११॥

अध॑ श्रु॒तं क॒वषं॑ वृ॒द्धम॒प्स्वनु॑ द्रु॒ह्युं नि वृ॑ण॒ग्वज्र॑बाहुः। वृ॒णा॒ना अत्र॑ स॒ख्याय॑ स॒ख्यं त्वा॒यन्तो॒ ये अम॑द॒न्ननु॑ त्वा॥

हे राजा! जो आपके अनुकूल वर्त्तमान हैं, जिनके अनुकूल आप हैं, वे सब मित्र मित्र होकर न्याय से पुत्र के समान पालन कर आनन्द भोगें॥१२॥

वि स॒द्यो विश्वा॑ दृंहि॒तान्ये॑षा॒मिन्द्रः॒ पुरः॒ सह॑सा स॒प्त द॑र्दः। व्यान॑वस्य॒ तृत्स॑वे॒ गयं॑ भा॒ग्जेष्म॑ पू॒रुं वि॒दथे॑ मृ॒ध्रवा॑चम्॥

जो धार्मिक अपने प्रधानों से सहित वा राज्यकार्य्यों में शूरवीर पुरुष अपने से सतगुने अधिक भी दुष्ट शत्रुओं को जीत सकते हैं, वे प्रजा पालने को योग्य होते हैं॥१३॥

नि ग॒व्यवोऽन॑वो द्रु॒ह्यव॑श्च ष॒ष्टिः श॒ता सु॑षुपुः॒ षट् स॒हस्रा॑। ष॒ष्टिर्वी॒रासो॒ अधि॒ षड् दु॑वो॒यु विश्वेदिन्द्र॑स्य वी॒र्या॑ कृ॒तानि॑॥

जहाँ राजा और प्रजा सेनाओं में प्रजा और सेना बिजुली के समान पूरण बल और पराक्रम युक्त सेना को बढ़वाते हैं, वहाँ साठ योद्धा छः हजार शत्रुओं को भी जीत सकते हैं॥१४॥

इन्द्रे॑णै॒ते तृत्स॑वो॒ वेवि॑षाणा॒ आपो॒ न सृ॒ष्टा अ॑धवन्त॒ नीचीः॑। दु॒र्मि॒त्रासः॑ प्रकल॒विन्मिमा॑ना ज॒हुर्विश्वा॑नि॒ भोज॑ना सु॒दासे॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जिनकी समुद्र की तरङ्गों के समान, उत्साहयुक्त, बलिष्ठ सेना हों, वे शत्रुओं की सेनाओं को नीचे गिरा शीघ्र उन्हें जीत सकते हैं॥१५॥

अ॒र्धं वी॒रस्य॑ शृत॒पाम॑नि॒न्द्रं परा॒ शर्ध॑न्तं नुनुदे अ॒भि क्षाम्। इन्द्रो॑ म॒न्युं म॑न्यु॒म्यो॑ मिमाय भे॒जे प॒थो व॑र्त॒निं पत्य॑मानः॥

जो राजा वीर जनों की बल वृद्धि करके दुष्टों पर क्रोध करता और धार्मिकों पर आनन्ददृष्टि हो तथा न्याययुक्त मार्ग का अनुगामी होता हुआ ऐश्वर्य को पैदा करता है, वही सर्वदा वृद्धि को प्राप्त होता है॥१६॥

आ॒ध्रेण॑ चि॒त्तद्वेकं॑ चकार सिं॒ह्यं॑ चि॒त्पेत्वे॑ना जघान। अव॑ स्र॒क्तीर्वे॒श्या॑वृश्च॒दिन्द्रः॒ प्राय॑च्छ॒द्विश्वा॒ भोज॑ना सु॒दासे॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो वीर सिंह के समान पराक्रम पर शत्रुओं को मारते हैं और भूगोल में एक अखण्डित राज्य करने को अच्छा यत्न करते हैं, वे समग्र बल को विधान कर और वीरों को सत्कार कर बुद्धिमानों से राज्य की शिक्षा दिलाने को प्रवृत्त हों॥१७॥

शश्व॑न्तो॒ हि शत्र॑वो रार॒धुष्टे॑ भे॒दस्य॑ चि॒च्छर्ध॑तो विन्द॒ रन्धि॑म्। मर्ताँ॒ एनः॑ स्तुव॒तो यः कृ॒णोति॑ ति॒ग्मं तस्मि॒न्नि ज॑हि॒ वज्र॑मिन्द्र॥

हे राजन् आदि धार्मिक जनो! जो सर्वदा शत्रुभावयुक्त और धार्मिक जनों को नष्ट करते हुए विद्यमान हैं, उनको शीघ्र मारो, जिससे सब जगह सबके अभय और सुख बढ़ें॥१८॥

आव॒दिन्द्रं॑ य॒मुना॒ तृत्स॑वश्च॒ प्रात्र॑ भे॒दं स॒र्वता॑ता मुषायत्। अ॒जास॑श्च॒ शिग्र॑वो॒ यक्ष॑वश्च ब॒लिं शी॒र्षाणि॑ जभ्रु॒रश्व्या॑नि॥

जो राजा आदि जन, सब मनुष्यों को अभयरूपी दक्षिणा जिस के बीच विद्यमान है, ऐसे राज्यपालनरूपी यज्ञ में भेद बुदि को छोड़, महान् धार्मिक उत्तम जनों के एकमति आदि उत्तम कामों को स्वीकार कर शत्रुओं के जीतने को प्रवृत्त होते हैं, वे ही परमैश्वर्य को प्राप्त होते हैं॥१९॥

न त॑ इन्द्र सुम॒तयो॒ न रायः॑ सं॒चक्षे॒ पूर्वा॑ उ॒षसो॒ न नूत्नाः॑। देव॑कं चिन्मान्यमा॒नं ज॑घ॒न्थाव॒ त्मना॑ बृह॒तः शम्ब॑रं भेत्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजन्! जैसे पिछली और नई होनेवाली प्रभात वेला सर्वथा मङ्गल करनेवाली हैं, वैसे यदि न्याय से इकट्ठे किये हुए धन से धार्मिक और उत्तम बुद्धिवाले जनों का सत्कार कर उन उक्त मनुष्यों की रक्षा कर इनसे राज्य के कार्य्यों को साधिये और वहाँ मेघ को सूर्य के समान दुष्टों को मार श्रेष्ठों को प्रसन्न रखिये तो आपकी सब ओर से वृद्धि हो॥२०॥

प्र ये गृ॒हादम॑मदुस्त्वा॒या प॑राश॒रः श॒तया॑तु॒र्वसि॑ष्ठः। न ते॑ भो॒जस्य॑ स॒ख्यं मृ॑ष॒न्ताधा॑ सू॒रिभ्यः॑ सु॒दिना॒ व्यु॑च्छान्॥

जिसकी विद्या, विनय और सुशीलता से सब गृहस्थ आदि मनुष्य आनन्दित हों और जो औरों का उत्कर्ष देखकर पीड़ित होते हैं और जो विद्वानों से सर्वदैव सुन्दर शिक्षा लेते हैं, वे सब सुख पाते हैं॥२१॥

द्वे नप्तु॑र्दे॒वव॑तः श॒ते गोर्द्वा रथा॑ व॒धूम॑न्ता सु॒दासः॑। अर्ह॑न्नग्ने पैजव॒नस्य॒ दानं॒ होते॑व॒ सद्म॒ पर्ये॑मि॒ रेभ॑न्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो! जैसे देनेवाले उत्तम दान देते और पौत्रपर्य्यन्त धनधान्य और पशु आदि की समृद्धि करते हैं, वैसे सब को वर्त्तना चाहिये॥२२॥

च॒त्वारो॑ मा पैजव॒नस्य॒ दानाः॒ स्मद्दि॑ष्टयः कृश॒निनो॑ निरे॒के। ऋ॒ज्रासो॑ मा पृथिवि॒ष्ठाः सु॒दास॑स्तो॒कं तो॒काय॒ श्रव॑से वहन्ति॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! वेदवेत्ता ऋत्विज् ब्राह्मण राजसहाय से यज्ञानुष्ठान से सब का निश्चित सुख बढ़ाते हैं और जैसे ब्रह्मचारी सन्तान के लिये ब्रह्मचर्य्य से पहिले विद्या पढ़ने के लिये विवाह कर सन्तान उत्पन्न करते हैं, वैसे राजजन और राजपुरुष सब के हित के लिये ब्रह्मचर्य्य से विद्या ग्रहण कराकर सब के सुख की उन्नति करें॥२३॥

यस्य॒ श्रवो॒ रोद॑सी अ॒न्तरु॒र्वी शी॒र्ष्णेशी॑र्ष्णे विब॒भाजा॑ विभ॒क्ता। स॒प्तेदिन्द्रं॒ न स्र॒वतो॑ गृणन्ति॒ नि यु॑ध्याम॒धिम॑शिशाद॒भीके॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। यदि राजादि पुरुष धर्मयुक्त न्याय में वर्त कर राज्य को उत्तम शिक्षा दिलावें तो सूर्य के समान प्रजाओं में उत्तम सुखों की उन्नति कर सकते हैं और शत्रुओं को निवार [=निवारण कर] सुख देनेवाले समीपस्थ जनों को सत्कार करना जानते हैं॥२४॥

इ॒मं न॑रो मरुतः सश्च॒तानु॒ दिवो॑दासं॒ न पि॒तरं॑ सु॒दासः॑। अ॒वि॒ष्टना॑ पैजव॒नस्य॒ केतं॑ दू॒णाशं॑ क्ष॒त्रम॒जरं॑ दुवो॒यु॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। यदि मनुष्य विद्यादि शुभ गुणों के देनेवाले, पिता के समान [=पालक] राजा का आश्रय करें तो पूर्ण प्रज्ञा अविनाशि सेवने योग्य ऐश्वर्य और राज्य को स्थिर कर सकें॥२५॥इस सूक्त में इन्द्र, राजा, प्रजा, मित्र, धार्मिक, अमात्य, शत्रुनिवारण तथा धार्मिक सत्कार के अर्थ का प्रतिपादन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह अठारहवाँ सूक्त और अट्ठाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

यस्ति॒ग्मशृ॑ङ्गो वृष॒भो न भी॒म एकः॑ कृ॒ष्टीश्च्या॒वय॑ति॒ प्र विश्वाः॑। यः शश्व॑तो॒ अदा॑शुषो॒ गय॑स्य प्रय॒न्तासि॒ सुष्वि॑तराय॒ वेदः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सूर्य वा बिजुली वर्षा करने से सुख देनेवाली और तीव्र ताप से वा पड़ जाने से भयंकर है, वैसे जो राजा विद्याध्ययन के लिये सन्तानों को नहीं देते उनके लिये दण्ड देनेवाला वा ब्रह्मचर्य्य से सब की विद्या बढ़ानेवाला राजा हो, उसी को सब स्वीकार करें॥१॥

त्वं ह॒ त्यदि॑न्द्र॒ कुत्स॑मावः॒ शुश्रू॑षमाणस्त॒न्वा॑ सम॒र्ये। दासं॒ यच्छुष्णं॒ कुय॑वं॒ न्य॑स्मा॒ अर॑न्धय आर्जुने॒याय॒ शिक्ष॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य विद्याप्राप्ति के लिये आप्त, श्रेष्ठ, विद्वान् अध्यापकों की शुश्रूषा करते शरीर और आत्मा के बल का विधान कर संग्राम में दुष्टों को जीतते और विद्याध्ययन से [रहित] जनों का तिरस्कार करते, विद्याभ्यास करनेवालों का सत्कार करते हैं, वे स्थिर राज्यैश्वर्य्य को प्राप्त होते हैं॥२॥

त्वं धृ॑ष्णो धृष॒ता वी॒तह॑व्यं॒ प्रावो॒ विश्वा॑भिरू॒तिभिः॑ सु॒दास॑म्। प्र पौरु॑कुत्सिं त्र॒सद॑स्युमावः॒ क्षेत्र॑साता वृत्र॒हत्ये॑षु पू॒रुम्॥

जो राजजन धार्मिक, दस्युओं को मारने, शस्त्र अस्त्रों के फेंकने में कुशल और विद्यादि शुभगुणों के देनेवाले सज्जनों का सत्कार करते हैं, वे सदा सुखी होते हैं॥३॥

त्वं नृभि॑र्नृमणो दे॒ववी॑तौ॒ भूरी॑णि वृ॒त्रा ह॑र्यश्व हंसि। त्वं नि दस्युं॒ चुमु॑रिं॒ धुनिं॒ चास्वा॑पयो द॒भीत॑ये सु॒हन्तु॑॥

हे राजा! आप सदैव सत्पुरुषों का सङ्ग न्याय से राज्य को पाल के धन की इच्छा और दुष्ट डाकुओं को निवार के प्रजापालना निरन्तर करो॥४॥

तव॑ च्यौ॒त्नानि॑ वज्रहस्त॒ तानि॒ नव॒ यत्पुरो॑ नव॒तिं च॑ स॒द्यः। नि॒वेश॑ने शतत॒मावि॑वेषी॒रह॑ञ्च वृ॒त्रं नमु॑चिमु॒ताह॑न्॥

हे राजन्! जैसे सूर्य असंख्य मेघ की नगरियों के समान सघन घन घटाघूम बादलों को हनता है, वैसे तुम्हारे सेना जन उत्तम होकर समस्त शत्रुओं को मारें॥५॥

सना॒ ता त॑ इन्द्र॒ भोज॑नानि रा॒तह॑व्याय दा॒शुषे॑ सु॒दासे॑। वृष्णे॑ ते॒ हरी॒ वृष॑णा युनज्मि॒ व्यन्तु॒ ब्रह्मा॑णि पुरुशाक॒ वाज॑म्॥

हे राजजनो! यदि आप लोग कर देनेवालों की पालना न्याय से करें और शरीर से धन से और मन से प्रजाजनों की उन्नति करें तो कुछ भी ऐश्वर्य अलभ्य न हो॥६॥

मा ते॑ अ॒स्यां स॑हसाव॒न्परि॑ष्टाव॒घाय॑ भूम हरिवः परा॒दै। त्राय॑स्व नोऽवृ॒केभि॒र्वरू॑थै॒स्तव॑ प्रि॒यासः॑ सू॒रिषु॑ स्याम॥

हे राजा! जैसे हम लोग तुम्हारी उन्नति के निमित्त प्रयत्न करें, वैसे आप भी प्रयत्न कीजिये, विद्या के प्रचार से सबको विद्वान् कराइये जिससे विरोध न हो॥७॥

प्रि॒यास॒ इत्ते॑ मघवन्न॒भिष्टौ॒ नरो॑ मदेम शर॒णे सखा॑यः। नि तु॒र्वशं॒ नि याद्वं॑ शिशीह्यतिथि॒ग्वाय॒ शंस्यं॑ करि॒ष्यन्॥

हे राजन्! जो शुभ गुणों के आचरण से युक्त तुम में प्रीतिमान् हों, उन धार्मिक जनों को प्रशंसित कीजिये, जैसे अतिथियों का आगमन हो, वैसा विधान कीजिये॥८॥

स॒द्यश्चि॒न्नु ते॑ मघवन्न॒भिष्टौ॒ नरः॑ शंसन्त्युक्थ॒शास॑ उ॒क्था। ये ते॒ हवे॑भि॒र्वि प॒णीँरदा॑शन्न॒स्मान्वृ॑णीष्व॒ युज्या॑य॒ तस्मै॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वान् अध्यापक! तुम हम लोगों को वेदार्थ शीघ्र ग्रहण कराओ, जिससे हम लोग भी अध्यापन करावें॥९॥

ए॒ते स्तोमा॑ न॒रां नृ॑तम॒ तुभ्य॑मस्म॒द्र्य॑ञ्चो॒ दद॑तो म॒घानि॑। तेषा॑मिन्द्र वृत्र॒हत्ये॑ शि॒वो भूः॒ सखा॑ च॒ शूरो॑ऽवि॒ता च॑ नृ॒णाम्॥

हे राजन्! जो आप विद्वानों की रक्षा करके उनसे उपकार लें तो कौन-कौन उन्नति न हो॥१०॥

नू इ॑न्द्र शूर॒ स्तव॑मान ऊ॒ती ब्रह्म॑जूतस्त॒न्वा॑ वावृधस्व। उप॑ नो॒ वाजा॑न्मिमी॒ह्युप॒ स्तीन्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

हे सेनापति! तुम जैसे अपने शरीर और बल को बढ़ाओ, वैसे ही समस्त योद्धाओं के शरीर-बल को बढ़ाओ। जैसे भृत्यजन तुम्हारी रक्षा करें, वैसे तुम भी इनकी निरन्तर रक्षा करो॥११॥इस सूक्त में इन्द्र के दृष्टान्त से राजसभा, सेनापति, अध्यापक, अध्येता, राजा, प्रजा और भृत्यजनों के काम का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥इस अध्याय में अग्नि, वाणी, विद्वान्, राजा, प्रजा, अध्यापक, अध्येता, पृथिवी आदि, मेधावी, बिजुली, सूर्य, मेघ, यज्ञ, होता, यजमान, सेना और सेनापति के गुण कर्मों का वर्णन होने से इस अध्याय के अर्थ की इससे पूर्व अध्याय के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह ऋग्वेद के पञ्चम अष्टक में दूसरा अध्याय और तीसवाँ वर्ग, सातवाँ मण्डल और उन्नीसवाँ सूक्त पूरा हुआ॥

उ॒ग्रो ज॑ज्ञे वी॒र्या॑य स्व॒धावा॒ञ्चक्रि॒रपो॒ नर्यो॒ यत्क॑रि॒ष्यन्। जग्मि॒र्युवा॑ नृ॒षद॑न॒मवो॑भिस्त्रा॒ता न॒ इन्द्र॒ एन॑सो म॒हश्चि॑त्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्यों का हितकारी पिता के समान पालने और उपदेश करनेवाले के समान पापाचरण से अलग रखनेवाला, सभा में स्थित होकर न्यायकर्ता तथा धन, ऐश्वर्य और पराक्रम को निरन्तर बढ़ाता है, उसी को सब मनुष्य राजा मानें॥१॥

हन्ता॑ वृ॒त्रमिन्द्रः॒ शूशु॑वानः॒ प्रावी॒न्नु वी॒रो ज॑रि॒तार॑मू॒ती। कर्ता॑ सु॒दासे॒ अह॒ वा उ॑ लो॒कं दाता॒ वसु॒ मुहु॒रा दा॒शुषे॑ भूत्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो शीघ्रकारी, सूर्य के समान विद्या और विनय के प्रकाश से दुष्टों का निवारण करनेवाला शूरवीर होता हुआ अच्छे सुपात्रों के लिये यथायोग्य पदार्थ देता हुआ बहुत सुख को प्राप्त हो॥२॥

यु॒ध्मो अ॑न॒र्वा ख॑ज॒कृत्स॒मद्वा॒ शूरः॑ सत्रा॒षाड्ज॒नुषे॒मषा॑ळ्हः। व्या॑स॒ इन्द्रः॒ पृत॑नाः॒ स्वोजा॒ अधा॒ विश्वं॑ शत्रू॒यन्तं॑ जघान॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! श्रेष्ठ राजगुणों सहित, दीर्घ ब्रह्मचर्य्य से द्वितीय जन्म अर्थात् विद्या जन्म का कर्त्ता, पूर्ण बल पराक्रमयुक्त, धार्मिक हो वह सूर्य के समान दुष्ट शत्रुओं को अन्यायरूपी अन्धकार को निवारे, वही सब का आनन्द देनेवाला हो॥३॥

उ॒भे चि॑दिन्द्र॒ रोद॑सी महि॒त्वाऽप॑प्राथ॒ तवि॑षीभिस्तुविष्मः। नि वज्र॒मिन्द्रो॒ हरि॑वा॒न्मिमि॑क्ष॒न्त्समन्ध॑सा॒ मदे॑षु॒ वा उ॑वोच॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे भूमि और सूर्य बड़प्पन से सब को व्याप्त होकर जल और अन्न से सब को और गीले किये हुए जगत् को सुखी करते हैं, वैसे ही राजा विद्या और विनय से सत्य का उपदेश कर सब प्रजाजनों की निरन्तर उन्नति करे॥४॥

वृषा॑ जजान॒ वृष॑णं॒ रणा॑य॒ तमु॑ चि॒न्नारी॒ नर्यं॑ सुसूव। प्र यः से॑ना॒नीरध॒ नृभ्यो॒ अस्ती॒नः सत्वा॑ ग॒वेष॑णः॒ स धृ॒ष्णुः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जिसको स्त्रीपुरुष दीर्घ ब्रह्मचर्य्य का सेवन कर उत्पन्न करते हैं, वह पुरुष जगदीश्वरवत् सब को न्याय से पालने को समर्थ होकर सेनाधिप हुआ शत्रुओं के जीतने को सदा समर्थ होता है॥५॥

नू चि॒त्स भ्रे॑षते॒ जनो॒ न रे॑ष॒न्मनो॒ यो अ॑स्य घो॒रमा॒विवा॑सात्। य॒ज्ञैर्य इन्द्रे॒ दध॑ते॒ दुवां॑सि॒ क्षय॒त्स रा॒य ऋ॑त॒पा ऋ॑ते॒जाः॥

जो रागद्वेषरहित मनवाले, घोरकर्मरहित, परमेश्वर के सेवक, धर्मात्मा जन हों, वे कभी नष्ट न हों॥६॥

यदि॑न्द्र॒ पूर्वो॒ अप॑राय॒ शिक्ष॒न्नय॒ज्ज्याया॒न्कनी॑यसो दे॒ष्णम्। अ॒मृत॒ इत्पर्या॑सीत दू॒रमा चि॑त्र॒ चित्र्यं॑ भरा र॒यिं नः॑॥

हे राजा! जो पहिले विद्वान् होकर विद्यार्थियों को शिक्षा देते हैं वा जो ज्येष्ठ कनिष्ठों के प्रति पिता के समान वर्त्ताव रखते हैं वा जो योगी जन परमात्मा को समाधि से अपने आत्मा में अच्छे प्रकार आरोप के औरों को उपदेश देते हैं, उनके लिये तुम शरीर, मन और धन को धारण करो॥७॥

यस्त॑ इन्द्र प्रि॒यो जनो॒ ददा॑श॒दस॑न्निरे॒के अ॑द्रिवः॒ सखा॑ ते। व॒यं ते॑ अ॒स्यां सु॑म॒तौ चनि॑ष्ठाः॒ स्याम॒ वरू॑थे॒ अघ्न॑तो॒ नृपी॑तौ॥

हे राजन्! जिस नीतिज्ञ आपके जो नीतिमान् जन हैं वे ही प्रिय हों और आप भी उन्हीं के प्रिय हूजिये, ऐसे परस्पर सुहृद् होकर एक सम्मति कर निरन्तर आप उन्नति कीजिये॥८॥

ए॒ष स्तोमो॑ अचिक्रद॒द्वृषा॑ त उ॒त स्ता॒मुर्म॑घवन्नक्रपिष्ट। रा॒यस्कामो॑ जरि॒तारं॑ त॒ आग॒न्त्वम॒ङ्ग श॑क्र॒ वस्व॒ आ श॑को नः॥

हे मनुष्यो! तुम जो शक्ति को बढ़ा कर धर्म कर्म से ऐश्वर्य आदि की प्राप्ति की अभिलाषा बढ़ाओ तो तुमको पुष्कल ऐश्वर्य प्राप्त हो॥९॥

स न॑ इन्द्र॒ त्वय॑ताया इ॒षे धा॒स्त्मना॑ च॒ ये म॒घवा॑नो जु॒नन्ति॑। वस्वी॒ षु ते॑ जरि॒त्रे अ॑स्तु श॒क्तिर्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

वे ही लक्ष्मी करनेवाले जन हैं जो आलस्य का त्याग कराके पुरुषार्थ के साथ युक्त करते हैं वा जो ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, उनको ऐश्वर्य की प्राप्ति करानेवाली सामर्थ्य होती है वा जो परस्पर की रक्षा करते हैं, वे सदा सुखी होते हैं॥१०॥इस सूक्त में राजा, सूर्य, बलिष्ठ, सेनापति, सेवक, अध्यापक, अध्येता, मित्र, दाता और रचनेवालों के कृत्य और गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह बीसवाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

असा॑वि दे॒वं गोऋ॑जीक॒मन्धो॒ न्य॑स्मि॒न्निन्द्रो॑ ज॒नुषे॑मुवोच। बोधा॑मसि त्वा हर्यश्व य॒ज्ञैर्बोधा॑ नः॒ स्तोम॒मन्ध॑सो॒ मदे॑षु॥

जो मनुष्य पृथिवी आदि से धान्य आदि को प्राप्त होकर विद्या को प्राप्त होते हैं और जो विद्वानों के सङ्ग से समस्त विद्या के रहस्यों को ग्रहण करते हैं, वे कभी दुःखी नहीं होते हैं॥१॥

प्र य॑न्ति य॒ज्ञं वि॒पय॑न्ति ब॒र्हिः सो॑म॒मादो॑ वि॒दथे॑ दु॒ध्रवा॑चः। न्यु॑ भ्रियन्ते य॒शसो॑ गृ॒भादा दू॒रउ॑पब्दो॒ वृष॑णो नृ॒षाचः॑॥

जैसे यज्ञ का अनुष्ठान करनेवाले आनन्द को प्राप्त होते हैं, वैसे युद्ध में निपुण पुरुष विजय को प्राप्त होते हैं, जैसे दूरदेशों में कीर्ति रखनेवाला विद्वान् जन होता है, वैसे यश से संचय किये कर्मों को कर परोपकारी जन हों॥२॥

त्वमि॑न्द्र॒ स्रवि॑त॒वा अ॒पस्कः॒ परि॑ष्ठिता॒ अहि॑ना शूर पू॒र्वीः। त्वद्वा॑वक्रे र॒थ्यो॒३॒॑ न धेना॒ रेज॑न्ते॒ विश्वा॑ कृ॒त्रिमा॑णि भी॒षा॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो राजा सूर्य्य के समान प्रजाजनों की पालना करता है, दुष्टों को भय देता है, वही सुख से व्याप्त होता है॥३॥

भी॒मो वि॑वे॒षायु॑धेभिरेषा॒मपां॑सि॒ विश्वा॒ नर्या॑णि वि॒द्वान्। इन्द्रः॒ पुरो॒ जर्हृ॑षाणो॒ वि दू॑धो॒द्वि वज्र॑हस्तो महि॒ना ज॑घान॥

हे मनुष्यो! जो युद्ध कार्यों को समग्र जान अपनी सेना को युद्ध में निपुण कर शत्रुओं को कंपा और शत्रुसेनाओं को कंपाते हैं, वे विजय से शोभित होते हैं॥४॥

न या॒तव॑ इन्द्र जूजुवुर्नो॒ न वन्द॑ना शविष्ठ वे॒द्याभिः॑। स श॑र्धद॒र्यो विषु॑णस्य ज॒न्तोर्मा शि॒श्नदे॑वा॒ अपि॑ गुर्ऋ॒तं नः॑॥

हे मनुष्यो! जो कामी लंपट जन हों, वे तुम लोगों को कदापि वन्दना करने योग्य नहीं, वे हम लोगों को कभी न प्राप्त हों, इसको तुम लोग जानो और जो धर्मात्मा जन हैं, वे वन्दना करने तथा सेवा करने योग्य हैं, कामातुरों को धर्मज्ञान और सत्यविद्या कभी नहीं होती है॥५॥

अ॒भि क्रत्वे॑न्द्र भू॒रध॒ ज्मन्न ते॑ विव्यङ्महि॒मानं॒ रजां॑सि। स्वेना॒ हि वृ॒त्रं शव॑सा ज॒घन्थ॒ न शत्रु॒रन्तं॑ विविदद्यु॒धा ते॑॥

जो मनुष्य शरीर और आत्मा के बल को प्रतिदिन बढ़ाते हैं, उन के शत्रुजन दूर से भागते हैं, किन्तु वह आप शत्रुओं को जीत सकें॥६॥

दे॒वाश्चि॑त्ते असु॒र्या॑य॒ पूर्वेऽनु॑ क्ष॒त्राय॑ ममिरे॒ सहां॑सि। इन्द्रो॑ म॒घानि॑ दयते वि॒षह्येन्द्रं॒ वाज॑स्य जोहुवन्त सा॒तौ॥

वे ही विद्वान् जन श्रेष्ठ होते हैं, जो सबों में दया का विधान और सत्य शास्त्रों का उपदेश कर बलों को बढ़ाते हैं, वे ही पिता के समान सत्कार करने योग्य होते हैं॥७॥

की॒रिश्चि॒द्धि त्वामव॑से जु॒हावेशा॑नमिन्द्र॒ सौभ॑गस्य॒ भूरेः॑। अवो॑ बभूथ शतमूते अ॒स्मे अ॑भिक्ष॒त्तुस्त्वाव॑तो वरू॒ता॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजन् शूरवीर! जो पीड़ित प्रजाजन तुमको आह्वान दें, उनके वचन को आप शीघ्र सुनें और सब की रक्षा करनेवाले होकर दुष्टों की हिंसा करनेवाले हूजिये॥८॥

सखा॑यस्त इन्द्र वि॒श्वह॑ स्याम नमोवृ॒धासो॑ महि॒ना त॑रुत्र। व॒न्वन्तु॑ स्मा॒ तेऽव॑सा समी॒के॒३॒॑भी॑तिम॒र्यो व॒नुषां॒ शवां॑सि॥

जो धार्मिक राजा से नित्य मित्रता करने की इच्छा करते हैं, वे बड़प्पन से सत्कार पाते हैं, जो प्रजा को अभय देते हैं, वे प्रतिदिन बलिष्ठ होते हैं॥९॥

स न॑ इन्द्र॒ त्वय॑ताया इ॒षे धा॒स्त्मना॑ च॒ ये म॒घवा॑नो जु॒नन्ति॑। वस्वी॒ षु ते॑ जरि॒त्रे अ॑स्तु श॒क्तिर्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

हे राजा! आप प्रयत्न से सबको पुरुषार्थी कर निरन्तर धनाढ्य कीजिये और अच्छे कामों में प्रेरणा दीजिये जिससे आपकी भृत्यों की अलौकिक शक्ति हो और ये आपकी सर्वदा रक्षा करें॥१०॥इस सूक्त में राजा, प्रजा, विद्वान्, इन्द्र, मित्र, सत्य, गुण और याच्ञा आदि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह इक्कीसवाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ॥

पिबा॒ सोम॑मिन्द्र॒ मन्द॑तु त्वा॒ यं ते॑ सु॒षाव॑ हर्य॒श्वाद्रिः॑। सो॒तुर्बा॒हुभ्यां॒ सुय॑तो॒ नार्वा॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे वैद्यो! तुम जैसे घोड़े तृण, अन्न और जलादिकों का अच्छे प्रकार सेवन कर पुष्ट होते हैं, वैसे ही बड़ी ओषधियों के रसों को पीकर बलवान् होओ॥१॥

यस्ते॒ मदो॒ युज्य॒श्चारु॒रस्ति॒ येन॑ वृ॒त्राणि॑ हर्यश्व॒ हंसि॑। स त्वामि॑न्द्र प्रभूवसो ममत्तु॥

जिस-जिस उपाय से दुष्ट बलहीन हों, उस-उस उपाय का राजा अनुष्ठान करे अर्थात् आरम्भ करे॥२॥

बोधा॒ सु मे॑ मघव॒न्वाच॒मेमां यां ते॒ वसि॑ष्ठो॒ अर्च॑ति॒ प्रश॑स्तिम्। इ॒मा ब्रह्म॑ सध॒मादे॑ जुषस्व॥

वही विद्वान् उत्तम है, जो जिस प्रकार की उत्तम शास्त्र विषय में बुद्धि अपने लिये चाहे, उसी को औरों के लिये चाहे और जो-जो उत्तम अपने लिये पदार्थ हो, उसे पराये के लिये भी जाने॥३॥

श्रु॒धी हवं॑ विपिपा॒नस्याद्रे॒र्बोधा॒ विप्र॒स्यार्च॑तो मनी॒षाम्। कृ॒ष्वा दुवां॒स्यन्त॑मा॒ सचे॒मा॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे जिज्ञासु विद्यार्थी जनो! तुम अपना पढ़ा हुआ परीक्षा लेनेवाले विद्वान् को सुनाओ, वहाँ वे जो उपदेश करें, उनका निरन्तर सेवन करो॥४॥

न ते॒ गिरो॒ अपि॑ मृष्ये तु॒रस्य॒ न सु॑ष्टु॒तिम॑सु॒र्य॑स्य वि॒द्वान्। सदा॑ ते॒ नाम॑ स्वयशो विवक्मि॥

विद्वान् जन परीक्षा में जिनको आलसी, प्रमादी और निर्बुद्धि देखे, उनकी न परीक्षा करे और न पढ़ावे और जो उद्यमी अर्थात् परिश्रमी उत्तम बुद्धि, विद्याभ्यास में तत्पर बोधयुक्त हों, उनकी उत्तम परीक्षा कर उन्हें अच्छा उत्साह दे॥५॥

भूरि॒ हि ते॒ सव॑ना॒ मानु॑षेषु॒ भूरि॑ मनी॒षी ह॑वते॒ त्वामित्। मारे अ॒स्मन्म॑घव॒ञ्ज्योक्कः॑॥

जो निश्चय से मनुष्यों के बीच उत्तम विद्वान् आप्त परीक्षा करनेवाला हो, उसको तथा अन्य अध्यापकों की निरन्तर प्रार्थना करो। आप लोगों को हमारे निकट जो धार्मिक, विद्वान् हो, यही निरन्तर रखने योग्य है, जो मिथ्या प्यारी वाणी बोलनेवाला न हो॥६॥

तुभ्येदि॒मा सव॑ना शूर॒ विश्वा॒ तुभ्यं॒ ब्रह्मा॑णि॒ वर्ध॑ना कृणोमि। त्वं नृभि॒र्हव्यो॑ वि॒श्वधा॑सि॥

सेनाधिष्ठाता जन सेनास्थ योद्धा भृत्यजनों की अच्छे प्रकार परीक्षा कर अधिकार और कार्य्यों में नियुक्त करें, यथावत् उनकी पालना करके उत्तम शिक्षा से बढ़ावें॥७॥

नू चि॒न्नु ते॒ मन्य॑मानस्य द॒स्मोद॑श्नुवन्ति महि॒मान॑मुग्र। न वी॒र्य॑मिन्द्र ते॒ न राधः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे राजन्! आप अच्छी परीक्षा कर सुपरीक्षित, धार्मिक, शूर, विद्वान् जनों को अपने निकट रक्खें तो कोई भी शत्रुजन आपको पीड़ा न दे सके, सदा वीर्य और ऐश्वर्य से बढ़ो॥८॥

ये च॒ पूर्व॒ ऋष॑यो॒ ये च॒ नूत्ना॒ इन्द्र॒ ब्रह्मा॑णि ज॒नय॑न्त॒ विप्राः॑। अ॒स्मे ते॑ सन्तु स॒ख्या शि॒वानि॑ यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजा! जो वेदार्थवेत्ता और अर्थ पदार्थों को जाननेवाले योगी जन विद्याध्ययन में निरत बुद्धिमान् हमारे कल्याण की इच्छा करनेवाले हों, उनके साथ ऐसी मित्रता कर धनधान्यों को बढ़ा इनसे इनकी सदा रक्षा कर और रक्षा किये हुए वह जन आप की सदा रक्षा करेंगे॥९॥इस सूक्त में इन्द्र, राजा, शूर, सेनापति, पढ़ाने, पढ़ने, परीक्षा करने और उपदेश देनेवालों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह बाईसवाँ सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ॥

उदु॒ ब्रह्मा॑ण्यैरत श्रव॒स्येन्द्रं॑ सम॒र्ये म॑हया वसिष्ठ। आ यो विश्वा॑नि॒ शव॑सा त॒तानो॑पश्रो॒ता म॒ ईव॑तो॒ वचां॑सि॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन्! जब संग्राम उपस्थित हो तब बहुत धन अन्न शस्त्र अस्त्र सेनाओं के अङ्ग और इनकी रक्षा करने तथा अच्छे प्रबन्ध करनेवालों को आप प्रेरणा देओ, आप्त और उपदेष्टा जनों को रक्खो, योद्धा जन उत्साहित और सुरक्षित हुए शीघ्र विजय करें॥१॥

अया॑मि॒ घोष॑ इन्द्र दे॒वजा॑मिरिर॒ज्यन्त॒ यच्छु॒रुधो॒ विवा॑चि। न॒हि स्वमायु॑श्चिकि॒ते जने॑षु॒ तानीदंहां॒स्यति॑ पर्ष्य॒स्मान्॥

हे मनुष्यो! जैसे विद्वान् जन धर्मयुक्त व्यवहार में वर्तें, वैसे तुम भी वर्तो, ब्रह्मचर्य्य आदि से अपनी आयु को बढ़ाओ॥२॥

यु॒जे रथं॑ ग॒वेष॑णं॒ हरि॑भ्या॒मुप॒ ब्रह्मा॑णि जुजुषा॒णम॑स्थुः। वि बा॑धिष्ट॒ स्य रोद॑सी महि॒त्वेन्द्रो॑ वृ॒त्राण्य॑प्र॒ती ज॑घ॒न्वान्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे शूरवीरो! जब आप लोग युद्ध के लिये जावें तब सामग्री को पूरी करके जावें, जिससे शत्रुओं को शीघ्र बाधा पीड़ा हो और विजय को भी प्राप्त हो॥३॥

आप॑श्चित्पिप्युः स्त॒र्यो॒३॒॑ न गावो॒ नक्ष॑न्नृ॒तं ज॑रि॒तार॑स्त इन्द्र। या॒हि वा॒युर्न नि॒युतो॑ नो॒ अच्छा॒ त्वं हि धी॒भिर्दय॑से॒ नि वाजा॑न्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे सेनाध्यक्ष पति! यदि आप सुरक्षित शूरवीर जनों की अच्छे प्रकार रक्षा कर अच्छी शिक्षा देकर और कृपा से उन्नति कर शत्रुओं के साथ युद्ध करावें तो ये सूर्य की किरणों के समान तेजस्वी होकर पवन के समान शीघ्र जा शत्रुओं को शीघ्र विनाशें॥४॥

ते त्वा॒ मदा॑ इन्द्र मादयन्तु शु॒ष्मिणं॑ तुवि॒राध॑सं जरि॒त्रे। एको॑ देव॒त्रा दय॑से॒ हि मर्ता॑न॒स्मिञ्छू॑र॒ सव॑ने मादयस्व॥

हे सर्व सेनाधिकारियों के पति! आप सर्वदैव सब पक्षपात को छोड़ कृपा करो और सब को समान भाव से आनन्दित करो, जिससे वे अच्छी रक्षा और सत्कार पाये हुए दुष्टों का निवारण और श्रेष्ठों की रक्षा करके निरन्तर राज्य बढ़ावें॥५॥

ए॒वेदिन्द्रं॒ वृष॑णं॒ वज्र॑बाहुं॒ वसि॑ष्ठासो अ॒भ्य॑र्चन्त्य॒र्कैः। स नः॑ स्तु॒तो वी॒रव॑त्पातु॒ गोम॑द्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

जिनका जो अधिष्ठाता हो उसकी आज्ञा में सब को यथावत् वर्तना चाहिये। अधिष्ठाता भी पक्षपात को छोड़ अच्छे प्रकार विचार कर आज्ञा दे, ऐसे परस्पर की रक्षा कर राज्य, धन और यशों को बढ़ा सदा बढ़ते हुए होओ॥६॥इस सूक्त में इन्द्र, सेना, योद्धा और सर्व सेनापतियों के कार्य्यों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह तेईसवाँ सूक्त और सातवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

योनि॑ष्ट इन्द्र॒ सद॑ने अकारि॒ तमा नृभिः॑ पुरुहूत॒ प्र या॑हि। असो॒ यथा॑ नोऽवि॒ता वृ॒धे च॒ ददो॒ वसू॑नि म॒मद॑श्च॒ सोमैः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि निवासस्थान उत्तम जल, स्थल और पवन जहाँ हो, उस देश में घर बना कर वहाँ बसें, सब के सुखों के बढ़ाने के लिये धनादि पदार्थों से अच्छी रक्षा कर सबों को आनन्दित करें॥१॥

गृ॒भी॒तं ते॒ मन॑ इन्द्र द्वि॒बर्हाः॑ सु॒तः सोमः॒ परि॑षिक्ता॒ मधू॑नि। विसृ॑ष्टधेना भरते सुवृ॒क्तिरि॒यमिन्द्रं॒ जोहु॑वती मनी॒षा॥

जो स्त्री सुविचार से अपने प्रिय पति को प्राप्त होके गर्भ को धारण करती है, वह पति के चित्त को खींचने और वश [में] करनेवाली होकर वीर सुत को उत्पन्न कर सर्वदा आनन्दित होती है॥२॥

आ नो॑ दि॒व आ पृ॑थि॒व्या ऋ॑जीषिन्नि॒दं ब॒र्हिः सो॑म॒पेया॑य याहि। वह॑न्तु त्वा॒ हर॑यो म॒द्र्य॑ञ्चमाङ्गू॒षमच्छा॑ त॒वसं॒ मदा॑य॥

वे ही नीरोग, शिष्ट, धार्मिक, चिरायु और परोपकारी हों, जो मद्यरूप और अच्छे प्रकार बुद्धि के नष्ट करनेवाले पदार्थ को छोड़ बल, बुद्धि आदि को बढ़ानेवाले सोम आदि बड़ी ओषधियों के रस के पीने को अपने वा आप्त के स्थान को जावें॥३॥

आ नो॒ विश्वा॑भिरू॒तिभिः॑ स॒जोषा॒ ब्रह्म॑ जुषा॒णो ह॑र्यश्व याहि। वरी॑वृज॒त्स्थवि॑रेभिः सुशिप्रा॒स्मे दध॒द्वृष॑णं॒ शुष्म॑मिन्द्र॥

वे ही मनुष्य महाशय होते हैं, जो पाप और परोपघात अर्थात् दूसरों को पीड़ा देने के कामों को छोड़ के अपने आत्मा के तुल्य सब मनुष्यों में वर्त्तमान सब के सुख के लिये अपना शरीर, वाणी और ठोढ़ी को वर्ताते हैं॥४॥

ए॒ष स्तोमो॑ म॒ह उ॒ग्राय॒ वाहे॑ धु॒री॒३॒॑वात्यो॒ न वा॒जय॑न्नधायि। इन्द्र॑ त्वा॒यम॒र्क ई॑ट्टे॒ वसू॑नां दि॒वी॑व॒ द्यामधि॑ नः॒ श्रोम॑तं धाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो विद्वान् तेजस्वियों के लिये प्रशंसा धारण करता, वह धुरी के समान सुख का आधार और घोड़े के समान वेगवान् हो बहुत लक्ष्मी पाकर सूर्य के समान इस संसार में प्रकाशित होता है॥५॥

ए॒वा न॑ इन्द्र॒ वार्य॑स्य पूर्धि॒ प्र ते॑ म॒हीं सु॑म॒तिं वे॑विदाम। इषं॑ पिन्व म॒घव॑द्भ्यः सु॒वीरां॑ यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

हे विद्वान्! आप हम लोगों के लिये धर्मयुक्त उत्तम बुद्धि को देओ, जिससे हम लोग अच्छे गुण-कर्म-स्वभावों को प्राप्त होकर सब मनुष्यों की अच्छे प्रकार रक्षा करें॥६॥इस सूक्त में इन्द्र, राजा, स्त्री-पुरुष और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चौबीसवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ ते॑ म॒ह इ॑न्द्रोत्यु॑ग्र॒ सम॑न्यवो॒ यत्स॒मर॑न्त॒ सेनाः॑। पता॑ति दि॒द्युन्नर्य॑स्य बा॒ह्वोर्मा ते॒ मनो॑ विष्व॒द्र्य१॒॑ग्वि चा॑रीत्॥

हे सेनाधिपति! जब संग्राम समय में आओ तब जो क्रोध प्रज्वलित क्रोधाग्नि से जलती हुई सेना शत्रुओं के ऊपर गिरें, उस समय वे विजय को प्राप्त हों, जब तक तुम्हारा बाहुबल न फैले मन भी अन्याय में न प्रवृत्त हो, तब तक तुम्हारी उन्नति होती है, यह जानो॥१॥

नि दु॒र्ग इ॑न्द्र श्नथिह्य॒मित्रा॑न॒भि ये नो॒ मर्ता॑सो अ॒मन्ति॑। आ॒रे तं शंसं॑ कृणुहि निनि॒त्सोरा नो॑ भर सं॒भर॑णं॒ वसू॑नाम्॥

हे राजा! जो धूर्त मनुष्य ब्रह्मचर्य आदि के निवारण से मनुष्यों को रोगी करते हैं, उनको काराघर में बाँधो और जो अपनी प्रशंसा के लिये सब की निन्दा करते हैं, उनको समझा कर उत्तम प्रजाजनों से अलग रक्खो, ऐसे करने से आपकी बड़ी प्रशंसा होगी॥२॥

श॒तं ते॑ शिप्रिन्नू॒तयः॑ सु॒दासे॑ स॒हस्रं॒ शंसा॑ उ॒त रा॒तिर॑स्तु। ज॒हि वध॑र्व॒नुषो॒ मर्त्य॑स्या॒स्मे द्यु॒म्नमधि॒ रत्नं॑ च धेहि॥

हे राजा! आप सैकड़ों वा सहस्रों प्रकारों से प्रजा की पालना और सुपात्रों को देना, दुष्टों का बन्धन, प्रजाजनों में कीर्ति बढ़ाना और धन को निरन्तर विधान करो, जिससे सब सुखी हों॥३॥

त्वाव॑तो॒ ही॑न्द्र॒ क्रत्वे॒ अस्मि॒ त्वाव॑तोऽवि॒तुः शू॑र रा॒तौ। विश्वेदहा॑नि तविषीव उग्रँ॒ ओकः॑ कृणुष्व हरिवो॒ न म॑र्धीः॥

हे धार्मिक राजा! जिससे आप सबकी रक्षा के लिये सदा प्रवृत्त होते हो, इससे तुम्हारी रक्षा में हम लोग सर्वदा प्रवृत्त हैं॥४॥

कुत्सा॑ ए॒ते हर्य॑श्वाय शू॒षमिन्द्रे॒ सहो॑ दे॒वजू॑तमिया॒नाः। स॒त्रा कृ॑धि सु॒हना॑ शूर वृ॒त्रा व॒यं तरु॑त्राः सनुयाम॒ वाज॑म्॥

हे राजा! यदि राज्य पालने वा बढ़ाने को आप चाहें तो शस्त्र अस्त्र और सेना जनों को निरन्तर ग्रहण करो, फिर सत्य आचार को माँगते हुए निरन्तर बढ़ो और हम लोगों को बढ़ाओ॥५॥

ए॒वा न॑ इन्द्र॒ वार्य॑स्य पूर्धि॒ प्र ते॑ म॒हीं सु॑म॒तिं वे॑विदाम। इषं॑ पिन्व म॒घव॑द्भ्यः सु॒वीरां॑ यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

वे ही पढ़ानेवाले धन्यवाद के योग्य होते हैं, जो विद्यार्थियों को शीघ्र विद्वान् और धार्मिक करते हैं और सर्वदैव रक्षा में वर्त्तमान होते हुए सब की उन्नति करते हैं॥६॥इस सूक्त में सेनापति, राजा और शस्त्र अस्त्रों को ग्रहण करना इन अर्थों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पच्चीसवाँ सूक्त और नवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

न सोम॒ इन्द्र॒मसु॑तो ममाद॒ नाब्र॑ह्माणो म॒घवा॑नं सु॒तासः॑। तस्मा॑ उ॒क्थं ज॑नये॒ यज्जुजो॑षन्नृ॒वन्नवी॑यः शृ॒णव॒द्यथा॑ नः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे बुद्धिमान् मनुष्यो! जैसे उत्पन्न हुआ पदार्थ जीव को आनन्द देता है, जैसे यथावत् वेदविद्या और आप्तजन धार्मिक धनाढ्य को विद्वान् करते हैं, वैसे उत्पन्न हुई विद्या आत्मा को सुख देती है और शुभगुण धनाढ्य को बढ़ाते हैं और सत्संग से ही मनुष्यत्व को जीव प्राप्त होता है॥१॥

उ॒क्थउ॑क्थे॒ सोम॒ इन्द्रं॑ ममाद नी॒थेनी॑थे म॒घवा॑नं सु॒तासः॑। यदीं॑ स॒बाधः॑ पि॒तरं॒ न पु॒त्राः स॑मा॒नद॑क्षा॒ अव॑से॒ हव॑न्ते॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो विद्यार्थी जन जैसे अच्छे पुत्र क्लेशयुक्त माता पिता को प्रीति से सेवते हैं, वैसे गुरु की सेवा करते हैं वा जैसे विद्या, विनय और पुरुषार्थों से उत्पन्न हुआ ऐश्वर्य उत्पन्न करनेवाले को आनन्दित करता है, वैसे तुम लोग वर्तो॥२॥

च॒कार॒ ता कृ॒णव॑न्नू॒नम॒न्या यानि॑ ब्रु॒वन्ति॑ वे॒धसः॑ सु॒तेषु॑। जनी॑रिव॒ पति॒रेकः॑ समा॒नो नि मा॑मृजे॒ पुर॒ इन्द्रः॒ सु सर्वाः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! तुम विद्वानों के उपदेश के अनुकूल ही आचरण करो जैसे धार्मिक, जितेन्द्रिय, विद्वान् राजा पक्षपात छोड़ के अपनी प्रजा न्याय से रखता है, वैसे प्रजाजन इस राजा की निरन्तर रक्षा करें, ऐसे करने से निरन्तर सब को निश्चल सुखलाभ होता है॥३॥

ए॒वा तमा॑हुरु॒त शृ॑ण्व॒ इन्द्र॒ एको॑ विभ॒क्ता त॒रणि॑र्म॒घाना॑म्। मि॒थ॒स्तुर॑ ऊ॒तयो॒ यस्य॑ पू॒र्वीर॒स्मे भ॒द्राणि॑ सश्चत प्रि॒याणि॑॥

हे मनुष्यो! जिसकी प्रशंसा आप्त विद्वान् जन करें वा जिसके धर्मयुक्त कर्मों को समस्त प्रजा प्रीति से चाहे, जो सत्य झूठ को यथावत् अलग कर न्याय करे, वही हमारा राजा हो॥४॥

ए॒वा वसि॑ष्ठ॒ इन्द्र॑मू॒तये॒ नॄन्कृ॑ष्टी॒नां वृ॑ष॒भं सु॒ते गृ॑णाति। स॒ह॒स्रिण॒ उप॑ नो माहि॒ वाजा॑न्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

विद्वान् जनो! तुम ऐसा प्रयत्न करो जिससे राजा आदि जन धार्मिक होकर असंख्य धन वा अतुल आनन्द को प्राप्त हों, जैसे आप उनकी रक्षा करते हैं, वैसे ये आपकी निरन्तर रक्षा करें॥५॥इस सूक्त में इन्द्र शब्द शब्द से जीव, राजा के कर्म और गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह छब्बीसवाँ सूक्त और दसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इन्द्रं॒ नरो॑ ने॒मधि॑ता हवन्ते॒ यत्पार्या॑ यु॒नज॑ते॒ धिय॒स्ताः। शूरो॒ नृषा॑ता॒ शव॑सश्चका॒न आ गोम॑ति व्र॒जे भ॑जा॒ त्वं नः॑॥

जो निश्चय से इस संसार में प्रशंसित बुद्धिवाला, सर्वदा बल वृद्धि की इच्छा करता हुआ, शिष्ट जनों की सम्मति वर्तनेवाला, विद्वान्, उद्योगी, धार्मिक और प्रजा पालन में तत्पर जन हो, उसी की सब कामना करो॥१॥

य इ॑न्द्र॒ शुष्मो॑ मघवन्ते॒ अस्ति॒ शिक्षा॒ सखि॑भ्यः पुरुहूत॒ नृभ्यः॑। त्वं हि दृ॒ळ्हा म॑घव॒न्विचे॑ता॒ अपा॑ वृधि॒ परि॑वृतं॒ न राधः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। वही राजा सदा बढ़ता है, जो अपराधी मित्रों को भी दण्ड देने के बिना नहीं छोड़ता, जो ऐसा सदैव उत्तम यत्न करता है, जिससे कि अपने मित्र उदासीन वा शत्रु अधिक न हों और जो सदैव विद्या और शिक्षा की वृद्धि के लिये प्रयत्न करता है, वही सब दुष्ट और लोककण्टक डाकुओं को निवार के राज्य करने के योग्य होता है॥२॥

इन्द्रो॒ राजा॒ जग॑तश्चर्षणी॒नामधि॒ क्षमि॒ विषु॑रूपं॒ यदस्ति॑। ततो॑ ददाति दा॒शुषे॒ वसू॑नि॒ चोद॒द्राध॒ उप॑स्तुतश्चिद॒र्वाक्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा आदि जन सूर्य के सम्मान राज्य में दण्ड प्रकाश किये और सुख के देनेवाले होते हैं, वे ही सब सुख पाते हैं॥३॥

नू चि॑न्न॒ इन्द्रो॑ म॒घवा॒ सहू॑ती दा॒नो वाजं॒ नि य॑मते न ऊ॒ती। अनू॑ना॒ यस्य॒ दक्षि॑णा पी॒पाय॑ वा॒मं नृभ्यो॑ अ॒भिवी॑ता॒ सखि॑भ्यः॥

जो राजा आदि जन यथावत् पुरुषार्थ से सब मनुष्यों को अधर्म से धर्म में प्रवृत्त करा अभय उत्पन्न कराते हैं, वे प्रशंसनीय होते हैं॥४॥

नू इ॑न्द्र रा॒ये वरि॑वस्कृधी न॒ आ ते॒ मनो॑ ववृत्याम म॒घाय॑। गोम॒दश्वा॑व॒द्रथ॑व॒द्व्यन्तो॑ यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

हे राजा! जैसे हम लोग आपको राज्य की उन्नति के लिये प्रवृत्त करावें, वैसे हम लोगों को धन प्राप्ति के लिये प्रवृत्त कराओ। सब आप लोग परमैश्वर्य्य को प्राप्त होकर हमारी रक्षा में निरन्तर प्रयत्न करो॥५॥इस सूक्त में इन्द्र, सेनापति, राजा, दाता, रक्षा करनेवाले और प्रवृत्ति करानेवाले के गुणों का और कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सत्ताईसवाँ सूक्त और ग्यारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

ब्रह्मा॑ ण इ॒न्द्रोप॑ याहि वि॒द्वान॒र्वाञ्च॑स्ते॒ हर॑यः सन्तु यु॒क्ताः। विश्वे॑ चि॒द्धि त्वा॑ वि॒हव॑न्त॒ मर्ता॑ अ॒स्माक॒मिच्छृ॑णुहि विश्वमिन्व॥

जो मनुष्य सत्य न्यायवृत्ति से राज्य भक्त हों, वे राज्य में सत्कार किये हुए निरन्तर बसें॥१॥

हवं॑ त इन्द्र महि॒मा व्या॑न॒ड् ब्रह्म॒ यत्पासि॑ शवसि॒न्नृषी॑णाम्। आ यद्वज्रं॑ दधि॒षे हस्त॑ उग्र घो॒रः सन्क्रत्वा॑ जनिष्ठा॒ अषा॑ळ्हाः॥

हे मनुष्यो! जो शस्त्र और अस्त्रों के प्रयोगों का करने धनुर्वेदादिशास्त्रों का जानने और प्रशंसायुक्त सेनावाला हो और जिस की पुण्यरूपी कीर्त्ति वर्त्तमान है, वही शत्रुओं के मारने और प्रजाजनों के पालने में समर्थ होता है॥२॥

तव॒ प्रणी॑तीन्द्र॒ जोहु॑वाना॒न्त्सं यन्नॄन्न रोद॑सी नि॒नेथ॑। म॒हे क्ष॒त्राय॒ शव॑से॒ हि ज॒ज्ञेऽतू॑तुजिं चि॒त्तूतु॑जिरशिश्नत्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजपुरुष सूर्य और पृथिवी के समान समस्त प्रजाजनों को धारण कर धर्म को पहुँचावें, वे नीति जाननेवाले समझने चाहियें॥३॥

ए॒भिर्न॑ इ॒न्द्राह॑भिर्दशस्य दुर्मि॒त्रासो॒ हि क्षि॒तयः॒ पव॑न्ते। प्रति॒ यच्चष्टे॒ अनृ॑तमने॒ना अव॑ द्वि॒ता वरु॑णो मा॒यी नः॑ सात्॥

हे मनुष्यो! जो यहाँ झूँठ कहते हैं, वे अधर्मात्मा पुरुष हैं और जो सत्य कहते हैं वे धर्मात्मा हैं, ऐसा निश्चय करो॥४॥

वो॒चेमेदिन्द्रं॑ म॒घवा॑नमेनं म॒हो रा॒यो राध॑सो॒ यद्दद॑न्नः। यो अर्च॑तो॒ ब्रह्म॑कृति॒मवि॑ष्ठो यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

हे विद्वानो! जैसे हम लोग राजा आदि मनुष्यों के प्रति सत्य का सर्वदा उपदेश करें, वैसे तुम भी उपदेश करो, ऐसे परस्पर की रक्षा कर उन्नति विधान करनी चाहिये॥५॥इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान्, राजगुणों और कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह अट्ठाईसवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒यं सोम॑ इन्द्र॒ तुभ्यं॑ सुन्व॒ आ तु प्र या॑हि हरिव॒स्तदो॑काः। पिबा॒ त्व१॒॑स्य सुषु॑तस्य॒ चारो॒र्ददो॑ म॒घानि॑ मघवन्निया॒नः॥

जो मनुष्य वैद्यकशास्त्र की रीति से उत्पन्न किये हुए सर्वरोग हरने और बुद्धि बल के देनेवाले, बड़ी-बड़ी ओषधियों के रस को पीते हैं, वे सुख और ऐश्वर्य पाते हैं॥१॥

ब्रह्म॑न्वीर॒ ब्रह्म॑कृतिं जुषा॒णो॑ऽर्वाची॒नो हरि॑भिर्याहि॒ तूय॑म्। अ॒स्मिन्नू॒ षु सव॑ने मादय॒स्वोप॒ ब्रह्मा॑णि शृणव इ॒मा नः॑॥

हे विद्वन्! आप सृष्टि के क्रम को जान कर हमको जतलाओ, इसमें पढ़ाना पढ़ना काम और पढ़े हुए की परीक्षा करो और विद्यादान से शीघ्र प्रमोद देओ॥२॥

का ते॑ अ॒स्त्यरं॑कृतिः सू॒क्तैः क॒दा नू॒नं ते॑ मघवन्दाशेम। विश्वा॑ म॒तीरा त॑तने त्वा॒याधा॑ म इन्द्र शृणवो॒ हवे॒मा॥

वे अध्यापक श्रेष्ठ होते हैं जो इन अपने विद्यार्थियों को कब विद्वान् करें ऐसी इच्छा करते हैं और सब के लिये सत्य उत्तम ज्ञानों को देते हैं और वे ही विद्यार्थी श्रेष्ठ हैं जो उत्साह से अपने पढ़े हुए की उत्तम परीक्षा देते हैं तथा वे ही परीक्षा करनेवाले श्रेष्ठ हैं जो परीक्षा में किसी का पक्षपात नहीं करते हैं॥३॥

उ॒तो घा॒ ते पु॑रु॒ष्या॒३॒॑ इदा॑स॒न्येषां॒ पूर्वे॑षा॒मशृ॑णो॒र्ऋषी॑णाम्। अधा॒हं त्वा॑ मघवञ्जोहवीमि॒ त्वं न॑ इन्द्रासि॒ प्रम॑तिः पि॒तेव॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वान् पितृजन पुत्रों के समान विद्यार्थियों की पालना करते हैं, वे ही सत्कार करने और प्रशंसा करने योग्य होते हैं॥४॥

वो॒चेमेदिन्द्रं॑ म॒घवा॑नमेनं म॒हो रा॒यो राध॑सो॒ यद्दद॑न्नः। यो अर्च॑तो॒ ब्रह्म॑कृति॒मवि॑ष्ठो यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

जो जन नाश न होने वाले सर्वत्र सत्कार के हेतु विद्याधन के देनेवाले हैं, वे ही सबके यथावत् पालनेवाले हैं॥५॥इस सूक्त में इन्द्र, सोमपान, अध्यापक, अध्येता, परीक्षक और विद्या देनेवालों के गुण और कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह उनतीसवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ नो॑ देव॒ शव॑सा याहि शुष्मि॒न्भवा॑ वृ॒ध इ॑न्द्र रा॒यो अ॒स्य। म॒हे नृ॒म्णाय॑ नृपते सुवज्र॒ महि॑ क्ष॒त्राय॒ पौंस्या॑य शूर॥

वही राजा श्रेष्ठ होता है, जो राज्य की रक्षा में निरन्तर उत्तम यत्न करे और धनविद्या की वृद्धि से प्रजा को अच्छे प्रकार पुष्टि देकर सुखी करे॥१॥

हव॑न्त उ त्वा॒ हव्यं॒ विवा॑चि त॒नूषु॒ शूराः॒ सूर्य॑स्य सा॒तौ। त्वं विश्वे॑षु॒ सेन्यो॒ जने॑षु॒ त्वं वृ॒त्राणि॑ रन्धया सु॒हन्तु॑॥

वही राजा सर्वप्रिय होता है, जो न्याय से प्रजा की अच्छी पालना कर संग्राम जीतता है॥२॥

अहा॒ यदि॑न्द्र सु॒दिना॑ व्यु॒च्छान्दधो॒ यत्के॒तुमु॑प॒मं स॒मत्सु॑। न्य१॒॑ग्निः सी॑द॒दसु॑रो॒ न होता॑ हुवा॒नो अत्र॑ सु॒भगा॑य दे॒वान्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। वही राजा जीतता है, जो उत्तम शूरवीर विद्वानों को अपनी सेना में सत्कार का रक्खे जैसे होम करनेवाली अग्नि में साकल्य होमता है, वैसे शस्त्र और अस्त्रों की अग्नि में शत्रुओं को होमे॥३॥

व॒यं ते त॑ इन्द्र॒ ये च॑ देव॒ स्तव॑न्त शूर॒ दद॑तो म॒घानि॑। यच्छा॑ सू॒रिभ्य॑ उप॒मं वरू॑थं स्वा॒भुवो॑ जर॒णाम॑श्नवन्त॥

जो राजा अच्छी परीक्षा कर विद्वानों के लिये धन आदि दे और सत्कार कर इन विद्या अवस्था वृद्ध धार्मिक जनों को सेना आदि के अधिकारों में नियुक्त करता है, उसकी सर्वदा जीत और प्रशंसा होती है॥४॥

वो॒चेमेदिन्द्रं॑ म॒घवा॑नमेनं म॒हो रा॒यो राध॑सो॒ यद्दद॑न्नः। यो अर्च॑तो॒ ब्रह्म॑कृति॒मवि॑ष्ठो यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

यदि सब मनुष्य सत्य के उपदेश करनेवाले हों तो राजा कभी ज्ञानहीन न हो, जब राजा धर्मिष्ठ हो तब सब मनुष्य धर्मात्मा हों, ऐसे परस्पर की रक्षा से सदैव सुख तुम लोग पाओ॥५॥इस सूक्त में इन्द्र, राजा, प्रजा, भृत्य और उपदेशक के काम का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह तीसवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र व॒ इन्द्रा॑य॒ माद॑नं॒ हर्य॑श्वाय गायत। सखा॑यः सोम॒पाव्ने॑॥

जो मित्रजन अपने मित्रजनों को आनन्द उत्पन्न करते हैं, वे मित्र होते हैं॥१॥

शंसेदु॒क्थं सु॒दान॑व उ॒त द्यु॒क्षं यथा॒ नरः॑। च॒कृ॒मा स॒त्यरा॑धसे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वानो! जिसका धर्म से उत्पन्न हुआ धन है और सुपात्रों के लिये दान वर्त्तमान है, उसी को उत्तम जानो॥२॥

त्वं न॑ इन्द्र वाज॒युस्त्वं ग॒व्युः श॑तक्रतो। त्वं हि॑रण्य॒युर्व॑सो॥

सब मनुष्यों को यही इच्छा करनी चाहिये जो धर्मात्मा आप्त विद्वान् राजा अध्यापक वा परीक्षा करनेवाला है सो निरन्तर उन्नति करनेहारा हो॥३॥

व॒यमि॑न्द्र त्वा॒यवो॒ऽभि प्र णो॑नुमो वृषन्। वि॒द्धि त्व१॒॑स्य नो॑ वसो॥

जैसे धार्मिक प्रजाजन धार्मिक राजा की कामना करते और उस को नमते हैं, वैसे ही राजा इस धार्मिकी प्रजा की कामना करे और निरन्तर नमे॥४॥

मा नो॑ नि॒दे च॒ वक्त॑वे॒ऽर्यो र॑न्धी॒ररा॑व्णे। त्वे अपि॒ क्रतु॒र्मम॑॥

राजा सदैव विद्या, धर्म और सुशीलता बढ़वाने के लिये निन्दक, दुष्ट मनुष्यों को निवार के प्रजा को निरन्तर प्रसन्न करे॥५॥

त्वं वर्मा॑सि स॒प्रथः॑ पुरोयो॒धश्च॑ वृत्रहन्। त्वया॒ प्रति॑ ब्रुवे यु॒जा॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा सत्कीर्ति, सुशील, निरभिमान, विद्वान् हो तो उसके प्रति सब सत्य बोलें और वह सुनकर प्रसन्न हो॥६॥

म॒हाँ उ॒तासि॒ यस्य॒ तेऽनु॑ स्व॒धाव॑री॒ सहः॑। म॒म्नाते॑ इन्द्र॒ रोद॑सी॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिस राजा की प्रजा और सेना धार्मिक और सुरक्षित हों, उसका सूर्य के समान प्रताप होता है॥७॥

तं त्वा॑ म॒रुत्व॑ती॒ परि॒ भुव॒द्वाणी॑ स॒याव॑री। नक्ष॑माणा स॒ह द्युभिः॑॥

जिस विद्वान् राजा वा उपदेशक विद्वान् की सकलविद्यायुक्त वाणी उत्तम और कार्य करनेवाले उपदेश के योग्य हो, वही सब प्रशंसा को योग्य होता है॥८॥

ऊ॒र्ध्वास॒स्त्वान्विन्द॑वो॒ भुव॑न्द॒स्ममुप॒ द्यवि॑। सं ते॑ नमन्त कृ॒ष्टयः॑॥

जिस राजा के समीप में भद्र, धार्मिक जन हैं, उसकी नम्रता से सब प्रजा नम्र होती है॥९॥

प्र वो॑ म॒हे म॑हि॒वृधे॑ भरध्वं॒ प्रचे॑तसे॒ प्र सु॑म॒तिं कृ॑णुध्वम्। विशः॑ पू॒र्वीः प्र च॑रा चर्षणि॒प्राः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे विद्वान् जन तुम लोगों के लिये शुभगुण और पुष्कल ऐश्वर्य विधान करते हैं, वैसे तुम इनके लिये श्रेष्ठ नीति धारण करो॥१०॥

उ॒रु॒व्यच॑से म॒हिने॑ सुवृ॒क्तिमिन्द्रा॑य॒ ब्रह्म॑ जनयन्त॒ विप्राः॑। तस्य॑ व्र॒तानि॒ न मि॑नन्ति॒ धीराः॑॥

जो राजा के लिये बहुत धन उत्पन्न करते और असत्य आचरण को निवृत्त कर सत्य आचरण प्रसिद्ध करते हैं, वे पूज्य होते हैं॥११॥

इन्द्रं॒ वाणी॒रनु॑त्तमन्युमे॒व स॒त्रा राजा॑नं दधिरे॒ सह॑ध्यै। हर्य॑श्वाय बर्हया॒ समा॒पीन्॥

जिस न उत्पन्न हुए क्रोधवाले, जितेन्द्रिय राजा को सकल शास्त्रयुक्त वाणी व्याप्त होती है, वही सत्य न्याय से प्रजा पालने योग्य होता है॥१२॥इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान् और राजा के काम का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥यह इकतीसवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

मो षु त्वा॑ वा॒घत॑श्च॒नारे अ॒स्मन्नि री॑रमन्। आ॒रात्ता॑च्चित्सध॒मादं॑ न॒ आ ग॑ही॒ह वा॒ सन्नुप॑ श्रुधि॥

जिन मनुष्यों के समीप बुद्धिमान् धार्मिक, विद्वान्जन और दूर में दुष्ट जन हैं, वे सदैव सुख पाते हैं॥१॥

इ॒मे हि ते॑ ब्रह्म॒कृतः॑ सु॒ते सचा॒ मधौ॒ न मक्ष॒ आस॑ते। इन्द्रे॒ कामं॑ जरि॒तारो॑ वसू॒यवो॒ रथे॒ न पाद॒मा द॑धुः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वान् राजा धर्मात्मा न्यायकारी हो तो इसके समीप में बहुत धार्मिक विद्वान् हों॥२॥

रा॒यस्का॑मो॒ वज्र॑हस्तं सु॒दक्षि॑णं पु॒त्रो न पि॒तरं॑ हुवे॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य जैसे पुत्र पिता की उपासना करते हैं, वैसे राजा की जो सेवा करते हैं, वे समस्त ऐश्वर्य पाते हैं॥३॥

इ॒म इन्द्रा॑य सुन्विरे॒ सोमा॑सो॒ दध्या॑शिरः। ताँ आ मदा॑य वज्रहस्त पी॒तये॒ हरि॑भ्यां या॒ह्योक॒ आ॥

जो पुरुषार्थ से विद्याओं को प्राप्त होकर उद्यम करते हैं, वे राज्यश्री को प्राप्त होते हैं॥४॥

श्रव॒च्छ्रुत्क॑र्ण ईयते॒ वसू॑नां॒ नू चि॑न्नो मर्धिष॒द्गिरः॑। स॒द्यश्चि॒द्यः स॒हस्रा॑णि श॒ता दद॒न्नकि॒र्दित्स॑न्त॒मा मि॑नत्॥

जो दीर्घ ब्रह्मचर्य्य से सब विद्याओं को सुनते, अच्छी शिक्षायुक्त वाणियों को चाहते और औरों को अतुल विज्ञान देते हैं, वे दुःख नहीं पाते हैं॥५॥

स वी॒रो अप्र॑तिष्कुत॒ इन्द्रे॑ण शूशुवे॒ नृभिः॑। यस्ते॑ गभी॒रा सव॑नानि वृत्रहन्त्सु॒नोत्या च॒ धाव॑ति॥

जो उत्तम पुरुषों के साथ सब ओर से मित्रता और दुष्टों के साथ वैमनस्य रखते हैं, वे असंख्य ऐश्वर्य पाते हैं॥६॥

भवा॒ वरू॑थं मघवन्म॒घोनां॒ यत्स॒मजा॑सि॒ शर्ध॑तः। वि त्वाह॑तस्य॒ वेद॑नं भजेम॒ह्या दू॒णाशो॑ भरा॒ गय॑म्॥

हे राजा! दुष्टों के मारनेवाले आपकी प्रजा में जो नीति उसी के अनुकूल कर्म हम लोग करें, जिससे हमारे अनुकूल आप होओ॥७॥

सु॒नोता॑ सोम॒पाव्ने॒ सोम॒मिन्द्रा॑य व॒ज्रिणे॑। पच॑ता प॒क्तीरव॑से कृणु॒ध्वमित्पृ॒णन्नित्पृ॑ण॒ते मयः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो वैद्य हों वे उत्तम ओषधि, प्रशंसायुक्त रोगनाशक रस और उत्तम अन्न पाकों की सब मनुष्यों के प्रति शिक्षा दें, जिससे पूर्ण सुख हो॥८॥

मा स्रे॑धत सोमिनो॒ दक्ष॑ता म॒हे कृ॑णु॒ध्वं रा॒य आ॒तुजे॑। त॒रणि॒रिज्ज॑यति॒ क्षेति॒ पुष्य॑ति॒ न दे॒वासः॑ कव॒त्नवे॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो अन्याय से किसी की हिंसा नहीं करते और धर्मात्माओं की वृद्धि करते हैं, वे विद्वान् जन सर्वदा जीतते, धर्म में निवास करते और पुष्ट होते हैं॥९॥

नकिः॑ सु॒दासो॒ रथं॒ पर्या॑स॒ न री॑रमत्। इन्द्रो॒ यस्या॑वि॒ता यस्य॑ म॒रुतो॒ गम॒त्स गोम॑ति व्र॒जे॥

यदि राजा प्रजा का रक्षक न हो तो किसी को सुख न हो॥१०॥

गम॒द्वाजं॑ वा॒जय॑न्निन्द्र॒ मर्त्यो॒ यस्य॒ त्वम॑वि॒ता भुवः॑। अ॒स्माकं॑ बोध्यवि॒ता रथा॑नाम॒स्माकं॑ शूर नृ॒णाम्॥

जब राजा प्रजाओं की और प्रजाजन राजाओं की रक्षा करें, तब सब की यथावत् रक्षा का संभव हो॥११॥

उदिन्न्व॑स्य रिच्य॒तेंऽशो॒ धनं॒ न जि॒ग्युषः॑। य इन्द्रो॒ हरि॑वा॒न्न द॑भन्ति॒ तं रिपो॒ दक्षं॑ दधाति सो॒मिनि॑॥

जो राजा धनियों में जो ऐश्वर्य है, उसे दरिद्रियों में भी बढ़ाता है, उसको कोई नष्ट नहीं कर सकता है, जिसका अधिक पुरुषार्थ होता है, उसी को धन और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है॥१२॥

मन्त्र॒मख॑र्वं॒ सुधि॑तं सु॒पेश॑सं॒ दधा॑त य॒ज्ञिये॒ष्वा। पू॒र्वीश्च॒न प्रसि॑तयस्तरन्ति॒ तं य इन्द्रे॒ कर्म॑णा॒ भुव॑त्॥

जिन राजाओं का गूढ़ विचार सर्वहित करना और श्रेष्ठ यत्न होता है, वे अच्छी क्रिया से सब प्रजाजनों को प्रेमास्पद से प्रसन्न कर सकते हैं॥१३॥

कस्तमि॑न्द्र॒ त्वाव॑सु॒मा मर्त्यो॑ दधर्षति। श्र॒द्धा इत्ते॑ मघव॒न्पार्ये॑ दि॒वि वा॒जी वाजं॑ सिषासति॥

जिसकी रक्षा धार्मिक राजा करता है, उसका तिरस्कार कौन कर सकता है॥१४॥

म॒घोनः॑ स्म वृत्र॒हत्ये॑षु चोदय॒ ये दद॑ति प्रि॒या वसु॑। तव॒ प्रणी॑ती हर्यश्व सू॒रिभि॒र्विश्वा॑ तरेम दुरि॒ता॥

हे राजा! आप यदि पक्षपात को छोड़ के सबकी रक्षा करें और उदार धनाढ्यों को संग्राम में प्रेरणा दें तो सब हम लोग सब दुःखों को तरें॥१५॥

तवेदि॑न्द्राव॒मं वसु॒ त्वं पु॑ष्यसि मध्य॒मम्। सत्रा॒ विश्व॑स्य पर॒मस्य॑ राजसि॒ नकि॑ष्ट्वा॒ गोषु॑ वृण्वते॥

हे राजा! आप सदैव निकृष्ट, मध्यम और उत्तम धनों का न्याय से ही संचय करो, जिसका धर्म्म से उत्पन्न होने से सत्य धन वर्त्तमान है, उसको कोई दुःख नहीं प्राप्त होता है॥१६॥

त्वं विश्व॑स्य धन॒दा अ॑सि श्रु॒तो य ईं॒ भव॑न्त्या॒जयः॑। तवा॒यं विश्वः॑ पुरुहूत॒ पार्थि॑वोऽव॒स्युर्नाम॑ भिक्षते॥

जो राजा संग्राम में विजय करनेवालों को बहुत धन देता है, उसका पराजय कभी नहीं होता है, जो प्रजाजन रक्षा चाहें उसकी रक्षा जो निरन्तर करता है, वही पुण्यकीर्ति होता है॥१७॥

यदि॑न्द्र॒ याव॑त॒स्त्वमे॒ताव॑द॒हमीशी॑य। स्तो॒तार॒मिद्दि॑धिषेय रदावसो॒ न पा॑प॒त्वाय॑ रासीय॥

हे राजा! यदि आप हम लोगों की निरन्तर रक्षा करें तो हम आपके राज्य को रक्षा कर पापाचरण त्याग औरों को भी अधर्माचरण से अलग रख कर निरन्तर आनन्द करें॥१८॥

शिक्षे॑य॒मिन्म॑हय॒ते दि॒वेदि॑वे रा॒य आ कु॑हचि॒द्विदे॑। न॒हि त्वद॒न्यन्म॑घवन्न॒ आप्यं॒ वस्यो॒ अस्ति॑ पि॒ता च॒न॥

वे ही भृत्य उत्तम हैं, जो राजा वा स्वामी को छोड़ के दूसरे को [=से] नहीं जांचते [=माँगते] न विना दिये लेते, प्रतिदिन पुरुषार्थ से प्रजा की रक्षा कर और धनवृद्धि करना चाहते हैं॥१९॥

त॒रणि॒रित्सि॑षासति॒ वाजं॒ पुरं॑ध्या यु॒जा। आ व॒ इन्द्रं॑ पुरुहू॒तं न॑मे गि॒रा ने॒मिं तष्टे॑व सु॒द्र्व॑म्॥

जो राजा पूर्ण विद्या और विनय तथा धर्मयुक्त व्यवहार से सत्य और असत्य को अलग कर न्याय करता है, उसको हम सब लोग नमते हैं, जैसे बढ़ई रथादि को बनाता है, वैसे हम लोग सब कामों को रचें॥२०॥

न दु॑ष्टु॒ती मर्त्यो॑ विन्दते॒ वसु॒ न स्रेध॑न्तं र॒यिर्न॑शत्। सु॒शक्ति॒रिन्म॑घव॒न् तुभ्यं॒ माव॑ते दे॒ष्णं यत्पार्ये॑ दि॒वि॥

जो अधर्माचरण से युक्त दुष्ट, हिंसक मनुष्य हैं उनको धन, राज्य, और उत्तम सामर्थ्यं नहीं प्राप्त होता है, इससे सबको न्याय के आचरण से ही धन खोजना चाहिये॥२१॥

अ॒भि त्वा॑ शूर नोनु॒मोऽदु॑ग्धाइव धे॒नवः॑। ईशा॑नम॒स्य जग॑तः स्व॒र्दृश॒मीशा॑नमिन्द्र त॒स्थुषः॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्य! यदि निरन्तर सुखेच्छा हो तो परमात्मा ही की आप लोग उपासना करें॥२२॥

न त्वावाँ॑ अ॒न्यो दि॒व्यो न पार्थि॑वो॒ न जा॒तो न ज॑निष्यते। अ॒श्वा॒यन्तो॑ मघवन्निन्द्र वा॒जिनो॑ ग॒व्यन्त॑स्त्वा हवामहे॥

हे मनुष्यो! जिस कारण परमेश्वर से तुल्य अधिक अन्य पदार्थ कोई नहीं न उत्पन्न हुआ न कभी भी उत्पन्न होगा, इससे ही उसकी उपासना और प्रशंसा हम लोग नित्य करें॥२३॥

अ॒भी ष॒तस्तदा भ॒रेन्द्र॒ ज्यायः॒ कनी॑यसः। पु॒रु॒वसु॒र्हि म॑घवन्त्स॒नादसि॒ भरे॑भरे च॒ हव्यः॑॥

हे मनुष्यो! जो परमात्मा अणु से अणु, सूक्ष्म से सूक्ष्म, बड़े से बड़ा सनातन सर्वाधार सर्वव्यापक सब की उपासना करने योग्य है, उसी का आश्रय सब करें॥२४॥

परा॑ णुदस्व मघवन्न॒मित्रा॑न्त्सु॒वेदा॑ नो॒ वसू॑ कृधि। अ॒स्माकं॑ बोध्यवि॒ता म॑हाध॒ने भवा॑ वृ॒धः सखी॑नाम्॥

हे राजा! आप धार्मिक, शूरजनों का सत्कार कर उनको शिक्षा देकर युद्धविद्या में कुशल कर डाकू आदि दुष्टों को निवृत्त कर सर्वोपकारी मनुष्यों के रक्षा करनेवाले हूजिये॥२५॥

इन्द्र॒ क्रतुं॑ न॒ आ भ॑र पि॒ता पु॒त्रेभ्यो॒ यथा॑। शिक्षा॑ णो अ॒स्मिन्पु॑रुहूत॒ याम॑नि जी॒वा ज्योति॑रशीमहि॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे जगदीश्वर! जैसे पिता हम लोगों को पुष्ट करता है, वैसे आप पालना कीजिये जैसे आप्त विद्वान् जन विद्यार्थियों के लिये शिक्षा देकर सत्य बुद्धि का ग्रहण कराता है, वैसे ही हमको सत्य विज्ञान ग्रहण कराओ जिससे हम लोग सृष्टिविद्या और आपको पाकर सर्वदैव आनन्दित हों॥२६॥

मा नो॒ अज्ञा॑ता वृ॒जना॑ दुरा॒ध्यो॒३॒॑ माशि॑वासो॒ अव॑ क्रमुः। त्वया॑ व॒यं प्र॒वतः॒ शश्व॑तीर॒पोऽति॑ शूर तरामसि॥

राजा और राजजन, सेना और सभाध्यक्ष ऐसी नावें रचें, जिनसे समुद्रों को सुख से सब तरें। उन समुद्रों में नौकाओं के चलानेवालों को मार्गविज्ञान यथार्थ हो॥२७॥इस सूक्त में इन्द्र, मेधावी, धन, विद्या की कामना करनेवाले, रक्षक, राजा, ईश्वर, जीव, धनसंचय फिर ईश्वर और नौकाओं के जानेवालों के गुण और कर्म का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह बत्तीसवाँ सूक्त और इक्कीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

श्वि॒त्यञ्चो॑ मा दक्षिण॒तस्क॑पर्दा धियंजि॒न्वासो॑ अ॒भि हि प्र॑म॒न्दुः। उ॒त्तिष्ठ॑न्वोचे॒ परि॑ ब॒र्हिषो॒ नॄन्न मे॑ दू॒रादवि॑तवे॒ वसि॑ष्ठाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो विद्याओं में प्रवीण, मनुष्यों की सत्य आचार में बुद्धि बढ़ानेवाले, पढ़ाने-पढ़ने और उपदेश करनेवाले हों उनको विद्या और धर्म के प्रचार के लिये निरन्तर शिक्षा, उत्साह और सत्कारयुक्त करें॥१॥

दू॒रादिन्द्र॑मनय॒न्ना सु॒तेन॑ ति॒रो वै॑श॒न्तमति॒ पान्त॑मु॒ग्रम्। पाश॑द्युम्नस्य वाय॒तस्य॒ सोमा॑त्सु॒तादिन्द्रो॑ऽवृणीता॒ वसि॑ष्ठान्॥

हे राजन् आदि जनो! जो दूर से अपने देश को ऐश्वर्य पहुँचाते और दारिद्र्य का विनाश कर लक्ष्मी को उत्पन्न करते हैं, उन उत्तम जनों की निरन्तर रक्षा कीजिये॥२॥

ए॒वेन्नु कं॒ सिन्धु॑मेभिस्ततारे॒वेन्नु कं॑ भे॒दमे॑भिर्जघान। ए॒वेन्नु कं॑ दाशरा॒ज्ञे सु॒दासं॒ प्राव॒दिन्द्रो॒ ब्रह्म॑णा वो वसिष्ठाः॥

जो मनुष्य नौकादिकों से समुद्रादिकों को अच्छे प्रकार शीघ्र तरें, वीरों से शत्रुओं को शीघ्र विनाशें, राजा और राज्य की रक्षा करें, वे मान करने योग्य हों॥३॥

जुष्टी॑ नरो॒ ब्रह्म॑णा वः पितॄ॒णामक्ष॑मव्ययं॒ न किला॑ रिषाथ। यच्छक्व॑रीषु बृह॒ता रवे॒णेन्द्रे॒ शुष्म॒मद॑धाता वसिष्ठाः॥

जो मनुष्य अपनी शक्ति को बढ़ा के दुष्टों को मार धन की वृद्धि से सब के अर्थ जो नष्ट नहीं, उस सुख को प्रीति से बढ़ाते, वे बड़ी कीर्ति को पाते हैं॥४॥

उद्द्यामि॒वेत्तृ॒ष्णजो॑ नाथि॒तासोऽदी॑धयुर्दाशरा॒ज्ञे वृ॒तासः॑। वसि॑ष्ठस्य स्तुव॒त इन्द्रो॑ अश्रोदु॒रुं तृत्सु॑भ्यो अकृणोदु लो॒कम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य सूर्य के समान विद्या और नम्रता से प्रकाशित और तृषित जल के समान ऐश्वर्य के ढूँढ़नेवाले सकल विद्यायुक्त विद्वानों के लिये आनन्द को धारण करते और शूरवीरों के लिये धन भी देते हैं, वे बहुत सुख पाते हैं॥५॥

द॒ण्डाइ॒वेद्गो॒अज॑नास आस॒न्परि॑च्छिन्ना भर॒ता अ॑र्भ॒कासः॑। अभ॑वच्च पुरए॒ता वसि॑ष्ठ॒ आदित्तृत्सू॑नां॒ विशो॑ अप्रथन्त॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य दण्ड के समान जड़बुद्धि हों, वे अच्छी परीक्षा कर न पढ़ाने योग्य और जो बुद्धिमान् हों वे पढ़ाने योग्य होते हैं, जो विद्या व्यवहार में प्रधान हो, वही विद्याविभाग की उत्तम प्रबन्ध से शिक्षा पहुँचावे॥६॥

त्रयः॑ कृण्वन्ति॒ भुव॑नेषु॒ रेत॑स्ति॒स्रः प्र॒जा आर्या॒ ज्योति॑रग्राः। त्रयो॑ घ॒र्मास॑ उ॒षसं॑ सचन्ते॒ सर्वाँ॒ इत्ताँ अनु॑ विदु॒र्वसि॑ष्ठाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे कार्य्य और कारण को कार्य में स्थिर बिजुलियाँ सूर्य आदि ज्योति को प्रकाशित करती हैं, प्रभातवेला और दिन को उत्पन्न करती हैं, वैसे तीन सभा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष साधन देनेवाले प्रकाशों को करती हैं॥७॥

सूर्य॑स्येव व॒क्षथो॒ ज्योति॑रेषां समु॒द्रस्ये॑व महि॒मा ग॑भी॒रः। वात॑स्येव प्रज॒वो नान्येन॒ स्तोमो॑ वसिष्ठा॒ अन्वे॑तवे वः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जिन धार्मिक विद्वानों का सूर्य के समान विद्या और धर्म का प्रकाश, दुष्टाचार पर क्रोध, समुद्र के समान गम्भीरता, पवन के समान अच्छे कर्मों में वेग हो वे मिलने योग्य हैं, यह जानना चाहिये॥८॥

त इन्नि॒ण्यं हृद॑यस्य प्रके॒तैः स॒हस्र॑वल्शम॒भि सं च॑रन्ति। य॒मेन॑ त॒तं प॑रि॒धिं वय॑न्तोऽप्स॒रस॒ उप॑ सेदु॒र्वसि॑ष्ठाः॥

वे ही विद्वान् जन संसार के उपकारी होते हैं, जो दीर्घ ब्रह्मचर्य्य से और आप्त विद्वानों की उत्तेजना से शिक्षा पाय समस्त विद्या पढ़ परमात्मा से व्याप्त सर्व सृष्टिक्रम को प्रवेश करते हैं॥९॥

वि॒द्युतो॒ ज्योतिः॒ परि॑ सं॒जिहा॑नं मि॒त्रावरु॑णा॒ यदप॑श्यतां त्वा। तत्ते॒ जन्मो॒तैकं॑ वसिष्ठा॒गस्त्यो॒ यत्त्वा॑ वि॒श आ॑ज॒भार॑॥

जिस मनुष्य का विद्या में जन्म प्रादुर्भाव होता है, उसकी बुद्धि बिजुली की ज्योति के समान सकल विद्याओं को धारण करती है॥१०॥

उ॒तासि॑ मैत्रावरु॒णो व॑सिष्ठो॒र्वश्या॑ ब्रह्म॒न्मन॒सोऽधि॑ जा॒तः। द्र॒प्सं स्क॒न्नं ब्रह्म॑णा॒ दैव्ये॑न॒ विश्वे॑ दे॒वाः पुष्क॑रे त्वाददन्त॥

जो मनुष्य शुद्धान्तःकरण से प्राण और उदान के तुल्य और निरन्तर मनोहर विद्या को ग्रहण करते हैं, वे विद्वानों के समान आनन्दित होते हैं॥११॥

स प्र॑के॒त उ॒भय॑स्य प्रवि॒द्वान्त्स॒हस्र॑दान उ॒त वा॒ सदा॑नः। यमेन॑ त॒तं प॑रि॒धिं व॑यि॒ष्यन्न॑प्स॒रसः॒ परि॑ जज्ञे॒ वसि॑ष्ठः॥

जिस मनुष्य का माता पिता से प्रथम जन्म, दूसरा आचार्य से विद्या द्वारा होता है, वही आकाश के पदार्थों को जाननेवाला उत्पन्न हुआ पूर्ण विद्वान् अतुल सुख का देनेवाला है॥१२॥

स॒त्रे ह॑ जा॒तावि॑षि॒ता नमो॑भिः कु॒म्भे रेतः॑ सिषिचतुः समा॒नम्। ततो॑ ह॒ मान॒ उदि॑याय॒ मध्या॒त्ततो॑ जा॒तमृषि॑माहु॒र्वसि॑ष्ठम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे स्त्री और पुरुषों से सन्तान उत्पन्न होता है, वैसे अध्यापक और उपदेशकों के पढ़ाने और उपदेश करने से विद्वान् होते हैं॥१३॥

उ॒क्थ॒भृतं॑ साम॒भृतं॑ बिभर्ति॒ ग्रावा॑णं॒ बिभ्र॒त्प्र व॑दा॒त्यग्रे॑। उपै॑नमाध्वं सुमन॒स्यमा॑ना॒ आ वो॑ गच्छाति प्रतृदो॒ वसि॑ष्ठः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्यार्थी सकल वेदवेत्ता कुशिक्षा और अविद्या को नष्ट करनेवाले आप्त विद्वान् की पूर्व अच्छे प्रकार सेवा कर विद्या पाय फिर पढ़ाता है, उसकी सब ज्ञान चाहनेवाले जन विद्या पाने के लिये उपासना करते हैं॥१४॥इस सूक्त में पढ़ाने-पढ़ने और उपदेश सुनाने और सुननेवालों के गुण और कार्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह ऋग्वेद के सातवें मण्डल में दूसरा अनुवाक, तेतीसवाँ सूक्त और पञ्चम अष्टक के तीसरे अध्याय में चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

प्र शु॒क्रैतु॑ दे॒वी म॑नी॒षा अ॒स्मत्सुत॑ष्टो॒ रथो॒ न वा॒जी॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। सब कन्या विदुषियों से ब्रह्मचर्य्य नियम से सब विद्या पढ़ें॥१॥

वि॒दुः पृ॑थि॒व्या दि॒वो ज॒नित्रं॑ शृ॒ण्वन्त्यापो॒ अध॒ क्षर॑न्तीः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मेघमण्डल से जल वेग से पृथिवी को पाकर प्रजा आनन्दित होते हैं, वैसे जो कन्या पढ़ानेवाली से भूगर्भादि विद्या को पाकर पति आदि को निरन्तर सुख देती हैं, वे अत्यन्त श्रेष्ठ होती हैं॥२॥

आप॑श्चिदस्मै॒ पिन्व॑न्त पृ॒थ्वीर्वृ॒त्रेषु॒ शूरा॒ मंस॑न्त उ॒ग्राः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो कन्या जल के समान कोमलत्वादि गुणयुक्त हैं, पृथिवी के समान सहनशील और शूरों के समान उत्साहिनी विद्याओं को ग्रहण करती हैं, वे सौभाग्यवती होती हैं॥३॥

आ धू॒र्ष्व॑स्मै॒ दधा॒ताश्वा॒निन्द्रो॒ न व॒ज्री हिर॑ण्यबाहुः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सारथी घोड़ों को रथ में जोड़ कर नियम से चलाता है, वैसे कन्या आत्मा अन्तःकरण और इन्द्रियों को विद्या की प्राप्ति से व्यवहार में निरन्तर जोड़ कर नियम से चलावें॥४॥

अ॒भि प्र स्था॒ताहे॑व य॒ज्ञं याते॑व॒ पत्म॒न्त्मना॑ हिनोत॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे कन्याओ! जैसे दिन अनुकूल क्रम से जाते और आते हैं और जैसे बटोही जन नित्य चलते हैं, वैसे ही अनुकूल क्रम से विद्याप्राप्ति मार्ग से विद्याप्राप्तिरूप यज्ञ को बढ़ाओ॥५॥

त्मना॑ स॒मत्सु॑ हि॒नोत॑ य॒ज्ञं दधा॑त के॒तुं जना॑य वी॒रम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे शूरवीर धीमान् बुद्धिमान् राजा पुरुष उत्तम यत्न से संग्रामों को विशेषता से जीतते हैं, वैसे कन्याओं को इन्द्रियाँ जीत और विद्याओं को पाकर विजय की विशेष भावना करनी चाहिये॥६॥

उद॑स्य॒ शुष्मा॑द्भा॒नुर्नार्त॒ बिभ॑र्ति भा॒रं पृ॑थि॒वी न भूम॑॥

जैसे विद्वान् जन इस विद्याबोध के बल से सब सुख को धारण करते हैं, वैसे ही कन्याजन विद्याबल से सब आनन्द को पाती हैं॥७॥

ह्वया॑मि दे॒वाँ अया॑तुरग्ने॒ साध॑न्नृ॒तेन॒ धियं॑ दधामि॥

जो विद्वानों को बुला के और उनका सत्कार कर सत्य आचार से विद्या को धारण करते हैं, वे विद्वान् होते हैं॥८॥

अ॒भि वो॑ दे॒वीं धियं॑ दधिध्वं॒ प्र वो॑ देव॒त्रा वाचं॑ कृणुध्वम्॥

मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों का अनुकरण कर बुद्धि, विद्या और वाणी को धारण करें॥९॥

आ च॑ष्ट आसां॒ पाथो॑ न॒दीनां॒ वरु॑ण उ॒ग्रः स॒हस्र॑चक्षाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वान् सूर्य के तुल्य अविद्या को निवार के विद्या के प्रकाश को उत्पन्न करता है, वही यहाँ माननीय होता है॥१०॥

राजा॑ रा॒ष्ट्रानां॒ पेशो॑ न॒दीना॒मनु॑त्तमस्मै क्ष॒त्रं वि॒श्वायु॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा न्यायकारी विद्वान् होता है, उसके प्रति समुद्र को नदी जैसे, वैसे प्रजा अनुकूल होकर ऐश्वर्य्य को उत्पन्न कराती हैं और इस राजा को पूरी आयु भी होती है॥११॥

अवि॑ष्टो अ॒स्मान्विश्वा॑सु वि॒क्ष्वद्युं॑ कृणोत॒ शंसं॑ निनि॒त्सोः॥

राजजन प्रजाओं में वर्त्तमान निन्दक जनों का निवारण कर प्रशंसा करनेवालों की रक्षा कर और प्रजाजनों में पिता के समान वर्त्त कर अविद्यान्धकार को निवारण करें॥१२॥

व्ये॑तु दि॒द्युद्द्वि॒षामशे॑वा यु॒योत॒ विष्व॒ग्रप॑स्त॒नूना॑म्॥

हे राजजनो! तुम, जो धार्मिक सज्जनों को पीड़ा देवें उनको दण्ड से पवित्र करो, जिससे सब ओर से सबको सुख प्राप्त हो॥१३॥

अवी॑न्नो अ॒ग्निर्ह॒व्यान्नमो॑भिः॒ प्रेष्ठो॑ अस्मा अधायि॒ स्तोमः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य स्वप्रकाश से सब की रक्षा करता है, वैसे राजा न्याय के प्रकाश से सब प्रजा की रक्षा करे॥१४॥

स॒जूर्दे॒वेभि॑र॒पां नपा॑तं॒ सखा॑यं कृध्वं शि॒वो नो॑ अस्तु॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सूर्य आदि पदार्थ जगत् में मित्र के समान वर्त कर सुखकारी होते हैं, वैसे ही राजजन सब के मित्र होकर मङ्गलकारी होते हैं॥१५॥

अ॒ब्जामु॒क्थैरहिं॑ गृणीषे बु॒ध्ने न॒दीनां॒ रजः॑सु॒ षीद॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजपुरुषो! जैसे सूर्य वर्षा से नदियों को पूर्ण करता है, वैसे धन-धान्यों से तुम प्रजाओं को पूर्ण करो॥१६॥

मा नोऽहि॑र्बु॒ध्न्यो॑ रि॒षे धा॒न्मा य॒ज्ञो अ॑स्य स्रिधदृता॒योः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन् आदि मनुष्यो! जैसे अवर्षण न हो, न्यायव्यवहार न नष्ट हो, वैसा तुम विधान करो॥१७॥

उ॒त न॑ ए॒षु नृषु॒ श्रवो॑ धुः॒ प्र रा॒ये य॑न्तु॒ शर्ध॑न्तो अ॒र्यः॥

मनुष्यों को चाहिये कि सज्जनों के निकट और दुष्टों के दूर रह कर लक्ष्मी की उन्नति करें॥१८॥

तप॑न्ति॒ शत्रुं॒ स्व१॒॑र्ण भूमा॑ म॒हासे॑नासो॒ अमे॑भिरेषाम्॥

हे राजन्! यदि आपसे योद्धा शूरवीर जनों की सेना सत्कार कर रक्खी जाय तो आप के शत्रुजन बिला जायें और सुख निरन्तर बढ़े॥१९॥

आ यन्नः॒ पत्नी॒र्गम॒न्त्यच्छा॒ त्वष्टा॑ सुपा॒णिर्दधा॑तु वी॒रान्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पतिव्रता स्त्री स्त्रीव्रत पति जन परस्पर की प्रीति से रक्षा करते हैं, वैसे राजा धार्मिकों की, अमात्य और भृत्यजन धार्मिक राजा की निरन्तर रक्षा करें॥२०॥

प्रति॑ नः॒ स्तोमं॒ त्वष्टा॑ जुषेत॒ स्याद॒स्मे अ॒रम॑तिर्वसू॒युः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जहाँ राजा अमात्यभृत्य और प्रजाजन एक-दूसरे की उन्नति को करना चाहते हैं, वहाँ समस्त ऐश्वर्य, सुख और वृद्धि होती है॥२१॥

ता नो॑ रासन्राति॒षाचो॒ वसू॒न्या रोद॑सी वरुणा॒नी शृ॑णोतु। वरू॑त्रीभिः सुशर॒णो नो॑ अस्तु॒ त्वष्टा॑ सु॒दत्रो॒ वि द॑धातु॒ रायः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजपुरुष सूर्य और भूमि के तुल्य प्रजाजनों को धनी करते, उनके न्याय करने को बातें सुनते और यथावत् पुरुषार्थ से लक्ष्मीवान् करते हैं, वे ही पूर्ण सुखवाले होते हैं॥२२॥

तन्नो॒ रायः॒ पर्व॑ता॒स्तन्न॒ आप॒स्तद्रा॑ति॒षाच॒ ओष॑धीरु॒त द्यौः। वन॒स्पति॑भिः पृथि॒वी स॒जोषा॑ उ॒भे रोद॑सी॒ परि॑ पासतो नः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। पढ़ने और सुननेवाले जन पढ़ाने और उपदेश करानेवालों के प्रति ऐसी प्रार्थना करें, हम लोगों को आप ऐसा बोध करावें कि जिससे हम लोग सब सृष्टि के सकाश से सुख की उन्नति कर सकें॥२३॥

अनु॒ तदु॒र्वी रोद॑सी जिहाता॒मनु॑ द्यु॒क्षो वरु॑ण॒ इन्द्र॑सखा। अनु॒ विश्वे॑ म॒रुतो॒ ये स॒हासो॑ रा॒यः स्या॑म ध॒रुणं॑ धि॒यध्यै॑॥

हे मनुष्यो! जैसे सृष्टिस्थ भूमि आदि पदार्थ सब को धारण कर सुख देते हैं, वैसे ही आप हों॥२४॥

तन्न॒ इन्द्रो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॒ग्निराप॒ ओष॑धीर्व॒निनो॑ जुषन्त। शर्म॑न्त्स्याम म॒रुता॑मु॒पस्थे॑ यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

मनुष्यों को ऐसी इच्छा करनी चाहिये कि विद्वानों के सङ्ग से जैसे बिजुली आदि पदार्थ अपने कामों को सेवें, वैसे हम लोग अनुष्ठान करें॥२५॥इस सूक्त में अध्येता, अध्यापक, स्त्री, पुरुष, राजा, प्रजा, सेना, भृत्य और विश्वेदेवों के गुण और कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चौंतीसवाँ सूक्त और सत्ताईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

शं न॑ इन्द्रा॒ग्नी भ॑वता॒मवो॑भिः॒ शं न॒ इन्द्रा॒वरु॑णा रा॒तह॑व्या। शमिन्द्रा॒सोमा॑ सुवि॒ताय॒ शं योः शं न॒ इन्द्रा॑पू॒षणा॒ वाज॑सातौ॥

हे जगदीश्वर! आप की कृपा से, विद्वानों के सङ्ग से और अपने पुरुषार्थ से आप की रची हुई सृष्टि में वर्त्तमान बिजुली आदि पदार्थों से हम लोग उपकार करना कराना चाहते हैं, सो यह हम लोगों का प्रयत्न सफल हो॥१॥

शं नो॒ भगः॒ शमु॑ नः॒ शंसो॑ अस्तु॒ शं नः॒ पुरं॑धिः॒ शमु॑ सन्तु॒ रायः॑। शं नः॑ स॒त्यस्य॑ सु॒यम॑स्य॒ शंसः॒ शं नो॑ अर्य॒मा पु॑रुजा॒तो अ॑स्तु॥

हे मनुष्यो! तुम जैसे ऐश्वर्य, पुण्यकीर्त्ति, अवकाश, धन, धर्म, योग और न्यायाधीश सुख करनेवाले हों, वैसा अनुष्ठान करो॥३॥

शं नो॑ धा॒ता शमु॑ ध॒र्ता नो॑ अस्तु॒ शं न॑ उरू॒ची भ॑वतु स्व॒धाभिः॑। शं रोद॑सी बृह॒ती शं नो॒ अद्रिः॒ शं नो॑ दे॒वानां॑ सु॒हवा॑नि सन्तु॥

जो मनुष्य पुष्टि करनेवालों से उपकार लेना जानते हैं, वे सब सुखों को पाते हैं॥३॥

शं नो॑ अ॒ग्निर्ज्योति॑रनीको अस्तु॒ शं नो॑ मि॒त्रावरु॑णाव॒श्विना॒ शम्। शं नः॑ सु॒कृतां॑ सुकृ॒तानि॑ सन्तु॒ शं न॑ इषि॒रो अ॒भि वा॑तु॒ वातः॑॥

जो अग्नि और वायु आदि पदार्थों से कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वे समग्र ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं॥४॥

शं नो॒ द्यावा॑पृथि॒वी पू॒र्वहू॑तौ॒ शम॒न्तरि॑क्षं दृ॒शये॑ नो अस्तु। शं न॒ ओष॑धीर्व॒निनो॑ भवन्तु॒ शं नो॒ रज॑स॒स्पति॑रस्तु जि॒ष्णुः॥

जो सब सृष्टिस्थ पदार्थों को सुख के [लिये] संयुक्त करने को योग्य होते हैं, वे ही उत्तम विद्वान् होते हैं॥५॥

शं न॒ इन्द्रो॒ वसु॑भिर्दे॒वो अ॑स्तु॒ शमा॑दि॒त्येभि॒र्वरु॑णः सु॒शंसः॑। शं नो॑ रु॒द्रो रु॒द्रेभि॒र्जला॑षः॒ शं न॒स्त्वष्टा॒ ग्नाभि॑रि॒ह शृ॑णोतु॥

जो पृथिवी, आदित्य और वायु की विद्या से ईश्वर, जीव और प्राणों को जान यहाँ इनकी विद्या को पढ़ा परीक्षा कर सब को विद्वान् और उद्योगी करते हैं, वे इस संसार में किस-किस ऐश्वर्य को नहीं प्राप्त होते हैं॥६॥

शं नः॒ सोमो॑ भवतु॒ ब्रह्म॒ शं नः॒ शं नो॒ ग्रावा॑णः॒ शमु॑ सन्तु य॒ज्ञाः। शं नः॒ स्वरू॑णां मि॒तयो॑ भवन्तु॒ शं नः॑ प्र॒स्वः१॒॑ शम्व॑स्तु॒ वेदिः॑॥

जो मनुष्य विद्या, ओषधी, धन और यज्ञादि से जगत् का सुख के साथ उपकार करते हैं, वे अतुल सुख पाते हैं॥७॥

शं नः॒ सूर्य॑ उरु॒चक्षा॒ उदे॑तु॒ शं न॒श्चत॑स्रः प्र॒दिशो॑ भवन्तु। शं नः॒ पर्व॑ता ध्रुवयो॑ भवन्तु॒ शं नः॒ सिन्ध॑वः॒ शमु॑ स॒न्त्वापः॑॥

जो जगदीश्वर ने बनाये हुए सूर्यादिकों से उपकार ले सकते हैं, वे इस जगत् में श्री, राज्य और कीर्तिवाले होते हैं॥८॥

शं नो॒ अदि॑तिर्भवतु व्र॒तेभिः॒ शं नो॑ भवन्तु म॒रुतः॑ स्व॒र्काः। शं नो॒ विष्णुः॒ शमु॑ पू॒षा नो॑ अस्तु॒ शं नो॑ भ॒वित्रं॒ शम्व॑स्तु वा॒युः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। माता आदि विदुषियों को कन्या और विद्वान् पिता आदि को पुत्र अच्छे प्रकार शिक्षा देने योग्य हैं, जिससे यह भूमि से ले के ईश्वर पर्यन्त पदार्थों की विद्याओं को पाके धार्मिक होकर सब मनुष्यों को निरन्तर आनन्दित करें॥९॥

शं नो॑ दे॒वः स॑वि॒ता त्राय॑माणः॒ शं नो॑ भवन्तू॒षसो॑ विभा॒तीः। शं नः॑ प॒र्जन्यो॑ भवतु प्र॒जाभ्यः॒ शं नः॒ क्षेत्र॑स्य॒ पति॑रस्तु शं॒भुः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वानों को वेदादि विद्याओं से परमेश्वर आदि पदार्थों के गुण-कर्म-स्वभाव विद्यार्थियों के प्रति यथावत् प्रकाश करने चाहियें, जिससे सबों से उपकार ले सकें॥१०॥

शं नो॑ दे॒वा वि॒श्वेदे॑वा भवन्तु॒ शं सर॑स्वती स॒ह धी॒भिर॑स्तु। शम॑भि॒षाचः॒ शमु॑ राति॒षाचः॒ शं नो॑ दि॒व्याः पार्थि॑वाः॒ शं नो॒ अप्याः॑॥

मनुष्यों को ऐसा आचार करना चाहिये जिससे सब को सब विद्वान् जन, सुन्दर बुद्धि और वाणी, विद्या देनेवाले योगीजन राजा और शिल्पी जन तथा दिव्य पदार्थ प्राप्त हों॥११॥

शं नः॑ स॒त्यस्य॒ पत॑यो भवन्तु॒ शं नो॒ अर्व॑न्तः॒ शमु॑ सन्तु॒ गावः॑। शं न॑ ऋ॒भवः॑ सु॒कृतः॑ सु॒हस्ताः॒ शं नो॑ भवन्तु पि॒तरो॒ हवे॑षु॥

मनुष्यों को ऐसे शील की धारणा करनी चाहिये जिससे आप्त सज्जन प्रसन्न हों, जिनकी प्रीति से सब पशु और विद्वान् पितृजन प्रसन्न और सुख करनेवाले होवें॥१२॥

शं नो॑ अ॒ज एक॑पाद्दे॒वो अ॑स्तु॒ शं नोऽहि॑र्बु॒ध्न्यः१॒॑ शं स॑मु॒द्रः। शं नो॑ अ॒पां नपा॑त्पे॒रुर॑स्तु॒ शं नः॒ पृश्नि॑र्भवतु दे॒वगो॑पा॥

हे अध्यापक और उपदेशको! तुम हम लोगों को जन्ममरणादि दोषरहित ईश्वर, मेघ, समुद्र और नौका की विद्या का ग्रहण कराइये, जिससे हम लोग सब के रक्षक हों॥१३॥

आ॒दि॒त्या रु॒द्रा वस॑वो जुषन्ते॒दं ब्रह्म॑ क्रि॒यमा॑णं॒ नवी॑यः। शृ॒ण्वन्तु॑ नो दि॒व्याः पार्थि॑वासो॒ गोजा॑ता उ॒त ये य॒ज्ञिया॑सः॥

मनुष्यों को चाहिये कि धार्मिक विद्वानों को बुलाय सत्कार कर अन्नादिकों से अच्छे प्रकार तृप्त कर अपना पढ़ा अच्छे प्रकार सुना, शेष इन से सुनें, जिससे भ्रमरहित सब हों॥१४॥

ये दे॒वानां॑ य॒ज्ञिया॑ य॒ज्ञिया॑नां॒ मनो॒र्यज॑त्रा अ॒मृता॑ ऋत॒ज्ञाः। ते नो॑ रासन्तामुरुगा॒यम॒द्य यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

हे मनुष्यो! जो अत्यन्त विद्वान् अत्यन्त शिल्पी सत्य आचरण करनेवाले जीवन्मुक्त ब्रह्मवेत्ता जन हम लोगों को विद्या और सुन्दर शिक्षा से निरन्तर उन्नति देते हैं, उनको हम लोग रखकर सदा सेवें॥१५॥इस सूक्त में सर्व सुखों की प्राप्ति के लिये सृष्टिविद्या और विद्वानों के सङ्ग का उपदेश किया, इससे इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह ऋग्वेद के पञ्चमाष्टक में तीसरा अध्याय और तीसवाँ वर्ग, सप्तम मण्डल में पैतीसवाँ सूक्त समाप्त हुआ॥

प्र ब्रह्मै॑तु॒ सद॑नादृ॒तस्य॒ वि र॒श्मिभिः॑ ससृजे॒ सूर्यो॒ गाः। वि सानु॑ना पृथि॒वी स॑स्र उ॒र्वी पृ॒थु प्रती॑क॒मध्येधे॑ अ॒ग्निः॥

जो जगदीश्वर आप ही प्रकाशमान और सूर्यादिकों का प्रकाश करने वा बनानेवाला जगत् के प्रकाश के लिये अग्नि और सूर्यलोक को रचता है, उसी की उपासना कर सत्य आचरण से मनुष्य ऐश्वर्य को प्राप्त होवें॥१॥

इ॒मां वां॑ मित्रावरुणा सुवृ॒क्तिमिषं॒ न कृ॑ण्वे असुरा॒ नवी॑यः। इ॒नो वा॑म॒न्यः प॑द॒वीरद॑ब्धो॒ जनं॑ च मि॒त्रो य॑तति ब्रुवा॒णः॥

हे मनुष्यो! आप जो सब के लिये अलग सर्वव्यापी सब का मित्र जगदीश्वर सब के हित के लिये सदैव प्रवृत्त है, उसी की उपासना कर मोक्ष पद को प्राप्त होवें॥२॥

आ वात॑स्य॒ ध्रज॑तो रन्त इ॒त्या अपी॑पयन्त धे॒नवो॒ न सूदाः॑। म॒हो दि॒वः सद॑ने॒ जाय॑मा॒नोऽचि॑क्रदद्वृष॒भः सस्मि॒न्नूध॑न्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे प्रकाशमान पदार्थों में उत्पन्न हुआ रवि अन्तरिक्ष में प्रकाशित होता है वा जिस अन्तरिक्ष में सब प्राणी रमते हैं, उसी में सब सुख को प्राप्त होते हैं॥३॥

गि॒रा य ए॒ता यु॒नज॒द्धरी॑ त॒ इन्द्र॑ प्रि॒या सु॒रथा॑ शूर धा॒यू। प्र यो म॒न्युं रिरि॑क्षतो मि॒नात्या सु॒क्रतु॑मर्य॒मणं॑ ववृत्याम्॥

हे राजन्! जो रथ आदि के चलाने में कुशल, राजप्रिय, विद्वान् हों, उनको आप न्यायकारी करो॥४॥

यज॑न्ते अस्य स॒ख्यं वय॑श्च नम॒स्विनः॒ स्व ऋ॒तस्य॒ धाम॑न्। वि पृक्षो॑ बाबधे॒ नृभिः॒ स्तवा॑न इ॒दं नमो॑ रु॒द्राय॒ प्रेष्ठ॑म्॥

जो अच्छे पुरुष सङ्ग करनेवाले, सब के मित्र और सब का दीर्घ जीवन अन्नादि ऐश्वर्य्य को करना चाहते हैं, वे ही लोक में अत्यन्त प्यारे होते हैं॥५॥

आ यत्सा॒कं य॒शसो॑ वावशा॒नाः सर॑स्वती स॒प्तथी॒ सिन्धु॑माता। याः सु॒ष्वय॑न्त सु॒दुघाः॑ सुधा॒रा अ॒भि स्वेन॒ पय॑सा॒ पीप्या॑नाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे छः अर्थात् पाँच ज्ञानेन्द्रिय और मन के बीच कर्मेन्द्रिय वाणी सुन्दर शोभायुक्त है और जैसे जल से पूर्ण नदी शोभा पाती है, वैसे विद्या और सत्य की कामना करती हुई पूर्ण कामनावाली स्त्री श्रेष्ठ और मान करने योग्य हीती है॥६॥

उ॒त त्ये नो॑ म॒रुतो॑ मन्दसा॒ना धियं॑ तो॒कं च॑ वा॒जिनो॑ऽवन्तु। मा नः॒ परि॑ ख्य॒दक्ष॑रा॒ चर॒न्त्यवी॑वृध॒न्युज्यं॒ ते र॒यिं नः॑॥

वे ही विद्वान् जन अति उत्तम हैं, जो सब के पुत्र और कन्याओं को ब्रह्मचर्य्य से रक्षा कर और बढ़ा कर उत्तम ज्ञाता करते हैं॥७॥

प्र वो॑ म॒हीम॒रम॑तिं कृणुध्वं॒ प्र पू॒षणं॑ विद॒थ्यं१॒॑ न वी॒रम्। भगं॑ धि॒यो॑ऽवि॒तारं॑ नो अ॒स्याः सा॒तौ वाजं॑ राति॒षाचं॒ पुरं॑धिम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् जन अध्यापक और उपदेशक सब की बुद्धि आयु विद्या की वृद्धि और शूरवीरों के समान सर्वदा रक्षा करते हैं, वैसे उन की सेवा और सत्कार सब को सदा करने योग्य हैं॥८॥

अच्छा॒यं वो॑ मरुतः॒ श्लोक॑ ए॒त्वच्छा॒ विष्णुं॑ निषिक्त॒पामवो॑भिः। उ॒त प्र॒जायै॑ गृण॒ते वयो॑ धुर्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

जानने की इच्छावालों को वेदवेत्ता ब्रह्म के जाननेवाले अध्यापक और उपदेशकों को प्राप्त होकर परमेश्वर आदि की विद्याओं का संग्रह कर सर्वदैव सब प्रकार से सब की रक्षा और उन्नति बढ़ानी चाहिये॥९॥इस सूक्त में विश्वेदेवों के कर्म और गुणों का गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की सङ्गति इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ जाननी चाहिये॥यह छत्तीसवाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

आ वो॒ वाहि॑ष्ठो वहतु स्त॒वध्यै॒ रथो॑ वाजा ऋभुक्षणो॒ अमृ॑क्तः। अ॒भि त्रि॑पृ॒ष्ठैः सव॑नेषु॒ सोमै॒र्मदे॑ सुशिप्रा म॒हभिः॑ पृणध्वम्॥

हे विद्वानो! तुम हम लोगों को रथ से चाहे हुए स्थान को पहुँचने के समान पढ़ाने से विद्या को पहुँचाओ॥१॥

यू॒यं ह॒ रत्नं॑ म॒घव॑त्सु धत्थ स्व॒र्दृश॑ ऋभुक्षणो॒ अमृ॑क्तम्। सं य॒ज्ञेषु॑ स्वधावन्तः पिबध्वं॒ वि नो॒ राधां॑सि म॒तिभि॑र्दयध्वम्॥

जो विद्वान् जन हैं, वे प्रजाओं में ब्रह्मचर्य्य विद्या उत्तम क्रिया बड़ी-बड़ी ओषधियों और धनों को बढ़वाकर सुखी हों॥२॥

उ॒वोचि॑थ॒ हि म॑घवन्दे॒ष्णं म॒हो अर्भ॑स्य॒ वसु॑नो विभा॒गे। उ॒भा ते॑ पू॒र्णा वसु॑ना॒ गभ॑स्ती॒ न सू॒नृता॒ नि य॑मते वस॒व्या॑॥

जो धनाढ्य जन बहुत वा थोड़े धन वा सुपात्र और कुपात्र वा धर्म और अधर्म के विभाग में सुपात्र और धर्म की वृद्धि के लिये धन दान करते हैं, उन की कीर्ति चिरकाल तक ठहरनेवाली होती है॥३॥

त्वमि॑न्द्र॒ स्वय॑शा ऋभु॒क्षा वाजो॒ न सा॒धुरस्त॑मे॒ष्यृक्वा॑। व॒यं नु ते॑ दा॒श्वांसः॑ स्याम॒ ब्रह्म॑ कृ॒ण्वन्तो॑ हरिवो॒ वसि॑ष्ठाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो अच्छे मार्ग में स्थिर, साधु जनों के समान धर्मों का आचरण करते हैं, वे ऐश्वर्य के साथ हो अर्थात् ऐश्वर्य्यवान् होकर दानशील होते हैं॥४॥

सनि॑तासि प्र॒वतो॑ दा॒शुषे॑ चि॒द्याभि॒र्विवे॑षो हर्यश्व धी॒भिः। व॒व॒न्मा नु ते॒ युज्या॑भिरू॒ती क॒दा न॑ इन्द्र रा॒य आ द॑शस्येः॥

मनुष्यों को विद्वानों से सदा उत्तम विद्या लेनी चाहिये और विद्वान् भी यथावत् अच्छे प्रकार देवें॥५॥

वा॒सय॑सीव वे॒धस॒स्त्वं नः॑ क॒दा न॑ इन्द्र॒ वच॑सो बुबोधः। अस्तं॑ ता॒त्या धि॒या र॒यिं सु॒वीरं॑ पृ॒क्षो नो॒ अर्वा॒ न्यु॑हीत वा॒जी॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। सब मनुष्य विद्वानों के प्रति ऐसी प्रार्थना करें, आप लोग हमें कब विद्वान् करके धन-धान्य, स्थान आदि पदार्थ और ऐश्वर्य्य को प्राप्त करावेंगे॥६॥

अ॒भि यं दे॒वी निर्ऋ॑तिश्चि॒दीशे॒ नक्ष॑न्त॒ इन्द्रं॑ श॒रदः॑ सु॒पृक्षः॑। उप॑ त्रिब॒न्धुर्ज॒रद॑ष्टिमे॒त्यस्व॑वेशं॒ यं कृ॒णव॑न्त॒ मर्ताः॑॥

हे मनुष्यो! तुम जैसे शरीर वाणी और मन से उत्पन्न हुए तीन प्रकार के सुख को प्राप्त विद्वान् जन हृदय से चाही हुई भार्या को प्राप्त होता है, स्त्री भी प्रिय पति को प्राप्त होकर आनन्दित होती वा जैसे ऋतु अपने-अपने समय को प्राप्त होकर सबको आनन्दित करती वा जैसे स्वभाव से ही कौमार आदि अवस्था आती हैं, वैसे ही परस्पर में प्रीति कर प्रयत्न करो॥७॥

आ नो॒ राधां॑सि सवितः स्त॒वध्या॒ आ रायो॑ यन्तु॒ पर्व॑तस्य रा॒तौ। सदा॑ नो दि॒व्यः पा॒युः सि॑षक्तु यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

जो सत्य भाव से परमेश्वर की उपासना कर न्याययुक्त व्यवहार से धन पाने को चाहते हैं और जो सदा आप्त अति सज्जन विद्वान् का सङ्ग सेवते हैं, वे दारिद्र्य कभी नहीं सेवते हैं॥८॥इस सूक्त में विश्वेदेवों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सैंतीसवाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ॥

उदु॒ ष्य दे॒वः स॑वि॒ता य॑याम हिर॒ण्ययी॑म॒मतिं॒ यामशि॑श्रेत्। नू॒नं भगो॒ हव्यो॒ मानु॑षेभि॒र्वि यो रत्ना॑ पुरू॒वसु॒र्दधा॑ति॥

जो मनुष्य परमेश्वर की उपासना करते हैं, वे श्रेष्ठ लक्ष्मी को प्राप्त होते हैं॥१॥

उदु॑ तिष्ठ सवितः श्रु॒ध्य१॒॑स्य हिर॑ण्यपाणे॒ प्रभृ॑तावृ॒तस्य॑। व्यु१॒॑र्वीं पृ॒थ्वीम॒मतिं॑ सृजा॒न आ नृभ्यो॑ मर्त॒भोज॑नं सुवा॒नः॥

जो सत्यभाव से धर्म का अनुष्ठान कर योग का अभ्यास करते हैं, उनके आत्मा में परमात्मा प्रकाशित होता है, जिस ईश्वर ने समस्त जगत् उत्पन्न कर मनुष्यादिकों का अन्नादि से हित सिद्ध किया, उसको छोड़ किसी और की उपासना मनुष्य कभी न करें॥२॥

अपि॑ ष्टु॒तः स॑वि॒ता दे॒वो अ॑स्तु॒ यमा चि॒द्विश्वे॒ वस॑वो गृ॒णन्ति॑। स नः॒ स्तोमा॑न्नम॒स्य१॒॑श्चनो॑ धा॒द्विश्वे॑भिः पातु पा॒युभि॒र्नि सू॒रीन्॥

हे मनुष्यो! जिस ईश्वर की सब धर्मात्मा सज्जन प्रशंसा करते हैं, जो हम लोगों की निरन्तर रक्षा करता, हम लोगों के लिये समस्त विश्व का विधान करता है, उसी की हम लोग सदा प्रशंसा करें॥३॥

अ॒भि यं दे॒व्यदि॑तिर्गृ॒णाति॑ स॒वं दे॒वस्य॑ सवि॒तुर्जु॑षा॒णा। अ॒भि स॒म्राजो॒ वरु॑णो गृणन्त्य॒भि मि॒त्रासो॑ अर्य॒मा स॒जोषाः॑॥

हे मनुष्यो! तुम उसी प्रशंसा करने योग्य परमेश्वर की स्तुति करो, जिस की स्तुति करके विदुषी स्त्री राजा और विद्वान् जन चाहा हुआ फल पाते हैं॥४॥

अ॒भि ये मि॒थो व॒नुषः॒ सप॑न्ते रा॒तिं दि॒वो रा॑ति॒षाचः॑ पृथि॒व्याः। अहि॑र्बु॒ध्न्य॑ उ॒त नः॑ शृणोतु॒ वरू॒त्र्येक॑धेनुभि॒र्नि पा॑तु॥

जो हम लोगों को विद्याहीन देख निन्दा करते और विद्वान् देख प्रशंसा करते और एकता के लिये प्रेरणा देते हैं, वे ही हमारे कल्याण करनेवाले होते हैं॥५॥

अनु॒ तन्नो॒ जास्पति॑र्मंसीष्ट॒ रत्नं॑ दे॒वस्य॑ सवि॒तुरि॑या॒नः। भग॑मु॒ग्रोऽव॑से॒ जोह॑वीति॒ भग॒मनु॑ग्रो॒ अध॑ याति॒ रत्न॑म्॥

हे मनुष्यो! जो राजा परमेश्वर की सृष्टि में सब की रक्षा के लिये प्रवृत्त होता है, वही सब ऐश्वर्य को पाकर सब को आनन्दित कराता है॥६॥

शं नो॑ भवन्तु वा॒जिनो॒ हवे॑षु दे॒वता॑ता मि॒तद्र॑वः स्व॒र्काः। ज॒म्भय॒न्तोऽहिं॒ वृकं॒ रक्षां॑सि॒ सने॑म्य॒स्मद्यु॑यव॒न्नमी॑वाः॥

जो दुष्ट आचारवाले प्राणी, रोग और शत्रुओं को निवार के सब के सुख करनेवाले होते हैं, वे ही जगत् पूज्य होते हैं॥७॥

वाजे॑वाजेऽवत वाजिनो नो॒ धने॑षु विप्रा अमृता ऋतज्ञाः। अ॒स्य मध्वः॑ पिबत मा॒दय॑ध्वं तृ॒प्ता या॑त प॒थिभि॑र्देव॒यानैः॑॥

विद्वानों के प्रति ईश्वर की यह आज्ञा है कि तुम धार्मिक विद्वान् होकर सब की रक्षा निरन्तर करो और आनन्दित तथा बड़ी ओषधियों के रस से नीरोग हुए सब को आनन्दित और तृप्त कर धर्मात्माओं के मार्गों से आप चलते हुए औरों को निरन्तर उन्हीं मार्गों से चलावें॥८॥इस सूक्त मे सविता, ऐश्वर्य, विद्वान् और विदुषियों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह अड़तीसवाँ सूक्त और पाँचवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

ऊ॒र्ध्वो अ॒ग्निः सु॑म॒तिं वस्वो॑ अश्रेत्प्रती॒ची जू॒र्णिर्दे॒वता॑तिमेति। भे॒जाते॒ अद्री॑ र॒थ्ये॑व॒ पन्था॑मृ॒तं होता॑ न इषि॒तो य॑जाति॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जहाँ स्त्री-पुरुष ऐसे हैं कि जिन्होंने बुद्धि उत्पन्न की है, अच्छे काम में आचरण करते हैं, वहाँ सब लक्ष्मी विराजमान है॥१॥

प्र वा॑वृजे सुप्र॒या ब॒र्हिरे॑षा॒मा वि॒श्पती॑व॒ बीरि॑ट इयाते। वि॒शाम॒क्तोरु॒षसः॑ पू॒र्वहू॑तौ वा॒युः पू॒षा स्व॒स्तये॑ नि॒युत्वा॑न्॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। सदैव जो स्त्री-पुरुष न्यायकारी राजा के समानप्रजा पालना, ईश्वर के समान न्यायाचरण, पवन के समान प्रिय पदार्थ पहुँचाना और संन्यासी के तुल्य पक्षपात और मोहादि दोष त्याग करनेवाले होते हैं, वे सर्वार्थ सिद्ध हों॥२॥

ज्म॒या अत्र॒ वस॑वो रन्त दे॒वा उ॒राव॒न्तरि॑क्षे मर्जयन्त शु॒भ्राः। अ॒र्वाक्प॒थ उ॑रुज्रयः कृणुध्वं॒ श्रोता॑ दू॒तस्य॑ ज॒ग्मुषो॑ नो अ॒स्य॥

हे विद्वानो! तुम धर्ममार्गों को शुद्ध प्रकाशित कर दूत के समान सब जगह घूम, धर्म का विस्तार कर सब मनुष्यों को विद्या सुखयुक्त करो॥३॥

ते हि य॒ज्ञेषु॑ य॒ज्ञिया॑स॒ ऊमाः॑ स॒धस्थं॒ विश्वे॑ अ॒भि सन्ति॑ दे॒वाः। ताँ अ॑ध्व॒र उ॑श॒तो य॑क्ष्यग्ने श्रु॒ष्टी भगं॒ नास॑त्या॒ पुरं॑धिम्॥

हे मनुष्यो! जो सत्यविद्या और धर्म के प्रकाश करनेवाले वेदवेत्ता अध्यापक, उपदेशक, विद्वान् सब मनुष्य आदि की उन्नति करते हैं, वे ही सर्वदा सर्वथा सब को साकार करने योग्य होते हैं॥४॥

आग्ने॒ गिरो॑ दि॒व आ पृ॑थि॒व्या मि॒त्रं व॑ह॒ वरु॑ण॒मिन्द्र॑म॒ग्निम्। आर्य॒मण॒मदि॑तिं॒ विष्णु॑मेषां॒ सर॑स्वती म॒रुतो॑ मादयन्ताम्॥

जो मनुष्य बिजुली आदि की विद्या को प्राप्त होकर औरों को प्राप्त कराते हैं, वे सब का आनन्द करनेवाले होते हैं॥५॥

र॒रे ह॒व्यं म॒तिभि॑र्य॒ज्ञिया॑नां॒ नक्ष॒त्कामं॒ मर्त्या॑ना॒मसि॑न्वन्। धाता॑ र॒यिम॑विद॒स्यं स॑दा॒सां स॑क्षी॒महि॒ युज्ये॑भि॒र्नु दे॒वैः॥

जो विद्वान् जिन मनुष्यों का काम पूरा करते हैं, वे पूर्णकाम होते हैं॥६॥

नू रोद॑सी अ॒भिष्टु॑ते॒ वसि॑ष्ठैर्ऋ॒तावा॑नो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॒ग्निः। यच्छ॑न्तु च॒न्द्रा उ॑प॒मं नो॑ अ॒र्कं यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

जो विद्वान् जन धर्मात्मा, विद्वानों के साथ जिसकी उपमा नहीं उस विज्ञान को देते हैं, वे हम लोगों की रक्षा कर सकते हैं॥७॥इस सूक्त में विश्वेदेवों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह उनतालीसवाँ सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ॥

ओ श्रु॒ष्टिर्वि॑द॒थ्या॒३॒॑ समे॑तु॒ प्रति॒ स्तोमं॑ दधीमहि तु॒राणा॑म्। यद॒द्य दे॒वः स॑वि॒ता सु॒वाति॒ स्यामा॑स्य र॒त्निनो॑ विभा॒गे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विदुषी माता सन्तानों की रक्षा कर और अच्छी शिक्षा देकर बढ़ाती है, वैसे विद्वान् जन हम को बढ़ावें॥१॥

मि॒त्रस्तन्नो॒ वरु॑णो॒ रोद॑सी च॒ द्युभ॑क्त॒मिन्द्रो॑ अर्य॒मा द॑दातु। दिदे॑ष्टु दे॒व्यदि॑ती॒ रेक्णो॑ वा॒युश्च॒ यन्नि॑यु॒वैते॒ भग॑श्च॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्य सर्वदा पुरुषार्थ से सब को ऐश्वर्ययुक्त करावें॥२॥

सेदु॒ग्रो अ॑स्तु मरुतः॒ स शु॒ष्मी यं मर्त्यं॑ पृषदश्वा॒ अवा॑थ। उ॒तेम॒ग्निः सर॑स्वती जु॒नन्ति॒ न तस्य॑ रा॒यः प॑र्ये॒तास्ति॑॥

जिन मनुष्यों की विद्वान् जन रक्षा करते हैं, वे विद्वान् हो धन और ऐश्वर्य को पाकर औरों की भी रक्षा कर सकते हैं॥३॥

अ॒यं हि ने॒ता वरु॑ण ऋ॒तस्य॑ मि॒त्रो राजा॑नो अर्य॒मापो॒ धुः। सु॒हवा॑ दे॒व्यदि॑तिरन॒र्वा ते नो॒ अंहो॒ अति॑ पर्ष॒न्नरि॑ष्टान्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही राजा होते हैं, जो न्याय, श्रेष्ठ गुण और सबों में मित्रता की भावना कराते हैं, वे ही अपराध के आचरण से लोगों को दूर रखने योग्य होते हैं और राजा होने योग्य होते हैं॥४॥

अ॒स्य दे॒वस्य॑ मी॒ळ्हुषो॑ व॒या विष्णो॑रे॒षस्य॑ प्रभृ॒थे ह॒विर्भिः॑। वि॒दे हि रु॒द्रो रु॒द्रियं॑ महि॒त्वं या॑सि॒ष्टं व॒र्तिर॑श्विना॒विरा॑वत्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जिस ईश्वर की महिमा को पाकर सूर्य आदि प्रकाश करते हैं, उसी को उपासना सर्वस्व से करनी चाहिये॥५॥

मात्र॑ पूषन्नाघृण इरस्यो॒ वरू॑त्री॒ यद्रा॑ति॒षाच॑श्च॒ रास॑न्। म॒यो॒भुवो॑ नो॒ अर्व॑न्तो॒ नि पा॑न्तु वृ॒ष्टिं परि॑ज्मा॒ वातो॑ ददातु॥

जो विद्वान् जन श्रेष्ठ जनों के तुल्य वर्त कर सब के लिये सुख वा विद्या देते हैं, वे सब के सब ओर से रक्षक हैं॥६॥

नू रोद॑सी अ॒भिष्टु॑ते॒ वसि॑ष्ठैर्ऋ॒तावा॑नो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॒ग्निः। यच्छ॑न्तु च॒न्द्रा उ॑प॒मं नो॑ अ॒र्कं यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो भूमि के तुल्य क्षमाशील, लक्ष्मी के तुल्य शोभती हुई, जल के तुल्य शान्त, सहेली के तुल्य उपकार करनेवाली विदुषी पढ़ानेवाली हों, वे सब कन्याओं को पढ़ा के और सब स्त्रियों को उपदेश से आनन्दित करें॥७॥इस सूक्त में विश्वेदेवों के गुण और कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चालीसवाँ सूक्त और सातवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्रा॒तर॒ग्निं प्रा॒तरिन्द्रं॑ हवामहे प्रा॒तर्मि॒त्रावरु॑णा प्रा॒तर॒श्विना॑। प्रा॒तर्भगं॑ पू॒षणं॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिं॑ प्रा॒तः सोम॑मु॒त रु॒द्रं हु॑वेम॥

मनुष्यों को रात्रि के पिछले पहर में उठ कर आवश्यक कार्य्य कर ध्यान से शरीरस्थ वा ब्रह्माण्डस्थ वा बिजुली, प्राण, उदान, मित्र, सूर्य, चन्द्रमा, ऐश्वर्य, पुष्टि, परमेश्वर, ओषधिगण और जीव विचार से जानने योग्य हैं, फिर अग्निहोत्रादि कामों से सब जगत् का उपकार कर कृतकृत्य होना चाहिये॥१॥

प्रा॒त॒र्जितं॒ भग॑मु॒ग्रं हु॑वेम व॒यं पु॒त्रमदि॑ते॒र्यो वि॑ध॒र्ता। आ॒ध्रश्चि॒द्यं मन्य॑मानस्तु॒रश्चि॒द्राजा॑ चि॒द्यं भगं॑ भ॒क्षीत्याह॑॥

इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को चाहिये कि प्रातः समय उठकर सब के आधार परमेश्वर का ध्यान कर सब करने योग्य कामों को नाना प्रकार से चिंतवन कर धर्म और पुरुषार्थ से पाये हुए ऐश्वर्य को भोगें वा भुगावें, यह ईश्वर उपदेश देता है॥२॥

भग॒ प्रणे॑त॒र्भग॒ सत्य॑राधो॒ भगे॒मां धिय॒मुद॑वा॒ दद॑न्नः। भग॒ प्र णो॑ जनय॒ गोभि॒रश्वै॒र्भग॒ प्र नृभि॑र्नृ॒वन्तः॑ स्याम॥

जो मनुष्य ईश्वर की आज्ञा, प्रार्थना, ध्यान और उपासना का आचरण पहिले करके पुरुषार्थ करते हैं, वे धर्मात्मा होकर अच्छे सहायवान् हुए सकल ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं॥३॥

उ॒तेदानीं॒ भग॑वन्तः स्यामो॒त प्र॑पि॒त्व उ॒त मध्ये॒ अह्ना॑म्। उ॒तोदि॑ता मघव॒न्त्सूर्य॑स्य व॒यं दे॒वानां॑ सुम॒तौ स्या॑म॥

जो मनुष्य जगदीश्वर का आश्रय और आज्ञा पालन से विद्वानों के सङ्ग से अति पुरुषार्थी होकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि के लिये प्रयत्न करते हैं, वे सकलैश्वर्य युक्त होते हुए भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान इन तीनों कालों में सुखी होते हैं॥४॥

भग॑ ए॒व भग॑वाँ अस्तु देवा॒स्तेन॑ व॒यं भग॑वन्तः स्याम। तं त्वा॑ भग॒ सर्व॒ इज्जो॑हवीति॒ स नो॑ भग पुरए॒ता भ॑वे॒ह॥

हे जगदीश्वर जो सकलैश्वर्य्यवान् आप सब को सब ऐश्वर्य्य देते हैं, उन के सहाय से सब मनुष्य धनाढ्य होवें॥५॥

सम॑ध्व॒रायो॒षसो॑ नमन्त दधि॒क्रावे॑व॒ शुच॑ये प॒दाय॑। अ॒र्वा॒ची॒नं व॑सु॒विदं॒ भगं॑ नो॒ रथ॑मि॒वाश्वा॑ वा॒जिन॒ आ व॑हन्तु॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य प्रातःकाल उठ के वेगयुक्त घोड़ों के समान शीघ्र जाकर आकर आलस्य छोड़ ऐश्वर्य को पाय नम्र होते हैं, वे ही पवित्र परमात्मा को पा सकते हैं॥६॥

अश्वा॑वती॒र्गोम॑तीर्न उ॒षासो॑ वी॒रव॑तीः॒ सद॑मुच्छन्तु भ॒द्राः। घृ॒तं दुहा॑ना वि॒श्वतः॒ प्रपी॑ता यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रभात वेला सब निद्रा में ठहरे हुए मरे हुए जैसों को चैतन्य करा कर्मों में युक्त कराती हैं, वैसे ही होती हुईं विदुषी स्त्रियाँ सब अविद्या निद्रास्थ स्त्रियों को पढ़ाने और उपदेश करने से अच्छे काम में प्रवृत्त करावें॥७॥इस सूक्त में मनुष्यों की दिनचर्य्या का प्रतिपादन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह इकतालीसवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र ब्र॒ह्माणो॒ अङ्गि॑रसो नक्षन्त॒ प्र क्र॑न्द॒नुर्न॑भ॒न्य॑स्य वेतु। प्र धे॒नव॑ उद॒प्रुतो॑ नवन्त यु॒ज्याता॒मद्री॑ अध्व॒रस्य॒ पेशः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो चारों वेद के जाननेवाले विद्वान् जन, अहिंसादिलक्षण हैं जिसके ऐसे धर्म के स्वरूप का बोध कराते हैं, वे स्तुति करने योग्य होते हैं॥१॥

सु॒गस्ते॑ अग्ने॒ सन॑वित्तो॒ अध्वा॑ यु॒ङ्क्ष्व सु॒ते ह॒रितो॑ रो॒हित॑श्च। ये वा॒ सद्म॑न्नरु॒षा वी॑र॒वाहो॑ हु॒वे दे॒वानां॒ जनि॑मानि स॒त्तः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही विद्वान् जन श्रेष्ठ हैं जो सनातन वेदप्रतिपादित धर्म का अनुष्ठान करके कराते हैं, उन्हीं विद्वानों का जन्म सफल होता है, जो पूर्ण विद्या को पाकर धर्मात्मा होकर प्रीति के साथ सब को अच्छी शिक्षा दिलाते हैं॥२॥

समु॑ वो य॒ज्ञं म॑हय॒न्नमो॑भिः॒ प्र होता॑ म॒न्द्रो रि॑रिच उपा॒के। यज॑स्व॒ सु पु॑र्वणीक दे॒वाना य॒ज्ञिया॑म॒रम॑तिं ववृत्याः॥

जो विद्वान् जन सत्कर्मानुष्ठानयज्ञ का अनुष्ठान करते हैं, वे पुष्कल वीर सेनावाले होते हुए सबको आनन्द देनेवाले होते हैं॥३॥

य॒दा वी॒रस्य॑ रे॒वतो॑ दुरो॒णे स्यो॑न॒शीरति॑थिरा॒चिके॑तत्। सुप्री॑तो अ॒ग्निः सुधि॑तो॒ दम॒ आ स वि॒शे दा॑ति॒ वार्य॒मिय॑त्यै॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जब विद्वान् धार्मिक उपदेश करनेवाला अतिथि जन तुम्हारे घरों को आवे तब अच्छे प्रकार उसका सत्कार करो, हे अतिथि! जब जहाँ-जहाँ आप रमण भ्रमण करें, वहाँ-वहाँ सब के लिये सत्य उपदेश करें॥४॥

इ॒मं नो॑ अग्ने अध्व॒रं जु॑षस्व म॒रुत्स्विन्द्रे॑ य॒शसं॑ कृधी नः। आ नक्ता॑ ब॒र्हिः स॑दतामु॒षासो॒शन्ता॑ मि॒त्रावरु॑णा यजे॒ह॥

जब अतिथि आवें तब गृहस्थ अर्घ्य, पाद्य, आसन, मधुपर्क, वचन और अन्नादिकों से उसका सत्कार कर और पूछ कर सत्य और असत्य का निर्णय करें और अतिथि भी प्रश्नों के समाधान देवें॥५॥

ए॒वाग्निं स॑ह॒स्यं१॒॑ वसि॑ष्ठो रा॒यस्का॑मो वि॒श्वप्स्न्य॑स्य स्तौत्। इषं॑ र॒यिं प॑प्रथ॒द्वाज॑म॒स्मे यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

जिसको धन की कामना हो, वह मनुष्य अग्न्यादि विद्या को ग्रहण करे, जो अतिथियों की सेवा करते हैं, उनको अतिथि लोग अधर्म के आचरण से सदा अलग रखते हैं॥६॥इस सूक्त में विश्वेदेवों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह बयालीसवाँ सूक्त और नवम वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र वो॑ य॒ज्ञेषु॑ देव॒यन्तो॑ अर्च॒न्द्यावा॒ नमो॑भिः पृथि॒वी इ॒षध्यै॑। येषां॒ ब्रह्मा॒ण्यस॑मानि॒ विप्रा॒ विष्व॑ग्वि॒यन्ति॑ व॒निनो॒ न शाखाः॑॥

हे अतिथि विद्वानो! जैसे गृहस्थ जन अन्नादि पदार्थों के साथ आपका सत्कार करें, वैसे तुम विज्ञानदान से गृहस्थों को निरन्तर प्रसन्न करो॥१॥

प्र य॒ज्ञ ए॑तु॒ हेत्वो॒ न सप्ति॒रुद्य॑च्छध्वं॒ सम॑नसो घृ॒ताचीः॑। स्तृ॒णी॒त ब॒र्हिर॑ध्व॒राय॑ सा॒धूर्ध्वा शो॒चींषि॑ देव॒यून्य॑स्थुः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे गृहस्थो! जिससे वायु, जल और ओषधि पवित्र होती हैं, उस यज्ञ का निरन्तर अनुष्ठान करो, यज्ञ धूम से अन्तरिक्ष को ढाँपो। हे अतिथियो! तुम सब मनुष्यों को सारथि, घोड़ों को जैसे, वैसे धर्म कामों में उद्यमी कर इनका आलस्य दूर करो, जिससे इनको समस्त लक्ष्मी प्राप्त हो॥२॥

आ पु॒त्रासो॒ न मा॒तरं॒ विभृ॑त्राः॒ सानौ॑ दे॒वासो॑ ब॒र्हिषः॑ सदन्तु। आ वि॒श्वाची॑ विद॒थ्या॑मन॒क्त्वग्ने॒ मा नो॑ दे॒वता॑ता॒ मृध॑स्कः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। वही माता उत्तम है जो ब्रह्मचर्य से विदुषी होकर सन्तानों को अच्छी शिक्षा देकर विद्या से इनकी उन्नति करे, वही पिता श्रेष्ठ है जो हिंसादि दोषरहित सन्तान करे, वे ही विद्वान् प्रशंसा पाये हैं जो और मनुष्यों को माँ के समान पालते हैं॥३॥

ते सी॑षपन्त॒ जोष॒मा यज॑त्रा ऋ॒तस्य॒ धाराः॑ सु॒दुघा॒ दुहा॑नाः। ज्येष्ठं॑ वो अ॒द्य मह॒ आ वसू॑ना॒मा ग॑न्तन॒ सम॑नसो॒ यति॒ ष्ठ॥

जो सत्य कहने, सत्य करने और सत्य माननेवाले होते हैं, वे पूर्णकाम होकर सब मनुष्यों को विद्वान् कर सकते हैं॥४॥

ए॒वा नो॑ अग्ने वि॒क्ष्वा द॑शस्य॒ त्वया॑ व॒यं स॑हसाव॒न्नास्क्राः॑। रा॒या यु॒जा स॑ध॒मादो॒ अरि॑ष्टा यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

हे विद्वानो! तुम हम को विद्या देओ, जिससे हम लोग प्रजाजनों में उत्तम धन आदि पाकर तुम्हारी सदैव रक्षा करें॥५॥इस सूक्त में विश्वेदेवों के गुण और कामों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह तयालीसवाँ सूक्त और दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

द॒धि॒क्रां वः॑ प्रथ॒मम॒श्विनो॒षस॑म॒ग्निं समि॑द्धं॒ भग॑मू॒तये॑ हुवे। इन्द्रं॒ विष्णुं॑ पू॒षणं॒ ब्रह्म॑ण॒स्पति॑मादि॒त्यान्द्यावा॑पृथि॒वी अ॒पः स्वः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे विद्वान् जन प्रथम से भूमि आदि की विद्या का संग्रह करके कार्यसिद्धि करते हैं, वैसे तुम भी करो॥१॥

द॒धि॒क्रामु॒ नम॑सा बो॒धय॑न्त उ॒दीरा॑णा य॒ज्ञमु॑पप्र॒यन्तः॑। इळां॑ दे॒वीं ब॒र्हिषि॑ सा॒दय॑न्तो॒ऽश्विना॒ विप्रा॑ सु॒हवा॑ हुवेम॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही विद्वान् जन जगत् के हितैषी होते हैं, जो सब जगह विद्या फैलाते हैं॥२॥

द॒धि॒क्रावा॑णं बुबुधा॒नो अ॒ग्निमुप॑ ब्रुव उ॒षसं॒ सूर्यं॒ गाम्। ब्र॒ध्नं मं॑श्च॒तोर्वरु॑णस्य ब॒भ्रुं ते विश्वा॒स्मद्दु॑रि॒ता या॑वयन्तु॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे आप्त विद्वान् सब के लिए विद्या और अभयदान देकर पाप के आचरण से उन्हें अलग करते हैं, वैसे सब विद्वान् करें॥३॥

द॒धि॒क्रावा॑ प्रथ॒मो वा॒ज्यर्वाग्रे॒ रथा॑नां भवति प्रजा॒नन्। सं॒वि॒दा॒न उ॒षसा॒ सूर्ये॑णादि॒त्येभि॒र्वसु॑भि॒रङ्गि॑रोभिः॥

जो अग्निविद्या को जानते हैं, वे रथों के शीघ्र चलानेवाले होते हैं॥४॥

आ नो॑ दधि॒क्राः प॒थ्या॑मनक्त्वृ॒तस्य॒ पन्था॒मन्वे॑त॒वा उ॑। शृ॒णोतु॑ नो॒ दैव्यं॒ शर्धो॑ अ॒ग्निः शृ॒ण्वन्तु॒ विश्वे॑ महि॒षा अमू॑राः॥

हे मनुष्यो! जैसे परीक्षक न्यायाधीश वा राजा सब के वचनों को सुन के सत्य और असत्य का निश्चय करता और अग्नि आदि का प्रयोग कर शीघ्र मार्ग को जाता है, वैसे ही तुम लोग विद्वानों से सुन कर धर्मयुक्त मार्ग से अपना व्यवहार कर मूढ़ता छोड़ो और छुड़ाओ॥५॥इस सूक्त में अग्निरूपी घोड़ों के गुण और कामों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चवालीसवाँ सूक्त और ग्यारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ दे॒वो या॑तु सवि॒ता सु॒रत्नो॑ऽन्तरिक्ष॒प्रा वह॑मानो॒ अश्वैः॑। हस्ते॒ दधा॑नो॒ नर्या॑ पु॒रूणि॑ निवे॒शय॑ञ्च प्रसु॒वञ्च॒ भूम॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सूर्य के तुल्य शुभ गुण और कर्म से प्रकाशित, मनुष्यादि प्राणियों का हित करते हैं, वे बहुत ऐश्वर्य पाते हैं॥१॥

उद॑स्य बा॒हू शि॑थि॒रा बृ॒हन्ता॑ हिर॒ण्यया॑ दि॒वो अन्ताँ॑ अनष्टाम्। नू॒नं सो अ॑स्य महि॒मा प॑निष्ट॒ सूर॑श्चिदस्मा॒ अनु॑ दादप॒स्याम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जिसका सूर्य के समान महिमा, प्रताप, सर्व बलयुक्त बाहू वर्तमान हैं, वही इस राज्य के बीच पूजित होता है॥२॥

स घा॑ नो दे॒वः स॑वि॒ता स॒हावा सा॑विष॒द्वसु॑पति॒र्वसू॑नि। वि॒श्रय॑माणो अ॒मति॑मुरू॒चीं म॑र्त॒भोज॑न॒मध॑ रासते नः॥

जो मनुष्य सूर्य के समान सब के धनों को बढ़ा कर सुपात्रों के लिये देते हैं, वे धनपति होते हैं॥३॥

इ॒मा गिरः॑ सवि॒तारं॑ सुजि॒ह्वं पू॒र्णग॑भस्तिमीळते सुपा॒णिम्। चि॒त्रं वयो॑ बृ॒हद॒स्मे द॑धातु यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

अच्छी विद्या से धार्मिक पुरुष होते हैं, धर्मात्मा पुरुष ही को विद्या और सर्व सुख प्राप्त होते हैं॥४॥इस सूक्त में सविता के तुल्य विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पैंतालीसवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इ॒मा रु॒द्राय॑ स्थि॒रध॑न्वने॒ गिरः॑ क्षि॒प्रेष॑वे दे॒वाय॑ स्व॒धाव्ने॑। अषा॑ळ्हाय॒ सह॑मानाय वे॒धसे॑ ति॒ग्मायु॑धाय भरता शृ॒णोतु॑ नः॥

जो दुष्टों के शिक्षा देनेवाले, शस्त्र और अस्त्रवेत्ता, सहनशील, युद्धकुशल विद्वान् हैं, उनको सर्वदैव धनुर्वेद पढ़ाने से और उसके अर्थ से भरी हुई वक्तृता से विद्वान् जन अत्यन्त उत्साह दें और जो सेनापति है, वह प्रजास्थ पुरुषों की वाणी सुने॥१॥

स हि क्षये॑ण॒ क्षम्य॑स्य॒ जन्म॑नः॒ साम्रा॑ज्येन दि॒व्यस्य॒ चेत॑ति। अव॒न्नव॑न्ती॒रुप॑ नो॒ दुर॑श्चरानमी॒वो रु॑द्र॒ जासु॑ नो भव॥

जो विद्वान् रक्षा करनेवाली सेना वा प्रजाओं की रक्षा करता हुआ प्रत्येक गृहस्थ के व्यवहार को विशेष जानता, दुःखों को नाश करता और सुखों को उत्पन्न करता हुआ अच्छे प्रकार राज्य कर सकता है, वही प्रजाजनों की पालना करनेवाला है, यह सब निश्चय करें॥२॥

या ते॑ दि॒द्युदव॑सृष्टा दि॒वस्परि॑ क्ष्म॒या चर॑ति॒ परि॒ सा वृ॑णक्तु नः। स॒हस्रं॑ ते स्वपिवात भेष॒जा मा न॑स्तो॒केषु॒ तन॑येषु रीरिषः॥

जिस राजा का न्यायप्रकाश सर्वत्र प्रदीपता है, वही सबको अधर्माचरण से रोक सकता है, जिसके राज्य में हजारों दूत और चार गुप्तचर मुखवर वैद्यजन विचरते हैं, उसकी थोड़ी भी राज्य की हानि नहीं होती है॥३॥

मा नो॑ वधी रुद्र॒ मा परा॑ दा॒ मा ते॑ भूम॒ प्रसि॑तौ हीळि॒तस्य॑। आ नो॑ भज ब॒र्हिषि॑ जीवशं॒से यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

वही राजा वीर वा उत्तम हो जो धार्मिक जनों को अदण्ड [=अदण्ड्य] कर दुष्टों को दण्ड दे॥४॥इस सूक्त में रुद्र, राजा और पुरुषों के गुण और कामों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह छ्यालीसवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आपो॒ यं वः॑ प्रथ॒मं दे॑व॒यन्त॑ इन्द्र॒पान॑मू॒र्मिमकृ॑ण्वते॒ळः। तं वो॑ व॒यं शुचि॑मरि॒प्रम॒द्य घृ॑त॒प्रुषं॒ मधु॑मन्तं वनेम॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वान् जन पहिली अवस्था में विद्या ग्रहण करते और युक्त आहार-विहार से शरीर को नीरोग करते हैं, उन्हीं की सब सेवा करें॥१॥

तमू॒र्मिमा॑पो॒ मधु॑मत्तमं वो॒ऽपां नपा॑दवत्वाशु॒हेमा॑। यस्मि॒न्निन्द्रो॒ वसु॑भिर्मा॒दया॑ते॒ तम॑श्याम देव॒यन्तो॑ वो अ॒द्य॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे वायु जल को तरङ्गों को उछालता है, वैसे जो राजा धनादिकों से प्रजाजनों की रक्षा करे, उसी को हम लोग राजा होने की सम्मति देवें॥२॥

श॒तप॑वित्राः स्व॒धया॒ मद॑न्तीर्दे॒वीर्दे॒वाना॒मपि॑ यन्ति॒ पाथः॑। ता इन्द्र॑स्य॒ न मि॑नन्ति व्र॒तानि॒ सिन्धु॑भ्यो ह॒व्यं घृ॒तव॑ज्जुहोत॥

जो युवति कन्या, नदियाँ समुद्रों को जैसे, वैसे हृदय के प्यारे पतियों को पाकर छोड़ती नहीं हैं, वैसे ही तुम सब मनुष्य एक-दूसरे के संयोग से सर्वदा आनन्द करो॥३॥

याः सूर्यो॑ र॒श्मिभि॑रात॒तान॒ याभ्य॒ इन्द्रो॒ अर॑दद्गा॒तुमू॒र्मिम्। ते सि॑न्धवो॒ वरि॑वो धातना नो यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो! जैसे सूर्य अपने तेजों से भूमि के जलों को खींच कर विस्तार करता है, वैसे अच्छे कामों से प्रजा को तुम विस्तारो॥४॥इस सूक्त में विद्वान्,स्त्री-पुरुष के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह सैंतालीसवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

ऋभु॑क्षणो वाजा मा॒दय॑ध्वम॒स्मे न॑रो मघवानः सु॒तस्य॑। आ वो॒ऽर्वाचः॒ क्रत॑वो॒ न या॒तां विभ्वो॒ रथं॒ नर्यं॑ वर्तयन्तु॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो विद्वान् जन तुम्हें और हमें विद्या और बुद्धि के दान से वा शिल्पविद्या से आनन्दित करते हैं, वे सर्वदा प्रशंसा करने योग्य हैं॥१॥

ऋ॒भुर्ऋ॒भुभि॑र॒भि वः॑ स्याम॒ विभ्वो॑ वि॒भुभिः॒ शव॑सा॒ शवां॑सि। वाजो॑ अ॒स्माँ अ॑वतु॒ वाज॑साता॒विन्द्रे॑ण यु॒जा त॑रुषेम वृ॒त्रम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही विद्वान् जन विद्याओं में व्याप्त शुभ गुण-कर्म-स्वभाव युक्त हैं, जो संग्राम में भी सब की रक्षा करके धन और बल दे सकते हैं॥२॥

ते चि॒द्धि पू॒र्वीर॒भि सन्ति॑ शा॒सा विश्वाँ॑ अ॒र्य उ॑प॒रता॑ति वन्वन्। इन्द्रो॒ विभ्वाँ॑ ऋभु॒क्षा वाजो॑ अ॒र्यः शत्रो॑र्मिथ॒त्या कृ॑णव॒न्वि नृ॒म्णम्॥

वही राजा महान् विजयी होता है, जो धार्मिक उत्तम विद्वानों का संग्रह करता है॥३॥

नू दे॑वासो॒ वरि॑वः कर्तना नो भू॒त नो॒ विश्वेऽव॑से स॒जोषाः॑। सम॒स्मे इषं॒ वस॑वो ददीरन्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

हे विद्वान् राजजनो! तुम हम लोगों की और प्रजाजनों की निरन्तर रक्षा करो, सर्वदा विज्ञान और अन्न आदि ऐश्वर्य को देओ, ऐसा करो तो तुम लोगों की हम निरन्तर रक्षा करें॥४॥इस मन्त्र में विद्वानों के गुण और कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह अड़तालीसवाँ सूक्त और पन्द्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

स॒मु॒द्रज्ये॑ष्ठाः सलि॒लस्य॒ मध्या॑त्पुना॒ना य॒न्त्यनि॑विशमानाः। इन्द्रो॒ या व॒ज्री वृ॑ष॒भो र॒राद॒ ता आपो॑ दे॒वीरि॒ह माम॑वन्तु॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो जल अन्तरिक्ष से बरस के सब की पालना करते हैं, उन का तुम पान आदि कामों में अच्छे प्रकार योग करो॥१॥

या आपो॑ दि॒व्या उ॒त वा॒ स्रव॑न्ति ख॒नित्रि॑मा उ॒त वा॒ याः स्व॑यं॒जाः। स॒मु॒द्रार्था॒ याः शुच॑यः पाव॒कास्ता आपो॑ दे॒वीरि॒ह माम॑वन्तु॥

हे विद्वानो! जैसे जल और प्राण हमारी अच्छे प्रकार रक्षा कर बढ़ावें, वैसे तुम लोग हम को बोध कराओ॥२॥

यासां॒ राजा॒ वरु॑णो॒ याति॒ मध्ये॑ सत्यानृ॒ते अ॑व॒पश्य॒ञ्जना॑नाम्। म॒धु॒श्चुतः॒ शुच॑यो॒ याः पा॑व॒कास्ता आपो॑ दे॒वीरि॒ह माम॑वन्तु॥

हे मनुष्यो! जो जगदीश्वर प्राणादिकों में अभिव्याप्त सब जीवों के धर्म-अधर्म को देखता और फल से युक्त करता हुआ सब की रक्षा करता है, वही सब को निरन्तर ध्यान करने योग्य है॥३॥

यासु॒ राजा॒ वरु॑णो॒ यासु॒ सोमो॒ विश्वे॑ दे॒वा यासूर्जं॒ मद॑न्ति। वै॒श्वा॒न॒रो यास्व॒ग्निः प्रवि॑ष्ट॒स्ता आपो॑ दे॒वीरि॒ह माम॑वन्तु॥

हे मनुष्यो! जिस आकाश में, प्राणों में वा जल में सब जगत् जीवन धारण करता है वा जिन प्राणों में स्थित योगी जन परमात्मा को प्राप्त होता है वा जहाँ बिजुली प्रविष्ट है, उन जलों को तुम जान कर रक्षायुक्त होओ॥४॥इस सूक्त में जलादि कों के गुण और कृत्यों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह उनपचासवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ मां मि॑त्रावरुणे॒ह र॑क्षतं कुला॒यय॑द्वि॒श्वय॒न्मा न॒ आ ग॑न्। अ॒ज॒का॒वं दु॒र्दृशी॑कं ति॒रो द॑धे॒ मा मां पद्ये॑न॒ रप॑सा विद॒त्त्सरुः॑॥

मनुष्यों को पापाचरण वा कुपथ्य कभी न करना चाहिये जिससे कभी रोगप्राप्ति न हो, जो इस संसार में अध्यापक और उपदेशक हैं, वे पढ़ाने और उपदेश करने से सब को अरोगी कर सीधे और उद्योगी करें॥१॥

यद्वि॒जाम॒न्परु॑षि॒ वन्द॑नं॒ भुव॑दष्ठी॒वन्तौ॒ परि॑ कु॒ल्फौ च॒ देह॑त्। अ॒ग्निष्टच्छोच॒न्नप॑ बाधतामि॒तो मा मां पद्ये॑न॒ रप॑सा विद॒त्त्सरुः॑॥

जो मनुष्य ब्रह्मचर्य्य को छोड़ के बालकपन में विवाह वा कुपथ्य करते हैं, उनके शरीर में शोध आदि रोग होते हैं, उनका निवारण वैद्यक-रीति से करना चाहिये॥२॥

यच्छ॑ल्म॒लौ भव॑ति॒ यन्न॒दीषु॒ यदोष॑धीभ्यः॒ परि॒ जाय॑ते वि॒षम्। विश्वे॑ दे॒वा निरि॒तस्तत्सु॑वन्तु॒ मा मां पद्ये॑न॒ रप॑सा विद॒त्त्सरुः॑॥

हे वैद्य आदि मनुष्यो! सब पदार्थों से वा पदार्थों में जितना विष उत्पन्न होता है, उतना सब निवार के अन्न पानी आदि सेवन करना चाहिये, जिससे तुम को कोई भी रोग न प्राप्त हो॥३॥

याः प्र॒वतो॑ नि॒वत॑ उ॒द्वत॑ उद॒न्वती॑रनुद॒काश्च॒ याः। ता अ॒स्मभ्यं॒ पय॑सा॒ पिन्व॑मानाः शि॒वा दे॒वीर॑शिप॒दा भ॑वन्तु॒ सर्वा॑ न॒द्यो॑ अशिमि॒दा भ॑वन्तु॥

हे मनुष्यो! जितना जल नदी आदि में जाता है और जितना मेघमण्डल में प्राप्त होता है, उतना सब होम से शुद्ध कर सेवो जिससे सर्वदा मङ्गल बढ़ कर दुःख का अच्छे प्रकार नाश हो॥४॥इस सूक्त में जल और ओषधी विष के निवारण से शुद्ध सेवन कहा, इससे इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह पचासवाँ सूक्त और सत्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ॒दि॒त्याना॒मव॑सा॒ नूत॑नेन सक्षी॒महि॒ शर्म॑णा॒ शंत॑मेन। अ॒ना॒गा॒स्त्वे अ॑दिति॒त्वे तु॒रास॑ इ॒मं य॒ज्ञं द॑धतु॒ श्रोष॑माणाः॥

हे मनुष्यो! जैसे हम लोग विद्वानों के सङ्ग से अत्यन्त सुख पावें, वैसे ही तुम भी इसको पाओ॥१॥

आ॒दि॒त्यासो॒ अदि॑तिर्मादयन्तां मि॒त्रो अ॑र्य॒मा वरु॑णो॒ रजि॑ष्ठाः। अ॒स्माकं॑ सन्तु॒ भुव॑नस्य गो॒पाः पिब॑न्तु॒ सोम॒मव॑से नो अ॒द्य॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो! तुम आदित्य के समान विद्या प्रकाश से, वैद्य के समान ओषधियों के सेवने से नीरोग होकर हमारा भी आरोग्य करो॥२॥

आ॒दि॒त्या विश्वे॑ म॒रुत॑श्च॒ विश्वे॑ दे॒वाश्च॒ विश्व॑ ऋ॒भव॑श्च॒ विश्वे॑। इन्द्रो॑ अ॒ग्निर॒श्विना॑ तुष्टुवा॒ना यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

जिस देश में सब विद्वान् जन बुद्धिमान् चतुर धार्मिक और रक्षा करने और विद्या देनेवाले उपदेशक हैं, वहाँ सब से रक्षायुक्त होकर सब सुखी होते हैं॥३॥इस सूक्त में सूर्य के समान विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह इक्यावनवाँ सूक्त और अठारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ॒दि॒त्यासो॒ अदि॑तयः स्याम॒ पूर्दे॑व॒त्रा व॑सवो मर्त्य॒त्रा। सने॑म मित्रावरुणा॒ सन॑न्तो॒ भवे॑म द्यावापृथिवी॒ भव॑न्तः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! तुम आप्त विद्वान् के समान वर्त कर धार्मिक विद्वानों में निरन्तर बस कर सत्य और असत्य का विभाग कर सूर्य और भूमि के समान परोपकार कर विश्व के सुख के लिये प्राण और उदान के सदृश सब की उन्नति के लिये होओ॥१॥

मि॒त्रस्तन्नो॒ वरु॑णो मामहन्त॒ शर्म॑ तो॒काय॒ तन॑याय गो॒पाः। मा वो॑ भुजेमा॒न्यजा॑त॒मेनो॒ मा तत्क॑र्म वसवो॒ यच्चय॑ध्वे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! आप सदैव ब्रह्मचर्य्य और विद्यादान से अपने लड़कों की रक्षा और सत्कार कर बढ़ावें और आप पाप न करके और से किये हुए को भी न सेवें॥२॥

तु॒र॒ण्यवोऽङ्गि॑रसो नक्षन्त॒ रत्नं॑ दे॒वस्य॑ सवि॒तुरि॑या॒नाः। पि॒ता च॒ तन्नो॑ म॒हान्यज॑त्रो॒ विश्वे॑ दे॒वाः सम॑नसो जुषन्त॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे विद्वान् जन इस ईश्वरकृत सृष्टि में विद्या पुरुषार्थ और विद्वानों की सेवा आदि से सब सुखों को पाते हैं, वैसे आप प्राप्त हों, सब मिल कर पिता के समान पालना करनेवाले परमात्मा की निरन्तर उपासना करें॥३॥इस सूक्त में विश्वेदेवों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह बावनवाँ सूक्त और उन्नीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ

प्र द्यावा॑ य॒ज्ञैः पृ॑थि॒वी नमो॑भिः स॒बाध॑ ईळे बृह॒ती यज॑त्रे। ते चि॒द्धि पूर्वे॑ क॒वयो॑ गृ॒णन्तः॑ पु॒रो म॒ही द॑धि॒रे दे॒वपु॑त्रे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सबको धारण करनेवाले भूमि और सूर्य को विद्वान् जन जान कर उपकार करते हैं, वैसे तुम भी करो॥१॥

प्र पू॑र्व॒जे पि॒तरा॒ नव्य॑सीभिर्गी॒र्भिः कृ॑णुध्वं॒ सद॑ने ऋ॒तस्य॑। आ नो॑ द्यावापृथिवी॒ दैव्ये॑न॒ जने॑न यातं॒ महि॑ वां॒ वरू॑थम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे स्त्री-पुरुषो! तुम पदार्थविद्या से पृथिवी आदि का विज्ञान करके सुन्दर घर बना वहाँ मनुष्यों के सुखों की उन्नति करो॥२॥

उ॒तो हि वां॑ रत्न॒धेया॑नि॒ सन्ति॑ पु॒रूणि॑ द्यावापृथिवी सु॒दासे॑। अ॒स्मे ध॑त्तं॒ यदस॒दस्कृ॑धोयु यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

जो मनुष्य बिजुली और भूमि के गुणों को जान कर वहाँ स्थित जो रत्न उनको पाकर सब के लिये सुख का विधान करते हैं, वे सब ओर से सदा सुरक्षित होते हैं॥३॥इस सूक्त में द्यावापृथिवी के गुणों और कृत्यों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह त्रेपनवाँ सूक्त और बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

वास्तो॑ष्पते॒ प्रति॑ जानीह्य॒स्मान्त्स्वा॑वे॒शो अ॑नमी॒वो भ॑वा नः। यत्त्वेम॑हे॒ प्रति॒ तन्नो॑ जुषस्व॒ शं नो॑ भव द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे॥

जो मनुष्य सब ओर द्वार और बहुत अवकाशवाले घर को बना कर उस में वसते और रोगरहित होकर अपने तथा औरों के लिये सुख देते हैं, वे सबको मङ्गल देनेवाले होते हैं॥१॥

वास्तो॑ष्पते प्र॒तर॑णो न एधि गय॒स्फानो॒ गोभि॒रश्वे॑भिरिन्दो। अ॒जरा॑सस्ते स॒ख्ये स्या॑म पि॒तेव॑ पु॒त्रान्प्रति॑ नो जुषस्व॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्य उत्तम घर बना कर गो आदि पशुओं से शोभित कर शुद्ध कर प्रजा के बढ़ानेवाले होकर अक्षय मित्रपन सब में अच्छे प्रकार प्रसिद्ध कराय जैसे पिता पुत्रों की रक्षा करता है, वैसे ही सब की रक्षा करें॥२॥

वास्तो॑ष्पते श॒ग्मया॑ सं॒सदा॑ ते सक्षी॒महि॑ र॒ण्वया॑ गातु॒मत्या॑। पा॒हि क्षेम॑ उ॒त योगे॒ वरं॑ नो यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

जो गृहस्थ सज्जनों का सत्कार कर उनकी रक्षा करते हैं, वे उन के योग-क्षेम की उन्नति कर निरन्तर उनकी पालना करते हैं॥३॥इस सूक्त में वास्तोष्पति के गुण और कृत्यों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह चौपनवाँ सूक्त और इक्कीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒मी॒व॒हा वा॑स्तोष्पते॒ विश्वा॑ रू॒पाण्या॑वि॒शन्। सखा॑ सु॒शेव॑ एधि नः॥

हे गृहस्थो! तुम सर्व प्रकार उत्तम घरों को बना कर सुखी होओ॥१॥

यद॑र्जुन सारमेय द॒तः पि॑शङ्ग॒ यच्छ॑से। वी॑व भ्राजन्त ऋ॒ष्टय॒ उप॒ स्रक्वे॑षु॒ बप्स॑तो॒ नि षु स्व॑प॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जहाँ आरोग्यपन से तुम्हारे दन्त आदि अवयव अच्छे प्रकार शोभते हैं, वहाँ ही निवास और शयन आदि व्यवहार को करो॥२॥

स्ते॒नं रा॑य सारमेय॒ तस्क॑रं वा पुनःसर। स्तो॒तॄनिन्द्र॑स्य रायसि॒ किम॒स्मान्दु॑च्छुनायसे॒ नि षु स्व॑प॥

गृहस्थों को चाहिये कि चोरों की रुकावट और श्रेष्ठों का सत्कार कर के कभी कुत्ते के समान न आचरण करें और सदैव शुद्ध वायु, जल और अवकाश में सोवें॥३॥

त्वं सू॑क॒रस्य॑ दर्दृहि॒ तव॑ दर्दर्तु सूक॒रः। स्तो॒तॄनिन्द्र॑स्य रायसि॒ किम॒स्मान्दु॑च्छुनायसे॒ नि षु स्व॑प॥

हे गृहस्थ! आप ऐश्वर्य का संचय कर, धर्म व्यवहार में अच्छे प्रकार विस्तार कर और विद्वानों का सत्कार कर श्रीमानों के समान आचरण करो, हम लोगों के प्रति किसलिये कुत्ते के समान आचरण करते हैं, नीरोग होते हुए प्रति समय सुख से सोओ॥४॥

सस्तु॑ मा॒ता सस्तु॑ पि॒ता सस्तु॒ श्वा सस्तु॑ वि॒श्पतिः॑। स॒सन्तु॒ सर्वे॑ ज्ञा॒तयः॒ सस्त्व॒यम॒भितो॒ जनः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को ऐसे घर रचने चाहियें, जिनमें सब के सर्व व्यवहारों के करने को अलग-अलग शाला और घर होवें॥५॥

य आस्ते॒ यश्च॒ चर॑ति॒ यश्च॒ पश्य॑ति नो॒ जनः॑। तेषां॒ सं ह॑न्मो अ॒क्षाणि॒ यथे॒दं ह॒र्म्यं तथा॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को ऐसे घर बनाने चाहियें, जिन में सब ऋतुओं में निर्वाह हो, सब सुख, बड़े और बाहरवाले जन गृहस्थों को सहसा न देखें और न घरवाले बाहरवालों को देखें॥६॥

स॒हस्र॑शृङ्गो वृष॒भो यः स॑मु॒द्रादु॒दाच॑रत्। तेना॑ सह॒स्ये॑ना व॒यं नि जना॑न्त्स्वापयामसि॥

हे मनुष्यो! जहाँ सूर्य की किरणों का स्पर्श सब ओर से हो और जो बल का अधिक बढ़ानेवाला घर हो, उसके शुद्ध होने में सब को सुलावें और हम लोग भी सोवें॥७॥

प्रो॒ष्ठे॒श॒या व॑ह्येश॒या नारी॒र्यास्त॑ल्प॒शीव॑रीः। स्त्रियो॒ याः पुण्य॑गन्धा॒स्ताः सर्वाः॑ स्वापयामसि॥

हे गृहस्थो! जिस घर में स्त्री बसें वह घर अतीव उत्तम रखना चाहिये, जिससे निज सन्तान उत्तम हों॥८॥इस सूक्त में गृहस्थों के काम का और गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह ऋग्वेद के सातवें मण्डल में तीसरा अनुवाक, पचपनवाँ सूक्त और पञ्चम अष्टक के चौथे अध्याय में बाईसवाँ वर्ग पूरा हुआ॥

सूक्तम्

क ईं॒ व्य॑क्ता॒ नरः॒ सनी॑ळा रु॒द्रस्य॒ मर्या॒ अधा॒ स्वश्वाः॑॥

इस संसार में कौन उत्तम प्रशंसा करने योग्य मनुष्य हैं, इस का अगले मन्त्र में समाधान जानना चाहिये॥१॥

नकि॒र्ह्ये॑षां ज॒नूंषि॒ वेद॒ ते अ॒ङ्ग वि॑द्रे मि॒थो ज॒नित्र॑म्॥

जिन विद्वानों के जन्मों को विद्या प्राप्ति करानेवाले न जानते हैं, वे प्रसिद्ध नहीं होते हैं और जो विद्या जन्म पाते हैं, वे ही कृतकृत्य और प्रसिद्ध होते हैं, यह उत्तर है॥२॥

अ॒भि स्व॒पूभि॑र्मि॒थो व॑पन्त॒ वात॑स्वनसः श्ये॒ना अ॑स्पृध्रन्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो गृहस्थ परस्पर सत्याचरणानुष्ठान से गम्भीर आशयवाले पराक्रमी होकर सब की उन्नति करना चाहते हैं, वे पूजित होते हैं॥३॥

ए॒तानि॒ धीरो॑ नि॒ण्या चि॑केत॒ पृश्नि॒र्यदूधो॑ म॒ही ज॒भार॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पृथिवी और सूर्य्य सब गृहों को धारण करते हैं, वैसे जो विद्वान् जन निर्णीत सिद्धान्तों को जानते हैं, वे सर्वत्र सत्कार करने योग्य होते हैं॥४॥

सा विट् सु॒वीरा॑ म॒रुद्भि॑रस्तु स॒नात्सह॑न्ती॒ पुष्य॑न्ती नृ॒म्णम्॥

वही स्त्री श्रेष्ठ है जो ब्रह्मचर्य्य से समग्र विद्याओं को पढ़ के शूरवीर पुत्रों को उत्पन्न करती है और वही सहनशील तथा कोशवाली होती है॥५॥

यामं॒ येष्ठाः॑ शु॒भा शोभि॑ष्ठाः श्रि॒या संमि॑श्ला॒ ओजो॑भिरु॒ग्राः॥

हे गृहस्थो! जो शालाधर धन और अन्नादि पदार्थों से युक्त शोभायमान प्राप्त होने योग्य सुख को देते हैं, उनको पतिव्रता स्त्रियों के समान सुन्दर शोभायुक्त निरन्तर करो॥६॥

उ॒ग्रं व॒ ओजः॑ स्थि॒रा शवां॒स्यधा॑ म॒रुद्भि॑र्ग॒णस्तुवि॑ष्मान्॥

जो स्त्रियाँ अपने पतियों के बल को न क्षीण करातीं, उनका पुत्र-पौत्रादि समूह बलवान् होता है॥७॥

शु॒भ्रो वः॒ शुष्मः॒ क्रुध्मी॒ मनां॑सि॒ धुनि॒र्मुनि॑रिव॒ शर्ध॑स्य धृ॒ष्णोः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो गृहस्थ जन श्रेष्ठों के साथ मिलाप और दुष्टों के साथ अलग होना रखते हैं, वे बहुत बल पाते हैं॥

सने॑म्य॒स्मद्यु॒योत॑ दि॒द्युं मा वो॑ दुर्म॒तिरि॒ह प्रण॑ङ्नः॥

हे मनुष्यो! तुम सदा दुष्टाचारी मनुष्यों से अलग रह कर और शत्रु बल को निवार के बढ़ते हुए होओ॥९॥

प्रि॒या वो॒ नाम॑ हुवे तु॒राणा॒मा यत्तृ॒पन्म॑रुतो वावशा॒नाः॥

जो सब के प्रियाचरण करने और सुख की कामना करनेवाले मनुष्य वर्त्तमान हैं, वे ही प्रिय सुखों को पाते हैं॥१०॥

स्वा॒यु॒धास॑ इ॒ष्मिणः॑ सुनि॒ष्का उ॒त स्व॒यं त॒न्वः१॒॑ शुम्भ॑मानाः॥

जो धुनर्वेद को पढ़ के आरोग्ययुक्त शरीर और युद्ध विद्या में कुशल हैं, वे ही धनधान्ययुक्त होते हैं॥११॥

शुची॑ वो ह॒व्या म॑रुतः॒ शुची॑नां॒ शुचिं॑ हिनोम्यध्व॒रं शुचि॑भ्यः। ऋ॒तेन॑ स॒त्यमृ॑त॒साप॑ आय॒ञ्छुचि॑जन्मानः॒ शुच॑यः पाव॒काः॥

जिनके पिछले काम पुण्यरूप हैं, वे ही पवित्र जन्मवाले हैं अथवा जिनके वर्त्तमान में धर्मयुक्त आचरण हैं, वे पवित्रजन्मा होते हैं॥१२॥

अंसे॒ष्वा म॑रुतः खा॒दयो॑ वो॒ वक्षः॑सु रु॒क्मा उ॑पशिश्रिया॒णाः। वि वि॒द्युतो॒ न वृ॒ष्टिभी॑ रुचा॒ना अनु॑ स्व॒धामायु॑धै॒र्यच्छ॑मानाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे शूरवीर पुरुषो! जैसे बिजुली वर्षाओं के साथ ही प्रकाशित होती है, वैसे ही आप लोग शस्त्र और अस्त्रों से प्रकाशित होओ और अपने शरीर बल को बढ़ाके और उत्तम सेना का आश्रय लेकर शत्रुओं को पराजय देओ॥१३॥

प्र बु॒ध्न्या॑ व ईरते॒ महां॑सि॒ प्र नामा॑नि प्रयज्यवस्तिरध्वम्। स॒ह॒स्रियं॒ दम्यं॑ भा॒गमे॒तं गृ॑हमे॒धीयं॑ मरुतो जुषध्वम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे गृहस्थो! जैसे मेघ पृथिवी को सेवते हैं, वैसे ही आप लोग प्रजाजनों को सेओ और शत्रुओं की निवृत्ति कर अतुल सुख पाओ॥१४॥

यदि॑ स्तु॒तस्य॑ मरुतो अधी॒थेत्था विप्र॑स्य वा॒जिनो॒ हवी॑मन्। म॒क्षू रा॒यः सु॒वीर्य॑स्य दात॒ नू चि॒द्यम॒न्य आ॒दभ॒दरा॑वा॥

जो विद्वान् के समीप से पढ़ते हैं, वे समर्थ अर्थात् विद्यासम्पन्न हो धनपति होते हैं॥१५॥

अत्या॑सो॒ न ये म॒रुतः॒ स्वञ्चो॑ यक्ष॒दृशो॒ न शु॒भय॑न्त॒ मर्याः॑। ते ह॑र्म्ये॒ष्ठाः शिश॑वो॒ न शु॒भ्रा व॒त्सासो॒ न प्र॑क्री॒ळिनः॑ पयो॒धाः॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो शूरवीर घोड़े के समान वेगवाले, अच्छी दृष्टिवाले के समान देखनेवाले, बालकों के समान सीधे स्वभाववाले, बछड़ों के समान खेल करनेवाले, पवनों के समान पदार्थों के धारण करनेवाले राजा आदि वीर जन हैं, वे ही विजय और प्रतिष्ठा को निरन्तर पाते हैं॥१६॥

द॒श॒स्यन्तो॑ नो म॒रुतो॑ मृळन्तु वरिव॒स्यन्तो॒ रोद॑सी सु॒मेके॑। आ॒रे गो॒हा नृ॒हा व॒धो वो॑ अस्तु सु॒म्नेभि॑र॒स्मे व॑सवो नमध्वम्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही राजजन उत्तम हैं, जो श्रेष्ठों को सुख देकर दुष्टों को मारते हैं और आप्त जनों को नम के दुष्टों में उग्र होते हैं॥१७॥

आ वो॒ होता॑ जोहवीति स॒त्तः स॒त्राचीं॑ रा॒तिं म॑रुतो गृणा॒नः। य ईव॑तो वृषणो॒ अस्ति॑ गो॒पाः सो अद्व॑यावी हवते व उ॒क्थैः॥

जो राजा आदि जन अभय देने और सब की रक्षा करनेवाला, छलकपट आदि दोषरहित, सत्यविद्या दाता और सत्यग्राहक है, वही यहाँ प्रशंसित वर्त्तमान है, उसी को मनुष्य उत्तम जानें॥१८॥

इ॒मे तु॒रं म॒रुतो॑ रामयन्ती॒मे सहः॒ सह॑स॒ आ न॑मन्ति। इ॒मे शंसं॑ वनुष्य॒तो नि पा॑न्ति गु॒रु द्वेषो॒ अर॑रुषे दधन्ति॥

हे राजा! जो सेना को अच्छी शिक्षा देकर शीघ्र विशेष रचना कर बली शत्रुओं को भी जीत उत्तमों की रक्षा कर दुष्टों में द्वेष फैलाते हैं, वे तुम को सत्कार करने चाहियें॥१९॥

इ॒मे र॒ध्रं चि॑न्म॒रुतो॑ जुनन्ति॒ भृमिं॑ चि॒द्यथा॒ वस॑वो जु॒षन्त॑। अप॑ बाधध्वं वृषण॒स्तमां॑सि ध॒त्त विश्वं॒ तन॑यं तो॒कम॒स्मे॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्राणायामादिकों से अच्छे सिद्ध किये हुए पवन समृद्धि और कुपथ्य से सेवन किये दरिद्र[ता] को उत्पन्न करते हैं, वैसे ही सेवन किये हुए विद्वान् राज्य की वृद्धि और अपमान किये हुए राज्य का भङ्ग उत्पन्न करते हैं, अच्छी शिक्षा दिये और सत्कार कर रक्षा किये हुए शूरवीर जैसे शत्रुओं को नष्ट करते हैं, वैसे वर्त्तकर प्रजाजनों में उत्तम सन्तान राजजन उत्पन्न करावें॥२०॥

मा वो॑ दा॒त्रान्म॑रुतो॒ निर॑राम॒ मा प॒श्चाद्द॑ध्म रथ्यो विभा॒गे। आ नः॑ स्पा॒र्हे भ॑जतना वस॒व्ये॒३॒॑ यदीं॑ सुजा॒तं वृ॑षणो वो॒ अस्ति॑॥

मनुष्य सदैव विद्वानों के लिये देने योग्य सत्यासत्य व्यवहार से अलग न होवें, जो कुछ भी उत्तम सुख हो, उसको सब के लिये निवेदन करें॥२१॥

सं यद्धन॑न्त म॒न्युभि॒र्जना॑सः॒ शूरा॑ य॒ह्वीष्वोष॑धीषु वि॒क्षु। अध॑ स्मा नो मरुतो रुद्रियासस्त्रा॒तारो॑ भूत॒ पृत॑नास्व॒र्यः॥

जो वीरजन शत्रुओं को मारनेवाले, प्रजाओं के रक्षक और बड़ी-बड़ी ओषधियों में चतुर हैं, उनको स्वामी राजा प्रीति से रक्खें॥२२॥

भूरि॑ चक्र मरुतः॒ पित्र्या॑ण्यु॒क्थानि॒ या वः॑ श॒स्यन्ते॑ पु॒रा चि॑त्। म॒रुद्भि॑रु॒ग्रः पृत॑नासु॒ साळ्हा॑ म॒रुद्भि॒रित्सनि॑ता॒ वाज॒मर्वा॑॥

जो मनुष्य प्रशंसनीय कर्मों को करते हैं, उनका सदा ही विजय होता है॥२३॥

अ॒स्मे वी॒रो म॑रुतः शु॒ष्म्य॑स्तु॒ जना॑नां॒ यो असु॑रो विध॒र्ता। अ॒पो येन॑ सुक्षि॒तये॒ तरे॒माध॒ स्वमोको॑ अ॒भि वः॑ स्याम॥

जो मनुष्य, मनुष्यों को बलयुक्त करते और नौका आदिकों से समुद्र के पार होकर दूसरे देश में जाकर धन बटोरते हैं, वे आप लोगों और हम लोगों के रक्षक हों॥२४॥

तन्न॒ इन्द्रो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॒ग्निराप॒ ओष॑धीर्व॒निनो॑ जुषन्त। शर्म॑न्त्स्याम म॒रुता॑मु॒पस्थे॑ यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे बिजुली आदि पदार्थ सब की उन्नति और नाश करते हैं, वैसे ही दोषों का नाश कर और गुणों की वृद्धि करके सब की रक्षा को सब सदा करें॥२५॥इस सूक्त में वायु, विद्वान्, राजा, शूरवीर, अध्यापक, उपदेशक और रक्षक के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह छप्पनवाँ सूक्त और छब्बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

मध्वो॑ वो॒ नाम॒ मारु॑तं यजत्राः॒ प्र य॒ज्ञेषु॒ शव॑सा मदन्ति। ये रे॒जय॑न्ति॒ रोद॑सी चिदु॒र्वी पिन्व॒न्त्युत्सं॒ यदया॑सुरु॒ग्राः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो पवन, भूगोलों को घुमाते और धारण करते हैं और वृष्टियों से सीचते हैं, उनको जान कर विद्वान् जन कार्यों को कर के आनन्द करें॥१॥

नि॒चे॒तारो॒ हि म॒रुतो॑ गृ॒णन्तं॑ प्रणे॒तारो॒ यज॑मानस्य॒ मन्म॑। अ॒स्माक॑म॒द्य वि॒दथे॑षु ब॒र्हिरा वी॒तये॑ सदत पिप्रिया॒णाः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! आप लोग सम्पूर्ण पदार्थों के रचनेवाले पवनों के समूह को जान कर सब के प्रिय को सिद्ध करो॥२॥

नैताव॑द॒न्ये म॒रुतो॒ यथे॒मे भ्राज॑न्ते रु॒क्मैरायु॑धैस्त॒नूभिः॑। आ रोद॑सी विश्व॒पिशः॑ पिशा॒नाः स॑मा॒नम॒ञ्ज्य॑ञ्जते शु॒भे कम्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे विद्वान् शूरवीर जन शरीर और आत्मा के बल से युक्त और श्रेष्ठ आयुधों से युक्त हुए सङ्ग्रामों में प्रकाशित होते हैं, वैसे भीरु मनुष्य नहीं प्रकाशित होते हैं, जैसे प्राण सब जगत् को आनन्दित करते हैं, वैसे विद्वान् सब को सुखी करते हैं॥३॥

ऋध॒क्सा वो॑ मरुतो दि॒द्युद॑स्तु॒ यद्व॒ आगः॑ पुरु॒षता॒ करा॑म। मा व॒स्तस्या॒मपि॑ भूमा यजत्रा अ॒स्मे वो॑ अस्तु सुम॒तिश्चनि॑ष्ठा॥

हे मनुष्यो! अन्याय से अपराध का परित्याग कर और सत्य बुद्धि को ग्रहण कर वे पुरुषार्थ से सुखी होओ॥४॥

कृ॒ते चि॒दत्र॑ म॒रुतो॑ रणन्तानव॒द्यासः॒ शुच॑यः पाव॒काः। प्र णो॑ऽवत सुम॒तिभि॑र्यजत्राः॒ प्र वाजे॑भिस्तिरत पु॒ष्यसे॑ नः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो यथार्थवक्ता, धार्मिक, पवित्र, विद्वान् होके सब सबकी रक्षा करते हैं, वे सब को पुष्ट और सुखी कर सकते हैं॥५॥

उ॒त स्तु॒तासो॑ म॒रुतो॑ व्यन्तु॒ विश्वे॑भि॒र्नाम॑भि॒र्नरो॑ ह॒वींषि॑। ददा॑त नो अ॒मृत॑स्य प्र॒जायै॑ जिगृ॒त रा॒यः सू॒नृता॑ म॒घानि॑॥

हे मनुष्यो! जो प्रशंसा करनेवाले मनुष्य सम्पूर्ण शब्द और अर्थ के सम्बन्धों से सम्पूर्ण विद्याओं को प्राप्त कर और शोभित होकर प्रजाजनों के लिये सत्य वचन को देते हैं, वे सम्पूर्ण सुख को प्राप्त होते हैं॥६॥

आ स्तु॒तासो॑ मरुतो॒ विश्व॑ ऊ॒ती अच्छा॑ सू॒रीन्स॒र्वता॑ता जिगात। ये न॒स्त्मना॑ श॒तिनो॑ व॒र्धय॑न्ति यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

हे मनुष्यो! जो विद्वान् धर्म्मयुक्त कर्म्म करनेवाले असंख्य विद्या से युक्त, दयालु, न्यायकारी, यथार्थवक्ता जन हम सबों की निरन्तर वृद्धि करें, वृद्धि करके सदा रक्षा करते हैं, उनको ही हम लोग प्रशंसित करके सेवा करें॥७॥इस सूक्त में पवन के सदृश विद्वान् के गुणों और कृत्य का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की सङ्गति इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ जाननी चाहिये॥यह सत्तावनवाँ सूक्त और सत्ताईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र सा॑क॒मुक्षे॑ अर्चता ग॒णाय॒ यो दैव्य॑स्य॒ धाम्न॒स्तुवि॑ष्मान्। उ॒त क्षो॑दन्ति॒ रोद॑सी महि॒त्वा नक्ष॑न्ते॒ नाकं॒ निर्ऋ॑तेरवं॒शात्॥

हे मनुष्यो! जो वायु आदि की विद्या को जानते हैं, उनका नित्य सत्कार करके इनसे वायु की विद्या को प्राप्त होकर आप लोग श्रेष्ठ हूजिये॥१॥

ज॒नूश्चि॑द्वो मरुतस्त्वे॒ष्ये॑ण॒ भीमा॑स॒स्तुवि॑मन्य॒वोऽया॑सः। प्र ये महो॑भि॒रोज॑सो॒त सन्ति॒ विश्वो॑ वो॒ याम॑न्भयते स्व॒र्दृक्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वान् मनुष्यो! जो भयङ्कर मनुष्य आदि प्राणी हैं, उनका विश्वास नहीं करके उन को बड़े बल और पराक्रम से वश में करिये॥२॥

बृ॒हद्वयो॑ म॒घव॑द्भ्यो दधात॒ जुजो॑ष॒न्निन्म॒रुतः॑ सुष्टु॒तिं नः॑। ग॒तो नाध्वा॒ वि ति॑राति ज॒न्तुं प्र णः॑ स्पा॒र्हाभि॑रू॒तिभि॑स्तिरेत॥

हे मनुष्यो! जो विद्वान् जन सब की अवस्था को बढ़ाते हैं, प्रशंसित कर्मों को कराते हैं, वे ही सबों से सत्कार करने योग्य होते हैं॥३॥

यु॒ष्मोतो॒ विप्रो॑ मरुतः शत॒स्वी यु॒ष्मोतो॒ अर्वा॒ सहु॑रिः सह॒स्री। यु॒ष्मोतः॑ स॒म्राळु॒त ह॑न्ति वृ॒त्रं प्र तद्वो॑ अस्तु धूतयो दे॒ष्णम्॥

हे मनुष्यो! जैसे प्राण, शरीर आदि सब की रक्षा करके सुख को प्राप्त कराते हैं, वैसे ही विद्वान् जन शरीर, आत्मा, बल और अवस्था की रक्षा कर के सब को आनन्द देते हैं, उनकी रक्षा के बिना कोई भी चक्रवर्ती राजा होने को योग्य नहीं होता, तिस से ये सब काल में सत्कार करने योग्य होते हैं॥४॥

ताँ आ रु॒द्रस्य॑ मी॒ळ्हुषो॑ विवासे कु॒विन्नंस॑न्ते म॒रुतः॒ पुन॑र्नः। यत्स॒स्वर्ता॑ जिहीळि॒रे यदा॒विरव॒ तदेन॑ ईमहे तु॒राणा॑म्॥

हे मनुष्यो! जो पापी जन धार्मिक जनों के अनादर करनेवाले होवें, उनको दूर वसाना चाहिये और जो नम्रता आदि से युक्त धार्म्मिक होवें, उन को समीप बसावें, जिससे सब का श्रेष्ठ यश प्रकट होवे॥५॥

प्र सा वा॑चि सुष्टु॒तिर्म॒घोना॑मि॒दं सू॒क्तं म॒रुतो॑ जुषन्त। आ॒राच्चि॒द्द्वेषो॑ वृषणो युयोत यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

जो मनुष्य सदा ही सत्य के कहनेवाले हों, वे ही स्तुति करनेवाले होवें, उन के साथ बल को बढ़ाय के सब शत्रुओं को दूर करके श्रेष्ठों की सदा रक्षा करो॥६॥इस सूक्त में वायु और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह अट्ठावनवाँ सूक्त और अट्ठाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

यं त्राय॑ध्व इ॒दमि॑दं॒ देवा॑सो॒ यं च॒ नय॑थ। तस्मा॑ अग्ने॒ वरु॑ण॒ मित्रार्य॑म॒न्मरु॑तः॒ शर्म॑ यच्छत॥

हे विद्वान् जनो! आप लोग सत्य उपदेश, उत्तम शिक्षा और विद्या दान से सब मनुष्यों की उत्तम प्रकार रक्षा करके वृद्धि करिये, जिससे सब सुखी होवें॥१॥

यु॒ष्माकं॑ देवा॒ अव॒साह॑नि प्रि॒य ई॑जा॒नस्त॑रति॒ द्विषः॑। प्र स क्षयं॑ तिरते॒ वि म॒हीरिषो॒ यो वो॒ वरा॑य॒ दाश॑ति॥

हे मनुष्यो! जो दुष्टता के दूर करनेवाले, सब की रक्षा करनेवाले, विद्या आदि ऐश्वर्य्य के देनेवाले और सुख से सर्वदा वसानेवाले विद्वान् हों, उन्हीं की सेवा और मेल कर के विद्याओं को प्राप्त हूजिये॥२॥

न॒हि व॑श्चर॒मं च॒न वसि॑ष्ठः परि॒मंस॑ते। अ॒स्माक॑म॒द्य म॑रुतः सु॒ते सचा॒ विश्वे॑ पिबत का॒मिनः॑॥

हे मनुष्यो! जो आप लोग इच्छा की सिद्धि करने की इच्छा करें तो योग्य आहार और विहार जिसमें उस ब्रह्मचर्य्य को करिये॥३॥

न॒हि व॑ ऊ॒तिः पृत॑नासु॒ मर्ध॑ति॒ यस्मा॒ अरा॑ध्वं नरः। अ॒भि व॒ आव॑र्त्सुम॒तिर्नवी॑यसी॒ तूयं॑ यात पिपीषवः॥

हे मनुष्यो! आप लोग इस प्रकार से प्रयत्न करिये, जिससे आप लोगों की न्याय से रक्षा सेना की बढ़ती और उत्तम बुद्धि कभी न न्यून हो॥४॥

ओ षु घृ॑ष्विराधसो या॒तनान्धां॑सि पी॒तये॑। इ॒मा वो॑ ह॒व्या म॑रुतो र॒रे हि कं॒ मो ष्व१॒॑न्यत्र॑ गन्तन॥

हे धार्मिक विद्वानो! मैं आप लोगों का पूर्ण सत्कार करता हूँ, आप लोग अन्यत्र की इच्छा को न करिये, यहाँ ही करने योग्य कर्मों को यथावत् करके पूर्ण अभीष्ट सुख को यहाँ ही प्राप्त हूजिये॥५॥

आ च॑ नो ब॒र्हिः सद॑तावि॒ता च॑ नः स्पा॒र्हाणि॒ दात॑वे॒ वसु॑। अस्रे॑धन्तो मरुतः सो॒म्ये मधौ॒ स्वाहे॒ह मा॑दयाध्वै॥

हे विद्वानो! आप लोग सब मनुष्यों के लिये विद्या देने को प्रवृत्त हूजिये, विद्या ही से इनकी रक्षा कीजिये और ऐश्वर्य्य सब के लिये बढ़ाइये॥६॥

स॒स्वश्चि॒द्धि त॒न्वः१॒॑ शुम्भ॑माना॒ आ हं॒सासो॒ नील॑पृष्ठा अपप्तन्। विश्वं॒ शर्धो॑ अ॒भितो॑ मा॒ नि षे॑द॒ नरो॒ न र॒ण्वाः सव॑ने॒ मद॑न्तः॥

हे मनुष्यो! जैसे हंस पक्षी शीघ्र चलते हैं, वैसे देह से प्राण निकलते हैं और जैसे उत्तम मनुष्य सब के प्रिय होते हैं, वैसे ही विद्वान् जन सब के प्रिय होते हैं॥७॥

यो नो॑ मरुतो अ॒भि दु॑र्हृणा॒युस्ति॒रश्चि॒त्तानि॑ वसवो॒ जिघां॑सति। द्रु॒हः पाशा॒न्प्रति॒ स मु॑चीष्ट॒ तपि॑ष्ठेन॒ हन्म॑ना हन्तना॒ तम्॥

हे धार्मिक विद्वानो! आप लोग दुष्ट मनुष्यों को श्रेष्ठों से दूर करके मोह आदि बन्धनों को निवृत्त कर के उनके दोषों का नाश करके उन को शुद्ध करिये॥८॥

सांत॑पना इ॒दं ह॒विर्मरु॑त॒स्तज्जु॑जुष्टन। यु॒ष्माको॒ती रि॑शादसः॥

हे विद्वानो! आप लोग सबका रक्षण करके ग्रहण करने योग्य को ग्रहण कराइये॥९॥

गृह॑मेधास॒ आ ग॑त॒ म॑रुतो॒ माप॑ भूतन। यु॒ष्माको॒ती सु॑दानवः॥

हे गृहस्थ जनो! आप लोग विद्या आदि श्रेष्ठ गुणों के देनेवाले होकर धर्म्म और पुरुषार्थ के विरुद्ध मत होओ॥१०॥

इ॒हेह॑ वः स्वतवसः॒ कव॑यः॒ सूर्य॑त्वचः। य॒ज्ञं म॑रुत॒ आ वृ॑णे॥

हे विद्वानो! आप लोग विद्या आदि के प्रचार नामक कर्म्म की सदा उन्नति करिये॥११॥

त्र्य॑म्बकं यजामहे सु॒गन्धिं॑ पुष्टि॒वर्ध॑नम्। उ॒र्वा॒रु॒कमि॑व॒ बन्ध॑नान्मृ॒त्योर्मु॑क्षीय॒ मामृता॑त्॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! हम सब लोगों का उपास्य जगदीश्वर ही है, जिसकी उपासना से पुष्टि, वृद्धि, उत्तम यश और मोक्ष प्राप्त होता है, मृत्यु सम्बन्धि भय नष्ट होता है, उस का त्याग कर के अन्य की उपासना हम लोग कभी न करें॥१२॥इस सूक्त में वायु के दृष्टान्त से विद्वान् और ईश्वर के गुण और कृत्य के वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये॥यह ऋग्वेद में पाँचवे अष्टक में चौथा अध्याय तीसवाँ वर्ग तथा सप्तम मण्डल में उनसठवाँ सूक्त समाप्त हुआ॥

यद॒द्य सू॑र्य॒ ब्रवोऽना॑गा उ॒द्यन्मि॒त्राय॒ वरु॑णाय स॒त्यम्। व॒यं दे॑व॒त्रादि॑ते स्याम॒ तव॑ प्रि॒यासो॑ अर्यमन्गृ॒णन्तः॑॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! आप लोग सूर्य्य के सदृश प्रकाशक परमात्मा ही की प्रार्थना करो, हे परब्रह्मन्! आप हम लोगों के आत्माओं में अन्तर्य्यामी के स्वरूप से सत्य-सत्य उपदेश करिये, जिससे आपकी आज्ञा में वर्त्ताव कर के हम लोग आप के प्रिय होवें॥१॥

ए॒ष स्य मि॑त्रावरुणा नृ॒चक्षा॑ उ॒भे उदे॑ति॒ सूर्यो॑ अ॒भि ज्मन्। विश्व॑स्य स्था॒तुर्जग॑तश्च गो॒पा ऋ॒जु मर्ते॑षु वृजि॒ना च॒ पश्य॑न्॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे उदय को प्राप्त हुआ सूर्य्य समीप में वर्त्तमान स्थूल जगत् को प्रकाशित करता है, वैसे अन्तर्य्यामी ईश्वर स्थूल और सूक्ष्म जगत् और जीवों को सब प्रकार से प्रकाशित करता है और सब की उत्तम प्रकार रक्षा कर के सब के कर्मों को देखता हुआ यथायोग्य फल देता है॥२॥

अयु॑क्त स॒प्त ह॒रितः॑ स॒धस्था॒द्या ईं॒ वह॑न्ति॒ सूर्यं॑ घृ॒ताचीः॑। धामा॑नि मित्रावरुणा यु॒वाकुः॒ सं यो यू॒थेव॒ जनि॑मानि॒ चष्टे॑॥

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पवन सूर्य्य लोकों को सब ओर से धारण करते हैं, वैसे विद्वान् जन सूर्य्य, प्राण और पृथिवी आदि की विद्या को जानें॥३॥

उद्वां॑ पृ॒क्षासो॒ मधु॑मन्तो अस्थु॒रा सूर्यो॑ अरुहच्छु॒क्रमर्णः॑। यस्मा॑ आदि॒त्या अध्व॑नो॒ रद॑न्ति मि॒त्रो अ॑र्य॒मा वरु॑णः स॒जोषाः॑॥

हे विद्वानो! अध्यापक और उपदेशक से विद्या को प्राप्त हुए आप लोग पृथिवी आदि की विद्या को जान कर धनवान् हूजिये॥४॥

इ॒मे चे॒तारो॒ अनृ॑तस्य॒ भूरे॑र्मि॒त्रो अ॑र्य॒मा वरु॑णो॒ हि सन्ति॑। इ॒म ऋ॒तस्य॑ वावृधुर्दुरो॒णे श॒ग्मासः॑ पु॒त्रा अदि॑ते॒रद॑ब्धाः॥

जो पूर्ण विद्यायुक्त होते हैं, वे ही सत्य और असत्य के जाननेवाले होते हैं॥५॥

इ॒मे मि॒त्रो वरु॑णो दू॒ळभा॑सोऽचे॒तसं॑ चिच्चितयन्ति॒ दक्षैः॑। अपि॒ क्रतुं॑ सु॒चेत॑सं॒ वत॑न्तस्ति॒रश्चि॒दंहः॑ सु॒पथा॑ नयन्ति॥

जो अज्ञानियों को ज्ञानी और ज्ञानियों को शीघ्र विद्वान् करके सत्य धर्म्म के मार्ग से चलाकर पाप से पृथक् करते हैं, वे ही इस संसार में दुर्लभ हैं॥६॥

इ॒मे दि॒वो अनि॑मिषा पृथि॒व्याश्चि॑कि॒त्वांसो॑ अचे॒तसं॑ नयन्ति। प्र॒व्रा॒जे चि॑न्न॒द्यो॑ गा॒धम॑स्ति पा॒रं नो॑ अ॒स्य वि॑ष्पि॒तस्य॑ पर्षन्॥

जो विद्वान् जन बिजुली और भूमि आदि सम्पूर्ण सृष्टि की विद्या को जानते हैं, वे सब मनुष्यों को दुःख से पार ले जाने को समर्थ होते हैं॥७॥

यद्गो॒पाव॒ददि॑तिः॒ शर्म॑ भ॒द्रं मि॒त्रो यच्छ॑न्ति॒ वरु॑णः सु॒दासे॑। तस्मि॒न्ना तो॒कं तन॑यं॒ दधा॑ना॒ मा क॑र्म देव॒हेळ॑नं तुरासः॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो माता के, मित्र के और न्यायाधीश के सदृश सब को सत्य विद्या देकर सुख देते हैं और धार्मिक विद्वानों के अनादर को कभी भी नहीं करते हैं और सब सन्तानों की ब्रह्मचर्य्य और विद्या में रक्षा करते हैं, वे ही सम्पूर्ण जगत् के हित चाहनेवाले होते हैं॥८॥

अव॒ वेदिं॒ होत्रा॑भिर्यजेत॒ रिपः॒ काश्चि॑द्वरुण॒ध्रुतः॒ सः। परि॒ द्वेषो॑भिरर्य॒मा वृ॑णक्तू॒रुं सु॒दासे॑ वृषणा उ लो॒कम्॥

जो विद्वान् जन वेद से युक्त वाणियों से सम्पूर्ण व्यवहारों को सिद्ध करके और दुष्ट क्रियाओं और दुष्टों का त्याग करते हैं, वे ही उत्तम सुख को प्राप्त होते हैं॥९॥

स॒स्वश्चि॒द्धि समृ॑तिस्त्वे॒ष्ये॑षामपी॒च्ये॑न॒ सह॑सा॒ सह॑न्ते। यु॒ष्मद्भि॒या वृ॑षणो॒ रेज॑माना॒ दक्ष॑स्य चिन्महि॒ना मृ॒ळता॑ नः॥

हे मनुष्यो! जिसकी सत्य बुद्धि, विद्या, नीति, सेना और प्रजा वर्त्तमान है, वही शत्रुओं को सहता हुआ सब को सुखयुक्त करता है, वह महिमा से आनन्दित होता है॥१०॥

यो ब्रह्म॑णे सुम॒तिमा॒यजा॑ते॒ वाज॑स्य सा॒तौ प॑र॒मस्य॑ रा॒यः। सीक्ष॑न्त म॒न्युं म॒घवा॑नो अ॒र्य उ॒रु क्षया॑य चक्रिरे सु॒धातु॑॥

जो मनुष्य ईश्वर के विज्ञान के, उत्तम धन के लाभ के और श्रेष्ठ गृह के लिये क्रोध आदि दोषों का परित्याग कर के प्रयत्न करते हैं, वे सम्पूर्ण सुखों से युक्त होते हैं॥११॥

इ॒यं दे॑व पु॒रोहि॑तिर्यु॒वभ्यां॑ य॒ज्ञेषु॑ मित्रावरुणावकारि। विश्वा॑नि दु॒र्गा पि॑पृतं ति॒रो नो॑ यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

हे अध्यापक और उपदेशक जनो! जैसे आप दोनों सब के हित को करें, वैसे हम लोगों के दुष्ट व्यसनों को दूर कर के सब काल में हम लोगों की वृद्धि करें॥१२॥इस सूक्त में सूर्य्य आदि के दृष्टान्तों से विद्वानों के गुण और कृत्य के वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की सङ्गति इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ जाननी चाहिये॥यह साठवाँ सूक्त और द्वितीय वर्ग समाप्त हुआ॥

उद्वां॒ चक्षु॑र्वरुण सु॒प्रती॑कं दे॒वयो॑रेति॒ सूर्य॑स्तत॒न्वान्। अ॒भि यो विश्वा॒ भुव॑नानि॒ चष्टे॒ स म॒न्युं मर्त्ये॒ष्वा चि॑केत॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे सूर्य्य सम्पूर्ण लोकों को प्रकाशित करता है, वैसे अध्यापक और उपदेशक जन सब के आत्माओं को प्रकाशित करते हैं॥१॥

प्र वां॒ स मि॑त्रावरुणावृ॒तावा॒ विप्रो॒ मन्मा॑नि दीर्घ॒श्रुदि॑यर्ति। यस्य॒ ब्रह्मा॑णि सुक्रतू॒ अवा॑थ॒ आ यत्क्रत्वा॒ न श॒रदः॑ पृ॒णैथे॑॥

हे विद्वानो! जो बहुत काल पर्य्यन्त ब्रह्मचर्य्य से शास्त्रों को पढ़ता है, वही बुद्धिमान् होकर सब मनुष्यों की रक्षा करने को समर्थ होता है॥२॥इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्याणां श्रीपरमविदुषां विरजानन्दसरस्वतीस्वामिनां शिष्येण श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिना निर्मिते संस्कृतार्यभाषाभ्यां समन्विते सुप्रमाणयुक्त ऋग्वेदभाष्ये सप्तमे मण्डले चतुर्थानुवाक एकषष्टितमे सूक्ते पञ्चमाष्टके पञ्चमाध्याये तृतीयवर्गे द्वितीयमन्त्रस्य भाष्यं समाप्तम्॥उक्तस्वामिकृतं भाष्यं चैतावदेवेति॥सं० १९५६ वि० आषाढ कृष्णा ५ को छपके समाप्त हुआ॥

प्रोरोर्मि॑त्रावरुणा पृथि॒व्याः प्र दि॒व ऋ॒ष्वाद्बृ॑ह॒तः सु॑दानू। स्पशो॑ दधाथे॒ ओष॑धीषु वि॒क्ष्वृध॑ग्य॒तो अनि॑मिषं॒ रक्ष॑माणा॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे अध्यापक तथा उपदेशको! तुम सत्य का प्रचार तथा ओषधियों=अन्नादि द्वारा प्रजा का भले प्रकार रक्षण करो अर्थात् अपने सदुपदेश द्वारा मानस रोगों की और ओषधियों द्वारा शारीरिक रोगों की चिकित्सा करके संसार में सर्वथा सुख फैलाने का उद्योग करो॥३॥

शंसा॑ मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य॒ धाम॒ शुष्मो॒ रोद॑सी बद्बधे महि॒त्वा। अय॒न्मासा॒ अय॑ज्वनाम॒वीराः॒ प्र य॒ज्ञम॑न्मा वृ॒जनं॑ तिराते॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यो! संसार में सबसे उच्च पद अध्यापक तथा उपदेशकों का है, तुम लोग इनके पद की रक्षा के लिए यत्नवान् होओ, ताकि इनका बल बढ़कर संसार के सब अज्ञानादि पापों का नाशक हो और संसार मर्यादा में स्थिर रहे॥तात्पर्य्य यह है कि संसार में सब पापों तथा अवनतियों का मूल कारण एकमात्र अज्ञान ही है, इसलिए तुमको सबसे पहले अज्ञान की जड़ काटने के लिए अध्यापक तथा उपदेशक बढ़ाने चाहियें, क्योंकि जिस देश में उपदेशक और अध्यापकों की बलवृद्धि नहीं होती, उस देश में अज्ञान की जड़ भी नहीं कट सकती प्रत्युत अज्ञान की सन्तति बढ़कर अनैश्वर्य और दारिद्र्य सर्वत्र फैल जाता है, इसी दारिद्र्य की निवृत्ति के लिए परमात्मा ने पृथ्वी तथा अन्तरिक्षलोक में अव्याहतगति अर्थात् बिना रोक-टोक से गतिशील होने के लिए अध्यापक तथा उपदेशकों के कर्त्तव्यों का वर्णन किया है॥इसी भाव से कृष्णजी ने “काम एष क्रोध एषः” गी. ३।३७ में अज्ञान की जड़ काटने का उपदेश करते हुए बलपूर्वक कहा है कि जब तक ज्ञानरूप शस्त्र से अज्ञान का छेदन नहीं किया जाता, तब तक संसार का कल्याण कदापि नहीं हो सकता, ज्ञात होता है कि यह भाव कृष्णजी ने इसी स्थल के वेदमन्त्रों से लिया है॥४॥

अमू॑रा॒ विश्वा॑ वृषणावि॒मा वां॒ न यासु॑ चि॒त्रं ददृ॑शे॒ न य॒क्षम्। द्रुहः॑ सचन्ते॒ अनृ॑ता॒ जना॑नां॒ न वां॑ नि॒ण्यान्य॒चिते॑ अभूवन्॥

जिन अध्यापक वा उपदेशकों में वाणी की विचित्रता नहीं पाई जाती और जिन की वेदादि सच्छास्त्रों में श्रद्धा नहीं है, उनके अज्ञाननिवृत्तिविषयक भाव संसार में कभी नहीं फैल सकते और न उनकी वाणी वृष्टि के समान सद्गुणरूप अङ्कुर उत्पन्न कर सकती है, इसी प्रकार जो अध्यापक वा उपदेशक रात्रि दिन निन्दा स्तुति में तत्पर रहते हैं, वे भी दूसरों की अज्ञानग्रन्थियों का छेदन नहीं कर सकते, इसलिए उचित है कि उपदेष्टा लोगों को निन्दा-स्तुति के भावों से सर्वथा वर्जित रहकर अपने हृदय में श्रद्धा के अङ्कुर दृढ़तापूर्वक जमाने चाहियें, ताकि सारा संसार आस्तिक भावों से विभूषित हो॥५॥

समु॑ वां य॒ज्ञं म॑हयं॒ नमो॑भिर्हु॒वे वां॑ मित्रावरुणा स॒बाधः॑। प्र वां॒ मन्मा॑न्यृ॒चसे॒ नवा॑नि कृ॒तानि॒ ब्रह्म॑ जुजुषन्नि॒मानि॑॥

हे अध्यापक तथा उपदेशकों! मैं जिज्ञासु तुम्हारे यज्ञों को सत्कारपूर्वक स्वीकार करता हुआ प्रार्थना करता हूँ कि आपके उपदेश मुझे ब्रह्म की प्राप्ति करायें॥६॥

इ॒यं दे॑व पु॒रोहि॑तिर्यु॒वभ्यां॑ य॒ज्ञेषु॑ मित्रावरुणावकारि। विश्वा॑नि दु॒र्गा पि॑पृतं ति॒रो नो॑ यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि कर्म, उपासना तथा ज्ञान इन तीनों प्रकार के यज्ञों में अध्यापक तथा उपदेशक ही पुरोहित का कार्य्य करते और यही जनता=जनसमूह को सब विघ्नों से बचाकर उसकी रक्षा करते हैं, इसलिये जनता को समष्टिरूप से इनसे स्वस्ति की प्रार्थना करनी चाहिये॥७॥३॥इकसठ ६१ वाँ सूक्त समाप्त हुआ॥

उत्सूर्यो॑ बृ॒हद॒र्चींष्य॑श्रेत्पु॒रु विश्वा॒ जनि॑म॒ मानु॑षाणाम्। स॒मो दि॒वा द॑दृशे॒ रोच॑मानः॒ क्रत्वा॑ कृ॒तः सुकृ॑तः क॒र्तृभि॑र्भूत्॥

हे मनुष्यो! तुम उसी एकमात्र परमात्मा का आश्रयण करो, जो सब मनुष्यों के भूत, भविष्यत् तथा वर्त्तमान जन्मों को जानता, सदा एकरस रहता और जिसको इस चराचर ब्रह्माण्ड की रचना प्रतिदिन वर्णन करती है, वही स्वतःप्रकाश परमात्मा मनुष्यमात्र का उपास्यदेव है, इसी भाव से “सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च” यजु. १३।४६ में परमात्मा का सूर्य्य नाम से वर्णन किया है ॥१॥

स सू॑र्य॒ प्रति॑ पु॒रो न॒ उद्गा॑ ए॒भिः स्तोमे॑भिरेत॒शेभि॒रेवैः॑। प्र नो॑ मि॒त्राय॒ वरु॑णाय वो॒चोऽना॑गसो अर्य॒म्णे अ॒ग्नये॑ च॥

जपयज्ञ, योगयज्ञ तथा ध्यानयज्ञ, इत्यादि यज्ञ परमात्मप्राप्ति के साधन हैं, जिनके द्वारा निष्कामकर्मी को परमात्मा की प्राप्ति होती है। इस मन्त्र में परमात्मा अध्यापक, उपदेशक तथा विज्ञानी पुरुषों को उपदेश करते हैं कि तुम लोग इन यज्ञों का प्रचार करो, ताकि निष्कामता फैलकर संसार का उपकार हो॥२॥

वि नः॑ स॒हस्रं॑ शु॒रुधो॑ रदन्त्वृ॒तावा॑नो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॒ग्निः। यच्छ॑न्तु च॒न्द्रा उ॑प॒मं नो॑ अ॒र्कमा नः॒ कामं॑ पूपुरन्तु॒ स्तवा॑नाः॥

इस मन्त्र में प्रकाशस्वरूप परमात्मा से यह प्रार्थना है कि हे भगवन्! आप हमको अध्यापक, उपदेशक, ज्ञानी तथा विज्ञानी विद्वानों द्वारा सत्य का उपदेश करायें और अनन्त प्रकार का सुख, सत्यादि धन और जीवन में पवित्रता दें ताकि हम शुद्ध होकर आपकी कृपा के पात्र बनें॥३॥

द्यावा॑भूमी अदिते॒ त्रासी॑थां नो॒ ये वां॑ ज॒ज्ञुः सु॒जनि॑मान ऋष्वे। मा हेळे॑ भूम॒ वरु॑णस्य वा॒योर्मा मि॒त्रस्य॑ प्रि॒यत॑मस्य नृ॒णाम्॥

हे सर्वोपरि वर्त्तमान परमात्मन्! आप सच्चिदानन्दस्वरूप हैं, हमने मनुष्यजन्म पाकर आपको लाभ किया है, इसलिए हम प्रार्थना करते हैं कि हम पर प्राणवायु का कभी प्रकोप न हो और नाही हम पर कभी अपानवायु कुपित हो, इन दोनों के संयम से हम सदैव आपके ज्ञान का लाभ उठायें अर्थात् प्राणों के संयमरूप प्राणायाम द्वारा हम आपके ज्ञान की वृद्धि करते हुए प्राणापान वायु हमारे लिये कभी दुःख का कारण न हों, यह प्रार्थना करते हैं॥४॥

प्र बा॒हवा॑ सिसृतं जी॒वसे॑ न॒ आ नो॒ गव्यू॑तिमुक्षतं घृ॒तेन॑। आ नो॒ जने॑ श्रवयतं युवाना श्रु॒तं मे॑ मित्रावरुणा॒ हवे॒मा॥

मनुष्य की स्वाभाविक गति इस ओर होती है कि वह अपने मन, प्राण तथा इन्द्रियों को संबोधन करके कुछ कथन करे, साहित्य में इसको स्वभावोत्ति अलंकार और दर्शनिकों की परिभाषा में उपचार कहते हैं, यहाँ पूर्वोक्त अलंकार से प्राणापान को संबोधन करके यह कथन किया है कि प्राणयाम द्वारा हमारी इन्द्रियों में इस प्रकार का बल उत्पत्र हो, जिससे वे सन्मार्ग से कभी च्युत न हों अर्थात् अपने संयम में तत्पर रहें और इनको “युवाना” विशेषण इसलिए दिया है कि जिस प्रकार अन्य शारीरिक तत्त्व वृद्धावस्था में जाकर जीर्ण हो जाते हैं, इस प्रकार प्राणों में कोई विकार उत्पत्र नहीं होता, नित्य नूतन रहने के कारण इनको “युवा” कहा गया है॥५॥

नू मि॒त्रो वरु॑णो अर्य॒मा न॒स्त्मने॑ तो॒काय॒ वरि॑वो दधन्तु। सु॒गा नो॒ विश्वा॑ सु॒पथा॑नि सन्तु यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

अध्यापक उपदेशक तथा अन्य-अन्य विषयों के ज्ञाता विद्वानों को यजमान लोग अपने यज्ञों में बुलायें और सम्मानपूर्वक उनसे कहें कि हे विद्वद्गण! आप हमारे कल्याणार्थ स्वस्तिवाचनादि वाणियों से प्रार्थना करें और हमारे लिए कल्याणरूप मार्गों का उपदेश करें॥६॥

उद्वे॑ति सु॒भगो॑ वि॒श्वच॑क्षाः॒ साधा॑रणः॒ सूर्यो॒ मानु॑षाणाम्। चक्षु॑र्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य दे॒वश्चर्मे॑व॒ यः स॒मवि॑व्य॒क्तमां॑सि॥

परमात्मदेव ही अध्यापक तथा उपदेशकों को सन्मार्ग दिखलानेवाला, सब प्रकार के अज्ञानों का नाशक है, वह सर्वद्रष्टा, सर्वप्रकाशक तथा सर्वैश्वर्यसम्पन्न परमात्मा प्राणायामादि संयमों द्वारा हमारे हृदय में प्रकाशित होता है, इसी भाव को “चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य” यजु॰ ७।४२॥में प्रतिपादन किया है कि वही परमात्मा सबका प्रकाशक और सन्मार्ग दिखलानेवाला है। “साधारणः” शब्द सामान्यभाव से सर्वत्र व्याप्त होने के अभिप्राय से आया है, जिसका अर्थ ऊपर स्पष्ट है॥१॥

उद्वे॑ति प्रसवी॒ता जना॑नां म॒हान्के॒तुर॑र्ण॒वः सूर्य॑स्य। स॒मा॒नं च॒क्रं प॑र्या॒विवृ॑त्स॒न्यदे॑त॒शो वह॑ति धू॒र्षु यु॒क्तः॥

इस मन्त्र में परमात्मा को सर्वोपरि वर्णन करते हुए यह वर्णन किया है कि सबका स्वामी परमात्मा जो सम्राट् के केतु झंडे के समान सर्वोपरि विराजमान है, वह सूर्य्य, चन्द्रमा, पृथिवी तथा अन्तरिक्ष आदि कोटि-कोटि ब्रह्माण्डों को रथ के चक्र के समान अपनी धुराओं पर घुमाता हुआ सबको अपने नियम में चला रहा है, उस परमात्मा को संयमी पुरुष ध्यान द्वारा प्राप्त करते हैं॥जो लोग वेदमन्त्रों को सूर्यादि जड़ पदार्थों के उपासन तथा वर्णन में लगाते हैं, उनको इस मन्त्र के “सूर्य्यस्य” पद से यह अर्थ सीख लेना चाहिए कि वेद सूर्य्य के भी सूर्य्य को सूर्य्य नाम से कहता है, इसी अभिप्राय से इस सूक्त के प्रथम मन्त्र में परमात्मा को मनुष्यों का सूर्य्य और इस मन्त्र में उसको भौतिक सूर्य्य का चलानेवाला कहा है, इसी भाव को लेकर केनोपनिषद् २।२। में “चक्षुषश्चक्षुः” उसको चक्षु का भी चक्षु कथन किया है अर्थात् वह परमात्मा सूर्य्य का सूर्य्य, प्राण का प्राण तथा चक्षु का चक्षु है, या यों कहो कि सूर्य्य, प्राण और चक्षु आदि अनन्त नामों से उसी का वर्णन किया गया है, इसलिए परस्पर विरोध नहीं॥२॥

वि॒भ्राज॑मान उ॒षसा॑मु॒पस्था॑द्रे॒भैरुदे॑त्यनुम॒द्यमा॑नः। ए॒ष मे॑ दे॒वः स॑वि॒ता च॑च्छन्द॒ यः स॑मा॒नं न प्र॑मि॒नाति॒ धाम॑॥

भाव यह है कि वह परमात्मदेव प्रत्येक मनुष्य के हृदयरूपी धाम को समान भाव से जानता है, उसमें न्यूनाधिक भाव नहीं अर्थात् वह पक्षपात किसी के साथ नहीं करता। परमात्मभावों को अपने हृदयगत करना ही उसके प्रकाश होने का साधन है, वही सब ज्योतियों का ज्योति, सर्वोपरि विराजमान और वही सबका उपास्यदेव है, उसी की उपासना करनी चाहिये, अन्य की नहीं॥३॥

दि॒वो रु॒क्म उ॑रु॒चक्षा॒ उदे॑ति दू॒रेअ॑र्थस्त॒रणि॒र्भ्राज॑मानः। नू॒नं जनाः॒ सूर्ये॑ण॒ प्रसू॑ता॒ अय॒न्नर्था॑नि कृ॒णव॒न्नपां॑सि॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे पुरुषो! सन्मार्ग दिखलानेवाला प्रकाशस्वरूप परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण और चमकते हुए द्युलोक का भी प्रकाशक है, वह स्वतःप्रकाश प्रभु उन पुरुषों के हृदय में प्रकाशित होता है, जो उसकी आज्ञा का पालन करते और वेदविहित कर्म करके सफलता को प्राप्त होते हैं॥तात्पर्य यह है कि यावदायुष वेदविहित कर्म करनेवाले सत्कर्मी पुरुषों के हृदय में परमात्मा का प्रकाश होता है, निरुद्यमी, आलसी तथा अज्ञानियों के हृदय में नहीं, इसी भाव को “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः” यजु॰ ४०।२॥इस मन्त्र में निरूपण किया है कि वेदविहित कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करो॥४॥

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यत्रा॑ च॒क्रुर॒मृता॑ गा॒तुम॑स्मै श्ये॒नो न दीय॒न्नन्वे॑ति॒ पाथः॑। प्रति॑ वां॒ सूर॒ उदि॑ते विधेम॒ नमो॑भिर्मित्रावरुणो॒त ह॒व्यैः॥

परमात्मा अध्यापक तथा उपदेशकों को आज्ञा देते हैं कि तुम लोग प्रातःकाल उस स्वयं ज्योतिःप्रकाश की उपासना करो, जो विद्युत् के समान सर्वत्र परिपूर्ण है और जिस ज्योति की प्राप्ति के लिये मुक्त पुरुष अनेक उपाय करते रहे हैं, तुम लोग उस स्वयंप्रकाश परमात्मा की प्रतिदिन उपासना करो अर्थात् प्रातःकाल ब्रहायज्ञ तथा देवयज्ञ करके ध्यान द्वारा उसको सत्कृत करो ॥५॥ परमात्मा के लिये जो यहाँ “श्येनः” की उपमा दी है, वह उसके सर्वत्र परिपूर्ण होने के अभिप्राय से है, शीघ्रगामी होने के अभिप्राय से नहीं। निरुक्त एकादश अध्याय में श्येन के अर्थ इन्द्र किये हैं और इन्द्र तथा विद्युत् यह एकार्थवाची शब्द है, इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है कि “शंसनीयं गच्छतीति श्येनः”=जो सर्वोपरि गतिशील हो, उसका नाम “श्येन” है॥और जो कोई एक लोग श्येन के अर्थ “बाज” पक्षी के करते हैं कि बाज बहुत शीघ्र एक स्थान से उड़कर स्थानान्तर को प्राप्त हो जाता है, इसी प्रकार यह भौतिक सूर्य्य भी उसी की न्याई शीघ्रग्रामी है, या यों कहो  कि गृध्र=“गिद्ध” पक्षी के समान वेगवाला है, यह अर्थ सायणाचार्य्य ने किये हैं, हमारे विचार में ऐसे अर्थ करने ही से वेदों का महत्त्व लोगों के हृदय से उठ रहा है। जब निरुक्तकार ने श्येन के अर्थ स्पष्टतया इन्द्र के किये हैं तो फिर यहाँ गिद्ध तथा बाज आदि पक्षियों का ग्रहण करना कैसे संगत हो सकता है, इसी प्रकार निरुक्तादि प्राचीन वेदाङ्गों का आश्रय छोड़कर सायणादि भाष्यकारों ने अनेक स्थलों में भूल की है, जैसा कि इसी मन्त्र में “सूर” के अर्थ भौतिक सूर्य्य करके मन्त्रार्थ यह किया है कि इस भौतिक सूर्य्य के गमनार्थ देवताओं ने आकाश में सड़क बनाई है, जिसमे वह श्येन तथा गृध्र से भी शीघ्र चलता है, इसलिये उसके उदयकाल में नमस्कारों से उसकी वन्दना करनी चाहिए। इसका उत्तर यह है कि जब इसी सूक्त के दूसरे मन्त्र में उस शक्ति को इस भौतिक सूर्य्य का चालक कथन किया गया है और अनेक स्थलों में यह कथन किया गया है कि उसी शक्ति से यह सूर्य्य उत्पत्र होता है, जैसा कि “चक्षोः सूर्यो अजायत”॥यजु॰ ३१।१२=उसी चक्षुरूप शक्ति से सूर्य्य उत्पन्न हुआ, फिर उक्त अर्थ के विरुद्ध यहाँ भौतिक सूर्य्य की उपासना सिद्ध करना वेदाशय से सर्वथा विरुद्ध है॥५॥

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नू मि॒त्रो वरु॑णो अर्य॒मा न॒स्त्मने॑ तो॒काय॒ वरि॑वो दधन्तु। सु॒गा नो॒ विश्वा॑ सु॒पथा॑नि सन्तु यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

इस मन्त्र में परमात्मा से प्रार्थना है कि हे प्रभो! आप हमारे लिए सर्वदा=सब काल में कल्याणदायक हों और आपकी कृपा से हमको सब ऐश्वर्य तथा सुखों की प्राप्ति हो। इस मन्त्र में जो मित्र, वरुण तथा अर्यमा शब्द आये हैं, वे सब परमात्मा के नाम हैं, “शं नो मित्रः शं वरुणः शं नो भवत्वर्यमा”॥यजु॰ ३६।९॥में मित्रादि सब नाम परमात्मा के हैं॥कहीं मित्र, वरुण के अर्थ अध्यापक तथा उपदेशक, कहीं प्राणवायु तथा उदानवायु और कहीं परमात्मा करते हो, आपके इस भिन्नार्थ करने में क्या हेतु है? इसका उत्तर यह है कि जैसे एक ही “ब्रह्म” शब्द कहीं वेद का वाचक, कहीं प्रकृति का वाचक, कहीं अन्न का और मुख्यतया परमात्मा का वाचक है, इसी प्रकार उपर्युक्त नाम मुख्यतया ब्रह्म के प्रतिपादक हैं और गौणी वृत्ति से अध्यापक तथा उपदेशक आदि नामों में भी वर्त्तते हैं। इसी भाव को महर्षि व्यास ने “स्याच्चैकस्य ब्रह्मशब्दवत्” ब्र० सू० २।३।५॥में यह वर्णन किया है कि एक ही शब्द प्रकरणभेद से ब्रह्म शब्द के समान नाना अर्थों का वाचक होता है, इसलिए कोई विरोध नहीं॥६॥६३ वाँ सूक्त समाप्त हुआ।

दि॒वि क्षय॑न्ता॒ रज॑सः पृथि॒व्यां प्र वां॑ घृ॒तस्य॑ नि॒र्णिजो॑ ददीरन्। ह॒व्यं नो॑ मि॒त्रो अ॑र्य॒मा सुजा॑तो॒ राजा॑ सुक्ष॒त्रो वरु॑णो जुषन्त॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यो! तुम द्युलोक तथा पृथिवीलोक की विद्या जाननेवाले अध्यापक तथा उपदेशकों में प्रेमभाव धारण करो और राजसूय यज्ञ के रचयिता जो क्षत्रिय लोग हैं, उनका प्रीति से सेवन करो, ताकि तुम्हारे राजा का पृथिवी तथा द्युलोक के मध्य में सर्वत्र ऐश्वर्य विस्तृत हो, जिससे तुम सांसारिक अभ्युदय को प्राप्त होकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करो अर्थात् जो सब का मित्र न्यायकारी कुलीन और जो डाकू चोर तथा अन्यायकारियों के दुःखों से छुड़ानेवाला हो, ऐसे राजा की प्रेमलता को अपने स्नेह से सिञ्चन करो॥१॥

आ रा॑जाना मह ऋतस्य गोपा॒ सिन्धु॑पती क्षत्रिया यातम॒र्वाक्। इळां॑ नो मित्रावरुणो॒त वृ॒ष्टिमव॑ दि॒व इ॑न्वतं जीरदानू॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे राजा लोगो! तुम सदा सत्य का पालन करो और एकमात्र सत्य पर ही अपने राज्य का निर्भर रक्खो, सब प्रजावर्ग को दुःखों से बचाने का प्रयत्न करो और अपने देश में विद्याप्रचार तथा धर्मप्रचार करनेवाले विद्वानों का धनादि से सत्कार करो, ताकि तुम्हारा ऐश्वर्य प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त हो॥२॥

मि॒त्रस्तन्नो॒ वरु॑णो दे॒वो अ॒र्यः प्र साधि॑ष्ठेभिः प॒थिभि॑र्नयन्तु। ब्रव॒द्यथा॑ न॒ आद॒रिः सु॒दास॑ इ॒षा म॑देम स॒ह दे॒वगो॑पाः॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे राजा तथा प्रजाजनो! तुम उस सर्वोपरि न्यायकारी परमात्मा की आज्ञा का यथावत् पालन करो, जिससे तुम मनुष्यजन्म के फलचतुष्टय को प्राप्त कर सको, तुमको तुम्हारे अध्यापक, उपदेष्टा तथा न्यायाधीश सदैव उत्तम मार्गों से चलायें, जिससे तुम्हारा ऐश्वर्य प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त हो॥३॥

यो वां॒ गर्तं॒ मन॑सा॒ तक्ष॑दे॒तमू॒र्ध्वां धी॒तिं कृ॒णव॑द्धा॒रय॑च्च। उ॒क्षेथां॑ मित्रावरुणा घृ॒तेन॒ ता रा॑जाना सुक्षि॒तीस्त॑र्पयेथाम्॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि जो राजा लोग अपनी प्रजा में विद्या तथा धार्मिक भावों के प्रचारार्थ अध्यापक और बड़े-बड़े विद्वान् धार्मिक उपदेशकों का अपने स्नेह से पालन-पोषण करते हैं, वे अपनी प्रजा को उन्नत करते हैं और जो प्रजाजन उन महात्माओं के उपदेशों को मन से विचार कर अनुष्ठान करते हैं, वे कभी अवनति को प्राप्त नहीं होते, प्रत्युत सद उन्नति की ओर जाते हैं॥४॥

ए॒ष स्तोमो॑ वरुण मित्र॒ तुभ्यं॒ सोमः॑ शु॒क्रो न वा॒यवे॑ऽयामि। अ॒वि॒ष्टं धियो॑ जिगृ॒तं पुरं॑धीर्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे विद्वानो! यह विद्यारूपी यज्ञ तुम्हारे लिए बल तथा प्रकाश देनेवाला हो और यह यज्ञ तुम्हारे सम्पूर्ण कर्मों को सफल करे, तुम्हारी बुद्धियें सदा उत्तम कर्मों में प्रवृत्त रहें, तुम इस यज्ञ की पूर्णाहुति में सदा यहाँ प्रार्थना किया करो कि परमात्मा मङ्गलमय भावों से सदैव हमको पवित्र करे॥५॥६४ वाँ सूक्त और छठवाँ वर्ग समाप्त हुआ।

प्रति॑ वां॒ सूर॒ उदि॑ते सू॒क्तैर्मि॒त्रं हु॑वे॒ वरु॑णं पू॒तद॑क्षम्। ययो॑रसु॒र्य१॒॑मक्षि॑तं॒ ज्येष्ठं॒ विश्व॑स्य॒ याम॑न्ना॒चिता॑ जिग॒त्नु॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे  पुरुषों! तुम सब सूर्योदयकाल में वेदमन्त्रों द्वारा सर्वपूज्य परमात्मा की उपासना करो, जिससे तुम्हें अक्षत बल तथा मनोवाञ्छित फल की प्राप्ति होगी और तुम संग्राम में अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करोगे। यहाँ द्विवचन से राजा तथा प्रजा दोनों का ग्रहण है अर्थात् राजा और प्रजा दोनों उपासनाकाल में प्रार्थना करें कि हे भगवन्! आप हमको अक्षत बल प्रदान करें, जिससे हम अपने शत्रुओं को जीत सकें॥इस मन्त्र में सूर्योदयसमय सन्ध्या तथा उपासना का विधान स्पष्ट पाये जाने से सबका परम कर्त्तव्य है कि सूर्योदयसमय ब्राह्म मुहूर्त में परमात्मा की उपासना करें, जिससे बुद्धि, बल तथा सब प्रकार का ऐश्वर्य्य प्राप्त हो॥१॥

ता हि दे॒वाना॒मसु॑रा॒ ताव॒र्या ता नः॑ क्षि॒तीः क॑रतमू॒र्जय॑न्तीः। अ॒श्याम॑ मित्रावरुणा व॒यं वां॒ द्यावा॑ च॒ यत्र॑ पी॒पय॒न्नहा॑ च॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यों! तुम प्रतिदिन परमात्मपरायण होने के लिये प्रयत्न करो, जो लोग प्रतिदिन परमात्मा से प्रार्थना करते हुए अपनी वृद्धि की इच्छा करते हैं, वे द्युलोक तथा पृथिवीलोक के ऐश्वर्य्य को प्राप्त होते हैं, इसलिए तुम सदैव अपनी वृद्धि के लिए प्रार्थना किया करो॥२॥

ता भूरि॑पाशा॒वनृ॑तस्य॒ सेतू॑ दुर॒त्येतू॑ रि॒पवे॒ मर्त्या॑य। ऋ॒तस्य॑ मित्रावरुणा प॒था वा॑म॒पो न ना॒वा दु॑रि॒ता त॑रेम॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यों! जल की नौकाओं के समान तुम्हारे तराने का एकमात्र साधन परमात्मा ही है, इसलिए तुम सेतु के समान उस पर विश्वास करके इस संसाररूप भवसागर को, जिसमें रिपु आदि अनेक प्रकार के दुरितरूप नक और असत्यादि अनेक प्रकार के भँवर हैं, इन सब से बचकर पार होने के लिए तुम्हें एकमात्र जगदीश्वर का ही अवलम्बन करना चाहिए, अन्य कोई साधन नहीं॥३॥

आ नो॑ मित्रावरुणा ह॒व्यजु॑ष्टिं घृ॒तैर्गव्यू॑तिमुक्षत॒मिळा॑भिः। प्रति॑ वा॒मत्र॒ वर॒मा जना॑य पृणी॒तमु॒द्नो दि॒व्यस्य॒ चारोः॑॥

हे दिव्यशक्तिसम्पन्न परमात्मन्! आप हमारी यज्ञभूमि को अन्न तथा स्निग्ध द्रव्यों से सदैव सिञ्चन करते रहें और हमको द्युलोकादि दिव्य स्थानों में विचरने के लिए उत्तम साधन प्रदान करें, जिससे हम अव्याहतगति होकर आपके लोक-लोकान्तरों में परिभ्रमण कर सकें, यह हमारी आपसे प्रार्थना है॥४॥

ए॒ष स्तोमो॑ वरुण मित्र॒ तुभ्यं॒ सोमः॑ शु॒क्रो न वा॒यवे॑ऽयामि। अ॒वि॒ष्टं धियो॑ जिगृ॒तं पुरं॑धीर्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

इस विज्ञानमय यज्ञ में स्नेह तथा आकर्षणरूपशक्तिप्रधान परमात्मा से यह प्रार्थना की गयी है कि हे भगवन्! आप हमें सौम्यस्वभाव, बलिष्ठ तथा आदित्य के समान तेजस्वी बनायें और हमारी बुद्धि की सब ओर से रक्षा करें, ताकि हम सदा प्रबुद्ध और अपने उद्योगों में तत्पर रहें, आपसे यही प्रार्थना है कि आप सदैव हम पर कृपा करते रहें॥५॥६५ वाँ सूक्त और सातवाँ वर्ग समाप्त हुआ।

प्र मि॒त्रयो॒र्वरु॑णयोः॒ स्तोमो॑ न एतु शू॒ष्यः॑। नम॑स्वान्तुविजा॒तयोः॑॥

“विगतम् जातम् यस्मात्स विजात:”=जिससे जन्म विगत हो, उसको “विजात” कहते हैं, अर्थात् विजात के अर्थ यहाँ आकृतिरहित के हैं अथवा “जननं जातम्”=उत्पन्न होनेवाले को “जात” और इससे विपरीत जन्मरहित को “अजात” कहते हैं। इस मन्त्र में जन्म तथा मृत्यु से रहित मित्रावरुण नामक परमात्मा से यह प्रार्थना की गई है कि हे भगवन्! आप ऐसी कृपा करें, जिससे हमारा यह विज्ञानरूपी यज्ञ सब प्रकार के सुखों का देनेवाला और प्रभूत अन्न से समृद्ध हो ॥यदि यह कहा जाय कि “विजातयो:” द्विवचन होने से यहाँ मित्र और वरुण दो देवताओं का ही ग्रहण हो सकता है, एक ईश्वर का नहीं ? इसका उत्तर यह है कि “मित्रयो:” “वरुणयो:” यहाँ भी एक शब्द में द्विवचन है, परन्तु अर्थ एक के ही किये जाते हैं। जिसका कारण यह समझना चाहिये कि वेद में वचन, विभक्ति तथा लिङ्ग का नियम नहीं, अर्थात् “बहुलं छन्दसि” अष्टा० २।४।७३॥ इस पाणिनिकृत सूत्र के अनुसार छन्द=वेद में सब बातों का व्यत्यय हो जाता है, इसलिये कोई दोष नहीं ॥और जो लोग “नमः” शब्द का अर्थ अन्न नहीं मानते, उनको ध्यान रखना चाहिए कि उपर्युक्त मन्त्र में “नम:” शब्द अन्न का वाचक है, जैसा कि अर्थ से स्पष्ट है, किसी अन्य पदार्थ का नहीं ॥१॥

या धा॒रय॑न्त दे॒वाः सु॒दक्षा॒ दक्ष॑पितरा। अ॒सु॒र्या॑य॒ प्रम॑हसा॥

इस मन्त्र में भी द्विवचन अविवक्षित है अर्थात् “या” से “यौ” के अर्थों का ग्रहण नहीं, किन्तु यह अर्थ है कि हे परमात्मन्! आपको विद्वान् लोग धारण करते हैं, आप सर्वोपरि दक्ष और दक्षों के भी रक्षक हैं, आप हमारे इस विज्ञानयज्ञ में अपनी दक्षता से सहायक हों॥तात्पर्य्य यह है कि कलाकौशलप्रधान यज्ञ को “विज्ञानयज्ञ” कहते हैं और यह यज्ञ कुशलता के बिना कदापि नहीं आ सकता, इसलिए सर्वोपरि कुशल=दक्ष परमात्मा के साहाय्य की इस मन्त्र में प्रार्थना की है। स्मरण रहे कि दक्ष, कुशल, चतुर तथा निपुण, ये सब पर्यायवाची शब्द हैं॥२॥

ता नः॑ स्ति॒पा त॑नू॒पा वरु॑ण जरितॄ॒णाम्। मित्र॑ सा॒धय॑तं॒ धियः॑॥

इस मन्त्र में “तनूपा” परमात्मा से सब प्रकार की पवित्रता के लिए प्रार्थना की गई है कि हे भगवन्! आप हमको सब प्रकार से पवित्र करें अथवा स्तिपा, तनूपा आदि सब परमात्मा के नाम हैं, जो गृहादि स्थनों को पवित्रे करे, उसका नाम “स्तिपा” और जो शरीरों को पवित्र करे, उसको “तनूपा” कहते हैं, इत्यादि नामयुक्त परमात्मा से पवित्रता की प्रार्थना करके पश्चात् विज्ञानयज्ञ में क्रियाकौशल की सिद्धि के लिए बुद्धि को साधनसम्पन्न करने की प्रार्थना की गई है॥३॥

यद॒द्य सूर॒ उदि॒तेऽना॑गा मि॒त्रो अ॑र्य॒मा। सु॒वाति॑ सवि॒ता भगः॑॥

मनुष्यों को जो प्रतिदिन धन तथा ऐश्वर्य्य प्राप्त होता है, वह सब परमेश्वर की कृपा से मिलता है, मानो वह सत्कर्मियों को अपने हाथ से बाँटता है और दुष्कर्मी हाथ मलते हुए देखते रहते हैं, इसलिए भग=सर्वऐश्वर्य्यसम्पन्न परमात्मा से सत्कर्मों द्वारा उस ऐश्वर्य्य की प्रार्थना कथन की गई है कि आप कृपा करके हमें भी प्रतिदिन वह ऐश्वर्य्य प्रदान करें॥“भग” नाम मुख्यतया परमात्मा का और गौणीवृत्ति से ऐश्वर्य्य का भी नाम “भग” है, इसलिए ऐश्वर्य्यसम्पन्न पुरुषों और आध्यात्मिक ऐश्वर्य्यसम्पन्न ऋषि-मुनियों को भी भगवान् कहा जाता है, अन्य अर्यमादि सब नाम परमात्मा के हैं, जैसा कि पीछे भी “शं नो मित्र: शं वरुण: शन्नो भवत्वर्यमा” इत्यादि मन्त्रों से सिद्ध कर आये हैं और सब स्पष्ट है॥४॥

सु॒प्रा॒वीर॑स्तु॒ स क्षयः॒ प्र नु याम॑न्त्सुदानवः। ये नो॒ अंहो॑ऽति॒पिप्र॑ति॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि दानी तथा यज्ञशील यजमानों के मार्ग सदा निर्विघ्न होते और उनके पापों का सदैव क्षय होता है। अर्थात् जब वे अपने शुद्ध हृदय द्वारा परमात्मा से प्रार्थना करते हैं कि हे भगवन्! आप हमारे पापों का क्षय करें, तब उनको इस कर्म का फल अवश्य शुभ होता है। यद्यपि वैदिक मत में केवल प्रार्थना का फल मनोऽभिलषित पदार्थों की प्राप्ति नहीं हो सकता, तथापि प्रार्थना द्वारा अपने हृदय की न्यूनताओं को अनुभव करने से उद्योग का भाव उत्पन्न होता है, जिसका फल परमात्मा अवश्य देते हैं, या यों कहों कि अपनी न्यूनताओं को पूर्ण करते हुए जो प्रार्थना की जाती है, वह सफल होती है॥५॥

उ॒त स्व॒राजो॒ अदि॑ति॒रद॑ब्धस्य व्र॒तस्य॒ ये। म॒हो राजा॑न ईशते॥

न्यायपूर्वक प्रजाओं का पालन करना राजाओं का “अखण्डित महाव्रत” है। जो राजा इस व्रत का पालन करता है अर्थात् किसी पक्षपात से न्याय को भङ्ग नहीं करता, वह स्वराज्य=अपनी स्वतन्त्र सत्ता से सदा विराजमान होता है। इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है कि “स्वयं राजते इति स्वराट्”=जो स्वतन्त्र सत्ता से विराजमान हो, उसका नाम “स्वराट्” और “स्वयं राजते इति स्वराज:”=जो स्वयं विराजमान हो, उसको “स्वराज” कहते हैं और यह बहुवचन में बनता है। यहाँ “स्वराज” शब्द “राजान:” का विशेषण है। अर्थात् वे ही राजा लोग स्वराज का लाभ करते हैं, जो न्याय-नियम से प्रजापालक होते हैं, अन्य नहीं॥कई एक मन्त्रों में “स्वराज” शब्द ईश्वर के लिए भी आता है, क्योंकि वह वास्तव में अपनी सत्ता से विराजमान है और अन्य सब राजा प्रजा किसी न किसी प्रकार से परतन्त्र ही रहते हैं, सर्वथा स्वतन्त्र कदापि नहीं हो सकते॥और जहाँ “स्वाराज्य” शब्द आता है, वहाँ यह अर्थ होते हैं कि “स्वर् राज्यं स्वाराज्यं” =जो देवताओं का राज्य हो, वह “स्वाराज्य” कहलाता है। इस पद में “स्वर” तथा “राज” दो शब्द हैं, “स्वर” शब्द के रकार का लोप होकर पूर्वपद को दीर्घ हो जाने से “स्वाराज” बनता और इसी के भाव को “स्वराज्य” कहते हैं, इस प्रकार कहीं “स्वराज्य” और कहीं “स्वराज” ये दोनों शब्द वेदों के अनेक मन्त्रों में आते हैं, जो कहीं ईश्वर के अर्थ देते और कहीं देवताओं के राज्य के अर्थ देते हैं, इनसे भिन्न अर्थ में इनका व्यवहार नहीं देखा जाता॥और जो आजकल कई एक लोग परराज्य की अपेक्षा से अपने राज्य के लिए “स्वराज्य” शब्द का व्यवहार करते हैं, वह वेद तथा शास्त्रों में कहीं नहीं पाया जाता, क्योंकि वैदिक सिद्धान्त में जो उत्तम गुणों से सम्पन्न हो, वह देवता और जो उक्त गुणों से रहित हो, उसको असुर कहते हैं, इस परिभाषा के अनुसार जो देवता है, वह अपना और असुर पराया है, यही मर्यादा सदा से चली आई है॥६॥

प्रति॑ वां॒ सूर॒ उदि॑ते मि॒त्रं गृ॑णीषे॒ वरु॑णम्। अ॒र्य॒मणं॑ रि॒शाद॑सम्॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे राजा तथा प्रजा के लोगो! तुम्हारा सबका यह कर्त्तव्य है कि तुम प्रात:काल उठकर पूजनीय परमात्मा की उपासना करो, जो किसी का पक्षपात नहीं करता और वह स्वकर्मानुसार सबको शुभाशुभ फल देता है। ऐसे न्यायाधीश को लक्ष्य रखकर उपासना करने से मनुष्य स्वयं भी न्यायकारी और धर्मात्मा बन जाता है॥७॥

रा॒या हि॑रण्य॒या म॒तिरि॒यम॑वृ॒काय॒ शव॑से। इ॒यं विप्रा॑ मे॒धसा॑तये॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यों! तुम ऐसी बुद्धि उत्पन्न करो, जिससे किसी की हिंसा न हो और जो बुद्धि ज्ञानयज्ञ, योगयज्ञ, तथा कर्मयज्ञ आदि सब यज्ञों को सिद्ध करनेवाली हो, इस प्रकार की बुद्धि धारण करने से तुम बलवान् तथा ऐश्वर्य्यसम्पन्न होगे, इसलिए तुमको “धियो यो नः प्रचोदयात्” इस गायत्री तथा अन्य मन्त्रों द्वारा सदैव शुभमति की प्रार्थना करनी चाहिए॥८॥

ते स्या॑म देव वरुण॒ ते मि॑त्र सू॒रिभिः॑ स॒ह। इष॒ स्व॑श्च धीमहि॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि यजमान लोगों! तुम इस प्रकार प्रार्थना करो कि हे परमात्मदेव! हम लोग सब प्रकार के ऐश्वर्य्य को प्राप्त हों, न केवल हम किन्तु ऋत्विगादि सब विद्वानों के साथ हम आनन्दलाभ करें॥इस मन्त्र में ऐश्वर्य्य तथा आनन्द इन दो पदार्थों की प्रार्थना है, परन्तु कई एक टीकाकारों ने इन उच्चभावों से भरे हुए अर्थों को छोड़कर “इष” के अर्थ अन्न “स्व” के अर्थ जल किये हैं, जिसका भाव यह है कि हे ईश्वर! तू हमें अन्न जल दे। हमारे विचार में इन टीकाकारों ने वेद के उच्चभाव को नीचा कर दिया है। “स्व:” शब्द सर्वत्र आनन्द के अर्थों में आता है, उसके अर्थ यहाँ केवल जल करना वेद के विस्तृतभाव को संकुचित करना है, अस्तु, भाव यह है कि इस मन्त्र में परमात्मा से सब प्रकार के ऐश्वर्य्य और आध्यात्मिक आनन्द की प्रार्थना की गई है, जो सर्वथा सङ्गत है॥९॥

ब॒हवः॒ सूर॑चक्षसोऽग्निजि॒ह्वा ऋ॑ता॒वृधः॑। त्रीणि॒ ये ये॒मुर्वि॒दथा॑नि धी॒तिभि॒र्विश्वा॑नि॒ परि॑भूतिभिः॥

जो विद्वान् पुरुष अपने शुभकर्मों द्वारा कर्मक्षेत्र को विस्तृत करते हैं, वे ही सब प्रकार के फलों को प्राप्त होते और कर्म, उपासना तथा ज्ञान द्वारा मनुष्य जन्म के धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षरूप फलचतुष्टय को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार के विद्वान् सूर्य्यसमान प्रकाश को लाभ करते हैं और अग्नि के सदृश उनकी वाणी असत्यरूप समिधाओं को जलाकर सदैव सत्यरूपी यज्ञ करती है। अर्थात् सत्कर्मी, अनुष्ठानी तथा विज्ञानी विद्वानों का ही काम है कि वे परस्पर मिलकर कर्मभूमि को विस्तृत करें, या यों कहो कि कर्मयोग के क्षेत्र में कटिबद्ध हों॥१०॥

वि ये द॒धुः श॒रदं॒ मास॒मादह॑र्य॒ज्ञम॒क्तुं चादृच॑म्। अ॒ना॒प्यं वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा क्ष॒त्रं राजा॑न आशत॥

शरद् ऋतु के प्रारम्भ में जो यज्ञ किया जाता है, उसका नाम “शारद” यज्ञ है। यह यज्ञ रात्रि-दिन अनवरत किया जाता है। जो विद्वान् अनुष्ठानपरायण होकर इस वार्षिक यज्ञ को पूर्ण करते हैं, वे दीप्तिमान् होकर सत्कारार्ह होते हैं॥ज्ञात होता है कि जिसका नाम वार्षिक उत्सव है, वह वैदिक समय में शरद् ऋतु के प्रारम्भ में होता था और उस समय सब आर्य्य पुरुष अपने-अपने कर्मों की जाँच पड़ताल किया करते थे। जिस प्रकार नये संवत् के चढ़ने पर अनुष्ठानी तथा सुकर्मी उन्नतिशील पुरुषों को अत्यन्त हर्ष होता है, इसी प्रकार उस समय उत्सव मनाया जाता था और हर्षित हुए आर्य्यपुरुष परमात्मा से प्रार्थना करते थे कि “पश्येम शरद: शतं जीवेम शरद: शतं०”=हे परमात्मन्! हम सौ वर्ष तक जीवें और कृपा करके आप हमें यावदायुष देखने तथा सुनने की शक्ति प्रदान करें, इत्यादि यह कर्मयोगप्रधान “शारद” यज्ञ अब भी आर्यावर्त्त में “शरत् पूर्णिमादि” उत्सवों द्वारा मनाया जाता है॥११॥

तद्वो॑ अ॒द्य म॑नामहे सू॒क्तैः सूर॒ उदि॑ते। यदोह॑ते॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा यू॒यमृ॒तस्य॑ रथ्यः॥

इस मन्त्र में यह उपदेश है कि हे जिज्ञासु जनों! तुम अपने प्रात:स्मणीय विद्वानों को सूर्योदयसमय सत्कारपूर्वक आह्वान=बुलाओ और उनसे प्रार्थना करो कि आप न्यायादिगुणसम्पन्न होने से हमारे पूज्य हैं। कृपा करके हमें भी सन्मार्ग का उपदेश करें, क्योंकि स्वयं अनुष्ठानी तथा सदाचारी विद्वान् ही अपने सदुपदेशों द्वारा सन्मार्ग को दर्शा सकते हैं। सो आप हमें भी कल्याणकारक उपदेशों द्वारा कृतकृत्य करें॥कई एक पोराणिक लोग “आह्वान” के अर्थ किसी असम्भव देवताविशेष को बुलाने के लिए किया करते हैं, वह ठीक नहीं, “आह्वान” के अर्थ विद्यमान विद्वानों के सत्कार के ही हैं॥१२॥

ऋ॒तावा॑न ऋ॒तजा॑ता ऋता॒वृधो॑ घो॒रासो॑ अनृत॒द्विषः॑। तेषां॑ वः सु॒म्ने सु॑च्छ॒र्दिष्ट॑मे नरः॒ स्याम॒ ये च॑ सू॒रयः॑॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यों! तुम अनृत से द्वेष करनेवाले तथा सत्य से प्यार करनेवाले सत्पुरुषों का सत्सङ्ग करो और उनसे नम्रतापूर्वक वर्तते हुए प्रार्थना करो कि हे महाराज! हमें भी सन्मार्ग का उपदेश करो, ताकि हम भी उत्तमगुणसम्पन्न हों॥१३॥

उदु॒ त्यद्द॑र्श॒तं वपु॑र्दि॒व ए॑ति प्रतिह्व॒रे। यदी॑मा॒शुर्वह॑ति दे॒व एत॑शो॒ विश्व॑स्मै॒ चक्ष॑से॒ अर॑म्॥

इस मन्त्र में यह उपदेश किया है कि अनृत से द्वेष तथा सत्य से प्यार करनेवाले सत्पुरुषों के सत्सङ्ग से शुद्धान्त:करणपुरुष उस परमात्मदेव को प्राप्त करते हैं। अर्थात् उनके अन्त:करण की वृत्तियाँ उस सर्वद्रष्टा देव को प्राप्त करने के लिए शीघ्र ही समर्थ होती हैं और उन्हीं के द्वारा वह देव प्रकाशित होता है, मलिनान्त:करण पुरुष उनको प्राप्त करने में सर्वथा असमर्थ होते हैं, इसलिए हे सांसारिक जनों! तुम सत्सङ्ग द्वारा उस अमृतस्वरूप को प्राप्त करो, जो तुम्हारा एकमात्र आधार है॥१४॥

शी॒र्ष्णःशी॑र्ष्णो॒ जग॑तस्त॒स्थुष॒स्पतिं॑ स॒मया॒ विश्व॒मा रजः॑। स॒प्त स्वसा॑रः सुवि॒ताय॒ सूर्यं॒ वह॑न्ति ह॒रितो॒ रथे॑॥

इस मन्त्र में उस परमात्मा की प्राप्ति का उपाय कथन किया है, जो स्थावर तथा जङ्गमरूप इस ब्रह्माण्ड का एकमात्र पति है। उसी परमात्मदेव को यहाँ “सूर्य्य” कथन किया गया है, जो उस भौतिक सूर्य्य का वाचक नहीं, किन्तु उस स्वत:प्रकाश परमात्मा का बोधक है। जो इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करनेवाला है, उसकी प्राप्ति का साधन मस्तिष्क में सप्त इन्द्रियों की वृत्तियाँ हैं अर्थात् दो आँख, दो कान, दो नासिका के छिद्र और एक मुख, इस प्रकार ये सप्त इन्द्रियों की वृत्तियें हैं। “स्वयं सरन्तीति स्वसार:”=जो स्वयं गमन करें, उनको “स्वसा” कहते हैं। जब ये वृत्तियें सदसद्विवेचन करनेवाली हो जाती हैं, तब उस ज्ञानगम्य परमात्मा की प्राप्ति होती है। अथवा पाँच ज्ञानेन्द्रिय, छठा मन और सातवीं बुद्धि, इन सातों  द्वारा   चराचर ब्रह्माण्ड के प्रति परमात्मा की रचना को ज्ञानगम्य करके मनुष्य उस प्रकाशस्वरूप को प्राप्त होता है, जहाँ “न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम्”=न सूर्य्य का प्रकाश पहुँच सकता और न चन्द्र तथा तारागण अपना प्रकाश पहुँचा सकते हैं। इस भाव से यहाँ वृत्तियों का वर्णन किया है अर्थात् योगी पुरुषों के अन्त:करण की वृत्तियें ही उस परज्योति को प्राप्त करने में समर्थ होती हैं। यहाँ सूर्य्य की सात किरणों का कोई प्रकरण नहीं, क्योंकि मन्त्र में “सूर्य्य” शब्द उस जगत्पति परमात्मा का विशेषण है, जो प्रकाशस्वरूप परमात्मा को ग्रहण कराता है, इस भौतिक सूर्य्य का नहीं। तीसरे सूक्त के दूसरे मन्त्र में स्पष्ट वर्णन किया गया है कि प्रकाशस्वरूप परमात्मा इस सूर्य्य का पति है और उसी से यह उत्पन्न होता है॥१५॥१०॥

तच्चक्षु॑र्दे॒वहि॑तं शु॒क्रमु॒च्चर॑त्। पश्ये॑म श॒रदः॑ श॒तं जीवे॑म श॒रदः॑ श॒तम्॥

सर्वप्रकाशक, सबका हितकारी तथा बलस्वरूप परमात्मा ऐसी कृपा करे कि हम सौ वर्ष जीवित रहें और सौ वर्ष तक उसको देखें। यहाँ “पश्येम” के अर्थ आँखों से देखने के नहीं, किन्तु ध्यान द्वारा ज्ञानगोचर करने के हैं, जैसा कि “दृश्यते त्वग्र्या बुद्ध्या” कठ० ३।१२॥इस वाक्य में “दृश्यते” के अर्थ बुद्धि से देखने के हैं अथवा उसकी इस रचनारूप महिमा को देखते हुए उसकी महत्ता का अनुभव करके उपासन में प्रवृत्त हों, यह आशय है॥यहाँ विचारणीय यह है कि यही मन्त्र यजुर्वेद में इस प्रकार है कि “तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरद: शतं, जीवेम शरद: शतं शृणुयाम शरद: शतं, प्रब्रवाम शरद: शतमदीना: स्याम शरद: शतं भूयश्च शरदः शतात्॥” अर्थात् उपर्युक्त ऋग् मन्त्र में लिखे−“पश्येम शरद: शतं, जीवेम शरद: शतं” तक ही नहीं, किन्तु “शृणुयाम शरद: शतं, प्रब्रवाम शरद: शतमदीना: स्याम शरद: शतं०” इत्यादि प्रकार से भिन्न है, जो लोग वेदों पर पुनरुक्त होने का दोष लगाते हैं, उनको इस भेद की ओर ध्यान करना चाहिए कि भिन्नार्थप्रतिपादन में वाक्य कदापि पुनरुक्त नहीं होते, किन्तु भिन्नार्थ के प्रतिपादक प्रकरणभेद वा आकारभेद से होते हैं, जैसा कि “तच्चक्षुर्देवहितं शुक्रमुच्चरत्” यह पाठ ऋग् का है, जिसके अर्थ ऊपर किये गये हैं और “तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्” यह पाठ यजुर्वेद का है, जिसका भाव यह है कि हम ऋषि-मुनियों के समान ज्ञानी विज्ञानी होकर देखें, सुनें और जीवें, प्राकृत लोगों के समान नहीं, इस प्रकार वेदों में आकारभेद वा प्रकरणभेद से जो मन्त्र पुन:-पुन: आते हैं, वे पुनरुक्त नहीं हो सकते, इसी प्रकार “सहस्रशीर्षादि” मन्त्र भी पुनरुक्त नहीं॥१६॥

काव्ये॑भिरदा॒भ्या या॑तं वरुण द्यु॒मत्। मि॒त्रश्च॒ सोम॑पीतये॥

इस मन्त्र में परमात्मा ने शिष्टाचार का उपदेश किया है कि हे प्रजाजनों! तुम सर्वपूज्य, विद्वान्, जितेन्द्रिय तथा वेदोक्त कर्मकर्त्ता विद्वानों को सुशोभित यानों द्वारा सत्कारपूर्वक अपने घर वा यज्ञमण्डप में बुलाओ और सोमादि उत्तमोत्तम पेय तथा खाद्य पदार्थों द्वारा उनका सत्कार करते हुए उनसे सदुपदेश श्रवण करो॥यहाँ यह भी ज्ञात रहे कि “सोम” के अर्थ चित्त को आह्लादित करने तथा सात्त्विक स्वभाव बनानेवाले रस के हैं, किसी मादक द्रव्य के नहीं, क्योंकि वेदवेत्ता विद्वान् लोग जो सूक्ष्म बुद्धि द्वारा उस परमात्मा को प्राप्त होने का यत्न करते हैं, वे मादक द्रव्यों का कदापि सेवन नहीं करते, क्योंकि सब मादक द्रव्य बुद्धिनाशक होते हैं और सोम के मादक द्रव्य न होने में एक बड़ा प्रमाण यह है कि “ऋत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम्” ८।२।१२॥इस मन्त्र में “न सुरायां” पद दिया है, जिसका अर्थ यह है कि सोम सुरा के समान मादक द्रव्य नहीं, इससे सिद्ध है कि बुद्धिवर्धक सात्त्विक पदार्थ का नाम सोम है॥१७॥

दि॒वो धाम॑भिर्वरुण मि॒त्रश्चा या॑तम॒द्रुहा॑। पिब॑तं॒ सोम॑मातु॒जी॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे ज्ञान के प्रकाश से सदा तेजस्वी तथा रागद्वेषादि भावों से रहित विद्वान् पुरुषो! तुम यजमानों से निमन्त्रित हुए उनके पवित्र घरों में आओ और सोमादि सात्त्विक पदार्थों का सेवन करते हुए उनको पवित्र धर्म का उपदेश करो, ताकि वे गृहस्थाश्रम के नियमपालन में विचल न हों॥१८॥

आ या॑तं मित्रावरुणा जुषा॒णावाहु॑तिं नरा। पा॒तं सोम॑मृतावृधा॥

परमात्मा आज्ञा देते हैं कि हे ज्ञानादि यज्ञों के अनुष्ठानी विद्वानों! तुम लोग सत्कारपूर्वक अपने यजमानों को प्राप्त होओ और सोमपान करते हुए उनके हृदय को शान्तिधाम बनाओ अर्थात् अपने अनुष्ठानरूप ज्ञान से उनको ज्ञानयज्ञ, योगयज्ञ, तथा कर्मयज्ञादि वैदिक कर्मों का अनुष्ठानी   बनाकर पवित्र करो और शान्ति की आहुति देते हुए संसार भर में शान्ति फैलाओ, जो तुम्हारा कर्त्तव्य है॥१९॥११॥यह ६६ वाँ सूक्त और ११ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्रति॑ वां॒ रथं॑ नृपती ज॒रध्यै॑ ह॒विष्म॑ता॒ मन॑सा य॒ज्ञिये॑न। यो वां॑ दू॒तो न धि॑ष्ण्या॒वजी॑ग॒रच्छा॑ सू॒नुर्न पि॒तरा॑ विवक्मि॥

हे धारणावाले अध्यापक तथा उपदेशकों! मैं तुम्हें दूत के समान उपदेश करता हूँ कि जिस प्रकार पिता अपने पुत्र को सुमार्ग में प्रवृत्त होने के लिए सदुपदेश करता है, इसी प्रकार तुम लोग भी वेदों के उपदेश द्वारा राजाओं को सन्मार्गगामी बनाओ, ताकि वह ऐश्वर्य्यप्रद यज्ञों से वेदमार्ग का पालन करे अथवा ध्यानयज्ञों से तुम्हारे मार्ग को विस्तृत करे॥भाव यह है कि जिस सम्राट् को अनुष्ठानी उपदेशक महात्मा अपने उपदेशों द्वारा उत्तेजित करते हुए स्वकर्तव्य कर्मों में लगाये रहते हैं और राजा भी उनके सदुपदेशों को अपने हार्दिक भाव से ग्रहण करता है, वह कदापि ऐश्वर्य्य से भ्रष्ट नहीं होता, इसलिए हे उपदेशकों! राजा तथा प्रजा को शुभ मार्ग में चलने का सदा उपदेश करो, यह मेरा तुम्हारे लिए आदेश है॥१॥

अशो॑च्य॒ग्निः स॑मिधा॒नो अ॒स्मे उपो॑ अदृश्र॒न्तम॑सश्चि॒दन्ताः॑। अचे॑ति के॒तुरु॒षसः॑ पु॒रस्ता॑च्छ्रि॒ये दि॒वो दु॑हि॒तुर्जाय॑मानः॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे उपदेशको! अन्धकार के निवृत्त होने पर सूर्योदयकाल में अपने सन्ध्या-अग्निहोत्रादि नित्य कर्म करो और राजा तथा प्रजा को भी इसी काल में उक्त कर्म करने तथा अन्य आवश्यक कर्मों के करने का उपदेश करो, क्योंकि उपदेश का यही अत्युत्तम समय है। इस समय सबकी बुद्धि उपदेश ग्रहण करने के लिए उद्यत होती है॥२॥

अ॒भि वां॑ नू॒नम॑श्विना॒ सुहो॑ता॒ स्तोमैः॑ सिषक्ति नासत्या विव॒क्वान्। पू॒र्वीभि॑र्यातं प॒थ्या॑भिर॒र्वाक्स्व॒र्विदा॒ वसु॑मता॒ रथे॑न॥

इस मन्त्र में परमात्मा राजपुरुषों को उपदेश करते हैं कि तुम लोग वैदिक यज्ञ करते हुए सत्यवक्ता होकर सदा सनातन सन्मार्गों से चलो, जिससे तुम्हारा ऐश्वर्य्य बढ़े और तुम उस ऐश्वर्य्य के स्वामी होकर सत्यपूर्वक प्रजा का पालन करो॥३॥

अ॒वोर्वां॑ नू॒नम॑श्विना यु॒वाकु॑र्हु॒वे यद्वां॑ सु॒ते मा॑ध्वी वसू॒युः। आ वां॑ वहन्तु॒ स्थवि॑रासो॒ अश्वाः॒ पिबा॑थो अ॒स्मे सुषु॑ता॒ मधू॑नि॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे प्रजाजनों! तुम उन राजशासनकर्त्ताओं से इस प्रकार प्रार्थना करो कि हे राजपुरुषो! आप हमारे नेता बनकर हमें उत्तम मार्गों पर चलायें, ताकि हम सब प्रकार की समृद्धि को प्राप्त हों, हममें कभी रागद्वेष न हो और हम सदा आपकी धर्मपूर्वक आज्ञा का पालन करें। परमात्मा आज्ञा देते हैं कि तुम दोनों मिलकर चलो, क्योंकि जब राजा तथा प्रजा में प्रेमभाव उत्पन्न होता है, तब वह मधुविद्या=रसायनविद्या को प्राप्त होते हैं अर्थात् दोनों का एक लक्ष्य हो जाने से संसार में कल्याण की वृद्धि होती है॥४॥

प्राची॑मु देवाश्विना॒ धियं॒ मेऽमृ॑ध्रां सा॒तये॑ कृतं वसू॒युम्। विश्वा॑ अविष्टं॒ वाज॒ आ पुरं॑धी॒स्ता नः॑ शक्तं शचीपती॒ शची॑भिः॥

इस मन्त्र में जगत्पिता परमात्मदेव से यह प्रार्थना की गई है कि हे भगवन्! आप हमारी सब प्रकार से रक्षा करते हुए अपनी दिव्यशक्ति द्वारा हमको सामर्थ्य दें कि हम उस शुभ, सरल तथा निष्कपट बुद्धि को प्राप्त होकर ऐश्वर्य्य तथा सब प्रकार के धनों का सम्पादन करें, या यों कहो कि हे कर्मों के अधिपति परमात्मन्! आप हमको कर्मानुष्ठान द्वारा ऐसी शक्ति प्रदान करें, जिससे हम साधनसम्पन्न होकर उस बुद्धि को प्राप्त हों, जो धन तथा ऐश्वर्य्य के देनेवाली है अथवा जिसके सम्पादन करने से ऐश्वर्य्य मिलता है॥प्रार्थना से तात्पर्य्य यह है कि पुरुष अपनी न्यूनता अनुभव करता हुआ शुभ कर्मों की ओर प्रवृत्त हो और शुभकर्मी को परमात्मा सब प्रकार का ऐश्वर्य्य प्रदान करते हैं, क्योंकि वह कर्माध्यक्ष है, जैसा कि अन्यत्र भी कहा है कि ”कर्माध्यक्ष: सर्वभूताधिवास: साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च” ॥श्वे० ६।११॥वह  परमात्मा कर्मों का अध्यक्ष=स्वामी, सब भूतों का निवासस्थान, साक्षी और निर्गुण=प्राकृत गुणों से रहित है, इत्यादि गुणसम्पन्न परमात्मा से प्रार्थना की गई है कि वह देव हमें शुभ कर्मों की ओर प्रेरे, ताकि हम उस दिव्य मेधा के प्राप्त करने के योग्य बनें, जिससे सब प्रकार के ऐश्वर्य्य प्राप्त होते हैं॥५॥

अ॒वि॒ष्टं धी॒ष्व॑श्विना न आ॒सु प्र॒जाव॒द्रेतो॒ अह्र॑यं नो अस्तु। आ वां॑ तो॒के तन॑ये॒ तूतु॑जानाः सु॒रत्ना॑सो दे॒ववी॑तिं गमेम॥

हे भगवन्! प्रजा उत्पन्न करने का एकमात्र साधन अमोघ वीर्य्य हमें प्रदान करें, ताकि हम इस संसार में सन्ततिरहित न हों और हमको तथा उत्पन्न हुई सन्तान को धन दें, ताकि हम सुख से अपना जीवन व्यतीत कर सकें॥और जो “देववीति” पद से विद्वानों का सत्सङ्ग कथन किया है, उसका तात्पर्य्य यह है कि हे परमात्मन्! आपकी कृपा से हमें धर्म और मोक्ष भी प्राप्त हो। इस मन्त्र में संक्षेप से मनुष्यजन्म के फलचतुष्टय की प्रार्थना की गई है अर्थात् “सुरत्नास:” पद से अर्थ, “तनय” पद से धर्मपूर्वक उत्पन्न की हुई सन्ततिरूप कामना और “देववीति” पद से धर्म तथा मोक्ष का वर्णन किया है, क्योंकि वेदज्ञ विद्वानों के सत्सङ्ग किये बिना धर्म का बोध नहीं होता और धर्म के बिना मोक्ष=सुख का मिलना असम्भव है॥जो कई एक लोग अपनी अज्ञानता से यह कहा करते हैं कि वेदों में केवल प्राकृत बातों का वर्णन है, उनको ऐसे मन्त्रों पर ध्यान देन चहिए, जिनमें मनुष्य के कर्त्तव्यरूप लक्ष्य का स्पष्ट वर्णन पाया जाता है। ऐसा अन्य किसी ग्रन्थ में नहीं मिलता, इसलिए वेदों के अपूर्व भावों पर दृष्टि डालना प्रत्येक आर्य्यसन्तान का परम कर्तव्य है॥६॥

ए॒ष स्य वां॑ पूर्व॒गत्वे॑व॒ सख्ये॑ नि॒धिर्हि॒तो मा॑ध्वी रा॒तो अ॒स्मे। अहे॑ळता॒ मन॒सा या॑तम॒र्वाग॒श्नन्ता॑ ह॒व्यं मानु॑षीषु वि॒क्षु॥

इस मन्त्र में परमात्मा से यह प्रार्थना है कि हे देव! जिस प्रकार अपने स्वामी वा मित्र के सम्मुख नैवेद्य रक्खा जाता है, इसी प्रकार हमलोग इस आहुतिरूप हव्य को, जो नीरोगता की निधि तथा मनुष्यमात्र का हितकारक है, आपके संमुख रखते हैं, आप कृपा करके इसको स्वीकार करें और सब प्राणिवर्ग में तुरन्त पहुँचा दें, ताकि वह विकारों से दूषित न हो॥तात्पर्य्य यह है कि मनुष्य अपने किये हुए यज्ञादि शुभ कर्मों को सदा ईश्वरार्पण करे और उनके फल की इच्छा न करता हुआ ईश्वराधीन छोड़ दें, शास्त्र में इसी का नाम निष्काम कर्म है। निष्कामकर्मी ही सिद्धि को प्राप्त होते और इन्हीं को शास्त्र में अमृत की प्राप्ति वर्णन की है, इसलिए सब आर्यों का कर्तव्य है कि जो सन्ध्या, अग्निहोत्र, जप, तप, दान तथा अनुष्ठानादि कर्म करे, वह सब ईश्वरार्पण करते हुए निष्काम भाव से करे, यह वेद भगवान् की आज्ञा है॥७॥

एक॑स्मि॒न्योगे॑ भुरणा समा॒ने परि॑ वां स॒प्त स्र॒वतो॒ रथो॑ गात्। न वा॑यन्ति सु॒भ्वो॑ दे॒वयु॑क्ता॒ ये वां॑ धू॒र्षु त॒रण॑यो॒ वह॑न्ति॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे दिव्यशक्तिसम्पन्न विद्वानों तथा साधारण मनुष्यो! तुम दोनों के लिए योग=परमात्मस्वरूप में जुड़ना समान है अर्थात् देव, साधारण तथा प्राकृत जन सभी उसको प्राप्त हो सकते हैं, वह एक सब का उपास्यदेव है, उसकी प्राप्ति के लिये बड़े दृढ सात साधन हैं, जिनके संयम द्वारा पुरुष उस योग को प्राप्त हो सकता है। वे सात इस प्रकार हैं, पाँच ज्ञानेन्द्रिय जिनसे जीवात्मा बाह्य जगत् के ज्ञान को उपलब्ध करता अर्थात् संसार की रचना देखकर परमात्मसत्ता का अनुमान करता है, मन से मनन करता और सदसद्विवेचन करनेवाली बुद्धि से परमात्मा का निश्चय करता है, इनमें श्रोत्रेन्द्रिय, मन तथा बुद्धि, ये तीनों परमात्मप्राप्ति में अन्तरङ्गसाधन हैं, इसी अभिप्राय से उपनिषदों में वर्णन किया है कि “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।” वह परमात्मा श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन करने योग्य है। वेदवाक्यों द्वारा परमात्मविषयक सुनने का नाम “श्रवण”, सुने हुए अर्थ को युक्तियों द्वारा मन से विचारने का नाम “मनन” और उस मनन किये हुए को निश्चित बुद्धि द्वारा धारण करने का नाम “निदिध्यासन” है। तीन ये और चार अन्य सातों ही देव का समीपी बनाते हैं, जो सबका उपास्य है॥८॥

अ॒स॒श्चता॑ म॒घव॑द्भ्यो॒ हि भू॒तं ये रा॒या म॑घ॒देयं॑ जु॒नन्ति॑। प्र ये बन्धुं॑ सू॒नृता॑भिस्ति॒रन्ते॒ गव्या॑ पृ॒ञ्चन्तो॒ अश्व्या॑ म॒घानि॑॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि जो यम-नियमादिकों से सम्पन्न अर्थात् किसी विषय में फँसे हुए नहीं, सत्पुरुषों को धनादि पदार्थ देने में उदार, प्रसन्न चित्त से मीठी वाणी बोलकर अपने सम्बन्धियों को प्रसन्न रखते और सत्यभाषण तथा सत्य का प्रचार करते हैं, वे उदार पुरुष परमात्मपद के अधिकारी होते हैं॥९॥

नू मे॒ हव॒मा शृ॑णुतं युवाना यासि॒ष्टं व॒र्तिर॑श्विना॒विरा॑वत्। ध॒त्तं रत्ना॑नि॒ जर॑तं च सू॒रीन्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे युवापुरुषों! तुम्हारा मुख्य कर्तव्य यह है कि तुम गुरु-शिष्य दोनों मिलकर यज्ञरूप अग्न्यागारों अथवा कलाकौशलरूप अग्निगृहों में जहाँ अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रादिकों की विद्या सिखलाई जाती है, जाओ और वहाँ जाकर आध्यात्मिक विद्या के विद्वानों तथा शिल्पविद्याविशारद देवों को प्रसन्न करो अर्थात् उनको विविध प्रकार का धन प्रदान करो, ताकि उनकी प्रसन्नता से तुम्हारा सदा के लिये कल्याण हो और तुम सदा उनसे नम्रभाव से वर्तो, ताकि वे तुम्हारा शुभचिन्तन करते रहें॥तात्पर्य्य यह है कि गुरु-शिष्य दोनों मिलकर व्यावहारिक तथा पारमार्थिक दोनों प्रकार की उन्नति करें। जहाँ गुरु-शिष्य दोनों अध्ययनाध्यापन द्वारा अपनी उन्नति नहीं करते, वहाँ कदापि कल्याण नहीं होता। कल्याण की कामनावाले गुरु-शिष्य, राजा-प्रजा, स्त्री-पुरुष, धनाढ्य-निर्धन और पण्डित तथा मूर्ख, ये सब जोड़े जब तक एक अर्थ में नियुक्त होकर अपनी उन्नति नहीं करते, तब तक इनका कदापि कल्याण नहीं हो सकता। इसी भाव को कठोपनिषद् में इस प्रकार वर्णन किया है कि–सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥कठ० ६।१९॥अर्थ−हे परमात्मन्! आप हम दोनों की एक साथ रक्षा और पालन कीजिये, हम दोनों को शारीरिक और आत्मिक बल दें, हमारा स्वाध्याय तेजवाला हो, हम किसी के साथ अथवा आपस में द्वेष न करें और हम दोनों विद्याविशारद होकर सुखपूर्वक रहें और आप दोनों को संसार के शासन का बल दें, यह आप से प्रार्थना है॥१०॥यह ६७ वाँ सूक्त और १३ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

आ शु॑भ्रा यातमश्विना॒ स्वश्वा॒ गिरो॑ दस्रा जुजुषा॒णा यु॒वाकोः॑। ह॒व्यानि॑ च॒ प्रति॑भृता वी॒तं नः॑॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि याज्ञिक लोगो! तुम अपने न्यायाधीश तथा सेनाधीश राजपुरुषों का सम्मान करो, उनको अपने यज्ञों में बुलाओ और मधुर वाणी से उनका सत्कार करते हुए हविशेष से उनको सत्कृत करो, ताकि राजा तथा प्रजा में परस्पर प्रेम उत्पन्न होकर देश का कल्याण हो॥१॥

प्र वा॒मन्धां॑सि॒ मद्या॑न्यस्थु॒ररं॑ गन्तं ह॒विषो॑ वी॒तये॑ मे। ति॒रो अ॒र्यो हव॑नानि श्रु॒तं नः॑॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे राजपुरुषो! तुम्हारा परम कर्त्तव्य है कि तुम राजपद त्यागकर प्रजा के धार्मिक यज्ञों में सम्मिलित होओ और धार्मिक प्रजा का विरोधी जो शत्रुदल है, उसका सदैव तिरस्कार करते रहो, ताकि यज्ञादि धार्मिक कार्यो में विघ्न न हो, अथवा राजा को चाहिये कि वह मादक पदार्थों के अधीन होकर कोई प्रमाद न करे और अपने राजपद को सर्वथा त्याग कर प्रेमभाव से प्रजा के साथ व्यवहार करे। वेदवेत्ता याज्ञिकों को चाहिये कि वह राजपुरुषों को सदैव यह उपदेश करते रहें॥२॥

प्र वां॒ रथो॒ मनो॑जवा इयर्ति ति॒रो रजां॑स्यश्विना श॒तोतिः॑। अ॒स्मभ्यं॑ सूर्यावसू इया॒नः॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे याज्ञिक पुरुषो! तुम उक्त प्रकार के रथ=यानोंवाले राजपुरुषों को अपने यज्ञ में बुलाओ, जिनके यान नभोमण्डल में सूर्य्य के साथ स्थितिवाले हों और जिनमें रक्षाविषयक अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र लगे हुए हों। यहाँ रथ के अर्थ पहियोंवाले भूमिस्थित रथ में नहीं किन्तु “रमन्ते यस्मिन् स रथ:”=जिसमें भले प्रकार रमण किया जाय, उसका नाम “रथ” है, सो भलीभाँति रमण आकाश में ही होता है, भूमिस्थित रथ में नहीं और न यह सूर्य्य तक गमन कर सकता है, इत्यादि विशेषणों से यहाँ विमान का कथन स्पष्ट है॥३॥

अ॒यं ह॒ यद्वां॑ देव॒या उ॒ अद्रि॑रू॒र्ध्वो विव॑क्ति सोम॒सुद्यु॒वभ्या॑म्। आ व॒ल्गू विप्रो॑ ववृतीत ह॒व्यैः॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे न्यायाधीश तथा सेनाधीश राजपुरुषो! जब तुम्हारे यान पर्वतों की चोटियों से भी ऊँचे जाकर गरजते और सुन्दरता में चन्द्रमण्डल का भी मानमर्दन करते हैं, तब ऐश्वर्य्य से सम्पन्न तुम लोगों को अपनी रक्षा के लिए बड़े-बड़े विद्वान् अपने यज्ञों में आह्वान करते अर्थात् ऐश्वर्य्यसम्पन्न राजा का सब पण्डित तथा गुणी जन आश्रय लेते हैं और राजा का कर्त्तव्य है कि वह गुणी जनों का यथायोग्य सत्कार करे॥४॥

चि॒त्रं ह॒ यद्वां॒ भोज॑नं॒ न्वस्ति॒ न्यत्र॑ये॒ महि॑ष्वन्तं युयोतम्। यो वा॑मो॒मानं॒ दध॑ते प्रि॒यः सन्॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे राजपुरुषो! तुम अन्न का कोष और विविध प्रकार के धनों को सम्पादन करके पूर्ण ऐश्वर्य्ययुक्त होओ, तुम्हारे ऐश्वर्य्यसम्पन्न होने पर सब लोग तुम्हारे शासन में रहते हुए तुमसे मेल करेंगे, क्योंकि ऐश्वर्य्ययुक्त पुरुष से सब प्रजाजन मेल रखते तथा प्यार करते हैं, अत एव प्रजापालन करनेवाले राजा का मुख्य कर्त्तव्य है कि सब प्रकार के यत्नों से ऐश्वर्य्य लाभ करे॥५॥

उ॒त त्यद्वां॑ जुर॒ते अ॑श्विना भू॒च्च्यवा॑नाय प्र॒तीत्यं॑ हवि॒र्दे। अधि॒ यद्वर्प॑ इ॒तऊ॑ति ध॒त्थः॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे न्यायाधीश तथा सेनाधीश राजपुरुषो! तुम्हारे याज्ञिक लोग तुम्हारी उन्नति तथा प्रजा के कल्याणार्थ प्रतिदिन यज्ञ करें, जिससे तुम्हारा शुभ हो और तुम वैदिक कर्मों द्वारा बलयुक्त शत्रुओं पर चढ़ाई के लिये सदा सन्नद्ध रहो, जिससे प्रजा की रक्षा हो। तात्पर्य्य यह है कि जो राजा लोग अपने दर्शपौर्णमास अथवा होली दिवाली आदि ऋतुयज्ञों में अपनी सेना को सदा उत्तेजित करते हुए युद्ध के लिये सन्नद्ध रहते हैं, वे राजा प्रजा की रक्षा में समर्थ होते हैं॥६॥

उ॒त त्यं भु॒ज्युम॑श्विना॒ सखा॑यो॒ मध्ये॑ जहुर्दु॒रेवा॑सः समु॒द्रे। निरीं॑ पर्ष॒दरा॑वा॒ यो यु॒वाकुः॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा शिक्षा देते हैं कि हे न्यायाधीश तथा सेनाधीश राजपुरुषो! तुम्हारा और प्रजा का वही सम्राट् सच्चा मित्र हो सकता है, जो किसी रुकावट के बिना समुद्र में यात्रा करता हुआ देश-देशान्तरों का परिभ्रमण करके अपने राज्य को उन्नत करता, अपनी प्रजा तथा राजकीय सैनिक पुरुषों में धार्मिक भावों का संचार करता और उनके सब दु:ख तथा रुकावटों को दूर करके प्रेमपूर्वक वर्तता है। “दुरेवास: जहु:” के अर्थ दुरवस्था को छोड़ देने के हैं। वास्तव में अपनी दुरवस्था को छोड़ने योग्य वही सम्राट् होता है, जो उद्योगी बनकर समुद्रयात्रा करता हुआ नाना प्रकार के धनोपार्जन करके अपनी प्रजा के दु:ख दूर करता है। आलसी राजा मित्रता के योग्य नहीं, क्योंकि वह प्रजा को पीड़ित करके धन लेता और बड़े-बड़े कर लगाकर राजकीय व्यवहारों की सिद्धि  करता है॥कई एक टीकाकार इस मन्त्र के अर्थ करते हैं कि ”भुज्यु” नामक एक पुरुष था, जो समुद्र में फेंका गया था। उसको किसी देवताविशेष ने समुद्र से निकाल कर उसकी दुरवस्था को दूर किया, परन्तु यह कथा इस मन्त्र से नहीं निकलती, क्योंकि इसमें न तो किसी देवता का नाम है और न भुज्यु नामक किसी मनुष्य का प्रकरण है, किन्तु “भुज्यु” एक गुणप्रधान पुरुष का नाम है। अर्थात् “ऐश्वर्य्यं भुनक्तीति भुज्यु:”= जो ऐश्वर्य्य का भोक्ता हो, उसको “भुज्यु” कहते हैं। और भली-भाँति ऐश्वर्य्यभोक्ता सम्राट् ही होता है। इसलिए यहाँ सम्राट् के ऐश्वर्य्य का वर्णन है, किसी पुरुषविशेष का नहीं॥७॥

वृका॑य चि॒ज्जस॑मानाय शक्तमु॒त श्रु॑तं श॒यवे॑ हू॒यमा॑ना। याव॒घ्न्यामपि॑न्वतम॒पो न स्त॒र्यं॑ चिच्छ॒क्त्य॑श्विना॒ शची॑भिः॥

“वृणक्ति य: स वृक:”=जो अन्धकार का नाशक हो, उसका नाम यहाँ “वृक“ है। परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे राजपुरुषो! अविद्यादि अन्धकार के नाशक, विद्यादि गुणों से सम्पन्न और जो हनन करने योग्य नहीं, ऐसी “अघ्न्या”=सर्वदा रक्षायोग्य गौएँ दुग्ध द्वारा जिसके ऐश्वर्य्य को बढ़ाती अर्थात् शरीरों को पुष्ट करती हैं, ऐसे राजा के ऐश्वर्य्य को आप लोग सत्कर्मों द्वारा बढ़ायें॥८॥

ए॒ष स्य का॒रुर्ज॑रते सू॒क्तैरग्रे॑ बुधा॒न उ॒षसां॑ सु॒मन्मा॑। इ॒षा तं व॑र्धद॒घ्न्या पयो॑भिर्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे वेदवेत्ता पुरुषो! तुम प्रात: ब्राह्ममुहूर्त्त में उठ कर अपने आचार को पवित्र बनाने का उपाय विचारो और स्वाध्याय करते हुए राजा तथा प्रजा के लिए कल्याण की प्रार्थना करो कि हे भगवन्! पुष्कल अन्न, वस्त्र तथा दुग्धादि पदार्थों से आप हमारी रक्षा करें। परमात्मा आज्ञा देते हैं कि राजा तथा प्रजा तुम दोनों के ऐसे ही सद्भाव हों, जिससे तुम्हारी सदैव वृद्धि हो और हे वैदिक कर्मों के अनुष्ठानी पुरुषो! तुम सदैव ऐसा ही अनुष्ठान करते रहो॥९॥यह ६८ वाँ सूक्त और १५ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ वां॒ रथो॒ रोद॑सी बद्बधा॒नो हि॑र॒ण्ययो॒ वृष॑भिर्या॒त्वश्वैः॑। घृ॒तव॑र्तनिः प॒विभी॑ रुचा॒न इ॒षां वो॒ळ्हा नृ॒पति॑र्वा॒जिनी॑वान्॥

इस मन्त्र में रथ के रूपकालङ्कार से परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे राजपुरुषों! तुम्हारा शरीररूपी रथ, जिसमें इन्द्रियरूप बलवान् घोड़े जुते हुए हैं, जो दृढ़ अस्थियों से बना हुआ है, जिसमें वीर्यरूप स्नेह से बनी हुई वर्तिका=बत्ती जल रही है, जो सब प्रकार के ऐश्वर्य्य तथा बलों का बढ़ानेवाला है, उसमें स्थित आत्मारूप राजा अव्याहतगति= बिना रोक-टोक सर्वत्र गमनशील हो अर्थात् तुम लोग पृथिवी और द्युलोक के मध्य में सर्वत्र गमन करो, यह हमारा तुम्हारे लिए आदेश है॥१॥

स प॑प्रथा॒नो अ॒भि पञ्च॒ भूमा॑ त्रिवन्धु॒रो मन॒सा या॑तु यु॒क्तः। विशो॒ येन॒ गच्छ॑थो देव॒यन्तीः॒ कुत्रा॑ चि॒द्याम॑मश्विना॒ दधा॑ना॥

हे राजपुरुषो! वह शरीररूपी रथ क्षिति, जल, पावक, गगन तथा वायु इन पाँच तत्त्वों=भूतों से बना हुआ जानो और जिसमें सत्त्व, रज, तम इन तीनों गुणों के बन्धन लगे हुए हैं अर्थात् इनसे जगह-जगह पर बन्धा हुआ है, जिससे यात्रा करते हुए मनुष्य उस दिव्य ज्योति परमात्मा को प्राप्त होते हैं, जो मनुष्यजीवन का मुख्य उद्देश्य है। परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे संसार के यात्री लोगो! तुम इस दिव्य रथ को मन से धारण करते हुए सर्वत्र विचरो अर्थात् मन को दमन करते हुए इस रथ में इन्द्रियरूप बड़े बलवान् घोड़े जुते हुए हैं, जो मनरूप रासों को दृढता से पकड़े विना कदापि वशीभूत नहीं हो सकते, इसलिए तुम मनरूप रासों को दृढ़ता से पकड़ो अर्थात् मन की चञ्चल वृत्तियों को स्थिर करो, ताकि ये इन्द्रियरूप घोड़े इस शरीररूप रथ को विषम मार्ग में ले जाकर किसी गर्त में न गिरायें॥इस मन्त्र में परमात्मा ने आध्यात्मिक उपदेश किया है, यही भाव कठ० ३।३ में इस प्रकार वर्णित है कि :−आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिन्तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥अर्थ–इस आत्मा को रथी जान, शरीर को रथ, बुद्धि को सारथी और मन को रासें जान। फिर आगे कठ० ३।९ में यह वर्णन किया है कि–विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः। सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्॥जो पुरुष संस्कृतबुद्धिरूप सारथीवाला तथा संस्कृत मनरूप रासोंवाला है, वह इस संसार से पार होकर व्यापक परमात्मा के सर्वोपरि प्राप्य स्थान को प्राप्त होता है। इसी उच्च भाव का उपदेश उपर्युक्त मन्त्रों में परमात्मा ने किया है। इस उच्चोपदेश को न समझकर सायणादि भाष्यकारों ने इस रथ को अश्विनीकुमारों का लिखा है, जो एक अप्रसिद्ध देवता है और उस रथ का आकाशमार्ग से यजमानों के यज्ञ में आना लिखा है। कहीं-कहीं इसको सूर्य्य का रथ कल्पना करके और उसमें बलवान् घोड़े जोत कर उसकी गति ऐसी वर्णन की है कि वह क्षणमात्र में सहस्रों कोस पहुँच जाता है, इत्यादि कल्पनायें वेदाशय से सर्वथा विरुद्ध हैं, क्योंकि यहाँ पाँच भूत और सत्त्वादि तीनों गुणोंवाले शरीररूप रथ का वर्णन है, जिसमें रथी जीवात्मा स्थित है। इससे स्पष्ट है कि यह रथ किसी देवता वा सूर्यादि का नहीं, किन्तु यह रथ प्रत्येक आत्मा को प्राप्त है। इस भाव को रूपकालङ्कार से परमात्मा ने वर्णन किया है, जो मनुष्यमात्र को शिक्षाप्रद और उपादेय है॥२॥

स्वश्वा॑ य॒शसा या॑तम॒र्वाग्दस्रा॑ नि॒धिं मधु॑मन्तं पिबाथः। वि वां॒ रथो॑ व॒ध्वा॒३॒॑ याद॑मा॒नोऽन्ता॑न्दि॒वो बा॑धते वर्त॒निभ्या॑म्॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे राजपुरुषो! तुम्हारा इन्द्रियरूप बलवान् घोड़ोंवाला रथ, जिसका सारथी बुद्धि वर्णन की गई है, जिसमें मनरूप रासें और पवित्र कर्मोंवाला जीवात्मा जिसका रथी है, वह अपने सदाचार से देश-देशान्तरों को विजय करके अर्थात् सम्पूर्ण दुराचारों के त्यागपूर्वक अमृतपान करता हुआ धर्म की अन्तिम सीमा पर पहुँच कर मुझे प्राप्त हो॥तात्पर्य्य यह है कि जिन राजपुरुषों का ब्रह्मचर्य्यरूप तप से शरीर हृष्ट-पुष्ट है और जिनके शरीररूपी रथ का बुद्धिरूप सारथी कुशल है, जो मनरूप रासों से इन्द्रियरूप घोड़ों को ऐसी चतुराई से चलाता है कि उनको वैदिकरूप मार्ग से तनिक भी इधर-उधर नहीं होने देता, वह राजपुरुष निर्विघ्न सम्पूर्ण संसार को विजय करते हुए अर्थात् सांसारिक विषय-वासनाओं को त्याग कर परमात्मा के सम्मुख जाता अर्थात् परमात्मपरायण होता है॥या यों कहो कि “अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः”=अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य्य और अपरिग्रह, ये पाँच “यम” और “शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः”=शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वरप्रणिधान, ये पाँच “नियम”, इन यम-नियमों को धारण करते हुए संयमी बनकर मेरी ओर आओ, मैं तुम्हारा कल्याण करूँगा॥३॥

यु॒वोः श्रियं॒ परि॒ योषा॑वृणीत॒ सूरो॑ दुहि॒ता परि॑तक्म्यायाम्। यद्दे॑व॒यन्त॒मव॑थः॒ शची॑भिः॒ परि॑ घ्रं॒समो॒मना॑ वां॒ वयो॑ गात्॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे क्षात्रधर्म को प्राप्त राजपुरुषों! तुम ब्रह्मचर्य्यादि नियमों का पालन करते हुए युवावस्था को प्राप्त होकर इस सर्वोपरि क्षात्रधर्म का पालन करो, जिससे सुरक्षित हुए सब यज्ञ निर्विघ्न समाप्त होते हैं। यदि तुम अपने जीवन से क्षात्रधर्म को उच्च मान कर इसकी भले प्रकार रक्षा करोगे, तो दिव्यगुणसम्पन्न देवियाँ तुम्हें स्वयंवरों में वरेंगीं और तुम्हें धनरूप ऐश्वर्य्य प्राप्त होगा॥४॥

यो ह॒ स्य वां॑ रथिरा॒ वस्त॑ उ॒स्रा रथो॑ युजा॒नः प॑रि॒याति॑ व॒र्तिः। तेन॑ नः॒ शं योरु॒षसो॒ व्यु॑ष्टौ॒ न्य॑श्विना वहतं य॒ज्ञे अ॒स्मिन्॥

इस मन्त्र में परमात्मा आज्ञा देते हैं कि हे शूरवीर राजपुरुषो! तुम क्षात्रधर्मरूप यज्ञ को भले प्रकार पालन करते हुए सुख को प्राप्त होओ अर्थात् अपने उस रथीरूप आत्मा को, जिसका वर्णन पीछे कर आये हैं, यम नियमादि द्वारा तेजस्वी बनाओ और सब प्रजा को उद्बोधन करो कि वे प्रातः उषाकाल में उठकर अपने कर्तव्य का पालन करें। यदि तुम इस प्रकार संस्कृत आत्मा द्वारा संसार की यात्रा करोगे, तो तुम्हारे लिए सब मार्ग सुगम हो जावेंगे, जिससे तुम द्युलोक के अन्त तक पहुँच कर मुझे प्राप्त होगे॥५॥

नरा॑ गौ॒रेव॑ वि॒द्युतं॑ तृषा॒णास्माक॑म॒द्य सव॒नोप॑ यातम्। पु॒रु॒त्रा हि वां॑ म॒तिभि॒र्हव॑न्ते॒ मा वा॑म॒न्ये नि य॑मन्देव॒यन्तः॑॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे राजपुरुषो! जिस प्रकार विद्युदादि शक्ति से आकर्षित हुआ पृथिवीमण्डल सूर्य्य की ओर खिंचा चला आता है, इसी प्रकार तुम लोग क्षात्रधर्म रूपी यज्ञ की ओर आकर्षित होकर आओ, यद्यपि तुम्हारी वासनायें तुम्हें दीन बनाने के लिए दूसरी ओर ले जाती हैं, परन्तु तुम उनसे सर्वथा पृथक् रह कर इस क्षात्र धर्म  रूप यज्ञ में ही दृढ़ रहो, क्योंकि शूरवीर क्षत्रिय ही इस यज्ञ का होता बन सकता है, अन्य भीरु तथा कातर पुरुष इस यज्ञ में आहुति देने का अधिकारी नहीं॥६॥

यु॒वं भु॒ज्युमव॑विद्धं समु॒द्र उदू॑हथु॒रर्ण॑सो॒ अस्रि॑धानैः। प॒त॒त्रिभि॑रश्र॒मैर॑व्य॒थिभि॑र्दं॒सना॑भिरश्विना पा॒रय॑न्ता॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे शूरवीर राजपुरुषो! तुम्हारी राज्यरूप श्री का भुज्यु=भोक्ता सम्राट् समुद्र में स्थित है अर्थात् “समुद्द्रवन्त्यस्मादापः स समुद्रः”=जिसमें भले प्रकार जल भरे हुए हों अथवा जो जलों का धारण करनेवाला हो, उसको “समुद्र” कहते हैं। इस व्युत्पत्ति से सागर तथा आकाश दोनों अर्थों में समुद्र शब्द प्रयुक्त होता है, जिसके अर्थ ये हैं कि हे शूरवीर राजपुरुषो! तुम्हारे राज्य की श्री जो युवावस्था को प्राप्त अर्थात् चमकती हुई दोनों समुद्रों के मध्य विराजमान है, तुम लोग उसको जल की यात्रा करनेवाले जहाजों द्वारा अथवा आकाश की यात्रा करनेवाले विमानों द्वारा निकालो। तात्पर्य्य यह है कि उत्तम  यन्त्रों द्वारा जलीय समुद्र की भली-भाँति यात्रा करनेवाले अथवा आकाशरूप  समुद्र में गति करनेवाले योद्धा पुरुष ही उस श्री को समुद्र से निकालकर ऐश्वर्य्यसम्पन्न हुए सुख भोग करते हैं, अन्य नहीं। वास्तव में भुज्यु के अर्थ सांसारिक श्रीभोक्ता सम्राट् के हैं, जिसके भाव को अल्पदर्शी टीकाकारों ने न समझकर ये अर्थ किये हैं कि कोई भुज्यु नामक पुरुष समुद्र में गिर गया था, उसके निकालने के लिए अश्विनीकुमारों से प्रार्थना की कि हे अश्विनीकुमारो! तुम इसको किसी प्रकार निकालो। यह अर्थ वेदाशय से सर्वथा विरुद्ध है, जिसका समाधान पीछे भी कर आये हैं, क्योंकि यहाँ न किसी भुज्यु नामक पुरुष का वर्णन है और नाहीं किसी इतिहास में भुज्यु नाम के पुरुष का लेख है। यह भुज्यु गुणप्रधान नाम है, व्यक्तिप्रधान नहीं, जैसा कि इस सूक्त के उपक्रम और उपसंहार से प्रतीत होता है॥७॥

नू मे॒ हव॒मा शृ॑णुतं युवाना यासि॒ष्टं व॒र्तिर॑श्विना॒विरा॑वत्। ध॒त्तं रत्ना॑नि॒ जर॑तं च सू॒रीन्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे युवा शूरवीर योद्धाओ! तुम धन-धान्य से पूरित ऐश्वर्य्यशाली देशों की ओर जाओ और वहाँ के शूरवीरों को विजय करके विविध प्रकार के धनों को लाभ करो और विजय के साथ ही परमात्मा से प्रार्थना करो कि हे भगवन्! आप अपने सदुपदेशों से हमें सदा पवित्र करें, ताकि हम से कोई अनिष्ट कर्म न हो और आप हमारी इस विजय में सदा सहायक हों॥८॥यह ६९ वाँ सूक्त और १६ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ वि॑श्ववाराश्विना गतं नः॒ प्र तत्स्थान॑मवाचि वां पृथि॒व्याम्। अश्वो॒ न वा॒जी शु॒नपृ॑ष्ठो अस्था॒दा यत्से॒दथु॑र्ध्रु॒वसे॒ न योनि॑म्॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि याज्ञिक लोगो! तुम अपने यज्ञों में ज्ञानी और विज्ञानी दोनों प्रकार के विद्वानों को सत्कारपूर्वक बुलाकर यज्ञवेदि पर बिठाओ और उनसे नाना प्रकार के सदुपदेश ग्रहण करो, क्योंकि यह वेदि केवल बैठने के लिए ही नहीं, किन्तु यज्ञकर्मों की दृढ़ता में स्थिर करानेवाली है॥तात्पर्य्य यह है कि जिन यज्ञों में ज्ञानी और विज्ञानी दोनों प्रकार के विद्वानों को निमन्त्रित कर सत्कार किया जाता है, वे यज्ञ सुशोभित और कृतकार्य्य होते हैं। आध्यात्मिक विद्या के जाननेवाले “ज्ञानी” और कला-कौशल की विद्या को जाननेवाले “विज्ञानी” कहाते हैं, अथवा पदार्थों के ज्ञाता को “ज्ञानी” और अनुष्ठाता को “विज्ञानी” कहते हैं। वह विद्वान्, पुरुषार्थी तथा अश्व के समान शीघ्रगामी केवल तुम्हारे स्थानों को ही सुशोभित करनेवाले न हों, किन्तु दृढ़तारूप व्रत में स्थिर करें। उक्त दोनों प्रकार के विज्ञानों से ही यज्ञ सफल होता है, अन्यथा नहीं॥१॥

सिष॑क्ति॒ सा वां॑ सुम॒तिश्चनि॒ष्ठाता॑पि घ॒र्मो मनु॑षो दुरो॒णे। यो वां॑ समु॒द्रान्त्स॒रितः॒ पिप॒र्त्येत॑ग्वा चि॒न्न सु॒युजा॑ युजा॒नः॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे याज्ञिक लोगो! तुम उत्तम बुद्धि द्वारा अनुष्ठानी बनकर यज्ञ का सेवन करो, क्योंकि तुम्हारे तप से उत्पन्न हुआ स्वेद मानो सरिताओं का रूप धारण करके तुम्हारे मनोरथरूपी समुद्र को परिपूर्ण करता है अर्थात् जब तक पुरुष पूर्ण तपस्वी बनकर अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए उद्यत नहीं होता, तब तक उस लक्ष्य की सिद्धि नहीं होती, इसलिए आप लोग अपने वैदिक लक्ष्यों की पूर्ति तपस्वी बनकर ही कर सकते हो, अन्यथा नहीं॥२॥

यानि॒ स्थाना॑न्यश्विना द॒धाथे॑ दि॒वो य॒ह्वीष्वोष॑धीषु वि॒क्षु। नि पर्व॑तस्य मू॒र्धनि॒ सद॒न्तेषं॒ जना॑य दा॒शुषे॒ वह॑न्ता॥

तात्पर्य्य यह है कि जिस देश के विद्वान् ओषधियों द्वारा किंवा प्रजासम्बन्धी नाना प्रकार की विद्याओं द्वारा अपने ऐश्वर्य्य को नहीं बढ़ाते, उस देश के याज्ञिक कदापि उन्नति को प्राप्त नहीं होते, इसलिए विद्वानों का मुख्य कर्त्तव्य है कि विद्यासम्पन्न होकर याज्ञिकों के ऐश्वर्य्य को बढ़ायें॥३॥

च॒नि॒ष्टं दे॑वा॒ ओष॑धीष्व॒प्सु यद्यो॒ग्या अ॒श्नवै॑थे॒ ऋषी॑णाम्। पु॒रूणि॒ रत्ना॒ दध॑तौ॒ न्य१॒॑स्मे अनु॒ पूर्वा॑णि चख्यथुर्यु॒गानि॑॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे याज्ञिक लोगो! तुम उन ज्ञानी तथा विज्ञानी विद्वानों से यह प्रार्थना करो कि आप सब प्रकार की विद्याओं में कुशल हो, इसलिए ओषधियों तथा जलीय विद्यासम्बन्धी ऋषियों के अभिप्राय को हमारे प्रति कहो और जो प्राचीन रसायनविद्यावेत्ता विद्वानों ने रत्नादि निधियों को निकाला है, उनका ज्ञान भी हमें कराओ अर्थात् पदार्थविद्या के जाननेवाले ऋषियों के तात्पर्य्य को समझकर हमें निधिपति बनाओ॥४॥

शु॒श्रु॒वांसा॑ चिदश्विना पु॒रूण्य॒भि ब्रह्मा॑णि चक्षाथे॒ ऋषी॑णाम्। प्रति॒ प्र या॑तं॒ वर॒मा जना॑या॒स्मे वा॑मस्तु सुम॒तिश्चनि॑ष्ठा॥

हे याज्ञिक लोगो! तुम उन वेदविद्यापारग विद्वानों से यह प्रार्थना करो कि आप उन पूर्वकालिक मन्त्रद्रष्टा ऋषियों से उपलब्ध किये ज्ञान का हमें उपदेश करें, जिससे हमारी बुद्धि निष्ठायुक्त होकर वेद के गूढ भावों को ग्रहण करने योग्य हो। कृपा करके आप हमारे यज्ञीय पवित्र स्थान को सुशोभित करें, ताकि हम आपसे वेदविषयक ज्ञान श्रवण करके पवित्र भावोंवाले हों॥५॥

यो वां॑ य॒ज्ञो ना॑सत्या ह॒विष्मा॑न्कृ॒तब्र॑ह्मा सम॒र्यो॒३॒॑ भवा॑ति। उप॒ प्र या॑तं॒ वर॒मा वसि॑ष्ठमि॒मा ब्रह्मा॑ण्यृच्यन्ते यु॒वभ्या॑म्॥

ब्रह्मप्रतिपादक वेद के प्रचारक विद्वानों! आप इस श्रेष्ठ यज्ञ में आकर इसकी शोभा को बढ़ावें, जो परमात्मा की उपासना के निमित्त किया गया है। हे आध्यात्मिक ज्ञान के प्रचारक विज्ञानी देवो! आप हमको इस पवित्र यज्ञ में परमात्मविषयक उपदेश करें, जो मनुष्यजीवन का एकमात्र लक्ष्य है॥६॥

इ॒यं म॑नी॒षा इ॒यम॑श्विना॒ गीरि॒मां सु॑वृ॒क्तिं वृ॑षणा जुषेथाम्। इ॒मा ब्रह्मा॑णि युव॒यून्य॑ग्मन्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे विद्वानों! तुम इस वेदवाणी का सदा सेवन करो, जो विद्या की वृद्धि द्वारा सब कामनाओं के पूर्ण करनेवाली है। तुम सदैव वेद के उन स्तोत्रों का पाठ करो, जिनमें परमात्मा की स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना का वर्णन किया गया है, जिससे तुम्हारा जीवन पवित्र होकर परमात्मप्राप्ति के योग्य हो॥७॥यह ७० वाँ सूक्त, चौथा अनुवाक और १७ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

अप॒ स्वसु॑रु॒षसो॒ नग्जि॑हीते रि॒णक्ति॑ कृ॒ष्णीर॑रु॒षाय॒ पन्था॑म्। अश्वा॑मघा॒ गोम॑घा वां हुवेम॒ दिवा॒ नक्तं॒ शरु॑म॒स्मद्यु॑योतम्॥

इस मन्त्र में परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे प्रजाजनों! तुम उन ऐश्वर्य्यसम्पन्न अध्यापक तथा उपदेशकों से यह प्रार्थना करो कि आप अपने सदुपदेशों द्वारा हमको पवित्र करते हुए हिंसारूप पापपङ्क को हमसे सदैव के लिए छुड़ाकर शुद्ध करें और हे विद्वानों! आप हम लोगों को उषःकाल=ब्राह्ममुहूर्त्त में उपदेश करें, जिस समय प्रकृति का सम्पूर्ण सौन्दर्य्य अपनी नूतन अवस्था को धारण करता और जिस समय पक्षीगण मधुरस्वर से अपने-अपने भावों द्वारा जगन्नियन्ता जगदीश के भावों को प्रकाशित करते हैं॥तात्पर्य्य यह है कि उत्तम शिक्षा ग्रहण करने के लिए ब्राह्म मुहूर्त्त ही अत्युत्तम काल है, क्योंकि रात्रि के विश्राम के अनन्तर उस समय बुद्धि निर्मल होने के कारण सूक्ष्म विषय को भी ग्रहण करने में समर्थ होती है, इसीलिए वेद भगवान् ने आज्ञा दी है कि तुम ब्राह्म मुहूर्त्त में उपदेश श्रवण करो॥१॥

उ॒पाया॑तं दा॒शुषे॒ मर्त्या॑य॒ रथे॑न वा॒मम॑श्विना॒ वह॑न्ता। यु॒यु॒तम॒स्मदनि॑रा॒ममी॑वां॒ दिवा॒ नक्तं॑ माध्वी॒ त्रासी॑थां नः॥

हे प्रजाजनों! तुम उन विद्वानों से प्रार्थना करो कि हे भगवन्! आप हमें प्राप्त होकर हमको वह उपाय बतलावें, जिससे हमारी दरिद्रता दूर हो हमारा शरीर नीरोग रहे, हम मधुरभाषी हों और ईर्ष्या-द्वेष से सर्वथा पृथक् रहें अर्थात् अपनी चिकित्सारूप विद्या द्वारा हमको नीरोग करके ऐसे साधन बतलावें, जिससे हम रोगी कभी न हों और पदार्थविद्या के उपदेश द्वारा हमें कला-कौशलरूप ज्ञान का उपदेश करें, जिससे हमारी दरिद्रता दूर हो। हम ऐश्वर्य्यशाली हों और साथ ही हमें आत्मज्ञान का भी उपदेश करें, जिससे हमारा आत्मा पवित्र भावों में परिणत होकर आपकी आज्ञा का सदैव पालन करनेवाला हो॥२॥

आ वां॒ रथ॑मव॒मस्यां॒ व्यु॑ष्टौ सुम्ना॒यवो॒ वृष॑णो वर्तयन्तु। स्यूम॑गभस्तिमृत॒युग्भि॒रश्वै॒राश्वि॑ना॒ वसु॑मन्तं वहेथाम्॥

इस मन्त्र में यह प्रार्थना की गई है कि हे परमात्मा! आप हमारे उपदेशकों को ऐश्वर्य्य की रासोंवाले रथ प्रदान करें अर्थात् वे सब प्रकार से सम्पत्तिसम्पन्न हों, दरिद्र न हों, ताकि वह हमको ऐहलौकिक दोनों प्रकार के सुख का उपदेश करें अर्थात् हम उनसे अभ्युदय तथा निःश्रेयस दोनों प्रकार के ज्ञान प्राप्त करके आनन्द अनुभव कर सकें॥३॥

यो वां॒ रथो॑ नृपती॒ अस्ति॑ वो॒ळ्हा त्रि॑वन्धु॒रो वसु॑माँ उ॒स्रया॑मा। आ न॑ ए॒ना ना॑स॒त्योप॑ यातम॒भि यद्वां॑ वि॒श्वप्स्न्यो॒ जिगा॑ति॥

इस मन्त्र में यह प्रार्थना की गई है कि हे विद्वज्जनों! आप परमात्मा के कथन किये हुए मार्ग द्वारा हमें प्राप्त हों अर्थात् परमात्मा ने उपदेशकों के लिये कर्तव्य कथन किया है, उसका आप पालन करें या यों कहो कि आप हमें परमात्मपरायण करके हमारे जीवन को उच्च बनावें और हमें वेदों का उपदेश सुनावें, जो परमात्मा ने हमारे लिये प्रदान किया है॥४॥

यु॒वं च्यवा॑नं ज॒रसो॑ऽमुमुक्तं॒ नि पे॒दव॑ ऊहथुरा॒शुमश्व॑म्। निरंह॑स॒स्तम॑सः स्पर्त॒मत्रिं॒ नि जा॑हु॒षं शि॑थि॒रे धा॑तम॒न्तः॥

हे विद्वानों! आपका जीर्णता से रहित नित नूतन ज्ञान हमारी सब ओर से रक्षा करे और वह पवित्र ज्ञान हमें राष्ट्र=ऐश्वर्य्य प्राप्त कराये और आपके ज्ञान द्वारा हम अपने गिरे हुए राष्ट्र को भी पुनः जीवित करें॥तात्पर्य्य यह है कि विद्वानों के उपदेशों से ज्ञान को प्राप्त हुए प्रजाजन अपने ऐश्वर्य्य को बढ़ाते और गिरे हुए राष्ट्र को भी फिर उठाते हैं अर्थात् जिस प्रकार इस अस्थिमय चर्मावगुण्ठित शरीर को केवल अपनी सत्ता से जीवात्मा ही उठाता है, इस प्रकार राष्ट्ररूप कलेवर को उठानेवाला एकमात्र ज्ञान ही है, इसलिये इस मन्त्र में विद्वानों से प्रार्थना है। आप ऐसी कृपा करें कि हम लोग ज्ञानी तथा विज्ञानी बनकर राष्ट्र को शरीरवत् धारण करते हुए सुखपूर्वक रहें॥५॥

इ॒यं म॑नी॒षा इ॒यम॑श्विना॒ गीरि॒मां सु॑वृ॒क्तिं वृ॑षणा जुषेथाम्। इ॒मा ब्रह्मा॑णि युव॒यून्य॑ग्मन्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

हे श्रोताजन तथा उपदेशको! तुम मिलकर वैदिक स्तोत्रों से परमात्मा की स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना करते हुए यह वर माँगो कि हे जगदीश्वर! हम वेदों के अनुसार अपना आचरण बनावें, जिससे हमारा जीवन पवित्र हो॥६॥यह ७१वाँ सूक्त और १८वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ गोम॑ता नासत्या॒ रथे॒नाश्वा॑वता पुरुश्च॒न्द्रेण॑ यातम्। अ॒भि वां॒ विश्वा॑ नि॒युतः॑ सचन्ते स्पा॒र्हया॑ श्रि॒या त॒न्वा॑ शुभा॒ना॥

हे यजमानो! आप लोग सदैव मन, वाणी तथा शरीर से ऐसे यत्नवान् हों, जिससे तुम्हारे यज्ञों को सत्यवादी विद्वान् आकर सुशोभित करें और आप लोग सब ओर से उनकी स्तुति करते हुए अपने आचरणों को पवित्र बनायें, क्योंकि सत्यवादी विद्वानों की सङ्गति से ही पुरुषों में उच्च भाव उत्पन्न होते हैं, अन्यथा नहीं॥१॥

आ नो॑ दे॒वेभि॒रुप॑ यातम॒र्वाक्स॒जोष॑सा नासत्या॒ रथे॑न। यु॒वोर्हि नः॑ स॒ख्या पित्र्या॑णि समा॒नो बन्धु॑रु॒त तस्य॑ वित्तम्॥

हे यजमानो! तुम सत्यवादी विद्वानों का भले प्रकार सत्कार करो और उनको पिता तथा बन्धु की भाँति मानकर उनसे ब्रह्मविद्यारूप धन का लाभ करो, जो तुम्हारे जीवन का उद्देश्य है अर्थात् तुम उन अध्यापक तथा उपदेशकों की सेवा में प्रेमपूर्वक प्रवृत्त रहो, जिससे वे प्रसन्न हुए तुम्हें ब्रह्मज्ञान का उपदेश करें॥कई एक टीकाकार इस मन्त्र से अश्विनीकुमारों की उत्पत्ति निकालते हैं कि विवस्वान् की सरण्यु नामक स्त्री ने किसी कारण से घोड़ी का रूप धारण कर लिया, पुनः विवस्वान् उसके मोह में आकर घोड़ा बन गया। उन दोनों के समागम से जो सन्तान उत्पन्न हुई, उसका नाम ‘अश्विनीकुमार’ वा ‘नासत्या’ है॥इसी प्रसङ्ग में यह भी लिखा है कि विवस्वान्रूप पिता तथा सरण्युरूप माता से पहले-पहल जो सन्तान उत्पन्न हुई, उसका नाम यम-यमी था अर्थात् यम भाई और यमी बहिन थी और दोनों के विवाह का उल्लेख भी है॥उपर्य्युक्त मन्त्र से यह कथा घड़ना सर्वथा मिथ्या है, क्योंकि वास्तव में कोई विवस्वान् पिता और न कोई सरण्यु माता थी। यह अलङ्कार है, जिसको आधुनिक टीकाकारों ने न समझ कर कुछ का कुछ लिख दिया है। विवस्वान् नाम सूर्य्य और सरण्यु नाम प्रकृति का है। जब कालक्रम से सूर्य्य द्वारा प्रकृति में संसाररूप सन्तति उत्पन्न होती है, तब प्रथम उसमे यम=काल और यमी=वृद्धि इन दोनों का जोड़ा उत्पन्न होता है। किसी पदार्थ को वृद्धिकाल में भोगना पाप है, इसीलिये इसके भोगने का निषेध किया है और अलङ्कार द्वारा यह भी दर्शाया है कि एक कुल में उत्पन्न हुए भाई-बहिन का विवाह निषिद्ध है, अस्तु, हम इस अलङ्कार का वर्णन यम-यमी सूक्त में विस्तारपूर्वक करेंगे, यहाँ इतना लिखना ही पर्याप्त है कि अश्विनीकुमारों की उत्पत्तिविषयक इस कथा का मन्त्र में लेश भी नहीं॥२॥

उदु॒ स्तोमा॑सो अ॒श्विनो॑रबुध्रञ्जा॒मि ब्रह्मा॑ण्यु॒षस॑श्च दे॒वीः। आ॒विवा॑स॒न्रोद॑सी॒ धिष्ण्ये॒मे अच्छा॒ विप्रो॒ नास॑त्या विवक्ति॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे विद्वज्जनों! तुम लोग ब्रह्ममुहूर्त्त में वेद की पवित्र वाणी का अभ्यास करते हुए वैदिक स्तोत्रों का उच्च स्वर से पाठ करो और वेद के ज्ञाता पुरुषों को उचित है कि वे विद्वानों को इस वेदवाणी का उपदेश करें, ताकि अज्ञान का नाश होकर ज्ञान की वृद्धि हो॥३॥

वि चेदु॒च्छन्त्य॑श्विना उ॒षासः॒ प्र वां॒ ब्रह्मा॑णि का॒रवो॑ भरन्ते। ऊ॒र्ध्वं भा॒नुं स॑वि॒ता दे॒वो अ॑श्रेद्बृ॒हद॒ग्नयः॑ स॒मिधा॑ जरन्ते॥

इस मन्त्र में परमात्मदेव उपदेश करते हैं कि हे विद्वान् उपदेशको! आपका कर्तव्य यह है कि आप प्रातः सूर्य्योदयकाल में जब प्रजाजन अग्निहोत्र करते तथा स्तोता लोग वेद का पाठ करते हैं, उस काल में अज्ञान का मार्जन करके जिज्ञासुओं को सत्योपदेश करो, जिससे वे विद्याध्यन तथा वेदोक्त कर्तव्यपालन में सदा तत्पर रहें। इस मन्त्र में परमात्मा ने ब्रह्मविद्याध्यन का सूर्य्योदयकाल ही बतलाया है अर्थात् यह उपदेश किया है कि प्रजाजन उषःकाल में निद्रा से निवृत्त होकर शरीर को शुद्ध करके सन्ध्या अग्निहोत्र के पश्चात् ब्रह्मविद्या के अध्ययन तथा उपदेशश्रवण में तत्पर हों॥४॥

आ प॒श्चाता॑न्नास॒त्या पु॒रस्ता॒दाश्वि॑ना यातमध॒रादुद॑क्तात्। आ वि॒श्वतः॒ पाञ्च॑जन्येन रा॒या यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

मन्त्र में जो “पञ्चजनाः” पद आया है, वह वैदिक सिद्धान्तानुसार पाँच प्रकार के मनुष्यों का वर्णन करता है अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और पाँचवें दस्यु, जिनको ‘निषाद’ भी कहते हैं। वास्तव में वर्ण चार ही हैं, परन्तु मनुष्यमात्र का कल्याण अभिप्रेत होने के कारण पाँचवें दस्युओं को भी सम्मिलित करके परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे सत्यवादी विद्वानों! आप लोग सब ओर से मनुष्यमात्र को प्राप्त होकर वैदिक धर्म का उपदेश करो, जिससे सब प्रजाजन सुकर्मों में प्रवृत्त होकर ऐश्वर्य्यशाली हों॥तात्पर्य्य यह है कि जो पुरुष सदा विद्वानों की सङ्गति में रहते और जिनको विद्वज्जन सब ओर से आकर प्राप्त होते हैं, वे पवित्र भावोंवाले होकर सदा ऐश्वर्य्यसम्पन्न हुए सङ्गति को प्राप्त होते हैं॥यहाँ “पञ्चजनाः” शब्द से यह भी है कि जिनमें गुण कर्म स्वभाव से कोई वर्ण स्थिर नहीं किया जा सकता था, उनको दस्यु वा निषाद कहते थे, क्योंकि वेद में चारों वर्णों का वर्णन स्पष्ट है। इससे सिद्ध है कि आर्यों में वर्णव्यवस्था वैदिक समय से गुणकर्मानुसार मानी जाती थी, जन्म से नहीं॥जिन लोगों का यह कथन है कि सनातन समय में वर्णव्यवस्था जन्म पर निर्भर थी, यह सर्वथा मिथ्या है, क्योंकि “ब्रह्मा देवानां पदवीं”॥ऋ० मं० ९।९६॥और “तमेव ऋषिं तमु ब्रह्माणमाहुः”॥ऋ० म० १०।१०७॥इत्यादि मन्त्रों में स्पष्ट है कि ब्रह्मा, ऋषि वा ब्राह्मणत्वादि धर्म वेद में सब गुण-कर्मानुसार माने गये हैं, जन्म से नहीं॥और जो लोग यह कहते हैं कि वैदिक समय में वर्णव्यवस्था थी ही नहीं और पुरुषसूक्तादि स्थल जिनमें वर्णव्यवस्था पाई जाती है, वे पीछे से मिलाये गये हैं, यह कथन भी ठीक नहीं, क्योंकि यदि पुरुषसूक्त पीछे से मिलाया हुआ होता, तो किसी एक वेद में होता, परन्तु चारों वेदों में पाये जाने और “पञ्चजनाः” आदि शब्दों से पाँच प्रकार के मनुष्यों का ग्रहण होने से स्पष्ट है कि “ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत्”॥यजु० ३१।१४॥इत्यादि मन्त्रों में परमात्मा ने गुणकर्मानुसार वर्णों का विभाग किया है, जन्मानुसार नहीं और यह भाव पुरुषसूक्त में स्पष्ट है अथवा इसके अर्थ ये भी हैं कि जो लोग प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान इन पाँचों में होनेवाली प्राणविद्या के ऐश्वर्य्य को जाननेवाले योगीजन हैं। उनसे शिक्षा लेने का विधान उक्त मन्त्र में है। वर्णविषयक जो इस मन्त्र के अर्थ हैं, वे आधिभौतिक हैं और प्राणविद्याविषयक जो अर्थ किये हैं, वे आध्यात्मिक हैं, इसलिए कोई विरोध नहीं॥५॥यह ७२वाँ सूक्त और १९वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अता॑रिष्म॒ तम॑सस्पा॒रम॒स्य प्रति॒ स्तोमं॑ देव॒यन्तो॒ दधा॑नाः। पु॒रु॒दंसा॑ पुरु॒तमा॑ पुरा॒जाम॑र्त्या हवते अ॒श्विना॒ गीः॥

हे यजमानो! तुम लोग यज्ञविद्या जाननेवाले विद्वानों से याज्ञिक बनने के लिए जिज्ञासा करो और उनसे यह प्रार्थना करो कि आप हमको याज्ञिक बनायें, जिससे हम इस अविद्यारूप अज्ञान से निवृत्त होकर ज्ञानमार्ग पर चलें। हम उत्तम गुणों के धारण करनेवाले हों और अन्ततः हमको मुक्तिपद प्राप्त हो, क्योंकि यज्ञ ही मुक्ति का साधन है और याज्ञिक पुरुष ही चिरायु होकर अमृत पद को प्राप्त होते हैं, या यों कहो कि जो पुरुष कर्म तथा ज्ञान दोनों साधनों से जिज्ञासा करता है, वही अमृतरूप पद का अधिकारी होता है, इसलिए मुक्ति की इच्छावाले पुरुषों को सदा ही यज्ञ का अनुष्ठान करना श्रेयस्कर है॥१॥

न्यु॑ प्रि॒यो मनु॑षः सादि॒ होता॒ नास॑त्या॒ यो यज॑ते॒ वन्द॑ते च। अ॒श्नी॒तं मध्वो॑ अश्विना उपा॒क आ वां॑ वोचे वि॒दथे॑षु॒ प्रय॑स्वान्॥

जो पुरुष यज्ञादि कर्म करता हुआ परमात्मा की उपासना में प्रवृत्त रहता है, वह परमात्मा का प्रिय पुरुष परमात्माज्ञापालन करता हुआ मधुविद्या का रसपान करनेवाला होता है। मधुविद्या का विस्तारपूर्वक वर्णन “बृहदारण्यकोपनिषद्” में किया गया है। विशेष जाननेवाले वहाँ देख लें, यहाँ विस्तारभय से उद्घृत नहीं किया, वही पुरुष ऐश्वर्य्यशाली होकर यज्ञों में दान देनेवाला होता, वही विद्वानों का सत्कार करनेवाला होता और वही ब्रह्मविद्या का अधिकारी होता है। इससे सिद्ध है कि याज्ञिक पुरुष ही ब्रह्म का समीपी होता है, अन्य नहीं॥२॥

अहे॑म य॒ज्ञं प॒थामु॑रा॒णा इ॒मां सु॑वृ॒क्तिं वृ॑षणा जुषेथाम्। श्रु॒ष्टी॒वेव॒ प्रेषि॑तो वामबोधि॒ प्रति॒ स्तोमै॒र्जर॑माणो॒ वसि॑ष्ठः॥

इस मन्त्र का भाव स्पष्ट है अर्थात् यज्ञनिधि परमात्मा याज्ञिक लोगों को उपदेश करते हैं कि तुम लोग वेदों का अध्ययन करते हुए यज्ञ की वृद्धि करो अर्थात् यज्ञ के सूक्ष्मांशों को वेद के अभ्यास द्वारा जानकर यज्ञविषयक उन्नति में प्रवृत्त होओ और सर्वगुणसम्पन्न तथा सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाले परमात्मा की उपासना करते हुए प्रार्थना करो कि वह हमारी इस कामना को पूर्ण करे॥३॥

उप॒ त्या वह्नी॑ गमतो॒ विशं॑ नो रक्षो॒हणा॒ सम्भृ॑ता वी॒ळुपा॑णी। समन्धां॑स्यग्मत मत्स॒राणि॒ मा नो॑ मर्धिष्ट॒मा ग॑तं शि॒वेन॑॥

हे शूरवीर विद्वानों! आप लोग धर्मिक प्रजा को प्राप्त होकर उत्तमोत्तम पदार्थों से नित्य यज्ञ कराओ, प्रजा को सदाचारी बनाओ, मदकारक द्रव्यों से उन्हें बचाओ, उनमें अहिंसा का उपदेश करो और दुष्ट राक्षसों से सदा उनकी रक्षा करते रहो, जिससे उनके यज्ञादि कर्मों में विघ्न न हो अर्थात् आप लोग प्रजा को सदा ही कल्याणरूप से प्राप्त हों॥४॥

आ प॒श्चाता॑न्नास॒त्या पु॒रस्ता॒दाश्वि॑ना यातमध॒रादुद॑क्तात्। आ वि॒श्वतः॒ पाञ्च॑जन्येन रा॒या यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

मन्त्र में “पञ्चजना” शब्द से ब्राह्मणादि चारों वर्ण और पाँचवें दस्युओं से तात्पर्य है, जैसा कि पीछे लिख आये हैं। परमात्मा आज्ञा देते हैं कि हे अध्यापक तथा उपदेशको! आप लोग सब ओर से सम्पूर्ण प्रजा को प्राप्त होकर अपने उपदेशों द्वारा मनुष्यमात्र की रक्षा करो और सब यजमान मिलकर कल्याणरूप वेदवाणियों से यह प्रार्थना करो कि हमारे उपदेशक हमको अपने सदुपदेशों से सदा पवित्र करें॥जो मनुष्य अध्यापक तथा उपदेशकों द्वारा सदैव उत्तमोत्तम गुणों को उपलब्ध करते और वेदवाणियों से अपने आपको पवित्र करते रहते हैं, वे सदाचारी होकर सदैव उन्नतिशील होते हैं॥५॥यह ७३वाँ सूक्त और २०वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इ॒मा उ॑ वां॒ दिवि॑ष्टय उ॒स्रा ह॑वन्ते अश्विना। अ॒यं वा॑म॒ह्वेऽव॑से शचीवसू॒ विशं॑विशं॒ हि गच्छ॑थः॥

हे विद्वानों! तुम सुख की इच्छावाले यजमानों को प्राप्त होकर उनको विद्युत् तथा अग्निविद्या का उपदेश करो, जिससे वे कला-कौशल बनाने में प्रवीण हों और प्रत्येक स्थान में घूम-घूम कर प्रजाजनों को इस विद्या का उपदेश करो, जिससे वे कलायन्त्र बनाकर ऐश्वर्य्यशाली हों या यों कहो कि प्रजाजनों में विज्ञान और ऐश्वर्य्य का उपदेश करो, जिससे उनके शुभ मनोरथ पूर्ण हों॥१॥

यु॒वं चि॒त्रं द॑दथु॒र्भोज॑नं नरा॒ चोदे॑थां सू॒नृता॑वते। अ॒र्वाग्रथं॒ सम॑नसा॒ नि य॑च्छतं॒ पिब॑तं सो॒म्यं मधु॑॥

हे यजमानो! तुम विद्वान् उपदेशकों को नाना प्रकार के भोजन और मीठे रसों का पान कराके प्रसन्न करो, ताकि वह सुन्दर वेदवाणियों का तुम्हारे प्रति उपदेश करें और वह तुम्हारे सम्मुख मानस यज्ञों द्वारा अनुष्ठान करके तुम्हें शान्ति का मार्ग बतलायें, जिससे तुम लोग परस्पर एक दूसरे की उन्नति करते हुए प्रजा में धर्म का प्रचार करो॥२॥

आ या॑त॒मुप॑ भूषतं॒ मध्वः॑ पिबतमश्विना। दु॒ग्धं पयो॑ वृषणा जेन्यावसू॒ मा नो॑ मर्धिष्ट॒मा ग॑तम्॥

हे जलविद्या के जाननेवाले अध्यापक तथा उपदेशको! आप शीघ्र आकर हमारे यज्ञ को सुशोभित करें अर्थात् हमारे यज्ञ में पधार कर हमें जलों की विद्या में निपुण करें, ताकि हम अपने ऐश्वर्य्य को बढ़ावें। हम आपका मधु आदि उत्तमोत्तम पदार्थों से सत्कार करते हैं। आप सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाले धन के स्वामी हैं, कृपा करके हमारे उपार्जन किये हुए धन का नाश न करें, किन्तु हमारी वृद्धि करें, जिससे हम यज्ञादि धर्मकार्यों में प्रवृत्त रहें॥३॥

अश्वा॑सो॒ ये वा॒मुप॑ दा॒शुषो॑ गृ॒हं यु॒वां दीय॑न्ति॒ बिभ्र॑तः। म॒क्षू॒युभि॑र्नरा॒ हये॑भिरश्वि॒ना दे॑वा यातमस्म॒यू॥

परमात्मा आज्ञा देते हैं कि कर्मकाण्डी तथा वेदानुयायी सद्गृहस्थ यजमानों को चाहिये कि वे विद्वान् उपदेशकों को अपने गृह में बुलाकर उनकी खान-पानादि से भले प्रकार सेवा करके उनसे नर-नारी सदुपदेश ग्रहण करके अपने जीवन को पवित्र करें और उन विद्युदादिविद्यावेत्ता विद्वानों से शीघ्र गतिवाले यानादि की शिक्षा प्राप्त करके ऐश्वर्य्यसम्पन्न हों॥४॥

अधा॑ ह॒ यन्तो॑ अ॒श्विना॒ पृक्षः॑ सचन्त सू॒रयः॑। ता यं॑सतो म॒घव॑द्भ्यो ध्रु॒वं यश॑श्छ॒र्दिर॒स्मभ्यं॒ नास॑त्या॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे यश तथा ऐश्वर्य्य की कामनावाले यजमानो! तुम विद्वान् उपदेशकों को प्राप्त होकर उनसे सदुपदेश ग्रहण करते हुए यशस्वी और ऐश्वर्य्यशाली होओ और अपने व्रत में दृढ़ रहो अर्थात् ऐश्वर्य्यसम्पन्न होने पर भी अपने व्रत से कदापि विचलित न हो॥५॥

प्र ये य॒युर॑वृ॒कासो॒ रथा॑ इव नृपा॒तारो॒ जना॑नाम्। उ॒त स्वेन॒ शव॑सा शूशुवु॒र्नर॑ उ॒त क्षि॑यन्ति सुक्षि॒तिम्॥

जो यजमान वेदमर्यादा पर चलते हुए अपने ऐश्वर्य्य को बढ़ाते हैं, वे विजयप्राप्त राजाओं के रथ के समान सुशोभित होते हैं अर्थात् जब राजा विजयी होकर अपने देश को आता है, उस समय उसकी प्रजा उसका मान हार्दिक भावों से करती है, इसी प्रकार प्रजा उन नरों का सत्कार अपने हार्दिक भावों से करती है। जो विद्वानों से उत्तम शिक्षा प्राप्त करके तदनुकूल अपने आचरण करते हैं, वे ही अपने यश से सुशोभित होकर प्रजा को सुशोभित करते और वे ही उत्तम भूमि को प्राप्त होते हैं॥६॥यह ७४वाँ सूक्त और २१वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

व्यु१॒॑षा आ॑वो दिवि॒जा ऋ॒तेना॑विष्कृण्वा॒ना म॑हि॒मान॒मागा॑त्। अप॒ द्रुह॒स्तम॑ आव॒रजु॑ष्ट॒मङ्गि॑रस्तमा प॒थ्या॑ अजीगः॥

इस मन्त्र में परमात्मा की महिमा वर्णन करते हुए यह उपदेश किया है कि हे सांसारिक जनों! तुम सूर्य्य द्वारा परमात्मा की महिमा का अनुभव करते हुए उनके साथ अपने आपको जोड़ो अर्थात् ब्रह्ममुहूर्त्तकाल में जब सूर्य्य द्युलोक को प्रकाशित करता हुआ अपने तेज से उदय होता है, उस काल में मनुष्यमात्र का कर्तव्य है कि वह आलस्य को त्याग कर परमात्मा की महिमा को अनुभव करते हुए ऋत=सत्य के आश्रित हों, उस महान् प्रभु की उपासना में संलग्न हों और याज्ञिक लोग उसी काल में यज्ञों द्वारा परमात्मा का आह्वान करें अर्थात् मनुष्यमात्र को ब्रह्मज्ञान का उपदेश करें, जिससे सब प्राणी परमात्मा की आज्ञा का पालन करते हुए सुखपूर्वक अपने जीवन को व्यतीत करें। यह परमात्मा का उच्च आदेश है॥१॥

म॒हे नो॑ अ॒द्य सु॑वि॒ताय॑ बो॒ध्युषो॑ म॒हे सौभ॑गाय॒ प्र य॑न्धि। चि॒त्रं र॒यिं य॒शसं॑ धेह्य॒स्मे देवि॒ मर्ते॑षु मानुषि श्रव॒स्युम्॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यों! तुम प्रातःकाल में उठकर अपने सौभाग्य के लिए प्रार्थना करो कि हे परमात्मन्! इस मनुष्यलोक में आप हमें नाना प्रकार का धन, यश, बल, तेज प्रदान करें, हमें पुत्र-पौत्रादि परिवार दें और हमको अपनी महत्ता से उच्च कर्मोंवाला बनायें॥तात्पर्य्य यह कि जो पुरुष प्रातःकाल में शुद्ध हृदय द्वारा परमपिता परमात्मा से प्रार्थना करते हैं, वे अवश्य ऐश्वर्य्यसम्पन्न होकर सांसारिक सुख भोगते और अन्ततः मुक्ति को प्राप्त होते हैं॥२॥

ए॒ते त्ये भा॒नवो॑ दर्श॒ताया॑श्चि॒त्रा उ॒षसो॑ अ॒मृता॑स॒ आगुः॑। ज॒नय॑न्तो॒ दैव्या॑नि व्र॒तान्या॑पृ॒णन्तो॑ अ॒न्तरि॑क्षा॒ व्य॑स्थुः॥

“उषा” सूर्य्य की रश्मियों का एक पुञ्ज है। जब वे रश्मियाँ इकठ्ठी होकर पृथिवीतल पर पड़ती हैं, तब एक प्रकार का अमृतभाव उत्पन्न करती हुई कई प्रकार के व्रत धारण कराती हैं अर्थात् नियमपूर्वक सन्ध्या करनेवाले उषःकाल में सन्ध्या के व्रत को और नियम से हवन करनेवाले हवनव्रत को धारण करते हैं। इसी प्रकार सूर्य्योदय होने पर प्रजाजन नानाप्रकार के व्रत धारण करके अमृतभाव को प्राप्त होते हैं, अत एव मनुष्य का कर्तव्य है कि वह प्रातः उषःकाल में अपने व्रतों को पूर्ण करे, व्रतों का पूर्ण करना ही अमृतभाव को प्राप्त होना है॥ या यों कहो कि जिस प्रकार विराट् स्वरूप में सूर्य्य-चन्द्रमादि अपने उदय-अस्तरूप व्रतों को नियमपूर्वक पालन करते हैं, इसी प्रकार अमृतभाव को प्राप्त होनेवाले जिज्ञासु को अपने व्रतों का नियमपूर्वक पालन करना चाहिये। जो उषःकाल में उठकर अपने नियम-व्रतों का पालन करते हैं, वे ही अमृत को प्राप्त होकर सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करते हैं, अन्य नहीं॥३॥

ए॒षा स्या यु॑जा॒ना प॑रा॒कात्पञ्च॑ क्षि॒तीः परि॑ स॒द्यो जि॑गाति। अ॒भि॒पश्य॑न्ती व॒युना॒ जना॑नां दि॒वो दु॑हि॒ता भुव॑नस्य॒ पत्नी॑॥

इस मन्त्र में उषा को द्युलोक की कन्या और संसार की पत्नीस्थानीय माना गया है, जिसका तात्पर्य यह है कि इसको द्युलोक से उत्पन्न होने के कारण “कन्या” और पृथिवीलोक पर आकर सर्वभोग्या=सबके भोगने योग्य होने से “पत्नी” कथन की गयी है। उषा में पत्नी भाव का आरोप करने से तात्पर्य यह है कि यह प्रतिदिन प्रातःकाल सब संसारी जनों को उद्बोधन करती है कि तुम उठकर जागो, परमात्मा में जुड़ो और अपनी दिनचर्या में प्रवृत्त होकर अपने-अपने कार्यों को विधिवत् करो, यह मन्त्र का भाव है। पृथिवीस्थ पाँच प्रकार के मनुष्यों का वर्णन पीछे कर आये हैं, इसलिये यहाँ आवश्यकता नहीं॥४॥

वा॒जिनी॑वती॒ सूर्य॑स्य॒ योषा॑ चि॒त्राम॑घा रा॒य ई॑शे॒ वसू॑नाम्। ऋषि॑ष्टुता ज॒रय॑न्ती म॒घोन्यु॒षा उ॑च्छति॒ वह्नि॑भिर्गृणा॒ना॥

इस मन्त्र में रूपकालङ्कार से उषा को सूर्य्य की स्त्री वर्णन किया गया है, जिसका तात्पर्य यह है कि प्रातःकाल पूर्वदिशा में जो रक्तवर्ण की दीप्ति सूर्योदय के समय उत्पन्न होती है, उसका नाम “उषा” है। द्युलोक उसका पितास्थानीय और सूर्य्य पतिस्थानीय माना गया है, क्योंकि वह द्युलोक में उत्पन्न होती और सूर्य्य उसका भोक्ता होने के कारण उसको पतिरूप से वर्णन किया गया है, या यों कहो कि सूर्य्य की रश्मिरूप उषा सूर्य्य की शोभा को बढ़ाती और सदैव उसके साथ रहने के कारण उसको योषारूप से वर्णन किया गया है और जो कई एक मन्त्रों में उषा को सूर्य्य की पुत्री वर्णन किया गया है, वह द्युलोक के भाव से है, सूर्य्य के अभिप्राय से नहीं॥तात्पर्य यह है कि यही “उषा” अन्नादि सब धनों के देनेवाली है, क्योंकि यही अन्धकार को दूर करके सब मनुष्यों को अपने-अपने काम में लगाती और यज्ञादि शुभ कार्य्य करने के लिए प्रेरणा करती है। ऋषि लोग प्रातःकाल में इसकी स्तुति करते हुए यज्ञादि कार्य्यों में प्रवृत्त होते और “सहस्रशीर्षादि” यजु० ३२।२॥मन्त्रों में परमात्मा के विराट् स्वरूप का वर्णन करते हुए सर्व ऐश्वर्य्य को प्राप्त होते हैं, इसीलिए यहाँ उषा को विशेषरूप से वर्णन किया गया है॥५॥

प्रति॑ द्युता॒नाम॑रु॒षासो॒ अश्वा॑श्चि॒त्रा अ॑दृश्रन्नु॒षसं॒ वह॑न्तः। याति॑ शु॒भ्रा वि॑श्व॒पिशा॒ रथे॑न॒ दधा॑ति॒ रत्नं॑ विध॒ते जना॑य॥

उषःकाल का आश्रय सूर्य्य प्रत्यक्षरूप से नानाप्रकार की किरणों को धारण करता हुआ संसार में अव्याहतगति होकर विचरता और उसकी दीप्ति से नानाप्रकार के ऐश्वर्य्य प्राप्त होते हैं। इनको रत्नों का विभाग करनेवाला कथन किया गया है अर्थात् सूर्य्य के प्रकाश होने पर ही सब प्राणी वर्ग अपना-अपना भरण-पोषण करते और कर्मानुसार रत्नादि धनों की प्राप्ति में प्रवृत्त होते हैं॥६॥

स॒त्या स॒त्येभि॑र्मह॒ती म॒हद्भि॑र्दे॒वी दे॒वेभि॑र्यज॒ता यज॑त्रैः। रु॒जद्दृ॒ळ्हानि॒ दद॑दु॒स्रिया॑णां॒ प्रति॒ गाव॑ उ॒षसं॑ वावशन्त॥

इस मन्त्र में “उषा” का महत्त्व वर्णन किया गया है, क्योंकि विद्वान् लोग उषःकाल में ही परमात्मा की स्तुति करते, बड़े-बड़े याज्ञिक महात्मा इसी काल में यज्ञ करते, गोपाल लोग गौओं का सत्कार करते और सब कर्मकाण्डी पुरुष उषःकाल की इच्छा करते हैं, क्योंकि इसी काल में सब वैदिककर्मों का प्रारम्भ होता है अर्थात् सन्ध्या-अग्निहोत्र, जप, तप आदि सब अनुष्ठान इसी काल में किये जाते हैं, इसलिए यह उषा सब के कामना करने योग्य है॥७॥

नू नो॒ गोम॑द्वी॒रव॑द्धेहि॒ रत्न॒मुषो॒ अश्वा॑वत्पुरु॒भोजो॑ अ॒स्मे। मा नो॑ ब॒र्हिः पु॑रु॒षता॑ नि॒दे क॑र्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे याज्ञिक तथा विद्वान् पुरुषो! तुम सदा उषःकाल में यह प्रार्थना करो कि हे भगवन्! आप हमें विविध प्रकार के यानादि पदार्थ और दृढ इन्द्रियोंवाली पुत्र-पौत्रादि सन्तति प्रदान करें। हमारे यज्ञ की कोई निन्दा न करे, प्रत्युत सब अनुष्ठानी बन कर हमारे सहकारी हों। हम निन्दित कर्मों के अपयश से सदैव भयभीत रहें। आप ऐसी कृपा करें कि हम आपसे प्रार्थना करते हुए सदा अपना कल्याण ही देखें। यह उपासक की प्रार्थना करने का प्रकार है॥८॥यह ७५वाँ सूक्त समाप्त हुआ॥

उदु॒ ज्योति॑र॒मृतं॑ वि॒श्वज॑न्यं वि॒श्वान॑रः सवि॒ता दे॒वो अ॑श्रेत्। क्रत्वा॑ दे॒वाना॑मजनिष्ट॒ चक्षु॑रा॒विर॑क॒र्भुव॑नं॒ विश्व॑मु॒षाः॥

इस मन्त्र में परमात्मा की स्तुति वर्णन की गई है कि जो परमात्मदेव सब ब्रह्माण्डों में ओतप्रोत हो रहा है और जो सबका उत्पत्तिस्थान तथा विद्वानों को शुभमार्ग में प्रेरित करनेवाला है, उसी देव का हम  सबको आश्रयण करना चाहिए और उसी की उपासना में हमें संलग्न होना चाहिए, जो चराचर का चक्षु और हमारा पितृस्थानीय है॥कई एक टीकाकारों ने यहाँ “उषा” को ही सविता तथा देवी माना है, यह उनकी भूल है, क्योंकि ज्योति, अमृत तथा विश्वानर आदि शब्द परमात्मा के ग्राहक तथा वाचक हैं, किसी जड़ पदार्थ के नहीं। दूसरी बात यह है कि उषःकाल में यज्ञादि कर्मों का वर्णन किया गया है, जैसा कि पीछे स्पष्ट है। उसके अनन्तर परमात्मा की स्तुति प्रार्थना करना ही उपादेय है, इसलिए यह मन्त्र परमात्मोपासना का ही वर्णन करता है, किसी जड़ पदार्थ का नहीं॥१॥

प्र मे॒ पन्था॑ देव॒याना॑ अदृश्र॒न्नम॑र्धन्तो॒ वसु॑भि॒रिष्कृ॑तासः। अभू॑दु के॒तुरु॒षसः॑ पु॒रस्ता॑त्प्रती॒च्यागा॒दधि॑ ह॒र्म्येभ्यः॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा की स्तुति वर्णन की गई है कि जब उपासक प्रथम परमात्मज्योति को देख कर ध्यानावस्थित हुआ उस परमात्मदेव का ध्यान करता और ध्यानावस्था में उस ज्योति को सम्पूर्ण चन्द्रमादि वसुओं से अलङ्कृत सबसे शिरोमणि पाता है, तब मुक्तकण्ठ से यह कहता है कि देवताओं का यह मार्ग मुझको प्राप्त हो, या यों कहो कि परमात्मरूप दिव्यज्योति, जो सब वसुओं में देदीप्यमान हो रही है, उसका ध्यान करनेवाले उपासक देवमार्ग द्वारा अमृतभाव को प्राप्त होते हैं। इसी भाव को “प्राची दिगग्निरधिपति०” इत्यादि सन्ध्या-मन्त्रों में वर्णन किया है कि प्राची आदि दिशा तथा उपदिशाओं का अधिपति एक परमात्मदेव ही है, जो हमारा रक्षक, शुभकर्मों में प्रेरक और सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य का दाता है, उसी की उपासना करनी योग्य है, अन्य की नहीं॥२॥

तानीदहा॑नि बहु॒लान्या॑स॒न्या प्रा॒चीन॒मुदि॑ता॒ सूर्य॑स्य। यतः॒ परि॑ जा॒र इ॑वा॒चर॒न्त्युषो॑ ददृ॒क्षे न पुन॑र्य॒तीव॑॥

जिस प्रकार अग्नि से सहस्रों प्रकार की ज्वालायें उत्पन्न होती रहती हैं, इसी प्रकार स्वतःप्रकाश परमात्मा के स्वरूप से तेज की रश्मियें सदैव देदीप्यमान होती रहती हैं, या यों कहो कि स्वतः-प्रकाश परमात्मा की ज्योति सदैव प्रकाशित होती रहती है। जैसे पदार्थों के अनित्य गुण उन पदार्थों से पृथक् हो जाते वा नाश को प्राप्त हो जाते हैं, इस प्रकार परमात्मा के प्रकाशरूप गुण का उससे कदापि वियोग नहीं होता अर्थात् परमात्मा के गुण विकारी नहीं, यह इस मन्त्र का भाव है॥३॥

त इद्दे॒वानां॑ सध॒माद॑ आसन्नृ॒तावा॑नः क॒वयः॑ पू॒र्व्यासः॑। गू॒ळ्हं ज्योतिः॑ पि॒तरो॒ अन्व॑विन्दन्त्स॒त्यम॑न्त्रा अजनयन्नु॒षास॑म्॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यों! विद्वानों के यज्ञ में वही सत्यवादी, वही कवि, वही प्राचीन उपदेष्टा और वही पितर माने जाते हैं, जो परमात्मा  के गुप्तभाव को प्रकाशित करते हैं अर्थात् विद्वत्ता तथा कवित्व उन्हीं लोगों का सफल होता है, जो परमात्मा के गुणों को कीर्तन द्वारा सर्वसाधारण तक पहुँचाते हैं॥४॥

स॒मा॒न ऊ॒र्वे अधि॒ संग॑तासः॒ सं जा॑नते॒ न य॑तन्ते मि॒थस्ते। ते दे॒वानां॒ न मि॑नन्ति व्र॒तान्यम॑र्धन्तो॒ वसु॑भि॒र्याद॑मानाः॥

जो पुरुष विद्वानों के नियमों का पालन करते हुए अहिंसक होकर अर्थात् अहिंसादि पाँच यमों का पालन करते हुए संसार में विचरते हैं, वे यत्नपूर्वक अपने अभीष्ट फल को प्राप्त होते हैं, या यों कहो कि वैदिक नियमों का वही पुरुष पालन करते हैं, जो अहिंसक होकर वेदवाणी का प्रचार करते और आपस में समानभाव से इन्द्रियों का संयम करते हुए औरों को ब्रह्मचर्य्यव्रत का उपदेश करते हैं। स्मरण रहे कि उपदेश उन्हीं का सफल होता है, जो अनुष्ठानी बनकर यात्रा करते हैं, अन्यों का नहीं॥५॥

प्रति॑ त्वा॒ स्तोमै॑रीळते॒ वसि॑ष्ठा उष॒र्बुधः॑ सुभगे तुष्टु॒वांसः॑। गवां॑ ने॒त्री वाज॑पत्नी न उ॒च्छोषः॑ सुजाते प्रथ॒मा ज॑रस्व॥

इस मन्त्र में रूपकालङ्कार से उषःकाल का वर्णन करते हुए परमात्मा उपदेश करते हैं जो पुरुष उषःकाल में उठकर सन्ध्यावन्दन तथा हवनादि अनुष्ठानार्ह कार्यों में प्रतिदिन प्रवृत्त रहते हैं, वे सब धनों के देनेवाली तथा इन्द्रियसंयम का मुख्यसाधनरूप उषःकाल से परम लाभ उठाते हैं अर्थात् जो पुरुष अपनी निद्रा त्याग उषःकाल में उठकर अपने नित्यकर्मों में प्रवृत्त होते हैं, वे सौभाग्यशाली पुरुष इन्द्रियों का संयम करते हुए ऐश्वर्य्यशाली होकर सब प्रकार का सुख भोगते हैं, क्योंकि इन्द्रियसंयम का मुख्य साधन उषःकाल में ब्रह्मोपासन है, इसलिये सब मनुष्यों को उचित है कि जब पूर्वदिशा में सूर्य्य की लाली उदय हो, उसी काल में ब्रह्मोपासनरूप अनुष्ठान करें॥६॥

ए॒षा ने॒त्री राध॑सः सू॒नृता॑नामु॒षा उ॒च्छन्ती॑ रिभ्यत॒॒ वसि॑ष्ठैः। दी॒र्घ॒श्रुतं॑ र॒यिम॒स्मे दधा॑ना यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे विचारशील विद्वानों! तुम उषःकाल के अपने कर्तव्य कर्मों से निवृत्त होकर स्वस्तिवाचनों से प्रार्थना करो कि आप हमें और हमारे यजमानों को ऐश्वर्य्यसम्पन्न करें और आपका दिया हुआ ऐश्वर्य्य पवित्र हो॥इस मन्त्र में जो उषादेवी को विद्वानों की नेत्री तथा वेदवाणियों की प्रकाशिका वर्णन किया गया है, वह उपचार से है, मुख्य नहीं। अर्थात् उषा ऐसा काल है कि परमालस्यग्रस्त मनुष्यों को भी उद्योगी बना देता और ईश्वरविमुखमनों में भी ईश्वरीय ज्योति का संचार करता है, इसलिये दिव्यरूप से वर्णन किया गया है, वास्तव में उषःकाल जड़ होने से किसी का प्रेरक वा स्वामी नहीं, सबका स्वामी एकमात्र परमात्मा है, उससे भिन्न कोई नहीं॥७॥यह ७६वाँ सूक्त और २३वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

उपो॑ रुरुचे युव॒तिर्न योषा॒ विश्वं॑ जी॒वं प्र॑सु॒वन्ती॑ च॒रायै॑। अभू॑द॒ग्निः स॒मिधे॒ मानु॑षाणा॒मक॒र्ज्योति॒र्बाध॑माना॒ तमां॑सि॥

इस मन्त्र में परमात्मा को ज्योतिरूप से वर्णन किया गया है अर्थात् जगज्जननी ज्योतिरूप परमात्मा, जो जीवमात्र का जन्मदाता है, उसने आदि सृष्टि में विश्व के चराचर जीवों को युवावस्था में प्रकट किया और वह परमात्मरूप शक्ति भी युवावस्था में प्रकट हुई स्त्री के समान नहीं॥इस मन्त्र में जीव शब्द स्पष्ट आया है, जिसके अर्थ चराचर प्राणधारी जीव के हैं, शुद्धचेतन के नहीं, क्योंकि शुद्धचेतनरूप जीव न कभी मरता और न उत्पन्न होता है, वह अनादि अनन्त सदा एकरस रहता है। इसका वर्णन “द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया” ऋ० १।१६४।२०। इत्यादि मन्त्रों में स्पष्ट वर्णित है॥१॥

विश्वं॑ प्रती॒ची स॒प्रथा॒ उद॑स्था॒द्रुश॒द्वासो॒ बिभ्र॑ती शु॒क्रम॑श्वैत्। हिर॑ण्यवर्णा सु॒दृशी॑कसंदृ॒ग्गवां॑ मा॒ता ने॒त्र्यह्ना॑मरोचि॥

जो दिव्यशक्ति सम्पूर्ण विश्व को धारण करके कोटानुकोटि ब्रह्माण्डों को चला रही है, वही दिव्यशक्तिरूप परमात्मा सब ब्रह्माण्डों की जननी और वही सबका अधिष्ठान होकर स्वयं प्रकाशमान हो रहा है॥२॥

दे॒वानां॒ चक्षुः॑ सु॒भगा॒ वह॑न्ती श्वे॒तं नय॑न्ती सु॒दृशी॑क॒मश्व॑म्। उ॒षा अ॑दर्शि र॒श्मिभि॒र्व्य॑क्ता चि॒त्राम॑घा॒ विश्व॒मनु॒ प्रभू॑ता॥

जो दिव्यशक्ति सूर्य्यादि सब तेजों का चक्षुरूप, सब प्रकाशक ज्योतियों को प्रकाश देनेवाली, गतिशील सूर्य्य चन्द्रादिकों को चलानेवाली और जो सम्पूर्ण संसार को आश्रय करके स्थित हो रही है, वही दिव्य शक्ति सम्पूर्ण विश्व का अधिष्ठान है॥या यों कहो कि सम्पूर्ण दिव्य शक्तियों की प्रकाशक एकमात्र परमात्मज्योति ही है। उसी के आश्रित हुए सब ब्रह्माण्ड नियमानुसार चलते और उसी के शासन में सब पदार्थ भ्रमण कर रहे हैं, जैसा कि अन्यत्र भी कहा है कि “एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः०॥” हे गार्गि! उसी अक्षर परमात्मा की आज्ञा में सूर्य्य-चन्द्रमादि सब ब्रह्माण्ड स्थिर हैं और वही सबको धारण कर रहा है। इसी भाव को “तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्तात्०॥” इस मन्त्र में भी प्रतिपादन किया है कि उसी परमात्मज्योति से सब ब्रह्माण्ड प्रकाशित होते हैं, अतएव सिद्ध है कि उषःकाल में उसी के उपासन से पुरुष सद्गति को प्राप्त हो सकता है, अन्यथा नहीं॥३॥

अन्ति॑वामा दू॒रे अ॒मित्र॑मुच्छो॒र्वीं गव्यू॑ति॒मभ॑यं कृधी नः। या॒वय॒ द्वेष॒ आ भ॑रा॒ वसू॑नि चो॒दय॒ राधो॑ गृण॒ते म॑घोनि॥

हे सब धनों से परिपूर्ण तथा ऐश्वर्य्यसम्पन्न स्वामिन्! आप हमें अन्न तथा गवादि पशुओं का स्वामी बनावें, आप हमें विस्तीर्ण भूमिपति बनावें, हमारे शत्रुओं को हमसे दूर करके सब संसार का हमें मित्र बनावें अर्थात् द्वेषबुद्धि को हमसे दूर करें, जिससे कोई भी हमसे शत्रुता न करे। अधिक क्या, आप उपासकों को शीलसम्पन्न करें, सब प्रकार का धन दें, जिससे हम लोग निरन्तर आपकी उपासना तथा आज्ञापालन में तत्पर रहें॥४॥

अ॒स्मे श्रेष्ठे॑भिर्भा॒नुभि॒र्वि भा॒ह्युषो॑ देवि प्रति॒रन्ती॑ न॒ आयुः॑। इषं॑ च नो॒ दध॑ती विश्ववारे॒ गोम॒दश्वा॑व॒द्रथ॑वच्च॒ राधः॑॥

मन्त्र का भाव स्पष्ट है। इसमें यह वर्णन किया है कि हे परमात्मन्! आप हमें दीर्घ आयु दें और सब प्रकार के ऐश्वर्य्य से सम्पन्न करें॥इस मन्त्र में आयु की प्रार्थना करना इस बात को सिद्ध करता है कि सब प्रकार के ऐश्वर्य्यों में आयु मुख्य है, क्योंकि आयु के बिना मनुष्य ऐश्वर्य्य का भोग नहीं कर सकता, इसी अभिप्राय से “जीवेम शरदः शतं” इस मन्त्र में सौ वर्ष तक जीवन धारण करने की प्रार्थना की गई है अर्थात् साधारण आयु सौ वर्ष पर्य्यन्त है। इसी मन्त्र में आगे “शरदः शतात्” सौ वर्ष से अधिक जीवन की प्रार्थना भी है, जिसका तात्पर्य्य यह है कि पुरुष योगसम्पन्न तथा सदाचारयुक्त हुआ सौ वर्ष से अधिक भी जीवन धारण कर सकता है, परन्तु यह अवस्था असाधारण है, प्रत्येक को प्राप्त नहीं हो सकती, इसी अभिप्राय से वेद में परमात्मा ने सौ वर्ष का नियम रखा है। सारांश यह है कि जितना पुरुष ब्रह्मचारी तथा सदाचारी रहेगा, उतनी ही उसकी आयु विशेष होगी और जितना अधिक दुराचार में प्रवृत्त रहेगा, उतनी ही आयु कम होगी, जैसा कि वर्त्तमानावस्था में प्रत्यक्ष देखा जाता है, अत एव सिद्ध है कि ऐश्वर्य्य भोगने के लिए आयु का होना आवश्वक है और आयु बढ़ाने के लिए एकमात्र सदाचार का अवलम्बन करना मनुष्यमात्र का कर्त्तव्य है, यह वेदभगवान् का उपदेश है॥५॥

यां त्वा॑ दिवो दुहितर्व॒र्धय॒न्त्युषः॑ सुजाते म॒तिभि॒र्वसि॑ष्ठाः। सास्मासु॑ धा र॒यिमृ॒ष्वं बृ॒हन्तं॑ यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

हे परमात्मा! उषःकाल में विज्ञानी ऋषि महात्मा अपनी ब्रह्मविषयणी बुद्धि द्वारा आपको ज्ञानगोचर करते हुए आपका ध्यान करते हैं, वह आप हमारे पूजनीय पिता हमें धनसम्पन्न तथा ऐश्वर्य्ययुक्त करते हुए सब प्रकार से हमारा कल्याण करें॥तात्पर्य यह है कि मन्त्रों द्वारा संस्कृत की हुई बुद्धि द्वारा जब ऋषि महात्मा परमात्मा का ध्यान करते हैं, तब उसका साक्षात्कार करके उसी को अपना एकमात्र लक्ष्य बनाते हैं, जैसा कि “दृश्यते त्वग्रया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः”=इत्यादि उपनिषद्वाक्यों में वर्णन किया है कि परमात्मा का दर्शन=साक्षात्कार सूक्ष्मबुद्धि द्वारा सूक्ष्मदर्शी ऋषियों को होता है। अधिक क्या, परमात्मा का ध्यान करने के लिए श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन ये तीन मुख्य साधन हैं अर्थात् प्रथम वेदमन्त्रों द्वारा परमात्मा का श्रवण करना, पुनः श्रवण किये हुए परमात्मस्वरूप का युक्तियों द्वारा मनन करना और तीसरे साधन से उसके स्वरूप का निदिध्यासन=ध्यान करना, इसी का नाम ब्रह्मोपासना है। जब पुरुष इस उपासना के तृतीय स्थान तक पहुँच जाता है, तब उसको ध्यान करने में कठिनता नहीं होती॥और जो कई एक लोग यह कहते हैं कि निराकार पदार्थ ध्यानगोचर नहीं हो सकता, उनसे यह प्रष्टव्य है कि अपना स्वरूप भी तो निराकार है, वह ध्यान में कैसे आ जाता है और सुख-दुःख भी तो निराकार है, उनका अनुभव क्यों होता है ? जिस प्रकार जीव का स्वरूप और सुखादिकों का अनुभव होता है, इसी प्रकार परमात्मा के निराकार स्वरूप का अनुभव होने में कोई बाधा नहीं॥निराकार परमात्मस्वरूप के अनुभव करने का प्रकार यह है कि पुरुष जपयज्ञ, ज्ञानयज्ञ तथा ध्यान द्वारा मन को स्थिर करके तदनन्तर उस आनन्दस्वरूप निराकार परमात्मा के स्वरूप में लगावे, तब वह स्थिरता को प्राप्त हुआ मन परमात्मा के स्वरूप को इस प्रकार अनुभव करता है, जिस प्रकार जीवात्मा अपने निराकार आनन्द को अनुभव कर लेता है और जैसे आनन्द के अनुभव करने में उसको कोई सन्देह शेष नहीं रहता, इसी प्रकार स्थिर मनवाले पुरुष को आनन्दस्वरूप परमात्मा के अनुभव करने में कोई शङ्का नहीं रहती, क्योंकि परमात्मा सर्वव्यापक है, उसके स्वरूप का आनन्द उसी प्रकार उसके जीवात्मा में व्यापक है, जैसा कि जीव का स्वरूपभूत आनन्द उसका है, सो जिस प्रकार जीवात्मा अपने स्वरूपभूत आनन्द को अनुभव करता है, इसी प्रकार अत्यन्त सन्निहित होने से परमात्मा का निराकार स्वरूप जीव के अनुभव का विषय होता है। इसका विशेष विवरण दशम मण्डल के ईश्वरस्वरूप- निरूपण में प्रतिपादन करेगें, विशेषाभिलाषी वहाँ देखें॥६॥यह ७७वाँ सूक्त और २४वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

प्रति॑ के॒तवः॑ प्रथ॒मा अ॑दृश्रन्नू॒र्ध्वा अ॑स्या अ॒ञ्जयो॒ वि श्र॑यन्ते। उषो॑ अ॒र्वाचा॑ बृह॒ता रथे॑न॒ ज्योति॑ष्मता वा॒मम॒स्मभ्यं॑ वक्षि॥

जब इस संसार में दृष्टि फैलाकर देखते हैं, तो सबसे पहले परमात्मस्वरूप को बोधन करनेवाले अनन्त हेतु इस संसार में हमारे दृष्टिगत होते हैं, जो सब से उच्च परमात्मस्वरूप को दर्शा रहे हैं, जैसा कि संसार की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय और यह अद्भुत रचना आदि चिह्नों से स्पष्टतया परमात्मा के स्वरूप का बोधन होता है। हे सर्वशक्तिसम्पन्न भगवन्! आप अपने बड़े तेजस्वी स्वरूप का हमें ज्ञान करायें, जिससे हम अपने आपको पवित्र करें॥१॥

प्रति॑ षीम॒ग्निर्ज॑रते॒ समि॑द्धः॒ प्रति॒ विप्रा॑सो म॒तिभि॑र्गृ॒णन्तः॑। उ॒षा या॑ति॒ ज्योति॑षा॒ बाध॑माना॒ विश्वा॒ तमां॑सि दुरि॒ताप॑ दे॒वी॥

ज्ञानस्वरूप परमात्मा का दिव्यस्वरूप सदैव प्रकाशमान हुआ अज्ञानरूप अन्धकार को निवृत्त करके ज्ञानरूप ज्योति का विस्तार करता अर्थात् उषारूप ज्योति के समान उच्चभाव को प्राप्त होता है। वह वेदवेत्ता ब्राह्मणों की बुद्धि का विषय होने से उनके प्रति प्रकाशित होता अर्थात् वे परमात्मस्वरूप को अपनी निर्मल बुद्धि से भली-भाँति अवगत करते हैं। अधिक क्या, उसका दिव्य स्वरूप संसार के प्रत्येक पदार्थ में ओत-प्रोत हो रहा है, इसलिए सब पुरुषों को उचित है कि वह परमात्मस्वरूप को अपने-अपने हृदय में अवगत करते हुए अपने जीवन को उच्च बनावें अर्थात् जिस प्रकार उषःकाल अन्धकार को निवृत्त करके प्रकाशमय हो जाता है, इसी प्रकार परमात्मा अज्ञानरूप अन्धकार को दूर करके अपने प्रकाश से विद्वानों के हृदय को प्रकाशित करता है॥२॥

ए॒ता उ॒ त्याः प्रत्य॑दृश्रन्पु॒रस्ता॒ज्ज्योति॒र्यच्छ॑न्तीरु॒षसो॑ विभा॒तीः। अजी॑जन॒न्त्सूर्यं॑ य॒ज्ञम॒ग्निम॑पा॒चीनं॒ तमो॑ अगा॒दजु॑ष्टम्॥

ज्ञानस्वरूप परमात्मा का ज्ञान सबसे पूर्व देखा जाता है। वह अपने ज्ञान का विस्तार करके पीछे प्रकाशित होता है, क्योंकि उसके जानने के लिए पहले ज्ञान की आवश्कता है और उसी परमात्मा से सूर्य्य-चन्द्रादि दिव्य ज्योतियाँ उत्पन्न होतीं, उसी से यज्ञ का प्रादुर्भाव होता और उसी से अग्नि आदि तत्त्व उत्पन्न होते हैं। वही परमात्मा अज्ञानरूप तम का नाश करके सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अपने ज्ञानरूप प्रकाश का विस्तार करता है, इसलिए सबका कर्तव्य है कि उसी ज्ञानस्वरूप परमात्मा को प्राप्त होकर ज्ञान की वृद्धि द्वारा अपने जीवन को उच्च बनावें॥३॥

अचे॑ति दि॒वो दु॑हि॒ता म॒घोनी॒ विश्वे॑ पश्यन्त्यु॒षसं॑ विभा॒तीम्। आस्था॒द्रथं॑ स्व॒धया॑ यु॒ज्यमा॑न॒मा यमश्वा॑सः सु॒युजो॒ वह॑न्ति॥

मन्त्र का आशय यह है कि इस ब्रह्माण्डरूपी रथ को परमात्मा की दिव्यशक्तियें चलाती हैं। उसी रथ में जुड़ी हुई द्युलोक की दुहिता उषा को विज्ञानी लोग देखते हैं, जो अन्नादि ऐश्वर्य्यसम्पन्न बड़ी दृढ़तावाली है। इस शक्ति को देखकर विज्ञानी महात्मा इस ब्रह्माण्ड में सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मा का अनुभव करते हुए उसी की उपासना में प्रवृत्त होकर अपने जीवन को सफल करते और परमात्मा की अचिन्त्यशक्तियों को विचारते हुए उसी में संग्लन होकर अमृतभाव को प्राप्त होते हैं॥४॥

प्रति॑ त्वा॒द्य सु॒मन॑सो बुधन्ता॒स्माका॑सो म॒घवा॑नो व॒यं च॑। ति॒ल्वि॒ला॒यध्व॑मुषसो विभा॒तीर्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

हे भगवन्! आपको शान्त मनवाले योगीजन बोधन करते तथा बड़े-बड़े ऐश्वर्य्यसम्पन्न आपके यश को वर्णन करते हैं और आपकी प्रेममय रज्जू से बन्धे हुए भक्तजन आपका सदैव कीर्तन करते हैं, कृपा करके हमको कल्याणरूप वाणियों से सदा के लिए पवित्र करें॥५॥यह ७८वाँ सूक्त और २५वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

व्यु१॒॑षा आ॑वः प॒थ्या॒३॒॑ जना॑नां॒ पञ्च॑ क्षि॒तीर्मानु॑षीर्बो॒धय॑न्ती। सु॒सं॒दृग्भि॑रु॒क्षभि॑र्भा॒नुम॑श्रे॒द्वि सूर्यो॒ रोद॑सी॒ चक्ष॑सावः॥

वह पूर्ण परमात्मा अपनी दिव्य ज्योति से सम्पूर्ण भूमण्डल को प्रकाशित करता हुआ अपने विशेष ज्ञान से “पञ्चजना”=ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और दस्यु इन पाँचों प्रकार के मनुष्यों को सत्यज्ञान का उपदेश कर रहा है, जो सबके लिए परम उपयोगी है। हमारा कर्तव्य है कि हम यत्नपूर्वक उस स्वतःप्रकाश परमात्मा के स्वरूप को जानकर उसी का आश्रयण करें॥१॥

व्य॑ञ्जते दि॒वो अन्ते॑ष्व॒क्तून्विशो॒ न यु॒क्ता उ॒षसो॑ यतन्ते। सं ते॒ गाव॒स्तम॒ आ व॑र्तयन्ति॒ ज्योति॑र्यच्छन्ति सवि॒तेव॑ बा॒हू॥

हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन्! आप द्युलोकपर्य्यन्त सम्पूर्ण प्रजाओं को अपनी दिव्य ज्योति से प्रकाशित कर रहे हैं अर्थात् आप अपने ज्ञानरूप तप से प्रजाओं को रचकर सूर्य्य की किरणों के समान अज्ञानरूप तम को छिन्न-भिन्न करके मनुष्यों को ज्ञानयुक्त बनाते हैं, जैसा कि “यस्य ज्ञानमयं तपः” इत्यादि उपनिषद्वाक्यों में उसी मन्त्र को आश्रय करके कहा है कि उस परमात्मा का ज्ञान ही एक प्रकार का तप है, उसी ज्ञानरूप तप से परमात्मा इस ब्रह्माण्ड की रचना करके सबको यथावस्थित नियम में चला रहे हैं॥२॥

अभू॑दु॒षा इन्द्र॑तमा म॒घोन्यजी॑जनत्सुवि॒ताय॒ श्रवां॑सि। वि दि॒वो दे॒वी दु॑हि॒ता द॑धा॒त्यङ्गि॑रस्तमा सु॒कृते॒ वसू॑नि॥

हे सर्वशक्तिसम्पन्न परमात्मन्! आपकी दुहितारूप विद्युदादि शक्तियें हमारे लिये कल्याणकारी होकर हमें अनन्त प्रकाश का धन धारण करावें और आपका ज्ञान हमारे हृदय को प्रकाशित करे॥इस मन्त्र में परमात्मरूप शक्ति को “दुहिता” इस अभिप्राय से कथन किया गया है कि “दुहिता दुर्हिता” इस वैदिकोक्ति के समान परमात्मा की विद्युदादि दिव्यशक्तियें दूर देशों में जाकर हित उत्पन्न करती हैं और जो दूर देशों में जाकर हित उत्पन्न करे, उसको दुहिता कहते हैं, इसलिये “दुहिता” शब्द से यहाँ विद्युदादि शक्तियों का ग्रहण है। जहाँ दुहिता शब्द का दिवः शब्द के साथ सम्बन्ध होता है, वहाँ यह अर्थ होते हैं कि जो द्युलोकादि दूर देशों में जाकर हित उत्पन्न करे, उसका नाम ‘दिवो दुहिता’ है। यहाँ दुहिता शब्द के अर्थ शक्ति के हैं, पुत्री के नहीं॥३॥

ताव॑दुषो॒ राधो॑ अ॒स्मभ्यं॑ रास्व॒ याव॑त्स्तो॒तृभ्यो॒ अर॑दो गृणा॒ना। यां त्वा॑ ज॒ज्ञुर्वृ॑ष॒भस्या॒ रवे॑ण॒ वि दृ॒ळ्हस्य॒ दुरो॒ अद्रे॑रौर्णोः॥

हे सर्वपालक भगवन्! आप हमको ऐश्वर्य्यसम्पन्न करें, जिससे हम अपने वेदवेत्ता स्तोता आदि विद्वानों को प्रसन्न करें, जो हमारे प्रति आपकी स्तुति उच्चस्वर से वर्णन करते हैं, या यों कहो कि परमात्मस्तुति-कीर्तन करते हुए हमको आपकी उपासना में प्रवृत्त करते हैं। हे भगवन्! आप हममें ऐसी शक्ति प्रदान करें कि कठिन से कठिन मार्गों के द्वारों को खोलकर आपका दर्शन कर सकें॥४॥

दे॒वंदे॑वं॒ राध॑से चो॒दय॑न्त्यस्म॒द्र्य॑क्सू॒नृता॑ ई॒रय॑न्ती। व्यु॒च्छन्ती॑ नः स॒नये॒ धियो॑ धा यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

हे दिव्यशक्तिसम्पन्न परमात्मन्! आप अब स्तोताओं को धन-धान्यादि से भले प्रकार समृद्ध करें, ताकि वह उत्तमोत्तम वेदवाणियों द्वारा आपका सदा स्तवन करते हुए हमारी बुद्धियों को आपकी ओर प्रेरित करे और हे भगवन्! हमें दानशील बनावें, ताकि हम उत्साहित होकर स्तोता आदि अधिकारियों को दान देनें में समर्थ हों और आप हमें सदा के लिए पवित्र करें, यह प्रार्थना है॥५॥यह ७९वाँ सूक्त और २६वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्रति॒ स्तोमे॑भिरु॒षसं॒ वसि॑ष्ठा गी॒र्भिर्विप्रा॑सः प्रथ॒मा अ॑बुध्रन्। वि॒व॒र्तय॑न्तीं॒ रज॑सी॒ सम॑न्ते आविष्कृण्व॒तीं भुव॑नानि॒ विश्वा॑॥

इस मन्त्र में संसार की उत्पत्ति, स्थिति तथा लय का वर्णन किया गया है अर्थात् संसार की उक्त तीन अवस्थाओं का कारण एकमात्र परमात्मा है। वह परमात्मा इस संसार के रचनाकाल में प्रथम ऋषियों को वेद का ज्ञान देता है, जिससे सब प्रजा उस रचयिता परमात्मा के निमयों को भले प्रकार जानकर तदनुसार ही आचरण करते हुए संसार में सुखपूर्वक विचरे। वही परमात्मा सब संसार का पालक, पोषक और अन्त समय में वही सबका संहार करनेवाला है॥१॥

ए॒षा स्या नव्य॒मायु॒र्दधा॑ना गू॒ढ्वी तमो॒ ज्योति॑षो॒षा अ॑बोधि। अग्र॑ एति युव॒तिरह्र॑याणा॒ प्राचि॑कित॒त्सूर्यं॑ य॒ज्ञम॒ग्निम्॥

परमात्मा की दिव्य शक्ति, जिससे सृष्टि के आदिकाल में पुनः रचना होती है, वह परमात्मा की प्रकाशरूप ज्योति से प्रथम अन्धकार का नाश करती है, क्योंकि प्रलयकाल में यह सब संसार अन्धकारमय होता है, तत्पश्चात् सूर्य्य, अग्नि और यज्ञ को रचकर उषःकाल का बोधन कराती है, जिससे सब प्रजागण परमात्मा का स्तवन करते हुए अपने कार्यों में प्रवृत्त होते हैं। परमात्मा की उस दिव्य शक्ति में कभी विकार उत्पन्न नहीं होता, वह युवावस्था को प्राप्त हुई मनुष्यों को कर्मानुसार सदा बल-बुद्धि आदि नूतन भावों को प्रदान करती रहती है और अन्त में उसी परमात्मा में लय हो जाती है ॥२॥

अश्वा॑वती॒र्गोम॑तीर्न उ॒षासो॑ वी॒रव॑तीः॒ सद॑मुच्छन्तु भ॒द्राः। घृ॒तं दुहा॑ना वि॒श्वतः॒ प्रपी॑ता यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

इस मन्त्र में परमात्मा का वर्णन करते हुए यह कथन किया है कि जिस प्रकार वर्तिका=बत्ती सब ओर से स्नेह=चिकनाई को अपने में लीन करके प्रकाश करती है, इसी प्रकार सब प्रेमी पुरुषों को परमात्मा प्रकाश=ज्ञान प्रदान करते हैं। वही परमात्मा वीरता, धीरता, ज्ञान तथा गति आदि सब सद्गुणों का आधार और प्रेममय पुरुषों का एकमात्र गतिस्थान है॥उसी परमात्मा की दिव्य शक्ति से यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उत्पन्न होता, उसी की सत्ता का लाभकर स्थित रहता और अन्त में उसी में लय हो जाता है, इसी कारण उस शक्ति को इस मन्त्र में “प्रपीता” सबका आश्रयभूत कहा गया है और इसी भाव को महर्षि व्यास ने “स्वाप्ययात्”॥१।१।९। ब्र०  सू०॥में यह वर्णन किया है कि कोई पदार्थ नाश को प्राप्त नहीं होता, किन्तु सबका लय एकमात्र परमात्मा में होता है अर्थात् प्रथम प्रकृतिरूप कारण में सब पदार्थों का लय हो जाता और कारण प्रकृतिरूप में ब्रह्म में सदा विद्यमान रहता है, इसी प्रकार दूसरी जीवरूप प्रकृति भी जो अनादिकाल से विद्यमान है, वह भी प्रलयकाल में ब्रह्माश्रित रहती हैं। इस प्रकार चिदचिदीश्वर=चित् जीव अचित् प्रकृति और ब्रह्म, ये तीनों अनादि अनन्त हैं, यही वैदिक सिद्धान्त है, जिसका विशेष वर्णन उपनिषद्, गीता तथा ब्रह्मसूत्रादि ग्रन्थों में विस्तारपूर्वक लिखा गया है॥३॥ऋग्वेद के ७वें मण्डल में ८०वाँ सूक्त और २७वाँ वर्ग समाप्त हुआ और पाँचवें अष्टक में पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥

प्रत्यु॑ अदर्श्याय॒त्यु१॒॑च्छन्ती॑ दुहि॒ता दि॒वः। अपो॒ महि॑ व्ययति॒ चक्ष॑से॒ तमो॒ ज्योति॑ष्कृणोति सू॒नरी॑॥

दिव्यशक्तिसम्पन्न परमात्मा अपने अनन्त सामर्थ्य से उषादि ज्योतियों का विकाश करता हुआ संसार के अन्धकार को दूर करता और विज्ञानी लोगों के लिए अपने प्रभूत ज्ञान का प्रकाश करता है, वही अपनी दिव्यशक्ति से वृष्टि द्वारा संसार का भरण-पोषण करता और वही सबको स्थिति देनेवाला है॥१॥

उदु॒स्रियाः॑ सृजते॒ सूर्यः॒ सचाँ॑ उ॒द्यन्नक्ष॑त्रमर्चि॒वत्। तवेदु॑षो॒ व्युषि॒ सूर्य॑स्य च॒ सं भ॒क्तेन॑ गमेमहि॥

हे सबको उत्पन्न करनेवाले परमात्मन्! आपका तेजोमय स्वरूप जो सूर्य्य-चन्द्रादि लोकों को प्रकाशित कर रहा है, वह हमको भी ज्ञान से प्रकाशित करे, ताकि हम आपको भक्तिभाव से प्राप्त हों अर्थात् हमलोग सदैव आपके ही स्वरूप का चिन्तन करते हुए अपने जीवन को पवित्र करें॥२॥

प्रति॑ त्वा दुहितर्दिव॒ उषो॑ जी॒रा अ॑भुत्स्महि। या वह॑सि पु॒रु स्पा॒र्हं व॑नन्वति॒ रत्नं॒ न दा॒शुषे॒ मयः॑॥

हे ज्योतिःस्वरूप परमात्मदेव! आप ऐसी कृपा करें कि हम उषःकाल में अनुष्ठान करते हुए आपके समीप हों, आप ही सब सांसारिक रत्नादि ऐश्वर्य्य तथा आत्मसुख देनेवाले हैं, कृपा करके हमको भी अपने प्रिय यजमानों के समान अभ्युदय और निःश्रेयसरूप दोनों प्रकार के सुखों को प्राप्त करायें। यहाँ मन्त्र में “मयः” शब्द से आध्यात्मिक आनन्द का ग्रहण है, जैसा कि “नमः शम्भवाय च मयोभवाय च” इत्यादि मन्त्रों में वर्णन किया है, इसी आनन्द की यहाँ परमात्मा से प्रार्थना की गई है॥३॥

उ॒च्छन्ती॒ या कृ॒णोषि॑ मं॒हना॑ महि प्र॒ख्यै दे॑वि॒ स्व॑र्दृ॒शे। तस्या॑स्ते रत्न॒भाज॑ ईमहे व॒यं स्याम॑ मा॒तुर्न सू॒नवः॑॥

हे परमपिता परमात्मन्! आपको ज्ञान द्वारा विज्ञानी पुरुष ही उपलब्ध कर सकते हैं, साधारण पुरुष नहीं।  हे दिव्यस्वरूप भगवन्! आप हमारे ज्ञानार्थ ही अपनी अपूर्व सामर्थ्य से जगत् की रचना करते हैं। आप माता के समान हम पर प्यार करते हुए हमारी सब प्रकार से रक्षा करें और हमें ज्ञानसम्पन्न करके अपनी उपासना का अधिकारी बनावें, ताकि हम आपके अनुग्रह से धन-धान्य से भरपूर हों॥४॥

तच्चि॒त्रं राध॒ आ भ॒रोषो॒ यद्दी॑र्घ॒श्रुत्त॑मम्। यत्ते॑ दिवो दुहितर्मर्त॒भोज॑नं॒ तद्रा॑स्व भु॒नजा॑महै॥

हे परमात्मन्! आप महामोहरूप घोर अज्ञान का नाश करके हमें उत्तम ज्ञान की प्राप्ति करायें, जिससे हम अपने भरण-पोषण के लिए धन उपलब्ध कर सकें। हे भगवन्! कोटानुकोटि ब्रह्माण्डों में आपका सामर्थ्य व्याप्त हो रहा है, आप हमारे पालनकर्ता और नाना प्रकार के ऐश्वर्य्यदाता हैं, कृपा करके हमारे भोजन के लिए अन्नादि धन दें, ताकि हम आपकी उपासना में प्रवृत्त रहें॥५॥

श्रवः॑ सू॒रिभ्यो॑ अ॒मृतं॑ वसुत्व॒नं वाजाँ॑ अ॒स्मभ्यं॒ गोम॑तः। चो॒द॒यि॒त्री म॒घोनः॑ सू॒नृता॑वत्यु॒षा उ॑च्छ॒दप॒ स्रिधः॑॥

हे सर्वशक्तिसम्पन्न भगवन्! आप शूरवीरों की वीरतारूप सामर्थ्य देनेवाले, विज्ञानियों को विज्ञानरूप सामार्थ्य देते, आप ही नानाप्रकार के अन्न तथा ज्ञान के साधन कला-कौशलादि के प्रदाता हैं, आप ही सब शोकों को दूर करके अमृत पद देनेवाले हैं, अर्थात् आप ही अभ्युदय और निःश्रेयस दोनों प्रकार के उपभोग देते हैं॥तात्पर्य्य यह है कि ऋषियों ने शोक-मोह की निवृत्तिरूप मुक्ति पद तथा संसारिक ऐश्वर्य्यों का प्रदाता एकमात्र परमात्मा को ही माना है अर्थात् परमात्मज्ञान से ही शोक-मोह की निवृत्ति होती है, जैसा कि “तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः” जो परमात्मस्वरूप को एकरस, अविनाशी और सजातीय, विजातीय तथा स्वगतभेदशून्य मानता है, उसको कोई शोक-मोह नहीं होता और “तमेव विदित्वातिमृत्युमेति” उसी को जानकर पुरुष मृत्यु से अतिक्रमण कर जाता है, इस वाक्य में परमात्मज्ञान को ही एकमात्र मुक्ति पद का साधन कथन किया गया है, इसलिए जिज्ञासुओं को शोक-मोह की निवृत्ति तथा परमानन्दप्राप्ति के लिए एकमात्र उसी का अवलम्बन करना चाहिए॥६॥यह ८१वाँ सूक्त और पहिला वर्ग समाप्त हुआ।

इन्द्रा॑वरुणा यु॒वम॑ध्व॒राय॑ नो वि॒शे जना॑य॒ महि॒ शर्म॑ यच्छतम्। दी॒र्घप्र॑यज्यु॒मति॒ यो व॑नु॒ष्यति॑ व॒यं ज॑येम॒ पृत॑नासु दू॒ढ्यः॑॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यों! तुम युद्ध में अप्रयुक्त पदार्थों का प्रयोग करनेवाले दुष्ट शत्रुओं को जीतने का प्रत्यन करो और युद्धविद्यावेत्ता अध्यापक तथा उपदेशकों से प्रार्थना करो कि वह तुम्हें युद्ध के लिए उपयोगी अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों की शिक्षा दें, जिससे तुम दुष्ट शत्रुओं का हनन करके जगत् में शान्ति फैलाओ॥१॥

स॒म्राळ॒न्यः स्व॒राळ॒न्य उ॑च्यते वां म॒हान्ता॒विन्द्रा॒वरु॑णा म॒हाव॑सू। विश्वे॑ दे॒वासः॑ पर॒मे व्यो॑मनि॒ सं वा॒मोजो॑ वृषणा॒ सं बलं॑ दधुः॥

इस मन्त्र में परमात्मा ने राजधर्म के संगठन का उपदेश किया है कि हे राजकीय पुरुषो! तुम अपने में से एक को सम्राट्=प्रजाधीश और एक को स्वराट् बनाओ, क्योंकि जब तक उपर्युक्त दोनों शक्तियें अपने- अपने कार्यों को विधिवत् नहीं करतीं, तब तक प्रजा में शान्ति का भाव उत्पन्न नहीं होता, न प्रजागण अपने अपने धर्मों का यथावत् पालन कर सकते हैं। “सम्यग् राजत इति सम्राट्”=जो अपने कार्यों में स्वतन्त्रतापूर्वक निर्णय करे, उसका नाम “स्वराट्” अर्थात् प्रजातन्त्र का नाम “स्वराट्” है, जो स्वतन्त्रतापूर्वक अपने लिए सुख-दुःख का विचार कर सके। इस प्रकार सम्राट् और स्वराट् जब परस्पर एक-दूसरे के सहायक हों, तभी दोनों बलों की सदैव वृद्धि होती है। हे अध्यापक तथा उपदेशको! तुम अपने उपदेशों द्वारा दोनों बलों की वृद्धि सदैव करते रहो, जिससे राजा और प्रजा में द्वेष उत्पन्न होकर अशान्ति न हो। तुम मिलकर सर्वोपरि बल धारण करो और तुम्हारा ऐश्वर्य्य सम्पूर्ण नभोमण्डल में व्याप्त हो॥२॥

अन्व॒पां खान्य॑तृन्त॒मोज॒सा सूर्य॑मैरयतं दि॒वि प्र॒भुम्। इन्द्रा॑वरुणा॒ मदे॑ अस्य मा॒यिनोऽपि॑न्वतम॒पितः॒ पिन्व॑तं॒ धियः॑॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे राजपुरुषो! तुम अपने उग्र कर्मों द्वारा शक्तिसम्पन्न होकर मायावी शत्रुओं का मर्दन करो अर्थात् प्रथम अपनी जलयन्त्रविद्या द्वारा उनके जलदुर्गों को विजय करो, तदनन्तर अपनी पदार्थविद्या से सूर्य्य के तेज को आच्छादन करके अर्थात् यन्त्रों द्वारा दिन को रात्रि बनाकर  शत्रुओं पर विजय करो। जो संसार में न्याय का भङ्ग करते हुए अपनी माया से प्रजाओं में नाना प्रकार की पीड़ा उत्पन्न करते हैं, उनका सर्वनाश तथा श्रेष्ठों का रक्षण करना तुम्हारा परम कर्त्तव्य है॥३॥

यु॒वामिद्यु॒त्सु पृत॑नासु॒ वह्न॑यो यु॒वां क्षेम॑स्य प्रस॒वे मि॒तज्ञ॑वः। ई॒शा॒ना वस्व॑ उ॒भय॑स्य का॒रव॒ इन्द्रा॑वरुणा सु॒हवा॑ हवामहे॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे अध्यापक तथा उपदेशकों! मैं तुम्हें बुलाकर अर्थात् ज्ञान द्वारा मेरे समीप स्थित हुए तुम्हें उपदेश करता हूँ कि तुम अनुष्ठानी बनकर राजा तथा प्रजा दोनों के हित में प्रयन्त करो, क्योंकि अनुष्ठानशील पुरुष ही उपदेशों द्वारा संसार का कल्याण कर सकता है, अन्य नहीं। हे विद्वानों! तुम युद्धविद्या के ज्ञाता बनकर सदैव अपने ज्ञान को बढ़ाते रहो और युद्ध में उत्साहपूर्वक शत्रुओं का दमन करते हुए राज्य के संगठन में सदा प्रयत्न करते रहो॥४॥

इन्द्रा॑वरुणा॒ यदि॒मानि॑ च॒क्रथु॒र्विश्वा॑ जा॒तानि॒ भुव॑नस्य म॒ज्मना॑। क्षेमे॑ण मि॒त्रो वरु॑णं दुव॒स्यति॑ म॒रुद्भि॑रु॒ग्रः शुभ॑म॒न्य ई॑यते॥

हे आग्नेय तथा तथा जलीय अस्त्र-शस्त्रों के वेत्ता विद्वानों! तुम लोग अपने अनुभव द्वारा राज्यविरोधी शत्रुओं को विजय करके सम्पूर्ण संसार की रक्षा करो, तुम कलाकौशल के ज्ञान द्वारा युद्धविषयक अस्त्र- शस्त्र निर्माण करो और ऐसे अस्त्रों का प्रयोग करो, जो आकाशमण्डल में फैल जानेवाली वायुओं द्वारा शत्रु का विजय करें अर्थात् प्रबल शत्रु को आग्नेयास्त्र तथा वारुणास्त्र द्वारा विजय करो और साधारण शत्रु को शुभ साधनों से अपने वश में करो, जिससे उसको घोर कष्ट न हो॥५॥

म॒हे शु॒ल्काय॒ वरु॑णस्य॒ नु त्वि॒ष ओजो॑ मिमाते ध्रु॒वम॑स्य॒ यत्स्वम्। अजा॑मिम॒न्यः श्न॒थय॑न्त॒माति॑रद्द॒भ्रेभि॑र॒न्यः प्र वृ॑णोति॒ भूय॑सः॥

वारुणास्त्र का प्रयोग करनेवाला विद्वान् अल्प साधनों से ही शत्रुसेना का विजय करके उसकी सामग्री पर अपना अधिकार जमा लेता है। उसका शस्त्र-अस्त्ररूप धन शत्रुओं के नाश का कारण होता है अर्थात् उसके इस अपूर्व धन के सम्मुख कोई शत्रु नहीं ठहर सकता, वह अनेक शत्रुओं को विजय करके बड़ा ऐश्वर्य्यसम्पन्न होता है॥६॥

न तमंहो॒ न दु॑रि॒तानि॒ मर्त्य॒मिन्द्रा॑वरुणा॒ न तपः॒ कुत॑श्च॒न। यस्य॑ देवा॒ गच्छ॑थो वी॒थो अ॑ध्व॒रं न तं मर्त॑स्य नशते॒ परि॑ह्वृतिः॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे राजा तथा यजमानो! तुम लोग अस्त्रशस्त्रविद्यासम्पन्न विद्वानों को अपने यज्ञों में बुलाओ, क्योंकि वारुणास्त्र तथा आग्नेयास्त्र आदि अस्त्रविद्यावेत्ता विद्वान् जिस राजा वा यजमान के यज्ञ में जाते हैं अथवा जिनका उपर्युक्त विद्वानों से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है, उनको न कोई ताप और न कोई अन्य बाधा नाश को प्राप्त कर सकती है। उनको न कोई शत्रु पीड़ा दे सकता और न कोई पाप उनका नाश कर सकता है अर्थात् विद्वानों के सत्सङ्ग से उनके पाप क्षय होकर जीवन पवित्र हो जाता है, इसलिए राजाओं को उचित है कि विद्वानों का सत्कार करते हुए उनको अपना समीपी बनावें, जिससे वे किसी विपत्ति को न देखें॥७॥

अ॒र्वाङ्न॑रा॒ दैव्ये॒नाव॒सा ग॑तं शृणु॒तं हवं॒ यदि॑ मे॒ जुजो॑षथः। यु॒वोर्हि स॒ख्यमु॒त वा॒ यदाप्यं॑ मार्डी॒कमि॑न्द्रावरुणा॒ नि य॑च्छतम्॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि आग्नेयास्त्र तथा वारुणास्त्र आदि अस्त्र-शस्त्रों की विद्या में निपुण विद्वानों! तुम सरलभाव से मेरे में प्रीति करो अर्थात् शुद्ध हृदय से वेदाज्ञा का पालन करते हुए मेरे सम्मुख आओ, मैं तुम्हें सुखसम्पन्न करूँगा॥८॥

अ॒स्माक॑मिन्द्रावरुणा॒ भरे॑भरे पुरोयो॒धा भ॑वतं कृष्ट्योजसा। यद्वां॒ हव॑न्त उ॒भये॒ अध॑ स्पृ॒धि नर॑स्तो॒कस्य॒ तन॑यस्य सा॒तिषु॑॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे विद्वानों! तुम प्रत्येक संग्राम में मेरे सम्मुख होओ अर्थात् मुझसे विजयप्राप्ति के लिए प्रार्थना करो, क्योंकि मेरी सहायता के बिना कोई किसी को जय नहीं कर सकता। हे बड़े बलवान् योद्धाओं! जो तुम्हारे साथ ईर्ष्या करते हैं, वे भी अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए है, परन्तु प्रजा और धर्म की रक्षा करना तुम्हारा मुख्य कर्त्तव्य होने से तुम किसी का पक्षपात मत करो, सदा राजधर्म का पालन करना और राजा की आज्ञा में सदैव रहना तुम्हारा धर्म है, जिसका अनुष्ठान करते हुए परमात्मा के समीपी होओ॥९॥

अ॒स्मे इन्द्रो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा द्यु॒म्नं य॑च्छन्तु॒ महि॒ शर्म॑ स॒प्रथः॑। अ॒व॒ध्रं ज्योति॒रदि॑तेॠता॒वृधो॑ दे॒वस्य॒ श्लोकं॑ सवि॒तुर्म॑नामहे॥

इस मन्त्र का आशय यह है कि जिस प्रकार ऋग्, यजुः, साम, अथर्व ये चारों वेद परमात्मा की आज्ञापालन कराने के लिए चार विभागों में विभक्त हैं, इसी प्रकार राज्यशासन भी चार विभागों में विभक्त जानना चाहिये अर्थात् आग्नेयास्त्र तथा वारुणास्त्रविद्या जाननेवालों से सैनिकरक्षण और राजमन्त्री तथा न्यायाधीश इन दोनों से राज्यप्रबन्ध, इस प्रकार उक्त चारों से धन की याचना करते हुए सदा ही इनके कल्याण का शुभचिन्तन करते  रहो अर्थात् सम्राट् के राष्ट्रप्रबन्ध के उक्त चारों से सांसारिक सुख की अभिलाषा करो और दिव्यशक्तिसम्पन्न परमात्मा से नित्य सुख की प्रार्थना करते हुए उनके दिव्य गुणों का सदा गान करते रहो, जिससे तुम्हें सद्गति प्राप्त हो॥१०॥यह ८२वाँ सूक्त और तीसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

यु॒वां न॑रा॒ पश्य॑मानास॒ आप्यं॑ प्रा॒चा ग॒व्यन्तः॑ पृथु॒पर्श॑वो ययुः। दासा॑ च वृ॒त्रा ह॒तमार्या॑णि च सु॒दास॑मिन्द्रावरु॒णाव॑सावतम्॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे शूरवीर विद्वानों! तुम दास=शूद्र और आर्य्य=कर्मानुष्ठानपरायण पुरुषों की रक्षा करो, तुम इनके शत्रुओं का हनन करके इन्हें अभयदान दो, क्योंकि इनके होने से प्रजाजन वैदिक मर्यादा का अतिक्रमण नहीं करते, सब अपनी मर्यादा में रह कर धर्म का पालन करते हैं और हृष्ट-पुष्ट शूरवीर तुम्हें प्राप्त होकर युद्ध द्वारा आत्मसमर्पण करते हुए तुम्हारे उत्साह को बढ़ाते हैं, इसलिए इन्हें भी सुरक्षित रखो, क्योंकि शूरवीरों के अभाव से भी प्रजा में अनेक प्रकार के अनर्थ फैल जाते हैं, जिससे मनुष्यों के जीवन में पवित्रता नहीं रहती॥१॥

यत्रा॒ नरः॑ स॒मय॑न्ते कृ॒तध्व॑जो॒ यस्मि॑न्ना॒जा भव॑ति॒ किं च॒न प्रि॒यम्। यत्रा॒ भय॑न्ते॒ भुव॑ना स्व॒र्दृश॒स्तत्रा॑ न इन्द्रावरु॒णाधि॑ वोचतम्॥

जिस संग्राम में शत्रु लोग ध्वजा उठाते हुए हम पर आक्रमण करते हों अथवा जिस संग्राम में हमारा कुछ प्रिय हो, या यों कहो कि जब शत्रु हम पर चढ़ाई करें वा हम दुष्टों के दमन अथवा प्रजा का प्रिय करने के लिए शत्रु पर चढ़ाई करें, हे अस्त्रशस्त्रवेत्ता विद्वानों! उक्त दोनों अवस्थाओं में आप हमारी शत्रु से रक्षा करें॥तात्पर्य्य यह है कि राजपुरुषों की सहायता के बिना प्रजा में कदापि सुख उत्पन्न नहीं हो सकता, इसीलिए मन्त्र में राजपुरुषों की सहायता वर्णन की गई है कि वे राजपुरुष आपत्तिकाल में उपदेशों तथा शस्त्रों द्वारा हमारी रक्षा करें॥२॥

सं भूम्या॒ अन्ता॑ ध्वसि॒रा अ॑दृक्ष॒तेन्द्रा॑वरुणा दि॒वि घोष॒ आरु॑हत्। अस्थु॒र्जना॑ना॒मुप॒ मामरा॑तयो॒ऽर्वागव॑सा हवनश्रु॒ता ग॑तम्॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे राजधर्म का पालन करनेवाले विद्वानों! तुम शत्रुसेना पर ऐसा घोर आक्रमण करो कि तुम्हारे अस्त्रों-शास्त्रों का शब्द आकाश में गूँज उठे, जिससे तुम्हारे शत्रु वेदवाणी का आश्रयण करते हुए तम्हारी शरण को प्राप्त हों अर्थात् अपने दुष्टभावों का त्याग करते हुए सब प्रजाजनों के समक्ष वेद की शरण में आवें और तुम्हारे योद्धा लोग सीमान्तों में विजय प्राप्त करते हुए शत्रुओं के दुर्गों को छिन्न-भिन्न करके सर्वत्र अपना अधिकार स्थापन करें, जिससे प्रजा वैदिकधर्म का भले प्रकार पालन कर सके॥३॥

इन्द्रा॑वरुणा व॒धना॑भिरप्र॒ति भे॒दं व॒न्वन्ता॒ प्र सु॒दास॑मावतम्। ब्रह्मा॑ण्येषां शृणुतं॒ हवी॑मनि स॒त्या तृत्सू॑नामभवत्पु॒रोहि॑तिः॥

परमात्मा आज्ञा देते हैं कि हे राजपुरुषो! तुम वेद से बहिर्मुख शत्रुओं का हनन करके वेदवेत्ता विद्वानों का सत्कार करो और निरन्तर हित करते हुए उनके सत्सङ्ग से अपने जीवन को उच्च बनाओ, उनके यज्ञों की रक्षा करो, जिससे उनका सत्यरूप फल प्रजा के लिए शुभ हो॥४॥

इन्द्रा॑वरुणाव॒भ्या त॑पन्ति मा॒घान्य॒र्यो व॒नुषा॒मरा॑तयः। यु॒वं हि वस्व॑ उ॒भय॑स्य॒ राज॒थोऽध॑ स्मा नोऽवतं॒ पार्ये॑ दि॒वि॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे इन्द्र तथा वरुणसमान युद्धविशारद विद्वानों! तुम हिंसक तथा अन्य शत्रुओं का सर्वस्व हरण करके उनका नाश करो, जो वेदविहित मर्यादा पर चलनेवाले विद्वानों को तपाते=दुःख देते हैं। हे भगवन्! आप ऐसी कृपा करें कि उन शत्रुओं का युद्ध में अधःपतन हो और हम विजयरूप पार को प्राप्त हों॥५॥

यु॒वां ह॑वन्त उ॒भया॑स आ॒जिष्विन्द्रं॑ च॒ वस्वो॒ वरु॑णं च सा॒तये॑। यत्र॒ राज॑भिर्द॒शभि॒र्निबा॑धितं॒ प्र सु॒दास॒माव॑तं॒ तृत्सु॑भिः स॒ह॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे इन्द्र तथा वरुणरूप विद्वानों! तुम युद्धों में विजयप्राप्त करते हुए कर्मानुष्ठानी तथा वेदविद्याप्रकाशक विद्वानों की रक्षा करो अर्थात् कर्म, उपासना तथा ज्ञान द्वारा भक्तिभाव को प्राप्त पुरुषों की सेवा में सदा तत्पर रहो, जिससे उन्हें कोई कष्ट प्राप्त न हों॥६॥

दश॒ राजा॑नः॒ समि॑ता॒ अय॑ज्यवः सु॒दास॑मिन्द्रावरुणा॒ न यु॑युधुः। स॒त्या नृ॒णाम॑द्म॒सदा॒मुप॑स्तुतिर्दे॒वा ए॑षामभवन्दे॒वहू॑तिषु॥

इस मन्त्र में यह उपदेश किया है कि राजा तथा राजकीय पुरुषों को सदा वैदिक धर्म का अनुष्ठान करना चाहिए, क्योंकि व्रत, तप तथा अनुष्ठानशील राजा को दश राजा भी मिलकर युद्ध में पराजित नहीं कर सकते, दृढ़व्रती, कर्मकाण्डी तथा धीर-वीर राजा की सब विद्वान् प्रशंसा करते और वही अपने सब कार्यों को विधिवत् करता हुआ संसार में कृतकार्य्य होता है, ऐसे धर्मज्ञ राजा की सब विद्वानों को सहायता करनी चाहिए॥७॥

दा॒श॒रा॒ज्ञे परि॑यत्ताय वि॒श्वतः॑ सु॒दास॑ इन्द्रावरुणावशिक्षतम्। श्वि॒त्यञ्चो॒ यत्र॒ नम॑सा कप॒र्दिनो॑ धि॒या धीव॑न्तो॒ अस॑पन्त॒ तृत्स॑वः॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि राजा लोगो! तुम कर्मकाण्डयुक्त तथा   सदाचारसम्पन्न होकर अपने कार्यों को विधिवत् करो और युद्धरूप कर्म में बुद्धिपूर्वक प्रवृत्त होओ। जो सदाचारसम्पन्न राजा बुद्धिपूर्वक युद्ध करता है, उसको अनेक राजा सब ओर से आक्रमण करने पर भी विजय नहीं कर सकते। परमात्मा आज्ञा देते हैं कि हे धनुर्विद्यासम्पन्न अध्यापक तथा उपदेशको! तुम ऐसे धर्मपरायण राजा की सदा सहायता करो, जिससे वह शीघ्र कृतकार्य हो॥८॥

वृ॒त्राण्य॒न्यः स॑मि॒थेषु॒ जिघ्न॑ते व्र॒तान्य॒न्यो अ॒भि र॑क्षते॒ सदा॑। हवा॑महे वां वृषणा सुवृ॒क्तिभि॑र॒स्मे इ॑न्द्रावरुणा॒ शर्म॑ यच्छतम्॥

जो राजा लोग व्रतों की रक्षा करते और दुष्ट शत्रुओं का दमन करते हैं, हे अस्त्रशस्त्रविद्यावेत्ता विद्वानों! तुम उनकी सहायता करो, क्योंकि व्रतपालन तथा दुष्टदमन किये बिना प्रजा में सुख का संचार कदापि नहीं हो सकता, इसी अभिप्राय से वेद में अन्य उपदेश किया है कि–अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम् इदमहमनृतात् सत्यमुपैमि॥ यजु०॥१॥५॥अर्थ–हे व्रतों के पति परमात्मा! मैं आपकी कृपा से व्रत का पालन करुँ, ताकि असत्यमार्ग को त्याग कर सत्य पथ को प्राप्त होऊँ। इस प्रकार वेदों में सर्वत्र नियमपालनरूप व्रत का बलपूर्वक उपदेश किया गया है। उसी की दृढ़ता का इस मन्त्र में वर्णन किया है। या यों कहो कि परमात्मा दृढ़व्रती लोगों के सदैव सहायक होते हैं और परमात्मा के नियम पर चलनेवाले पुरुषों को भी उचित है कि वे ऐसे भावोंवाले पुरुषों के सहायक बनें॥९॥

अ॒स्मे इन्द्रो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा द्यु॒म्नं य॑च्छन्तु॒ महि॒ शर्म॑ स॒प्रथः॑। अ॒व॒ध्रं ज्योति॒रदि॑तेॠता॒वृधो॑ दे॒वस्य॒ श्लोकं॑ सवि॒तुर्म॑नामहे॥

हे न्यायाधीश परमात्मन्! आप इन्द्रादि विद्वानों द्वारा हमको नित्य सुख की प्राप्ति करायें और ऐसी कृपा करें कि हम आपके सत्यादि गुणों का गान करते हुए सदैव आपकी स्तुति में तत्पर रहें॥१०॥यह ८३वाँ सूक्त और ५वाँ वर्ग समाप्त हुआ।

आ वां॑ राजानावध्व॒रे व॑वृत्यां ह॒व्येभि॑रिन्द्रावरुणा॒ नमो॑भिः। प्र वां॑ घृ॒ताची॑ बा॒ह्वोर्दधा॑ना॒ परि॒ त्मना॒ विषु॑रूपा जिगाति॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे यजमानो! तुम अग्निविद्यावेत्ता तथा जल वायु आदि तत्त्वों की विद्या जाननेवाले विद्वानों को दुष्ट दमनरूप  संग्राम में बुलाओ और नम्रवाणियों द्वारा उनका सत्कार करते हुए उनको उद्बोधन करो कि हे भगवन्! जिस प्रकार घृतादि पदार्थों से अग्नि देदीप्यमान होती है, इसी प्रकार आप हमारे सम्मानादि भावों से देदीप्यमान होकर शत्रुरूप समिधाओं को शीघ्र ही भस्म करें, जिससे हमारी शुभकामानायें पूर्ण हों॥तात्पर्य्य यह कि इस मन्त्र में युद्धविद्यावेत्ता सैनिक पुरुषों का सत्कार कथन किया गया है अर्थात् राजा अपने सैनिक तथा विद्वान् पुरुषों का सत्कार सदैव करे, जिससे वे राजधर्म का अङ्ग बनकर राजा की रक्षा में सदा तत्पर रहें॥१॥

यु॒वो रा॒ष्ट्रं बृ॒हदि॑न्वति॒ द्यौर्यौ से॒तृभि॑रर॒ज्जुभिः॑ सिनी॒थः। परि॑ नो॒ हेळो॒ वरु॑णस्य वृज्या उ॒रुं न॒ इन्द्रः॑ कृणवदु लो॒कम्॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे राजपुरुषो! तुम सदैव अपने राष्ट्र की वृद्धि में लगे रहो और उसको प्रेमरूप रज्जु के बन्धन से ऐसा बाँधो, कि वह किसी प्रकार से भी शिथिलता को प्राप्त न हो। अधिक क्या, जिनके राष्ट्र दृढ़ बन्धनों से बँधे हुए हैं, उन पर न कोई जलयानों द्वारा आक्रमण कर सकता और न कोई विद्युत् आदि शक्तियों से उसको हानि पहुँचा सकता है। जो राजा अपने राष्ट्र को दृढ़ बनाने के लिए प्रजा में प्रेम उत्पन्न करता अर्थात् अन्याय और दुराग्रह का त्याग करता हुआ अपने को विश्वासार्ह बनाता है, तब वे दोनों परस्पर उत्पन्न होते और पृथिवी से लेकर द्युलोकपर्य्यन्त सर्वत्र उनका अटल प्रभाव हो जाता है, इसलिए उचित है कि राजा अपने राष्ट्र को दृढ़ बनाने के लिए प्रजा में प्रेम उत्पन्न करे। प्रजा में प्रेम का संचार करनेवाला राजा ही अपने सब कार्यों को विधिवत् करता और वही अन्ततः परमात्मा को प्राप्त होता है॥२॥

कृ॒तं नो॑ य॒ज्ञं वि॒दथे॑षु॒ चारुं॑ कृ॒तं ब्रह्मा॑णि सू॒रिषु॑ प्रश॒स्ता। उपो॑ र॒यिर्दे॒वजू॑तो न एतु॒ प्र णः॑ स्पा॒र्हाभि॑रू॒तिभि॑स्तिरेतम्॥

परमात्मा आज्ञा देते हैं कि हे न्यायाधीश तथा सेनाधीश राजपुरुषो! तुम प्रजाजनों को प्राप्त होकर उनके घरों को यज्ञों द्वारा सुशोभित करो और शूरवीरों को वैदिक शिक्षा दो, ताकि वे वेदवाणीरूप ब्रह्मस्तोत्रों का प्रजा में भलीभाँति प्रचार करें और राजा तथा प्रजा दोनों ऐश्वर्य्ययुक्त पदार्थों से भरपूर हों और प्रजाजन भी उन विद्वानों से प्रार्थना करें कि हे भगवन्! आपकी रक्षा से हमको पुष्कल धन प्राप्त हो और हम आपकी रक्षा में रहकर मनोऽभिलषित उन्नति करें॥३॥

अ॒स्मे इ॑न्द्रावरुणा वि॒श्ववा॑रं र॒यिं ध॑त्तं॒ वसु॑मन्तं पुरु॒क्षुम्। प्र य आ॑दि॒त्यो अनृ॑ता मि॒नात्यमि॑ता॒ शूरो॑ दयते॒ वसू॑नि॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यों! तुम सब प्रकार के ऐश्वर्य्य तथा धन की याचना उसी परमात्मा से करो, क्योंकि वही परमैश्वर्य्ययुक्त, नानाप्रकार के अन्नरूप धनों का स्वामी और वही सब संसार को यथाभाग देनेवाला है। वह अनृतवादियों को दण्ड देता और धर्मात्मा शूरवीरों को यथेष्ट धन का स्वामी बनाता है, इसलिए उचित है कि सब प्रजाजन सत्यपरायण होकर परमात्मा से ही धन की प्रार्थना करें॥४॥

इ॒यमिन्द्रं॒ वरु॑णमष्ट मे॒ गीः प्राव॑त्तो॒के तन॑ये॒ तूतु॑जाना। सु॒रत्ना॑सो दे॒ववी॑तिं गमेम यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

इस मन्त्र में यजमान की ओर से प्रार्थना कथन की गई है कि हे भगवन्! हमारा किया हुआ स्वाध्याय तथा वैदिककर्मों का अनुष्ठान, यह सब आप ही का यश है, क्योंकि इन्हीं कर्मों के अनुष्ठान से हमारे पुत्र-पौत्रादि सन्तानों की वृद्धि होती और हम ऐश्वर्य्यसम्पन्न होकर आपके भक्तिभाजन बनते हैं अर्थात् वैदिककर्मों के अनुष्ठान द्वारा ही मनुष्य को पुत्र-पौत्रादि सन्तति प्राप्त होती और इसी से धनादि ऐश्वर्य्य की वृद्धि होती है, इसलिए जिज्ञासुओं को उचित है कि वह धनप्राप्ति तथा ऐश्वर्य्यवृद्धि के लिए वैदिक कर्मों का निरन्तर अनुष्ठान करें और सन्तति-अभिलाषियों के लिए भी यही कर्म उपादेय है॥यह ८४वाँ सूक्त और छठवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

पु॒नी॒षे वा॑मर॒क्षसं॑ मनी॒षां सोम॒मिन्द्रा॑य॒ वरु॑णाय॒ जुह्व॑त्। घृ॒तप्र॑तीकामु॒षसं॒ न दे॒वीं ता नो॒ याम॑न्नुरुष्यताम॒भीके॑॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे प्रजाजनों! तुम इन्द्र=परमैश्वर्य्ययुक्त शूरवीर तथा वरुण=शत्रुसेना को शस्त्रों द्वारा आच्छादन करनेवाले वीर पुरुषों का सोमादि उत्तमोत्तम पदार्थों से सत्कार करके उन्हें प्रसन्न करते हुए अपनी स्नेहपूर्ण शुद्ध बुद्धि द्वारा सदैव उनकी रक्षा के लिए प्रार्थना करो, जिससे वे शत्रुओं का पराजय करके तुम्हारे लिए सुखदायी हों। तुम युद्ध में चढ़ाई के समय उनके सहायक बनो और उनको सदा प्रेम की दृष्टि से देखो, क्योंकि जहाँ प्रजा-राजपुरुषों में परस्पर प्रेम होता है, वहाँ सदैव आनन्द बना रहता है, इसलिए तुम दोनों परस्पर प्रेम की वृद्धि करो॥१॥

स्पर्ध॑न्ते॒ वा उ॑ देव॒हूये॒ अत्र॒ येषु॑ ध्व॒जेषु॑ दि॒द्यवः॒ पत॑न्ति। यु॒वं ताँ इ॑न्द्रावरुणाव॒मित्रा॑न्ह॒तं परा॑चः॒ शर्वा॒ विषू॑चः॥

इन्द्र=विद्युत् की शक्ति जाननेवाला, वरुण=जलयानों की विद्या जाननेवाला, हे विद्युत् तथा जलीय विद्याओं के जाननेवाले सेनाध्यक्षो! तुम असुरसेना के हनन करने के लिए सदा उद्यत रहो और युद्ध करते हुए अपनी सेना के झण्डों की बड़े प्रयत्न से रक्षा करो और अपने साथ ईर्षा करनेवालों को सदा परास्त करते रहो, ताकि कोई अन्यायकारी पुरुष तुम्हें कभी दबाकर अन्याय न कर सके, यह तुम्हारे लिए ईश्वरीय आदेश है॥२॥

आप॑श्चि॒द्धि स्वय॑शसः॒ सद॑स्सु दे॒वीरिन्द्रं॒ वरु॑णं दे॒वता॒ धुः। कृ॒ष्टीर॒न्यो धा॒रय॑ति॒ प्रवि॑क्ता वृ॒त्राण्य॒न्यो अ॑प्र॒तीनि॑ हन्ति॥

जो पुरुष परमात्मशक्तियों को धारण करके भिन्न-भिन्न कर्मों के ज्ञाता हैं, वे परमैश्वर्य्ययुक्त परमात्मा की उपासना करते हुए न्यायाधीश के पद पर स्थित होते हैं और जो युद्धविद्याविशारद होते हैं, वे आकाशस्थ शत्रु की सेना को मेघमण्डल के समान अपने प्रबल वायुसदृश वेग से छिन्न-भिन्न करते हैं अर्थात् दिव्यशक्तिसम्पन्न राजपुरुष न्यायाधीश बनकर प्रजा में उत्पन्न हुए दोषों को नाश करके उसको धर्मपथ पर चलाते और दूसरे सेनाधीश बनकर वश में न आनेवाले शत्रुओं को विजय करके प्रजा में शान्ति फैलाते हुए परमात्मा की आज्ञा का पालन करते हैं॥३॥

स सु॒क्रतु॑ॠत॒चिद॑स्तु॒ होता॒ य आ॑दित्य॒ शव॑सा वां॒ नम॑स्वान्। आ॒व॒वर्त॒दव॑से वां ह॒विष्मा॒नस॒दित्स सु॑वि॒ताय॒ प्रय॑स्वान्॥

इस मन्त्र में परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यों! तुम इन्द्र=विद्युत् तथा वरुण=वायुरूप शक्ति को काम में लाओ। जो इन शक्तियों को व्यवहार में लाता है, वह ऐश्वर्य्यसम्पन्न होकर सम्पूर्ण संसार में फैलता अर्थात् उसकी अतुल कीर्ति होती है और वही पुरुष तेजस्वी बनकर अमित्र सेना का हनन करनेवाला होता है॥४॥

इ॒यमिन्द्रं॒ वरु॑णमष्ट मे॒ गीः प्राव॑त्तो॒के तन॑ये॒ तूतु॑जाना। सु॒रत्ना॑सो दे॒ववी॑तिं गमेम यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

हे जगदीश्वर! हम आपकी कृपा से विद्युत् तथा वायुरूप शक्तियों की विद्या जाननेवाले विद्वानों को सदैव प्राप्त होते रहें अर्थात् ऐसी कृपा करें कि हम उन विद्वानों के सङ्ग से उक्त विद्या की  वृद्धि द्वारा अपने जीवन को उच्च बनावें और हमारा किया हुआ वेदपाठ तथा यज्ञादि सत्कर्म  हमारी सन्तानों को पवित्र करे और आप हमको मङ्गलमय वाणियों से सदैव पवित्र करते रहें, यह हम यजमानों की प्रार्थना हैं ॥५॥यह ८५वाँ सूक्त और ७वाँ वर्ग समाप्त हुआ।

धीरा॒ त्व॑स्य महि॒ना ज॒नूंषि॒ वि यस्त॒स्तम्भ॒ रोद॑सी चिदु॒र्वी। प्र नाक॑मृ॒ष्वं नु॑नुदे बृ॒हन्तं॑ द्वि॒ता नक्ष॑त्रं प॒प्रथ॑च्च॒ भूम॑॥

जो परमात्मा इस सम्पूर्ण ब्रहमाण्ड का रचयिता है और जिसने कर्मानुसार स्वर्ग=सुख और नरक=दुःख को रचा है, उसके महत्त्व को धीर पुरुष ही विज्ञान द्वारा अनुभव करते हैं, जैसा कि अन्यत्र भी वर्णन किया है कि–“तस्य योनिं परिपश्यन्ति धीराः। तस्मिन् ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा” यजु०॥३१॥१९॥सम्पूर्ण ब्रहमाण्डों की योनि=उत्पत्तिस्थान परमात्मा को धीर पुरुष ही ज्ञान द्वारा अनुभव करते हैं, जो सबको अपने वश में किये हुए है। इसी भाव को महर्षि व्यास ने “ योनिश्चेह गीयते”॥ब्र० सू० १।४।२७॥में वर्णन किया है कि एकमात्र परमात्मा ही सब भूतों की योनि=निमित्त कारण है और “आनीदवातं स्वधया तदेकं”॥ऋग्० मं. १०।२९।२॥में भलीभाँति वर्णन किया है कि स्वधा=माया=प्रकृति के साथ वह एक है अर्थात् परमात्मा निमित्तकारण और प्रकृति उपादानकारण है। इसी भाव को श्वेताश्वरोपनिषद् में इस प्रकार वर्णन किया है कि “मायान्तु प्रकृतिं विद्यात्, मायिनन्तु महेश्वरं”=माया को प्रकृति जान अर्थात् माया तथा प्रकृति ये दोनों उस उपादानकारण के नाम हैं और “मायिनं” प्रकृतिवाला उस महेश्वर=परमात्मा को जानो। इससे सिद्ध है कि वही परमात्मा इस सम्पूर्ण ब्रहमाण्ड का रचयिता और वही सबका नियन्ता=नियम में चलानेवाला है, उसकी महिमा को ज्ञान द्वारा अनुभव करके उसी की उपासना करनी चाहिए, अन्य की नहीं॥१॥

उ॒त स्वया॑ त॒न्वा॒३॒॑ सं व॑दे॒ तत्क॒दा न्व१॒॑न्तर्वरु॑णे भुवानि। किं मे॑ ह॒व्यमहृ॑णानो जुषेत क॒दा मृ॑ळी॒कं सु॒मना॑ अ॒भि ख्य॑म्॥

उपासक पुरुष उपासनाकाल में उस दिव्यज्योति परमात्मा से प्रार्थना करता है कि हे भगवन्! आप मुझे ऐसी शक्ति प्रदान करें कि मैं आपके समीप होकर आपसे आलाप करूँ, हे सर्वनियन्ता भगवन्! आप मेरी उपासनारूप भेंट को स्वीकार करके ऐसी कृपा करें कि मैं सर्वसुखदाता आपको अपने पवित्र मन द्वारा ज्ञानगोचर करूँ, आप ही की उपासना में निरन्तर रत रहूँ और एकमात्र आप ही मेरे सम्मुख लक्ष्य हों अर्थात् उपासक पुरुष नानाप्रकार के तर्क-वितर्कों से यह निश्चय करता है कि मैं ऐसे साधन सम्पादन करूँ, जिनसे उस आनन्दस्वरूप में निमग्न होकर आनन्द का अनुभव करूँ॥२॥

पृ॒च्छे तदेनो॑ वरुण दि॒दृक्षूपो॑ एमि चिकि॒तुषो॑ वि॒पृच्छ॑म्। स॒मा॒नमिन्मे॑ क॒वय॑श्चिदाहुर॒यं ह॒ तुभ्यं॒ वरु॑णो हृणीते॥

हे सर्वव्यापक! मैं उन पापों को कैसे जानूँ, जिनके कारण आपके दर्शन से वञ्चित हूँ। हे सर्वपालक! ऐसी कृपा कर कि मैं उन पापों से छूटकर आपको प्राप्त होउँ। यह प्रसिद्ध है कि वेदों के ज्ञाता विद्वान् पुरुष पूछने पर निश्चयपूर्वक यह कहते हैं कि परमात्मा सबका मङ्गल, कल्याण चाहते हैं, यदि उपासक अंशमात्र भी उनकी ओर झुके, तो वह दयालु भगवान् स्वयं उसका उद्धार करते हैं, इसलिए पुरुष को चाहिए कि वह साधनसम्पन्न होकर परमात्मा की उपासना में प्रवृत्त हो, तभी उसका उद्धार हो सकता है, अन्यथा नहीं॥३॥

किमाग॑ आस वरुण॒ ज्येष्ठं॒ यत्स्तो॒तारं॒ जिघां॑ससि॒ सखा॑यम्। प्र तन्मे॑ वोचो दूळभ स्वधा॒वोऽव॑ त्वाने॒ना नम॑सा तु॒र इ॑याम्॥

इस मन्त्र में उपासक अपने पापों के मार्जननिमित्त परमात्मा से प्रार्थना करता है कि हे महाराज! वह मैंने कौन बड़े पाप किये हैं, जिनके कारण मैं आपको प्राप्त नहीं हो सकता अथवा आपकी प्राप्ति में विघ्नकारी है। हे मित्ररूप परमेश्वर! आप मेरा हनन न करते हुए अपनी कृपा द्वारा उन पापों से मुझे निर्मुक्त करें, ताकि मैं शीघ्र ही आपको प्राप्त होऊँ॥तात्पर्य्य यह है कि पुरुष जब तक अपने दुर्गुणों को आप अनुभव नहीं करता, तब तक वह अपना सुधार नहीं कर सकता। मनुष्य का सुधार तभी होता है, जब वह अपने आपको आत्मिक उन्नति में निर्बल पाता है। परमात्मा आज्ञा देते हैं कि जिज्ञासु जनों! तुम अघमर्षणादि मन्त्रों के पाठ द्वारा अपने आपको पवित्र बनाकर मेरे समीप आओ, तुम्हें आनन्द प्राप्त होगा॥५॥

अव॑ द्रु॒ग्धानि॒ पित्र्या॑ सृजा॒ नोऽव॒ या व॒यं च॑कृ॒मा त॒नूभिः॑। अव॑ राजन्पशु॒तृपं॒ न ता॒युं सृ॒जा व॒त्सं न दाम्नो॒ वसि॑ष्ठम्॥

इस मन्त्र में विषय-वासना में लिप्त जीवन की ओर से यह प्रार्थना की गई है कि हे जगदीश्वर! जो स्वभाव मेरे माता-पिता की ओर से मुझमें आया है अथवा मैंने अपने दुष्कर्मों से जो प्रकृति बना ली है, उसको आप अपनी कृपा से दूर करके मुझको अपना समीपी बनावें। जिस प्रकार रज्जु से बँधा हुआ वत्स अपनी माता का दूध नहीं पी सकता, इसी प्रकार विषयवासनारूप रज्जु में बँधा हुआ मैं आपके स्वरूपरूपी कामधेनु का दुग्धपान नहीं कर सकता, हे प्रभो! आपसे विमुख करनेवाले विषयावासनारूप बन्धनों से मुक्त करके मुझको आनन्द का भोक्ता बनायें, यह मेरी आपसे प्रार्थना है॥५॥

न स स्वो दक्षो॑ वरुण॒ ध्रुतिः॒ सा सुरा॑ म॒न्युर्वि॒भीद॑को॒ अचि॑त्तिः। अस्ति॒ ज्याया॒न्कनी॑यस उपा॒रे स्वप्न॑श्च॒नेदनृ॑तस्य प्रयो॒ता॥

इस मन्त्र का आशय यह है कि अपने स्वभाव द्वारा किया हुआ कर्म ही पाप की ओर नहीं ले जाता, किन्तु (१) जीव की प्रकृति=स्वभाव, (२) मन्दकर्म, (३) अज्ञान, (४) क्रोध, (५) ईश्वर का नियमन, ये पाँच जीव की सद्गति वा दुर्गति में कारण होते हैं, जैसा कि कौषीतकी उप० में वर्णन किया है कि “एष एव साधु कर्म कारयति, तं यमधो निनीषते” कौ० ३।३।८।=जिसको वह देव अधोगति को प्राप्त कराना चाहता है, उसको नीचे की ओर ले जाता और जिसको उच्च बनाना चाहता है, उसको उन्नति के पथ पर चलाता है। यहाँ यह शङ्का होती है कि ऐसा करने से ईश्वर में वैषम्य तथा नैर्घृण्यरूप दोष आते हैं अर्थात् ईश्वर ही अपनी इच्छा से किसी को नीचा और किसी को ऊँचा बनाता है ? इसका उत्तर यह है कि ईश्वर पूर्वकृत कर्मों द्वारा फलप्रदाता है और उस फल से स्वयंसिद्ध ऊँच-नीचपन आजाता है। जैसे किसी पुरुष को जहाँ नीचकर्म करने का दण्ड मिला, उतने काल जो वह स्वकर्म करने से वञ्चित रहा, इससे वह दूसरों से पीछे रह गया। इस भाव से ईश्वर जीव की उन्नति तथा अवनति का हेतु है, वास्तव में जीव के स्वकृत कर्म ही उसकी उन्नति तथा अवनति में कारण होते हैं। इसी भाव से जीव को कर्म करने में स्वतन्त्र और भोगने में परतन्त्र माना है, कर्मानुसार फल देने से ईश्वर में कोई दोष नहीं आता॥६॥

अरं॑ दा॒सो न मी॒ळ्हुषे॑ कराण्य॒हं दे॒वाय॒ भूर्ण॒येऽना॑गाः। अचे॑तयद॒चितो॑ दे॒वो अ॒र्यो गृत्सं॑ रा॒ये क॒वित॑रो जुनाति॥

परमात्मा के अज्ञानियों का पथप्रदर्शक होने से जीव अपने कल्याण की प्रार्थना करता हुआ यह कथन करता है कि हे परमात्मदेव! मैं आपके निमित्त यजन करता हुआ प्रार्थी हूँ कि कृपा करके आप मेरे कल्याणार्थ मुझे ऐश्वर्य्यसम्पन्न करें॥७॥

अ॒यं सु तुभ्यं॑ वरुण स्वधावो हृ॒दि स्तोम॒ उप॑श्रितश्चिदस्तु। शं नः॒ क्षेमे॒ शमु॒ योगे॑ नो अस्तु यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

इस मन्त्र में यह प्रार्थना की गई है कि हे परमात्मन्! यह हमारा किया हुआ यज्ञ आपको प्राप्त हो, आप कृपा करके हमारे योग-क्षेम की रक्षा करते हुए हमारे भावों को पवित्र करें। अधिक क्या, जो परमात्मा में सदैव रत रहते हैं, उनके योगक्षेम-निर्वाह के लिए परमात्मा स्वयं उद्यत होते हैं॥८॥यह ८६वाँ सूक्त और ८वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

रद॑त्प॒थो वरु॑णः॒ सूर्या॑य॒ प्रार्णां॑सि समु॒द्रिया॑ न॒दीना॑म्। सर्गो॒ न सृ॒ष्टो अर्व॑तीॠता॒यञ्च॒कार॑ म॒हीर॒वनी॒रह॑भ्यः॥

सब संसार को वशीभूत रखनेवाले परमात्मा ने चन्द्रमा, अन्तरिक्षस्थ जल और शीघ्रगामिनी नदियों को रचा और उसी ने तेजोपुञ्ज सूर्य्य को रचकर उसमें गति प्रदान की, जिससे सम्पूर्ण भूमण्डल में गति उत्पन्न हो जाती है। इसी अभिप्राय से अन्यत्र भी वर्णन किया है कि– सूर्य्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्। दिवञ्च पृथिवीञ्चान्तरिक्षमथो स्वः॥ऋग्० १०।१९१।३॥अर्थ–धाता=सबको धारण-पोषण करनेवाले परमात्मा ने सूर्य्य चन्द्रमा, पृथिवी, आकाश और सम्पूर्ण लोक-लोकान्तरों को पहले की न्याईं बनाया॥१॥

आ॒त्मा ते॒ वातो॒ रज॒ आ न॑वीनोत्प॒शुर्न भूर्णि॒र्यव॑से सस॒वान्। अ॒न्तर्म॒ही बृ॑ह॒ती रोद॑सी॒मे विश्वा॑ ते॒ धाम॑ वरुण प्रि॒याणि॑॥

“वृणोति सर्वमिति वरुणः”=जो इस चराचर ब्रह्माण्ड को अपनी शक्तिद्वारा आच्छादान करे, उसका नाम “वरुण” है। एकमात्र परमात्मा ही ऐसा महान् है, जो सब विश्ववर्ग को अपनी शक्तिद्वारा आच्छादन करके अपनी महत्ता से सर्वत्र ओत-प्रोत हो रहा है, इसलिए उसका नाम वरुण है, जैसा कि “ईशावास्यमिदं  सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्” यजु० ४०।१॥इत्यादि मन्त्रों में अन्यत्र भी वर्णन किया है कि इस संसार में जो कुछ वस्तुमात्र दृष्टिगत हो रहा है, वह सब ईश्वर की सत्ता से व्याप्त है। यही भाव इस मन्त्र में प्रकारान्तर से वर्णन किया है कि वायु उस वरुण परमात्मा के प्राणसमान और यह निखिल ब्रहमाण्ड उसके स्थान हैं, जो जीवमात्र को प्रिय हैं॥तात्पर्य्य यह है कि परमात्मा की रचनारूप ये ब्रह्माण्ड ऐसे अद्भुत हैं कि जीवमात्र इनको अमृततुल्य मानते हुए आनन्दपूर्वक उपभोग करते हैं, परन्तु जो प्राणी उस परब्रह्म के आज्ञापालक हैं, उन्हीं को यह ब्रह्माण्ड सदैव अमृतमय प्रतीत होता है, इसी अभिप्राय से कहा है कि “आनन्दादेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते, आनन्देन जातानि जीवन्ति” उसी आनन्दस्वरूप परमात्मा से ये सब प्राणी उत्पन्न होते और आनन्द से ही जीते हैं। अर्थात् जिस प्रकार सुषुप्ति अवस्था में जीव आनन्द का भोक्ता होता है, इसी प्रकार प्रलयावस्था में भी आनन्द का भोग करता है, इसका नाम प्रकृतिलय अवस्था है। इसमें और मुक्ति अवस्था में इतना भेद है कि इस अवस्था में आविद्यिक=अविद्या की वृत्ति बनी रहती है और मुक्ति अवस्था में यह वृत्ति नहीं होती। यद्यपि प्रलय और सुषुप्ति में आनन्द होता है, परन्तु वह मुक्ति के समान अविद्यारहित आनन्द नहीं होता। “आनन्दादेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते०” मुक्त जीव आनन्द भोगते हुए ही इस संसार में आते और सदाचारी होने के कारण यहाँ भी आनन्द भोगते और अन्त में उसी चिद्घन आनन्दस्वरूप ब्रह्म में लय हो जाते हैं। इस प्रकार सदाचारपूर्वक परमात्मा की आज्ञापालन करनेवाले पुरुषों को यह संसार सदैव आनन्दमय होता है॥२॥

परि॒ स्पशो॒ वरु॑णस्य॒ स्मदि॑ष्टा उ॒भे प॑श्यन्ति॒ रोद॑सी सु॒मेके॑। ऋ॒तावा॑नः क॒वयो॑ य॒ज्ञधी॑राः॒ प्रचे॑तसो॒ य इ॒षय॑न्त॒ मन्म॑॥

जो पुरुष परमात्मपरायण होते हैं, उनका यश पृथिवी तथा द्युलोक के मध्य में फैल जाता, इसी अभिप्राय से उक्त लोकों को साक्षीरूप से वर्णन किया है। लोकों का देखना यहाँ उपचार से वर्णन किया गया है, वास्तविक नहीं, क्योंकि वास्तव में देखने तथा साक्षी देने का धर्म पृथिवी तथा द्युलोक में न होने से तत्रस्थ मनुष्यों की लक्षणा कर लेनी चाहिए। पृथिवी तथा द्युलोक के मध्य में सब प्राणीवर्ग उन मनुष्यों की साक्षी देते हैं, जो सदाचारी तथा ईश्वरपरायण होते हैं अर्थात् वे कभी छिप नहीं सकते, इसलिए प्रत्येक पुरुष को उचित है कि वह ईश्वरपरायण होकर संसार में अपना यश विस्तृत करे॥३॥

उ॒वाच॑ मे॒ वरु॑णो॒ मेधि॑राय॒ त्रिः स॒प्त नामाघ्न्या॑ बिभर्ति। वि॒द्वान्प॒दस्य॒ गुह्या॒ न वो॑चद्यु॒गाय॒ विप्र॒ उप॑राय॒ शिक्ष॑न्॥

परमात्मा अपने ज्ञान के पात्र मेधावी भक्तों को अपनी भक्ति का मार्ग बतलाते हुए उपदेश करते हैं कि तुम इक्कीस नामोंवाले यज्ञ, जिनको वेदवाणी ने धारण किया है, उनका अनुष्ठान करो अर्थात् ब्रह्मयज्ञादि पाँच महायज्ञ और उपनयनादि षोडशसंस्काररूप यज्ञ, इन इक्कीस यज्ञों का करनेवाला मुक्तिधाम का अधिकारी होता और वही परमात्मा की समीपता को उपलब्ध करके सुख का अनुभव करता है। वह परमात्मा का उपदेश मनुष्यमात्र के लिए ग्राह्य है कि उक्त इक्कीस यज्ञों का अनुष्ठान करते हुए अपने जीवन को उच्च बनावें॥४॥

ति॒स्रो द्यावो॒ निहि॑ता अ॒न्तर॑स्मिन्ति॒स्रो भूमी॒रुप॑राः॒ षड्वि॑धानाः। गृत्सो॒ राजा॒ वरु॑णश्चक्र ए॒तं दि॒वि प्रे॒ङ्खं हि॑र॒ण्ययं॑ शु॒भे कम्॥

एकमात्र परमात्मा का ही यह ऐश्वर्य्य है, जिसने नभोमण्डल में अणुरूप बालु, अन्तरिक्ष निर्वातस्थान तथा द्युलोक प्रकाशस्थान, यह तीन प्रकार का द्युलोक और उपरितल, मध्य तथा रसातल, यह तीन प्रकार की पृथिवी, जिसमें षड् ऋतुयें चक्रवत् घूम-घूम कर आती हैं और पृथिवी तथा द्युलोक के मध्य में सबसे विचित्र तेजोमण्डलमय सूर्य्यलोक का निर्माण किया, जो सम्पूर्ण भूमण्डल तथा अन्य लोक-लोकान्तरों को प्रकाशित करता है, इत्यादि विविध रचना से ज्ञात होता है कि परमात्मा का ऐश्वर्य्य अकथनीय है। इस मन्त्र में विभूतिसम्पन्न वरुण को विराड्रूप से वर्णन किया गया है॥५॥

अव॒ सिन्धुं॒ वरु॑णो॒ द्यौरि॑व स्थाद्द्र॒प्सो न श्वे॒तो मृ॒गस्तुवि॑ष्मान्। ग॒म्भी॒रशं॑सो॒ रज॑सो वि॒मानः॑ सुपा॒रक्ष॑त्रः स॒तो अ॒स्य राजा॑॥

वह पूर्ण परमात्मा, जिसने समुद्रादि अगाध जलाशयों की मर्यादा बाँध दी है, वह रेणु आदि सूक्ष्म से सूक्ष्म पदार्थों का निर्माता, वह अनन्तशक्तिसम्पन्न और वही इस सद्रूप जगत् का राजा है॥स्मरण रहे कि जो लोग इस संसार को मिथ्या मानते हैं, वे “सतो अस्य राजा” इस वाक्य से शिक्षा लें, जिसमें वेद भगवान् ने मिथ्यावादियों के मत का स्पष्ट खण्डन किया है कि यह जगत् सद्रूप है, मिथ्या नहीं॥६॥

यो मृ॒ळया॑ति च॒क्रुषे॑ चि॒दागो॑ व॒यं स्या॑म॒ वरु॑णे॒ अना॑गाः। अनु॑ व्र॒तान्यदि॑तेॠ॒धन्तो॑ यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

इस मन्त्र में जो यह वर्णन किया है कि वह अपराध करते हुए को अपनी दया से क्षमा कर देता है, इसका आशय यह है कि वह अपने सम्बन्ध में हुए पापों को क्षमा कर देता है, परन्तु जिन पापों का प्रभाव दूसरों पर पड़ता है, उनको कदापि क्षमा नहीं करता। जैसे कोई प्रमादवश किसी दिन सन्ध्या न करे, तो प्रार्थना करने पर उस पाप को क्षमा कर सकता है, परन्तु चोरी अथवा असत्य भाषणादि पापों को वह कदापि क्षमा नहीं करता, उनका दण्ड अवश्य देता है। यद्यपि परमात्मा में इतनी उदारता है कि वह अपराधों को क्षमा भी कर सकता है, परन्तु हमको उसके समक्ष सदैव निरपराध होकर जाना चाहिये। जब हम उस परमात्मा के नियमों का पालन करते हुए उससे क्षमा की प्रार्थना करते हैं, तभी वह हमारे ऊपर दया कर सकता है, अन्यथा नहीं॥इस मन्त्र में परमात्मा की आज्ञारूप व्रतों के पालन करने का सर्वोपरि उपदेश पाया जाता है, जैसा कि “अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि०॥” यजु० १।५॥इत्यादि मन्त्रों में व्रतपालन की प्रार्थना की गई है। जो पुरुष व्रतपालन नहीं कर सकता, उससे संसार में कुछ भी नहीं होता, उसका जीवन निष्फल जाता है, इसलिये ईश्वरीय नियमों का पालन करना प्रत्येक मनुष्य के लिये अवश्य कर्त्तव्य है॥७॥यह ८७वाँ सूक्त और नवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र शु॒न्ध्युवं॒ वरु॑णाय॒ प्रेष्ठां॑ म॒तिं व॑सिष्ठ मी॒ळ्हुषे॑ भरस्व। य ई॑म॒र्वाञ्चं॒ कर॑ते॒ यज॑त्रं स॒हस्रा॑मघं॒ वृष॑णं बृ॒हन्त॑म्॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे स्नातक विद्वानों! तुम उसकी उपासना करो, जिसने सूर्य-चन्द्रमा को निर्माण किया है और जो इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय का कारण है, जिसके भय से अग्न्यादि तेजस्वी पदार्थ अपने-अपने तेज को धारण किये हुये हैं, जैसा कि “भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः। भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः॥” कठ० ६,३,॥उसके भयसे अग्नि तपती है, उसी के भय से सूर्य प्रकाश करता है, विद्युत् और वायु इत्यादि शक्तियें उसी के बल से परिभ्रमण करती हैं। “सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्” ऋग् मं० १० सू० १९०।३॥जिसने सूर्यचन्द्रादि पदार्थों को रचा है, उसी धाता सब निर्माता परमात्मा की उपासना पूर्व मन्त्र में कथन की गयी है॥१॥

अधा॒ न्व॑स्य सं॒दृशं॑ जग॒न्वान॒ग्नेरनी॑कं॒ वरु॑णस्य मंसि। स्व१॒॑र्यदश्म॑न्नधि॒पा उ॒ अन्धो॒ऽभि मा॒ वपु॑र्दृ॒शये॑ निनीयात्॥

हे ज्ञानस्वरूप परमात्मन्! आप मेरी चितवृत्ति को निर्मल करके अपने स्वरूपप्राप्ति के योग्य बनायें॥२॥

आ यद्रु॒हाव॒ वरु॑णश्च॒ नावं॒ प्र यत्स॑मु॒द्रमी॒रया॑व॒ मध्य॑म्। अधि॒ यद॒पां स्नुभि॒श्चरा॑व॒ प्र प्रे॒ङ्ख ई॑ङ्खयावहै शु॒भे कम्॥

इस मन्त्र में कर्मयोग का वर्णन किया है कि जब पुरुष अपनी इच्छाओं को ईश्वराधीन कर देता है, वा यों कहो कि निष्काम कर्मों को करता हुआ उनके फल की इच्छा नहीं करता, तब परमात्मा के भावों में विचरता हुआ पुरुष एक प्रकार के अपूर्व आनन्द को अनुभव करता है॥३॥

वसि॑ष्ठं ह॒ वरु॑णो ना॒व्याधा॒दृषिं॑ चकार॒ स्वपा॒ महो॑भिः। स्तो॒तारं॒ विप्रः॑ सुदिन॒त्वे अह्नां॒ यान्नु द्याव॑स्त॒तन॒न्यादु॒षासः॑॥

परमात्मा जिस पुरुष के शुभ कर्म देखता है, उसको उत्तम विद्वान् बनाता है और कर्मानुसार ही परमात्मा ऋषि, विप्र, ब्राह्मणादि पदवियें प्रदान करता है। इस मन्त्र में वर्णव्यवस्था भी गुणकर्मानुसार कथन की गई है, यही भाव “तमेव ऋषिं तमु ब्रह्माणं”॥ऋग् अ० ८ अ० ६ व० ४॥“तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्”॥ऋ० ८।७।११।४॥इत्यादि मन्त्रों में भी कर्मानुसार परमात्मा की कामना से ही ब्राह्मणादि पदवियें प्राप्त होती हैं, यही भाव है। उपनिषद् में भी कर्मानुसार ही ऊँच-नीच व्यवस्था कथन की है। जैसा कि “एष एव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषते, एष एवासाधु कर्म कारयति तं यमधो निनीषते”॥कौ० ३।८॥परमात्मा कर्मों द्वारा ही ऊँच-नीच अवस्था को प्राप्त कराता है, यही व्यवस्था उक्त मन्त्र में कथन की है॥४॥

क्व१॒॑ त्यानि॑ नौ स॒ख्या ब॑भूवुः॒ सचा॑वहे॒ यद॑वृ॒कं पु॒रा चि॑त्। बृ॒हन्तं॒ मानं॑ वरुण स्वधावः स॒हस्र॑द्वारं जगमा गृ॒हं ते॑॥

जो जिज्ञासु सब कर्मों को हिंसारहित करता है और परमात्मा के साथ निष्पापादि गुणों को धारण करके उसकी मैत्री को उपलब्ध करता है, वह उसके अनन्त ऐश्वर्य्ययुक्त स्वरूप को प्राप्त होता है। तात्पर्य्य यह है कि जब तक जिज्ञासु अपने आपको उसकी कृपा का पात्र नहीं बनाता, तब तक वह उसकी स्वरूपप्राप्ति का अधिकारी नहीं बन सकता॥५॥

य आ॒पिर्नित्यो॑ वरुण प्रि॒यः सन्त्वामागां॑सि कृ॒णव॒त्सखा॑ ते। मा त॒ एन॑स्वन्तो यक्षिन्भुजेम य॒न्धि ष्मा॒ विप्रः॑ स्तुव॒ते वरू॑थम्॥

जो पुरुष कुछ भी परमात्मा के साथ सम्बन्ध रखता है, वह यदि स्वभाववश कभी पाप में पड़ जाता है, परमात्मा की कृपा से फिर भी उन पापों से निकल सकता है, क्योंकि परमात्मा के आराधन का बल उसे पापप्रवाह से निकाल सकता है। इसी अभिप्राय से कहा है कि परमात्मा परमात्मपरायण पुरुषों के लिए अवश्यमेव शुभस्थान देते हैं॥६॥

ध्रु॒वासु॑ त्वा॒सु क्षि॒तिषु॑ क्षि॒यन्तो॒ व्य१॒॑स्मत्पाशं॒ वरु॑णो मुमोचत्। अवो॑ वन्वा॒ना अदि॑तेरु॒पस्था॑द्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

इस मन्त्र में जो पृथिवी को नित्य कथन किया है, इससे यह तात्पर्य्य है कि यह संसार मिथ्या नहीं, क्योंकि ध्रुव पदार्थ मिथ्या नहीं होता, किन्तु दृढ़ होता है॥७॥यह ८८वाँ सूक्त और १०वाँ वर्ग समाप्त हुआ।

मो षु व॑रुण मृ॒न्मयं॑ गृ॒हं रा॑जन्न॒हं ग॑मम्। मृ॒ळा सु॑क्षत्र मृ॒ळय॑॥

परमात्मा ने उक्त ऐश्वर्य्य का उपदेश किया है कि हे जीवो! तुम सदैव अपने जीवन के लक्ष्य को ऊँचा रक्खा करो और तुम यह प्रार्थना किया करो कि हम मट्टी के घरों में मत रहें, किन्तु हमारे रहने के स्थान अति मनोहर स्वर्णजटित सुन्दर हों तथा उनमें परमात्मा हमको सब प्रकार के ऐश्वर्य्य दें॥१॥

यदेमि॑ प्रस्फु॒रन्नि॑व॒ दृति॒र्न ध्मा॒तो अ॑द्रिवः। मृ॒ळा सु॑क्षत्र मृ॒ळय॑॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि जो पुरुष मनुष्यजन्म के धर्म, अर्थ काम, मोक्ष इन चारों फलों से विहीन हैं, वे पुरुष लोहनिर्म्माता की धौंकनी के समान केवल श्वासमात्र से जीवित प्रतीत होते हैं, वास्तव में वे पुरुष चर्म्मनिर्मित (दृतिः) चमड़े की खाल के समान निर्जीव हैं, इसलिए पुरुष को चाहिये कि वह सदैव उद्योगी और कर्म्मयोगी बनकर सदैव अपने लक्ष्य के लिए कटिबद्ध रहे। अपुरुषार्थी होकर जीना केवल चर्म्मपात्र के समान प्राणयात्रा करना है। इस अभिप्राय से इस मन्त्र में उद्योग=अर्थात् कर्म्मयोग का उपदेश किया है॥२॥

क्रत्वः॑ समह दी॒नता॑ प्रती॒पं ज॑गमा शुचे। मृ॒ळा सु॑क्षत्र मृ॒ळय॑॥

पुरुष अपनी निर्बलता से शुभकर्मों को जानता हुआ भी उनका अनुष्ठान नहीं कर सकता, प्रत्युत अपनी दीनता से उनके विरुद्ध आचरण करता है, इसलिए इस मन्त्र में परमात्मा ने उपदेश किया है कि हे वैदिक धर्म्मानुयायी पुरुषो! तुम उद्योगी बनने के लिए परमात्मा से सदैव प्रार्थना करो कि हे परमात्मन्! आप हमको आत्मिक बल दें, ताकि हम कर्मानुष्ठानी बनकर अकर्म्मण्यतारूप दोष को दूर करके सत्कर्मी बनें॥३॥

अ॒पां मध्ये॑ तस्थि॒वांसं॒ तृष्णा॑विदज्जरि॒तार॑म्। मृ॒ळा सु॑क्षत्र मृ॒ळय॑॥

कर्म्मों के मनोरथरूपी सागर में पड़ा-पड़ा मनुष्य बूढ़ा हो जाता है और कर्म्मों का अनुष्ठान नहीं कर सकता। जिस पर परमात्मदेव की कृपा होती है, वही कर्म्मों का अनुष्ठान करके कर्म्मयोगी बनता है, अन्य नहीं, वा यों कहो कि उद्योगी पुरुष को ही परमात्मा अपनी कृपा का पात्र बनाते हैं, अन्य को नहीं। इसी अभिप्राय से परमात्मा ने इस मन्त्र में कर्म्मयोग का उपदेश किया है। कई एक लोग उक्त मन्त्र का यह अर्थ करते हैं कि समुद्र के जल में डूबता हुआ पुरुष इस मन्त्र में वरुण देवता की उपासना करता है और यह कहता है कि “लवणोत्कटस्य समुद्रजलस्य पानानर्हत्वात्” ॥कि मैं समुद्र के जल के क्षार होने के कारण इसे पी नहीं सकता। यह अर्थ सर्वथा वेद के आशय से बाह्य है, क्योंकि यहाँ जल में डूबने का क्या प्रकरण ? यहाँ तो इससे प्रथम मन्त्र में कर्मों के प्रतिकूल आचरण का प्रकरण था, इसलिए यहाँ भी यही प्रकरण है। अन्य युक्ति यह है कि इस ११वें वर्ग के प्रारम्भ से ही कर्म्मों का प्रकरण है और (अपां मध्ये) इस वाक्य में (अप) शब्द से कर्म्मों का ग्रहण है, क्योंकि ‘अप’ नाम निरुक्त में कर्म्मों का है, जैसा कि “अपः, अप्नः, दंसः इत्यादीनि षड्विंशतिः कर्म्मनामानि” निघं०।२।१।४॥४॥

यत्किं चे॒दं व॑रुण॒ दैव्ये॒ जने॑ऽभिद्रो॒हं म॑नु॒ष्या॒३॒॑श्चरा॑मसि। अचि॑त्ती॒ यत्तव॒ धर्मा॑ युयोपि॒म मा न॒स्तस्मा॒देन॑सो देव रीरिषः॥

इस मन्त्र में उन पापों से क्षमा माँगी गई है, जो अज्ञान से किये जाते हैं अथवा यों कहो कि जो प्रत्यवायरूप पाप हैं, उनके विषय में यह क्षमा की प्रार्थना है। परमात्मा ऐसे पाप को क्षमा नहीं करता, जिससे उसके न्यायरूपी नियम पर दोष आवे, किन्तु यदि कोई पुरुष परमात्मा के सम्बन्ध-विषयक अपने कर्त्तव्य को पूरा नहीं करता, उस पुरुष को अपने सम्बन्धविषयक परमात्मा क्षमा कर देता है। अन्यविषयक किये हुए पाप को क्षमा करने से परमात्मा अन्यायी ठहरता है। वैदिक धर्म्म में यह विशेषता है कि इसमें अन्य धर्म्मों के समान सब पापों की क्षमा करने से परमात्मा अन्यायकारी ठहरता है, इसी अभिप्राय से मन्त्र में ‘तव धर्म्मा’ यह कथन किया है कि परमात्मा के सम्बन्ध में सन्ध्या-वन्दनादि जो कर्म्म हैं, उनमें त्रुटि होने से भी परमात्मा क्षमा कर देता है, अन्यों से नहीं॥जो लोग आर्य्यधर्म्म में यह दोष लगाया करते हैं कि वैदिक धर्म्म में परमात्मा सर्वथा निर्दयी है, वह किसी विषय में भी दया नहीं करता। यह उनकी अत्यन्त भूल है और अज्ञान से किये हुए पाप में भी परमात्मा क्षमा कर देता है, इस बात को मन्त्र में स्पष्ट रीति से वर्णन किया है। कई एक टीकाकारों ने इस प्रकरण को वरुण देवता की उपासना करने में और जल में डूबते हुए पुरुष के बचाने के विषय में लगाया है और ऐसे अर्थ करने में उन्होंने अत्यन्त भूल की है। जब इस प्रकरण में ऐसी-ऐसी दर्शन की उच्च बातों का वर्णन है कि परमात्मा किन-किन पापों को क्षमा करता है और किन-किन को नहीं, तो इस में जल में डूबनेवाले पुरुष की क्या कथा ? इसलिये पूर्व मन्त्र में ‘अपां मध्ये’ के अर्थ प्राणमयकोष के हैं अथवा ‘अपां’ के अर्थ कर्मों में बद्ध जीव के हैं क्योंकि यह संगति इस ११ वें मन्त्र से है और इस वर्ग की समाप्ति तक यही प्रकरण है। जो लोग यह कहा करते हैं वि वेदों में कर्त्तव्य कर्म्मों का विधान नहीं, वेद प्राकृत बातों का वर्णन करते हैं, उनको ऐसे सूक्तों का ध्यान रखना अत्यन्त आवश्यक है॥५॥यह ८९वाँ सूक्त, ५वाँ अनुवाक और ११वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

प्र वी॑र॒या शुच॑यो दद्रिरे वामध्व॒र्युभि॒र्मधु॑मन्तः सु॒तासः॑। वह॑ वायो नि॒युतो॑ या॒ह्यच्छा॒ पिबा॑ सु॒तस्यान्ध॑सो॒ मदा॑य॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे वायुतत्त्व की विद्या को जाननेवाले विद्वान् पुरुषो! आप वैदिक पुरुषों से उपदेश-लाभ करके सर्वत्र भूमण्डल में अव्याहतगति होकर विचरें॥१॥

ई॒शा॒नाय॒ प्रहु॑तिं॒ यस्त॒ आन॒ट् छुचिं॒ सोमं॑ शुचिपा॒स्तुभ्यं॑ वायो। कृ॒णोषि॒ तं मर्त्ये॑षु प्रश॒स्तं जा॒तोजा॑तो जायते वा॒ज्य॑स्य॥

जो लोग विद्वानों को धन देते हैं, वे सर्वदा ऐश्वर्यसम्पन्न होते हैं और जो लोग ईश्वरार्पण कर्म करते हैं अर्थात् निष्काम कर्म करते हैं, परमात्मा उनको सदा ऐश्वर्यशाली बनाता है॥२॥

रा॒ये नु यं ज॒ज्ञतू॒ रोद॑सी॒मे रा॒ये दे॒वी धि॒षणा॑ धाति दे॒वम्। अध॑ वा॒युं नि॒युतः॑ सश्चत॒ स्वा उ॒त श्वे॒तं वसु॑धितिं निरे॒के॥

स्वभावोक्ति अलङ्कार द्वारा इस मन्त्र में परमात्मा यह उपदेश करते हैं कि मानो प्रकृति ने ही ऐसे पुरुष को उत्पन्न किया है, जो संसार के दरिद्र का नाश करता है। ऐसा पुरुष जिस देश में उत्पन्न होता है, उस देश में अनैश्वर्य और दरिद्रता का गन्ध भी नहीं रहता॥३॥

उ॒च्छन्नु॒षसः॑ सु॒दिना॑ अरि॒प्रा उ॒रु ज्योति॑र्विविदु॒र्दीध्या॑नाः। गव्यं॑ चिदू॒र्वमु॒शिजो॒ वि व॑व्रु॒स्तेषा॒मनु॑ प्र॒दिवः॑ सस्रु॒रापः॑॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे पुरुषो! जो लोग वायुवत् सर्वत्र गतिशील विद्वानों की संगति में रहते हैं, उनके लिये सूर्योदयकाल सुन्दर प्रतीत होते हैं और उनके लिये सृवृष्टि और सम्पूर्ण ऐश्वर्य उपलब्ध होते हैं। बहुत क्या, योगी जनों की संगति करनेवाले पुरुष ध्यानावस्थित होकर उस परम ज्योति को उपलब्ध करते हैं, जिसका नाम परब्रह्म है॥तात्पर्य यह है कि विद्वानों की संगति के बिना उस पूर्णपुरुष का बोध कदापि नहीं हो सकता, इसलिये पुरुष को उचित है कि सदैव विद्वानों की संगति में रहे॥४॥

ते स॒त्येन॒ मन॑सा॒ दीध्या॑नाः॒ स्वेन॑ यु॒क्तासः॒ क्रतु॑ना वहन्ति। इन्द्र॑वायू वीर॒वाहं॒ रथं॑ वामीशा॒नयो॑र॒भि पृक्षः॑ सचन्ते॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यों! विद्युत् विद्या के जाननेवाले तथा वायु आदि सूक्ष्म तत्त्वों के जाननेवाले विद्वान् जिन यानों को बनाते हैं, वे यान उत्तम से उत्तम ऐश्वर्यों को प्राप्त कराते हैं और वीर लोगों को नभोमण्डल में ले जानेवाले एकमात्र वही यान कहला सकते हैं, अन्य नहीं॥५॥

ई॒शा॒नासो॒ ये दध॑ते॒ स्व॑र्णो॒ गोभि॒रश्वे॑भि॒र्वसु॑भि॒र्हिर॑ण्यैः। इन्द्र॑वायू सू॒रयो॒ विश्व॒मायु॒रर्व॑द्भिर्वी॒रैः पृत॑नासु सह्युः॥

विद्युत् आदि विद्याओं की शक्तिओं को जाननेवाले विद्वान् ही प्रजाओं   को ऐश्वर्यसम्पन्न बना सकते हैं। ऐश्वर्यसम्पन्न होकर ही प्रजा पूर्ण आयु को भोग सकती है। ऐश्वर्यसम्पन्न लोग ही युद्धों में पर पक्षों को परास्त करते हैं। परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे विद्वानों! तुम सबसे पहिले अपने देश को ऐश्वर्यसम्पन्न करो, ताकि तुम्हारी प्रजायें वीर सन्तान उत्पन्न करके शत्रुओं को परास्त करें॥जो लोग यह कहते हैं कि वैदिक समय में भारतवर्ष में ऐश्वर्य नहीं था, उनको उक्त मन्त्र की रचना पर अवश्य दृष्टि डालनी चाहिये। इस मन्त्र में केवल गौ, घोड़े और धनादि वस्तुओं के ऐश्वर्य का ही वर्णन नहीं किया, प्रत्युत (हिरण्य) बड़े-बड़े दिव्य रत्नों का वर्णन स्पष्टरीति से उक्त मन्त्र में किया गया है, इतना ही नहीं किन्तु स्वर्ण शब्द भी इसमें स्पष्ट रीति से आया है, जिसमें किसी को भी विवाद नहीं॥वेदों में एक प्रकार के ऐश्वर्य की तो कथा ही क्या, किन्तु नाना प्रकार के ऐश्वर्यों का वर्णन पाया जाता है, जैसा कि मं० २ सू० १५ मन्त्र ३ में रत्नों के धारण करने का उपदेश है। इसी प्रकार मं० १ सू० २० मन्त्र १ में रत्नों का वर्णन है। एक दो उदाहरणों से क्या, सहस्रों मन्त्र वेदों में ऐसे पाये जाते हैं, जिनमें रत्नादि निधियों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। बहुत क्या, ऋग्वेद के पहिले मन्त्र में ही अग्नि को “रत्नधातमम्” का विशेषण दिया गया है, अर्थात् भौतिक अग्नि वा परमात्मा नाना प्रकार के रत्नों को धारण करनेवाले हैं। इसी भाव का उपदेश इस मन्त्र में है कि परमात्मा ईश्वरपरायण लोगों को नाना प्रकार की निधियों का स्वामी बनाता है, किन्तु केवल ईश्वर-अविश्वासी और उद्योगरहित लोगों को नहीं, किन्तु कर्मयोगी और ईश्वरविश्वासी लोगों को ईश्वर ऐश्वर्यसम्पन्न करता है। इसी अभिप्राय से परमात्मा ने इस मन्त्र में विद्युदादि विद्याओं के वेत्ता कर्मयोगी पुरुषों को वर्णन किया है॥६॥

अर्व॑न्तो॒ न श्रव॑सो॒ भिक्ष॑माणा इन्द्रवा॒यू सु॑ष्टु॒तिभि॒र्वसि॑ष्ठाः। वा॒ज॒यन्तः॒ स्वव॑से हुवेम यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

जो लोग वेदवेत्ता विद्वानों से उपदेश लाभ करते हैं, वे ही बल तथा ऐश्वर्यसम्पन्न होकर अपना और अपने देश का कल्याण कर सकते हैं, अन्य नहीं॥७॥यह ९०वाँ सूक्त और १२वाँ वर्ग समाप्त हुआ।

कु॒विद॒ङ्ग नम॑सा॒ ये वृ॒धासः॑ पु॒रा दे॒वा अ॑नव॒द्यास॒ आस॑न्। ते वा॒यवे॒ मन॑वे बाधि॒तायावा॑सयन्नु॒षसं॒ सूर्ये॑ण॥

जो लोग अपने आलस्य आदि दोषरहित और ज्ञानी हैं, वे उषाकाल में उठकर अपने यज्ञादि कर्मों का प्रारम्भ करते हैं। मन्त्र में जो भूतकाल की क्रिया दी है, वह “व्यत्ययो बहुलम्” इस नियम के अनुसार वर्तमानकाल की बोधिका है, इसलिये वेदों से प्रथम किसी अन्य देव के होने की आशङ्का इससे नहीं हो सकती। अन्य युक्ति यह कि “सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत्” “देवाभागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते” इत्यादि मन्त्रों में पूर्व काल के देवों की सूचना जैसे दी गई है, इसी प्रकार उक्त मन्त्र में भी है, इसलिये कोई दोष नहीं॥तात्पर्य्य यह है कि वैदिक सिद्धान्त में सृष्टि प्रवाहरूप से अनादि है, इसलिये उसमें भूतकाल का वर्णन करना कोई दोष की बात नहीं॥१॥

उ॒शन्ता॑ दू॒ता न दभा॑य गो॒पा मा॒सश्च॑ पा॒थः श॒रद॑श्च पू॒र्वीः। इन्द्र॑वायू सुष्टु॒तिर्वा॑मिया॒ना मा॑र्डी॒कमी॑ट्टे सुवि॒तं च॒ नव्य॑म्॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि जो लोग कर्मयोगी और ज्ञानयोगी विद्वानों को अपना नेता बनाते हैं, वे सुख को प्राप्त होते हैं और उनको नवीन से नवीन धनादि वस्तुओं की सदैव प्राप्ति होती है॥२॥

पीवो॑अन्नाँ रयि॒वृधः॑ सुमे॒धाः श्वे॒तः सि॑षक्ति नि॒युता॑मभि॒श्रीः। ते वा॒यवे॒ सम॑नसो॒ वि त॑स्थु॒र्विश्वेन्नरः॑ स्वप॒त्यानि॑ चक्रुः॥

जो पुरुष ज्ञानयोगी बन कर बुद्धिरूपी श्री को उत्पन्न करते हैं, वे संयमी पुरुष ही कर्मयोगी बन सकते हैं, अन्य नहीं॥तात्पर्य यह है कि जिन पुरुषों का अपना मन वशीभूत है, वे ही पुरुष कर्मयोग और ज्ञानयोग के अधिकारी होते हैं, अन्य नहीं, इस भाव को उपनिषदों में इस प्रकार वर्णन किया है कि−“यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः। स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते”॥कठ० ३।८॥जो पुरुष समनस्क वशीकृत मनवाला होता है, वही विज्ञानवान् ज्ञानयोगी और शुभ कर्मों द्वारा पवित्र अर्थात् कर्मयोगी बन सकता है, फिर वह प्राकृत संसार में नहीं आता॥समनस्क, समनस और वशीकृतमन, संयमी ये सब एकार्थवाची शब्द हैं और इनका तात्पर्य कर्मयोग और ज्ञानयोग में है। इस प्रकार उक्त मन्त्र में कर्मयोग और ज्ञानयोग का वर्णन किया है॥३॥

याव॒त्तर॑स्त॒न्वो॒३॒॑ याव॒दोजो॒ याव॒न्नर॒श्चक्ष॑सा॒ दीध्या॑नाः। शुचिं॒ सोमं॑ शुचिपा पातम॒स्मे इन्द्र॑वायू॒ सद॑तं ब॒र्हिरेदम्॥

जब तक मनुष्य के शरीर में कर्म करने की शक्ति रहती है और जब तक ब्रह्मचर्य के प्रभव से उत्पन्न हुआ ओज रहता है और जब तक सत्य के समझने की शक्ति रहती है, तब तक उसे ज्ञानयोगी और कर्मयोगी पुरुषों से सदैव यह प्रार्थना करनी चाहिये कि हे भगवन्, आप मेरे समक्ष आकर मुझे सत्कर्मों का उपदेश करके साधु स्वभाववाला बनाइये। जो लोग यह शङ्का किया करते हैं कि वेदों में सदाचार का उपदेश नहीं, उनको ऐसे सदाचार के बोधक उक्त मन्त्रों पर अवश्य ध्यान देना चाहिये। वेद में ऐसे सहस्रों मन्त्र हैं, जिनमें केवल सदाचार की शिक्षा का वर्णन किया गया है॥४॥

नि॒यु॒वा॒ना नि॒युतः॑ स्पा॒र्हवी॑रा॒ इन्द्र॑वायू स॒रथं॑ यातम॒र्वाक्। इ॒दं हि वां॒ प्रभृ॑तं॒ मध्वो॒ अग्र॒मध॑ प्रीणा॒ना वि मु॑मुक्तम॒स्मे॥

यजमान कर्मयोगी और ज्ञानयोगी विद्वानों से यह प्रार्थना करते हैं कि हे भगवन्! आप हमारे यज्ञों में आकर हमको कर्मयोग तथा ज्ञानयोग का उपदेश करें, ताकि हम उद्योगी तथा ज्ञानी बन कर निरुद्योगिता और अज्ञानरूपी पापों से छुट कर मोक्ष फल के भागी बनें॥५॥

या वां॑ श॒तं नि॒युतो॒ याः स॒हस्र॒मिन्द्र॑वायू वि॒श्ववा॑राः॒ सच॑न्ते। आभि॑र्यातं सुवि॒दत्रा॑भिर॒र्वाक्पा॒तं न॑रा॒ प्रति॑भृतस्य॒ मध्वः॑॥

जो लोग कर्मयोगी और ज्ञानयोगी पुरुषों की सैकड़ों और सहस्रों वार संगति करते हैं, वे लोग उद्योगी और ब्रह्मज्ञानी बन कर जन्म के धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूपी चारों फलों को प्राप्त होते हैं॥६॥

अर्व॑न्तो॒ न श्रव॑सो॒ भिक्ष॑माणा इन्द्रवा॒यू सु॑ष्टु॒तिभि॒र्वसि॑ष्ठाः। वा॒ज॒यन्तः॒ स्वव॑से हुवेम यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

जो लोग ज्ञान और विज्ञान के भिक्षु बन कर ज्ञानी और विज्ञानी लोगों से सदैव ज्ञानयोग और कर्मयोग की भिक्षा माँगते हैं, परमात्मा उनको अभ्युदय और निःश्रेयस इन दोनों ऐश्वर्यों से परिपूर्ण करता है॥७॥यह ९१वाँ सूक्त और १३वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ वा॑यो भूष शुचिपा॒ उप॑ नः स॒हस्रं॑ ते नि॒युतो॑ विश्ववार। उपो॑ ते॒ अन्धो॒ मद्य॑मयामि॒ यस्य॑ देव दधि॒षे पू॑र्व॒पेय॑म्॥

यजमान लोग अपने यज्ञों में कर्मयोगी पुरुषों को बुलाकर उत्तमोत्तम अन्नादि पदार्थों के आह्लादक रस उनकी भेंट करके उनसे सदुपदेश ग्रहण करें। वायु शब्द से इस मन्त्र में कर्मयोगी का ग्रहण है, किसी वायुतत्त्व या किसी अन्य वस्तु का नहीं। यद्यपि वायु शब्द के अर्थ कहीं ईश्वर के कहीं वायुतत्त्व के भी हैं, तथापि यहाँ प्रसङ्ग से वायु शब्द कर्मयोगी का बोधक है, क्योंकि इसके उत्तर मन्त्र में “शचीभिः” इत्यादिक कर्मबोधक वाक्यों से कर्मप्रधान पुरुष का ही ग्रहण है और यहाँ “वायवा याहि दर्शतेमे सोमा अरं कृताः”॥१।२।१॥इत्यादि मन्त्रों में वायु शब्द से ईश्वर का ग्रहण किया है, वहाँ ईश्वर का प्रसङ्ग है, पूर्वोक्त सूक्तों की सङ्गति से वायु शब्द ईश्वर का प्रतिपादक है अर्थात् “अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्”॥१।१।१॥इस ईश्वरप्रकरण में पढ़े जाने के कारण वहाँ वायु शब्द ईश्वर का बोधक है, क्योंकि “शन्नो मित्रः शं वरुणः”॥तैत्तिरीय ब्रा. १॥इस मन्त्र में वायु शब्द ईश्वर के प्रकरण में पढ़ा गया है। जिस प्रकार वहाँ ईश्वरप्रकरण है, इसी प्रकार यहाँ विद्वानों से शिक्षालाभ करने के प्रकरण में पढ़े जाने के कारण वायु शब्द विद्वान् का बोधक है, किसी अन्य वस्तु का नहीं॥१॥

प्र सोता॑ जी॒रो अ॑ध्व॒रेष्व॑स्था॒त्सोम॒मिन्द्रा॑य वा॒यवे॒ पिब॑ध्यै। प्र यद्वां॒ मध्वो॑ अग्रि॒यं भर॑न्त्यध्व॒र्यवो॑ देव॒यन्तः॒ शची॑भिः॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे यजमान लोगों! तुम सुन्दर-सुन्दर पदार्थों के रस निकाल कर विद्वानों को तृप्त करो, ताकि वे प्रसन्न होकर तुमको उपदेश दें॥२॥

प्र याभि॒र्यासि॑ दा॒श्वांस॒मच्छा॑ नि॒युद्भि॑र्वायवि॒ष्टये॑ दुरो॒णे। नि नो॑ र॒यिं सु॒भोज॑सं युवस्व॒ नि वी॒रं गव्य॒मश्व्यं॑ च॒ राधः॑॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि यजमानों से आह्वान किये हुए विद्वान् लोग यज्ञमण्डपों में जाकर जनता को गौऐं, घोड़े और धनादि ऐश्वर्यों के उत्पन्न करने का उपदेश करें॥३॥

ये वा॒यव॑ इन्द्र॒माद॑नास॒ आदे॑वासो नि॒तोश॑नासो अ॒र्यः। घ्नन्तो॑ वृ॒त्राणि॑ सू॒रिभिः॑ ष्याम सास॒ह्वांसो॑ यु॒धा नृभि॑र॒मित्रा॑न्॥

जो सर्वव्यापक परमात्मा पर विश्वास रख कर अन्यायकारियों के दमन के लिए उद्यत होते हैं, वे सदैव विजयलक्ष्मी का लाभ करते हैं अर्थात् उनके गले में विजयलक्ष्मी अवश्यमेव जयमाला पहनाती है॥४॥

आ नो॑ नि॒युद्भिः॑ श॒तिनी॑भिरध्व॒रं स॑ह॒स्रिणी॑भि॒रुप॑ याहि य॒ज्ञम्। वायो॑ अ॒स्मिन्त्सव॑ने मादयस्व यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

इस मन्त्र में परमात्मा ने सैकड़ों और सहस्रों शक्तियोंवाले कर्म्मयोगी विद्वानों के आह्वान करने का उपदेश किया है कि हे यजमानो! तुम अपने यज्ञों में ऐसे विद्वानों को बुलाओ, जिनकी पदार्थविद्या में सैकड़ों प्रकार की शक्तियें हैं, उनको बुलाकर तुम उनसे सदुपदेश सुनो॥५॥यह ९२वाँ सूक्त और १४वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

शुचिं॒ नु स्तोमं॒ नव॑जातम॒द्येन्द्रा॑ग्नी वृत्रहणा जु॒षेथा॑म्। उ॒भा हि वां॑ सु॒हवा॒ जोह॑वीमि॒ ता वाजं॑ स॒द्य उ॑श॒ते धेष्ठा॑॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे विद्वानों! आप यजमानों के यज्ञ को बल देनेवाला तथा कलाकौशल विद्याओं से शीघ्र ही फल का देनेवाला बनायें॥१॥

ता सा॑न॒सी श॑वसाना॒ हि भू॒तं सा॑कं॒वृधा॒ शव॑सा शूशु॒वांसा॑। क्षय॑न्तौ रा॒यो यव॑सस्य॒ भूरेः॑ पृ॒ङ्क्तं वाज॑स्य॒ स्थवि॑रस्य॒ घृष्वेः॑॥

यजमानों को चाहिये कि वे अपने भौतिक तथा आध्यात्मिक यज्ञों में अनुभवी विद्वानों को बुला कर उनसे शिक्षा ग्रहण करें और उनसे ज्ञान और विज्ञान की विद्याओं का काम करायें। यज्ञ का वास्तव में यही फल है कि उससे ज्ञान तथा विज्ञान की वृद्धि हो तथा विद्वानों की सत्सङ्गति और उनका सत्कार हो॥२॥

उपो॑ ह॒ यद्वि॒दथं॑ वा॒जिनो॒ गुर्धी॒भिर्विप्राः॒ प्रम॑तिमि॒च्छमा॑नाः। अर्व॑न्तो॒ न काष्ठां॒ नक्ष॑माणा इन्द्रा॒ग्नी जोहु॑वतो॒ नर॒स्ते॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे यजमानो! तुम ऐसे विद्वानों को अपने यज्ञों में बुलाओ, जो कर्म्म और ज्ञान दोनों प्रकार की विद्या में व्याप्त हों और आत्मिक बल रखने के कारण दृढ़व्रती हों, क्योंकि दृढ़व्रती पुरुष ही अपने लक्ष्य को प्राप्त हो सकता है, अन्य नहीं। इसी अभिप्राय से वेद में अन्यत्र भी कथन किया है कि “अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि” हे परमात्मन्! आप व्रतों के पति हैं, कृपा करके मुझे भी दृढ़व्रती होने की शक्ति दें, ताकि मैं असत्य का त्याग करके सत्य पथ को ग्रहण करूँ। इसी भाव का उपदेश उक्त मन्त्र में किया गया है॥३॥

गी॒र्भिर्विप्रः॒ प्रम॑तिमि॒च्छमा॑न॒ ईट्टे॑ र॒यिं य॒शसं॑ पूर्व॒भाज॑म्। इन्द्रा॑ग्नी वृत्रहणा सुवज्रा॒ प्र नो॒ नव्ये॑भिस्तिरतं दे॒ष्णैः॥

यश और ऐश्वर्य्य के चाहनेवाले लोगों को चाहिये कि कर्म्मयोगी और ज्ञानयोगी पुरुषों को अपने यज्ञों में बुलाएँ और बुलाकर उनसे सुमति की प्रार्थना करें, क्योंकि विद्वानों के सत्कार के बिना किसी देश में भी सुमति उत्पन्न नहीं हो सकती। इसी अभिप्राय से परमात्मा ने इस मन्त्र में विद्वानों से सुमति लेने का उपदेश किया है॥४॥

सं यन्म॒ही मि॑थ॒ती स्पर्ध॑माने तनू॒रुचा॒ शूर॑साता॒ यतै॑ते। अदे॑वयुं वि॒दथे॑ देव॒युभिः॑ स॒त्रा ह॑तं सोम॒सुता॒ जने॑न॥

इस मन्त्र में आध्यात्मिक ज्ञान का उपदेश किया है कि हे विद्वान् पुरुषो! तुम लोग आहार-व्यवहार द्वारा सौम्यस्वभाव बनानेवाले विद्वानों का सङ्ग करो तथा जो पुरुष ज्ञानयोगी हैं, उनकी सङ्गति में रह कर अपने आपको परमात्मपरायण बनाओ॥५॥

इ॒मामु॒ षु सोम॑सुति॒मुप॑ न॒ एन्द्रा॑ग्नी सौमन॒साय॑ यातम्। नू चि॒द्धि प॑रिम॒म्नाथे॑ अ॒स्माना वां॒ शश्व॑द्भिर्ववृतीय॒ वाजैः॑॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे यजमानो! आप लोग ज्ञान-विज्ञान के ज्ञाता विद्वानों को अपनी विज्ञानशालाओं में बुलाएँ, क्योंकि ज्ञान तथा विज्ञान से बढ़कर मनुष्य के मन को प्रसन्न करनेवाली संसार में कोई अन्य वस्तु नहीं, इसलिए तुम विद्वानों की सत्सङ्गति से मन के (सौमनस्य) अर्थात् विज्ञानादि भावों को बढ़ाओ, यही मनुष्यजन्म का सर्वोपरि फल है। सायणाचार्य्य ने यहाँ (मन्त्र) के अर्थ मेरे ही यज्ञ में आने के किये हैं, सो ठीक नहीं, क्योंकि यज्ञान्त में ऋत्विगादि विद्वान् और यजमान मिलकर परमात्मा से पापनिवृत्त्यर्थ यह प्रार्थना करें॥६॥

सो अ॑ग्न ए॒ना नम॑सा॒ समि॒द्धोऽच्छा॑ मि॒त्रं वरु॑ण॒मिन्द्रं॑ वोचेः। यत्सी॒माग॑श्चकृ॒मा तत्सु मृ॑ळ॒ तद॑र्य॒मादि॑तिः शिश्रथन्तु॥

पापों की निवृत्ति पश्चात्ताप से होती है, परमात्मा जिस पर अपनी कृपा करते हैं, वही पुरुष अपने मन से पापों की निवृत्ति के लिये प्रार्थना करता है अर्थात् मनुष्य में परमात्मा की कृपा से विनीतभाव आता है, अन्यथा नहीं। यहाँ सञ्चित और क्रियमाण कर्म्मों की निवृत्ति से तात्पर्य्य है, प्रारब्ध कर्म्मों से नहीं॥७॥

ए॒ता अ॑ग्न आशुषा॒णास॑ इ॒ष्टीर्यु॒वोः सचा॒भ्य॑श्याम॒ वाजा॑न्। मेन्द्रो॑ नो॒ विष्णु॑र्म॒रुतः॒ परि॑ ख्यन्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

इस मन्त्र में इस बात की शिक्षा है कि पुरुष को चाहिये कि वह सत्पुरुषों की सङ्गति से बाहर कदापि न रहे और परमात्मा के आगे हृदय खोल कर निष्पाप होने की सदैव प्रार्थना किया करे, इसी से मनुष्य का कल्याण होता है। केवल अपने उद्योग के भरोसे पर ईश्वर और विद्वान् पुरुषों की (उपेक्षा) अर्थात् उनमें उदासीन दृष्टि कदापि न करे॥८॥यह ९३वाँ सूक्त १६वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इ॒यं वा॑म॒स्य मन्म॑न॒ इन्द्रा॑ग्नी पू॒र्व्यस्तु॑तिः। अ॒भ्राद्वृ॒ष्टिरि॑वाजनि॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि जो लोग अपने विद्वानों के सद्गुणों को वर्णन करते हैं, वे मानों सद्गुणकीर्तनरूप वृष्टि से अङ्कुरों के समान प्रादुर्भाव को प्राप्त होते हैं॥तात्पर्य्य यह है कि जब जिज्ञासु लोगों की वृत्ति विद्वानों के सद्गुणों की ओर लगती है, तब वे स्वयं भी सद्भावसम्पन्न होते हैं और प्रजा में भी सद्भावों की वृष्टि करते हैं, इसलिये प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह विद्वानों के गुणों का कीर्तन करे॥१॥

शृ॒णु॒तं ज॑रि॒तुर्हव॒मिन्द्रा॑ग्नी॒ वन॑तं॒ गिरः॑। ई॒शा॒ना पि॑प्यतं॒ धियः॑॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे विद्वानों! तुम अपने जिज्ञासुओं की वाणियों पर ध्यान दो और उनके कर्मों के सुधार के लिए उनको सदुपदेश दो, ताकि वे सत्कर्मी बन कर संसार का सुधार करें॥२॥

मा पा॑प॒त्वाय॑ नो न॒रेन्द्रा॑ग्नी॒ माभिश॑स्तये। मा नो॑ रीरधतं नि॒दे॥

विद्वानों से मिलकर जिज्ञासुओं को यह प्रार्थना करनी चाहिए कि आपके सङ्ग से हम में ऐसा बल उत्पन्न हो कि हमको शत्रु कभी दबा न सकें और हम कोई ऐसा काम न करें, जिससे हमारी संसार में निन्दा हो और हमारा मन कदापि पाप की ओर न जाये॥३॥

इन्द्रे॑ अ॒ग्ना नमो॑ बृ॒हत्सु॑वृ॒क्तिमेर॑यामहे। धि॒या धेना॑ अव॒स्यवः॑॥

जो लोग विद्वानों के साथ रह कर अपनी वाणी को अनुष्ठानमयी बनाते हैं अर्थात् कर्मयोगी बन कर उक्त विद्वानों की सङ्गति करते हैं, वे संसार में सदैव सुरक्षित होते हैं॥४॥

ता हि शश्व॑न्त॒ ईळ॑त इ॒त्था विप्रा॑स ऊ॒तये॑। स॒बाधो॒ वाज॑सातये॥

जो लोग इस भाव से यज्ञ करते हैं कि उनकी बाधायें निवृत्त होवें, वे अपने यज्ञों में कर्मयोगी, ज्ञानयोगी विद्वानों को अवश्यमेव बुलायें, ताकि उनके सत्सङ्ग द्वारा ज्ञान और कर्म से सम्पन्न होकर सब बाधाओं को दूर कर सकें॥५॥

ता वां॑ गी॒र्भिर्वि॑प॒न्यवः॒ प्रय॑स्वन्तो हवामहे। मे॒धसा॑ता सनि॒ष्यवः॑॥

संसार में अभ्युदय और शोभन साहित्य उन्हीं लोगों का बढ़ता है, जो लोग अपने यज्ञों में सदुपदेष्टा कर्मयोगी और ज्ञानयोगियों को बुलाकर सदुपदेश सुनते हैं॥६॥

इन्द्रा॑ग्नी॒ अव॒सा ग॑तम॒स्मभ्यं॑ चर्षणीसहा। मा नो॑ दुः॒शंस॑ ईशत॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि याज्ञिक लोगो! तुम अपने यज्ञों में ऐसे विद्वानों को बुलाओ, जो दुष्टों के दमन करने और ऐश्वर्य्य के उत्पन्न करने में समर्थ हों॥७॥

मा कस्य॑ नो॒ अर॑रुषो धू॒र्तिः प्रण॒ङ्मर्त्य॑स्य। इन्द्रा॑ग्नी॒ शर्म॑ यच्छतम्॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे जिज्ञासु जनों! तुम अपने विद्वानों से ‘शमविधि’ की शिक्षा लो अर्थात् तुम्हारा मन किसी में भी दुर्भावना का पात्र न बने, किन्तु तुम सबके कल्याण की सदैव इच्छा करो। इस भाव को अन्यत्र भी वर्णन किया है कि “मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्” यजु० तुम सबको मित्रता की दृष्टि से देखो॥८॥

गोम॒द्धिर॑ण्यव॒द्वसु॒ यद्वा॒मश्वा॑व॒दीम॑हे। इन्द्रा॑ग्नी॒ तद्व॑नेमहि॥

उक्त विद्वानों के सदुपदेश से हम सब प्रकार के धनों को प्राप्त हों॥९॥

यत्सोम॒ आ सु॒ते नर॑ इन्द्रा॒ग्नी अजो॑हवुः। सप्ती॑वन्ता सप॒र्यवः॑॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे विद्वानों! आप ऋत्विगादिक विद्वानों के यज्ञों में जाकर उनकी शोभा को अवश्यमेव बढ़ाएँ॥१०॥

उ॒क्थेभि॑र्वृत्र॒हन्त॑मा॒ या म॑न्दा॒ना चि॒दा गि॒रा। आ॒ङ्गू॒षैरा॒विवा॑सतः॥

इस मन्त्र में कर्मयोगी और ज्ञानयोगियों से अज्ञान के नाश करने की प्रार्थना का विधान है॥११॥

ताविद्दुः॒शंसं॒ मर्त्यं॒ दुर्वि॑द्वांसं रक्ष॒स्विन॑म्। आ॒भो॒गं हन्म॑ना हतमुद॒धिं हन्म॑ना हतम्॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे विद्वानों! आप राक्षसी वृत्तिवाले दुष्टाचारी पुरुषों का अपने विद्याबल से नाश करो, क्योंकि अन्यायकारी अधर्म्मात्माओं का दमन विद्याबल से किया जा सकता है, अन्यथा नहीं, अतः आप इस संसार में से पापपिशाच को विद्याबल से भगाओ॥१२॥यह ९४वाँ सूक्त और १८वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र क्षोद॑सा॒ धाय॑सा सस्र ए॒षा सर॑स्वती ध॒रुण॒माय॑सी॒ पूः। प्र॒बाब॑धाना र॒थ्ये॑व याति॒ विश्वा॑ अ॒पो म॑हि॒ना सिन्धु॑र॒न्याः॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यों! ब्रह्मविद्यारूपी नदी सब प्रकार के अज्ञानादि पाप-पङ्कों को बहा ले जाती है और यही नदी भुवनत्रय को पवित्र करती अर्थात् अन्य जो भौतिक नदियें हैं, वे किसी एक प्रदेश को पवित्र करती हैं और यह सबको पवित्र करनेवाली है, इसलिए इसकी उनसे विलक्षणता है। तात्पर्य यह है कि यह विद्यारूपी नदी आध्यात्मिक पवित्रता का संचार और भौतिक नदी बाह्य पवित्रता का संचार करती है। कई एक टीकाकारों ने सरस्वती शब्द के वास्तविक अर्थ को न समझ कर यहाँ भौतिक नदी के अर्थ किये हैं। उन्होंने अत्यन्त भूल की है, जो निघण्टु में ५७ प्रकार के वाणी के अर्थों में रहते हुए भी सरस्वती शब्द को एक जल-नदी के अर्थों में लगा दिया। इस प्रकार की भारी भूलों के भर जाने से ही वेदार्थ कलङ्कित हो रहा है। अस्तु, सरस्वती शब्द से यहाँ ब्रह्मविद्यारूपी ग्रहण है। मालूम होता है कि वेद के ऐसे गूढ़ स्थलों को न समझने से ही भारतवर्ष में नदियों की पूजा होने लग गयी॥१॥

एका॑चेत॒त्सर॑स्वती न॒दीनां॒ शुचि॑र्य॒ती गि॒रिभ्य॒ आ स॑मु॒द्रात्। रा॒यश्चेत॑न्ती॒ भुव॑नस्य॒ भूरे॑र्घृ॒तं पयो॑ दुदुहे॒ नाहु॑षाय॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यों! ये भौतिक नदियें केवल सांसारिक धनों को और संसार में सुखदायक जल तथा दुग्धादि पदार्थों को देती हैं और विद्यारूपी सरस्वती आध्यात्मिक धन और ऐश्वर्य्य को देनेवाली है। बहुत से टीकाकारों ने इस मन्त्र के अर्थ इस प्रकार किये हैं कि सरस्वती नदी नहुष राजा के यज्ञ करने के लिए संसार में आयी अर्थात् जिस प्रकार यह जनप्रवाद है कि भगीरथ के तप करने से भागीरथी गङ्गा निकली, यह भी इसी प्रकार का एक अर्थवादमात्र है, क्योंकि यदि यह भी भागीरथी के समान आती, तो इसका नाम भी नाहुषी होना चाहिए था। अस्तु, इस प्रकार की कल्पित अनेक कथायें अज्ञान के समय में वेदार्थ में भर दी गयीं, जिनका वेदों में गन्ध भी नहीं, क्योंकि ‘नहुष’ शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है कि “नह्यति कर्मसु इति नहुषस्तदपत्यं नाहुषः” इससे ‘नाहुष’ शब्द का अर्थ यहाँ मनुष्यसन्तान है, कोई राजा विशेष नहीं। इसी से निरुक्तकार ने भी कहा है कि वेदों में शब्द यौगिक और योगरूढ़ हैं, केवल रूढ़ नहीं। इस बात को सायण ने भी अपनी भूमिका में माना है, फिर न मालूम क्यों, यहाँ राजा विशेष मान कर एक कल्पित कथा भर दी॥२॥

स वा॑वृधे॒ नर्यो॒ योष॑णासु॒ वृषा॒ शिशु॑र्वृष॒भो य॒ज्ञिया॑सु। स वा॒जिनं॑ म॒घव॑द्भ्यो दधाति॒ वि सा॒तये॑ त॒न्वं॑ मामृजीत॥

सरस्वती विद्या से उत्पन्न हुआ प्रबोधरूप पुत्र स्त्री-पुरुष को संस्कार करके देवता बनाता है और यज्ञकर्मा लोगों को याज्ञिक बनाता है। बहुत क्या, जो युद्धों में आत्मत्याग करके शूरवीर बनते हैं, उनको इतने साहसी और निर्भीक एकमात्र सरस्वती विद्या से उत्पन्न हुआ प्रबोधरूप पुत्र ही शूरवीर बनाता है, अन्य नहीं॥३॥

उ॒त स्या नः॒ सर॑स्वती जुषा॒णोप॑ श्रवत्सु॒भगा॑ य॒ज्णे अ॒स्मिन्। मि॒तज्ञु॑भिर्नम॒स्यै॑रिया॒ना रा॒या यु॒जा चि॒दुत्त॑रा॒ सखि॑भ्यः॥

सरस्वती विद्या यदि संयमी पुरुषों द्वारा अर्थात् सदाचारी पुरुषों द्वारा उपदेश की जाय, तो पुरुष को ऐश्वर्य्यशाली बनाती है, सदा के लिए अभ्युदयसम्पन्न करती है॥४॥

इ॒मा जुह्वा॑ना यु॒ष्मदा नमो॑भिः॒ प्रति॒ स्तोमं॑ सरस्वति जुषस्व। तव॒ शर्म॑न्प्रि॒यत॑मे॒ दधा॑ना॒ उप॑ स्थेयाम शर॒णं न वृ॒क्षम्॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि, हे याज्ञिक पुरुषो! तुम इस प्रकार विद्यारूप कल्पवृक्ष का सेवन करो, जिस प्रकार धूप से संतप्त पक्षिगण आकर छायाप्रद वृक्ष का आश्रयण करते हैं एवं आप इस सरस्वती विद्या का सब प्रकार से आश्रयण करें॥५॥

अ॒यमु॑ ते सरस्वति॒ वसि॑ष्ठो॒ द्वारा॑वृ॒तस्य॑ सुभगे॒ व्या॑वः। वर्ध॑ शुभ्रे स्तुव॒ते रा॑सि॒ वाजा॑न्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

जो लोग विद्या को चाहते हैं और प्रतिदिन विद्या में रत हैं, उनके ब्रह्मविद्यारूप यज्ञ के दरवाजे खुल जाते हैं तथा वे सब प्रकार के सुखों को प्राप्त होते हैं॥६॥यह ९५वाँ सूक्त और १९वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

बृ॒हदु॑ गायिषे॒ वचो॑ऽसु॒र्या॑ न॒दीना॑म्। सर॑स्वती॒मिन्म॑हया सुवृ॒क्तिभिः॒ स्तोमै॑र्वसिष्ठ॒ रोद॑सी॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे विद्वन् लोगों! आपके लिये पूजायोग्य एकमात्र सरस्वती विद्या है, उसकी पूजा करनेवाला विद्वान् कदापि अवनति को प्राप्त नहीं होता, किन्तु सदैव अभ्युदय को प्राप्त होता है। तात्पर्य यह है कि सत्कर्तव्य एकमात्र परमात्मा का ज्ञान है, उसी का नाम (ब्रह्मविद्या) सरस्वती व ज्ञान है, क्योंकि विद्या, ज्ञान, सरस्वती ये तीनों पर्य्याय शब्द हैं। परमात्मा का ज्ञान तादात्म्यसम्बन्ध से परमात्मा में रहता है, इसलिये वह भी परमात्मा का रूप है, इसलिये यहाँ जड़ोपास्ति का दोष नहीं आता॥१॥

उ॒भे यत्ते॑ महि॒ना शु॑भ्रे॒ अन्ध॑सी अधिक्षि॒यन्ति॑ पू॒रवः॑। सा नो॑ बोध्यवि॒त्री म॒रुत्स॑खा॒ चोद॒ राधो॑ म॒घोना॑म्॥

भ॒द्रमिद्भ॒द्रा कृ॑णव॒त्सर॑स्व॒त्यक॑वारी चेतति वा॒जिनी॑वती। गृ॒णा॒ना ज॑मदग्नि॒वत्स्तु॑वा॒ना च॑ वसिष्ठ॒वत्॥

सरस्वती ब्रह्मविद्या जो सब ज्ञानों का स्रोत है, वह यदि ऋषि-मुनियों के समान स्तुति की जाय, अर्थात् उनके समान यह भी ध्यान का विषय बनाई जाय, तो मनुष्य के लिये फलदायक होती है। ‘जमदग्नि’ यहाँ कोई ऋषिविशेष नहीं, किन्तु “जमन् अग्निरिव” जो जमन् प्रकाश करता हुआ अग्नि के समान देदीप्यमान हो अर्थात् तेजस्वी और ब्रह्मवर्चस्वी हो, उसको ‘जमदग्नि’ कहते हैं, एवम् ‘वसिष्ठ’ यह नाम भी वेद में गुणप्रधान है, व्यक्तिप्रधान नहीं, जैसा कि “धर्मादिकर्तव्येषु अतिशयेन वसतीति वसिष्ठः” जो धर्मादि कर्तव्यों के पालन करने में रहे अर्थात् जो अपने यम-नियमादि व्रतों को कभी भङ्ग न करे, उसका नाम यहाँ ‘वसिष्ठ’ है॥तात्पर्य यह है कि जो पुरुष उक्त विद्वानों के समान विद्या को पूजनार्ह और सत्कर्तव्य समझता है, वह इस संसार में कृतकार्य होता है, अन्य नहीं॥३॥

ज॒नी॒यन्तो॒ न्वग्र॑वः पुत्री॒यन्तः॑ सु॒दान॑वः। सर॑स्वन्तं हवामहे॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे पुरुषो! तुम ब्रह्मज्ञान का आवाहन करो, जो विद्यारूपी सरस्वती माता से उत्पन्न होता है और सम्पूर्ण प्रकार के अनिष्टों को दूर करनेवाला है, परन्तु उसके पात्र वे पुरुष बनते हैं, जो उदारता के भाव और वेदरूपी विद्या के अधिकारी हों, अर्थात् जिनके मल-विक्षेपादि दोष सब दूर हो गये हों और यम-नियमादि सम्पन्न हों, वे ही ब्रह्मज्ञान के अधिकारी होते हैं, अन्य नहीं, या यों कहो कि जो अङ्ग और उपाङ्गों के साथ वेद का अध्ययन करते और यम-नियमादिसम्पन्न होते हैं॥४॥

ये ते॑ सरस्व ऊ॒र्मयो॒ मधु॑मन्तो घृत॒श्चुतः॑। तेभि॑र्नोऽवि॒ता भ॑व॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यों! ब्रह्मविद्यारूपी सरित् की लहरें अत्यन्त मीठी है और आप विद्याप्राप्ति के लिये सदैव यह विनय किया करें कि वह विद्या अपने विचित्र भावों से आपकी रक्षक बने॥५॥

पी॒पि॒वांसं॒ सर॑स्वतः॒ स्तनं॒ यो वि॒श्वद॑र्शतः। भ॒क्षी॒महि॑ प्र॒जामिष॑म्॥

जीव प्रार्थना करता है कि हे परमात्मन्! मैं ब्रह्मविद्या के स्तन का पान करूँ, जिस अमृत को पीकर पुरुष दिव्यदृष्टि हो जाता है और संसार के सब ऐश्वर्यों के भोगने योग्य बनता है॥६॥यह ९६वाँ सूक्त और २०वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

य॒ज्ञे दि॒वो नृ॒षद॑ने पृथि॒व्या नरो॒ यत्र॑ देव॒यवो॒ मद॑न्ति। इन्द्रा॑य॒ यत्र॒ सव॑नानि सु॒न्वे गम॒न्मदा॑य प्रथ॒मं वय॑श्च॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे जिज्ञासु जनों! तुम उपासनारूप यज्ञों में परस्पर मिल कर उपासना करो और द्युलोक द्वारा विमानों पर आये हुये विद्वानों का आप भली भाँति सत्कार करें। यहाँ जो ‘सुन्वे’ उत्तम पुरुष का एकवचन देकर जीव की ओर से प्रार्थना कथन की गयी है, यह शिक्षा का प्रकार है, अर्थात् जीव की ओर से यह परमात्मा का वचन है। यही प्रकार “अग्निमीळे पुरोहितम्” ऋक् १, १ १। “मैं परमात्मा की स्तुति करता हूँ” इत्यादि मन्त्रों में भी दर्शाया गया है। इससे यह सन्देह सर्वथा निर्मूल है कि यह वाक्य जीवनिर्मित है, ईश्वरनिर्मित नहीं, क्योंकि उपासना प्रार्थना के विषय में सर्वत्र जीव की ओर से प्रार्थना बतलायी गयी हैं। अन्य उत्तर इसका यह भी कि ग्रन्थ में पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष दोनों ही ग्रन्थकर्त्ता की ओर से होते हैं, फिर भी पूर्वपक्ष अन्य की ओर से और उत्तरपक्ष ग्रन्थकर्त्ता की तरफ से कथन किया जाता है। यही प्रकार यहाँ भी है और ऋग्वेद के दशवें मण्डल के अन्त में “सङ्गच्छध्वम् संवदध्वं”॥ऋ. मं. १० सू. १९१-२॥यह तुम्हारा मन्तव्य और कर्तव्य एक सा हो और “समानी व आकूतिः समाना   हृदयानि वः”॥ऋ, १०।१।९१।४॥तुम्हारा भाषण और तुम्हारे हृदय एक से हों, इस स्थल में ईश्वर ने अपनी ओर से विधिवाद को स्पष्ट कर दिया, जिसमें गन्धमात्र भी सन्देह नहीं॥१॥

आ दैव्या॑ वृणीम॒हेऽवां॑सि॒ बृह॒स्पति॑र्नो मह॒ आ स॑खायः। यथा॒ भवे॑म मी॒ळ्हुषे॒ अना॑गा॒ यो नो॑ दा॒ता प॑रा॒वतः॑ पि॒तेव॑॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यों! तुम उस बृहस्पति की उपासना करो, जो तुमको सब विघ्नों से बचाता है और पिता के समान रक्षा करता है। इस मन्त्र में बृहस्पति शब्द परमात्मा के लिये आया है, जैसा कि “शन्नो मित्रः शं वरुणः शन्नो भवत्वर्यमा। शन्न इन्द्रो बृहस्पतिः शन्नो विष्णुरुरुक्रमः” यजुः ३६।९॥इस मन्त्र में ‘बृहस्पति’ शब्द परमात्मा के अर्थ में है॥२॥

तमु॒ ज्येष्ठं॒ नम॑सा ह॒विर्भिः॑ सु॒शेवं॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिं॑ गृणीषे। इन्द्रं॒ श्लोको॒ महि॒ दैव्यः॑ सिषक्तु॒ यो ब्रह्म॑णो दे॒वकृ॑तस्य॒ राजा॑॥

इस मन्त्र में इस बात का उपदेश किया गया है कि वेदप्रकाशक परमात्मा ही एकमात्र पूजनीय है, उसको छोड़ कर ईश्वरत्वेन और किसी की उपासना नहीं करनी चाहिये॥३॥

स आ नो॒ योनिं॑ सदतु॒ प्रेष्ठो॒ बृह॒स्पति॑र्वि॒श्ववा॑रो॒ यो अस्ति॑। कामो॑ रा॒यः सु॒वीर्य॑स्य॒ तं दा॒त्पर्ष॑न्नो॒ अति॑ स॒श्चतो॒ अरि॑ष्टान्॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे पुरुषो! तुम उस परमदेव को अपने   हृदयमन्दिर में स्थान दो, जो सबका एकमात्र उपास्यदेव है और इस निखिल ब्रहमाण्ड की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय करता है॥४॥

तमा नो॑ अ॒र्कम॒मृता॑य॒ जुष्ट॑मि॒मे धा॑सुर॒मृता॑सः पुरा॒जाः। शुचि॑क्रन्दं यज॒तं प॒स्त्या॑नां॒ बृह॒स्पति॑मन॒र्वाणं॑ हुवेम॥

जो परमात्मा स्वतःप्रकाश और जन्ममरणादि धर्मरहित है अर्थात् नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव है, उसको हम अपने शुद्ध अन्तःकरण में धारण करें। तात्पर्य यह है कि जब मन मल-विक्षेपादि दोषों से रहित हो जाता है, तब उसे ब्रह्म की अवगति अर्थात् ब्रह्मप्राप्ति होती है और ब्रह्मप्राप्ति के अर्थ यहाँ ज्ञानद्वारा प्राप्ति के है, देशान्तर प्राप्ति के नहीं। इस बात को भलीभाँति निम्नलिखित मन्त्र में वर्णन किया गया है॥५॥

तं श॒ग्मासो॑ अरु॒षासो॒ अश्वा॒ बृह॒स्पतिं॑ सह॒वाहो॑ वहन्ति। सह॑श्चि॒द्यस्य॒ नील॑वत्स॒धस्थं॒ नभो॒ न रू॒पम॑रु॒षं वसा॑नाः॥

श्रवण, मनन, निदिध्यासनादि साधनों से संस्कृत हुई अन्तःकरण की वृत्तियाँ उस नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव ब्रह्म को प्राप्त कराती हैं, जो सर्वव्यापक और शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदि गुणों से रहित है और कोटानुकोटि ब्रह्माण्ड जिसके एकदेश में जीवों के घोंसलों के समान एक समान एक प्रकार की तुच्छ सत्ता से स्थिर है। इस मन्त्र में उस भाव को विशाल किया है, जिसको “एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्च पूरुषः। पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि”॥ ऋ. १०।९०।३॥। इस मन्त्र में वर्णन किया है कि कोटानुकोटि ब्रह्माण्ड उस परमात्मा के एकदेश में क्षुद्र जन्तु के घोंसले के समान स्थिर है, अथवा यों कहो कि “युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परितस्थुषः; रोचन्ते रोचना दिवि”। मं. १। सू. ६। १। जो योगी लोग सर्वव्यापक परमात्मा को योगज सामर्थ्य से अनुभव करते हैं अर्थात् योग की वृत्ति द्वारा उस परमात्मा का मनन करते हैं, वे ब्रह्म के प्रकाश को लाभ करके तेजस्वी और ब्रह्मवर्चस्वी बनते हैं॥६॥

स हि शुचिः॑ श॒तप॑त्रः॒ स शु॒न्ध्युर्हिर॑ण्यवाशीरिषि॒रः स्व॒र्षाः। बृह॒स्पतिः॒ स स्वा॑वे॒श ऋ॒ष्वः पु॒रू सखि॑भ्य आसु॒तिं करि॑ष्ठः॥

उक्तगुणसम्पन्न परमात्मा अपने भक्तों को आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक तीनों तापों को मिटा कर अति ऐश्वर्य प्रदान करता है॥७॥

दे॒वी दे॒वस्य॒ रोद॑सी॒ जनि॑त्री॒ बृह॒स्पतिं॑ वावृधतुर्महि॒त्वा। द॒क्षाय्या॑य दक्षता सखायः॒ कर॒द्ब्रह्म॑णे सु॒तरा॑ सुगा॒धा॥

इस मन्त्र में द्युलोक और पृथिवीलोक के बृहस्पति परमात्मा को द्योतक वर्णन किया है, अर्थात् पृथिव्यादि लोक उसकी सत्ता को बोधन करते हैं। यहाँ ‘जनित्री’ के ये अर्थ हैं कि इसका आविर्भाव (प्रकट) करते हैं और ब्रह्म शब्द के अर्थ जो यहाँ सायणाचार्य ने अन्न के किये हैं, वह सर्वदा वेदाशय के विरुद्ध है, क्योंकि इसी सूक्त में ब्रह्मणस्पति शब्द में ब्रह्म के अर्थ वेद के आ चुके हैं, फिर यहाँ अन्न के अर्थ कैसे ? यूरोपदेशनिवासी मोक्षमूलर भट्ट, मिस्टर विल्सन और ग्रिफिथ साहब ने भी इस मन्त्र के अर्थ यही किये हैं कि द्युलोक और पृथिवीलोक ने बृहस्पति को पैदा किया। यह अर्थ वैदिक प्रक्रिया से सर्वथा विरुद्ध है, अस्तु॥इसका बलपूर्वक खण्डन हम निम्नलिखित मन्त्र में करेंगे॥८॥

इ॒यं वां॑ ब्रह्मणस्पते सुवृ॒क्तिर्ब्रह्मेन्द्रा॑य व॒ज्रिणे॑ अकारि। अ॒वि॒ष्टं धियो॑ जिगृ॒तं पुरं॑धीर्जज॒स्तम॒र्यो व॒नुषा॒मरा॑तीः॥

इस मन्त्र में ब्रह्मणस्पति शब्द उसी वेदपति परमात्मा के लिये प्रयुक्त हुआ है, जिसका वर्णन इस सूक्त के कई एक मन्त्रों में प्रथम भी आ चुका है।ब्रह्मणस्पति के अर्थ वेद के पति हैं अर्थात् आदिसृष्टि में ब्रह्मवेदविद्या का दाता एकमात्र परमात्मा था, इसी अभिप्राय से परमात्मा को (ब्रह्म) वेद का पति कथन किया गया है॥यद्यपि ब्रह्मशब्द के अर्थ प्रकृति के भी हैं, ब्रह्म बड़े को भी कहते हैं, इस प्रकार पृथिव्यादि लोक-लोकान्तरों का नाम भी ब्रह्म है, तथापि मुख्य नाम ब्रह्म परमात्मा का ही है, जैसा कि “तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः। तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म”। यजु० अ० ३२।१॥इसमें अग्नि, आदित्य, वायु, चन्द्रमा, शुक्र, ब्रह्म ये सब परमात्मा के नाम हैं। एवं “यो भूतञ्च भव्यञ्च सर्वं यश्चाधितिष्ठति। स्वर्यस्य च केवलं तस्मै ज्यैष्ठाय ब्रह्मणे नमः“॥ अथ० १०।८।४।१॥यहाँ (ज्येष्ठ) सबसे बड़ा ब्रह्म कह कर ब्रह्म शब्द को ब्रह्मवाचक सिद्ध किया है। एवं “देवास्तं सर्वे धूर्वन्तु ब्रह्म वर्म्म ममान्तरम्”॥साम० ९।२१।३॥इस मन्त्र में ब्रह्म शब्द ईश्वर के लिये आया है। मन्त्र का तात्पर्य यह है कि जो लोग अपनी रक्षा आप नहीं करते, वा यों कहो कि अपनी सेना को आप मारते हैं वा कायरता दिखलाते हैं, ऐसे सैनिकों को विद्वान् लोग नष्ट करें और यह प्रार्थना करें कि परमात्मा (वर्म्म) कवच के समान हमारा रक्षक हो। परमात्मा के सहारे से ही सब शुभ कामों की सिद्धि आस्तिक पुरुषों को रखनी चाहिये, केवल अपने उद्योग से नहीं।इसी प्रकार का मन्त्र ऋग्वेद मं० ६ सू० ७१ संख्या १९ में है। यहाँ भी “ब्रह्म वर्म ममान्तरम्” यह पाठ है। यहाँ भी सूक्त की समाप्ति में परमात्मा को रक्षक माना गया है, किसी अन्य वस्तु को नहीं।जो लोग यह कहा करते हैं कि ऋग्वेद में ब्रह्म शब्द ईश्वर के अर्थों में नहीं आया, उनको उक्त मन्त्र से ज्ञानलाभ करना चाहिये, क्योंकि उक्त मन्त्र में ब्रह्म शब्द ईश्वर के अर्थ में स्पष्ट है।जिन लोगों ने आजकल वेदों की हिंसा करके उनको निष्कलङ्क बनाने पर कमर बाँधी है, उन्होंने उक्त मन्त्र को सामवेदसंहिता से उड़ा दिया, क्योंकि उनके परिवार में यह मन्त्र ऋग्वेद में आ चुका।पहले तो यह कथन ही सर्वथा मिथ्या है कि यह मन्त्र पूर्णाङ्गतया ऋग्वेद में आ चुका, क्योंकि ऋग्वेद में “ब्रह्म वर्म ममान्तरम्” इतने पर समाप्त है और सामवेद में “शर्म वर्म ममान्तरम्” इतना और है, जिसके अर्थ वाक्यभेद से सर्वथा भिन्न हैं अर्थात् “योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः”।अथर्व० ३।।६।२७।१॥जब यह अन्य वाक्य के साथ मिलकर आने से छह वार आने पर भी पुनरुक्त नहीं, तो फिर भी उक्त सामवेद का मन्त्र क्यों पुनरुक्ति के दोष से दूषित किया जाता है।अन्य उत्तर यह है कि ऋग्वेद में यह मन्त्र योद्धाओं के प्रकरण में आया है और सामवेद में ईश्वर के प्रकरण में है। इस प्रकार प्रकरणभेद से भी अर्थ भिन्न हैं। अस्तु, इस विषय को हम वेदमर्यादा में बहुत लिख आए है। यहाँ मुख्य प्रसङ्ग यह है कि जो लोग ब्रह्म शब्द के अर्थ वेदों में ईश्वर के नहीं मानते, किन्तु स्तोत्र वा गीत के ही मानते हैं, उनके मत के निरास के लिये उक्त मन्त्र का उदाहरण दिया गया।प्रायः यूरोपनिवासी विद्वानों का यह विचार है कि ब्रह्म शब्द केवल औपनिषद समय में आकर सर्वव्यापक ब्रह्म शब्द के अर्थों में लिया गया, पहले नहीं।इसका समाधान एक प्रकार से तो हम चारों वेदों का एक-एक मन्त्र प्रमाण दे कर आए, परन्तु विशेषरीति से समाधान यह है कि यदि वैदिक समय में ब्रह्म शब्द का प्रयोग सर्वव्यापक ब्रह्म में नहीं मानो, तो “यो भूतं च भव्यं च सर्वं यश्चाधितिष्ठति। स्वर्यस्य च केवलं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः”॥अथर्व  १०।८।।४।१॥में तीनों कालों में रस और सब से बड़ा ब्रह्म शब्द का अर्थ क्यों माना जाता ? इसी आधार को लेकर उपनिषदों में “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म॥तै० २।१॥“प्रज्ञानं ब्रह्म” ऐ० ३।१॥“विज्ञानमानन्दं ब्रह्म”॥बृ० ३।९।१८॥“ब्रह्मैवेदं विश्वं”॥मु०। २।११॥“सर्वं खल्विदं ब्रह्म”॥छा०  ३।१४।१॥“तपसा चीयते ब्रह्म”॥मु० १।१।८॥“यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्त्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्”॥मु० ३।३॥इत्यादि वाक्यों में ब्रह्म का निरूपण किया है। यह ब्रह्मनिरूपण एकमात्र वेद के आधार पर है, इसी अभिप्रायः से ब्रह्मविद्या वेदमूलक मानी गई है।केवल उपनिषदों में ही ब्रह्म का निरूपण नहीं, किन्तु जो प्रमाण १ प्रथम ऋग्वेद के मं० ६ का दिया गया है, उससे स्पष्ट सिद्ध है कि ब्रह्म नाम वेद में भी सर्वोपरि विश्वकर्त्ता जगदीश्वर का है।इसलिये कतिपय मन्त्रों में ब्रह्मणस्पति आ जाने से यह सन्देह नहीं करना चाहिये कि जब ब्रह्म का पति कोई और हुआ तो ब्रह्म शब्द ईश्वर के अर्थ नहीं देता ? किन्तु उक्त स्थान में यह स्पष्ट है कि यहाँ ब्रह्म नाम वेद का है। यों तो “यस्य ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत ओदनः”॥कठ० १।२।१५॥यहाँ ब्रह्म शब्द ब्राह्मण स्वभाववाले वर्ण के लिये भी आता है, एवं “तदेतद् ब्रह्म क्षत्रं विट् शूद्रः॥” बृ०। १।४।१५॥यहाँ भी वर्णवाची ब्रह्म शब्द है, परन्तु इससे यह कदापि सिद्ध नहीं होता कि प्रथम ब्रह्म शब्द जात्यादिकों का वाची ही था और बहुत देर बाद ईश्वरवाची समझा गया, अस्तु। यह कल्पना सर्वथा युक्तिहीन और निराधार है।यदि जातिवाचक भी ब्रह्म शब्द समझा जाय, तो आपत्ति यह है कि ब्राह्मण तो उसका अपत्य हुआ पर उससे प्रथम ब्रह्म क्या था ? यदि कहो कि वह भी जातिवाचक था, तो प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि वह किससे उत्पन्न होने के कारण ब्रह्म कहलाया ? यदि कहो कि वह तो गुणवाचक शब्द है अर्थात् जिसमें बड़प्पन है, उसका नाम ब्रह्म है, तो फिर ब्राह्मण शब्द गुणवाची क्यों नहीं अर्थात् जिसका (ब्रह्म) वेद वा ईश्वर से सम्बन्ध हो, उसको ब्राह्मण कहते हैं, जैसा कि ‘शतपथब्राह्मण’ यहाँ ब्राह्मण शब्द के अर्थ होते हैं कि ‘ब्रह्मण इदं ब्राह्मणम्’ जो ब्रह्म से सम्बन्ध रखता हो। यहाँ व्याकरण की रीति से “तस्येदम्” ॥४।३।।१२०॥इस सूत्र से अण् प्रत्यय है। यदि कहो कि “ब्राह्मोऽजातौ” अष्टा०  ६।४।१७१॥इस सूत्र से जातिभिन्नार्थ में सर्वत्र टि का लोप हो जाता है, तो ‘शतपथब्राह्मण’ यहाँ क्यों न हुआ। अस्तु, कुछ हो टि का लोप हो वा न हो, पर ब्राह्मण शब्द का प्रयोग तो जाति से भिन्नार्थ में भी पाया जाता है, जैसा कि ‘मण्डूका ब्राह्मणाः’॥मं०  ७। सू० १०३॥में पाया जाता है। क्या कोई कह सकता है कि यहाँ भी टि का अलुक् जाति मान कर हुआ है, कदापि नहीं।एवं सूक्ष्म विवेचना करने से सिद्ध यह हुआ कि ब्रह्म शब्द के मुख्यार्थ ईश्वर और गौणार्थ वेद और प्रकृत्यादि अन्य पदार्थ भी हैं।इसी अभिप्राय से गीता में कृष्णजी कहते हैं कि “मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्”॥गी० २४।।३॥इस प्रकार यहाँ ब्रह्मणस्पति के अर्थ प्रकृति के अधिपति के भी लिये गये॥और बात यह है कि इस सूक्त में ब्रह्मणस्पति और बृहस्पति का समानाधिकरण्य अर्थात् एक अर्थवाची दोनों शब्द हैं, फिर बृहस्पति को द्युलोक और प्रकृति को पृथिवीलोक कैसे पैदा कर सकता है ?यदि यह कहा जाय कि ‘जनित्री’ यह विशेषण द्युलोक और पृथिवीलोक को दिया गया है अर्थात् पृथिवीलोक और द्युलोक दोनों बृहस्पति के पैदा करनेवाले हैं, यह अर्थलाभ होता है, फिर बृहस्पति को पैदा करनेवाले द्युलोक और पृथिवीलोक क्यों न माने जायें ? इसका उत्तर यह है कि “प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा विजायते” इस मन्त्र में ब्रह्म को अजन्मा मान कर फिर यह कहा कि ‘बहुधा विजायते’ अर्थात् फिर ‘जनी प्रादुर्भावे’ का प्रयोग दिया है, इससे स्पष्ट सिद्ध होता है कि जनित्री वा जायमान के अर्थ प्रादुर्भाव के हैं, जिसके सरल भाषा में अर्थ प्रकट होना किये जा सकते हैं। सिद्ध यह हुआ कि द्युलोक और पृथिवीलोक ने परमात्मा के महत्त्व को सिद्ध किया। इसी अभिप्राय से अथर्ववेद में कहा है कि “यस्य भूमिः प्रमान्तरिक्षमुतोदरम्”॥१०।४।३२॥अर्थात् पृथिव्यादि लोक उसके ज्ञान के साधन हैं। इस बात को महर्षि व्यास ने “जन्माद्यस्य यतः” इस दूसरे सूत्र में वर्णन किया है कि इस चराचर संसार की उत्पत्ति, स्थिति, तथा प्रलय जिस बृहस्पति परमात्मा से होती है, उसको ब्रह्म कहते हैं॥९॥

बृह॑स्पते यु॒वमिन्द्र॑श्च॒ वस्वो॑ दि॒व्यस्ये॑शाथे उ॒त पार्थि॑वस्य। ध॒त्तं र॒यिं स्तु॑व॒ते की॒रये॑ चिद्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे पुरुषो! तुम उस बृहस्पति सर्वोपरि ब्रह्म की उपासना करो, जिसने द्युलोक और पृथिवीलोक के सब ऐश्वर्यों को उत्पन्न किया है और उसी से सब प्रकार के धन और ऐश्वर्यों की प्रार्थना करते हुए कहो कि हे परमात्मा! आप मङ्गलवाणियों से हमारी सदैव रक्षा करें॥१०॥यह ९७वाँ सूक्त और २२वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अध्व॑र्यवोऽरु॒णं दु॒ग्धमं॒शुं जु॒होत॑न वृष॒भाय॑ क्षिती॒नाम्। गौ॒राद्वेदी॑याँ अव॒पान॒मिन्द्रो॑ वि॒श्वाहेद्या॑ति सु॒तसो॑ममि॒च्छन्॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे ऋत्विग् लोगों! आप निखिल संसार के पति परमात्मा की उपासना करो और सुन्दर-सुन्दर पदार्थों से हवन करते हुए अपने स्वभाव को सौम्य बनाने की इच्छा करो। इस मन्त्र में परमात्मा ने सौम्य स्वभाव बनाने का उपदेश किया, अर्थात् जो विद्वान् शीलसम्पन्न होता है, वही अपने लक्ष्य को प्राप्त होता है, अन्य नहीं, इस भाव का यहाँ वर्णन किया गया॥१॥

यद्द॑धि॒षे प्र॒दिवि॒ चार्वन्नं॑ दि॒वेदि॑वे पी॒तिमिद॑स्य वक्षि। उ॒त हृ॒दोत मन॑सा जुषा॒ण उ॒शन्नि॑न्द्र॒ प्रस्थि॑तान्पाहि॒ सोमा॑न्॥

केवल सोम द्रव्य के पीने से ही शील उत्तम स्वभाव नहीं बन सकता, इसलिये यह कथन किया है कि हे विद्वन्! आप सौम्य स्वभाव का उपदेश करके लोगों में शान्ति फैलावें॥२॥

ज॒ज्ञा॒नः सोमं॒ सह॑से पपाथ॒ प्र ते॑ मा॒ता म॑हि॒मान॑मुवाच। एन्द्र॑ पप्राथो॒र्व१॒॑न्तरि॑क्षं यु॒धा दे॒वेभ्यो॒ वरि॑वश्चकर्थ॥

इस मन्त्र में इस बात का उपदेश किया गया है कि जो पुरुष प्रथम माता से शिक्षा उपलब्ध करता है तथा वैदिक संस्कारों द्वारा अपने स्वभाव को सुन्दर बनाता है, वह सर्वोत्तम विद्वान् होकर इस संसार में अपने यश को फैलाता है और वेदानुयायी पुरुषों के ऐश्वर्य को बढ़ाता है॥३॥

यद्यो॒धया॑ मह॒तो मन्य॑माना॒न्त्साक्षा॑म॒ तान्बा॒हुभिः॒ शाश॑दानान्। यद्वा॒ नृभि॒र्वृत॑ इन्द्राभि॒युध्या॒स्तं त्वया॒जिं सौ॑श्रव॒सं ज॑येम॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि जो पुरुष न्यायशील होकर अन्यायकारी शत्रुओं को दमन करने का बल माँगते हैं, उनको मैं अनन्त बल देता हूँ, ताकि वे अन्यायकारी हिंसकों का नाश कर संसार में धर्म और न्याय का राज्य फैलावें॥४॥

प्रेन्द्र॑स्य वोचं प्रथ॒मा कृ॒तानि॒ प्र नूत॑ना म॒घवा॒ या च॒कार॑। य॒देददे॑वी॒रस॑हिष्ट मा॒या अथा॑भव॒त्केव॑लः॒ सोमो॑ अस्य॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे विद्वानों! जो पुरुष आसुरी माया के बन्धन ने नहीं आता, उसके बल और यश को सम्पूर्ण संसार वर्णन करता है और उसकी दृढ़ता और परमात्मपरायणता उसको आपत् समय में भी सहायता देती है, इसलिये तुम ऐसा व्रत धारण करो कि छल, कपट, दम्भ के कदापि वशीभूत न होओ। इस दृढ़ता के लिये मैं तुम्हारा सहायक होऊँगा॥५॥

तवे॒दं विश्व॑म॒भितः॑ पश॒व्यं१॒॑ यत्पश्य॑सि॒ चक्ष॑सा॒ सूर्य॑स्य। गवा॑मसि॒ गोप॑ति॒रेक॑ इन्द्र भक्षी॒महि॑ ते॒ प्रय॑तस्य॒ वस्वः॑॥

हे परमात्मन्! आप सम्पूर्ण विश्व के प्रकाशक हैं और आपका यह संसार प्राणिमात्र के लिये सुखदायक है, जो कुछ हम इसमें दुःखप्रद अर्थात् दुःखदायक देखते हैं, वह सब हमारे ही अज्ञान का फल है॥६॥

बृह॑स्पते यु॒वमिन्द्र॑श्च॒ वस्वो॑ दि॒व्यस्ये॑शाथे उ॒त पार्थि॑वस्य। ध॒त्तं र॒यिं स्तु॑व॒ते की॒रये॑ चिद्यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

यहाँ परमात्मा में जो द्विवचन दिया है, वह इन्द्र और बृहस्पति के भिन्न-भिन्न होने के अभिप्राय से नहीं, किन्तु उत्पत्ति और स्थिति इन दो शक्तियों के अभिप्राय से अर्थात् स्वामित्व और प्रकाशकत्व इन दो शक्तियों के अभिप्राय से है, व्यक्तिभेद के अभिप्राय से नहीं। इसी अभिप्राय से आगे जाकर ‘यूयम्’ यह बहुवचन दिया। तात्पर्य्य यह है कि एक ही परमात्मा को यहाँ बृहस्पति और इन्द्र इन  नामों से गुणभेद से वर्णन किया, जैसा कि एक ही ब्रह्म का “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” तै० २।१। यहाँ सत्यादि नामों से एक ही वस्तु का ग्रहण है, एवं यहाँ भी भिन्न-भिन्न नामों से एक ही ब्रह्म का ग्रहण हैं, दो का नहीं॥७॥यह ९८वाँ सूक्त और २३वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प॒रो मात्र॑या त॒न्वा॑ वृधान॒ न ते॑ महि॒त्वमन्व॑श्नुवन्ति। उ॒भे ते॑ विद्म॒ रज॑सी पृथि॒व्या विष्णो॑ देव॒ त्वं प॑र॒मस्य॑ वित्से॥

जीव केवल प्रत्यक्ष से लोकों को जान सकता है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों का ज्ञाता एकमात्र परमात्मा है। तन्मात्रा कथन करना यहाँ प्रकृति के सूक्ष्म कार्य्यों का उपलक्षणमात्र है। तात्पर्य यह है कि प्रकृति उसके शरीरस्थानी होकर उस परमात्मा के महत्त्व को बढ़ा रही है, या यों कहो कि प्रकृत्यादि सब पदार्थ उस परमात्मा के एकदेश में हैं और वह असीम अर्थात् अवधिरहित है॥१॥

न ते॑ विष्णो॒ जाय॑मानो॒ न जा॒तो देव॑ महि॒म्नः पर॒मन्त॑माप। उद॑स्तभ्ना॒ नाक॑मृ॒ष्वं बृ॒हन्तं॑ दा॒धर्थ॒ प्राचीं॑ क॒कुभं॑ पृथि॒व्याः॥

भूत, भविष्य, वर्त्तमान तीनों कालों में किसी की शक्ति नहीं, जो परमात्मा के महत्त्व को जान सके, इसी कारण उसका नाम अनन्त है, जिसको “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”॥तै०  २।१॥इस वाक्य ने भी भलीभाँति वर्णन किया है। उसी ब्रह्म का यहाँ विष्णु नाम से वर्णन है, केवल यहाँ ही नहीं, किन्तु “य उ त्रिधातु पृथिवीमुत दाधार भुवनानि विश्वा”॥ऋ० मं. १।१५४।४॥में यह कहा है कि जिस एक अद्वैत अर्थात् असहाय परमात्मा ने  सत्वरजस्तम इन तीनों गुणों के समुच्चयरूप प्रकृति को धारण किया हुआ है, उस व्यापक ब्रह्म का नाम यहाँ विष्णु है। “विष्णोर्नु कं वीर्य्याणि प्रवोचं”॥ऋ. मं. १।१५४।१॥“तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः”॥ऋ. मं. १।२२।२०॥“इदं विष्णुर्विचक्रमे”॥ऋ. १।२२।१७॥इत्यादि शतशः मन्त्रों में उस व्यापक विष्णु के स्वरूप को वर्णन किया है। फिर न जाने, वेदों में आध्यात्मिकवाद की आशङ्का करनेवाले किस आधार पर यह कहा करते हैं कि वेदों में एकेश्वरवाद नहीं॥२॥

इरा॑वती धेनु॒मती॒ हि भू॒तं सू॑यव॒सिनी॒ मनु॑षे दश॒स्या। व्य॑स्तभ्ना॒ रोद॑सी विष्णवे॒ते दा॒धर्थ॑ पृथि॒वीम॒भितो॑ म॒यूखैः॑॥

यहाँ द्युलोक और पृथिवीलोक दोनों उपलक्षणमात्र हैं। वास्तव में परमात्मा ने सब लोक-लोकान्तरों को ऐश्वर्य्य के लिये उत्पन्न किया है और इस ऐश्वर्य्य के अधिकारी सत्कर्म्मी पुरुष हैं। जो लोग कर्म्मयोगी हैं, उनके लिये द्युलोक तथा पृथिवीलोक के सब मार्ग खुले हुए हैं। परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे अधिकारी जनों! आपके लिये यह विस्तृत ब्रह्माण्डक्षेत्र खुला है। आप इस में कर्म्मयोगद्वारा अव्याहतगति अर्थात् बिना रोक–टोक के सर्वत्र विचरें॥३॥

उ॒रुं य॒ज्ञाय॑ चक्रथुरु लो॒कं ज॒नय॑न्ता॒ सूर्य॑मु॒षास॑म॒ग्निम्। दास॑स्य चिद्वृषशि॒प्रस्य॑ मा॒या ज॒घ्नथु॑र्नरा पृत॒नाज्ये॑षु॥

परमात्मा प्रार्थनाकर्त्ताओं के द्वारा इसको प्रकट करते हैं कि न्यायाभिलाषी पुरुषों! तुम मायावी पुरुषों की माया के नाश करने के लिये प्रार्थनारूपी भाव को उत्पन्न करो, फिर यह सत्कर्म्म स्वयं प्रबल हो करके फल देगा॥४॥

इन्द्रा॑विष्णू दृंहि॒ताः शम्ब॑रस्य॒ नव॒ पुरो॑ नव॒तिं च॑ श्नथिष्टम्। श॒तं व॒र्चिनः॑ स॒हस्रं॑ च सा॒कं ह॒थो अ॑प्र॒त्यसु॑रस्य वी॒रान्॥

मायावी शत्रु को दमन करने के लिये न्यायशील पुरुषों को परमात्मा उपदेश करते हैं कि तुम लोग अन्यायकारी शत्रुओं के सैकड़ों हजारों दुर्गों से मत डरो, क्योंकि (माया) अन्याय से जीतने की इच्छा करनेवाला असुर स्वयं अपने पाप से आप मारा जाता है और उसके लिये आकाश से वज्रपात होता है, जैसा कि अन्यत्र भी कहा है कि “प्र वर्तय दिवो अश्मानमिन्द्र”॥मं. ७।१०४ मं, १९॥परमात्मा! तुम अन्यायकारी मायावी के लिये आकाश से वज्रपात करो। इस प्रकार न्याय की रक्षा के लिये वीर पुरुषों के प्रति यहाँ परमात्मा का उपदेश है॥५॥

इ॒यं म॑नी॒षा बृ॑ह॒ती बृ॒हन्तो॑रुक्र॒मा त॒वसा॑ व॒र्धय॑न्ती। र॒रे वां॒ स्तोमं॑ वि॒दथे॑षु विष्णो॒ पिन्व॑त॒मिषो॑ वृ॒जने॑ष्विन्द्र॥

जो ऐश्वर्य के बढ़ानेवाली इस वाणी को सेवन करते हैं अर्थात् (ब्रह्मयज्ञ) ईश्वरोपासना (और वीरयज्ञ) अन्याय के दमन करने के लिये वीरता करना, इस प्रकार भक्तिभाव और वीरभाव इन दोनों का अनुष्ठान करते हैं, वे सब प्रकार की विपत्तियों को नाश कर सकते हैं॥६॥

वष॑ट् ते विष्णवा॒स आ कृ॑णोमि॒ तन्मे॑ जुषस्व शिपिविष्ट ह॒व्यम्। वर्ध॑न्तु त्वा सुष्टु॒तयो॒ गिरो॑ मे यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

शिपिनाम यहाँ तेजोरूप किरणों का है “शिपयो रश्मयः”॥निरु. ५।८॥अर्थात् ज्योतिःस्वरूप परमात्मा हमारी प्रार्थनाओं को स्वीकार करे और हमको सदैव उन्नति के मार्ग में ले जाये। यहाँ पहले (त्वां) एकवचन आकर भी (यूयं) फिर आदरार्थ बहुवचन है॥७॥यह ९९वाँ सूक्त और २४वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

नू मर्तो॑ दयते सनि॒ष्यन्यो विष्ण॑व उरुगा॒याय॒ दाश॑त्। प्र यः स॒त्राचा॒ मन॑सा॒ यजा॑त ए॒ताव॑न्तं॒ नर्य॑मा॒विवा॑सात्॥

परमात्मप्राप्ति के लिये सबसे प्रथम जिज्ञासा अर्थात् प्रबल इच्छा उत्पन्न होनी चाहिये। तदनन्तर जो पुरुष निष्कपटभाव से परमात्मपरायण होता है, उस पुरुष को परमात्मा का साक्षात्कार अर्थात् यथार्थ ज्ञान अवश्यमेव होता है॥१॥

त्वं वि॑ष्णो सुम॒तिं वि॒श्वज॑न्या॒मप्र॑युतामेवयावो म॒तिं दाः॑। पर्चो॒ यथा॑ नः सुवि॒तस्य॒ भूरे॒रश्वा॑वतः पुरुश्च॒न्द्रस्य॑ रा॒यः॥

शुभ नीति और सुनीति उसका नाम है, जिससे संसार भर का कल्याण हो। इस मन्त्र में परमात्मा ने इस नीति के उत्पन्न करने के लिये जिज्ञासु द्वारा प्रार्थना कथन करके उपदेश किया है। वास्तव में शुभ नीति ही धर्म्म, देश और जाति की उन्नति का सर्वोपरि साधन है॥२॥

त्रिर्दे॒वः पृ॑थि॒वीमे॒ष ए॒तां वि च॑क्रमे श॒तर्च॑सं महि॒त्वा। प्र विष्णु॑रस्तु त॒वस॒स्तवी॑यान्त्वे॒षं ह्य॑स्य॒ स्थवि॑रस्य॒ नाम॑॥

तीन प्रकार से पृथिवी को रचने के अर्थ ये हैं कि प्रकृति के सत्त्वादि गुणोंवाले परमाणुओं को परमात्मा ने तीन प्रकार से रखा। तामस-भाववाले परमाणु, पृथिवी पाषाणादिरूप से, राजस नक्षत्रादिरूप से और दिव्य अर्थात् द्युलोकस्थ पदार्थों को सात्त्विक भाव से, ये तीन प्रकार की गतियें हैं, इसी का नाम ‘त्रेधा निधदे पदं’ है, इसी भाव को “इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निधदे पदम्”॥मं. १।२२।१७॥में वर्णन किया है। जो कई एक लोग इसके अर्थ ये करते हैं कि विष्णु ने वामनावतार को धारण करके तीन पैर से पृथिवी को नापा, इसका उत्तर यह है कि इसी विष्णुसूक्त में “तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः”॥मं. १।२२।२०॥में इस पद को चक्षु की निराकार ज्योति के समान निराकार माना है। अन्य युक्ति यह है कि विष्णु का स्वरूपपद निराकार होने से एक कथन किया है, तीन संख्या केवल प्रकृतिरूपी पद में मानी है, विष्णु के पद में नहीं, फिर निराकार विष्णु का देह धर कर साकार पद कैसे ? सबसे प्रबल प्रमाण इस विषय में यह है कि इसी प्रसङ्ग में सूक्त ९९वें के दूसरे मन्त्र में यह कथन किया है कि “न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप” हे देव! तुम्हारी महिमा के अन्त को कोई नहीं पा सकता, क्योंकि तुमने ही लोक-लोकान्तरों को धारण किया हुआ है, तो फिर जब वह सर्वाधिष्ठान अर्थात् सब भुवनों का आश्रय है, तो उसके पैरों को अन्य वस्तुएँ कैसे आश्रय दे सकती हैं॥३॥

वि च॑क्रमे पृथि॒वीमे॒ष ए॒तां क्षेत्रा॑य॒ विष्णु॒र्मनु॑षे दश॒स्यन्। ध्रु॒वासो॑ अस्य की॒रयो॒ जना॑स उरुक्षि॒तिं सु॒जनि॑मा चकार॥

जिस पृथिवी में (सुजनिमा) सुन्दर आविर्भाववाले प्राणिजात हैं, उनका कर्त्ता जो परमात्मा है, उसने इस सम्पूर्ण विश्व को रचा है। विष्णु के अर्थ यहाँ “यज्ञो वै विष्णुः”॥श. प.॥“तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे”॥यजु०  ३१.७॥इत्यादि प्रमाणों से व्यापक परमात्मा के हैं। यही बात विष्णुसूक्तों में सर्वत्र पायी जाती है। इस भाव को वेद ने अन्यत्र भी वर्णन किया है कि “द्यावाभूमी जनयन्देव एकः”॥यजु०॥एक परमात्मा ने सब लोक-लोकान्तरों को रचा है॥४॥

प्र तत्ते॑ अ॒द्य शि॑पिविष्ट॒ नामा॒र्यः शं॑सामि व॒युना॑नि वि॒द्वान्। तं त्वा॑ गृणामि त॒वस॒मत॑व्या॒न्क्षय॑न्तम॒स्य रज॑सः परा॒के॥

विष्णु, अर्य्य, व्यापक ये तीनों एक ही पदार्थ के नाम हैं। विष्णु को इस मन्त्र में अर्य्य कहा है और अर्य्य परमात्मा का मुख्य नाम है। इस विषय में प्रमाण यह है कि “राष्ट्री। अर्यः। नियुत्वान्। इनइन इति चत्वारीश्वरनामानि॥” निघं ३।२२॥राष्ट्री, अर्य्य, नियुत्वान्, इनइन ये चारों ईश्वर के नाम हैं। अस्तु। जो लोग “इदं विष्णुर्विचक्रमे” इत्यादि मन्त्रों में विष्णु शब्द के अर्थ सूर्य्य किया करते हैं, उनको इस मन्त्र के अर्थ से शिक्षा लेनी चाहिये, क्योंकि उक्त मन्त्र में विष्णु का अर्थ अर्थात् व्यापक ईश्वर कथन किया है। इससे स्पष्ट है कि विष्णु शब्द के अर्थ व्यापक ईश्वर के ही हैं, किसी अन्य जड़ वा अल्पज्ञ वस्तु के नहीं॥५॥

किमित्ते॑ विष्णो परि॒चक्ष्यं॑ भू॒त्प्र यद्व॑व॒क्षे शि॑पिवि॒ष्टो अ॑स्मि। मा वर्पो॑ अ॒स्मदप॑ गूह ए॒तद्यद॒न्यरू॑पः समि॒थे ब॒भूथ॑॥

परमात्मा का ‘स्वप्रकाशतेजोमयरूप’ सृष्टि की रचना और पालने से सबको प्रसिद्ध है, अर्थात् उसकी विचित्र रचना से प्रत्येक सूक्ष्मदर्शी पुरुष जानता है कि यह विविध रचना किसी सर्वज्ञ तेजोमय परमात्मा से बिना कदापि नहीं हो सकती।दूसरी ओर जो उसका ‘मन्युमयरूप’ है अर्थात् दुष्टों को दमन करनेवाला ओज है, वह शीघ्र सबकी समझ में नहीं आता, इसलिये इस मन्त्र में यह बतलाया गया है कि जिज्ञासु जन इसको भी समझने का यत्न करें।(बभूथ) क्रिया यहाँ भूतकाल की बोधक नहीं, किन्तु वैदिक व्याकरण के नियम से तीनों कालों का बोधन करती है, अर्थात् परमात्मा तीनों कालों में रुद्ररूप से दुष्टों का दमन करते हैं।और उस रूप के वर्णन करने का प्रकरण यहाँ इसलिये बतलाया है कि आगे सातवें अध्याय में उस रूप का विशेषरूप से वर्णन करना है।कई एक लोग इन दो रूपों के ये अर्थ करते हैं कि एक विष्णु का न देखने योग्य और न सुनने योग्य रूप है, अर्थात् ऐसा अश्लील लज्जाकर है, जिसका भले आदमी नाम लेने से भी लज्जा करते हैं।या यों कहो कि शेप नाम उनके मत में मनुष्य के प्रजा-उत्पादक इन्द्रिय का है। उस जैसे मुखवाले को ‘शिपिविष्टः’ कहते हैं, इसलिये उसके देखने का यहाँ निषेध किया है। यह अर्थ सायणाचार्य्य, महीधरादि सबने किये हैं, जिनकी विशेष समीक्षा करने से ग्रन्थ बढ़ता है, इसलिये इतना ही कहते हैं कि यह उनकी अत्यन्त भूल है, क्योंकि निरु० ५।८ में शेप के अर्थ स्वयं निरुक्तकार ने किये हैं कि ‘शेप’ नाम प्रकाश का है। प्रकाश से आविष्ट का नाम ‘शिपिविष्ट’ है।हमें यहाँ इनके ऐसे घृणित रूप मानने का उतना शोक नहीं, जितना प्रोफेसर मैक्समूलर, विलसन, ग्रिफिथ और सर रमेशचन्द्रदत्त के ऐसे लज्जाकर अर्थों की ज्यों की त्यों नकल कर देने का है। ये लोग यदि इस मन्त्र के भाव पर तनिक भी ध्यान देते, तो ऐसे घृणित अर्थ कदापि न करते।और जो यह कहा जाता है कि निरुक्त के कर्त्ता ने स्वयं यहाँ लज्जाजनक अर्थ किये हैं और यह कहा है कि विष्णु की हँसी उड़ाने के लिये दूसरा लज्जाप्रधान नाम रखा है। यह कथन उन लोगों का है, जो निरुक्तकार के आशय को न समझ कर अन्यथा टीका-टिप्पणी करते हैं, अस्तु॥मुख्य बात यह है कि ‘शिपिविष्ट’ नाम ज्योतिःस्वरूप परमात्मा का है, क्योंकि ‘शिपि’ नाम ज्योति का स्वयं निरुक्तकार ने माना है, यह हम अनेक स्थलों में दर्शा आये हैं॥६॥

वष॑ट् ते विष्णवा॒स आ कृ॑णोमि॒ तन्मे॑ जुषस्व शिपिविष्ट ह॒व्यम्। वर्ध॑न्तु त्वा सुष्टु॒तयो॒ गिरो॑ मे यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

इस छठे अध्याय के अन्त में प्रकाशरूप सर्वव्यापक परमात्मा से यह प्रार्थना की गई है कि आप हमको अत्यन्त उन्नतिशील बनायें और सदैव हमारी रक्षा करें।जो लोग विष्णु के अर्थ सूर्य्य वा देहधारी विष्णुदेवता के किया करते हैं, उनको इन सूक्तों से यह ज्ञानलाभ करना चाहिये कि यहाँ तो उस विष्णु का वर्णन है, जिसके आदि और अन्त का पार कोई कार्य्य-पदार्थ पा ही नहीं सकता, फिर यहाँ उस सूर्य्य की क्या कथा ? जिसको “सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्”॥ऋ. मं. १०।९०।३॥यह वेदमन्त्र स्वयं कार्य्यरूप से कथन करता है। इतना ही नहीं, यहाँ तो यहाँ तक वर्णन किया है कि “न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप”॥ऋ. ७। सू.९९। मं.२॥तुम्हारी महिमा को भूत, भविष्यत्, वर्त्तमान तीनों कालों में उत्पन्न होनेवाला जन्तु तुम्हारे अन्त को कदापि नहीं पा सकता और वह महिमा अर्थात् महत्त्व “एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्च पूरुषः”॥ऋ. मं. १०। सू ९०।३॥इस वेदमन्त्र में वर्णित है, फिर यहाँ किसी देहधारी का ग्रहण कैसे ?इसी प्रकार “इदं विष्णुर्विचक्रमे”॥ऋ. १।२२।१७॥“विष्णोः कर्म्माणि पश्यत”॥मन्त्र १९॥“तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः” मन्त्र २०॥इत्यादि व्यापक विष्णु परमात्मा के वर्णन करनेवाले सब मन्त्रों का तात्पर्य्य साकार ईश्वरवादियों ने अवतार वा इस भौतिक सूर्य्य के वर्णन में बतलाया है, सो ठीक नहीं, क्योंकि विष्णु के अर्थ सर्वत्रैव व्यापक परमात्मा के हैं। प्रमाण इसमें ये हैं “विष्णुर्यज्ञः”॥शत. ६। ५। २। ११॥“तस्मात् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे”॥ऋ. मं. १०। सू. ९०। ९॥“यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः”॥ऋ. १०। ९०। १६॥जब उक्त प्रमाणों में यज्ञ और विष्णु के एक ही अर्थ हैं अर्थात् यज्ञ वह जिससे वेद उत्पन्न हुए “एतस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेवैतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः”॥बृ०  २। ४। १०॥यहाँ वेदों का कर्त्ता यजनरूप यज्ञ नहीं, किन्तु “इज्यते सर्वैः पूज्यत इति यज्ञः परमात्मा” इस अर्थ से कि जो सबका उपासनीय एकमात्र देव हो, उसका नाम यहाँ यज्ञ है। एवं तात्पर्य यह निकला कि यज्ञ, विष्णु, ब्रह्म, ब्रह्मणस्पति, बृहस्पति ये सब नाम एक निराकर परमात्मा के हैं, तो फिर विष्णु से साकार का ग्रहण कैसे ?“स पर्य्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम्”॥यजु. ४०। ६॥“न ते विष्णो जायमानो न जातः”॥“को अद्धा वेद क इह प्र वोचत्” मं. १०। सू. १२९। ६॥“न तस्य प्रतिमास्ति॥यजु० ३२। ३॥“नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्चम्” ॥यजु० ३२। २॥इत्यादि शतशः प्रमाण जिसको अकाय अर्थात् निराकार वर्णन करते हैं, उस परमात्मा का यहाँ विष्णु नाम से निरूपण किया है। विष्णु शब्द अपने स्वार्थ से अर्थात् जब इसके धातु से इसके अर्थ इस प्रकार निकलते हैं कि “विष्लृ व्याप्तौ, विषेः किच्च”॥उ. ३। ३८॥इस सूत्र से ‘नु’ प्रत्यय करने से विष्णु शब्द सिद्ध होत है, “वेवेष्टि इति विष्णुः” इसी प्रकार व्यापक परमात्मा के अर्थ ही सिद्ध होते हैं। इसी अर्थ को वेद, ब्राह्मण, उपनिषद्, वेदान्तसूत्र एक स्वर से प्रतिपादन करते हैं कि ईश्वर अजन्मा है अर्थात् निराकार है, अक्षर अविनाशी है, जैसे कि “कस्मिन्नु खल्वाकाश ओतश्च प्रोतश्च। स होवाचैतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्वह्रस्वम्”॥बृ. ३। ८। ८॥“आकाशे तदोतञ्च प्रोतञ्च”॥बृ. ३। ८। ४॥“ओमित्येतदक्षरम्” मां० १॥“ओमित्येतदक्षरम्” छा. १। १। १॥“अचक्षुष्कमश्रोत्रमवाग् मनः”। बृ० ३। ८। ८॥“अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः”॥श्वे. ३। १९॥“ऋचोऽक्षरे परमे व्योमन्”॥ऋ. २। ३। २१। ३९॥“परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते”॥प्र. ४। १० ॥“अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते”॥मु. १। १। ५॥“येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यम्”॥मु. १। २। १३॥इत्यादि।ब्राह्मण और उपनिषद् के वाक्यों में यह वर्णन किया है कि जो इस चराचर जगत् का आधार परमात्मा है, वह आकाश में भी ओतप्रोत है अर्थात् आकाश उससे स्थूल है। वह एकमात्र अक्षर है और चक्षु-श्रोत्रादि ज्ञानेन्द्रिय तथा हस्त-पादादि कर्मेन्द्रियों से रहित होकर भी सर्वज्ञाता है॥“अक्षरमम्बरान्तधृतेः”॥ब्र. सू. १। ३। १०॥में उस अक्षर को लोक-लोकान्तरों का आधार वर्णन किया है।इतना ही नहीं, किन्तु उसको इन्द्रियगोचर अर्थात् मन वाणी का सर्वथा अविषय माना है, इस विषय में प्रमाण ये हैं कि “नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा”। कठ. ६। १२॥“यत्तदद्रेश्यमग्राह्यं”। मु० १। १। ६॥“न चक्षुषा गृह्यते नाषि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्म्मणा वा”॥मु० ३। १। ८॥“य इत्तद्विदुस्तेऽमृतत्वमानशुः”॥ऋ० मं. १। १६४। मं. २६॥ जो इस इन्द्रियगोचर को जानते हैं, वे ही अमृतपद को पाते हैं।उक्त वेद तथा उपनिषदों के भाव को ब्रह्मसूत्र में यों वर्णन किया है कि “तदव्यक्तमाह हि”॥ब्र. सू. ३। २। २३॥उसको इस प्रकार वेद अव्यक्त कहता है अर्थात् सूक्ष्मरूप से वर्णन करता है॥कई एक लोग इसमें यह शङ्का  करते हैं कि जब वह अक्षर सर्वथा इन्द्रियागोचर अर्थात् किसी भी इन्द्रिय का विषय नहीं, तो उसका ध्यान किस प्रकार हो सकता है। उनके प्रश्न का सार यह है कि निराकार पदार्थ ध्यान का विषय नहीं हो सकता।इसका उत्तर यह है कि ध्यान में दो पदार्थ होते हैं, एक (ध्याता) अर्थात् ध्यान करनेवाला और दूसरा ध्येय, जिसका ध्यान किया जाता है। जब ध्यान करनेवाला स्वयं निराकार होकर भी ध्यान कर सकता है अर्थात् उसे ध्यान करने के लिये किसी स्थूल पदार्थ की आवश्यकता नहीं पड़ती, तो फिर निराकार ध्यान का विषय क्यों नहीं ?यदि यह कहा जाय कि ध्यान में कोई न कोई आकार आना चाहिये, तब ध्यान होगा, तो उत्तर यह है कि आकार के अर्थ यहाँ विशेषरूपता के हैं अर्थात् एक प्रकार की अद्भुत सत्ता के हैं। दृष्टान्त के लिये देखो, जब किसी जीव को किसी भी आनन्द का अनुभव हो, चाहे वह आनन्द विद्या का आनन्द हो वा विषयानन्द हो अथवा ब्रह्मानन्द हो, इन तीन प्रकार के आनन्दों के ध्यान में आने के लिये किसी आकार की आवश्यकता नहीं पड़ती, किन्तु एक विलक्षण सत्ता की आवश्यकता पड़ती है। इसी प्रकार ईश्वर के ध्यान में भी एक प्रकार की विलक्षण सत्ता की आवश्यकता है, किसी विशेष रूप की नहीं। इसी अभिप्राय से उपनिषदों में कहा है कि “यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥क०। २। २३॥“ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः”॥ मु.  ३। १। ८॥जिस पुरुष को परमात्मा अपने ध्यान का पात्र समझता है, उस पुरुष के ज्ञानगोचर होकर उसको प्राप्त होता है अर्थात् अपने ध्यान का विषय हो जाता है। दूसरे प्रमाण के यह अर्थ हैं कि ज्ञान के प्रभाव से जिस पुरुष का अन्तःकरण शुद्ध हो गया है, वह ज्ञानी पुरुष उस (निष्कल) अर्थात् निरञ्जन पुरुष का ध्यान कर सकता है। यदि निराकार पदार्थ ध्यान का विषय न होता, तो उपनिषदों के कर्त्ता ऋषि लोग उस पुरुष को (निष्कल) कह कर फिर ध्यान का विषय न कहते, किन्तु उसी (निष्कल) अर्थात् निराकार को यहाँ ध्यान का विषय माना है। इससे स्पष्ट सिद्ध है कि ईश्वर के ध्यान के लिये साकार वस्तु की आवश्यकता नहीं।इसी अभिप्राय से जहाँ-जहाँ वेदों में ईश्वर-योग का निरुपण है, वहाँ सर्वत्रैव निराकार परमात्मा के साथ योग वर्णन किया गया है, साकार के साथ नहीं, जैसा कि “युञ्जन्ति ब्रध्नमरुषं चरन्तं परि तस्थुषः”॥ऋ० मं. १। सू०  ६। १॥“युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः” ॥ऋ० ५। ८१। १॥इत्यादि मन्त्रों से जहाँ चित्त का परमात्मा में स्थिर करना लिखा है, वहाँ किसी साकार वस्तु के आधार पर चित्त की स्थिति नहीं की जाती, किन्तु इस स्थावर जङ्गमात्मक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का जो एमात्र आत्मा परमात्मदेव है, उसी में चित्त की स्थिति की जाती है, इसी का नाम ईश्वरयोग है।चित्त की स्थिरता के लिये योग कई एक प्रकार के हैं, जैसे कर्म्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग, ईश्वरयोग। ‘कर्म्मयोग’ उसका नाम है कि जब पुरुष फल की अभिलाषा छोड़कर कर्म्म में लग जाता है, वह कर्म्म आत्मसुधार का हो, अथवा देशसुधार का हो, जब उससे भिन्न योगी को अर्थात् कर्म के साथ जुड़नेवाले पुरुष को अन्य कोई भी वस्तु उससे प्रिय अथवा कल्याणदायक प्रतीत न हो और न वह पुरुष उस कर्म्म के करने में कोई आत्मपरिश्रम वा कष्ट समझे, किन्तु यह समझे कि यह मेरा परम कर्त्तव्य है अथवा यों कहो कि कर्म्म से भिन्न वह अपना जीवन न समझे। वस्तुतः बात भी यही है कि जीना नाम ही कर्म्म का है, क्योंकि जीने के अर्थ प्राणधारण करना है और प्राण के अर्थ (चेष्टा) अर्थात् कर्म्म करना है। इस प्रकार कर्म्मयोग के अर्थ यावदायुष अर्थात् अपने समस्त जीवनपर्य्यन्त कर्म्म करने के हैं। इसी अभिप्राय से वेद ने आज्ञा दी है कि “कुर्वन्नेवेह कर्म्माणि जिजीविषेच्छतं  समाः” यजु० ४०। २॥कर्म्म करता हुआ सौ वर्ष जीने की इच्छा करे।इसी प्रकार ज्ञानयोग भी मनुष्य के लिये परम कर्तव्य है। यद्यपि ज्ञान में कर्त्तव्य नहीं, किन्तु जानना है, तथापि यह कर्म्म के बिना पङ्गु के समान है। जिस प्रकार पाँच ज्ञानेन्द्रियों के अविकल अर्थात् यथायोग्य होने पर भी पङ्गु कर्म्मन्द्रियरूपी पादों से रहित पुरुष चलने-फिरने में असमर्थ होता है एवं कर्म्मरहित पुरुष ज्ञानी होकर भी अभ्युदय और निःश्रेयस दोनों प्रकार के फलों से वञ्चित रह जाता है, इसलिये कर्म्मयोग ज्ञानयोग का साधन है।ज्ञानयोग और विद्यायोग यह एक ही पदार्थ के दो नाम हैं। जो पुरुष विद्या में जुड़ जाता है अर्थात् चित्तवृत्ति को सब ओर से हटाकर एकमात्र विद्या को ही अपना लक्ष्य समझता है, उसको ‘ज्ञानयोगी’ कहते हैं।ध्यानयोग इससे भिन्न है। वह प्रायः ईश्वरविषय में ही व्यवहार किया जाता है अर्थात् जब पुरुष सत्कर्म्मी और ज्ञानी बनकर ईश्वर को अपना लक्ष्य बनाता है, तो उस अवस्था का नाम ध्यानयोग है। ध्यानयोग और ईश्वरयोग ये दोनों एकार्थवाची शब्द हैं। “ध्यानाच्च”॥ब्र० सू० ४। १। ८॥इस सूत्र में इसका भलीभाँति निरूपण किया गया है कि ईश्वर में ध्यान लगाने से चित्तवृत्ति स्थिर होती है। इसी का वर्णन योग में इस प्रकार किया है “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”॥यो०  १। २॥चित्तवृत्ति के रोक लेने का नाम ‘योग’ है।प्रकृत यह है कि ईश्वरयोग तभी हो सकता है, जब पुरुष एकमात्र परमात्मसत्ता में चित्त को लगा देता है। उस समय उस पुरुष को अपने आत्मवत् परमात्मसत्ता प्रतीत होती है अर्थात् सर्वव्यापक विष्णु, परमात्मा उसे अपने आत्मा में अन्तरात्मरूप से प्रतीत होने लगता है। उस अन्तरात्मा का वर्णन अन्तर्यामी-ब्राह्मण में स्पष्ट है, उसी अन्तर्यामी का नाम यहाँ विष्णु व बृहस्पति है। विष्णु और बृहस्पति ये एकार्थवाची शब्द हैं अर्थात् ये दोनों शब्द सर्वव्यापक आत्मशक्ति के निरुपक हैं, किसी व्यक्तिविशेष के नहीं।    इस ध्यानयोग को वितर्क, विचार, आनन्द, अस्मिता रूप से चार प्रकार का कथन किया गया है।ध्यानावस्था में प्रथम नाना प्रकार के तर्क उत्पन्न होते हैं। कोई कहता है कि निराकार में ध्यान कैसे लग सकता है ? और कोई निराकार की सत्ता को ही स्वीकार नहीं करता अर्थात् जिसका आकार ही नहीं, वह वस्तु ही नहीं, यह भी संशय उत्पन्न होने लगता है। इस प्रकार तर्करूप मल निर्मल चित्तवृत्ति में समल जल के समान अति तेजोरूप पदार्थ को भी प्रतिबिम्बित नहीं होने देता।यद्यपि “तर्काऽप्रतिष्ठानात्” ब्र. सू. २।१।११॥में तर्क की प्रतिष्ठा नहीं मानी गई अर्थात् उक्त सूत्र में महर्षि व्यास ने तर्क की निन्दा की है कि तर्क की कहीं भी स्थिति नहीं होती। आज एक बात को एक बुद्धिमान् एक प्रकार से स्थापन करता है, कल कोई उससे बुद्धिमान् आ जाता है, तो वह उसको और प्रकार से कहता है अर्थात् एक से एक बुद्धिमान् संसार में पड़ा है। यदि बुद्धि पर निर्भर कर के धर्म्म का निर्णय किया जाय, तो अति कठिन हो जायगा। इस प्रकार तर्क की प्रतिष्ठा नहीं मानी जा सकती।तथापि ऋषि लोगों ने भी तर्क को स्वीकार किया है और यह कहा है कि “ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः” मन्त्रों के अर्थों को जो लोग समाधि द्वारा अनुसन्धान करें, वे ऋषि कहलाते हैं। जब इस प्रकार के योगी ऋषि न रहे, तो वैदिक लोगों ने विचार किया कि अब क्या किया जाय। अब वेद के अर्थ का निश्चय कैसे किया जाय कि अमुक अर्थ ठीक है, अमुक नहीं, तो कहते हैं कि उनको तर्क ऋषि मिला अर्थात् जिस बात का निर्णय तर्क=युक्ति कर दे, वही बात सत्य समझनी चाहिये, अन्य नहीं। इस सिद्धान्त के साथ “तर्काऽप्रतिष्ठानात्” इस व्यास जी के कथन का विरोध आता है। केवल व्यासजी के कथन के साथ ही उक्त सिद्धान्त का विरोध नहीं, किन्तु तर्क के साथ भी विरोध है कि जब प्रत्येक निर्णय तर्क पर रक्खा जाय, तो फिर वेद प्रमाण को कौन मानेगा ? और उस तर्क का यदि और तर्क से खण्डन हो जाय, तो भी उसे कौन मानेगा ? इसलिये कोई व्यवस्था होनी चाहिये और वह व्यवस्था यह है कि “वेदशास्त्राविरोधिना यस्तर्केणानुसन्धत्ते स धर्म्म वेद नेतरः”॥मनु. १२।१०६॥जो वेद-शास्त्र के अनुकूल तर्क से धर्म्म का निर्णय करता है, वह धर्म्म को जानता है, अन्य नहीं।अब शङ्का यह होती है कि यह कैसे निर्णय किया जाय, कि यह तर्क वेद-शास्त्र का विरोधी है और यह नहीं ?इसका उत्तर यह है कि इस बात का निर्णय तो स्वयं वेदभगवान् कर देते हैं कि “को अद्धा वेद क इह प्रवोचत् कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः”॥ऋ. मं.। १०। सू० १२९। ६॥कीन ठीक-ठीक जान सकता है कि यह सृष्टि किस वस्तु से बनी और क्यों इस प्रकार विचित्र है अर्थात् किसने इसकी विविध प्रकार से रचना की ?यह तर्क है कि ठीक-ठीक कोई भी नहीं जान सकता कि सृष्टि किसने किस वस्तु से किस प्रकार उत्पन्न की ?इसका उत्तर स्वयं वेद ने आगे के मन्त्र में दिया है कि “योऽस्याध्यक्षः परमे व्योमन्” जो इसका स्वामी इस महदाकाश में परिपूर्ण हो रहा है, वह स्वयं जानता है। यह वेदानुकूल तर्क का स्वरूप है।हाँ यदि कोई इसमें यह कहे कि वह क्यों जानता है ? और यदि जानता है तो उस जाननेवाले का सिर कितना बड़ा है ? क्योंकि इतने बड़े “ब्रह्माण्ड” के जाननेवाले के लिये सिर भी बड़ा होना चाहिये। इस प्रकार के तर्क का नाम वेदशास्त्रविरोधी तर्क है, वा यों कहो कि ‘कुतर्क’ है।मुख्य प्रसङ्ग यह है कि “वितर्कयोग” की आज्ञा तो वेद स्वयं देता है कि पुरुष पहले तर्क करके वस्तु का निर्णय करे, पर कुतर्क न करे। प्रसङ्ग प्राप्त यह बात है कि ध्यान की प्रथम अवस्था का नाम ‘वितर्कयोग’ है अर्थात् उसमें नाना प्रकार का तर्क बना रहता है। ध्यान की इस प्रथम अवस्था से आगे ध्यान का नाम ‘विचारयोग’ है, जिसमें परमात्मा के गुणों का विचार किया जाता है कि परमात्मा इस प्रकार इस ब्रह्माण्ड में व्यापक है। जिस प्रकार विद्युच्छक्ति स्थूल वस्तुओं में व्यापक है वा जैसे जीवात्मा की शक्ति इस शरीररूप ब्रह्माण्ड में व्यापक है, इस प्रकार परमात्मा सर्वत्र व्यापक है, इस विचार का नाम ‘आनन्दयोग’ है।जब पुरुष का चित्त बाह्य विषयों से हटकर अन्तर्मुख होकर विचारयोग में सिद्धि प्राप्त कर लेता है, तो उसे एक प्रकार का आनन्द आने लगता है, इसलिये उक्त ध्यानयोग की तीसरी अवस्था का नाम ‘आनन्दयोग’ है। इस आनन्द से आगे चतुर्थ अवस्था का नाम अस्मितायोग है अर्थात् इस अवस्था में पुरुष परमात्मा में अपनी चित्तवृत्ति का ऐसा योग कर देता है कि जिससे उसे परमात्मा का और अपना भेदभाव प्रतीत नहीं होता।वा यों कहो कि उस समय परमात्मरूपी अगाध सागर में वह इस प्रकार निमग्न हो जाता है कि उसे आनन्द ही आनन्द अनुभव होता है, आनन्द से भिन्न उस समय उसकी दृष्टि में कोई और सत्ता नहीं रहती अर्थात् उस समय ब्रह्म के भावों को वह इस प्रकार अनुभव करता है कि ब्रह्म से भिन्न उस समय वह किसी वस्तु को अनुभव नहीं करता। इसी अवस्था को “ब्राह्मेण जैमिनिरुपन्यासादिभ्यः”। ब्र. सू.  ४-४-५ ॥इसमें यों वर्णन किया है कि उस अवस्था में परब्रह्म को प्राप्त होकर जीव सत्य-संकल्पादि धर्म्मों को धारण करता है। जिस प्रकार ब्रह्म सत्यसंकल्प है, उसी प्रकार ब्रह्म के सत्यकामादि धर्म उसे साक्षात् प्रतीत होने लगते हैं। उस ब्रह्म का आनन्द उसे आत्मानन्द के समान भान होता है।युक्ति इस में यह है कि जिस प्रकार चित्तवृत्तिनिरोध से आत्मगत आनन्दादि गुण प्रतीत होते हैं, इसी प्रकार अस्मितायोग से उपासक को ब्रह्मानन्द अपना ही आनन्द प्रतीत होता है। इसी आनन्द को प्राप्त होकर उपासक को किसी अन्य वस्तु की इच्छा नहीं रहती। इसी अवस्था का निरूपण उपनिषदों में नदी-समुद्र के दृष्टान्त से किया है कि जिस प्रकार नदी महासागर को प्राप्त होकर इस प्रकार महत्त्व को धारण कर लेती है कि उसमें और महासागर में कोई भेद-भाव प्रतीत नहीं  होता। वास्तव में नदी का क्षुद्र भाव और समुद्र का महान् भाव उस समय एकत्व को धारण किये हुए प्रतीत होता है। इसी भाव को “पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम्। उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति॥” यजु० ३१। २॥इत्यादि मन्त्रों में वर्णन किया कि यह जो कुछ चराचर जगत् है, यह सब ईश्वराश्रित है। इसी अवस्था का नाम अद्वैतावस्था है। इसी को महर्षि व्यास ने “अविभागेन तु दृष्टत्वात्”॥ब्र. सू. ४। ४। ४॥इत्यादि सूत्रों में निरूपण किया है कि उस ब्रह्म में उपासक अविभागावस्था को प्राप्त होकर अर्थात् एकत्व योग को प्राप्त होकर स्थिर होता है। उस अवस्था को ऋग्वेद में इस प्रकार वर्णन किया है कि−“अनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किं चनास॥” ऋ. १०। १२९। २॥प्रलयकाल में ब्रह्म अपनी प्रकृति व जीव रूप शक्ति को अपने भीतर लय लेता है अर्थात् उस समय उनकी कोई भिन्न सत्ता प्रतीत नहीं होती। इसी प्रकार अस्मितायोग में उपासक की भिन्न सत्ता प्रतीत नहीं होती। अस्मितायोग, समाधि, ब्रह्मभाव ये सब एकार्थवाचीशब्द हैं। इसी अवस्था को “तत्त्वमसि” “अहं ब्रह्मास्मि” इत्यादि वाक्य निरूपण करते हैं। इस अवस्था को प्राप्त होकर योगी अपने में अपार सत्ता को अनुभव करता है। उस अपार सत्ता के सहारे उसे अपने में किञ्चिन्मात्र भी दुर्बलता प्रतीत नहीं होती। इसी ईश्वरयोग के उच्च शिखर पर आरूढ़ होकर श्रीकृष्णजी ने गीता में यह कहा है कि “पश्य मे योगमैश्वरम्” मेरे ईश्वरविषयक योग को अनुभव करो। इस अवस्था में उपासक दृढ़ता के साथ यह कह सकता है कि “मैं ईश्वर का ध्यान करता हूँ वा मैं उसको जानता हूँ”, इसका प्रतिपादक वेद का यह मन्त्र है “वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्। तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय”॥यजु. ३१। १८॥जो अन्धेरे से प्रकाश के समान अविद्या से परे है, जिसकी अखण्डनीय सत्ता है और सबसे बड़ा अर्थात् ‘विष्णु’ व्यापकरूप से सब में व्यापक हो रहा है, उस पूर्ण पुरुष को मैं जानता हूँ। यह ध्यानयोग की चौथी अवस्था है, इसको अस्मितायोग भी कहते हैं।इस विषय को वेद इस प्रकार वर्णन करता है “योगाय योक्तारम्”॥यजु. ३०। १४॥“सह योगं भजन्तु मे”॥अथर्व. का. १९। ८। २॥“योगे योगे तवस्तरं वाजे वाजे हवामहे”॥अथर्व १९। २४। ७॥“सीरा युञ्जन्ति कवयो युगा वितन्वते पृथक्”॥ यजु. १२। ६७॥“युञ्जे वाचं शतपदीम्” ॥सा. उ. ९। २। ७॥कि परमात्मा आध्यात्मिक विद्या के लिये योगी जनों को उत्पन्न करता है और जीवों की प्रार्थना में अभ्युदयादि सुखों के साथ योगानन्दादि सुखों की प्रार्थनायें भी पाई जाती हैं।  इतना ही नहीं, किन्तु ऋग्वेद और यजुर्वेद में तो योगविद्या का विधान भी भलीभाँति पाया जाता है, जैसे कि “सीरा युञ्जन्ति कवयः” विद्वान् लोग सुषुम्नादि नाड़ियों द्वारा योग करते हैं और योगविद्या-विषय में ऋग्वेद के दो मन्त्र हम प्रथम प्रमाण दे आये हैं। इस प्रकार व्यापक परमात्मा में चित्त स्थिर करने का नाम योग है और वह व्यापक परमात्मा यहाँ विष्णु नाम से निरूपण किया गया। “यो वेवेष्टि व्याप्नोति चराचरं जगत् स विष्णुः” जो परमात्मा इस चराचर ब्रह्माण्ड (व्याप्य) को एकदेश में स्थिर करके अधिकरणरूप से विराजमान है, उसका नाम यहाँ ‘विष्णु’ है।इस अन्तरात्मा को अन्तर्यामी-ब्राह्मण में विशेषरूप से वर्णन किया गया है। उसी का नाम यहाँ विष्णु वा बृहस्पति है। विष्णु, बृहस्पति, अन्तर्यामी ये सब सर्वव्यापक आत्मशक्ति के नाम हैं, किसी व्यक्तिविशेष के नहीं॥

ति॒स्रो वाचः॒ प्र व॑द॒ ज्योति॑रग्रा॒ या ए॒तद्दु॒ह्रे म॑धुदो॒घमूधः॑। स व॒त्सं कृ॒ण्वन्गर्भ॒मोष॑धीनां स॒द्यो जा॒तो वृ॑ष॒भो रो॑रवीति॥

इस मन्त्र में स्वभावोक्ति अलङ्कार से परमात्मा ने यह उपदेश किया है कि विद्युत् शक्ति को वत्स और आकाशस्थ मेघमण्डल को ऊधस्थानी बनाकर ऋत्विजों को ऋचारूपी हस्तों द्वारा दोग्धा बनाया है। तात्पर्य यह हैं कि वर्षाऋतु में ऋत्विजों को उद्गाता आदिकों के उच्च स्वरों से वेदमन्त्रों को गायन करना चाहिये, ताकि वृष्टि सुखप्रद और समय सुखप्रद प्रतीत हो॥१॥

यो वर्ध॑न॒ ओष॑धीनां॒ यो अ॒पां यो विश्व॑स्य॒ जग॑तो दे॒व ईशे॑। स त्रि॒धातु॑ शर॒णं शर्म॑ यंसत्त्रि॒वर्तु॒ ज्योतिः॑ स्वभि॒ष्ट्य१॒॑स्मे॥

जो परमात्मा उक्त वर्षादि ऋतुओं में ओषधियों को बढ़ाता है और जो सब ओषधियों में रसों का आविष्कार करनेवाला है, वह परमात्मा इस त्रिधातु शरीर में सुख दे और सब प्रकार के ऐश्वर्य प्राप्त कराये॥२॥

स्त॒रीरु॑ त्व॒द्भव॑ति॒ सूत॑ उ त्वद्यथाव॒शं त॒न्वं॑ चक्र ए॒षः। पि॒तुः पयः॒ प्रति॑ गृभ्णाति मा॒ता तेन॑ पि॒ता व॑र्धते॒ तेन॑ पु॒त्रः॥

वर्षाऋतु में मेघ नवप्रसूता गौ के समान अपने दुग्धरूपी पयःपुञ्ज से संसार को परिपूर्ण कर देता है, वा यों कहो कि द्यु पिता और पृथिवी मातास्थानी बनकर वर्षाऋतु में नाना प्रकार की  सम्पत्ति उत्पन्न करते हैं और जो यहाँ पितास्थानी द्युलोक का बढ़ना कथन किया गया है, वह उसके ऐश्वर्य के भाव से है, कुछ आकारवृद्धि के अभिप्राय से नहीं॥३॥

यस्मि॒न्विश्वा॑नि॒ भुव॑नानि त॒स्थुस्ति॒स्रो द्याव॑स्त्रे॒धा स॒स्रुरापः॑। त्रयः॒ कोशा॑स उप॒सेच॑नासो॒ मध्वः॑ श्चोतन्त्य॒भितो॑ विर॒प्शम्॥

जिस परमात्मा में अन्नमय, प्राणमय और मनोमय इन तीनों कोशोंवाले अनन्त जीव निवास करते हैं और निखिल ब्रह्माण्ड उसी में स्थिर हैं, उसी परमात्मा की सत्ता से जीव संचित, क्रियमाण और प्रारब्ध तीन प्रकार के कर्मों की वृष्टि करता है। वह परमात्मा मेघ के समान आनन्दों की वृष्टि करता है। इस मन्त्र में रूपकालङ्कार से परमात्मा को मेघवत् वृष्टिकर्त्ता वर्णन किया गया है॥४॥

इ॒दं वचः॑ प॒र्जन्या॑य स्व॒राजे॑ हृ॒दो अ॒स्त्वन्त॑रं॒ तज्जु॑जोषत्। म॒यो॒भुवो॑ वृ॒ष्टयः॑ सन्त्व॒स्मे सु॑पिप्प॒ला ओष॑धीर्दे॒वगो॑पाः॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे उद्गातादि लोगो! तुम लोग अपने सम्राट् के हृदय में इस बात को बलपूर्वक भर दो कि जिस प्रकार वृष्टिकर्त्ता मेघ हम पर वृष्टि करके नाना प्रकार की ओषधियें उत्पन्न करते हैं और जिस प्रकार परमात्मा इस संसार में आनन्द की वृष्टि करता है, इसी प्रकार हे राजन्! आप अपनी प्रजा के लिये न्यायनियम से सुख के वृष्टिकर्त्ता हों॥५॥

स रे॑तो॒धा वृ॑ष॒भः शश्व॑तीनां॒ तस्मि॑न्ना॒त्मा जग॑तस्त॒स्थुष॑श्च। तन्म॑ ऋ॒तं पा॑तु श॒तशा॑रदाय यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

जिस परमात्मा में चराचर सब जीव निवास करते हैं और जो प्रकृतिरूपी बीजकोष धारण किये हुए है, अर्थात् जिससे तीनों गुणों की साम्यावस्थारूप प्रकृति और जीवरूप प्रकृति सदा भिन्न होकर विराजमान हैं, उसी एकमात्र परमात्मा से अपने सदाचार और सत्यता की प्रार्थना करनी चाहिये॥६॥यह १०१वाँ सूक्त और पहला वर्ग समाप्त हुआ॥

प॒र्जन्या॑य॒ प्र गा॑यत दि॒वस्पु॒त्राय॑ मी॒ळ्हुषे॑। स नो॒ यव॑समिच्छतु॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे पुरुषो! तुम तृप्तिजनक वस्तुओं का वर्णन करो, जिससे तुममें ऐश्वर्यप्राप्ति के लिये उद्योग उत्पन्न हो॥१॥

यो गर्भ॒मोष॑धीनां॒ गवां॑ कृ॒णोत्यर्व॑ताम्। प॒र्जन्यः॑ पुरु॒षीणा॑म्॥

जिस सर्वतृप्तिकारक परमात्मा ने सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों को रच कर ओषधियों को उत्पन्न किया और जिसने मनुष्यों की बुद्धि की तृप्ति करने के लिये अपने अनन्त ज्ञान को मनुष्यों के लिये दिया, उसकी उपासना प्रत्येक मनुष्य को करनी चाहिये॥२॥

तस्मा॒ इदा॒स्ये॑ ह॒विर्जु॒होता॒ मधु॑मत्तमम्। इळां॑ नः सं॒यतं॑ करत्॥

एकमात्र वही परमात्मा ऐश्वर्यों के लिये प्रार्थनीय है, अन्य नहीं॥३॥यह १०२वाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

सं॒व॒त्स॒रं श॑शया॒ना ब्रा॑ह्म॒णा व्र॑तचा॒रिणः॑। वाचं॑ प॒र्जन्य॑जिन्वितां॒ प्र म॒ण्डूका॑ अवादिषुः॥

वृष्टिकाल में वेदपाठ का व्रत करनेवाले ब्राह्मण वेदपाठ का व्रत करते हैं और उस समय में प्रायः उन सूक्तों को पढ़ते हैं, जो तृप्तिजनक हैं। दूसरे पक्ष में इस मन्त्र का यह भी अर्थ है कि वर्षाऋतु में मण्डन करनेवाले जीव वर्षाऋतु में ऐसी ध्वनि करते हैं, मानों एक वर्ष के अनन्तर उन्होंने अपने मौनव्रत को उपार्जन करके इसी ऋतु में बोलना प्रारम्भ किया है। तात्पर्य यह है कि इस मन्त्र में परमात्मा ने यह उपदेश किया है कि जिस प्रकार क्षुद्र जन्तु भी वर्षाकाल में आह्लादजनक ध्वनि करते हैं अथवा यों कहो कि परमात्मा के यश को गायन करते हैं, एवं हे वेदज्ञ लोगों! तुम भी वेद का गायन करो। मालूम होता है कि श्रावणी का उत्सव, जो भारतवर्ष में प्रायः वैदिक सर्वत्र मनाते हैं, यह वेदपाठ से ईश्वर के महत्त्वगायन का उत्सव था॥१॥

दि॒व्या आपो॑ अ॒भि यदे॑न॒माय॒न्दृतिं॒ न शुष्कं॑ सर॒सी शया॑नम्। गवा॒मह॒ न मा॒युर्व॒त्सिनी॑नां म॒ण्डूका॑नां व॒ग्नुरत्रा॒ समे॑ति॥

इस मन्त्र में यह बोधन किया है कि वर्षाकाल के साथ मेंढकादि जीवों का ऐसा घनिष्ठ सम्बन्ध है, जैसा इन्द्रियों का इन्द्रियों की वृत्तियों के साथ। जैसे इन्द्रियों की यथार्थ ज्ञानरूप प्रमा आदि वृत्तियें इन्द्रियों को मण्डन करती हैं, इसी प्रकार ये वर्षाऋतु को मण्डन करते हैं।दूसरी बात इस मन्त्र से यह स्पष्ट होती है कि मण्डूकादिकों का जन्म मैथुनी सृष्टि के समान मैथुन से नहीं होता, किन्तु प्रकृतिरूप बीज से ही वे उत्पन्न हो जाते हैं, इससे अमैथुनी सृष्टि होने का नियम भी परमात्मा ने इस मन्त्र में दर्शा दिया।जो लोग यह कहा करते हैं कि वेदों में कोई अपूर्वता नहीं, उसमें तो मेंढक और मत्स्यों का बोलना आदिक भी लिखा है, उनको ऐसे सूक्त ध्यानपूर्वक पढ़ने चाहिये। इन वर्षाऋतु के सूक्तों ने इस बात को स्पष्ट कर दिया कि जिस उत्तमता के साथ वर्षाऋतु का वर्णन वेद में है, वैसा आज तक किसी कवि ने नहीं किया, अर्थात् जो प्राकृत नियमों की अपूर्वता, ईश्वरीयज्ञान वेद कर सकता है, उसको जीव का तुच्छ ज्ञान कैसे कर सकता है। जीव का ज्ञान तो केवल वेदों से एक जल के बिन्दु के समान एक अंश को लेकर वर्णन करता है।जो लोग यह कहा करते हैं कि ऋग्वेद सिन्धु नदी अर्थात् अटक के आस-पास बना, उनको इस सूक्त से यह शिक्षा लेनी चाहिये कि इसमें तो उन देशों का वर्णन पाया जाता है, जिनमें घोर वृष्टि होती है और सिन्धु नदी के तट पर तो वर्षाऋतु ही नहीं होती। कभी-कभी आगन्तुक वृष्टि होती है। अस्तु, ऐसे निर्मूल आक्षेपों की वेदों में क्या कथा ? इनमें तो लोक-लोकान्तरों के सब पदार्थों का वर्णन पाया जाता है, फिर एकदेशी होने का आक्षेप निर्मूल नहीं तो क्या ?॥२॥

यदी॑मेनाँ उश॒तो अ॒भ्यव॑र्षीत्तृ॒ष्याव॑तः प्रा॒वृष्याग॑तायाम्। अ॒ख्ख॒ली॒कृत्या॑ पि॒तरं॒ न पु॒त्रो अ॒न्यो अ॒न्यमुप॒ वद॑न्तमेति॥

वर्षाऋतु में जीव ऐसे आनन्द से विचरते हैं और अपने भावों को अपनी चेष्टा तथा वाणियों से बोधन करते हुए पुत्रों के समान अपने वृद्ध पितरों के पास जाते हैं। इस मन्त्र में स्वभावोक्ति अलङ्कार से वर्षा के जीवों की चेष्टा का वर्णन किया है और इसमें यह भी शिक्षा दी है कि जैसे क्षुद्र जन्तु भी अपने वृद्धों के पास जाकर अपने भाव को प्रकट करते हैं, इस प्रकार तुम भी अपने वृद्धों के पास जाकर अपने भावों को प्रकट करो॥३॥

अ॒न्यो अ॒न्यमनु॑ गृभ्णात्येनोर॒पां प्र॑स॒र्गे यदम॑न्दिषाताम्। म॒ण्डूको॒ यद॒भिवृ॑ष्टः॒ कनि॑ष्क॒न्पृश्निः॑ सम्पृ॒ङ्क्ते हरि॑तेन॒ वाच॑म्॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे जीवो! तुम प्रकृतिसिद्ध वर्षा आदि ऋतुओं में नूतन-नूतन भावों को ग्रहण करनेवाले जल-जन्तुओं से शिक्षा लाभ करो कि वे जिस प्रकार हर्षित होकर उद्योगी बनते हैं, इसी प्रकार तुम भी उद्योगी बनो॥४॥

यदे॑षाम॒न्यो अ॒न्यस्य॒ वाचं॑ शा॒क्तस्ये॑व॒ वद॑ति॒ शिक्ष॑माणः। सर्वं॒ तदे॑षां स॒मृधे॑व॒ पर्व॒ यत्सु॒वाचो॒ वद॑थ॒नाध्य॒प्सु॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि जिस प्रकार जलजन्तु भी एक-दूसरे की चेष्टा से शिक्षालाभ करते हैं और एक ही प्रकार की भाषा सीखते हैं, इस प्रकार तुम भी परस्पर शिक्षालाभ करते हुए एक प्रकार की भाषा से भाषण करो॥५॥

गोमा॑यु॒रेको॑ अ॒जमा॑यु॒रेकः॒ पृश्नि॒रेको॒ हरि॑त॒ एक॑ एषाम्। स॒मा॒नं नाम॒ बिभ्र॑तो॒ विरू॑पाः पुरु॒त्रा वाचं॑ पिपिशु॒र्वद॑न्तः॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि जिस प्रकार जन्तु भी स्वरभेद, आकारभेद और वर्णभेद रखते हुए जातिभेद और वाणीभेद नहीं रखते, इस प्रकार हे मनुष्यों! तुमको प्राकृत जन्तुओं से शिक्षा लेकर भी वाणी का एकत्व और जाति का एकत्व दृढ़ करना चाहिये। जो पुरुष वाणी के एकत्व को और जाति के एकत्व को दृढ़ नहीं रख सकता, वह अपने मनुष्यत्व को भी नहीं रख सकता॥६॥

ब्रा॒ह्म॒णासो॑ अतिरा॒त्रे न सोमे॒ सरो॒ न पू॒र्णम॒भितो॒ वद॑न्तः। सं॒व॒त्स॒रस्य॒ तदहः॒ परि॑ ष्ठ॒ यन्म॑ण्डूकाः प्रावृ॒षीणं॑ ब॒भूव॑॥

उक्त मन्त्र में परमात्मा ने वर्षाकाल में वैदिकोत्सव के मनाने का उपदेश किया है कि हे मनुष्यों! तुम वर्षाऋतु में प्रकृति के विचित्र दृश्य को देख कर वैदिक सूक्तों से उपासना करो और सोमादि यज्ञों द्वारा ब्रह्मोत्सवों को मनाओ। विचित्र बात है कि जिस जाति के धर्मपुस्तक में यह उपदेश था, उस जाति में इस भाव को छोड़कर अन्य सब प्रकार के उत्सव वर्षाऋतु में मनाये जाते हैं, किन्तु वैदिकोत्सव कोई नहीं मनाया जाता, इससे हानिप्रद बात और क्या हो सकती है॥७॥

ब्रा॒ह्म॒णासः॑ सो॒मिनो॒ वाच॑मक्रत॒ ब्रह्म॑ कृ॒ण्वन्तः॑ परिवत्स॒रीण॑म्। अ॒ध्व॒र्यवो॑ घ॒र्मिणः॑ सिष्विदा॒ना आ॒विर्भ॑वन्ति॒ गुह्या॒ न के चि॑त्॥

वेदव्रती ब्राह्मण ब्रह्म के यश को गायन करने के लिये एकान्त स्थान में बैठें और वे शीतोष्णादि द्वन्द्वों को सहते हुए तितिक्षु और तपस्वी बन कर अपने व्रत को पूर्ण करें॥८॥

दे॒वहि॑तिं जुगुपुर्द्वाद॒शस्य॑ ऋ॒तुं नरो॒ न प्र मि॑नन्त्ये॒ते। सं॒व॒त्स॒रे प्रा॒वृष्याग॑तायां त॒प्ता घ॒र्मा अ॑श्नुवते विस॒र्गम्॥

वर्षाकाल में ब्राह्मण लोग तप करें अर्थात् संयमी बनकर वेदपाठ करें। यहाँ व्रत से उसी व्रत का विधान है, जिसका “अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि”॥ यजु. १।५॥इत्यादि मन्त्रों से वर्णन किया गया है। इससे यह बात भी सिद्ध होती है कि वैदिक समय में ईश्वरार्चन केवल वैदिक सूक्तों के द्वारा ही क्रिया जाता था अर्थात् जो सूक्त ईश्वर के यश को वर्णन करते हैं, उनके पढ़ने का नाम ही उस समय ईश्वरार्चन था। जो ईश्वर के प्रतिनिधि बनाकर इस समय में मृण्मय देव पूजे जाते हैं, मालूम होता है उस समय भारतवर्ष में यह प्रथा न थी, हाँ इतना अवश्य हुआ कि जिन-जिन ऋतुओं में वैदिक यज्ञ होते थे वा प्रकृति के सौन्दर्य को देखकर वर्षादि ऋतुओं में वैदिक उत्सव किये जाते थे, उनके स्थान में अब अन्य प्रकार के उत्सव और पूजन होने लग पड़े, इस बात का प्रमाण निम्नलिखित मन्त्र में दिया जाता है॥९॥

गोमा॑युरदाद॒जमा॑युरदा॒त्पृश्नि॑रदा॒द्धरि॑तो नो॒ वसू॑नि। गवां॑ म॒ण्डूका॒ दद॑तः श॒तानि॑ सहस्रसा॒वे प्र ति॑रन्त॒ आयुः॑॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे जीवो! तुम वर्षाकाल से अनन्त प्रकार की शिक्षा का लाभ करो और अपने ऐश्वर्य और आयु की वृद्धि की प्रार्थना करो। यद्यपि केवल प्रार्थना से ऐश्वर्य और आयु की वृद्धि नहीं होती, तथापि जिसके हृदय में आयुर्वृद्धि और ऐश्वर्यवृद्धि का भाव उत्पन्न होता है, वह उसकी प्राप्ति के लिये यज्ञ अवश्य करता है। इस नियम के अनुसार परमात्मा ने जीवों को प्रार्थना का उपदेश प्रधानरूप से दिया है, अस्तु। मुख्य प्रसङ्ग यह है कि वर्षाऋतु का वर्णन इस सूक्त से भलीभाँति किया गया है और वर्षाऋतु का मण्डन करनेवाले मण्डूकादि जीवों की रचना से शिक्षालाभ का उपदेश इस सूक्त का तात्पर्य है। जो लोग यह कहा करते हैं कि वेद में ऐसे भी सूक्त हैं, जिनके मण्डूक देवता हैं, उनको यह समझ लेना चाहिये कि मण्डूक देवता होना कोई निन्दा की बात नहीं, वेदों के महत्त्व की बात है, क्योंकि जब देवता शब्द के अर्थ यह हैं कि ‘दीव्यतीति देवः’ जो प्रकाश करे, तो क्या मण्डूक किसी विद्या का प्रकाश नहीं करते, यदि न करते तो बाईआलोजी विद्या में मण्डूकादि जन्तुओं की आवश्यकता क्यों पड़ती ?   इससे स्पष्ट सिद्ध है कि परमात्मा ने सब विद्याओं का मूलभूत बीज वेद में पहले से ही रख दिया है। दूसरी बात यह है कि यदि वेद में वर्षाऋतु का वर्णन न होता, तो कवि लोग कहाँ से इसका वर्णन करते। सच तो यह है कि जिस सौन्दर्य के साथ इस सूक्त में वर्षाऋतु का वर्णन किया है, उस सौन्दर्य्य के साथ आदिकवि वाल्मीकि भी वर्षाऋतु को वर्णन नहीं कर सके। इससे अधिक वेदों का महत्त्व और क्या हो सकता है कि सबसे उत्तम साहित्य और सर्वोपरि पदार्थविद्या का वर्णन वेद के अनेक सूक्तों में पाया जाता है॥१०॥यह १०३वाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ॥

इन्द्रा॑सोमा॒ तप॑तं॒ रक्ष॑ उ॒ब्जतं॒ न्य॑र्पयतं वृषणा तमो॒वृधः॑। परा॑ शृणीतम॒चितो॒ न्यो॑षतं ह॒तं नु॒देथां॒ नि शि॑शीतम॒त्रिणः॑॥

हे परमात्मन्! जो राक्षसी वृत्ति से प्रजा में अनाचार फैलाते हैं, आप उनका नाश करें। यहाँ राक्षस कोई जातिविशेष नहीं, किन्तु जिनसे प्रजा में शान्ति और न्यायनियम का भङ्ग होता है, उन्हीं का नाम राक्षस है। तात्पर्य यह है कि परमात्मा ने जीवों की प्रार्थना द्वारा इस बात को प्रकट किया है कि दुष्ट दस्युओं के नाश करने का भाव आप अपने हृदय में उत्पन्न किया करें। जब आपके शुद्ध हृदय से यह प्रबल प्रवाह उत्पन्न होगा, तो पापपङ्करूपी दस्युदल उसमें अवश्य बह जायगा। वा यों कहो कि इस सूक्त में परमात्मा ने शील से अनाचार के दूर करने का उपदेश किया। जो लोग सुशीलतादि दिव्यगुणसम्पन्न हैं, वे ही ‘देवता’ और जो लोग सुशीलतारहित केवल अन्याय से अपनी प्राणयात्रा करते हैं अर्थात् ‘असुषु रमन्ते ये ते असुराः’ जो लोग केवल प्राणों की रक्षा ही में रत हों, उनका नाम यहाँ ‘असुर’ है, यही अर्थ सर्वत्र समझ लेना चाहिये॥१॥

इन्द्रा॑सोमा॒ सम॒घशं॑सम॒भ्य१॒॑घं तपु॑र्ययस्तु च॒रुर॑ग्नि॒वाँ इ॑व। ब्र॒ह्म॒द्विषे॑ क्र॒व्यादे॑ घो॒रच॑क्षसे॒ द्वेषो॑ धत्तमनवा॒यं कि॑मी॒दिने॑॥

जो लोग वेदद्वेषी और अघायु पुरुषों के दमन करने का भाव नहीं रखते, वे परमात्मा की आज्ञा को यथावत् पालन नहीं कर सकते, इसलिये परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे पुरुषो! तुम पापात्मा धर्मानुष्ठानविहीन धर्मद्वेषी पुरुषों से सदैव ग्लानि करो और जो केवल कुतर्कपरायण होकर अहर्निश धर्मनिन्दा में तत्पर रहते हैं, उनको भी द्वेषबुद्धि से अपने से दूर करो। तात्पर्य यह है कि वैदिक लोगों को चाहिये कि वे सत्कर्मों और धर्मरत पुरुषों का सम्मान करें, औरों का नहीं॥२॥

इन्द्रा॑सोमा दु॒ष्कृतो॑ व॒व्रे अ॒न्तर॑नारम्भ॒णे तम॑सि॒ प्र वि॑ध्यतम्। यथा॒ नातः॒ पुन॒रेक॑श्च॒नोदय॒त्तद्वा॑मस्तु॒ सह॑से मन्यु॒मच्छवः॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा के मन्यु का वर्णन किया है, जैसा कि अन्यत्र भी कहा है कि ‘मन्युरसि मन्युं महि धेहि’ कि आप मन्युस्वरूप हैं, मुझे भी मन्यु प्रदान करें। मन्यु के अर्थ यहाँ परमात्मा की दमनरूप शक्ति के हैं। जैसा कि ‘महद्भयं वज्रमुद्यतम्’। कठ. ६।२। हे परमात्मन्! आपकी दमनरूप शक्ति से वज्र उठाये हुए के समान भय प्रतीत होता है। इसमें सन्देह नहीं कि दुष्टों के दमन के लिये परमात्मा भयरूप है, इसी अभिप्राय से कहा है कि ‘भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः’ उसके दमनरूप शक्ति के नियम में आकर सब सूर्य-चन्द्रादि भ्रमण करते हैं, इस भाव को इस सूक्त में वर्णन किया है॥३॥

इन्द्रा॑सोमा व॒र्तय॑तं दि॒वो व॒धं सं पृ॑थि॒व्या अ॒घशं॑साय॒ तर्ह॑णम्। उत्त॑क्षतं स्व॒र्यं१॒॑ पर्व॑तेभ्यो॒ येन॒ रक्षो॑ वावृधा॒नं नि॒जूर्व॑थः॥

जिस प्रकार मेघों से बिजली उत्पन्न होकर पृथिवीतल पर गिरती है, इस प्रकार अन्यायकारी शत्रुओं के लिये परमात्मा अनेकविध शस्त्र-अस्त्रों को उत्पन्न करके उनका हनन करता है॥४॥

इन्द्रा॑सोमा व॒र्तय॑तं दि॒वस्पर्य॑ग्नित॒प्तेभि॑र्यु॒वमश्म॑हन्मभिः। तपु॑र्वधेभिर॒जरे॑भिर॒त्रिणो॒ नि पर्शा॑ने विध्यतं॒ यन्तु॑ निस्व॒रम्॥

भाव यह है कि अन्यायकारी दुष्टों के दमन करने को परमात्मा अनेक प्रकार कथन करते हैं॥५॥

इन्द्रा॑सोमा॒ परि॑ वां भूतु वि॒श्वत॑ इ॒यं म॒तिः क॒क्ष्याश्वे॑व वा॒जिना॑। यां वां॒ होत्रां॑ परिहि॒नोमि॑ मे॒धये॒मा ब्रह्मा॑णि नृ॒पती॑व जिन्वतम्॥

मन्त्र में ‘इमा ब्रह्माणि’ के अर्थ वैदिक वाणियों के हैं। जिस प्रकार वेद की वाणियें नृपति राजा को कर्म में और अपने स्वधर्म में प्रेरणा करती हैं वा यों कहो कि जिस प्रकार प्रजा की प्रार्थनायें राजा को दुष्टदमन के लिये उद्यत करती हैं, इसी प्रकार आप हमारी प्रार्थनाओं से दुष्ट दस्युओं का दमन करके प्रजा में शान्ति का राज्य फैलावें॥६॥

प्रति॑ स्मरेथां तु॒जय॑द्भि॒रेवै॑र्ह॒तं द्रु॒हो र॒क्षसो॑ भङ्गु॒राव॑तः। इन्द्रा॑सोमा दु॒ष्कृते॒ मा सु॒गं भू॒द्यो नः॑ क॒दा चि॑दभि॒दास॑ति द्रु॒हा॥

दुष्टाचारी अन्यायकारियों के प्रति दण्ड देने का विधान इस मन्त्र में किया गया है। तात्पर्य यह है कि जो पुरुष क्रूरप्रकृति हैं, वे यथायोग्य दण्ड के अधिकारी होते हैं, क्षमा के नहीं॥७॥

यो मा॒ पाके॑न॒ मन॑सा॒ चर॑न्तमभि॒चष्टे॒ अनृ॑तेभि॒र्वचो॑भिः। आप॑ इव का॒शिना॒ संगृ॑भीता॒ अस॑न्न॒स्त्वास॑त इन्द्र व॒क्ता॥

इस मन्त्र में शुद्ध मन से आचरण करने की अत्यन्त प्रशंसा की है कि जो पुरुष कायिक, वाचिक और मानस तीनों प्रकार से शुद्धभाव और सत्यवादी रहते हैं, उनके समान कोई असत्यवादी ठहर नहीं सकता। तात्पर्य यह है कि मनुष्य को अपनी सच्चाई पर सदा दृढ़ रहना चाहिये॥८॥

ये पा॑कशं॒सं वि॒हर॑न्त॒ एवै॒र्ये वा॑ भ॒द्रं दू॒षय॑न्ति स्व॒धाभिः॑। अह॑ये वा॒ तान्प्र॒ददा॑तु॒ सोम॒ आ वा॑ दधातु॒ निॠ॑तेरु॒पस्थे॑॥

जो लोग अपने साहस से सद्धर्मपरायण पुरुषों को दूषित करते हैं, उनको परमात्मा हिंसकों के वशीभूत करता है अथवा पापात्मा पुरुषों के मध्य में फेंक देता है, जिससे वे स्वयं पापी बन कर अपने कर्मों से आप ही नष्ट-भ्रष्ट हो जायें। तात्पर्य इस मन्त्र का यह है कि परमात्मा उसे दण्ड देने के अभिप्राय से पापात्मा पुरुषों के वशीभूत करता है, ताकि वे दण्ड भोग कर स्वयं शुद्ध हो जायें। परमात्मा को सबका सुधार करना अपेक्षित है। नाश  करना इस अभिप्राय से कहा गया कि परमात्मा उसके कुकर्म और कुवृत्तियों का नाश करता है, आत्मनाश नहीं॥९॥

यो नो॒ रसं॒ दिप्स॑ति पि॒त्वो अ॑ग्ने॒ यो अश्वा॑नां॒ यो गवां॒ यस्त॒नूना॑म्। रि॒पुः स्ते॒नः स्ते॑य॒कृद्द॒भ्रमे॑तु॒ नि ष ही॑यतां त॒न्वा॒३॒॑ तना॑ च॥

हे ज्ञानस्वरूप परमात्मन्! आप ऐसे राक्षसों को सदैव नाश को प्राप्त करें, जो धर्मचारी पुरुषों के बल, वीर्य और ऐश्वर्य को छिप कर वा किसी कुनीति से नाश करते हैं॥१०॥

प॒रः सो अ॑स्तु त॒न्वा॒३॒॑ तना॑ च ति॒स्रः पृ॑थि॒वीर॒धो अ॑स्तु॒ विश्वाः॑। प्रति॑ शुष्यतु॒ यशो॑ अस्य देवा॒ यो नो॒ दिवा॒ दिप्स॑ति॒ यश्च॒ नक्त॑म्॥

जो लोग सदाचारी लोगों को दुःख पहुँचाते हैं, वे तीनों लोकों से अर्थात् भूत, भविष्यत् वर्तमान तीनों काल के सुखों से वञ्चित हो जाते हैं। वा यों कहो कि भूतकाल में उनका ऐतिहासिक यश नष्ट हो जाता है और वर्तमानकाल में अशान्ति उत्पन्न होकर उनके शान्त्यादि सुख नाश को प्राप्त हो जाते हैं और भविष्य में उनका अभ्युदय नहीं होता, इस प्रकार वे तीनों लोकों से परे हो जाते हैं अर्थात् वञ्चित रहते हैं॥११॥

सु॒वि॒ज्ञा॒नं चि॑कि॒तुषे॒ जना॑य॒ सच्चास॑च्च॒ वच॑सी पस्पृधाते। तयो॒र्यत्स॒त्यं य॑त॒रदृजी॑य॒स्तदित्सोमो॑ऽवति॒ हन्त्यास॑त्॥

तात्पर्य यह है कि अपनी ओर से वे देव और असुर दोनों ही सत्यवादी बन सकते हैं अर्थात् देवता कहेगा कि मैं सत्यवादी हूँ और असुर कहेगा कि मैं सत्यवादी हूँ, परन्तु ये बात वास्तव में ठीक नहीं, क्योंकि विद्वान् इसका निर्णय कर सकता है कि अमुक सत्यवादी और अमुक असत्यवादी है। सत्य भी दो प्रकार का होता है, जैसा कि “ऋतञ्च सत्यञ्चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत”॥ऋग् १०।१९०।१॥इस मन्त्र में वर्णन किया है अर्थात् वाणी के सत्य को ऋत कहते हैं और भाविक सत्य को अर्थात् वस्तुगत सत्य को सत्य कहते हैं। देवता वे लोग कहलाते हैं, जो वाणीगत सत्य तथा वस्तुगत सत्य के बोलने और माननेवाले होते हैं अर्थात् सत्यवादी और सत्यमानी लोगों का नाम वैदिक परिभाषा में देव और सदाचारी है, इनसे विपरीत असत्यवादी और असत्यमानी लोगों का नाम असुर और राक्षस है। और यह बात असुर इस नाम से भी स्वयं प्रकट होती है, क्योंकि ‘असुषु रमन्त इत्यसुरः’ जो प्राणमयकोश वा अन्नमयकोशात्मक शरीर को ही आत्मा मानते हैं, वे असुर हैं। इसी अभिप्राय से ‘असुर्या नाम ते लोकाः’। यजुः ४०।३। इस मन्त्र में असुरों के आत्मीय लोगों को ‘असुर्याः’ कहा। इस परिभाषा के अनुसार प्रकृति, पुरुष और परमात्मा की जो भिन्न-भिन्न सत्ता नहीं मानते, वे भी एक प्रकार के असुर ही हैं। भाव यह है कि इस मन्त्र में देव और राक्षस का निर्णय स्वयं परमात्मा ने किया है॥१२॥

न वा उ॒ सोमो॑ वृजि॒नं हि॑नोति॒ न क्ष॒त्रियं॑ मिथु॒या धा॒रय॑न्तम्। हन्ति॒ रक्षो॒ हन्त्यास॒द्वद॑न्तमु॒भाविन्द्र॑स्य॒ प्रसि॑तौ शयाते॥

पापी पुरुष पाप से पश्चात्ताप करने पर अथवा ईश्वर के सम्बन्ध में सन्ध्या-वन्दनादि कर्मों के समय पर न करने से प्रत्यवायरूपी दोषों से मुक्त भी हो सकता है, एवं साहसी क्षत्रिय प्रजारक्षा के भाव से छोड़ा जा सकता है, पर राक्षस=अन्यायकारी, असत्यवादी=मिथ्याभाव प्रचार करनेवाला और मिथ्या आचार करनेवाला पाप से कदापि निर्मुक्त नहीं हो सकता। तात्पर्य यह है कि परमात्मा में दया और न्याय दोनों हैं। दया केवल उन्हीं पर करता है, जो दया के पात्र हैं वा यों कहो कि जिनके पाप आत्मा वा परमात्मा सम्बन्धी हैं और जो लोग दूसरों की वञ्चना करते हैं, वे अन्याय करते हैं, उनको परमात्मा कदापि क्षमा नहीं करता अर्थात् यथायोग्य दण्ड देता है, इस प्रकार परमात्मा न्यायशील है॥१३॥

यदि॑ वा॒हमनृ॑तदेव॒ आस॒ मोघं॑ वा दे॒वाँ अ॑प्यू॒हे अ॑ग्ने। किम॒स्मभ्यं॑ जातवेदो हृणीषे द्रोघ॒वाच॑स्ते निॠ॒थं स॑चन्ताम्॥

इस मन्त्र में प्रार्थना के भाव से मिथ्या देवों की उपासना का निषेध किया है अर्थात् ईश्वर से भिन्न किसी अन्य देव की उपासना का यहाँ बलपूर्वक निषेध किया है और जो लोग भिन्न-भिन्न देवताओं के पुजारी हैं, उनको राक्षस वा ईश्वर के दण्ड के पात्र बतलाया है। तात्पर्य यह है कि ईश्वर को छोड़ कर अन्य किसी की पूजा ईश्वरत्वेन कदापि नहीं करनी चाहिये, इस भाव का उपदेश इस मन्त्र में किया है॥१४॥

अ॒द्या मु॑रीय॒ यदि॑ यातु॒धानो॒ अस्मि॒ यदि॒ वायु॑स्त॒तप॒ पूरु॑षस्य। अधा॒ स वी॒रैर्द॒शभि॒र्वि यू॑या॒ यो मा॒ मोघं॒ यातु॑धा॒नेत्याह॑॥

इस मन्त्र से पूर्व के मन्त्र में मिथ्या देवों के पुजारियों को (यातुधाना) राक्षस वा दण्ड के भागी कथन किया गया है, उसी प्रकरण में वेदानुयायी आस्तिक पुरुष शपथ खाकर कहता है कि यदि मैं भी ऐसा हूँ, तो मेरा जीना सर्वथा निष्फल है, इससे मर जाना भला है। इस मन्त्र में परमात्मा ने इस बात की शिक्षा दी है कि जो पुरुष संसार का उपकार नहीं करता और सच्चे विश्वास से संसार में आस्तिक भाव का प्रचार नहीं करता, उसका जीना पृथ्वी के लिए एकमात्र भार है, उससे कोई लौकिक वा पारलौकिक उपकार नहीं।इसी भाव को भगवान् कृष्ण गीता में यों कहते हैं “अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति”। हे अर्जुन! जो पापमय आयु व्यतीत करता है और केवल अपने इन्द्रिय के ही भोगों में रत है, उसका जीवन सर्वथा निष्फल है। मालूम होता है वेद के उक्त (मोघ) शब्द से ही गीता में “मोघं पार्थ जीवति” यह वाक्य लिया गया है, कहीं अन्यत्र से नहीं। विशेष ध्यान रखने योग्य वेद की यह अपूर्व्वता अर्थात् अनूठापन है कि इसमें अपनी पवित्रता के लिए जीव शपथें खाता है और विधर्म्मी लोगों के धर्म्मपुस्तकों में अपनी सफाई के लिए ईश्वर भी शपथें खाकर विश्वास दिलाया करता है॥१५॥

यो माया॑तुं॒ यातु॑धा॒नेत्याह॒ यो वा॑ र॒क्षाः शुचि॑र॒स्मीत्याह॑। इन्द्र॒स्तं ह॑न्तु मह॒ता व॒धेन॒ विश्व॑स्य ज॒न्तोर॑ध॒मस्प॑दीष्ट॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे जीवो! तुम में से जो पुरुष सदाचारियों को मिथ्या ही दूषित करते हैं और स्वयं दम्भी बनकर सदाचारी, सत्यवादी और सत्यमानी बनते हैं, न्यायकारी राजाओं का काम है कि ऐसे पुरुषों को यथायोग्य दण्ड दें॥१६॥

प्र या जिगा॑ति ख॒र्गले॑व॒ नक्त॒मप॑ द्रु॒हा त॒न्वं१॒॑ गूह॑माना। व॒व्राँ अ॑न॒न्ताँ अव॒ सा प॑दीष्ट॒ ग्रावा॑णो घ्नन्तु र॒क्षस॑ उप॒ब्दैः॥

इस मन्त्र में राजधानी की रक्षा के लिए इस बात का उपदेश किया गया है जो स्त्री गुप्तचरी होकर रात को विचरती है और अपना भेद किसी को नहीं देती अथवा स्त्रियों के आचरण बिगाड़ने के लिए ऐसा रूप धारण करती है, उसको भी राक्षसों की श्रेणी में गिनना चाहिए, उसको राजा यथायोग्य दण्ड दे॥१७॥

वि ति॑ष्ठध्वं मरुतो वि॒क्ष्वि१॒॑च्छत॑ गृभा॒यत॑ र॒क्षसः॒ सं पि॑नष्टन। वयो॒ ये भू॒त्वी प॒तय॑न्ति न॒क्तभि॒र्ये वा॒ रिपो॑ दधि॒रे दे॒वे अ॑ध्व॒रे॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगी पुरुषों! आप लोग आकाशमार्ग में जाकर प्रजा को पीड़ा देनेवाले अन्तरायकारी राक्षसों को क्रियाकौशल द्वारा विमानादि यान बनाकर नाश करें। इस मन्त्र में परमात्मा ने प्रजा की रक्षा के लिए पुरुषों को सम्बोधन करके अन्यायकारी राक्षसों के हनन का उपदेश किया है॥१८॥

प्र व॑र्तय दि॒वो अश्मा॑नमिन्द्र॒ सोम॑शितं मघव॒न्त्सं शि॑शाधि। प्राक्ता॒दपा॑क्तादध॒रादुद॑क्ताद॒भि ज॑हि र॒क्षसः॒ पर्व॑तेन॥

पर्वत के अर्थ यहाँ उस शस्त्र के हैं, जिसमें पोरी के समान बहुत से पर्व पड़ते हों। निघण्टु में पर्वत मेघप्रकरण में भी पढ़ा गया है। जो लोग पर्वत के अर्थ पहाड़ के समझ लेते हैं वह अत्यन्त भूल करते हैं। हाँ वैदिक समय के बहुत पीछे पर्वत के अर्थ लौकिक भाषा में पहाड़ के भी बन गए। अस्तु−यहाँ प्रकरण शस्त्र का है, इसलिए इसके अर्थ शस्त्र के होने चाहिये, अन्य नहीं॥१९॥

ए॒त उ॒ त्ये प॑तयन्ति॒ श्वया॑तव॒ इन्द्रं॑ दिप्सन्ति दि॒प्सवोऽदा॑भ्यम्। शिशी॑ते श॒क्रः पिशु॑नेभ्यो व॒धं नू॒नं सृ॑जद॒शनिं॑ यातु॒मद्भ्यः॑॥

इस मन्त्र में ये सब कथन किया है कि दुष्टाचारी अन्यायकारी प्रजा को दुःख देते हैं, उन्हीं के लिए परमात्मा ने तीक्ष्ण शस्त्रों को रचा। तात्पर्य यह है कि परमात्मा उपद्रवी और दुष्टाचारियों को दमन करके संसार में शान्ति का राज्य फैलाना चाहता है॥२०॥

इन्द्रो॑ यातू॒नाम॑भवत्पराश॒रो ह॑वि॒र्मथी॑नाम॒भ्या॒३॒॑विवा॑सताम्। अ॒भीदु॑ श॒क्रः प॑र॒शुर्यथा॒ वनं॒ पात्रे॑व भि॒न्दन्त्स॒त ए॑ति र॒क्षसः॑॥

परमात्मा असत्कर्मी राक्षसों के मारने के लिये सदैव वज्र उठाये उद्यत रहता है, इसी अभिप्राय से उपनिषद् में कहा है कि ‘महद्भयं वज्रमुद्यतमिव’ परमात्मा वज्र उठाये पुरुष के समान अत्यन्त भयरूप है। यद्यपि परमात्मा शान्तिमय, सर्वप्रिय और सर्वव्यापक है, जिसमें निराकार और क्रोधरहित होने से वज्र का उठाना असम्भव है, तथापि उसके न्याय-नियम ऐसे बने हुए हैं कि उसको अनन्तशक्तियें दण्डनीय दुष्टाचारी राक्षसों के लिये सदैव वज्र उठाये रहती हैं, इसी अभिप्राय से मुग्दरादि सदैव काम करते हैं, कुछ परमात्मा के हाथों से नहीं॥२१॥

उलू॑कयातुं शुशु॒लूक॑यातुं ज॒हि श्वया॑तुमु॒त कोक॑यातुम्। सु॒प॒र्णया॑तुमु॒त गृध्र॑यातुं दृ॒षदे॑व॒ प्र मृ॑ण॒ रक्ष॑ इन्द्र॥

इस मन्त्र में परमात्मा ने अन्यायकारी मायावी और नानाप्रकार से न्यायकारियों पर आघात करनेवाले दुष्टों से बचने के लिये प्रार्थना का उपदेश किया है। यद्यपि प्रार्थना केवल वाणीमात्र से सफल नहीं होती, तथापि जब हार्दिक भाव से प्रार्थना की जाती है, तो उससे उद्योग उत्पन्न होकर मनुष्य अवश्यमेव कृतकार्य होता है॥२२॥

मा नो॒ रक्षो॑ अ॒भि न॑ड्यातु॒माव॑ता॒मपो॑च्छतु मिथु॒ना या कि॑मी॒दिना॑। पृ॒थि॒वी नः॒ पार्थि॑वात्पा॒त्वंह॑सो॒ऽन्तरि॑क्षं दि॒व्यात्पा॑त्व॒स्मान्॥

तात्पर्य यह है कि आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक तीनों प्रकार के तापों से हम सर्वथा वर्जित रहें अर्थात् पार्थिक शरीर में कोई आधिभौतिक ताप न हो और अन्तरिक्ष से हमें कोई आधिभौतिक ताप न व्यापे और मानस तापों के मूलभूत अन्यायकारी राक्षसों का विध्वंस होने से हमें कोई मानस ताप न व्याप्त हो और जो पृथिवी तथा अन्तरिक्ष से रक्षा का कथन है, वह तापनिवृत्ति के अभिप्राय से औपचारिक है, मुख्य नहीं॥२३॥

इन्द्र॑ ज॒हि पुमां॑सं यातु॒धान॑मु॒त स्त्रियं॑ मा॒यया॒ शाश॑दानाम्। विग्री॑वासो॒ मूर॑देवा ऋदन्तु॒ मा ते दृ॑श॒न्त्सूर्य॑मु॒च्चर॑न्तम्॥

इस मन्त्र में यह कथन किया है कि जो लोग मायावी और हिंसक होते हैं, वे शनैः-शनैः ज्ञानरहित होकर ऐसी मुग्धावस्था को प्राप्त हो जाते हैं कि फिर उनको सत्य और झूठ का विवेक नहीं रहता। परमात्मन्! ऐसे दुराचारियों को आप ऐसी मोहमयी निशा में सुलायें कि वह संसार में जागृति को प्राप्त न्यायकारी सदाचारियों को दुःख न दें॥२४॥

प्रति॑ चक्ष्व॒ वि च॒क्ष्वेन्द्र॑श्च सोम जागृतम्। रक्षो॑भ्यो व॒धम॑स्यतम॒शनिं॑ यातु॒मद्भ्यः॑॥

यह रक्षोघ्न सूक्त है, जिसके अर्थ ये हैं कि जिसमें राक्षसों का हनन हो, उसका नाम ‘रक्षोघ्न’ है। वास्तव में इस सूक्त में अन्यायकारी राक्षसों के हनन के लिए अनन्त प्रकार कथन किये गये हैं और वेदानुयायी आस्तिकों के वैदिक यज्ञ की निर्विघ्न समाप्ति के लिए रक्षा के अनेकशः उपाय वर्णन किये हैं, जिनको पढ़कर और जिनके अनुष्ठान से पुरुष वास्तव में आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक इन तीनों तापों से रहित हो सकता है। सच तो यह है कि आजकल वेदाभिमानिनी आर्यजाति अपने संकटों की निवृत्ति के लिए अनेक प्रकार के संकटमोचनों का पाठ करती है। यदि वह रक्षोघ्नादि सच्चे संकटमोचन सूक्तों का पाठ और अनुष्ठान करे, तो इसके संकट निवृत्त होने में तनिक भी सन्देह नहीं॥जो कई एक लोग यह शङ्का करते हैं कि वेदों का उच्चोद्येश्य तो यह है कि “मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्”॥यजु. ३६।१८॥प्राणिमात्र को मित्रता की दृष्टि से देखो, तो फिर ऐसे शान्तिधर्मप्रधान वेदों में राक्षसों के हनन करनेवाले सूक्तों का क्या प्रसङ्ग ? इसका उत्तर यह है कि वेद सब धर्मों का निरूपण करता है। वस्तुतः वेद की शिक्षा का फल संसार में शान्ति का प्रचार करना है, परन्तु जब कोई इस शान्तिरूपी यज्ञ में आकर विघ्न डाले, तो उसकी निवृत्ति के लिए वेद में वीरधर्म का भी उपदेश है, परन्तु यह धर्म वैदिक लोगों के मत में मुख्यस्थानी नहीं, किन्तु शरीर में बाहु के समान रक्षास्थानी है। इसी अभिप्राय से वेद में कहा है कि “ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत्”॥यजु. ३१।११॥ब्राह्मण ब्रह्मवेत्ता विद्वान् इस विराट् में मुख के समान है। इस प्रकार शान्तिप्रधान ब्रह्मविद्या ही वेदों का मुख्योद्देश्य है॥२५॥यह १०४वाँ सूक्त, छठा अनुवाक और नववाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

मण्डलम्

सूक्तम्

मा चि॑द॒न्यद्वि शं॑सत॒ सखा॑यो॒ मा रि॑षण्यत। इन्द्र॒मित्स्तो॑ता॒ वृष॑णं॒ सचा॑ सु॒ते मुहु॑रु॒क्था च॑ शंसत॥

इस मन्त्र में यह उपदेश किया है कि हे उपासक लोगो! तुम परमैश्वर्य्यसम्पन्न, सर्वरक्षक, सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाले और सबके कल्याणकारक एकमात्र परमात्मा की ही उपासना करो, किसी जड़ पदार्थ तथा किसी पुरुषविशेष की उपासना परमात्मा के स्थान में मत करो, सदा उसके साक्षात्कार करने का प्रयत्न करो और जिन आर्ष ग्रन्थों में परमात्मा का गुणवर्णन किया गया है अथवा जिन ग्रन्थों में उसके साक्षात्कार करने का विधान है, उन ग्रन्थों का नित्य स्वाध्याय करते हुए मनन करो। उक्त मन्त्र में स्पष्टतया वर्णन किया है कि जो परमात्मा से भिन्न जड़ोपासक हैं, वे आत्महिंसक=अपनी आत्मा का हनन करनेवाले हैं और आत्मा का हनन करनेवाले सदा असद्गति को प्राप्त होते हैं, जैसा कि यजु० ४०। ३ में भी वर्णन किया है किः− असुर्य्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः। तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः॥अर्थ−आत्महनः=आत्मा का हनन करनेवाले जनाः=जन मरने के पश्चात् असुरों के लोकों को प्राप्त होते हैं, जो अन्धतम से ढके हुए अर्थात् अन्धकारमय हैं। इस मन्त्र में “लोक” शब्द के अर्थ अवस्थाविशेष के हैं, लोकान्तर प्राप्ति के नहीं और इसी भाव को “अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते” यजु० ४०। ९ में इस प्रकार वर्णन किया है कि जो अविद्या=विपरीत ज्ञान की उपासना करते हैं, वे अन्धतम को प्राप्त होते हैं, या यों कहो कि जो परमात्मा के स्थान में जड़ोपासना करते हैं, वे अपने इष्टफल को प्राप्त नहीं होते अर्थात् परमात्मा से अन्य की उपासना करनेवाले आत्महिंसक ऐहिक और पारलौकिक सुख से सदा वञ्चित रहते हैं, इसलिये उचित है कि सुख की कामनावाला पुरुष एकमात्र परमात्मा की ही उपासना करे, क्योंकि परमात्मा सजातीय विजातीय तथा स्वगतभेदशून्य है, इसलिये उसका सजातीय कोई पदार्थ नहीं, इसी कारण यहाँ अन्य उपासनाओं का निषेध करके परमात्मा की ही उपासना वर्णित की है॥१॥महान् आत्मा ईश्वर को छोड़ के जो मूढ़ जड़ सूर्य्यादिकों की, मानवकल्पित विष्णुप्रभृतियों की और अवस्तु=प्रेत मृत पितृगण यक्ष गन्धर्व आदिकों की उपासना करते हैं, वे आत्महन् हो महान् अन्धकार में गिरते हैं, अतः सब छोड़ केवल ब्रह्म उपासनीय है, यह शिक्षा इससे देते हैं।

अ॒व॒क्र॒क्षिणं॑ वृष॒भं य॑था॒जुरं॒ गां न च॑र्षणी॒सह॑म्। वि॒द्वेष॑णं सं॒वन॑नोभयंक॒रं मंहि॑ष्ठमुभया॒विन॑म्॥

इस मन्त्र में गुणगुणिभाव से परमात्मा का स्वरूपवर्णन किया गया है कि वह परमात्मा अजर, अमर, अभय, नित्यपवित्र, सब मनुष्यों के कर्मों का द्रष्टा और जो सदाचारी मनुष्यों को सद्गति का प्रदाता है, वही मनुष्यमात्र का उपासनीय है। मन्त्र में लोकप्रसिद्ध मेघादिकों के दृष्टान्त इस अभिप्राय से कथन किये हैं कि साधारण पुरुष भी उसके गुणगौरव को जानकर उसकी स्तुति तथा उपासना करें, इस मन्त्र की व्याख्या शतपथ में इस प्रकार की है किः− एकधैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमेयं ध्रुवम्। विजरः पर आकाशादयमात्मा महान् ध्रुवः॥उसके जानने का एक ही प्रकार है कि वह जरादि अवस्थाओं से रहित महानात्मा आकाश से भी परे है, तात्पर्य्य यह है कि वैदिक लोग “दिवञ्च पृथिवीञ्चान्तरिक्षमथो स्वः” ऋग्० ८। ८। ४८। ३ इत्यादि मन्त्रों के प्रमाण द्वारा आकाश को एकदेशी और उत्पत्तिवाला मानते हैं, ईश्वर के समान सर्वव्यापक नहीं। इसी अभिप्राय से परमात्मा को आकाश से भी परे कहा है॥भाव यह है कि सब पदार्थों का निर्माता और अधिष्ठाता एकमात्र परमात्मा ही है और उसी की उपासना करना मनुष्यमात्र को उचित है॥सम्राट्, सेनाधिपति, न्यायाधीश आदि राजकर्मचारी, ग्रामनायक, लोकमान्य चौधरी या पञ्च, आचार्य्य, अध्यापक, गृहपत्नी, शिक्षिका, आचार्य्या इस प्रकार के धार्मिक, सामाजिक और राजकीय जन मिलकर प्रजाहितकर वस्तुओं की चिन्ता करें और समुत्थित विघ्नों का नाना उपायों से विनाश करें। हे धीरो! इन्द्र के समान आलस्यरहित होकर अशुभकर्मियों को दण्ड, शुभकर्मियों को पुरस्कार देते हुए और प्रजाओं को शुभकर्मों में स्थापित करते हुए आप सब अपने जीवन को पुष्पित और फलित बनावें। एक ही चर्षणीसह शब्द या उभयङ्कर शब्द के आशय कितने हो सकते हैं, इसको आप लोग स्वयं विचारें, क्योंकि सर्व आशय प्रकट नहीं किए जा सकते। ग्रन्थ बहुत बढ़ जायगा॥२॥

यच्चि॒द्धि त्वा॒ जना॑ इ॒मे नाना॒ हव॑न्त ऊ॒तये॑। अ॒स्माकं॒ ब्रह्मे॒दमि॑न्द्र भूतु॒ तेऽहा॒ विश्वा॑ च॒ वर्ध॑नम्॥

इस मन्त्र में निष्कामकर्मों का उपदेश किया गया है अर्थात् सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों के दाता परमात्मा से यह प्रार्थना की गई है कि हे प्रभो! आपका दिया हुआ यह धनादि ऐश्वर्य्य मेरे लिये शुभ हो अर्थात् इस धन से सदा यज्ञादि कर्मों द्वारा आपके यश को विस्तृत करूँ, हे ऐश्वर्य्य के दाता परमेश्वर! आपकी कृपा से हमको नाना प्रकार के ऐश्वर्य्य प्राप्त हों और हम आपकी उपासना में सदा तत्पर रहें। भाव यह है कि परमात्मदत्त धन को सदा उपकारिक कामों में व्यय करना चाहिये, जो पुरुष अपनी सम्पत्ति को सदा वैदिककर्मों में व्यय करते हैं, उनका ऐश्वर्य्य उन्नति को प्राप्त होता है और अवैदिक कर्मों में व्यय करनेवाले का ऐश्वर्य्य शीघ्र ही नाश को प्राप्त होकर वह सब प्रकार के सुखों से वञ्चित रहता है॥३॥हे मनुष्यो! आत्मरक्षा के लिये अन्य देवों को छोड़ सर्वेश्वर ही प्रार्थनीय है। इन्द्रियसहित यह आत्मा वशीभूत बना परमात्मा में नियोजनीय है और कर्मफल की आकाङ्क्षा न करके आपके सर्व याग और सर्व स्तोत्र उसी के यश के वर्धक होवें॥३॥

वि त॑र्तूर्यन्ते मघवन्विप॒श्चितो॒ऽर्यो विपो॒ जना॑नाम्। उप॑ क्रमस्व पुरु॒रूप॒मा भ॑र॒ वाजं॒ नेदि॑ष्ठमू॒तये॑॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि वेदोक्तकर्म करनेवाले विद्वान् पुरुष परमात्मा की कृपा द्वारा नानाविध उपायों से सब संकट तथा विपत्तियों को पार कर जाते हैं। वे कभी भी शत्रुओं से पराजित न होकर उनको कंपानेवाले होते हैं और नाना सुखसाधन योग्य पदार्थों को सहज ही में उत्पन्न कर सकते हैं, इसलिये पुरुषों को वेदविद्या का अध्ययन और परमात्मा की आज्ञा का पालन करना चाहिये, जिससे सुख प्राप्त हो॥४॥भगवान् उपदेश देते हैं कि स्वग्रामनिवासी, स्वदेशस्थ और दूरस्थित विद्वानों को, प्रजाहितैषियों को और जनरक्षकों को सब कोई उत्साहित करें और उनको विपद् से बचावें॥४॥

म॒हे च॒न त्वाम॑द्रिवः॒ परा॑ शु॒ल्काय॑ देयाम्। न स॒हस्रा॑य॒ नायुता॑य वज्रिवो॒ न श॒ताय॑ शतामघ॥

इस मन्त्र में ब्रह्मानन्द को सर्वोपरि वर्णन किया है अर्थात् ब्रह्मानन्द की तुलना धनधामादिक किसी सांसारिक पदार्थ से नहीं हो सकती और मनुष्य, गन्धर्व, देव तथा पितृ आदि जो उच्च से उच्च पद हैं, उनमें भी उस आनन्द का अवभास नहीं होता, जिसको ब्रह्मानन्द कहते हैं। इसी अभिप्राय से मन्त्र में सब प्रकार की अनर्घ वस्तुओं को ब्रह्मानन्द की अपेक्षा तुच्छ माना है। मन्त्र में “शत” शब्द अयुत संख्या के ऊपर आने से अगण्य संख्यावाची है, जिसका अर्थ यह है कि असंख्यात धन से भी ब्रह्मानन्द की तुलना नहीं हो सकती॥५॥महाप्रलोभ से या भय से या फल को न देखने से परमात्मा त्याज्य नहीं। किन्तु हे मनुष्यो! अफलाकाङ्क्षी होकर महेश्वर की सेवा करो और उसकी आज्ञापालन से ही उसको प्रसन्न करो॥५॥

वस्याँ॑ इन्द्रासि मे पि॒तुरु॒त भ्रातु॒रभु॑ञ्जतः। मा॒ता च॑ मे छदयथः स॒मा व॑सो वसुत्व॒नाय॒ राध॑से॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि जिस प्रकार माता हार्दिक प्रेम से पुत्र का लालन-पालन करके सदा उसकी भलाई चाहती है, इसी प्रकार ईश्वर भी मातृवत् सब जीवों की हितकामना करता है। मन्त्र में पिता तथा भ्राता सब सम्बन्धियों का उपलक्षण है अर्थात् ईश्वर सब सम्बन्धियों से बड़ा है और माता के समान कथन करने से इस बात को दर्शाया है कि अन्य सम्बन्धियों की अपेक्षा माता अधिक स्नेह करती है और माता के समान ही परमात्मा सब मनुष्यों का शुभचिन्तक है॥६॥सत्यासत्यविवेकवती माता के और परमेश्वर के अनुग्रह के विना जगत् में कोई प्रतिष्ठित नहीं होता॥६॥

क्वे॑यथ॒ क्वेद॑सि पुरु॒त्रा चि॒द्धि ते॒ मनः॑। अल॑र्षि युध्म खजकृत्पुरंदर॒ प्र गा॑य॒त्रा अ॑गासिषुः॥

इस मन्त्र में प्रश्नोत्तर की रीति से परमात्मा की सर्वव्यापकता बोधन की गई है, जिसका भाव यह है कि हे परमात्मन्! आप पहले कहाँ थे, वर्तमान समय में कहाँ हैं और भविष्य में कहाँ होंगे ? इत्यादि प्रश्न परमात्मा में नहीं हो सकते, क्योंकि वह अन्य पदार्थों की न्याईं एकदेशावच्छिन्न नहीं, अपने ज्ञानस्वरूप से सर्वत्र विद्यमान होने के कारण मन्त्र में “पुरुत्रा चिद्धिते मनः” इत्यादि प्रतीकों से उसको सर्वव्यापक वर्णन किया गया है, इसलिये उचित है कि परमात्मा को सर्वव्यापक मानकर जिज्ञासु उसके ज्ञानरूप प्रदीप से अपने हृदय को प्रकाशित करें और किसी काल तथा किसी स्थान में भी पापकर्म करने का साहस न करें, क्योंकि वह प्रत्येक स्थान में हर समय हमारे कर्मों का द्रष्टा है॥७॥मन को वश में करके परमात्मा का ध्यान करना चाहिये। अज्ञानी जन लोगों को प्रसन्न करने के लिये, जनता में मेरी भक्ति प्रसिद्ध हो, इस अभिप्राय से माला घुमाता हुआ लोगों के साथ नाना बातें करता हुआ विक्षिप्त मन से भगवान् का नाम जपता है और ईश्वरीय आज्ञा का उल्लङ्घन कर आचरण करता है। वैसे कपटी पुरुष को परमात्मा दण्ड देता है, क्योंकि वह पुरन्दर है। हे राजाओ! सेनानायको! इतरजनो! तथा पुरोहितो! यदि तुम ज्ञानपूर्वक अपने स्वार्थ के लिये निरपराधी प्रजाओं में अन्याय करोगे, तो वह पुरन्दर तुम्हारे सब नगरों को और प्रिय वस्तुओं को दग्ध और हरण कर लेगा। इस बात का सदा स्मरण रक्खो, जिस हेतु वह युध्म, खजकृत् और पुरन्दर है। यदि तुम्हारे हाथ में शतघ्नी या सहस्रघ्नी आयुध है, तो उसके हाथ में महास्त्र वज्र है, जिसका जगत् निवारण नहीं कर सकता है॥७॥

प्रास्मै॑ गाय॒त्रम॑र्चत वा॒वातु॒र्यः पु॑रंद॒रः। याभिः॑ का॒ण्वस्योप॑ ब॒र्हिरा॒सदं॒ यास॑द्व॒ज्री भि॒नत्पुरः॑॥

भाव यह है कि वह पूर्ण परमात्मा काण्व=विद्वानों की सन्तान का अविद्यान्धकार निवृत्त करके उनके हृदय में विद्या का प्रकाश करे, ताकि वे विद्या के प्रचार द्वारा परमात्मज्ञान का उपदेश करते हुए लोगों को श्रद्धालु बनावें और परमात्मा के गुणों का कीर्तन करते हुए आस्तिकभाव का प्रचार करें॥८॥समाहित मन से ध्यात, सत्यवाणी से स्तुत, शुद्ध और हिंसारहित परोपकारादि कर्म से प्रसादित परमात्मा संतुष्ट होता है। अन्य मन से कृत कर्म्म विफल होते हैं, यह शिक्षा इससे देते हैं॥८॥

ये ते॒ सन्ति॑ दश॒ग्विनः॑ श॒तिनो॒ ये स॑ह॒स्रिणः॑। अश्वा॑सो॒ ये ते॒ वृष॑णो रघु॒द्रुव॒स्तेभि॑र्न॒स्तूय॒मा ग॑हि॥

उस सर्वव्यापक परमात्मा की इतनी विस्तृत शक्तियाँ हैं कि उनको पूर्णतया जानना मनुष्यशक्ति से सर्वथा बाहर है, इसी अभिप्राय से मन्त्र में “सहस्रिणः” पद से उनको अनन्त कथन किया है, क्योंकि “सहस्र” शब्द यहाँ असंख्यात के अर्थ में है, इसी प्रकार अन्यत्र पुरुषसूक्त में भी “सहस्रशीर्षा पुरुषः” इत्यादि मन्त्रों में उसका महत्त्व वर्णन किया गया है, वह महत्त्वशाली परमात्मा अपनी कृपा से हमारे समीपस्थ हों, ताकि हम उनके गुणगान करते हुए पूर्ण श्रद्धावाले हों॥९॥ईश्वर की विभूतियाँ सर्वदा अध्येतव्य हैं। किस आधार पर सूर्य्य स्थित है। पृथिवी का आधार क्या है। रात्रि में जो असंख्य नक्षत्र भासित होते हैं, उनकी क्या अवस्था है। इस प्रकार की ईश्वरीय वस्तु सदा जिज्ञासितव्य है और तत्त्ववित् पुरुषों के द्वारा वेदितव्य है॥९॥

आ त्व१॒॑द्य स॑ब॒र्दुघां॑ हु॒वे गा॑य॒त्रवे॑पसम्। इन्द्रं॑ धे॒नुं सु॒दुघा॒मन्या॒मिष॑मु॒रुधा॑रामरं॒कृत॑म्॥

इस मन्त्र में परमात्मा को “धेनु” कथन किया है, जिसके अर्थ गौ तथा वाणी आदि हैं पर वे गौण हैं। “धेनु” शब्द का मुख्यार्थ ईश्वर में ही घटता है, क्योंकि “धीयते इति धेनुः”=जो पिया जाय, उसका नाम “धेनु” है और उसका साक्षात्कार करना ही पिया जाना है, इसलिये यहाँ प्रकरण से ईश्वर को कामधेनुरूप से वर्णन किया गया है, क्योंकि कामनाओं का पूर्ण करनेवाला परमात्मा ही है। वह कामधेनुरूप परमात्मा हमको प्राप्त होकर हमारे इष्टफल को पूर्ण करे॥१०॥ईश्वर सर्वश्रेष्ठा और सर्वशान्तिप्रदाता धेनु और वृष्टि है। हे मनुष्यो! उसको सेवो। देखो, इस पृथिवी पर कितने सुमधुर फूल, मूल, कन्द और ओषधि उसने बनाए हैं, जो कभी न्यून नहीं होते। जिस भक्ति से दोग्ध्री गौ की सेवा करते हो, उसी प्रेम से परमात्मा का भी भजन करो। वह धेनुवत् दूधों से और मेघवत् आनन्दवृष्टि से तुमको सदा पोसेगा, यह उपदेश इससे देते हैं॥१०॥

यत्तु॒दत्सूर॒ एत॑शं व॒ङ्कू वात॑स्य प॒र्णिना॑। वह॒त्कुत्स॑मार्जुने॒यं श॒तक्र॑तुः॒ त्सर॑द्गन्ध॒र्वमस्तृ॑तम्॥

गतिशील इस सूर्य्य में आकर्षण तथा विकर्षणरूप दो शक्तियाँ पाई जाती हैं। उनका धाता तथा निर्माता एकमात्र परमात्मा ही है और सूर्य्य जैसे कोटानकोटि ब्रह्माण्ड के स्वरूप में ओतप्रोत हो रहे हैं, इसीलिये मन्त्र में उसको “शतक्रतुः”=सैकड़ों क्रियाओंवाला कहा है। सूर्य्य को “गन्धर्व” इसलिये कहा है कि पृथिव्यादि लोक उसी की आकर्षणशक्ति से ठहरे हुए हैं और वायुसम्बन्धी कहने का अभिप्राय यह है कि तेज की उत्पत्ति वायु से होती है, जैसा कि “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः आकाशाद्वायुः वायोरग्निः” तैत्तिरीयोपनिषद् में वर्णन किया है कि वायु से अग्नि उत्पन्न हुई, इत्यादि प्रमाणों से सिद्ध है कि सूर्य्य-चन्द्रमादिकों का प्रकाश परमात्मा की शक्ति से ही होता है, अन्यथा नहीं॥११॥अज्ञानमय और क्लेशपूर्ण इस संसार को देखकर इससे विराग करे। तथा परमात्मा की सेवा से इस जीवात्मा का उद्धार करे, जिससे पुनः इस महान् संसार-सागर में अवपतन न हो, वैसा यत्न करे॥११॥

य ऋ॒ते चि॑दभि॒श्रिषः॑ पु॒रा ज॒त्रुभ्य॑ आ॒तृदः॑। संधा॑ता सं॒धिं म॒घवा॑ पुरू॒वसु॒रिष्क॑र्ता॒ विह्रु॑तं॒ पुनः॑॥

मन्त्र में “जत्रु” शब्द सब शरीरावयव का उपलक्षण है अर्थात् शरीर में रोग तथा अन्य विपत्तिरूप आघातों के आने से प्रथम ही परमात्मा उनका संधाता और वही आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक तीनों प्रकार के दुःखों की निवृत्ति करनेवाला है, इसलिये सबको उचित है कि उसी की आज्ञापालन तथा उसी की उपासना में प्रवृत्त रहें॥१२॥निष्प्रयोजन ही वह ईश्वर सदा जीव का कल्याण करता है। हे मनुष्यो! ईदृश करुणालय को छोड़कर कहाँ घूम रहे हो। धन की आकाङ्क्षा से भी वही सेवनीय है, क्योंकि वह सर्व धनों का राजा है। वही सर्व भुवनों का अधिपति है॥१२॥

मा भू॑म॒ निष्ट्या॑ इ॒वेन्द्र॒ त्वदर॑णा इव। वना॑नि॒ न प्र॑जहि॒तान्य॑द्रिवो दु॒रोषा॑सो अमन्महि॥

इस मन्त्र में यह वर्णन किया है कि विद्या तथा विनय से सम्पन्न पुरुष में सब सद्गुण निवास करते हैं अर्थात् जो पुरुष परमात्मा की उपासनापूर्वक भक्तिभाव से नम्र होता है, उसके शत्रु उस पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते, सब विद्वानों में प्रतिष्ठा प्राप्त करता और सब गुणी जनों में मान को प्राप्त होता है, इसलिये सब पुरुषों को उचित है कि नीचभावों के त्यागपूर्वक उच्चभावों का ग्रहण करें, ताकि परमपिता परमात्मा के निकटवर्ती हों॥१३॥आलस्य मृत्यु है और चेष्टा जीवन है, यह मन में रखकर विद्या, धन और प्रतिष्ठा के लिये सदा प्रयत्न करना चाहिये। ज्ञानलाभार्थ अतिदूर से दूर अन्य महाद्वीप में भी जाना उचित है। तभी मनुष्य सुखी हो सकते हैं। क्षुधार्त्त, रोगग्रस्त, आतुर, गृहादिरहित और अकिञ्चन जन परमात्मा में मनोनिवेश नहीं कर सकते, इसी हेतु “हम सौ वर्ष अदीन होवें” “हम नीच न होवें” इत्यादि प्रार्थना होती है॥१–३॥

अम॑न्म॒हीद॑ना॒शवो॑ऽनु॒ग्रास॑श्च वृत्रहन्। स॒कृत्सु ते॑ मह॒ता शू॑र॒ राध॑सा॒ अनु॒ स्तोमं॑ मुदीमहि॥

इस मन्त्र में स्तुति द्वारा परमात्मा से यह प्रार्थना की गई है कि हे भगवन्! आप हमें ऐश्वर्य्ययुक्त करें, ताकि हम प्रसन्नतापूर्वक स्तुतियों द्वारा आपका गुणगान किया करें, या यों कहो कि जो मनुष्य शान्ति तथा अक्रौर्यभाव से परमात्मा की स्तुति करता हुआ कर्मयोग में प्रवृत्त होता है, उसको परमात्मा उच्च से उच्च ऐश्वर्य्यशाली बनाकर आनन्दित करते हैं, इसलिये प्रत्येक पुरुष को शान्तिभाव से उसकी उपासना में सदा प्रवृत्त रहना चाहिये॥१४॥परमात्मा की उपासना सर्वदा शनैः शनैः शान्तचित्त से कर्त्तव्य है। मुझको नास्तिक मानकर लोग मेरी निन्दा करेंगे, इस हेतु केवल लोकभय से कोई उसकी उपासना करते हैं। कोई विक्षिप्तचित्तवाले पुरुष दूसरों के अपकार के लिये मारण, मोहन और उच्चाटन आदि प्रयोग करते हुए उसकी अर्चना करते हैं। ये दोनों अनुचित हैं। यह मातापितृभूत वेद सिखलाता है। और प्रतिवर्ष एकवार भी पूजोत्सव करके मनुष्य आनन्दित होवे, यह भी दिखलाया है॥१४॥

यदि॒ स्तोमं॒ मम॒ श्रव॑द॒स्माक॒मिन्द्र॒मिन्द॑वः। ति॒रः प॒वित्रं॑ ससृ॒वांस॑ आ॒शवो॒ मन्द॑न्तु तुग्र्या॒वृधः॑॥

हे परमात्मन्! आप मेरी स्तुति को सुनें, मैंने जो यज्ञादि शुभकर्म सम्पादित किये हैं वा करता हूँ, वे आपके अर्पण हों, मेरे लिये नहीं, कृपा करके आप इन्हें स्वीकार करें, ताकि मुझे आनन्द प्राप्त हो। इसी का नाम निष्काम कर्मभाव है। जो पुरुष निस्स्वार्थ शुभकर्म करता है, उस पर परमात्मा प्रसन्न होते और उसको आह्लाद प्राप्त होता है॥१५॥संस्कृत, पवित्रीकृत, बहुसुश्रुत और साधनसम्पन्न आत्मा परमात्मतत्त्व का निश्चय करता है, इस हेतु ईश्वर की उपासना के लिये प्रथम आत्मा को योग द्वारा शुद्ध और पवित्र बनावे। तभी वह हम लोगों की स्तुति सुनेगा॥१५॥

आ त्व१॒॑द्य स॒धस्तु॑तिं वा॒वातुः॒ सख्यु॒रा ग॑हि। उप॑स्तुतिर्म॒घोनां॒ प्र त्वा॑व॒त्वधा॑ ते वश्मि सुष्टु॒तिम्॥

सब मनुष्यों को चाहिये कि प्रत्येक शुभकार्य्य के पूर्व यज्ञादि द्वारा परमात्मा की प्रार्थना-उपासना करके कार्य्यारम्भ करें, क्योंकि परमात्मा अपने भक्त तथा प्रिय उपासकों के कार्य्य को निर्विघ्न समाप्त करता है, इसलिये प्रत्येक पुरुष को उसकी उपासना में प्रवृत्त रहना चाहिये॥१६॥सब कोई परमदेव की स्तुति करना चाहते हैं। भक्त, तत्त्ववित्, धनवान्, राजा और प्रजाएँ उसी की स्तुति करते हैं। मैं भी उसी की स्तुति करता हूँ। इसी प्रकार इतर आधुनिक जन भी उसकी प्रार्थना करें। धन, विज्ञान, सन्तान आदि की प्राप्ति होने पर मनुष्य को उचित है कि परमात्मा को धन्यवाद दे॥१६॥

सोता॒ हि सोम॒मद्रि॑भि॒रेमे॑नम॒प्सु धा॑वत। ग॒व्या वस्त्रे॑व वा॒सय॑न्त॒ इन्नरो॒ निर्धु॑क्षन्व॒क्षणा॑भ्यः॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे पुरुषो! तुम चित्तवृत्तियों के निरोध द्वारा मनन करते हुए परमात्मा का साक्षात्कार करो। यहाँ नदी का दृष्टान्त इसलिये दिया है कि जैसे नदी का प्रवाह निरन्तर बहता रहता है, इसी प्रकार चित्तवृत्तियें निरन्तर प्रवाहित रहती हैं। उनकी चञ्चलता को स्थिर करने का एकमात्र उपाय “ज्ञान” है, अतएव ज्ञान द्वारा चित्तवृत्तियों का निरोध करके अन्तःकरण की पवित्रता द्वारा परमात्मा की उपासना में प्रवृत्त होना चाहिये। या यों कहो कि श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन द्वारा उपासना करते हुए परमात्मा का साक्षात्कार करना चाहिये अर्थात् वेदवाक्यों द्वारा तत्त्वार्थ का सुनना “श्रवण”, तर्कद्वारा युक्तियुक्त विषय को ग्रहण करना तथा अयुक्तियुक्त को छोड़ देना “मनन” और विजातीय प्रत्ययरहित ब्रह्माकारवृत्ति का नाम “निदिध्यासन” है, इत्यादि साधनों द्वारा उपासना करनेवाला उपासक अपने लक्ष्य को पूर्ण करता है॥१७॥स्वभावतः बाह्याडम्बर में मनुष्यों की अधिक प्रवृत्ति है। इस नीच प्रवृत्ति के निवारण करने के लिये वेद कहते हैं कि तुम आध्यात्मिक यज्ञ करो। हे क्षुद्रदृष्टि मनुष्यो! छल से दूसरों को प्रसन्न मत करो, किन्तु शुद्धाचरण और सत्य व्यवहार से परमात्मा को, नरों को और नारियों को आह्लादित करें॥१७॥

अध॒ ज्मो अध॑ वा दि॒वो बृ॑ह॒तो रो॑च॒नादधि॑। अ॒या व॑र्धस्व त॒न्वा॑ गि॒रा ममा जा॒ता सु॑क्रतो पृण॥

भाव यह है कि इस मन्त्र में अन्तरिक्षादि लोकों में भी व्यापक, सर्वरक्षक तथा सर्वनियन्ता परमात्मा से यह प्रार्थनाकथन किया है कि हे प्रभो! आप हमारे हृदय में विराजमान हों और हमारे ऐश्वर्य की वृद्धि तथा हमारी सन्तान को उत्तम फल प्रदान करें, जिससे वे संसार में सुख-सम्पत्ति को प्राप्त हों॥१८॥परमात्मा सर्वत्र विद्यमान है, उसका कहीं एक स्थान नियत नहीं। मूर्खजन उस व्यापी को एकदेशी जान इधर-उधर दौड़ते हैं। हे मनुष्यो! जहाँ तुम ध्यान करोगे, वहाँ ही वह है। वहाँ ही उसको पावोगे, यह निश्चय है॥१८॥

इन्द्रा॑य॒ सु म॒दिन्त॑मं॒ सोमं॑ सोता॒ वरे॑ण्यम्। श॒क्र ए॑णं पीपय॒द्विश्व॑या धि॒या हि॑न्वा॒नं न वा॑ज॒युम्॥

इस मन्त्र में यह उपदेश किया गया है कि हे उपासक लोगो! तुम कर्मयोगी बनने के लिये उस महानात्मा प्रभु से प्रार्थना करो, जो बल तथा अनेक प्रकार की क्रियाओं का देनेवाला है। भाव यह है कि कर्मयोगी ही संसार में सब प्रकार के ऐश्वर्य्य को प्राप्त होता और वही प्रतिष्ठित होकर मनुष्यजन्म के फलों को उपलब्ध करता है, इसलिये पुरुषों को कर्मयोगी बनने की परमात्मा से सदैव प्रार्थना करनी चाहिये॥१९॥कपटादि दोषरहित ईश्वरविश्वासी धर्म्माचारी मनुष्यों का कदापि भी अधःपात नहीं करता, यह देख शुभकर्म मनुष्य करें॥१९॥

मा त्वा॒ सोम॑स्य॒ गल्द॑या॒ सदा॒ याच॑न्न॒हं गि॒रा। भूर्णिं॑ मृ॒गं न सव॑नेषु चुक्रुधं॒ क ईशा॑नं॒ न या॑चिषत्॥

इस मन्त्र में उपदेशक उपासकों के प्रति यह उपदेश करता है कि हे उपासको! तुम लोग सदैव यज्ञादिकर्मों में प्रवृत्त रहो और परमात्मा की वेदरूप वाणी, जो मनुष्यमात्र के लिये कल्याणकारक है, उसमें सन्देह होने पर क्रोध न करते हुए प्रतिपक्षी को यथार्थ उत्तर दो और सबका पालन-पोषण तथा रक्षण करनेवाले परमपिता परमात्मा से ही सब कामनाओं की याचना करो। वही सबके लिये इष्टफलों का प्रदाता है। यद्यपि परमात्मा सम्पूर्ण कर्मों का फलप्रदाता है और विना कर्म किये हुए कोई भी इष्टसिद्धि को प्राप्त नहीं होता, तथापि मनुष्य अपनी न्यूनता पूर्ण करने के लिये अपने से उच्च की अभिलाषा स्वाभाविक रखता है और सर्वोपरि उच्च एकमात्र परमात्मा है, इसलिये अपनी न्यूनता पूर्ण करने के लिये उसी सर्वोपरि देव से सबको याचना करनी चाहिये॥२०॥सुकर्मों और स्तोत्रों से परमात्मा ही केवल याचनीय है, अन्य राजप्रभृति नहीं। क्योंकि अन्य याचना मनुष्य को नीचे गिरा देती है॥२०॥

मदे॑नेषि॒तं मद॑मु॒ग्रमु॒ग्रेण॒ शव॑सा। विश्वे॑षां तरु॒तारं॑ मद॒च्युतं॒ मदे॒ हि ष्मा॒ ददा॑ति नः॥

परमात्मा उपासक की उपासना से अनुकूल होकर उसके बलवान् शत्रु का भी दमन करके उसकी सर्व प्रकार से रक्षा करते हैं, इसलिये सब पुरुषों को सदा उसकी प्रार्थना तथा उपासना में प्रवृत्त रहना चाहिये। सार यह है कि प्रार्थना भी एक कर्म है और वह नम्रता, अधिकारित्व तथा पात्रत्वादि धर्मों को अवश्य धारण कराती है, इसलिये प्रार्थना का फल शत्रुदमनादि कोई दुष्कर कर्म नहीं॥२१॥हे मनुष्यो! इस संसार में आनन्दप्रद बहुत वस्तुएँ उसने दी हैं। स्त्री, पति, पुत्र, कन्या, कुसुम, मेघ, समुद्र, नदियाँ, ऋतु, सायं, उषा इस प्रकार की वस्तु विद्वानों को आह्लादित करती हैं। पदार्थों से आनन्द लेने की चेष्टा करो॥२१॥

शेवा॑रे॒ वार्या॑ पु॒रु दे॒वो मर्ता॑य दा॒शुषे॑। स सु॑न्व॒ते च॑ स्तुव॒ते च॑ रासते वि॒श्वगू॑र्तो अरिष्टु॒तः॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि परमात्मा के उपासक दो प्रकार के होते हैं, एक स्वार्थपरायण होकर उपासना करनेवाले और दूसरे परार्थपरायण होकर उपासना करते हैं, इन दोनों प्रकार के उपासकों में से परमात्मा न्यायकारी तथा परोपकारार्थ प्रार्थना-उपासना करनेवाले को अवश्य फल देते हैं, इसलिये प्रत्येक पुरुष को परोपकारदृष्टि से परमात्मोपासन में प्रवृत्त रहना चाहिये॥२२॥परमात्मा के दान प्रत्यक्ष हैं, उन्हें अल्पज्ञ मनुष्य नहीं देखते हैं। जिन अपूर्व वस्तुओं का भोग सम्राट् करता है, वे तुमको भी दी गई हैं, यह विचारो। यह वायु, यह नदीजल, यह मेघों की मनोहारिणी शोभा, ये कुसुमोद्यान, ये आराम, इस प्रकार की कितनी वस्तु तुम्हारे प्रमोद के लिये विद्यमान हैं, उन्हें सेवो। सुखी होवोगे॥२२॥

एन्द्र॑ याहि॒ मत्स्व॑ चि॒त्रेण॑ देव॒ राध॑सा। सरो॒ न प्रा॑स्यु॒दरं॒ सपी॑तिभि॒रा सोमे॑भिरु॒रु स्फि॒रम्॥

इस मन्त्र में उपासक की ओर से सर्वैश्वर्य्यसम्पन्न परमात्मा से प्रार्थना है कि हे प्रभो! आप हमारी शुभकामनाओं को पूर्ण करें और अनेकविध धनों से हमें सम्पन्न करते रहें, ताकि हम आपके गुणों का गान करते हुए आपकी उपासना में तत्पर रहें॥२३॥‘आयाहि मत्स्व’ इत्यादि क्रियाएँ परम श्रद्धा प्रकाशित करती हैं। यद्यपि वह परमात्मा न तो भूखा और न वह कभी खाता-पीता और न कभी दुःखी वा सुखी होता है। वह एकरस है। तथापि वह हमारा पिता, माता, बन्धु और मित्र है। हमारे निकट जो कुछ है, वह उसे श्रद्धापुरःसर निवेदित करते हैं और इससे उसकी मित्रता प्रकाशित करते हैं। इससे यह भी शिक्षा दी जाती है कि यदि कोई इन्द्र=परमैश्वर्यशाली विद्वान्, राजा, योगी ब्रह्मचारी और संन्यासी आदि अतिथि आवें, तो उनके साथ भी ऐसा ही सत्कार करें। इति॥२३॥

आ त्वा॑ स॒हस्र॒मा श॒तं यु॒क्ता रथे॑ हिर॒ण्यये॑। ब्र॒ह्म॒युजो॒ हर॑य इन्द्र के॒शिनो॒ वह॑न्तु॒ सोम॑पीतये॥

इस मन्त्र में समष्टिरूप से उपासना करने का विधान किया गया है कि जो इन दिव्य ब्रह्माण्डों को रचकर व्यापक हो रहा है, वही परमात्मा हमारा उपासनीय है। हम लोग सैकड़ों तथा सहस्रों एक साथ मिलकर ब्रह्मानन्द के लिये उस दिव्यज्योति परमपिता परमात्मा की उपासना करें॥२४॥ब्रह्मज्ञान के लिये प्रथम यह जगत् अध्येतव्य है। क्योंकि कार्य ज्ञान से कर्ता के ज्ञान का संभव है। जैसे अष्टाध्यायी, रामायण आदि के पठन से पाणिनि और वाल्मीकि प्रभृतियों की बुद्धि का वैभव प्रतीत होता है। वैसे ही परमेश्वर कहाँ है, ऐसी जिज्ञासा होने पर सर्व वेद सर्व शास्त्र और सर्व आचार्य्य उत्तर देते हैं “इसी जगत् में सर्ववस्तु में वह विद्यमान है”। “हृदय में आत्मा है”। हृदय में ही अन्वेष्टव्य है। “आदित्य में वह है” आदित्य में अन्वेषणीय है” इस प्रकार के वाक्य प्रकृति की ओर हमको ले जाते हैं। अतः हे मनुष्यो! अनन्त विभु को अनन्त जगत् में देखो। यह उपदेश इससे देते हैं॥२४॥

आ त्वा॒ रथे॑ हिर॒ण्यये॒ हरी॑ म॒यूर॑शेप्या। शि॒ति॒पृ॒ष्ठा व॑हतां॒ मध्वो॒ अन्ध॑सो वि॒वक्ष॑णस्य पी॒तये॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा को अचिन्त्यशक्तिशाली वर्णन किया गया है अर्थात् उसके पारावार को पहुँचना सर्वथा असम्भव है, इसी अभिप्राय से यहाँ मयूरपिच्छ के दृष्टान्त से भलीभाँति स्पष्ट किया गया है कि जिस प्रकार मयूर के बर्ह=पिच्छ में नाना वर्ण की कोई इयत्ता नहीं कर सकता, इसी प्रकार ब्रह्माण्डरूप विचित्र कार्य्यों की अवधि बाँधना मनुष्य की शक्ति से सर्वथा बाहर है॥२५॥प्रथम यह सम्पूर्ण जगत् ही ईश्वर का रमणीय वाहन है, यह जानना चाहिये। इसी रथ पर स्थित होकर वह सब देखता है। इस रथ में स्थावर और जङ्गमरूप दो प्रकार के पदार्थ ही मानो, घोड़े नियोजित हैं। उनके विविध वर्ण नाना रूप और नाना आकृतियाँ हैं और ये विचित्र हैं। इनका अध्ययन करना चाहिये, तब ही ब्रह्मबोध की संभावना है। तब ही सर्व क्लेश नष्ट होते हैं। क्लेशों के क्षीण होने पर परमात्मा हृदय में भासित होने लगते हैं॥२५॥

पिबा॒ त्व१॒॑स्य गि॑र्वणः सु॒तस्य॑ पूर्व॒पा इ॑व। परि॑ष्कृतस्य र॒सिन॑ इ॒यमा॑सु॒तिश्चारु॒र्मदा॑य पत्यते॥

इस मन्त्र में यह उपदेश किया गया है कि हे वेद के ज्ञाता उपदेशको! तुम परमात्मा को भले प्रकार जानकर उसकी पवित्र वाणी का प्रचार करो और सब जिज्ञासु पुरुषों को परमात्मसम्बन्धी ज्ञान का फल दर्शाकर उनको कल्याण का मार्ग बतलाओ, जिससे वह मनुष्यजन्म का फल उपलब्ध कर सकें॥२६॥जब हमारे सर्व कर्म शुद्ध, रसमय और प्रमोदप्रद होंगे, तब वह क्यों नहीं उन पर अनुग्रह करेगा। क्योंकि वह स्तोत्र और यज्ञों का प्रियतम और यज्वाओं का सुहृद् है॥२६॥

य एको॒ अस्ति॑ दं॒सना॑ म॒हाँ उ॒ग्रो अ॒भि व्र॒तैः। गम॒त्स शि॒प्री न स यो॑ष॒दा ग॑म॒द्धवं॒ न परि॑ वर्जति॥

अद्वितीय, बलवान् तथा सबको सुखप्रद परमात्मा, जो कठिन से कठिन विपत्तियों में भी अपने उपासक का सहाय करता है, वह हमको प्राप्त होकर कभी भी वियुक्त न हो और सब मनुष्यों को उचित है कि प्रत्येक कार्य्य के प्रारम्भ में परमात्मा की स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना करें, ताकि सब कामों में सफलता प्राप्त हो॥२७॥जगत्कर्ता पाता और संहर्ता कोई एक ही देव है, यद्यपि यह सर्वसिद्धान्त है, तथापि इतरसम्प्रदायाचार्य्य उस देव के दूत, सेवक, पुत्र और स्त्री प्रभृति भी हैं, ऐसा मानते हैं। तब वह एक है, यह कैसे बन सकता है। इस प्रकार हम सब ही एक एक ही हैं, किन्तु वैदिक देव ऐसा नहीं। वह महान् अद्वितीय है। उसने जिन नियमों को इस जगत् में स्थापित किया है, उनको दूर कोई नहीं कर सकते। अतः हे मनुष्यो! उसीका गान करो, वह कृपाधाम तुम्हारे शुभकर्मों को देखेगा और सफल करेगा। उस एक को छोड़ अन्य देवों को न पूजो॥२७॥

त्वं पुरं॑ चरि॒ष्ण्वं॑ व॒धैः शुष्ण॑स्य॒ सं पि॑णक्। त्वं भा अनु॑ चरो॒ अध॑ द्वि॒ता यदि॑न्द्र॒ हव्यो॒ भुवः॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा को अनन्त बलशाली कथन किया गया है कि वह परमात्मा अपनी हननशील शक्तियों से शत्रुओं के समूह को नष्ट करता, वह सम्पूर्ण ज्योतियों में प्रविष्ट होकर प्रकाशित कर रहा है और वही सारे ब्रह्माण्डों को रचकर अपनी शक्ति से सबको थांभ रहा है, अधिक क्या परमात्मा ही की शक्ति से सूर्य्य तथा विद्युदादि तेजस्वी पदार्थ अनेक कर्मों के उत्पादन तथा विनाश में समर्थ होते हैं और वह सदाचारी को सुखद तथा दुराचारी को दुःखदरूप से उपस्थित होता है, अतएव पुरुष को उचित है कि सदाचार द्वारा परमात्मपरायण हो॥२८॥हे इन्द्र! जिस कारण शिष्ट या दुष्ट दोनों प्रकार के मनुष्यों से तू ही बुलाया जाता है और तू प्रकाशस्वरूप और सर्वत्र व्यापक है, अतः तू न्यायदृष्टि से पापियों को दण्ड और धार्मिकों को लाभ पहुँचाता है॥२८॥

मम॑ त्वा॒ सूर॒ उदि॑ते॒ मम॑ म॒ध्यंदि॑ने दि॒वः। मम॑ प्रपि॒त्वे अ॑पिशर्व॒रे व॑स॒वा स्तोमा॑सो अवृत्सत॥

इस मन्त्र में परमात्मा के निदिध्यासन का वर्णन किया गया है कि सब कालों में परमात्मा का स्तवन करना चाहिये अर्थात् परमात्मा को सर्वव्यापक, सब कर्मों का द्रष्टा, शुभाशुभ कर्मों का फलप्रदाता और हमको अन्नवस्त्रादि नाना पदार्थों का देनेवाला इत्यादि अनेक भावों से स्मरण रखते हुए उसकी आज्ञापालन में तत्पर रहें, ताकि वह हमें शुभकर्मों में प्रवृत्त करे॥२९॥प्रातः, सायं, मध्याह्न और रात्रि में भी सर्वदा परमात्मा स्मरणीय है। उसके अनुशासन को वारंवार स्मरण कर जगद्व्यापारों में मन दातव्य है। ईश्वर की प्रार्थना के लिये कोई समय नियत नहीं॥२९॥

स्तु॒हि स्तु॒हीदे॒ते घा॑ ते॒ मंहि॑ष्ठासो म॒घोना॑म्। नि॒न्दि॒ताश्वः॑ प्रप॒थी प॑रम॒ज्या म॒घस्य॑ मेध्यातिथे॥

हे अभ्यागत! वह पूर्ण परमात्मा, जिसकी शक्ति सम्पूर्ण शक्तियों से बलवान्, सम्पूर्ण व्यापक पदार्थों को अपनी व्यापक शक्ति से तिरस्कृत करनेवाला और वही सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों का भण्डार है, तू उसी की उपासना कर। यहाँ मेध्यातिथि किसी व्यक्तिविशेष का नाम नहीं, किन्तु वेदविद्या के ज्ञाता पूज्य अतिथि का नाम मेध्यातिथि है, जैसा कि “मेधितुं संगन्तुं योग्यो मेध्यः स चासावतिथिः” “मेधृ संगमे−ऋहलोर्ण्यत्”=संगति करने योग्य अतिथि को “मेध्यातिथि” कहते हैं, इसी प्रकार वसिष्ठ, विश्वामित्र, भरद्वाज तथा कण्वादि नाम वेद में आते हैं, जो किसी व्यक्तिविशेष के नाम नहीं, किन्तु इनके यौगिक अर्थ हैं, जिनको यथावसर लिखा जायगा, जिससे वेद में व्यक्तिविशेष की भ्रान्ति न हो॥३०॥प्रथम इन्द्रियों को जीत श्रेष्ठमार्ग का आलम्ब कर उत्कृष्टमना बन, तब परमदेव की उपासना कर। तब सब पदार्थ स्थावर और जङ्गम तुझे आह्लादित करेंगे, यह जान॥३०॥

आ यदश्वा॒न्वन॑न्वतः श्र॒द्धया॒हं रथे॑ रु॒हम्। उ॒त वा॒मस्य॒ वसु॑नश्चिकेतति॒ यो अस्ति॒ याद्वः॑ प॒शुः॥

परमात्मा की सृष्टिरूप इस अनन्त ब्रह्माण्ड में सूक्ष्म से सूक्ष्म दुर्विज्ञेय पदार्थ विद्यमान हैं, जिनको बड़े-बड़े पदार्थवेत्ता अपने ज्ञानद्वारा अनुभव करते हैं। इस मन्त्र में कर्मयोगी परमात्मा की प्रकृति को दुर्विज्ञेय कथन करता हुआ यह वर्णन करता है कि हम लोग उन पदार्थों को जानने के लिये दृढ़ जिज्ञासा से प्रवृत्त हों अर्थात् कर्मयोगी को उचित है कि वह अपने अभ्यास द्वारा उनके जानने का प्रयत्न करे, जो पुरुष सूक्ष्म से सूक्ष्म पदार्थों को जानकर उनका आविष्कार करते हैं, वे ऐश्वर्य्यशाली होकर मनुष्यजन्म के फलों को प्राप्त होते हैं॥३१॥श्रद्धा से आराधित परमेश्वर अवश्य प्रसन्न होता है और उपासक के हृदयरूप रथ पर आरूढ़ होता है। तब यह द्रष्टा जीवात्मा सर्वश्रेष्ठ इष्ट धन को देख और पाकर अन्य धन की आकाङ्क्षा नहीं करता, यह इसका भाव है॥३१॥

य ऋ॒ज्रा मह्यं॑ माम॒हे स॒ह त्व॒चा हि॑र॒ण्यया॑। ए॒ष विश्वा॑न्य॒भ्य॑स्तु॒ सौभ॑गास॒ङ्गस्य॑ स्व॒नद्र॑थः॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि परमात्मा ने सृष्टि में अनेकानेक विचित्र पदार्थ और उनको जानने के लिये विचित्र शक्ति प्रदान की है, अतएव ऐश्वर्य्याभिलाषी पुरुष को उचित है कि वह सर्वदा उनके ज्ञानोत्पादन का प्रयत्न करे और जो निरन्तर परमात्मा की उपासना में प्रवृत्त हुए ज्ञानप्राप्त करते हैं, उनको परमात्मा सकल ऐश्वर्य्यों का स्वामी बनाते हैं, इसलिये प्रत्येक उपासक का कर्तव्य है कि वह परमात्मा की उपासना द्वारा ज्ञान प्राप्त करे॥३२॥हे मनुष्यो! तुम सदा अपने उपकारी माता, पिता, आचार्य, गुरु, राजा, रक्षक, दाता और वैद्य प्रभृतियों के कृतज्ञ बनो और ईश्वर की आज्ञा पालन करते हुए तुम सर्वथा असमर्थ दीन हीन और अनाथों की रक्षा करने में सन्नद्ध रहो॥३२॥

अध॒ प्लायो॑गि॒रति॑ दासद॒न्याना॑स॒ङ्गो अ॑ग्ने द॒शभिः॑ स॒हस्रैः॑। अधो॒क्षणो॒ दश॒ मह्यं॒ रुश॑न्तो न॒ळा इ॑व॒ सर॑सो॒ निर॑तिष्ठन्॥

इस मन्त्र में कर्मयोगी का पराक्रम वर्णन किया गया है कि परमात्मपरायण कर्मयोगी नाना प्रकार के प्रयोगों द्वारा अपनी अस्त्र-शस्त्रविद्या को इतना उन्नत कर लेता है कि सहस्रों मनुष्यों की शक्तियों को भस्मीभूत तथा चूर्ण कर सकता है, इसलिये परमात्मोपासन में प्रवृत्त हुए पुरुष को उचित है कि वह अस्त्र-शस्त्रविद्या में निपुण हो॥३३॥यह ईश्वर समस्त प्रयोग जानता है। इस एक पृथिवी पर कई लक्ष कई एक कोटि व्यक्तियाँ दीखती हैं, वे सब ही परस्पर कुछ न कुछ भेद रखती हैं। प्रथम मनुष्य की ओर देखिये। सम्प्रति इस पृथिवी पर जितने मनुष्य हैं, उन सबों के मुखों की आकृति भिन्न-भिन्न है। इसी प्रकार किसी एक ग्राम के समस्त पशुओं को देखिये, सबका मुख एकसा नहीं। सहस्रों पशुओं में से अपने पशु को गवाँर चरवाह भी पहचान लेता है। कहाँ तक मैं लिखूं, सर्वव्यक्ति परस्पर भिन्न-भिन्न मुखाकृति से युक्त है। क्या यह महामहाश्चर्य की बात नहीं। इस विचित्र रचना को जो रचता रहता है, वह कितने प्रयोगों को जानता है, इसको कौन वर्णन कर सकता है। इसी कारण वह वेद में प्लायोगि=प्रयोगविद् कहा गया है। हे मनुष्यो! वह सर्वज्ञ है। सर्व वस्तुओं में निवास करता है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि विद्वान् उपासकों या सर्व प्राणियों के अभीष्टों को भी जानता है, इसमें सन्देह नहीं। किन्तु यह न्यायवान् है। अतः सबको निज-२ कर्मानुसार वह पुष्कल दान दे रहा है। सबसे बढ़कर वह कृपानिधि मनुष्यों को उन दानों से भूषित कर देता है, जिनके तुल्य अन्य दान जगत् में नहीं हैं। और जिन दानों से ग्रहीता अद्भुत-२ कार्य कर सकते हैं। वे दान कहीं अन्यत्र नहीं। इसी शरीर में विद्यमान हैं। वे पाँच कर्मेन्द्रिय और पाँच ज्ञानेन्द्रिय हैं। हे मनुष्यो! इन दशों दानों को यदि तुम कोटिदान समझो, तो भी थोड़ा ही समझते हो। यदि इन दानों को ऐसी-२ कोटि पृथिवी के समान समझते तो भी इस दान के माहात्म्य को नहीं समझते हो। समस्त पृथिवी पर के पदार्थ इस दान के अर्ध खर्वांश के तुल्य नहीं हैं। वे दान तुमको मिले हुए हैं। उनको कार्य में लाकर जितना धन चाहो, उतना कमालो और हे मनुष्यो! इस अद्भुत दानदाता के निकट सदा कृतज्ञ बने रहो। यह शिक्षा वेद भगवान् इससे देते हैं॥३३॥

अन्व॑स्य स्थू॒रं द॑दृशे पु॒रस्ता॑दन॒स्थ ऊ॒रुर॑व॒रम्ब॑माणः। शश्व॑ती॒ नार्य॑भि॒चक्ष्या॑ह॒ सुभ॑द्रमर्य॒ भोज॑नं बिभर्षि॥

कूटस्थनित्य, नित्य, अनित्य, मिथ्या तथा तुच्छ, इस प्रकार पदार्थों की पाँच प्रकार की सत्ता पाई जाती है, जैसा कि ब्रह्म कूटस्थनित्य, प्रकृति तथा जीव केवल नित्य, यह कार्य्यरूप ब्रह्माण्ड अनित्य, रज्जु सर्पादिक प्रातिभासिक पदार्थ मिथ्या और शशशृङ्ग, वन्ध्यापुत्रादि तुच्छ कहे जाते हैं, इसी प्रकार इस मन्त्र में इस ब्रह्माण्ड को “अनस्थ” शब्द से अनित्य कथन किया है, जैसा कि “न आ सर्वकालमभिव्याप्य तिष्ठतीत्यनस्थः” इस व्युत्पत्ति से “अनस्थ” का अर्थ सब काल में न रहनेवाले पदार्थ का है, “अ” का व्यत्यय से ह्रस्वादेश हो गया है अर्थात् जो परिणामी नित्य हो, उसको “अनस्थ” शब्द से कहा जाता है। इसी भाव को इस मन्त्र में वर्णन किया गया है कि यह कार्य्यरूप ब्रह्माण्ड अनस्थ=सदा स्थिर रहनेवाला नहीं। यद्यपि यह अनित्य है, तथापि ईश्वर की विभूति और जीवों के भोग का स्थान होने से इसको भोजन कथन किया गया है। यहाँ अत्यन्त खेद से लिखना पड़ता है कि “भोजन” के अर्थ सायणाचार्य्य ने उपस्थेन्द्रिय के किये हैं और “अवरम्बमाण” के अर्थ लटकते हुए करके मनुष्य के गुप्तेन्द्रिय में संगत कर दिया है, इतना ही नहीं किन्तु “स्थूल” शब्द से उसको और भी पुष्ट किया है। केवल सायणाचार्य्य ही नहीं, इनकी पदपद्धति पर चलनेवाले विलसन तथा ग्रिफिथ आदि योरोपीय आचार्य्यों ने भी इसके अत्यन्त निन्दित अर्थ किये हैं, जिनको सन्देह हो, वे उक्त आचार्य्यों के भाष्यों का पाठ कर देखें, अस्तु−हम यहाँ बलपूर्वक लिखते हैं कि “भोजन” वा “अवरम्बमाण” शब्दों के अर्थ किसी कोश अथवा व्याकरण से अश्लील नहीं हो सकते। अधिक क्या, हम इस विषय में सायणाचार्य्य के भाष्य का ही प्रमाण देते हैः− देवी दिवो दुहितरा सुशिल्पे उषासानक्ता सदतां नियोनौ। आवां देवास उशती उशन्त उरौ सीदन्तु सुभगे उपस्थे॥ऋग्० १०। ७०। ६इस मन्त्र में “उषा” को देवी=द्योतमान द्युलोक की शक्ति कहा गया है, “योनि” का अर्थ यज्ञस्थान और “उपस्थ” का अर्थ समीपस्थ किया है अर्थात् जब उषारूप देवी योनि=यज्ञस्थान के उपस्थ=समीप प्राप्त होती है, उस समय ऋत्विगादि यज्ञकर्ताओं को यज्ञ का प्रारम्भ करना चाहिये। यदि कोई इन अर्थों को इस प्रकार बिगाड़ना चाहता कि “नार्यभिवक्ष्याह सभद्रमर्य भोजनं बिभर्षि”=हे पति! जो तू पहले नपुंसक था, अब उपस्थेन्द्रियरूप सुन्दर भोजन को धारण किये हुए है, तो क्या योनि, उपस्थ तथा उरु इन शब्दों के आ जाने से पूर्वोक्त अर्थ को न बिगाड़ देता, परन्तु ऐसा नहीं किया। यदि यह कहा जाय कि इस मन्त्र में “नारी” शब्द आया है, इसलिये इसके सहचार से नपुंसक की कथा तथा सुभद्र=भोजन के अर्थ उपस्थेन्द्रिय के ही हो सकते हैं अन्य नहीं, इसका उत्तर यह है कि “अर्चन्ति नारीरपसो न विष्टिभिः” ऋग्० १। ९–२। ३ इस मन्त्र के अर्थ में सायणाचार्य को नारी का अर्थ “स्त्री” करना चाहिये था, परन्तु नारी का अर्थ यौगिक किया है, जैसा कि “नारीर्नेत्र्यः”=नृ नये, ॠदोरप्, नृनरयोर्वृद्धिश्च, शार्ङ्गरवादिषु पाठात् ङीन्”=नयनकर्त्री उषा देवी यहाँ नारी है। जब उषाकाल का नाम नारी हो सकता है तो फिर “सत्वरजस्तमः” इन तीनों गुणों की माता अनादिसिद्ध प्रकृति का नाम नारी क्यों नहीं हो सकता ? हमारे पक्ष में प्रबल तर्क यह है कि नारी का शश्वती विशेषण है, जो अनादिसिद्ध प्रकृति को कथन करता है, किसी व्यक्तिविशेष को नहीं। इससे भी बढ़कर हमारे पक्ष की पोषक अन्य युक्ति यह है कि “अर्य” शब्द मन्त्र में ईश्वर का वाचक है, जिसको निरुक्त और निघण्टु अपनी कण्ठोक्ति से ईश्वर का वाचक मानते हैं, अस्तु। इसी प्रकार अन्य मन्त्रों के अर्थ भी वेदानभिज्ञ भाष्यकारों ने बहुत प्रकार से अनेक स्थलों में बिगाड़े हैं, जिनको यथास्थान भले प्रकार दर्शाया गया है, अब हम उनमें से एक दो मन्त्रों को उदाहरणार्थ यहाँ उद्धृत करते हैं− यदस्या अहु भेद्याः कृधु स्थूलमुपातसत्। मुष्काविदस्या एजतो गोशफे शकुलाविव॥यजु० २३। २८ इस मन्त्र में “स्थूल” और “मुष्क” शब्द आ जाने से महीधर ने ऐसे अश्लील अर्थ किये हैं, जिसको पढ़ने तथा सुनने से भी घृणा होती है। जिनको सन्देह हो, वे महीधरभाष्य पढ़कर देखें। घृणास्पद होने से हम उस अर्थ को यहाँ उद्धृत नहीं करते। वास्तव में बात यह है कि वेद के आशय को विना समझे जो लोग प्राकृतदृष्टि से वेदों के अर्थ करते हैं, वे महापाप के भागी होते हैं, जैसा किः− मातुर्दिधिषुमब्रवं स्वसुर्जारः शृणोतु नः। भ्रातेन्द्रस्य सखा मम॥ऋग्० ६। ५५। ५इस मन्त्र का यदि अर्थ विना विचार से किया जाए, तो सीधा गाली प्रतीत होता है कि “मैं माता के दिधिषु=दूसरे पति को कहता हूँ कि वह स्वसुर्जार=बहिन का जार मेरे वचन को सुने, जो इन्द्र का भाई और मेरा मित्र है” यह अश्लील अर्थ किया है, परन्तु वास्तव में ऋग्वेद में जहाँ इस विराट् के तेजोमण्डल सूर्य्य का वर्णन किया गया है, उस प्रकरण का यह मन्त्र है, जिसका सत्यार्थ यह है कि मैं मातुर्दिधिषु=मानकर्त्री पृथिवी के धारण करनेवाले सूर्य्य को लक्ष्य करके कहता हूँ कि “स्वसुः=स्वयं सरतीति स्वसा”=जो अपने स्वभाव से सरण करनेवाली उषारूप किरणें हैं, उनका जार=जारयिता और वह इन्द्र=विद्युत् का भाई और मेरा मित्र है, जिसका भाव यह है कि सूर्य्य अपनी आकर्षणशक्ति से पृथ्वी को धारण करता और अन्धकार से मिश्रित उषाकाल को जलाकर अपने प्रकाश को उत्पन्न करता है। यहाँ “स्वसृ” शब्द का अर्थ बहिन नहीं, किन्तु “सप्त स्वसारो अभिसंनवन्ते यत्र गवां निहिताः सप्त सप्त” ऋग्० १। १६४। ३ इस मन्त्र में सूर्य्य की किरणों का नाम “स्वसा” है, जो मन्त्र के भाष्य में स्पष्ट है। इसी प्रकार “माता पितरमुत आव भाज” ऋग्० १। १६४। ८ इस मन्त्र के भाष्य में माता का अर्थ विस्तृत क्षेत्रवती भूमि है, जननी नहीं। वास्तव में वेदों के आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक तीन प्रकार के अर्थ हैं, जिनका तत्त्व न समझकर अल्पदर्शी लोग उलटे अर्थ कर देते हैं, जिससे पाठकों की दृष्टि में वेद निन्दित समझे जाते हैं। या यों कहो कि लौकिक संस्कृत के अमरकोश की रीति से “स्वसा” शब्द का अर्थ बहिन तथा “माता” शब्द का अर्थ जननी ही होता है, इस लिये लोगों को भ्रम उत्पन्न हो जाता है कि “मातुर्दिधिषुमब्रवम्” इत्यादि मन्त्रों में माता तथा बहिन की गालियें ही गायन की गई हैं, परन्तु वास्तव में यह बात नहीं। उनको इस अल्पदृष्टि को छोड़कर उदारदृष्टि से वेदाशय का विवरण करना चाहिये और विलसन, ग्रिफिथ तथा मैक्समूलर आदि विदेशी और महीधर तथा सायणादि स्वदेशी अर्वाचीन भाष्यकारों का अनुकरण न करते हुए “परोक्षकृताः प्रत्यक्षकृताश्च मन्त्रा भूयिष्ठा अल्पश आध्यात्मिकाः” निरु० ५। १ इत्यादि निरुक्त तथा निघण्टु को देखकर वेदों का मुख्यार्थ करना चाहिये, जिससे वेदों का गौरव बढ़े और सम्पूर्ण मनुष्य वेदानुयायी होकर सुखसम्पत्ति को प्राप्त हों॥३४॥इति प्रथमं सूक्तं षोडशो वर्गश्च समाप्तः॥यह पहला सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥जब उपासक धीरे धीरे उसी के अनुग्रह से उसकी विभूति को कुछ-कुछ जानने में समर्थ होता है, तब उसके अन्तःकरण में सर्व भाव बदलते जाते हैं। उसके अन्तःकरण से शत्रुता भाग जाती है। ईर्ष्या के सब बीज दग्ध हो जाते हैं। समबुद्धि उपस्थित होती है। यह मेरा देशी और यह विदेशी है, यह भाव प्रलीन हो जाता है। स्वदेशीय पालनीय हैं और विदेशीय घातनीय हैं। तब ही हमारे देश के आदमी सुखी होंगे, ये सर्व प्राणी, पशु, मत्स्य, पक्षी और सरीसृप आदि मनुष्यजाति के कल्याण के लिये सृष्ट हैं। इसलिये ये सफल जीव मनुष्य के कार्य में नियोजनीय हैं। उस मनुष्य जाति के लिये उनके हनन करने में भी कोई दोष नहीं और उनके भक्षण में भी कोई पाप नहीं, इस प्रकार के सब विपरीत विचार नष्ट हो जाते हैं। किन्तु सर्वजीव समान हैं। सर्व परस्पर भाई हैं, यह कल्याणी मति उदित होती है। एवञ्च उस काल में शनैः-शनैः वह उपासक जगत् के समस्त व्यापारों से विरत होकर परमात्मचिन्तन में आसक्त हो जाता है। तब उसको अन्य कुछ कर्तव्य भी नहीं रहता है। तब वह आनन्द का अनुभव करता रहता है। कोई अविद्या उसको व्यथित नहीं कर सकती। इस अवस्था में सब इन्द्रियों का एक ही उद्देश हो जाता है। तब मानो, यह बुद्धिरूपा नारी भी कृतार्था होकर अपने स्वामी जीवात्मा की स्तुति करने लगती है। यही भाव इस ऋचा से वेद दिखलाता है॥३४॥

इ॒दं व॑सो सु॒तमन्धः॒ पिबा॒ सुपू॑र्णमु॒दर॑म्। अना॑भयिन्ररि॒मा ते॑॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि सेना का नेता वीरों के प्रति कथन करता है कि हे कर्मयोगी शूरवीरो! तुम इस सिद्ध किये हुए आह्लादक सोमादि रस का पान करो। यह तुम्हारे लिये सिद्ध किया हुआ है अर्थात् विजय को प्राप्त कर्मयोगी शूरवीरों की सेवा-शुश्रूषा सोमादि रसों से विधान की गई है॥१॥बड़ी भक्ति और श्रद्धा से ईश्वर के नाम पर प्रत्येक वस्तु को प्रथम रख, तब उससे अपना कार्य्य लेवे, इसी नियम के अनुसार नवान्नेष्टि प्रभृति शुभकर्म गृहस्थों के गृहों में हुआ करते हैं॥१॥

नृभि॑र्धू॒तः सु॒तो अश्नै॒रव्यो॒ वारैः॒ परि॑पूतः। अश्वो॒ न नि॒क्तो न॒दीषु॑॥

यह सोमरस, जो विद्वान् वैद्यों द्वारा शोधकर तैयार किया जाता है, वह युद्धविशारद नेताओं का रक्षक होता है अर्थात् उसके पान करने से शरीर में विचित्रबल तथा ऐसी फुरती आ जाती है कि वह शत्रु पर अवश्य विजय प्राप्त करते हैं अर्थात् उक्त रसपान करने पर शूरवीर को विद्युत् के समान तेजस्वी और ओजस्वी बना देता है॥२॥वेदों और विद्वानों के द्वारा शुभ और पवित्र कर्म अच्छे प्रकार समझ कर उनके अनुष्ठान में मनुष्य लगे रहें॥२॥

तं ते॒ यवं॒ यथा॒ गोभिः॑ स्वा॒दुम॑कर्म श्री॒णन्तः॑। इन्द्र॑ त्वा॒स्मिन्त्स॑ध॒मादे॑॥

याज्ञिक लोग ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगी पुरुषों का यज्ञस्थान में आह्वान करते हैं कि हम लोगों ने आपके लिये गव्य पदार्थों द्वारा स्वादु रस सिद्ध किया है, आप कृपा करके हमारे यज्ञ को सुशोभित करते हुए इसका पान करें और हमारे यज्ञ में ज्ञानयोग तथा कर्मयोग का उपदेश कर हमें कृतकृत्य करें। स्मरण रहे कि यज्ञों में जो सोमादि रस सिद्ध किये जाते हैं, वे आह्लादक होते हैं, मादक नहीं॥३॥परमात्मा को अपने हृदय में देखते हुए उसका ध्यान और स्तुति करे और बाह्य जगत् में उसकी विलक्षणलीला देख-२ कर उसकी कीर्ति का मनोहर गान करते हुए मन को तृप्त करे॥३॥

इन्द्र॒ इत्सो॑म॒पा एक॒ इन्द्रः॑ सुत॒पा वि॒श्वायुः॑। अ॒न्तर्दे॒वान्मर्त्याँ॑श्च॥

इस मन्त्र में कर्मयोगी का महत्त्व वर्णन किया गया है कि विश्व को वशीभूत करनेवाला कर्मयोगी परमात्मसम्बन्धी तथा सांसारिक ज्ञान उपलब्ध करता है, इसलिये पुरुष को कर्मयोगी बनना चाहिये। या यों कहो कि देव तथा मनुष्यों के बीच कर्मयोगी ही इस विविध विश्व के ऐश्वर्य्य को भोगता है, इसलिये अभ्युदय की इच्छावाले पुरुषों का कर्तव्य है कि वह उस विश्वायु कर्मयोगी की संगति से अभ्युदय प्राप्त करें॥४॥सूर्य्य आदि देव तथा नृप प्रभृति मनुष्य कदापि भी न उपासनीय, न ध्यातव्य, न पूज्य और न अर्चनीय हैं, केवल एक ईश्वर ही सकल मनुष्यों का सेव्य है। इस ऋचा से यह शिक्षा भगवान् देते हैं। इस हेतु ऋचा में इन्द्रः+इत्=इन्द्र ही, एकः इन्द्रः=एक इन्द्र ही इत्यादि पद आते हैं। सोम और सुत इन दोनों शब्दों के अर्थ में भेद है। समस्त पदार्थवाची सोम शब्द और यज्ञ के लिये जो पदार्थ प्रस्तुत किये जाते हैं, वे सुत। सुत शब्द यज्ञ के लिये भी आता है॥४॥

न यं शु॒क्रो न दुरा॑शी॒र्न तृ॒प्रा उ॑रु॒व्यच॑सम्। अ॒प॒स्पृ॒ण्व॒ते सु॒हार्द॑म्॥

इस मन्त्र में यह वर्णन किया है कि बलवान्, दुष्प्राप्य तथा पूर्णकाम आदि सब पुरुष कर्मयोगी को सदा प्रसन्न रखते तथा उसी के अनुकूल आचरण करते हैं, अर्थात् सब अनुचर जैसा सम्बन्ध रखते हुए सदा उसकी सेवा में तत्पर रहते हैं, ताकि वह प्रसन्न हुआ सबको विद्यादान द्वारा तृप्त करे॥५॥जो सर्वेश्वर सर्वात्मा परमात्मा है, वह सदा एक रस से रहता है। वह न कदापि तृप्त होता न प्रसन्न और न क्लेशित होता। जिसको कोई भी पदार्थ प्रसन्न नहीं कर सकते, उसको अध्वर्युगण स्तोत्रादिकों से कैसे लुभा सकते। तथापि प्रेम, भक्ति और श्रद्धा से जो उसकी स्तुति प्रार्थना करते हैं, वह उनकी परमदेवता के प्रति मानसिक भावना है। यद्यपि सर्व भाव से उसको कोई भी प्रसन्न नहीं कर सकता, तथापि वह सबका पिता और भक्तवत्सल है, अतः उसकी प्रसन्नता मनुष्यों के कर्म में प्रतीत होती है॥५॥

गोभि॒र्यदी॑म॒न्ये अ॒स्मन्मृ॒गं न व्रा मृ॒गय॑न्ते। अ॒भि॒त्सर॑न्ति धे॒नुभिः॑॥

जो लोग कर्मयोगी को क्रूरता से वञ्चन करते हैं, वे उससे विद्या संबन्धी लाभ प्राप्त नहीं कर सकते और जो लोग वाणीमात्र से उसका सत्कार करते हैं अर्थात् उसको अच्छा कह छोड़ते हैं और उसके कर्मों का अनुष्ठान नहीं करते, वे भी उससे लाभ नहीं उठा सकते और न ऐसे अनुष्ठानी पुरुष कभी भी अभ्युदय को प्राप्त होते हैं, इसलिये जिज्ञासु पुरुषों को उचित है कि सदैव सरलचित्त से उसकी सेवा तथा आज्ञापालन करते हुए उससे विद्या का लाभ करें और उसके कर्मों का अनुष्ठान करते हुए अभ्युदय को प्राप्त हों॥६॥हे मनुष्यो! जिसको सब ही खोज रहे हैं, उसी की उपासना से आत्मा को तृप्त करो॥६॥

त्रय॒ इन्द्र॑स्य॒ सोमाः॑ सु॒तासः॑ सन्तु दे॒वस्य॑। स्वे क्षये॑ सुत॒पाव्नः॑॥

इस मन्त्र का तात्पर्य्य यह है कि तेजस्वी कर्मयोगी के लिये पुनः-पुनः अर्चननिमित्त तीन सोम-भागों के संस्कार का विधान है अर्थात् यज्ञ में आये हुए कर्मयोगी को आगमन, मध्य और गमनकाल में सोमादि उत्तमोत्तम पदार्थ अर्पण करे, जिससे वह प्रसन्न होकर विद्यादि सद्गुणों का उपदेश करके जिज्ञासुओं को अनुष्ठानी बनावे॥७॥हम लोग उसको क्या दे सकते हैं। उसके जो ये तीनों लोक हैं, वे ही यज्ञिय पदार्थ के समान प्रिय होवें। अथवा उसके जो ये तीन लोक हैं, वे ही सबको सोमवत्=सुतवत् प्रिय होवें॥७॥

त्रयः॒ कोशा॑सः श्चोतन्ति ति॒स्रश्च॒म्वः१॒॑ सुपू॑र्णाः। स॒मा॒ने अधि॒ भार्म॑न्॥

शत्रु के साथ संग्राम प्राप्त होने पर तीन प्रकार की सामग्री से विजय प्राप्त होती है अर्थात् (१) विद्याकोश=बुद्धिमान् सेनापति जो सेना को विचारपूर्वक संग्राम में प्रवृत्त करे (२) बलकोश=बलवान् सैनिकों का होना और (३) धनकोश=धन का पर्याप्त होना, ये तीन कोश जिसके पास पूर्ण होते हैं, वे अवश्य विजय को प्राप्त होते हैं, अन्य नहीं॥८॥हे मनुष्यो! ईश्वर की महान् महिमा है, कहीं भी अपूर्णता वा न्यूनता नहीं है। यह विषय इससे दिखलाया गया है॥८॥

शुचि॑रसि पुरुनि॒ष्ठाः क्षी॒रैर्म॑ध्य॒त आशी॑र्तः। द॒ध्ना मन्दि॑ष्ठः॒ शूर॑स्य॥

इस मन्त्र में पुष्टिकारक तथा आह्लादजनक दूध-घृतादि पदार्थों की महिमा वर्णन की गई है अर्थात् कर्मयोगी शूरवीरों के अङ्ग प्रत्यङ्ग दूध, दधि तथा घृतादि शुद्ध पदार्थों से ही सुसंगठित तथा सुरूपवान् होते हैं, तमोगुण-उत्पादक मादक द्रव्यों से नहीं, इसलिये प्रत्येक पुरुष को उक्त पदार्थों का ही सेवन करना चाहिये, हिंसा से प्राप्त होनेवाले तथा मादक द्रव्यों का नहीं॥९॥मनुष्य प्रथम सर्व प्रकार से पवित्र और परोपकारी बनें, तदनन्तर अपने विशुद्ध कर्मों से उसके आनन्दप्रद होवें॥९॥

इ॒मे त॑ इन्द्र॒ सोमा॑स्ती॒व्रा अ॒स्मे सु॒तासः॑। शु॒क्रा आ॒शिरं॑ याचन्ते॥

याज्ञिक लोगों का कथन है कि हे कर्मयोगिन् महात्माओ! हम लोगों से सिद्ध किया हुआ यह शुद्ध, पौष्टिक सोमरस आपके लिये उपस्थित है, आप इसका पान करें।क्या स्थावर और क्या जङ्गम, सर्व पदार्थ ही ईश्वर से अपना खाद्य पदार्थ माँग रहे हैं। क्या ही विलक्षण यह संसार है॥१०॥

ताँ आ॒शिरं॑ पुरो॒ळाश॒मिन्द्रे॒मं सोमं॑ श्रीणीहि। रे॒वन्तं॒ हि त्वा॑ शृ॒णोमि॑॥

“पुरो दाश्यते दीयते इति पुरोडाशः”=जो पुरः=पहिले दाश्यते=दिया जाय, उसको “पुरोडाश” कहते हैं। याज्ञिक पुरुषों का कथन है कि हे ऐश्वर्य्यसम्पन्न कर्मयोगिन्! पय आदि उत्तमोत्तम पदार्थों से बने हुए इस “पुरोडाश”=यज्ञशेष को आप ग्रहण करें। स्मरण रहे कि पुरोडाश को पहले देने का कारण यह है कि वह यज्ञ के हवनीय पदार्थों में सर्वोत्तम बनाया जाता है, इसलिये उसका सबसे पहले देने का विधान है॥११॥वह जगदीश ही निखिल पदार्थों को मिश्रित कर अच्छी प्रकार उन्हें पका कार्य में परिणत कर रहा है। इस महान् कार्य को दूसरा कौन कर सकता, क्योंकि वही अतिशय धनी है॥११॥

हृ॒त्सु पी॒तासो॑ युध्यन्ते दु॒र्मदा॑सो॒ न सुरा॑याम्। ऊध॒र्न न॒ग्ना ज॑रन्ते॥

इस मन्त्र में सोमरस के गुणवर्णन किये गये हैं कि पान किया हुआ सोमरस पुष्टि आह्लाद तथा बुद्धिवर्द्धकता आदि उत्तम गुण उत्पन्न करता है, सुरापान के समान दुर्मद उत्पन्न नहीं करता अर्थात् जैसे सुरा बुद्धिनाशक तथा शरीरगत बलनाशक होती है, वैसा सोमरस नहीं, इसलिये हे कर्मयोगिन्! स्तोता लोग उक्त रसपान के लिये आपसे प्रार्थना करते हैं कि कृपा करके इसको ग्रहण करें। और जो सायणादि भाष्यकार तथा यूरोप देश निवासी विलसन्, ग्रिफिथ तथा मैक्समूलर आदि वेद के भाष्यकार सोमरस को एक प्रकार का मदकारक पदार्थ मानते हैं, सो ठीक नहीं, क्योंकि मन्त्र में स्पष्ट लिखा है कि “दुर्मदासो न सुरायां”=सुरा=शराब के पीने से जैसा दुर्मद होता है, वैसा सोमपान से नहीं अर्थात् सोमरस पौष्टिक तथा बुद्धिवर्द्धक और सुरापान बलनाशक तथा बुद्धि कुण्ठित करनेवाला है, इसलिये सोम को सुरा का प्रतिनिधि अथवा दुर्मदकारक मानना उक्त भाष्यकारों की भूल है॥१२॥हे मनुष्यो! विषयवासनाओं में आसक्त पुरुष परमतत्त्व को नहीं समझ सकते, अतः चित्त को विमल बना स्वस्थ हो उसकी स्तुति प्रार्थना करो॥१२॥

रे॒वाँ इद्रे॒वतः॑ स्तो॒ता स्यात्त्वाव॑तो म॒घोनः॑। प्रेदु॑ हरिवः श्रु॒तस्य॑॥

हे कर्मयोगिन्! आपके सदृश गुणोंवाला पुरुष धनवान्, ऐश्वर्य्यवान् तथा ऐश्वर्य्यसम्पन्न होता है अर्थात् जो पुरुष कर्मयोगी के उपदेशों को ग्रहण करके तदनुकूल आचरण बनाता है, वह अवश्य ऐश्वर्य्यवाला तथा तेजस्वी होता है॥१३॥हे मनुष्यो! उसमें विश्वास करो। अवश्य तुम सब प्रकार से धनसम्पन्न होवोगे। जब इस लोक में धनी के सेवक धनी होते हैं, तब उसके सेवक की बात ही क्या॥१३॥

उ॒क्थं च॒न श॒स्यमा॑न॒मगो॑र॒रिरा चि॑केत। न गा॑य॒त्रं गी॒यमा॑नम्॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि जिस पुरुष की वाणी प्रशस्त नहीं अर्थात् जो अनृतवादी और अकर्मण्य है, वह कर्मयोगी के सन्मुख नहीं ठहर सकता, क्योंकि कर्मयोगी स्तुत्यर्ह स्तोत्रों का ज्ञाता होने से परमात्मा की आज्ञा का पूर्णतया पालन करनेवाला होता है॥१४॥वह इन्द्र सबको जानता है, अतः छल कपट त्याग और उसमें विश्वास जमा श्रद्धा भक्ति से उसकी स्तुति प्रार्थना करो॥१४॥

मा न॑ इन्द्र पीय॒त्नवे॒ मा शर्ध॑ते॒ परा॑ दाः। शिक्षा॑ शचीवः॒ शची॑भिः॥

इस मन्त्र में जिज्ञासु की ओर से यह प्रार्थना कथन की गई है कि हे शासनकर्त्ता कर्मयोगिन्! आप मुझको हिंसक तथा क्रूरकर्मी मनुष्य के वशीभूत न करें, जो अत्यन्त कष्ट भुगाता है। कृपा करके आप मुझको अपने ही शासन में रखकर मेरा जीवन उच्च बनावें, जिससे मैं परमात्मा की आज्ञापालन करता हुआ उत्तम कर्मों में प्रवृत्त रहूँ। स्मरण रहे कि मन्त्र में “शची” शब्द बुद्धि, कर्म तथा वाणी के अभिप्राय से आया है और वैदिककोश में इसके उक्त तीन ही अर्थ किये गये हैं अर्थात् “शची” शब्द यहाँ कर्मयोगी की शक्ति के लिये प्रयुक्त हुआ है, किसी व्यक्तिविशेष के लिये नहीं। पौराणिक भाष्यकारों ने “शची” शब्द कहीं-कहीं एक व्यक्तिविशेष इन्द्र की स्त्री के लिये प्रयुक्त किया है और व्यक्तिविशेष ही उन्होंने “इन्द्र” माना है, परन्तु यह भाव मन्त्र से नहीं निकलता। यह अर्वाचीन लोगों की कल्पित कल्पना है। जैसे भवानी, ब्रह्माणी, ब्रह्मा और शिव की स्त्रियाँ कल्पना करती हैं, इसी प्रकार यह कल्पना भी सर्वथा वेदबाह्य और अर्वाचीन है॥१५॥हे मनुष्यो! निष्प्रयोजन हिंसा से दूर रहो अन्यथा तुम भी हिंसा में पड़ोगे और शुभ कर्मों के द्वारा फल की आकाङ्क्षा करो॥१५॥

व॒यमु॑ त्वा त॒दिद॑र्था॒ इन्द्र॑ त्वा॒यन्तः॒ सखा॑यः। कण्वा॑ उ॒क्थेभि॑र्जरन्ते॥

इस मन्त्र में जिज्ञासुजन कर्मयोगी की स्तुति करते हुए यह कथन करते हैं कि हे भगवन्! आप ऐसी कृपा करें कि हम लोग आपके समान सद्गुणसम्पन्न होकर समान ख्यातिवाले हों, आप हमारी इस कामना को पूर्ण करें॥१६॥उसको सब ही पूजते हैं, किन्तु विश्वासी और आज्ञापालक जन ही फल पाते हैं, यह वैलक्षण्य है॥१६॥

न घे॑म॒न्यदा प॑पन॒ वज्रि॑न्न॒पसो॒ नवि॑ष्टौ। तवेदु॒ स्तोमं॑ चिकेत॥

जिज्ञासु की ओर से यह स्तुति की गई है कि हे बड़ी शक्तिवाले कर्मयोगिन्! नवीन रचनात्मक कर्मरूपी यज्ञ में मैं आप ही की स्तुति करता हूँ। कृपा करके मुझको आप अपने सदुपदेशों से कर्मण्य बनावें, ताकि मैं भी कर्मशील होकर ऐश्वर्य्य प्राप्त करूँ॥१७॥इससे यह सिद्ध होता है कि प्रत्येक शुभकर्म में केवल भगवान् ही स्तवनीय है और अन्यान्य देवों की उपासना से हानि ही है॥१७॥

इ॒च्छन्ति॑ दे॒वाः सु॒न्वन्तं॒ न स्वप्ना॑य स्पृहयन्ति। यन्ति॑ प्र॒माद॒मत॑न्द्राः॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि उत्तमोत्तम आविष्कारों में तत्पर कर्मयोगी लोग निरालसी क्रियाओं में तत्पर पुरुष को विविध रचनात्मक कामों में प्रवृत्त करते हैं अर्थात् उद्योगी पुरुष को अपने उपदेशों द्वारा कलाकौशलादि अनेकविध कामों को सिखलाते हैं और ऐसा पुरुष जो आलस्य को त्यागकर निरन्तर उद्योग में प्रवृत्त रहता है, वही सुख भोगता तथा वही परमानन्द को प्राप्त होता है और आलसी व्यसनों में प्रवृत्त हुआ निरन्तर अपनी अवनति करता तथा सुख, सम्पत्ति और आनन्द से सदा वञ्चित रहता है, इसलिये ऐश्वर्य्य और आनन्द की कामनावाले पुरुष को निरन्तर उद्योगी होना चाहिये॥१८॥जैसे विद्वान् आलसी पुरुष को नहीं चाहते हैं, तद्वत् सर्वहितकारी पुरुषों को उचित है कि वे उत्तमोत्तम कर्म करके उपमेय बनने की चेष्टा करें॥१८॥

ओ षु प्र या॑हि॒ वाजे॑भि॒र्मा हृ॑णीथा अ॒भ्य१॒॑स्मान्। म॒हाँ इ॑व॒ युव॑जानिः॥

राजलक्ष्मी, जो सदा युवति है, उसका पति वयोवृद्ध=हतपुरुषार्थ तथा जीर्णावयवोंवाला पुरुष कदापि नहीं हो सकता, या यों कहो कि जिस प्रकार युवति स्त्री का पति वृद्ध हो, तो वह पुरुष सभा, समाज तथा सदाचार के नियमों से लज्जित होकर अपना शिर ऊँचा नहीं कर सकता, इसी प्रकार जो पुरुष हतोत्साह तथा शूरतादि गुणों से रहित है, वह राज्यश्रीरूप युवति का पति बनने योग्य नहीं होता। इस मन्त्र में वृद्धविवाह तथा हतोत्साह पुरुष के लिये राजलक्ष्मी की प्राप्ति दुर्घट कथन की है अर्थात् युवति स्त्री के दृष्टान्त से इस बात को बोधन किया है कि शूरवीर बनने के लिये सदा युवावस्थापन्न शौर्य्यादि भावों की आवश्यकता है॥१९॥यदि हम उपासक कुकर्मों में न फंसें, तो वह कदापि क्रुद्ध न होगा। सदा उसको मन में रख कर्मों में प्रवृत्त होओ॥१९॥

मो ष्व१॒॑द्य दु॒र्हणा॑वान्त्सा॒यं क॑रदा॒रे अ॒स्मत्। अ॒श्री॒र इ॑व॒ जामा॑ता॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि हे सर्वविद्यासम्पन्न कर्मयोगिन्! आप शत्रुओं का हनन करनेवाले तथा विद्यादाता हैं। कृपा करके हमारे यज्ञ में पधारें। निर्धन जामाता के समान अति विलम्ब न करें अर्थात् जैसे निर्धन जामाता बिना सामग्री के ठीक समय पर नहीं पहुँच सकता, इस प्रकार आप अतिकाल न करें॥२०॥ईश्वर की उपासना में विलम्ब न करना चाहिये। विक्षिप्त चित्त से आराधित परमात्मा प्रसन्न नहीं होता॥२०॥

वि॒द्मा ह्य॑स्य वी॒रस्य॑ भूरि॒दाव॑रीं सुम॒तिम्। त्रि॒षु जा॒तस्य॒ मनां॑सि॥

यज्ञ में आये हुए कर्मयोगी की प्रशंसा करते हुए जिज्ञासु जनों का कथन है कि विद्यादि का दान देनेवाले इस बुद्धिमान् के अनुकूल हमलोग आचरण करें, जिसने सत्त्वादि तीनो गुणों को जाना है अर्थात् जो प्राकृतिक पदार्थों को भले प्रकार जानकर नवीन आविष्कारों का करनेवाला है, या यों कहो कि पदार्थविद्या में भले प्रकार निपुण कर्मयोगी से विद्यालाभ कर ऐश्वर्य्यशाली हों॥२१॥हे मनुष्यो! क्या तुम उसकी महती प्रीति और बहुत दानों को नहीं जानते हो ? यह त्रिलोकी उसके नियम दिखला रही है। कैसी मेघों की घटा मनुष्यों के मन को प्रीतियुक्त करती है। कैसे-२ अद्भुत फूल, कन्द, ओषधि, व्रीहि और उपयोगी पशु इस प्रकार के सहस्रों वस्तु रात्रि-दिवा दे रहा है। हे मनुष्यो! शतशः माता-पिताओं से भी वह बढ़कर वत्सल है। अतएव वही धनार्थ वा सन्तानार्थ भी ध्येय और मन्तव्य है॥२१॥

आ तू षि॑ञ्च॒ कण्व॑मन्तं॒ न घा॑ विद्म शवसा॒नात्। य॒शस्त॑रं श॒तमू॑तेः॥

याज्ञिक लोगों का कथन है कि हे जिज्ञासु जनसमुदाय! तुम सब मिलकर विद्वानों सहित आये हुए कर्मयोगी का अर्चन तथा विविध प्रकार से सेवा सत्कार करो, जो विद्वान् महात्माओं के लिये अवश्यकर्तव्य है। ये बलवान्, यशस्वी तथा अनेक प्रकार से रक्षा करनेवाले योगीराज प्रसन्न होकर हमें विद्यादान द्वारा कृतार्थ करें, क्योंकि इनके समान यशस्वी, प्रतापी तथा वेदविद्या में निपुण अन्य कोई नहीं है॥२२॥जैसे परमात्मा अनन्त साहाय्यप्रदाता है, वैसे तुम भी लोगों में साहाय्य करो। जैसे वह ज्ञानबल है, वैसे ही तुम ज्ञानी और बली होओ। जैसे वह महायशस्वी है, वैसे ही तुम भी यशों का उपार्जन करो और पात्रों में ज्ञानधन की वर्षा करो॥२२॥

ज्येष्ठे॑न सोत॒रिन्द्रा॑य॒ सोमं॑ वी॒राय॑ श॒क्राय॑। भरा॒ पिब॒न्नर्या॑य॥

सोमरस बनानेवाले को “सोता” कहते हैं, याज्ञिक लोगों का कथन है कि हे सोता! शत्रुओं के नाशक, सब कामों के पूर्ण करने में समर्थ तथा सबके हितकारक कर्मयोगी के लिये सर्वोत्तम सोमरस भेट करो, जिसको वह पानकर प्रसन्न हुए सद्गुणों की शिक्षा द्वारा हमको अभ्युदय सम्पन्न करे॥२३॥वही जगदीश महावीर है, क्योंकि वह सब कुछ कर सकता है, अतः वीरत्व की प्राप्ति के लिये उसी की उपासना करो। उसकी आज्ञा से ब्रह्मचर्य्य और व्रतों को करके वीर हो, लोगों में उपकार करो और मनोयोग से परार्थ करते हुए तुम परमगुरु में चित्त रक्खो॥२३॥

यो वेदि॑ष्ठो अव्य॒थिष्वश्वा॑वन्तं जरि॒तृभ्यः॑। वाजं॑ स्तो॒तृभ्यो॒ गोम॑न्तम्॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि जो कर्मयोगी धनों का लाभ करानेवाला और जो कवि=वेदों के ज्ञाता उपासकों के लिये अश्व, गो तथा अन्नादि नाना धनों का समर्पण करनेवाला है, उसका हम लोग श्रद्धापूर्वक सत्कार करें, ताकि वह प्रसन्न होकर ऐश्वर्य्य का लाभ करानेवाला हो॥२४॥हे मनुष्यो! यद्यपि उसके दान पृथिवी प्रभृति बहुत हैं, तथापि सर्व वस्तुओं से श्रेष्ठ दान यह है कि ये दोनों इन्द्रिय हैं। इन्हें शुभ कर्मों में लगाओ। वहाँ भी महादान विस्पष्ट वाणी है। तत्रापि विद्वान् स्तुतिपाठकों को और जितेन्द्रिय तपस्वियों को पवित्रतमा विद्यायुक्ता सदसद्विवेकिनी सुबुद्धियुक्ता वाणी देता है, जिस वाणी से जगत् को वश में कर सकते हैं। निरीह ईश्वर को भी प्रसन्न करते हैं। वही सर्वभाव से ध्येय, गेय और स्तुत्य है॥२४॥

पन्य॑म्पन्य॒मित्सो॑तार॒ आ धा॑वत॒ मद्या॑य। सोमं॑ वी॒राय॒ शूरा॑य॥

हे जिज्ञासु जनो! इस वेदविद्या के ज्ञाता ओजस्वी=बलवान् कर्मयोगी का सत्कार उत्तम प्रकार से बने हुए सोमरस द्वारा ही करना चाहिये, जिससे वह हर्षित हुए उत्तमोत्तम उपदेशों द्वारा हमारे जीवन में पवित्रता का संचार करे॥२५॥हे मनुष्यो! ईश्वर ही स्तवनीय है। अचेतन सूर्य्यादि उपासनीय नहीं तथा सर्व नवीन और प्रिय वस्तु उसको समर्पित करो॥२५॥

पाता॑ वृत्र॒हा सु॒तमा घा॑ गम॒न्नारे अ॒स्मत्। नि य॑मते श॒तमू॑तिः॥

जिज्ञासुजन प्रार्थना करते हैं कि हे भगवन्! आप हमारे समीप आवें अर्थात् विद्या, शिक्षा तथा अनेकविध उपायों से हमारी रक्षा करें, क्योंकि रक्षा करनेवाला कर्मयोगी ही शासक होता है, अरक्षक नहीं॥२६॥परमात्मा ही सर्वविघ्ननिवारक और सर्वपालक है। उसकी आज्ञापालन करते हुए मनुष्य इस प्रकार निर्वाह करें, जिससे सदाचारनिरत उन्हें देख प्रसन्न हो और आपदों से बचावे॥२६॥

एह हरी॑ ब्रह्म॒युजा॑ श॒ग्मा व॑क्षतः॒ सखा॑यम्। गी॒र्भिः श्रु॒तं गिर्व॑णसम्॥

परमात्मा की आज्ञा पालन करनेवाले तथा संसार को सुख का मार्ग विस्तृत करनेवाले ज्ञानयोगी और कर्मयोगी यज्ञ में आकर वेदवाणियों द्वारा उस प्रभु की उपासना करते हुए सब जिज्ञासुजनों को परमात्मा की आज्ञा पालन करने का उपदेश करते हैं कि हे जिज्ञासुओ! तुम उस परमात्मा की उपासना तथा आज्ञापालन करो, जो सबको मित्रता की दृष्टि से देखता है, जैसा कि “मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्” इत्यादि मन्त्रों में वर्णन किया है कि सर्वमित्र परमात्मा की उपासना करता हुआ प्रत्येक पुरुष उसी की आज्ञापालन में तत्पर रहे॥२७॥मूर्तवस्तुवत् वह कदापि प्रत्यक्ष नहीं होता। परम्परा से वह केवल सुना जाता है, उसको किन्हींने देखा नहीं, क्योंकि वह इन्द्रियों से अदृश्य है। तब क्या उसके दर्शन के लिये यत्न भी न किया जाय, ऐसा नहीं। ये उसकी विभूतियाँ उसको प्रकाशित करती हैं, इनमें ही वह विद्यमान है। इनमें ही वह अन्वेष्ट्य है। इसी कारण ये विभूतियाँ परस्पर कल्याणकारिणी हैं। इनके कल्याणकारित्व को भी हम लोग नहीं देखते, क्योंकि चित्त विक्षिप्त हो रहा है॥२७॥

स्वा॒दवः॒ सोमा॒ आ या॑हि श्री॒ताः सोमा॒ आ या॑हि। शिप्रि॒न्नृषी॑वः॒ शची॑वो॒ नायमच्छा॑ सध॒माद॑म्॥

इस मन्त्र में ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगी का सत्कार कथन किया है कि हे भगवन्! आप विद्वानों सहित भोजन तथा उत्तमोत्तम रसों का पान करें, यह भक्ष्य तथा पानक्रिया योग्य पदार्थ परिपक्व हो गये हैं, अतएव आप इनको ग्रहण करें, यह स्तोता आपसे प्रार्थना करता है॥२८॥हे मनुष्यो! ईश्वरप्रदत्त कौन वस्तु तुम्हारे हितकर और गुणमय नहीं है। इस हेतु उसी को हितकर और आनन्दप्रद जानो और उसी की कीर्ति के गान से वाणी को पवित्र करो॥२८॥

स्तुत॑श्च॒ यास्त्वा॒ वर्ध॑न्ति म॒हे राध॑से नृ॒म्णाय॑। इन्द्र॑ का॒रिणं॑ वृ॒धन्तः॑॥

हे कर्मयोगिन्! स्तोता लोग कर्मशील पुरुषों को उत्साहित करते हुए आपसे धन तथा बल के लिये प्रार्थना करते हैं कि कृपा करके आप हमें पदार्थविद्या के आविष्कारों द्वारा उन्नत करें, जिससे हमारा यश संसार में विस्तृत हो और विशेषतया उन्नति को प्राप्त हो॥२९॥हे परम इष्टदेव! जो तेरी कीर्ति गाते हैं, उनका संसार में महोदय देखा जाता है। उनका अधःपतन नहीं होता। उनकी वाणी भी समुन्नता, शुद्धा, पवित्रतमा, सत्या, बहुभाषायुक्ता और नाना शब्दमयी होती है॥२९॥

गिर॑श्च॒ यास्ते॑ गिर्वाह उ॒क्था च॒ तुभ्यं॒ तानि॑। स॒त्रा द॑धि॒रे शवां॑सि॥

हे ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगिन्! आप सम्बन्धी स्तोत्रों तथा ऋचाओं द्वारा आपको उद्बोधन करते हुए आपकी प्रशंसा करते हैं कि कृपा करके आप हम लोगों को वेदविद्या का उपदेश करें, जिससे हम ऐश्वर्य्यशाली होकर संसार में यशस्वी हों॥३०॥जब मनुष्य ईश्वरीय तत्त्व जानता और तदीय गुणों से अपनी वाणी को पवित्र करता, तब ही उसमें बल आता, उससे सुरक्षित उपासक सर्वत्र सुप्रतिष्ठित होता है॥३०॥

ए॒वेदे॒ष तु॑विकू॒र्मिर्वाजाँ॒ एको॒ वज्र॑हस्तः। स॒नादमृ॑क्तो दयते॥

इस मन्त्र का तात्पर्य्य यह है कि जिज्ञासु पुरुष कर्मयोगी की स्तुति करते हुए उसको चिरकालपर्य्यन्त अन्नादि खाद्य पदार्थों को सुरक्षित रखनेवाला कथन करते हैं, जिसका भाव यह है कि राजा तथा प्रजा को अन्न का कोष सदा चिरकाल तक सुरक्षित रखना चाहिये, जिससे प्रजा अन्न के कष्ट से दारुण दुःख को प्राप्त न हो। शास्त्र में “अन्नं वै प्राणः”=अन्न को प्राण कथन किया है, क्योंकि अन्न के विना प्राणी जीवित नहीं रह सकता, इसलिये पुरुषों को उचित है कि अन्न का कोश सदा सुरक्षित रखें॥३१॥हे मनुष्यो! जिस हेतु वही विश्वकर्मा कर्मफलदाता और अविनश्वरदेव है। उसी की कृपा से विज्ञान और धन प्राप्त होते हैं। अतः आप भी कर्म करें। आलस्य त्यागें और उसी की शरण में जायँ॥३१॥

हन्ता॑ वृ॒त्रं दक्षि॑णे॒नेन्द्रः॑ पु॒रू पु॑रुहू॒तः। म॒हान्म॒हीभिः॒ शची॑भिः॥

वह महान् ऐश्वर्य्यसम्पन्न कर्मयोगी, जो सन्मार्ग से च्युत पुरुषों को दण्ड देनेवाला और श्रेष्ठों की रक्षा करनेवाला है, वह सब स्थानों में पूजा जाता अर्थात् मान को प्राप्त होता है और सब प्रजाजन उसी की आज्ञा में रहकर मनुष्यजन्म के फलचतुष्टय को प्राप्त होते हैं॥३२॥जिस हेतु वह सर्वविघ्नविनाशक, सर्व विद्वानों से सुपूजित और स्वशक्तियों और स्वकर्मों से महान् देव है। अतः हे मनुष्यो! उसी की शरण जाओ और तुम भी संसार के विघ्न निवारण करने में यथाशक्ति प्रयत्न करो और अपने सदाचारों से महान् बनो॥३२॥

यस्मि॒न्विश्वा॑श्चर्ष॒णय॑ उ॒त च्यौ॒त्ना ज्रयां॑सि च। अनु॒ घेन्म॒न्दी म॒घोनः॑॥

सबका शासक कर्मयोगी, जो अपने अतुल बल से सब प्रजाओं को वशीभूत रखता है, वह धनवानों को सुरक्षित रखता हुआ उनको आनन्द प्रदान करनेवाला होता है॥३३॥जिसके अधीन यह अनन्त और अद्भुत जगत् है, हे मनुष्यो! उसको त्याग अन्य जड़ देवों को क्योंकर गाते हो, क्योंकि अन्य देव मनोरथ पूर्ण नहीं कर सकते। परन्तु परमात्मा की कृपा सर्वदा तुम्हारी रक्षक है, यह विचार कर उसी को गाओ, यह आशय है॥३३॥

ए॒ष ए॒तानि॑ चका॒रेन्द्रो॒ विश्वा॒ योऽति॑ शृ॒ण्वे। वा॒ज॒दावा॑ म॒घोना॑म्॥

संसार की मर्यादा को बाँधना कर्मयोगी का मुख्य कर्तव्य है, यदि वह धनवानों की रक्षा न करे तो संसार में विप्लव होने से धनवान् सुरक्षित नहीं रह सकते, इसलिये यह कथन किया है कि वह धनवानों को सुरक्षित रखने के कारण मानो उनका अन्नदाता है और ऐश्वर्य्यसम्पन्न धनवानों की रक्षा करना प्राचीन काल से सुना जाता है॥३४॥हे मनुष्यो! उसी की महिमा गाओ, जो सबको बनाता, पालता और अन्त में संहार करता, उसी को दाता समझकर ध्यान करो॥३४॥

प्रभ॑र्ता॒ रथं॑ ग॒व्यन्त॑मपा॒काच्चि॒द्यमव॑ति। इ॒नो वसु॒ स हि वोळ्हा॑॥

जो कर्मयोगी मार्गों को विस्तृत, साफ सुथरे तथा प्रकाशमय बनाता है, जिसमें रथ तथा मनुष्यादि सब आरामपूर्वक सुगमता से आ जा सकें, वही प्रभु होता और वही श्रीमान्=सब रत्नादि पदार्थों का स्वामी होता है॥३५॥सब बाधाओं से जिस भक्त को ईश्वर बचाता है, वही जनों और धनों का अधिपति होता है॥३५॥

सनि॑ता॒ विप्रो॒ अर्व॑द्भि॒र्हन्ता॑ वृ॒त्रं नृभिः॒ शूरः॑। स॒त्यो॑ऽवि॒ता वि॒धन्त॑म्॥

वह विद्वान् कर्मयोगी, जो सबका प्रभु है, वह यानादि गतिशील पदार्थों द्वारा सबको इष्ट पदार्थों का विभाजक होता है और जो वैदिकधर्म में प्रवृत्त अनुष्ठाता पुरुष उन्नति कर रहे हैं, उनका विरोध करनेवाले दुष्टों को दण्ड देनेवाला और जो अपने वर्णाश्रमोचित कर्मों में लगे हुए हैं, उनकी सर्व प्रकार से रक्षा करता है॥३६॥हे मनुष्यो! जैसे परमात्मा परमदाता सत्य और रक्षक है, वैसे ही तुम भी यथाशक्ति दो, सत्याचारी होओ। अबल, असमर्थ और असहायकों की रक्षा करो॥३६॥

यज॑ध्वैनं प्रियमेधा॒ इन्द्रं॑ स॒त्राचा॒ मन॑सा। यो भूत्सोमैः॑ स॒त्यम॑द्वा॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि जिज्ञासुजन, जो अनेक प्रकार की विद्यावृद्धिवाले यज्ञों में लगे हुए उन्नति कर रहे हैं, वे मन से उस सच्चे आनन्दवाले कर्मयोगी की अर्चना करें, ताकि वह उनके यज्ञों में आये हुए विघ्नों को निवृत्त करके पूर्ण करानेवाला हो॥३७॥मन को वशीभूत करके ईश्वरतत्त्व जिज्ञासितव्य है। वह महान् देव सर्व पदार्थों के साथ स्थित होकर सबको आनन्द दे रहा है, यह जानना चाहिये॥३७॥

गा॒थश्र॑वसं॒ सत्प॑तिं॒ श्रव॑स्कामं पुरु॒त्मान॑म्। कण्वा॑सो गा॒त वा॒जिन॑म्॥

विद्वान् याज्ञिक पुरुषों को उचित है कि वह विस्तृत कीर्तिवाले, सञ्जनों के पालक, यशस्वी और सब विद्याओं के ज्ञाता कर्मयोगी की स्तुति करें, ताकि वह प्रसन्न होकर सब विद्वानों की कामनाओं को पूर्ण करे॥३८॥हे विद्वानो! परमात्मा की विभूति अनन्ता मनोहारिणी महामहाश्चर्य्या और सुखविधायिनी है, उसको गाओ। वह महादेव सन्तों का पति है। सब यशस्वी हों, यह वह चाहता है और सर्वत्र स्थित होकर वह सबको आनन्द पहुँचा रहा है। उसकी उपासना करो॥३८॥

य ऋ॒ते चि॒द्गास्प॒देभ्यो॒ दात्सखा॒ नृभ्यः॒ शची॑वान्। ये अ॑स्मि॒न्काम॒मश्रि॑यन्॥

प्रशस्तक्रियावान् कर्मयोगी, जो सबका हितकारक, विद्यादि शुभ गुणों का प्रचारक और जिसमें सब प्रकार की शक्तियें विद्यमान हैं, वह अशक्त को भी शक्तिसम्पन्न करता और कामना करनेवाले विद्वानों के लिये पूर्णकाम होता है, जिससे वह अपने मनोरथ को सुखपूर्वक सफल कर सकते हैं॥३९॥हे मेधाविजनो! तुम ईश्वर में श्रद्धा, विश्वास, प्रीति और आशा स्थापित करो। वह सबका सखा सर्वप्रद और सर्वशक्तिमान् है, वह सर्वयोग्य वस्तु तुमको देगा॥३९॥

इ॒त्था धीव॑न्तमद्रिवः का॒ण्वं मेध्या॑तिथिम्। मे॒षो भू॒तो॒३॒॑ऽभि यन्नयः॑॥

इस मन्त्र में कर्मयोगी का यह कर्तव्य कथन किया गया है कि वह विद्वानों की सन्तानों को सुशिक्षित बनाकर राष्ट्र में उपदेश करावे और उनकी रक्षा करे, जिससे उसका राष्ट्र सद्गुणसम्पन्न और धर्मपथगामी हो॥४०॥जो ईश्वर नाना उपायों से उपासक की रक्षा करता है, जो सर्वज्ञ न्यायकारी शुद्ध है, उसी की उपासना करो॥४०॥

शिक्षा॑ विभिन्दो अस्मै च॒त्वार्य॒युता॒ दद॑त्। अ॒ष्टा प॒रः स॒हस्रा॑॥

सूक्त में क्षात्रधर्म का प्रकरण होने से इस मन्त्र में ४८००० अड़तालीस हजार योद्धाओं का वर्णन है अर्थात् कर्मयोगी के प्रति जिज्ञासुजनों की यह प्रार्थना है कि आप शत्रुओं के दमनार्थ हमको उक्त योद्धा प्रदान करें, जिससे शान्तिमय जीवन व्यतीत हो॥४१॥यद्यपि परमात्मा प्रतिक्षण दान दे रहा है, तथापि पुनः-पुनः उसके समीप पहुँच कर अभीष्ट वस्तुओं की प्राप्त्यर्थ निवेदन करें और जो नयनादि दान दिए हुए हैं, उनसे काम लेवें॥४१॥

उ॒त सु त्ये प॑यो॒वृधा॑ मा॒की रण॑स्य न॒प्त्या॑। ज॒नि॒त्व॒नाय॑ मामहे॥

इस मन्त्र में कर्मयोगी के प्रति जिज्ञासु की प्रार्थना है कि आप कृपा करके हमको जल से बढ़ी हुई दो शक्ति प्रदान करें, जिनसे हम शत्रुओं का प्रहार कर सकें अर्थात् जल द्वारा उत्पन्न किया हुआ “वरुणास्त्र” जिसकी दो शक्ति विख्यात हैं, एक−शत्रुपक्ष के आक्रमण को रोकनेवाली “निरोधशक्ति” और दूसरी−आक्षेप करनेवाली “प्रहार शक्ति” ये दो शक्ति जिसके पास हों, वह शत्रु से कभी भयभीत नहीं होता और न शत्रु उसको वशीभूत कर सकता है, इसलिये यहाँ उक्त दो शक्तियों की प्रार्थना की गई है॥४२॥यह दूसरा सूक्त और चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥हे मनुष्यो! परमेश्वर के विशेष ज्ञान के लिये उनकी विभूतियाँ अवश्य अध्येतव्य हैं, जो इन पृथिव्यादि लोकों के वास्तविक तत्त्वों को नहीं जानते हैं वे इनके रचयिता को कैसे जान सकते हैं, क्योंकि वह इन्हीं के द्वारा प्रकाशित होता है॥४२॥

पिबा॑ सु॒तस्य॑ र॒सिनो॒ मत्स्वा॑ न इन्द्र॒ गोम॑तः। आ॒पिर्नो॑ बोधि सध॒माद्यो॑ वृ॒धे॒३॒॑ऽस्माँ अ॑वन्तु ते॒ धियः॑॥

इस मन्त्र में याज्ञिक पुरुषों की ओर से कर्मयोगी के प्रति यह प्रार्थना कथन की गई है कि हे परमैश्वर्य्यसम्पन्न कर्मयोगिन्! आप हमारे सुसंस्कृत सिद्ध किये हुए इन दूध, दधि तथा घृतादि गोरसों को पानकर तृप्त हों और हम सम्बन्धी जनों की वृद्धि के लिये आप सदैव प्रयत्न करते रहें अर्थात् विद्या तथा ऐश्वर्य्यवृद्धि सम्बन्धी उपायों का आप सदा हमारे प्रति उपदेश करें, जिससे हम विद्वान् तथा ऐश्वर्य्यशाली हों, या यों कहो कि आपकी विशालबुद्धि सदैव हमारे हितचिन्तन में प्रवृत्त रहे, यह हमारी प्रार्थना है॥१॥हे मनुष्यो! ईश्वर तुम्हारा सखा, तुमको मित्रवत् नाना उपायों से बचाता और प्राकृत दृष्टान्त से समझाता है, अतः उसकी आज्ञा पालो, तब ही वह अनुग्रह करेगा॥१॥

भू॒याम॑ ते सुम॒तौ वा॒जिनो॑ व॒यं मा नः॑ स्तर॒भिमा॑तये। अ॒स्माञ्चि॒त्राभि॑रवताद॒भिष्टि॑भि॒रा नः॑ सु॒म्नेषु॑ यामय॥

हे कर्मयोगी भगवन्! आप ऐसी कृपा करें कि हम लोग ऐश्वर्य्यसम्पन्न होकर आपके सदृश उत्तम कर्मों में प्रवृत्त हों, हम अभिमानी शत्रुओं के पादाक्रान्त न हों, हे प्रभो! आप हमारी कामनाओं को पूर्ण करें, जिससे हम सुखसम्पन्न होकर सदैव परमात्मा की आज्ञापालन में प्रवृत्त रहें॥२॥हे भगवन्! हम अज्ञ हैं, तेरी विभूति नहीं जानते, अतः हे जगदीश! हम में वैसी शक्ति स्थापित कर, जिससे युक्त होकर हम तेरे आज्ञापालन में समर्थ होवें। हमको कुमार्ग से लौटा कर सुपथ की ओर ले चल॥२॥

इ॒मा उ॑ त्वा पुरूवसो॒ गिरो॑ वर्धन्तु॒ या मम॑। पा॒व॒कव॑र्णाः॒ शुच॑यो विप॒श्चितो॒ऽभि स्तोमै॑रनूषत॥

हे ऐश्वर्य्यसम्पन्न कर्मयोगिन्! हम लोग शुभ वाणियों द्वारा आपको आशीर्वाद देते हैं कि परमेश्वर आपको अधिकाधिक ऐश्वर्य्यसम्पन्न करें। अग्निसमान तेजस्वी सब विद्वान् यज्ञों में आपके यश का गायन करते हैं कि परमात्मा आपको अधिक बढ़ावें और आप हम लोगों की वृद्धि करें॥३॥हे भगवन्! मैं कुछ अन्य याचना नहीं करता। मैं सर्वदा अबाध होकर स्त्री, अपत्यों और बान्धवों के साथ तेरी ही महती कीर्ति को गाऊँ। ये सब मेधावी जन तेरी ही प्रशंसा करते हैं, तथापि तेरे गुणों की समाप्ति नहीं, क्योंकि तू अनन्त है। तेरे गुणों का पार कौन देख सकता है। हे भगवन्! मुझे स्तुतिवर्धिनी शक्ति दे॥३॥

अ॒यं स॒हस्र॒मृषि॑भिः॒ सह॑स्कृतः समु॒द्र इ॑व पप्रथे। स॒त्यः सो अ॑स्य महि॒मा गृ॑णे॒ शवो॑ य॒ज्ञेषु॑ विप्र॒राज्ये॑॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि वह कर्मयोगी, जो अनेक ऋषियों द्वारा धनुर्विद्या प्राप्त करके अपने बलप्रभाव से सर्वत्र विख्यात होता है, वह सारे देश में पूजा जाता है और अपने स्थिर बल तथा पराक्रम द्वारा विद्वानों में सत्कारार्ह होता और यज्ञों में सब याज्ञिक लोग उसकी स्तुति करते हैं॥४॥यह सम्पूर्ण जगत् मिलकर भी परमात्मा की महिमा को समाप्त नहीं कर सकता। आकाश का अन्त संभव है, परन्तु उस अनन्तदेव का कहीं अन्त नहीं। तथापि वह हमारी सखा के समान रक्षा करता है। ईदृश ईश को भजो॥४॥

इन्द्र॒मिद्दे॒वता॑तय॒ इन्द्रं॑ प्रय॒त्य॑ध्व॒रे। इन्द्रं॑ समी॒के व॒निनो॑ हवामह॒ इन्द्रं॒ धन॑स्य सा॒तये॑॥

विद्वान् पुरुष तथा ऐश्वर्य्यसम्पन्न श्रीमान् प्रजाजन विद्वानों से सुशोभित धर्मसमाज में, यज्ञ के प्रारम्भ होने पर, संग्राम उपस्थित होने पर और धन उपार्जनवाले कामों के प्रारम्भ करने में कर्मयोगी को आह्वान करते=बुलाते हैं अर्थात् ऐसे शुभ कामों को कर्मयोगी की सम्मति से प्रारम्भ करते हैं, ताकि उनमें सफलता प्राप्त हो॥५॥हे मनुष्यो! परमात्मा को वारंवार स्मरण कर लौकिक और वैदिक सर्व कर्म करो। सर्वत्र उसी को पूजो। वही सबका अधिपति है। जो श्वास-प्रश्वास लेता, चलता, अथवा स्थिर है, उन सबका कर्ता वही है। निश्चय सूर्य्यादिकों का भी जनक वही है। तब कौन अन्य उपास्य है। मुग्धजन अन्य देवों की उपासना करते हैं॥५॥

इन्द्रो॑ म॒ह्ना रोद॑सी पप्रथ॒च्छव॒ इन्द्रः॒ सूर्य॑मरोचयत्। इन्द्रे॑ ह॒ विश्वा॒ भुव॑नानि येमिर॒ इन्द्रे॑ सुवा॒नास॒ इन्द॑वः॥

इस मन्त्र में कर्मयोगी की महिमा वर्णन की गई है कि वह अपनी शक्ति द्वारा पृथिवी तथा द्युलोक की दिव्य दीप्तियों से लाभ उठाता है और वही सूर्य्यप्रभा को सफल करता अर्थात् मूर्खों में विद्वत्व का उत्पादन करके सूर्य्योदय होने पर स्व−स्व कार्य्य में प्रवृत्त करता है अथवा अपनी विद्याद्वारा सूर्य्यप्रभा से अनेक कार्य्य सम्पादन करके लाभ उठाता है, कर्मयोगी ही सबको नियम में रखता और उत्तमोत्तम पदार्थों का भोक्ता कर्मयोगी ही होता है। तात्पर्य्य यह है कि जिस देश का नेता विद्वान् होता है, उसी देश के मानव सूर्य्यलोक, द्युलोक तथा पृथ्वीलोक की दिव्य दीप्तियों से लाभ उठा सकते हैं, इसी अभिप्राय से यहाँ सूर्य्यादिकों का प्रकाशक कर्मयोगी को माना है। सायणाचार्य्य इस मन्त्र का यह अर्थ करते हैं कि स्वर्भानु=राहु से ग्रसे हुए सूर्य्य को इन्द्र ही प्रकाश देता है। अब इस अर्थ में “इन्द्र” का विवेचन करना आवश्यक है कि इन्द्र का क्या अर्थ है ? यदि इन्द्र के अर्थ सूर्य्य माने जाएँ तो आत्माश्रय दोष लगता है अर्थात् अपना प्रकाशक आप हुआ, यदि “इन्द्र” शब्द के अर्थ विद्युत् लेवें तो फिर राहु का ग्रसना और उसको मारकर इन्द्र का प्रकाश करना क्या ? यदि इसके अर्थ देवविशेष लिये जाएँ तो ऐसी कोई कथा वेद, ब्राह्मण, उपनिषद् तथा पुराणों तक में भी नहीं पाई जाती, जिसमें इन्द्र देवता ने राहु मारकर सूर्य्य को छुड़ाया हो। अधिक क्या, इस प्रकार की मनगढन्त कथाओं का उपन्यास करके सायणाचार्य्य ने राहु का मारना लिखा है, जो सर्वथा असंगत है। सायण का ही अनुकरण करके विलसन, ग्रिफिथ आदि विदेशी भाष्यकार भी ऐसे ही अर्थ करते हैं, जो असंगत हैं। सत्यार्थ यही है कि “इन्दति योगादिना परमैश्वर्य्यं प्राप्नोतीतीन्द्रः”=जो योगादि साधनों से परमैश्वर्य्य को प्राप्त हो उसका नाम “इन्द्र” है। इस प्रकार यह नाम यहाँ कर्मयोगी का है, किसी देवविशेष का नहीं। आजकल लोग नवग्रहों के नव मन्त्र मानते हैं, परन्तु उनका अर्थ ग्रहों का नहीं निकलता और न उनका अर्थ सायण वा महीधर ने ही ग्रहों का किया है। उक्त दोनों आचार्य्य उन मन्त्रों का अर्थ इस प्रकार करते हैं किः− (१)−आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥ऋग्० १। ३५। २ अर्थ−सविता देवता कृष्णवर्ण अन्तरिक्षमार्ग से वार-वार आवर्तन करता हुआ देवता तथा मनुष्यों को अपने-अपने कर्मों में लगाता और सब भुवनों को देखता हुआ सुवर्णमय रथ से हमारे समीप आता है, “सायण”॥(२)−“इमं देवा आसपत्न सुवध्वम्” यजु० ९। ४०=हे सवितादिक देवताओ! आप इस यजमान को शत्रुरहित, महान्, क्षात्रबल, महान् ज्येष्ठत्व, महान् जनराज्य और आत्मबल के लिये समर्थ करें। यह यजमान अमुक पिता का पुत्र अमुक माता का पुत्र और इन प्रजाओं का स्वामी है। हे कुरुपाञ्चाल निवासी प्रजाओ! यह खदिरवर्मा तुम्हारा राजा हो और हम ब्राह्मणों का सोम चन्द्रमा वा सोमलता राजा हो, “महीधर”॥(३)−“अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः” यजु० ३। १२=यह अग्नि द्युलोक का मूर्धारूप तथा ककुत्=शिखररूप और पृथ्वी का पालक है तथा जलों के सारभूत अन्न को बढ़ाता है॥(४)−“उद्बुध्यस्वाग्ने प्रतीजागृहि त्व०” यजु० १५। ५४=हे अग्ने! आप सावधान हों और यजमान को सावधान करके इष्टपूरक कर्मों में लगाएँ और स्वयं लगें, हे विश्वेदेव! आप और यजमान सबसे ऊँचे सूर्य्यलोक में चिरकाल तक रहें॥(५)−“बृहस्पते अतियदर्यः” ऋग्० २। २३। १५=हे सत्य से उत्पन्न बृहस्पते! जिस ब्रह्मवर्चस् की श्रेष्ठ ब्राह्मण अर्चा करता है, जो मनुष्यों में शोभित हो रहा है, जो अपने बलों से दीप्त कर देता है उस चित्री ब्रह्मवर्चसरूप धन को मुझे दीजिये॥(६)−“अन्नात्परिस्रुतो रसम०” यजु० १९। ७५=प्रजापति परिस्रुत अन्न से रसों को पी गया और सब ब्रह्माण्ड को वशीभूत कर लिया इत्यादि॥(७)−“शं नो देवीः” ऋग्० १०। ९। ४=दिव्यजल हमारे अभिष्टि=यज्ञ, पान तथा कल्याण के लिये हों और आये हुए रोगों का शमन तथा न आये हुओं को दूर करें॥(८)−“कया नश्चित्र आ भुवत्” ऋग्० ४। ३१। १=मेरा मित्र इन्द्र किस तृप्ति से अथवा किस प्रज्ञायुक्त कर्म से मेरे अभिमुख हो॥(९)−“केतुं कृण्वन्नकेतवे” ऋग्० १। ६। ३=हे मनुष्यो! इस आश्चर्य्य को देखो कि यह सूर्य प्रातःकाल में अज्ञानियों को ज्ञान उत्पन्न करता हुआ और रूपरहित को रूपवान् करता हुआ अपनी दाह किरणों से युक्त प्रतिदिन उत्पन्न होता है॥इत्यादि लेखों से प्रतीत होता है कि सायणादि भाष्यकारों की दृष्टि में भी जो नवग्रहों का अस्तित्व वेदमन्त्रों से सिद्ध किया जाता है, वह ठीक नहीं। अस्तु, सायण तो भला महीधर से कुछ प्राचीन हैं, महीधराचार्य्य ने भी “शन्नो देवीरभिष्टय” आदि मन्त्रों से शनैश्चर आदि ग्रह सिद्ध नहीं किये, किन्तु “शं” को कल्याणार्थक मानकर जल से शुद्धि सिद्ध की है। अधिक क्या, कोई भी संस्कृतवेत्ता उक्त मन्त्रों से शनैश्चर आदि ग्रहों की सिद्धि नहीं कर सकता, पर स्मरण रहे कि अन्धविश्वास और ज्ञान का इतना विरोध है कि जिन लोगों के अन्तःकरण में उक्त तर्कहीन विश्वास ने प्रवेश किया, उन्होंने पद-पदार्थ से काम न लेकर यह मान लिया कि “शन्नो देवीरभिष्टय” शनैश्चर ग्रह को ही सिद्ध करता है। हमारे विचार में वेदों की तो कथा ही क्या, किन्तु गणितज्योतिष में भी इन ग्रहरूपी देवताओं का नाम तक नहीं। इससे प्रतीत होता है कि फलितज्योतिष के समय में, जो बहुत आधुनिक है, उसमें आकर इन ग्रहरूपी देवताओं की कल्पना लोगों को सूझी, जिस कल्पना से आज शनैश्चरादि ग्रहों से ग्रस्त भारतभर कल्प रहा है॥६॥जिसने सब बनाया है और जो सबको पालता है, जिसमें सब महाभूत और प्राणी सविकाश स्थित हैं, वह कैसा होगा, इसको पुनः-२ विचारो॥६॥

अ॒भि त्वा॑ पू॒र्वपी॑तय॒ इन्द्र॒ स्तोमे॑भिरा॒यवः॑। स॒मी॒ची॒नास॑ ऋ॒भवः॒ सम॑स्वरन्रु॒द्रा गृ॑णन्त॒ पूर्व्य॑म्॥

याज्ञिक लोगों का कथन है कि हे कर्मयोगिन्! सत्यभाषी विद्वान् पुरुष स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते हुए सोमरस का अग्रपान करने के लिये आपका आह्वान करते हैं और शत्रुओं को भयप्रद योद्धा लोग आपकी स्तुति करते हुए सत्कारार्ह उत्तमोत्तम पदार्थ भेंटकर आपको प्रसन्न करना चाहते हैं॥७॥स्वभावतः सर्वजन स्वकीय रक्षा प्रथम ही चाहते हैं और निज-२ सहायता के लिये सब उसी को बुलाते हैं, परन्तु जो सबको त्याग उसकी कल्याणी मति में रहते हैं, उसी को उसके नियम पालते हैं॥७॥

अ॒स्येदिन्द्रो॑ वावृधे॒ वृष्ण्यं॒ शवो॒ मदे॑ सु॒तस्य॒ विष्ण॑वि। अ॒द्या तम॑स्य महि॒मान॑मा॒यवोऽनु॑ ष्टुवन्ति पू॒र्वथा॑॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि स्तोता तथा अधिकारी जिज्ञासुजनों के बल को उत्तमोत्तम पदार्थों द्वारा कर्मयोगी बढ़ाता है, क्योंकि बलसम्पन्न पुरुष ही अपने अभीष्ट को पूर्ण कर सकता है और मनुष्य पूर्व की न्याईं अर्थात् पूर्व कल्प के समान इस कर्मयोगी के धर्माचरण का अनुष्ठान करके अब भी ऐश्वर्य्यशाली हो सकते हैं, इसलिये कर्मयोगी का स्तवन करते हुए पुरुष अनुष्ठानार्ह हों॥८॥सब पदार्थ आनन्दमय होवें, इस हेतु इनमें रसों और बलों को सदा इन्द्र बढ़ाता रहता है। विद्वान् ईश्वर की ऐसी महिमा जानकर सर्वदा से गाते चले आते हैं॥८॥

तत्त्वा॑ यामि सु॒वीर्यं॒ तद्ब्रह्म॑ पू॒र्वचि॑त्तये। येना॒ यति॑भ्यो॒ भृग॑वे॒ धने॑ हि॒ते येन॒ प्रस्क॑ण्व॒मावि॑थ॥

जिज्ञासु प्रार्थना करता है कि कर्मयोगिन्! आप हमें ऐसी शक्ति प्राप्त कराएँ, जिससे हम परमात्मसम्बन्धी ज्ञानवाले तथा ऐश्वर्य्यशाली हों, हे प्रभो! आप अधिकारियों की याचना पूर्ण करनेवाले हैं अर्थात् कर्मयोगियों से लेकर प्रकृष्ट ज्ञानवाले ज्ञानयोगी को देते हैं। हे पराक्रमसम्पन्न! आप अपनी कृपा से हमें भी पराक्रमी बनावें, जिससे हम अपने कार्य्यों को विधिवत् करते हुए ज्ञानद्वारा परमात्मा की समीपता प्राप्त करें॥९॥ब्रह्मचर्य्य से आत्मबल प्राप्त होता है। जो जन आत्मशक्ति को नहीं जानते हैं, वे ही महानीच पशु हैं। इस कारण हे मनुष्यो! मन में ईश्वर को रखकर आत्मशक्ति को बढ़ाओ, तब ही तुम भी रक्षक और हितकर होओगे॥९॥

येना॑ समु॒द्रमसृ॑जो म॒हीर॒पस्तदि॑न्द्र॒ वृष्णि॑ ते॒ शवः॑। स॒द्यः सो अ॑स्य महि॒मा न सं॒नशे॒ यं क्षो॒णीर॑नुचक्र॒दे॥

इस मन्त्र में कर्मयोगी की महिमा वर्णन की गई है कि वह कृत्रिम नदियों द्वारा मरु देशों में भी जलों को पहुँचाकर पृथिवी को उपजाऊ बनाकर प्रजा को सुख पहुँचाता और धर्मपथयुक्त तथा अभ्युदयकारक होने के कारण कर्मयोगी के ही आचरणों का पृथिवी भर के सब मनुष्य अनुकरण करते हैं॥१०॥आद्य सृष्टि में ये समुद्रस्थ जल कहाँ से आये। जब पृथिवी भी अग्नि से जाज्वल्यमान थी, तब जल का आगमन कहाँ से हुआ इसको पुनः-पुनः विचारो। अहो! इसी की सर्व महिमा है, हे मनुष्यो! उस एक ही की उपासना करो॥१०॥

श॒ग्धी न॑ इन्द्र॒ यत्त्वा॑ र॒यिं यामि॑ सु॒वीर्य॑म्। श॒ग्धि वाजा॑य प्रथ॒मं सिषा॑सते श॒ग्धि स्तोमा॑य पूर्व्य॥

इन्द्र=हे सब धनों के स्वामी कर्मयोगिन्! हम लोग आपकी आज्ञापालन करते हुए आपसे याचना करते हैं कि आप हमें सब प्रकार का धन-धान्य देकर संतुष्ट करें, क्योंकि जो आपका अनुकूलगामी है, उसको सबसे प्रथम अन्नादि धन दीजिये अर्थात् कर्मयोगी का यह कर्तव्य है कि वह वैदिकमार्ग में चलने तथा चलानेवाली प्रजाओं को धनादि सकल आवश्यक पदार्थ देकर सर्वदा प्रसन्न रखे, जिससे उसके किसी राष्ट्रिय अङ्ग में न्यूनता न आवे॥११॥ईश्वर के निकट तीन पदार्थ याचनीय हैं। इस लोक के लिये महाबलिष्ठ पुत्रादिक धन, परलोक के लिये सुविज्ञान और दोनों के लिये स्तुतिशक्ति, सत्काव्यशक्ति। प्रातः-सायं मन से उसके निकट पहुँचकर उसकी प्रार्थना करें और सम्पूर्ण दिन उसके साधन इकट्ठे करें, तब ही मनोरथ की सिद्धि हो सकती है॥११॥

श॒ग्धी नो॑ अ॒स्य यद्ध॑ पौ॒रमावि॑थ॒ धिय॑ इन्द्र॒ सिषा॑सतः। श॒ग्धि यथा॒ रुश॑मं॒ श्याव॑कं॒ कृप॒मिन्द्र॒ प्रावः॒ स्व॑र्णरम्॥

इस मन्त्र में याज्ञिक लोगों की ओर से प्रार्थना है कि हे कर्मयोगिन्! आप हमारे सम्बन्धी यजमान को, जो याज्ञिककर्मों में प्रवृत्त है, धन से सम्पन्न कीजिये, हे भगवन्! जैसे कर्मों में प्रवृत्त दरिद्र पुरुष को धन देकर सुखी करते हो, वैसे ही आप हम लोगों सहित यजमान को भी समर्थ करें, जिससे वह उत्साहित होकर यज्ञसम्बन्धी कर्म करे-करावे॥१२॥हे भगवन्! तू स्वभावतः जगत् की रक्षा कर रहा है। तथा परोपकारी जनों को उन्नत बनाता है। अतः मुझे भी सर्व कर्म में साहाय्य दे॥१२॥

कन्नव्यो॑ अत॒सीनां॑ तु॒रो गृ॑णीत॒ मर्त्यः॑। न॒ही न्व॑स्य महि॒मान॑मिन्द्रि॒यं स्व॑र्गृ॒णन्त॑ आन॒शुः॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि बड़े-बड़े विद्वान् पुरुष जो निरन्तर सूक्ष्म पदार्थों के जानने में प्रवृत्त रहते हैं, उन्होंने भी कर्मयोगी की महिमा का पार नहीं पाया, तब नवशिक्षित मनुष्य उसकी महिमा को क्या कह सकता है, क्योंकि कर्मयोगी की अनन्त कलायें हैं, जिनकी इयत्ता को विद्वान् पुरुष अनन्तकाल तक भी नहीं जान सकता॥१३॥ईश की महिमा अनन्त है। पूर्व विद्वान् भी उसके अन्त तक न पहुँचे। अद्यतन भी अन्त तक न पहुँचेंगे। हे महादेव! स्वमति के अनुसार आपकी स्तुति में सब प्रवृत्त होते हैं। तदनुसार मैं भी आपकी स्तुति करता हूँ। हे ईश! मेरे आशय को जानकर प्रसन्न हो॥१३॥

कदु॑ स्तु॒वन्त॑ ऋतयन्त दे॒वत॒ ऋषिः॒ को विप्र॑ ओहते। क॒दा हवं॑ मघवन्निन्द्र सुन्व॒तः कदु॑ स्तुव॒त आ ग॑मः॥

कर्मयोगी से प्रार्थना, उसके यज्ञ, स्तुति और आह्वान करने को सभी पुरुष उत्कण्ठित रहते और यह चाहते हैं कि यह कर्मयोगी कब हमारी प्रार्थना को किस प्रकार स्वीकार करे, जिससे हम लोग भी उसकी कृपा से अभ्युदयसम्पन्न होकर इष्ट पदार्थों का भोग करें, हे कर्मयोगिन्! आप याज्ञिक पुरुषों के हव्य पदार्थों को कब स्वीकार करेंगे अर्थात् यज्ञ का फल, जो ऐश्वर्य्यलाभ करना है, वह आप हमको शीघ्र प्राप्त कराएँ और स्तोता के गृह को पवित्र करें अर्थात् उसके गृह में सदा कुशल रहे, जिससे यज्ञसम्बन्धी कार्यों में विघ्न न हो, यह प्रार्थना है॥१४॥हे भगवन्! महान् जन भी आपके सर्व सत्य नियमों का पालन नहीं कर सकते। ऋषि और मेधावीजन भी आपकी तर्कना करने में असमर्थ हैं। तब हम लोग तो क्या हैं, तथापि आप स्वभाव से ही सुकर्मी और ज्ञानीजनों का उद्धार करते हैं, आपकी कृपा से वे कब सुखी होंगे, यह मैं पूछता हूँ॥१४॥

उदु॒ त्ये मधु॑मत्तमा॒ गिरः॒ स्तोमा॑स ईरते। स॒त्रा॒जितो॑ धन॒सा अक्षि॑तोतयो वाज॒यन्तो॒ रथा॑ इव॥

हे कर्मयोगिन्! जिस प्रकार संग्राम में विजयप्राप्त करनेवाले, धन की इच्छावाले, दृढ़ रक्षावाले, बल की चाहनावाले रथ समान उद्देश्य को लेकर शीघ्रता से निकलते हैं, इसी प्रकार मधुर वाणियों द्वारा स्तोता लोग समान उद्देश्य से आपकी स्तुति गायन कर रहे हैं, हे प्रभो! आप उनको ऐश्वर्य्यसम्पन्न करें॥१५॥हे भगवन्! धन्य वे विद्वान् हैं, जो तेरे व्रतों को पालते हुए तेरी ही कीर्ति को गद्यपद्य द्वारा प्रचलित करते हैं। वे ही समाजों में उठते हैं और वे ही लौकिक और वैदिक फल पाते हैं॥१५॥

कण्वा॑ इव॒ भृग॑वः॒ सूर्या॑ इव॒ विश्व॒मिद्धी॒तमा॑नशुः। इन्द्रं॒ स्तोमे॑भिर्म॒हय॑न्त आ॒यवः॑ प्रि॒यमे॑धासो अस्वरन्॥

कर्मयोगी की सम्पूर्ण राष्ट्रभूमि में विद्वान्, उपदेशक तथा शूरवीर व्याप्त रहते हैं, जिससे उसका राष्ट्र ज्ञान से पूर्ण होकर सुरक्षित बना रहता और अन्न-धन से भरपूर होकर सर्वदा उसकी प्रशंसा करता है॥१६॥ईश्वरग्रन्थप्रणेता तपस्वी और कर्मीजन इस लोक में सुखी रहते हैं और परलोक में उसको पाते हैं। हे मनुष्यो! तुम भी तत्समान बनो॥१६॥

यु॒क्ष्वा हि वृ॑त्रहन्तम॒ हरी॑ इन्द्र परा॒वतः॑। अ॒र्वा॒ची॒नो म॑घव॒न्त्सोम॑पीतय उ॒ग्र ऋ॒ष्वेभि॒रा ग॑हि॥

इस मन्त्र में याज्ञिक लोगों की ओर से यह प्रार्थना है कि हे शत्रुओं का हनन करनेवाले, हे ऐश्वर्य्यशालिन् तथा हे भीमकर्मा कर्मयोगिन्! आप अपने रथ पर सवार होकर विद्वानों के साथ सोमपान के लिये हमारे स्थान को प्राप्त हों, ताकि हम लोग आपका सत्कार करके अपना कर्त्तव्य पालन करें॥१७॥ईश्वर सर्वविघ्ननिवारण करता है, इसमें सन्देह नहीं। जो उसके नियमपालन करते हैं, उसकी आज्ञा का तिरस्कार कभी नहीं करते, भूतों के ऊपर दया दिखलाते हैं, उनका ही वह उद्धार करता है। इस हेतु हे मनुष्यो! उसकी आज्ञा में विचरण करो॥१७॥

इ॒मे हि ते॑ का॒रवो॑ वाव॒शुर्धि॒या विप्रा॑सो मे॒धसा॑तये। स त्वं नो॑ मघवन्निन्द्र गिर्वणो वे॒नो न शृ॑णुधी॒ हव॑म्॥

याज्ञिक पुरुषों की ओर से कथन है कि हे ऐश्वर्य्यशाली कर्मयोगिन्! शिल्पी लोग, जो विविध प्रकार के अस्त्र-शस्त्रादि बनाने तथा अन्य कामों के निर्माण करने में कुशल हैं, वे यज्ञ में भाग लेने के लिये आपकी कामना करते हैं अर्थात् अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण द्वारा युद्धविशारद होना भी यज्ञ है, सो इन साहाय्याभिलाषी पुरुषों को यज्ञ में भाग दें, ताकि युद्धसामग्री के निर्माणपूर्वक यह यज्ञ सर्वाङ्गपूर्ण हो॥१८॥शुभ कर्मों की पूर्ति के लिये ज्ञानी अज्ञानी सब ही जन अन्तःकरण से तेरी ही स्तुति करते हैं। वह तू प्रिय के समान हमारे वचनों को सुन और हमारे मनोरथों को पूर्ण कर॥१८॥

निरि॑न्द्र बृह॒तीभ्यो॑ वृ॒त्रं धनु॑भ्यो अस्फुरः। निरर्बु॑दस्य॒ मृग॑यस्य मा॒यिनो॒ निः पर्व॑तस्य॒ गा आ॑जः॥

याज्ञिक लोगों का कथन है कि हे कर्मयोगिन्! आपने उत्तमोत्तम शस्त्र-अस्त्रादिकों के बल से ही बड़े-बड़े दस्युओं को अपने वशीभूत किया, जो अराजकता फैलाते, श्रेष्ठ पुरुषों का अपमान करते और याज्ञिक लोगों के यज्ञ में विघ्नकारक थे। इन्हीं शस्त्रों के प्रभाव से आपने बड़े-बड़े हिंसक पशुओं का हनन करके प्रजा को सुरक्षित किया और इन्हीं शस्त्रास्त्रों के प्रयोग द्वारा पर्वतीय प्रदेशों को विजय किया, इसलिये प्रत्येक पुरुष को शस्त्रास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करके युद्धविद्या में कुशल होना चाहिये॥१९॥इस महादेव का न्यायमार्ग सर्वत्र फैलाया है। उसको अल्पज्ञ नहीं देखते हैं। इसने कितने प्रकार के उत्पत्तिस्थान रचे हैं। कितने प्रकार के प्राणी हैं, मनुष्यों में भी सब तुल्य नहीं। हे विद्वानो! ईश के न्यायालयों को देखो। हे क्षुद्रमानवो! उससे भय करो॥१९॥

निर॒ग्नयो॑ रुरुचु॒र्निरु॒ सूर्यो॒ निः सोम॑ इन्द्रि॒यो रसः॑। निर॒न्तरि॑क्षादधमो म॒हामहिं॑ कृ॒षे तदि॑न्द्र॒ पौंस्य॑म्॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि जिस पुरुष के अज्ञान की निवृत्ति हो जाती है, वह महापुरुषार्थी कहलाता है और वही पुरुष सूर्य्यादि के प्रकाश, अग्न्याधान तथा सोमादि रसों से उपयोग ले सकता है और उसी को यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड रुचिकर तथा आनन्दप्रद प्रतीत होता है। या यों कहो कि सर्व रसों की राशि, जो आनन्दमय ब्रह्म है, उसकी प्रतीति अज्ञानी को नहीं हो सकती, किन्तु ज्ञानी पुरुष ही उस आनन्द को अनुभव करता है। इसी अभिप्राय से यहाँ ज्ञानी पुरुष के लिये सम्पूर्ण पदार्थों के रोचक होने से आनन्द की प्राप्ति कथन की गई है॥२०॥हे जननायक नृपराजा तथा उपदेशक आदि प्रजाहितचिन्तक जनो! जैसे परमात्मा सर्वार्थ विघ्नों को नष्ट किया करता है, वैसे आप भी दुष्टों के निग्रह के लिये यत्न करें, तब ही मनुष्य उपद्रवरहित होंगे॥२०॥

यं मे॒ दुरिन्द्रो॑ म॒रुतः॒ पाक॑स्थामा॒ कौर॑याणः। विश्वे॑षां॒ त्मना॒ शोभि॑ष्ठ॒मुपे॑व दि॒वि धाव॑मानम्॥

पूर्ण बलवान् तथा तेजस्वी, जिसने अपने बल द्वारा पृथिवी को विजय कर लिया है, ऐसा कर्मयोगी और ब्रह्मचर्य्यपूर्वक वेद-वेदाङ्गों के अध्ययन द्वारा पूर्ण विद्वान्, जिसका आत्मिकबल महान् है, ऐसे विद्वान् पुरुष जिन पदार्थों का संशोधन करते हैं, वे पदार्थ स्वभाव से ही स्वच्छ तथा सात्विक होते हैं और विद्वानों द्वारा संशोधित पदार्थों को ही उपयोग में लाना चाहिये॥२१॥इसका आशय यह है कि सबसे प्रथम परमदेव को धन्यवाद देना चाहिये कि इसने जो दान मनुष्य को दे रक्खा है, उसका वर्णन नहीं हो सकता है। हम जीव अपने चारों ओर आनन्दमय पदार्थ देख रहे हैं। यह शरीर ही कैसा सुन्दर और भोगविलास का आश्चर्यमन्दिर बना कर दिया है, इसलिये उस देव की जितनी स्तुति की जाय, वह सब ही बहुत थोड़ी है। अतः यहाँ इन्द्र शब्द प्रथम आया है। तब हम बाह्य जगत् की ओर देखें। वायु कैसा एक अद्भुत वस्तु है। वह किस वेग से प्रतिक्षण चलता रहता है। पलमात्र भी इसके विना प्राणी अपनी जीवनसत्ता नहीं रख सकते हैं। पुनः आन्तरिक प्राण क्या-२ कार्य्य कर रहे हैं। इसकी सहायता से सर्व इन्द्रिय स्व-स्व व्यापार करने में समर्थ होते हैं। आन्तरिक वायु के विना यह शरीरमन्दिर अतितुच्छ हो जाता है। इसके द्वारा हम सकल साधन करते हैं। अतः द्वितीय स्थान में ये मरुत् धन्यवादार्ह हैं। मरुत् शब्द से बाह्य सम्पूर्ण जगत् पृथिवी, जल, सूर्य आदि का ग्रहण है। तत्पश्चात् इन दोनों के अस्तित्व में यह जीवात्मा कार्य कर रहा है। मन और इन्द्रियसहित जिसका जीवात्मा वशीभूत है, वह कौनसा कार्य नहीं कर सकता है। हे मनुष्यो! एकान्त में इस तत्त्व को विचारो। यह शरीर कितनी देर तक ठहरने वाला है। कोटि-२ मनुष्य आये और विना कुछ यहाँ चिह्न छोड़ के चल बसे। किन्तु इनमें से ही वैदिक कविगण, आचार्य्य, न्यायशील क्षत्रियवर्ग और दानशील उपकारी वैश्यवर्ग आदि बहुत कुछ निज-२ चिह्न इस पृथिवी पर छोड़ गये हैं, जिनकी कीर्ति जनता गाती हुई चली आई है। इसलिये वे सब भी प्रशंसार्ह हैं॥२१॥

रोहि॑तं मे॒ पाक॑स्थामा सु॒धुरं॑ कक्ष्य॒प्राम्। अदा॑द्रा॒यो वि॒बोध॑नम्॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि कर्मयोगी लोग ही शीघ्र गतिशील अश्वादि पदार्थों को लाभ करके विद्वानों के अर्पण करते हैं, ताकि वे सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करें। “अश्व” शब्द यहाँ सब वाहनों का उपलक्षण है अर्थात् जल, स्थल तथा नभोगामी जो गतिशील वाहन, उन सबका अश्व शब्द ग्राहक है॥२२॥हे मनुष्यो! प्रथम आत्मा को अपने वश में करो। जब यह, जीव निरर्गल हो जाता है, तब सब इन्द्रियाँ परम चपल हो जाती हैं। मन भी विक्षिप्त हो जाता है। मन के विक्षिप्त होने पर किसी वस्तु को उपासक नहीं समझ सकता है। अतः जिसका आत्मा इन्द्रियाँ और मन के साथ अन्तर्मुखी नहीं होता है, तब वह उससे क्या-क्या लाभ उठाता है, यह इससे दिखलाते हैं। उस अवस्था में इतस्ततः प्रकीर्ण जो ईश्वरप्रदत्त धन हैं, उनको मेधावी उपासक देखने और ग्रहण करने में समर्थ होता है। मन भी बहुत सी नवीन वस्तुओं का आविर्भाव करता है। नव-२ प्रलीन विज्ञान भासित होने लगते हैं। वह सब ईश्वर की कृपा से होता है, अतः इसके द्वारा कृतज्ञता प्रकाशित की जाती है॥२२॥

यस्मा॑ अ॒न्ये दश॒ प्रति॒ धुरं॒ वह॑न्ति॒ वह्न॑यः। अस्तं॒ वयो॒ न तुग्र्य॑म्॥

इस मन्त्र में इन्द्रिय तथा इन्द्रियवृत्तियों का वर्णन है कि जिस पुरुष के इन्द्रिय संस्कृत हैं, उसकी इन्द्रियवृत्तियें साध्वी तथा संस्कृत होती हैं, इसलिये मनुष्य को चाहिये कि वह मनस्वी बनकर इन्द्रियवृत्तियों को सदैव अपने स्वाधीन रक्खे। इसी भाव को कठ० में इस प्रकार वर्णन किया है कि “सदश्वा इव सारथेः”=जिस प्रकार सारथी के संस्कृत और सुचालित घोड़े वशीभूत होते हैं, इसी प्रकार इन्द्रियसंयमी पुरुष के इन्द्रिय वशीभूत होते हैं॥२३॥इस शरीर में जो दश इन्द्रियें स्थापित की गई हैं, वे मन के साहाय्य के लिये हैं। उनसे कैसे और कौन कार्य लेने चाहियें, इसको विचारो और उनको योगद्वारा वश में करके कार्य्य में लगाओ॥२३॥•

आ॒त्मा पि॒तुस्त॒नूर्वास॑ ओजो॒दा अ॒भ्यञ्ज॑नम्। तु॒रीय॒मिद्रोहि॑तस्य॒ पाक॑स्थामानं भो॒जं दा॒तार॑मब्रवम्॥

जिस कर्मयोगी ने अपने पिता से ब्रह्मविद्या तथा कर्मयोगविद्या का अध्ययन किया है, वह ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ होता है, या यों कहो कि वह मानो पिता के शरीर का ही अङ्ग है, जैसा कि धर्मशास्त्र में भी लिखा है कि “आत्मा वै जायते पुत्रः”=अपना आत्मा ही पुत्ररूप से उत्पन्न होता है, इस वाक्य के अनुसार पुत्र पिता का आत्मारूप प्रतिनिधि है और इसी भाव को मनु० ३। ३ en में इस प्रकार वर्णन किया है कि “तं प्रतीतं स्वधर्मेण ब्रह्मदायहरं पितुः”=जो ब्रह्मविद्या के चमत्कार से प्रसिद्ध और जिसने अपने पिता से ही वेदरूप पैतृक सम्पत्ति को लाभ किया है, उस स्नातक का गोदान से सत्कार करे। इस प्रकार ब्रह्मविद्याविशिष्ट उस स्नातक के महत्त्व का इस मन्त्र में वर्णन है, जिसने अपने पिता के गुरुकुल में ही ब्रह्मविद्या का अध्ययन किया है॥२४॥यह तीसरा सूक्त और उन्तीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥सर्व शास्त्रों की यह शिक्षा है कि प्रथम आत्मतत्त्व को अच्छे प्रकार जानो। आत्मा शरीर से पृथक् एक वस्तु है या नहीं है, इस विवाद को छोड़कर इससे तुमको क्या-क्या लाभ पहुँच सकता है और वशीभूत आत्मा से जगत् में तुम कितने कार्य कर सकते हो, इसको ही प्रथम विचारो। इस में अद्भुत शक्ति है, जिसके द्वारा तुमको सर्व धन की प्राप्ति हो सकती है। वास्तव में यही चिन्तामणि, कल्पद्रुम और अमृत है, इसको जो योग्य काम में लगाते हैं। वे ही ऋषि, मुनि, कवि, आचार्य्य, ग्रन्थकर्त्ता, नूतन-२ विद्याविष्कर्ता होते हैं। निश्चय वे मनुष्यरूप में पशु हैं, जो इन्द्रियसहित आत्मा का माहात्म्य नहीं जानते हैं। जो अपने कुल और परमात्मा की कीर्त्ति को बढ़ाता, सत्य की स्थापना करता, ओजस्वी होता और ज्ञान-विज्ञान का विस्तार करता, वही आत्मा है। सूक्त के अन्त में आत्मगुणों को प्रकाशित करता हुआ वेद सिखलाता है कि हे मनुष्यो! ईश ने तुमको सर्व गुणों का आकर आत्मा दिया है। इसी से तुम्हारे सर्व कार्य सिद्ध होंगे, यह निश्चय जानो। इति॥२४॥

यदि॑न्द्र॒ प्रागपा॒गुद॒ङ्न्य॑ग्वा हू॒यसे॒ नृभिः॑। सिमा॑ पु॒रू नृषू॑तो अ॒स्यान॒वेऽसि॑ प्रशर्ध तु॒र्वशे॑॥

याज्ञिक लोगों की ओर से कथन है कि इन्द्र=हे परमैश्वर्य्यसम्पन्न कर्मयोगिन्! आप चाहे प्राच्यादि किसी दिशा वा स्थान में क्यों न हों, हम लोग स्वकार्यार्थ आपको बुलाते हैं और आप हम लोगों से प्रेरित हुए हमारे कार्य्यार्थ आते हैं, इसलिये कृपा करके शीघ्र आवें और हमारे मनोरथ को पूर्ण करें॥१॥हे मेधाविजनो! इस प्रकार आप जानिये। यद्यपि सब जन सर्वत्र निज-२ मनोरथ की पूर्ति के लिये उस ईश की स्तुति और गान करते हैं और उससे माँगते हैं, तथापि वह सब पर प्रसन्न नहीं होता, क्योंकि वह भावग्राही है। जो उसकी आज्ञा में सदा रहता, पापों से निवृत्त होता, भूतों के ऊपर दया करता, वही अनुग्राह्य होता है॥१॥

यद्वा॒ रुमे॒ रुश॑मे॒ श्याव॑के॒ कृप॒ इन्द्र॑ मा॒दय॑से॒ सचा॑। कण्वा॑सस्त्वा॒ ब्रह्म॑भिः॒ स्तोम॑वाहस॒ इन्द्रा य॑च्छ॒न्त्या ग॑हि॥

हे ऐश्वर्य्यसम्पन्न कर्मयोगिन्! भीरु, तेजस्वी, तमोगुणी तथा सम्पत्तिशाली सब प्रकार के पुरुष आपको बुलाकर सत्कार करते और आप सबको हर्ष उत्पन्न करते हैं, सो हे भगवन्! आपके सत्कारार्ह पदार्थ लिये हुए विद्वान् लोग स्तुतियों द्वारा आपको बुला रहे हैं। आप कृपा करके शीघ्र आइये॥२॥हे मनुष्यो! जो उसकी आज्ञा अच्छे प्रकार जानकर जगत् में परार्थ प्रवृत्त होते हैं, वे ही ईश के दयापात्र हैं। वे कौन हैं, इस अपेक्षा में कतिपय उदाहरण दिखलाते हैं। जो कोई रोगार्तों के उद्धारक हैं, जो जनों के दुःख की निवृत्ति के लिये सदा यत्न करते हैं, सर्वभूतों पर अपने समान कृपा करते हैं, ऐसे मनुष्यों के हृदय में वह ईश निवास करता है। इनके अतिरिक्त संसार के कल्याण के लिये जो उपदेश दिया करते हैं, उपदेशमय ग्रन्थों को रचकर प्रचार करते हैं और ईश्वरीय आज्ञाओं को लोगों में समझाते हैं, इस प्रकार के जो जन हैं, वे भी ईश्वर की दया पाते हैं। तुम भी ऐसे शुभकर्म करके उसके अनुग्राह्य बनो॥२॥

यथा॑ गौ॒रो अ॒पा कृ॒तं तृष्य॒न्नेत्यवेरि॑णम्। आ॒पि॒त्वे नः॑ प्रपि॒त्वे तूय॒मा ग॑हि॒ कण्वे॑षु॒ सु सचा॒ पिब॑॥

हे ऐश्वर्य्यसम्पन्न तथा ऐश्वर्य्य के दाता कर्मयोगिन्! जिस प्रकार पिपासार्त मृग शीघ्रता से जलाशय को प्राप्त होता है, इसी प्रकार उत्कट इच्छा से आप हम लोगों को प्राप्त हों और विद्वानों के मध्य उत्तमोत्तम पदार्थ तथा सोमरस का सेवन करें॥३॥ईश्वर हमारा पिता और माता है, अतः जैसे पुत्र प्रेम से माता पिता को बुलाता, वैसे ही उपासक भी यहाँ उसको बुलाता है। तृषार्त मृग व्याकुल हो जलाशय की ओर दौड़ता है, तथैव हे ईश! हमारे क्लेशों को थोड़े करने के लिये आ। हम तेरे पुत्र रक्षणीय हैं॥३॥

मन्द॑न्तु त्वा मघवन्नि॒न्द्रेन्द॑वो राधो॒देया॑य सुन्व॒ते। आ॒मुष्या॒ सोम॑मपिबश्च॒मू सु॒तं ज्येष्ठं॒ तद्द॑धिषे॒ सहः॑॥

हे कर्मयोगिन्! ये रस आपकी प्रसन्नतार्थ हम लोगों ने सिद्ध करके आपको अर्पण किये हैं। आप इनको पान करके प्रसन्न हों और हम जिज्ञासुजनों को धनादि ऐश्वर्य्य प्रदान करें। हे युद्धविद्या में कुशल शूरवीर! आप शत्रुओं को विजय करनेवाले और उनके पदार्थों को जीतकर अपना भाग ग्रहण करनेवाले हो, इसी कारण आपको सब सामर्थ्यसम्पन्न कहते हैं॥४॥हे मनुष्यो! तुम्हारे सर्व पदार्थ और सब कर्म पवित्र और शुद्ध हों, जो ईश्वर को प्रसन्न कर सकें, क्योंकि वही सब वस्तुओं को पैदा कर रक्षा करता है, अतः सर्व पदार्थ प्रथम उसको समर्पित करो॥४॥

प्र च॑क्रे॒ सह॑सा॒ सहो॑ ब॒भञ्ज॑ म॒न्युमोज॑सा। विश्वे॑ त इन्द्र पृतना॒यवो॑ यहो॒ नि वृ॒क्षा इ॑व येमिरे॥

इस मन्त्र में जिज्ञासुजनों की ओर से कर्मयोगी की स्तुति वर्णन की गई है कि हे युद्धविशारद कर्मयोगिन्! आपके सन्मुख शत्रुबल पाषाणवत् निश्चेष्ट हो जाता है अर्थात् शत्रु का बल अपूर्ण होने से वह आपके सन्मुख नहीं ठहर सकता, आपका बल पूर्ण होने के कारण शत्रु का बल तथा क्रोध सदा भञ्जन होता रहता है॥५॥यदि परम ईश दुष्टों का दमन न करे, उनके गर्व के ऊपर प्रहार न करे, तो वे निःशङ्क होकर दुर्बलों को उखाड़ डालें। उसी के भय से वे दुर्जन हत्याकाण्ड से निवृत्त रहते हैं। हे मनुष्यो! तुम भी सदा दुष्टों, चौरादिकों, पापियों, लम्पटों, उद्दण्ड क्षत्रियों और प्रजापीड़क जनों को दण्ड देने और वश में करने के लिये यत्न करो॥५॥

स॒हस्रे॑णेव सचते यवी॒युधा॒ यस्त॒ आन॒ळुप॑स्तुतिम्। पु॒त्रं प्रा॑व॒र्गं कृ॑णुते सु॒वीर्ये॑ दा॒श्नोति॒ नम॑उक्तिभिः॥

हे युद्धविद्याविशारद कर्मयोगिन्! आपकी स्तुति द्वारा आपसे शिक्षा प्राप्त किया हुआ पुरुष अति तीव्र युद्ध करनेवाला तथा सहस्रों योद्धाओं से युक्त होता है और जो नम्रतापूर्वक आपका सत्कार करता है, वह स्वयं युद्धविशारद होता और कर्मयोगी की अध्यक्षता में रहने के कारण उसकी सन्तान भी संग्राम में कुशल होती है अर्थात् उसको कोई युद्ध में निवारण=हटा नहीं सकता॥६॥हे मनुष्यो! ईश्वर की सहायता वे ही प्राप्त कर सकते हैं, जो उसकी आज्ञा में चलते हैं। उसी की कृपा वास्तव में महाबल है। जो ईश्वर की कृपा का पात्र है, उसको जगत् में सम्राट् भी गिरा नहीं सकता, उसके उपासक के पुत्रादि भी महाबलिष्ठ और विजेता होते हैं। अतः उसी की कृपा के पात्र बनो, शुभकर्म करके उसके आशीर्वाद के भाजन होओ॥६॥

मा भे॑म॒ मा श्र॑मिष्मो॒ग्रस्य॑ स॒ख्ये तव॑। म॒हत्ते॒ वृष्णो॑ अभि॒चक्ष्यं॑ कृ॒तं पश्ये॑म तु॒र्वशं॒ यदु॑म्॥

हे शत्रुओं को वशीभूत करनेवाले कर्मयोगिन्! आपसे मैत्रीभावसम्बन्ध प्राप्त होने पर न हम शत्रुओं से भयभीत होते और न अपनी कार्य्यसिद्धि में श्रान्त होते हैं अर्थात् निर्भयता से शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं। हमारी कामनाओं को पूर्ण करनेवाले कर्मयोगिन्! आपकी शिक्षाद्वारा उक्त महान् कर्म करने को हम समर्थ हुए हैं, सो आपका यह शिक्षणरूप कर्म प्रशंसनीय है। हे शत्रुओं के नाशक कर्मयोगिन्! आपकी कृपा से यही भाव हमारी सन्तान में भी आवे अर्थात् उसको भी शत्रुओं के मध्य हम विजय प्राप्त करता हुआ देखें, हमारी इस कामना को पूर्ण करें॥७॥हम क्यों डरते हैं ? उत्तर−आन्तरिक दुर्बलता के कारण। जिसका आत्मा दुर्बल है, वह सबसे डरता है। असत्यता, मिथ्याव्यवहार, स्वेच्छाचारित्व, कदाचार, राजनियमों का पालन न करना और ईश्वरीय आज्ञाओं का उल्लङ्घन, इस प्रकार के विकर्म मनुष्यों को दुर्बल बना देते हैं। अबल पुरुष जगत् में स्थितिलाभ नहीं करते। केवल धन से, राज्य से, शरीर से, जन से, सेनादि बल से यह आत्मा बलिष्ठ नहीं होता, किन्तु एक ही सम्यगनुष्ठित सत्य से यह आत्मा महान् बलवान् होता है। विदेशी गैलेलियो और साक्रेटीज आदि विद्वान् और स्वदेशी युधिष्ठिर, बुद्ध आदि महात्मा सत्य ही से महाबली थे। जिनके नाम ही सम्प्रति इस भूमि को पवित्र कर रहे हैं। हे मनुष्यो! सत्यव्रत पालकर निर्भय होओ। अतः वेद में हम न डरें, इत्यादि प्रार्थना होती है। और भी−हे मेधाविजनो! ईश्वर का जो यह जगद्रूप कर्म है, इसका माहात्म्य मनुष्यों को समझाओ, क्योंकि यह महाश्चर्य्य और प्रशंसनीय है और इस आत्मा को भी उसके अधीन कर उसी का यश गाओ और विस्तार करो, इत्यादि शिक्षा इससे होती है॥७॥

स॒व्यामनु॑ स्फि॒ग्यं॑ वावसे॒ वृषा॒ न दा॒नो अ॑स्य रोषति। मध्वा॒ सम्पृ॑क्ताः सार॒घेण॑ धे॒नव॒स्तूय॒मेहि॒ द्रवा॒ पिब॑॥

सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाले कर्मयोगिन्! आप वाम अङ्ग से ही सब शत्रुओं को वशीभूत करनेवाले हैं। जो प्रसन्नतापूर्वक आपका भाग देता है, उसका आप सदा ही कल्याण करते और अनाज्ञाकारी का दमन करते हैं। हे भगवन्! यह शहद और दुग्धादि पदार्थों से मिश्रित उत्तमोत्तम खाद्य पदार्थ आपके लिये सिद्ध किये हुए रखे हैं, आप शीघ्र आकर इनका सेवन कीजिये॥८॥वह ईश आनन्दस्वरूप और सर्वगत है, प्राकृत विकार उसको विकृत नहीं करते। अतः हे मनुष्यो! उसी की उपासना करो॥८॥

अ॒श्वी र॒थी सु॑रू॒प इद्गोमाँ॒ इदि॑न्द्र ते॒ सखा॑। श्वा॒त्र॒भाजा॒ वय॑सा सचते॒ सदा॑ च॒न्द्रो या॑ति स॒भामुप॑॥

जो पुरुष कर्मयोगी को प्रसन्न रखकर उससे मित्रता करते हैं, वे अश्व, रथ तथा गौ आदि पशु और अन्नादि धनों से युक्त होकर सदैव आनन्द भोगते हैं। वे बड़ी आयुवाले होते और स्वरूपवान् तथा प्रतिष्ठित हुए सभा-समाज में मान को प्राप्त होते हैं, इसलिये प्रतिष्ठाभिलाषी पुरुष को उक्त गुणसम्पन्न कर्मयोगी से मित्रता करके सदा लाभ उठाना चाहिये॥९॥इसका आशय यह है कि जो परमात्मा की उपासना करता है, उसके सब कर्म नियत अविच्छिन्न और मन से अनुष्ठित होते हैं, अतः वे शीघ्र पुष्पों और फलों से युक्त होते हैं और ऐसे उपासक की दिन-२ उन्नति होती जाती है॥९॥

ऋश्यो॒ न तृष्य॑न्नव॒पान॒मा ग॑हि॒ पिबा॒ सोमं॒ वशाँ॒ अनु॑। नि॒मेघ॑मानो मघवन्दि॒वेदि॑व॒ ओजि॑ष्ठं दधिषे॒ सहः॑॥

इस मन्त्र में याज्ञिक पुरुषों की ओर से कथन है कि हे कर्मयोगिन्! जैसे पिपासातुर मृग जलाशय की ओर अति शीघ्रता से जाता है, इसी प्रकार शीघ्र ही आप हमारे यज्ञस्थान को प्राप्त होकर सोमरस पान करें और अपने सदुपदेश से आनन्द वर्षावें। हे महाबलशालिन् कर्मयोगिन्! आप हमें भी बलवान् कीजिये ताकि अपने कार्यों को विधिवत् करते हुए सदा शत्रुओं का दमन करते रहें॥१०॥पूर्वार्ध से अतिशय प्रेम दिखलाते हैं। जैसे पिपासित मृग जलाशय की ओर दौड़ता है, हे ईश! वैसे तू भी हमारे क्लेशों को देखकर मत विलम्ब कर। तेरी ही कृपा से सब पदार्थ प्रतिदिन अपनी-२ सत्ता पाते हैं और बल धारण करते हैं, अतः मेरी ओर भी देख॥१०॥

अध्व॑र्यो द्रा॒वया॒ त्वं सोम॒मिन्द्रः॑ पिपासति। उप॑ नू॒नं यु॑युजे॒ वृष॑णा॒ हरी॒ आ च॑ जगाम वृत्र॒हा॥

हे यज्ञपति=यजमान! पूज्य कर्मयोगी सोमरस पान करने के लिये शीघ्र ही अश्वों के रथ में सवार होकर यज्ञस्थान को आ रहे हैं, सो आने से प्रथम ही सोमरस सिद्ध करके तैयार रखना चाहिये॥११॥सर्वगत सर्वद्रष्टा ईश्वर को जान पाप से निवृत्त हो और इस जगत् का परस्परोपकारित्व को देख उपकार में प्रवृत्त रहो॥११॥

स्व॒यं चि॒त्स म॑न्यते॒ दाशु॑रि॒र्जनो॒ यत्रा॒ सोम॑स्य तृ॒म्पसि॑। इ॒दं ते॒ अन्नं॒ युज्यं॒ समु॑क्षितं॒ तस्येहि॒ प्र द्र॑वा॒ पिब॑॥

हे कर्मयोगिन्! यजमान की ओर से कुशल सेवकों द्वारा अन्नपान भले प्रकार सिद्ध हो गया है, आप इसको ग्रहण कीजिये॥१२॥जिस पर परमेश्वर की कृपा होती है, वह वस्तुतत्त्वों को विचारने लगता है। उससे वह परम पण्डित बन जाता है। इन पदार्थों का तत्त्व जो नहीं जानता है, क्या वह पण्डित है ? इनके विज्ञान से ही मनुष्य ऋषि और मुनि हुए। हे स्त्रियो और पुरुषो! इस सृष्टि का अध्ययन करो॥१२॥

र॒थे॒ष्ठाया॑ध्वर्यवः॒ सोम॒मिन्द्रा॑य सोतन। अधि॑ ब्र॒ध्नस्याद्र॑यो॒ वि च॑क्षते सु॒न्वन्तो॑ दा॒श्व॑ध्वरम्॥

यजमान की ओर से कथन है कि याज्ञिक लोगो! रथ में स्थित कर्मयोगी को सोमरस अर्पण कीजिये। कर्मयोगी के दिये हुए अस्त्र-शस्त्रों से यज्ञस्थान विशेषरूप से सुशोभित हो रहा है। हमारा कर्तव्य है कि यज्ञरक्षार्थ आये हुए कर्मयोगी का विशेषरूप से सत्कार करें॥१३॥ये स्थावर पर्वत आदि भी अध्वर्यु के समान मानो यज्ञ कर रहे, ईश्वर के महत्त्व दिखला रहे और उनके समान ही मानो, स्वोत्पन्न बहुत सी वस्तुएँ जगत् को दे रहे हैं। हे मनुष्यो! तुम भी सर्व वस्तु को परमात्मा के उद्देश से प्रसिद्ध करो॥१३॥

उप॑ ब्र॒ध्नं वा॒वाता॒ वृष॑णा॒ हरी॒ इन्द्र॑म॒पसु॑ वक्षतः। अ॒र्वाञ्चं॑ त्वा॒ सप्त॑योऽध्वर॒श्रियो॒ वह॑न्तु॒ सव॒नेदुप॑॥

हे याज्ञिक लोगो! हमारी कामनाओं को पूर्ण करनेवाली शक्तियें कर्मयोगी को यज्ञभूमि में लावें, या यों कहो कि यजमान के शीघ्रगामी अश्व, जो यज्ञस्थान में ही रहते हैं, वे कर्मयोगी को यहाँ पहुँचावें, जिससे हम लोग शिक्षा द्वारा अपना मनोरथ पूर्ण करें॥१४॥द्विविध जो ये स्थावर जङ्गमरूप संसार हैं, वे परस्पर में उपकारी हैं, आनन्दवर्षा करते हैं और वे ही परमात्मा के प्रकाश करने में समर्थ हैं। इससे यह उपदेश देते हैं कि तुम उस उपाय से शुभ कर्म करो और मन को वश में लाओ, जिससे तुम्हारे सर्व कर्मों में सब पदार्थ ईश की विभूति प्रकाशित कर सकें॥१४॥

प्र पू॒षणं॑ वृणीमहे॒ युज्या॑य पुरू॒वसु॑म्। स श॑क्र शिक्ष पुरुहूत नो धि॒या तुजे॑ रा॒ये वि॑मोचन॥

हे ऐश्वर्य्यसम्पन्न तथा पालक-पोषक कर्मयोगिन्! हम लोग आपसे मित्रता प्राप्त करने के लिये यत्नवान् हैं। हे भगवन्! आप हमको दुःखों से छुड़ाकर सुखप्रदान करनेवाले हैं। कृपा करके अपनी शुद्धबुद्धि से हमको शत्रुनाश तथा ऐश्वर्य्यलाभार्थ शिक्षा दीजिये, जिससे हम निश्चिन्त होकर याज्ञिक कार्यों को पूर्ण करें॥१५॥हे स्त्रियो तथा मनुष्यो! वह ईश सर्वशक्तिमान्, सर्वपूज्य, सर्वदुःखनिवारक और सर्वधनसम्पन्न है, अतः अन्य देवों को छोड़ उसी को सर्वभाव से स्वीकार करो। उसी को सखा बनाओ। हम भी उसी को चुनते हैं॥१५॥

सं नः॑ शिशीहि भु॒रिजो॑रिव क्षु॒रं रास्व॑ रा॒यो वि॑मोचन। त्वे तन्नः॑ सु॒वेद॑मु॒स्रियं॒ वसु॒ यं त्वं हि॒नोषि॒ मर्त्य॑म्॥

हे दुःखों से पार करनेवाले कर्मयोगिन्! आप कृपा करके हमको कर्म करने में कुशल बनावें अर्थात् हम लोग निरन्तर कर्मों में प्रवृत्त रहें, जिससे हमारा दारिद्र्य दूर होकर ऐश्वर्य्यशाली हों। आप हमको कान्तिवाला वह उज्वल धन देवें, जिसको प्राप्त कर मनुष्य आनन्दोपभोग करते हैं। आप सब प्रकार से समर्थ हैं, इसलिये हमारी इस प्रार्थना को स्वीकार करें॥१६॥हे स्त्रियो तथा पुरुषो! परमात्मा सर्वदुःखनिवारक है, यह अच्छी तरह निश्चय कर मन में उसको रख, उससे आशीर्वाद माँगते हुए सांसारिक कार्य्यों में प्रवेश करो। उससे सर्व मनोरथ पाओगे॥१६॥

वेमि॑ त्वा पूषन्नृ॒ञ्जसे॒ वेमि॒ स्तोत॑व आघृणे। न तस्य॑ वे॒म्यर॑णं॒ हि तद्व॑सो स्तु॒षे प॒ज्राय॒ साम्ने॑॥

हे सबके पोषक इन्द्र=कर्मयोगिन्! आप ही कार्य्य सिद्ध करनेवाले, आप देदीप्यमान तथा स्तुति करने योग्य हैं, आपके विना अन्य कोई स्तुति के योग्य नहीं और न मैं किसी अन्य को जानता हूँ, हे युद्धकुशल भगवन्! आप मुझको प्रार्जित=एकत्रित किया हुआ साम दीजिये अर्थात् सदा के लिये कल्याण तथा ऐश्वर्य्य प्रदान कीजिये॥१७॥वही ईश सर्वपोषक और सर्वप्रकाशक है, अतः हे मेधाविगण! उसी की प्रीति की प्राप्ति के लिये प्रयत्न करो और अन्य देवों को छोड़ उसी की प्रार्थना करो। वह करुणालय तुमको सर्व क्लेश से दूर कर देगा॥१७॥

परा॒ गावो॒ यव॑सं॒ कच्चि॑दाघृणे॒ नित्यं॒ रेक्णो॑ अमर्त्य। अ॒स्माकं॑ पूषन्नवि॒ता शि॒वो भ॑व॒ मंहि॑ष्ठो॒ वाज॑सातये॥

हे सबके पालक कर्मयोगिन्! हमारी गौओं के भक्षणार्थ तृणरूप धन नित्य हो। मन्त्र में “गावः” पद सब पशुओं का उपलक्षण है अर्थात् हमारे पशुओं के लिये नित्य पुष्कल उत्तम चारा मिले, जिससे वह हृष्ट-पुष्ट रहें। हे कर्मयोगिन्! आप हम जिज्ञासुओं के सदैव रक्षक हों और हमारे लिये धन-दान देने में सदा उदारभाव हों॥१८॥यह स्वाभाविकी प्रार्थना है। सब कार्य में प्रथम महेश प्रार्थनीय है, यह दिखलाते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि मन से ध्यात ईश प्रसन्न होता है॥१८॥

स्थू॒रं राधः॑ श॒ताश्वं॑ कुरु॒ङ्गस्य॒ दिवि॑ष्टिषु। राज्ञ॑स्त्वे॒षस्य॑ सु॒भग॑स्य रा॒तिषु॑ तु॒र्वशे॑ष्वमन्महि॥

इस मन्त्र में कर्मयोगी का ऐश्वर्य्य कथन किया है कि वह विमान द्वारा अन्तरिक्ष में गमन करता तथा उसी में चढ़कर ऋत्विजों से मिलता है। वह विमान कैसा है ? ऐश्वर्य्यसम्पन्न राजा के सैकड़ों अश्वों की शक्तिवाला अर्थात् अत्यन्त वेग से चलनेवाला और बहुत स्थूल बना हुआ है, वह कर्मयोगी दानविषयक उदारता में प्रसिद्ध और कर्मों द्वारा सबको धनाढ्य बनाने में कुशल है॥१९॥परमेश्वर ने जो धन दिया है उसी को बहुत मानता हुआ सदा प्रसन्न रहे, कभी उपालम्भ न करे, क्योंकि अज्ञानी मनुष्य ईश्वरप्रदत्त धन को न जान झखता रहता है। हे मनुष्यो! तुममें कैसा ज्ञान विद्यमान है, इसको वारंवार विचारो और उसी से सब सिद्ध करो॥१९॥

धी॒भिः सा॒तानि॑ का॒ण्वस्य॑ वा॒जिनः॑ प्रि॒यमे॑धैर॒भिद्यु॑भिः। ष॒ष्टिं स॒हस्रानु॒ निर्म॑जामजे॒ निर्यू॒थानि॒ गवा॒मृषिः॑॥

इस मन्त्र में दानशील महात्मा कर्मयोगी का दान कथन किया गया है कि यज्ञप्रिय, सुदर्शन, विद्वानों का सेवन करनेवाला तथा मेधावीपुत्र बलवान् कर्मयोगी ने साठ सहस्र उत्तम गायों के यूथों को ऋषि के लिये सदा को दान दिया॥२०॥इस देह में कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय और अन्तःकरण विद्यमान हैं। ये ईश्वरप्रदत्त महादान हैं। इनको ही अच्छे प्रकार जान ऋषि अद्भुत कर्म करते हैं, इनको ही तीक्ष्ण करके मनुष्य ऋषि होते हैं॥२०॥

वृ॒क्षाश्चि॑न्मे अभिपि॒त्वे अ॑रारणुः। गां भ॑जन्त मे॒हनाश्वं॑ भजन्त मे॒हना॑॥

ऋषि की ओर से कथन है कि मुझको गोधनरूप धन प्राप्त होने पर बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ और मूर्ख से लेकर पण्डितपर्य्यन्त सब जन इस दान की प्रशंसा करने लगे, मन्त्र में “वृक्ष” शब्द से तात्पर्य्य जड़=मूर्ख का है, वृक्ष का नहीं, क्योंकि वृक्ष में शब्द करने की शक्ति नहीं होती॥२१॥यह चौथा सूक्त और तेतीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥हे मनुष्यो! परमात्मा मनुष्यजाति को जो दान देता है, उसको कोई वर्णन नहीं कर सकता, मनुष्य का दान देखकर जड़ वृक्ष भी स्पर्धा करते हैं। ऐसा दान पाकर भी यदि तुम महान् कार्य्य नहीं साधते हो, तब तुम्हारी महती विनष्टि है॥२१•॥

दू॒रादि॒हेव॒ यत्स॒त्य॑रु॒णप्सु॒रशि॑श्वितत्। वि भा॒नुं वि॒श्वधा॑तनत्॥

इस मन्त्र में उषाकाल का वर्णन किया गया है कि जब सम्पूर्ण संसार को अरुण=तेजस्वी बनानेवाले उषाकाल का आगमन होता है, तब सब प्राणी निद्रादेवी की गोद से उद्बुद्ध होकर परमपिता परमात्मा की महिमा का अनुभव करते हुए उसी के ध्यान में निमग्न होते हैं। अधिक क्या, इस उषाकाल का महत्त्व ऋषि, महर्षि, शास्त्रकार तथा सम्पूर्ण महात्मागण बड़े गौरव से वर्णन करते चले आये हैं कि जो पुरुष इस उषाकाल में उठकर परमात्मपरायण होते हैं उनको परमात्मा सब प्रकार के ऐश्वर्य्य प्रदान करते हैं, जैसा कि ऋग्० ७। ६। ६ में वर्णन किया है किः− प्रतित्वा स्तोमैरीडते वसिष्ठा उषर्बुधः सुभगे तुष्टुवांसः। गवां नेत्री वाजपत्नी न उच्छोषः सुजाते प्रथमा जरस्व॥हे सुभगे उषा! स्तुति करनेवाले विद्वान् पुरुष उषाकाल में जागकर स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं। गौ तथा अन्नादि धनों को देनेवाली, प्रथम प्राप्त होनेवाली आप प्रकाशित होकर सुख से लब्ध हों अर्थात् जो पुरुष इस उषाकाल में जागते हैं, वे संयमी होते हैं और यह उषाकाल अन्नादि ऐश्वर्य्य का स्वामी है, या यों कहो कि उषाकाल के सेवी को अन्नादि विविध ऐश्वर्य्य प्राप्त होते और इसी के सेवन से पुरुष की दीर्घायु होती है। इसी काल का नाम “ब्राह्ममुहूर्त्त” है, जिसके विषय में मनु भगवान् मनु० ४। ९२ में इस प्रकार वर्णन करते हैं किः− ब्राह्मे मुहूर्त्ते बुध्येत धर्मार्थौ चानुचिन्तयेत्। कायक्लेशांश्च तन्मूलान् वेदतत्त्वार्थमेव च॥पुरुषों को उचित है कि वह ब्राह्ममुहूर्त्त में उठकर धर्म और अर्थ का चिन्तन करें अर्थात् उषाकाल में जागकर सन्ध्या अग्निहोत्रादि धर्मकार्यों में प्रवृत्त हों और उनसे निवृत्त होकर धर्मपूर्वक धन कमाने का उपाय सोचें। शरीर को आरोग्य रखने के उपायों को भी विचारें अर्थात् उसी काल में नित्य व्यायामादि क्रिया करें, क्योंकि शरीर के नीरोग होने से ही पुरुष मनुष्यजन्म के फलचतुष्टय लाभ कर सकता है। उसके पश्चात् वेद के तत्त्व का विचार करें अर्थात् स्वाध्याय में प्रवृत्त हों, जिससे धर्माधर्म का भले प्रकार बोध प्राप्त कर सकें, इसलिये धर्माभिलाषी तथा ऐश्वर्य्याभिलाषी पुरुषों को उचित है कि वह नित्य उषाकाल में जागकर परमात्मा की उपासना में प्रवृत्त हों॥१॥प्रभात में उठकर ईश्वरविभूति देखता हुआ जीवों के कल्याणों की चिन्ता करे॥१॥

नृ॒वद्द॑स्रा मनो॒युजा॒ रथे॑न पृथु॒पाज॑सा। सचे॑थे अश्विनो॒षस॑म्॥

ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगी उषाकाल में जागकर वेदप्रतिपादित सन्ध्या अग्निहोत्रादि कर्मों से निवृत्त हो स्वेच्छाचारी रथपर बैठ कर अपने राष्ट्र का प्रबन्ध देखने तथा उस काल का वायुसेवन करने के लिये जाते हैं। जो पुरुष कर्मयोगी के इस आचरण का सेवन करते हैं, वे भी बुद्धिमान् तथा ऐश्वर्य्यवान् और दीर्घजीवी होकर अनेक प्रकार के सुख अनुभव करते हैं॥२॥सर्व कल्याणाभिलाषी जनों को उचित है कि प्रातःकाल उठ बाहर जा आवश्यक और स्नान कर, सन्ध्या के पश्चात् ईश्वर का ध्यान करें॥२॥

यु॒वाभ्यां॑ वाजिनीवसू॒ प्रति॒ स्तोमा॑ अदृक्षत। वाचं॑ दू॒तो यथो॑हिषे॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि उषाकाल का सेवन करनेवाले ऐश्वर्य्यसम्पन्न कर्मयोगी की उसी काल में स्तोता लोग स्तुति करते और कर्मचारीगण आज्ञा प्राप्तकर अपने-अपने कार्य्य में प्रवृत्त होते हैं। अतएव प्रत्येक पुरुष को उचित है कि सूर्योदय से प्रथम ही शौच, सन्ध्या अग्निहोत्रादि आवश्यक कार्यों से निवृत्त होकर सूर्योदय होने पर अपने व्यावहारिक कार्यों में प्रवृत्त हो। ऐसा पुरुष अवश्य ही अपने अभीष्ट कार्यों को सिद्ध करता है, अन्य नहीं॥३॥जिससे प्रजाओं का अभ्युदय हो, वही कार्य राजाओं को कर्तव्य है, यह आशय है॥३॥

पु॒रु॒प्रि॒या ण॑ ऊ॒तये॑ पुरुम॒न्द्रा पु॑रू॒वसू॑। स्तु॒षे कण्वा॑सो अ॒श्विना॑॥

ऐश्वर्य्यसम्पन्न कर्मयोगी तथा विद्याविशारद ज्ञानयोगी की सब विद्वान् स्तुति करते हैं कि हे भगवन्! आप सर्वप्रिय, सबको आनन्द देनेवाले तथा संसार में सुख का विस्तार करनेवाले हैं। कृपा करके हम लोगों की सब ओर से रक्षा करें, ताकि हम लोग विद्यावृद्धि तथा धर्म का आचरण करते हुए अपनी इष्टसिद्धि को प्राप्त हों॥४॥मन्त्री आदि सहकारियों के साथ राजा वैसा व्यवहार रक्खे, जिससे वे सब प्रजाओं के प्रिय होवें, उनके धन बढ़ें और सब मिलकर परस्पर रक्षा करें॥४॥

मंहि॑ष्ठा वाज॒सात॑मे॒षय॑न्ता शु॒भस्पती॑। गन्ता॑रा दा॒शुषो॑ गृ॒हम्॥

हे कर्मयोगी तथा ज्ञानयोगिन्! आप विद्यादि गुणों के कारण सबके पूजनीय=सत्कारार्ह हो। आप अन्न के दाता, सर्वमित्र, सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों के स्वामी और याज्ञिक पुरुषों में प्रीति उत्पन्न करनेवाले हैं, इसलिये हम लोग आपकी स्तुति करते हैं। कृपा करके हमें भी उक्तगुणसम्पन्न करें॥५॥सर्व कार्य में राजा और अधिकारी वर्गों को परमोदार और परमोपयोगी होना चाहिये, यह आशय है॥५॥

ता सु॑दे॒वाय॑ दा॒शुषे॑ सुमे॒धामवि॑तारिणीम्। घृ॒तैर्गव्यू॑तिमुक्षतम्॥

इस मन्त्र में याज्ञिक विद्वानों की ओर से यह प्रार्थना कथन की गई है कि हे कर्मयोगिन्! आप हमारे यजमान की आत्मा को उच्च बनावें अर्थात् उन पर सदा प्रेम की दृष्टि रखें, जिससे वे अपनी इन्द्रियों को वशीभूत रखते हुए सदाचार में प्रवृत्त रहें, जिससे उनके यज्ञसम्बन्धी कार्य्य निर्विघ्न पूर्ण हों॥६॥राजा को उचित है कि ईश्वरोपासक आदिकों की और गवादि पशु संचारभूमि की सर्वोपायों से रक्षा करे॥६॥

आ नः॒ स्तोम॒मुप॑ द्र॒वत्तूयं॑ श्ये॒नेभि॑रा॒शुभिः॑। या॒तमश्वे॑भिरश्विना॥

विद्वज्जनों की ओर से प्रार्थना है कि हे कर्मयोगिन् तथा ज्ञानयोगिन्! हमारे क्षात्रधर्मसम्बन्धी स्तोत्रों के उच्चारणकाल में आप सशस्त्र शीघ्र आवें और आकर क्षात्रधर्म का महत्त्व तथा शस्त्रों की प्रयोगविधि का श्रवण करें, जिससे हमारा ज्ञान वृद्धि को प्राप्त हो॥७॥आवश्यक कार्य उपस्थित होने पर राजा को या कर्मचारी को निज गृह पर बुलाकर घटना निवेदन करे और राजा भी उसे सुन शीघ्र निर्णय करे॥७॥

येभि॑स्ति॒स्रः प॑रा॒वतो॑ दि॒वो विश्वा॑नि रोच॒ना। त्रीँर॒क्तून्प॑रि॒दीय॑थः॥

इस मन्त्र में ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगी के यान का वैलक्षण्य वर्णन किया गया है कि वह अपने शीघ्रगामी यान द्वारा तीन दिन और तीन रात्रि में सम्पूर्ण दिव्यप्रदेशों=देश-देशान्तरों में परिभ्रमण करके अपनी राजधानी को प्राप्त करते हैं॥८॥शीघ्रगामी रथ के द्वारा राजा प्रतिवर्ष सब रक्षितव्य स्थानों को देखे और देखकर यदि कहीं न्यूनता हो, तो उसको दूर करे॥८॥

उ॒त नो॒ गोम॑ती॒रिष॑ उ॒त सा॒तीर॑हर्विदा। वि प॒थः सा॒तये॑ सितम्॥

हे प्रातःस्मरणीय कर्मयोगिन् तथा ज्ञानयोगिन्! आप कृपा करके हमको गवादि धन से युक्त करें। हमको भोगयोग्य पदार्थ प्राप्त कराएँ और हमारे मार्गों को बाधारहित करें अर्थात् दुष्ट जन, जो हमारे यज्ञादि कर्मों में बाधक हैं, उनको क्षात्रबल से वशीभूत करके हमको अभयदान दें, जिससे हम निर्भय होकर वैदिक कर्मानुष्ठान में प्रवृत्त रहें॥९॥जिन वाणिज्यादि उपायों से देश समृद्ध हो, राजा उन्हें विचार प्रजाओं की सम्मति से प्रसारित करे॥९॥

आ नो॒ गोम॑न्तमश्विना सु॒वीरं॑ सु॒रथं॑ र॒यिम्। वो॒ळ्हमश्वा॑वती॒रिषः॑॥

हे कर्मयोगिन् तथा ज्ञानयोगिन्! आप हमको विद्यादान द्वारा तृप्त करें, जिससे हम परमात्मपरायण होकर वेदवाणी का विस्तार करें। हमको दुष्ट दस्यु तथा म्लेच्छ जनों के दमनार्थ शूरवीर पुरुष प्रदान करें, जो हमारी रक्षा में तत्पर रहें और हमें उत्तम वाहन तथा अन्नादि धन प्राप्त कराएँ, जिससे हम अपनी इष्टकामनाओं को पूर्ण कर सकें॥१०॥विविध देशों की कलाओं, वाणिज्य विद्याओं और उनके साधन यन्त्रादिकों को स्वयं जान और प्रजाओं को जनवाकर देश को सब मिलकर समृद्ध करें॥१०॥

वा॒वृ॒धा॒ना शु॑भस्पती दस्रा॒ हिर॑ण्यवर्तनी। पिब॑तं सो॒म्यं मधु॑॥

इस मन्त्र में ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगी का स्तुतिपूर्वक सत्कार करना कथन किया है कि हे उत्तमोत्तम पदार्थों के स्वामी! आप शत्रुओं का क्षय करनेवाले तथा अभ्युदयसम्पन्न हैं। कृपया इस उत्तम मधुर रस को, जो नाना पदार्थों से सिद्ध किया गया है, पान करके हमारे इस सत्कार को स्वीकार करें॥११॥राजा और कर्मचारी वर्ग कभी आलसी न होवें, वे शुभस्पति बनें अर्थात् प्रजाओं के कल्याण करने में ही सदा लगे रहें। दस्रा=ऐसे कर्म करें कि प्रजा उनके दर्शन के लिये सदा उत्कण्ठित रहे, इत्यादि-२ उत्तमोत्तम कार्य्य करते हुए श्रेष्ठ आरोग्यजनक पदार्थों को भोंगे॥११॥

अ॒स्मभ्यं॑ वाजिनीवसू म॒घव॑द्भ्यश्च स॒प्रथः॑। छ॒र्दिर्य॑न्त॒मदा॑भ्यम्॥

हे बल से रत्न उत्पादन करनेवाले ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन्! आप धनवान् पुरुषों और हम विद्वानों के लिये उत्तम=सब ऋतुओं में आराम तथा आनन्ददायक और जिसमें मनुष्य तथा पशु नीरोग रह सकें और जो सब उपद्रवों से रहित हो, ऐसे निवासगृह को यन्तं=यत्न कीजिये, यह आपसे हमारी प्रार्थना है॥१२॥वाणिज्य, सुमति, यागक्रिया, बुद्धि आदि का नाम वाजिनी है। जिनके यही वाजिनी धन है, वे वाजिनीवसु। धनिक पुरुष का नाम वेद में मघवा या मघवान् आता है। राजा को उचित है कि अकिञ्चन और धनिक दोनों के लिये निवासस्थान का प्रबन्ध करें॥१२॥

नि षु ब्रह्म॒ जना॑नां॒ यावि॑ष्टं॒ तूय॒मा ग॑तम्। मो ष्व१॒॑न्याँ उपा॑रतम्॥

हे ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन्! आप यज्ञों के रक्षक, याज्ञिक पुरुषों के नितान्त सेवी और विद्वानों का पूजन करनेवाले हैं, इसलिये प्रार्थना है कि आप विलम्ब न करते हुए शीघ्र ही हमारे यज्ञस्थान को पधारकर सुशोभित करें॥१३॥जो राजपुरुष ज्ञान-विज्ञान की सदा रक्षा करते हैं और सर्वदा जनताओं के ऊपर ध्यान रखते, जिनका जीवन ही प्रजार्थ है, वे ही सर्वत्र आदरणीय हैं॥१३॥

अ॒स्य पि॑बतमश्विना यु॒वं मद॑स्य॒ चारु॑णः। मध्वो॑ रा॒तस्य॑ धिष्ण्या॥

हे सबको वशीभूत करनेवाले ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन्! आप मेरे अर्पण किये हुए इस पवित्र, मीठे तथा हर्षोत्पादक सोमरस का पान कर तृप्त हों और हम पर प्रसन्न होकर हमारी कामनाओं को पूर्ण करें॥१४॥राजा अथवा राजकर्मचारीगण तब ही अच्छे पदार्थों का भोग कर सकते हैं, यदि वे परिश्रमपूर्वक कार्य्य करते हों। मधु शब्द से मधुर पदार्थ का ग्रहण है। प्रत्येक वस्तु उस समय मधुर प्रतीत होता है, जब क्षुधा प्रज्वलित हो और पाकस्थली वारंवार खाने से बिगड़ न गई हो। धनसम्पन्न पुरुष की पाचनशक्ति अधिक भोजन से बिगड़ जाती है॥१४॥

अ॒स्मे आ व॑हतं र॒यिं श॒तव॑न्तं सह॒स्रिण॑म्। पु॒रु॒क्षुं वि॒श्वधा॑यसम्॥

अब सोमरस द्वारा सत्कार करने के अनन्तर यजमान प्रार्थना करता है कि हे सब प्राणियों के आश्रयभूत तथा सबकी रक्षा करनेवाले ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन्! आप कृपा करके मुझको ऐश्वर्य्यप्राप्ति का मार्ग बतलाएँ जिससे मैं ऐश्वर्य्ययुक्त होकर यज्ञादि कर्मों को विधिवत् कर सकूँ और यज्ञ के निधि परमात्मा की आज्ञापालन में सदा तत्पर रहूँ॥१५॥वाणिज्य के साधन, समुद्रमार्ग प्रसार, नौकासंचय और अन्यान्य वस्तुओं की वृद्धिकरण, विज्ञान की उन्नति, इस प्रकार के विविध वस्तुओं से देश को सदा सुसज्जित रखना राजधर्म है॥१५॥

पु॒रु॒त्रा चि॒द्धि वां॑ नरा वि॒ह्वय॑न्ते मनी॒षिणः॑। वा॒घद्भि॑रश्वि॒ना ग॑तम्॥

हे ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन्! आप अनेक स्थानों में निमन्त्रित होने पर भी कृपा करके शीघ्रगामी यान द्वारा हमारे यज्ञ को सुशोभित करें॥१६॥विद्वान् और ऋत्विक् का नाम वाघत् है। राजवर्ग जहाँ जाएँ, वहाँ उनके साथ परम बुद्धिमान् जन और धार्मिक पुरोहित अवश्य रहें, ताकि सदसद्विवेक के साथ प्रजाओं के सब विषय निर्णीत होवें॥१६॥

जना॑सो वृ॒क्तब॑र्हिषो ह॒विष्म॑न्तो अरं॒कृतः॑। यु॒वां ह॑वन्ते अश्विना॥

हे ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन्! आप पराक्रमी होने से सबको पराक्रमसम्पन्न बनानेवाले हैं, इसलिये आपको उत्तमासन सुसज्जित करके उत्तम वस्त्राभूषणों से अलंकृत होकर सिद्ध किया हुआ सोमरस लिये हुए सब पुरुष आपके आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। सो आप उसका पान करके हमारे यज्ञ को प्राप्त होकर उत्तम उपदेशों द्वारा हमें पराक्रमी बनावें॥१७॥वृक्तबर्हिष् यह नाम ऋत्विक् का भी है, जो कामक्रोधादिकों से रहित हैं, वे वृक्त हैं, वे ही निष्कामी हविष्मान् और अरंकृत अर्थात् परमोद्योगी हैं, इस प्रकार के मनुष्यों का अधिकार है कि वे राजपुरुषों को अपने गृह पर बुलाकर सदुपदेश देवें और अभियोग का निर्णय करावें॥१७॥

अ॒स्माक॑म॒द्य वा॑म॒यं स्तोमो॒ वाहि॑ष्ठो॒ अन्त॑मः। यु॒वाभ्यां॑ भूत्वश्विना॥

हे ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन्! आज हम लोग जिस स्तोत्र द्वारा आपकी स्तुति करते हैं, वह हमारे लिये सफलीभूत हो अर्थात् हम लोग आपके शुभाचरणों का अनुकरण करके पराक्रमी, उद्योगी तथा विद्वान् होकर आपके समीपवर्ती हों॥१८॥सत्य और हृदयग्राही स्तुति प्रार्थना राजवर्ग को सुनावें॥१८॥

यो ह॑ वां॒ मधु॑नो॒ दृति॒राहि॑तो रथ॒चर्ष॑णे। ततः॑ पिबतमश्विना॥

हे तेजस्वी पुरुषो! यह सोमरस का पात्र, जो आपके रथ से ही दृष्टिगत होता है, आपके पानार्थ स्थापित किया है, कृपा कर इस पात्र से पानकर प्रसन्न हों और हम लोगों को अपने सदुपदेशों से ओजस्वी तथा तेजस्वी बनावें, यह हमारी आपसे प्रार्थना है॥१९॥युद्ध में जाने के समय रथ के ऊपर खान-पान की सामग्री भी रख लेनी चाहिये॥१९॥

तेन॑ नो वाजिनीवसू॒ पश्वे॑ तो॒काय॒ शं गवे॑। वह॑तं॒ पीव॑री॒रिषः॑॥

हे पराक्रमशील ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन्! आप हमारे सिद्ध किये हुए सोमरस का पान करके प्रसन्न हों और आपकी कृपा से हमारे पशु तथा सन्तान निरोग रहकर वृद्धि को प्राप्त हों। हमारी विद्या सदा उन्नत होती रहे और हम बड़े ऐश्वर्य्य को प्राप्त हों, यह हमारी आपसे विनयपूर्वक प्रार्थना है॥२०॥देश में जिन उपायों से अच्छे पशुओं, सन्तानों और अन्नों की वृद्धि हो, वे कर्तव्य हैं॥२०॥

उ॒त नो॑ दि॒व्या इष॑ उ॒त सिन्धूँ॑रहर्विदा। अप॒ द्वारे॑व वर्षथः॥

हे प्रातःस्मरणीय ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन्! हमारे लिये उत्तमोत्तम पदार्थ प्रदान करें, जिनके सेवन से विद्या, बल तथा बुद्धि की वृद्धि हो। हे भगवन्! हमारे लिये नहरों का सुप्रबन्ध कीजिये, जिससे कृषि द्वारा अन्न अधिकता से उत्पन्न हो तथा जलसम्बन्धी अन्य कार्यों में सुविधा हो अर्थात् मनुष्य तथा पशु अन्न और जल से सदा संतुष्ट रहें, ऐसी कृपा करें॥२१॥राजवर्ग को उचित है कि देश में अन्नों का अभाव न होने देवें। कृषि और जल का बहुत अच्छा प्रबन्ध करें॥२१॥

क॒दा वां॑ तौ॒ग्र्यो वि॑धत्समु॒द्रे ज॑हि॒तो न॑रा। यद्वां॒ रथो॒ विभि॒ष्पता॑त्॥

हे सब मनुष्यों के नेता! जब सब शक्तियों से युक्त आपका शीघ्रगामी यान उड़ता है, तब समुद्र में रहनेवाला तुग्र्य=हिंसक जीवविशेष अथवा जल परमाणु आदि आपका कुछ भी नहीं कर सकते अर्थात् आप जल और स्थल में स्वच्छन्दतापूर्वक विचरते हैं, आपके लिये कहीं भी कोई रुकावट नहीं॥२२॥वाणिज्य के लिये सामुद्रिक मार्ग को सदा ठीक रखना और जहाजों को विदेशों में भेजना भिजवाना भी राजकर्त्तव्य है॥२२॥

यु॒वं कण्वा॑य नासत्या॒ ऋपि॑रिप्ताय ह॒र्म्ये। शश्व॑दू॒तीर्द॑शस्यथः॥

“न सत्यौ असत्यौ न असत्यौ नासत्यौ”=जो कभी भी असत्य न बोलें, उनका नाम “नासत्य” है। हे सत्यवादी ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन्! गृह में स्थित अर्थात् कोई अपराध न करते हुए शत्रुओं से सताये जाने पर आप विद्वानों की सदैव रक्षा करने के कारण पूज्य=सत्कारयोग्य हैं, कृपा करके हमारी भी दुष्ट पुरुषों से सदैव रक्षा करें॥२३॥राजा को प्रत्येक गृह की वार्ता जाननी चाहिये और तदनुसार उसका यथोचित प्रबन्ध करे॥२३॥

ताभि॒रा या॑तमू॒तिभि॒र्नव्य॑सीभिः सुश॒स्तिभिः॑। यद्वां॑ वृषण्वसू हु॒वे॥

हे ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन्! आप अधिकारी पुरुषों को धन देनेवाले, प्रशंसनीय तथा सबकी कामनाओं को पूर्ण करनेवाले हैं। हे भगवन्! हम लोग जब आपको आह्वान करें, तब आप शीघ्र आकर हमारी रक्षा करें, ताकि हमारे यज्ञादि कार्य्य निर्विघ्न पूर्ण हों॥२४॥प्रजाओं की प्रार्थना सुनने के लिये सदा राज्यकर्मचारिवर्ग तैयार रहे॥२४॥

यथा॑ चि॒त्कण्व॒माव॑तं प्रि॒यमे॑धमुपस्तु॒तम्। अत्रिं॑ शि॒ञ्जार॑मश्विना॥

हे ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन्! जिस प्रकार आपने स्तुति करनेवाले विद्वान्, पूज्यबुद्धिवाले मनुष्य तथा अत्रि की रक्षा की, उसी प्रकार मेरी रक्षा करें अर्थात् “अविद्यमानानि आधिभौतिकाधिदैविकाध्यात्मिकानि दुःखानि यस्यासावत्रिः”=जिसके आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक तीनों प्रकार के दुःखों की निवृत्ति हो गई हो, उसको “अत्रि” कहते हैं। सो जैसे आप अत्रि की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार मेरी रक्षा करें॥२५॥जो किन्हीं विशेष विद्याओं में निपुण हैं, वे कण्व, जो सदा प्रेम से यज्ञ करते हैं, वे प्रियमेध, जो माता-पिता और भ्राता, इन तीनों से रहित हैं, वे अत्रि, इनकी और एतत्समान अन्यान्य जनों की राजा सदा रक्षा करे॥२५॥

यथो॒त कृत्व्ये॒ धनें॒ऽशुं गोष्व॒गस्त्य॑म्। यथा॒ वाजे॑षु॒ सोभ॑रिम्॥

“धर्मादन्यत्र न गच्छन्तीत्यगस्तयः, तेषु साधुस्तं सदाचारिणम्”=जो धर्ममार्ग से अन्यत्र न जाए, उसको “अगस्ति” और अगस्ति में जो साधु है, उसको “अगस्त्य” कहते हैं। यहाँ “तत्र साधुः” इस पाणिनि-सूत्र से “यत्” प्रत्यय होता है, जिसके अर्थ सदाचारी के हैं अर्थात् जैसे अर्थवेत्ता, सदाचारी तथा महर्षि की आपने रक्षा की वा करते हैं, उसी प्रकार आप हमारी भी रक्षा करें, यह याज्ञिक पुरुषों की ओर से प्रार्थना है, “सोभरि” शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है कि “सु=सम्यक् हरत्यज्ञानमिति सोभरिः”=जो भले प्रकार अज्ञान का नाश करे, उसको “सोभरि” कहते हैं। यहाँ “हृग्रहोर्भश्छन्दसि” इस पाणिनि-सूत्र से “ह” को “भ” हो गया है॥२६॥कृषिबुद्धि के लिये भूभागों को, पश्वादिकों के लिये वनों को और विज्ञानादिकों के लिये विविधकलाओं को राजा बढ़ावे॥२६॥

ए॒ताव॑द्वां वृषण्वसू॒ अतो॑ वा॒ भूयो॑ अश्विना। गृ॒णन्तः॑ सु॒म्नमी॑महे॥

हे सुखराशि तथा सुख के देनेवाले ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन्! हम लोग आपकी सब प्रकार से अधिकाधिक स्तुति करते हुए आपसे वारंवार याचना करते हैं कि कृपा करके सब प्रकार के कष्टों से बचाकर हमको सुख प्रदान करें॥२७॥लौकिक और पारलौकिक दोनों धनों की वृद्धि के लिये राजा प्रयत्न करे॥२७॥

रथं॒ हिर॑ण्यवन्धुरं॒ हिर॑ण्याभीशुमश्विना। आ हि स्थाथो॑ दिवि॒स्पृश॑म्॥

हे व्यापकशक्तिशील! आप निश्चय करके यान द्वारा आकाश में विचरनेवाले हैं, जो यान ऊपर-नीचे सुवर्णमय शृङ्खलाओं से बँधा हुआ है॥२८॥प्रजाओं की रक्षा के लिये राजा सदा सन्नद्ध रहे॥२८॥

हि॒र॒ण्ययी॑ वां॒ रभि॑री॒षा अक्षो॑ हिर॒ण्ययः॑। उ॒भा च॒क्रा हि॑र॒ण्यया॑॥

हे ऐश्वर्य्यशालिन्! आपके रथ=यान का आधारदण्ड=धुरा सुवर्णमय, अक्ष=अग्रभाग सुवर्णमय और दोनों चक्र=पहिये सुवर्णमय हैं अर्थात् आपका सम्पूर्ण यान सुवर्ण का है॥२९॥प्रजाओं से नियुक्त राजा शोभन रथ आदि आयोजन पाने योग्य है॥२९॥

तेन॑ नो वाजिनीवसू परा॒वत॑श्चि॒दा ग॑तम्। उपे॒मां सु॑ष्टु॒तिं मम॑॥

हे बलसम्पन्न ऐश्वर्य्यशालिन्! आप कृपा करके उक्त सुवर्णमय रथ द्वारा देशान्तर से हमारे यज्ञ में सम्मिलित हों, हमारी इस प्रार्थना को अवश्य श्रवण करें॥३०॥सदा प्रजाओं की प्रार्थनाओं को राजा सुने॥३०॥

आ व॑हेथे परा॒कात्पू॒र्वीर॒श्नन्ता॑वश्विना। इषो॒ दासी॑रमर्त्या॥

हे अहिंसनशील=किसी को दुःख न देनेवाले ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन्! आप देश-देशान्तरों में स्थित धन को अर्थात् आपके पूर्वजों का धनरूप ऐश्वर्य्य, जो उनसे शत्रुओं ने हरण किया हुआ था, उसको आप उनसे प्राप्त कर स्वयं उपभोग करते हैं। यह आप जैसे शूरवीरों का ही प्रशंसनीय कार्य्य है। जिसका भाव यह है कि जो पुरुष अपने पूर्वजों की शत्रुगृह में गई हुई सम्पत्ति को पुनः प्राप्त करता है, वह प्रशंसा के योग्य होता है॥३१॥प्रजापीड़क चोरादिकों के धनों को छीनकर प्रजाओं में बाँट देवें॥३१॥

आ नो॑ द्यु॒म्नैरा श्रवो॑भि॒रा रा॒या या॑तमश्विना। पुरु॑श्चन्द्रा॒ नास॑त्या॥

हे आह्लादक तथा सत्यभाषणशील! आप दिव्य ज्ञानवाले, यशस्वी तथा विविध धनों के स्वामी हैं। आप कृपा करके अपने उक्त सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों सहित आवें और हमारे यज्ञ को सुशोभित करें॥३२॥देश में सर्वविध धनों को पैदा करवाने की चेष्टा राजा करे॥३२॥

एह वां॑ प्रुषि॒तप्स॑वो॒ वयो॑ वहन्तु प॒र्णिनः॑। अच्छा॑ स्वध्व॒रं जन॑म्॥

हे तेजस्वी वर्णवाले, ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन्! आप कृपा करके शीघ्रगामी अश्वों द्वारा हमारे हिंसारहित यज्ञ को शीघ्र ही प्राप्त हों और हमारी इस याचना को स्वीकार करें॥३३॥प्रजाओं में विचरण करता हुआ राजा महादरिद्र प्रजा से भी निरामय आदि कुशल की जिज्ञासा करे॥३३॥

रथं॑ वा॒मनु॑गायसं॒ य इ॒षा वर्त॑ते स॒ह। न च॒क्रम॒भि बा॑धते॥

हे ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन्! आपका जो शीघ्रगामी दृढ़ यान है, उसमें बैठे हुए आपको शत्रु की सेना कुछ भी बाधा नहीं कर सकती, क्योंकि आप बलपूर्ण हैं, इसलिये कृपा करके हमारे यज्ञ को आकर शीघ्र ही सुशोभित करें॥३४॥राजरथ विज्ञान के साहाय्य से रचित और सुदृढ़ हो॥३४॥

हि॒र॒ण्यये॑न॒ रथे॑न द्र॒वत्पा॑णिभि॒रश्वैः॑। धीज॑वना॒ नास॑त्या॥

हे सत्यप्रतिज्ञ ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन्! आप मन समान शीघ्रगामी सुवर्णमय रथ पर चढ़कर शीघ्र ही हमारे यज्ञ में सम्मिलित हों॥३५॥बहुधा राजा का रथ स्वर्णमय होना चाहिये॥३५॥

यु॒वं मृ॒गं जा॑गृ॒वांसं॒ स्वद॑थो वा वृषण्वसू। ता नः॑ पृङ्क्तमि॒षा र॒यिम्॥

हे ऐश्वर्य्यसम्पन्न ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन्! आप सचेतन=युद्ध के लिये सन्नद्ध शत्रु से ही युद्ध करके विजय प्राप्त करते हैं, अचेतन पर नहीं। सो हे सम्पूर्ण बलवालों में श्रेष्ठ! आप ऐश्वर्य्यप्रदान द्वारा हमारी इष्टकामनाओं को पूर्ण करें॥३६॥चोर आदि दुष्टों को विनष्ट करता हुआ राजा प्रजाओं के धनों की वृद्धि करे॥३६॥

ता मे॑ अश्विना सनी॒नां वि॒द्यातं॒ नवा॑नाम्। यथा॑ चिच्चै॒द्यः क॒शुः श॒तमुष्ट्रा॑नां॒ दद॑त्स॒हस्रा॒ दश॒ गोना॑म्॥

इस मन्त्र में यजमान की ओर से कथन है कि हे ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन्! आप उत्तमोत्तम नूतन पदार्थ मेरे लिये ज्ञात करें=जानें अर्थात् प्रदान करें। हे सबके शासक प्रभो! आप मुझको सौ ऊँट और दश सहस्र गौओं का दान दें, जिससे मेरा यज्ञ सर्वाङ्गपूर्ण हो॥३७॥विद्यादि गुणसम्पन्न विवेकी पुरुष बहुत धनसंचय कर सकते हैं, अतः हे मनुष्यों! गुणों का उपार्जन करो, विद्या, उद्योग और व्यापारादिकों से जो कुछ प्राप्त हो, उसकी वार्ता राजा के निकट पहुँचा देवे, ताकि राजा को चोरी आदि का सन्देह न हो॥३७॥

यो मे॒ हिर॑ण्यसंदृशो॒ दश॒ राज्ञो॒ अमं॑हत। अ॒ध॒स्प॒दा इच्चै॒द्यस्य॑ कृ॒ष्टय॑श्चर्म॒म्ना अ॒भितो॒ जनाः॑॥

हे शत्रुओं को तपानेवाले, हे भटमानी योद्धाओं पर विजय प्राप्त करनेवाले ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन्! आप तेजस्वी दश राजा मुझको दें अर्थात् दश राजाओं का मुझको शासक बनावें, जिससे मैं ऐश्वर्य्यसम्पन्न होकर अपने यज्ञ को पूर्ण करूँ, यह यजमान की ओर से उक्ति है॥३८॥विवेक के उत्पन्न होने से इन्द्रियों का इन्द्रियत्व प्रतीत होता है। हे मनुष्यों! विवेक के ही अधीन सब जन हैं, उसी की उपासना करो॥३८॥

माकि॑रे॒ना प॒था गा॒द्येने॒मे यन्ति॑ चे॒दयः॑। अ॒न्यो नेत्सू॒रिरोह॑ते भूरि॒दाव॑त्तरो॒ जनः॑॥

हे ज्ञानयोगिन् तथा कर्मयोगिन्! आप मुझको शुभमार्ग प्राप्त कराएँ, जो मेरे लिये कल्याणकारी हो अर्थात् ज्ञानी जनों का जो मार्ग है, वह मार्ग मुझे प्राप्त हो, जिसको दानशील परोपकारी तथा भौतिकसम्पत्तिशील पुरुष प्राप्त नहीं कर सकते॥३९॥यह पाँचवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥निश्चय विवेकी सन्मार्गगामी होते हैं। वे परोपकार में निज सम्पूर्ण वस्तु लगाते हैं, अतः विवेकी होना चाहिये, यह शिक्षा इससे देते हैं॥३९॥

सूक्तम्

म॒हाँ इन्द्रो॒ य ओज॑सा प॒र्जन्यो॑ वृष्टि॒माँ इ॑व। स्तोमै॑र्व॒त्सस्य॑ वावृधे॥

इस मन्त्र में परमात्मा की स्तुति वर्णन की गई है कि वह महत्त्वविशिष्ट परमात्मा अपने पराक्रम=अपनी शक्ति से ही पूज्य=प्रतिष्ठा योग्य है, उसको किसी अन्य के साहाय्य की आवश्यकता नहीं। जिस प्रकार वृष्टि से पूर्ण मेघ फलप्रद होता है, इसी प्रकार वह पूर्ण परमात्मा भी सबको फल देनेवाला है और वह वत्स=पुत्रसमान उपासकों के स्तोत्र=स्तुति योग्य वाक्यों से वृद्धि को प्राप्त होता अर्थात् प्रचार द्वारा अनेक पुरुषों में प्रतिष्ठित होता है, इसलिये उचित है कि हम लोग श्रद्धा भक्ति से नित्यप्रति उस परमपिता परमात्मा की उपासना में प्रवृत्त रहें, ताकि अन्य परमात्मविमुख पुरुष भी हमारा अनुकरण करते हुए श्रद्धासम्पन्न हों॥१॥हे मनुष्यों! भगवान् का महत्त्व सृष्टिविद्या के अध्ययन से जानो। जो ये जगत् के धारक, पोषक, सुखप्रापक मेघ, वायु, वह्नि और सूर्य्य प्रभृति हैं, वे भी उसी से उत्पन्न, वर्धित और नियोजित हैं, ऐसी श्रद्धा करो॥१॥

प्र॒जामृ॒तस्य॒ पिप्र॑तः॒ प्र यद्भर॑न्त॒ वह्न॑यः। विप्रा॑ ऋ॒तस्य॒ वाह॑सा॥

जब वह्निसदृश=तेजस्वी विद्वान् हृदय में धारण करते हुए अपने उपदेशों द्वारा उस सत्य के स्रोत=उत्पत्तिस्थान परमात्मा को लोक-लोकान्तरों में प्रकाशित करते हैं, तब स्तोता लोग उसके माहात्म्य को जानकर परमात्मोपासन में प्रवृत्त होते और उसके सत्यादि गुणों को धारण कर अपने जीवन को उच्च बनाते हैं, इसलिये प्रत्येक पुरुष को उचित है कि विद्वानों द्वारा श्रवण किये हुए परमात्मा के गुणों को धारण कर अपने जीवन को पवित्र बनावें॥२॥जिस सत्य नियम से सुबुद्ध होकर सूर्य्यादि सब देव जगत् को पुष्ट कर रहे हैं, उसी को जानकर मेधाविगण भी सदा परमात्म-गान में निरत होते हैं, यह जानना चाहिये॥२॥

कण्वा॒ इन्द्रं॒ यदक्र॑त॒ स्तोमै॑र्य॒ज्ञस्य॒ साध॑नम्। जा॒मि ब्रु॑वत॒ आयु॑धम्॥

जब विद्वान् पुरुष तप, अनुष्ठान और यज्ञों द्वारा परमात्मा के सत्यादि गुणों को धारण कर पवित्र जीवनवाले हो जाते हैं, तब परमात्मा उनको मनोवाञ्छित फल प्रदान करते हैं, फिर उनके लिये शस्त्रसमुदाय निष्प्रयोजन है अर्थात् जब परमात्मपरायण पुरुष की सब इष्टकामनाएँ वाणी द्वारा ही सिद्ध हो जाती हैं, तो शस्त्र व्यर्थ हैं, इसलिये इच्छित फल की कामनावाले पुरुष को परमात्मपरायण होना चाहिये॥३॥हे मनुष्यों! परमगुरु में विश्वास करो, उसकी उपासना के लिये अन्य साधनों का संचय मत करो। युद्ध में भी उसी को प्रधान आयुध मानो, क्योंकि ईश्वरोपासक जन वैसा ही करते हैं॥३॥

सम॑स्य म॒न्यवे॒ विशो॒ विश्वा॑ नमन्त कृ॒ष्टयः॑। स॒मु॒द्राये॑व॒ सिन्ध॑वः॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि जिस प्रकार नदियें स्वाभाविक ही समुद्र की ओर प्रवाहित होती हैं, इसी प्रकार परमात्मा के प्रभाव से प्रवाहित हुई सब प्रजाएँ उसकी ओर आकर्षित हो रही हैं, क्योंकि संतप्त प्रजाओं को शान्तिप्रदान करने का आधार एकमात्र परमात्मा ही है, अन्य नहीं॥४॥स्थावर और जंगम सब ही पदार्थ ईश्वरीय नियमों को विचलित नहीं कर सकते। तदधीन होकर निज-२ व्यापार करते हैं, यह जानना चाहिये॥४॥

ओज॒स्तद॑स्य तित्विष उ॒भे यत्स॒मव॑र्तयत्। इन्द्र॒श्चर्मे॑व॒ रोद॑सी॥

इस मन्त्र में परमात्मा को तेजस्वी कथन किया है कि वह अपने तेज प्रभाव से सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों में दीप्तिमान् हो रहा है, इसलिये सब प्रजाओं को उचित है कि उसके तेजस्वी भाव को धारण कर ब्रह्मचर्यादि व्रतों से अपने आपको तेजस्वी तथा बलवान् बनावें, क्योंकि बलसम्पन्न पुरुष ही मनुष्यजन्म के फलचतुष्टय को प्राप्त होते हैं॥५॥कार्य से कर्त्ता का ज्ञान होता है, यह सबको प्रत्यक्ष है। जब परमात्मा ने इस सृष्टि का विकाश किया, तब विद्वानों के समीप इसकी महती शक्ति विदित होने लगी। सृष्टि का अद्भुत कौशल देखकर सब ही मोहित हो जाते हैं, ऐसा भगवान् भूतभावन है॥५॥

वि चि॑द्वृ॒त्रस्य॒ दोध॑तो॒ वज्रे॑ण श॒तप॑र्वणा। शिरो॑ बिभेद वृ॒ष्णिना॑॥

वह परमपिता परमात्मा अज्ञान का नाशक और ज्ञान का प्रसारक है अर्थात् वह सर्वरक्षक परमात्मा विद्यारूप शक्ति से अविद्यारूप अज्ञान का नाश करके पुरुषों को सुखप्रद होता है, इसलिये उचित है कि सुख की कामनावाला पुरुष निरन्तर विद्या में रत रहे, ताकि विद्यावृद्धि द्वारा ज्ञान का प्रकाश होकर अज्ञान का नाश हो॥६॥हे मनुष्यों! यदि आप इन्द्र की सुमति आज्ञा में रहेंगे, तब आपके सर्व विघ्नों का वह विनाश कर देगा, अतः उसकी आज्ञा का पालन करते हुए उसकी सेवा करो॥६॥

इ॒मा अ॒भि प्र णो॑नुमो वि॒पामग्रे॑षु धी॒तयः॑। अ॒ग्नेः शो॒चिर्न दि॒द्युतः॑॥

हम लोग दीप्तिवाली=तेजस्वी गुणोंवाली अर्थात् तेजस्वी बनानेवाली ऋचाओं को विद्वानों के सन्मुख पुनः-पुनः उच्चारण करते हैं, जिस से कि वह हमारी न्यूनता को पूर्ण करें, ताकि हम लोग तेजस्वीभाव को भले प्रकार धारण करनेवाले हों॥७॥जो कुछ लौकिक वा वैदिक कर्म हम करें, वह सब प्रथम विद्वानों के निकट निवेदनीय है, क्योंकि यदि उसमें कोई न्यूनता हो, तो विद्वानों के द्वारा शोधित होकर फल देने में समर्थ होती है। इससे अभिमान त्यागना चाहिये, यह भी शिक्षा होती है॥७॥

गुहा॑ स॒तीरुप॒ त्मना॒ प्र यच्छोच॑न्त धी॒तयः॑। कण्वा॑ ऋ॒तस्य॒ धार॑या॥

जो कर्म हमारी हृदयरूप गुहा में विद्यमान हैं अर्थात् जो प्रारब्ध कर्म हैं, उन सबको परमात्मा भले प्रकार जानते हैं, क्योंकि परमात्मा मनुष्य के बाहर-भीतर सर्वत्र विराजमान हैं, इसलिये विद्वान् पुरुष सदैव सत्य के आश्रित होकर कर्म करते हैं, ताकि वह शुभ फल के भागी हों, अतएव शुभफल की कामनावाले प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह परमात्मा का महत्त्व जानते हुए प्रत्येक कर्म सत्य के आश्रित होकर करें, ताकि उनको उत्तम फल की प्राप्ति हो॥८॥सर्व विद्याएँ, सर्व विचार, सर्व धार्मिक, सामाजिक और राज्य सम्बन्धी नियम विद्वानों के हृदय से निकलते हैं। पण्डितगण उन-२ विचारों की वारंवार परीक्षा और चिन्तन करते हैं। दूसरों के समीप कहते हैं। उन्हें बहुत तरह से विचारकर कार्य में लगाते हैं। वैसे ही अन्य जन भी करें। यह शिक्षा इससे देते हैं॥८॥

प्र तमि॑न्द्र नशीमहि र॒यिं गोम॑न्तम॒श्विन॑म्। प्र ब्रह्म॑ पू॒र्वचि॑त्तये॥

हे परमपिता परमात्मन्! आप ऐसी कृपा करें कि हम अपने कल्याणार्थ उत्तमोत्तम धन लाभ करें और अनादि ज्ञान का भण्डार जो वेद है, वह हमको प्राप्त हो, जिसके आश्रित कर्मों का अनुष्ठान करते हुए ऐश्वर्य्य प्राप्त करने के अधिकारी बनें, यह हमारी प्रार्थना है॥९॥हे मनुष्यों! गौ और अश्व आदि धन पाकर निज और दूसरों का उपकार करें, यह इसका आशय है॥९॥

अ॒हमिद्धि पि॒तुष्परि॑ मे॒धामृ॒तस्य॑ ज॒ग्रभ॑। अ॒हं सूर्य॑ इवाजनि॥

इस मन्त्र में उपासक की ओर से यह कथन है कि मैं सत्यस्वरूप, सबके पालक परमात्मा के ज्ञान को उपलब्ध कर सूर्य्य के समान तेजस्वी हो गया। जो अन्य भी उसके ज्ञान की प्राप्ति तथा आज्ञा पालन करते हैं, वे भी तेजस्वी तथा ओजस्वी जीवनवाले होकर आनन्दोपभोग करते हैं॥१०॥सर्वकार्य में ईश्वर की कृपा प्रार्थनीय है। उसी के अनुग्रह से विद्वान् सत्य के नियमों को जानते हैं, सो जो कोई वैसी विद्या से और सुमति से भूषित होता है, वही सूर्यवत् अज्ञानान्धकार को विध्वस्त करके ज्ञानज्योति फैलाता है॥१०॥

अ॒हं प्र॒त्नेन॒ मन्म॑ना॒ गिरः॑ शुम्भामि कण्व॒वत्। येनेन्द्रः॒ शुष्म॒मिद्द॒धे॥

मैं परमात्मज्ञान से सत्याश्रित होकर महर्षिसदृश परमात्मवाणियों का अभ्यास करता हुआ उसकी कृपा से बल को धारण करता हूँ। जो अन्य भी वेदवाणियों से अंलकृत होते हैं, वे तेजस्वी जीवनवाले होकर आनन्दित होते हैं॥११॥जैसे पुरातन ऋषि और विद्वान् ईश्वर की आज्ञा के अनुसरण से और लोकहित करने से वाणी, मन और शरीर पवित्र किया करते थे, वैसे ही आप आधुनिक जन भी उनके पथ पर चलिये। इसी से भगवान् प्रसन्न होगा॥११॥

ये त्वामि॑न्द्र॒ न तु॑ष्टु॒वुॠष॑यो॒ ये च॑ तुष्टु॒वुः। ममेद्व॑र्धस्व॒ सुष्टु॑तः॥

हे परमात्मदेव! हममें से जो महर्षि आपकी उपासना में सदैव तत्पर रहते और जो नहीं करते हैं, उन दोनों को समान फल प्राप्त कराएँ, क्योंकि वे दोनों ही तप, अनुष्ठान और सम्यक् स्तुतियों से अधिकार प्राप्त कर चुके हैं॥१२॥आस्तिक और नास्तिक दोनों प्रकार के लोग सदा से चले आते हैं। जो जन श्रद्धालु और विश्वासी हैं, वे अन्तःकरण को ईश्वर में लगाकर शान्तचित्त से ऐसी प्रार्थना करें कि उससे परमात्मा प्रसन्न होकर जगत् का अभ्युदय करे॥१२॥

यद॑स्य म॒न्युरध्व॑नी॒द्वि वृ॒त्रं प॑र्व॒शो रु॒जन्। अ॒पः स॑मु॒द्रमैर॑यत्॥

जब उपासक उपासनाओं द्वारा शुद्ध हो जाता है अर्थात् उसके मल-विक्षेपादि निवृत्त हो जाते हैं, तब परमात्मा उसमें अज्ञान की निवृत्ति द्वारा ज्ञान का प्रादुर्भाव करते हैं अर्थात् उपासक तपश्चर्या के प्रभाव से ज्ञान प्राप्त कर सुखोपभोग करता है, अतएव सुख की कामनावाले पुरुषों को उचित है कि वे अज्ञान की निवृत्तिपूर्वक ज्ञान की वृद्धि करने में सदा तत्पर रहें॥१३॥यह जगत् महा महाऽद्भुत है। इसका तत्त्व सुस्पष्ट नहीं, तथापि सर्वदा इसकी जिज्ञासा करनी चाहिये। तत्त्ववित् पण्डितों को जल पृथिवी आदिकों के होने के कारण प्रतीत होते हैं, अतः हे मनुष्यों! सृष्टि का अध्ययन करो॥१३॥

नि शुष्ण॑ इन्द्र धर्ण॒सिं वज्रं॑ जघन्थ॒ दस्य॑वि। वृषा॒ ह्यु॑ग्र शृण्वि॒षे॥

जो पुरुष परमात्मोपासन से विमुख दस्यु जीवनवाले हैं, वे परमात्मा के दिये हुए दुःखरूप वज्र से निश्चय नाश को प्राप्त होते हैं, क्योंकि अशुभ कर्मों का फल दुःख और शुभ कर्मों का फल सुख नियम के अनुसार सदैव परमात्मा देते हैं, इसलिये पुरुष को दस्युजीवन के त्यागपूर्वक सदा वेदविहित कर्मों का अनुष्ठान करना चाहिये॥१४॥परमात्मा में विश्वास करके उसका ध्यान करो। तुम्हारे सर्व विघ्नों को हरण कर लेगा, वह निश्चय मेघवत् सुखों का वर्षा करनेवाला है, यह जानना चाहिये॥१४॥

न द्याव॒ इन्द्र॒मोज॑सा॒ नान्तरि॑क्षाणि व॒ज्रिण॑म्। न वि॑व्यचन्त॒ भूम॑यः॥

उस वज्रशक्तिसम्पन्न परमात्मा को कोई भी अतिक्रमण नहीं कर सकता और न उसको कोई विचलित कर सकता है। वह सब राजाओं का महाराजा, सब दिव्यशक्तियों का चालक, सब लोक-लोकान्तरों का ईशिता, सबको प्राणनशक्ति देनेवाला और सम्पूर्ण धन-धान्य तथा ऐश्वर्य्यों का स्वामी है, उसकी आज्ञा का पालन करना ही जीवन और उससे विमुख होना मृत्यु है॥१५॥जो इन्द्र जिस द्युलोक, अन्तरिक्ष और भूमि को उत्पन्न करता और पालता है, वे उसको अपने वश में कैसे कर सकते हैं। वह सबसे अधिक बलिष्ठ और ओजस्वितम है॥१५॥

यस्त॑ इन्द्र म॒हीर॒पः स्त॑भू॒यमा॑न॒ आश॑यत्। नि तं पद्या॑सु शिश्नथः॥

जो पुरुष परमात्मा के न्याययुक्त मार्ग का अतिक्रमण करके चलता है, वह अवश्य दुःख को प्राप्त होता है, इसलिये सुख की कामनावाले पुरुषों का कर्तव्य है कि उसके वेदविहित न्याययुक्तमार्ग से कभी विचलित न हों॥१६॥जल सर्व प्राणियों का जीवन है, उसके अभाव से सब स्थावर और जङ्गम सूख जाते हैं, अतः उसके लिये वारंवार प्रार्थना की जाती है॥१६॥

य इ॒मे रोद॑सी म॒ही स॑मी॒ची स॒मज॑ग्रभीत्। तमो॑भिरिन्द्र॒ तं गु॑हः॥

इस मन्त्र में परमात्मा का महत्त्व वर्णन किया गया है कि हे परमात्मन्! सत्त्व, रज तथा तम का समूह जो प्रकृति, उसका कार्य्य जो यह पृथिवी और द्युलोक तथा अन्य लोक-लोकान्तरों को आप अपनी बन्धनरूप शक्ति से परस्पर एक दूसरे को थामे हुए हैं, जिससे आपकी अचिन्त्यशक्ति का बोध होता है। फिर इन सबको प्रलयकाल में सूक्ष्मांशों से गूढ़ रखते हैं अर्थात् ये सब ब्रह्माण्डादि कार्य्यजात सूक्ष्मावस्था में आप ही के आश्रित रहते हैं, यह आपकी महान् महिमा है॥१७॥हे मनुष्यों! संसार में नाना विघ्नों और विविध दुःखों को देखकर भी उनके निवारण के लिये सर्व क्लेशहर ईश्वर का आश्रय क्यों न लेते॥१७॥

य इ॑न्द्र॒ यत॑यस्त्वा॒ भृग॑वो॒ ये च॑ तुष्टु॒वुः। ममेदु॑ग्र श्रुधी॒ हव॑म्॥

हे सर्वरक्षक तथा सर्वपालक परमात्मन्! चित्तवृत्तिनिरोध तथा अज्ञान के नाशक विद्वज्जन आपकी उपासना तथा स्तुति करने में सदैव तत्पर रहते हैं, जिससे आप उनको उन्नत करते हैं। हे परमेश्वर! मुझ जिज्ञासु की प्रार्थना भी स्वीकार करें अर्थात् मुझको शक्ति दें कि मैं भी आपकी उपासना में सदैव प्रवृत्त रहकर अपना जीवन सफल करूँ॥१८॥स्व-स्व भाषा द्वारा सब कोई परमदेवता की प्रार्थना करें। यतिगण मन को रोककर स्तुति करते हैं। तपस्वी स्वतप से उसकी विभूति को प्रकाशित करते हैं। विद्वान् उसकी कीर्ति गाते हैं। इसी प्रकार इतरजन भी स्व-स्व भाषा से उसको गावें॥१८॥

इ॒मास्त॑ इन्द्र॒ पृश्न॑यो घृ॒तं दु॑हत आ॒शिर॑म्। ए॒नामृ॒तस्य॑ पि॒प्युषीः॑॥

हे सर्वरक्षक प्रभो! आपसे उत्पादित सूर्य्यरश्मि इस पृथिवी में स्थित जल को अपनी आकर्षणशक्ति से ऊपर ले जाती, पुनः मेघमण्डल बनकर वर्षा होती और वर्षा से अन्न तथा अन्न से प्राणियों की रक्षा होती है॥१९॥यह ईश्वरीय सृष्टि बहुत ही सुखमयी है। कैसे-२ पदार्थ यहाँ सुख प्रकट कर रहे हैं। गौ का दूध कैसा एक उत्तम पदार्थ है। वह अपने बच्चे को पिलाकर पुनः मनुष्य को दूध देती है, परन्तु दुग्धवत् इस पृथिवी पर सहस्रशः पदार्थ हैं। आम्र कैसा स्वादु, नारिकेल कैसा पोषक वस्तु, इक्षु एक अद्भुत पदार्थ है। गोधूम और धान्य आदि सब ही ईश्वर की परम महिमा दिखलाते हैं॥१९॥

या इ॑न्द्र प्र॒स्व॑स्त्वा॒सा गर्भ॒मच॑क्रिरन्। परि॒ धर्मे॑व॒ सूर्य॑म्॥

हे परमेश्वर! जलों की उत्पादक सूर्य्यरश्मि, जो आपकी शक्ति के अश्रित हैं, वे ग्रीष्मऋतु में जलपरमाणुओं को खींचकर मेघमण्डल में एकत्रित करतीं और फिर वे ही जलपरमाणु वर्षाऋतु में मेघ बनकर बरसते और पृथिवी को धनरूपा बनाते हैं॥२०॥हे मनुष्यों! सकल जगत् का जीवन उसको जान उसी की उपासना से अपने आत्मा को पवित्र बनाओ॥२०॥

त्वामिच्छ॑वसस्पते॒ कण्वा॑ उ॒क्थेन॑ वावृधुः। त्वां सु॒तास॒ इन्द॑वः॥

हे सम्पूर्ण बलों के स्वामी परमेश्वर! विद्वान् लोग वेदवाक्यों द्वारा आप ही की स्तुति करते और ऐश्वर्य्यसम्पन्न पुरुष आप ही की महिमा का वर्णन करते हैं, क्योंकि आप पूर्णकाम हैं॥२१॥हे मनुष्यों! यह सम्पूर्ण जगत् निज कर्ता की कीर्ति को उजियाला कर रहा है। इसको अन्तर्दृष्टि से देखो॥२१॥

तवेदि॑न्द्र॒ प्रणी॑तिषू॒त प्रश॑स्तिरद्रिवः। य॒ज्ञो वि॑तन्त॒साय्यः॑॥

हे परमेश्वर! नीतिज्ञों में आप प्रशंसित नीतिमान् हैं, आपकी प्रसन्नतार्थ ही बड़े-बड़े यज्ञ किये जाते हैं। सो हे प्रभु! आप हमें सम्पन्न करें, ताकि हम यज्ञों द्वारा आपकी उपासना करें, क्योंकि एकमात्र आप ही हमारे स्वामी और पूज्य हैं॥२२॥इन्द्र की उत्तम नीति को देख उससे मोहित हो मेधाविगण उसकी प्रशंसा करते और उसको दिखलाने के लिये विविध याग करते हैं॥२२॥

आ न॑ इन्द्र म॒हीमिषं॒ पुरं॒ न द॑र्षि॒ गोम॑तीम्। उ॒त प्र॒जां सु॒वीर्य॑म्॥

हे परमेश्वर! हम लोग यज्ञों द्वारा आपका स्तवन करते हैं। आप कृपा करके बड़े नागरिक पुरुष के समान हमें ऐश्वर्य्यसम्पन्न करें, सुन्दर सन्तान दें और हमें बलवान् बनावें, ताकि हम अपने अभीष्ट कार्य्यों की सिद्धि करते हुए आपका विस्तार करें॥२३॥गोधूम, यवादि अन्नों और गवादि पशुओं के विना मनुष्य जीवनयात्रा नहीं कर सकते, अतः उन वस्तुओं के लिये भूयो भूयः प्रार्थना होती है, यह आशय है॥२३॥

उ॒त त्यदा॒श्वश्व्यं॒ यदि॑न्द्र॒ नाहु॑षी॒ष्वा। अग्रे॑ वि॒क्षु प्र॒दीद॑यत्॥

हे सम्पूर्णं बलों के स्वामी परमेश्वर! आप हमें शीघ्रगामी अश्वों सहित बल प्रदान करें, जो बल प्रजारक्षण के लिये पर्याप्त हो अर्थात् जो बल सभ्य प्रजाओं को सुख देनेवाला और अन्यायकरियों का नाशक हो, वह बल हमें दीजिये॥२४॥जो-जो धन मनुष्यों में प्राप्त हो सके, उन-२ सब धनों को इधर-उधर से संग्रह करना उचित है, यह शिक्षा इससे देते हैं॥२४॥

अ॒भि व्र॒जं न त॑त्निषे॒ सूर॑ उपा॒कच॑क्षसम्। यदि॑न्द्र मृ॒ळया॑सि नः॥

हे सबके पालक परमेश्वर! आप हमारे समीपस्थ प्रदेशों को समृद्धशाली तथा उन्नत करें, जिससे हम लोग सुख-सम्पन्न होकर सदा वैदिक कर्मानुष्ठान में प्रवृत्त रहें॥२५॥परमात्मा हमारा पिता है, हमारे सुचरित को देखकर प्रसन्न होता, अभीष्ट फल देता, लोक में यशस्वी बनाता है। अतः हे मनुष्यों! उसी को प्रसन्न करने के लिये यत्न करो॥२५॥

यद॒ङ्ग त॑विषी॒यस॒ इन्द्र॑ प्र॒राज॑सि क्षि॒तीः। म॒हाँ अ॑पा॒र ओज॑सा॥

इन्द्र=हे सर्वैश्वर्य्यसम्पन्न परमेश्वर! आप सेनापति के समान हमारी सब ओर से रक्षा करते और प्रजा के समान हम पर शासन करते हैं, इसलिये आपका महान् पराक्रम तथा अपार शक्ति है। सो हे प्रभो! कृपा करो कि हम लोग आपके शासन में रहकर आपकी आज्ञा का पालन करते हुए उन्नत हों॥२६॥हे मेधाविगण! ईश्वर की महिमा देखो। उसका न तो आदि न अन्त और मध्य है, वह सबसे महान् है। अतः सबका शासन करता और सबका राजा है, अतः उसी की सेवा करो॥२६॥

तं त्वा॑ ह॒विष्म॑ती॒र्विश॒ उप॑ ब्रुवत ऊ॒तये॑। उ॒रु॒ज्रय॑स॒मिन्दु॑भिः॥

हे सर्वरक्षक तथा सब प्रजाओं के स्वामी परमात्मन्! आप हमारी सब ओर से रक्षा करें, हम सब प्रजाजन दिव्य पदार्थों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं। हे प्रभो! हमें शक्ति दें कि हम निरन्तर वेदविहित मार्ग में चलकर अपना जीवन सफल करें॥२७॥जिसके ऐश्वर्य्य से ये पृथिव्यादि लोक हैं, जिसके चलाने से ये चलते हैं, उसी को विद्वान् पूजते हैं। तुम भी उसी की स्तुति करो, यह शिक्षा इससे देते हैं॥२७॥

उ॒प॒ह्व॒रे गि॑री॒णां सं॑ग॒थे च॑ न॒दीना॑म्। धि॒या विप्रो॑ अजायत॥

वह पूर्ण परमात्मा, जो इस ब्रह्माण्ड के रोम-रोम में व्यापक हो रहा है, वह सबको नियम में रखनेवाला और स्वकर्मानुसार सबका फलप्रदाता है। उसका ज्ञान सदा एकरस रहने के कारण कभी मिथ्या नहीं होता और वह अपने ज्ञान से ही सर्वत्र विद्यमान है॥२८॥जो कोई निर्जन स्थान प्राप्तकर ईश्वरीय विभूतियों के तत्त्वों की चिन्ता करता है, वह अवश्य उसको पाता है और वह धीरे-२ मेधावी होता है। सब मनुष्यों को उचित है कि तत्त्वों की जिज्ञासा करें॥२८॥

अतः॑ समु॒द्रमु॒द्वत॑श्चिकि॒त्वाँ अव॑ पश्यति। यतो॑ विपा॒न एज॑ति॥

वह चेतनस्वरूप परमात्मा अपनी व्यापकता से ऊर्ध्व, अन्तरिक्ष तथा अधोभाग में स्थित सबको अपनी चेष्टारूप शक्ति से देखता, सब लोक-लोकान्तरों को नियम में रखता और सबको यथाभाग सब पदार्थों का विभाग करता है॥२९॥हे मनुष्यों! जो सर्वज्ञ और सर्वप्रेरक है, उसी को गाओ॥२९॥

आदित्प्र॒त्नस्य॒ रेत॑सो॒ ज्योति॑ष्पश्यन्ति वास॒रम्। प॒रो यदि॒ध्यते॑ दि॒वा॥

जो परमात्मा अन्तरिक्ष से भी ऊर्ध्व देश में अपनी व्यापकता से देदीप्यमान हो रहा है, उसको विद्वान् लोग प्राचीन, गतिशील, ज्योतिर्मय तथा सर्वत्र वासक=व्यापक देखते हुए उसी की उपासना में तत्पर रहते हैं॥३०॥जगत् का स्रष्टा परमात्मा कोई है, इसमें सन्देह नहीं। विद्वद्गण उसकी ज्योति को देखते हैं और हम लोगों से उसका उपदेश देते हैं॥३०॥

कण्वा॑स इन्द्र ते म॒तिं विश्वे॑ वर्धन्ति॒ पौंस्य॑म्। उ॒तो श॑विष्ठ॒ वृष्ण्य॑म्॥

उस अनन्त पराक्रमयुक्त परमात्मा के ज्ञान, प्रयत्न तथा कर्मों की सब विद्वान् लोग प्रशंसा करते हुए उनको बढ़ाते अर्थात् प्रशंसायुक्त वाणियों से उनका विस्तार करते हैं॥३१॥ईश्वर ने हम लोगों को बहुत से अद्भुत पदार्थ दिए हैं, जैसे इस शरीर में बुद्धि, विवेक और स्मरणशक्ति आदि और बाह्यजगत् में नाना खाद्य पेय आदि पदार्थ मेधावी उनको पाकर और अच्छे प्रकार बढ़ाकर महा महा धनी होते हैं, परन्तु मूढजन उनको पाकर दुःख भोगते हैं, यह आश्चर्य की बात है॥३१॥

इ॒मां म॑ इन्द्र सुष्टु॒तिं जु॒षस्व॒ प्र सु माम॑व। उ॒त प्र व॑र्धया म॒तिम्॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि हे परमेश्वर! कृपा करके मेरी सब ओर से रक्षा करें और मेरे ज्ञान को प्रतिदिन बढ़ावें, ताकि मैं आपकी उपासना में प्रवृत्त हुआ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करूँ। हे प्रभो! मेरी इस प्रार्थना को भले प्रकार सुनें॥३२॥सब वस्तु प्रथम ईश्वर को समर्पणीय है और सदा तत्त्वों के अभ्यास से बुद्धि तीक्ष्ण कर्तव्य है, यह इसका आशय है॥३२॥

उ॒त ब्र॑ह्म॒ण्या व॒यं तुभ्यं॑ प्रवृद्ध वज्रिवः। विप्रा॑ अतक्ष्म जी॒वसे॑॥

हे वज्रशक्तिसम्पन्न परमात्मन्! आप सबसे प्राचीन और सबको यथायोग्य कर्मों में प्रवृत्त करानेवाले हैं। हे प्रभो! विद्वान् लोग अपने जीवन को उच्च बनाने के लिये वैदिक कर्मों में निरन्तर रत रहते हैं, जिससे लोक में चहुँ दिक् आपका विस्तार हो॥३३॥जो मेधाविगण ईश्वर की विभूतियों के तत्त्व को जानते हैं, वे उसकी महिमा के गाने के विना कैसे जी सकते हैं, हे मनुष्यों! तुम सब भी उसकी महिमा को जानकर सदा गाओ॥३३॥

अ॒भि कण्वा॑ अनूष॒तापो॒ न प्र॒वता॑ य॒तीः। इन्द्रं॒ वन॑न्वती म॒तिः॥

जब विद्वान् लोग परमात्मा की सम्यक् प्रकार से स्तुति करते हैं, तब वह स्तुति निम्न स्थान में स्वाभाविक जलप्रवाह की भाँति परमात्मा को प्राप्त होती है और वह स्तुतिकर्त्ता को फलप्रद होती है। यहाँ निदिध्यासन के अभिप्राय से “वहना” लिखा है, वास्तव में स्तुति में क्रियारूप गति नहीं॥३४॥जैसे विद्वान् आचरण करते हैं, वैसे ही इतर जन भी करें, यह शिक्षा इससे देते हैं॥३४॥

इन्द्र॑मु॒क्थानि॑ वावृधुः समु॒द्रमि॑व॒ सिन्ध॑वः। अनु॑त्तमन्युम॒जर॑म्॥

इस मन्त्र का भाव स्पष्ट है कि जिस प्रकार नदियें समुद्र को प्राप्त होकर उसको महान् करती हैं, इसी प्रकार वेदवाणियें उस प्रभावशाली तथा अजर अमर अभयत्वादि गुणोंवाले परमात्मा को बढ़ाती हैं अर्थात् उसका यश विस्तृत करती हैं॥३५॥पवित्र और सत्यवचन वक्तव्य हैं, यह शिक्षा इससे देते हैं॥३५॥

आ नो॑ याहि परा॒वतो॒ हरि॑भ्यां हर्य॒ताभ्या॑म्। इ॒ममि॑न्द्र सु॒तं पि॑ब॥

हे सर्वरक्षक प्रभो! आप हमारे हृदय में विराजमान होकर हमारे संस्कृत हृदय को अनुभव करें अर्थात् हमारी न्यूनता को दूर करें, जिससे केवल एकमात्र आप ही का मान और ध्यान हमारे हृदय में हो॥३६॥हे मनुष्यों! सृष्टि के अध्ययन से ही ईश्वर का बोध होता है। जब मनुष्य उसकी विभूति को जानते हैं और उसकी आज्ञा में सदा रहते हैं, तब निश्चय उस पर वह प्रसन्न होता है॥३६॥

त्वामिद्वृ॑त्रहन्तम॒ जना॑सो वृ॒क्तब॑र्हिषः। हव॑न्ते॒ वाज॑सातये॥

हे अज्ञानान्धतम के निवारक प्रभो! भिन्न-भिन्न स्थानों में समाधिस्थ हुए उपासक लोग आपकी उपासना में प्रवृत्त हैं। कृपा करके आप उनको ऐश्वर्य्य प्रदान करें, ताकि वह आपका गुणगान करते हुए निरन्तर आप ही की उपासना में तत्पर रहें॥३७॥विद्वान् सर्वकार्यसिद्ध्यर्थ परमात्मा को ही पूजते हैं, परन्तु मूढ़ उन उन विधियों से अन्य जड़ देवों की अर्चना करते हैं, किन्तु उनसे काम न पाकर सदा वे क्लेश में रहते हैं, यह जानकर सब उसी को पूजें और गावें॥३७॥

अनु॑ त्वा॒ रोद॑सी उ॒भे च॒क्रं न व॒र्त्येत॑शम्। अनु॑ सुवा॒नास॒ इन्द॑वः॥

हे परमेश्वर! जिस प्रकार अश्व अपने चक्र में घूमता है, इसी प्रकार द्युलोक तथा पृथिवीलोकादि सब लोक-लोकान्तर आपके नियम में बँधे हुए अपनी परिधि में परिभ्रमण करते हैं और सम्पूर्ण पदार्थ, जो आप ही का अनुवर्तन करते हैं, हे प्रभो! वह कृपा करके हमें प्राप्त कराएँ, ताकि हम लोग आपके यशकीर्तन में सदा तत्पर रहें॥३८॥कैसा ईश्वर का महत्त्व है, हे तत्त्वविद् जनो! इसकी महिमा देखो, यह समस्त विविध सृष्टि ईश्वर की आज्ञा के अनुकूल चलती है। अतः इसी को गाओ॥३८॥

मन्द॑स्वा॒ सु स्व॑र्णर उ॒तेन्द्र॑ शर्य॒णाव॑ति। मत्स्वा॒ विव॑स्वतो म॒ती॥

हे परमेश्वर! अन्तरिक्ष के समीपवर्ती लोकलोकान्तरों में अपने उपासकों को सब प्रकार की अनुकूलता प्रदान करें और उनकी उपासना से आप प्रसन्न हों, ताकि उपासक सदैव अपना कल्याण ही देखें, यह प्रार्थना है॥३९॥शुद्ध आचरणों तथा व्यवहारों से परमात्मा को प्रसन्न करने की चेष्टा करो। क्षुद्रदृष्टि पुरुष जैसे मनुष्यों से डरते हैं, वैसे ईश्वर नहीं॥

वा॒वृ॒धा॒न उप॒ द्यवि॒ वृषा॑ व॒ज्र्य॑रोरवीत्। वृ॒त्र॒हा सो॑म॒पात॑मः॥

वह परमपिता परमात्मा, जो सर्वत्र विराजमान तथा सबसे बड़ा है, वही सबकी कामनाओं को पूर्ण करनेवाला, सर्वशक्तिसम्पन्न, अज्ञान का नाशक और जो सर्वत्र शब्दायमान हो रहा है, वही हमको वैदिकपथ पर चलानेवाला और शुभ मार्गों में प्रेरक है॥४०॥ईश का न्याय प्रकृति में सर्वत्र विकीर्ण है, उसको जानो। जानकर अबोधों को सिखलाओ और उसकी कृपा दिखलाओ॥४०॥

ऋषि॒र्हि पू॑र्व॒जा अस्येक॒ ईशा॑न॒ ओज॑सा। इन्द्र॑ चोष्कू॒यसे॒ वसु॑॥

हे सबके पालक तथा रक्षक प्रभो! आप सबसे प्रथम हैं, सूक्ष्मद्रष्टा और अपने अद्वितीय पराक्रम से सबका शासन कर रहे हैं और कर्मानुसार यथाभाग सबको धनादि ऐश्वर्य्य प्रदान करते हैं। कृपा करके उपासक की विशेषतया रक्षा करें, ताकि वह आपकी उपासना में निरन्तर तत्पर रहे॥४१॥सृष्टि की आदि में उसी ने मनुष्यों को वेदविद्या दी, अतः वह ऋषि और सर्वशासक होने से ईशान कहलाता है, निश्चय वही सर्वसुखप्रदाता है, अतः वही सेव्य है॥४१॥

अ॒स्माकं॑ त्वा सु॒ताँ उप॑ वी॒तपृ॑ष्ठा अ॒भि प्रयः॑। श॒तं व॑हन्तु॒ हर॑यः॥

हे यज्ञस्वरूप परमात्मन्! हमारा भाव तथा हव्य पदार्थ, जो आपके निमित्त यज्ञ में हुत किये जाते हैं, इत्यादि भाव आपको प्राप्त कराएँ अर्थात् ऐसी कृपा करें कि वैदिक कर्मों का अनुष्ठान हमारे लिये सुखप्रद हो॥४२॥जब हमारे इन्द्रिय शुद्ध, पवित्र और वशीभूत होते हैं, तब वे ईश के गुणों को प्रकाशित करने में समर्थ होते हैं, अतः प्रथम इन्द्रियों को वश में करो, यह शिक्षा इससे देते हैं॥४२॥

इ॒मां सु पू॒र्व्यां धियं॒ मधो॑र्घृ॒तस्य॑ पि॒प्युषी॑म्। कण्वा॑ उ॒क्थेन॑ वावृधुः॥

हे परमात्मन्! विद्वान् पुरुष अपनी मेधा को वेदवाक्यों द्वारा उन्नत करते हैं कि वह आपको प्राप्त करानेवाली हो अर्थात् हमारी बुद्धि सूक्ष्म हो कि जो सूक्ष्म से सूक्ष्म विषयों को अवगत करती हुई आपकी सूक्ष्मता को अनुभव करनेवाली हो॥४३॥बुद्धिवृद्धि के लिये प्राचीन और नवीन ग्रन्थों का अध्ययन, विद्वानों के साथ संवाद, अपने से मननादि व्यापार, विदेशादि गमन, प्राकृत पदार्थों का अभ्यास, इस प्रकार के अनेक उपाय कर्तव्य हैं॥४३॥

इन्द्र॒मिद्विम॑हीनां॒ मेधे॑ वृणीत॒ मर्त्यः॑। इन्द्रं॑ सनि॒ष्युरू॒तये॑॥

इस मन्त्र में यह उपदेश किया है कि पुरुष बड़े-बड़े यज्ञों में परमात्मा को ही वरण करें अर्थात् उसी के निमित्त यज्ञ करें और ऐश्वर्य्य की कामनावाला पुरुष उसी की उपासना में तत्पर रहे, वह अवश्य कृतकार्य्य होगा॥४४॥अज्ञानवश भी मनुष्य अन्य देवों की पूजा न करें, सबके आत्मा परमात्मा की ही उपासना करें, यह आज्ञा ईश्वर देता है॥४४॥

अ॒र्वाञ्चं॑ त्वा पुरुष्टुत प्रि॒यमे॑धस्तुता॒ हरी॑। सो॒म॒पेया॑य वक्षतः॥

हे अनेकानेक विद्वानों द्वारा स्तुत प्रभो! आप ऐसी कृपा करें कि हम विद्वानों की प्रशंसनीय शक्तियें आपको प्राप्त करानेवाली हों अर्थात् हमारा वेदाभ्यास तथा वैदिक कर्मों का अनुष्ठान हमारे लिये सुखप्रद हो, यह प्रार्थना है॥४५॥ईशरचित जो स्थावर जङ्गम द्विविध पदार्थ दीखते हैं, वे ही इन्द्र को प्रकाशित कर सकते हैं, वे विद्वान् ईश्वर के महत्त्व को जान शान्ति पाते हैं॥४५॥

श॒तम॒हं ति॒रिन्दि॑रे स॒हस्रं॒ पर्शा॒वा द॑दे। राधां॑सि॒ याद्वा॑नाम्॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि कर्मानुसार यथाभाग सबको देनेवाला परमात्मा ज्ञानशील तथा परोपकारी पुरुषों को सैकड़ों तथा सहस्रों प्रकार के पदार्थ प्रदान करता है॥४६॥मनुष्य जो कुछ पुरुषार्थ से प्राप्त करे, उसी से तुष्ट होकर सदा परमदेव की स्तुति करे। कदापि भी भाग्यनिन्दक अथवा ईश्वरोपालम्भक न होवे॥४६॥

त्रीणि॑ श॒तान्यर्व॑तां स॒हस्रा॒ दश॒ गोना॑म्। द॒दुष्प॒ज्राय॒ साम्ने॑॥

साङ्गोपाङ्ग सामवेद के ज्ञाता विद्वान् पुरुष को उपासक तीन सौ अश्व और दश सहस्र गौयें देते हैं अर्थात् परमात्मपरायण पुरुष, जिसको परमात्मा ऐश्वर्य्यशाली करता है, वह सामवेद के ज्ञाता को उक्त दान देकर प्रसन्न करता है, ताकि अन्य पुरुष उत्साहसम्पन्न होकर वेदों का अध्ययन करते हुए परमात्मपरायण हों॥४७॥जिस हेतु मैं उद्योगी और सामवित् हूँ, अतः सामगान और उसकी आज्ञापालन से ईश्वर की कृपा पाकर इस लोक में बहुत धन प्राप्त करता हूँ। हे मनुष्यों! तुम भी उसकी आज्ञा पर चलो और उद्योगी बनो, तो संसार में परम सुखी रहोगे॥४७॥

उदा॑नट् ककु॒हो दिव॒मुष्ट्रा॑ञ्चतु॒र्युजो॒ दद॑त्। श्रव॑सा॒ याद्वं॒ जन॑म्॥

अभ्युदयप्रवृद्ध=ऐश्वर्य्यसम्पन्न उपासक विविध विद्याओं से युक्त वेदों के ज्ञाता पुरुष को सुवर्ण से लदे हुए चार ऊँट तथा उनकी रक्षार्थ जनसमुदाय देता हुआ अतुल कीर्ति को प्राप्त होता और दूसरों को वेदाध्ययन के लिये उत्साहित करता है॥४८॥यह छठा सूक्त और सत्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥जो सर्वज्ञ, परमधनाढ्य और सर्ववित् है, वही सर्व वस्तु दे सकता है, अतः हे मनुष्यों! सर्वगुणसम्पन्न ईश्वर को भजो, वह तुमको सब देगा॥४८॥

प्र यद्व॑स्त्रि॒ष्टुभ॒मिषं॒ मरु॑तो॒ विप्रो॒ अक्ष॑रत्। वि पर्व॑तेषु राजथ॥

क्षात्रबल वही वृद्धि को प्राप्त हो सकता है, जिसके नेता विप्र=बुद्धिमान् हों। इस मन्त्र में बुद्धिमान् मन्त्री प्रधान क्षात्रबल का निरूपण किया है। विद्यासभा के लिये, सैनिक बल के लिये, प्रजोपकारी वापी कूप तडाग राजपथादिकों के लिये व्यय करना, यही तीन प्रकार का व्यय है॥१॥यहाँ मरुत् शब्द से सप्तप्राणों का ग्रहण है−नयनद्वय, कर्णद्वय, घ्राणद्वय और एक जिह्वा। इन सातों में व्याप्त वायु का नाम मरुत् है, अतएव सप्त मरुत् का वर्णन अधिक आता है। एक-२ की वृत्ति मानो सात सात हैं, अतः ७x७=४९ मरुत् माने जाते हैं, मरुत् नाम यहाँ प्राणों का ही है, इसमें एक प्रमाण यह है कि इन्द्र का नाम मरुत्वान् है। इन्द्र=जीवात्मा। इसका साथी यह प्राण है, अतः इन्द्र मरुत्वान् कहलाता है। यह अध्यात्म अर्थ है, भौतिकार्थ में मरुत् शब्द वायुवाची है, लौकिकार्थ में मरुत् शब्द वैश्यवाची और सेनावाचक होता है। भावार्थ इसका यह है कि प्रथम योगाभ्यास के लिये विप्र अर्थात् परम बुद्धिमान् बनो, पश्चात् इन नयनादि इन्द्रियों को वश में करने के लिये प्राणायाम करो, इस क्रिया से तुम्हारा शिर अतिशय बलिष्ठ और ज्ञान-विज्ञान सहित होगा, हे मनुष्यों! उस योगरत शिर से प्राणियों का और अपना उद्धार करो॥१॥

यद॒ङ्ग त॑विषीयवो॒ यामं॑ शुभ्रा॒ अचि॑ध्वम्। नि पर्व॑ता अहासत॥

सैनिक नेताओं को चाहिये कि वह उसी को सर्वोपरि दुर्ग समझें, जो साधनसामग्रीप्रधान दुर्ग है अर्थात् मनुष्यों का दुर्ग, यानों का दुर्ग और अश्वादि सेना संरक्षक पशुओं का दुर्ग सर्वोपरि कहलाता है। यहाँ पर्वत शब्द से दुर्ग का ग्रहण है, क्योंकि “पर्वाणि सन्ति अस्येति पर्वतः”=जिसके पर्व होते हैं, उसी को दुर्ग कहते हैं॥२॥तविषीयु=यद्यपि प्राण स्वतः बलवान् हैं, तथापि इनको नाना उपायों से बलिष्ठ बनाना चाहिये और जब ये शुद्ध पवित्र होंगे, तब ही वे ईश्वर की ओर जायेंगे। पर्वत=जिसमें पर्व हो, वह पर्वत। मानो नयन आदि एक-२ पर्व है, अतः शिर का नाम पर्व है। भौतिक अर्थ में हिमालय आदि पर्वत और मेघ आदि अर्थ हैं॥२॥

उदी॑रयन्त वा॒युभि॑र्वा॒श्रासः॒ पृश्नि॑मातरः। धु॒क्षन्त॑ पि॒प्युषी॒मिष॑म्॥

जिन लोगों की एकमात्र ईश्वर की वाणी माता है, वे लोग सदैव विजय को प्राप्त होते हैं, क्योंकि ईश्वर की वाणी को मानकर ईश्वर के नियमों पर चलने के समान संसार में और कोई बल नहीं, इसलिये मनुष्य को चाहिये कि वह वेदवाणी को स्वतःप्रमाण मानता हुआ ईश्वर के नियमों पर चले॥३॥जब आन्तरिक वायु बाह्य वायु के साथ मिलकर प्राणायामकाल में ऊपर को चढ़ता है, तब प्रत्येक नयनादिक प्राण को पूर्ण बल और बुद्धि प्राप्त होती है अर्थात् धीरे-२ शक्ति और ज्ञान का प्रकाश होने लगता है॥३॥

वप॑न्ति म॒रुतो॒ मिहं॒ प्र वे॑पयन्ति॒ पर्व॑तान्। यद्यामं॒ यान्ति॑ वा॒युभिः॑॥

जो लोग व्योमयानादि द्वारा=विद्यानिर्मित यानों द्वारा शत्रु पर आक्रमण करते हैं, वे ही शत्रुबल को कम्पायमान कर सकते हैं, अन्य नहीं॥४॥जैसे बाह्य वायु का उपद्रव हम देखते हैं, तद्वत् इस शरीरस्थ वायु का भी है। उसकी शान्ति केवल प्राणायाम और चित्तैकाग्रता से होती है, अन्यथा मनुष्य की बुद्धि स्थिर नहीं होती॥४॥

नि यद्यामा॑य वो गि॒रिर्नि सिन्ध॑वो॒ विध॑र्मणे। म॒हे शुष्मा॑य येमि॒रे॥

अत्यन्त उत्साही तथा साहसी सैनिकों के आगे नदियें और पर्वत भी मार्ग छोड़ देते हैं। इस मन्त्र में उत्साह का वर्णन किया है॥५॥जब झञ्झावायु बड़े वेग से चलता है, तब पर्वतों की बड़ी-२ शिलाएँ गिरने लगती हैं, वृक्ष उखड़कर गिर पड़ते हैं, समुद्र भी मानो, उसके सामने झुक जाते हैं। यह प्राकृत दृश्य का वर्णन है॥५॥

यु॒ष्माँ उ॒ नक्त॑मू॒तये॑ यु॒ष्मान्दिवा॑ हवामहे। यु॒ष्मान्प्र॑य॒त्य॑ध्व॒रे॥

यज्ञ में क्षात्रधर्मवेत्ता सैनिक और पदार्थविद्यावेत्ता विद्वान् तथा अध्यात्मविद्यावेत्ता योगीजन इत्यादि विद्वानों का सत्कार करना अभ्युदय का हेतु है॥६॥इन्द्रियों को वश में करने से ही मनुष्य विधिवत् शुभ कर्म कर सकता है। अतः वेद कहते हैं कि रात्रि दिन और शुभ कर्म के समय प्रथम इन्द्रियों को वशीभूत बना लो, अन्यथा सब कर्म निष्फल हो जाएँगे॥६॥

उदु॒ त्ये अ॑रु॒णप्स॑वश्चि॒त्रा यामे॑भिरीरते। वा॒श्रा अधि॒ ष्णुना॑ दि॒वः॥

इस मन्त्र में क्षात्रधर्मप्रधान योद्धाओं के रक्तवर्ण का वर्णन किया है कि वे देदीप्यमान सुन्दर वर्णवाले योद्धा लोग यानों द्वारा अन्तरिक्ष में विचरते हैं॥७॥इसका आशय यह है कि प्राणायामकाल में शरीर के भीतर अनेक प्रकार के शब्द होते हैं और वे प्राण धीरे-२ शिर पर चढ़ते हैं। भौतिकार्थ में भी इन मन्त्रों को लगाना चाहिये॥७॥

सृ॒जन्ति॑ र॒श्मिमोज॑सा॒ पन्थां॒ सूर्या॑य॒ यात॑वे। ते भा॒नुभि॒र्वि त॑स्थिरे॥

जिस प्रकार सूर्य में प्रभामण्डल पड़ता है अर्थात् उसकी रश्मियें प्रभा से सूर्य के मुख को ढापे रहती हैं, इसी प्रकार जिस सम्राट् के स्वरूप को उसके सैनिकों का तेज देदीप्यमान हुआ आच्छादित करता है, वही सम्राट् प्रशंसनीय होता है॥८॥प्राणायाम करने से प्रत्येक इन्द्रिय में स्व-स्व प्रकाश की वृद्धि होती है। नयन यहाँ उपलक्षणमात्र है। प्राण स्वयं प्रकाशवान् वस्तु हैं, उनमें अधिक बल है, जैसे बाह्य वायु में देखते हैं। सूर्य=ऐसे-२ स्थल में सूर्य्य शब्द से नयन का ग्रहण करना चाहिये, क्योंकि प्राणायाम का विषय है, इस शरीर में मानो, नयन सूर्य्य है, यदि सूर्य्य न हो तो नेत्र व्यर्थ हो जाय, इत्यादि अर्थ पर यहाँ ध्यान देना चाहिये॥८॥

इ॒मां मे॑ मरुतो॒ गिर॑मि॒मं स्तोम॑मृभुक्षणः। इ॒मं मे॑ वनता॒ हव॑म्॥

जो निर्भय होकर युद्ध में मरें या मारें वे “मरुत्” कहलाते हैं, “ये म्रियन्ते यैर्वा जना युद्धे म्रियन्ते ते मरुतः”=जो अपराङ्मुख होकर युद्ध करते हैं और जिनको मरने से भय और जीने में कोई राग नहीं, ऐसे योद्धाओं का नाम “मरुत्” है। उक्त मरुतों की माताएँ उनको तीन प्रकार का उत्साह प्रदान करती हैं॥९॥पूजा, सन्ध्या और यज्ञादि शुभकर्मों के समय अपनी समस्त इन्द्रियवृत्तियों को स्तुति प्रार्थना और उपासना में लगावें॥९॥

त्रीणि॒ सरां॑सि॒ पृश्न॑यो दुदु॒ह्रे व॒ज्रिणे॒ मधु॑। उत्सं॒ कव॑न्धमु॒द्रिण॑म्॥

उक्त विद्युत् शस्त्रवाले वज्री योद्धाओं की माताएँ मीठे वचनों से युद्ध की शिक्षायें देतीं और उत्साह बढ़ाकर तथा जाति में स्नेह बढ़ाकर युद्ध के लिये सन्नद्ध करती हैं॥१०॥तीन सरोवर=कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय और अन्तरिन्द्रिय अर्थात् मन आदि भीतर के इन्द्रिय। इन तीनों की जो वृत्तियाँ, वे ही तीन सरोवर हैं। इनकी वृत्तियाँ यदि शुभकर्म में लगाई जाएँ, तो वे मधुर फल देती हैं। वे तीनों तीन प्रकार की हैं। ज्ञानेन्द्रिय उत्स अर्थात् इतश्चेतश्च बहनेवाले हैं। कर्मेन्द्रिय कबन्ध अर्थात् शरीर में ही बद्ध हैं और अन्तःकरण मन आदि उद्रिण अर्थात् उड़नेवाले हैं। हे मनुष्यों! इनको वश में करके मधुरफल चाखो॥१०॥

मरु॑तो॒ यद्ध॑ वो दि॒वः सु॑म्ना॒यन्तो॒ हवा॑महे। आ तू न॒ उप॑ गन्तन॥

इस मन्त्र में उन योद्धाओं का आह्वान कथन किया है, जो विमान द्वारा अन्तरिक्ष में विचरते हैं, किसी अन्य देवविशेष का नहीं॥११॥प्राण नाम इन्द्रियों का ही है। वारंवार इन्द्रियों से प्रार्थना इसलिये की जाती है कि वे अतिचपल हैं। वेद प्रत्येक वस्तु को चेतनत्व का आरोपकर वर्णन करते हैं, यह ध्यान में सदा रखना चाहिये। ईश्वरोपासनार्थ जब उपासक बैठे, तब प्रथम अपने इन्द्रियों को छू-छूकर देखे कि कोई कलङ्कित तो नहीं हुआ है। इनको विषय से छुड़ाकर ध्यान में लगाना कठिन है, अतः हे मनुष्यों! सावधान होकर इनको सुशिक्षित बनाओ॥११॥

यू॒यं हि ष्ठा सु॑दानवो॒ रुद्रा॑ ऋभुक्षणो॒ दमे॑। उ॒त प्रचे॑तसो॒ मदे॑॥

जो पुरुष दमन करने की शक्ति रखते हैं, वे ही उत्पाती, साहसी, लोगों का दमन करके प्रजा में शान्ति उत्पन्न कर सकते हैं, इसलिये ऐसे तेजस्वी पुरुषों की प्राप्ति के लिये परमात्मा से अवश्य प्रार्थना करनी चाहिये॥१२॥जो कोई प्राणों अर्थात् इन्द्रियों को सदा शुभ कर्म में लगाते हैं, वे किन सुखों को न पाते और वे इस जगत् में महान् होते हैं। अतः हे मनुष्यों! इनको अच्छे प्रकार जान और जितेन्द्रिय पुरुषों का आख्यान पढ़ अपने जीव को सफल बनाओ॥१२॥

आ नो॑ र॒यिं म॑द॒च्युतं॑ पुरु॒क्षुं वि॒श्वधा॑यसम्। इय॑र्ता मरुतो दि॒वः॥

जो पुरुष परमात्मा के इस अनन्त ब्रह्माण्ड से पदार्थविद्या द्वारा उपयोग लेते हैं, वे अन्तरिक्ष में सदा स्वेच्छाचारी होकर विचरते और प्रजा के लिये अनन्त प्रकार के धनों का भण्डार भर देते हैं, इसलिये उन्नति चाहनेवाले पुरुष को उक्त विद्या के जानने में पूर्ण परिश्रम करना चाहिये॥१३॥प्राणायामाभ्यास से जब वे इन्द्रियगण विवश होते हैं, तब उपासक को असाधारण आनन्द मिलता है और वह अपने ज्ञानबल से संसार को धारण-पोषण करनेवाला होता है॥१३॥

अधी॑व॒ यद्गि॑री॒णां यामं॑ शुभ्रा॒ अचि॑ध्वम्। सु॒वा॒नैर्म॑न्दध्व॒ इन्दु॑भिः॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि स्वेच्छाचारी योद्धाओं के लिये जल स्थल सब एक प्रकार के हो जाते हैं और वे गिरिशिखरों के ऊपर विना रोक-टोक विचरते हैं॥१४॥ये इन्द्रियगण जब प्राणायाम से शुभ्र, पवित्र और शोधित होते हैं, तब ही ईश्वर को जानने लगते हैं और विविध आनन्द पाते हैं॥१४॥

ए॒ताव॑तश्चिदेषां सु॒म्नं भि॑क्षेत॒ मर्त्यः॑। अदा॑भ्यस्य॒ मन्म॑भिः॥

जो योधा किसी से तिरस्कृत नहीं होते अर्थात् जो अपने क्षात्रबल में पूर्ण हैं, उन्हीं से अपनी रक्षा की भिक्षा माँगनी चाहिये॥१५॥आत्मा आत्मा को जाने, तब ही सुख प्राप्त होगा॥१५॥

ये द्र॒प्सा इ॑व॒ रोद॑सी॒ धम॒न्त्यनु॑ वृ॒ष्टिभिः॑। उत्सं॑ दु॒हन्तो॒ अक्षि॑तम्॥

जिन योद्धाओं के अस्त्र-शस्त्ररूप बाणवृष्टि से नभोमण्डल पूर्ण हो जाता है, उन्हीं से अपनी रक्षा की भिक्षा माँगनी चाहिये॥१६॥हे मनुष्यों! जैसे वायु से जगत् को लाभ पहुँचता है, तद्वत् आप भी मनुष्य में लाभ पहुँचाया कीजिये, अध्यात्म में भी इसको लगाना चाहिये॥१६॥

उदु॑ स्वा॒नेभि॑रीरत॒ उद्रथै॒रुदु॑ वा॒युभिः॑। उत्स्तोमैः॒ पृश्नि॑मातरः॥

जिन योधाओं के रथों के पहियों से पृथिवी गूँज उठती है, ऐसे शूरवीरों से ही रक्षा की भिक्षा माँगनी चाहिये॥१७॥भौतिक और आध्यात्मिक दोनों अर्थ होते हैं, आध्यात्मिक इस प्रकार होगा कि प्राणायाम के समय भीतर महानाद होते हैं, उनकी गति अतिवेगवती होती है और मुख्य प्राण की स्तुति इन्द्रिय करते हैं, इत्यादि॥१७॥

येना॒व तु॒र्वशं॒ यदुं॒ येन॒ कण्वं॑ धन॒स्पृत॑म्। रा॒ये सु तस्य॑ धीमहि॥

हे विद्वान् सैनिक नेताओ! आप आध्यात्मिक विद्यावेत्ता विद्वानों के रक्षणार्थ अनन्त प्रकार के ऐश्वर्य्य प्रदान करते हैं, जिससे ब्रह्मविद्या की भले प्रकार उन्नति होती है॥१८॥परमात्मा उपदेश देता है कि हे मनुष्यों! प्राणायाम से इन्द्रियसहित मन और आत्मा की रक्षा होती है, अतः प्रतिदिन उसका अभ्यास करो और इससे तुमको शान्ति मिलेगी, अतः उसका ध्यान सदा रक्खो॥१८॥

इ॒मा उ॑ वः सुदानवो घृ॒तं न पि॒प्युषी॒रिषः॑। वर्धा॑न्का॒ण्वस्य॒ मन्म॑भिः॥

इस मन्त्र में यह उपदेश किया है कि हे विद्वान् पुरुषो! आप घृतादि पुष्टिप्रद पदार्थों को बढ़ायें अर्थात् उनकी रक्षा करें, जिससे बल-वीर्य्य की पुष्टि तथा वृद्धि द्वारा नीरोग रहकर ब्रह्मविद्या तथा ऐश्वर्य्य की वृद्धि करने में यत्नवान् हों॥१९॥यह स्वाभाविक वर्णन है। प्राणों की पुष्टि अन्नों से होती है, यह प्रत्यक्ष है। आत्मा के योग के द्वारा सकल कार्य होना चाहिये, तब ही लाभ होता है। अतः मन्त्र में (काण्वस्य मन्मभिः) पद आया है॥१९॥

क्व॑ नू॒नं सु॑दानवो॒ मद॑था वृक्तबर्हिषः। ब्र॒ह्मा को वः॑ सपर्यति॥

इस मन्त्र का आशय यह है कि जिन लोगों को यज्ञ में विशेष=असाधारण आसन दिया जाता है, वे “वृक्तबर्हिष” कहे जाते हैं और ऐसे असाधारण विद्वानों के गुणगौरव को चतुर्वेद का वक्ता ब्रह्मा ही जान सकता है, अन्य नहीं और वह विशेषतया पूजा के योग्य होते हैं॥२०॥भाव इसका यह है कि इन्द्रियगण अति चञ्चल हैं, यद्यपि शुभ कर्म में इनको विद्वान् लगाते हैं, तथापि वे इधर-उधर भाग जाते हैं, उस समय उपासक की समस्त क्रिया नष्ट हो जाती है, अतः प्राणों को विवश करने के लिये सम्बोधनपूर्वक यहाँ वर्णन है॥२०॥

न॒हि ष्म॒ यद्ध॑ वः पु॒रा स्तोमे॑भिर्वृक्तबर्हिषः। शर्धाँ॑ ऋ॒तस्य॒ जिन्व॑थ॥

हे असाधारण उच्च आसनवाले विद्वानो! आप हमारे यज्ञों में सम्मिलित होकर शोभा को बढ़ावें और हम लोगों को अपने उपदेशों द्वारा शुभ ज्ञान प्रदान करें॥२१॥आशय यह है कि मनुष्य का प्राणबल सदा समान नहीं रहता, अतः बलयुक्त युवावस्था में ही धर्मकार्य्य करे, वृद्धावस्था के लिये धर्म को न रख देवे। अनेक उपायों से भी वार्धक्य मिट नहीं सकता॥२१॥

समु॒ त्ये म॑ह॒तीर॒पः सं क्षो॒णी समु॒ सूर्य॑म्। सं वज्रं॑ पर्व॒शो द॑धुः॥

उपर्युक्त वर्णित विद्वान् पुरुष बड़े-बड़े आविष्कार करके प्रजा को सब प्रकार से सुखी करते हैं अर्थात् जलों के संशोधन की विद्या का उपदेश करते और अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों का प्रकाश करते हैं, जिससे शत्रु का सर्वथा दमन हो और इसी कारण वे विद्वान् पूजार्ह होते हैं॥२२॥वेद में विचित्र प्रकार का कहीं-२ वर्णन आता है। वायु से क्या-क्या घटना होती रहती है, यह इससे दिखलाते हैं। वायु के योग से जल होता है, यह प्रत्यक्ष है। क्षोणी अर्थात् द्युलोक और पृथिवीलोक के मध्य यदि वायु न हो, तो दोनों को परस्पर उपकार न हो। इसी प्रकार सूर्य का किरण वायु के द्वारा ही पृथिवी पर गिरता है और वायु से नाना रोगों और विघ्नों का भी नाश होता है॥२२॥

वि वृ॒त्रं प॑र्व॒शो य॑यु॒र्वि पर्व॑ताँ अरा॒जिनः॑। च॒क्रा॒णा वृष्णि॒ पौंस्य॑म्॥

वे अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग को जाननेवाले विद्वान् पुरुष अपने परिश्रम द्वारा मार्गरोधक शत्रुओं को छिन्न-भिन्न करके भगा देते हैं और वे जिन पर्वतों का आश्रय लेते हैं, उनको भी अपनी विद्याद्वारा तोड़-फोड़ कर शत्रुओं का निरोध करते हैं॥२३॥अग्नि, सूर्य्य, मरुत् आदि पदार्थों को जगत् के कल्याण के लिये ईश्वर ने स्थापित किया है। वायु के अनेक कार्य हैं, मुख्य कार्य ये हैं कि जो रोग कीट या अन्यान्य रोगोत्पादक अंश कहीं जम जाते हैं, तो वायु उनको उड़ाकर इधर-उधर छींट देते हैं, जिनसे उनका बल सर्वथा नष्ट हो जाता है। और मेघों को चारों दिशाओं में ले जाकर बरसाते हैं और प्राणियों को जीवित रखते हैं। अतः इनके गुणों का निरूपण वेदों में आता है॥२३॥

अनु॑ त्रि॒तस्य॒ युध्य॑तः॒ शुष्म॑मावन्नु॒त क्रतु॑म्। अन्विन्द्रं॑ वृत्र॒तूर्ये॑॥

ये अग्रणी विद्वान् योद्धा संग्राम में युद्ध करते हुए पिछले तीसरे मण्डल की रक्षा करते और सम्राट् को भी सुरक्षित रखते हुए राष्ट्र की रक्षा करते हैं, जिससे वे कृतकार्य्य होकर राष्ट्र को मङ्गलमय बनाते हैं॥२४॥अग्नि का भी सहायक वायु होता है और सूर्य्य का भी, विज्ञानशास्त्र के अध्ययन से इस विषय को जानो॥२४॥

वि॒द्युद्ध॑स्ता अ॒भिद्य॑वः॒ शिप्राः॑ शी॒र्षन्हि॑र॒ण्ययीः॑। शु॒भ्रा व्य॑ञ्जत श्रि॒ये॥

पदार्थविद्यावेत्ता योद्धा लोग नाना प्रकार के विद्युत् शस्त्रों को लेकर धर्मयुद्ध में उपस्थित हों और शत्रुओं को विजय करते हुए प्रकाशित हों॥२५॥यह वायु का स्वाभाविक वर्णन है कि ईश्वरीय प्रबन्ध से ज्यों-२ वायु का प्रसार आकाश में होता गया, त्यों-२ जगत् का मङ्गल बढ़ता गया॥२५॥

उ॒शना॒ यत्प॑रा॒वत॑ उ॒क्ष्णो रन्ध्र॒मया॑तन। द्यौर्न च॑क्रदद्भि॒या॥

“उक्षति सिञ्चति कामान् इति उक्षा”=जो नाना प्रकार की कामनाओं की वृष्टि करे, उसका नाम “उक्षा” है। इस प्रकार के कामना देनेवाले यानों पर आरूढ़ होकर जो योद्धा लोग युद्ध में जाते हैं, उनसे सब भयभीत होते और वे ही विजय को प्राप्त होते हैं, अन्य नहीं। स्मरण रहे कि “उक्षा” शब्द का अर्थ यहाँ सायणाचार्य्य ने कामनाओं की वृष्टि करनेवाला किया है। जो लोग उक्त शब्द को बलीवर्द=बैल का वाचक मानकर गवादि पशुओं का बलिदान कथन करते हैं, उनका कथन वेदाशय से सर्वथा विरुद्ध है, क्योंकि “उक्षा” शब्द सिञ्चन करने तथा कामनाओं की पूर्ति करने के अर्थों में आता है, किसी पशु-पक्षी के बलिदान के लिये नहीं॥२६॥यह भी स्वाभाविक वर्णन है। वायु यद्यपि सर्वत्र पृथिवी पर विद्यमान है, तथापि जब भारतवर्ष में पूर्वीय या पश्चिमीय वायु चलता है, तो निश्चय नहीं होता कि यह कहाँ से चलकर आया है। ज्यों-ज्यों दिन बढ़ता जाता है, त्यों-त्यों वायु का वेग तेज होता जाता है, यहाँ तक की मध्याह्न में वैशाख, ज्येष्ठ का वायु अतिशय असह्य हो जाता। लोग गृह बन्द कर बैठते हैं। यह दृश्य भारतवासियों को अच्छे प्रकार विदित है। शरीर के भीतर भी जब वायु का प्रकोप होता है, तब यही दशा होती है॥२६॥

आ नो॑ म॒खस्य॑ दा॒वनेऽश्वै॒र्हिर॑ण्यपाणिभिः। देवा॑स॒ उप॑ गन्तन॥

दैवी शक्तियों से सम्पन्न पुरुषों के हाथ में ही ऐश्वर्य्य तथा हिरण्यादि दिव्य पदार्थ होते हैं, अत एव ऐसे विभूतिसम्पन्न तथा दिव्यशक्तिमान् देवताओं को यज्ञ में अवश्य निमन्त्रित करके बुलाना चाहिये, ताकि उनके उपदेश से प्रजाजन लाभ उठावें॥२७॥इसका आशय यह है कि प्राणायाम भी एक यज्ञ है, इसको भी विधिपूर्वक करें। प्रतिक्षण मन इधर-उधर भागा करते हैं। उच्छृङ्खल अश्व के समान ये इन्द्रियगण बड़े वेग से चारों तरफ दौड़ते हैं, अतः मन सहित प्रथम सब इन्द्रियों को वश में करके तब किसी यज्ञ में प्रवृत्त होवें॥२७॥

यदे॑षां॒ पृष॑ती॒ रथे॒ प्रष्टि॒र्वह॑ति॒ रोहि॑तः। यान्ति॑ शु॒भ्रा रि॒णन्न॒पः॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि पदार्थविद्यावेत्ता पुरुषों का यह भी कर्तव्य है कि वह युद्धसम्बन्धी जलों का भी संशोधन करें, ताकि किसी प्रकार का जलसम्बन्धी रोग उत्पन्न न हो॥२८॥जब भगवान् की ओर मन जाता है, तब नयन से करुणरस निकलने लगते हैं॥२८॥

सु॒षोमे॑ शर्य॒णाव॑त्यार्जी॒के प॒स्त्या॑वति। य॒युर्निच॑क्रया॒ नरः॑॥

जो हिमालय आदि उच्च प्रदेश और जो समुद्रपर्य्यन्त निम्न प्रदेश हैं, उन सब प्रदेशों में पदार्थविद्यावेत्ता योद्धाओं का रथचक्र अव्याहतगति होता है अर्थात् उनके जलयान, पृथिवीयान तथा नभोयानादि यानों को कोई प्रतिपक्षी रोक नहीं सकता॥२९॥बारम्बार समाधि के अभ्यास से वे प्राण शिर के ब्रह्मरन्ध्र में जाकर शान्ति लेते हैं॥२९॥

क॒दा ग॑च्छाथ मरुत इ॒त्था विप्रं॒ हव॑मानम्। मा॒र्डी॒केभि॒र्नाध॑मानम्॥

इस मन्त्र में नाना प्रकार की विद्याओं को जाननेवाले मरुत्=विद्वान् योद्धाओं के आगमन की प्रतीक्षा का वर्णन किया गया है कि हे मरुद्गण! आप सुखसामग्री सहित कब जाते हैं अर्थात् शीघ्र जाएँ॥३०॥जब उपासक समाधिकाल में ईश्वर की प्रार्थना करने लगे, तब प्रथम इन्द्रियों को सर्वथा वश में कर लेवे, क्योंकि जब इन्द्रियगण इधर-उधर भाग जाते हैं, तब उनको पुनः विवश करना अति कठिन हो जाता है॥३०॥

कद्ध॑ नू॒नं क॑धप्रियो॒ यदिन्द्र॒मज॑हातन। को वः॑ सखि॒त्व ओ॑हते॥

इस मन्त्र में यह भाव वर्णन किया है कि उत्तम योद्धा वे हैं, जो कठिन से कठिन आपत्काल प्राप्त होने पर भी अपने सम्राट् का साथ नहीं छोड़ते अर्थात् विपत्तिकाल में भी जीवन की आशा न करते हुए राष्ट्र की रक्षा करते हैं॥३१॥यद्यपि आत्मा को इन्द्रियगण त्यागते नहीं, तथापि इनको विवश करना अति कठिन है। जो सदा विषय से विमुख होकर ईश्वर की ओर जाते हैं, वे ही इनको पा सकते हैं॥३१॥

स॒हो षु णो॒ वज्र॑हस्तैः॒ कण्वा॑सो अ॒ग्निं म॒रुद्भिः॑। स्तु॒षे हिर॑ण्यवाशीभिः॥

जिस सम्राट् के उक्त आपत्काल में भी त्याग न करनेवाले आज्ञाकारी योद्धा हैं, वह सदैव सूर्य्य के समान देदीप्यमान रहता है अर्थात् उसके राज्यश्रीरूप प्रकाश को कदापि कोई दबा वा छिपा नहीं सकता॥३२॥जब समाधि आदि योगाभ्यास से ये इन्द्रियगण विषय से निवृत्त होकर ईश्वराभिमुख होते हैं, तब इनके निकट कोई पाप नहीं आते। उस समय कहा जाता है कि मानो ये इन्द्रियगण अपनी रक्षा के लिये हाथों में महादण्ड रखते हैं और देदीप्यमान वाशी (वसूला) से युक्त रहते हैं। इस अवस्था में प्राप्त आत्मा की स्तुति उपासक करते हैं॥३२॥

ओ षु वृष्णः॒ प्रय॑ज्यू॒ना नव्य॑से सुवि॒ताय॑। व॒वृ॒त्यां चि॒त्रवा॑जान्॥

जो सम्राट् न्यायशील तथा धर्मपरायण है, उसको परमात्मा कामनाओं की वर्षा करनेवाले, अद्भुत बलवाले तथा सदा निर्भीक योद्धाओं को प्रदान करता है॥३३॥समाधिसिद्ध प्राणों के द्वारा मनुष्य हितकारी ज्ञान प्राप्त कर जगत् में फैलावे॥३३॥

गि॒रय॑श्चि॒न्नि जि॑हते॒ पर्शा॑नासो॒ मन्य॑मानाः। पर्व॑ताश्चि॒न्नि ये॑मिरे॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि उपर्युक्त निर्भीक योद्धाओं के बलपूर्ण प्रहार से मानो पर्वत भी काँपने लगते हैं अर्थात् विषम और अति दुर्गम प्रदेश भी उनके आक्रमण से नहीं बच सकते, या यों कहो कि जल, स्थल तथा निम्नोन्नत सब प्रदेशों में उनका पूर्ण प्रभुत्व होता है॥३४॥प्रथम सब प्रकार इन्द्रियों को वश में करे। यह शिक्षा इससे देते हैं॥३४॥

आक्ष्ण॒यावा॑नो वहन्त्य॒न्तरि॑क्षेण॒ पत॑तः। धाता॑रः स्तुव॒ते वयः॑॥

जिन योद्धाओं को उनके यान नभोमण्डल द्वारा प्रवाहण करते हैं, वे योद्धा यश और ऐश्वर्य्यादि सब प्रकार के सुखसम्पादन करते हैं अर्थात् उनकी प्रजा उनके अनुकूल होने से वे सब प्रकार के सुख भोगते हैं॥३५॥हे मनुष्यों! वायुतत्त्व को जानकर इनको कार्य में लगाओ। इससे अभाव में तुम नहीं रहोगे॥३५॥

अ॒ग्निर्हि जानि॑ पू॒र्व्यश्छन्दो॒ न सूरो॑ अ॒र्चिषा॑। ते भा॒नुभि॒र्वि त॑स्थिरे॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि उक्त प्रकार के योद्धा जिस सम्राट् के वशवर्ती होते हैं, उसका तेज सहस्रांशु सूर्य्य के समान दशों दिशाओं में फैलकर अन्यायरूप अन्धकार को निवृत्त करता हुआ सम्पूर्ण संसार का प्रकाशक होता है॥३६॥यह सातवाँ सूक्त और चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥यह निश्चित विषय है कि प्रथम आग्नेय शक्ति की अधिकता होती है, पश्चात् वायुशक्ति की, यही विषय इसमें कहा गया है॥३६॥

आ नो॒ विश्वा॑भिरू॒तिभि॒रश्वि॑ना॒ गच्छ॑तं यु॒वम्। दस्रा॒ हिर॑ण्यवर्तनी॒ पिब॑तं सो॒म्यं मधु॑॥

इस मन्त्र में पूर्वप्रकृत क्षात्रधर्म का वर्णन करते हुए याज्ञिक पुरुषों का कथन है कि हे सेनाध्यक्ष तथा सभाध्यक्ष! आप हमारे यज्ञ को प्राप्त होकर हमारी सब प्रकार से रक्षा करें, हे ऐश्वर्यसम्पन्न! आप हमारे सहायक होकर यज्ञ को पूर्ण करें और हमारा यह सोमरसपान सम्बन्धी सत्कार स्वीकार करें॥१॥प्रजाओं में जितने साहाय्य अपेक्षित हों, वे सब राजाओं को देने चाहियें॥१॥

आ नू॒नं या॑तमश्विना॒ रथे॑न॒ सूर्य॑त्वचा। भुजी॒ हिर॑ण्यपेशसा॒ कवी॒ गम्भी॑रचेतसा॥

इस मन्त्र में सेनाध्यक्ष तथा सभाध्यक्ष की प्रशंसा करते हुए उनका आह्वान कथन किया है कि हे सेनाध्यक्ष तथा सभाध्यक्ष! आप कवी=प्रकृति के कार्य्यजात सूक्ष्मपदार्थों के ज्ञाता, बुद्धिमान् और विस्तृत ऐश्वर्य्यवाले हैं। कृपा करके हमारे यज्ञ को प्राप्त होकर अपने उपदेश द्वारा हमें भी उक्तगुणसम्पन्न करें॥२॥जो प्रजाओं के पालन में सदा तत्पर, व्यवहारशास्त्रतत्त्ववित् और परमोदार होते हैं, वे ही प्रजाओं में माननीय और पूज्य होते हैं॥२॥

आ या॑तं॒ नहु॑ष॒स्पर्यान्तरि॑क्षात्सुवृ॒क्तिभिः॑। पिबा॑थो अश्विना॒ मधु॒ कण्वा॑नां॒ सव॑ने सु॒तम्॥

व्यापक=हे सर्वत्र प्रसिद्ध सेनाध्यक्ष तथा सभाध्यक्ष! आप सबको वशीभूत करनेवाले तथा विद्या के मार्गप्रदर्शिता हैं। आप हमारे यज्ञ को प्राप्त होकर लौकिक तथा पारलौकिक विद्या का उपदेश करें॥३॥राजा और अमात्य आदिकों को आलस्यरहित होना चाहिये और प्रजाओं के साथ भोजनादिक व्यवहार भी करना चाहिये॥३॥

आ नो॑ यातं दि॒वस्पर्यान्तरि॑क्षादधप्रिया। पु॒त्रः कण्व॑स्य वामि॒ह सु॒षाव॑ सो॒म्यं मधु॑॥

हे यानों द्वारा अन्तरिक्ष में गमन करनेवाले सेनाध्यक्ष तथा सभाध्यक्ष! आप अन्तरिक्ष से हम विद्वानों के यज्ञ को प्राप्त होकर हमारा सत्कार स्वीकार करें और हमको अन्तरिक्षलोकस्थ विद्या का उपदेश करके कृतार्थ करें॥४॥जहाँ-२ शुभ कर्मों का अनुष्ठान होता हो, वहाँ-२ रक्षार्थ राजा और अमात्यादि वर्गों को जाना चाहिये॥४॥

आ नो॑ यात॒मुप॑श्रु॒त्यश्वि॑ना॒ सोम॑पीतये। स्वाहा॒ स्तोम॑स्य वर्धना॒ प्र क॑वी धी॒तिभि॑र्नरा॥

हे सर्वत्र सुविख्यात सेनाध्यक्ष तथा सभाध्यक्ष! आप बुद्धिमान्, सूक्ष्मद्रष्टा और वेदविद्या के ज्ञाता हैं, सो हमारे यज्ञ को प्राप्त होकर हमको वेदविद्या का उपदेश करें॥५॥जो राज्य को स्वसम्पत्ति मानकर अयथार्थरूप से अर्थ को विनष्ट करते हैं, वे अनभिज्ञ राजा प्रजाओं को रक्षित नहीं कर सकते। अतः वैसी विपरीत बुद्धि को त्याग प्रजाभ्युदय के लिये सदा चेष्टा करें॥५॥

यच्चि॒द्धि वां॑ पु॒र ऋष॑यो जुहू॒रेऽव॑से नरा। आ या॑तमश्वि॒ना ग॑त॒मुपे॒मां सु॑ष्टु॒तिं मम॑॥

हे सर्वत्र प्रसिद्ध सेनाध्यक्ष तथा सभाध्यक्ष! आप पूर्वकाल की न्याईं हमारे विद्यावृद्धिविषयक यज्ञोत्सव में आकर रक्षा करें और धन-धान्य से सहायता प्रदान करें, ताकि हमारा यज्ञ पूर्ण हो॥६॥प्रजा के लिये राजा सदा तैयार रहे, जहाँ कोई उपद्रव सुनने में आवे, वहाँ शीघ्र प्रस्थान करे॥६॥

दि॒वश्चि॑द्रोच॒नादध्या नो॑ गन्तं स्वर्विदा। धी॒भिर्व॑त्सप्रचेतसा॒ स्तोमे॑भिर्हवनश्रुता॥

हे सेनाध्यक्ष तथा सभाध्यक्ष! आप सब लोक-लोकान्तरों की विद्या, प्रजा के गुप्त रहस्य, यज्ञादि कर्म और वेदविद्या को भले प्रकार जाननेवाले हैं। कृपा करके हमारे यज्ञ में आवें और हम लोगों को उक्त विद्याओं का उपदेश करें॥७॥प्रजाहितार्थ राजा अभिषिक्त होता है, अतः सर्व सुखों को त्याग प्रजारक्षण में अपने को नियुक्त करे॥७॥

किम॒न्ये पर्या॑सते॒ऽस्मत्स्तोमे॑भिर॒श्विना॑। पु॒त्रः कण्व॑स्य वा॒मृषि॑र्गी॒र्भिर्व॒त्सो अ॑वीवृधत्॥

हे सर्वत्र विख्यात सेनाध्यक्ष तथा सभाध्यक्ष! हम लोग आपका सबसे अधिक सत्कार करते और आपके यश का विस्तार करते हैं, इसलिये आप हमारे यज्ञ को प्राप्त होकर वेदविद्या का उपदेश करें॥८॥जो राजा प्रजारक्षण व्रत को पालता है, वह बड़ी उत्सुकता और हर्ष के साथ−विद्वानों या मूर्खों−सबसे पूजा जाता है॥८॥

आ वां॒ विप्र॑ इ॒हाव॒सेऽह्व॒त्स्तोमे॑भिरश्विना। अरि॑प्रा॒ वृत्र॑हन्तमा॒ ता नो॑ भूतं मयो॒भुवा॑॥

हे सेनाध्यक्ष तथा सभाध्यक्ष! आप पाप से रहित, शत्रुनाशक तथा यज्ञों के रहस्य को जाननेवाले हैं। हम लोग स्तोत्रों द्वारा आपका आह्वान करते हैं, कृपा करके यहाँ यज्ञ में सम्मिलित हों॥९॥राजा और राजवर्ग, सबसे मैं पूजित होता हूँ, यह स्वगौरव देख किसी पाप और नीच कर्म में अपने को न गिरावें॥९॥

आ यद्वां॒ योष॑णा॒ रथ॒मति॑ष्ठद्वाजिनीवसू। विश्वा॑न्यश्विना यु॒वं प्र धी॒तान्य॑गच्छतम्॥

हे सेनाध्यक्ष तथा सभाध्यक्ष! आप पर्याप्तकाम होने से आपकी सब इच्छा पूर्ण हैं, हे भगवन्! आप हमारी कामनाओं की पूर्ति के लिये भी यत्नवान् हों, यह प्रार्थना है॥१०॥राजा को सर्व विद्याएँ उपार्जन करनी चाहियें॥१०॥

अतः॑ स॒हस्र॑निर्णिजा॒ रथे॒ना या॑तमश्विना। व॒त्सो वां॒ मधु॑म॒द्वचोऽशं॑सीत्का॒व्यः क॒विः॥

हे सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! आप अपने विचित्र यान द्वारा हमारे यज्ञ को प्राप्त हों, सब विद्वान् पुरुष मधुर वाणियों द्वारा आपका स्तवन कर रहे हैं॥११॥राजा वहाँ-२ बड़े समारोह के साथ जाय और सदाचारों को पालता हुआ वैसा विचरण करे, जिससे सर्वत्र प्रजा प्रशंसा करे॥११॥

पु॒रु॒म॒न्द्रा पु॑रू॒वसू॑ मनो॒तरा॑ रयी॒णाम्। स्तोमं॑ मे अ॒श्विना॑वि॒मम॒भि वह्नी॑ अनूषाताम्॥

हे सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! आप आनन्दयुक्त, बहुधनों के स्वामी तथा धनोपार्जन की विद्या जाननेवाले, सर्वपूज्य=सत्कारार्ह हैं, हे भगवन्! हमारे इस स्तुतिप्रद वाक्यों को श्रवण करते हुए हमारे यज्ञ में आकर इसको सफलीभूत करें॥१२॥जो सज्जनों को आह्लादित करता, पण्डितों को मानता, दरिद्रों को धनों से पोसता और प्राणियों के मन को जानता, इस प्रकार सबको सुखी करता, वही राजा राज्ययोग्य है॥१२॥

आ नो॒ विश्वा॑न्यश्विना ध॒त्तं राधां॒स्यह्र॑या। कृ॒तं न॑ ऋ॒त्विया॑वतो॒ मा नो॑ रीरधतं नि॒दे॥

हे सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! आप हमको उत्तमोत्तम धनों के उपार्जन करने की विधि का उपदेश करें, जिससे हम धनसम्पन्न हों और आप ऐसी कृपा करें कि वेदों के ज्ञाता सत्पुरुषों से ही हमारा सम्बन्ध तथा व्यवहार हो, लम्पट, निन्दक, अनृतभाषी तथा वेदमर्यादा से च्युत पुरुषों से हमारा सम्बन्ध न हो॥१३॥राजा प्रजाओं को व्यापारों की स्थापना से समृद्ध, विद्याप्रचार से सर्व कर्म में कुशल और धर्म संस्कारों से धार्मिक और पवित्र बनावें॥१३॥

यन्ना॑सत्या परा॒वति॒ यद्वा॒ स्थो अध्यम्ब॑रे। अतः॑ स॒हस्र॑निर्णिजा॒ रथे॒ना या॑तमश्विना॥

हे सत्यादि गुणसम्पन्न सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! आप चाहे कहीं भी क्यों न हों, कृपा करके सब स्थानों से अपने विचित्र यान द्वारा हमारे यज्ञ में आकर सुशोभित हों और हमें विविध विद्याओं का उपदेश करें॥१४॥राजा कदापि भी मिथ्या व्यवहार न करे, असत्य न बोले, सर्वदा प्रतिज्ञा का पालन करे, अपने व्यापार से कदापि प्रमाद न करे और विविध अलङ्कारों से भूषित रथ पर बैठकर राज्यकार्यों के देखने के लिये बाहर जाया करे॥१४॥

यो वां॑ नासत्या॒वृषि॑र्गी॒र्भिर्व॒त्सो अवी॑वृधत्। तस्मै॑ स॒हस्र॑निर्णिज॒मिषं॑ धत्तं घृत॒श्चुत॑म्॥

हे सत्यवादी सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्षो! जो पुत्रसदृश विद्वान् आपका स्तवन करते हुए आपको विख्यात करते हैं, वे आपको अपने यज्ञ में आह्वान कर रहे हैं। आप यज्ञ को प्राप्त होकर अन्न तथा धन के दान द्वारा उनको कृतकृत्य करें॥१५॥राज्यसम्बन्धी इतिहासों के लेखक राजा से पोषणीय हैं, यह शिक्षा इससे देते हैं॥१५॥

प्रास्मा॒ ऊर्जं॑ घृत॒श्चुत॒मश्वि॑ना॒ यच्छ॑तं यु॒वम्। यो वां॑ सु॒म्नाय॑ तु॒ष्टव॑द्वसू॒याद्दा॑नुनस्पती॥

हे दानशील सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! आप यजमान के लिये उत्तमोत्तम इष्ट पदार्थ प्रदान करें, जो आपके प्रति धन की कामना करता है॥१६॥जो कोई विद्यादि वृद्धि के लिये पाठशाला आदि भवन बनावे और जो कोई सुजन धर्मप्रचारादि शुभ कर्म करे, वह राज्य की ओर से पालनीय है॥१६॥

आ नो॑ गन्तं रिशादसे॒मं स्तोमं॑ पुरुभुजा। कृ॒तं नः॑ सु॒श्रियो॑ नरे॒मा दा॑तम॒भिष्ट॑ये॥

हे शत्रुओं पर विजय प्राप्त करनेवाले सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! आप हमारे यज्ञ के पूर्त्यर्थ उत्तमोत्तम पदार्थ प्रदान करते हुए हमारे यज्ञ को प्राप्त होकर हमें उत्साहित करें॥१७॥राजा और अमात्य पाठशालादिकों के निरीक्षण के लिये सर्वत्र जाया करें॥१७॥

आ वां॒ विश्वा॑भिरू॒तिभिः॑ प्रि॒यमे॑धा अहूषत। राज॑न्तावध्व॒राणा॒मश्वि॑ना॒ याम॑हूतिषु॥

हे यज्ञादि कर्मों के नेता सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! आप हमारे यज्ञ को प्राप्त होकर हमारी सब ओर से रक्षा करें, ताकि हमारा यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण हो॥१८॥राजा प्रतिदिन न्यायालय में जाकर मन्त्री आदिकों के साथ राज्यकार्य्य निरीक्षण करे॥१८॥

आ नो॑ गन्तं मयो॒भुवाश्वि॑ना श॒म्भुवा॑ यु॒वम्। यो वां॑ विपन्यू धी॒तिभि॑र्गी॒र्भिर्व॒त्सो अवी॑वृधत्॥

हे शान्ति तथा सुखोत्पादक सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! आप हमारे यज्ञ को प्राप्त हों, हम लोग आपकी वृद्ध्यर्थ वेदवाणियों द्वारा परमात्मा से प्रार्थना करते हैं॥१९॥अमात्यवर्गों के साथ राजा सदा प्रजाओं का हितचिन्तन करे। वैद्यों को ग्राम-२ में रखकर रोगों को दूर करावे और इतिहासलेखक आदि विद्वानों को सर्वोपायों से पाले॥१९॥

याभिः॒ कण्वं॒ मेधा॑तिथिं॒ याभि॒र्वशं॒ दश॑व्रजम्। याभि॒र्गोश॑र्य॒माव॑तं॒ ताभि॑र्नोऽवतं नरा॥

हे धार्मिक नेता सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! जैसे आप विद्वानों की, योगीजनों की और नष्ट इन्द्रियादि अधिकारियों की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार हमारी भी रक्षा करें, ताकि आपके आधिपत्य में हमारा विद्यावर्धक यज्ञ पूर्ण हो॥२०॥प्रथम राजा विविध पाठशालाओं की स्थापना से विद्याओं को बढ़ा सर्वविध विद्वानों की रक्षा करता हुआ पश्चात् इतर जनों के भरण-पोषण में यत्नवान् होवे॥२०॥

याभि॑र्नरा त्र॒सद॑स्यु॒माव॑तं॒ कृत्व्ये॒ धने॑। ताभिः॒ ष्व१॒॑स्माँ अ॑श्विना॒ प्राव॑तं॒ वाज॑सातये॥

हे बलवान् शूरवीर सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! जिन शक्तियों से आप दस्यु आदि वेदविरोधी जनों से भय को प्राप्त शूरवीरों की रक्षा करते हैं, उन्हीं शक्तियों से आप हमारी रक्षा करें, ताकि हम निर्विघ्न धनोपार्जन में तत्पर रहें॥२१॥सर्व बाधाओं से प्रजाओं को राजा बचावे॥२१॥

प्र वां॒ स्तोमाः॑ सुवृ॒क्तयो॒ गिरो॑ वर्धन्त्वश्विना। पुरु॑त्रा॒ वृत्र॑हन्तमा॒ ता नो॑ भूतं पुरु॒स्पृहा॑॥

हे सर्वत्र प्रसिद्ध सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! हम लोग वेदवाणियों द्वारा आपकी वृद्धि की प्रार्थना करते हैं। हे सर्वरक्षक! आप हमारे समीप हों, ताकि हम अपने इष्ट कामों को निर्विघ्न समाप्त कर सकें॥२२॥राजा और अमात्यवर्ग वैसा बर्ताव करें, जिससे प्रजाओं के माननीय होवें॥२२॥

त्रीणि॑ प॒दान्य॒श्विनो॑रा॒विः सान्ति॒ गुहा॑ प॒रः। क॒वी ऋ॒तस्य॒ पत्म॑भिर॒र्वाग्जी॒वेभ्य॒स्परि॑॥

हे सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! विजय, शान्ति तथा न्याय से सुभूषित आप विद्वानों और अन्य सब प्रजाजनों की रक्षा में सत्य को अवलम्बन करते हुए प्रवृत्त हों अर्थात् सत्य के आश्रित होकर ही प्रजा का रक्षण तथा शासन करें॥२३॥यह आठवाँ सूक्त और उनतीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥स्वसभ्यों के साथ जो राजसभा, विद्यासभा और धर्मसभा स्थापित करके उनकी सम्मति से राज्यकार्य करता है, वही सर्वत्र पूज्य होता है॥२३॥

आ नू॒नम॑श्विना यु॒वं व॒त्सस्य॑ गन्त॒मव॑से। प्रास्मै॑ यच्छतमवृ॒कं पृ॒थु च्छ॒र्दिर्यु॑यु॒तं या अरा॑तयः॥

इस मन्त्र में यह कथन है कि हे सेनापति तथा सभाध्यक्ष! आप हमारे प्रजारक्षणरूप यज्ञ में आकर क्षात्रधर्मरूप सुप्रबन्ध द्वारा प्रजा को सब बाधाओं से रहित कर सुखपूर्ण करें, उनके निवासार्थ उत्तम गृह में सुवास दें और प्रजा को दुःख देनेवाले दुष्टों का निवारण करें॥१॥राजा को उचित है कि वे अनाथ शिशुओं की रक्षा करें॥१॥

यद॒न्तरि॑क्षे॒ यद्दि॒वि यत्पञ्च॒ मानु॑षाँ॒ अनु॑। नृ॒म्णं तद्ध॑त्तमश्विना॥

हे सर्वत्र प्रसिद्ध सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! आप ऐश्वर्य्यसम्पन्न होने के कारण प्रजापालन करने में समर्थ हैं, सो हे भगवन्! उक्त स्थानों से धन लेकर धनहीन प्रजा को सम्पन्न करें॥२॥राजा को उचित है कि प्रजाओं के अभ्युदय के लिये सर्वविध धन स्वदेश में स्थापित करें॥२॥

ये वां॒ दंसां॑स्यश्विना॒ विप्रा॑सः परिमामृ॒शुः। ए॒वेत्का॒ण्वस्य॑ बोधतम्॥

हे बलसम्पन्न सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! जिस प्रकार आप विद्वानों का पालन, पोषण तथा रक्षण करते हैं, उसी प्रकार विद्वानों के कुल में उत्पन्न हम लोगों की भी रक्षा करें, जिससे हम लोग वेदविद्या के सम्पादन द्वारा याज्ञिक कर्मों में प्रवृत्त रहें॥३॥प्रजाहितचिन्तक राजाओं के यशों को सब ही गाते हैं, इसमें सन्देह नहीं, किन्तु तत्त्ववित् पुरुष राज्य के गुण-दोष जानते हैं और जानकर उनका संशोधन करते हैं। नए-२ अभ्युदय के उपाय नृपों को दिखलाते हैं। इस हेतु बहूपकारक होने से वे प्रथम सर्व प्रकार के सम्मान के योग्य हैं॥३॥

अ॒यं वां॑ घ॒र्मो अ॑श्विना॒ स्तोमे॑न॒ परि॑ षिच्यते। अ॒यं सोमो॒ मधु॑मान्वाजिनीवसू॒ येन॑ वृ॒त्रं चिके॑तथः॥

हे बलसम्पन्न सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! हम लोग युद्ध के प्रारम्भ में स्तोत्रों द्वारा आपके विजय की प्रार्थना करते हैं, आप इस सोमरस को पान करके शत्रुओं पर विजय प्राप्त करें॥४॥राजा विविध भोगों को भोगता हुआ प्रजाओं की रक्षा करे॥४॥

यद॒प्सु यद्वन॒स्पतौ॒ यदोष॑धीषु पुरुदंससा कृ॒तम्। तेन॑ माविष्टमश्विना॥

हे पौरुषसम्पन्न सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! आपने जो पौरुष जलों तथा वनस्पतियों की विद्या जानने में किया है और उनके द्वारा आप अन्नों के संग्रह में सर्व प्रकार कुशल हैं, कृपा करके आप अपने उपदेश द्वारा हमें भी उक्त विद्याओं से सम्पन्न करें, जिससे हम अन्नवान् और अन्न के भोक्ता हों॥५॥राजा जलों, वनस्पतियों, यवादिकों की वृद्धि के लिये सदा प्रयत्न करे॥५॥

यन्ना॑सत्या भुर॒ण्यथो॒ यद्वा॑ देव भिष॒ज्यथः॑। अ॒यं वां॑ व॒त्सो म॒तिभि॒र्न वि॑न्धते ह॒विष्म॑न्तं॒ हि गच्छ॑थः॥

हे सत्यवादी सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! आप शासन तथा सहायता द्वारा सम्पूर्ण प्रजा को सन्तुष्ट रखते हैं। आप ऐसी कृपा करें कि हम लोग आपको प्राप्त होकर अपनी आवश्यकताओं को आप पर प्रकट कर सकें और आपके समीपी होकर उत्तम शिक्षाओं द्वारा उच्च पद को प्राप्त हों॥६॥राजा राज्य में जहाँ-तहाँ भवन स्थापित कर असमर्थों को भोजनादिकों से रक्षा और क्रियावान् पुरुषों का साहाय्य किया करे॥६॥

आ नू॒नम॒श्विनो॒ॠषिः॒ स्तोमं॑ चिकेत वा॒मया॑। आ सोमं॒ मधु॑मत्तमं घ॒र्मं सि॑ञ्चा॒दथ॑र्वणि॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि सब नीतिज्ञ विद्वान् पुरुष क्षात्रबल=राजमर्यादा को भले प्रकार जानें, ताकि राजनियम के विरुद्ध चलकर दण्ड के भागी न हों और राजकीय पुरुषों का उत्तमोत्तम पदार्थों द्वारा सत्कार करें, जिससे वे सर्वत्र सत्कारार्ह सिद्ध हों॥७॥विद्वज्जन देश का इतिहास लिखें और स्वयं कर्म करते हुए अन्यों से करवावें॥७॥

आ नू॒नं र॒घुव॑र्तनिं॒ रथं॑ तिष्ठाथो अश्विना। आ वां॒ स्तोमा॑ इ॒मे मम॒ नभो॒ न चु॑च्यवीरत॥

हे बलवान् सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! आप अपने शीघ्रगामी देदीप्यमान रथपर चढ़कर हमारे यज्ञ को प्राप्त हों, हम स्तोत्रों द्वारा आपका आह्वान करते हैं॥८॥राजा प्रजा-कार्य निरीक्षण के लिये रथ पर चढ़ बाहर सदा जाया करें॥८॥

यद॒द्य वां॑ नासत्यो॒क्थैरा॑चुच्युवी॒महि॑। यद्वा॒ वाणी॑भिरश्विने॒वेत्का॒ण्वस्य॑ बोधतम्॥

हे सत्यसङ्कल्प सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! हम विद्वान् लोग वेदों के स्तोत्रों द्वारा तथा निज वाणियों द्वारा आपका आह्वान करते हैं, आप हमारे इस भाव को जानकर अवश्य हमारे यज्ञ को प्राप्त हों॥९॥सर्व प्रजाएँ राजा का सम्मान करें, वह भी सर्वप्रजाओं का सम्मान करता हुआ तत्त्ववित् पुरुष की विशेषतया पूजा करे॥९॥

यद्वां॑ क॒क्षीवाँ॑ उ॒त यद्व्य॑श्व॒ ऋषि॒र्यद्वां॑ दी॒र्घत॑मा जु॒हाव॑। पृथी॒ यद्वां॑ वै॒न्यः साद॑नेष्वे॒वेदतो॑ अश्विना चेतयेथाम्॥

हे मान्यवर सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! यदि आपको ऐश्वर्य्यसम्पन्न तथा निर्धन विद्वान् अथवा तमोगुणी शूरवीर वा बुद्धिमान् विद्वान् पुरुष आह्वान करें, तो आप उनका निमन्त्रण स्वीकार कर अवश्य आवें और अपने उपदेश से इस मनुष्यसुधारक यज्ञ को पूर्ण करें॥१०॥विद्वान् भी देशोद्धारक राजा और अमात्यादिवर्ग का यशोगान से सम्मान करें॥१०॥

या॒तं छ॑र्दि॒ष्पा उ॒त नः॑ पर॒स्पा भू॒तं ज॑ग॒त्पा उ॒त न॑स्तनू॒पा। व॒र्तिस्तो॒काय॒ तन॑याय यातम्॥

हे बलवान् सबकी रक्षा करनेवाले सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! आप शत्रुओं से हमारी और हमारे गृह=अन्तःपुर की रक्षा करें और हमारे पुत्र-पौत्रों की भी रक्षा करते हुए उन्हें विद्यादान द्वारा योग्य बनावें॥११॥राजा प्रजाओं की सर्व वस्तुओं की रक्षा करें और करावें॥११॥

यदिन्द्रे॑ण स॒रथं॑ या॒थो अ॑श्विना॒ यद्वा॑ वा॒युना॒ भव॑थः॒ समो॑कसा। यदा॑दि॒त्येभि॑ॠ॒भुभिः॑ स॒जोष॑सा॒ यद्वा॒ विष्णो॑र्वि॒क्रम॑णेषु॒ तिष्ठ॑थः॥

हे श्रीमान् सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! सम्राट् के सहगामी तथा उनके समीपवर्ती होने के कारण आप हमारी अभीष्ट कामनाओं को पूर्ण करें, जिससे हमारे याज्ञिक कार्य्य सफलतापूर्वक पूर्ण हों॥१२॥यदि कोई प्रजा आपत्ति में प्राप्त होकर राजा को बुलावे, तो राजा सर्व आवश्यक कार्यों को छोड़ प्रथम उस प्रजा का उस आपत्ति से उद्धार करे॥१२॥

यद॒द्याश्विना॑व॒हं हु॒वेय॒ वाज॑सातये। यत्पृ॒त्सु तु॒र्वणे॒ सह॒स्तच्छ्रेष्ठ॑म॒श्विनो॒रवः॑॥

हे सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! यदि हमें अपनी रक्षा के लिये शत्रुओं के सन्मुख होकर युद्ध करना पड़े, तो आप हमारे रक्षक हों, क्योंकि आप बलवान् होने से विद्वानों की सदैव रक्षा करनेवाले हैं॥१३॥जब-२ विद्वान् या मूर्ख प्रजा राजा को न्यायार्थ बुलावें, तब-२ शीघ्र राजा वहाँ पहुँचे॥१३॥

आ नू॒नं या॑तमश्विने॒मा ह॒व्यानि॑ वां हि॒ता। इ॒मे सोमा॑सो॒ अधि॑ तु॒र्वशे॒ यदा॑वि॒मे कण्वे॑षु वा॒मथ॑॥

हे सर्वत्र विख्यात सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! आप हमको प्राप्त होकर हमारा सत्कार स्वीकार करें। हम लोगों ने आपके अनुकूल भोजन तथा सोमरस सिद्ध किया है, इसको स्वीकार कर हम पर प्रसन्न हों॥१४॥प्रजाओं को उचित है कि वे यथायोग्य सत्कार राजा और अमात्यादिकों का अन्नादिकों से भी करें॥१४॥

यन्ना॑सत्या परा॒के अ॑र्वा॒के अस्ति॑ भेष॒जम्। तेन॑ नू॒नं वि॑म॒दाय॑ प्रचेतसा छ॒र्दिर्व॒त्साय॑ यच्छतम्॥

हे सत्यवादी सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! आप हमको भोजन के लिये अन्नादि पदार्थों सहित वासयोग्य उत्तम गृह प्रदान करें, जिसमें वास करते हुए हम लोग आत्मिकोन्नति में तत्पर रहें॥१५॥राजा को उचित है कि असमर्थ पुरुषों के लिये सुख का गृह बनवा देवें॥१५॥

अभु॑त्स्यु॒ प्र दे॒व्या सा॒कं वा॒चाहम॒श्विनोः॑। व्या॑वर्दे॒व्या म॒तिं वि रा॒तिं मर्त्ये॑भ्यः॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि प्रातः उषाकाल में उठ कर दिव्य ज्योतिः की स्तुति में प्रवृत्त याज्ञिक पुरुष प्रार्थना करते हैं कि हे परमात्मन्! हमारी पढ़ी हुई विद्या प्रकाशित हो अर्थात् फलप्रद हो जिससे हम सब पदार्थ उपलब्ध कर सकें॥१६॥जो कोई प्रातःकाल उठकर परमात्मा की स्तुति करता है, उसकी बुद्धि विमला होती है और बुद्धि प्राप्त होने पर विविध ऐहिक और पारलौकिक धन वह उपासक प्राप्त करता है॥१६॥

प्र बो॑धयोषो अ॒श्विना॒ प्र दे॑वि सूनृते महि। प्र य॑ज्ञहोतरानु॒षक्प्र मदा॑य॒ श्रवो॑ बृ॒हत्॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि प्रत्येक श्रमजीवी उषाकाल में जागकर स्व-स्व कार्य्य में प्रवृत्त हों। उषाकाल में प्रबुद्ध पुरुष को विद्या, ऐश्वर्य्य, हर्ष, उत्साह तथा नीरोगतादि सब महत्त्वविशिष्ट पदार्थ प्राप्त होते हैं॥१७॥क्या राजा क्या प्रजा, सब ही प्रातःकाल उठकर ईश्वर की स्तुति प्रार्थना करें॥१७॥

यदु॑षो॒ यासि॑ भा॒नुना॒ सं सूर्ये॑ण रोचसे। आ हा॒यम॒श्विनो॒ रथो॑ व॒र्तिर्या॑ति नृ॒पाय्य॑म्॥

इस मन्त्र में यह वर्णन किया है कि सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष उषाकाल से अपने रथों पर चढ़कर राष्ट्र का प्रबन्ध करते हुए सूर्योदय में घर को लौटते हैं, उनका प्रबन्ध राष्ट्र के लिये प्रशंसित होता है। इसी प्रकार जो पुरुष उषाकाल में जागकर अपने ऐहिक और पारलौकिक कार्यों को विधिवत् करते हैं, वे अपने मनोरथ में अवश्य कृतकार्य्य होते हैं॥१८॥प्रातःकाल उठकर मन्त्रिदलों के साथ राजा प्रजा के गृह पर जाकर मङ्गल-समाचार पूछे॥१८॥

यदापी॑तासो अं॒शवो॒ गावो॒ न दु॒ह्र ऊध॑भिः। यद्वा॒ वाणी॒रनू॑षत॒ प्र दे॑व॒यन्तो॑ अ॒श्विना॑॥

जब योद्धा लोग सोमरसपान करके आह्लादित होते अथवा वेदवाणियें उनके शूरवीरतादि गुणों की प्रशंसा करतीं हैं, तब वे योद्धा लोग उस समय गौओं के दूध-समान सब अर्थियों के अर्थ पूर्ण करने में समर्थ होते हैं और इसी अवस्था में सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष उनको सुरक्षित रखते हैं अर्थात् उत्साहित योद्धा लोग गौओं के दूधसमान बलप्रद होते और उन्हीं को सेनाध्यक्ष सुरक्षित रखकर अपनी विजय से उत्साहित होता है॥१९॥प्रातःकाल ही यज्ञ कर्त्तव्य हैं, राजा भी प्रातः ही उठकर स्वकार्य में अपने को लगावे॥१९॥

प्र द्यु॒म्नाय॒ प्र शव॑से॒ प्र नृ॒षाह्या॑य॒ शर्म॑णे। प्र दक्षा॑य प्रचेतसा॥

इस मन्त्र में अभ्युदय तथा निःश्रेयस सिद्धि की प्रार्थना की गई है अर्थात् ज्ञानवृद्ध पुरुषों से ज्ञानलाभ करके अभ्युदय और निःश्रेयस की वृद्धि करनी चाहिये॥२०॥राजा स्वसैन्यों से प्रजाओं के समस्त धनों की रक्षा करे॥२०॥

यन्नू॒नं धी॒भिर॑श्विना पि॒तुर्योना॑ नि॒षीद॑थः। यद्वा॑ सु॒म्नेभि॑रुक्थ्या॥

हे प्रशंसनीय सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! हम लोग आपका आह्वान करते हैं कि आप हमारे विद्याप्रचाररूप यज्ञ को पूर्ण करते हुए हमारे योगक्षेम का सम्यक् प्रबन्ध करें, जिससे हम धर्मसम्बन्धी कार्यों के करने में शिथिल न हों॥२१॥यह नवम सूक्त और तेतीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥प्रातःकाल कदापि भी आलस्य से युक्त हो राजा न सोता रहे। यह शिक्षा इससे देते हैं॥२१॥

यत्स्थो दी॒र्घप्र॑सद्मनि॒ यद्वा॒दो रो॑च॒ने दि॒वः। यद्वा॑ समु॒द्रे अध्याकृ॑ते गृ॒हेऽत॒ आ या॑तमश्विना॥

इस मन्त्र का भाव स्पष्ट है अर्थात् याज्ञिक लोगों का कथन है कि हे सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! आप उक्त स्थानों में से कहीं भी हों, कृपा करके हमारे विद्याप्रचार तथा प्रजारक्षणरूप यज्ञ में आकर हमारे मनोरथ सफल करें॥१॥सब कार्यों को छोड़ राजा स्वबलों के साथ प्रजा की ही रक्षा करे। राजभवन में या क्रीड़ास्थान में या अतिदूर अगम्य स्थान में वहाँ से आकर प्रजा की बाधाओं को दूर करे॥१॥

यद्वा॑ य॒ज्ञं मन॑वे सम्मिमि॒क्षथु॑रे॒वेत्का॒ण्वस्य॑ बोधतम्। बृह॒स्पतिं॒ विश्वा॑न्दे॒वाँ अ॒हं हु॑व॒ इन्द्रा॒विष्णू॑ अ॒श्विना॑वाशु॒हेष॑सा॥

हे सर्वत्र प्रसिद्ध, हे सब विद्वानों की कामनाओं को पूर्ण करनेवाले सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! जिस प्रकार आप ज्ञानी जनों के यज्ञ को प्राप्त होकर उनकी कामनाओं को पूर्ण करते हैं, इसी प्रकार आप हम विद्वत्पुत्रों के यज्ञ को प्राप्त होकर हमारे यज्ञ की त्रुटियों को पूर्ण करनेवाले हों॥२॥मनु=मननकर्ता और कण्व=ग्रन्थकर्त्ता, ये दोनों सदा सर्वकार्य्यसिद्धार्थ रक्षणीय हैं। यज्ञ में जैसे राजा, राज्ञी और अमात्यादि बुलाए जाते हैं, वैसे ही अन्य कर्मचारी व्यवहारज्ञ और कार्यकुशल देशजन भी निमन्त्रणयोग्य हैं॥२॥

त्या न्व१॒॑श्विना॑ हुवे सु॒दंस॑सा गृ॒भे कृ॒ता। ययो॒रस्ति॒ प्र णः॑ स॒ख्यं दे॒वेष्वध्याप्य॑म्॥

हे वैदिककर्म करनेवाले सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! हम लोग आपके साथ मैत्रीपालन करने के लिये आपका आह्वान करते हैं। आप हमारे यज्ञ में आकर प्रजापालनरूप शुभकर्मों में योग दें, ताकि हमारा यज्ञ सर्वाङ्गपूर्ण हो॥३॥जो आश्चर्यकर्मों को कर्ता और प्रजाओं के क्लेशहर हैं, जिनके साथ प्रजाओं की मैत्री होती है और जिनका यश सर्वत्र प्रख्यात हो जाता है, वे माननीय हैं॥३॥

ययो॒रधि॒ प्र य॒ज्ञा अ॑सू॒रे सन्ति॑ सू॒रयः॑। ता य॒ज्ञस्या॑ध्व॒रस्य॒ प्रचे॑तसा स्व॒धाभि॒र्या पिब॑तः सो॒म्यं मधु॑॥

हे सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! विद्यारहित प्रदेशों में विद्याप्रचार का सुप्रबन्ध उन देशों में वास करनेवाले विद्वानों द्वारा करावें और हिंसारहित यज्ञों में सहायक होकर उनको पूर्ण करें॥४॥जो राजा कर्मचारियों के साथ शुभकर्मों की रक्षा करते, जिनकी प्रजाएँ प्रातःकाल ही उठकर अपने-२ कार्य्य में लग जाते, जो यज्ञतत्त्वों को जानते, वे ही राजा प्रजा के मध्य माननीय होते हैं॥४॥

यद॒द्याश्वि॑ना॒वपा॒ग्यत्प्राक्स्थो वा॑जिनीवसू। यद्द्रु॒ह्यव्यन॑वि तु॒र्वशे॒ यदौ॑ हु॒वे वा॒मथ॒ मा ग॑तम्॥

इस मन्त्र में याज्ञिक यजमान की ओर से कथन है कि हे पूर्ण बल=सेनाओं के अधिपति सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! मैं आपका आह्वान करता हूँ कि आप उपर्युक्त स्थानों में अथवा इनसे भिन्न स्थानों में कहीं भी हों, कृपा करके मेरे यज्ञ में आकर सहायक हों॥५॥प्रजाओं के कार्यनिरीक्षण के निमित्त राजा सर्वत्र जाया करें। किन्तु जहाँ अधिक आवश्यकता हो, वहाँ प्रथम जाना उचित है॥५॥

यद॒न्तरि॑क्षे॒ पत॑थः पुरुभुजा॒ यद्वे॒मे रोद॑सी॒ अनु॑। यद्वा॑ स्व॒धाभि॑रधि॒तिष्ठ॑थो॒ रथ॒मत॒ आ या॑तमश्विना॥

हे अनेक पदार्थों के भोक्ता श्रीमान् सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष! आप उक्त स्थानों में हों अथवा अन्यत्र राष्ट्रिय कार्य्यों में प्रवृत्त होने पर भी हमारे यज्ञ को प्राप्त होकर पूर्णाहुति द्वारा सम्पूर्ण याज्ञिक कार्यों को पूर्ण करें॥६॥यह दसवाँ सूक्त और चौतीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥अपनी क्रीड़ा और आनन्द को छोड़कर राजा सदा प्रजारक्षण में तत्पर हों॥६॥

त्वम॑ग्ने व्रत॒पा अ॑सि दे॒व आ मर्त्ये॒ष्वा। त्वं य॒ज्ञेष्वीड्यः॑॥

हे सर्वरक्षक, सर्वव्यापक, सर्वप्रतिपालक परमात्मन्! आप सबके पिता=पालन, पोषण तथा रक्षण करनेवाले और सबको कर्मानुसार फल देनेवाले हैं, इसीलिये आपकी यज्ञादि शुभकर्मों में प्रथम ही स्तुति की जाती है कि आपके अनुग्रह से हमारा यह शुभ कर्म पूर्ण हो॥१॥सर्वत्र यज्ञों, शुभकर्मों और गृह्यकर्मों में एक परमात्मा ही पूज्य है॥१॥

त्वम॑सि प्र॒शस्यो॑ वि॒दथे॑षु सहन्त्य। अग्ने॑ र॒थीर॑ध्व॒राणा॑म्॥

हे परमपिता परमात्मन्! आप सम्पूर्ण हिंसारहित कर्मों के प्रचारक तथा नेता होने से सब यज्ञादि कर्मों में प्रथम ही स्तुति किये जाते हैं॥२॥हे मनुष्यों! सर्वत्र परमात्मा ही को पूजो, क्योंकि वही सबका नेता है॥२॥

स त्वम॒स्मदप॒ द्विषो॑ युयो॒धि जा॑तवेदः। अदे॑वीरग्ने॒ अरा॑तीः॥

हे सर्वव्यापक तथा सर्वरक्षक परमात्मन्! आप हमारे शत्रुओं और उनके साथी दुष्ट जनों से हमारी सदैव रक्षा करें, क्योंकि आप सब कर्मों के जाननेवाले हैं॥३॥ईश्वरोपासक प्रथम सर्व द्वेषों और कामादिक शत्रुओं को दूर करें। तदर्थ परमात्म-प्रार्थना भी करें॥३॥

अन्ति॑ चि॒त्सन्त॒मह॑ य॒ज्ञं मर्त॑स्य रि॒पोः। नोप॑ वेषि जातवेदः॥

हे सब चराचर प्राणिजात के शुभाशुभकर्मों को जाननेवाले परमात्मन्! शत्रुजनों से होनेवाले हिंसारूप यज्ञ को आप नहीं जानते अर्थात् अवश्य जानते हैं, सो आप उसका फल उनको यथायोग्य ही प्रदान करेंगे॥४॥दुष्टजन और उनके कर्म आदरणीय नहीं हैं॥४॥

मर्ता॒ अम॑र्त्यस्य ते॒ भूरि॒ नाम॑ मनामहे। विप्रा॑सो जा॒तवे॑दसः॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि हे परमात्मन्! हम विद्वान् लोग आपको अजर=बुढ़ापे से रहित, अमर=मरणधर्म से रहित, इन्द्र=सबका पालक, वरुण=सबको वशीभूत रखनेवाला और अग्नि=प्रकाशस्वरूप आदि गुणविशिष्ट जानते हैं॥५॥परमात्मवाचक शब्दों को विचारता हुआ उनके अर्थों के अनुकूल अपना आचरण बनावें॥५॥

विप्रं॒ विप्रा॒सोऽव॑से दे॒वं मर्ता॑स ऊ॒तये॑। अ॒ग्निं गी॒र्भिर्ह॑वामहे॥

उपर्युक्त गुणसम्पन्न परमात्मा को हम विद्वान् लोग वेदवाणियों द्वारा आह्वान करते अर्थात् उनके समीपी होते हैं कि वह सर्वज्ञ परमात्मा हमारी सब ओर से रक्षा करें॥६॥परमात्मा की स्तुति सब ही करें॥६॥

आ ते॑ व॒त्सो मनो॑ यमत्पर॒माच्चि॑त्स॒धस्था॑त्। अग्ने॒ त्वांका॑मया गि॒रा॥

हे परमात्मन्! आपसे रक्षा किया हुआ याज्ञिक पुरुष कामनाओं को पूर्ण करनेवाली वेदवाणियों द्वारा आपके ज्ञान को विस्तृत करता अर्थात् आपके ज्ञान का प्रचार करता हुआ प्रजा को आपकी ओर आकर्षित करता है कि सब मनुष्य आपको ही पूज्य मानकर आपकी ही उपासना में प्रवृत्त हों॥७॥परमात्मा सर्वत्र विद्यमान है, उसको वही प्रसन्न कर सकता है, जो उसकी आज्ञाओं को बरतते हैं॥७॥

पु॒रु॒त्रा हि स॒दृङ्ङसि॒ विशो॒ विश्वा॒ अनु॑ प्र॒भुः। स॒मत्सु॑ त्वा हवामहे॥

हे परमेश्वर! आप सर्वत्र समानरूप से विद्यमान होने के कारण सर्वद्रष्टा होने से सबके प्रभु=स्वामी हैं, इसी से क्षात्रधर्म में प्रवृत्त योद्धा लोग युद्ध में आपका आश्रयण करते हैं॥८॥हे मनुष्यों! परमात्मा सर्वत्र सम है और सबका शासक है, यह प्रतीत करो और उसी को इस कारण हृदय में ध्यान करो और संकटों में बुलाओ॥८॥

स॒मत्स्व॒ग्निमव॑से वाज॒यन्तो॑ हवामहे। वाजे॑षु चि॒त्ररा॑धसम्॥

हे परमात्मन्! आपको विचित्र सामग्रीवाला होने से सब मनुष्य आपसे अपनी रक्षा की याचना करते और योद्धा लोग संग्रामों में आपसे ही विजय की प्रार्थना करते हैं॥९॥वही बलदा और विज्ञानदाता है, तदर्थ वही पूज्य है, यह जानना चाहिये॥९॥

प्र॒त्नो हि क॒मीड्यो॑ अध्व॒रेषु॑ स॒नाच्च॒ होता॒ नव्य॑श्च॒ सत्सि॑। स्वां चा॑ग्ने त॒न्वं॑ पि॒प्रय॑स्वा॒स्मभ्यं॑ च॒ सौभ॑ग॒मा य॑जस्व॥

हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन्! आप पुरातन होने से सबके उपासनीय हैं। कृपा करके हमारी शारीरिक, आत्मिक तथा सामाजिक उन्नति में सहायक हों, जिससे हम लोग बलवान् होकर मनुष्यजन्म के फलचतुष्टय को प्राप्त हों और एकमात्र आप ही की उपासना तथा आप ही की आज्ञापालन करते हुए सौभाग्यशाली हों, यह हमारी आपसे विनयपूर्वक प्रार्थना है। मन्त्र में “कम्” पद पादपूरणार्थ आया है॥१०॥तात्पर्य्य यह है कि इस सूक्त में परोपकार का उपदेश करते हुए एकमात्र परमात्मा की ही उपासना का वर्णन किया गया है अर्थात् परमात्मा की अनन्योपासना में हेतु दर्शाकर यह वर्णन किया है कि वह परमात्मा “प्रत्न”=अनादि तथा “नव्य”=नित्य अजर होने से हिंसारहित यज्ञों का सर्वदा सहायक है और यज्ञ का अर्थ परोपकार करना है। ब्रह्माण्ड के पालन की प्रार्थना का उपदेश इसलिये आया है कि प्रत्येक उपासक प्राणिमात्र का हित चाहता हुआ अपने हित की इच्छा करे, क्योंकि परोपकारी पुरुष ही को अभ्युदय प्राप्त होता और वही निःश्रेयस का अधिकारी होता है, यह वेद का अटल सिद्धान्त है। इस अष्टमाध्याय के उपसंहार में यह वर्णन किया है कि उपासक लोग यज्ञों द्वारा परोपकार में प्रवृत्त रहकर उक्त गुणविशिष्ट एकमात्र परमात्मा की ही उपासना करें अर्थात् अनित्य, नश्वर आदि भावोंवाले साधारण जनों को छोड़कर नित्य पवित्र, अजर, अमर, अभय, सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों के पालक, पोषक तथा रक्षक परमात्मा ही की उपासना में प्रवृत्त रहें, जैसा कि “माचिदन्यद्विशंसत” ऋग्० ८। १। १=हे सबके मित्र=परोपकारप्रिय उपासको! तुम परमात्मा से भिन्न अन्य किसी की उपासना मत करो, क्योंकि अन्य की उपासना से पुरुष आत्महिंसक होता है और इसी भाव को “मम त्वा सूर उदिते” ऋग्० ८। १। २९=हे परमात्मन्! मैं सर्वदा सब कालों में आप ही की स्तुति में प्रवृत्त रहूँ अर्थात् आप ही की उपासना करूँ, “त्वामिच्छवसस्पते कण्वा उक्थेन वावृधुः” ऋग्० ८। ६। २१=हे सब बलों के आधार परमात्मन्! विद्वान् पुरुष स्तुतियों द्वारा आप ही के यश को बढ़ाते अर्थात् आप ही की उपासना में प्रवृत्त रहते हैं, सो हे प्रभो! आप हमको बल दें कि हम लोग आप ही की उपासना तथा आप ही की आज्ञापालन करते हुए मनुष्यजन्म के फलचतुष्टय को प्राप्त हों॥सर्व शुभ कार्यों में परमात्मा ही पूज्य, गेय और ध्येय है॥१०॥

य इ॑न्द्र सोम॒पात॑मो॒ मदः॑ शविष्ठ॒ चेत॑ति। येना॒ हंसि॒ न्य१॒॑त्रिणं॒ तमी॑महे॥

हे सर्वोपरि बलवान् परमेश्वर! आप सम्पूर्ण संसार की उत्पत्ति, स्थिति तथा लयकर्त्ता हैं, आप सब बलों में सर्वश्रेष्ठ बलवान् तथा व्यापकत्वेन सर्वत्र जागरूक होकर सब कर्मों में द्रष्टा और वेदमार्ग से रहित पुरुषों के दण्डदाता हैं अर्थात् आप सम्पूर्ण लोक-लोकान्तरों को अपने स्वरूप में धारण करते हुए सूक्ष्म और स्थूल संसार को एकदेश में रखकर सर्वत्र व्यापक हैं। हे प्रभो! हम आपसे याचना करते हैं कि आप हमें शारीरिक, आत्मिक तथा सामाजिक बल प्रदानकर बलवान् बनावें, ताकि हम अपने अभीष्ट फल को प्राप्त होकर मनुष्यजन्म सफल करें॥१॥यदि ईश्वरीय नियम से हम मनुष्य चलें, तो कोई रोग नहीं हो सकता, अतः इस प्रार्थना से आशय यह है कि प्रत्येक आदमी उसकी आज्ञापालन करे, तब देखें कि संसार के उपद्रव शान्त होते हैं या नहीं॥१॥

येना॒ दश॑ग्व॒मध्रि॑गुं वे॒पय॑न्तं॒ स्व॑र्णरम्। येना॑ समु॒द्रमावि॑था॒ तमी॑महे॥

इस मन्त्र में यह कथन किया है कि यह भौतिक जड़ शरीर उसी परमात्मा की शक्ति से चेतनशक्ति को पाकर दश इन्द्रियों का अनुगामी बनकर विविध क्रिया करने में समर्थ होता है और “स्वर्णरम्” का अर्थ स्वतन्त्र है, जिससे यह सूचित किया है कि यह जीव कर्म करने में स्वतन्त्र और फल भोगने में परतन्त्र है, क्योंकि परमात्मा प्रत्येक जीव के लिये कर्तृत्व तथा इष्टानिष्ट कर्मों की रचना नहीं करता, किन्तु यह जीव का ही स्वभाव है कि जिससे वह स्वयं इष्टानिष्ट कर्मों में प्रवृत्त होता है॥२॥हे मनुष्यों! प्रथम ईश्वर तुम्हारी रक्षा माता के उदर में करता है, तत्पश्चात् जिससे तुम्हारा अस्तित्व है, उस सूर्य्य का भी वही रक्षक है और जिससे तुम्हारी जीवनयात्रा के लिये विविध अन्न उत्पन्न होते हैं, उस महासमुद्र का भी वही रक्षक है॥२॥

येन॒ सिन्धुं॑ म॒हीर॒पो रथाँ॑ इव प्रचो॒दयः॑। पन्था॑मृ॒तस्य॒ यात॑वे॒ तमी॑महे॥

हे परमात्मन्! आप अपने जिस पराक्रम से महान् जलों को शीघ्रगामी रथों के समान शीघ्रता से समुद्र को प्राप्त कराते हैं, वह पराक्रम, तेज और बल हमें भी दीजिये और हे परमपिता परमात्मन्! आप हम लोगों को सत्य पर ले जाएँ, ताकि हम लोग मन, कर्म और वचन से सत्यव्यवहार में प्रवृत्त हों, हम कभी भी असत्य का आश्रय न लें, यह हम आपसे याचना करते हैं। हे प्रभो! हमारा मनोरथ सफल करें॥३॥यह परमात्मा का महान् नियम है कि पृथिवीस्थ जल समुद्र में और समुद्र का पृथिवी में एवं पृथिवी और समुद्र से उठकर जल मेघ बनता और वहाँ से पुनः समुद्रादि में गिरता है। इत्यादि अनेक नियम के अध्ययन से मनुष्य सत्यता की ओर जा सकता है। हे भगवन्! सत्यता की ओर हमको ले चलो॥३॥

इ॒मं स्तोम॑म॒भिष्ट॑ये घृ॒तं न पू॒तम॑द्रिवः। येना॒ नु स॒द्य ओज॑सा व॒वक्षि॑थ॥

हे सब बलों में सर्वोपरि बलवान् परमेश्वर! हम लोग पवित्र स्तोत्रों द्वारा आपसे याचना करते हैं। कृपा करके हमारी कामनाओं को पूर्ण करें, ताकि हम वैदिक अनुष्ठान में प्रवृत्त रहें। हे प्रभो! आप पराक्रमसम्पन्न हैं, हमें भी पराक्रमी बनावें, ताकि हम वैदिकमार्ग से च्युत दुष्टों के दमन करने में सदा साहसी हों॥४॥यद्यपि परमात्मा सदा एकरस रहता है, मनुष्य केवल अपना कर्त्तव्यपालन करता हुआ शुभकर्म में और ईश्वरीय स्तुति प्रार्थना आदि में प्रवृत्त होता है। ईश्वरीय नियमानुसार उस कर्म का फल मनुष्य को मिलता रहता है, तथापि यदि उपासक की स्तुति सुनकर परमदेव प्रसन्न और चौरादिक आततायी जनों के दुष्कर्मों से अप्रसन्न न हो, तो संसार किस प्रकार चल सकता है। इससे इसकी एकरसता में किञ्चित् भी विकार नहीं होता। इस संसार का कोई विवेकी शासक भी होना चाहिये इत्यादि विविध भावना से प्रेरित हो मनुष्य स्तुति आदि शुभकर्म में प्रवृत्त होता है। यही आशय वेद भगवान् दिखलाता है। मनुष्य की प्रवृत्ति के अनुसार ही वेद है कि भगवान् भक्तों की स्तुति सुनता है और प्रसन्न होकर इस जगत् की रक्षा करता है॥४॥

इ॒मं जु॑षस्व गिर्वणः समु॒द्र इ॑व पिन्वते। इन्द्र॒ विश्वा॑भिरू॒तिभि॑र्व॒वक्षि॑थ॥

हे सर्वरक्षक परमात्मन्! आप सम्पूर्ण लोक-लोकान्तरों के रक्षक तथा पालक हैं, हमारे इस स्तुतिप्रद स्तोत्र को श्रवण करते हुए हमारी सब ओर से रक्षा करें। हे पवित्र वाणियों से भजनीय परमेश्वर! लोक-लोकान्तरों के धारण करनेवाले तथा उनको नियम में चलानेवाले आप ही हैं, कृपा करके हमारी रक्षा करते हुए हमें भी बल प्रदान करें, कि हम लोग वैदिक अनुष्ठानरूप नियम से कभी च्युत न हों॥५॥प्रेम और सद्भाव से विरचित स्तोत्र वा प्रार्थना को भगवान् अवश्य सुनता है। ऐसे-२ मनुष्यों के शुभकर्म से जगत् का स्वतः कल्याण होता है॥५॥

यो नो॑ दे॒वः प॑रा॒वतः॑ सखित्व॒नाय॑ माम॒हे। दि॒वो न वृ॒ष्टिं प्र॒थय॑न्व॒वक्षि॑थ॥

इस मन्त्र में परमात्मा की स्तुति का वर्णन करते हैं। हे परमपिता प्रभो! हम आपके अत्यन्त कृतज्ञ हैं, आप हमारे पालन-पोषण के लिये इष्ट पदार्थों को दूरदेशों से प्राप्त कराते हैं। हे हमारे पालक पिता! आप द्युलोक से वृष्टि वर्षाकर हमें अन्नादि अनेक पदार्थ देते हैं। हे परमात्मन्! आप हमें बल दें कि हम कृतघ्न न होते हुए सदैव आपकी आज्ञापालन में प्रवृत्त रहें, जैसे लोक में सुपुत्र सदा अपने पिता की आज्ञापालन करते हैं॥६॥जो यह परमदेव वर्षा के समान आनन्द की वृष्टि कर रहा है, वह हमारा पूज्य और वही परममित्र है॥६॥

व॒व॒क्षुर॑स्य के॒तवो॑ उ॒त वज्रो॒ गभ॑स्त्योः। यत्सूर्यो॒ न रोद॑सी॒ अव॑र्धयत्॥

इस मन्त्र में ज्ञान को संसार का पालक इसलिये कहा है कि बिना ज्ञान के जड़ प्रकृति किसी कार्य्य की प्रवृत्ति अथवा निवृत्ति में समर्थ नहीं हो सकती। जिस प्रकार सूर्य्य अपने प्रकाश से जगत् के सकल घटापटादि पदार्थों को व्यक्त करता है, इसी प्रकार जीव भी प्रकृति के आश्रित होकर ज्ञानशक्ति ही से सम्पूर्ण पदार्थों को विषय करता है और इस परमात्मा की पालन तथा संहाररूप दोनों शक्ति ही गभन्ति=बाहुस्थानीय मानी है, जिनसे सत्पुरुषों का पालन तथा असत्पुरुषों का संहाररूप दण्ड से संसार की स्थिति होती है॥७॥उस देव के नियम और दण्ड से ही यह जगत् चल रहा है। इसका कर्त्ता भी वही है। जैसे प्रत्यक्षरूप से सूर्य इसको सब प्रकार सुख पहुँचाता है, तद्वत् ईश्वर भी। परन्तु वह अदृश्य है, अतः हमको उसकी क्रिया प्रतीत नहीं होती है॥७॥

यदि॑ प्रवृद्ध सत्पते स॒हस्रं॑ महि॒षाँ अघः॑। आदित्त॑ इन्द्रि॒यं महि॒ प्र वा॑वृधे॥

हे दुष्टनाशक तथा सज्जनप्रतिपालक परमात्मन्! आप वेदविहित कर्मों के पालक, सज्जनों के सदा सहायक रहते हैं, जो अपने कर्मानुष्ठान में कभी विचल नहीं होते और आप दुष्ट असुरों के सदा नाशक हैं। यह आपका नियम अटल है, इसी से आप महान् हैं कि आप सदा न्यायदृष्टि से ही संसार का पालन, पोषण तथा रक्षण करते हैं॥८॥इस जगत् की तब ही वृद्धि होती है, जब इस पर उसकी कृपा होती है॥८॥

इन्द्रः॒ सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॒र्न्य॑र्शसा॒नमो॑षति। अ॒ग्निर्वने॑व सास॒हिः प्र वा॑वृधे॥

वह पूर्ण परमात्मा, जो सर्वोपरि विराजमान है, वही हमारे दुःखों का हर्त्ता और सुखों का देनेवाला है। जैसे सूर्य्य अपनी रश्मियों द्वारा शीतनिमित्तक विकारों को निवृत्त करता है, तद्वत् परमात्मा सब विकारों को निवृत्त करके हमको सुख प्राप्त कराते हैं, अतएव उनकी आज्ञापालन करना ही सुख की प्राप्ति और परमात्मा से विमुख होना ही घोर दुःखों में पड़कर मनुष्यजीवन को नष्ट करना है॥९॥परमदेव ने इस जगत् की रक्षा के लिये ही सूर्य्यादिकों को स्थापित किया है। सूर्य्य, अग्नि, वायु और जलादि पदार्थों द्वारा ही सकल विघ्नों को शान्त किया करता है॥९॥

इ॒यं त॑ ऋ॒त्विया॑वती धी॒तिरे॑ति॒ नवी॑यसी। स॒प॒र्यन्ती॑ पुरुप्रि॒या मिमी॑त॒ इत्॥

हे सर्वोपरि तथा सर्वस्वामी परमेश्वर! हम लोग ऋतु-२ में यज्ञों द्वारा आपकी स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना करते हुए सम्पूर्ण प्रजाओं में आपका यश तथा ऐश्वर्य्य प्रकाशित करते हैं। आप यज्ञरूप, तथा यज्ञ का विस्तार करनेवाले हैं। हे प्रभो! हमें सब दुःखों से दूर रखकर शक्ति प्रदान करो, कि हम लोग नित्य-नैमित्तिक यज्ञों द्वारा आपके यजन करने में प्रवृत्त रहें॥१०॥ऐसे-२ मन्त्रों द्वारा गूढ़ रहस्य प्रकाशित किया जाता है, किन्तु इन पर अधिक यदि टीका-टिप्पणी की जाय, तो ग्रन्थ का बहुत विस्तार हो जायेगा और पाठक पढ़ते-२ थक जाएँगें, अतः यहाँ सब विषय संक्षिप्तरूप से निरूपित होता है। धीति=धी=विज्ञान। ईश्वरीय विज्ञान किस प्रकार सृष्टि में विकाशित हो रहा है, इसको बाह्यरूप से मौनव्रतावलम्बी मुनिगण ही जानते हैं। इस ओर जो जितने लगते हैं, वे उतना जानते हैं। अद्यतनकाल में कैसे-२ नवीन अद्भुत कलाकौशल आविष्कृत हुए हैं, वे इन ही प्राकृत नियमों के अध्ययन से निकले हैं और विद्वानों की इसमें एक दृढ़तर सम्मति है कि ऐसी-२ सहस्रों बातें अभी प्रकृति में गुप्त रीति से लीन हैं, जिनका पता हमको अभी नहीं लगा है। भविष्यत् में वे क्रमशः विकाशित होते जाएँगें। अतः हे मनुष्यों! इन सृष्टिविज्ञानों का अध्ययन कीजिये, इति॥१०॥

गर्भो॑ य॒ज्ञस्य॑ देव॒युः क्रतुं॑ पुनीत आनु॒षक्। स्तोमै॒रिन्द्र॑स्य वावृधे॒ मिमी॑त॒ इत्॥

यज्ञ का प्रारम्भ करनेवाला ऋत्विक् सब विद्वानों की उपस्थिति में यज्ञ का अनुष्ठान करता हुआ स्तोत्रों द्वारा प्रथम परमात्मा का यजन करता अर्थात् परमात्मा की महिमा को सब पर प्रकट करके उसके महत्त्व को बढ़ाता और पश्चात् यज्ञ का प्रारम्भ करता है॥११॥जो कोई एकाग्रचित्त होकर ज्ञानपूर्वक उसका यजन करता है, वह पवित्र होता है और उसकी कीर्ति जगत् में विस्तीर्ण होती है॥११॥

स॒निर्मि॒त्रस्य॑ पप्रथ॒ इन्द्रः॒ सोम॑स्य पी॒तये॑। प्राची॒ वाशी॑व सुन्व॒ते मिमी॑त॒ इत्॥

जो पुरुष परमात्मा को स्नेहदृष्टि से देखते अर्थात् वेदविहित नियमों का पालन करते हैं, उन्हें परमात्मा इष्ट पदार्थों द्वारा सौम्यगुणसम्पन्न करके सुखी करते हैं, या यों कहो कि उनको वह ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त हो जाता है, जिससे वे सब दुर्गुणों को त्यागकर सर्वदा सद्गुणों का सेवन करते हुए सुख भोगते हैं॥१२॥सर्व पदार्थ के ऊपर अधिकार रखने के लिये परमात्मा सर्वव्यापक है और मधुर वाणी के समान वह सबका सहायक है॥१२॥

यं विप्रा॑ उ॒क्थवा॑हसोऽभिप्रम॒न्दुरा॒यवः॑। घृ॒तं न पि॑प्य आ॒सन्यृ॒तस्य॒ यत्॥

जिस प्रकार याज्ञिक लोग घृतद्वारा अग्नि को प्रज्वलित करते=बढ़ाते हैं, इसी प्रकार मेधावी पुरुष स्तुतियों द्वारा परमात्मा के महत्त्व को सर्वत्र प्रजाजनों में विस्तृत करते हैं, ताकि प्रजाजन उसकी महिमा को भले प्रकार जानकर उसी की उपासना में प्रवृत्त रहें॥१३॥ईश्वर की दैनिक स्तुति और प्रार्थनारूप यज्ञ सबसे बढ़कर है॥१३॥

उ॒त स्व॒राजे॒ अदि॑तिः॒ स्तोम॒मिन्द्रा॑य जीजनत्। पु॒रु॒प्र॒श॒स्तमू॒तय॑ ऋ॒तस्य॒ यत्॥

वेदवाणी परमात्मा के प्रकाशक स्तोत्रों को उत्पन्न करती है अर्थात् जिन स्तोमों में परमात्मा के गुणकीर्तन का वर्णन पाया जाता है, उनको वेदवाणी भले प्रकार प्रकट करती है और वही स्तोत्र हमको समृद्ध करके सब ओर से हमारी रक्षा के हेतु होते हैं, या यों कहो कि जिन स्तोत्रों में हमारी रक्षा का विधान है, उनके अनुकूल आचरण करने से हम सर्वदा सुरक्षित रहते हैं, अतएव उनके अनुकूल वर्तना मनुष्यमात्र को श्रेयस्कर है॥१४॥प्रत्येक वस्तु अपनी-२ सहायता और रक्षा के लिये परमात्मा से प्रार्थना कर रही है॥१४॥

अ॒भि वह्न॑य ऊ॒तयेऽनू॑षत॒ प्रश॑स्तये। न दे॑व॒ विव्र॑ता॒ हरी॑ ऋ॒तस्य॒ यत्॥

हे सत्यस्वरूप, हे सबका पालन, पोषण तथा संहार करनेवाले परमात्मन्! अग्निसदृश देदीप्यमान विद्वान् स्तुतियों द्वारा आपका प्रकाश करते अर्थात् प्रजाओं को आपकी ओर आकर्षित करते हैं कि परमात्मा की उपर्युक्त महान् शक्तियों को अनुभव करते हुए उसी की उपासना करो, अन्य की नहीं॥१५॥सब ही सत्यमार्ग पर चलें, यही ईश्वर की आज्ञा है, इसी को सूर्य्यादि देव सब ही दिखला रहे हैं॥१५॥

यत्सोम॑मिन्द्र॒ विष्ण॑वि॒ यद्वा॑ घ त्रि॒त आ॒प्त्ये। यद्वा॑ म॒रुत्सु॒ मन्द॑से॒ समिन्दु॑भिः॥

इस मन्त्र में परमात्मा को सर्वशक्तिसम्पन्न वर्णन किया गया है कि सूर्य्य, चन्द्रमादि दिव्य पदार्थों में जो शक्ति है, वह आप ही की दी हुई है और कर्म, उपासना तथा ज्ञानसम्पन्न विद्वानों और जो क्षात्रधर्म का पालन करनेवाले शूरवीरों में पराक्रम है, वह आप ही का प्रदत्त बल है। आपकी शक्ति तथा कृपा के बिना जड़-चेतन कोई भी पदार्थ न उन्नत हो सकता और न स्थिर रह सकता है॥१६॥ईश्वर सूर्य्य से लेकर तृणपर्य्यन्त व्याप्त है और सबका भरण-पोषण कर रहा है॥१६॥

यद्वा॑ शक्र परा॒वति॑ समु॒द्रे अधि॒ मन्द॑से। अ॒स्माक॒मित्सु॒ते र॑णा॒ समिन्दु॑भिः॥

हे सर्वव्यापक तथा सब कर्मों को पूर्ण करनेवाले परमेश्वर! आप द्युलोकादि सब लोक-लोकान्तरों को प्रकाशित करते हुए स्वयं प्रकाशमान हो रहे हैं, हे प्रभो! हमारे निष्पादित यज्ञादि कर्म में अपनी कृपा से योग दें कि हम लोग उनको विधिवत् पूर्ण करें॥१७॥हे ईश्वर! जहाँ तू हो, वहाँ से आकर मेरे पदार्थों के साथ आनन्दित हो॥१७॥

यद्वासि॑ सुन्व॒तो वृ॒धो यज॑मानस्य सत्पते। उ॒क्थे वा॒ यस्य॒ रण्य॑सि॒ समिन्दु॑भिः॥

हे विद्वान् तथा सज्जनों के पालक, पोषक तथा रक्षक परमात्मन्! आप याज्ञिक पुरुषों के सदा सहायक तथा वृद्धि करनेवाले हैं। याज्ञिक लोग स्तोत्रों द्वारा आपकी सम्यक् स्तुति करते और आप योग देकर उनके यज्ञों को भले प्रकार पूर्ण करते हैं॥१८॥हे ईश! जिस हेतु तू सबका रक्षक है, अतः मेरी भी रक्षा कर॥१८॥

दे॒वंदे॑वं॒ वोऽव॑स॒ इन्द्र॑मिन्द्रं गृणी॒षणि॑। अधा॑ य॒ज्ञाय॑ तु॒र्वणे॒ व्या॑नशुः॥

हे प्रजाजनो! ब्रह्मविद्यावेत्ता तथा पदार्थविद्यावेत्ता विद्वानों की रक्षा से सुरक्षित होकर अपने यज्ञों को पूर्ण करो और उनकी सहायता से शत्रुओं पर विजय प्राप्त करो, ताकि तुम्हारे यज्ञादि शुभ कार्य्य सदा पूर्ण हों॥१९॥प्रत्येक विद्वान् को उचित है कि वह शुभकर्म की व्याख्या करे और प्रजाओं को सत्पथ पर लावे॥१९॥

य॒ज्ञेभि॑र्य॒ज्ञवा॑हसं॒ सोमे॑भिः सोम॒पात॑मम्। होत्रा॑भि॒रिन्द्रं॑ वावृधु॒र्व्या॑नशुः॥

हे याज्ञिक पुरुषो! तुम यज्ञ के नेता को यज्ञों द्वारा, यज्ञ में सोमरस पान करनेवालों को सोमरस द्वारा और परमात्मा को स्तुतियों द्वारा तृप्त करो अर्थात् बढ़ाओ, जिससे तुम्हारे यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण हों॥२०॥शुभकर्मों से ही उसको प्रसन्न करना चाहिये॥२०॥

म॒हीर॑स्य॒ प्रणी॑तयः पू॒र्वीरु॒त प्रश॑स्तयः। विश्वा॒ वसू॑नि दा॒शुषे॒ व्या॑नशुः॥

भाव यह है कि उस पूर्ण परमात्मा की निर्माणशक्ति=प्रत्येक कार्य्य की यथावत् रचनारूप शक्ति और वैदिक स्तुतियें अर्थात् वेदों में वर्णित परमात्मा की सुप्रबन्धादि शक्तियें महान् और अनादि हैं, जिनसे संसार में सब कार्य्य यथावत् हो रहे हैं॥२१॥हे मनुष्यों! वह सब प्रकार से पूर्ण है। जो कोई उसकी आज्ञा के अनुसार चलता है, उसको वह सब देता है॥२१॥

इन्द्रं॑ वृ॒त्राय॒ हन्त॑वे दे॒वासो॑ दधिरे पु॒रः। इन्द्रं॒ वाणी॑रनूषता॒ समोज॑से॥

अज्ञाननाशक तथा ज्ञान के प्रकाशक परमात्मा को विद्वान् पुरुष ध्यानद्वारा धारण करते हैं अर्थात् विद्वान् पुरुष समाधिस्ध होकर परमात्मा के समीपस्थ हुए ज्ञान को सम्पादन करते हैं, जिससे मुक्त होकर सुख अनुभव करते हैं, अतएव जिज्ञासु जनों का कर्तव्य है कि वह आत्मिक बल सम्पादन करके ज्ञान की वृद्धि द्वारा परमात्मा के समीपस्थ होने के लिये यत्नवान् हों॥२२॥हे मनुष्यों! निखिल दुरितनिवारणार्थ उसी की शरण में आइये॥२२॥

म॒हान्तं॑ महि॒ना व॒यं स्तोमे॑भिर्हवन॒श्रुत॑म्। अ॒र्कैर॒भि प्र णो॑नुमः॒ समोज॑से॥

परमात्मपरायण उपासक लोग शारीरिक, आत्मिक तथा सामाजिक उन्नति के लिये महान् परमात्मा की वेदवाणियों द्वारा स्तुति करते हैं कि हे प्रभो! हमें बल दें कि हम लोग उक्त तीनों प्रकार की उन्नति करते हुए स्वतन्त्र हों अर्थात् पराक्रमयुक्त होकर मनुष्यसमुदाय में मान को प्राप्त हों, यह हमारी आपसे प्रार्थना है॥२३॥बलप्राप्ति के लिये भी वही स्तुत्य है॥२३॥

न यं वि॑वि॒क्तो रोद॑सी॒ नान्तरि॑क्षाणि व॒ज्रिण॑म्। अमा॒दिद॑स्य तित्विषे॒ समोज॑सः॥

वज्रशक्तिसम्पन्न परमात्मा, जो सम्पूर्ण लोक-लोकान्तरों के जीवों को प्राणनशक्ति देनेवाला है, उसको कोई भी पृथक् नहीं कर सकता, क्योंकि वही सबका जीवनाधार, वही प्राणों का प्राण, वही सबको वास देनेवाला और वही सम्पूर्ण लोक-लोकान्तरों को दीप्त करनेवाला है, उसकी आज्ञापालन करना ही अमृत की प्राप्ति और उससे विमुख होना ही मृत्यु है॥२४॥वह ईश्वर इस पृथिवी, द्युलोक और आकाश से भी बहुत बड़ा है, अतः वे इसको अपने में रख नहीं सकते। उसी के बल से ये सूर्यादि जगत् चल रहे हैं, अतः वही उपास्य है॥२४॥

यदि॑न्द्र पृत॒नाज्ये॑ दे॒वास्त्वा॑ दधि॒रे पु॒रः। आदित्ते॑ हर्य॒ता हरी॑ ववक्षतुः॥

हे परमात्मन्! जो शूरवीर आपको संग्रामसमय हृदय में धारण करते हैं अर्थात् युद्ध करते हुए आपसे विजय की याचना करते हैं, वही संग्रामभूमि में विजय को प्राप्त होते हैं, अतएव विजय की कामनावाले शूरवीरों को सदैव परमात्मा से विजय की याचना करनी चाहिये, क्योंकि उनकी कृपा विना विजय प्राप्त नहीं हो सकती॥२५॥इस संसारसागर से वे ही पार उतरते हैं, जो उसकी शरण में पहुँचते हैं, भक्तगण उसको इस प्रकृति में ही देखते हैं॥२५॥

य॒दा वृ॒त्रं न॑दी॒वृतं॒ शव॑सा वज्रि॒न्नव॑धीः। आदित्ते॑ हर्य॒ता हरी॑ ववक्षतुः॥

हे महान् शक्तिसम्पन्न परमेश्वर! आपकी शक्ति से ही वर्षा होती और वर्षा से अन्न उत्पन्न होकर प्रजा का पालन-पोषण होता है अर्थात् वर्षा का करना तथा सस्योत्पादन=कृषी का उत्पन्न करना, ये दो शक्तियें, जो लोक को धारण करती हैं, आप ही के अधीन हैं॥२६॥मनुष्यों का जब विघ्न विनष्ट होता है, तब ही वह ईश्वर की ओर जाता है, तब ही वह प्रकृतिदेवी प्रसन्न होकर उसकी छवि प्रकट करती है॥२६॥

य॒दा ते॒ विष्णु॒रोज॑सा॒ त्रीणि॑ प॒दा वि॑चक्र॒मे। आदित्ते॑ हर्य॒ता हरी॑ ववक्षतुः॥

हे सर्वशक्तिसम्पन्न परमेश्वर! आपसे प्रेरित हुआ सूर्य्य जब अपनी किरणों को प्रसारित करता है, तभी शीत की निवृत्ति होती और सब पदार्थों में रसों का आधान होता है अर्थात् शीतनाशक तथा रसविकर्षकरूप दो शक्तियें भी आप ही के अधीन हैं॥२७॥यह सूर्य्य भी इसके महान् यश को प्रकाशित करता है। इस दिवाकर को देख उसका महत्त्व प्रतीत होता है॥२७॥

य॒दा ते॑ हर्य॒ता हरी॑ वावृ॒धाते॑ दि॒वेदि॑वे। आदित्ते॒ विश्वा॒ भुव॑नानि येमिरे॥

हे सबकी कामनाओं को पूर्ण करनेवाले परमात्मन्! आप सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों को धारण किये हुए हैं और प्रतिदिन सबका पालन, पोषण तथा रक्षण करते हैं, इसी से सब लोक-लोकान्तर नियमबद्ध रहते हैं अर्थात् संसार का धारण करना तथा पोषणरूप शक्तियें भी आप ही के अधीन हैं॥२८॥ज्यों-२ इसके गूढ़ नियम मालूम होते हैं, त्यों-त्यों उपासक का ईश्वर में विश्वास होता जाता है॥२८॥

य॒दा ते॒ मारु॑ती॒र्विश॒स्तुभ्य॑मिन्द्र नियेमि॒रे। आदित्ते॒ विश्वा॒ भुव॑नानि येमिरे॥

हे परमात्मन्! आपके नियम में बँधी हुई सब सैनिक प्रजाएँ अर्थात् राष्ट्र को नियम में रखनेवाली शक्तिरूप सेनाएँ आपकी आज्ञापालन करने के लिये सबको नियम में रखती हैं, इसी कारण सब लोक-लोकान्तर नियमबद्ध हो रहे हैं॥२९॥ईश्वर की विभूति वायु आदि समस्त पदार्थ में दीख पड़ती है॥२९॥

य॒दा सूर्य॑म॒मुं दि॒वि शु॒क्रं ज्योति॒रधा॑रयः। आदित्ते॒ विश्वा॒ भुव॑नानि येमिरे॥

हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन्! आप द्युलोकस्थ सूर्य्य की विस्तृत निर्मल ज्योति को धारण कर रहे हैं, इसी कारण सब लोक-लोकान्तर नियमबद्ध हुए स्थित हैं, यह आपकी महान् शक्ति है, क्योंकि सूर्य्य के विना सम्पूर्ण प्रजाओं का स्थित रहना असम्भव है॥३०॥सूर्य की स्थापना से इस जगत् को अधिक लाभ पहुँच रहा है॥३०॥

इ॒मां त॑ इन्द्र सुष्टु॒तिं विप्र॑ इयर्ति धी॒तिभिः॑। जा॒मिं प॒देव॒ पिप्र॑तीं॒ प्राध्व॒रे॥

हे हमारे पालक परमात्मन्! याज्ञिक लोग यज्ञस्थानों में स्तुतियों द्वारा आपको बढ़ाते अर्थात् प्रजाजनों में आपको सर्वोपरि सिद्ध करते हैं, जैसे लोक में सहायक बन्धुजन अपने बन्धु को उच्च अवस्था पर पहुँचाते हैं॥३१॥जैसे विद्वान् उसकी स्तुति करते हैं, तद्वत् इतरजन भी करें॥३१॥

यद॑स्य॒ धाम॑नि प्रि॒ये स॑मीची॒नासो॒ अस्व॑रन्। नाभा॑ य॒ज्ञस्य॑ दो॒हना॒ प्राध्व॒रे॥

“यज्ञो वै विष्णुः” इत्यादि वाक्यों से यज्ञ नाम व्यापक परमात्मा का है और “नाभ्या आसीदन्तरिक्षम्” इस मन्त्र के अनुसार अन्तरिक्ष उस परमात्मा का नाभिस्थान माना गया है। उसी नाभि=द्युलोक में अनेक लोक उस परमात्मा की शक्ति से भ्रमण करते हुए शब्दायमान हो रहे हैं और उसी के तेज से उनमें अनेक स्वयंप्रकाश हैं, यह उस परमात्मा की महिमा है॥३२॥हे मनुष्यों! उसको अपने व्यवहार से प्रसन्न करो॥३२॥

सु॒वीर्यं॒ स्वश्व्यं॑ सु॒गव्य॑मिन्द्र दद्धि नः। होते॑व पू॒र्वचि॑त्तये॒ प्राध्व॒रे॥

हे प्रभो! यज्ञकर्त्ता के समान ज्ञान प्राप्त करानेवाले गुरु तथा आचार्य्य आप ही हैं। कृपा करके हमको ज्ञान की प्राप्ति कराएँ, जिससे हम लोग नित्यप्रति यज्ञों द्वारा आपकी उपासना में प्रवृत्त रहें। हे ऐश्वर्य्यसम्पन्न भगवन्! हमें गौ आदि उत्तमोत्तम धनों को दीजिये, जिससे हम ऐश्वर्य्यसम्पन्न होकर यज्ञ करते हुए स्वाधीनता से जीवन व्यतीत करें॥३३ यह बारहवाँ सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ॥उसी की कृपा से अश्वादिक पशु भी प्राप्त होते हैं॥३३॥

सूक्तम्

इन्द्रः॑ सु॒तेषु॒ सोमे॑षु॒ क्रतुं॑ पुनीत उ॒क्थ्य॑म्। वि॒दे वृ॒धस्य॒ दक्ष॑सो म॒हान्हि षः॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि परमात्मा सृष्टि के आदि में अर्थात् इस ब्रह्माण्ड के कार्य्याकार होने पर सम्पूर्ण ज्ञान के भण्डार तथा ऐश्वर्य्यप्राप्ति के साधन चारों वेदों को पुनः प्रकट करता है, जिससे मनुष्यों को सम्पूर्ण कर्मों का ज्ञान होता है, जैसा कि अन्यत्र भी वर्णन किया है किः−ऋतञ्च सत्यञ्चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत। ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः॥ऋग्० ८। ८। ४८। १। उसी परमात्मा से ऋत=वेद, कार्य्यरूप प्रकृति, रात्रि, मेघमण्डल तथा समुद्रादि सम्पूर्ण पदार्थ उत्पन्न हुए और इसीलिये परमात्मा सबसे महान्=सर्वोपरि है, क्योंकि वह वेदों द्वारा मनुष्यों को ज्ञान की वृद्धि करनेवाला है, जिससे पुरुष ऐश्वर्य्यसम्पन्न होकर संसार में महान् होता है। अतएव मनुष्यमात्र का कर्तव्य है कि परमात्मवाणीरूप वेद का नित्य स्वाध्याय करते हुए पवित्र भावोंवाले बनें, जिससे मनुष्यजन्म के फलचतुष्टय को प्राप्त करने के अधिकारी हों॥ईश्वर सब कर्मों में वैसी सुमति हमको देवे, जिससे हमारे सर्व व्यापार अभ्युदय के लिये पवित्रतम होवें॥१॥

स प्र॑थ॒मे व्यो॑मनि दे॒वानां॒ सद॑ने वृ॒धः। सु॒पा॒रः सु॒श्रव॑स्तमः॒ सम॑प्सु॒जित्॥

वह सब पदार्थों को नियम में रखनेवाला परमात्मा सूर्य्यादि दिव्य पदार्थों की सबसे प्रथम रचना करता है, क्योंकि प्रकाश के विना न प्राणी जीवनधारण कर सकते और न संसार का कोई कार्य्य विधिवत् हो सक्ता है, इसी भाव को ऋग्० ८। ८। ४८। ३। में इस प्रकार वर्णन किया है किः-सूर्य्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्। दिवञ्च पृथिवीञ्चान्तरिक्षमथो स्वः॥धाता=सबके धारण-पोषण करनेवाले परमात्मा ने सूर्य्य तथा चन्द्रमा पूर्व की न्याईं बनाये, द्युलोक, पृथिवीलोक, अन्तरिक्षलोक और अन्य प्रकाशमान तथा प्रकाशरहित लोक-लोकान्तरों को भी बनाया=रचा, इसी कारण वह परमात्मा अत्यन्त यशवाला और सर्वोपरि जेता अर्थात् सर्वोत्कृष्ट गुणोंवाला है, जिसकी आज्ञापालन करना मनुष्यमात्र का परम कर्तव्य है॥वह ईश्वर सबके अन्तर्यामी होकर सबको बढ़ाता और पोसता है और वही सर्व विघ्नों का विजेता है, अतः हे मनुष्यों! वही पूज्य और ध्येय है॥२॥

तम॑ह्वे॒ वाज॑सातय॒ इन्द्रं॒ भरा॑य शु॒ष्मिण॑म्। भवा॑ नः सु॒म्ने अन्त॑मः॒ सखा॑ वृ॒धे॥

याज्ञिक पुरुषों की ओर से कथन है कि हे सर्वरक्षक तथा सब बलों के उत्पादक परमात्मन्! हम लोग यज्ञपूर्ति के लिये आपका आह्वान करते अर्थात् आपकी सहायता चाहते हैं। कृपा करके हमारे सुखोत्पादक कार्य्यों में सहायक हों, या यों कहो कि हम लोगों को मित्र की दृष्टि से देखें, ताकि हमारे यज्ञादि कार्य्य सफलता को प्राप्त हों और हम उन्नतिशील होकर आपकी उपासना में प्रवृत्त रहें॥३॥वही ईश्वर धनद और विज्ञानद है, ऐसा मानकर उसकी उपासना करो॥३॥

इ॒यं त॑ इन्द्र गिर्वणो रा॒तिः क्ष॑रति सुन्व॒तः। म॒न्दा॒नो अ॒स्य ब॒र्हिषो॒ वि रा॑जसि॥

हे सबके इष्टदेव सेवनीय परमात्मन्! यह आपके निमित्त अर्थात् आपकी प्रजा के लिये दी हुई आहुति याज्ञिक के लिये इष्टफल देनेवाली हो और आप अपनी प्राप्ति द्वारा हम लोगों को हर्ष उत्पन्न करनेवाले हों या यों कहो कि हम लोग आपके समीपवर्ती होकर सुख का अनुभव करते हुए सदा यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्त रहें॥४॥यह सम्पूर्ण अद्भुत सर्वधनसम्पन्न जगत् ही इसका दान है। विद्वान् इससे महाधनिक होते हैं। हे मनुष्यों! इसका शासक वही ईश है, उसी की उपासना करो॥४॥

नू॒नं तदि॑न्द्र दद्धि नो॒ यत्त्वा॑ सु॒न्वन्त॒ ईम॑हे। र॒यिं न॑श्चि॒त्रमा भ॑रा स्व॒र्विद॑म्॥

हे सब धनों की राशि परमात्मन्! हम लोग यज्ञ करते हुए जो आपसे याचना करते हैं, उन हमारी इष्ट कामनाओं को कृपा करके पूर्ण करें और हमको विविध प्रकार के धन देकर ऐश्वर्य्यसम्पन्न करें, ताकि हम यज्ञों के करने में सदा समर्थ हों॥५॥जो परमात्मा की उपासना मन से करता और उसकी आज्ञा पर सदा चलता, वही सब धन का योग्य है॥५॥

स्तो॒ता यत्ते॒ विच॑र्षणिरतिप्रश॒र्धय॒द्गिरः॑। व॒या इ॒वानु॑ रोहते जु॒षन्त॒ यत्॥

हे प्रभो! आपकी स्तुति करनेवाले उपासक विद्वान् पुरुष वेदवाणियों द्वारा आपके महत्त्व को इतस्ततः विस्तार करते हैं, तब सब प्रजाजन आप में प्रीति करते अर्थात् आपकी आज्ञापालन करने में प्रवृत्त होते हैं और वह उपासक पुत्रपौत्रादि धनों से सम्पन्न होकर सदा सुख का अनुभव करते हैं, अतएव उचित है कि विद्वान् पुरुष परमात्मा की वाणीरूप वेद का प्रचार करते हुए ऐश्वर्य्यसम्पन्न हों॥६॥वाणी सत्य और प्रिय प्रयोक्तव्य है॥६॥

प्र॒त्न॒वज्ज॑नया॒ गिरः॑ शृणु॒धी ज॑रि॒तुर्हव॑म्। मदे॑मदे ववक्षिथा सु॒कृत्व॑ने॥

हे परमात्मन्! आप स्तोता की स्तुतिरूप वेदवाणियों को सुनें अर्थात् उसको शुभ फलों की प्राप्ति करावें, जिससे वह उत्साहसम्पन्न होकर सदा यज्ञादि सुकर्मों में प्रवृत्त रहे। आप सुकर्मी के लिये सदैव इष्ट पदार्थों को प्राप्त कराते हैं, अतएव उचित है कि सब पुरुष सुकर्मों में प्रवृत्त रहें, ताकि उनकी मनोकामना पूर्ण हो॥७॥ईश्वर ही ने मनुष्यों में विस्पष्ट वाणी स्थापित की। वही सर्व कर्मों का फलदाता है, अतः हे मनुष्यों! उसी को पूजो॥७॥

क्रीळ॑न्त्यस्य सू॒नृता॒ आपो॒ न प्र॒वता॑ य॒तीः। अ॒या धि॒या य उ॒च्यते॒ पति॑र्दि॒वः॥

वह पूर्ण परमात्मा, जो द्युलोकादि लोक-लोकान्तरों का स्वामी तथा रक्षक है, उसकी वेदरूप वाणियें अनायास सर्वत्र विस्तृत हो रही है। जैसे जल स्वाभाविक अनायास ही निम्न स्थानों को प्राप्त होता है, इसी प्रकार वेदरूप प्रिय सत्य वाणियें मनुष्यमात्र को प्राप्त होने से सबके अनुष्ठानयोग्य हैं॥८॥ईश्वर कर्ता है और यह जगत् कार्य है। कार्यों में जो क्रिया है, वह उसी की है। अतः मनुष्य जाति से लेकर कीटपर्यन्त प्राणियों में जो वचन, जो शक्तियाँ, जो सौन्दर्य्य, इस प्रकार की जो आश्चर्यरचना है, वह ईश्वर की है। अतः वह विज्ञानपति है॥८॥

उ॒तो पति॒र्य उ॒च्यते॑ कृष्टी॒नामेक॒ इद्व॒शी। न॒मो॒वृ॒धैर॑व॒स्युभिः॑ सु॒ते र॑ण॥

हे उपासक जनो! तुम स्तोताओं द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार कर उसकी स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना में प्रवृत्त होओ, क्योंकि एकमात्र परमात्मा ही सबका रक्षक, सबको वश में रखनेवाला और एक वही सब प्रजाओं का पालक है॥९॥हे मनुष्यों! परमात्मा सर्वपति है, ऐसा जानकर उसका गान करो॥९॥

स्तु॒हि श्रु॒तं वि॑प॒श्चितं॒ हरी॒ यस्य॑ प्रस॒क्षिणा॑। गन्ता॑रा दा॒शुषो॑ गृ॒हं न॑म॒स्विनः॑॥

हे उपासक जनो! तुम उस परमात्मा की उपासना में निरन्तर प्रवृत्त रहो, जिसकी उत्पादन तथा रक्षणरूप शक्तियें शत्रुओं को वशीभूत करनेवाली और उपासक के अन्तःकरण में प्रविष्ट होकर उसको बलवान् तथा पवित्र भावोंवाला बनानेवाली हैं॥१०॥ईश्वरोपासकों को कदापि भी धन की क्षीणता नहीं होती, यह जानकर उसी की पूजा करो॥१०॥

तू॒तु॒जा॒नो म॑हेम॒तेऽश्वे॑भिः प्रुषि॒तप्सु॑भिः। आ या॑हि य॒ज्ञमा॒शुभिः॒ शमिद्धि ते॑॥

इस मन्त्र में अलंकार द्वारा परमात्मा को संबोधित करते हुए याज्ञिक पुरुषों का कथन है कि हे शुभफलों के दाता परमात्मन्! आप हमारे यज्ञ को प्राप्त होकर अर्थात् अपनी शक्ति द्वारा हमारे यज्ञ को पूर्ण करें, जिससे हम सुख अनुभव करते हुए आपकी उपासना में प्रवृत्त रहें॥११॥यज्ञादि शुभकर्मों में वही ईश पूज्य है, अन्य देव नहीं। उसी का पूजन कल्याणकर होता है॥११॥

इन्द्र॑ शविष्ठ सत्पते र॒यिं गृ॒णत्सु॑ धारय। श्रवः॑ सू॒रिभ्यो॑ अ॒मृतं॑ वसुत्व॒नम्॥

हे सत्पुरुषों के रक्षक=पालक परमात्मन्! आप अपने उपासकों को ऐश्वर्य्यसम्पन्न करें, ताकि वह यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्त रहें और विद्वानों को अनश्वर=नाश न होनेवाला यश दीजिये, जिससे वे आपकी महिमा का व्याख्यान करते हुए प्रजाजनों को आपकी उपासना तथा आज्ञापालन में प्रवृत्त करें॥१२॥ईश्वर ही मुक्ति का दाता है, यह मानकर उसकी उपासना करें॥१२॥

हवे॑ त्वा॒ सूर॒ उदि॑ते॒ हवे॑ म॒ध्यंदि॑ने दि॒वः। जु॒षा॒ण इ॑न्द्र॒ सप्ति॑भिर्न॒ आ ग॑हि॥

हे सर्व ऐश्वर्य्यों के स्वामी परमात्मन्! ऐश्वर्य्यप्राप्ति के प्रारम्भ में तथा ऐश्वर्य्य प्राप्त होने पर, हम लोग आपकी शरण को प्राप्त होते हैं, अर्थात् आप ही हमारे ऐश्वर्य्य की रक्षा करें, जिससे हम यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्त होकर सदा आपकी उपासना करते रहें॥१३॥प्रातः मध्याह्न और सायंकाळ परमात्मा का ध्यान करें॥१३॥

आ तू ग॑हि॒ प्र तु द्र॑व॒ मत्स्वा॑ सु॒तस्य॒ गोम॑तः। तन्तुं॑ तनुष्व पू॒र्व्यं यथा॑ वि॒दे॥

हे परमात्मन्! आप कृपा करके संस्कारी तथा प्रशस्त वाक्=बोलने में चतुर विद्वान् पुरुषों को ऐश्वर्य्यसम्पन्न करें और उन्हें पुत्र-पौत्रादि सन्तान से भी वृद्धि को प्राप्त करें, ताकि वह परम्परागत आपको प्रजाजनों पर प्रकाशित करते रहें॥१४॥हे ईश! तू हमको देख। अच्छे मार्ग में ले चल। यश को बढ़ा। पूर्ववत् पुत्रादिकों को बढ़ा॥१४॥

यच्छ॒क्रासि॑ परा॒वति॒ यद॑र्वा॒वति॑ वृत्रहन्। यद्वा॑ समु॒द्रे अन्ध॑सोऽवि॒तेद॑सि॥

हे आवरण=अविद्यानाशक परमात्मन्! आप सर्वत्र सबको यथाभाग भोग्य पदार्थों का दान देते हुए अपनी व्यापकता से सबको नियम में रखते और सदैव सबकी रक्षा करते हैं। हे प्रभो! अपने दिये हुए पदार्थों तथा सन्तानों की आप ही रक्षा करें, ताकि आपका दिया हुआ ऐश्वर्य्य हमसे वियुक्त न हो, क्योंकि आप सब प्रकार से समर्थ हैं॥१५॥हे मनुष्यों! ईश्वर सबकी रक्षा करता है, यह जानना चाहिये॥१५॥

इन्द्रं॑ वर्धन्तु नो॒ गिर॒ इन्द्रं॑ सु॒तास॒ इन्द॑वः। इन्द्रे॑ ह॒विष्म॑ती॒र्विशो॑ अराणिषुः॥

हे सम्पूर्ण दिव्य पदार्थों के स्वामी परमेश्वर! आपके दिये हुए दिव्य पदार्थों से सुभूषित हुए हम लोग स्तुतियों द्वारा आपकी महिमा का विस्तार करें। ये दिव्य पदार्थ आपके महत्त्व को बढ़ाएँ और हे ऐश्वर्य्यसम्पन्न! यह सब प्रजाएँ आपसे सुरक्षित हुई आप ही में क्रीड़ा कर रही हैं, क्योंकि यह विश्व आपका उदरस्थानीय है॥१६॥हे मनुष्यों! तुम्हारे वचन कर्म और शरीर भी ईश्वर के यशों को बढ़ावें और तुम स्वयं उसकी आज्ञा में आनन्दित होओ॥१६॥

तमिद्विप्रा॑ अव॒स्यवः॑ प्र॒वत्व॑तीभिरू॒तिभिः॑। इन्द्रं॑ क्षो॒णीर॑वर्धयन्व॒या इ॑व॥

हे सर्वरक्षक परमात्मन्! आपकी रक्षा से सुरक्षित हुए विद्वज्जन सर्वत्र आपकी महिमा को बढ़ा रहे हैं और यह सम्पूर्ण लोक-लोकान्तर आपकी ही महिमा का विस्तार कर रहे हैं अर्थात् आपकी इस अलौकिक रचना को देखकर विद्वान् पुरुष आपकी महिमा का कीर्तन करते हुए आपकी शरण को प्राप्त होकर सुख अनुभव करते हुए प्रजाजनों को आपकी ओर आकर्षित कर रहे हैं॥१७॥हे मनुष्यों! सर्व विद्वान् और अन्यान्य लोक उसी को गाते हैं, यह जान तुम भी उसी को गाओ॥१७॥

त्रिक॑द्रुकेषु॒ चेत॑नं दे॒वासो॑ य॒ज्ञम॑त्नत। तमिद्व॑र्धन्तु नो॒ गिरः॑ स॒दावृ॑धम्॥

वह परमात्मा, जो इस संसार की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय करनेवाला है, उसकी महिमा को विद्वान् पुरुष सब अवस्थाओं में बढ़ाते हैं, अतएव हम सब प्रजाजनों को उचित है कि सदा वृद्धि को प्राप्त उस परमात्मा के महत्त्व को वाणियों द्वारा विस्तृत करें॥१८॥परम विद्वान्जन भी जिस को सर्वदा गाते स्तुति और प्रार्थना करते हैं, उसी को हम भी सर्वभाव से पूजें॥१८॥

स्तो॒ता यत्ते॒ अनु॑व्रत उ॒क्थान्यृ॑तु॒था द॒धे। शुचिः॑ पाव॒क उ॑च्यते॒ सो अद्भु॑तः॥

हे शुद्धस्वरूप परमात्मन्! आप और आपकी रचना आश्चर्य्यमय है, जिसको विद्वान् पुरुष धारणा, ध्यान, समाधि द्वारा अनुभव करते हैं। हे प्रभो! आप ही सबको ज्ञानदाता और आप ही सर्वत्र सुधारक हैं। आपके उपासक ऋतु-२ में यज्ञों द्वारा आपके गुणों को धारण करते हैं, क्योंकि आप स्वयं शुद्ध और दूसरों को पवित्र करनेवाले हैं॥१९॥जो शुचि, पवित्रकारक और अद्भुत है। उसी को विद्वान् स्तोता अनुव्रत होकर पूजते हैं, हम भी उसी को पूजें॥१९॥

तदिद्रु॒द्रस्य॑ चेतति य॒ह्वं प्र॒त्नेषु॒ धाम॑सु। मनो॒ यत्रा॒ वि तद्द॒धुर्विचे॑तसः॥

हे रुद्ररूप परमात्मन्! अन्तरिक्षादि लोक-लोकान्तरों में आपकी महिमा चहुँ ओर प्रकाशित हो रही है, जिसको जानने के लिये बड़े-२ कुशलमति अपनी सूक्ष्मबुद्धि से प्रयत्न करते हैं। हे प्रभो! हमें वह ज्ञान प्रदान कीजिये, जिससे हम आपको यथार्थरूप से जानें और आपके समीपवर्ती होकर सुख अनुभव करें॥२०॥जो लोकाधिपति परमात्मा विद्युदादि अनन्त पदार्थों को आकाश में स्थापित करके उनका शासन करता और चेताता है, उसी में योगिगण मन लगाते हैं। हे मनुष्यों! उसी एक को जानो॥२०॥

यदि॑ मे स॒ख्यमा॒वर॑ इ॒मस्य॑ पा॒ह्यन्ध॑सः। येन॒ विश्वा॒ अति॒ द्विषो॒ अता॑रिम॥

हे सबके मित्र परमेश्वर! आप अपने मैत्रीभाव से हमारे भोग्य पदार्थों की रक्षा करें अर्थात् वे हमें पुष्कलरूप से प्रदान करें, जिनसे हम पुष्ट होकर आपकी मैत्रीपालन में समर्थ हों, या यों कहो कि शारीरिक तथा आत्मिक बल उन्नत करके आपके समीपवर्ती हों और बलवान् होकर सम्पूर्ण द्वेषियों पर विजय प्राप्त करें। यह आप हमें अपनी मैत्री का परिचय दीजिये, जो आप प्राचीन काल से अपने मित्रों=भक्तों पर दयादृष्टि रखते हैं॥२१॥जो परमात्मा को निज सखा जान सब वस्तु उसको समर्पित करता है, वही सब क्लेशों को पार कर जाता है॥२१॥

क॒दा त॑ इन्द्र गिर्वणः स्तो॒ता भ॑वाति॒ शंत॑मः। क॒दा नो॒ गव्ये॒ अश्व्ये॒ वसौ॑ दधः॥

हे सकल ऐश्वर्य्यसम्पन्न परमात्मन्! आप अपनी परमकृपा से अपने उपासकों को सुख प्रदान करें और उनको गौ, अश्व, सन्तानरूप प्रजा तथा अन्नादि विविध प्रकार का धन दीजिये, जिससे वह सुखसम्पन्न होकर सदैव आपकी उपासना में प्रवृत्त रहें अर्थात् निरालस होकर सदा यज्ञानुष्ठान करें॥२२॥हे भगवन्! स्तोता को सौभाग्ययुक्त कर और उसको अन्य अभिलषित पदार्थ दे॥२२॥

उ॒त ते॒ सुष्टु॑ता॒ हरी॒ वृष॑णा वहतो॒ रथ॑म्। अ॒जु॒र्यस्य॑ म॒दिन्त॑मं॒ यमीम॑हे॥

यह मन्त्र पूर्व मन्त्र में जो धन ऐश्वर्य्यादिविषयक प्रश्न किये हैं, उनके उत्तर को कहता है अर्थात् जो मनुष्य जो अश्व धन आदि पदार्थों को प्राप्त करना चाहे, उसके लिये एकमात्र यही उपाय है कि वह अपने ज्ञान को ईश्वर की प्रार्थना द्वारा तथा उसके कहे हुए विहित आचरणों से बढ़ाकर सामर्थ्य उत्पन्न करे॥२३॥हे मनुष्यों! ये स्थावर और जङ्गम संसार परमात्मा को दिखला रहे हैं, अतः वे दोनों अच्छे प्रकार ज्ञातव्य हैं॥२३॥

तमी॑महे पुरुष्टु॒तं य॒ह्वं प्र॒त्नाभि॑रू॒तिभिः॑। नि ब॒र्हिषि॑ प्रि॒ये स॑द॒दध॑ द्वि॒ता॥

विद्वानों द्वारा सदा स्तुत परमात्मन्! हम लोग वेदवाणियों द्वारा सदैव आपकी स्तुति तथा प्रार्थना करते हैं। कृपा करके हमारे हृदय में विराजमान होकर हमें सदसद्विवेचन करनेवाली बुद्धि दीजिये, जिससे हम संसार के पदार्थों को यथावस्थित जानकर उनसे उपयोग लें और उसी सूक्ष्म बुद्धि से आपके समीपवर्ती होकर सुख अनुभव करें॥२४॥परमात्मा ही प्रार्थनीय और याचनीय है। वही सर्वत्र व्यापक होने से हमारी स्तुति सुनता और अभीष्ट को जानता है॥२४॥

वर्ध॑स्वा॒ सु पु॑रुष्टुत॒ ऋषि॑ष्टुताभिरू॒तिभिः॑। धु॒क्षस्व॑ पि॒प्युषी॒मिष॒मवा॑ च नः॥

हे सबके स्तुतियोग्य तथा प्रार्थनीय परमेश्वर! आप अपनी रक्षाओं द्वारा हमें वृद्धि को प्राप्त कराएँ। हमारा खाद्य अन्न हमें पुष्टिकारक तथा दीप्तिकर हो, जिससे हमारी रक्षा हो और हम पुष्ट होकर कान्तिवाले हों॥२५॥ऋषिप्रदर्शित मार्ग से चले, यह उपदेश इससे देते हैं॥२५॥

इन्द्र॒ त्वम॑वि॒तेद॑सी॒त्था स्तु॑व॒तो अ॑द्रिवः। ऋ॒तादि॑यर्मि ते॒ धियं॑ मनो॒युज॑म्॥

हे शत्रुविदारक परमात्मन्! जो पुरुष आपकी उपासना में निरन्तर प्रवृत्त रहते हैं, निश्चय आप उनके रक्षक होते हैं और सत्य का आश्रयण करनेवाले ज्ञानयुक्त होकर वैदिक कर्मों द्वारा आपको प्राप्त करते हैं। हे प्रभो! हमें आत्मिक बल दें कि हम सत्य का पालन करते हुए आपकी उपासना में सदा तत्पर रहें, जिससे हमें सुख देनेवाली अपूर्व ज्ञान की प्राप्ति हो॥२६॥परमात्मा उसका रक्षक होता है, जो शुभकर्म करता है और जो उस परमगुरु में मन लगाता है॥२६॥

इ॒ह त्या स॑ध॒माद्या॑ युजा॒नः सोम॑पीतये। हरी॑ इन्द्र प्र॒तद्व॑सू अ॒भि स्व॑र॥

हे परमदेव परमेश्वर! आप हमारे यज्ञ को अपनी परमकृपा से पूर्ण करें और हमें रत्नादि उत्तमोत्तम धनों का लाभ कराएँ, जिससे हम नित्यनूतन पदार्थों के आविष्काररूप यज्ञ करते रहें, जो सब प्रजाजनों की उन्नति करनेवाले हों। हे हमारे रक्षक देव! अपनी असद्गुणनिवारक और सद्गुणों की धारक शक्तियों को हममें प्रवेश करें, ताकि हम सद्गुणसम्पन्न होकर अपने आपको उन्नत करने में समर्थ हों॥२७॥हे ईश! इन पदार्थों को स्व-२ कार्य में लगा और हम लोगों के ऊपर कृपा कर॥२७॥

अ॒भि स्व॑रन्तु॒ ये तव॑ रु॒द्रासः॑ सक्षत॒ श्रिय॑म्। उ॒तो म॒रुत्व॑ती॒र्विशो॑ अ॒भि प्रयः॑॥

इस मन्त्र में क्षात्रबल के लिये परमात्मा से प्रार्थना की गई है कि हे प्रभो! आप क्षात्रबल को उन्नत करें, जिससे सब धर्म सुरक्षित रहें। हे परमात्मन्! योद्धा लोग सर्वत्र व्याप्त हों, ताकि सब ओर से हमारी रक्षा रहे, आप योद्धा लोगों को सम्पत्तिशाली करें, ताकि वह उत्साहपूर्वक दुष्टों के दलन करने में वीरता दिखाएँ और अन्य सैनिकजनों के लिये भी सदैव अन्नादि भोग्य पदार्थ देकर उन्हें सन्तुष्ट करें, ताकि उनमें क्षात्रबल पूर्ण होने से सब प्रजा सुरक्षित रहे॥२८॥हे ईश तेरी कृपा से संसार की शोभा बढ़े और अन्नों से लोग पुष्ट रहें॥२८॥

इ॒मा अ॑स्य॒ प्रतू॑र्तयः प॒दं जु॑षन्त॒ यद्दि॒वि। नाभा॑ य॒ज्ञस्य॒ सं द॑धु॒र्यथा॑ वि॒दे॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि यह परमात्मा की अपूर्व सीमा है कि जिसकी शक्ति से अनेक ब्रह्माण्ड किसी अन्य के आश्रय की अपेक्षा न करते हुए निराधार स्थिर है, जैसे सूर्य्य, चन्द्रमा, नक्षत्र आदि अनेक पदार्थ रचकर उनमें गति प्रवेश करके काल आदि विशेष ज्ञान के लिये धारण कर रहा है, जो उसकी महिमा को भले प्रकार प्रकट करते हैं॥२९॥हे मनुष्यों! उसी के कृपा से उत्तमोत्तम स्थान प्राप्त कर सकते हो, अतः उसी की उपासना करो॥२९॥

अ॒यं दी॒र्घाय॒ चक्ष॑से॒ प्राचि॑ प्रय॒त्य॑ध्व॒रे। मिमी॑ते य॒ज्ञमा॑नु॒षग्वि॒चक्ष्य॑॥

वह अनादि परमात्मा जब सृष्टि का निर्माण करता है, तब प्रवाहरूप से अनादि कर्मों के अनुसार ही सृष्टि रचता है अर्थात् वेदविहित शुभकर्मोंवाले ऐश्वर्य्यसम्पन्न तथा सब कामनाओं से पूर्ण हुए सुख अनुभव करते हैं, इसी अवस्था का नाम “स्वर्ग” है और वेदविरुद्ध अशुभकर्म करनेवाले दरिद्र, आलसी, निरुद्यमी तथा प्रत्येक पदार्थ की इच्छावाले होते हैं, जिसका नाम “नरकपात” है। अतएव सब पुरुषों का कर्तव्य है कि वह सदा शुभकर्मों में प्रवृत्त रहें, ताकि परमात्मा के नियमानुसार स्वर्ग=सुखविशेष के भोगनेवाले हों॥३०॥निखिल यज्ञों का विधायक भी वही है, अतः यज्ञों में वही पूज्यतम है॥३०॥

वृषा॒यमि॑न्द्र ते॒ रथ॑ उ॒तो ते॒ वृष॑णा॒ हरी॑। वृषा॒ त्वं श॑तक्रतो॒ वृषा॒ हवः॑॥

हे कामनाओं को पूर्ण करनेवाले परमेश्वर! यह आपका रचनारूप ब्रह्माण्ड अनेक पदार्थों से परिपूर्ण होने के कारण मनुष्यों की कामनाओं को पूर्ण करनेवाला है। हे परमात्मन्! आप ही इस सम्पूर्ण सृष्टि का पालन-पोषण करनेवाले, आप ही कर्मों का विस्तार करनेवाले और आप ही कामनाओं को पूर्ण करनेवाले हैं। हे प्रभो! हम प्रजाजन आपकी शरण को प्राप्त हुए प्रार्थना करते है कि हमारी कामनाओं को पूर्ण कर हमें सुखप्रद हों॥३१॥परमात्मा के सकल कर्म ही आनन्दप्रद हैं, अतः वही उपास्यदेव है॥३१॥

वृषा॒ ग्रावा॒ वृषा॒ मदो॒ वृषा॒ सोमो॑ अ॒यं सु॒तः। वृषा॑ य॒ज्ञो यमिन्व॑सि॒ वृषा॒ हवः॑॥

हे कामप्रद परमेश्वर! यह आपकी रचनारूप पर्वत, नदियाँ तथा पृथिवी आदि सब कामनाओं की वर्षा करनेवाले अर्थात् हमारी कामनाओं को पूर्ण करनेवाले हैं। यह आपका रचित यज्ञ, जो ब्रह्माण्ड में नियमपूर्वक नित्य हो रहा है, वह वर्षा आदि द्वारा हमारी कामनाओं को पूर्ण करता है। हे हमारे रक्षक प्रभो! आप हमारी रक्षा करते हुए सब कामनाओं को पूर्ण करें॥३२॥हे मनुष्यों! उसी ईश की सङ्गति करो, उसका सङ्ग आनन्दप्रद है॥३२॥

वृषा॑ त्वा॒ वृष॑णं हुवे॒ वज्रि॑ञ्चि॒त्राभि॑रू॒तिभिः॑। वा॒वन्थ॒ हि प्रति॑ष्टुतिं॒ वृषा॒ हवः॑॥

हे कामनाप्रद परमेश्वर! हम लोग कामनाओं की पूर्ति के लिये विविध स्तुतियों द्वारा आपके समीपवर्ती होते हैं। हे प्रभो! आप हमारी प्रार्थनाओं को स्वीकार करनेवाले हैं, अतएव हमारी कामनाओं की पूर्तिरूप प्रार्थना को स्वीकार करें, ताकि हम उच्चभावोंवाले होकर पदार्थों के आविष्कार द्वारा ऐश्वर्य्यशाली हों और यज्ञादि कर्मों में हमारी सदा प्रवृत्ति रहें॥३३॥यह तेरहवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥हे मनुष्यों! उस दयालु का दान अनन्त-अनन्त है, तुम भी अपनी शक्ति के अनुसार उसका अनुकरण करो॥३३॥

यदि॑न्द्रा॒हं यथा॒ त्वमीशी॑य॒ वस्व॒ एक॒ इत्। स्तो॒ता मे॒ गोष॑खा स्यात्॥

इस मन्त्र में यह उपदेश किया है कि क्षात्रधर्म में स्थित भावी सम्राट् को चाहिये कि वह वर्तमान ऐश्वर्यसम्पन्न राजा के सदाचारों को देखकर उन्हीं का अनुकरण करे और सर्वदा यही उद्योग करता रहे, जिससे अपने अनुयायी कार्यसम्पादक किसी प्रजाजन को बिना अपराध पीड़ित न करे, क्योंकि प्रजा का सुखी होना ही साम्राज्य की चिरस्थिति में कारण है अर्थात् प्रजा के सुखी होने से ही साम्राज्य चिरकालस्थायी रह सकता है, अन्यथा नहीं॥१॥जैसे वह ईश दान दे रहा है, तद्वत् हम धन पाकर दान देवें॥१॥

शिक्षे॑यमस्मै॒ दित्से॑यं॒ शची॑पते मनी॒षिणे॑। यद॒हं गोप॑तिः॒ स्याम्॥

प्रजापालक को उचित है कि वह अपनी इन्द्रियों को स्वाधीन करने का प्रयत्न पहिले ही से करे, जो इन्द्रियों की गति के अनुसार सर्वदा चलता है, उसका अधःपात शीघ्र ही होता है, फिर साम्राज्य प्राप्त करने के अनन्तर अपने राष्ट्रिय विद्वानों का अन्न-धनादि अपेक्षित द्रव्यों से सर्वदा सत्कार करता रहे, क्योंकि जिस देश में विद्वानों की पूजा होती है, उस देश की शक्तियें सदा बढ़कर अपने स्वामी को उन्नत करती हैं अर्थात् जिस राजा के राज्य में गुणी पुरुषों का सत्कार होता है, वह राज्य सदैव उन्नति को प्राप्त होता है॥२॥हे भगवन्! मुझको धनवान् और दाता बना, जिससे दरिद्रों और विद्वानों को मैं वित्त दूँ, इस मेरी इच्छा को पूर्ण कर॥२॥

धे॒नुष्ट॑ इन्द्र सू॒नृता॒ यज॑मानाय सुन्व॒ते। गामश्वं॑ पि॒प्युषी॑ दुहे॥

जिस प्रकार गौएँ वृद्धि को प्राप्त हुईं चारों ओर फैल कर अपने दुग्धपान द्वारा सब ज्ञानयोगियों तथा कर्मयोगियों के ज्ञान और बल को बढ़ाकर सब कार्यों को उत्साहसहित तथा नियमपूर्वक कराती हैं, उसी प्रकार सम्राट् की सत्य तथा प्रिय वाणियाँ प्रजावर्ग में फैलकर सब कर्मचारियों को उत्साहसम्पन्न करती हुई ज्ञान-कर्म को समुन्नत करती हैं अर्थात् सत्यवादी तथा विश्वासपात्र राजा से सम्पूर्ण प्रजा तथा उसके कर्मचारीगण प्रसन्न हुए सर्व प्रकार से राष्ट्र की उन्नति में यत्नवान् होते हैं और जो राजा विश्वासपात्र नहीं है, वह शीघ्र ही राष्ट्र से च्युत होकर नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है॥३॥हे इन्द्र! जो मैं तुझसे सदा धन माँगता रहता हूँ, वह भी अनुचित ही है, क्योंकि त्वत्प्रदत्त वाणी ही मुझको सब देती है। अन्य कोई भी यदि स्वकीया वाणी को भी सुमधुरा और सुसंस्कृता बनावेगा, तब वह उसी से पूर्ण मनोरथ होगा। अतः सर्वदा ईश्वर के समीप धनयाचना न करनी चाहिये, किन्तु तत्प्रदत्त साधनों से उद्योगी होना चाहिये, यह शिक्षा इस ऋचा से देते हैं॥३॥

न ते॑ व॒र्तास्ति॒ राध॑स॒ इन्द्र॑ दे॒वो न मर्त्यः॑। यद्दित्स॑सि स्तु॒तो म॒घम्॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि जो सम्राट् अपनी प्रजा को अन्न तथा धनादि अपेक्षित पदार्थों द्वारा सन्तुष्ट रखता है, उसके कार्य को राष्ट्रिय अल्प राजा तथा प्रजा कोई भी विघ्नित नहीं कर सकता किन्तु सहाय बनकर कार्य को सिद्ध करते हैं अर्थात् जो सम्राट् प्रजापालन तथा प्रजा के सुखोपयोगी कार्यों को सदैव सम्पादित करता रहता है, उसका राज्य निर्विघ्न चिरस्थायी रहता और विघ्न होने पर प्रजाजन उसके सब प्रकार से सहायक होते हैं॥४॥ईश्वर सब कुछ कर सकता है, इससे यह शिक्षा देते हैं। उसका बाधक या निवारक कोई पदार्थ नहीं है॥४॥

य॒ज्ञ इन्द्र॑मवर्धय॒द्यद्भूमिं॒ व्यव॑र्तयत्। च॒क्रा॒ण ओ॑प॒शं दि॒वि॥

जब वह सम्राट् योद्धा अपनी शक्ति को अनेक ओजस्वी कर्मों द्वारा आकाश में तथा पर्वतों और पृथिवी में प्रसिद्ध करता है, तब प्रजा में होनेवाले अनेक कर्म उसी के अधीन होकर उसको स्वयं बढ़ाते हैं, जिससे वह उत्साहित होकर अपनी शक्ति को पूर्ण प्रकार से प्रकट करता है अर्थात् प्रजा से साहाय्यप्राप्त सम्राट् अपनी सब स्थानों में विजयरूप कामनाओं को पूर्ण करता है॥५॥जिस कारण शुभ कर्मों से ही ईश्वर प्रसन्न होता है, अतः हे मनुष्यों! सत्यादि व्रतों और सन्ध्यादि कर्मों को नित्य करो॥५॥

वा॒वृ॒धा॒नस्य॑ ते व॒यं विश्वा॒ धना॑नि जि॒ग्युषः॑। ऊ॒तिमि॒न्द्रा वृ॑णीमहे॥

इस मन्त्र का तात्पर्य्य यह है कि जब वह सम्राट् प्रजा के साहाय्य से विजय प्राप्त कर सब ऐश्वर्यों को अपने अधीन कर लेता है, तब सब राष्ट्र उसी के अधीन होकर उसी से अपनी रक्षा सर्वदा चाहते और उसी को अपना स्वामी समझते हैं, अतएव राष्ट्रपति को उचित है कि सर्व प्रकार से राष्ट्र की रक्षा करने तथा उसको सुखपूर्ण करने में सदा यत्नवान् हो॥६॥प्रातः और सायंकाल सदा ईश्वर से रक्षार्थ और साहाय्यार्थ प्रार्थना करनी चाहिये॥६॥

व्य१॒॑न्तरि॑क्षमतिर॒न्मदे॒ सोम॑स्य रोच॒ना। इन्द्रो॒ यदभि॑नद्व॒लम्॥

उपर्युक्त विजयप्राप्त योद्धा, जो ऐश्वर्य्य को प्राप्त है, उसको चाहिये कि वह सर्वदा उत्साहवर्धक, बलप्रद तथा आह्लादक सोमादि रसों का सेवन करके अपना शरीर पुष्ट करे, उन्मादक पदार्थों से नहीं, क्योंकि उन्मादक द्रव्य सब कार्यों के साधक ज्ञान को दबाकर उसके कार्यों को यथेष्ट सिद्ध नहीं होने देते अर्थात् मादक पदार्थों का सेवन करनेवाला योद्धा=राष्ट्रपति अपने कार्यों को विधिवत् न करने के कारण शीघ्र ही राष्ट्र से च्युत हो जाता है॥७॥जब-२ परमदेव हमारे विघ्नों का निपातन करता है, तब-२ सब ही पदार्थ अपने-२ स्वरूप से प्रकाशित होने लगते हैं॥७॥

उद्गा आ॑ज॒दङ्गि॑रोभ्य आ॒विष्कृ॒ण्वन्गुहा॑ स॒तीः। अ॒र्वाञ्चं॑ नुनुदे व॒लम्॥

सम्राट् को उचित है कि लुप्त हुई प्राचीन तथा अर्वाचीन क्षात्रबलवर्धक गूढ़ विद्याओं का आविष्कार करने का प्रयत्न करता रहे अर्थात् अपने सैनिकों को सिखलाता रहे, जिससे उसके सैनिक किसी शत्रु की सेना से पराभूत न हों, प्रत्युत सदैव विजय प्राप्त करते रहें॥८॥उसी की कृपा से ज्ञान विज्ञान, विवेक और मेधा आदि गुण उत्पन्न होते हैं, यह शिक्षा इससे दी जाती है॥८॥

इन्द्रे॑ण रोच॒ना दि॒वो दृ॒ळ्हानि॑ दृंहि॒तानि॑ च। स्थि॒राणि॒ न प॑रा॒णुदे॑॥

वह प्रजापालक सम्राट् सूर्य्य के सदृश अपनी शक्ति को व्यापक बनाकर अपनी तथा दूसरे विद्वानों की बुद्धि की सहायता से पर्वतादि उच्चस्थानों में ऐसा दृढ़ दुर्ग बनावे, जिसको प्रतिपक्षी दल विचलित न कर सके॥९॥हे मनुष्यों! महामहाऽऽश्चर्यमय इस जगत् को देखो! किस आधार पर यह सूर्य्य और पृथिवी आदि ठहरे हुए हैं। क्यों न अपने-२ स्थान से विचलित होकर ये नष्ट हो जाते हैं। हे मनुष्यों! सबका आधार उसी को जानो और जानकर उसी को पूजो॥९॥

अ॒पामू॒र्मिर्मद॑न्निव॒ स्तोम॑ इन्द्राजिरायते। वि ते॒ मदा॑ अराजिषुः॥

जिस प्रकार जल की तरङ्ग नई-नई एक के उपरान्त दूसरी, उसके बाद तीसरी इत्यादि निरन्तर उत्पन्न हुआ करती हैं, इसी प्रकार न्यायतत्पर राजा की तरङ्गरूपी स्तुति भी प्रजारूप जल में निरन्तर नई-नई उत्पन्न हुआ करती हैं, तभी उसके क्षात्रगुणों से प्रजा निर्विघ्न रहती है। अतएव राजा को उचित है कि अपनी निन्दा के भय से सब प्रजा में नया-नया हर्ष उत्पन्न करता रहे, जिससे सब प्रजा सन्तुष्ट रहकर सदैव उसकी अनुगामी हो॥१०॥सब ही विवेकी प्रातःकाल ही उठकर उसकी स्तुति करते हैं। हे भगवन्! आपने सर्वत्र आनन्द बिछा दिया है। उसको लेने के लिये जिससे हममें बुद्धि उत्पन्न हो, वैसा उपाय दिखलाकर कृपा कर॥१०॥

त्वं हि स्तो॑म॒वर्ध॑न॒ इन्द्रास्यु॑क्थ॒वर्ध॑नः। स्तो॒तॄ॒णामु॒त भ॑द्र॒कृत्॥

राजा अपने प्रजाहितकारक सद्गुणों से प्रजा को ऐसा अनुरक्त करे कि वह अन्य राजाओं की अपेक्षा अपने राजा को ही सर्वोत्तम समझे और राजा वैदिक मार्गों का निर्विघ्न प्रसार करे, जिससे प्रजा उसकी अनुयायिनी बनकर उचित सुख का अनुभव कर सके अर्थात् अपने कर्मकाण्ड तथा धर्म में उन्नत होती हुई प्रजा के मार्गों में कोई रुकावट तथा बाधा राजा न करे, जिससे अपने धर्म में दृढ़ हुई प्रजा राष्ट्र का शुभचिन्तन करती हुई सुखी रहे॥११॥उसी की कृपा से भक्तों की स्तुतिशक्ति, भाषण चातुर्य्य और कल्याण होता है, यह जानकर वही स्तुत्य और पूज्य है, यह शिक्षा इससे देते हैं॥११॥

इन्द्र॒मित्के॒शिना॒ हरी॑ सोम॒पेया॑य वक्षतः। उप॑ य॒ज्ञं सु॒राध॑सम्॥

जो राजा वेदोक्त गुणों का सेवन करता है, उसी को उत्कृष्ट रत्न प्राप्त होते हैं और उसी को प्रजाजन अपने-२ कर्मों की रक्षा के लिये आह्वान करते हैं, या यों कहो कि न्यायप्रिय, सत्यवादी तथा विश्वासपात्र राजा कभी धनहीन नहीं होता, उसको प्रजाजन अपने शुभ कर्मों में सदा आह्वान कर रत्नादि अर्पण करते और उससे सदैव अपनी रक्षा की याचना करते हैं॥१२॥ये सूर्य्यादि सब पदार्थ ही परमात्मा को दिखलाने में समर्थ हैं। अन्यथा इसको कौन दिखला सकता है। इन पदार्थों की स्थिति विचारने से उसका अस्तित्व भासित होता है॥१२॥

अ॒पां फेने॑न॒ नमु॑चेः॒ शिर॑ इ॒न्द्रोद॑वर्तयः। विश्वा॒ यदज॑यः॒ स्पृधः॑॥

जब वह सम्राट् गूढ धनुर्विद्या का आविष्कार करता है, तब ऐसी शक्ति उत्पन्न कर लेता है कि वाष्प द्वारा निर्मित शस्त्रों से संग्राम में आये हुए बड़े-२ शत्रुओं को सहज ही में वशीभूत कर सकता है अर्थात् विद्वान् राजा अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण द्वारा प्रबल शत्रुओं को भी सहज ही में विजय कर लेता है, अतएव राष्ट्रपति धनुर्विद्या के जानने में सदा यत्न करता रहे॥१३॥जल का भी कारण परमात्मा ही है, ऐसा जानना चाहिये॥१३॥

मा॒याभि॑रु॒त्सिसृ॑प्सत॒ इन्द्र॒ द्यामा॒रुरु॑क्षतः। अव॒ दस्यूँ॑रधूनुथाः॥

भाव यह है कि उपर्युक्त धनुर्विद्यावेत्ता राष्ट्रपति छल से युद्ध करनेवाले तथा व्योमयानादि द्वारा आकाश में युद्ध करनेवाले अन्यायी शत्रुओं को भी पराङ्मुख करके विजय को प्राप्त होता है, अतएव राष्ट्रपति के लिये धनुर्विद्या में कुशल होना परमावश्यक है॥१४॥वह परमदेव अतिबलिष्ठ पापियों को भी अपने स्थान से गिरा देता है, अतः हे मनुष्यों! तुम पापों से दूर रहो॥१४॥

अ॒सु॒न्वामि॑न्द्र सं॒सदं॒ विषू॑चीं॒ व्य॑नाशयः। सो॒म॒पा उत्त॑रो॒ भव॑न्॥

उक्त प्रकार से वैदिक मार्ग में चलनेवाला शूरवीर सम्राट् राष्ट्र भर में सत्कार पाता और प्रत्येक यज्ञ में प्रथम भाग उसी को दिया जाता है, ऐसा राष्ट्रपति वेदविरुद्ध कर्मसेवी दुष्टजनों की शक्ति को छिन्न-भिन्न करने में समर्थ होता है॥१५॥यह चौदहवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥परमात्मा न्यायकारी और महादण्डधर है। वह पापिष्ठ सभा को भी उखाड़ देता है। यह जानकर पापों का आचरण न करे, यह इसका आशय है॥१५॥

तम्व॒भि प्र गा॑यत पुरुहू॒तं पु॑रुष्टु॒तम्। इन्द्रं॑ गी॒र्भिस्त॑वि॒षमा वि॑वासत॥

हे सम्पूर्ण प्रजाजनो! तुम सब मिलकर और पृथक्-२ भी उसी परमदेव परमात्मा की वेदवाणियों द्वारा स्तुतिगान करो, जिससे उस महान् देव का महत्त्व सब पर भले प्रकार प्रकट होकर मनुष्यमात्र उसी की उपासना में प्रवृत्त हो और जगत् के सम्पूर्ण नर-नारी एकमात्र उसी को अपना पूज्य देव मानें, जिसकी अनेक ऋषि, मुनि, महात्मा तथा विद्वान् आदि सृष्टि से पूजा=उपासना करते चले आये हैं॥१॥उस इन्द्र को छोड़कर अन्य किसी को ध्येय, पूज्य और स्तुत्य न समझे॥१॥

यस्य॑ द्वि॒बर्ह॑सो बृ॒हत्सहो॑ दा॒धार॒ रोद॑सी। गि॒रीँरज्राँ॑ अ॒पः स्व॑र्वृषत्व॒ना॥

इस मन्त्र में उस महान् परमात्मा की महिमा वर्णन की गई है कि वह परमात्मदेव, जिसके पराक्रम से द्युलोक तथा पृथिवी आदि लोक-लोकान्तर अपनी गति करते हुए स्थित हैं, जो अपनी मर्यादा से कभी चलायमान नहीं होते और अन्तरिक्ष में चञ्चल मेघमण्डल को धारण करके समयानुकूल वर्षा करना आपकी महान् महिमा है। अधिक क्या, अनेकानेक आपके ऐसे महत्त्वपूर्ण कार्य्य हैं, जिनका वर्णन करना मनुष्य की बुद्धि से सर्वथा बाहर है॥२॥परमात्मा ही इस पृथिवी, उस द्युलोक, उन नक्षत्रों और अन्यान्य सकल वस्तुओं का धारण और पोषण करता है, उसकी ईदृशी शक्ति को जानकर उसी की उपासना करे॥२॥

स रा॑जसि पुरुष्टुतँ॒ एको॑ वृ॒त्राणि॑ जिघ्नसे। इन्द्र॒ जैत्रा॑ श्रव॒स्या॑ च॒ यन्त॑वे॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि अन्योपासना से उस परमात्मा की उपासना में यह विशेषता है कि अन्य साधारण मनुष्य आदि की उपासना किसी एक तुच्छ कार्य्य की सिद्धि करा सकती है और परमात्मोपासना ऐसे दिव्यज्ञान को उत्पन्न करती है, जिससे मनुष्य साधारण अभीष्ट को ही नहीं, किन्तु बड़े-२ लौकिक तथा पारलौकिक अभीष्टों को सिद्ध करने में समर्थ होता है, जो अभीष्ट सन्मार्ग द्वारा सिद्ध होकर उसके पवित्र यश को बढ़ाते हैं, अतएव वही सर्वोपरि उपासनीय है॥३॥इन्द्र ही सर्वविघ्नविनाशक होने से पूज्य है, इसको निश्चय करो॥३॥

तं ते॒ मदं॑ गृणीमसि॒ वृष॑णं पृ॒त्सु सा॑स॒हिम्। उ॒ लो॒क॒कृ॒त्नुम॑द्रिवो हरि॒श्रिय॑म्॥

हे अतुलबल तथा वज्रशक्तिवाले परमेश्वर! आप ही सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाले और आप ही उस आह्लादक बल को देनेवाले हैं, जिसको प्राप्त कर मनुष्य उन्नत होता है। हे प्रभो! हम उस आह्लादक आत्मिक बल के लिये आपसे प्रार्थना करते हैं कि हमें बलवान् करो, ताकि हम उन्नत होकर मनुष्यजन्म के फलचतुष्टय को प्राप्त हों॥४॥परमात्मा सदा पदार्थों के ऊपर आनन्दवृष्टि कर रहा है। तथापि सब आनन्दित नहीं हैं, यह आश्चर्य है। हे मनुष्यों! इस जगत् से उस आनन्द को निकाल धारण करने के लिये प्रयत्न करो॥४॥

येन॒ ज्योतीं॑ष्या॒यवे॒ मन॑वे च वि॒वेदि॑थ। म॒न्दा॒नो अ॒स्य ब॒र्हिषो॒ वि रा॑जसि॥

हे परमात्मन्! जिस बल से ज्ञान तथा कर्मों की उन्नति करते हुए अनेक दिव्यशक्तिसम्पन्न होकर ऐश्वर्य्यसम्पन्न होते हैं और जिस बल से उपासक लोग आपको अपने हृदय में धारण कर आह्लादित होते हैं, उसी बल की हम आपसे याचना करते हैं॥५॥वह इन्द्र हम जीवों को सूर्य्यादिकों और इन्द्रियों के द्वारा भौतिक और अभौतिक दोनों प्रकार की ज्योति दे रहा है, जिनसे हमको बहुत सुख मिलते हैं। तथापि न तो उसको हम जानते और न उसको पूजते। हे मनुष्यों! यहाँ ही वह विद्यमान है। उसी को जान पूजो, यह आशय है॥५॥

तद॒द्या चि॑त्त उ॒क्थिनोऽनु॑ ष्टुवन्ति पू॒र्वथा॑। वृष॑पत्नीर॒पो ज॑या दि॒वेदि॑वे॥

हे कर्मफलदाता परमात्मन्! आपके दिये हुए जिस बल को पाकर विद्वान् पुरुष कृतकृत्य हुए प्रशंसा करते हैं, वह बल हमें प्रदान करें। हे प्रभो! आप ही सब कामनाओं के पूर्ण करनेवाले और आप ही कर्मफलदाता हैं। कृपा करके हमें शुभकर्मों की ओर प्रेरित करें, जिससे हमारे शुभ मनोरथ पूर्ण हों॥६॥हे भगवन्! तू ही सबसे स्तुत्य है। वह तू जब-२ जल की आवश्यकता हो, तब-२ जल दिया कर, जिससे सब ही पदार्थ प्राणवान् होते हैं॥६॥

तव॒ त्यदि॑न्द्रि॒यं बृ॒हत्तव॒ शुष्म॑मु॒त क्रतु॑म्। वज्रं॑ शिशाति धि॒षणा॒ वरे॑ण्यम्॥

हे परमात्मन्! आपके महान् ऐश्वर्य्य, बल, कर्म और आपके वज्ररूप शस्त्र को यह द्युलोक और पृथिवीलोक प्रकाशित कर रहे हैं अर्थात् आपसे रचित इन प्रकृतिस्थ पदार्थों को अवलोकन कर कौन आपकी महत्ता को अनुभव नहीं करता अर्थात् सभी अनुभव कर रहे हैं॥७॥हमारे सब ही कर्म उसी को विभूतियाँ दिखलावें। यह इसका आशय है॥७॥

तव॒ द्यौरि॑न्द्र॒ पौंस्यं॑ पृथि॒वी व॑र्धति॒ श्रवः॑। त्वामापः॒ पर्व॑तासश्च हिन्विरे॥

हे सम्पूर्ण ऐश्वर्यों के स्वामी परमेश्वर! यह द्युलोक तथा पृथिवीलोक आपके कर्तृत्व=क्रिया, बल तथा यश को भले प्रकार प्रकट कर रहे हैं और आपके आश्रित मेघ=वृष्टि पृथिवी को प्राप्त होकर सबकी रक्षा करती है अर्थात् अन्नादि की उत्पत्ति द्वारा प्राणीमात्र तृप्त होते हैं, यह सब पदार्थ आपकी महत्ता प्रकट कर रहे हैं॥८॥सूर्य्यादि सब ही पदार्थ उसकी महिमा को दिखला रहे हैं॥८॥

त्वां विष्णु॑र्बृ॒हन्क्षयो॑ मि॒त्रो गृ॑णाति॒ वरु॑णः। त्वां शर्धो॑ मद॒त्यनु॒ मारु॑तम्॥

हे सबके आश्रय महान् परमेश्वर! विष्णु=व्यापक, मित्र=सबका हितचिन्तक तथा वरुण=सबका उपासनीय, यह सब शब्द आप ही में प्रयुक्त होते हैं और ऋत्विक्=वेदविद्या के प्रकाशक विद्वान् आपके आश्रित=आप ही की कृपा से विद्यासम्पन्न होकर मनुष्यों को सदुपदेश द्वारा हर्षित करते हैं॥९॥भाव यह है कि हे इन्द्र! यह महान् सूर्य, ब्राह्मण, क्षत्रिय और अहोरात्र आपकी ही कीर्त्ति दिखला रहे हैं। तथा इस वायु का वेग या बल भी आपसे ही प्राप्त होता है। आप ऐसे महान् देव हैं। आपकी ही स्तुति मैं किया करूँ॥९॥

त्वं वृषा॒ जना॑नां॒ मंहि॑ष्ठ इन्द्र जज्ञिषे। स॒त्रा विश्वा॑ स्वप॒त्यानि॑ दधिषे॥

हे सब कामनाओं को पूर्ण करनेवाले प्रभो! आप अपने उपासकों को सब प्रकार के पदार्थों का दान देकर उन्हें सन्तुष्ट करते हैं और आप ही सब प्राणियों को धारण कर उनका पालन, पोषण तथा रक्षण करते हैं, जिससे आपकी महिमा सब पर प्रकट हो रही है॥१०॥उस इन्द्र को परमोदार समझकर उपासना करे॥१०॥

स॒त्रा त्वं पु॑रुष्टुतँ॒ एको॑ वृ॒त्राणि॑ तोशसे। नान्य इन्द्रा॒त्कर॑णं॒ भूय॑ इन्वति॥

हे सबके स्तुतियोग्य परमात्मन्! एकमात्र आप ही सब विघ्नों तथा उपद्रवों को नष्ट करके प्राणियों को सुख देनेवाले हैं। आपसे भिन्न अन्य कोई भी कर्मों में आधिक्य प्राप्त नहीं कर सकता अर्थात् सब कर्मों में आप ही का आधिपत्य पाया जाता है॥११॥वह एक ही सर्व विघ्नों को विनष्ट करता है। वह सब कुछ कर सकता है, यह जान उसकी उपासना करे॥११॥

यदि॑न्द्र मन्म॒शस्त्वा॒ नाना॒ हव॑न्त ऊ॒तये॑। अ॒स्माके॑भि॒र्नृभि॒रत्रा॒ स्व॑र्जय॥

हे सबके रक्षक परमात्मन्! जो उपासक जन आपको अपने ज्ञानानुसार अनेक प्रकार से अपनी रक्षा के लिये प्रेरित करते हैं, आप निश्चय ही उनके रक्षक होते हैं। हे प्रभो! इस रक्षारूप यज्ञ में हमारे सब नेता आपकी स्तुति करते हैं। कृपा करके हमको बलप्रदान करें कि हमारी सब ओर से रक्षा हो॥१२॥उसी की कृपा से विजय भी होता है, अतः उसके लिये भी वही उपासनीय है॥१२॥

अरं॒ क्षया॑य नो म॒हे विश्वा॑ रू॒पाण्या॑वि॒शन्। इन्द्रं॒ जैत्रा॑य हर्षया॒ शची॒पति॑म्॥

जयैषी=जय की इच्छावाले पुरुष को चाहिये कि परमात्मा के शरण में रहते हुए अपनी जय का उद्योग करे, क्योंकि वह सब ब्रह्माण्डों में ओत-प्रोत है और सबसे अधिक ऐश्वर्य्य तथा सब शक्तियों का आविर्भाव वा विनाश उसी से होता है॥१३॥यह पन्द्रहवाँ सूक्त और उन्नीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥जैसे उसकी कृपा से मेरा गृह सर्वधनसम्पन्न है, वैसे ही तुम्हारा गृह भी वैसा ही हो, यदि उसी को पूजो॥१३॥

प्र स॒म्राजं॑ चर्षणी॒नामिन्द्रं॑ स्तोता॒ नव्यं॑ गी॒र्भिः। नरं॑ नृ॒षाहं॒ मंहि॑ष्ठम्॥

हे कल्याण की कामनावाले पुरुषो! तुम लोग राजाओं के राजा महाराजा, सबके नेता, मनुष्यों को कर्मफल देनेवाले और जो नानाविध पदार्थों का दान प्रदान करके प्राणिमात्र को सन्तुष्ट करता है, उस प्रभु की वेदवाणियों द्वारा निरन्तर स्तुति करो, जिससे तुम्हारी सब कामनाएँ पूर्ण हों॥१॥हे मनुष्यों! इन्द्र की ही प्रशंसा करो, जो मनुष्यों का महाराज और नायक है। जो परमोदार और दुष्टनियन्ता है॥१॥

यस्मि॑न्नु॒क्थानि॒ रण्य॑न्ति॒ विश्वा॑नि च श्रव॒स्या॑। अ॒पामवो॒ न स॑मु॒द्रे॥

जिस प्रकार अगाध जल का प्रवाह समुद्र को सुशोभित कर रहा है, इसी प्रकार परमात्मरचित वेदों के स्तोत्र=स्तुतिप्रद वेदवाणियें और नानाविध पदार्थ सम्पूर्ण लोक-लोकान्तरों को देदीप्यमान कर रहे हैं, जो आपकी महिमा को दर्शाते हुए आपके महत्त्व को बढ़ाते हैं, जिससे आपका गौरव सब पर भले प्रकार प्रकट हो रहा है॥२॥सर्वव्यापी सर्वान्तर्यामी परमात्मा की जो स्तुति प्रार्थना की जाती है, वह समुद्र की जलतरङ्गवत् शोभित होती है॥२॥

तं सु॑ष्टु॒त्या वि॑वासे ज्येष्ठ॒राजं॒ भरे॑ कृ॒त्नुम्। म॒हो वा॒जिनं॑ स॒निभ्यः॑॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि संग्राम प्राप्त होने पर बल, बुद्धि तथा शत्रु के पराजयार्थ योद्धा लोग उस सर्वोपरि महाराजा परमात्मा से प्रार्थना करते हैं, जो महान् कार्यों को पूर्ण करनेवाला, महान् बलसम्पन्न और जो संग्राम में विजय का देनेवाला है, अतएव मनुष्यमात्र को उसकी स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना करते हुए उन्नत होने का प्रयत्न करना चाहिये॥३॥इन सूर्य्य चन्द्र पृथिवी आदि पदार्थों में से सदा विज्ञान का लाभ करे। इनके अध्ययन से ही मनुष्य धनवान् होते हैं॥३॥

यस्यानू॑ना गभी॒रा मदा॑ उ॒रव॒स्तरु॑त्राः। ह॒र्षु॒मन्तः॒ शूर॑सातौ॥

वह महान् बलसम्पन्न परमात्मा, जिसकी शक्तियें शूरवीरों को उत्साह तथा आह्लादजनक हैं, वे ही शत्रुओं को विजय करानेवाली, सर्वत्र विस्तीर्ण और अगाध हैं अर्थात् जिनका पारावार नहीं, परमात्मा अपने उपासक योद्धाओं को उक्त शक्ति प्रदान कर विजय प्राप्त कराते हैं, अत एव विजय की कामनावाले योद्धाओं को निरन्तर उसकी उपासना में प्रवृत्त रहना चाहिये॥४॥मदाः=ईशरचित विविध संसार का नाम मद है, क्योंकि इसमें ही जीव क्रीड़ा करते हैं। वह न्यून, गम्भीर, उरु और रक्षक है। शूरसाति=संग्राम। जिसमें शूरवीर पुरुष ही लाभ उठा सकते हैं। देखते हैं कि इस जीवनयात्रा में भी वे ही कृतकृत्य होते हैं, जो मानसिक, आध्यात्मिक और शारीरिक तीनों बलों में सुपुष्ट हैं॥४॥

तमिद्धने॑षु हि॒तेष्व॑धिवा॒काय॑ हवन्ते। येषा॒मिन्द्र॒स्ते ज॑यन्ति॥

शत्रु के संनिहित=प्राप्त होने पर अर्थात् युद्धसमय में जो योद्धा लोग परमात्मा से विजय की प्रार्थना करते हैं और जिसके पक्ष में परमात्मा होते हैं, निस्सन्देह उसी की विजय होती है, परपक्ष की नहीं॥५॥हे मनुष्यों! धन के निमित्त वही स्तुत्य है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जिसके पक्ष में ईश्वर होता है, वह अवश्य विजयी होता है, क्योंकि वह सत्य के लिये ही युद्ध करता है॥५॥

तमिच्च्यौ॒त्नैरार्य॑न्ति॒ तं कृ॒तेभि॑श्चर्ष॒णयः॑। ए॒ष इन्द्रो॑ वरिव॒स्कृत्॥

विद्वान् पुरुष वेदविहित बलवर्धक स्तोत्रों द्वारा उसी महान् बलप्रद परमात्मा की ईश्वरभाव से तथा यज्ञादि विविध कर्मों द्वारा सेव्यभाव से उपासना करते हैं, जो बल तथा विजयप्रदाता है। इसलिये प्रजाजनों को सेव्यभाव से उसी की उपासना में निरन्तर रत रहना चाहिये, जिससे उनकी शारीरिक, आत्मिक तथा सामाजिक उन्नति हो॥६॥भगवान् के लिये ही उत्तमोत्तम स्तोत्र रचें और ऐसे शुभकर्म करें, जिनसे ईश्वर की प्राप्ति हो। हे मनुष्यों! वही सर्वप्रकार धनों का प्रदाता है, यह जान उसकी उपासना करो॥६॥

इन्द्रो॑ ब्र॒ह्मेन्द्र॒ ऋषि॒रिन्द्रः॑ पु॒रू पु॑रुहू॒तः। म॒हान्म॒हीभिः॒ शची॑भिः॥

वही सर्वशक्तिमान् परमात्मा अग्नि, वायु, आदित्य तथा अङ्गिरा द्वारा ऋगादि चारों वेदों का प्रकाशक, वही ऋषि=सूक्ष्मद्रष्टा=वेदों के सूक्ष्म=गूढ़ तत्त्वों का प्रकाशक, वही सबका पूजनीय इष्टदेव और वही सर्वोपरि होने से महान् है, उसी की उपासना करना मनुष्यमात्र का कर्तव्य है॥७॥वह सबसे महान् है, क्योंकि इस अनन्त सृष्टि का जो कर्त्ता है, वह अवश्य इन सबसे सब प्रकार से महान् होना चाहिये। सृष्टिरचना इसकी महती क्रिया है, हे मनुष्यों! इसकी इस लीला को देखो॥७॥

स स्तोम्यः॒ स हव्यः॑ स॒त्यः सत्वा॑ तुविकू॒र्मिः। एक॑श्चि॒त्सन्न॒भिभू॑तिः॥

वह पूर्ण परमात्मा सबका उपासनीय, तथा स्तुतियोग्य है, वही वेदविहित कर्म करनेवाले सत्पुरुषों का पालक, दुष्टों को दण्ड देनेवाला और विविध प्रकार के कर्मों का उत्पादक तथा पूर्ण करनेवाला है, अतएव प्रत्येक पुरुष को उचित है कि सदैव वेदविहित कर्मों का अनुष्ठान करते हुए उसी की शरण को प्राप्त हों॥८॥भगवान् के विषय में जितना कहा जाय, वह सब ही अति स्वल्प है। हे मनुष्यों! वही स्तुत्य, हव्य, सत्य और विश्वकर्मा है। वह असहाय सर्व कार्य कर रहा है॥८॥

तम॒र्केभि॒स्तं साम॑भि॒स्तं गा॑य॒त्रैश्च॑र्ष॒णयः॑। इन्द्रं॑ वर्धन्ति क्षि॒तयः॑॥

परमात्मा के द्रष्टा योगीजन, जिन्होंने उसके स्वरूप को भले प्रकार जाना है, वे उसको यजुरादि चारों वेदों से प्रकाशित करते हैं, क्योंकि परमात्मा का पूर्ण ज्ञान वेदों द्वारा ही हो सकता है। वेद परमात्मा की वाणी होने से उनमें वर्णित परमात्मा का स्वरूपज्ञान तथा उसकी महिमा का मान भले प्रकार होता है, अन्यथा नहीं, अतएव प्रत्येक पुरुष वेदों के अध्ययन द्वारा उसका स्वरूपज्ञान प्राप्त करने के लिये प्रयत्न करे॥९॥हे विवेकी जनों! जहाँ देखो, क्या यज्ञों में, क्या अन्यत्र, सर्वत्र ही बुद्धिमान् जन भी उसी का यशोगान करते हैं। आप भी उसी को गाओ, यह शिक्षा इससे देते हैं॥९॥

प्र॒णे॒तारं॒ वस्यो॒ अच्छा॒ कर्ता॑रं॒ ज्योतिः॑ स॒मत्सु॑। सा॒स॒ह्वांसं॑ यु॒धामित्रा॑न्॥

जो परमात्मा सम्पूर्ण धनों का देनेवाला, युद्ध में अपने भक्तों को पौरुष देनेवाला अर्थात् न्याययुक्त योद्धाओं का सहायक और न्यायपथ से च्युत योद्धाओं को अभिभूत=पराजित करनेवाला है, वही सबका रक्षक और सदा उपासनायोग्य है॥१०॥हे मनुष्यों! यदि उसकी शरण में अन्तःकरण से प्राप्त होंगे, तब निश्चय है कि वह तुमको धन की ओर ले जायगा, महान् से महान् संग्राम में तुमको ज्योति देगा और अन्त में तुम्हारे निखिल शत्रुओं का समूलोच्छेद करेगा॥१०॥

स नः॒ पप्रिः॑ पारयाति स्व॒स्ति ना॒वा पु॑रुहू॒तः। इन्द्रो॒ विश्वा॒ अति॒ द्विषः॑॥

जिस प्रकार जलमय स्थानों में नौका तराने की साधन होती है, इसी प्रकार वह हमारा रक्षक परमात्मा, जो सब कामों की पूर्ति करनेवाला है, वह नौका के समान सब शत्रुओं से हमारी रक्षा करता हुआ पार करनेवाला है॥११॥हे मनुष्यों! सदा दुष्टजनों से बचने के लिये परमात्मा से प्रार्थना करनी चाहिये। स्वयं कभी दुराचार में न फँसे॥११॥

स त्वं न॑ इन्द्र॒ वाजे॑भिर्दश॒स्या च॑ गातु॒या च॑। अच्छा॑ च नः सु॒म्नं ने॑षि॥

हे उपर्युक्त महिमावाले परमेश्वर! आप हमें बल प्रदान करते हुए हमको वे पदार्थ प्रदान करें, जिनकी हम आपसे याचना करते हैं। हमें वेदविहित सन्मार्ग की ओर ले जाएँ, जिससे हम पापकर्मों से सदा पृथक् रहें और तीनों प्रकार के तापों से हमारी रक्षा करें, ताकि हम सुखसम्पन्न होकर आपकी उपासना में तत्पर रहें॥१२॥यह सोलहवाँ सूक्त और इक्कीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥हे मनुष्यों! परमात्मा ही से धन, जन, ज्ञान और बल की प्रार्थना करो, वही सन्मार्ग तुम्हें दिखलावेगा॥१२॥

आ या॑हि सुषु॒मा हि त॒ इन्द्र॒ सोमं॒ पिबा॑ इ॒मम्। एदं ब॒र्हिः स॑दो॒ मम॑॥

विजयी योद्धा, जिसने परमात्मा की विशेषकृपा से शत्रुओं पर विजयप्राप्त किया है, वह क्षात्रबलप्रधान यज्ञ में सत्कारार्ह होता है। वही सम्मान का अधिकारी होता है और उसको यज्ञ में उच्चस्थान पर आसीन कर याज्ञिक पुरुष सोमरस आदि उत्तमोत्तम पदार्थों से उसका सत्कार करते हैं, ताकि अन्य योद्धा उसको ऐश्वर्यसम्पन्न देखकर उत्साहित हों॥१॥मनुष्य जो कुछ शुभकर्म करते, पकाते, खाते, होम करते और देते हैं, उन सबको प्रथम परमात्मा के निकट समर्पित करें। यह शिक्षा इस ऋचा द्वारा दी गई है॥१॥

आ त्वा॑ ब्रह्म॒युजा॒ हरी॒ वह॑तामिन्द्र के॒शिना॑। उप॒ ब्रह्मा॑णि नः शृणु॥

यज्ञसदन में यज्ञ के नेता की ओर से यह कथन है कि हे युद्धविशारद योद्धा! तुम अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर, अश्व पर सवार होकर युद्ध में जाओ और शत्रु पर विजयप्राप्त कर हमारे सन्मुख आओ और हमारी स्तुतिप्रद वाणियों को श्रवण कर हर्ष को प्राप्त होओ। परमात्मा आपको युद्ध में विजयी होने के लिये बल प्रदान करें॥२॥हे मनुष्यों! इसमें अणुमात्र सन्देह नहीं कि यदि हम प्रेम श्रद्धा और भक्तिभावसम्पन्न होकर उसकी प्रार्थना करें, तो वह अवश्य सुनेगा। यदि उसकी विभूतियाँ देखना चाहें, तो नयन उठाकर इस महामहाऽद्भुत जगत् को देखें। इसी में वह अपनी लीला प्रकट कर रहा है॥२॥

ब्र॒ह्माण॑स्त्वा व॒यं यु॒जा सो॑म॒पामि॑न्द्र सो॒मिनः॑। सु॒ताव॑न्तो हवामहे॥

हे विजय को प्राप्त योद्धा! हम याज्ञिक ब्राह्मण आपको यज्ञसदन में आह्वान करते हैं, आप हमारे यज्ञस्थान को प्राप्त होकर हमारा यह सत्कार स्वीकार करें और हमारे सर्व प्रकार से रक्षक होकर यज्ञपूर्ति में सहायक हों॥३॥मनुष्य प्रथम वेदविहित यज्ञों को और सत्यादिकों के अभ्यास द्वारा अपने अन्तःकरण को शुद्ध पवित्र बनावे, तब उससे जो कुछ प्रार्थना करेगा, वह स्वीकृत होगी। अतः मूल में ब्रह्माणः इत्यादि पद आए हैं॥३॥

आ नो॑ याहि सु॒ताव॑तो॒ऽस्माकं॑ सुष्टु॒तीरुप॑। पिबा॒ सु शि॑प्रि॒न्नन्ध॑सः॥

हे शिर पर मुकुट धारण किये हुए विजयी योद्धा! हम लोग स्तुतियों द्वारा आपको आह्वान करते हैं, आप हमारे यज्ञसदन को प्राप्त होकर सोमरस पान करें और हमारे यज्ञ की सब ओर से रक्षा करें॥४॥जो ईश्वर की आज्ञा में रहकर शुभकर्म करते जाते हैं, उन पर परमदेव सदा प्रसन्न रहते हैं और सर्व अभाव से उनकी रक्षा करते हैं॥४॥

आ ते॑ सिञ्चामि कु॒क्ष्योरनु॒ गात्रा॒ वि धा॑वतु। गृ॒भा॒य जि॒ह्वया॒ मधु॑॥

हे क्षात्रबलसम्पन्न योद्धा! हम लोग आपके सैनिकों सहित आपको आह्वान करते हैं, आप हमारे यज्ञसदन में आकर भोग्य पदार्थों को भक्षण कर तृप्त हों, तुम्हारा क्षात्रबल दुष्टों के दलन करने और श्रेष्ठों की रक्षा करने में सफलीभूत हो॥५॥हे प्रेममय परमात्मन्! हमारी सारी क्रियाएँ प्रेमयुक्त हों, क्योंकि तू सबमें व्याप्त है। जिससे हम घृणा अथवा राग-द्वेष करेंगे, वह तेरा ही शरीर है अर्थात् यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मानो ईश्वर का शरीर है, क्योंकि वह उसमें व्यापक है। तब हम किससे राग और द्वेष करें, यह पुनः-पुनः विचारना चाहिये॥५॥

स्वा॒दुष्टे॑ अस्तु सं॒सुदे॒ मधु॑मान्त॒न्वे॒३॒॑ तव॑। सोमः॒ शम॑स्तु ते हृ॒दे॥

हे क्षात्रबलप्रधान योद्धाओ! हमारा सिद्ध किया हुआ सोमरस, जो स्वादु और पुष्टिकारक है, यह आपके शरीर और आत्मा के लिये पुष्टिकारक तथा बलप्रद हो, जिससे आप प्रजा की रक्षा करने में सर्वथा समर्थ हों॥६॥हे मनुष्यों! जगत् में प्रेम प्रसारित करो। यहाँ प्रेम का अभाव देखते हैं, राग, द्वेष, हिंसा, द्रोह आदि से यह संसार पूर्ण हो रहा है। मनुष्य में विवेक इसी कारण दिया गया है कि वह इन कुकर्मों से बचे और बचावे॥६॥

अ॒यमु॑ त्वा विचर्षणे॒ जनी॑रिवा॒भि संवृ॑तः। प्र सोम॑ इन्द्र सर्पतु॥

जिस प्रकार रिद्धिसिद्धिसम्पन्न प्रजा पय आदि द्रव्यों से परिपूर्ण होकर अभ्युदय का धाम होती है, इसी प्रकार यह सोम पय आदि द्रव्यों से संस्कार को प्राप्त हुआ आपको प्राप्त हो॥७॥ईश्वर को निखिल पदार्थ समर्पित कर इसका भी यह आशय है कि जगत् के कल्याण के हेतु प्रतिदिन यथाशक्ति दान प्रदान करता रहे। पुरुषार्थ और सत्यता से प्राप्त धन को अवश्यमेव देशहित व और मनुष्यहित में लगावें॥७॥

तु॒वि॒ग्रीवो॑ व॒पोद॑रः सुबा॒हुरन्ध॑सो॒ मदे॑। इन्द्रो॑ वृ॒त्राणि॑ जिघ्नते॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि ये शूरवीर योद्धा, जो विस्तीर्ण कन्धोंवाले, बलप्रद उदरवाले और जो बड़ी भुजाओंवाले हैं, वे सोमरस का पान करके युद्ध में शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं अर्थात् सोमरसपान से आह्लाद प्राप्त होने पर परपक्ष को जीतकर विजय का नाद बजाते हुए स्वराष्ट्र की रक्षा करते हैं॥८॥जो जन सदा ईश्वर के आश्रित होकर शुभकर्म में प्रवृत्त रहते हैं, उनके विघ्न स्वयं उसकी कृपा से विनष्ट हो जाते हैं, उसकी महान् महिमा है॥८॥

इन्द्र॒ प्रेहि॑ पु॒रस्त्वं विश्व॒स्येशा॑न॒ ओज॑सा। वृ॒त्राणि॑ वृत्रहञ्जहि॥

हे युद्ध में शत्रुओं को हनन करनेवाले योद्धा लोगो! आप अपने अमित पराक्रम से वेदविरोधी, प्रजा को कष्ट देनेवाले तथा श्रेष्ठ=उच्च भावोंवाले पुरुषों का अपमान करनेवाले शत्रुओं को नष्ट करके राष्ट्र को सुख-सम्पत्ति से समृद्ध करें॥९॥हे मनुष्यों! इस सम्पूर्ण जगत् का स्वामी वही ईश है। वही तुम्हारे समस्त विघ्नों का विनाश कर सकता है। उसी की उपासना सब कोई करो॥९॥

दी॒र्घस्ते॑ अस्त्वङ्कु॒शो येना॒ वसु॑ प्र॒यच्छ॑सि। यज॑मानाय सुन्व॒ते॥

हे युद्धविजयी योद्धाजनो! जिन अस्त्र-शस्त्रों से विजय प्राप्त कर यज्ञकर्त्ता यजमान को यज्ञ की पूर्त्यर्थ धन प्रदान करते हो, वे आपके शस्त्र अप्रतिहतगति हों अर्थात् उनकी गति रोकने में कोई समर्थ न हो। यह स्तोता आदि यज्ञकर्ताओं का योद्धा के लिये आशीर्वचन है, जो प्रजा की रक्षानिमित्त यज्ञ में सदैव स्तुतिवाक्यों द्वारा परमात्मा से प्रार्थना करते हैं॥१०॥यद्यपि भगवान् कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं रखता है, तथापि आरोप करके सर्व वर्णन किया जाता है। जो कोई शुभकर्म करते रहते हैं, वे कदापि अन्नादिकों के अभाव से पीड़ित नहीं होते। यह भगवान् की कृपा है॥१०॥

अ॒यं त॑ इन्द्र॒ सोमो॒ निपू॑तो॒ अधि॑ ब॒र्हिषि॑। एही॑म॒स्य द्रवा॒ पिब॑॥

याज्ञिक पुरुषों की ओर से उक्ति है कि हे शूरवीरो! जिस सोमरस को हम लोगों ने बड़ी शुद्धतापूर्वक बनाया है, उसको पान कर हमारा सत्कार स्वीकार करें, या यों कहो कि हमारे यज्ञ को प्राप्त होकर सुशोभित करें, जिससे दुष्टजन सदा भयभीत हुए यज्ञ में विघ्नकारी न हों॥११॥यह संसार ही परमात्मा का सोम अर्थात् प्रिय वस्तु है। जैसे हम जीव सोमरस से बहुत प्रसन्न होते हैं। परमात्मा भी इससे प्रसन्न होता है, यदि यह छल कपट आदि से रहित शुद्ध पवित्र हो। इससे यह शिक्षा होती है कि प्रत्येक मनुष्य को शुद्ध पवित्र होना चाहिये॥११॥

शाचि॑गो॒ शाचि॑पूजना॒यं रणा॑य ते सु॒तः। आख॑ण्डल॒ प्र हू॑यसे॥

हे विश्वासार्ह वाणीवाले तथा सत्कारयोग्य योद्धा जनो! हम लोग आपको यज्ञसदन में बुलाकर सत्कार करते हैं। आप हमारी और हमारे यज्ञ की शत्रुओं से सदैव रक्षा करते रहें, जिससे हमारे यज्ञ में कोई विघ्न न हो और हम अपने उद्देश्य की सिद्धि में कृतकार्य्य हों॥१२॥जिस कारण ईश्वर ने इस जगत् को रचा है और इसके द्वारा सर्व प्राणियों को सुख पहुँचा रहा है, अतः इस तत्त्व को जानकर ऋषि-मुनिगण इसकी सदा पूजा किया करते हैं॥१२॥

यस्ते॑ शृङ्गवृषो नपा॒त्प्रण॑पात्कुण्ड॒पाय्यः॑। न्य॑स्मिन्दध्र॒ आ मनः॑॥

हे उपासकों के रक्षक तेजस्वी योद्धा! आपका रक्षक जो “कुण्डपाय्य” यज्ञ* है, उस यज्ञ को याज्ञिक पुरुष बड़ी श्रद्धा तथा उत्साह से पूर्ण करते हैं, जिससे आपका बल वृद्धि को प्राप्त हो, आप सदा अजय हों अर्थात् कोई शत्रु आपको युद्ध में न जीत सके॥१३॥*कुण्ड के आकारविशेषवाले पात्रों से जिस यज्ञ में सोमपान किया जाता है, उसका नाम “कुण्डपाय्य” यज्ञ है॥यद्यपि इस संसार में एक-२ पदार्थ ही अद्भुत है तथापि यह सूर्य्य तो अत्यद्भुत वस्तु है, इसको देख-२ कर ऋषिगण चकित होते हैं। हे इन्द्र! यह तेरी अद्भुत कीर्ति है॥१३॥

वास्तो॑ष्पते ध्रु॒वा स्थूणांस॑त्रं सो॒म्याना॑म्। द्र॒प्सो भे॒त्ता पु॒रां शश्व॑तीना॒मिन्द्रो॒ मुनी॑नां॒ सखा॑॥

हे सर्वरक्षक तथा सबके स्वामी परमात्मन्! आप ऐसी कृपा करें कि हम उपासकों का शारीरिक बल वृद्धि को प्राप्त हो, जिससे हम आत्मिक उन्नति करते हुए ज्ञानसम्पन्न पुरुषों के प्रिय हों अर्थात् उनके सत्सङ्ग से ज्ञानी होकर आपको प्राप्त हों। हे प्रभो! आप ही हमारे गृह, परिवार तथा गौ आदि धनों की रक्षा करनेवाले और आप ही शत्रुसमुदाय से हमारी रक्षा करके यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्त करनेवाले हो॥१४॥सबके कल्याण के लिये ईश्वर से प्रार्थना करे। सब कोई निज बल बढ़ावे। अपने-२ स्थानों को सुदृढ बना रक्खे और ऐसा शुभ आचरण करे कि वह ईश सदा उस पर प्रसन्न रहे॥१४॥

पृदा॑कुसानुर्यज॒तो ग॒वेष॑ण॒ एकः॒ सन्न॒भि भूय॑सः। भूर्णि॒मश्वं॑ नयत्तु॒जा पु॒रो गृ॒भेन्द्रं॒ सोम॑स्य पी॒तये॑॥

हे परमात्मन्! उच्च भावोंवाले, यष्टव्य=परमात्म-उपासन में प्रवृत्त रहनेवाले, गो आदि धन तथा पृथिवी की कामनावाले, एक ही अनेकों को वशीभूत करनेवाले, उपासकजन तथा श्रेष्ठ पुरुषों का भरण-पोषण करनेवाले, अपने यश को संसार में विस्तृत करनेवाले योद्धा को नम्र वाक्यों द्वारा अपने अभिमुख लावें अर्थात् उसकी सब प्रकार से रक्षा करें, ताकि वह अपनी अभीष्ट सिद्धि में सफलीभूत हो॥१५॥यह सत्रहवाँ सूक्त और चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥बुद्धिमान् जन केवल उसी की उपासना किया करें, क्योंकि इस जगत् का स्वामी वही है। वही सबमें व्याप्त और चेतन है॥१५॥

इ॒दं ह॑ नू॒नमे॑षां सु॒म्नं भि॑क्षेत॒ मर्त्यः॑। आ॒दि॒त्याना॒मपू॑र्व्यं॒ सवी॑मनि॥

जिन विद्वानों ने ब्रह्मचर्य्यादि व्रतों से अखण्डनीय=भ्रान्ति आदि दोषों से रहित विद्यासम्पादन करके ऐश्वर्य्य प्राप्त किया है, मनुष्य को चाहिये कि ऐसे विद्वानों का जिज्ञासु बनकर उनसे सद्गुणसम्पन्न होने की भिक्षारूप याचना करे॥१॥यहाँ प्रथम सदाचार की शिक्षा देते हैं कि जब-२ आचार्य या विद्वान् आज्ञा देवें, तब-२ उनसे विज्ञान की भिक्षा माँगे। यद्वा आदित्य=सूर्य्य, इस संसार में सूर्य्य से भी नाना सुख की प्राप्ति मनुष्य करे॥१॥

अ॒न॒र्वाणो॒ ह्ये॑षां॒ पन्था॑ आदि॒त्याना॑म्। अद॑ब्धाः॒ सन्ति॑ पा॒यवः॑ सुगे॒वृधः॑॥

उपर्युक्त विद्वानों के मार्ग निस्सन्देह सदैव निर्विघ्न तथा शत्रुओं के बल से अभिभव=दबने योग्य नहीं होते, किन्तु ऐश्वर्य्य तथा सुखों की वृद्धि करनेवाले होते हैं, अतएव मनुष्य को उचित है कि उक्त विद्वानों के मार्ग का अनुसरण करे॥२॥विद्वानों और आचार्य्यों से सुरचित धर्मादि मार्ग अतिशय आनन्दप्रद होते हैं। अतः उनकी रक्षा करना मनुष्यमात्र का परम धर्म है॥२॥

तत्सु नः॑ सवि॒ता भगो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा। शर्म॑ यच्छन्तु स॒प्रथो॒ यदीम॑हे॥

जो विद्वान् सबको वशीभूत रखनेवाला, राष्ट्र के हिताहित कार्य्य को सोचनेवाला, पापों से बचानेवाला, सबका मित्र और अनुष्ठानसम्पन्न है, वह हमारी शुभ कामनाओं को पूर्ण करे, या यों कहो कि जो विद्वान् परमात्मप्राप्तिरूप ज्ञान के प्रकाशक, ऐश्वर्य्यशाली तथा नाना प्रकार की शक्तियों से वस्तुओं के तेजतिमिर को निवृत्त करनेवाले और जो एकमात्र परमात्मा के उपासक हैं, उनके सत्सङ्ग से मनुष्य को विद्यावृद्धि द्वारा सुख की प्राप्ति होती है॥३॥यदि हम धर्मभाव से भावित होकर ईश्वर से प्रार्थना करें, तो वह अवश्य स्वीकृत हो॥३॥

दे॒वेभि॑र्देव्यदि॒तेऽरि॑ष्टभर्म॒न्ना ग॑हि। स्मत्सू॒रिभिः॑ पुरुप्रिये सु॒शर्म॑भिः॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि पुरुष को प्रकाशित करनेवाली, सब पदार्थों की द्योतक, पुरुष को ऐश्वर्य्य में परिणत करनेवाली और दीनतारहित भावों को मनुष्य में प्रवेश करानेवाली विद्या उक्त विद्वानों को संगति द्वारा ही प्राप्त हो सकती है, इसलिये प्रजाजनों को उचित है कि विद्याप्राप्ति के लिये विद्वानों का सङ्ग करे॥४॥ऐसे-२ प्रकरण में अदिति नाम सुबुद्धि का है। विद्वानों और मङ्गलकारी मनुष्यों की यदि सुबुद्धि हो, तो संसार का बहुत उपकार हो सकता है, क्योंकि वे तत्त्ववित् पुरुष हैं। अतः बुद्धि के लिये प्रार्थना है॥४॥

ते हि पु॒त्रासो॒ अदि॑तेर्वि॒दुर्द्वेषां॑सि॒ योत॑वे। अं॒होश्चि॑दुरु॒चक्र॑योऽने॒हसः॑॥

विद्यासम्पन्न=विद्या के पुत्रवत् विद्वान् पुरुष पापों और शत्रुओं से निवृत्त करना जानते हैं अर्थात् वे पुरुष के राग, द्वेष, काम तथा क्रोधादि वेगों को रोककर उनमें एकमात्र शान्ति स्थापन करते हैं, “यह विद्या का महत्त्व” है, अतएव सर्वोपरि शान्तिधारण करने के लिये पुरुष को चाहिये कि वे विद्वानों की सङ्गति से अपने को शान्त बनाएँ, जिससे सर्वप्रिय तथा सर्वमित्र हों॥५॥आचार्य्य या विद्वद्वर्ग सदा जनता को नाना क्लेशों से बचाया करते हैं। अपने सुभाषण से लोगों को सन्मार्ग में लाके पापों से दूर करते हैं। अतः देश में ऐसे आचार्य्य और विद्वान् जैसे बढ़ें, वैसा उपाय सबको करना उचित है॥५॥

अदि॑तिर्नो॒ दिवा॑ प॒शुमदि॑ति॒र्नक्त॒मद्व॑याः। अदि॑तिः पा॒त्वंह॑सः स॒दावृ॑धा॥

वह विद्या पापों से निवृत्त करनेवाली तथा रात-दिन हमारी रक्षा करनेवाली है, या यों कहो कि विद्या पुरुष को सब द्वन्द्वों से रहित करके अभयपद=निर्वाण पद को प्राप्त कराती है अर्थात् राग द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा मानापमानादि द्वन्द्वों की निवृत्ति द्वारा पुरुष को उच्च भावोंवाला बनाती है। अधिक क्या भवसागर की लहरों से वही पुरुष पार हो सकता है, जो एकमात्र विद्या का आश्रय लेकर तितीर्षु बनता है॥६॥सद्बुद्धि मनुष्य की सर्वदा रक्षा करती है, अतः हे मनुष्यों! उसका उपार्जन सर्वोपाय से करो॥६॥

उ॒त स्या नो॒ दिवा॑ म॒तिरदि॑तिरू॒त्या ग॑मत्। सा शंता॑ति॒ मय॑स्कर॒दप॒ स्रिधः॑॥

वह विद्या कार्य्य प्रारम्भ करने पर हमारी रक्षा करे, प्रारम्भ किये हुए प्रत्येक कार्य्य को पूर्ण करे, किसी कार्य्य में हमें हानि न हो अर्थात् विद्या=बुद्धिपूर्वक जो कार्य्य किये जाते हैं, वे सफलमनोरथ होते, शान्ति तथा सुख उत्पन्न करते और बुद्धिपूर्वक किये हुए कार्य्य में कोई विरोधी भी कृतकार्य्य नहीं हो सकता, इसलिये प्रत्येक पुरुष को विद्या की उन्नति करने में यत्नवान् होना चाहिये॥७॥बुद्धि को सदा अज्ञान के विनाश करने में लगावे, तब ही जगत् में सुख हो सक्ता है॥७॥

उ॒त त्या दैव्या॑ भि॒षजा॒ शं नः॑ करतो अ॒श्विना॑। यु॒यु॒याता॑मि॒तो रपो॒ अप॒ स्रिधः॑॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि जो शारीरिक तथा आध्यात्मिक दोनों प्रकार के वैद्य ह, वे अपने ज्ञान तथा क्रिया द्वारा हमारे उक्त रोगों को शमन करें अर्थात् आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक इन तीनों प्रकार के दुःखों को निवृत्त करके अभ्युदय प्राप्त करावें और सब विघ्नों को शान्त करते हुए हमें आध्यात्मिकता के उपदेश द्वारा हमारे दुश्चरित्र को निवृत्त करें॥८॥वैद्य राजा अमात्य और विद्वान् आदिकों को उचित है कि मनुष्य समाज से रोग, अज्ञान, पाप और शत्रुता आदिकों को दूर किया करें। तब ही संसार सुखी रह सकता है॥८॥

शम॒ग्निर॒ग्निभिः॑ कर॒च्छं न॑स्तपतु॒ सूर्यः॑। शं वातो॑ वात्वर॒पा अप॒ स्रिधः॑॥

हे सर्वोपरि पूज्य परमात्मन्! आप ऐसी कृपा करें कि यह भौतिकाग्नि, यह सूर्य्य तथा वायु आदि भौतिक पदार्थ हमारे लिये सुखकर हों और आपकी कृपा से सब विघ्न हमसे दूर रहें, ताकि हम विद्याप्राप्ति द्वारा शारीरिक तथा आत्मिक दोनों प्रकार की उन्नति करें॥९॥यह स्वाभाविक प्रार्थना है। राजा और अमात्यादिक नाना उपायों से प्रजासम्बन्धी विघ्नों को दूर किया करें॥९॥

अपामी॑वा॒मप॒ स्रिध॒मप॑ सेधत दुर्म॒तिम्। आदि॑त्यासो यु॒योत॑ना नो॒ अंह॑सः॥

हे सब विद्याओं के ज्ञाता परमात्मन्! आप हमसे शारीरिक तथा मानसिक दोनों प्रकारे के रोग दूर करें, हमारे कामों में विघ्नकारक पुरुषों को हमसे सदा पृथक् रखें और हमें पवित्र बुद्धि दें, जिससे हम सब पापों से दूर रहकर उन्नतिशील हों॥१०॥हे मनुष्यों! तुम सद्बुद्धि उपार्जन करो, जिससे तुम सब प्रकार सुखी होगे॥१०॥

यु॒योता॒ शरु॑म॒स्मदाँ आदि॑त्यास उ॒ताम॑तिम्। ऋध॒ग्द्वेषः॑ कृणुत विश्ववेदसः॥

हे सब विद्याओं के ज्ञाता विद्वान् पुरुषो! आप विद्याप्रचार द्वारा हमारे अज्ञान को निवृत्त करें, ताकि हम हिंसक स्वभाववाले न होकर मित्र हों, न हम किसी से द्वेष करें और न हमारे द्वेषी उत्पन्न हों अर्थात् द्वेष करनेवालों को हमसे सदा पृथक् करें॥११॥आचार्य्य और ज्ञानी पुरुषों को उचित है कि वे जहाँ रहें, वहाँ अज्ञान का नाश और सुख की वृद्धि किया करें॥११॥

तत्सु नः॒ शर्म॑ यच्छ॒तादि॑त्या॒ यन्मुमो॑चति। एन॑स्वन्तं चि॒देन॑सः सुदानवः॥

हे श्रेष्ठसम्पत्तिवाले विद्वान् पुरुषो! आप विद्या के दान द्वारा हमको पवित्र भावों में परिणत करें, जिससे हम सब पापों से निवृत्त होकर सुखी हों॥१२॥ईश्वर से ज्ञानरूप कल्याण की याचना करनी चाहिये, वही मनुष्य को पाप से बचा सकता है॥१२॥

यो नः॒ कश्चि॒द्रिरि॑क्षति रक्ष॒स्त्वेन॒ मर्त्यः॑। स्वैः ष एवै॑ रिरिषीष्ट॒ युर्जनः॑॥

इस मन्त्र में ईर्षा-द्वेष का निषेध करके पुरुष को शक्त्तिसम्पन्न होने का उपदेश किया गया है अर्थात् जो पुरुष किसी को हिंसकभाव से दुःख पहुँचाता है, वह अपने पापरूप आचरणों से स्वयं नाश को प्राप्त हो जाता है, इसलिये पुरुष को सदा अहिंसकभावोंवाला होना चाहिये, हिंसक स्वभाववाला नहीं॥१३॥अपने अपराधी से बदला लेने की न चेष्टा करे, ईश्वर की इच्छा पर उसे छोड़ देवे। वह शत्रु अवश्य अपने कर्मों से सन्तप्त होता रहेगा या दुष्टता से निवृत्त होगा॥१३॥

समित्तम॒घम॑श्नवद्दुः॒शंसं॒ मर्त्यं॑ रि॒पुम्। यो अ॑स्म॒त्रा दु॒र्हणा॑वाँ॒ उप॑ द्व॒युः॥

जो मनुष्य कुटिल नीति से हमको दुःख पहुँचाता अर्थात् प्रत्यक्ष में शुभचिन्तक तथा परोक्ष में अशुभ विचार करता हुआ सेवन करता है, ऐसा निन्दनीय शत्रु मनुष्य पापों से आच्छादित होकर शीघ्र ही नाश को प्राप्त हो जाता है॥१४॥अपनी ओर से किसी का अपराध न हो, ऐसी ही सदा चेष्टा करनी चाहिये। जो जन निरपराधी को सताते हैं, उन्हें सांसारिक नियम ही दण्ड देकर नष्ट कर देता है॥१४॥

पा॒क॒त्रा स्थ॑न देवा हृ॒त्सु जा॑नीथ॒ मर्त्य॑म्। उप॑ द्व॒युं चाद्व॑युं च वसवः॥

हे परिपक्व बुद्धिवाले विद्वान् पुरुषो! आप छली, कपटी तथा शुद्धस्वभावयुक्त, दोनों प्रकार के मनुष्यों को मिलाप होने पर भले प्रकार जान लेते हैं, अतएव उचित है कि पुरुष परिश्रम से विद्यासम्पन्न हों, जिससे वे मित्र-अमित्र अर्थात् भले-बुरे को पहचानकर दुष्ट मनुष्यों से हानि न उठावें॥१५॥वे ही विद्वान् हैं, जो मनुष्यों की चेष्टा से उनकी हृदयस्थ बातें जान लेवें। कपटी और अकपटी जनों की मुखछवि भिन्न-२ होती है। अतः तत्त्ववित् पुरुष उनको शीघ्र जान लेते हैं॥१५॥

आ शर्म॒ पर्व॑ताना॒मोतापां वृ॑णीमहे। द्यावा॑क्षामा॒रे अ॒स्मद्रप॑स्कृतम्॥

हे पापकारी मनुष्यो! यह पृथिवी तथा अन्तरिक्ष, जो मनुष्यमात्र को सुख देनेवाले हैं, इन पर पाप मत करो, किन्तु इनसे पृथक् होकर करो अर्थात् सब स्थानों में पाप न करते हुए अपने जीवन को पवित्र और उच्चभावोंवाला बनाओ॥१६॥जो कोई पृथिवी और द्युलोक के तत्त्वों को सर्वदा विचारते हैं, वे पाप में प्रवृत्त नहीं होते, क्योंकि पाप में क्षुद्रजन प्रवृत्त होते हैं, महान् जन नहीं। तत्त्ववित् जनों का हृदय महाविशाल हो जाता है॥१६॥

ते नो॑ भ॒द्रेण॒ शर्म॑णा यु॒ष्माकं॑ ना॒वा व॑सवः। अति॒ विश्वा॑नि दुरि॒ता पि॑पर्तन॥

हे वेदविद्या में पारग विद्वान् पुरुषो! आप हमको अपनी ज्ञानरूप नौका द्वारा इस संसाररूप भवसागर से पार करें अर्थात् हमको सम्पूर्ण दुःखसाध्य कर्मों से पृथक् करके सुखसाध्य कर्मों में परिणत करें, जो विद्वानों का कर्तव्य है॥१७॥विद्वानों के सङ्ग से कुकर्म में प्रवृत्ति नहीं होती है। अतः वे आदर से सेवनीय हैं॥१७॥

तु॒चे तना॑य॒ तत्सु नो॒ द्राघी॑य॒ आयु॑र्जी॒वसे॑। आदि॑त्यासः सुमहसः कृ॒णोत॑न॥

हे तेजस्वी विद्वान् पुरुषो! आप हमारे पुत्र-पौत्रादि सन्तानों को भी ब्रह्मचर्य्यपूर्वक विद्याध्ययन करने का उपदेश करें, जिससे वे पवित्र जीवनवाले हों और सुखमय आयु व्यतीत करते हुए दीर्घजीवी हों, क्योंकि सदाचारसम्पन्न विद्वान् पुरुष ही सुखमय जीवन व्यतीत कर सकते हैं, मूर्ख नहीं॥१८॥आचार्य्यादिकों की शिक्षा पर चलने से मनुष्य की आयु बढ़ी है। अतः बालकों को उनके निकट सदा भेजना उचित है॥१८॥

य॒ज्ञो ही॒ळो वो॒ अन्त॑र॒ आदि॑त्या॒ अस्ति॑ मृ॒ळत॑। यु॒ष्मे इद्वो॒ अपि॑ ष्मसि सजा॒त्ये॑॥

हे परोपकारप्रिय विद्वान् पुरुषो! आप प्रजाओं के प्रति परोपकारदृष्टि से वर्तने के कारण परोपकाररूप यज्ञ के करनेवाले हैं, जिससे प्रजाजन सुख अनुभव करते हैं और आप मनुष्यमात्र को मित्रता की दृष्टि से देखते हैं, इस कारण हम आपके बन्धुभाव को प्राप्त हैं, अतएव आपका कर्तव्य है कि आप हमें विद्या के मार्ग पर चलाकर सुखी करें, क्योंकि हम आप ही के हैं॥१९॥शिष्यों को उचित है कि अपने शुभाशुभकर्म आचार्यों के निकट निवेदित करें। उनकी ही आज्ञा में और प्रेम की छाया में निवास करें॥१९॥

बृ॒हद्वरू॑थं म॒रुतां॑ दे॒वं त्रा॒तार॑म॒श्विना॑। मि॒त्रमी॑महे॒ वरु॑णं स्व॒स्तये॑॥

प्रजाओं के रक्षक योद्धाओं तथा राष्ट्रपति के स्वामी विद्वान्, पुरुष, ज्ञान तथा कर्मकाण्ड का प्रचार करनेवाले, मनुष्यमात्र को मित्रता की दृष्टि से देखनेवाले, प्रजाओं के दुःख तथा उनके मार्ग में विघ्नों के निवारण करनेवाले और न्यायपथ से च्युत राष्ट्रपति के अन्याय से दुःखी प्रजा को सुख में परिणत करनेवाले नेताओं से हम याचना करते हैं कि वे हमारी सन्तानों को सुमार्ग में प्रवृत्त करें और धनधान्यसहित हमारे गृहों के रक्षक हों॥२०॥सर्वदा ईश्वर से ज्ञान की याचना करनी चाहिये॥२०॥

अ॒ने॒हो मि॑त्रार्यमन्नृ॒वद्व॑रुण॒ शंस्य॑म्। त्रि॒वरू॑थं मरुतो यन्त नश्छ॒र्दिः॥

हे सब प्रजाओं को मित्रता की दृष्टि से देखनेवाले, वेदविहित कर्मों में तत्पर रहनेवाले, प्रजाओं के दुःखनिवारण करने में तत्पर रहनेवाले और योद्धाओं के अधिपति=वेदविद्यासम्पन्न विद्वान् पुरुष, परोपकारपरायण नेता पुरुष, प्रशंसनीय अहिंसक पुरुषों से भरे हुए अर्थात् वेदविहित कर्म करनेवाले परिवार से परिपूर्ण उत्तम गृह प्रदान करें॥२१॥निवास के लिये अच्छा निरुपद्रव भवन बनाना चाहिये॥२१॥

ये चि॒द्धि मृ॒त्युब॑न्धव॒ आदि॑त्या॒ मन॑वः॒ स्मसि॑। प्र सू न॒ आयु॑र्जी॒वसे॑ तिरेतन॥

हे विद्वान् पुरुषो! आप आरोग्य रहने तथा सदाचारी रहने की शिक्षा देनेवाले हैं, आपके उपदेश पर अनुष्ठान करनेवाला पवित्र होता है। हे हमारे रक्षक विद्वज्जन! हमारे पिता परपिता आदि वृद्ध पुरुष तथा परिवार में रोगार्त्त पुरुष, जो निकट मृत्युवाले हैं, उनके जीवन की वृद्धि अर्थ सुखमय जीवनकाल प्रदान करें, जिससे ये प्रयाणकाल में सद्गति को प्राप्त हों॥२२॥यह अठारहवाँ सूक्त और अट्ठाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥विद्वानों के सङ्ग से आयु की वृद्धि होती है॥२२॥

तं गू॑र्धया॒ स्व॑र्णरं दे॒वासो॑ दे॒वम॑र॒तिं द॑धन्विरे। दे॒व॒त्रा ह॒व्यमोहि॑रे॥

इस सूक्त में अग्नि शब्द वाच्य परमात्मा की हेतुदर्शनपूर्वक विविधोपासनाओं का वर्णन किया गया है। “अग्नि” शब्द का अर्थ अग्रणी=अग्रगतिवाला आदि निरुक्तोक्त जानना चाहिये कि हे उपासक लोगो! तुम सब कर्मों के प्रारम्भ में उस परमात्मा की स्तुति करो, क्योंकि वही सब कर्मों का नेता है, वही पुरुष दिव्यज्ञानवाला तथा परम चतुर है, जो परमात्मा के शरण में प्राप्त होकर सब कर्मों को करता और अन्त में उसी के अर्पण कर देता है॥१॥ये सूर्यादि पदार्थ अपने अस्तित्व से अपने जनक ईश्वर को दिखला रहे हैं॥१॥

विभू॑तरातिं विप्र चि॒त्रशो॑चिषम॒ग्निमी॑ळिष्व य॒न्तुर॑म्। अ॒स्य मेध॑स्य सो॒म्यस्य॑ सोभरे॒ प्रेम॑ध्व॒राय॒ पूर्व्य॑म्॥

“सुष्ठु हरत्यज्ञानं बिभर्त्ति वा जनानिति सोभरिः”=जो भले प्रकार अज्ञानों का नाश करे अथवा प्रजा का भरण-पोषण करे, उसको “सोभरि” कहते हैं। हृ वा भृ धातु से औणादिक इन् प्रत्यय होकर “उकार” को “ओकार” हो गया है और हृ धातुपक्ष में “हृग्रहोर्भश्छन्दसि” इस वार्तिक से ह को भ हो जाता है। सोभरि विद्वान् के प्रति उपदेश है कि यज्ञारम्भ में यज्ञनियन्ता परमात्मा की स्तुति करके सर्वदा हिंसारहित यज्ञ करने की चेष्टा करते रहो, क्योंकि वह परमात्मा हिंसारहित यज्ञवालों को पर्याप्त चिरस्थायी सौभाग्य प्राप्त कराता है और हिंसक याज्ञिकों की सम्पत्ति विपत्तिमय तथा शीघ्र नाशकारी होती है॥२॥यज्ञ में केवल परमदेव ही पूज्य, स्तुत्य और प्रार्थनीय है, क्योंकि वही चेतन देव है। उसी की यह संपूर्ण सृष्टि है॥२॥

यजि॑ष्ठं त्वा ववृमहे दे॒वं दे॑व॒त्रा होता॑र॒मम॑र्त्यम्। अ॒स्य य॒ज्ञस्य॑ सु॒क्रतु॑म्॥

पूर्व मन्त्र में परमात्मा को स्तुति द्वारा वरण करना वर्णन किया है, अब इस मन्त्र में वरण का हेतु दिखलाया है कि जो परमात्मा सबसे बड़े इस ब्रह्माण्डरूप यज्ञ का प्रवर्तक तथा स्थितिकर्ता है और मृत्युरहित होने से सर्वदा सहायक है तथा सब देवों का भी देवता है, उसीका रक्षार्थ वरण करना उचित है, क्योंकि अन्य साधारणजन अधिक से अधिक एक जन्म का सहायक हो सकता है और वह अनेक जन्म-जन्मान्तरों का सहायक है, अतएव मनुष्य मात्र उसी का वरण कर उसी की स्तुति तथा उपासना में तत्पर हों॥३॥हम मनुष्य केवल ईश्वर की ही उपासना पूजा करें, क्योंकि वही एक पूजनीय है॥३॥

ऊ॒र्जो नपा॑तं सु॒भगं॑ सु॒दीदि॑तिम॒ग्निं श्रेष्ठ॑शोचिषम्। स नो॑ मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य॒ सो अ॒पामा सु॒म्नं य॑क्षते दि॒वि॥

वह परमात्मा मित्र=सब प्रजाओं के दुःखनाश का उपाय करनेवाला नेता है और जो वरुण=राजसम्बन्धी होकर विघ्ननाशी नेता है। इन दोनों प्रकार के नेताओं का अनुकूल होना, इनकी अनुकूलता से सुखलाभ होना तथा जलादि भौतिक पदार्थों का सुख उसी परमात्मा की अनुकूलता से होता है, इससे उसका अनुकूल करना परमावश्यक है॥४॥जैसे हम विद्वान् उस परमात्मा की उपासना करते हैं, हे मनुष्यों! आप भी वैसे ही उसी को पूजो॥४॥

यः स॒मिधा॒ य आहु॑ती॒ यो वेदे॑न द॒दाश॒ मर्तो॑ अ॒ग्नये॑। यो नम॑सा स्वध्व॒रः॥

इस मन्त्र में तीन प्रकार के यज्ञों का विधान किया है अर्थात् (१) शास्त्रोक्त विधि अनुसार यज्ञीय काष्ठ से अग्नि प्रदीप्त करके आज्य=घृतादि की आहुति देना (२) अन्न तथा धनादि से विद्वानों वा स्वयंविदों का सत्कार करना (३) वेदाभ्यास द्वारा आत्मा में ईश्वरीय ज्ञान का प्रकाश करके उच्चता वा पौरुष उत्पन्न करना, इसी का नाम ज्ञानयज्ञ है अर्थात् आत्मिकज्ञान की उन्नति करना। इन तीनों यज्ञों द्वारा जो परमात्मा का परिचरण करता है, उसको अग्रिम मन्त्र में लिखे अनुसार फल की प्राप्ति होती है॥५॥इस ऋचा से तीन कर्तव्य दिखलाते हैं १−अग्निहोत्र, २−वेदाध्ययन और ३−दान, ये अवश्य और नित्य कर्त्तव्य हैं॥५॥

तस्येदर्व॑न्तो रंहयन्त आ॒शव॒स्तस्य॑ द्यु॒म्नित॑मं॒ यशः॑। न तमंहो॑ दे॒वकृ॑तं॒ कुत॑श्च॒न न मर्त्य॑कृतं नशत्॥

जो पूर्वोक्त यज्ञकर्ता है, उसको यश के सहित अन्नादि पदार्थ प्राप्त होते हैं और देवकृत=नेता लोगों के प्रमाद से किया गया अथवा मर्त्यकृत=साधारण मनुष्यद्वारा आया हुआ पाप उसको बाधित नहीं करता अर्थात् जो पुरुष नियमपूर्वक उक्त तीनों यज्ञों का अनुष्ठान करता है, उसको यश प्राप्त होता और गौ, अश्व तथा नाना प्रकार के धनों से सुभूषित होता है और देवकृत तथा मनुष्यकृत पापरूप मल पङ्क से निपायमान नहीं होता, अतएव ऐश्वर्य की कामनावाले सब मनुष्यों को उक्त यज्ञों का अनुष्ठान सदैव करना चाहिये॥६॥जो शुभकर्म में सदा आसक्त हैं, वे कदापि अशुभ कर्म में प्रवृत्त नहीं होते, अतः वे न इन्द्रियविवश होते और न ये दुर्जनों के जाल में ही फँसते हैं॥६॥

स्व॒ग्नयो॑ वो अ॒ग्निभिः॒ स्याम॑ सूनो सहस ऊर्जां पते। सु॒वीर॒स्त्वम॑स्म॒युः॥

इस मन्त्र में उपासक को आत्मरक्षा के लिये दो प्रकार के सहायकों की ईश्वर से प्रार्थना करना कथन की। एक तो अनेक विद्याकुशल विविध विद्वान् और दूसरे संग्रामकुशल वीर, इन दोनों की वृद्धि जिस देश में होती है, वही देश सर्वथा सुरक्षित रहता है, इसलिये सब प्रजाजनों को उचित है कि अपनी रक्षा के लिये उक्त दोनों प्रकार के मनुष्यों के लिये परमात्मा से प्रार्थना करें, ताकि सब सुरक्षित रहकर धार्मिक तथा सामाजिक उन्नति करते हुए ऐश्वर्यसम्पन्न हों॥७॥अग्निहोत्रादि कर्म मनुष्य को पवित्र करनेवाले हैं, अतः उनका सेवन नित्य कर्त्तव्य है॥७॥

प्र॒शंस॑मानो॒ अति॑थि॒र्न मि॒त्रियो॒ऽग्नी रथो॒ न वेद्यः॑। त्वे क्षेमा॑सो॒ अपि॑ सन्ति सा॒धव॒स्त्वं राजा॑ रयी॒णाम्॥

अतिथि का सादृश्य देकर इस मन्त्र में यह व्यक्त किया है कि अतिथि को भी परमात्मा के समान पूज्य मानना चाहिये और रथ का साहाय्य इसलिये दिया है कि जैसे किसी यान्त्रिक को रथ का प्रयोजन प्रथम ही होता है, इसी प्रकार संसारयात्रा करनेवाले को रथरूप परमात्मा का आश्रय लेना परमावश्यक है, क्योंकि वह पूजनीय, सबका मित्र, मङ्गलमय और सब धनों का स्वामी है॥८॥हे मनुष्यों! उस सर्वान्तर्यामी परमात्मा को ही अपना मित्र बनाओ। जो शुभाचरण में रत रहते हैं, जो उसकी आज्ञा को पालते हैं, वे उसके कृपापात्र होते हैं॥८॥

सो अ॒द्धा दा॒श्व॑ध्व॒रोऽग्ने॒ मर्तः॑ सुभग॒ स प्र॒शंस्यः॑। स धी॒भिर॑स्तु॒ सनि॑ता॥

परमात्मसम्बन्धी यज्ञ करनेवाले को मानस वा वाचिक सत्यता, पवित्र यश, शुभकर्मों द्वारा परोपकार शक्ति इत्यादि अनेक सद्गुण प्राप्त होते हैं अर्थात् जब उपासक जन विद्वानों से सम्मिलित होकर परमात्मयज्ञ करने में प्रवृत्त होते हैं, तब परमात्मा उन्हें ऐसी सद्बुद्धि तथा आत्मबल देता है, जिससे वे सत्य के आश्रित होकर शुभकर्मों द्वारा अनेक परोपकार करके उत्तम यश का लाभ करते हैं, अतएव प्रत्येक पुरुष को परमात्मसम्बन्धी यज्ञ करना चाहिये, ताकि वह यशस्वी और ऐश्वर्य्यशाली होकर उत्तम जीवनवाला हो॥९॥भगवान् की आज्ञा में जो रहता है, वह निश्चय जगत् में प्रशंसनीय होता है और उसकी कृपा से वह बुद्धिमान्, धनवान् और उदार होता है॥९॥

यस्य॒ त्वमू॒र्ध्वो अ॑ध्व॒राय॒ तिष्ठ॑सि क्ष॒यद्वी॑रः॒ स सा॑धते। सो अर्व॑द्भिः॒ सनि॑ता॒ स वि॑प॒न्युभिः॒ स शूरैः॒ सनि॑ता कृ॒तम्॥

जो पुरुष परमात्माश्रित होकर अपने पौरुष से यज्ञ करने में प्रवृत्त होता है, उसको परमात्मा सहायक होकर गौ, अश्वादि ऐश्वर्य, विद्वानों का सङ्ग, शूरों द्वारा सुरक्षा आदि अनेक इष्ट पदार्थों का लाभ कराके शत्रुओं के अभिभव में समर्थ बनाता है॥१०॥उसकी कृपा से मनुष्य सर्व प्रकार के सुखों से युक्त होता है। प्रतिदिन उसकी वृद्धि और उसका अभ्युदय होता है। वह जगत् में माननीय और गणनीय होता है॥१०॥

यस्या॒ग्निर्वपु॑र्गृ॒हे स्तोमं॒ चनो॒ दधी॑त वि॒श्ववा॑र्यः। ह॒व्या वा॒ वेवि॑ष॒द्विषः॑॥

वह परमात्मा अपने उपासक को शुभकर्म में श्रद्धा उत्पन्न करके पुनः सन्मार्गगामी बनाता है, जिससे वह सर्वदा विविध देवों=विद्वानों की उपासना द्वारा शाश्वत सुख भोगता है अर्थात् वह उपासक विद्वानों की सेवा द्वारा उनसे अपूर्व ज्ञान प्राप्त करके यज्ञादि कर्मों द्वारा सब प्रकार का ऐश्वर्य्य प्राप्त करता है॥११॥धन्य वे मनुष्य हैं, जिनके गृह अग्निहोत्रादि कर्मों और उपासनाओं से भूषित हैं॥११॥

विप्र॑स्य वा स्तुव॒तः स॑हसो यहो म॒क्षूत॑मस्य रा॒तिषु॑। अ॒वोदे॑वमु॒परि॑मर्त्यं कृधि॒ वसो॑ विवि॒दुषो॒ वचः॑॥

परमात्मध्यानपरायण मनुष्य अपने चित्त को शुद्ध=प्रतिष्ठित बनाकर पृथिवी से अन्तरिक्षपर्यन्त पदार्थों के ज्ञान में अथवा सदैव समृद्धि को प्राप्त करके विद्वानों के कर्म की सहायता में समर्थ होता है अर्थात् परमात्मदेव अपने उपासक तथा यज्ञों में दानदाता यजमान के लिये भूलोक तथा अन्तरिक्षलोक की विद्याओं का ज्ञाता बनाकर ऐश्वर्य्यसम्पन्न करता है॥१२॥जो विद्वान् संसार के उपकार में सदा लगे रहते हैं, उनकी वाणी को परमात्मा सबके ऊपर स्थापित करता है। अतः हे मनुष्यों! स्वार्थ को त्याग परमार्थ में लगो॥१२॥

यो अ॒ग्निं ह॒व्यदा॑तिभि॒र्नमो॑भिर्वा सु॒दक्ष॑मा॒विवा॑सति। गि॒रा वा॑जि॒रशो॑चिषम्॥

परमात्मा ही अनश्वर प्रतापवाला तथा ज्ञान का प्रकाशक है, ऐसा समझकर जो मनुष्य हव्यदान=कर्मों द्वारा नमस्कार तथा स्तुतियों द्वारा परमात्मा की उपासना करता है, वह अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त होता है॥१३॥ईश्वर के उद्देश्य से ही सब शुभकर्म कर्त्तव्य हैं, लोग अभिमान से ईश्वर को और सदाचार को भूल जाते हैं, वे क्लेश में पड़ते हैं॥१३॥

स॒मिधा॒ यो निशि॑ती॒ दाश॒ददि॑तिं॒ धाम॑भिरस्य॒ मर्त्यः॑। विश्वेत्स धी॒भिः सु॒भगो॒ जनाँ॒ अति॑ द्यु॒म्नैरु॒द्न इ॑व तारिषत्॥

जिस प्रकार मनुष्य नौका द्वारा गम्भीर से गम्भीर नदी नदों को, जल अथवा जलजन्तुजनित क्लेश न सहता हुआ पार करता है, इसी प्रकार संसाररूपी महासागर को परमात्मरूपनौकाश्रित होकर सुखेन पार कर सकता है। जिस प्रकार काष्ठादिनिर्मित नौका काष्ठादिनिर्मित क्षेपणी=चलाने के दण्डों से चलाई जाती है, उसी प्रकार परमात्मरूप नौका के चलाने के लिये ज्ञानयज्ञमय तथा कार्ययज्ञमय दो क्षेपणी हैं, जिनका अनुष्ठान करता हुआ पुरुष सुखपूर्वक इस संसाररूप भवसागर से पार होकर अमृतपद को प्राप्त होता है॥१४॥प्रात्यहिक शुभकर्मों और ईश्वर की आज्ञापालन से मनुष्य की परमोन्नति होती है॥१४॥

तद॑ग्ने द्यु॒म्नमा भ॑र॒ यत्सा॒सह॒त्सद॑ने॒ कं चि॑द॒त्रिण॑म्। म॒न्युं जन॑स्य दू॒ढ्यः॑॥

प्रत्येक उपासक को चाहिये कि वह परमात्मोपासना द्वारा स्वशक्ति बढ़ाकर अनुचित व्यापार से स्वकार्यबाधित करनेवालों को ही बाधित करें, अपराधरहित प्राणी को कदापि नहीं, क्योंकि निरपराध प्राणी को बाधित करना असुरभाव कहलाता है, अतएव पुरुष असुरभाव का कदापि अवलम्बन न करे और किसी प्राणी पर कदापि अनुचित क्रोध न करे, ऐसा पुरुष सदैव विपत्तिग्रस्त रहता और अक्रोधी पुरुष सबका मित्र होता और उसका जीवन संसार में सुखमय होता है॥१५॥ईश्वर की प्रार्थना और विद्या द्वारा वैसे विवेक का उपार्जन करे, जिससे महान् रिपु हृदयस्थ अविवेक विनष्ट हो और गृहसम्बन्धी निखिल कलह दूर हों॥१५॥

येन॒ चष्टे॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा येन॒ नास॑त्या॒ भगः॑। व॒यं तत्ते॒ शव॑सा गातु॒वित्त॑मा॒ इन्द्र॑त्वोता विधेमहि॥

अनेक प्रकार के उच्चपदवाले नेतागणों के आचरण तथा यश को –देख-सुनकर उपासक वैसे ही आचरणों को करता हुआ पवित्र यश की प्रार्थना करे अर्थात् सत्यज्ञानवाला, सत्यकर्मवाला, सदाचारी तथा परमात्मा का उपासक विद्वान् जिन-२ कर्मों का अनुष्ठान करता है, उन्हीं कर्मों का आचरण करता हुआ यशस्वी, तेजस्वी, प्रतापी और दीर्घ जीवनवाला होता है॥१६॥ऐसी-२ ऋचा द्वारा एक यह विषय विस्पष्टता से दिखलाया जाता है कि प्रार्थयिता नर योग्य हैं या नहीं। अतः प्रथम स्वयं प्रार्थना के योग्य बनें, तब उसके निकट याचना करें, तब ही उसकी पूर्त्ति हो सकती है॥१६॥

ते घेद॑ग्ने स्वा॒ध्यो॒३॒॑ ये त्वा॑ विप्र निदधि॒रे नृ॒चक्ष॑सम्। विप्रा॑सो देव सु॒क्रतु॑म्॥

जो परमात्मा स्वज्ञानशक्ति से सर्वत्र पूरित है, जो सूर्यादिकों में प्रविष्ट होकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित कर रहा है, जिसके कर्म सबसे अधिक तथा दुर्ज्ञेय हैं, उसी का शुद्धचित्त से ध्यान करके मनुष्य दीर्घकर्मों में समर्थ हो सकता है, अन्यथा नहीं॥१७॥परमात्मा को हृदयप्रदेश में स्थापित करे, अग्निहोत्रादि शुभ कर्म सदा किया करे, इत्यादि वाक्यों का आशय यही है कि उसकी आज्ञा का सदा पालन करे, कभी अनवहित लुब्ध और वशीभूत होकर भी उसका निरादर न करे। उसकी उपासना तब ही समझी जा सकती है, जब उपासक भी वैसा ही हो। शुद्धता, पवित्रता और उदारत्वादि ईश्वरीय गुण अपने में धारण कर प्रतिदिन बढ़ाता जाए॥१७॥

त इद्वेदिं॑ सुभग॒ त आहु॑तिं॒ ते सोतुं॑ चक्रिरे दि॒वि। त इद्वाजे॑भिर्जिग्युर्म॒हद्धनं॒ ये त्वे कामं॑ न्येरि॒रे॥

जो मनुष्य परमात्माधीन होकर अपने पुरुषार्थ को यज्ञ, परोपकार, बलोपार्जन, धनोपार्जन अथवा संग्राम में लगाते हैं, उन्हीं को यथेष्ट फलसिद्धि होती है अर्थात् परमात्मा के उपासक तथा आज्ञापालक पुरुष ही अपनी कामनाओं को पूर्ण कर सकते हैं, अन्य नहीं॥१८॥धन्य वे नर हैं, जो सदा ईश्वर की आज्ञा पर चलते हुए जगत् के कार्य्यों में लगे रहते हैं॥१८॥

भ॒द्रो नो॑ अ॒ग्निराहु॑तो भ॒द्रा रा॒तिः सु॑भग भ॒द्रो अ॑ध्व॒रः। भ॒द्रा उ॒त प्रश॑स्तयः॥

इस मन्त्र में यह उपदेश किया है कि आहुति आदि मन्त्रोक्त कर्मों के आदि में याज्ञिक प्रार्थना करें कि हमारे यज्ञ में दान आदि कोई ऐसा कर्म न हो, जिससे किसी जीव को कष्ट हो, किन्तु सब कर्म सब जीवों के हितकारक हों अर्थात् हमारा यज्ञ हिंसारहित हो और हमारी स्तुतिएँ कल्याणकारक हों, जिससे सब प्राणी सुख अनुभव करें॥१९॥हम मनुष्य जो कुछ कर्म करें, वह जगत् के मङ्गल के लिये हो, अनिष्ट कर्म न कर कल्याणप्रद ही कार्य्य सदा हम किया करें॥१९॥

भ॒द्रं मनः॑ कृणुष्व वृत्र॒तूर्ये॒ येना॑ स॒मत्सु॑ सा॒सहः॑। अव॑ स्थि॒रा त॑नुहि॒ भूरि॒ शर्ध॑तां व॒नेमा॑ ते अ॒भिष्टि॑भिः॥

हे बलप्रद परमात्मन्! क्षात्रबलवर्धक संग्राम में हमारे आत्मा को दृढ़ तथा कल्याणमय करें, जिससे शत्रुसमुदाय पीठ दिखावे। हमारे क्षात्रबलप्रधान यज्ञ सफल हों, जिनमें प्रजाजनों का हितचिन्तन करते हुए उनको सुखपूर्ण करने में कृतकार्य्य हों और सब याज्ञिक आपकी उपासना में निरन्तर तत्पर रहें॥२०॥महा महासंग्राम में बुद्धिमान् अपने मन को विकृत न करें और न सत्य से ही कदापि दूर चले जाएँ॥२०॥

ईळे॑ गि॒रा मनु॑र्हितं॒ यं दे॒वा दू॒तम॑र॒तिं न्ये॑रि॒रे। यजि॑ष्ठं हव्य॒वाह॑नम्॥

जो परमात्मा ब्रह्माण्डरूप महान् यज्ञ का कर्ता तथा ब्रह्माण्डगत विविध पदार्थों को यथायोग्य यथाभाग सब प्रजाओं को वितीर्ण करनेवाला तथा जो दिव्य विद्वानों द्वारा सेवित है, वही सर्वथा प्राप्तव्य है और ध्यान करने पर शीघ्र ही ध्यानविषय हो जाना उसकी शीघ्रगति कही जाती है। वास्तव में सर्वव्यापक की गति नहीं हो सकती। ऐसे महान् तथा सर्वव्यापक परमात्मा को देव=योगसम्पन्न विद्वान् पुरुष ही प्राप्त कर सकते हैं, अन्य नहीं॥२१॥मनुष्य को उचित है कि अग्निहोत्रादि कर्म करे और उससे क्या लाभ होता है, उसका और अग्निविद्या का वर्णन लोगों को सुनावें॥२१॥

ति॒ग्मज॑म्भाय॒ तरु॑णाय॒ राज॑ते॒ प्रयो॑ गायस्य॒ग्नये॑। यः पिं॒शते॑ सू॒नृता॑भिः सु॒वीर्य॑म॒ग्निर्घृ॒तेभि॒राहु॑तः॥

जिस परमात्मा के करालकालरूप मुख में अनेक बलिष्ठ से बलिष्ठ प्राणी लय को प्राप्त हो जाते हैं, जो यज्ञ द्वारा सेवित और जो अपने उपासक को यथेष्ट बल प्रदान करता है, वही सबका सेव्य है। यहाँ “अग्नि” शब्द का भौतिकाग्नि अर्थ करना ठीक नहीं, क्योंकि सुवीर्यदानादिगुण भौतिकाग्नि में संभव नहीं हो सकते, इसलिये परमात्मा का ही ग्रहण करना चाहिये॥२२॥हम मनुष्य जो अन्न पशु हिरण्य और भूमि आदि बढ़ाकर धन एकत्रित करें, वह केवल परोपकार के और यज्ञादि शुभकर्म के लिये ही करें। धन की क्या अवश्यकता है, इसको अच्छे प्रकार विचार सन्मार्ग में इसका व्यय करें॥२२॥

यदी॑ घृ॒तेभि॒राहु॑तो॒ वाशी॑म॒ग्निर्भर॑त॒ उच्चाव॑ च। असु॑र इव नि॒र्णिज॑म्॥

सुबुद्धि उत्पन्न करने अर्थात् बुद्धि को उत्तम बनाने के दो ही उपाय हो सकते हैं, एक−शुद्ध रसों का सेवन करना, दूसरा−विद्वानों की सङ्गति द्वारा सत्कर्मों में मन लगाना और ये दोनों यज्ञसाध्य हैं। घृतादि पवित्र आहुतियों द्वारा अन्तरिक्ष में मेघशुद्धि से सुन्दर वृष्टि होती है तथा भूलोक में वायु आदि पदार्थ शुद्ध होते हैं, जिससे पवित्र रसों की उत्पत्ति होकर उनके सेवन द्वारा सुबुद्धि होती है, इसी अभिप्राय से मनु जी ने कहा किः−अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः॥मनु० ३। ७५शास्त्रोक्त विधि से अग्नि में दी हुई आहुति अन्तरिक्षलोक को प्राप्त होती, अन्तरिक्ष से पवित्र वृष्टि, वृष्टि से पवित्र अन्न और पवित्र अन्न से पवित्र प्राणीजात उत्पन्न होते हैं, अतएव उचित है कि मेधा=पवित्र बुद्धि सम्पादन करने के लिये पुरुष को नित्य यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिये॥२३॥जिस प्रकार सूर्य्य उष्णता और प्रकाश से जगदुपकार करता है, तद्वत् अग्नि भी इस पृथिवी पर कार्य्य कर सकता है, यदि उसके गुणानुसार कार्य्य में लगा सकें॥२३॥

यो ह॒व्यान्यैर॑यता॒ मनु॑र्हितो दे॒व आ॒सा सु॑ग॒न्धिना॑। विवा॑सते॒ वार्या॑णि स्वध्व॒रो होता॑ दे॒वो अम॑र्त्यः॥

“मुखादग्निरजायत” यजु० ३१। ११। इत्यादि मन्त्रों में अग्नि परमात्मा का मुखस्थानीय वर्णन किया है, इसी अभिप्राय से इस मन्त्र में परमात्मा को हवनों द्वारा सुन्दर गन्धयुक्त मुखवाला कहा है। वह परमात्मा यज्ञ द्वारा सेवित होकर शोभन रसों को ही नहीं किन्तु अन्य अभिलषित पदार्थों को भी देता है, जिससे प्राणी पुष्ट होकर स्व-स्व व्यवहार में प्रवृत्त होते हैं, अतएव मनुष्यमात्र का कर्तव्य है कि वह अमरणशील दिव्य परमात्मा की उपासना में तत्पर रहें, जो सबको उत्तमोत्तम पदार्थों का देनेवाला तथा सबका जीवनाधार है॥२४॥होम से जलवर्षण होता है, ऐसा बहुत आचार्य्यों की सम्मति है, अतः हवनसामग्री तदनुकूल होनी चाहिये। तब ही वह लाभ हो सकता है॥२४॥

यद॑ग्ने॒ मर्त्य॒स्त्वं स्याम॒हं मि॑त्रमहो॒ अम॑र्त्यः। सह॑सः सूनवाहुत॥

इस मन्त्र में परमात्मोपासक को परमात्मा के सदृश हो जाना विधान किया है अर्थात् परमात्मसेवी उसका ध्यान करते-२ सर्व सांसारिक पदार्थों का तत्वज्ञ होकर परमानन्द का अनुभव करता हुआ अन्त में माया से निर्मुक्त होकर परमपद को प्राप्त होता है, यहाँ “अहं त्वं स्याम्”=मैं आप हो जाऊँ, यह अभेदलक्षणा द्वारा किया है, वास्तविक नहीं, जैसे “तत्त्वमसि” इस वाक्य में अथवा “सिंहो माणवकः”=यह माणवक सिंह है, इस वाक्य में वर्णन किया है अर्थात् उपासक परमात्मा के समान गुणोंवाला होता है, परमात्मा नहीं॥२५॥ईश्वर की उपासना से मनुष्यों में उसके गुण आते हैं, अतः वह उपासक उपास्य के समान माना जाता है और मनुष्य की इच्छा भी बलवती होती है, अतः तदनुसार यह प्रार्थना है॥२५॥

न त्वा॑ रासीया॒भिश॑स्तये वसो॒ न पा॑प॒त्वाय॑ सन्त्य। न मे॑ स्तो॒ताम॑ती॒वा न दुर्हि॑तः॒ स्याद॑ग्ने॒ न पा॒पया॑॥

मनुष्य को चाहिये कि वह असत्य कर्म में तथा अन्य पापकर्म में ईश्वर को साक्षी वा सहायक न बनाये, क्योंकि एक तो पापकर्म ही पाप है और दूसरा ईश्वर को साक्षी बनाना भी पाप होकर दूना पाप हो जाता है, जिससे उसका फलरूप दूना कष्ट भोगना पड़ता है, और जहाँ तक हो सके अपने सब मित्रों को परमात्मज्ञान में प्रवृत्त तथा दुष्ट बुद्धि से निवृत्त करके सबका हितकारक बताना चाहिये, किसी को द्वेषी न बनावे और न किसी को पापकर्मों में प्रवृत्त करे, ऐसा करनेवाला पुरुष महान् दुःखों को भोगता है॥२६॥मारण, मोहन, उच्चाटन, हिंसा आदि कुत्सित कर्म के लिये हम उपासक ईश्वर की उपासना न करें तथा हम कदापि किसी के शत्रु पिशुन और कलङ्कदाता न बनें॥२६॥

पि॒तुर्न पु॒त्रः सुभृ॑तो दुरो॒ण आ दे॒वाँ ए॑तु॒ प्र णो॑ ह॒विः॥

पुत्रकर्तृक पिता का सेवन व्यभिचारी होता है, इसलिये इस मन्त्र में पितृकर्तृक पुत्र के सेवन से उपमा दी गई है, जिसका तात्पर्य्य यह है कि यद्यपि परमात्मा सब प्राणियों का परम पिता है, पुत्र नहीं, तो भी मन्त्र में “पुत्र की नाईं सेवन किया गया” यह विशेषण उपमार्थ इसलिये दिया है कि पिता पुत्र को प्राण से भी प्रिय मानकर सेवन करता है और पुत्र का सेवन पिता में व्यभिचरित देखा जाता है अर्थात् प्राणों से प्रिय परमात्मा, जो हमारा प्रेमपात्र तथा सेवनीय इष्टदेव है, वह हमको योग्य पदार्थ प्राप्त कराये, जिससे हम पुष्ट होकर सदैव प्रजाहितकारक कार्य्यों में प्रवृत्त रहें॥२७॥हे मनुष्यों! प्रथम तुम अपने अन्तःकरण को शुद्ध करो और जगत् में हिंसा परद्रोहादि दुष्टकर्मों से सर्वथा निवृत्त हो जाओ। तब वह परमदेव तुम्हारे हृदय और गृह में वासकर शुभ मार्ग की ओर ले जावेगा॥२७॥

तवा॒हम॑ग्न ऊ॒तिभि॒र्नेदि॑ष्ठाभिः सचेय॒ जोष॒मा व॑सो। सदा॑ दे॒वस्य॒ मर्त्यः॑॥

उपासकों को परमात्मा से यह प्रार्थना करनी चाहिये कि हे परमात्मन्! हमारे रक्षायोग्य जो अन्नादि पदार्थ हैं, उनको आप अपनी व्यापक शक्ति से समीप ही में उत्पन्न करते रहें, जिससे सुखपूर्वक आपका सेवन कर सकें, या यों कहो कि वह दिव्यगुणसम्पन्न परमात्मा हमारे कल्याणकारक भोग्यपदार्थ तथा हमको आरोग्यता प्रदान करे, जिससे हम चिन्तारहित होकर औपकारिक कार्य्य करते हुए आपकी उपासना में निरन्तर रत रहें॥२८॥हे भगवन्! मुझको निखिल दुर्व्यसन और दुष्टता से दूर करो जिससे मैं सबका प्रीतिपात्र बनूँ। अज्ञान से दुर्व्यसन में और स्वार्थ से परद्रोह में लोग फँसते हैं, अतः सत्सङ्ग और विद्याभ्यास और ईश्वरीय गुणों का अपने हृदय में आधान करें॥२८॥

तव॒ क्रत्वा॑ सनेयं॒ तव॑ रा॒तिभि॒रग्ने॒ तव॒ प्रश॑स्तिभिः। त्वामिदा॑हुः॒ प्रम॑तिं वसो॒ ममाग्ने॒ हर्ष॑स्व॒ दात॑वे॥

वह सर्वज्ञ परमात्मा जो सबका पालक पोषक तथा रक्षक है, वही अपने उपासकों को सब भोग्यपदार्थ तथा सब प्रकार का ऐश्वर्य्य प्रदान करता है अर्थात् सब मनुष्यों को जो ऐश्वर्य्य प्राप्त है, वह सब ईश्वरदत्त है, ऐसा मानकर उसके दिये हुए धन से उसका सेवन करना चाहिये, या यों कहो कि परमात्मदत्त धन को उसकी वाणी वेदप्रचार में व्यय करना चाहिये, जिससे प्रजाजन परमात्मा के गुणों को भले प्रकार जानकर निरन्तर उसका सेवन करें अथवा प्रजाजनों की उन्नतिविषयक अन्य कार्यों में व्यय करना चाहिये, पाप कर्मों में नहीं, क्योंकि पाप कर्मों में व्यय किया हुआ धन शीघ्र ही नाश हो जाता है और पापी पुरुष महासंकट में पड़कर महान् दुःख भोगता है, अतएव उचित है कि परमात्मा के दिये हुए धन को सदा उत्तम काम में व्यय करो, मन्द कर्मों में नहीं॥२९॥मनुष्य को उचित है कि वह सर्वदशा में ईश्वर की आज्ञा पर चले, तब ही वह कल्याण का मुखावलोकन कर सकता है॥२९॥

प्र सो अ॑ग्ने॒ तवो॒तिभिः॑ सु॒वीरा॑भिस्तिरते॒ वाज॑भर्मभिः। यस्य॒ त्वं स॒ख्यमा॒वरः॑॥

परमात्मा अपने उपासकों को प्रसिद्ध होने के लिये अनेक शौर्यादि शक्ति प्रदान करता है अर्थात् जो परमात्मा का मित्र है, या यों कहो कि जो परमात्मा की आज्ञापालन करता हुआ उसकी उपासना में निरन्तर तत्पर है, वह सब आपत्तियों तथा कष्टों से बचकर सुख अनुभव करता है॥३०॥उस देव की जिस पर कृपा होती है, वही धन-धान्य से सम्पन्न होकर इस लोक में प्रशंसनीय होता है॥३०॥

तव॑ द्र॒प्सो नील॑वान्वा॒श ऋ॒त्विय॒ इन्धा॑नः सिष्ण॒वा द॑दे। त्वं म॑ही॒नामु॒षसा॑मसि प्रि॒यः क्ष॒पो वस्तु॑षु राजसि॥

जिस परमात्मा के ब्रह्मानन्द की समता कोई आनन्द नहीं कर सकता और जो शक्तिरूपेण प्रत्येक वस्तु में प्रकाशित हो रहा है, उसका प्रत्येक उषाकल में गान करना प्रत्येक मनुष्य को उचित है॥३१॥परमात्मा और उसका कार्य्यजगत्, ये दोनों सदा चिन्तनीय हैं। वह इसी में व्याप्त है, उसके कार्य्य के ज्ञान से ही विद्वान् तृप्त होते हैं॥३१॥

तमाग॑न्म॒ सोभ॑रयः स॒हस्र॑मुष्कं स्वभि॒ष्टिमव॑से। स॒म्राजं॒ त्रास॑दस्यवम्॥

जिसका यज्ञ परमानन्दमय है, जो सब सम्राटों का सम्राट् तथा अनेक शूरवीरों का उत्पादक है, वही सबका परमप्राप्तव्य है अर्थात् जो परमात्मा वेदविरोधी दस्युओं को त्रास देनेवाला, विविध पदार्थों का स्वामी और जो हमारे कल्याणार्थ यज्ञों का निर्माता है, वही हमको प्रयत्न से प्राप्त करने योग्य है॥३२॥हम मनुष्य कपट को त्याग उसके निकट पहुँचें, तब ही कल्याणभागी हो सकेंगे॥३२॥

यस्य॑ ते अग्ने अ॒न्ये अ॒ग्नय॑ उप॒क्षितो॑ व॒या इ॑व। विपो॒ न द्यु॒म्ना नि यु॑वे॒ जना॑नां॒ तव॑ क्ष॒त्राणि॑ व॒र्धय॑न्॥

संसार में अनेक प्रकार के सूर्यादि तेजोमय आधार हैं, परन्तु परमात्मा उन सबों का शक्तिदाता तथा स्वयं परमतेजोमय है। विज्ञानियों को चाहिये कि वे उन सब तेजों से अनेक विज्ञानों को प्रकाशित करके परमात्मा के यश को बढ़ाते हुए स्वयं यशस्वी बनें॥३३॥ये सूर्य्यादि अग्नि भी उसी महाग्नि ईश्वर से तेज और प्रभा पा रहे हैं, उसी की कीर्ति गाते हुए कविगण सुखी होते हैं॥३३॥

यमा॑दित्यासो अद्रुहः पा॒रं नय॑थ॒ मर्त्य॑म्। म॒घोनां॒ विश्वे॑षां सुदानवः॥

विद्वान् पुरुष अनेक कलाओं को प्रकाशित कर स्वयं दैन्यरहित होकर प्रजाओं को अनेक विपत्तियों से पार कर सकता है अर्थात् पदार्थविद्यावेत्ता विद्वान् पुरुष कला-कौशलादि-निर्माण द्वारा स्वयं ऐश्वर्य्यसम्पन्न होता और प्रजाजनों को भी धनवान् बनाता है, इसलिये उचित है कि सब विद्वान् पदार्थविद्या द्वारा उन्नत हों॥३४॥पूर्व सम्पूर्ण सूक्त में अग्निवाच्य ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना कही गई है, यहाँ आदित्य की चर्चा देखते हैं। इसका कारण यह है कि आदित्य नाम आचार्य का है। उनकी ही कृपा से सर्व कार्य सिद्ध हो सकता है, क्योंकि वे ज्ञान देते हैं, सन्मार्ग पर ले जाते हैं और ईश्वर की आज्ञाएँ समझाते हैं॥३४॥

यू॒यं रा॑जानः॒ कं चि॑च्चर्षणीसहः॒ क्षय॑न्तं॒ मानु॑षाँ॒ अनु॑। व॒यं ते वो॒ वरु॑ण॒ मित्रार्य॑म॒न्त्स्यामेदृ॒तस्य॑ र॒थ्यः॑॥

हे सर्वज्ञ तथा प्रकाशस्वरूप परमात्मन्! आप वेदविरोधी शत्रुओं को अभिभूत=तिरस्कृत करनेवाले, और वेदविहित कर्म करनेवाले उपासकों की शत्रुओं से रक्षा करते हुए उनको सुख प्राप्त करानेवाले हैं अर्थात् इस संसार में सत्य तथा असत्य दोनों मार्ग प्रचलित हैं, जो असत्यमार्गगामी हैं, वे दण्डनीय होते और सत्यमार्गगामी सदैव सुख अनुभव करते हैं, इसलिये मनुष्यमात्र को सत्य का आश्रयण करना परमावश्यक है, ताकि परमात्मा के प्रिय होकर सुखपूर्ण जीवनवाले हों॥३५॥हम लोग सदा सत्य और न्यायपथ पर चलें॥३५॥

अदा॑न्मे पौरुकु॒त्स्यः प॑ञ्चा॒शतं॑ त्र॒सद॑स्युर्व॒धूना॑म्। मंहि॑ष्ठो अ॒र्यः सत्प॑तिः॥

वह परमात्मा शूरवीरों में तेजोरूप से विद्यमान होकर शत्रुओं के नाश द्वारा सज्जनों का पालन करता है, उसी ने अपनी विचित्र शक्ति से नदियों द्वारा सर्वत्र जल पहुँचाया और उसी ने घृतादि वहनशील पदार्थों को उत्पन्न करके प्रजावर्ग को पुष्ट तथा सुखी किया, इत्यादि अनेकानेक पदार्थ जिनका उपभोग करके मनुष्य सुखी होते हैं, सब परमात्मा की रचना है, अतएव मनुष्यमात्र का कर्तव्य है कि उसकी महिमा का अनुभव करते हुए उसके आज्ञापालक हों, ताकि वह प्रसन्न होकर हमें प्रभूत सुखकारक पदार्थ प्राप्त कराए॥३६॥जो उसकी उपासना अन्तःकरण से करता है, वह सर्व धनसम्पन्न होता है, अतः हे मनुष्यों! केवल उसी की उपासना सदा करो॥३६॥

उ॒त मे॑ प्र॒यियो॑र्व॒यियोः॑ सु॒वास्त्वा॒ अधि॒ तुग्व॑नि। ति॒सॄ॒णां स॑प्तती॒नां श्या॒वः प्र॑णे॒ता भु॑व॒द्वसु॒र्दिया॑नां॒ पतिः॑॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि जो परमात्मा सहस्रों नस नाड़ीरूप तन्तुओं से शरीररूप पटमण्डप को विनकर इसको क्रियावान् बनाता और उसके मध्य में जीवात्मा की चेतनशक्ति को प्रविष्ट कर स्वयं भी अन्तःकरणरूप तीर्थ में निवास करता है, जो सकल कार्य्यरूप ब्रह्माण्ड को स्वाधीन रखनेवाला और सब जीवों को कर्मानुसार न्यायपूर्वक फल देनेवाला है, उसको अपने अन्तःकरण में खोजना चाहिये॥३७॥यह उन्नीसवाँ सूक्त और पैंतीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥जो समस्त भुवनों का तथा सकल दाताओं का रक्षक परमात्मा है, वही भक्तों के शुभकर्मों की समाप्ति में सहायक होता है। अतः सर्वत्र वही उपास्यदेव है॥३७॥

आ ग॑न्ता॒ मा रि॑षण्यत॒ प्रस्था॑वानो॒ माप॑ स्थाता समन्यवः। स्थि॒रा चि॑न्नमयिष्णवः॥

इस मन्त्र में उन वीर योद्धाओं का वर्णन है, जिनके तेज से भयभीत होकर दिशाएँ कम्पायमान हो जाती हैँ, या यों कहो कि जो अपने रौद्रभाव से सबको पददलित करके सभ्यता का राज्य स्थापित करते हैं, उन योद्धाओं से प्रजाजनों की प्रार्थना है कि आप हमारे अनुकूल होकर हमें सुराज्य प्राप्त कराएँ, जिससे हमें सब प्रकार की अनुकूलता प्राप्त हो और हम अन्नादि धनों से सम्पन्न होकर परमात्मोपासन में प्रवृत्त रहें, हे विजयी योद्धाओ! आप हम प्रजाओं के प्रतिकूल न वर्तते हुए सदैव हमारा हितचन्तिन करो अर्थात् क्षात्रधर्म को परमात्मा की आज्ञानुकूल वर्तो, जो तुम्हारा परमकर्तव्य है॥१॥इस सूक्त का देवता मरुत् है। यह शब्द अनेकार्थ है। यहाँ सैन्यवाची है। मरुत् शब्द का एक धात्वर्थ मारनेवाला भी है। जिस कारण राज्यप्रबन्ध के लिये दुष्टसंहारजन्य मरुद्गण महासाधन और महास्त्र हैं, अतः इसका नाम मरुत् है। इसी प्रथम ऋचा में अनेक विषय ऐसे हैं, जिनसे पता लगता है कि सेना का वर्णन है। जैसे (मा+रिषण्यत) इससे दिखलाया गया है कि प्रायः सैन्यपुरुष उन्मत्त होते हैं, निरपराध प्रजाओं को लूटते मारते रहते हैं, अतः यहाँ शिक्षा देते हैं कि हे सैन्यनायको! तुम किसी निरपराधी की हिंसा मत करो॥१॥

वी॒ळु॒प॒विभि॑र्मरुत ऋभुक्षण॒ आ रु॑द्रासः सुदी॒तिभिः॑। इ॒षा नो॑ अ॒द्या ग॑ता पुरुस्पृहो य॒ज्ञमा सो॑भरी॒यवः॑॥

हे शत्रुओं को रुलानेवाले वीर योद्धाओ! आप हमारे भरणपोषण करनेवाले पदार्थों सहित हमारे प्रजापालनरूप यज्ञ को शीघ्रगामी रथों द्वारा प्राप्त हों हम आपका सत्कार करते हैं अर्थात् जो योद्धागण धर्मपूर्वक युद्ध करके प्रजाओं के लिये सभ्यता तथा धर्म का राज्य स्थापित करते हैं, प्रजाजनों का कर्तव्य है कि ऐसे वीर पुरुषों की पूजा=सत्कार करने में सदैव तत्पर रहें॥२॥सेना को उचित है कि वह प्रजाओं की माननीया हो और उनकी रक्षा अच्छे प्रकार करे॥२॥

वि॒द्मा हि रु॒द्रिया॑णां॒ शुष्म॑मु॒ग्रं म॒रुतां॒ शिमी॑वताम्। विष्णो॑रे॒षस्य॑ मी॒ळ्हुषा॑म्॥

हे वीर पुरुषों की सन्तान! आप प्रजाहितकारक कर्म करनेवाले तथा हमें इष्ट पदार्थों के देनेवाले हैं, इसलिये हम आपका सत्कार करते हैं अर्थात् वीर योद्धा पुरुषों की सन्तान भी शौर्यादि गुणसम्पन्न होकर स्वधर्म तथा स्वदेश की रक्षा करने के कारण प्रशंसनीय तथा सत्करणीय होती है, अतएव उचित है कि सब प्रजाजन, समष्टिरूप से उन वीरों के सत्कार करने में सदैव तत्पर रहें॥३॥भाव इसका यह है कि सेना की क्या शक्ति है, उसको क्या अधिकार है, वह जगत् में किस प्रकार उपकारिणी बन सकती है, इत्यादि विषय विद्वानों को जानने चाहियें। वे सैन्यजन दुष्टों को शिष्ट बनावें। यदि वे अपनी दुष्टता न छोड़ें, तो उनके धन से देश के उपकार सिद्ध करें॥३॥

वि द्वी॒पानि॒ पाप॑त॒न्तिष्ठ॑द्दु॒च्छुनो॒भे यु॑जन्त॒ रोद॑सी। प्र धन्वा॑न्यैरत शुभ्रखादयो॒ यदेज॑थ स्वभानवः॥

हे सर्वत्रविख्यात योद्धाओ! जब आपके धनुष की टंकार चहुँ ओर गूँजने लगती है, तब सब लोक-लोकान्तर विपत्तिग्रस्त हो जाते हैं अर्थात् स्वभावसिद्ध क्षात्रधर्मवाले योद्धाओं का प्रभाव द्युलोक तथा पृथिवीलोक में सर्वत्र परिपूर्ण हो जाता है, इसलिये प्रत्येक क्षत्रिय का कर्तव्य है कि वह प्रकृतिसिद्ध क्षात्रधर्म का अनुष्ठान करते हुए अपने को बलवान् बनावे॥४॥राजसेनाएँ सदा प्रजाओं की रक्षा के लिये ही नियुक्त की जाती हैं, इसी काम में सदा धर्म पर वे तत्पर रहें॥४॥

अच्यु॑ता चिद्वो॒ अज्म॒न्ना नान॑दति॒ पर्व॑तासो॒ वन॒स्पतिः॑। भूमि॒र्यामे॑षु रेजते॥

इस मन्त्र में योद्धाओं के प्रस्थान करने पर जो पर्वतादिकों का शब्दायमान होना कथन किया है वह उपचार से है, या यों कहो कि क्षात्रधर्म का अनुष्ठान करनेवाले योद्धाओं का बल वर्णन किया है कि उनके प्रचण्ड वेग से भूमिस्थ लोक काँपने लगते हैं, जैसे कोई कहे कि भारत का आर्तनाद सुनकर सब लोग करुणारस में प्रवाहित होजाते हैं, इस कथन में “भारत” शब्द भारतवर्ष को नहीं किन्तु भारतदेशनिवासियों में लाक्षणिक होने से मनुष्यों का वाचक है, इसको शास्त्रीय परिभाषा में अलंकार, उपचार वा लक्षणा कहते हैं, लक्ष्यार्थ को समझकर जो वेदार्थ का ज्ञाता होता है, वही इस आशय को समझता है, अन्य नहीं॥५॥इससे यह सूचित किया गया है कि यदि सेना उच्छृङ्खल हो जाय तो जगत् की बड़ी हानि होती है, अतः उसका शासक देश का परमहितैषी और स्वार्थविहीन हो॥५॥

अमा॑य वो मरुतो॒ यात॑वे॒ द्यौर्जिही॑त॒ उत्त॑रा बृ॒हत्। यत्रा॒ नरो॒ देदि॑शते त॒नूष्वा त्वक्षां॑सि बा॒ह्वो॑जसः॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि शत्रुओं का संहार करनेवाले विजयी योद्धा जब युद्ध के आभूषणों को धारण करते हैं, तब मानो द्युलोक अन्तरिक्ष लोक से नीचे आकर अपने तेज का प्रकाश करने लगता है अर्थात् योद्धाओं के युद्धसूचक चिह्न द्युलोक के समान प्रकाशवाले होते हैं, या यों कहो कि दिव्य शक्तियों को धारण किये हुए योद्धा सूर्य्यसमान दीप्तिमान् प्रतीत होते हैं॥६॥जो अच्छे सैनिक पुरुष होते हैं, उनसे सब डरते हैं, क्योंकि वे निःस्वार्थ और देशहित के लिये समर करते हैं॥६॥

स्व॒धामनु॒ श्रियं॒ नरो॒ महि॑ त्वे॒षा अम॑वन्तो॒ वृष॑प्सवः। वह॑न्ते॒ अह्रु॑तप्सवः॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि जो शूरवीर नेतागण प्रजा के हितार्थ स्वधर्मपालन तथा राज्यलक्ष्मी की रक्षा के लिये युद्ध करते हैं, उनकी शोभा=कीर्ति भूमण्डल में चहुँदिक् फैल जाती है और वे श्रीसम्पन्न होकर अत्यन्त शोभायमान होते हैं, अतएव स्वधर्म, स्वजाति तथा स्वदेश के लिये जो नेतागण युद्धस्थल में पदार्पण करते हैं, वे अपने धर्म का पालन करने के कारण महती कीर्ति तथा महदैश्वर्य्य को प्राप्त होकर देश को सुरक्षित रखते हैं॥७॥सेना को उचित है कि वह अपने देश की सर्व प्रकार से रक्षा करे, वे स्वयं अपने आचरण से दीप्तिमान् और करुणानन्द हों और उनके प्रत्येक कार्य्य सरल हों॥७॥

गोभि॑र्वा॒णो अ॑ज्यते॒ सोभ॑रीणां॒ रथे॒ कोशे॑ हिर॒ण्यये॑। गोब॑न्धवः सुजा॒तास॑ इ॒षे भु॒जे म॒हान्तो॑ नः॒ स्पर॑से॒ नु॥

हे सब प्रजाओं का भरणपोषण करनेवाले तथा विद्याप्रिय योद्धाओ! आप लोग शीघ्र ही हमारे विद्याप्रधान यज्ञों में सुशोभित होकर प्रजाजनों को अपनी रक्षा द्वारा सुख पहुँचावें अर्थात् हमको अपने उपदेशों से बलवान् बनावें और हमारे लिये पुष्कल अन्न-प्राप्ति के अर्थ यत्नवान् हों॥८॥वीरपुरुष सदा जगत् के उपकार किया करें। प्रजाओं के क्लेशों को दूर करने के लिये सदा यत्न करें॥८॥

प्रति॑ वो वृषदञ्जयो॒ वृष्णे॒ शर्धा॑य॒ मारु॑ताय भरध्वम्। ह॒व्या वृष॑प्रयाव्णे॥

हे प्रजाजनो! तुम अपनी कामनाओं को पूर्ण करनेवाले योद्धाओं को बुलाकर सदैव उनका सत्कार करो, उनसे शूरवीरतादि गुण धारण करके बलवान् होओ और उनके दातव्यभाग को कभी मत रोको, सदैव देते रहो॥९॥तात्पर्य्य यह है कि जो जनता योद्धाओं के सैनिक विभागों का यथायोग्य मान करती हुई उनसे धीर वीरतादि गुणों की शिक्षा प्राप्त कर अनुष्ठान करती है, वह सदैव सुखी रहती है॥भगवान् उपदेश देते हैं कि सेना देश हितकारिणी हो और उस का भरण-पोषण प्रजाधीन हो॥९॥

वृ॒ष॒ण॒श्वेन॑ मरुतो॒ वृष॑प्सुना॒ रथे॑न॒ वृष॑नाभिना। आ श्ये॒नासो॒ न प॒क्षिणो॒ वृथा॑ नरो ह॒व्या नो॑ वी॒तये॑ गत॥

हे शत्रुनाशक वीरो! आप शीघ्रगामी रथों द्वारा अपना दातव्यभाग लेने के लिये शीघ्र आवें और श्येन=वाज के समान प्रतिपक्षियों को अपने आक्रमण से निर्बल करके सम्पूर्ण जनता से दातव्य भाग प्राप्त कर अपना कर्तव्य पालन करें अर्थात् हमारी सब ओर से रक्षा करते हुए हमें सुखसम्पन्न करें॥१०॥प्रजा के कार्य में किञ्चित् भी विलम्ब वे न करें और अपने साथ नाना पदार्थ लेकर चलें। जहाँ जैसी आवश्यकता देखें, वहाँ वैसा करें॥१०॥

स॒मा॒नम॒ञ्ज्ये॑षां॒ वि भ्रा॑जन्ते रु॒क्मासो॒ अधि॑ बा॒हुषु॑। दवि॑द्युतत्यृ॒ष्टयः॑॥

उपर्युक्त योद्धाओं का व्यञ्जक=द्योतक चिह्न एक जैसा होता है, बाहुमूलों में परिचय करानेवाले शोभायमान सुवर्ण के भूषण होते और हाथों में सूर्य्य की किरणसमान प्रकाशमान शस्त्र होते हैं, जो क्षात्रबल के प्रभाव को प्रकाशित करते हैं अर्थात् शूरवीर क्षत्रियों का स्वरूप शस्त्रास्त्रों से दिव्य शोभा को धारण करता है॥११॥सेना नाना अस्त्र-शस्त्रों से युक्त हो, किन्तु उनके कपड़े आदि सब एक ही हों॥११॥

त उ॒ग्रासो॒ वृष॑ण उ॒ग्रबा॑हवो॒ नकि॑ष्ट॒नूषु॑ येतिरे। स्थि॒रा धन्वा॒न्यायु॑धा॒ रथे॑षु॒ वोऽनी॑के॒ष्वधि॒ श्रियः॑॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि बल से पूर्ण योद्धा जिनके वृषभ समान स्कन्ध, विशाल बाहु, कम्बुसमान ग्रीवा तथा धनुर्विद्याप्रधान योद्धाओं के अस्त्र-शस्त्रों में राजलक्ष्मी सदा निवास करती है॥१२॥सैनिक पुरुष परमोद्योगी हों, अपने शरीर की चिन्ता न करें। वे अच्छे-२ अस्त्रों से सुभूषित हों॥१२॥

येषा॒मर्णो॒ न स॒प्रथो॒ नाम॑ त्वे॒षं शश्व॑ता॒मेक॒मिद्भु॒जे। वयो॒ न पित्र्यं॒ सहः॑॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि जिन योद्धाओं के नाम की धाक शत्रु के हृदय को कम्पायमान कर देती और जिनके प्रताप से धर्म तथा देश अभ्युदय को प्राप्त होता है, वे योद्धा सद्वंशविभूषित हिमाचल के समान अचल रहकर धर्म तथा जाति में शिरोमणि होकर विराजमान होते हैं॥१३॥सैनिक पुरुष ऐसे शुद्धाचारी हों कि जिनके नाम उज्ज्वल हों और वे ऐसे प्रजाहितकर हों कि सब कोई उनसे अपने धन के समान लाभ उठा सकें॥१३॥

तान्व॑न्दस्व म॒रुत॒स्ताँ उप॑ स्तुहि॒ तेषां॒ हि धुनी॑नाम्। अ॒राणां॒ न च॑र॒मस्तदे॑षां दा॒ना म॒ह्ना तदे॑षाम्॥

सम्पूर्ण प्रजाजनों को उचित है कि वह प्रतिष्ठा बढ़ानेवाले तथा अन्नादि भोग्यपदार्थों का दान देनेवाले योद्धाओं की वन्दना तथा स्तुति करें अर्थात् उनकी तन, मन, धन से सदैव सेवा करते रहें, जिससे वे प्रसन्न होकर अनुग्रहपूर्वक सब कामनाओं को पूर्ण करें॥१४॥अच्छी सेना की प्रशंसा करनी चाहिये॥१४॥

सु॒भगः॒ स व॑ ऊ॒तिष्वास॒ पूर्वा॑सु मरुतो॒ व्यु॑ष्टिषु। यो वा॑ नू॒नमु॒तास॑ति॥

जो प्रजाजन उपर्युक्त गुणसम्पन्न योद्धाओं को अपने घर बुलाकर उनका विविध पदार्थों से सत्कार करते और जो निश्चय ही उनके शरणागत होकर रहते हैं, वे सौभाग्यशाली होते हैं, या यों कहो कि जो प्रजावर्ग उक्त प्रकार के योद्धाओं को अपना रक्षक बनाते हैं, वे सदा सुखी रहते और निर्भय होकर ईश्वरीयधर्म का देश में प्रचार करते हैं॥१५॥सेना से सुरक्षित देश में सभी जन सुख से रहते हैं। सेना को उचित है कि लोभ, काम, क्रोध और अपमानादि से प्रेरित होकर प्रजाओं में कोई उपद्रव न मचावे, किन्तु प्रेम से प्रजा की रक्षा करे॥१५॥

यस्य॑ वा यू॒यं प्रति॑ वा॒जिनो॑ नर॒ आ ह॒व्या वी॒तये॑ ग॒थ। अ॒भि ष द्यु॒म्नैरु॒त वाज॑सातिभिः सु॒म्ना वो॑ धूतयो नशत्॥

हे शत्रुओं को तपानेवाले शूरवीर योद्धाओ! वह पुरुष धन-धामादि अनेकविध सुखों से युक्त होता है, जिसके यहाँ आप उपभोगार्थ जाते हैं, या यों कहो कि वह पुरुष अनन्त प्रकार के भोगों तथा अभ्युदय को प्राप्त होता है, जो आपकी आज्ञापालन करता तथा विविध प्रकार के पदार्थों से आपकी सेवा करता है॥१६॥सेनाओं को उचित है कि वे प्रजाओं के धनों और सुखों को पालें और बचावें॥१६॥

यथा॑ रु॒द्रस्य॑ सू॒नवो॑ दि॒वो वश॒न्त्यसु॑रस्य वे॒धसः॑। युवा॑न॒स्तथेद॑सत्॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि रुद्र=शत्रुओं को रुलानेवाले योद्धाओं की सन्तान भी दुष्टजनों की सुधारक तथा उनको धर्मपथ पर स्थित करनेवाली होती है अर्थात् उक्त वीर पुरुषों की सन्तानें प्रजाजनों में सुधार उत्पन्न करती हुई सम्पूर्ण सुखों की उत्पादक होती हैं॥१७॥यहाँ रुद्रादि शब्द से सैनिकजनों का लक्षण कहा गया है। प्रथम रुद्रसूनु पद से दिखलाया गया है कि ईश्वर के पुत्र जैसे परोपकारी आदि हो सकते हैं, वैसे ही सैनिकजन हैं और प्रत्येक उत्तम कार्य्य के वे विधायक हैं और युवा हैं। युवक पुरुषों से सेना में जितने कार्य्य सिद्ध हो सकते हैं, उतने वृद्धादिकों से नहीं॥१७॥

ये चार्ह॑न्ति म॒रुतः॑ सु॒दान॑वः॒ स्मन्मी॒ळ्हुष॒श्चर॑न्ति॒ ये। अत॑श्चि॒दा न॒ उप॒ वस्य॑सा हृ॒दा युवा॑न॒ आ व॑वृध्वम्॥

हे वीर पुरुषों की सन्तान! जो मनुष्य विविध प्रकार के पदार्थों से आपका सत्कार करते अथवा जो अन्य प्रकार से आपकी सेवा में तत्पर रहते हैं, उन्हें आप ऐश्वर्य्यशाली बनाकर धर्ममार्ग में प्रवृत्त करते हैं। तात्पर्य्य यह है कि जिस देश में दानशील पुरुषों द्वारा सार्वजनिक सुख के उत्पादक विद्वानों का सत्कार होता वा वीर पुरुषों द्वारा विद्वान् पुरुष सत्कारार्ह होते हैं, वह देश सदैव अभ्युदयशाली होता है॥१८॥परस्पर साहाय्य करना चाहिये, यह शिक्षा इससे मिलती है॥१८॥

यून॑ ऊ॒ षु नवि॑ष्ठया॒ वृष्णः॑ पाव॒काँ अ॒भि सो॑भरे गि॒रा। गाय॒ गा इ॑व॒ चर्कृ॑षत्॥

हे प्रजाओं का पालन-पोषण करनेवाले राजन्! तुम तरुण तथा बलिष्ठ प्रजाजनों को अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा द्वारा सुशिक्षित बनाओ। जैसे गोपालक तरुण वृषों को सुशिक्षित बनाकर कृषि आदि विविध कार्यों में लगाता और जैसे कर्मयोगी इन्द्रियों को वशीभूत करके अनेकविध कार्यों को सिद्ध करता है, इसी प्रकार राजा को उचित है कि वह संयमी पुरुषों की इन्द्रियों के समान अपने योद्धाओं को सुशिक्षित तथा युद्धकार्य्य में निपुण बनाकर उनका सदैव सत्कार करता रहे, ताकि वे शत्रुसमुदाय पर विजयप्राप्त करते हुए प्रजा को सुरक्षित रखें॥१९॥गृहस्थजन क्षेत्रोपकारी बैल इत्यादिक साधनों को अच्छी तरह से पालते और काम में लगाते, वैसे ही प्रजाजन सेनाओं को पालें और काम में लगावें॥१९॥

सा॒हा ये सन्ति॑ मुष्टि॒हेव॒ हव्यो॒ विश्वा॑सु पृ॒त्सु होतृ॑षु। वृष्ण॑श्च॒न्द्रान्न सु॒श्रव॑स्तमान्गि॒रा वन्द॑स्व म॒रुतो॒ अह॑॥

हे प्रजाजनो! तुम संग्रामों में युद्ध करनेवाले तथा शत्रु के बुलाने पर युद्ध में जानेवाले योद्धाओं का सत्कार करो अर्थात् मल्लयुद्ध में निमन्त्रण देकर बुलानेवाले मल्ल के समान जो योद्धा दस्युओं तथा म्लेच्छों के हननार्थ सदा उद्यत रहते हैं, ऐसे योद्धाओं का प्रजाजनों को स्तवन=सत्कार करना धर्म है॥२०॥जो सेनाएँ उत्तमोत्तम कार्य करें, वे प्रशंसनीय हैं॥२०॥

गाव॑श्चिद्घा समन्यवः सजा॒त्ये॑न मरुतः॒ सब॑न्धवः। रि॒ह॒ते क॒कुभो॑ मि॒थः॥

हे वीर योद्धाओ! आपसे सुरक्षित हुई गौएँ सब दिशाओं में भक्षण करती हुई स्वच्छन्द होकर विचरती हैं। आप सदैव इनकी रक्षा करते हुए इनको हृष्ट-पुष्ट करें, ताकि इनके दुग्ध तथा घृतादि पदार्थों का सेवन करके प्रजाजन शारीरक तथा आत्मिकोन्नति करते हुए अपने हितकारक कार्यों को विधिवत् करने में कुशल हों॥२१॥तात्पर्य्य यह है कि जिस देश में सर्वोपकारिणी गौ की रक्षा की जाती है, वह देश कृषि आदि से उन्नत होता, उस देश के निवासी सदैव हृष्ट-पुष्ट तथा उन्नतिशील होते और गो-पदार्थों से यज्ञादि कर्म करते हुए सदैव सुख अनुभव करते हैं॥प्रजाजन रक्षा के कारण परम सुखी और प्रेमी हो रहे हैं अथवा पशुजाति भी परस्पर प्रेम कर रही है॥२१॥

मर्त॑श्चिद्वो नृतवो रुक्मवक्षस॒ उप॑ भ्रातृ॒त्वमाय॑ति। अधि॑ नो गात मरुतः॒ सदा॒ हि व॑ आपि॒त्वमस्ति॒ निध्रु॑वि॥

हे शूरवीरो योद्धाओ! आप शत्रुनाशक तथा साधारण पुरुषों से भी मित्रता करनेवाले हैं, आपके आश्रित सब मनुष्य अपने स्व-२ कार्य्यों को पूर्ण करते हैं, या यों कहो कि सुवर्ण से विभूषित वीरों की मैत्री पुरुष को तेजस्वी बनाती है और सुवर्ण के आभूषण धारण करना उन्हीं वीरों को देदीप्यमान करता है, भीरु तथा कायर पुरुषों का ग्रीवास्थ सुवर्ण भी एक प्रकार का भार ही होता है॥२२॥सैनिकजन सर्वप्रिय होवें और यथोचित कर्त्तव्य लोगों को समझाया करें॥२२॥

मरु॑तो॒ मारु॑तस्य न॒ आ भे॑ष॒जस्य॑ वहता सुदानवः। यू॒यं स॑खायः सप्तयः॥

हे शूर वीर योद्धाओ! आप हम प्रजाजनों के मित्र और सर्वत्र जाने में समर्थ अर्थात् आप लोग अव्याहतगतिवाले हैं, अतएव अनावृष्टि तथा अन्य विपत्ति पड़ने पर दूसरे देशों से अन्नादि खाद्य पदार्थ लाकर हमारी रक्षा करें, जिससे हम अकाल द्वारा पीड़ित न हों॥२३॥सैनिकजनों को प्रजाओं के उपकारार्थ विविध औषधों का भी प्रस्तुत करना एक मुख्य काम है॥२३॥

याभिः॒ सिन्धु॒मव॑थ॒ याभि॒स्तूर्व॑थ॒ याभि॑र्दश॒स्यथा॒ क्रिवि॑म्। मयो॑ नो भूतो॒तिभि॑र्मयोभुवः शि॒वाभि॑रसचद्विषः॥

हे प्रजाओं के रक्षक शूरवीरो! आप अपने उद्योग से समुद्रपर्य्यन्त सम्पूर्ण देश को स्वाधीन करते सुरक्षित करते और कुल्या=नहरें निकालकर तथा कूप खनकर देश को हरा-भरा करते हैं, जिससे प्रजाजन सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करें। ऐसे राष्ट्रपति चिरस्थायी होते और सम्पूर्ण प्रजावर्ग उनसे सदैव प्रसन्न रहते हैं॥२४॥समुद्र में व्यापारिक जहाजों की रक्षा की बड़ी आवश्यकता होती है अतः वेद भगवान् कहते हैं कि समुद्र की भी रक्षा करना सैनिक धर्म है। तथा कूप में सदा जल विद्यमान रहे और उसमें शत्रुगण विषादि घातक पदार्थ न मिला सकें, अतः कूपों की रक्षा का विधान है॥२४॥

यत्सिन्धौ॒ यदसि॑क्न्यां॒ यत्स॑मु॒द्रेषु॑ मरुतः सुबर्हिषः। यत्पर्व॑तेषु भेष॒जम्॥

हे वीर योद्धाओ! जो नदियों में, वनों में, पर्वतों की कन्दराओं में तथा अगम्य प्रदेशों में जो-२ औषध तथा गुप्त पदार्थ हैं, उन सबको आप भले प्रकार जानकर उपयोग में लाते हैं॥२५॥औषधों का भी संग्रह करना सैनिकजनों का कर्त्तव्य है॥२५॥

विश्वं॒ पश्य॑न्तो बिभृथा त॒नूष्वा तेना॑ नो॒ अधि॑ वोचत। क्ष॒मा रपो॑ मरुत॒ आतु॑रस्य न॒ इष्क॑र्ता॒ विह्रु॑तं॒ पुनः॑॥

हे वीर योद्धाओ! पूर्वोक्त स्थानों से प्राप्त ओषधियों को भले प्रकार जानते हुए हमारे शरीरों की चिकित्सा करें, विच्छिन्न अङ्गों को पूरा करें और शल्यों को भरकर हमें नीरोग करें॥२६॥तात्पर्य्य यह है कि वेद में शल्यचिकित्सा=सर्जरी का वर्णन स्पष्ट है, क्योंकि उक्त मन्त्र में “आतुर” तथा “विह्रुत” शब्द कटे तथा टूटे हुए अङ्ग-प्रत्यङ्ग के लिये आये हैं, जो शल्यचिकित्सा को भली-भाँति स्पष्ट करते हैं। इसी प्रकार वेदों में यथास्थान सब विद्याओं का वर्णन स्पष्ट है॥२६॥चिकित्सा करना भी सैनिकजनों का एक महान् कर्त्तव्य है॥२६॥

सूक्तम्

व॒यमु॒ त्वाम॑पूर्व्य स्थू॒रं न कच्चि॒द्भर॑न्तोऽव॒स्यवः॑। वाजे॑ चि॒त्रं ह॑वामहे॥

जिस प्रकार कोई भारवाही मनुष्य असमर्थ होकर सहायता के लिये अपने से अधिक शक्तिमान् का आश्रय लेकर ही कार्य सिद्ध कर सकते हैं, इसी प्रकार प्रजाजन भी प्रधान सेनापति का आश्रय लेकर ही बड़े-बड़े उद्देश्यों को सिद्ध कर सकते हैं, क्योंकि हर प्रकार के विघ्नों को नष्ट करने में सेनापति ही समर्थ होता है, अतएव उचित है कि सब प्रजाजन सेनापति का सत्कार करते हुए अपने कार्य्य सिद्ध करने में समर्थ हों॥१॥अपूर्व्य=जिसके पहिले कोई न हो “यस्मात् पूर्वो न कश्चित् सोऽपूर्वः” यद्वा=जिसके सदृश कोई नहीं, वह अपूर्व। वेद में अपूर्व्य होता है। वाज=यह अनेकार्थक शब्द है। ज्ञान, अन्न, युद्ध, गमन आदि इसके अर्थ होते हैं॥१॥

उप॑ त्वा॒ कर्म॑न्नू॒तये॒ स नो॒ युवो॒ग्रश्च॑क्राम॒ यो धृ॒षत्। त्वामिद्ध्य॑वि॒तारं॑ ववृ॒महे॒ सखा॑य इन्द्र सान॒सिम्॥

भाव यह है कि बड़े-२ विघ्नों का निवृत्त करना सेनाध्यक्ष ही के अधीन है, अतएव सम्राट् को चाहिये कि सेनाध्यक्ष उसी को बनावे, जो युवा तथा उत्साहसम्पन्न हो और जो प्रजाजनों की भले प्रकार रक्षा करनेवाला हो॥२॥हे मनुष्यों! जैसे हम ऋषिगण उसी परमात्मा की उपासना करते हैं, वैसे आप लोग भी करें॥२॥

आ या॑ही॒म इन्द॒वोऽश्व॑पते॒ गोप॑त॒ उर्व॑रापते। सोमं॑ सोमपते पिब॥

इस मन्त्र में सेनापति का सत्कार कथन किया है कि जब वह सेनाध्यक्ष अपनी रक्षाओं से पृथ्वी को गौ, अश्वपूर्ण तथा सस्यशालिनी कर देता है, तब सब प्रजाजन बड़े हर्षपूर्वक सत्कार करते हुए उसको आह्वान करके सम्मानित करते हैं अर्थात् सोमरसादि उत्तमोत्तम विविध पदार्थों से उसका सत्कार करते हुए अपनी रक्षा की प्रार्थना करते हैं, ताकि उनके सोमयाग * में कोई विघ्न न हो॥३॥*चारों वेदों में सोम नाम से जिन-२ मन्त्रों में परमात्मा की स्तुति की गई है, उन मन्त्रों से जो याग किया जाता है अथवा सोमरसपानार्थ जो याग किया जाता है, उसका नाम ‘सोमयाग’ है॥उर्वरा=उपजाऊ भूमि का नाम उर्वरा है। परमेश्वर हमारे पशुओं, खेतों और लताओं का भी रक्षक है॥३॥

व॒यं हि त्वा॒ बन्धु॑मन्तमब॒न्धवो॒ विप्रा॑स इन्द्र येमि॒म। या ते॒ धामा॑नि वृषभ॒ तेभि॒रा ग॑हि॒ विश्वे॑भिः॒ सोम॑पीतये॥

सेनापति को उचित है कि जो विद्वान् उसके राष्ट्र में बन्धुओं से पृथक् होकर विद्यावृद्धि करने में लगे हुए हैं, उनकी भले प्रकार रक्षा करे, जिससे विद्या का प्रचार निर्विघ्न हो अर्थात् उसके राष्ट्र में कोई द्विज विद्या से शून्य न रहे॥४॥यद्यपि भ्राता, पुत्र, परिवार आदि बन्धु, बान्धव सबके थोड़े बहुत होते हैं, तथापि वास्तविक बन्धु परमात्मा ही है, इस अभिप्राय से यहाँ ‘अबन्धु’ पद आया है॥४॥

सीद॑न्तस्ते॒ वयो॑ यथा॒ गोश्री॑ते॒ मधौ॑ मदि॒रे वि॒वक्ष॑णे। अ॒भि त्वामि॑न्द्र नोनुमः॥

जिस प्रकार शाखा आदि अवयवों के रहते ही वृक्ष की सत्ता है, विना अवयवों के नहीं, जिस प्रकार वृक्षमूल के रहते ही शाखाओं की सत्ता है, बिना मूल के नहीं, इसी प्रकार प्रजा और सेनाध्यक्ष इन दोनों का भी अस्तित्व परस्पराश्रय है, स्वाश्रय नहीं, इसलिये दोनों में परस्पर प्रेम होना आवश्यक है॥५॥जीव मनुष्यशरीर पाकर नाना भोग भोगते हुए बड़े आनन्द से भगवद्रचित संसार में विश्राम कर रहा है, इसलिये भगवान् की स्तुति-प्रार्थना करना उचित ही है॥५॥

अच्छा॑ च त्वै॒ना नम॑सा॒ वदा॑मसि॒ किं मुहु॑श्चि॒द्वि दी॑धयः। सन्ति॒ कामा॑सो हरिवो द॒दिष्ट्वं स्मो व॒यं सन्ति॑ नो॒ धियः॑॥

सेनापति को उचित है कि जो प्रजाओं के कार्य्य अपने अधीन हैं, उनको विचारपूर्वक शीघ्र ही करना चाहिये और प्रजाओं को भी उचित है कि उसकी अनुमति से ही सब कर्म करें, विरुद्ध नहीं॥६॥मनुष्य के हृदय में अनेक कामनाएँ हैं, हितकारी और शुभ कामनाओं को ईश्वर पूर्ण करता है॥६॥

नूत्ना॒ इदि॑न्द्र ते व॒यमू॒ती अ॑भूम न॒हि नू ते॑ अद्रिवः। वि॒द्मा पु॒रा परी॑णसः॥

जो सेनापति शत्रुओं को हटाकर प्रजाओं की बाधा दूर करके अपनी प्रभावशक्ति को फैलाते हैं, उन्हीं को प्रजा नम्र होकर अपना स्वामी समझ सम्मानित करती है अर्थात् जो राष्ट्रपति तथा सेनापति प्रजा को सुख पहुँचाते और विद्यावृद्धि तथा धर्मवृद्धि में सहायक होते हैं, वे सत्कारार्ह तथा पूज्य होते हैं, अन्य नहीं॥७॥परमात्मा की रक्षा सर्वदा से होती आई है, उसकी उदारता असीम है, अतः वही पूज्य है॥७॥

वि॒द्मा स॑खि॒त्वमु॒त शू॑र भो॒ज्य१॒॑मा ते॒ ता व॑ज्रिन्नीमहे। उ॒तो स॑मस्मि॒न्ना शि॑शीहि नो वसो॒ वाजे॑ सुशिप्र॒ गोम॑ति॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि परमात्मा के प्रभाव को जानकर सब प्रजाएँ अनेक शक्ति प्राप्त करने के लिये उसकी प्रार्थना करती हैं, जिससे वह स्वयं भी अपने विघ्नों को दूर कर सकें और अपने स्वामी की भी सहायता करने में समर्थ हों॥८॥उसने हम जीवों के भोग के लिये सहस्रशः पदार्थ दिये हैं, तथापि हम जीव विकल ही रहते हैं। इसका कारण अनुद्योग है॥८॥

यो न॑ इ॒दमि॑दं पु॒रा प्र वस्य॑ आनि॒नाय॒ तमु॑ वः स्तुषे। सखा॑य॒ इन्द्र॑मू॒तये॑॥

इस मन्त्र में यह वर्णन किया है कि जो शूरवीर हमारी रक्षा करनेवाला तथा हमें उत्तमोत्तम पदार्थ देनेवाला है, उससे सुरक्षित होकर सब याज्ञिक लोग प्रथम उपकार को स्मरण करके स्वयं सत्कार करते और दूसरे से सत्कार कराने का प्रयत्न करते हैं॥९॥हे मनुष्यों! जो इन अनन्त पदार्थों को भूमि पर प्रकाशित करता है, वही एक पूज्य है, अन्य नहीं॥९॥

हर्य॑श्वं॒ सत्प॑तिं चर्षणी॒सहं॒ स हि ष्मा॒ यो अम॑न्दत। आ तु नः॒ स व॑यति॒ गव्य॒मश्व्यं॑ स्तो॒तृभ्यो॑ म॒घवा॑ श॒तम्॥

भाव यह है कि अनेक प्रकार की सम्पत्ति की प्राप्ति करानेवाले उस सेनापति की रक्षा से सुरक्षित होकर समृद्धिशाली प्रजाजन ही उसका आह्वान तथा यजन करते हैं, इसलिये सब प्रजाओं को समृद्ध होने के लिये उसकी प्रार्थना करनी चाहिये॥१०॥वही परमदेव हम जीवों का मनोरथ पूर्ण कर सकता है॥१०॥

त्वया॑ ह स्विद्यु॒जा व॒यं प्रति॑ श्व॒सन्तं॑ वृषभ ब्रुवीमहि। सं॒स्थे जन॑स्य॒ गोम॑तः॥

भाव यह है कि सैनिक लोग सेनापति की रक्षा द्वारा ही अनेक गर्वित शत्रुओं को तिरस्कृत कर सकते हैं, स्वतन्त्र नहीं, इसलिये सेनापति का होना अत्यावश्यक है, ताकि हम लोग शत्रुओं से सुरक्षित होकर अपने सब कार्य्यों को विधिवत् कर सकें॥११॥जो जन उसी को अपना आश्रय बनाते हैं, वे महान् शत्रुओं को भी जीत लेते हैं॥११॥

जये॑म का॒रे पु॑रुहूत का॒रिणो॒ऽभि ति॑ष्ठेम दू॒ढ्यः॑। नृभि॑र्वृ॒त्रं ह॒न्याम॑ शूशु॒याम॒ चावे॑रिन्द्र॒ प्र णो॒ धियः॑॥

इस मन्त्र में प्रजाओं की ओर से सेनापति से प्रार्थना है कि हे सेनापते! आप अपनी रक्षा द्वारा ऐसा सामर्थ्य दें, जिससे हम वेदविरुद्ध अथवा आपके प्रतिकूल चलनेवाले मनुष्यों को पराङ्मुख कर सकें॥१२॥प्रत्येक उपासक को उचित है कि वह अपने आन्तरिक और बाह्य विघ्नों को शान्त रक्खे॥१२॥

अ॒भ्रा॒तृ॒व्यो अ॒ना त्वमना॑पिरिन्द्र ज॒नुषा॑ स॒नाद॑सि। यु॒धेदा॑पि॒त्वमि॑च्छसे॥

सेनापति को जन्म ही से बन्धुरहित इसलिये कहा है कि वह बाल्यावस्था में ब्रह्मचर्यव्रत द्वारा विविध शस्त्रास्त्र सीखने के लिये वन्धुओं से वियुक्त रहता है, फिर शिक्षित होने पर विविध रक्षाओं में तत्पर रहने के कारण सामान्य जन के समान बान्धवों के साथ नहीं रहने पाता और संग्राम में सम्बन्ध को चाहना इसलिये कहा है कि बलप्रधान होने के कारण इसका सम्बन्ध बल ही के द्वारा होता है अर्थात् बलवान् शत्रु पराजित होकर और सामान्य प्रजाजन उसके प्रताप को सुनकर सम्बन्धी हो जाते हैं॥१३॥यद्यपि परमेश्वर सर्वोपाधिरहित है, तथापि इसका बन्धु जीवात्मा है, उस जीवात्मा को इस संसार में विजयी देखना चाहता है, जो विजयी होता है, वही उसका वास्तविक बन्धु है॥१३॥

नकी॑ रे॒वन्तं॑ स॒ख्याय॑ विन्दसे॒ पीय॑न्ति ते सुरा॒श्वः॑। य॒दा कृ॒णोषि॑ नद॒नुं समू॑ह॒स्यादित्पि॒तेव॑ हूयसे॥

सेनापति को चाहिये कि वह स्वयं दुराचार से दूर रहते हुए दुराचारियों का सङ्ग भी न करे, क्योंकि ऐसा करने से संग्राम में विजय प्राप्त होना दुष्कर है और जो सेनापति विजय प्राप्त नहीं कर सकता, उसका प्रजाजन भी निरादर करते और वह सफलमनोरथ नहीं होता, इसलिये सेनापति को सदाचारसम्पन्न होकर विजय प्राप्त करने का सदैव उद्योग करना चाहिये॥१४॥पापी दुर्जन ईश्वर के नियमों को तोड़ते रहते हैं, परन्तु विपत्काल में उसको पुकारते हैं॥१४॥

मा ते॑ अमा॒जुरो॑ यथा मू॒रास॑ इन्द्र स॒ख्ये त्वाव॑तः। नि ष॑दाम॒ सचा॑ सु॒ते॥

सेनापति को उचित है कि अपने अधीन राष्ट्र को किसी प्रकार की भी शक्तियों से हीन न होने दे, जिससे वह अनेक बलसाध्य कर्मों को स्वयं ही करते हुए अपना सहायक हो सके, तात्पर्य्य यह है कि जिस सेनापति का राष्ट्र सहायक होता है, वही शक्तिसम्पन्न होकर कृतकार्य्य होता है, अन्य नहीं॥१५॥हम लोग आलसी और व्यर्थ समय न बितावें, किन्तु ईश्वरीय आज्ञा का पालन करते हुए सदा शुभकर्म में प्रवृत्त रहें॥१५॥

मा ते॑ गोदत्र॒ निर॑राम॒ राध॑स॒ इन्द्र॒ मा ते॑ गृहामहि। दृ॒ळ्हा चि॑द॒र्यः प्र मृ॑शा॒भ्या भ॑र॒ न ते॑ दा॒मान॑ आ॒दभे॑॥

सेनापति को चाहिये कि राष्ट्र के किसी एक विभाग में धन या किसी अन्य वस्तु की न्यूनता हो तो वह दूसरे विभाग से पूर्ण करे और जहाँ तक हो सके पौरुष, ज्ञान, विज्ञान तथा गो आदि पदार्थों की वृद्धि करता रहे, जिससे नित्यावश्यक पदार्थों से उसका राष्ट्र क्लेशित न हो॥१६॥हम अपने पुरुषार्थ से धनसंग्रह करें। दूसरों के धनों की आशा न करें। ईश्वर से ही अभ्युदय के लिये माँगें॥१६॥

इन्द्रो॑ वा॒ घेदिय॑न्म॒घं सर॑स्वती वा सु॒भगा॑ द॒दिर्वसु॑। त्वं वा॑ चित्र दा॒शुषे॑॥

इस मन्त्र में यह कथन किया है कि प्रजाओं के बड़े से बड़े उद्देश्यों के साधक तीन ही हो सकते हैं (१) सर्वोपकारक विद्या (२) योद्धाओं का स्वामी=सेनापति (३) सब छोटे-२ राजाओं का स्वामी सम्राट्, इसलिये जो प्रजाओं का हित चाहनेवाला सम्राट् है, उसको चाहिये कि वह अपने राष्ट्र में ऐसी विद्या उत्पन्न करे, जिससे प्रजाजन स्वतन्त्रता से अपने-२ कार्यों को स्वयं पूर्ण कर सकें अथवा ऐसा प्रजाहितैषी सेनापति नियत करे वा स्वयं ही उनके उद्देश्यों को सर्वदा पूर्ण करता रहे, जिससे वे लोग प्रसन्नता के साथ अपने सहायक हो सकें॥१७॥जहाँ नदियों और मेघों के कारण धन उत्पन्न होता है, वहाँ के लोग धनदाता ईश्वर को न समझ नदी आदि को ही धनदाता समझ पूजते हैं, इसका वेद निषेध करता है॥१७॥

चित्र॒ इद्राजा॑ राज॒का इद॑न्य॒के य॒के सर॑स्वती॒मनु॑। प॒र्जन्य॑ इव त॒तन॒द्धि वृ॒ष्ट्या स॒हस्र॑म॒युता॒ दद॑त्॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि सम्राट् होना किसी कुलविशेष अथवा किसी व्यक्तिविशेष पर निर्भर नहीं किन्तु अनेक राजाओं में से जिस योग्य राजा को प्रजाजन स्वीकृत करें, वही सम्राट् प्रजाओं का पालक हो सकता है, क्योंकि साम्राज्यधर्म में निमित्त शौर्यादि गुण ही होते हैं, व्यक्तिविशेष नहीं। ऐसे चयन किये हुए अर्थात् चुने हुए सम्राट् के राष्ट्र में सब अल्प राजा तथा प्रजा उत्साहसहित अपने कार्य्यों को सिद्ध करते हुए उसकी सहायता करते हैं॥१८॥यह इक्कीसवाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ॥बहुत अज्ञानी जन राजा और नदी आदि को धनदाता मान पूजते हैं, वेद इसका निषेध करता है॥१८॥

ओ त्यम॑ह्व॒ आ रथ॑म॒द्या दंसि॑ष्ठमू॒तये॑। यम॑श्विना सुहवा रुद्रवर्तनी॒ आ सू॒र्यायै॑ त॒स्थथुः॑॥

इस मन्त्र में यज्ञकर्त्ता यजमान की ओर से कथन है कि हे शत्रुनाशक न्यायाधीश तथा सेनाधीश! मैं अपने यज्ञ की रक्षार्थ आपको आह्वान करता हूँ, हे दुष्टों को दण्ड देनेवाले! आप हमारे यज्ञ को प्राप्त होकर अपनी आज्ञा द्वारा सब प्रकार की रक्षाओं से इस यज्ञ को पूर्ण करें॥१॥विद्वानों को उचित है कि नूतन-२ रथ और विमान आदि वस्तु का आविष्कार करें, जिनसे राज्यव्यवस्था में सुविधा और शत्रुओं पर आतङ्क जम जाए॥१॥

पू॒र्वा॒युषं॑ सु॒हवं॑ पुरु॒स्पृहं॑ भु॒ज्युं वाजे॑षु॒ पूर्व्य॑म्। स॒च॒नाव॑न्तं सुम॒तिभिः॑ सोभरे॒ विद्वे॑षसमने॒हस॑म्॥

हे भगवन्! आप सबका पालन-पोषण करनेवाले, विद्वानों को सुखप्रद, सैनिकबलयुक्त होने से संग्रामों में विजयी, आप नीतिनिपुण और पाप से रहित होने के कारण स्तुतियोग्य हैं, अतएव आप हमारे यज्ञ की सर्व प्रकार से रक्षा करें॥२॥जो रथ या विमान या नौका आदि सुदृढ़, चिरस्थायी और संग्रामादि कार्य के योग्य हों, वैसी-२ बहुत सी रथ आदि वस्तु सदा विद्वान् बनाया करें॥२॥

इ॒ह त्या पु॑रु॒भूत॑मा दे॒वा नमो॑भिर॒श्विना॑। अ॒र्वा॒ची॒ना स्वव॑से करामहे॒ गन्ता॑रा दा॒शुषो॑ गृ॒हम्॥

याज्ञिक पुरुषों के घर जाकर उनकी सहायता करनेवाले, दिव्यस्वरूप सेनाधीश तथा न्यायाधीश! आप अपना याज्ञिकभाग ग्रहण कर उपभोग करें और हमारी स्तुतियों को स्वीकार कर यज्ञ की रक्षा के लिये सदैव सन्नद्ध रहें॥३॥प्रजाएँ मिलकर उनको स्वराजा बनावें, जो विद्वान्, साहसी, सत्यपरायण और जितेन्द्रियत्व आदि गुणों से भूषित हों, जिनमें स्वार्थ का लेश भी न हो, किन्तु मनुष्य के हित के लिये जिनकी सर्व प्रवृत्ति हो॥३॥

यु॒वो रथ॑स्य॒ परि॑ च॒क्रमी॑यत ई॒र्मान्यद्वा॑मिषण्यति। अ॒स्माँ अच्छा॑ सुम॒तिर्वां॑ शुभस्पती॒ आ धे॒नुरि॑व धावतु॥

इसी अर्थ का महर्षि श्रीस्वामी दयानन्दसरस्वतीजी ने “न्यघ्न्यस्य मूर्धनि०” ऋग्० १। ३०। १९। मन्त्र के भाष्य में प्रतिपादन किया है, विशेषाभिलाषी वहाँ देख लें। भाव यह है कि हे अन्न द्वारा पालक न्यायाधीश तथा सेनाधीश! आपका उपर्युक्त प्रकार का यान, जो विचित्र कलाओं से सुसज्जित है, उसमें आरूढ़ हुए आप शीघ्र ही हमारे यज्ञ को प्राप्त होकर सब बाधाओं को दूर करते हुए यज्ञ को पूर्ण करें॥४॥जो अच्छे नीतिनिपुण और वीरत्वादिगुणयुक्त राजा और मन्त्रिदल हों, उनको ही सब प्रजा मिलकर सिंहासन पर बैठावें॥४॥

रथो॒ यो वां॑ त्रिवन्धु॒रो हिर॑ण्याभीशुरश्विना। परि॒ द्यावा॑पृथि॒वी भूष॑ति श्रु॒तस्तेन॑ नास॒त्या ग॑तम्॥

हे सत्यवादी न्यायाधीश तथा सेनाधीश! आपका शिल्पी विद्वानों से रचित यान, जो ऊपर, नीचे तथा बीच में सुदृढ़ बंधा हुआ है अर्थात् जिसको कलायन्त्रों से भले प्रकार दृढ़ बनाया है, जो वाष्प द्वारा पृथिवी तथा अन्तरिक्ष में विचरता और जिससे आप शत्रुओं को पराजित करते हैं, उसमें आरूढ़ हुए हमारे यज्ञसदन को प्राप्त हों॥५॥समय-२ पर राजा अपने मन्त्रिदलसहित प्रजाओं के गृह पर जा सत्कार ग्रहण करें॥५॥

द॒श॒स्यन्ता॒ मन॑वे पू॒र्व्यं दि॒वि यवं॒ वृके॑ण कर्षथः। ता वा॑म॒द्य सु॑म॒तिभिः॑ शुभस्पती॒ अश्वि॑ना॒ प्र स्तु॑वीमहि॥

हे प्रजाओं के रक्षक न्यायाधीश तथा सेनाधीश! आप सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मा पर पूर्ण श्रद्धा रखनेवाले तथा उसका प्रजाओं में उपदेश करनेवाले और अन्नादि आवश्यक पदार्थों से प्रजा को संतुष्ट रखनेवाले हैं, आपकी हम स्तुतियों द्वारा प्रार्थना करते हैं कि आप हमारे अनुकूल हों, जिससे सब याज्ञिक कार्य्य निर्विघ्न पूर्ण हों॥६॥कभी-२ राजा और मन्त्रिदल भी अपने हाथ से हल चलावें। जिससे इतर प्रजाओं में भी खेती करने का उत्साह हो। अतएव वेद में हल चलाने की भी विधि लिखी है॥६॥

उप॑ नो वाजिनीवसू या॒तमृ॒तस्य॑ प॒थिभिः॑। येभि॑स्तृ॒क्षिं वृ॑षणा त्रासदस्य॒वं म॒हे क्ष॒त्राय॒ जिन्व॑थः॥

हे महती सेना से सुसज्जित न्यायाधीश तथा सेनाधीश! आप कर्मजीवी पुरुषों की दस्युओं से रक्षा करनेवाले तथा सम्पूर्ण प्रजा को समृद्धिशाली बनानेवाले हैं। आप सम्पूर्ण प्रजा को उत्साहसम्पन्न करें, ताकि सब याज्ञिक कर्मों में प्रवृत्त होकर अपने कार्यों को विधिवत् पूर्ण करते हुए ऐश्वर्य्यशाली हों॥७॥मन्त्रिदलसहित राजा सदा सत्यमार्ग की समुन्नति करता रहे और पक्षपात छोड़ सबकी भलाई के चिन्तन, वर्धन और रक्षण में तत्पर रहे॥७॥

अ॒यं वा॒मद्रि॑भिः सु॒तः सोमो॑ नरा वृषण्वसू। आ या॑तं॒ सोम॑पीतये॒ पिब॑तं दा॒शुषो॑ गृ॒हे॥

हे सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों के प्रदाता नेता पुरुषो! हम याज्ञिक आपका सत्कार करते हैं। आप हमारे यज्ञसदन को प्राप्त होकर उपर्युक्त प्रकार से सिद्ध किये हुए सोमरस का पान कर हमें उत्साहित करें, ताकि हम अपने कर्म करने में सदा सन्नद्ध रहें॥८॥राजा और अमात्यगण सत्करणीय हैं, यह इसका भाव है॥८॥

आ हि रु॒हत॑मश्विना॒ रथे॒ कोशे॑ हिर॒ण्यये॑ वृषण्वसू। यु॒ञ्जाथां॒ पीव॑री॒रिषः॑॥

हे सम्पूर्ण धनों के दाता न्यायाधीश तथा सेनाधीश! आपकी शक्तिएँ सर्वत्र फैली हुई प्रजाओं में सुप्रबन्ध कर रही हैं। आप अपने दिव्य यानों में आरूढ़ होकर प्रजाओं को समृद्धियुक्त करते हुए उनकी शुभ कामनाओं को पूर्ण करें, ताकि सब प्रजाजन वैदिककर्मों से विचलित न हों अर्थात् वैदिककर्म करते हुए सदैव परमात्मा के स्तवन करने में प्रवृत्त रहें॥९॥राजा और राज्यकर्मचारी रथादि यान पर चढ़ प्रजाओं के कल्याण के लिये इधर-उधर सदा भ्रमण करते हुए उनके सुख बढ़ावें॥९॥

याभिः॑ प॒क्थमव॑थो॒ याभि॒रध्रि॑गुं॒ याभि॑र्ब॒भ्रुं विजो॑षसम्। ताभि॑र्नो म॒क्षू तूय॑मश्वि॒ना ग॑तं भिष॒ज्यतं॒ यदातु॑रम्॥

इस मन्त्र में रोगनिवृत्ति अर्थात् रोगियों को निरोग करने के लिये न्यायाधीश तथा सेनाधीश से प्रार्थना कथन की गई है कि आप वृद्ध, युवा तथा बालकों की चिकित्सा का पूर्ण प्रबन्ध करें, ताकि सब नीरोगावस्था में रहकर अपने कर्तव्य का पालन करते रहें, या यों कहो कि सब प्रजाजन उद्योगी होकर जीवन व्यतीत करें, निरुद्यमी होकर नहीं॥१०॥महामात्य राजा सब प्रकार के मनुष्यों=अन्ध, बधिर, पङ्गु इत्यादिकों और प्राणियों की रक्षा करे-करावे तथा सर्वत्र औषधालय स्थापित कर रोगियों की चिकित्सा का प्रबन्ध करे॥१०॥

यदध्रि॑गावो॒ अध्रि॑गू इ॒दा चि॒दह्नो॑ अ॒श्विना॒ हवा॑महे। व॒यं गी॒र्भिर्वि॑प॒न्यवः॑॥

अनेक प्रकार की ओषधियों और अपने उद्योग से सम्पूर्ण प्रजाजनों को हृष्ट-पुष्ट तथा कार्य्य करने में शीघ्रगामी बनानेवाले न्यायाधीश तथा सेनाधीश! हम सब याज्ञिक पुरुष स्तुतियों द्वारा आपको आह्वान करते हैं, आप यज्ञसदन में आकर हमारे कष्टों को निवृत्त करते हुए यज्ञ के पूर्ण होने में योग दें॥११॥जब-२ राजवर्ग प्रजाहित कार्य्य करें, तब-२ वह प्रजा द्वारा अभिनन्दनीय हैं॥११॥

ताभि॒रा या॑तं वृष॒णोप॑ मे॒ हवं॑ वि॒श्वप्सुं॑ वि॒श्ववा॑र्यम्। इ॒षा मंहि॑ष्ठा पुरु॒भूत॑मा नरा॒ याभिः॒ क्रिविं॑ वावृ॒धुस्ताभि॒रा ग॑तम्॥

कूप तड़ागादि जलाशयों को निर्माण कर प्रजाओं को सुख देनेवाले, प्रजाओं की शुभ कामनाओं को पूर्ण करनेवाले, कतिपय प्रजाजनों को ऐश्वर्य्यशाली बनानेवाले और यज्ञों का सर्वत्र प्रचार तथा विस्तार करनेवाले न्यायाधीश तथा सेनाधीश! हम स्तुतिपूर्वक आपको आह्वान करते हैं, आप हमारे यज्ञ में सम्मिलित हों॥१२॥राज्यकर्मचारी परमोदार परमदानी और सर्वप्रिय होवें और प्रजा की रक्षा के लिये सदा तत्पर रहें॥१२॥

तावि॒दा चि॒दहा॑नां॒ ताव॒श्विना॒ वन्द॑मान॒ उप॑ ब्रुवे। ता उ॒ नमो॑भिरीमहे॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि उपर्युक्त गुणसम्पन्न न्यायाधीश तथा सेनाधीश अभिवादन करने योग्य तथा हविर्भाग भेंट करके प्रार्थना करने योग्य हैं, क्योंकि वे सब प्रकार से प्रजाओं के हितचिन्तक और प्रजाओं को सुखपूर्ण करने में सदा यत्नवान् रहते हैं, इसलिये वे सब प्रकार से पूजा=सत्कारयोग्य हैं॥१३॥राज्यसम्बन्धी जो त्रुटियाँ हों, उनसे राजा को परिचित करवाना चाहिये॥१३॥

ताविद्दो॒षा ता उ॒षसि॑ शु॒भस्पती॒ ता याम॑न्रु॒द्रव॑र्तनी। मा नो॒ मर्ता॑य रि॒पवे॑ वाजिनीवसू प॒रो रु॑द्रा॒वति॑ ख्यतम्॥

हे सब प्रजाओं के दुःख दूर करनेवाले न्यायधीश तथा सेनाधीश! हम लोग दिन में तथा सब कालों में आपको स्तुतिपूर्वक आह्वान करते हैं, क्योंकि आप अन्न तथा शुद्ध जलों द्वारा हमारे रक्षक हैं। हे रुद्ररूपधारी नेताओ! आप हमारे दुःखों को दूर करके हमें सुख देनेवाले हैं। आप हमारे शत्रुओं को न बढ़ने दें, किन्तु उनका अपमान करते हुए उनको सदैव वशीभूत रखें, जिससे हमारे यज्ञादि कार्यों में विघ्न न हो॥१४॥प्रजाओं को उचित है कि वे अपने सुख-दुःख की बात राजा के निकट कहें और यथोचित रीति पर उनसे शुभकर्म करावें॥१४॥

आ सुग्म्या॑य॒ सुग्म्यं॑ प्रा॒ता रथे॑ना॒श्विना॑ वा स॒क्षणी॑। हु॒वे पि॒तेव॒ सोभ॑री॥

हे सेवनीय न्यायाधीश तथा सेनाधीश! हम ऋषिसन्तान प्रातःस्मरणीय पिता के समान आपको आह्वान करते हैं, आप हमारे यज्ञसदन को प्राप्त होकर सुखवृष्टि करें॥१५॥राजवर्ग को उचित है कि वे प्रातःकाल उठकर नित्यकर्म करने के पश्चात् प्रजावर्गों की खबर लेवें॥१५॥

मनो॑जवसा वृषणा मदच्युता मक्षुंग॒माभि॑रू॒तिभिः॑। आ॒रात्ता॑च्चिद्भूतम॒स्मे अव॑से पू॒र्वीभिः॑ पुरुभोजसा॥

हे शीघ्रगामी नेताओ! आप सुख देनेवाले, शत्रुओं के गर्व को चूर करनेवाले तथा प्रजाओं का पालन करनेवाले हैं। आप हमारा सदैव स्मरण रखें, किसी देश काल में भी हमसे दृष्टि न उठावें, ताकि हम सुरक्षित हुए प्रजाहितकारक यज्ञ में निर्विघ्न साफल्य प्राप्त कर सकें॥१६॥इससे यह दिखलाते हैं कि राज्य की ओर से प्रजारक्षण का प्रबन्ध प्रतिक्षण रहना उचित है॥१६॥

आ नो॒ अश्वा॑वदश्विना व॒र्तिर्या॑सिष्टं मधुपातमा नरा। गोम॑द्दस्रा॒ हिर॑ण्यवत्॥

हे दर्शनीय नेताओ! आप हमारे यज्ञसदन को प्राप्त होकर हमें गौ तथा अश्वादि पशु अन्न और सुवर्णादि धन देकर सम्पत्तिशाली करें, ताकि हम प्रजाहितकारक कार्य्यों में दत्तचित्त होकर सफलता प्राप्त करते हुए अपने मनोरथ पूर्ण कर सकें॥१७॥राजा, यदि उदारता दिखलावें, तो उनको हृदय से धन्यवाद देना चाहिये। यह शिक्षा इससे देते हैं॥१७॥

सु॒प्रा॒व॒र्गं सु॒वीर्यं॑ सु॒ष्ठु वार्य॒मना॑धृष्टं रक्ष॒स्विना॑। अ॒स्मिन्ना वा॑मा॒याने॑ वाजिनीवसू॒ विश्वा॑ वा॒मानि॑ धीमहि॥

हे सेनारूप बल से युक्त न्यायाधीश तथा सेनाधीश! आपके आगमनकाल में प्राप्त हुए धन तथा अन्य भोग्य पदार्थों को हम लोग सुखपूर्वक भोगें, जिससे पराक्रमसम्पन्न होकर कठिन से कठिन प्रजाहितकारक कार्यों को अनायास पूर्ण करें॥१८॥तात्पर्य्य यह है कि जिस देश के नेता विद्वान्, बुद्धिमान्, पराक्रमी तथा सदाचारसम्पन्न होते हैं, वहाँ सदैव आनन्द, उत्साह और यज्ञादि कर्मों द्वारा धर्म, धन तथा सब प्रकार का ऐश्वर्य्य प्राप्त होता है, अतएव उचित है कि ऐश्वर्य्य की कामनावाले पुरुष सदैव यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्त रहें, यह मनुष्यमात्र को वेद का आदेश है॥यह बाईसवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥राज्य की ओर से यदि रक्षा का प्रबन्ध नहीं, तो समस्त अज्ञानी प्रजाएँ परस्पर लड़-२ कर नष्ट-भ्रष्ट हो जायँ। अतः राजप्रबन्धकर्ता सब प्रकार का प्रबन्ध प्रतिक्षण रक्खें॥१८॥

ईळि॑ष्वा॒ हि प्र॑ती॒व्यं१॒॑ यज॑स्व जा॒तवे॑दसम्। च॒रि॒ष्णुधू॑म॒मगृ॑भीतशोचिषम्॥

इस मन्त्र में परमात्मा आज्ञा देते हैं कि हे याज्ञिक जनो! जिन शूरवीरों के बाणों का धूम नभोमण्डल तक व्याप्त हो जाता है, जिनका जगत् में कोई भी अपमान नहीं कर सकता और जो अपने शौर्य्य-क्रौर्य्यादि तेज से सबको तिरस्कृत करते हैं, आप लोग उनका पूजन=सत्कार करो॥१॥वास्तव में हम लोग अग्नि के गुणों से सर्वथा अपरिचित हैं, इसलिये वेद में पुनः-२ अग्निगुणज्ञानार्थ उपदेश है॥१॥

दा॒मानं॑ विश्वचर्षणे॒ऽग्निं वि॑श्वमनो गि॒रा। उ॒त स्तु॑षे॒ विष्प॑र्धसो॒ रथा॑नाम्॥

“अग्निः कस्माद् अङ्गं नयति संनममानः” निरु० अ० ७ ख० १४=जो परपक्षियों को दबाकर अपने पक्ष में मिला ले, उसका नाम यहाँ “अग्नि” है अथवा आग्नेयास्त्र का प्रयोग करनेवाले का नाम “अग्नि” है। ज्ञानयोगी विद्वान् को उचित है कि वह युद्धविद्याकुशल कर्मयोगी के साथ स्पर्धा न करता हुआ परस्पर मित्रभाव से कर्मसाध्य यानादिकों को प्राप्त कर अपने दिव्य ज्ञान को यथेष्ट प्रकाशित करे॥२॥तात्पर्य्य यह है कि युद्धविद्याकुशल कर्मयोगी को अग्निरूप वर्णन करके यह कथन किया है कि ऐसे वीर योद्धा के साथ ईर्ष्या, द्वेष अथवा अमर्ष न करें, किन्तु अपनी अस्त्र-शस्त्रादि शक्तियों को बढ़ाकर उक्त योद्धा के गुणों को अपने में धारण करें॥२॥जो ईश्वर विविध पदार्थ दे रहा है, वही स्तवनीय है॥२॥

येषा॑माबा॒ध ऋ॒ग्मिय॑ इ॒षः पृ॒क्षश्च॑ नि॒ग्रभे॑। उ॒प॒विदा॒ वह्नि॑र्विन्दते॒ वसु॑॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि उपर्युक्त कर्मयोगी को जब प्रजाजन उसका देय आप नहीं देते, तब वह बलात् उनके धनों को हर लेता है अर्थात् जब वह यह देखता है कि प्रजाओं में यथोचित व्यवस्था नहीं, तब वह अपनी दण्डरूप शक्ति से दमनीय लोगों को दमन करके समता का शासन फैलाता है, जिससे प्रजाओं को अनेक प्रकार के कष्ट प्राप्त होते हैं, अतएव प्रजाओं को शासक को बलि देना अति आवश्यक है, जिससे किसी प्रकार का विरोध उत्पन्न न हो॥३॥भगवान् उपद्रवकारी पुरुषों से धन छीन लेता और स्तुतिपाठकजन उन्हीं धनों से धनिक होता है अर्थात् साधुजनों का पोषण करता है॥३॥

उद॑स्य शो॒चिर॑स्थाद्दीदि॒युषो॒ व्य१॒॑जर॑म्। तपु॑र्जम्भस्य सु॒द्युतो॑ गण॒श्रियः॑॥

जो प्रजाजन उक्त गुणसम्पन्न योद्धाओं का सत्कार करते हैं, या यों कहो कि देश में वीरपूजा का प्रचार करते हैं, उनके तेजोमय सूर्य्य का कदापि अस्त नहीं होता, किन्तु प्रतिदिन और प्रतिक्षण उनके तेज का प्रभामण्डल सदैव बढ़ता रहता है॥४॥हे मनुष्यों! जिस कारण ईश्वर सर्वत्र विद्यमान है, अतः उससे डरकर शुभकर्म में सदा प्रवृत्त रहो॥४॥

उदु॑ तिष्ठ स्वध्वर॒ स्तवा॑नो दे॒व्या कृ॒पा। अ॒भि॒ख्या भा॒सा बृ॑ह॒ता शु॑शु॒क्वनिः॑॥

हे कर्मयोगिन्! आप सब प्रकार से समर्थ और अस्त्र-शस्त्रादिकों की दीप्ति से देदीप्यमान होने के कारण हमारे यज्ञसदन को अवश्य प्राप्त हों। तात्पर्य्य यह है कि हम लोग ज्ञानयज्ञ, तपोयज्ञ तथा ब्रह्मयज्ञादि अनेकविध यज्ञों के करने में सदैव उद्यत रहें, केवल उद्यत ही नहीं, किन्तु तेजोपुञ्ज के समान उत्तेजित होकर सदैव कटिबद्ध रहें और प्रयत्नपूर्वक अपने कर्तव्य को पूर्ण करें॥५॥स्वध्वर=जिसके लिये अच्छे-२ यज्ञ किये जाएँ, वह स्वध्वर। यद्यपि परमात्मा सदा स्वयं जागृति है, तथापि सेवक अपने लिये ईश्वर को उठाता है अर्थात् अपनी ओर करता है। उसको हृदय में देखता हुआ उपासक सदा कर्म में जागृत रहे॥५॥

अग्ने॑ या॒हि सु॑श॒स्तिभि॑र्ह॒व्या जुह्वा॑न आनु॒षक्। यथा॑ दू॒तो ब॒भूथ॑ हव्य॒वाह॑नः॥

भाव यह है कि संग्रामवेत्ता विद्वान् सम्राट् के दूतसदृश होते हैं, जो प्रजाओं से राजभाग लेते हैं, या यों कहो कि जिस प्रकार शिक्षा, कल्प तथा व्याकरणादि वेद के अङ्ग हैं, इसी प्रकार परा अपरा विद्यावेत्ता विद्वान् सम्राट् के अङ्ग कहलाते हैं, इसलिये सम्राट् को उचित है कि उक्त विद्वान् उत्पन्न करके सुरीति तथा सुनीति का प्रचार करे, ताकि प्रजा में सुव्यवस्था उत्पन्न होकर प्रजागण सदैव धर्मपरायण हों और वे विद्वान् सब प्रजाओं की रक्षा करते हुए राजभाग को ग्रहण करें॥६॥दूत=ईश्वर दूत इसलिये है कि वह अपना सन्देशा हम लोगों के निकट पहुँचाता है और हव्यवाहन इसलिये है कि उसी का यह महान् प्रबन्ध है कि वस्तु एक स्थान से दूसरे स्थान में जाती रहती है॥६॥

अ॒ग्निं वः॑ पू॒र्व्यं हु॑वे॒ होता॑रं चर्षणी॒नाम्। तम॒या वा॒चा गृ॑णे॒ तमु॑ वः स्तुषे॥

हे याज्ञिकजनो! आप लोग युद्धविद्याविशारद विद्वान् को आह्वान कर यज्ञ का आरम्भ करते हैं अर्थात् आप लोग केवल आधिभौतिक हवन ही नहीं करते, किन्तु आधिदैविक तथा आध्यात्मिक यज्ञ भी करते हैं, या यों कहो कि प्रजाजनों में से आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक इन तीनों तापों को मिटाकर अत्यन्त पुरुषार्थरूप अमृत की वृष्टि करते हैं और यज्ञ करने का फल भी यही है, अतएव वेदानुयायी पुरुषों को चाहिये कि उक्त यज्ञों का अनुष्ठान करते हुए स्वयं सुखी हों और प्रजाजनों पर सुख की वृष्टि करें॥७॥विद्वानों को उचित है कि वे सबके कल्याण के लिये ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना करें॥७॥

य॒ज्ञेभि॒रद्भु॑तक्रतुं॒ यं कृ॒पा सू॒दय॑न्त॒ इत्। मि॒त्रं न जने॒ सुधि॑तमृ॒ताव॑नि॥

वह याज्ञिक विद्वान् यज्ञ को जिसका ऋत=सत्य नाम है, इस नाम को सार्थक करके प्रजा को सत्यपरायण तथा सदाचारवर्ती बनाकर इस मनुष्यजन्म के लक्ष्य को सफल करें॥८॥वह सत्यस्वरूप ईश उसी जन पर प्रसन्न होता है, जो सत्यपरायण और कर्मनिष्ठ है॥८॥

ऋ॒तावा॑नमृतायवो य॒ज्ञस्य॒ साध॑नं गि॒रा। उपो॑ एनं जुजुषु॒र्नम॑सस्प॒दे॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि याज्ञिक को उचित है कि अपने यज्ञ को निर्विघ्न पूर्ण किया चाहे तो सबसे प्रथम युद्धकुशल शुरवीर की सत्कारयुक्त वाणी से प्रार्थना करके उसका सम्यक् सेवन करे, जिससे विघातक लोग विघ्न न कर सकें, मन्त्र में “जुजुषुः” क्रिया का कर्ता “ऋतायवः” यह सम्बोधन पद आया है, इससे भूतकालिक “लकार” का भी विध्यर्थ में व्यत्यय कर लेना आवश्यक है और “ऋतायवः” यह पद सम्बोधन है। इस ज्ञान का करानेवाला इसका सर्वनिघात स्वर है, क्योंकि किसी पद से परे सम्बोधन पद को “आमन्त्रितस्य च” इस पाणिनिसूत्र से सर्वनिघात हो जाता है॥९॥जिस हेतु परमात्मा सत्यस्वरूप है, अतः उसके उपासक भी वैसे होवें और जैसे वह परमोदार है, वैसे उपासक भी होवें। इत्यादि शिक्षाएँ इन मन्त्रों से दी जाती हैं॥९॥

अच्छा॑ नो॒ अङ्गि॑रस्तमं य॒ज्ञासो॑ यन्तु सं॒यतः॑। होता॒ यो अस्ति॑ वि॒क्ष्वा य॒शस्त॑मः॥

भाव यह है कि जिस प्रकार प्राण शरीर के सब अङ्गों का संरक्षक होता है, या यों कहो कि सब अङ्गों में सारभूत प्राण ही कहा जाता है, इसी प्रकार यज्ञ की रक्षा करनेवाले वीरपुरुष यज्ञ के प्राणसदृश हैं, अतएव प्रजाजनों को उचित है कि जिस प्रकार योगीजन प्राणविद्या द्वारा प्राणों को वशीभूत करके अभिनिवेशादि पाँच क्लेशों से रहित हो जाते हैं, इसी प्रकार प्राणरूप वीरों की विद्या द्वारा अविद्यादि पाँच क्लेशों से रहित होना प्रजाजनों का मुख्योद्देश्य होना चाहिये, ताकि सुख का अनुभव करते हुए मनुष्यजीवन को उच्च बनावें॥१०॥हमारे सकल शुभकर्म उसके उद्देश्य से ही हों॥१०॥

अग्ने॒ तव॒ त्ये अ॑ज॒रेन्धा॑नासो बृ॒हद्भाः। अश्वा॑ इव॒ वृष॑णस्तविषी॒यवः॑॥

इस मन्त्र में यह वर्णन किया है कि वीरविद्यावेत्ता विद्वान् अग्निसमान देदीप्यमान होकर शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित हुए प्रतिदिन प्रतिपक्षी भटों को ढूँढते हैं अर्थात् परमात्मा आदेश करते हैं कि हे न्यायशील युद्धवेत्ता वीरो! जब तुम अपने लक्ष्य का प्रतिक्षण पालन करोगे, तो तुम ही अपने वेधनरूप प्रतिपक्षी लक्ष्यों के ढूँढ़ने में तत्पर रहोगे और यदि तुम अपनी वीरविद्या का पालन न करोगे, तो तुम्ही अन्य लोगों से अथवा अन्य बधिकों से मृगादिकों के समान ढूँढ़े जाओगे, या यों कहो कि जो पुरुष अपने उद्देश्य को पूर्ण नहीं करता, वह दूसरे के तीक्ष्ण बाणों का लक्ष्य बनता है॥११॥ईश्वर के गुण अनन्त हैं। गुणकीर्तन से वेद का तात्पर्य्य यह है कि उपासक जन भी यथाशक्ति उन गुणों के पात्र बनें। इस स्तुति से ईश्वर को न हर्ष ही और न विस्मय ही होता है॥११॥

स त्वं न॑ ऊर्जां पते र॒यिं रा॑स्व सु॒वीर्य॑म्। प्राव॑ नस्तो॒के तन॑ये स॒मत्स्वा॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि बलों के स्वामी योद्धाओं से सदैव प्रार्थना करनी चाहिये कि वह हमारी सन्तानों तथा ऐश्वर्य्य की रक्षा करें अर्थात् जो क्षात्रधर्मप्रधान क्षत्रियवर्ण है, वही ब्राह्मणादि अन्य वर्णों की रक्षा कर सकता है और अन्य वर्णों का काम केवल विद्या तथा धनादिकों का उपार्जन करना है, युद्ध करना नहीं॥१२॥ईश्वर सर्वप्रद है। उससे जो माँगेंगे, वह प्राप्त तो होगा, परन्तु यदि वह पदार्थ हमारे लिये हानिकारी न हो, अतः शुभकर्म में हम निरन्तर रहें, उसी से हमारा कल्याण है॥१२॥

यद्वा उ॑ वि॒श्पतिः॑ शि॒तः सुप्री॑तो॒ मनु॑षो वि॒शि। विश्वेद॒ग्निः प्रति॒ रक्षां॑सि सेधति॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि जिस देश में अग्निसमान देदीप्यमान योद्धा प्रसन्नचित्त रहते हैं, वहाँ राक्षस दस्युओं का प्रवेश कदापि नहीं हो सकता, अतएव ईश्वर आज्ञा देता है कि हे वैदिक लोगो! तुम रक्षोहण सूक्तों का पाठ करते हुए अपने क्षत्रियवर्ग की पुष्टि में सदैव दत्तचित्त रहो, ताकि राक्षससमुदाय देश में प्रबल न हो॥१३॥हे मनुष्यों! यदि दुर्जनों के दौर्जन्य का विध्वंस करना चाहते हो, तो उस परमदेव को अपने मन में स्थापित करो॥१३॥

श्रु॒ष्ट्य॑ग्ने॒ नव॑स्य मे॒ स्तोम॑स्य वीर विश्पते। नि मा॒यिन॒स्तपु॑षा र॒क्षसो॑ दह॥

इस मन्त्र में यह वर्णन किया है कि ज्ञानयज्ञ, कर्मयज्ञ, उपासनात्मकयज्ञ तथा ऐश्वर्य की वृद्धि करनेवाले विश्वजिदादि याग, इन सब यज्ञों की रक्षा के लिये बाणविद्यावेत्ता योद्धा ही याज्ञिकों को सुरक्षित रखते हैं, अन्य नहीं, इसलिये प्रजाजनों को उचित है कि विघ्नकारक राक्षसों को शीघ्र भस्म करने के लिये क्षात्रधर्म को सुरक्षित रक्खें॥१४॥आन्तरिक दुर्गुण ही महाराक्षस हैं। अपने में परमात्मा की स्थिति के परिज्ञान से प्रतिदिन उनकी क्षीणता होती जाती है। अतः ऐसी प्रार्थना की जाती है॥१४॥

न तस्य॑ मा॒यया॑ च॒न रि॒पुरी॑शीत॒ मर्त्यः॑। यो अ॒ग्नये॑ द॒दाश॑ ह॒व्यदा॑तिभिः॥

जो पुरुष न्यायशील, सत्यपरायण तथा दृढ़व्रतधारी क्षात्रधर्म की रक्षा करते हैं, उन पर कोई मायावी राक्षस अपना प्रभाव नहीं डाल सकता॥१५॥ब्रह्मोपासक जनों को इस लोक में किसी से भय नहीं होता, क्योंकि उनकी शक्ति और प्रभाव पृथ्वी पर फैलकर सबको अपने वश में कर लेते हैं, उनका प्रताप सम्राट् से भी अधिक हो जाता है, परन्तु उपासना करने में मनोयोग की पूर्णता होनी चाहिये॥१५॥

व्य॑श्वस्त्वा वसु॒विद॑मुक्ष॒ण्युर॑प्रीणा॒दृषिः॑। म॒हो रा॒ये तमु॑ त्वा॒ समि॑धीमहि॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि जो पुरुष बलद्वारा प्रजा को सिञ्चन करनेवाले क्षत्रियवर्ग को अपने देश में उत्पन्न कर वृद्धि करते हैं, वे ऐश्वर्य्य तथा धन-धान्यादि सम्पूर्ण पदार्थों से विभूषित होते हैं॥१६॥जिस परमात्मा की स्तुति-प्रार्थना सदा से ऋषिगण करते आए हैं, उसी की पूजा हम भी करें॥१६॥

उ॒शना॑ का॒व्यस्त्वा॒ नि होता॑रमसादयत्। आ॒य॒जिं त्वा॒ मन॑वे जा॒तवे॑दसम्॥

भाव यह है कि जिस देश में उत्क्रान्तिवर्द्धक कवि उत्पन्न होते हैं, उस देश को परमात्मा, जो प्रत्येक प्राणीवर्ग में व्याप्त है, वह अपनी ज्ञानदीप्ति से उनको देदीप्यमान करता है॥१७॥वास्तव में वह ईश ही होता है। वही सर्वधनेश और याजक है॥१७॥

विश्वे॒ हि त्वा॑ स॒जोष॑सो दे॒वासो॑ दू॒तमक्र॑त। श्रु॒ष्टी दे॑व प्रथ॒मो य॒ज्ञियो॑ भुवः॥

इस मन्त्र में यह आदेश किया है कि जिस देश में सम्पूर्ण शासक लोग विद्वान् योद्धाओं को अपना संरक्षक बनाते हैं, वह देश शीघ्र ही उत्क्रान्ति को प्राप्त होता है॥१८॥सकल विद्वान् प्रथम ईश्वर को ही पूजते हैं, अतः इतर जन भी उनका ही अनुकरण करें, यह शिक्षा इससे देते हैं॥१८॥

इ॒मं घा॑ वी॒रो अ॒मृतं॑ दू॒तं कृ॑ण्वीत॒ मर्त्यः॑। पा॒व॒कं कृ॒ष्णव॑र्तनिं॒ विहा॑यसम्॥

इस मन्त्र में यह वर्णन किया है जो विद्वान् योद्धा पाँच क्लेशों में से अभिनिवेश=मृत्यु के त्रास से सर्वथा रहित है अर्थात् जिसको मृत्यु का भय नहीं है, उसी का अपूर्ण कर्म=साहस प्रजाजनों को अपनी ओर खेंचता है, अन्यों का नहीं॥१९॥तात्पर्य्य यह है कि “नाकृत्वा दारुणं कर्म श्रीरुत्पद्यते क्वचित्” इस वाक्यानुसार जो एक बार भी भूकम्प के समान भयानक पापों को कम्पायमान नहीं कर देता, वह श्री=शोभा, लक्ष्मी तथा ऐश्वर्य्य को कदापि प्राप्त नहीं हो सकता, इसलिये न्यायकारी ईश्वरोपासक पुरुषों को उचित है कि उक्त प्रकार के साहसी योद्धाओं को अपना संरक्षक बनावें, ताकि उनके यज्ञों में विघ्न न हों॥१९॥जिस हेतु परमात्मा ही सबका चालक और धारक है, अतः उसी की पूजा प्रार्थना करो, यह उपदेश इससे देते हैं॥१९॥

तं हु॑वेम य॒तस्रु॑चः सु॒भासं॑ शु॒क्रशो॑चिषम्। वि॒शाम॒ग्निम॒जरं॑ प्र॒त्नमीड्य॑म्॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि याज्ञिक पुरुष हाथ में स्रुक् लेकर यज्ञसदन में आये हुए उस दिव्य कान्तिवाले, युवा तथा प्रशंसनीय शूरवीर योद्धा का सत्कार करें॥२०॥हम मनुष्य वेदविहित कर्मों तथा उपासना, दोनों को साथ-२ किया करें॥२–०॥

यो अ॑स्मै ह॒व्यदा॑तिभि॒राहु॑तिं॒ मर्तोऽवि॑धत्। भूरि॒ पोषं॒ स ध॑त्ते वी॒रव॒द्यशः॑॥

भाव यह है कि जो पुरुष उक्त प्रकार के यज्ञ करते, या यों कहो कि यज्ञ में सत्कारार्ह उपर्युक्त विद्वान् योद्धाओं को आह्वान करके उनका सत्कार करते हैं, वे वीर सन्तानों को लाभ करते और विविध प्रकार के ऐश्वर्य्यों से विभूषित होते हैं॥२१॥जो जन नियमपूर्वक अग्निहोत्रादि कर्म करता है, उसको इस लोक में धन, यश, पुत्र और नीरोगिता प्राप्त होती है॥२१॥

प्र॒थ॒मं जा॒तवे॑दसम॒ग्निं य॒ज्ञेषु॑ पू॒र्व्यम्। प्रति॒ स्रुगे॑ति॒ नम॑सा ह॒विष्म॑ती॥

जो सब प्राणियों की रक्षा करता और जो प्रजापालक यज्ञों में सबसे प्रथम उपस्थित होकर यज्ञ का रक्षक होता है, ऐसे शूरपति का अतिथियों के सत्कारार्ह पात्रों द्वारा यज्ञसदन में सब याज्ञिक सत्कार करें॥२२॥तात्पर्य्य यह है कि यज्ञभाग के योग्य देवताओं के प्रति ही यज्ञ के स्तवन तथा स्रुक्=यज्ञपात्र सबसे प्रथम सफल होते हैं अर्थात् यज्ञ के पात्र तथा स्तुतियों का साफल्य तभी होता है, जब योग्य शूरवीर अथवा विद्वानों का यज्ञ में सत्कार=पूजन किया जाता है॥२२॥प्रथम स्रुवा आदि सामग्री एकत्रित करके हवन करे और होम के समय भगवान् का मन से स्मरण करता जाए और जो अभिलाषा हो, उसको भी मन में रक्खे॥२२॥

आभि॑र्विधेमा॒ग्नये॒ ज्येष्ठा॑भिर्व्यश्व॒वत्। मंहि॑ष्ठाभिर्म॒तिभिः॑ शु॒क्रशो॑चिषे॥

उस दिव्य ज्योतिवाले शूरवीर की स्तुतिएँ व्यापक शक्तिसम्पन्न के समान सत्करणीय होती हैं अर्थात् जिस प्रकार विद्युदादि पदार्थ व्यापक शक्तिवाले हैं, इसी प्रकार शूरवीर भी अपनी विस्तृत शक्तियों से बहुव्यापक होता है, जिसका परिचरण करना योग्य है॥२३॥ध्यान के समय इन्द्रियसहित मन को रोक और अन्तःकरण में ही उत्तमोत्तम स्तोत्र पढ़ते हुए उपासक ईश्वर का ध्यान करें॥२३॥

नू॒नम॑र्च॒ विहा॑यसे॒ स्तोमे॑भिः स्थूरयूप॒वत्। ऋषे॑ वैयश्व॒ दम्या॑या॒ग्नये॑॥

इस मन्त्र में यह वर्णन किया है कि यज्ञनिर्माता यजमान का कर्तव्य है कि वह युद्धविद्यावेत्ता वीरों के लिये सुन्दर=सुखदायक तथा युद्धयोग्य गृहों का निर्माण करे, ताकि वे सब प्रकार की बाधाओं से रहित होकर देश को सुरक्षित रखें॥२४॥यहाँ परमात्मा स्वयं आज्ञा देता है कि मेरी अर्चना करो और मुझको विहायस्=महान् व्यापक और दम्य=गृहपति समझो। अर्थात् मुझको परिवार में ही सम्मिलित समझो॥२४॥

अति॑थिं॒ मानु॑षाणां सू॒नुं वन॒स्पती॑नाम्। विप्रा॑ अ॒ग्निमव॑से प्र॒त्नमी॑ळते॥

भाव यह है कि सबसे प्रथम आतिथ्य के योग्य देश तथा धर्म के रक्षक शूर वीर ही होते हैं, इसलिये विद्वानों को उचित है कि ऐसे वीरों का इतिहास ओजस्विनी भाषा में लिखकर उनका स्तवन करें और उनके योग्य पदार्थ अर्पण कर उन्हें सदैव प्रसन्न रखें॥२५॥जब बुद्धिमान् जन भी उसी की पूजा और आराधना करते हैं, तब अन्य जनों को तो वह कर्म अवश्य करना चाहिये, यह शिक्षा इससे देते हैं॥२५॥

म॒हो विश्वाँ॑ अ॒भि ष॒तो॒३॒॑ऽभि ह॒व्यानि॒ मानु॑षा। अग्ने॒ नि ष॑त्सि॒ नम॒साधि॑ ब॒र्हिषि॑॥

उपयुक्त गुणसम्पन्न योद्धाओं को भी उचित है कि वे वैदिक यज्ञ को आस्तिकभाव का कर्म समझकर सब विद्वानों, हव्य पदार्थों तथा यज्ञवेदी के प्रति नम्रतापूर्वक आकर उपस्थित हों॥२६॥परमात्मा यद्यपि सर्वत्र विद्यमान ही है, तथापि मनुष्य अपने स्वभाव के अनुसार प्रार्थना करता है और परमात्मा के सकल गुणों का वर्णन केवल अनुवादमात्र है॥२६॥

वंस्वा॑ नो॒ वार्या॑ पु॒रु वंस्व॑ रा॒यः पु॑रु॒स्पृहः॑। सु॒वीर्य॑स्य प्र॒जाव॑तो॒ यश॑स्वतः॥

उन शूरवीर योद्धाओं को उचित है कि अनेक वरणीय पदार्थ तथा विविध प्रकार का धन, जो उन्होंने अपने अपूर्व बल से दिग्विजय द्वारा उपलब्ध किया है, उसको यज्ञ में आकर समर्पित करें॥२७॥ऐहिक-लौकिक धन वही प्रशस्य है, जो धन सन्तति, पशु, हिरण्य और यश से संयुक्त हो॥२७॥

त्वं व॑रो सु॒षाम्णेऽग्ने॒ जना॑य चोदय। सदा॑ वसो रा॒तिं य॑विष्ठ॒ शश्व॑ते॥

भाव यह है कि वे युवा शूरवीर, जो अपने पराक्रम द्वारा शत्रुओं पर विजय प्राप्त करनेवाले, सौम्यगुणवाले तथा प्रजाजनों के हितकारक हैं, वे यज्ञों में सम्मिलित होकर जनता को युद्धविद्या की ओर प्रेरित करें, ताकि उनसे राक्षसदल सदा भयभीत रहे॥२८॥जौ वैदिक गान में और शुभकर्म में निपुण हों, उन्हें प्रजागण सदा भरण और पोषण करें और वे भी उद्योगी होकर प्रजाओं में अपनी विद्या प्रकाशित किया करें॥२८॥

त्वं हि सु॑प्र॒तूरसि॒ त्वं नो॒ गोम॑ती॒रिषः॑। म॒हो रा॒यः सा॒तिम॑ग्ने॒ अपा॑ वृधि॥

हे शूरवीर विद्वान् योद्धा! आप ही उत्तमोत्तम पदार्थों और गौ तथा अश्वादि धनों के देनेवाले हैं अर्थात् आप ही दिव्यशक्ति और अनन्त प्रकार के ऐश्वर्य से प्रजा को विभूषित करते हैं, अतएव आप हमारे यज्ञों में सदैव योग देकर हमें दानशील बनावें॥२९॥ईश्वर पर विश्वासकर प्रार्थना करे, तब अवश्य ही उसका फल प्राप्त होगा॥२९॥

अग्ने॒ त्वं य॒शा अ॒स्या मि॒त्रावरु॑णा वह। ऋ॒तावा॑ना स॒म्राजा॑ पू॒तद॑क्षसा॥

पूर्वोक्त सूक्तों में “इन्द्र” शब्द को हमने प्रायः वीर योद्धाओं के पक्ष में लगाया है, अनेक लोगों को इस स्थल में यह सन्देह होगा कि “इन्द्र” के अर्थ देवताविशेष तो हो सकते हैं परन्तु “वीर” अर्थ करने में क्या प्रमाण है, इसका उत्तर यह है कि “इन्द्रः सीतान्निगृह्णातु” ऋग्० ४। ५७। ७। यहाँ हल पकड़नेवाले हालिक=हल जोतनेवाले का नाम “इन्द्र” है, “इमां त्वमीन्द्रमीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु” ऋग्० १०। ८६। ३। इस मन्त्र में पति का नाम “इन्द्र” है, “इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते” ऋग्० ६। ४७। १८। इस मन्त्र में सायणाचार्य्य के मत में “इन्द्र”=ईश्वर माया के वशीभूत होकर नाना रूपों को धारण कर लेता है। स्वामी दयानन्द सरस्वती के मत में इस मन्त्र में “इन्द्र”=जीवात्मा अपनी माया=शक्ति से नाना रूपों को धारण कर लेता है। इस प्रकार प्रकरणभेद से स्वयं वेद ही “इन्द्र” शब्द के कई अर्थ करता है। और निरुक्तकार नि० अ० १० खं० ८ में इस प्रकार “इन्द्र” का वर्णन करता है कि “इन्द्रः, इरा दृणातीति वा” “इरां ददातीति वा” “इरां दधातीति वा”=जो अन्न को दे वा धारण करे, अथवा विदीर्ण करे=काटे वा शत्रु के ऐश्वर्य्य का नाश करे, उसको “इन्द्र” कहते हैं। इस प्रकार तेजस्वी शूरवीर का नाम “इन्द्र” है। अस्तु, हम इधर-उधर की निरुक्ति में न पड़कर वेद से ही “इन्द्र” का अर्थ करते हैं। वेद स्वयं “इन्द्र” के यह अर्थ करता है कि जो निम्नलिखित प्रतिज्ञा करे और उसके पालन करने में समर्थ हो, उसको “इन्द्र” कहते हैं। जब कोई यजमान मुझे यज्ञ की रक्षा के लिये बुलाता है, तब मैं अपने अस्त्र-शस्त्रों से दोनों के नाश करनेवाले शत्रुओं के टुकड़े-२ कर डालता हूँ−ऋग्० १०। ४९। ७, यहाँ कोई सहस्र प्रकार से भी अर्थाभास=मिथ्या अर्थ करे, तब भी क्षत्रिय योद्धा से भिन्न इन्द्र के अन्य अर्थ नहीं लगा सकता। वेदों को लघु दृष्टि से देखनेवाले तो यही कहेंगे कि प्राचीन, प्राकृत=जंगली समय में ऐसे क्रूर कर्म किये जाते थे कि द्वेष से शत्रु के टुकड़े-२ किये जाएँ, परन्तु सभ्यता के समय में ऐसा क्रूर कर्म कैसे प्रशंसित कहा जा सकता है ? इसका उत्तर यह है कि ऋग्० १०। ४२। ३। में ईश्वर आज्ञा देता है कि मैंने आर्य्य नाम दस्यु=अनाचारी=अन्यायकारियों के लिये नहीं दिया। हे योद्धाओ! तुम ऐसे अन्यायकारी दस्युओं का रौद्रभावयुक्त कर्मों से नाश करो, जो दोनों को दुःख देते हैं। क्या आज चढ़ती-बढ़ती सभ्यता की इस बीसवीं शताब्दी में विघातक, साहसी, डाकू जो अत्यन्त दारुण कर्म करते हैं, क्या वे गोलियों से नहीं उड़ा दिये जाते ? वा फाँसी नहीं चढ़ा दिये जाते ? वेद तो इससे भी बढ़कर इन्द्र=योद्धा के कृत्य को यहाँ तक वर्णन करता है कि दधिक्रा=शस्त्र को धारण करनेवाला योद्धा अकेला ही सहस्रों प्रतिपक्षियों को मार सकता है। इसका वर्णन ऋग्० ४। ३८। सूक्त में है। ज्ञात होता है कि अग्निबाणादि, जो आर्यों के महाकाव्यों में पाये जाते हैं, उनका उपदेश वेदभगवान् ने भी बलपूर्वक किया था। जब वेद ने स्वयं इन्द्रसूक्तों को क्षात्रधर्मप्रधान वर्णन किया है, तो फिर इन्द्र के अर्थ शूरवीर करने में क्या आपत्ति ? इतना ही नहीं, अपितु,इन्द्रं स्तवानृतमं यस्य मह्ना विबबाधे रोचना विज्मो अन्तान्। आ यः पप्रौ चर्षणीधृद्वरोभिः प्र सिन्धुभ्यो रिरिचानो महित्वा॥ऋग्० १०। ८९। १। इत्यादि मन्त्रों में ईश्वर आज्ञा देता है कि हे याज्ञिक पुरुषो! आप ऐसे इन्द्र की स्तुति करें, जिसका तेज शत्रुओं को तिरस्कृत करता और जो समुद्रादि अगम्य देशों को भी स्वाधीन करके सर्वोपरि होकर विराजमान होता है और ऋग्० १०। ५२। ६। में जिस एक-२ इन्द्र के साथ तीन सहस्र तीन सौ तीस और नौ योद्धा सदा कटिबद्ध रहते हैं, ऐसे इन्द्र=सेनाधीश योद्धा के हाथ में मैं स्वयं वज्र देता हूँ। ऋग्० १०। ५२। इत्यादि अनेक सूक्तों में उसी इन्द्र का वर्णन है, जिसके विषय में हमने उक्त्त सूक्तों को लगाया है। क्या यहाँ कोई कह सकता है कि यह वह इन्द्र है, जिसकी पूजा का निषेध कृष्णजी ने पुराणों में किया है ? वा वह इन्द्र है, जो अप्सराओं का राजा कहा जाता है ? अथवा वह इन्द्र है, जो अहल्या के साथ दुराचार से सहस्रभग हुआ ? कदापि नहीं, जिसका वर्णन हमने किया है, यह वैदिक इन्द्र है, या यों कहो कि यह वह इन्द्र है, जिसके पास अर्जुन वनवास से दुबारा अस्त्र-शस्त्रविद्या सीखने गया था। इसको वेद के अनेक सूक्तों में क्षत्रिय नाम से वर्णन किया है, परन्तु विस्तार के भय से उन सूक्तों का यहाँ उल्लेख नहीं करते। यदि आर्य्यजाति, जो अब हिन्दूजाति के नाम से प्रसिद्ध है, इस वैदिक इन्द्र को अपना देवता मानती, तो इसके धीर-वीरतादि गुणों का कदापि नाश न होता। इसी प्रकार “मित्र” और “वरुण” देवता भी कोई व्यक्तिविशेष देवता न थे, जैसाकि “इन्द्रं मित्रं वरुणं” ऋग्० १। १६४। ४६। इस मन्त्र के अर्थ सायणाचार्य्य ने ईश्वरविषयक किये हैं कि एक ही ईश्वर इन्द्र, मित्र, वरुण इत्यादि अनेक नामों से वर्णन किया जाता है। सायणाचार्य्य के ये अर्थ ऋग्वेद की भूमिका में हैं और फिर इसी मन्त्र के अर्थ ऋग्० १। १६४। ४६। में आदित्य के किये हैं अर्थात् एक ही आदित्य=सूर्य्य इन्द्र, मित्र, वरुण इत्यादि अनेक नामों को धारण कर लेता है। यहाँ हम सायणाचार्य्य को परस्पर विरोध के दोष से दूषित नहीं करते, क्योंकि उन्होंने अपनी बनाई भूमिका में एक ईश्वरवाद के प्रकरण में आध्यात्मिक अर्थ किये हैं और पूर्वोक्त सूक्त में आधिदैविक अर्थ किये हैं अर्थात् दिव्यरूपधारी, जो तेजोमण्डल आदित्य है, वह अपनी दिव्य शक्तियों से सब पदार्थों में स्निग्धता उत्पन्न करता है, इसलिये “मित्र” है। “आदित्याज्जायते वृष्टिः”=आदित्य से वृष्टि होती है, इत्यादि वाक्यों द्वारा आदित्य वृष्टि का कारण होने से वरुण देव भी सूर्य्य ही है। इस प्रकार यह मन्त्र आधिदैविक पक्ष में लगाया गया है। केवल यही नहीं, “चत्वारि शृङ्गा०” ऋग्० ४। ५८। ३। इस मन्त्र के सायणाचार्य्य ने पाँच अर्थ किये हैं, एवंविश्वकर्मा विमना आद्विहाया धाता विधाता परमोत संदृक्। तेषामिष्टानि समिषा मदन्ति यत्रा सप्तऋषीन् पर एकमाहुः॥ऋग्० १०। ८२। २। इस मन्त्र के आधिदैवत पक्ष में यह अर्थ किये हैं कि विश्वकर्मा=बहुत प्रकार से सृष्टि को लाभ पहुँचानेवाला सूर्य्य, विमना=बहुत प्रकार की मननशक्तिरूप इन्द्रियों को धारण करनेवाला, आद्विहाया=सब ओर से महान्, धाता=अपनी आकर्षणशक्ति से अनेक भुवनों को धारण करनेवाला, सप्तऋषीन् परः=सात प्रकार की किरणों से परे है। अध्यात्म पक्ष में सायणाचार्य्य ने ये अर्थ किये हैं कि अनन्तज्ञान होने से ईश्वर विमना=बहुत मनोंवाला है और सप्तऋषि=जो सात इन्द्रिय हैं, उनसे परे=इन्द्रियागोचर है, एक=नानापन के भाव से रहित केवल एक अद्वितीय है। इस प्रकार आध्यात्मिक, आधियाज्ञिक, आधिभौतिक भेद से वेदों के तीन-२ अर्थ हो सकते हैं। इस विषय में हम सायणादि भाष्यकारों पर कोई आक्षेप नहीं करते। इन्हें उपालम्भ इस अंश में देते हैं कि इन्होंने प्रत्यक्षविरुद्ध अलौकिक नानादेववाद मान कर वेदों को दूषित कर दिया है अर्थात् बड़े-२ तेजस्वी तथा ओजस्वी आत्मा जो भूत प्राणी हैं, उनके विषय में वेदों के विनियोग का सर्वथा त्याग कर दिया। यदि कहीं भूलचूक से आधिभौतिक अर्थ किये भी हैं, तो व्यक्तिविशेष मानकर किये हैं कि कोई विश्वामित्र या और कोई वसिष्ठ था, एवं वरुण भी कोई विशेष देवता है, जिसकी पूजा से पुरुष समुद्र में नहीं डूबता, इत्यादि मिथ्या कथाओं की तो भरमार है, पर मित्र का यौगिक अर्थ क्या है ? और वरुण का यौगिक अर्थ क्या है ? और वेद में किस भाव से इनके प्रयोग आते हैं ? इस विषय पर सायणादि भाष्यकारों ने ध्यान नहीं दिया। इस विषय में ऋग्० ८। २३। ३०। मन्त्र की ओर ध्यान दिलाते हुए हम यह बतलाते हैं कि वेद में आधिभौतिक अर्थ किस प्रकार हैं। इस मन्त्र में यह प्रार्थना की गई है कि हे अग्ने! तू मित्र और वरुण देवता को हमारे यज्ञ में प्राप्त कर। यहाँ यह बात मीमांसायोग्य है कि वह मित्र और वरुण कौन हैं ? यदि मित्र के अर्थ सूर्य्य के माने जायें, तो क्या सूर्य्य को अग्नि देवता यज्ञ में बुला सकता है ? कदापि नहीं, फिर ऐसी असंभवता वेद क्यों बतलाता ? हाँ वरुण मेह=वृष्टि का देवता माना जा सकता है, इसलिये यदि आधियाज्ञिक अर्थ किये जायें, तो अर्थ ये होते हैं कि हे यज्ञ के देवता अग्ने! तू वरुण से हमारे यज्ञ को विभूषित कर अर्थात् इस यज्ञ से वृष्टि के देवता द्वारा वृष्टि करा, परन्तु मित्र के अर्थ इस प्रकार आधियाज्ञिक सङ्गत प्रतीत नहीं होते, इसलिये मित्र की सन्निधि से यहाँ वरुण के अर्थ भी आधिभौतिक ही सङ्गत प्रतीत होते हैं, जैसा कि “मेद्यति स्निह्यति इति मित्रम्”=जो सबको सत्य की शिक्षाओं अर्थात् विद्यारूपी स्नेह से सुसिञ्चित करे, ऐसे सद्गुणसम्पन्न अध्यापक का नाम यहाँ “मित्र” है और जिसको “मेदयतेर्वा” इस कथन से निरुक्त भी प्रमाणित करता है और जो अपने सदुपदेशों द्वारा सब आविद्यिक छिद्रों को आच्छादित करे=ढक दे, उसको “वरुण” कहते हैं, “वृणोति आच्छादयति सदुपदेशेन यः स वरुणः”=जो सदुपदेशों द्वारा पूर्ण करे, उसको “वरुण” कहते हैं, ये ही अर्थ निरुक्त में किये हैं। अन्य युक्ति उक्तार्थ की पुष्टि में यह है कि जब मित्र के अर्थ ऋग्० ३। ५९। १। में सायणाचार्य्यादि विश्वामित्र के भी कर लेते हैं अर्थात् विश्वामित्र और मित्र देवता एक हैं, तो फिर आधिभौतिक अर्थ कर लेने में क्या आपत्ति ? क्योंकि व्यक्तिविशेष की अपेक्षा से ऋषिसामान्य अर्थ करना इसलिये सङ्गत प्रतीत होता है कि रामचन्द्र के समकालीन “विश्वामित्र” शब्द को वेद भी नहीं कहता, हाँ गुणवाचक शब्दों का प्रयोग वेद में आता है, जैसा कि, पुरुहूत, पुरन्दर, वाजी, अर्वा इत्यादि शब्द वेद में पाये जाते हैं, एवं मित्र, वरुण शब्द भी योगरूढ नहीं, किन्तु केवल यौगिक हैं अर्थात् व्युत्पन्न हैं, जैसा कि हम पीछे वर्णन कर आये हैं और ऋग्० ३। ५९। ४। में भी मित्र वा गुरु को नमस्कारयोग्य कहा है कि “अयं मित्रो नमस्यः”=इस मित्र को नमस्कार है। वेदार्थ के करने में जो आजकल त्रुटि हो रही है, वह यह है कि “पुरुहूत” के अर्थ अमरकोषादि टीकाकार यही करते हैं कि “पुरुहूतो पुरन्दरः” अमरको० खं० १ स्व० व० ४८=पुरुहूत नाम इन्द्र का है, किसी अन्य देवता का नहीं। यद्यपि बहुतों से यज्ञ में बुलाये जाने के कारण अन्य देवता भी “पुरुहूत” शब्द से कहे जा सकते हैं, परन्तु योगरूढ़ होने से यह शब्द केवल व्यक्तिविशेष इन्द्र को ही कहता है, यह अमरकोषादि कोषकारों का मत है। ऐसा अज्ञान एक दो को नहीं, किन्तु संस्कृत के बड़े-२ धुरन्धर पण्डित भी उक्त अज्ञान में फँसे हुए हैं, इस अज्ञान की निवृत्ति के लिये हम निम्नलिखित ऋग्वेद का मन्त्र प्रमाण देते हैं−होतारं विश्ववेदसं सं हि त्वा विश इन्धते। स आ वह पुरुहूत प्रचेतसोऽग्ने देवाँ इह द्रवत्॥ऋग्० १। ४४। ७। इसका भाव यह है कि मैं उस होता=अग्नि की उपासना करता हूँ, जो सब प्रकार के धनों का स्वामी है और जिसकी सब प्रजाएँ उपासना करती हैं, वह अग्नि हमारे इस यज्ञ में देवताओं को प्राप्त करावे। सायणाचार्य्य ने इस मन्त्र को भौतिकाग्नि के पक्ष में लगाया है। अस्तु, कुछ हो, पर सायणाचार्य्य ने भी “पुरुहूत” नाम यहाँ अग्नि का रखकर अमरकोषादि टीकाकारों की प्रथा को मिटा दिया और केवल यौगिक अर्थ करके पुरुहूत अग्नि को माना कि जो बहुतों से बुलाया वा सत्कार किया जाय, उसका नाम यहाँ “पुरुहूत” है। जिस प्रकार अमरकोषादि टीकाकारों ने मनमाना नाम इन्द्र का पुरुहूत रख दिया, इसी प्रकार वाजी के अर्थ केवल घोड़ा करके ऐसा अज्ञान उत्पन्न कर दिया कि “ये वाजिनं परिपश्यन्ति पक्वम्” ऋग्० १। १६२। १२-१३। इत्यादि मन्त्रों में भाष्यकारों को केवल घोड़ा मारने के अर्थ सूझने लगे, इसलिये सायणादि भाष्यकार इसके यह अर्थ करते हैं कि जो लोग घोड़े को पकता हुआ देखते और उसके मांस की भिक्षा माँगते हैं, उनका अभिगूर्तिः=उद्यम हमको प्राप्त हो। इस अर्थ का एकमात्र कारण अमरकोष का यह पाठ है कि−“वाजिवाहार्वगन्धर्वहयसैन्धवसप्तयः” अमर० खं० २ क्षत्रवर्ग० ८। ४३=वाजी, अर्वा इत्यादि नाम घोड़े के हैं और जब हम वैदिक शब्दों का वर्ताव देखते हैं, तो यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि वाजी, अर्वा यह केवल घोड़े के ही नाम नहीं, किन्तु गुणवाचक होने से घोड़े में भी प्रयुक्त हो सकते हैं, मुख्यतया नहीं, जैसा कि−“रक्षोहणं वाजिनमाजिघर्मि मित्रं प्रथिष्ठमुपयामि शर्म” ऋग्० १०। ८७। १। इत्यादि मन्त्रों में वर्णन किया है कि राक्षसों के हनन करनेवाले वाजिनं=बलवाले अग्नि को मैं घृत से प्रदीप्त करता हूँ। यहाँ सायणाचार्य्य ने वाजिनं के अर्थ बलवाले अग्नि के कैसे कर दिये, क्योंकि अमरकोष में तो वाजी के अर्थ कहीं भी बल, अन्न यश के नहीं आये। यदि कहा जाय कि यहाँ निरुक्त के अनुसार किये हैं तो फिर “ये वाजिनं परिपश्यन्ति पक्वम्” यहाँ विचारे अनाथ घोड़े की हत्या के क्यों किये ? इसी प्रकार ऋग्० ४। ३८। १०। में वाजि और अर्वा ये दोनों नाम दधिक्रा=शस्त्रविशेष के लिये आये हैं कि हे दधिक्रा! आप सूर्य्य के समान चमकीले, वाजि=बलवाले और अर्वा=रणकुशल हैं। जब इस प्रकार वाजि तथा अर्वा नाम तेजस्वी पदार्थों के आये हैं, तो फिर अर्वा से अर्वा घोड़े की हत्या करने के क्या अर्थ ? ऋग्० ४। ३८। १०। मन्त्र में सायणाचार्य्य ने अर्वा के अर्थ रणकुशल के किये हैं, जिससे ये अर्थ ठीक उपलब्ध होते हैं कि जो लोग “अर्वतो मांसभिक्षामुपासते”=युद्धकुशल शत्रु के मांस की भिक्षा माँगते हैं अर्थात् भीम की प्रतिज्ञा के समान दुःशासनरूप शत्रु का वध करते हैं, उनका उद्यम परमात्मा हमको दे॥पूर्वप्रकृत यह था कि मित्र, वरुण कोई व्यक्तिविशेष देवता न थे, किन्तु अत्यन्त स्नेह करनेवाले का नाम “मित्र” और सदुपदेश द्वारा आच्छादन करके सुरक्षित कर देनेवाले का नाम “वरुण” था, जैसाकि हम पूर्व कथन कर आये हैं। अधिक क्या, ऋग्० १०। ८७। १। मन्त्र का प्रमाण जो हमने वाजी के विषय में दिया है कि वाजी नाम तेजस्वी होने से अग्नि का है, इतना ही नहीं इसी मन्त्र में मित्र नाम भी अग्नि का आया है फिर मित्र से देहधारी देवताविशेष कैसे लिया जा सकता है? हमारे कथन से ही क्या, वरुणादिकों को व्यक्तिविशेष माननेवाले सायणादि भाष्यकार भी “इन्द्रं मित्रं वरुणं” ऋग्० १। १६४। ४६। मन्त्र में एक ही परमात्मा के नाम वरुणादि हैं, इस बात को मानते हैं। ऋग्वेद के प्रथम मण्डल की भूमिका में सायणाचार्य्य ने इस बात को माना है और इसी भाव को “यो देवानां नामधा एक एव” ऋग्० १०। ८२। ३। मन्त्र स्पष्टरूप से वर्णन करता है कि सब दिव्य नामों का वाच्य अर्थात् अग्नि आदि तेजस्वी नामों से उसी परमात्मा का वर्णन किया गया है और इस मन्त्र पर सायणाचार्य्य ने भी ऐसा ही भाष्य किया है कि एक परमात्मा ही सब देवों का देव है और उसी ने इस विविध रचनावाले ब्रह्माण्ड को उत्पन्न किया है। हमारे विचार में इसका कारण यह है कि सायणाचार्य्य के समय में हिंसाप्रधान यज्ञों की प्रथा अभिशेष थी अर्थात् बुद्ध महाराज के पश्चात् भी वाममार्ग के प्रवर्तित कराये हुए यज्ञ अभी तक चले आते थे। दूसरा कारण यह भी प्रतीत होता है कि सायणाचार्य्य का समय घोर अत्याचार का था अर्थात् ईसा की चौदहवीं शताब्दी में राजा बुक के दर्बार में सायणाचार्य्य थे। उस समय पश्चिमी म्लेच्छ जातियों का घोर आक्रमण हो रहा था। इसी कारण निरुक्तादि ग्रन्थों के अनुसन्धान तथा वेदों के महत्त्व का समय न था। पौराणिक वायु भी इतस्ततः बलपूर्वक बह रहा था, इसी कारण अर्वा के अर्थ अर्वी घोड़े के ही सूझते थे, क्योंकि उस समय अर्बी घोड़ों की खुरक्षुन्न पृथिवी की धूल नभोमण्डल को व्याप्त कर रही थी। ऐसे समय में यदि शब्दार्थ का विनिमय होकर वेदों का अनर्थ हुआ, तो कौन आश्चर्य्य की बात है। केवल यही नहीं, शतपथ में जो पुरुरवा नाम विद्वान् का था और उर्वशी ब्रह्मविद्या थी, उर्वशी ने पुरुरवा को कहा कि मैं जब तुम्हें नंगा देख लूँगी, फिर तुम्हारे घर में न रहूँगी। तात्पर्य्य यह है कि ब्रह्मविद्या वेदवेत्ता ब्राह्मण के प्रति यह कथन करती है कि यदि तू शील तथा सदाचारादि वस्त्रों से रहित हो जायेगा, तो मैं तुम्हारे समीप न रहूँगी। जब से पुरुरवा व्यक्तिविशेष समझा जाने लगा और उर्वशी स्वरवेश्या समझी जाने लगी, तब से कथा ने अन्य रूप धारण कर लिया। पुरु=बहुत और “रव” शब्द जिसके पास हो, उसका नाम पुरुरवा था। बृहस्पति अर्थात् वाणियों के पति विद्वान् का नाम यहाँ “पुरुरवा” था। इसी प्रकार उर्वशी=ब्रह्मविद्या का नाम था, क्योंकि “उर्वशी” शब्द निरुक्त में ब्रह्मविद्या के नामों में पढ़ा गया है, अन्य प्रमाण यह है कि−अन्तरिक्षप्रां रजसो विमानीमुप शिक्षाम्युर्वशीं वसिष्ठः। उप त्वा रातिः सुकृतस्य तिष्ठान्नि वर्तस्व हृदयं तप्यते मे॥ऋग्० १०। ९५। १७। इत्यादि मन्त्रों के यह अर्थ किये जाने लगे कि उर्वशी की वसिष्ठ इस प्रकार स्तुति करता है कि तू अन्तरिक्ष को भी मापनेवाली अर्थात् अप्सरा होने के कारण उड़ जाती है और रजस=जलों को मापनेवाली अर्थात् कुरुक्षेत्रादिकों के तालाबों में क्रीड़ा करनेवाली है। वसिष्ठ कहता है कि मैं तुझे यह शिक्षा देता हूँ कि तू पुरुरवा नामक राजा को प्राप्त हो और राजा उर्वशी को यह कहता है कि तू मेरी आँखों से परे हट जा, क्योंकि तैने मेरे हृदय को तपा दिया है। यदि वैदिक वा पौराणिक वंशावली देखी जाय तो वसिष्ठ उर्वशी का पुत्र माना गया है, जैसा कि “उर्वश्यां वसिष्ठः” ऋग्० ७। १४। ३=उर्वशी में वसिष्ठ हुआ, यहाँ वास्तव में तात्पर्य्य यह था कि उर्वशी=ब्रह्मविद्या की गोद में पले हुए विशेषगुणसम्पन्न ब्राह्मण का नाम यहाँ वसिष्ठ था और यदि सायणादि भाष्य प्रामाणिक माने जायें, तो वसिष्ठ ने अपनी माता उर्वशी को पुरुरवा राजा के पास भेजने की अनुमति दी, जैसा कि हम उक्त मन्त्र के अर्थों से सिद्ध कर आये हैं। जहाँ पुत्र माताओं को व्यभिचार के भाव से राजाओं के पास भेजने का उपदेश करें, ऐसी कथाओं के कीर्तन से क्या लाभ। वास्तव में बात यह थी कि उक्त मन्त्र जो ऋग्० १०। ९५। १७। का है, इसमें ब्रह्मविद्या का वर्णन है, जैसा कि अन्य आर्षग्रन्थों में भी यह लिखा है कि विद्या आकर ब्राह्मण से बोली कि तू मेरी रक्षा कर। “जो ब्राह्मण=ब्रह्मवेत्ता पुरुष शील तथा सदाचार से ब्रह्मविद्या की रक्षा नहीं करता, उसके पास ब्रह्मविद्या नहीं रहती” यही इस शतपथ की कथा का तात्पर्य्य था, जिसको न समझकर उर्वशी=स्वरवेश्या और पुरुरवा उस पर अनुरक्त समझा गया, जिससे भागवतादि पुराणों में इस कथा ने और भी विशदरूप धारण कर लिया। इसी प्रकार ब्राह्मणग्रन्थों के उत्तम भाव बदलकर पुराणों के कल्पित कथा कथानकों में आगये, जिससे भारतवर्ष के सत्य साहित्य का सर्वथा उलट-पुलट होगया। यहाँ तक कि जब भारत, अर्जुन, कृष्ण इत्यादि नाम वेद में आ जाते हैं, तो लोगों को यह सन्देह हो जाता है कि महाभारतादि ग्रन्थों में जो वर्णन है, वह सब वेद से ही लिया गया है। वास्तव में भाव यह है कि वेद में भरत नाम कर्मयोगियों का था, जो अपने कर्मकाण्ड द्वारा इस विश्व को भरपूर कर देते थे। अर्जुन नाम क्षात्रधर्मप्रधान योद्धा का था एवं कृष्ण नाम आकर्षण करनेवाले का था। ये सब नाम वैदिक होने से महाभारतकालीन पुरुषों के भी रख लिये गये, क्योंकि वेदज्ञ पुरुष वैदिक नामों को ही श्रेष्ठ समझकर रखते थे। यदि निरुक्तादि ग्रन्थों का आलोचन बना रहता, तो यह बात स्पष्ट रीति से ज्ञात रहती कि भरत नाम वेद में याज्ञिक कर्मकाण्डियों का है, क्योंकि वे अपने यज्ञादि कर्मों द्वारा देश को भरपूर कर देते हैं और अब इससे ऐसा विपरीत समय आ गया कि अमरकोषादि कोषों के द्वारा ही शब्दों का शक्तिग्रह होने लगा, जिनमें कृष्ण वा अर्जुन का नाम खोजो तो पाण्डव, अर्जुन वा यादव कृष्ण का ही नाम मिलेगा। इसकी विवेचना इन कोषों में कहीं भी नहीं आती कि वेद में ये नाम किस अभिप्राय से आये थे। ऋग्० १०। २१। ३। में कृष्ण और अर्जुन हवन की श्वेत तथा कृष्ण ज्वालाओं के लिये आये हैं, किसी व्यक्तिविशेष के लिये नहीं, अस्तु−यदि इस प्रकार वेद में प्रयुक्त हुए शब्दों को लेकर अर्थ किये जाएँ, तो लोग कहते हैं कि यह खेंचतान है। हम पूछते हैं कि “सोमः पवते”=जिसके अर्थ पवित्र करना है, उसके अर्थ क्षरति=बहना किये जाते हैं, “वेन” के अर्थ यज्ञ के हैं, परन्तु इसके अर्थ वेन राजा किये जाते हैं, जैसा कि निम्नलिखित सायणभाष्य में वर्णन किया है कि “सोमः पवते०” ऋग्० ९। ९६। ५। इसमें “पवते” के अर्थ “क्षरति” के किये हैं और ऋग्० १०। १५१। ५। में अत्रि तथा कण्व ये दोनों ऋषिविशेष माने हैं। ऋग्० १। १३९। ९। में इसके विरुद्ध “कण्व” के अर्थ बुद्धिमान् और “अत्रि” के अर्थ तीनों प्रकार के दुःखों से रहित किये हैं अर्थात् “अत्रिर्न त्रय इति निरुक्तम्” निरु० ३। १७। इत्यादि निरुक्त के प्रमाण देकर यह सिद्ध किया है कि जिसमें तीनों दुःख न हों, उसका नाम “अत्रि” है, एवं कहीं गुणप्रधान, कहीं व्यक्तिविशेष और कहीं वेन=यज्ञ तथा कहीं वैन्य से वेन राजा का पुत्र लिया है। इसी प्रकार अन्य कई एक लोग “अज” के अर्थ असहयोगी के करते हैं और वे यह भी नहीं देखते कि “योऽजो भागस्तपसा तं तपस्व” ऋग्० १०। १६। ४। इस मन्त्र में जीवात्मा को पूर्ण सहयोगी माना है। इस प्रकार खेंचतान होते हुए भी कोई अपनी दिव्यदृष्टि से काम नहीं लेता, परन्तु जब वेद में यथायोग्य अभ्यास करनेवाला कोई विद्वान् पुरुष वेद में प्रयुक्त अर्थ देखकर सत्यार्थ करता है, तो अल्पश्रुत लोग उसका नाम खेंचतान रख लेते हैं। उदाहरण के लिये देखो मुण्डक० १। ५। जहाँ परा, अपरा विद्या का वर्णन है कि “परा चैवापरा च” यहाँ सब टीकाकारों ने वेद को अपरा=सांसारिक विद्या में रखा है और परा=ब्रह्मविद्या से वेद का सर्वथा बहिष्कार कर दिया है। इसको कोई भी खेंचतान नहीं कहता। यदि वेद का अनुशीलन रहता तो−परो दिवा पर एना पृथिव्या परो देवेभिरसुरैर्यदस्ति। कं स्विद्गर्भं प्रथमं दध्र आपो यत्र देवाः समपश्यन्त विश्वे॥ऋग्० १०। ८२। ५। इत्यादि मन्त्रों पर दृष्टि जाकर यह स्पष्ट रीति से विदित हो जाता कि वास्तव में पराविद्या का भाण्डार एकमात्र वेद ही है। इस मन्त्र का आशय यह है कि वह परब्रह्म द्युलोक, पृथिवीलोक से परे है और उसी ने प्रथम इस विश्वव्यापिनी प्रकृति को अपने गर्भ में धारण किया, जिसमें सब दिव्य लोक-लोकान्तर सङ्गत हैं। उस एक अज=अविनाशी के सहारे ही ये सब लोक-लोकान्तर ठहरे हुए हैं। इसी भाव को “अजस्य नाभावध्येकमर्पितं यस्मिन्विश्वानि भुवनानि तस्थुः” ऋग्० १०। ८३। ६ ने स्पष्ट कर दिया कि सब लोक-लोकान्तरों का सहारा एकमात्र परब्रह्म ही है, जिसकी नाभि में सब लोक-लोकान्तर ओतप्रोत हैं। नाभि के अर्थ भी यहाँ सायणाचार्य्य ने साकार नाभि के नहीं किये अर्थात् “सर्वजगद्बन्धक” शब्द देकर यह अर्थ किये हैं कि जो सम्पूर्ण लोक-लोकान्तरों को अपने शासन में रखनेवाली शक्ति है, उसका नाम यहाँ “नाभि” है। जब इस स्थल में “पर” नाम सर्वोपरि होने से परब्रह्म का है, फिर वेदों में पराविद्या कैसे नहीं, क्योंकि परा इसी “पर” शब्द से बनता है अर्थात् स्त्रीलिङ्ग होने से उसमें टाप् प्रत्यय हो जाता है। इस प्रकार जो पराविद्या का एकमात्र भाण्डार वेद था, उसका अध्ययनाध्यापन जब आर्य्यजाति ने छोड़ दिया, तो उसको वेदकथा कहानियों की पुस्तक वा प्राकृत लोगों के गीत भान होने लगी। ऐसे अन्धकार के समय में सत्यासत्यार्थ के विवेक की क्या कथा। इसी अन्धकार से निकालने के लिये हम प्रतिपक्षी भाष्यकारों के भाष्यों की प्रतीकें देकर प्रतिबन्दी उत्तरों द्वारा वेदभाष्य को विशद करते हैं, ताकि वेदानुयायी पुरुष स्वाध्यायरूप तपोबल से पुनः वेदार्थ पर आरूढ़ हों॥३०॥यह तेईसवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥अन्त में ब्राह्मण और क्षत्रिय जाति की रक्षा के लिये प्रार्थना करके इस सूक्त की समाप्ति करते हैं॥३०॥

सखा॑य॒ आ शि॑षामहि॒ ब्रह्मेन्द्रा॑य व॒ज्रिणे॑। स्तु॒ष ऊ॒ षु वो॒ नृत॑माय धृ॒ष्णवे॑॥

हम सब ही मिलकर उसके गुणों का अध्ययन करें, जिससे मानवजन्म सफल हो॥१॥

शव॑सा॒ ह्यसि॑ श्रु॒तो वृ॑त्र॒हत्ये॑न वृत्र॒हा। म॒घैर्म॒घोनो॒ अति॑ शूर दाशसि॥

इससे दो बातें दिखलाई गई हैं, एक परमात्मा सर्वविघ्नविनाशक है और दूसरा वह परम दानी है॥२॥

स नः॒ स्तवा॑न॒ आ भ॑र र॒यिं चि॒त्रश्र॑वस्तमम्। नि॒रे॒के चि॒द्यो ह॑रिवो॒ वसु॑र्द॒दिः॥

विविध सम्पत्तियों की प्राप्ति के लिये वही प्रार्थनीय है॥३॥

आ नि॑रे॒कमु॒त प्रि॒यमिन्द्र॒ दर्षि॒ जना॑नाम्। धृ॒ष॒ता धृ॑ष्णो॒ स्तव॑मान॒ आ भ॑र॥

इस जगत् में सर्व वस्तु ही प्रिय हैं, तथापि कतिपय वस्तुओं को कतिपय प्राणी पसन्द नहीं करते। विष, सर्प, वृश्चिक, विद्युदादि पदार्थ भी किसी विशेष उपयोग के लिये हैं। इस जगत् को नानाद्रव्यों से ईश्वर प्रतिक्षण भूषित कर रहा है, अतः वही स्तवनीय है॥४॥

न ते॑ स॒व्यं न दक्षि॑णं॒ हस्तं॑ वरन्त आ॒मुरः॑। न प॑रि॒बाधो॑ हरिवो॒ गवि॑ष्टिषु॥

वह सर्वोपरि है, इसमें कहना ही क्या, उसी के अधीन यह विश्व है, अतः वही उपास्य है॥५॥

आ त्वा॒ गोभि॑रिव व्र॒जं गी॒र्भिॠ॑णोम्यद्रिवः। आ स्मा॒ कामं॑ जरि॒तुरा मनः॑ पृण॥

मन की गति और चेष्टा अनन्त है, अतः इसको भी वही पूर्ण कर सकता है॥६॥

विश्वा॑नि वि॒श्वम॑नसो धि॒या नो॑ वृत्रहन्तम। उग्र॑ प्रणेत॒रधि॒ षू व॑सो गहि॥

यदि हम अन्यों के कल्याण करने में मन लगावें, तो अवश्य हमारा मन पवित्र होगा॥७॥

व॒यं ते॑ अ॒स्य वृ॑त्रहन्वि॒द्याम॑ शूर॒ नव्य॑सः। वसोः॑ स्पा॒र्हस्य॑ पुरुहूत॒ राध॑सः॥

वही धन उपार्जनीय है, जो सर्वप्रिय और हितकारी हो॥८॥

इन्द्र॒ यथा॒ ह्यस्ति॒ तेऽप॑रीतं नृतो॒ शवः॑। अमृ॑क्ता रा॒तिः पु॑रुहूत दा॒शुषे॑॥

उसका बल और दान दोनों अविनश्वर हैं॥९॥

आ वृ॑षस्व महामह म॒हे नृ॑तम॒ राध॑से। दृ॒ळ्हश्चि॑द्दृह्य मघवन्म॒घत्त॑ये॥

परमात्मा सर्वधनसम्पन्न है और न्यायकर्त्ता है, अतः अन्यायी पुरुषों के धनों को वह छीन लेता है॥१०॥

नू अ॒न्यत्रा॑ चिदद्रिव॒स्त्वन्नो॑ जग्मुरा॒शसः॑। मघ॑वञ्छ॒ग्धि तव॒ तन्न॑ ऊ॒तिभिः॑॥

वही हमको सर्व कार्य में समर्थ कर सकता है, यदि मन से उसकी स्तुति करें॥११॥

न॒ह्य१॒॑ङ्ग नृ॑तो॒ त्वद॒न्यं वि॒न्दामि॒ राध॑से। रा॒ये द्यु॒म्नाय॒ शव॑से च गिर्वणः॥

सामर्थ्य, धन और यश भी उसी से प्राप्त हो सकता है, अतः वही प्रार्थनीय है॥१२॥

एन्दु॒मिन्द्रा॑य सिञ्चत॒ पिबा॑ति सो॒म्यं मधु॑। प्र राध॑सा चोदयाते महित्व॒ना॥

वही हमको उन्नति की ओर भी ले जाता है, अतः प्रेम और श्रद्धा से वही सेव्य है॥१३॥

उपो॒ हरी॑णां॒ पतिं॒ दक्षं॑ पृ॒ञ्चन्त॑मब्रवम्। नू॒नं श्रु॑धि स्तुव॒तो अ॒श्व्यस्य॑॥

जो ईश्वरसम्बन्धी काव्यों को बनाते और उसके तत्त्वों को समझते हैं, वे ही यहाँ ऋषि कहाते हैं। वे जितेन्द्रिय होने के कारण अश्व्य कहाते हैं॥१४॥

न॒ह्य१॒॑ङ्ग पु॒रा च॒न ज॒ज्ञे वी॒रत॑र॒स्त्वत्। नकी॑ रा॒या नैवथा॒ न भ॒न्दना॑॥

वही सर्वगुणसम्पन्न होने के कारण परमपूज्य है॥१५॥

एदु॒ मध्वो॑ म॒दिन्त॑रं सि॒ञ्च वा॑ध्वर्यो॒ अन्ध॑सः। ए॒वा हि वी॒रः स्तव॑ते स॒दावृ॑धः॥

जो तुम शुभ काम करो, वह ईश्वर की प्रीति के लिये ही हो॥१६॥

इन्द्र॑ स्थातर्हरीणां॒ नकि॑ष्टे पू॒र्व्यस्तु॑तिम्। उदा॑नंश॒ शव॑सा॒ न भ॒न्दना॑॥

ईश्वर अनन्त शक्तिशाली है। उसी की स्तुति सब करते हैं, अतः हम भी उसी को पूजें॥१७॥

तं वो॒ वाजा॑नां॒ पति॒महू॑महि श्रव॒स्यवः॑। अप्रा॑युभिर्य॒ज्ञेभि॑र्वावृ॒धेन्य॑म्॥

उसी को चारों तरफ पूज रहे हैं, विद्वान् या मूर्ख, यज्ञों के द्वारा उसी का महत्त्व दिखला रहे हैं॥१८॥

एतो॒ न्विन्द्रं॒ स्तवा॑म॒ सखा॑यः॒ स्तोम्यं॒ नर॑म्। कृ॒ष्टीर्यो विश्वा॑ अ॒भ्यस्त्येक॒ इत्॥

जिस कारण वही स्तुतियोग्य है और हमारे विघ्नों को भी दूर किया करता है, अतः वही सेव्य है॥१९॥

अगो॑रुधाय ग॒विषे॑ द्यु॒क्षाय॒ दस्म्यं॒ वचः॑। घृ॒तात्स्वादी॑यो॒ मधु॑नश्च वोचत॥

उत्तमोत्तम स्तोत्र रचकर उसकी स्तुतियों का जाप करे॥२०॥

यस्यामि॑तानि वी॒र्या॒३॒॑ न राधः॒ पर्ये॑तवे। ज्योति॒र्न विश्व॑म॒भ्यस्ति॒ दक्षि॑णा॥

जिसके बल, वीर्य्य और दान अनन्त हैं, वही मनुष्य-जाति के उपास्य इष्टदेव हैं॥२१॥

स्तु॒हीन्द्रं॑ व्यश्व॒वदनू॑र्मिं वा॒जिनं॒ यम॑म्। अ॒र्यो गयं॒ मंह॑मानं॒ वि दा॒शुषे॑॥

जो हमको सकल भोग पदार्थ दे रहा है, उसी की स्तुति करो॥२२॥

ए॒वा नू॒नमुप॑ स्तुहि॒ वैय॑श्व दश॒मं नव॑म्। सुवि॑द्वांसं च॒र्कृत्यं॑ च॒रणी॑नाम्॥

वही सबका पूज्य और स्तुत्य है॥२३॥

वेत्था॒ हि निॠ॑तीनां॒ वज्र॑हस्त परि॒वृज॑म्। अह॑रहः शु॒न्ध्युः प॑रि॒पदा॑मिव॥

वह सर्वज्ञ है, अतः हम जीव उससे कुछ गुप्त नहीं रख सकते, इस हेतु इसको जान पाप से निवृत्त रहें॥२४॥

तदि॒न्द्राव॒ आ भ॑र॒ येना॑ दंसिष्ठ॒ कृत्व॑ने। द्वि॒ता कुत्सा॑य शिश्नथो॒ नि चो॑दय॥

जैसे ईश्वर समदृष्टि है, वैसे यथासम्भव हम भी होवें॥२५॥

तमु॑ त्वा नू॒नमी॑महे॒ नव्यं॑ दंसिष्ठ॒ सन्य॑से। स त्वं नो॒ विश्वा॑ अ॒भिमा॑तीः स॒क्षणिः॑॥

“संन्यसे” इसका तात्पर्य यह है कि हम जो कुछ प्राप्त करें, उसमें से अपने योग्य रख करके अन्य सब दान कर दिया जाए और काम क्रोधादि जो महाशत्रु हैं, उनको भी जीतने के लिये सदा प्रयत्न करता रहे॥२६॥

य ऋक्षा॒दंह॑सो मु॒चद्यो वार्या॑त्स॒प्त सिन्धु॑षु। वध॑र्दा॒सस्य॑ तुविनृम्ण नीनमः॥

हमारे जो समय-२ पर विघ्न उत्पन्न होते हैं, उनके विनाश के लिये भी वही प्रार्थनीय है॥२७॥

यथा॑ वरो सु॒षाम्णे॑ स॒निभ्य॒ आव॑हो र॒यिम्। व्य॑श्वेभ्यः सुभगे वाजिनीवति॥

जैसे परमात्मा इस संसार पर कृपा रखता है, तद्वत् सब ही परस्पर रक्खें और अपनी-२ इन्द्रियों को भी अपने-२ वश में कर उसकी ओर लगावें, तब ही मनुष्य ऋषि और महाकवि आदि होता है॥२८॥

आ ना॒र्यस्य॒ दक्षि॑णा॒ व्य॑श्वाँ एतु सो॒मिनः॑। स्थू॒रं च॒ राधः॑ श॒तव॑त्स॒हस्र॑वत्॥

जो पदार्थतत्त्वविद् हों, उनका साहाय्य करना सबका धर्म होना चाहिये, जिससे वे सुखी रहकर नाना विद्याएँ प्रकाशित कर देश की शोभा बढ़ा सकें॥२९॥

यत्त्वा॑ पृ॒च्छादी॑जा॒नः कु॑ह॒या कु॑हयाकृते। ए॒षो अप॑श्रितो व॒लो गो॑म॒तीमव॑ तिष्ठति॥

यज्ञों के फलों में सन्देह नहीं करना चाहिये, यह इससे दिखलाते हैं। जो शुभकर्म करते हैं, वे अच्छे फल पाते हैं॥३०॥

ता वां॒ विश्व॑स्य गो॒पा दे॒वा दे॒वेषु॑ य॒ज्ञिया॑। ऋ॒तावा॑ना यजसे पू॒तद॑क्षसा॥

जो जगत् के जितने अधिक लाभकारी हों, वे उतने ही पूजायोग्य हैं। जो ईश्वरीय नियमों को सदा देश में फैलाते हैं और प्रकृति का अध्ययन करते रहते हैं, सत्यपथ से कदापि पृथक् नहीं होते, इत्यादि विविधगुणयुक्त पुरुष का नाम ब्राह्मण है। प्रजापालन में तत्पर और सत्यादि सर्वगुणसम्पन्न पुरुष का नाम क्षत्रिय है। वैसे महापुरुष निःसन्देह पूज्य, मान्य और अभिनन्दनीय हैं। यही विषय इस सूक्त में दिखलावेंगे॥१॥

मि॒त्रा तना॒ न र॒थ्या॒३॒॑ वरु॑णो॒ यश्च॑ सु॒क्रतुः॑। स॒नात्सु॑जा॒ता तन॑या धृ॒तव्र॑ता॥

परोपकार करना अति कठिन कार्य्य है, अतः यहाँ इन दोनों के विशेषण में मित्र, सुक्रतु और सुजात आदि पद आए हैं॥२॥

ता मा॒ता वि॒श्ववे॑दसासु॒र्या॑य॒ प्रम॑हसा। म॒ही ज॑जा॒नादि॑तिॠ॒ताव॑री॥

जो संसार में विख्यात और विद्वान् हों, वैसे कोटियों में दो चार होते हैं। किन्तु प्रारम्भ से यदि बालक-बालिका सुशिक्षित हों, तो वे वैसे हो सकते हैं॥३॥

म॒हान्ता॑ मि॒त्रावरु॑णा स॒म्राजा॑ दे॒वावसु॑रा। ऋ॒तावा॑नावृ॒तमा घो॑षतो बृ॒हत्॥

वे सदा ईश्वरीय नियमों को देश-२ में फैलाया करें॥४॥

नपा॑ता॒ शव॑सो म॒हः सू॒नू दक्ष॑स्य सु॒क्रतू॑। सृ॒प्रदा॑नू इ॒षो वास्त्वधि॑ क्षितः॥

वे दोनों सब प्रकार के धनों के स्वामी हों और जगत् में बल वीर्य सत्यता आदि गुणों को बढ़ाया करें॥५॥

सं या दानू॑नि ये॒मथु॑र्दि॒व्याः पार्थि॑वी॒रिषः॑। नभ॑स्वती॒रा वां॑ चरन्तु वृ॒ष्टयः॑॥

मनुष्य के सुख के लिये जिन-२ वस्तुओं की आवश्यकता हो, वे सब ही संग्रहणीय हैं॥६॥

अधि॒ या बृ॑ह॒तो दि॒वो॒३॒॑ऽभि यू॒थेव॒ पश्य॑तः। ऋ॒तावा॑ना स॒म्राजा॒ नम॑से हि॒ता॥

जिस कारण मित्र और वरुण दोनों महाप्रतिनिधि हैं, इसलिये वे उच्च और उत्तम सिंहासन के ऊपर बैठते हैं और अन्यान्य सिंहासन के नीचे बैठते हैं, इसलिये मन्त्र में कहा गया है कि वे दोनों ऊपर से झुण्ड के झुण्ड अपने सामने विद्वानों को देखते हैं॥७॥

ऋ॒तावा॑ना॒ नि षे॑दतुः॒ साम्रा॑ज्याय सु॒क्रतू॑। धृ॒तव्र॑ता क्ष॒त्रिया॑ क्ष॒त्रमा॑शतुः॥

पूर्वोक्त गुणसंयुक्त ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों राज्य कार्य्य के लिये चुने जायँ, तब वे इस कार्य को महाव्रत समझ सदा प्रजाहित में आसक्त रहें॥८॥

अ॒क्ष्णश्चि॑द्गातु॒वित्त॑रानुल्ब॒णेन॒ चक्ष॑सा। नि चि॑न्मि॒षन्ता॑ निचि॒रा नि चि॑क्यतुः॥

वे दोनों सब वस्तु में बड़े ही तीक्ष्ण हों। शीघ्र मानवगति के परिचायक हों और प्रसन्न नयन से प्रजाओं को देखें॥९॥

उ॒त नो॑ दे॒व्यदि॑तिरुरु॒ष्यतां॒ नास॑त्या। उ॒रु॒ष्यन्तु॑ म॒रुतो॑ वृ॒द्धश॑वसः॥

प्रजारक्षा ही परमधर्म है, दण्ड के भय से ही शान्ति रहती है, अतः यथाशक्ति सब ही श्रेष्ठ पुरुष और स्त्रियाँ इस कार्य्य में दत्तचित्त और सावधान रहें॥१०॥

ते नो॑ ना॒वमु॑रुष्यत॒ दिवा॒ नक्तं॑ सुदानवः। अरि॑ष्यन्तो॒ नि पा॒युभिः॑ सचेमहि॥

जो राज्य की रक्षा में नियुक्त हों, वे सचिन्त होकर सब पदार्थों के ऊपर ध्यान रक्खें, जिससे प्रजाएँ सुखी रहें॥११॥

अघ्न॑ते॒ विष्ण॑वे व॒यमरि॑ष्यन्तः सु॒दान॑वे। श्रु॒धि स्व॑यावन्त्सिन्धो पू॒र्वचि॑त्तये॥

प्रजागण जिन-२ उपायों से निरुपद्रव हों, वे-२ अवश्य कर्त्तव्य हैं और स्वस्थ अबाधित प्रजाएँ भी रक्षकों को प्रसन्न रक्खें॥१२॥

तद्वार्यं॑ वृणीमहे॒ वरि॑ष्ठं गोप॒यत्य॑म्। मि॒त्रो यत्पान्ति॒ वरु॑णो॒ यद॑र्य॒मा॥

जिससे अपना और दूसरों का उपकार और हित हो, वह धन उपार्जनीय है॥१३॥

उ॒त नः॒ सिन्धु॑र॒पां तन्म॒रुत॒स्तद॒श्विना॑। इन्द्रो॒ विष्णु॑र्मी॒ढ्वांसः॑ स॒जोष॑सः॥

चेतन और अचेतन दोनों से जगत् का निर्वाह हो रहा है, अतः इन दोनों से बुद्धिमान् लाभ उठावें॥१४॥

ते हि ष्मा॑ व॒नुषो॒ नरो॒ऽभिमा॑तिं॒ कय॑स्य चित्। ति॒ग्मं न क्षोदः॑ प्रति॒घ्नन्ति॒ भूर्ण॑यः॥

कार्य में नियुक्त मित्रादि निरालस होकर प्रजा के विघ्नों को दूर किया करें॥१५॥

अ॒यमेक॑ इ॒त्था पु॒रूरु च॑ष्टे॒ वि वि॒श्पतिः॑। तस्य॑ व्र॒तान्यनु॑ वश्चरामसि॥

राज्य की ओर से स्थापित नियमों को सब ही एकमत होकर पालें और पलवावें॥१६॥

अनु॒ पूर्वा॑ण्यो॒क्या॑ साम्रा॒ज्यस्य॑ सश्चिम। मि॒त्रस्य॑ व्र॒ता वरु॑णस्य दीर्घ॒श्रुत्॥

राज्यप्रतिनिधियों से स्थापित जो नियम और उपाय हैं, उनका प्रतिपालन करना सबको उचित है॥१७॥

परि॒ यो र॒श्मिना॑ दि॒वोऽन्ता॑न्म॒मे पृ॑थि॒व्याः। उ॒भे आ प॑प्रौ॒ रोद॑सी महि॒त्वा॥

वही ब्राह्मण है, जो निज विज्ञान से संसार का परोपकार कर रहा है॥१८॥

उदु॒ ष्य श॑र॒णे दि॒वो ज्योति॑रयंस्त॒ सूर्यः॑। अ॒ग्निर्न शु॒क्रः स॑मिधा॒न आहु॑तः॥

जो सदा सत्यादि व्रत पालते हुए ज्ञानोपार्जन और परोपकार में ही लगे रहते हैं, वे ब्राह्मण हैं॥१९॥

वचो॑ दी॒र्घप्र॑सद्म॒नीशे॒ वाज॑स्य॒ गोम॑तः। ईशे॒ हि पि॒त्वो॑ऽवि॒षस्य॑ दा॒वने॑॥

जो सर्व प्रकार के धनों के स्वामी हों, वे ही ब्राह्मणपदवाच्य हैं॥२०॥

तत्सूर्यं॒ रोद॑सी उ॒भे दो॒षा वस्तो॒रुप॑ ब्रुवे। भो॒जेष्व॒स्माँ अ॒भ्युच्च॑रा॒ सदा॑॥

हम लोग तब ही धनों के अधिकारी हो सकते हैं, जब राज्यप्रचालित और ईश्वरीय नियमों को अच्छे प्रकार मानें॥२१॥

ऋ॒ज्रमु॑क्ष॒ण्याय॑ने रज॒तं हर॑याणे। रथं॑ यु॒क्तम॑सनाम सु॒षाम॑णि॥

उपासक को कभी अवश्य फल प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं अतः ईश्वरभक्त को धैर्य और विश्वास रखना चाहिये॥२२॥

ता मे॒ अश्व्या॑नां॒ हरी॑णां नि॒तोश॑ना। उ॒तो नु कृत्व्या॑नां नृ॒वाह॑सा॥

हमारे इन्द्रियगण उसकी कृपा से विषयविमुख हों और सदा मनुष्यों में सुखवाहक हों॥२३॥

स्मद॑भीशू॒ कशा॑वन्ता॒ विप्रा॒ नवि॑ष्ठया म॒ती। म॒हो वा॒जिना॒वर्व॑न्ता॒ सचा॑सनम्॥

कर्मेन्द्रिय और ज्ञानन्द्रिय दोनों को शुद्ध कर्मकुशल, विवेकयुक्त और धीर बनावे॥२४॥

यु॒वोरु॒ षू रथं॑ हुवे स॒धस्तु॑त्याय सू॒रिषु॑। अतू॑र्तदक्षा वृषणा वृषण्वसू॥

पूर्व में भी कह आये हैं कि राजा और मन्त्रिदल का नाम “अश्वी” है। प्रजाओं को उचित है कि बड़ी-२ सभाओं में मन्त्रिदलसहित राजा को बुलाकर सत्कार करें। यहाँ रथ के बुलाने से राजा के बुलाने का तात्पर्य्य है। जो राजदल प्रजाओं में सदा अपनी उदारता प्रकट करते हों, वे आदरणीय हैं॥१॥

यु॒वं व॑रो सु॒षाम्णे॑ म॒हे तने॑ नासत्या। अवो॑भिर्याथो वृषणा वृषण्वसू॥

राजा को उचित है कि अच्छे पुरुषों की रक्षा करे और देश में भ्रमण कर उनकी दशाओं से परिचित हो यथायोग्य प्रबन्ध करे॥२॥

ता वा॑म॒द्य ह॑वामहे ह॒व्येभि॑र्वाजिनीवसू। पू॒र्वीरि॒ष इ॒षय॑न्ता॒वति॑ क्ष॒पः॥

राजा को उचित है कि प्रजा के हित के लिये बहुत सा धन एकत्रित कर रक्खें॥३॥

आ वां॒ वाहि॑ष्ठो अश्विना॒ रथो॑ यातु श्रु॒तो न॑रा। उप॒ स्तोमा॑न्तु॒रस्य॑ दर्शथः श्रि॒ये॥

रथ शब्द यहाँ उपलक्षण है अर्थात् प्रजाओं में जहाँ-२ भोज्य पदार्थों की न्यूनता हो, वहाँ-२ राजदल रथ, अश्व, उष्ट्र आदिकों के द्वारा अन्न पहुँचाया करें॥४॥

जु॒हु॒रा॒णा चि॑दश्वि॒ना म॑न्येथां वृषण्वसू। यु॒वं हि रु॑द्रा॒ पर्ष॑थो॒ अति॒ द्विषः॑॥

राष्ट्रकर्मचारियों को उचित है कि परस्पर द्वेष, हिंसा आदि अवगुण को दूर करें। और उपद्रवकारी जनों को यथाविधि दण्ड देकर सुमार्ग में लावें॥५॥

द॒स्रा हि विश्व॑मानु॒षङ्म॒क्षूभिः॑ परि॒दीय॑थः। धि॒यं॒जि॒न्वा मधु॑वर्णा शु॒भस्पती॑॥

राज्य में जिन उपायों से बुद्धि, शुभकर्म, विद्या, धन और व्यवसाय आदिकों की वृद्धि हो, वे अवश्य करवाये जाएँ॥६॥

उप॑ नो यातमश्विना रा॒या वि॑श्व॒पुषा॑ स॒ह। म॒घवा॑ना सु॒वीरा॒वन॑पच्युता॥

जिस हेतु राष्ट्र के हितसाधन के लिये राजा के निकट सर्वसाधन उपस्थित रहते हैं, अतः राजदल को सदा प्रजा के अभ्युदय के लिये प्रयत्न करना उचित है॥७॥

आ मे॑ अ॒स्य प्र॑ती॒व्य१॒॑मिन्द्र॑नासत्या गतम्। दे॒वा दे॒वेभि॑र॒द्य स॒चन॑स्तमा॥

अपने शुभ कर्म में अच्छे-२ पुरुषों को बुलाकर सत्कार करे॥८॥

व॒यं हि वां॒ हवा॑मह उक्ष॒ण्यन्तो॑ व्यश्व॒वत्। सु॒म॒तिभि॒रुप॑ विप्रावि॒हा ग॑तम्॥

प्रजागण राजदल के साथ प्रेम और विश्वास करें और राजदल प्रजाओं के हित में सदा लगे रहें॥

अ॒श्विना॒ स्वृ॑षे स्तुहि कु॒वित्ते॒ श्रव॑तो॒ हव॑म्। नेदी॑यसः कूळयातः प॒णीँरु॒त॥

कूलयातः−“कुडि दाहे”। दाहार्थक कुण्ड धातु से बनता है। पणि=जिसका व्यवहार अच्छा नहीं। वाणिज्य आदि व्यवहार में कुटिल पुरुषों को दण्ड देना भी राज्य का काम है॥१०॥

वै॒य॒श्वस्य॑ श्रुतं नरो॒तो मे॑ अ॒स्य वे॑दथः। स॒जोष॑सा॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा॥

प्रजागण अपनी इच्छा स्वतन्त्रता से सब प्रतिनिधियों के समक्ष सुनावें। प्रतिनिधि दल उस पर यथोचित कार्य्य करें॥११॥

यु॒वाद॑त्तस्य धिष्ण्या यु॒वानी॑तस्य सू॒रिभिः॑। अह॑रहर्वृषण॒ मह्यं॑ शिक्षतम्॥

राज्य की ओर से जो धन विद्वद्वर्ग में वितीर्ण किये जाएँ, वे इतर जातियों में भी बाँटे जाएँ॥१२॥

यो वां॑ य॒ज्ञेभि॒रावृ॒तोऽधि॑वस्त्रा व॒धूरि॑व। स॒प॒र्यन्ता॑ शु॒भे च॑क्राते अ॒श्विना॑॥

राजसभा से प्रचालित नियमों को सब मानें और जो कोई उनके प्रचार में साहाय्य दान करें, वे परितोषणीय हैं॥१३॥

यो वा॑मुरु॒व्यच॑स्तमं॒ चिके॑तति नृ॒पाय्य॑म्। व॒र्तिर॑श्विना॒ परि॑ यातमस्म॒यू॥

जो कवि और विद्वान् आदि काव्य और शास्त्र रचें, वे राज्य की ओर से पूजनीय और पोषणीय हैं॥१४॥

अ॒स्मभ्यं॒ सु वृ॑षण्वसू या॒तं व॒र्तिर्नृ॒पाय्य॑म्। वि॒षु॒द्रुहे॑व य॒ज्ञमू॑हथुर्गि॒रा॥

राजवर्ग को उचित है कि प्रजाओं के कल्याणार्थ सदा चेष्टा करें, उनके साधनों में आलस्य न करें, क्योंकि राजवर्ग प्रजाओं की रक्षा के लिये ही नियुक्त किये गये हैं॥१५॥

वाहि॑ष्ठो वां॒ हवा॑नां॒ स्तोमो॑ दू॒तो हु॑वन्नरा। यु॒वाभ्यां॑ भूत्वश्विना॥

हमारे समस्त काम राज्यप्रियसाधक हों॥१६॥

यद॒दो दि॒वो अ॑र्ण॒व इ॒षो वा॒ मद॑थो गृ॒हे। श्रु॒तमिन्मे॑ अमर्त्या॥

राजा निज काम त्याग प्रजाओं के काम में सदा तत्पर रहे हैं॥१७॥

उ॒त स्या श्वे॑त॒याव॑री॒ वाहि॑ष्ठा वां न॒दीना॑म्। सिन्धु॒र्हिर॑ण्यवर्तनिः॥

गुणवान् शीलवान् राजा की प्रशंसा सब करें करावें॥१८॥

स्मदे॒तया॑ सुकी॒र्त्याश्वि॑ना श्वे॒तया॑ धि॒या। वहे॑थे शुभ्रयावाना॥

जो शुभ कीर्तियों से युक्त हों, जिनकी बुद्धि विमल हो और प्रजाओं के भारवहन में धुरन्धर हों, वे राजा हैं॥१९॥

यु॒क्ष्वा हि त्वं र॑था॒सहा॑ यु॒वस्व॒ पोष्या॑ वसो। आन्नो॑ वायो॒ मधु॑ पिबा॒स्माकं॒ सव॒ना ग॑हि॥

जब सेनापति नाना विजय कर आवें, तब उनका पूरा सत्कार हो और प्रत्येक शुभकर्म में वे बुलाये जाएँ॥२०॥

तव॑ वायवृतस्पते॒ त्वष्टु॑र्जामातरद्भुत। अवां॒स्या वृ॑णीमहे॥

ईश्वरीय और राजकीय दोनों नियमों को पालन करनेवाले तथा सूक्ष्मकार्यसाधक, जो वीर महावीर वे सेनानायक-योग्य होते हैं॥२१॥

त्वष्टु॒र्जामा॑तरं व॒यमीशा॑नं रा॒य ई॑महे। सु॒ताव॑न्तो वा॒युं द्यु॒म्ना जना॑सः॥

जिन-२ उपायों से देश समृद्ध हो, विद्वानों से और राजसभा से सम्मति लेकर उनको सेनानायक कार्य्य में लावें॥२२॥

वायो॑ या॒हि शि॒वा दि॒वो वह॑स्वा॒ सु स्वश्व्य॑म्। वह॑स्व म॒हः पृ॑थु॒पक्ष॑सा॒ रथे॑॥

सेनापति स्थायी सुदृढ़ रथों पर आरूढ़ होकर कल्याणार्थ देश में भ्रमण करें॥२३॥

त्वां हि सु॒प्सर॑स्तमं नृ॒षद॑नेषु हू॒महे॑। ग्रावा॑णं॒ नाश्व॑पृष्ठं मं॒हना॑॥

प्रत्येक शुभकर्म में राजवत् सेनानी भी आदरणीय है॥२४॥

स त्वं नो॑ देव॒ मन॑सा॒ वायो॑ मन्दा॒नो अ॑ग्रि॒यः। कृ॒धि वाजाँ॑ अ॒पो धियः॑॥

सेनानी अन्न, जल और प्रजोत्साह को भी विविध उपायों से बढ़ाया करें॥२५॥

अ॒ग्निरु॒क्थे पु॒रोहि॑तो॒ ग्रावा॑णो ब॒र्हिर॑ध्व॒रे। ऋ॒चा या॑मि म॒रुतो॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिं॑ दे॒वाँ अवो॒ वरे॑ण्यम्॥

यज्ञ के लिये बहुत वस्तुओं की आवश्यकता होती है, इसलिये सब सामग्रियों की योजना जिस समय हो सके, उसमें यज्ञ करे॥१॥

आ प॒शुं गा॑सि पृथि॒वीं वन॒स्पती॑नु॒षासा॒ नक्त॒मोष॑धीः। विश्वे॑ च नो वसवो विश्ववेदसो धी॒नां भू॑त प्रावि॒तारः॑॥

यज्ञ में दुग्ध और घृतादि के लिये पशुओं, मृत्तिका, प्रस्तर और ऊखल आदि का भी प्रयोजन होता है। इन सामग्रियों से सम्पन्न होने से यज्ञ सफल होता है॥२॥

प्र सू न॑ एत्वध्व॒रो॒३॒॑ऽग्ना दे॒वेषु॑ पू॒र्व्यः। आ॒दि॒त्येषु॒ प्र वरु॑णे धृ॒तव्र॑ते म॒रुत्सु॑ वि॒श्वभा॑नुषु॥

यज्ञ का फल इस पृथिवी से लेकर सूर्य्यपर्य्यन्त विस्तीर्ण हो, यह इससे प्रार्थना है॥३॥

विश्वे॒ हि ष्मा॒ मन॑वे वि॒श्ववे॑दसो॒ भुव॑न्वृ॒धे रि॒शाद॑सः। अरि॑ष्टेभिः पा॒युभि॑र्विश्ववेदसो॒ यन्ता॑ नोऽवृ॒कं छ॒र्दिः॥

प्रत्येक पुरुष को उचित है कि वह अपने गृह को शुद्ध पवित्र बना रक्खे॥४॥

आ नो॑ अ॒द्य सम॑नसो॒ गन्ता॒ विश्वे॑ स॒जोष॑सः। ऋ॒चा गि॒रा मरु॑तो॒ देव्यदि॑ते॒ सद॑ने॒ पस्त्ये॑ महि॥

जो छोटे, बड़े, मूर्ख, विद्वान्, राजा और प्रजा यज्ञ में श्रद्धा से आवें, वे सब ही सत्कारयोग्य हैं॥५॥

अ॒भि प्रि॒या म॑रुतो॒ या वो॒ अश्व्या॑ ह॒व्या मि॑त्र प्रया॒थन॑। आ ब॒र्हिरिन्द्रो॒ वरु॑णस्तु॒रा नर॑ आदि॒त्यासः॑ सदन्तु नः॥

मरुत्, मित्र, वरुण और आदित्य आदि शब्द अधिलोकार्थ में बन्धु और मित्रादिवाचक हैं। शुभकर्म में इन सबका सत्कार होना चाहिये॥६॥

व॒यं वो॑ वृ॒क्तब॑र्हिषो हि॒तप्र॑यस आनु॒षक्। सु॒तसो॑मासो वरुण हवामहे मनु॒ष्वदि॒द्धाग्न॑यः॥

अपने निकट जो वस्तु हों, उनसे अपना और पर का हित सिद्ध करे और समय-२ पर अच्छे पुरुषों को बुलाकर अपने गृह पर सत्कार करे॥७॥

आ प्र या॑त॒ मरु॑तो॒ विष्णो॒ अश्वि॑ना॒ पूष॒न्माकी॑नया धि॒या। इन्द्र॒ आ या॑तु प्रथ॒मः स॑नि॒ष्युभि॒र्वृषा॒ यो वृ॑त्र॒हा गृ॒णे॥

जो प्रजाहितचिन्तक हैं, वे सबके सत्कारयोग्य हैं॥८॥

वि नो॑ देवासो अद्रु॒होऽच्छि॑द्रं॒ शर्म॑ यच्छत। न यद्दू॒राद्व॑सवो॒ नू चि॒दन्ति॑तो॒ वरू॑थमाद॒धर्ष॑ति॥

उत्तमोत्तम वासगृह, यज्ञशाला, धर्मशाला, पाठशाला आदि बनावें और उनसे यथायोग्य काम लेवें॥९॥

अस्ति॒ हि वः॑ सजा॒त्यं॑ रिशादसो॒ देवा॑सो॒ अस्त्याप्य॑म्। प्र णः॒ पूर्व॑स्मै सुवि॒ताय॑ वोचत म॒क्षू सु॒म्नाय॒ नव्य॑से॥

जो वस्तु प्राचीनकाल की अच्छी और लाभकारी हों, उनकी रक्षा करना और जो नूतन-२ विषय प्रचलित हों, उनको ग्रहण करना मनुष्यधर्म है॥१०॥

इ॒दा हि व॒ उप॑स्तुतिमि॒दा वा॒मस्य॑ भ॒क्तये॑। उप॑ वो विश्ववेदसो नम॒स्युराँ असृ॒क्ष्यन्या॑मिव॥

नवीन-२ स्तुतिरचना करने में अनेक लाभ हैं। प्रथम तो अपनी वाणी पवित्र होती, वारंवार विचारने से अन्तःकरण शुद्ध होता है, साहित्य की उन्नति और भावी सन्तान के लिये सुपथ बनता जाता है॥११॥

उदु॒ ष्य वः॑ सवि॒ता सु॑प्रणीत॒योऽस्था॑दू॒र्ध्वो वरे॑ण्यः। नि द्वि॒पाद॒श्चतु॑ष्पादो अ॒र्थिनोऽवि॑श्रन्पतयि॒ष्णवः॑॥

जो जन प्रणीति=प्रणयन रचना में निपुण हैं, वे भी सुप्रणीति कहाते हैं या जिनके लिये स्तुतिवचन अच्छे हैं, वे सुप्रणीति विद्वद्वर्ग। प्रायः विद्वज्जन आलसी होते हैं, अतः उनको आलस्यत्याग के लिये यह शिक्षा दी गई है॥१२॥

दे॒वंदे॑वं॒ वोऽव॑से दे॒वंदे॑वम॒भिष्ट॑ये। दे॒वंदे॑वं हुवेम॒ वाज॑सातये गृ॒णन्तो॑ दे॒व्या धि॒या॥

विद्वानों का सत्कार करके उत्तमोत्तम शिक्षा गृहस्थ ग्रहण करें॥१३॥

दे॒वासो॒ हि ष्मा॒ मन॑वे॒ सम॑न्यवो॒ विश्वे॑ सा॒कं सरा॑तयः। ते नो॑ अ॒द्य ते अ॑प॒रं तु॒चे तु नो॒ भव॑न्तु वरिवो॒विदः॑॥

विद्वद्वर्ग कदापि आलस्य और घृणा न करके प्रजाओं में जा-जाकर सद्विद्या का बीज बोया करें॥१४॥

प्र वः॑ शंसाम्यद्रुहः सं॒स्थ उप॑स्तुतीनाम्। न तं धू॒र्तिर्व॑रुण मित्र॒ मर्त्यं॒ यो वो॒ धाम॒भ्योऽवि॑धत्॥

निश्छल निष्कपट हो प्रेम से विद्वानों की सेवा करो और उनसे उत्तमोत्तम शिक्षा ग्रहण करो॥१५॥

प्र स क्षयं॑ तिरते॒ वि म॒हीरिषो॒ यो वो॒ वरा॑य॒ दाश॑ति। प्र प्र॒जाभि॑र्जायते॒ धर्म॑ण॒स्पर्यरि॑ष्टः॒ सर्व॑ एधते॥

हे मनुष्यों! विद्वानों की सेवा करो, विद्या से ही तुम्हारी सब प्रकार की उन्नति होगी॥१६॥

ऋ॒ते स वि॑न्दते यु॒धः सु॒गेभि॑र्या॒त्यध्व॑नः। अ॒र्य॒मा मि॒त्रो वरु॑णः॒ सरा॑तयो॒ यं त्राय॑न्ते स॒जोष॑सः॥

प्रत्येक नर समाज और देश के विचारशील पुरुषों के साथ सत्सङ्ग करे और उनकी सम्मति लेकर अपने आचरण बनावे, तब ही उसकी महती समृद्धि होती है॥१७॥

अज्रे॑ चिदस्मै कृणुथा॒ न्यञ्च॑नं दु॒र्गे चि॒दा सु॑सर॒णम्। ए॒षा चि॑दस्माद॒शनिः॑ प॒रो नु सास्रे॑धन्ती॒ वि न॑श्यतु॥

विद्वानों से भी मननकर्ता पुरुष अधिक माननीय हैं, उनको सर्व बाधाओं से बचाना सबका कर्तव्य है, क्योंकि वे नूतन-२ विद्या प्रकाशित कर लोगों का महोपकार करते हैं॥१८॥

यद॒द्य सूर्य॑ उद्य॒ति प्रिय॑क्षत्रा ऋ॒तं द॒ध। यन्नि॒म्रुचि॑ प्र॒बुधि॑ विश्ववेदसो॒ यद्वा॑ म॒ध्यंदि॑ने दि॒वः॥

शक्ति वा बल वही है, जिससे प्रजा के उत्तम लाभदायी कार्य हों। धन भी वही है, जिस से सर्वोपकार हो। बहुत लोग किसी विशेष स्थान में, विशेष पात्र में और नियत तिथि में ही दानादि उपकार करना चाहते हैं, परन्तु वेदभगवान् कहते हैं कि उपकार का कोई समय नियत नहीं॥१९॥

यद्वा॑भिपि॒त्वे अ॑सुरा ऋ॒तं य॒ते छ॒र्दिर्ये॒म वि दा॒शुषे॑। व॒यं तद्वो॑ वसवो विश्ववेदस॒ उप॑ स्थेयाम॒ मध्य॒ आ॥

विद्वानों के साथ-२ रहने से बहुविध लाभ हैं। आत्मा पवित्र होता, उदारता आती, बहुज्ञता बढ़ती और परोपकार करने से जन्मग्रहण की सफलता होती है॥२०॥

यद॒द्य सूर॒ उदि॑ते॒ यन्म॒ध्यंदि॑न आ॒तुचि॑। वा॒मं ध॒त्थ मन॑वे विश्ववेदसो॒ जुह्वा॑नाय॒ प्रचे॑तसे॥

दानपात्र अनुग्राह्य और उत्थाप्य वे पुरुष हैं, जो जुह्वान और प्रचेता हों। ईश्वरीयेच्छा के अनुकूल शुभकर्मों में जिनकी प्रवृत्ति हो, वे जुह्वान और तदीय विभूतियों के अध्ययन और ज्ञान में निपुण जन प्रचेता हैं॥२१॥

व॒यं तद्वः॑ सम्राज॒ आ वृ॑णीमहे पु॒त्रो न ब॑हु॒पाय्य॑म्। अ॒श्याम॒ तदा॑दित्या॒ जुह्व॑तो ह॒विर्येन॒ वस्यो॒ऽनशा॑महै॥

प्रथम हम ऐहलौकिक और पारलौकिक कर्मों में परमनिपुण होवें, पूर्ण योग्यता प्राप्त करें, तब ही हम पुरस्कार के भी अधिकारी होवेंगे। विद्वानों के निकट सदा नम्र होकर विद्याधन ग्रहण करें॥२२॥

ये त्रिं॒शति॒ त्रय॑स्प॒रो दे॒वासो॑ ब॒र्हिरास॑दन्। वि॒दन्नह॑ द्वि॒तास॑नन्॥

३३ देव। वे कौन हैं, इस पर बहुत विवाद है। वेदों में ३३ तैंतीस देव कहीं गिनाए हुए नहीं हैं, किन्तु वेदों में नियत संख्या का वर्णन आता है। अतः ये तैंतीस देव इन्द्रिय हैं। हस्त, पाद, मूत्रेन्द्रिय, मलेन्द्रिय और मुख, ये पाँच कर्मेन्द्रिय और नयन, कर्ण, घ्राण, रसना और त्वचा, ये पाँच ज्ञानेन्द्रिय हैं और मन एकादश इन्द्रिय कहलाते हैं। ये उत्तम, मध्यम और अधम भेद से तीन प्रकार के इन्द्रिय ही ३३ तैंतीस प्रकार के देव हैं। इनको अपने वश में रखने और उचित काम में लगाने से ही मनुष्य योगी, ऋषि, मुनि, कवि और विद्वान् होता है। अतः वेद भगवान् इनके सम्बन्ध में उपदेश देते हैं॥१॥

वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा स्मद्रा॑तिषाचो अ॒ग्नयः॑। पत्नी॑वन्तो॒ वष॑ट्कृताः॥

इससे भगवान् यह शिक्षा देते हैं कि जगत् के उपकार करनेवाले सबको आदरदृष्टि से देखो और यथायोग्य उनकी पूजा शुश्रूषा करो। यद्वा−प्रथम और अन्तिम ऋचा से विस्पष्टतया विदित होता है कि यह सब वर्णन इन्द्रियों का ही है, अतः यहाँ भी वरुण आदिकों का भी तत्परक ही अर्थ करना उचित है। (मित्र) हितकारी इन्द्रिय (वरुण) वशीकृतेन्द्रिय (अर्य्यमा) गमनशीलेन्द्रिय और (अग्नयः) अग्निसमान प्रचण्ड या उपकारी इन्द्रिय (पत्नीवान्) अपनी-२ शक्तिसहित जगत् के उपकारी होवें। इत्यादि॥२॥

ते नो॑ गो॒पा अ॑पा॒च्यास्त उद॒क्त इ॒त्था न्य॑क्। पु॒रस्ता॒त्सर्व॑या वि॒शा॥

मनुष्यदेव जो ब्राह्मणादिक हैं, वे हमारी सदा सब ओर रक्षा करें, अथवा वे इन्द्रियगण हमारी रक्षा करें, यह भाव ग्रहण करना चाहिये॥३॥

यथा॒ वश॑न्ति दे॒वास्तथेद॑स॒त्तदे॑षां॒ नकि॒रा मि॑नत्। अरा॑वा च॒न मर्त्यः॑॥

जो अपने पीछे यश, कीर्ति और कोई चिरस्थायी वस्तु को छोड़नेवाला नहीं है, वही मर्त्य है, क्योंकि उसका कोई स्मारक नहीं रहता। जिनके स्मारक कुछ रह जाते हैं, वे ही देव हैं, अतः देव बनने के लिये सब प्रयत्न करें॥४॥

स॒प्ता॒नां स॒प्त ऋ॒ष्टयः॑ स॒प्त द्यु॒म्नान्ये॑षाम्। स॒प्तो अधि॒ श्रियो॑ धिरे॥

परमात्मा ने मानवजाति में सर्व वस्तुओं के संग्राहक सप्त इन्द्रिय स्थापित किये हैं। उनसे विद्वान् अनेकानेक अद्भुत वस्तु संग्रह करते हैं। किन्तु मूर्खगण इन्हीं को पापों में लगाकर विनष्ट कर दीन हीन सदा रहते हैं, उनको शुभकर्म में लगाकर हे मनुष्यों! सुधारो॥५॥

ब॒भ्रुरेको॒ विषु॑णः सू॒नरो॒ युवा॒ञ्ज्य॑ङ्क्ते हिर॒ण्यय॑म्॥

वस्तुतः मनोरूप इन्द्रिय इस शरीर में एक अद्भुत भूषण है। इसको जो जानता है और अच्छे काम में इसको लगाता है, वही मनुष्य जाति में भूषण बनता है॥१॥

योनि॒मेक॒ आ स॑साद॒ द्योत॑नो॒ऽन्तर्दे॒वेषु॒ मेधि॑रः॥

शरीर में नयन देव का प्रधान आसन है। प्रथम मनुष्य की बुद्धि इससे बढ़ती है, क्योंकि इससे देख-देखकर शिशु में जिज्ञासा शक्ति बढ़ती जाती है॥२॥

वाशी॒मेको॑ बिभर्ति॒ हस्त॑ आय॒सीम॒न्तर्दे॒वेषु॒ निध्रु॑विः॥

प्रथम कर्णदेव सब सुनकर और निश्चयकर मनोद्वारा आत्मा से कहता है, तब वह काट-छाँट करता है, अतः यहाँ वाशी का वर्णन है॥३॥

वज्र॒मेको॑ बिभर्ति॒ हस्त॒ आहि॑तं॒ तेन॑ वृ॒त्राणि॑ जिघ्नते॥

केवल विद्या से वा ज्ञान से वा कर्म्मकलाप से यह जीव निषिद्ध कर्म्मों से निवृत्त नहीं होता, किन्तु निवृत्ति के लिये वस्तुतत्त्व का पूर्णज्ञान और बलवती इच्छाशक्ति होनी चाहिये, यही दोनों आत्मा के महास्त्र हैं, इनका ही यत्न से उपार्जन करें॥४॥

ति॒ग्ममेको॑ बिभर्ति॒ हस्त॒ आयु॑धं॒ शुचि॑रु॒ग्रो जला॑षभेषजः॥

मुख में जो अन्नों के पीसनेवाले दन्त हैं, वे महोपकारी अस्त्र हैं॥५॥

प॒थ एकः॑ पीपाय॒ तस्क॑रो यथाँ ए॒ष वे॑द निधी॒नाम्॥

प्रत्येक कर्मेन्द्रिय का गुण अध्येतव्य है। हाथ से हम उपासक क्या-२ काम ले सकते हैं, इसमें कितनी शक्ति है और इसको कैसे उपकार में लगावें, इत्यादि विचार करे॥६॥

त्रीण्येक॑ उरुगा॒यो वि च॑क्रमे॒ यत्र॑ दे॒वासो॒ मद॑न्ति॥

इससे यह शिक्षा देते हैं कि मनुष्य को आलस्य करना उचित नहीं। चरण से चलकर निज और अन्यों का उपकार सदा करे॥७॥

विभि॒र्द्वा च॑रत॒ एक॑या स॒ह प्र प्र॑वा॒सेव॑ वसतः॥

मन और अहङ्कार ये दोनों जीवों को अपथ में ले जानेवाले हैं। अतः इनको अपने वश में करके उत्तमोत्तम कार्य्य सिद्ध करें॥८॥

सदो॒ द्वा च॑क्राते उप॒मा दि॒वि स॒म्राजा॑ स॒र्पिरा॑सुती॥

अपने-२ प्रत्येक इन्द्रिय के गुण, आकार और स्थिति जानें॥९॥

अर्च॑न्त॒ एके॒ महि॒ साम॑ मन्वत॒ तेन॒ सूर्य॑मरोचयन्॥

जैसे योगी, यति और विद्वानों के प्राण ईश्वर में लगे रहते हैं। इतरजन भी यथाशक्ति अपने इन्द्रियों को परोपकार में लगावें॥१०॥

न॒हि वो॒ अस्त्य॑र्भ॒को देवा॑सो॒ न कु॑मार॒कः। विश्वे॑ स॒तोम॑हान्त॒ इत्॥

इति॑ स्तु॒तासो॑ असथा रिशादसो॒ ये स्थ त्रय॑श्च त्रिं॒शच्च॑। मनो॑र्देवा यज्ञियासः॥

ते न॑स्त्राध्वं॒ ते॑ऽवत॒ त उ॑ नो॒ अधि॑ वोचत। मा नः॑ प॒थः पित्र्या॑न्मान॒वादधि॑ दू॒रं नै॑ष्ट परा॒वतः॑॥

ये दे॑वास इ॒ह स्थन॒ विश्वे॑ वैश्वान॒रा उ॒त। अ॒स्मभ्यं॒ शर्म॑ स॒प्रथो॒ गवेऽश्वा॑य यच्छत॥

सूक्तम्

यो यजा॑ति॒ यजा॑त॒ इत्सु॒नव॑च्च॒ पचा॑ति च। ब्र॒ह्मेदिन्द्र॑स्य चाकनत्॥

पु॒रो॒ळाशं॒ यो अ॑स्मै॒ सोमं॒ रर॑त आ॒शिर॑म्। पादित्तं श॒क्रो अंह॑सः॥

संसार में दरिद्रता और अज्ञान अधिक हैं, इस कारण ज्ञानी पुरुष ज्ञान और धनी जन विविध प्रकार के अन्न और द्रव्य इच्छुक जनों को सदा दिया करें। ईश्वर दाताओं को सर्व दुःखों से बचाया करता है, क्योंकि वह सर्वशक्तिमान् है॥२॥

तस्य॑ द्यु॒माँ अ॑स॒द्रथो॑ दे॒वजू॑तः॒ स शू॑शुवत्। विश्वा॑ व॒न्वन्न॑मि॒त्रिया॑॥

संसार में उस भक्तजन का परम अभ्युदय फैलता है, शत्रु भी उसके वशीभूत होते हैं, जो अन्तःकरण से परोपकार में लगे रहते हैं और आस्तिकता से जगत् को सुखी करते हैं॥३॥

अस्य॑ प्र॒जाव॑ती गृ॒हेऽस॑श्चन्ती दि॒वेदि॑वे। इळा॑ धेनु॒मती॑ दुहे॥

या दम्प॑ती॒ सम॑नसा सुनु॒त आ च॒ धाव॑तः। देवा॑सो॒ नित्य॑या॒शिरा॑॥

प्रति॑ प्राश॒व्याँ॑ इतः स॒म्यञ्चा॑ ब॒र्हिरा॑शाते। न ता वाजे॑षु वायतः॥

न दे॒वाना॒मपि॑ ह्नुतः सुम॒तिं न जु॑गुक्षतः। श्रवो॑ बृ॒हद्वि॑वासतः॥

पु॒त्रिणा॒ ता कु॑मा॒रिणा॒ विश्व॒मायु॒र्व्य॑श्नुतः। उ॒भा हिर॑ण्यपेशसा॥

वी॒तिहो॑त्रा कृ॒तद्व॑सू दश॒स्यन्ता॒मृता॑य॒ कम्। समूधो॑ रोम॒शं ह॑तो दे॒वेषु॑ कृणुतो॒ दुवः॑॥

आ शर्म॒ पर्व॑तानां वृणी॒महे॑ न॒दीना॑म्। आ विष्णोः॑ सचा॒भुवः॑॥

द्रष्टव्य−प्रत्येक मनुष्य को उचित है कि वह ईश्वर की परम विभूतियों को देखे, जाने, विचारे, पृथिवी पर पर्वत कैसा विस्तृत सुगठित और वृक्षादिकों से सुशोभायमान प्रतीत होता है, नदी का जल कितना जीव-हितकारी है, नदी के तट सदा शीतल और घासादि से युक्त रहते हैं, इसी प्रकार इस पृथिवी पर शतशः पदार्थ द्रष्टव्य हैं। इन्हें देख इनसे गुण ग्रहण करना चाहिये, इति शम्॥१०॥

ऐतु॑ पू॒षा र॒यिर्भगः॑ स्व॒स्ति स॑र्व॒धात॑मः। उ॒रुरध्वा॑ स्व॒स्तये॑॥

अ॒रम॑तिरन॒र्वणो॒ विश्वो॑ दे॒वस्य॒ मन॑सा। आ॒दि॒त्याना॑मने॒ह इत्॥

यथा॑ नो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा वरु॑णः॒ सन्ति॑ गो॒पाः। सु॒गा ऋ॒तस्य॒ पन्थाः॑॥

अ॒ग्निं वः॑ पू॒र्व्यं गि॒रा दे॒वमी॑ळे॒ वसू॑नाम्। स॒प॒र्यन्तः॑ पुरुप्रि॒यं मि॒त्रं न क्षे॑त्र॒साध॑सम्॥

म॒क्षू दे॒वव॑तो॒ रथः॒ शूरो॑ वा पृ॒त्सु कासु॑ चित्। दे॒वानां॒ य इन्मनो॒ यज॑मान॒ इय॑क्षत्य॒भीदय॑ज्वनो भुवत्॥

न य॑जमान रिष्यसि॒ न सु॑न्वान॒ न दे॑वयो। दे॒वानां॒ य इन्मनो॒ यज॑मान॒ इय॑क्षत्य॒भीदय॑ज्वनो भुवत्॥

नकि॒ष्टं कर्म॑णा नश॒न्न प्र यो॑ष॒न्न यो॑षति। दे॒वानां॒ य इन्मनो॒ यज॑मान॒ इय॑क्षत्य॒भीदय॑ज्वनो भुवत्॥

अस॒दत्र॑ सु॒वीर्य॑मु॒त त्यदा॒श्वश्व्य॑म्। दे॒वानां॒ य इन्मनो॒ यज॑मान॒ इय॑क्षत्य॒भीदय॑ज्वनो भुवत्॥

प्र कृ॒तान्यृ॑जी॒षिणः॒ कण्वा॒ इन्द्र॑स्य॒ गाथ॑या। मदे॒ सोम॑स्य वोचत॥

यः सृबि॑न्द॒मन॑र्शनिं॒ पिप्रुं॑ दा॒सम॑ही॒शुव॑म्। वधी॑दु॒ग्रो रि॒णन्न॒पः॥

न्यर्बु॑दस्य वि॒ष्टपं॑ व॒र्ष्माणं॑ बृह॒तस्ति॑र। कृ॒षे तदि॑न्द्र॒ पौंस्य॑म्॥

प्रति॑ श्रु॒ताय॑ वो धृ॒षत्तूर्णा॑शं॒ न गि॒रेरधि॑। हु॒वे सु॑शि॒प्रमू॒तये॑॥

स गोरश्व॑स्य॒ वि व्र॒जं म॑न्दा॒नः सो॒म्येभ्यः॑। पुरं॒ न शू॑र दर्षसि॥

यदि॑ मे रा॒रणः॑ सु॒त उ॒क्थे वा॒ दध॑से॒ चनः॑। आ॒रादुप॑ स्व॒धा ग॑हि॥

व॒यं घा॑ ते॒ अपि॑ ष्मसि स्तो॒तार॑ इन्द्र गिर्वणः। त्वं नो॑ जिन्व सोमपाः॥

उ॒त नः॑ पि॒तुमा भ॑र संररा॒णो अवि॑क्षितम्। मघ॑व॒न्भूरि॑ ते॒ वसु॑॥

उ॒त नो॒ गोम॑तस्कृधि॒ हिर॑ण्यवतो अ॒श्विनः॑। इळा॑भिः॒ सं र॑भेमहि॥

बृ॒बदु॑क्थं हवामहे सृ॒प्रक॑रस्नमू॒तये॑। साधु॑ कृ॒ण्वन्त॒मव॑से॥

यः सं॒स्थे चि॑च्छ॒तक्र॑तु॒रादीं॑ कृ॒णोति॑ वृत्र॒हा। ज॒रि॒तृभ्यः॑ पुरू॒वसुः॑॥

स नः॑ श॒क्रश्चि॒दा श॑क॒द्दान॑वाँ अन्तराभ॒रः। इन्द्रो॒ विश्वा॑भिरू॒तिभिः॑॥

यो रा॒यो॒३॒॑ऽवनि॑र्म॒हान्त्सु॑पा॒रः सु॑न्व॒तः सखा॑। तमिन्द्र॑म॒भि गा॑यत॥

आ॒य॒न्तारं॒ महि॑ स्थि॒रं पृत॑नासु श्रवो॒जित॑म्। भूरे॒रीशा॑न॒मोज॑सा॥

नकि॑रस्य॒ शची॑नां निय॒न्ता सू॒नृता॑नाम्। नकि॑र्व॒क्ता न दा॒दिति॑॥

न नू॒नं ब्र॒ह्मणा॑मृ॒णं प्रा॑शू॒नाम॑स्ति सुन्व॒ताम्। न सोमो॑ अप्र॒ता प॑पे॥

पन्य॒ इदुप॑ गायत॒ पन्य॑ उ॒क्थानि॑ शंसत। ब्रह्मा॑ कृणोत॒ पन्य॒ इत्॥

पन्य॒ आ द॑र्दिरच्छ॒ता स॒हस्रा॑ वा॒ज्यवृ॑तः। इन्द्रो॒ यो यज्व॑नो वृ॒धः॥

वि षू च॑र स्व॒धा अनु॑ कृष्टी॒नामन्वा॒हुवः॑। इन्द्र॒ पिब॑ सु॒ताना॑म्॥

पिब॒ स्वधै॑नवानामु॒त यस्तुग्र्ये॒ सचा॑। उ॒तायमि॑न्द्र॒ यस्तव॑॥

अती॑हि मन्युषा॒विणं॑ सुषु॒वांस॑मु॒पार॑णे। इ॒मं रा॒तं सु॒तं पि॑ब॥

इ॒हि ति॒स्रः प॑रा॒वत॑ इ॒हि पञ्च॒ जनाँ॒ अति॑। धेना॑ इन्द्राव॒चाक॑शत्॥

सूर्यो॑ र॒श्मिं यथा॑ सृ॒जा त्वा॑ यच्छन्तु मे॒ गिरः॑। नि॒म्नमापो॒ न स॒ध्र्य॑क्॥

अध्व॑र्य॒वा तु हि षि॒ञ्च सोमं॑ वी॒राय॑ शि॒प्रिणे॑। भरा॑ सु॒तस्य॑ पी॒तये॑॥

य उ॒द्नः फ॑लि॒गं भि॒नन्न्य१॒॑क्सिन्धूँ॑र॒वासृ॑जत्। यो गोषु॑ प॒क्वं धा॒रय॑त्॥

अह॑न्वृ॒त्रमृची॑षम और्णवा॒भम॑ही॒शुव॑म्। हि॒मेना॑विध्य॒दर्बु॑दम्॥

प्र व॑ उ॒ग्राय॑ नि॒ष्टुरेऽषा॑ळ्हाय प्रस॒क्षिणे॑। दे॒वत्तं॒ ब्रह्म॑ गायत॥

यो विश्वा॑न्य॒भि व्र॒ता सोम॑स्य॒ मदे॒ अन्ध॑सः। इन्द्रो॑ दे॒वेषु॒ चेत॑ति॥

इ॒ह त्या स॑ध॒माद्या॒ हरी॒ हिर॑ण्यकेश्या। वो॒ळ्हाम॒भि प्रयो॑ हि॒तम्॥

अ॒र्वाञ्चं॑ त्वा पुरुष्टुत प्रि॒यमे॑धस्तुता॒ हरी॑। सो॒म॒पेया॑य वक्षतः॥

व॒यं घ॑ त्वा सु॒ताव॑न्त॒ आपो॒ न वृ॒क्तब॑र्हिषः। प॒वित्र॑स्य प्र॒स्रव॑णेषु वृत्रह॒न्परि॑ स्तो॒तार॑ आसते॥

स्वर॑न्ति त्वा सु॒ते नरो॒ वसो॑ निरे॒क उ॒क्थिनः॑। क॒दा सु॒तं तृ॑षा॒ण ओक॒ आ ग॑म॒ इन्द्र॑ स्व॒ब्दीव॒ वंस॑गः॥

कण्वे॑भिर्धृष्ण॒वा धृ॒षद्वाजं॑ दर्षि सह॒स्रिण॑म्। पि॒शङ्ग॑रूपं मघवन्विचर्षणे म॒क्षू गोम॑न्तमीमहे॥

पा॒हि गायान्ध॑सो॒ मद॒ इन्द्रा॑य मेध्यातिथे। यः सम्मि॑श्लो॒ हर्यो॒र्यः सु॒ते सचा॑ व॒ज्री रथो॑ हिर॒ण्ययः॑॥

यः सु॑ष॒व्यः सु॒दक्षि॑ण इ॒नो यः सु॒क्रतु॑र्गृ॒णे। य आ॑क॒रः स॒हस्रा॒ यः श॒ताम॑घ॒ इन्द्रो॒ यः पू॒र्भिदा॑रि॒तः॥

यो धृ॑षि॒तो योऽवृ॑तो॒ यो अस्ति॒ श्मश्रु॑षु श्रि॒तः। विभू॑तद्युम्न॒श्च्यव॑नः पुरुष्टु॒तः क्रत्वा॒ गौरि॑व शाकि॒नः॥

क ईं॑ वेद सु॒ते सचा॒ पिब॑न्तं॒ कद्वयो॑ दधे। अ॒यं यः पुरो॑ विभि॒नत्त्योज॑सा मन्दा॒नः शि॒प्र्यन्ध॑सः॥

दा॒ना मृ॒गो न वा॑र॒णः पु॑रु॒त्रा च॒रथं॑ दधे। नकि॑ष्ट्वा॒ नि य॑म॒दा सु॒ते ग॑मो म॒हाँश्च॑र॒स्योज॑सा॥

य उ॒ग्रः सन्ननि॑ष्टृतः स्थि॒रो रणा॑य॒ संस्कृ॑तः। यदि॑ स्तो॒तुर्म॒घवा॑ शृ॒णव॒द्धवं॒ नेन्द्रो॑ योष॒त्या ग॑मत्॥

स॒त्यमि॒त्था वृषेद॑सि॒ वृष॑जूति॒र्नोऽवृ॑तः। वृषा॒ ह्यु॑ग्र शृण्वि॒षे प॑रा॒वति॒ वृषो॑ अर्वा॒वति॑ श्रु॒तः॥

वृष॑णस्ते अ॒भीश॑वो॒ वृषा॒ कशा॑ हिर॒ण्ययी॑। वृषा॒ रथो॑ मघव॒न्वृष॑णा॒ हरी॒ वृषा॒ त्वं श॑तक्रतो॥

वृषा॒ सोता॑ सुनोतु ते॒ वृष॑न्नृजीपि॒न्ना भ॑र। वृषा॑ दधन्वे॒ वृष॑णं न॒दीष्वा तुभ्यं॑ स्थातर्हरीणाम्॥

एन्द्र॑ याहि पी॒तये॒ मधु॑ शविष्ठ सो॒म्यम्। नायमच्छा॑ म॒घवा॑ शृ॒णव॒द्गिरो॒ ब्रह्मो॒क्था च॑ सु॒क्रतुः॑॥

वह॑न्तु त्वा रथे॒ष्ठामा हर॑यो रथ॒युजः॑। ति॒रश्चि॑द॒र्यं सव॑नानि वृत्रहन्न॒न्येषां॒ या श॑तक्रतो॥

अ॒स्माक॑म॒द्यान्त॑मं॒ स्तोमं॑ धिष्व महामह। अ॒स्माकं॑ ते॒ सव॑ना सन्तु॒ शंत॑मा॒ मदा॑य द्युक्ष सोमपाः॥

न॒हि षस्तव॒ नो मम॑ शा॒स्त्रे अ॒न्यस्य॒ रण्य॑ति। यो अ॒स्मान्वी॒र आन॑यत्॥

इन्द्र॑श्चिद्घा॒ तद॑ब्रवीत्स्त्रि॒या अ॑शा॒स्यं मनः॑। उ॒तो अह॒ क्रतुं॑ र॒घुम्॥

सप्ती॑ चिद्घा मद॒च्युता॑ मिथु॒ना व॑हतो॒ रथ॑म्। ए॒वेद्धूर्वृष्ण॒ उत्त॑रा॥

अ॒धः प॑श्यस्व॒ मोपरि॑ संत॒रां पा॑द॒कौ ह॑र। मा ते॑ कशप्ल॒कौ दृ॑श॒न्त्स्त्री हि ब्र॒ह्मा ब॒भूवि॑थ॥

एन्द्र॑ याहि॒ हरि॑भि॒रुप॒ कण्व॑स्य सुष्टु॒तिम्। दि॒वो अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं॑ य॒य दि॑वावसो॥

आ त्वा॒ ग्रावा॒ वद॑न्नि॒ह सो॒मी घोषे॑ण यच्छतु। दि॒वो अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं॑ य॒य दि॑वावसो॥

अत्रा॒ वि ने॒मिरे॑षा॒मुरां॒ न धू॑नुते॒ वृकः॑। दि॒वो अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं॑ य॒य दि॑वावसो॥

आ त्वा॒ कण्वा॑ इ॒हाव॑से॒ हव॑न्ते॒ वाज॑सातये। दि॒वो अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं॑ य॒य दि॑वावसो॥

दधा॑मि ते सु॒तानां॒ वृष्णे॒ न पू॑र्व॒पाय्य॑म्। दि॒वो अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं॑ य॒य दि॑वावसो॥

स्मत्पु॑रंधिर्न॒ आ ग॑हि वि॒श्वतो॑धीर्न ऊ॒तये॑। दि॒वो अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं॑ य॒य दि॑वावसो॥

आ नो॑ याहि महेमते॒ सह॑स्रोते॒ शता॑मघ। दि॒वो अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं॑ य॒य दि॑वावसो॥

आ त्वा॒ होता॒ मनु॑र्हितो देव॒त्रा व॑क्ष॒दीड्यः॑। दि॒वो अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं॑ य॒य दि॑वावसो॥

आ त्वा॑ मद॒च्युता॒ हरी॑ श्ये॒नं प॒क्षेव॑ वक्षतः। दि॒वो अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं॑ य॒य दि॑वावसो॥

आ या॑ह्य॒र्य आ परि॒ स्वाहा॒ सोम॑स्य पी॒तये॑। दि॒वो अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं॑ य॒य दि॑वावसो॥

आ नो॑ या॒ह्युप॑श्रुत्यु॒क्थेषु॑ रणया इ॒ह। दि॒वो अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं॑ य॒य दि॑वावसो॥

सरू॑पै॒रा सु नो॑ गहि॒ सम्भृ॑तैः॒ सम्भृ॑ताश्वः। दि॒वो अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं॑ य॒य दि॑वावसो॥

आ या॑हि॒ पर्व॑तेभ्यः समु॒द्रस्याधि॑ वि॒ष्टपः॑। दि॒वो अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं॑ य॒य दि॑वावसो॥

आ नो॒ गव्या॒न्यश्व्या॑ स॒हस्रा॑ शूर दर्दृहि। दि॒वो अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं॑ य॒य दि॑वावसो॥

आ नः॑ सहस्र॒शो भ॑रा॒युता॑नि श॒तानि॑ च। दि॒वो अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं॑ य॒य दि॑वावसो॥

आ यदिन्द्र॑श्च॒ दद्व॑हे स॒हस्रं॒ वसु॑रोचिषः। ओजि॑ष्ठ॒मश्व्यं॑ प॒शुम्॥

य ऋ॒ज्रा वात॑रंहसोऽरु॒षासो॑ रघु॒ष्यदः॑। भ्राज॑न्ते॒ सूर्या॑ इव॥

पारा॑वतस्य रा॒तिषु॑ द्र॒वच्च॑क्रेष्वा॒शुषु॑। तिष्ठं॒ वन॑स्य॒ मध्य॒ आ॥

अ॒ग्निनेन्द्रे॑ण॒ वरु॑णेन॒ विष्णु॑नादि॒त्यै रु॒द्रैर्वसु॑भिः सचा॒भुवा॑। स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण च॒ सोमं॑ पिबतमश्विना॥

मनुष्यजाति को उत्तम और सुशील बनाने के लिये तीन मार्ग हैं, विद्या, धर्म और राज-नियम। परन्तु इन तीनों में राजदण्ड से ही संसार की स्थिति बनी रहती है, क्योंकि इसके उग्र दण्ड से आपामर डरते हैं। अतः राजमण्डल का वर्णन इस प्रकार वेद में कहा गया है॥१॥

विश्वा॑भिर्धी॒भिर्भुव॑नेन वाजिना दि॒वा पृ॑थि॒व्याद्रि॑भिः सचा॒भुवा॑। स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण च॒ सोमं॑ पिबतमश्विना॥

विश्वै॑र्दे॒वैस्त्रि॒भिरे॑काद॒शैरि॒हाद्भिर्म॒रुद्भि॒र्भृगु॑भिः सचा॒भुवा॑। स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण च॒ सोमं॑ पिबतमश्विना॥

जु॒षेथां॑ य॒ज्ञं बोध॑तं॒ हव॑स्य मे॒ विश्वे॒ह दे॑वौ॒ सव॒नाव॑ गच्छतम्। स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण॒ चेषं॑ नो वोळ्हमश्विना॥

स्तोमं॑ जुषेथां युव॒शेव॑ क॒न्यनां॒ विश्वे॒ह दे॑वौ॒ सव॒नाव॑ गच्छतम्। स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण॒ चेषं॑ नो वोळ्हमश्विना॥

गिरो॑ जुषेथामध्व॒रं जु॑षेथां॒ विश्वे॒ह दे॑वौ॒ सव॒नाव॑ गच्छतम्। स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण॒ चेषं॑ नो वोळ्हमश्विना॥

हा॒रि॒द्र॒वेव॑ पतथो॒ वनेदुप॒ सोमं॑ सु॒तं म॑हि॒षेवाव॑ गच्छथः। स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण च॒ त्रिर्व॒र्तिर्या॑तमश्विना॥

हं॒सावि॑व पतथो अध्व॒गावि॑व॒ सोमं॑ सु॒तं म॑हि॒षेवाव॑ गच्छथः। स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण च॒ त्रिर्व॒र्तिर्या॑तमश्विना॥

श्ये॒नावि॑व पतथो ह॒व्यदा॑तये॒ सोमं॑ सु॒तं म॑हि॒षेवाव॑ गच्छथः। स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण च॒ त्रिर्व॒र्तिर्या॑तमश्विना॥

पिब॑तं च तृप्णु॒तं चा च॑ गच्छतं प्र॒जां च॑ ध॒त्तं द्रवि॑णं च धत्तम्। स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण॒ चोर्जं॑ नो धत्तमश्विना॥

जय॑तं च॒ प्र स्तु॑तं च॒ प्र चा॑वतं प्र॒जां च॑ ध॒त्तं द्रवि॑णं च धत्तम्। स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण॒ चोर्जं॑ नो धत्तमश्विना॥

ह॒तं च॒ शत्रू॒न्यत॑तं च मि॒त्रिणः॑ प्र॒जां च॑ ध॒त्तं द्रवि॑णं च धत्तम्। स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण॒ चोर्जं॑ नो धत्तमश्विना॥

मि॒त्रावरु॑णवन्ता उ॒त धर्म॑वन्ता म॒रुत्व॑न्ता जरि॒तुर्ग॑च्छथो॒ हव॑म्। स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण चादि॒त्यैर्या॑तमश्विना॥

अङ्गि॑रस्वन्ता उ॒त विष्णु॑वन्ता म॒रुत्व॑न्ता जरि॒तुर्ग॑च्छथो॒ हव॑म्। स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण चादि॒त्यैर्या॑तमश्विना॥

ऋ॒भु॒मन्ता॑ वृषणा॒ वाज॑वन्ता म॒रुत्व॑न्ता जरि॒तुर्ग॑च्छथो॒ हव॑म्। स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण चादि॒त्यैर्या॑तमश्विना॥

ब्रह्म॑ जिन्वतमु॒त जि॑न्वतं॒ धियो॑ ह॒तं रक्षां॑सि॒ सेध॑त॒ममी॑वाः। स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण च॒ सोमं॑ सुन्व॒तो अ॑श्विना॥

क्ष॒त्रं जि॑न्वतमु॒त जि॑न्वतं॒ नॄन्ह॒तं रक्षां॑सि॒ सेध॑त॒ममी॑वाः। स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण च॒ सोमं॑ सुन्व॒तो अ॑श्विना॥

धे॒नूर्जि॑न्वतमु॒त जि॑न्वतं॒ विशो॑ ह॒तं रक्षां॑सि॒ सेध॑त॒ममी॑वाः। स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण च॒ सोमं॑ सुन्व॒तो अ॑श्विना॥

अत्रे॑रिव शृणुतं पू॒र्व्यस्तु॑तिं श्या॒वाश्व॑स्य सुन्व॒तो म॑दच्युता। स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण॒ चाश्वि॑ना ति॒रोअ॑ह्न्यम्॥

सर्गाँ॑ इव सृजतं सुष्टु॒तीरुप॑ श्या॒वाश्व॑स्य सुन्व॒तो म॑दच्युता। स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण॒ चाश्वि॑ना ति॒रोअ॑ह्न्यम्॥

र॒श्मीँरि॑व यच्छतमध्व॒राँ उप॑ श्या॒वाश्व॑स्य सुन्व॒तो म॑दच्युता। स॒जोष॑सा उ॒षसा॒ सूर्ये॑ण॒ चाश्वि॑ना ति॒रोअ॑ह्न्यम्॥

अ॒र्वाग्रथं॒ नि य॑च्छतं॒ पिब॑तं सो॒म्यं मधु॑। आ या॑तमश्वि॒ना ग॑तमव॒स्युर्वा॑म॒हं हु॑वे ध॒त्तं रत्ना॑नि दा॒शुषे॑॥

न॒मो॒वा॒के प्रस्थि॑ते अध्व॒रे न॑रा वि॒वक्ष॑णस्य पी॒तये॑। आ या॑तमश्वि॒ना ग॑तमव॒स्युर्वा॑म॒हं हु॑वे ध॒त्तं रत्ना॑नि दा॒शुषे॑॥

स्वाहा॑कृतस्य तृम्पतं सु॒तस्य॑ देवा॒वन्ध॑सः। आ या॑तमश्वि॒ना ग॑तमव॒स्युर्वा॑म॒हं हु॑वे ध॒त्तं रत्ना॑नि दा॒शुषे॑॥

अ॒वि॒तासि॑ सुन्व॒तो वृ॒क्तब॑र्हिषः॒ पिबा॒ सोमं॒ मदा॑य॒ कं श॑तक्रतो। यं ते॑ भा॒गमधा॑रय॒न्विश्वाः॑ सेहा॒नः पृत॑ना उ॒रु ज्रयः॒ सम॑प्सु॒जिन्म॒रुत्वाँ॑ इन्द्र सत्पते॥

प्राव॑ स्तो॒तारं॑ मघव॒न्नव॒ त्वां पिबा॒ सोमं॒ मदा॑य॒ कं श॑तक्रतो। यं ते॑ भा॒गमधा॑रय॒न्विश्वाः॑ सेहा॒नः पृत॑ना उ॒रु ज्रयः॒ सम॑प्सु॒जिन्म॒रुत्वाँ॑ इन्द्र सत्पते॥

ऊ॒र्जा दे॒वाँ अव॒स्योज॑सा॒ त्वां पिबा॒ सोमं॒ मदा॑य॒ कं श॑तक्रतो। यं ते॑ भा॒गमधा॑रय॒न्विश्वाः॑ सेहा॒नः पृत॑ना उ॒रु ज्रयः॒ सम॑प्सु॒जिन्म॒रुत्वाँ॑ इन्द्र सत्पते॥

ज॒नि॒ता दि॒वो ज॑नि॒ता पृ॑थि॒व्याः पिबा॒ सोमं॒ मदा॑य॒ कं श॑तक्रतो। यं ते॑ भा॒गमधा॑रय॒न्विश्वाः॑ सेहा॒नः पृत॑ना उ॒रु ज्रयः॒ सम॑प्सु॒जिन्म॒रुत्वाँ॑ इन्द्र सत्पते॥

ज॒नि॒ताश्वा॑नां जनि॒ता गवा॑मसि॒ पिबा॒ सोमं॒ मदा॑य॒ कं श॑तक्रतो। यं ते॑ भा॒गमधा॑रय॒न्विश्वाः॑ सेहा॒नः पृत॑ना उ॒रु ज्रयः॒ सम॑प्सु॒जिन्म॒रुत्वाँ॑ इन्द्र सत्पते॥

अत्री॑णां॒ स्तोम॑मद्रिवो म॒हस्कृ॑धि॒ पिबा॒ सोमं॒ मदा॑य॒ कं श॑तक्रतो। यं ते॑ भा॒गमधा॑रय॒न्विश्वाः॑ सेहा॒नः पृत॑ना उ॒रु ज्रयः॒ सम॑प्सु॒जिन्म॒रुत्वाँ॑ इन्द्र सत्पते॥

श्या॒वाश्व॑स्य सुन्व॒तस्तथा॑ शृणु॒ यथाशृ॑णो॒रत्रेः॒ कर्मा॑णि कृण्व॒तः। प्र त्र॒सद॑स्युमाविथ॒ त्वमेक॒ इन्नृ॒षाह्य॒ इन्द्र॒ ब्रह्मा॑णि व॒र्धय॑न्॥

प्रेदं ब्रह्म॑ वृत्र॒तूर्ये॑ष्वाविथ॒ प्र सु॑न्व॒तः श॑चीपत॒ इन्द्र॒ विश्वा॑भिरू॒तिभिः॑। माध्यं॑दिनस्य॒ सव॑नस्य वृत्रहन्ननेद्य॒ पिबा॒ सोम॑स्य वज्रिवः॥

से॒हा॒न उ॑ग्र॒ पृत॑ना अ॒भि द्रुहः॑ शचीपत॒ इन्द्र॒ विश्वा॑भिरू॒तिभिः॑। माध्यं॑दिनस्य॒ सव॑नस्य वृत्रहन्ननेद्य॒ पिबा॒ सोम॑स्य वज्रिवः॥

ए॒क॒राळ॒स्य भुव॑नस्य राजसि शचीपत॒ इन्द्र॒ विश्वा॑भिरू॒तिभिः॑। माध्यं॑दिनस्य॒ सव॑नस्य वृत्रहन्ननेद्य॒ पिबा॒ सोम॑स्य वज्रिवः॥

स॒स्थावा॑ना यवयसि॒ त्वमेक॒ इच्छ॑चीपत॒ इन्द्र॒ विश्वा॑भिरू॒तिभिः॑। माध्यं॑दिनस्य॒ सव॑नस्य वृत्रहन्ननेद्य॒ पिबा॒ सोम॑स्य वज्रिवः॥

क्षेम॑स्य च प्र॒युज॑श्च॒ त्वमी॑शिषे शचीपत॒ इन्द्र॒ विश्वा॑भिरू॒तिभिः॑। माध्यं॑दिनस्य॒ सव॑नस्य वृत्रहन्ननेद्य॒ पिबा॒ सोम॑स्य वज्रिवः॥

क्ष॒त्राय॑ त्व॒मव॑सि॒ न त्व॑माविथ शचीपत॒ इन्द्र॒ विश्वा॑भिरू॒तिभिः॑। माध्यं॑दिनस्य॒ सव॑नस्य वृत्रहन्ननेद्य॒ पिबा॒ सोम॑स्य वज्रिवः॥

श्या॒वाश्व॑स्य॒ रेभ॑त॒स्तथा॑ शृणु॒ यथाशृ॑णो॒रत्रेः॒ कर्मा॑णि कृण्व॒तः। प्र त्र॒सद॑स्युमाविथ॒ त्वमेक॒ इन्नृ॒षाह्य॒ इन्द्र॑ क्ष॒त्राणि॑ व॒र्धय॑न्॥

य॒ज्ञस्य॒ हि स्थ ऋ॒त्विजा॒ सस्नी॒ वाजे॑षु॒ कर्म॑सु। इन्द्रा॑ग्नी॒ तस्य॑ बोधतम्॥

इन्द्र का कर्म राज्यशासन है, अतः इससे यहाँ क्षत्रिय का ग्रहण है और अग्नि का कर्म यज्ञशासन है, अतः इससे ब्राह्मण का ग्रहण है अथवा राजा और दूत, क्योंकि अग्नि को दूत कहा है। ब्राह्मण, क्षत्रिय को उचित है कि वे कदापि भी ईश्वरीय आज्ञाओं का तिरस्कार न करें॥१॥

तो॒शासा॑ रथ॒यावा॑ना वृत्र॒हणाप॑राजिता। इन्द्रा॑ग्नी॒ तस्य॑ बोधतम्॥

जिस हेतु ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों प्रत्येक प्रकार के विघ्नों के शमन करनेवाले हैं, अतः वे कभी न अपना अधिकार भूलें और न उससे प्रमाद करें॥२॥

इ॒दं वां॑ मदि॒रं मध्वधु॑क्ष॒न्नद्रि॑भि॒र्नरः॑। इन्द्रा॑ग्नी॒ तस्य॑ बोधतम्॥

ब्राह्मण और क्षत्रिय को प्रसन्न और सुखी रखने के लिये ये प्रजाजन अति परिश्रम से नाना वस्तु पैदा कर रहे हैं, यह बात इन्हें भूलना न चाहिये, किन्तु स्मरण रख सबकी रक्षा में ये प्रवृत्त रहें॥३॥

जु॒षेथां॑ य॒ज्ञमि॒ष्टये॑ सु॒तं सोमं॑ सधस्तुती। इन्द्रा॑ग्नी॒ आ ग॑तं नरा॥

राजा और ब्राह्मण या राजा और दूत, दोनों मिलकर यज्ञ की रक्षा करें॥४॥

इ॒मा जु॑षेथां॒ सव॑ना॒ येभि॑र्ह॒व्यान्यू॒हथुः॑। इन्द्रा॑ग्नी॒ आ ग॑तं नरा॥

यज्ञादि शुभकर्मों में जिस-२ उद्देश्य से जो-२ दान हो, उनको वहाँ-२ राजा और दूत पहुँचाने का प्रयत्न करें॥५॥

इ॒मां गा॑य॒त्रव॑र्तनिं जु॒षेथां॑ सुष्टु॒तिं मम॑। इन्द्रा॑ग्नी॒ आ ग॑तं नरा॥

प्रजाजन जहाँ राजा को बुलावें, वहाँ सगण जाकर रक्षा करें॥६॥

प्रा॒त॒र्याव॑भि॒रा ग॑तं दे॒वेभि॑र्जेन्यावसू। इन्द्रा॑ग्नी॒ सोम॑पीतये॥

राजा सदा धनसंग्रह करें और प्रजा के कार्य्य में उद्यत रहें॥७॥

श्या॒वाश्व॑स्य सुन्व॒तोऽत्री॑णां शृणुतं॒ हव॑म्। इन्द्रा॑ग्नी॒ सोम॑पीतये॥

रोगी और अनाथादि सबसे प्रथम द्रष्टव्य और पालनीय है॥८॥

ए॒वा वा॑मह्व ऊ॒तये॒ यथाहु॑वन्त॒ मेधि॑राः। इन्द्रा॑ग्नी॒ सोम॑पीतये॥

राजा को उचित है कि विद्वानों और मूर्खों, दोनों की विनती ध्यान से सुनें॥९॥

आहं सर॑स्वतीवतोरिन्द्रा॒ग्न्योरवो॑ वृणे। याभ्यां॑ गाय॒त्रमृ॒च्यते॑॥

प्रजाजन राजा के निकट साहाय्यार्थ याचना करे॥१०॥

अ॒ग्निम॑स्तोष्यृ॒ग्मिय॑म॒ग्निमी॒ळा य॒जध्यै॑। अ॒ग्निर्दे॒वाँ अ॑नक्तु न उ॒भे हि वि॒दथे॑ क॒विर॒न्तश्चर॑ति दू॒त्यं१॒॑ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

ऐसे स्थलों में अग्नि नाम ईश्वर का ही है, जो सर्वगत सर्वलीन है। जैसे सबमें अग्नि विद्यमान है, वह महाकवि और ध्येय पूज्य है॥१॥

न्य॑ग्ने॒ नव्य॑सा॒ वच॑स्त॒नूषु॒ शंस॑मेषाम्। न्यरा॑ती॒ ररा॑व्णां॒ विश्वा॑ अ॒र्यो अरा॑तीरि॒तो यु॑च्छन्त्वा॒मुरो॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

हम लोग प्राचीन भाषा और नवीन भाषा दोनों की उन्नति करें और अनाथादिकों को सदा दान किया करें, जो न देवें, उन्हें शिक्षा देकर दानपथ पर लावें॥२॥

अग्ने॒ मन्मा॑नि॒ तुभ्यं॒ कं घृ॒तं न जु॑ह्व आ॒सनि॑। स दे॒वेषु॒ प्र चि॑किद्धि॒ त्वं ह्यसि॑ पू॒र्व्यः शि॒वो दू॒तो वि॒वस्व॑तो॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

तत्त॑द॒ग्निर्वयो॑ दधे॒ यथा॑यथा कृप॒ण्यति॑। ऊ॒र्जाहु॑ति॒र्वसू॑नां॒ शं च॒ योश्च॒ मयो॑ दधे॒ विश्व॑स्यै दे॒वहू॑त्यै॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

हे मनुष्यो! आवश्यकता के अनुसार वही सबमें शक्ति और सामर्थ्य दे रहा है, वही जीवों के अन्नों का भी प्रबन्ध कर रहा है, अतः वही पूज्यतम है॥४॥

स चि॑केत॒ सही॑यसा॒ग्निश्चि॒त्रेण॒ कर्म॑णा। स होता॒ शश्व॑तीनां॒ दक्षि॑णाभिर॒भीवृ॑त इ॒नोति॑ च प्रती॒व्यं१॒॑ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

जो जगदीश केवल सृष्टिरचनारूप द्वारा ही जाना जाता है, जो सर्वत्र विद्यमान है, वही सर्वपूज्य है॥५॥

अ॒ग्निर्जा॒ता दे॒वाना॑म॒ग्निर्वे॑द॒ मर्ता॑नामपी॒च्य॑म्। अ॒ग्निः स द्र॑विणो॒दा अ॒ग्निर्द्वारा॒ व्यू॑र्णुते॒ स्वा॑हुतो॒ नवी॑यसा॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

सर्व देवों का वह जनक है, सबकी दशा वह जानता है, सबका शासक है, इत्यादि दिखलाने से भाव यह है कि वही एक पूज्य है, अन्य नहीं॥६॥

अ॒ग्निर्दे॒वेषु॒ संव॑सुः॒ स वि॒क्षु य॒ज्ञिया॒स्वा। स मु॒दा काव्या॑ पु॒रु विश्वं॒ भूमे॑व पुष्यति दे॒वो दे॒वेषु॑ य॒ज्ञियो॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

सब देवों में वही एक परमपूज्य है। हे मनुष्यो! उसी की स्तुति प्रार्थना करो, अन्य की नहीं॥७॥

यो अ॒ग्निः स॒प्तमा॑नुषः श्रि॒तो विश्वे॑षु॒ सिन्धु॑षु। तमाग॑न्म त्रिप॒स्त्यं म॑न्धा॒तुर्द॑स्यु॒हन्त॑मम॒ग्निं य॒ज्ञेषु॑ पू॒र्व्यं नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

सप्तमानुष=दो नयन, दो कर्ण, दो घ्राण और एक रसना ये ही सप्त मनुष्य हैं। अथवा पृथिवी पर सात प्रकार के मनुष्यवंश। त्रिपस्त्यं=पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युलोक ये ही तीन लोक वा तीन गृह वा तीन स्थान हैं, अतः इनका शासक व्यापक जगदीश परमपूज्य है॥८॥

अ॒ग्निस्त्रीणि॑ त्रि॒धातू॒न्या क्षे॑ति वि॒दथा॑ क॒विः। स त्रीँरे॑काद॒शाँ इ॒ह यक्ष॑च्च पि॒प्रय॑च्च नो॒ विप्रो॑ दू॒तः परि॑ष्कृतो॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

त्रिधातु=पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युलोक ये तीनों धातु अर्थात् पदार्थ। अथवा ईश्वर, जीव और प्रकृति। अथवा कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय और अन्तरिन्द्रिय (मन आदि) ३२ देव=उत्तम, मध्यम और अधम भेद से एकादश इन्द्रिय ही ३३ देव हैं। पञ्चकर्मेन्द्रिय, पञ्चज्ञानेन्द्रिय और एक मन, ये ही एकादश (११) इन्द्रिय देव हैं। परमात्मा ही जब इन पर कृपा करता है, तब इनका प्रकाश होता है। अतः इस कारण भी वही पूज्यदेव है॥९॥

त्वं नो॑ अग्न आ॒युषु॒ त्वं दे॒वेषु॑ पूर्व्य॒ वस्व॒ एक॑ इरज्यसि। त्वामापः॑ परि॒स्रुतः॒ परि॑ यन्ति॒ स्वसे॑तवो॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

धनों की कामना से भी वही प्रार्थनीय है, क्योंकि सर्वधन का स्वामी वही है और जिससे धन उत्पन्न होता है, वह जल भी उसी के अधीन हैं॥१०॥

इन्द्रा॑ग्नी यु॒वं सु नः॒ सह॑न्ता॒ दास॑थो र॒यिम्। येन॑ दृ॒ळ्हा स॒मत्स्वा वी॒ळु चि॑त्साहिषी॒मह्य॒ग्निर्वने॑व॒ वात॒ इन्नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

न॒हि वां॑ व॒व्रया॑म॒हेऽथेन्द्र॒मिद्य॑जामहे॒ शवि॑ष्ठं नृ॒णां नर॑म्। स नः॑ क॒दा चि॒दर्व॑ता॒ गम॒दा वाज॑सातये॒ गम॒दा मे॒धसा॑तये॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

ता हि मध्यं॒ भरा॑णामिन्द्रा॒ग्नी अ॑धिक्षि॒तः। ता उ॑ कवित्व॒ना क॒वी पृ॒च्छ्यमा॑ना सखीय॒ते सं धी॒तम॑श्नुतं नरा॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

अ॒भ्य॑र्च नभाक॒वदि॑न्द्रा॒ग्नी य॒जसा॑ गि॒रा। ययो॒र्विश्व॑मि॒दं जग॑दि॒यं द्यौः पृ॑थि॒वी म॒ह्यु१॒॑पस्थे॑ बिभृ॒तो वसु॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

प्र ब्रह्मा॑णि नभाक॒वदि॑न्द्रा॒ग्निभ्या॑मिरज्यत। या स॒प्तबु॑ध्नमर्ण॒वं जि॒ह्मबा॑रमपोर्णु॒त इन्द्र॒ ईशा॑न॒ ओज॑सा॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

अपि॑ वृश्च पुराण॒वद्व्र॒तते॑रिव गुष्पि॒तमोजो॑ दा॒सस्य॑ दम्भय। व॒यं तद॑स्य॒ सम्भृ॑तं॒ वस्विन्द्रे॑ण॒ वि भ॑जेमहि॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

यदि॑न्द्रा॒ग्नी जना॑ इ॒मे वि॒ह्वय॑न्ते॒ तना॑ गि॒रा। अ॒स्माके॑भि॒र्नृभि॑र्व॒यं सा॑स॒ह्याम॑ पृतन्य॒तो व॑नु॒याम॑ वनुष्य॒तो नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

या नु श्वे॒ताव॒वो दि॒व उ॒च्चरा॑त॒ उप॒ द्युभिः॑। इ॒न्द्रा॒ग्न्योरनु॑ व्र॒तमुहा॑ना यन्ति॒ सिन्ध॑वो॒ यान्त्सीं॑ ब॒न्धादमु॑ञ्चतां॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

पू॒र्वीष्ट॑ इ॒न्द्रोप॑मातयः पू॒र्वीरु॒त प्रश॑स्तयः॒ सूनो॑ हि॒न्वस्य॑ हरिवः। वस्वो॑ वी॒रस्या॒पृचो॒ या नु साध॑न्त नो॒ धियो॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

तं शि॑शीता सुवृ॒क्तिभि॑स्त्वे॒षं सत्वा॑नमृ॒ग्मिय॑म्। उ॒तो नु चि॒द्य ओज॑सा॒ शुष्ण॑स्या॒ण्डानि॒ भेद॑ति॒ जेष॒त्स्व॑र्वतीर॒पो नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

तं शि॑शीता स्वध्व॒रं स॒त्यं सत्वा॑नमृ॒त्विय॑म्। उ॒तो नु चि॒द्य ओह॑त आ॒ण्डा शुष्ण॑स्य॒ भेद॒त्यजैः॒ स्व॑र्वतीर॒पो नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

ए॒वेन्द्रा॒ग्निभ्यां॑ पितृ॒वन्नवी॑यो मन्धातृ॒वद॑ङ्गिर॒स्वद॑वाचि। त्रि॒धातु॑ना॒ शर्म॑णा पातम॒स्मान्व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम्॥

अ॒स्मा ऊ॒ षु प्रभू॑तये॒ वरु॑णाय म॒रुद्भ्योऽर्चा॑ वि॒दुष्ट॑रेभ्यः। यो धी॒ता मानु॑षाणां प॒श्वो गा इ॑व॒ रक्ष॑ति॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

परमात्मा की पूजा यदि मन और श्रद्धा से की जाए, तो सर्व फल देती है और उस उपासक के सर्व विघ्न भी नष्ट हो जाते हैं॥१॥

तमू॒ षु स॑म॒ना गि॒रा पि॑तॄ॒णां च॒ मन्म॑भिः। ना॒भा॒कस्य॒ प्रश॑स्तिभि॒र्यः सिन्धू॑ना॒मुपो॑द॒ये स॒प्तस्व॑सा॒ स म॑ध्य॒मो नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

उसकी स्तुति अपनी भाषा द्वारा या पूर्व रचित स्तोत्र द्वारा किसी प्रकार करे, इससे मनुष्य का कल्याण है॥२॥

स क्षपः॒ परि॑ षस्वजे॒ न्यु१॒॑स्रो मा॒यया॑ दधे॒ स विश्वं॒ परि॑ दर्श॒तः। तस्य॒ वेनी॒रनु॑ व्र॒तमु॒षस्ति॒स्रो अ॑वर्धय॒न्नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

वह परमात्मा सब काल में सर्वत्र व्यापक है, यह जान पापों से निवृत्त रहे॥३॥

यः क॒कुभो॑ निधार॒यः पृ॑थि॒व्यामधि॑ दर्श॒तः। स माता॑ पू॒र्व्यं प॒दं तद्वरु॑णस्य॒ सप्त्यं॒ स हि गो॒पा इ॒वेर्यो॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

जिस कारण वह जगत् का कर्ता है, अतः सर्व भाव से वही पूज्य और उपास्यदेव है॥४॥

यो ध॒र्ता भुव॑नानां॒ य उ॒स्राणा॑मपी॒च्या॒३॒॑ वेद॒ नामा॑नि॒ गुह्या॑। स क॒विः काव्या॑ पु॒रु रू॒पं द्यौरि॑व पुष्यति॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

यस्मि॒न्विश्वा॑नि॒ काव्या॑ च॒क्रे नाभि॑रिव श्रि॒ता। त्रि॒तं जू॒ती स॑पर्यत व्र॒जे गावो॒ न सं॒युजे॑ यु॒जे अश्वाँ॑ अयुक्षत॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

ईश्वर स्वयं महाकवि है, तथापि अपनी वाणी पवित्र करने के लिये ईश्वरीय स्तोत्र रचते हैं। स्वकल्याणार्थ उसको पूजो। आलस्य मत करो॥६॥

य आ॒स्वत्क॑ आ॒शये॒ विश्वा॑ जा॒तान्ये॑षाम्। परि॒ धामा॑नि॒ मर्मृ॑श॒द्वरु॑णस्य पु॒रो गये॒ विश्वे॑ दे॒वा अनु॑ व्र॒तं नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

जिस ईश्वर के नियम के अनुसार सब सूर्य्यादि देव चल रहे हैं, हे मनुष्यों! उसकी पूजा करो॥७॥

स स॑मु॒द्रो अ॑पी॒च्य॑स्तु॒रो द्यामि॑व रोहति॒ नि यदा॑सु॒ यजु॑र्द॒धे। स मा॒या अ॒र्चिना॑ प॒दास्तृ॑णा॒न्नाक॒मारु॑ह॒न्नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

जिस कारण वह कपटता नहीं चाहता, अतः निष्कपट होकर उसकी उपासना करो और उसको अपने-२ हृदय में देखो॥८॥

यस्य॑ श्वे॒ता वि॑चक्ष॒णा ति॒स्रो भूमी॑रधिक्षि॒तः। त्रिरुत्त॑राणि प॒प्रतु॒र्वरु॑णस्य ध्रु॒वं सदः॒ स स॑प्ता॒नामि॑रज्यति॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

इस ऋचा द्वारा परमात्मा की महती शक्ति दिखलाते हैं। जीवात्मा की दृष्टि में ये तीन लोक हैं, परन्तु लोक-लोकान्तर की कोई संख्या नहीं है। आनन्तर यह सृष्टि है। परमात्मा उनसे भी ऊपर रहता हुआ सबमें है, यह इसकी आश्चर्य्यलीला है। हे मनुष्यों! विचारदृष्टि से इसकी विभूतियाँ देखो और तुम क्या हो, सो भी विचारो॥९॥

यः श्वे॒ताँ अधि॑निर्णिजश्च॒क्रे कृ॒ष्णाँ अनु॑ व्र॒ता। स धाम॑ पू॒र्व्यं म॑मे॒ यः स्क॒म्भेन॒ वि रोद॑सी अ॒जो न द्यामधा॑रय॒न्नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

अस्त॑भ्ना॒द्द्यामसु॑रो वि॒श्ववे॑दा॒ अमि॑मीत वरि॒माणं॑ पृथि॒व्याः। आसी॑द॒द्विश्वा॒ भुव॑नानि स॒म्राड्विश्वेत्तानि॒ वरु॑णस्य व्र॒तानि॑॥

ए॒वा व॑न्दस्व॒ वरु॑णं बृ॒हन्तं॑ नम॒स्या धीर॑म॒मृत॑स्य गो॒पाम्। स नः॒ शर्म॑ त्रि॒वरू॑थं॒ वि यं॑सत्पा॒तं नो॑ द्यावापृथिवी उ॒पस्थे॑॥

जो ईश्वर की पूजा और वन्दना करते हैं, उनकी सब ही पदार्थ रक्षा करते हैं। अतः हे मनुष्यों केवल उसी की पूजा करो। यदि अपनी रक्षा चाहते हो॥२॥

इ॒मां धियं॒ शिक्ष॑माणस्य देव॒ क्रतुं॒ दक्षं॑ वरुण॒ सं शि॑शाधि। ययाति॒ विश्वा॑ दुरि॒ता तरे॑म सु॒तर्मा॑ण॒मधि॒ नावं॑ रुहेम॥

हे देव! बुद्धि, बल और क्रियाशक्ति, ये तीनों हमको दे, जिससे पापादि दुःखों को तैर कर विज्ञानरूपी नौका पर चढ़ तेरे निकट पहुँच सकें॥३॥

आ वां॒ ग्रावा॑णो अश्विना धी॒भिर्विप्रा॑ अचुच्यवुः। नास॑त्या॒ सोम॑पीतये॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

विद्वानों के ऊपर भी यदि कोई आपत्ति आवे तो वे भी राजा और अमात्यादि राज्य प्रबन्धकर्त्ताओं के निकट जावें और उनसे साहाय्य लेकर निखिल विघ्नों को नष्ट करें॥४॥

यथा॑ वा॒मत्रि॑रश्विना गी॒र्भिर्विप्रो॒ अजो॑हवीत्। नास॑त्या॒ सोम॑पीतये॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

राजा और राज्य-कर्मचारियों को उचित है कि विद्वान्, मूर्ख, धनी, गरीब और असहाय आदि सर्व प्रकार के मनुष्यों की पूरी रक्षा करें, जिससे कोई विघ्न न रहने पावे॥५॥

ए॒वा वा॑मह्व ऊ॒तये॒ यथाहु॑वन्त॒ मेधि॑राः। नास॑त्या॒ सोम॑पीतये॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे॥

राजा का सत्कार सब कोई करे॥६॥

सूक्तम्

इ॒मे विप्र॑स्य वे॒धसो॒ऽग्नेरस्तृ॑तयज्वनः। गिरः॒ स्तोमा॑स ईरते॥

जिस ईश्वर के उपासक कभी दुःख में निमग्न नहीं होते, उसकी ही स्तुति मेरी जिह्वा करे, उसी की ओर मेरा ध्यानवचन पहुँचे॥१॥

अस्मै॑ ते प्रति॒हर्य॑ते॒ जात॑वेदो॒ विच॑र्षणे। अग्ने॒ जना॑मि सुष्टु॒तिम्॥

भगवान् स्वयं सर्वज्ञ और सर्वज्ञानमय है। उसी की स्तुति हम लोग अपने कल्याण के लिये करें। वह परमदेव इतना अवश्य चाहता है कि समस्त प्राणी मेरी आज्ञा पर चलें॥२॥

आ॒रो॒का इ॑व॒ घेदह॑ ति॒ग्मा अ॑ग्ने॒ तव॒ त्विषः॑। द॒द्भिर्वना॑नि बप्सति॥

ईश्वर की तीक्ष्ण दीप्ति ये ही सूर्य्यादिक हैं, जिनसे जगत् को कितने लाभ हो रहे हैं, उसको कौन वर्णन कर सकता है। ये ऋचाएँ भौतिक अग्नि के विषय में भी लगाई जा सकती हैं॥३॥

हर॑यो धू॒मके॑तवो॒ वात॑जूता॒ उप॒ द्यवि॑। यत॑न्ते॒ वृथ॑ग॒ग्नयः॑॥

उसकी महती शक्ति है, जिससे सूर्य्यादि लोकों में भी कार्य्य हो रहे हैं, हे मनुष्यों! आप उसी की पूजा कीजिये॥४॥

ए॒ते त्ये वृथ॑ग॒ग्नय॑ इ॒द्धासः॒ सम॑दृक्षत। उ॒षसा॑मिव के॒तवः॑॥

जिस ईश्वर के उत्पादित ये सूर्य्यादि अग्नि जगत् में उपकार कर रहे हैं, उसकी उपासना करो। उसकी परम विभूतियाँ देखो। तब ही उस प्रभु को पहिचान सकते हो॥५॥

कृ॒ष्णा रजां॑सि पत्सु॒तः प्र॒याणे॑ जा॒तवे॑दसः। अ॒ग्निर्यद्रोध॑ति॒ क्षमि॑॥

कहीं-२ पर वेद भगवान् स्वाभाविक वर्णन दिखलाते हैं, जिससे मनुष्य यह शिक्षा ग्रहण करे कि प्रथम प्रत्येक वस्तु का मोटा-मोटा गुण जाने। तत्पश्चात् विशेष गुण का अध्ययन करे। हे मनुष्यों! इन बातों की सूक्ष्मता की ओर ध्यान दो॥६॥

धा॒सिं कृ॑ण्वा॒न ओष॑धी॒र्बप्स॑द॒ग्निर्न वा॑यति। पुन॒र्यन्तरु॑णी॒रपि॑॥

यह भी स्वाभाविक वर्णन है। आग्नेय शक्तियाँ ही पदार्थमात्र को बढ़ाती और घटाती हैं। इस कारण सदा पदार्थों में अनपचय और अपचय होता ही रहता है, हे मनुष्यों! यह पदार्थगति देख ईश्वर के चिन्तन में लगो। एक दिन तुम्हारा भी अपचय आरम्भ होगा॥७॥

जि॒ह्वाभि॒रह॒ नन्न॑मद॒र्चिषा॑ जञ्जणा॒भव॑न्। अ॒ग्निर्वने॑षु रोचते॥

हे मनुष्यों! प्रथम भौतिक अग्नि के गुणों का पठन-पाठन करो। देखो, कैसी तीक्ष्ण इसकी गति है और इससे कौन-२ कार्य्य हो रहे हैं॥८॥

अ॒प्स्व॑ग्ने॒ सधि॒ष्टव॒ सौष॑धी॒रनु॑ रुध्यसे। गर्भे॒ सञ्जा॑यसे॒ पुनः॑॥

यह ऋचा भौतिक और ईश्वर दोनों में घट सकती है। ईश्वर भी जलों और ओषधियों में व्यापक है और इनके ही द्वारा प्रकट भी होता है। भौतिक अग्नि के इस गुण के वर्णन से वेद का तात्पर्य्य यह है कि परमात्मा का बनाया हुआ यह अग्नि कैसा विलक्षण है। मेघ और समुद्र में भी रहता, वहाँ वह बुझता नहीं। विद्युत् जल से ही उत्पन्न होती, परन्तु जल इसको शमित नहीं कर सकता, यह कैसा आश्चर्य्य है॥९॥

उद॑ग्ने॒ तव॒ तद्घृ॒ताद॒र्ची रो॑चत॒ आहु॑तम्। निंसा॑नं जु॒ह्वो॒३॒॑ मुखे॑॥

इससे वेद भगवान् यह शिक्षा देते हैं कि अग्नि में प्रतिदिन विविध सामग्रियों से होम किया करो, होम के लिये जुहू, उपभृत्, स्रुक् आदि नाना साधन तैयार करले और यह ध्यान रक्खे कि धूम न होने पावे किन्तु निरन्तर ज्वाला ही उठती रहे। इस प्रकार हवन से अनेक कल्याण होंगे॥१०॥

उ॒क्षान्ना॑य व॒शान्ना॑य॒ सोम॑पृष्ठाय वे॒धसे॑। स्तोमै॑र्विधेमा॒ग्नये॑॥

जो सबका धाता विधाता ईश है, उसकी उपासना सर्व भाव से करो॥११॥

उ॒त त्वा॒ नम॑सा व॒यं होत॒र्वरे॑ण्यक्रतो। अग्ने॑ स॒मिद्भि॑रीमहे॥

कामनाओं की पूर्ति के लिये अन्यान्य देवों से याचना लोग करते हैं। इस ऋचा द्वारा उसका निषेध कर केवल ईश्वर से ही याचना करनी चाहिये, यह शिक्षा देते हैं॥१२॥

उ॒त त्वा॑ भृगु॒वच्छु॑चे मनु॒ष्वद॑ग्न आहुत। अ॒ङ्गि॒र॒स्वद्ध॑वामहे॥

त्वं ह्य॑ग्ने अ॒ग्निना॒ विप्रो॒ विप्रे॑ण॒ सन्त्स॒ता। सखा॒ सख्या॑ समि॒ध्यसे॑॥

जैसे सूर्य्य और वायु आदि दृश्य होते हैं, तद्वत् परमात्मा स्वरूप से कहीं पर भी दृश्य नहीं होता। उसकी कोई आकृति रूप नहीं। अतः वेद भगवान् कहते हैं कि तत्-तत् रूप के साथ तत्-तत् स्वरूप ही वह है। “रूपं-रूपं प्रतिरूपो बभूव” इत्यादि भी इसी अभिप्राय से कहा गया है, अतः वह अगम्य हो रहा है॥१४॥

स त्वं विप्रा॑य दा॒शुषे॑ र॒यिं दे॑हि सह॒स्रिण॑म्। अग्ने॑ वी॒रव॑ती॒मिष॑म्॥

भगवान् उसी के ऊपर अपने आशीर्वाद की वर्षा करता है, जो स्वयं परिश्रमी हो और जो धन या ज्ञान प्राप्त कर दूसरों का उपकार करता हो। अतः विप्र और दाश्वान् पद आया है, जो परिश्रम करके प्राकृत जगत् से अथवा विद्वानों से शिक्षा लाभ करता है, वही विप्र मेधावी होता है। जिसने कुछ दिया है या देता है, उसी को दाश्वान् कहते हैं। वीरवती। जिस मनुष्य में वीरता नहीं है, जगत् में उसका आना और न आना बराबर है। अवीर पुरुष अपनी जीविका भी उचितरूप से नहीं कर सकता॥१५॥

अग्ने॒ भ्रातः॒ सह॑स्कृत॒ रोहि॑दश्व॒ शुचि॑व्रत। इ॒मं स्तोमं॑ जुषस्व मे॥

उ॒त त्वा॑ग्ने॒ मम॒ स्तुतो॑ वा॒श्राय॑ प्रति॒हर्य॑ते। गो॒ष्ठं गाव॑ इवाशत॥

जैसे वत्स के लिये गौ दौड़कर गोष्ठ में जाती है, तद्वत् मेरे स्तोत्र भी शीघ्रता से आपके निकट प्राप्त हों। यह इसका आशय है॥१७॥

तुभ्यं॒ ता अ॑ङ्गिरस्तम॒ विश्वाः॑ सुक्षि॒तयः॒ पृथ॑क्। अग्ने॒ कामा॑य येमिरे॥

परमात्मा ही एक पूज्य, स्तुत्य, ध्येय और गेय है, यह शिक्षा इससे देते हैं॥१८॥

अ॒ग्निं धी॒भिर्म॑नी॒षिणो॒ मेधि॑रासो विप॒श्चितः॑। अ॒द्म॒सद्या॑य हिन्विरे॥

हे मनुष्यों! जब श्रेष्ठ पुरुष निखिल मनोरथ की सिद्धि के लिये उसी को प्रसन्न करते हैं, तब आप भी अन्यान्य भौतिक अग्नि सूर्य्यादिकों की उपासना पूजा छोड़कर केवल उसी को पूजो॥१९॥

तं त्वामज्मे॑षु वा॒जिनं॑ तन्वा॒ना अ॑ग्ने अध्व॒रम्। वह्निं॒ होता॑रमीळते॥

प्रत्येक शुभकर्म में वही ईश्वर पूज्य है, अन्य नहीं॥२०॥

पु॒रु॒त्रा हि स॒दृङ्ङसि॒ विशो॒ विश्वा॒ अनु॑ प्र॒भुः। स॒मत्सु॑ त्वा हवामहे॥

जिस कारण परमात्मा में किञ्चिन्मात्र भी पक्षपात का लेश नहीं है और सबका स्वामी भी वही है, अतः उसी को सब पूजते चले आते हैं। इस समय भी तुम उसी की कीर्ति गाओ॥२१॥

तमी॑ळिष्व॒ य आहु॑तो॒ऽग्निर्वि॒भ्राज॑ते घृ॒तैः। इ॒मं नः॑ शृणव॒द्धव॑म्॥

जिस कारण परमात्मा चेतन देव है, अतः वह हमारी प्रार्थना स्तुति को सुनता है। अन्य सूर्य्यादि देव जड़ हैं, अतः वे हमारी प्रार्थना को नहीं सुन सकते। इस कारण केवल ईश्वर की ही स्तुति कर्त्तव्य है॥२२॥

तं त्वा॑ व॒यं ह॑वामहे शृ॒ण्वन्तं॑ जा॒तवे॑दसम्। अग्ने॒ घ्नन्त॒मप॒ द्विषः॑॥

जिस कारण वही देव हमारी प्रार्थनाएँ सुनता और निखिल विघ्नों को दूर करता, अतः वही एक मनुष्यों का परम पूज्य ध्येय और स्तुत्य है॥२३॥

वि॒शां राजा॑न॒मद्भु॑त॒मध्य॑क्षं॒ धर्म॑णामि॒मम्। अ॒ग्निमी॑ळे॒ स उ॑ श्रवत्॥

सबका अधिपति और अध्यक्ष वही परमात्मा है, अतः क्या विद्वान् क्या मूर्ख क्या राजा और प्रजा, सबका वही पूज्य देव है॥२४॥

अ॒ग्निं वि॒श्वायु॑वेपसं॒ मर्यं॒ न वा॒जिनं॑ हि॒तम्। सप्तिं॒ न वा॑जयामसि॥

हे मनुष्यों! उसकी विभूति देखो, सूर्य्यादिकों को भी वह बलप्रद है। वही सबका हितकारी है, उसी की उपासना करो॥२५॥

घ्नन्मृ॒ध्राण्यप॒ द्विषो॒ दह॒न्रक्षां॑सि वि॒श्वहा॑। अग्ने॑ ति॒ग्मेन॑ दीदिहि॥

उसकी कृपा से मनुष्यों के निखिल विघ्न शान्त होते हैं, अतः हे मनुष्यों! उसी की उपासना करो॥२६॥

यं त्वा॒ जना॑स इन्ध॒ते म॑नु॒ष्वद॑ङ्गिरस्तम। अग्ने॒ स बो॑धि मे॒ वचः॑॥

हे भगवन्! मैं आपकी केवल स्तुति ही करता हूँ, इसी के ऊपर कृपा कर। यद्यपि तुझको ध्यान में योगिगण देखते हैं, तथापि मैं उसमें असमर्थ होकर केवल तेरी कीर्ति गाता हूँ॥२७॥

यद॑ग्ने दिवि॒जा अस्य॑प्सु॒जा वा॑ सहस्कृत। तं त्वा॑ गी॒र्भिर्ह॑वामहे॥

लोक समझते हैं कि भगवान् सूर्य्य अग्नि आदि तेजस पदार्थों में ही व्यापक है। इस ऋचा द्वारा दिखलाते हैं कि भगवान् सर्वत्र व्यापक है। जो सबमें व्याप्त है, उसी की कीर्ति हम गाते हैं। आप भी गावें॥२८॥

तुभ्यं॒ घेत्ते जना॑ इ॒मे विश्वाः॑ सुक्षि॒तयः॒ पृथ॑क्। धा॒सिं हि॑न्व॒न्त्यत्त॑वे॥

उसी की कृपा से अन्न की भी प्राप्ति होती है, वायु, जल और सूर्य्य का प्रकाश ये तीनों प्राणियों के अस्तित्व के परम साधन हैं, जिनके विना क्षणमात्र भी प्राणी नहीं रह सकता। उनको इसने बहुत-२ राशि में बना रक्खा है। तथापि इनको छोड़ विविध गेहूँ, जौ आदि अन्नों की आवश्यकता है। इन अन्नों को परमात्मा दान दे रहा है, अतः वही देव उपास्य पूज्य है॥२९॥

ते घेद॑ग्ने स्वा॒ध्योऽहा॒ विश्वा॑ नृ॒चक्ष॑सः। तर॑न्तः स्याम दु॒र्गहा॑॥

जब ज्ञानी जन अपनी तथा अन्यान्य जीवों की विचित्र दशाओं पर ध्यान देते हैं, तब उनसे घृणा और वैराग्य उत्पन्न होता है, तत्पश्चात् उनकी निवृत्ति के लिये ईश्वर के निकट पहुँचता है। सदा ईश्वर की ओर आओ, यह शिक्षा इससे देते हैं॥३०॥

अ॒ग्निं म॒न्द्रं पु॑रुप्रि॒यं शी॒रं पा॑व॒कशो॑चिषम्। हृ॒द्भिर्म॒न्द्रेभि॑रीमहे॥

सब कोई उसी देव की पूजा उपासना करें, अन्य की नहीं॥३१॥

स त्वम॑ग्ने वि॒भाव॑सुः सृ॒जन्त्सूर्यो॒ न र॒श्मिभिः॑। शर्ध॒न्तमां॑सि जिघ्नसे॥

परमात्मा के ध्यान और पूजन से अन्तःकरण उज्ज्वल होता जाता है और वह उपासक दिन-२ पाप से छूटता जाता है॥–३२॥

तत्ते॑ सहस्व ईमहे दा॒त्रं यन्नोप॒दस्य॑ति। त्वद॑ग्ने॒ वार्यं॒ वसु॑॥

अपने पुरुषार्थ से लौकिक धन उपार्जन करे, परन्तु विज्ञानरूप धन उस जगदीश्वर से माँगे॥३३॥

स॒मिधा॒ग्निं दु॑वस्यत घृ॒तैर्बो॑धय॒ताति॑थिम्। आस्मि॑न्ह॒व्या जु॑होतन॥

भगवान् उपदेश देते हैं कि अग्निहोत्र प्रतिदिन करो। घृत, चन्दन, गुग्गुल, केसर आदि उपकरणों से शाकल्य तैयार कर सुशोभन कुण्ड बना उसमें अग्नि प्रदीप्त कर होमो॥१॥

अग्ने॒ स्तोमं॑ जुषस्व मे॒ वर्ध॑स्वा॒नेन॒ मन्म॑ना। प्रति॑ सू॒क्तानि॑ हर्य नः॥

अग्निहोत्रकाल में नाना स्तोत्र बनाकर ईश्वर की कीर्ति गाओ और सुन्दर भाषा से उसकी स्तुति और प्रार्थना करो॥२॥

अ॒ग्निं दू॒तं पु॒रो द॑धे हव्य॒वाह॒मुप॑ ब्रुवे। दे॒वाँ आ सा॑दयादि॒ह॥

ध्यान-योगसमय मन में ईश्वर को स्थापित कर इन्द्रियों को वश में ला स्तुति प्रार्थना करे॥३॥

उत्ते॑ बृ॒हन्तो॑ अ॒र्चयः॑ समिधा॒नस्य॑ दीदिवः। अग्ने॑ शु॒क्रास॑ ईरते॥

ईश्वर सबमें व्यापक होकर स्वतेज से सबको प्रदीप्त कर रहा है। अग्नि और सूर्य्यादिक में उसी की दीप्ति है, पृथिवी में उसकी शक्ति से सर्व वस्तु उत्पन्न हो रही हैं। वायु में उसकी गति है। इस अनन्त ईश्वर की उपासना करो, जिससे हे मनुष्यों! तुम्हारा कल्याण हो॥४॥

उप॑ त्वा जु॒ह्वो॒३॒॑ मम॑ घृ॒ताची॑र्यन्तु हर्यत। अग्ने॑ ह॒व्या जु॑षस्व नः॥

हे मनुष्यों! तुम वैसे शुद्ध कर्म करो, जिससे परमात्मा प्रसन्न हो॥५॥

म॒न्द्रं होता॑रमृ॒त्विजं॑ चि॒त्रभा॑नुं वि॒भाव॑सुम्। अ॒ग्निमी॑ळे॒ स उ॑ श्रवत्॥

हे मनुष्यों! उसी की उपासना करो, जो तुम्हारी बातों को सुनता और पूर्ण करता है॥६॥

प्र॒त्नं होता॑र॒मीड्यं॒ जुष्ट॑म॒ग्निं क॒विक्र॑तुम्। अ॒ध्व॒राणा॑मभि॒श्रिय॑म्॥

वही ईश पूज्य है, यह शिक्षा इससे देते हैं॥७॥

जु॒षा॒णो अ॑ङ्गिरस्तमे॒मा ह॒व्यान्या॑नु॒षक्। अग्ने॑ य॒ज्ञं न॑य ऋतु॒था॥

हे ईश्वर! मुझमें तथा सर्व मनुष्यों में ऐसी शक्ति, श्रद्धा और भक्ति दे, जिनसे सर्वदा सर्व ऋतु में तेरी उपासना पूजा कर सकें॥८॥

स॒मि॒धा॒न उ॑ सन्त्य॒ शुक्र॑शोच इ॒हा व॑ह। चि॒कि॒त्वान्दैव्यं॒ जन॑म्॥

मनुष्य प्रथम अपने को शुद्ध सत्य और उदार बनावे, तब ईश्वर के निकट याचना करे॥९॥

विप्रं॒ होता॑रम॒द्रुहं॑ धू॒मके॑तुं वि॒भाव॑सुम्। य॒ज्ञानां॑ के॒तुमी॑महे॥

अनेक विशेष देने से तात्पर्य यह है कि उपासक के मन में ईश्वर के गुण बैठ जाएँ और वह उपासक भी सम्पूर्ण माननीय सद्गुणों से संयुक्त होवे॥१०॥

अग्ने॒ नि पा॑हि न॒स्त्वं प्रति॑ ष्म देव॒ रीष॑तः। भि॒न्धि द्वेषः॑ सहस्कृत॥

प्रत्येक आदमी यदि द्वेष छोड़ता जाए, तो द्वेषी कहाँ रहेगा। जब अपने पर आपत्ति आती है, तब आदमी ईश्वर और सत्यता की पुकार मचाता है। इस अवस्था में प्रत्येक मनुष्य को विचार-कर देखना चाहिये कि द्वेष कहाँ से आता है। अपनी-अपनी भावी आपत्ति देख यदि आदमी अन्याय और असत्यता से निवृत्त हो जाए, तो कितना सुख पहुँचे। यही शिक्षा इस मन्त्र द्वारा दी जाती है॥११॥

अ॒ग्निः प्र॒त्नेन॒ मन्म॑ना॒ शुम्भा॑नस्त॒न्वं१॒॑ स्वाम्। क॒विर्विप्रे॑ण वावृधे॥

इस का तात्पर्य्य यह है कि मन से और प्रेम से ध्यात, गीत, स्तुत होने पर वह प्रसन्न होता है और उस उपासक के साथ सदा निवास करता है॥१२॥

ऊ॒र्जो नपा॑त॒मा हु॑वे॒ऽग्निं पा॑व॒कशो॑चिषम्। अ॒स्मिन्य॒ज्ञे स्व॑ध्व॒रे॥

अध्वर और यज्ञ दोनों शब्द एकार्थक हैं, तथापि यहाँ विशेषणवत् अध्वर शब्द प्रयुक्त हुआ है। भाव इसका यह है कि ईश्वर बलदाता है, उसकी उपासना से महान् बल प्राप्त होता है॥१३॥

स नो॑ मित्रमह॒स्त्वमग्ने॑ शु॒क्रेण॑ शो॒चिषा॑। दे॒वैरा स॑त्सि ब॒र्हिषि॑॥

ईश्वर को हृदय में बैठाकर ध्यान करे और इन्द्रियों को प्रथम वश कर उसकी स्तुति मन से करे॥१४॥

यो अ॒ग्निं त॒न्वो॒३॒॑ दमे॑ दे॒वं मर्तः॑ सप॒र्यति॑। तस्मा॒ इद्दी॑दय॒द्वसु॑॥

मनुष्य मिथ्या ज्ञान के कारण नाना तीर्थों में जाकर उसकी पूजा करता है और समझता है कि इन स्थानों में वह पूज्य इष्टदेव साक्षात् विराजमान है, जिसके दर्शन पूजन आदि से निखिल पाप छूटते हैं, यह मिथ्या भ्रम है। हे मनुष्यों! यह सर्वत्र है। अपने हृदय को पवित्र कर उसी को शुद्ध मन्दिर मान वहाँ ही उसकी पूजा करो॥१५॥

अ॒ग्निर्मू॒र्धा दि॒वः क॒कुत्पतिः॑ पृथि॒व्या अ॒यम्। अ॒पां रेतां॑सि जिन्वति॥

हे मनुष्यों! जो ईश्वर त्रिभुवन का अधिपति और स्थावरों और जङ्गमों का प्राणस्वरूप है, उसकी आज्ञाएँ मानो और उसी को जान पहिचान कर पूजो। स्तुति करो। अन्य की पूजा छोड़ो॥१६॥

उद॑ग्ने॒ शुच॑य॒स्तव॑ शु॒क्रा भ्राज॑न्त ईरते। तव॒ ज्योतीं॑ष्य॒र्चयः॑॥

हे मनुष्यों! ईश्वर का तेज देखो। सूर्य्य उसकी ज्वाला है। तुम स्वयं उसके ज्योति हो। जिसमें सर्वज्ञान भरा हुआ है, वह मानवजाति किस प्रकार भटक रही है॥१७॥

ईशि॑षे॒ वार्य॑स्य॒ हि दा॒त्रस्या॑ग्ने॒ स्व॑र्पतिः। स्तो॒ता स्यां॒ तव॒ शर्म॑णि॥

जिस कारण वह ईश्वर सुख और प्रकाशक अधिपति है और धनों का भी वही स्वामी है, अतः हे मनुष्यों! उसी की शरण लो। उसी की कीर्ति गाते हुए स्तुति पाठक और विद्वान् बनो॥१८॥

त्वाम॑ग्ने मनी॒षिण॒स्त्वां हि॑न्वन्ति॒ चित्ति॑भिः। त्वां व॑र्धन्तु नो॒ गिरः॑॥

विद्वानों को उचित है कि वे उसी की पूजा करें करवावें और उसी की कीर्ति गावें। इतर जन भी इनका ही अनुकरण करें॥१९॥

अद॑ब्धस्य स्व॒धाव॑तो दू॒तस्य॒ रेभ॑तः॒ सदा॑। अ॒ग्नेः स॒ख्यं वृ॑णीमहे॥

हे मनुष्यों! उस परमात्मा के साथ मित्रता करो, जिससे तुम्हारा परम कल्याण होगा। जो सदा रहनेवाला है॥२०॥

अ॒ग्निः शुचि॑व्रततमः॒ शुचि॒र्विप्रः॒ शुचिः॑ क॒विः। शुची॑ रोचत॒ आहु॑तः॥

ईश्वर परम पवित्र है, अतः उसकी उपासना भी पवित्र बनकर करो॥२१॥

उ॒त त्वा॑ धी॒तयो॒ मम॒ गिरो॑ वर्धन्तु वि॒श्वहा॑। अग्ने॑ स॒ख्यस्य॑ बोधि नः॥

हे मनुष्यों! तुम्हारे ध्यान ईश्वर के गुण बढ़ानेवाले हों, तुम्हारे वचन भी उसी की कीर्ति बढ़ावें और गावें, उसी की शरण में तुम पहुँचो। तब ही तुमको वह मित्र के समान ग्रहण करेगा •॥२२॥

यद॑ग्ने॒ स्याम॒हं त्वं त्वं वा॑ घा॒ स्या अ॒हम्। स्युष्टे॑ स॒त्या इ॒हाशिषः॑॥

इसका आशय यह प्रतीत होता है कि मनुष्य अपनी न्यूनता के कारण ईश्वर से विविध कामनाएँ चाहता है, किन्तु अपनी सब कामनाओं को पूर्ण होते न देख इष्टदेव में दोष लगाता है। अतः आकुल होकर कभी-२ उपासक इष्टदेव से प्रार्थना करता है कि हे देव! मेरी आवश्यकता आप नहीं समझते। यदि आप मेरी दशा में रहते, तब आपको मालूम होता कि दुःख क्या वस्तु है। आपको कदाचित् दुःख का अनुभव नहीं है, अतः आप मेरी दुःखमयी प्रार्थना पर ध्यान नहीं देते, इत्यादि॥२३॥

वसु॒र्वसु॑पति॒र्हि क॒मस्य॑ग्ने वि॒भाव॑सुः। स्याम॑ ते सुम॒तावपि॑॥

ईश्वर महा धनपति है, वह परमोदार है, उसका धन प्रकाशरूप है, अतः हम मनुष्यों को उचित है कि अपने शुद्धाचरण से और सत्यता से उसकी कृपा और आशीर्वाद के पात्र बनें॥२४॥

अग्ने॑ धृ॒तव्र॑ताय ते समु॒द्राये॑व॒ सिन्ध॑वः। गिरो॑ वा॒श्रास॑ ईरते॥

यह शरीरस्थ जीव ईश्वर का सखा और सेवक है, यह अपने स्वामी का महान् ऐश्वर्य्य चिरकाल से देखता आता है। यद्यपि शरीरबद्ध होने से कुछ काल के लिये यह स्वामी से विमुख हो रहा है, तथापि इसकी स्वाभाविकी गति ईश्वर की ओर ही है, जैसे नदियों की गति समुद्र की ओर है॥२५॥

युवा॑नं वि॒श्पतिं॑ क॒विं वि॒श्वादं॑ पुरु॒वेप॑सम्। अ॒ग्निं शु॑म्भामि॒ मन्म॑भिः॥

वह परमात्मा महान् देव है, सबका अधिपति है, कर्त्ता, धर्ता, संहर्ता वही है। उसको जैसे विद्वान् पूजते, गाते और उसकी आज्ञा पर चलते, वैसा ही सब करें॥२६॥

य॒ज्ञानां॑ र॒थ्ये॑ व॒यं ति॒ग्मज॑म्भाय वी॒ळवे॑। स्तोमै॑रिषेमा॒ग्नये॑॥

जिसकी कृपा से लोगों की शुभ कर्मों में प्रवृत्ति होती है और यज्ञादिकों की समाप्ति होती है, जिसके सूर्य्यादिक तेज और प्रताप प्रत्यक्ष हैं, उसको हम उपासक शुद्धाचारों और प्रार्थनाओं के द्वारा प्राप्त होवें॥२७॥

अ॒यम॑ग्ने॒ त्वे अपि॑ जरि॒ता भू॑तु सन्त्य। तस्म॑स पावक मृळय॥

ईश्वर-विमुख मनुष्य-समाज को देख विद्वान् को प्रयत्न करना चाहिये कि लोग उच्छृङ्खल, नास्तिक और उपद्रवकारी न होने पावें, क्योंकि उनसे जगत् की बड़ी हानि होती है। जैसे राजनियमों को कार्य्य में लाने के लिये प्रथम अनेक उद्योग करने पड़ते हैं, तद्वत् धार्मिक नियमों को भी॥२८॥

धीरो॒ ह्यस्य॑द्म॒सद्विप्रो॒ न जागृ॑विः॒ सदा॑। अग्ने॑ दी॒दय॑सि॒ द्यवि॑॥

हे मनुष्यों! जो तुम्हारे कल्याण के लिये सदा जागृत है, उसकी आज्ञा में चलो॥२९॥

पु॒राग्ने॑ दुरि॒तेभ्यः॑ पु॒रा मृ॒ध्रेभ्यः॑ कवे। प्र ण॒ आयु॑र्वसो तिर॥

अन्त में आशीर्वाद माँगते हैं। पापों और शत्रुओं से बचने के लिये केवल ईश्वर की शरण है, उसमें श्रद्धा और विश्वास और सबसे बढ़कर उसी की आज्ञा पर चलना है, इति॥३०॥

आ घा॒ ये अ॒ग्निमि॑न्ध॒ते स्तृ॒णन्ति॑ ब॒र्हिरा॑नु॒षक्। येषा॒मिन्द्रो॒ युवा॒ सखा॑॥

मनुष्यमात्र को उचित है कि वह प्रतिदिन अग्निहोत्र करे और अतिथिसेवा के लिये कभी मुख न मोड़े और अपने आत्मा को दृढ़ विश्वासी और मित्र बना रक्खे। आत्मा को कभी उच्छृङ्खल न बनावे॥१॥

बृ॒हन्निदि॒ध्म ए॑षां॒ भूरि॑ श॒स्तं पृ॒थुः स्वरुः॑। येषा॒मिन्द्रो॒ युवा॒ सखा॑॥

इस ऋचा से पुनः पूर्वोक्त अर्थ को ही दृढ़ करते हैं, भगवान् उपदेश देते हैं कि मनुष्य निज कल्याण के लिये प्रथम अग्निहोत्रादि कर्म अवश्य करे और अपने आत्मा को सदा दृढ़ बना रक्खे, तब ही कल्याण है॥२॥

अयु॑द्ध॒ इद्यु॒धा वृतं॒ शूर॒ आज॑ति॒ सत्व॑भिः। येषा॒मिन्द्रो॒ युवा॒ सखा॑॥

ईश्वर की उपासना और अग्निहोत्रादि कर्मों के सेवने से आत्मा बलिष्ठ होता है और अपने निकट भी पापों को नहीं आने देता है॥३॥

आ बु॒न्दं वृ॑त्र॒हा द॑दे जा॒तः पृ॑च्छ॒द्वि मा॒तर॑म्। क उ॒ग्राः के ह॑ शृण्विरे॥

जब उपासक ईश्वर की स्तुति प्रार्थना करता रहता है, तब उसका आत्मा शुद्ध पवित्र होकर बलिष्ठ हो जाता है। वह आत्मा अपने निकट पापों को कदापि आने नहीं देता है। उस अवस्था में वह वृत्रहा, नमुचि, सूदन आदि पदों से भूषित होता है और मानो अपनी रक्षा के लिये सदा अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित रहता है। उस समय मानो, यह बुद्धि से पूछता है मेरे कितने और कौन-२ शत्रु हैं इत्यादि इसका आशय है। इससे यह शिक्षा दी गई है कि आत्मा यदि तुम्हारा वास्तव में सखा है, तो उसका उद्धार करना ही परमधर्म है। वह केवल कर्म और उपासना से हो सकता है॥४॥

प्रति॑ त्वा शव॒सी व॑दद्गि॒रावप्सो॒ न यो॑धिषत्। यस्ते॑ शत्रु॒त्वमा॑च॒के॥

जब आत्मा में ईश्वर की उपासना से कुछ-कुछ बल आने लगता है, तब वह अपने को शत्रुरहित और निश्चिन्त समझने लगता है। उस समय बुद्धि कहती है कि हे आत्मन्! आप निश्चिन्त न होवें, अभी आपके शत्रु हैं, वे आपसे युद्ध करेंगे। ईश्वर की शरण में पुनः-पुनः जाओ। उसकी उपासना स्तुति प्रार्थना मत छोड़ो॥५॥

उ॒त त्वं म॑घवञ्छृणु॒ यस्ते॒ वष्टि॑ व॒वक्षि॒ तत्। यद्वी॒ळया॑सि वी॒ळु तत्॥

यह समस्त वर्णन सिद्ध जितेन्द्रिय आत्मा का है, यह ध्यान रखना चाहिये। भाव इसका यह है कि यदि आत्मा वश में हो और ईश्वरीय नियमवित् हो, तो उस आत्मा से कौन वस्तु प्राप्त नहीं होती। लोग आत्मा को नहीं जानते, अतः वे स्वयं दरिद्र बने रहते हैं। हे उपासको! स्व आत्मा को पहिचानो॥६॥

यदा॒जिं यात्या॑जि॒कृदिन्द्रः॑ स्वश्व॒युरुप॑। र॒थीत॑मो र॒थीना॑म्॥

प्रत्येक मनुष्य को निज अनुभव है कि उसको प्रतिदिन कितना युद्ध करना पड़ता है। जीविका के लिये प्रतिष्ठा और मर्य्यादा के लिये समाज में प्रतिष्ठित होने के लिये एवं व्यापारादि में ख्याति लाभ के लिये मनुष्य को सदा युद्ध करना ही पड़ता है। इन सबसे भी अधिक उस समय घोर समर रचना पड़ता है, जब किसी प्रिय अभीष्ट वस्तु के लाभ की चिन्ता उपस्थित होती है। कितने युवक अभी युवती न पाकर आत्म-हत्या की गोद में जा बैठे, परन्तु जब ज्ञानी आत्मा युद्ध में भी जाता है, तब वह सुशोभित ही होता है॥७॥

वि षु विश्वा॑ अभि॒युजो॒ वज्रि॒न्विष्व॒ग्यथा॑ वृह। भवा॑ नः सु॒श्रव॑स्तमः॥

प्रतिदिन हमारे अन्तःकरण में नाना दुष्ट वासनाएँ उत्पन्न होती रहती हैं। ये ही हमारे महाशत्रु हैं, उनको ज्ञानी सुशील आत्मा अपने निकट नहीं आने देता। वही आत्मा संसार में यशोधारी होता है, अतः हे मनुष्यों! अपने आत्मा में बुरी वासनाएँ उत्पन्न होने मत दो॥८॥

अ॒स्माकं॒ सु रथं॑ पु॒र इन्द्रः॑ कृणोतु सा॒तये॑। न यं धूर्व॑न्ति धू॒र्तयः॑॥

जो आत्मा पापाचरणों से रहित और सदाचारों से सुभूषित और विवेकी है, वही स्वाधार शरीर को जगत् में श्रेष्ठ और पूज्य बनाता है। अतः हे मनुष्यों! आत्मकल्याण के मार्गों के तत्त्वविद् पुरुषों की शिक्षा पर चलकर अपने को सुधारो॥९॥

वृ॒ज्याम॑ ते॒ परि॒ द्विषोऽरं॑ ते शक्र दा॒वने॑। ग॒मेमेदि॑न्द्र॒ गोम॑तः॥

इस अन्तरात्मा के गुण पहिचानो। जो कोई इसे जान इसको शुद्ध बनाता और पापों से बचाता है, वह इसके द्वारा बहुत कुछ पाता है। हे मनुष्यों! यह शक्र है। यह महादण्डधारी है। इसको पापाचार से स्वभावतः घृणा है। इसकी उपासना करो॥१०॥

शनै॑श्चि॒द्यन्तो॑ अद्रि॒वोऽश्वा॑वन्तः शत॒ग्विनः॑। वि॒वक्ष॑णा अने॒हसः॑॥

हम अपनी-२ उन्नति धीरे-२ करें। विविध पशुओं को भी पालकर उनसे लाभ उठावें और सदा वैसे आचार और विचार से चलें, जिससे कोई उपद्रव न आवे॥११॥

ऊ॒र्ध्वा हि ते॑ दि॒वेदि॑वे स॒हस्रा॑ सू॒नृता॑ श॒ता। ज॒रि॒तृभ्यो॑ वि॒मंह॑ते॥

वि॒द्मा हि त्वा॑ धनंज॒यमिन्द्र॑ दृ॒ळ्हा चि॑दारु॒जम्। आ॒दा॒रिणं॒ यथा॒ गय॑म्॥

परमेश्वर को जानकर ही उसकी उपासना करनी चाहिये। वह धन का स्वामी है, अतः धन पाकर भी उसी की स्तुति करें। वह दुष्टों को विदीर्ण करनेवाला है और गृहवद् रक्षक है, अतः सर्वकामनाओं के लिये उसी के निकट मनुष्य पहुँचे॥१३॥

क॒कु॒हं चि॑त्त्वा कवे॒ मन्द॑न्तु धृष्ण॒विन्द॑वः। आ त्वा॑ प॒णिं यदीम॑हे॥

ईश्वर स्वयं पणि है, उसको जो तुम दोगे, उसके बदले में वह भी कुछ तुमको देगा, अतः उसकी सेवा करो॥१४॥

यस्ते॑ रे॒वाँ अदा॑शुरिः प्रम॒मर्ष॑ म॒घत्त॑ये। तस्य॑ नो॒ वेद॒ आ भ॑र॥

इ॒म उ॑ त्वा॒ वि च॑क्षते॒ सखा॑य इन्द्र सो॒मिनः॑। पु॒ष्टाव॑न्तो॒ यथा॑ प॒शुम्॥

हे मनुष्यों! प्रथम तुम शुभकर्मी बनो, तब ईश्वर की प्रतीक्षा करो, अन्यथा तुम्हारा साथी वह कदापि न होगा। तुम सबके सखा बनो। किसी की हानि की चिन्ता मत करो। देखो, संसार में कितने दिन तुम्हें रहना है॥१६॥

उ॒त त्वाब॑धिरं व॒यं श्रुत्क॑र्णं॒ सन्त॑मू॒तये॑। दू॒रादि॒ह ह॑वामहे॥

हे मनुष्यों! तुम्हें निश्चय हो कि वह बधिर नहीं है, वह हमारा वचन सुनता है। वह प्रार्थना पर ध्यान देता है और आवश्यकता को पूर्ण करता है, अतः उसी की स्तुति प्रार्थना करो॥१७॥

यच्छु॑श्रू॒या इ॒मं हवं॑ दु॒र्मर्षं॑ चक्रिया उ॒त। भवे॑रा॒पिर्नो॒ अन्त॑मः॥

यह स्वाभाविक प्रार्थना है। ईश्वर को सब ही अपना बन्धु बनाना चाहते हैं, परन्तु वह किसका सखा बनता है, यह पुनः-पुनः विचारना चाहिये॥१८॥

यच्चि॒द्धि ते॒ अपि॒ व्यथि॑र्जग॒न्वांसो॒ अम॑न्महि। गो॒दा इदि॑न्द्र बोधि नः॥

इसमें सन्देह नहीं कि जब-२ मनुष्य आपद्ग्रस्त होता है, तब-२ ईश्वर का साहाय्य चाहता है, परन्तु सो न करके सदा ईश्वर की आज्ञा पर चलो, तब ही कल्याण है॥१९॥

आ त्वा॑ र॒म्भं न जिव्र॑यो रर॒भ्मा श॑वसस्पते। उ॒श्मसि॑ त्वा स॒धस्थ॒ आ॥

हे मनुष्यों! ईश्वर को अपना आश्रय बनाओ। उस पर विश्वास करो। प्रत्येक शुभकर्म में उसकी उपासना करो॥२०॥

स्तो॒त्रमिन्द्रा॑य गायत पुरुनृ॒म्णाय॒ सत्व॑ने। नकि॒र्यं वृ॑ण्व॒ते यु॒धि॥

समर में भी परमात्मा का ही गान करे, क्योंकि उसी की कृपा से वहाँ भी विजय होती है॥२१॥

अ॒भि त्वा॑ वृषभा सु॒ते सु॒तं सृ॑जामि पी॒तये॑। तृ॒म्पा व्य॑श्नुही॒ मद॑म्॥

मा त्वा॑ मू॒रा अ॑वि॒ष्यवो॒ मोप॒हस्वा॑न॒ आ द॑भन्। माकीं॑ ब्रह्म॒द्विषो॑ वनः॥

प्रायः देखा गया है कि संसार के द्वेषी नाना पाप और अपराध सदा करते रहते हैं, ईश्वरीय नियमों को तोड़ डालते हैं। वे न केवल ईश्वरभक्तों की निन्दा किया करते हैं, किन्तु अपने ऊपर आपत्ति आने पर ईश्वर की शरण में जाकर उन्हें भी ठगना चाहते हैं। उतनी देर के लिये परम भक्त बन जाते हैं, अतः इसमें प्रार्थना है कि ऐसे आदमी उन्नत न होने पावें॥२३॥

इ॒ह त्वा॒ गोप॑रीणसा म॒हे म॑न्दन्तु॒ राध॑से। सरो॑ गौ॒रो यथा॑ पिब॥

जब-२ नवीन अन्न या अधिक लाभ हो, तब-२ मनुष्य को उचित है कि वे ईश्वर के नाम पर अपने परिजनों तथा मित्रों को बुलाकर उत्सव करें और ईश्वर को धन्यवाद देवें॥२४॥

या वृ॑त्र॒हा प॑रा॒वति॒ सना॒ नवा॑ च चुच्यु॒वे। ता सं॒सत्सु॒ प्र वो॑चत॥

परमात्मा की कृपा से मनुष्य को जो कुछ प्राप्त हो, उसके लिये ईश्वर को धन्यवाद देवे और सभा में ईश्वरीय कृपा का फल भी सुना दे, ताकि लोगों को विश्वास और प्रेम हो॥२५॥

अपि॑बत्क॒द्रुवः॑ सु॒तमिन्द्रः॑ स॒हस्र॑बाह्वे। अत्रा॑देदिष्ट॒ पौंस्य॑म्॥

जब ईश्वर अन्त में इस अनन्त सृष्टि को समेट लेता है, तब अल्पज्ञ जीवों को यह देख आश्चर्य प्रतीत होता है। तब ही उसमें जीव श्रद्धा और भक्ति करता है॥२६॥

स॒त्यं तत्तु॒र्वशे॒ यदौ॒ विदा॑नो अह्नवा॒य्यम्। व्या॑नट् तु॒र्वणे॒ शमि॑॥

ईश्वर जिसमें सत्यता पाता है, उसके लिये मङ्गलमय मार्ग खोलता है, अतः हे मनुष्यों! प्रतिदिन सत्यता की ओर जाओ। असत्यता में फँसकर अपने को मत पतित बनाओ॥२७॥

त॒रणिं॑ वो॒ जना॑नां त्र॒दं वाज॑स्य॒ गोम॑तः। स॒मा॒नमु॒ प्र शं॑सिषम्॥

जो ईश्वर सबका स्वामी है और जो समानरूप से सर्वत्र विद्यमान और हितकारी है, उसी की स्तुति मैं करता हूँ और आप लोग भी करें॥२८॥

ऋ॒भु॒क्षणं॒ न वर्त॑व उ॒क्थेषु॑ तुग्र्या॒वृध॑म्। इन्द्रं॒ सोमे॒ सचा॑ सु॒ते॥

हे मनुष्यों! जैसे प्रत्येक लौकिक या वैदिक कर्म के समय मैं ईश्वर की स्तुति करता हूँ, वैसा आप भी करें॥२९॥

यः कृ॒न्तदिद्वि यो॒न्यं त्रि॒शोका॑य गि॒रिं पृ॒थुम्। गोभ्यो॑ गा॒तुं निरे॑तवे॥

हे मनुष्यों! परमात्मा की महती शक्ति देखो। यदि जल न होता, तो इस पृथिवी पर एक भी जीव न देख पड़ता। यह उसकी कृपा है कि उसने ऐसा मेघ बनाया और उसका मार्ग भी भूमि पर तैयार किया, वही पूज्य है॥३०॥

यद्द॑धि॒षे म॑न॒स्यसि॑ मन्दा॒नः प्रेदिय॑क्षसि। मा तत्क॑रिन्द्र मृ॒ळय॑॥

इसका आशय यह है कि हमारे लिये आपको अनेक क्लेश उठाने पड़ते हैं। हम आपसे सदा माँगते रहते हैं, आप यथाकर्म उसे देते रहते हैं। यह सब न करके आप केवल हमारे लिए उतना कीजिये, जिससे हम सुखी रहें॥३१॥

द॒भ्रं चि॒द्धि त्वाव॑तः कृ॒तं शृ॒ण्वे अधि॒ क्षमि॑। जिगा॑त्विन्द्र ते॒ मनः॑॥

इसका आशय विस्पष्ट है। जिसके ऊपर परमात्मा की कृपा होती है, वह पृथिवी पर सुप्रसिद्ध हो जाता है। यह दृश्य देख उपासक कहता है कि हे इन्द्र! मैं भी आपका पात्र बनकर देशविख्यात होऊँ इत्यादि। ऐसी शुभ इच्छा बहुत पुरुषों की होती है। यह मानवस्वभाव है, अतः ऐसी ऐसी प्रार्थना वेद में आती हैं॥३२॥

तवेदु॒ ताः सु॑की॒र्तयोऽस॑न्नु॒त प्रश॑स्तयः। यदि॑न्द्र मृ॒ळया॑सि नः॥

विस्पष्ट ऋचा को भी भाष्यकार और टीकाकार कठिन बना देते हैं। इस ऋचा का अर्थ विस्पष्ट है। इन्द्र के निकट निवेदन किया जाता है कि आप जो हमको सुखी करते हैं, वह आपकी कृपा सुकीर्ति और प्रशंसा है॥३३॥

मा न॒ एक॑स्मि॒न्नाग॑सि॒ मा द्वयो॑रु॒त त्रि॒षु। वधी॒र्मा शू॑र॒ भूरि॑षु॥

मनुष्य अन्तःकरण से दुर्बल है। वह बारम्बार ईश्वरीय आज्ञाओं को तोड़ता रहता है। उससे बात-बात में अनेक अपराध हो जाते हैं। देखता है कि इन सबके बदले में यदि मुझको दण्ड मिला तो सदा कारागार में मैं निगडित ही रहूँगा। अतः मानवदुर्बलता के कारण ऐसी प्रार्थना होती है॥३४॥

बि॒भया॒ हि त्वाव॑त उ॒ग्राद॑भिप्रभ॒ङ्गिणः॑। द॒स्माद॒हमृ॑ती॒षहः॑॥

पूर्व में प्रार्थना की गई है कि अपराध होने पर भी आप हमको दण्ड न देवें। इसपर उपासक मन में कहता है कि हे ईश मैं जानकर अपराध न करूँगा। आपको मैं जानता हूँ, आप न्यायाधीश हैं। पापी आपके निकट नहीं रह सकता, अतः आपसे मैं सदा डरता हूँ, आपके नियम पर चलता हूँ, तथापि अपराध हो जाए, तो कृपा कर क्षमा करें॥३५॥

मा सख्युः॒ शून॒मा वि॑दे॒ मा पु॒त्रस्य॑ प्रभूवसो। आ॒वृत्व॑द्भूतु ते॒ मनः॑॥

प्रत्येक आदमी को उतना उद्योग अवश्य करना चाहिये, जिससे कि वह अपने गृह तथा मित्र-वर्ग को सुखी रख सके। अनुद्योगी और आलसी पुरुष ही ईश्वर के राज्य में क्लेश पाते हैं। देखो, निर्बुद्धि परन्तु परिश्रमी पक्षिगण कैसे प्रसन्न रहते हैं॥३६॥

को नु म॑र्या॒ अमि॑थितः॒ सखा॒ सखा॑यमब्रवीत्। ज॒हा को अ॒स्मदी॑षते॥

ए॒वारे॑ वृषभा सु॒तेऽसि॑न्व॒न्भूर्या॑वयः। श्व॒घ्नीव॑ नि॒वता॒ चर॑न्॥

परमात्मा सकलमनोरथदाता होने के कारण वृषभ कहाता है। अतः हे मनुष्यों! उसी की सेवा करो और उसी से अपनी आकाङ्क्षित वस्तु माँगो॥३८॥

आ त॑ ए॒ता व॑चो॒युजा॒ हरी॑ गृभ्णे सु॒मद्र॑था। यदी॑न ब्र॒ह्मभ्य॒ इद्ददः॑॥

प्रत्येक मनुष्य को उचित है कि यथासाध्य इस संसार के नियमों और रचना प्रभृति को जाने। विद्वानों को इस ओर अधिक ध्यान देना उचित है॥३९॥

भि॒न्धि विश्वा॒ अप॒ द्विषः॒ परि॒ बाधो॑ ज॒ही मृधः॑। वसु॑ स्पा॒र्हं तदा भ॑र॥

इस संसार में द्वेष करनेवाली मनुष्जाति या पशुप्रभृति जातियाँ कितनी हानि करनेवाली हैं, यह प्रत्यक्ष है और उन्मत्त स्वार्थी राजा लड़कर कितनी बाधाएँ सन्मार्ग में फैलाते हैं, यह भी प्रत्यक्ष ही है, अतः इन दोनों उपद्रवों से छूटने के लिये वारंवार वेद में प्रार्थना आती है और इन दोनों के अभाव होने से ही संसार में सुख पहुँचता है। इत्यादि॥४०॥

यद्वी॒ळावि॑न्द्र॒ यत्स्थि॒रे यत्पर्शा॑ने॒ परा॑भृतम्। वसु॑ स्पा॒र्हं तदा भ॑र॥

पर्वत, समुद्र और पृथिवी के अभ्यन्तर में बहुत धन गुप्त हैं। वैज्ञानिक पुरुष इसको जानते हैं। विद्वानों को उचित है कि उस-२ धन को जगत् के कल्याण के लिये प्रकाशित करें॥४१॥

यस्य॑ ते वि॒श्वमा॑नुषो॒ भूरे॑र्द॒त्तस्य॒ वेद॑ति। वसु॑ स्पा॒र्हं तदा भ॑र॥

परमात्मा से अपने और जगत् के कल्याण के लिये सदा प्रार्थना करनी चाहिये॥४२॥

त्वाव॑तः पुरूवसो व॒यमि॑न्द्र प्रणेतः। स्मसि॑ स्थातर्हरीणाम्॥

परमेश्वर ही सर्वविधाता सर्वकर्त्ता है। उसी के सेवक हम मनुष्य हैं, अतः उसी की उपासना स्तुति और प्रार्थना हम करें॥१॥

त्वां हि स॒त्यम॑द्रिवो वि॒द्म दा॒तार॑मि॒षाम्। वि॒द्म दा॒तारं॑ रयी॒णाम्॥

अन्नों और धनों का अधिपति और दाता ईश्वर को मान उसी की उपासना करो॥२॥

आ यस्य॑ ते महि॒मानं॒ शत॑मूते॒ शत॑क्रतो। गी॒र्भिर्गृ॒णन्ति॑ का॒रवः॑॥

अच्छे विद्वान् स्तुतिपाठक और अन्यान्य आचार्य्यगण उसी की स्तुति करते हैं, अतः हे मनुष्यों! आप भी उसी की महिमा गाओ॥३॥

सु॒नी॒थो घा॒ स मर्त्यो॒ यं म॒रुतो॒ यम॑र्य॒मा। मि॒त्रः पान्त्य॒द्रुहः॑॥

जिसके ऊपर ईश्वर तथा लोक की कृपा हो, वही श्रेष्ठ पुरुष है। अतः प्रत्येक मनुष्य को शुभकर्म में प्रवृत्त होना चाहिये। शुभकर्मों से शत्रु भी प्रसन्न रहते हैं॥४॥

दधा॑नो॒ गोम॒दश्व॑वत्सु॒वीर्य॑मादि॒त्यजू॑त एधते। सदा॑ रा॒या पु॑रु॒स्पृहा॑॥

जो ईश्वर के प्रेमी हैं, उनकी वृद्धि सदा होती है। इसमें कारण यह है कि वह भक्त सबसे प्रेम रखता है। सबके सुख-दुःख में सम्मिलित होता, सत्यता से वह अणुमात्र भी डिगता नहीं, अतः लोगों की सहानुभूति और ईश्वर की दया से वह प्रतिदिन बढ़ता जाता है॥५॥

तमिन्द्रं॒ दान॑मीमहे शवसा॒नमभी॑र्वम्। ईशा॑नं रा॒य ई॑महे॥

हे मनुष्यों! अपनी आकाङ्क्षा ईश्वर के निकट निवेदन करो। वह उसको पूर्ण करेगा॥६॥

तस्मि॒न्हि सन्त्यू॒तयो॒ विश्वा॒ अभी॑रवः॒ सचा॑। तमा व॑हन्तु॒ सप्त॑यः पुरू॒वसुं॒ मदा॑य॒ हर॑यः सु॒तम्॥

परमात्मा में सब रक्षाएँ विद्यमान हैं, इसका आशय यह है कि वही सब रक्षा कर सकता है। उसको ये संसार प्रकट कर सकते हैं॥७॥

यस्ते॒ मदो॒ वरे॑ण्यो॒ य इ॑न्द्र वृत्र॒हन्त॑मः। य आ॑द॒दिः स्व१॒॑र्नृभि॒र्यः पृत॑नासु दु॒ष्टरः॑॥

इससे यह शिक्षा दी जाती है कि मनुष्य को ईश्वरीय कार्य्य में सदा आनन्दित रहना चाहिये, तब ही मनुष्य सुखी हो सकता है॥८॥

यो दु॒ष्टरो॑ विश्ववार श्र॒वाय्यो॒ वाजे॒ष्वस्ति॑ तरु॒ता। स नः॑ शविष्ठ॒ सव॒ना व॑सो गहि ग॒मेम॒ गोम॑ति व्र॒जे॥

ग॒व्यो षु णो॒ यथा॑ पु॒राश्व॒योत र॑थ॒या। व॒रि॒व॒स्य म॑हामह॥

ईश्वर में सब पदार्थ अतिशय हैं। वह कितना महान् है, यह मनुष्य की बुद्धि में नहीं आ सकता। उसके निकट कितना धन है, उसकी न तो संख्या हो सकती और न मानवमन ही वहाँ तक पहुँच सकता है, अतः उसके साथ महान् आदि शब्द लगाए जाते हैं। इस ऋचा से यह शिक्षा होती है कि जब वह इतना महान् है, तब उसको छोड़कर दूसरों से मत माँगो। गौ, अश्व और रथ आदि पदार्थ गृहस्थाश्रम के लिये परमोपयोगी हैं, अतः इनकी प्राप्ति के लिये बहुधा प्रार्थना आती है॥१०॥

न॒हि ते॑ शूर॒ राध॒सोऽन्तं॑ वि॒न्दामि॑ स॒त्रा। द॒श॒स्या नो॑ मघव॒न्नू चि॑दद्रिवो॒ धियो॒ वाजे॑भिराविथ॥

इसमें सन्देह नहीं कि उसके धन का अन्त नहीं है। ईश्वर के समान हम उपासक उससे आवश्यकता निवेदन करें और उसी की इच्छा पर छोड़ देवें॥११॥

य ऋ॒ष्वः श्रा॑व॒यत्स॑खा॒ विश्वेत्स वे॑द॒ जनि॑मा पुरुष्टु॒तः। तं विश्वे॒ मानु॑षा यु॒गेन्द्रं॑ हवन्ते तवि॒षं य॒तस्रु॑चः॥

हे मनुष्यों! जिसकी उपासना सब कोई आदिकाल से करते आए हैं, आज भी उसी की उपासना करो, वह चिरन्तन ईश्वर है॥१२॥

स नो॒ वाजे॑ष्ववि॒ता पु॑रू॒वसुः॑ पुरस्था॒ता म॒घवा॑ वृत्र॒हा भु॑वत्॥

वही संकट में भी रक्षक है, वही धनस्वामी है। उसी की स्तुति, प्रार्थना करो॥१३॥

अ॒भि वो॑ वी॒रमन्ध॑सो॒ मदे॑षु गाय गि॒रा म॒हा विचे॑तसम्। इन्द्रं॒ नाम॒ श्रुत्यं॑ शा॒किनं॒ वचो॒ यथा॑॥

उसकी कृपा से जब-२ कुछ लाभ हो, तब-२ ईश्वर के नाम पर उत्सव रचें। सब मिलकर उसका कीर्तिगान करें॥१४॥

द॒दी रेक्ण॑स्त॒न्वे॑ द॒दिर्वसु॑ द॒दिर्वाजे॑षु पुरुहूत वा॒जिन॑म्। नू॒नमथ॑॥

आपत्ति और सम्पत्ति, सब समय में ईश्वर की स्तुति और प्रार्थना करो॥१५॥

विश्वे॑षामिर॒ज्यन्तं॒ वसू॑नां सास॒ह्वांसं॑ चिद॒स्य वर्प॑सः। कृ॒प॒य॒तो नू॒नमत्यथ॑॥

परमात्मा सर्वसम्पत्तियों और सर्व रूपरङ्गों का अधिपति है, उसकी उपासना हम करते हैं और इसी प्रकार सब करें॥१६॥

म॒हः सु वो॒ अर॑मिषे॒ स्तवा॑महे मी॒ळ्हुषे॑ अरंग॒माय॒ जग्म॑ये। य॒ज्ञेभि॑र्गी॒र्भिर्वि॒श्वम॑नुषां म॒रुता॑मियक्षसि॒ गाये॑ त्वा॒ नम॑सा गि॒रा॥

उसी ईश्वर का सब गान करें, जो परमपूज्य है॥१७॥

ये पा॒तय॑न्ते॒ अज्म॑भिर्गिरी॒णां स्नुभि॑रेषाम्। य॒ज्ञं म॑हि॒ष्वणी॑नां सु॒म्नं तु॑वि॒ष्वणी॑नां॒ प्राध्व॒रे॥

ईश्वरीय प्रत्येक पदार्थ से लाभ हो रहा है, यह जान उसको धन्यवाद दो॥१८॥

प्र॒भ॒ङ्गं दु॑र्मती॒नामिन्द्र॑ शवि॒ष्ठा भ॑र। र॒यिम॒स्मभ्यं॒ युज्यं॑ चोदयन्मते॒ ज्येष्ठं॑ चोदयन्मते॥

दुर्जनों और नीच बुद्धियों से जगत् की बहुत हानि होती है, अतः विद्वानों को उचित है कि सुबुद्धि और सुजन जगत् में उत्पन्न करें॥१९॥

सनि॑तः॒ सुस॑नित॒रुग्र॒ चित्र॒ चेति॑ष्ठ॒ सूनृ॑त। प्रा॒सहा॑ सम्रा॒ट् सहु॑रिं॒ सह॑न्तं भु॒ज्युं वाजे॑षु॒ पूर्व्य॑म्॥

उपासकों के हृदय में ईश्वरीय गुण प्रविष्ट हों, अतः नाना विशेषणों द्वारा वर्णन होता है॥२०॥

आ स ए॑तु॒ य ईव॒दाँ अदे॑वः पू॒र्तमा॑द॒दे। यथा॑ चि॒द्वशो॑ अ॒श्व्यः पृ॑थु॒श्रव॑सि कानी॒ते॒३॒॑ऽस्या व्युष्या॑द॒दे॥

विद्वान् इस प्रकार उपदेश करें, जिससे जीवगण ईश्वराभिमुख हों॥२१॥

ष॒ष्टिं स॒हस्राश्व्य॑स्या॒युता॑सन॒मुष्ट्रा॑नां विंश॒तिं श॒ता। दश॒ श्यावी॑नां श॒ता दश॒ त्र्य॑रुषीणां॒ दश॒ गवां॑ स॒हस्रा॑॥

जैसे विवाह के मन्त्र वर-वधू ही पढ़ते हैं, सबके लिये नहीं हैं, इसी प्रकार जिन राजा महाराजा आदिकों के निकट इतने पशु हों, वे इन मन्त्रों को उच्चारण कर ईश्वर की स्तुति प्रार्थना करें। उसको धन्यवाद दें॥२२॥

दश॑ श्या॒वा ऋ॒धद्र॑यो वी॒तवा॑रास आ॒शवः॑। म॒थ्रा ने॒मिं नि वा॑वृतुः॥

जिनके निकट इस प्रकार की सामग्री हो, वे ऐसी प्रार्थना करें॥२३॥

दाना॑सः पृथु॒श्रव॑सः कानी॒तस्य॑ सु॒राध॑सः। रथं॑ हिर॒ण्ययं॒ दद॒न्मंहि॑ष्ठः सू॒रिर॑भू॒द्वर्षि॑ष्ठमकृत॒ श्रवः॑॥

ईश्वर से लोग याचना करते हैं, परन्तु उसके दान लोग नहीं जानते हैं, उसकी कृपा और दान अनन्त है, वह सुवर्णमय रथ देता है, जो शरीर है, इससे जीव सब कुछ प्राप्त कर सकता है, उसको धन्यवाद दो॥२४॥

आ नो॑ वायो म॒हे तने॑ या॒हि म॒खाय॒ पाज॑से। व॒यं हि ते॑ चकृ॒मा भूरि॑ दा॒वने॑ स॒द्यश्चि॒न्महि॑ दा॒वने॑॥

वह ईश्वर हमारी सम्पूर्ण आवश्यकताएँ जानता और यथाकर्म पूर्ण करता है। उससे बढ़कर कौन दानी है। हे मनुष्यों! उसी की स्तुति प्रार्थना करो॥२५॥

यो अश्वे॑भि॒र्वह॑ते॒ वस्त॑ उ॒स्रास्त्रिः स॒प्त स॑प्तती॒नाम्। ए॒भिः सोमे॑भिः सोम॒सुद्भिः॑ सोमपा दा॒नाय॑ शुक्रपूतपाः॥

यो म॑ इ॒मं चि॑दु॒ त्मनाम॑न्दच्चि॒त्रं दा॒वने॑। अ॒र॒ट्वे अक्षे॒ नहु॑षे सु॒कृत्व॑नि सु॒कृत्त॑राय सु॒क्रतुः॑॥

उ॒च॒थ्ये॒३॒॑ वपु॑षि॒ यः स्व॒राळु॒त वा॑यो घृत॒स्नाः। अश्वे॑षितं॒ रजे॑षितं॒ शुने॑षितं॒ प्राज्म॒ तदि॒दं नु तत्॥

अध॑ प्रि॒यमि॑षि॒राय॑ ष॒ष्टिं स॒हस्रा॑सनम्। अश्वा॑ना॒मिन्न वृष्णा॑म्॥

गावो॒ न यू॒थमुप॑ यन्ति॒ वध्र॑य॒ उप॒ मा य॑न्ति॒ वध्र॑यः॥

अध॒ यच्चार॑थे ग॒णे श॒तमुष्ट्राँ॒ अचि॑क्रदत्। अध॒ श्वित्ने॑षु विंश॒तिं श॒ता॥

श॒तं दा॒से ब॑ल्बू॒थे विप्र॒स्तरु॑क्ष॒ आ द॑दे। ते ते॑ वायवि॒मे जना॒ मद॒न्तीन्द्र॑गोपा॒ मद॑न्ति दे॒वगो॑पाः॥

अध॒ स्या योष॑णा म॒ही प्र॑ती॒ची वश॑म॒श्व्यम्। अधि॑रुक्मा॒ वि नी॑यते॥

महि॑ वो मह॒तामवो॒ वरु॑ण॒ मित्र॑ दा॒शुषे॑। यमा॑दित्या अ॒भि द्रु॒हो रक्ष॑था॒ नेम॒घं न॑शदने॒हसो॑ व ऊ॒तयः॑ सु॒तयो॑ व ऊ॒तयः॑॥

अधिलोकार्थ में वरुण, मित्र, अर्य्यमा, आदित्य आदि शब्द लोकवाचक होते हैं। यद्यपि सम्पूर्ण वेद देवता स्तुतिपरक ही प्रतीत होते हैं, तथापि इनकी योजना अनेक प्रकार से होती है। देवता शब्द भी वेद में सर्ववाचक है, क्योंकि इषु देवता, धनुष देवता, ज्या देवता, अश्व देवता, मण्डूक देवता, वनस्पति यूप देवता आदि शतशः प्रयोग उस भाव को दिखला रहे हैं। सम्पूर्ण ऋचा का आशय यह है कि मनुष्य के प्रत्येक वर्ग के मुख्य-२ पुरुष जो राष्ट्र-सभासद् हों और निरपेक्ष और निःस्वार्थ भाव से मनुष्य जाति की हित-चिन्ता में सदा लगे रहें और सर्वोत्तम कार्य करके अपने प्रतिवासियों ग्रामीणों और देशवासियों को विशेष लाभ पहुँचाते हों, उन्हें सदा पारितोषिक दान देना चाहिये और देश में पापों का उदय न हो, उसका सदा उद्योग करते रहना चाहिये॥१॥

वि॒दा दे॑वा अ॒घाना॒मादि॑त्यासो अ॒पाकृ॑तिम्। प॒क्षा वयो॒ यथो॒परि॒ व्य१॒॑स्मे शर्म॑ यच्छताने॒हसो॑ व ऊ॒तयः॑ सु॒तयो॑ व ऊ॒तयः॑॥

विद्वानों, सभासदों, श्रेष्ठ पुरुषों को उचित है कि उपद्रवों की शान्ति का उपाय जानें और कार्य्य में लावें॥२॥

व्य१॒॑स्मे अधि॒ शर्म॒ तत्प॒क्षा वयो॒ न य॑न्तन। विश्वा॑नि विश्ववेदसो वरू॒थ्या॑ मनामहेऽने॒हसो॑ व ऊ॒तयः॑ सु॒तयो॑ व ऊ॒तयः॑॥

यस्मा॒ अरा॑सत॒ क्षयं॑ जी॒वातुं॑ च॒ प्रचे॑तसः। मनो॒र्विश्व॑स्य॒ घेदि॒म आ॑दि॒त्या रा॒य ई॑शतेऽने॒हसो॑ व ऊ॒तयः॑ सु॒तयो॑ व ऊ॒तयः॑॥

इसका आशय यह है कि सभासद् जिसको पारितोषिकरूप धनादि देवें, उसके धन के वे रक्षक भी होवें॥४॥

परि॑ णो वृणजन्न॒घा दु॒र्गाणि॑ र॒थ्यो॑ यथा। स्यामेदिन्द्र॑स्य॒ शर्म॑ण्यादि॒त्याना॑मु॒ताव॑स्यने॒हसो॑ व ऊ॒तयः॑ सु॒तयो॑ व ऊ॒तयः॑॥

हम लोग सदा ईश्वर आचार्य्य, गुण, श्रेष्ठजन तथा धर्मात्मा सभासदों के संगम में निवास करें, जिससे न पाप और न आपत्तियाँ हमारे निकट आवें॥५॥

प॒रि॒ह्वृ॒तेद॒ना जनो॑ यु॒ष्माद॑त्तस्य वायति। देवा॒ अद॑भ्रमाश वो॒ यमा॑दित्या॒ अहे॑तनाने॒हसो॑ व ऊ॒तयः॑ सु॒तयो॑ व ऊ॒तयः॑॥

राष्ट्रनियमानुकूल चलने से जगत् में कल्याण होता है। राष्ट्र चलानेवाले विद्वान् हितैषी अस्वार्थी और विषयविमुख होने चाहियें॥६॥

न तं ति॒ग्मं च॒न त्यजो॒ न द्रा॑सद॒भि तं गु॒रु। यस्मा॑ उ॒ शर्म॑ स॒प्रथ॒ आदि॑त्यासो॒ अरा॑ध्वमने॒हसो॑ व ऊ॒तयः॑ सु॒तयो॑ व ऊ॒तयः॑॥

अपने व्यवहार और आचार इस प्रकार बना रक्खे, कि उसके ऊपर कोई आपत्ति न पड़े॥७॥

यु॒ष्मे दे॑वा॒ अपि॑ ष्मसि॒ युध्य॑न्त इव॒ वर्म॑सु। यू॒यं म॒हो न॒ एन॑सो यू॒यमर्भा॑दुरुष्यताने॒हसो॑ व ऊ॒तयः॑ सु॒तयो॑ व ऊ॒तयः॑॥

ईश्वरीय और राष्ट्रसम्बन्धी आज्ञाओं के मानने से मनुष्य सुखी रहता है॥८॥

अदि॑तिर्न उरुष्य॒त्वदि॑तिः॒ शर्म॑ यच्छतु। मा॒ता मि॒त्रस्य॑ रे॒वतो॑ऽर्य॒म्णो वरु॑णस्य चाने॒हसो॑ व ऊ॒तयः॑ सु॒तयो॑ व ऊ॒तयः॑॥

समस्त प्रजाएँ मिलकर सुदृढ़तर सभा स्थापित करें। वहाँ देश के बुद्धिमान्, विद्वान्, शूरवीर और प्रत्येक दल के मुख्य-२ पुरुष और नारियाँ सभासद् बनाए जायँ, जो देश का सर्वप्रकार से हित किया करें॥९॥

यद्दे॑वाः॒ शर्म॑ शर॒णं यद्भ॒द्रं यद॑नातु॒रम्। त्रि॒धातु॒ यद्व॑रू॒थ्यं१॒॑ तद॒स्मासु॒ वि य॑न्तनाने॒हसो॑ व ऊ॒तयः॑ सु॒तयो॑ व ऊ॒तयः॑॥

राज्यसम्बन्धी कर्मचारियों, सभासदों, प्रतिनिधियों तथा अन्यान्य पुरुषों को उचित है कि सब प्रकार अपने देश को परम समृद्ध बनाने की चेष्टा करें॥१०॥

आदि॑त्या॒ अव॒ हि ख्यताधि॒ कूला॑दिव॒ स्पशः॑। सु॒ती॒र्थमर्व॑तो य॒थानु॑ नो नेषथा सु॒गम॑ने॒हसो॑ व ऊ॒तयः॑ सु॒तयो॑ व ऊ॒तयः॑॥

विद्वानों सभासदों तथा अन्य हितकारी पुरुषों को उचित है कि वे प्रजाओं को सुमार्ग में ले जाएँ॥११॥

नेह भ॒द्रं र॑क्ष॒स्विने॒ नाव॒यै नोप॒या उ॒त। गवे॑ च भ॒द्रं धे॒नवे॑ वी॒राय॑ च श्रवस्य॒ते॑ऽने॒हसो॑ व ऊ॒तयः॑ सु॒तयो॑ व ऊ॒तयः॑॥

दुष्ट निषिद्ध और हानिकारी कर्म करनेवाले राक्षस कहलाते हैं। उन्हें शिक्षा और दण्ड देकर सुपथ पर लाना चाहिये॥१२॥

यदा॒विर्यद॑पी॒च्यं१॒॑ देवा॑सो॒ अस्ति॑ दुष्कृ॒तम्। त्रि॒ते तद्विश्व॑मा॒प्त्य आ॒रे अ॒स्मद्द॑धातनाने॒हसो॑ व ऊ॒तयः॑ सु॒तयो॑ व ऊ॒तयः॑॥

हे भगवन्! इस संसार में नाना विघ्न, नाना उपद्रव, विविध क्लेश और बहुविध प्रलोभन विद्यमान हैं, इन सबसे हमको दूर करो॥१३॥

यच्च॒ गोषु॑ दु॒ष्ष्वप्न्यं॒ यच्चा॒स्मे दु॑हितर्दिवः। त्रि॒ताय॒ तद्वि॑भावर्या॒प्त्याय॒ परा॑ वहाने॒हसो॑ व ऊ॒तयः॑ सु॒तयो॑ व ऊ॒तयः॑॥

जाग्रदवस्था में अनुभूत पदार्थ स्वप्नावस्था में दृष्ट होते हैं। प्रातःकाल लोग अधिक स्वप्न देखते हैं। अतः उषा देवी का सम्बोधन किया गया है। यद्वा (दिवः+दुहिता) प्रकाश की कन्या बुद्धि है, क्योंकि इसी से आत्मा को प्रकाश मिलता है। अतः बुद्धि सम्बोधित हुई है। स्वप्न से किसी प्रकार का भय करना उचित नहीं, अतः बुद्धि से कहा जाता है कि स्वप्न को दूर करो॥१४॥

नि॒ष्कं वा॑ घा कृ॒णव॑ते॒ स्रजं॑ वा दुहितर्दिवः। त्रि॒ते दु॒ष्ष्वप्न्यं॒ सर्व॑मा॒प्त्ये परि॑ दद्मस्यने॒हसो॑ व ऊ॒तयः॑ सु॒तयो॑ व ऊ॒तयः॑॥

बुद्धि से विचार करना चाहिये कि स्वप्न क्या वस्तु है। जब शिर में गरमी पहुँचती है, तब निद्रा अच्छी तरह नहीं होती। उस समय लोग नाना स्वप्न देखते हैं, इसलिये शिर को सदा शीतल रक्खे। पेट को सदा शुद्ध रक्खे। बल वीर्य्य से शरीर को नीरोग बनावे। व्यसन में कभी न फँसे। कोई भयंकर काम न करे। इस प्रकार के उपायों से स्वप्न कम होंगे॥१५॥

तद॑न्नाय॒ तद॑पसे॒ तं भा॒गमु॑पसे॒दुषे॑। त्रि॒ताय॑ च द्वि॒ताय॒ चोषो॑ दु॒ष्ष्वप्न्यं॑ वहाने॒हसो॑ व ऊ॒तयः॑ सु॒तयो॑ व ऊ॒तयः॑॥

त्रित तीनों लोकों का एक नाम त्रित है, क्योंकि यह नीचे ऊपर और मध्य इन तीनों स्थानों में जो तत=व्याप्त हो, वह त्रित=त्रितत।

यथा॑ क॒लां यथा॑ श॒फं यथ॑ ऋ॒णं सं॒नया॑मसि। ए॒वा दु॒ष्ष्वप्न्यं॒ सर्व॑मा॒प्त्ये सं न॑यामस्यने॒हसो॑ व ऊ॒तयः॑ सु॒तयो॑ व ऊ॒तयः॑॥

ईश्वर से प्रार्थना करे कि वह दुःस्वप्न न देखे, क्योंकि उससे हानि होती है। इसका आशय यह है कि अपने शरीर और मन को ऐसा स्वस्थ शान्त नीरोग और प्रसन्न बना रक्खे कि वह स्वप्न न देखे॥१७॥

अजै॑ष्मा॒द्यास॑नाम॒ चाभू॒माना॑गसो व॒यम्। उषो॒ यस्मा॑द्दु॒ष्ष्वप्न्या॒दभै॒ष्माप॒ तदु॑च्छत्वने॒हसो॑ व ऊ॒तयः॑ सु॒तयो॑ व ऊ॒तयः॑॥

इसका आशय यह है कि कल्पित अवस्तु और संकल्पमात्र में स्थित पदार्थों से न डरकर और उनकी चिन्ता न करके हम मनुष्य निखिल आपत्तियों को दूर करने की चेष्टा करें, जिससे हम सुखी होकर ईश्वर की और मनुष्यों की सेवा कर सकें। हे मनुष्यों! जिससे यह अपूर्व जीवन सार्थक सफल और हितकर हो, वैसी चेष्टा सदा किया करो इति॥१८॥

स्वा॒दोर॑भक्षि॒ वय॑सः सुमे॒धाः स्वा॒ध्यो॑ वरिवो॒वित्त॑रस्य। विश्वे॒ यं दे॒वा उ॒त मर्त्या॑सो॒ मधु॑ ब्रु॒वन्तो॑ अ॒भि सं॒चर॑न्ति॥

इसका आशय यह है कि जो जन, बुद्धिमान्, परिश्रमी, स्वाध्यायनिरत हैं, उनको ही मधुमय स्वादु अन्न प्राप्त होते हैं। जो जन आलसी, कुकर्मी और असंयमी हैं, वे यदि महाराज और महामहा श्रेष्ठी भी हैं, तो भी उन्हें अन्न मधुर और स्वादु नहीं मालूम होते, क्योंकि उनका क्षुधाग्नि अतिशय मन्द हो जाता है, उदराशय बिगढ़ जाता है, परिपाकशक्ति बहुत थोड़ी हो जाती है, इस कारण उन्हें मधुमान् पदार्थ भी अति कटु लगने लगते हैं, उत्तमोत्तम भोज्य वस्तु को भी उनका जी नहीं चाहता। अतः कहा गया है कि परिश्रमी नीरोग और संयमी आदमी ही अन्न का स्वाद ले सकता है। द्वितीय बात इसमें यह है कि मनुष्य और श्रेष्ठ मनुष्यों को उचित है कि माँस, अपवित्र अन्न, जिससे शरीर की नीरोगिता में बाधा पड़े और जो देखने में घृणित हो, वैसे अन्न न खाएँ॥१॥

अ॒न्तश्च॒ प्रागा॒ अदि॑तिर्भवास्यवया॒ता हर॑सो॒ दैव्य॑स्य। इन्द॒विन्द्र॑स्य स॒ख्यं जु॑षा॒णः श्रौष्टी॑व॒ धुर॒मनु॑ रा॒य ऋ॑ध्याः॥

प्रथम यह सदा स्मरण रखना चाहिये कि जड़ वस्तु को सम्बोधित कर चेतनवत् वर्णन करने की रीति वेद में है। अतः पदानुसार ही इसका अर्थ सुगमता के लिये किया गया है। इसी को प्रथम पुरुषवत् वर्णन समझ लीजिये। अब आशय यह है−जब वैसे मधुमान् अन्न शरीर के आभ्यन्तर जाते हैं, तो इनसे अनेक सुगुण उत्पन्न होते हैं। इनसे शुद्ध रक्त और माँस आदि बनते हैं। शरीर की दुर्बलता नहीं रहती। मन प्रसन्न रहता है। परन्तु जब पेट में अन्न नहीं रहता या अन्न के अभाव से शरीर कृश हो जाता है, तब क्रोध भी बढ़ जाता है। वह क्रोध भी अन्न की प्राप्ति से निवृत्त हो जाता है। शरीर नीरोग और पुष्ट रहने से दिन-दिन धनोपार्जन में मन लगता है। अतः कहा जाता है कि अन्न क्रोध को दूर करता है। इत्यादि॥२॥

अपा॑म॒ सोम॑म॒मृता॑ अभू॒माग॑न्म॒ ज्योति॒रवि॑दाम दे॒वान्। किं नू॒नम॒स्मान्कृ॑णव॒दरा॑तिः॒ किमु॑ धू॒र्तिर॑मृत॒ मर्त्य॑स्य॥

शं नो॑ भव हृ॒द आ पी॒त इ॑न्दो पि॒तेव॑ सोम सू॒नवे॑ सु॒शेवः॑। सखे॑व॒ सख्य॑ उरुशंस॒ धीरः॒ प्र ण॒ आयु॑र्जी॒वसे॑ सोम तारीः॥

ऐसा अन्न और रस खाओ और पीओ, जिससे शरीर और आत्मा को लाभ पहुँचे और आयु बढ़े॥४॥

इ॒मे मा॑ पी॒ता य॒शस॑ उरु॒ष्यवो॒ रथं॒ न गावः॒ सम॑नाह॒ पर्व॑सु। ते मा॑ रक्षन्तु वि॒स्रस॑श्च॒रित्रा॑दु॒त मा॒ स्रामा॑द्यवय॒न्त्विन्द॑वः॥

हम मनुष्य ऐसे अन्न खाएँ, जिनसे शरीर की रक्षा, फुर्ती और वीरता प्राप्त होवे। उत्तेजक मद्यादि न पीवें, जिससे शुभ चरित्र भ्रष्ट हो और व्याधियाँ बढ़ें। अन्नों के खान-पान से ही विविध रोग होते हैं, अतः विधिपूर्वक अन्नसेवन करें। इसी कारण इस सूक्त में अन्न का ऐसा वर्णन आया है॥५॥

अ॒ग्निं न मा॑ मथि॒तं सं दि॑दीपः॒ प्र च॑क्षय कृणु॒हि वस्य॑सो नः। अथा॒ हि ते॒ मद॒ आ सो॑म॒ मन्ये॑ रे॒वाँ इ॑व॒ प्र च॑रा पु॒ष्टिमच्छ॑॥

वैसा अन्न सेवन करे, जिससे वह अग्निवत् तेजस्वी भासित हो, नेत्र की शक्ति बढ़े और वह दिन-२ धनवान् ही होता जाए अर्थात् मद्यादि पान कर लम्पटता द्यूतादि कुकर्म में धनव्यय न करे। जब-२ अन्न प्राप्त हो, तब-२ ईश्वर को धन्यवाद दे और सदा अदीनभाव रहे। ये सब शिक्षाएँ इससे मिलती हैं॥६॥

इ॒षि॒रेण॑ ते॒ मन॑सा सु॒तस्य॑ भक्षी॒महि॒ पित्र्य॑स्येव रा॒यः। सोम॑ राज॒न्प्र ण॒ आयूं॑षि तारी॒रहा॑नीव॒ सूर्यो॑ वास॒राणि॑॥

इसका आशय विस्पष्ट है। जब तक खूब भूख न लगे, अन्न के लिये आकुलता न हो, तब तक भोजन न करे। इसी अवस्था में अन्न सुखदायी होता है और आयु बढ़ती है। सोम राजा इसलिये कहाता है कि शरीर में प्रवेश कर यहीं चमकता है और सब इन्द्रियों पर अधिकार रखता है। यदि अन्न न खाया जाए, तो सब इन्द्रियाँ शिथिल हों जाएँ और शरीर भी न रहे, अतः शरीर का शासक होने से अन्न राजा है॥७॥

सोम॑ राजन्मृ॒ळया॑ नः स्व॒स्ति तव॑ स्मसि व्र॒त्या॒३॒॑स्तस्य॑ विद्धि। अल॑र्ति॒ दक्ष॑ उ॒त म॒न्युरि॑न्दो॒ मा नो॑ अ॒र्यो अ॑नुका॒मं परा॑ दाः॥

इसका अभिप्राय यह है कि ऐसा अन्न हम खाएँ, जिससे सुख और कल्याण हो। हम सदा संयमी होवें। अन्न खाकर सात्त्विक बल धारण करें और काम क्रोध आदि शत्रु के वशीभूत न होवें। इति॥८॥

त्वं हि न॑स्त॒न्वः॑ सोम गो॒पा गात्रे॑गात्रे निष॒सत्था॑ नृ॒चक्षाः॑। यत्ते॑ व॒यं प्र॑मि॒नाम॑ व्र॒तानि॒ स नो॑ मृळ सुष॒खा दे॑व॒ वस्यः॑॥

भाव इसका विस्पष्ट है। अन्न ही हमारे शरीर का पोषक है, इसमें सन्देह नहीं। वह हमारे प्रत्येक अङ्ग में जाकर पोषण करता है। अन्न के व्रतों को हम लोग भग्न करते हैं। इसका भाव यह है कि नियमपूर्वक शक्ति के अनुसार भोजन नहीं करते। कभी-२ देखा गया है कि अतिशय भोजन से तत्काल आदमी मर गया है। अतिभोजन से अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। स्वल्प भोजन सदा हितकारी होता है॥९॥

ऋ॒दू॒दरे॑ण॒ सख्या॑ सचेय॒ यो मा॒ न रिष्ये॑द्धर्यश्व पी॒तः। अ॒यं यः सोमो॒ न्यधा॑य्य॒स्मे तस्मा॒ इन्द्रं॑ प्र॒तिर॑मे॒म्यायुः॑॥

ईश्वर से सब कोई प्रार्थना करें कि उत्तमोत्तम अन्न खा पीकर हम बलवान् और लोकोपकारी हों॥१०॥

अप॒ त्या अ॑स्थु॒रनि॑रा॒ अमी॑वा॒ निर॑त्रस॒न्तमि॑षीची॒रभै॑षुः। आ सोमो॑ अ॒स्माँ अ॑रुह॒द्विहा॑या॒ अग॑न्म॒ यत्र॑ प्रति॒रन्त॒ आयुः॑॥

इसमें सन्देह नहीं कि उत्तमोत्तम अन्न के खाने-पीने से और उत्तम गृह में रहने से रोग नहीं होते और शरीर में विद्यमान रोग भी नष्ट हो जाते हैं॥११॥

यो न॒ इन्दुः॑ पितरो हृ॒त्सु पी॒तोऽम॑र्त्यो॒ मर्त्याँ॑ आवि॒वेश॑। तस्मै॒ सोमा॑य ह॒विषा॑ विधेम मृळी॒के अ॑स्य सुम॒तौ स्या॑म॥

श्रेष्ठ खाद्य पदार्थ का प्रयोग ऐसा करें कि जिससे सुख हो और बुद्धि न बिगड़े॥१२॥

त्वं सो॑म पि॒तृभिः॑ संविदा॒नोऽनु॒ द्यावा॑पृथि॒वी आ त॑तन्थ। तस्मै॑ त इन्दो ह॒विषा॑ विधेम व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम्॥

वेद की एक यह रीति है कि भौतिक पदार्थों का वर्णन कर उसी नाम से अन्त में ईश्वर की प्रार्थना करते हैं, अतः अगले तीन मन्त्रों से ईश्वर की प्रार्थना का विधान है॥१३॥

त्राता॑रो देवा॒ अधि॑ वोचता नो॒ मा नो॑ नि॒द्रा ई॑शत॒ मोत जल्पिः॑। व॒यं सोम॑स्य वि॒श्वह॑ प्रि॒यासः॑ सु॒वीरा॑सो वि॒दथ॒मा व॑देम॥

हम लोग समय-२ पर विद्वानों से उपदेश ग्रहण करें, ताकि आलस्यादि दोष न आने पावें और ईश्वर के प्रिय सदा बने रहें॥१४॥

त्वं नः॑ सोम वि॒श्वतो॑ वयो॒धास्त्वं स्व॒र्विदा वि॑शा नृ॒चक्षाः॑। त्वं न॑ इन्द ऊ॒तिभिः॑ स॒जोषाः॑ पा॒हि प॒श्चाता॑दु॒त वा॑ पु॒रस्ता॑त्॥

अ॒भि प्र वः॑ सु॒राध॑स॒मिन्द्र॑मर्च॒ यथा॑ वि॒दे। यो ज॑रि॒तृभ्यो॑ म॒घवा॑ पुरू॒वसुः॑ स॒हस्रे॑णेव॒ शिक्ष॑ति॥

श॒तानी॑केव॒ प्र जि॑गाति धृष्णु॒या हन्ति॑ वृ॒त्राणि॑ दा॒शुषे॑। गि॒रेरि॑व॒ प्र रसा॑ अस्य पिन्विरे॒ दत्रा॑णि पुरु॒भोज॑सः॥

आ त्वा॑ सु॒तास॒ इन्द॑वो॒ मदा॒ य इ॑न्द्र गिर्वणः। आपो॒ न व॑ज्रि॒न्नन्वो॒क्यं१॒॑ सरः॑ पृ॒णन्ति॑ शूर॒ राध॑से॥

अ॒ने॒हसं॑ प्र॒तर॑णं वि॒वक्ष॑णं॒ मध्वः॒ स्वादि॑ष्ठमीं पिब। आ यथा॑ मन्दसा॒नः कि॒रासि॑ नः॒ प्र क्षु॒द्रेव॒ त्मना॑ धृ॒षत्॥

आ नः॒ स्तोम॒मुप॑ द्र॒वद्धि॑या॒नो अश्वो॒ न सोतृ॑भिः। यं ते॑ स्वधावन्त्स्व॒दय॑न्ति धे॒नव॒ इन्द्र॒ कण्वे॑षु रा॒तयः॑॥

उ॒ग्रं न वी॒रं नम॒सोप॑ सेदिम॒ विभू॑ति॒मक्षि॑तावसुम्। उ॒द्रीव॑ वज्रिन्नव॒तो न सि॑ञ्च॒ते क्षर॑न्तीन्द्र धी॒तयः॑॥

यद्ध॑ नू॒नं यद्वा॑ य॒ज्ञे यद्वा॑ पृथि॒व्यामधि॑। अतो॑ नो य॒ज्ञमा॒शुभि॑र्महेमत उ॒ग्र उ॒ग्रेभि॒रा ग॑हि॥

अ॒जि॒रासो॒ हर॑यो॒ ये त॑ आ॒शवो॒ वाता॑ इव प्रस॒क्षिणः॑। येभि॒रप॑त्यं॒ मनु॑षः प॒रीय॑से॒ येभि॒र्विश्वं॒ स्व॑र्दृ॒शे॥

ए॒ताव॑तस्त ईमह॒ इन्द्र॑ सु॒म्नस्य॒ गोम॑तः। यथा॒ प्रावो॑ मघव॒न्मेध्या॑तिथिं॒ यथा॒ नीपा॑तिथिं॒ धने॑॥

यथा॒ कण्वे॑ मघवन्त्र॒सद॑स्यवि॒ यथा॑ प॒क्थे दश॑व्रजे। यथा॒ गोश॑र्ये॒ अस॑नोॠ॒जिश्व॒नीन्द्र॒ गोम॒द्धिर॑ण्यवत्॥

प्र सु श्रु॒तं सु॒राध॑स॒मर्चा॑ श॒क्रम॒भिष्ट॑ये। यः सु॑न्व॒ते स्तु॑व॒ते काम्यं॒ वसु॑ स॒हस्रे॑णेव॒ मंह॑ते॥

श॒तानी॑का हे॒तयो॑ अस्य दु॒ष्टरा॒ इन्द्र॑स्य स॒मिषो॑ म॒हीः। गि॒रिर्न भु॒ज्मा म॒घव॑त्सु पिन्वते॒ यदीं॑ सु॒ता अम॑न्दिषुः॥

यदीं॑ सु॒तास॒ इन्द॑वो॒ऽभि प्रि॒यमम॑न्दिषुः। आपो॒ न धा॑यि॒ सव॑नं म॒ आ व॑सो॒ दुघा॑ इ॒वोप॑ दा॒शुषे॑॥

अ॒ने॒हसं॑ वो॒ हव॑मानमू॒तये॒ मध्वः॑ क्षरन्ति धी॒तयः॑। आ त्वा॑ वसो॒ हव॑मानास॒ इन्द॑व॒ उप॑ स्तो॒त्रेषु॑ दधिरे॥

आ नः॒ सोमे॑ स्वध्व॒र इ॑या॒नो अत्यो॒ न तो॑शते। यं ते॑ स्वदाव॒न्त्स्वद॑न्ति गू॒र्तयः॑ पौ॒रे छ॑न्दयसे॒ हव॑म्॥

प्र वी॒रमु॒ग्रं विवि॑चिं धन॒स्पृतं॒ विभू॑तिं॒ राध॑सो म॒हः। उ॒द्रीव॑ वज्रिन्नव॒तो व॑सुत्व॒ना सदा॑ पीपेथ दा॒शुषे॑॥

यद्ध॑ नू॒नं प॑रा॒वति॒ यद्वा॑ पृथि॒व्यां दि॒वि। यु॒जा॒न इ॑न्द्र॒ हरि॑भिर्महेमत ऋ॒ष्व ऋ॒ष्वेभि॒रा ग॑हि॥

र॒थि॒रासो॒ हर॑यो॒ ये ते॑ अ॒स्रिध॒ ओजो॒ वात॑स्य॒ पिप्र॑ति। येभि॒र्नि दस्युं॒ मनु॑षो नि॒घोष॑यो॒ येभिः॒ स्वः॑ प॒रीय॑से॥

ए॒ताव॑तस्ते वसो वि॒द्याम॑ शूर॒ नव्य॑सः। यथा॒ प्राव॒ एत॑शं॒ कृत्व्ये॒ धने॒ यथा॒ वशं॒ दश॑व्रजे॥

यथा॒ कण्वे॑ मघव॒न्मेधे॑ अध्व॒रे दी॒र्घनी॑थे॒ दमू॑नसि। यथा॒ गोश॑र्ये॒ असि॑षासो अद्रिवो॒ मयि॑ गो॒त्रं ह॑रि॒श्रिय॑म्॥

यथा॒ मनौ॒ सांव॑रणौ॒ सोम॑मि॒न्द्रापि॑बः सु॒तम्। नीपा॑तिथौ मघव॒न्मेध्या॑तिथौ॒ पुष्टि॑गौ॒ श्रुष्टि॑गौ॒ सचा॑॥

पा॒र्ष॒द्वा॒णः प्रस्क॑ण्वं॒ सम॑सादय॒च्छया॑नं॒ जिव्रि॒मुद्धि॑तम्। स॒हस्रा॑ण्यसिषास॒द्गवा॒मृषि॒स्त्वोतो॒ दस्य॑वे॒ वृकः॑॥

य उ॒क्थेभि॒र्न वि॒न्धते॑ चि॒किद्य ऋ॑षि॒चोद॑नः। इन्द्रं॒ तमच्छा॑ वद॒ नव्य॑स्या म॒त्यरि॑ष्यन्तं॒ न भोज॑से॥

यस्मा॑ अ॒र्कं स॒प्तशी॑र्षाणमानृ॒चुस्त्रि॒धातु॑मुत्त॒मे प॒दे। स त्वि१॒॑मा विश्वा॒ भुव॑नानि चिक्रद॒दादिज्ज॑निष्ट॒ पौंस्य॑म्॥

यो नो॑ दा॒ता वसू॑ना॒मिन्द्रं॒ तं हू॑महे व॒यम्। वि॒द्मा ह्य॑स्य सुम॒तिं नवी॑यसीं ग॒मेम॒ गोम॑ति व्र॒जे॥

यस्मै॒ त्वं व॑सो दा॒नाय॒ शिक्ष॑सि॒ स रा॒यस्पोष॑मश्नुते। तं त्वा॑ व॒यं म॑घवन्निन्द्र गिर्वणः सु॒ताव॑न्तो हवामहे॥

क॒दा च॒न स्त॒रीर॑सि॒ नेन्द्र॑ सश्चसि दा॒शुषे॑। उपो॒पेन्नु म॑घव॒न्भूय॒ इन्नु ते॒ दानं॑ दे॒वस्य॑ पृच्यते॥

प्र यो न॑न॒क्षे अ॒भ्योज॑सा॒ क्रिविं॑ व॒धैः शुष्णं॑ निघो॒षय॑न्। य॒देदस्त॑म्भीत्प्र॒थय॑न्न॒मूं दिव॒मादिज्ज॑निष्ट॒ पार्थि॑वः॥

यस्या॒यं विश्व॒ आर्यो॒ दासः॑ शेवधि॒पा अ॒रिः। ति॒रश्चि॑द॒र्ये रुश॑मे॒ परी॑रवि॒ तुभ्येत्सो अ॑ज्यते र॒यिः॥

तु॒र॒ण्यवो॒ मधु॑मन्तं घृत॒श्चुतं॒ विप्रा॑सो अ॒र्कमा॑नृचुः। अ॒स्मे र॒यिः प॑प्रथे॒ वृष्ण्यं॒ शवो॒ऽस्मे सु॑वा॒नास॒ इन्द॑वः॥

यथा॒ मनौ॒ विव॑स्वति॒ सोमं॑ श॒क्रापि॑बः सु॒तम्। यथा॑ त्रि॒ते छन्द॑ इन्द्र॒ जुजो॑षस्या॒यौ मा॑दयसे॒ सचा॑॥

पृष॑ध्रे॒ मेध्ये॑ मात॒रिश्व॒नीन्द्र॑ सुवा॒ने अम॑न्दथाः। यथा॒ सोमं॒ दश॑शिप्रे॒ दशो॑ण्ये॒ स्यूम॑रश्मा॒वृजू॑नसि॥

य उ॒क्था केव॑ला द॒धे यः सोमं॑ धृषि॒तापि॑बत्। यस्मै॒ विष्णु॒स्त्रीणि॑ प॒दा वि॑चक्र॒म उप॑ मि॒त्रस्य॒ धर्म॑भिः॥

यस्य॒ त्वमि॑न्द्र॒ स्तोमे॑षु चा॒कनो॒ वाजे॑ वाजिञ्छतक्रतो। तं त्वा॑ व॒यं सु॒दुघा॑मिव गो॒दुहो॑ जुहू॒मसि॑ श्रव॒स्यवः॑॥

यो नो॑ दा॒ता स नः॑ पि॒ता म॒हाँ उ॒ग्र ई॑शान॒कृत्। अया॑मन्नु॒ग्रो म॒घवा॑ पुरू॒वसु॒र्गोरश्व॑स्य॒ प्र दा॑तु नः॥

यस्मै॒ त्वं व॑सो दा॒नाय॒ मंह॑से॒ स रा॒यस्पोष॑मिन्वति। व॒सू॒यवो॒ वसु॑पतिं श॒तक्र॑तुं॒ स्तोमै॒रिन्द्रं॑ हवामहे॥

क॒दा च॒न प्र यु॑च्छस्यु॒भे नि पा॑सि॒ जन्म॑नी। तुरी॑यादित्य॒ हव॑नं त इन्द्रि॒यमा त॑स्थाव॒मृतं॑ दि॒वि॥

यस्मै॒ त्वं म॑घवन्निन्द्र गिर्वणः॒ शिक्षो॒ शिक्ष॑सि दा॒शुषे॑। अ॒स्माकं॒ गिर॑ उ॒त सु॑ष्टु॒तिं व॑सो कण्व॒वच्छृ॑णुधी॒ हव॑म्॥

अस्ता॑वि॒ मन्म॑ पू॒र्व्यं ब्रह्मेन्द्रा॑य वोचत। पू॒र्वीॠ॒तस्य॑ बृह॒तीर॑नूषत स्तो॒तुर्मे॒धा अ॑सृक्षत॥

समिन्द्रो॒ रायो॑ बृह॒तीर॑धूनुत॒ सं क्षो॒णी समु॒ सूर्य॑म्। सं शु॒क्रासः॒ शुच॑यः॒ सं गवा॑शिरः॒ सोमा॒ इन्द्र॑ममन्दिषुः॥

उ॒प॒मं त्वा॑ म॒घोनां॒ ज्येष्ठं॑ च वृष॒भाणा॑म्। पू॒र्भित्त॑मं मघवन्निन्द्र गो॒विद॒मीशा॑नं रा॒य ई॑महे॥

य आ॒युं कुत्स॑मतिथि॒ग्वमर्द॑यो वावृधा॒नो दि॒वेदि॑वे। तं त्वा॑ व॒यं हर्य॑श्वं श॒तक्र॑तुं वाज॒यन्तो॑ हवामहे॥

आ नो॒ विश्वे॑षां॒ रसं॒ मध्वः॑ सिञ्च॒न्त्वद्र॑यः। ये प॑रा॒वति॑ सुन्वि॒रे जने॒ष्वा ये अ॑र्वा॒वतीन्द॑वः॥

विश्वा॒ द्वेषां॑सि ज॒हि चाव॒ चा कृ॑धि॒ विश्वे॑ सन्व॒न्त्वा वसु॑। शीष्टे॑षु चित्ते मदि॒रासो॑ अं॒शवो॒ यत्रा॒ सोम॑स्य तृ॒म्पसि॑॥

इन्द्र॒ नेदी॑य॒ एदि॑हि मि॒तमे॑धाभिरू॒तिभिः॑। आ शं॑तम॒ शंत॑माभिर॒भिष्टि॑भि॒रा स्वा॑पे स्वा॒पिभिः॑॥

आ॒जि॒तुरं॒ सत्प॑तिं वि॒श्वच॑र्षणिं कृ॒धि प्र॒जास्वाभ॑गम्। प्र सू ति॑रा॒ शची॑भि॒र्ये त॑ उ॒क्थिनः॒ क्रतुं॑ पुन॒त आ॑नु॒षक्॥

यस्ते॒ साधि॒ष्ठोऽव॑से॒ ते स्या॑म॒ भरे॑षु ते। व॒यं होत्रा॑भिरु॒त दे॒वहू॑तिभिः सस॒वांसो॑ मनामहे॥

अ॒हं हि ते॑ हरिवो॒ ब्रह्म॑ वाज॒युरा॒जिं यामि॒ सदो॒तिभिः॑। त्वामिदे॒व तममे॒ सम॑श्व॒युर्ग॒व्युरग्र॑॑ मथी॒नाम्॥

ए॒तत्त॑ इन्द्र वी॒र्यं॑ गी॒र्भिर्गृ॒णन्ति॑ का॒रवः॑। ते स्तोभ॑न्त॒ ऊर्ज॑मावन्घृत॒श्चुतं॑ पौ॒रासो॑ नक्षन्धी॒तिभिः॑॥

नक्ष॑न्त॒ इन्द्र॒मव॑से सुकृ॒त्यया॒ येषां॑ सु॒तेषु॒ मन्द॑से। यथा॑ संव॒र्ते अम॑दो॒ यथा॑ कृ॒श ए॒वास्मे इ॑न्द्र मत्स्व॥

आ नो॒ विश्वे॑ स॒जोष॑सो॒ देवा॑सो॒ गन्त॒नोप॑ नः। वस॑वो रु॒द्रा अव॑से न॒ आ ग॑मञ्छृ॒ण्वन्तु॑ म॒रुतो॒ हव॑म्॥

पू॒षा विष्णु॒र्हव॑नं मे॒ सर॑स्व॒त्यव॑न्तु स॒प्त सिन्ध॑वः। आपो॒ वातः॒ पर्व॑तासो॒ वन॒स्पतिः॑ शृ॒णोतु॑ पृथि॒वी हव॑म्॥

यदि॑न्द्र॒ राधो॒ अस्ति॑ ते॒ माघो॑नं मघवत्तम। तेन॑ नो बोधि सध॒माद्यो॑ वृ॒धे भगो॑ दा॒नाय॑ वृत्रहन्॥

आजि॑पते नृपते॒ त्वमिद्धि नो॒ वाज॒ आ व॑क्षि सुक्रतो। वी॒ती होत्रा॑भिरु॒त दे॒ववी॑तिभिः सस॒वांसो॒ वि शृ॑ण्विरे॥

सन्ति॒ ह्य१॒॑र्य आ॒शिष॒ इन्द्र॒ आयु॒र्जना॑नाम्। अ॒स्मान्न॑क्षस्व मघव॒न्नुपाव॑से धु॒क्षस्व॑ पि॒प्युषी॒मिष॑म्॥

व॒यं त॑ इन्द्र॒ स्तोमे॑भिर्विधेम॒ त्वम॒स्माकं॑ शतक्रतो। महि॑ स्थू॒रं श॑श॒यं राधो॒ अह्र॑यं॒ प्रस्क॑ण्वाय॒ नि तो॑शय॥

भूरीदिन्द्र॑स्य वी॒र्यं१॒॑ व्यख्य॑म॒भ्याय॑ति। राध॑स्ते दस्यवे वृक॥

श॒तं श्वे॒तास॑ उ॒क्षणो॑ दि॒वि तारो॒ न रो॑चन्ते। म॒ह्ना दिवं॒ न त॑स्तभुः॥

श॒तं वे॒णूञ्छ॒तं शुनः॑ श॒तं चर्मा॑णि म्ला॒तानि॑। श॒तं मे॑ बल्बजस्तु॒का अरु॑षीणां॒ चतुः॑शतम्॥

सु॒दे॒वाः स्थ॑ काण्वायना॒ वयो॑वयो विच॒रन्तः॑। अश्वा॑सो॒ न च॑ङ्क्रमत॥

आदित्सा॒प्तस्य॑ चर्किर॒न्नानू॑नस्य॒ महि॒ श्रवः॑। श्यावी॑रतिध्व॒सन्प॒थश्चक्षु॑षा च॒न सं॒नशे॑॥

प्रति॑ ते दस्यवे वृक॒ राधो॑ अद॒र्श्यह्र॑यम्। द्यौर्न प्र॑थि॒ना शवः॑॥

दश॒ मह्यं॑ पौतक्र॒तः स॒हस्रा॒ दस्य॑वे॒ वृकः॑। नित्या॑द्रा॒यो अ॑मंहत॥

श॒तं मे॑ गर्द॒भानां॑ श॒तमूर्णा॑वतीनाम्। श॒तं दा॒साँ अति॒ स्रजः॑॥

तत्रो॒ अपि॒ प्राणी॑यत पू॒तक्र॑तायै॒ व्य॑क्ता। अश्वा॑ना॒मिन्न यू॒थ्या॑म्॥

अचे॑त्य॒ग्निश्चि॑कि॒तुर्ह॑व्य॒वाट् स सु॒मद्र॑थः। अ॒ग्निः शु॒क्रेण॑ शो॒चिषा॑ बृ॒हत्सूरो॑ अरोचत दि॒वि सूर्यो॑ अरोचत॥

यु॒वं दे॑वा॒ क्रतु॑ना पू॒र्व्येण॑ यु॒क्ता रथे॑न तवि॒षं य॑जत्रा। आग॑च्छतं नासत्या॒ शची॑भिरि॒दं तृ॒तीयं॒ सव॑नं पिबाथः॥

यु॒वां दे॒वास्त्रय॑ एकाद॒शासः॑ स॒त्याः स॒त्यस्य॑ ददृशे पु॒रस्ता॑त्। अ॒स्माकं॑ य॒ज्ञं सव॑नं जुषा॒णा पा॒तं सोम॑मश्विना॒ दीद्य॑ग्नी॥

प॒नाय्यं॒ तद॑श्विना कृ॒तं वां॑ वृष॒भो दि॒वो रज॑सः पृथि॒व्याः। स॒हस्रं॒ शंसा॑ उ॒त ये गवि॑ष्टौ॒ सर्वाँ॒ इत्ताँ उप॑ याता॒ पिब॑ध्यै॥

अ॒यं वां॑ भा॒गो निहि॑तो यजत्रे॒मा गिरो॑ नास॒त्योप॑ यातम्। पिब॑तं॒ सोमं॒ मधु॑मन्तम॒स्मे प्र दा॒श्वांस॑मवतं॒ शची॑भिः॥

यमृ॒त्विजो॑ बहु॒धा क॒ल्पय॑न्तः॒ सचे॑तसो य॒ज्ञमि॒मं वह॑न्ति। यो अ॑नूचा॒नो ब्रा॑ह्म॒णो यु॒क्त आ॑सी॒त्का स्वि॒त्तत्र॒ यज॑मानस्य सं॒वित्॥

एक॑ ए॒वाग्निर्ब॑हु॒धा समि॑द्ध॒ एकः॒ सूर्यो॒ विश्व॒मनु॒ प्रभू॑तः। एकै॒वोषाः सर्व॑मि॒दं वि भा॒त्येकं॒ वा इ॒दं वि ब॑भूव॒ सर्व॑म्॥

ज्योति॑ष्मन्तं केतु॒मन्तं॑ त्रिच॒क्रं सु॒खं रथं॑ सु॒षदं॒ भूरि॑वारम्। चि॒त्राम॑घा॒ यस्य॒ योगे॑ऽधिजज्ञे॒ तं वां॑ हु॒वे अति॑ रिक्तं॒ पिब॑ध्यै॥

इ॒मानि॑ वां भाग॒धेया॑नि सिस्रत॒ इन्द्रा॑वरुणा॒ प्र म॒हे सु॒तेषु॑ वाम्। य॒ज्ञेय॑ज्ञे ह॒ सव॑ना भुर॒ण्यथो॒ यत्सु॑न्व॒ते यज॑मानाय॒ शिक्ष॑थः॥

नि॒ष्षिध्व॑री॒रोष॑धी॒राप॑ आस्ता॒मिन्द्रा॑वरुणा महि॒मान॒माश॑त। या सिस्र॑तू॒ रज॑सः पा॒रे अध्व॑नो॒ ययोः॒ शत्रु॒र्नकि॒रादे॑व॒ ओह॑ते॥

स॒त्यं तदि॑न्द्रावरुणा कृ॒शस्य॑ वां॒ मध्व॑ ऊ॒र्मिं दु॑हते स॒प्त वाणीः॑। ताभि॑र्दा॒श्वांस॑मवतं शुभस्पती॒ यो वा॒मद॑ब्धो अ॒भि पाति॒ चित्ति॑भिः॥

घृ॒त॒प्रुषः॒ सौम्या॑ जी॒रदा॑नवः स॒प्त स्वसा॑रः॒ सद॑न ऋ॒तस्य॑। या ह॑ वामिन्द्रावरुणा घृत॒श्चुत॒स्ताभि॑र्धत्तं॒ यज॑मानाय शिक्षतम्॥

अवो॑चाम मह॒ते सौभ॑गाय स॒त्यं त्वे॒षाभ्यां॑ महि॒मान॑मिन्द्रि॒यम्। अ॒स्मान्त्स्वि॑न्द्रावरुणा घृत॒श्चुत॒स्त्रिभिः॑ सा॒प्तेभि॑रवतं शुभस्पती॥

इन्द्रा॑वरुणा॒ यदृ॒षिभ्यो॑ मनी॒षां वा॒चो म॒तिं श्रु॒तम॑दत्त॒मग्रे॑। यानि॒ स्थाना॑न्यसृजन्त॒ धीरा॑ य॒ज्ञं त॑न्वा॒नास्तप॑सा॒भ्य॑पश्यम्॥

इन्द्रा॑वरुणा सौमन॒समदृ॑प्तं रा॒यस्पोषं॒ यज॑मानेषु धत्तम्। प्र॒जां पु॒ष्टिं भू॑तिम॒स्मासु॑ धत्तं दीर्घायु॒त्वाय॒ प्र ति॑रतं न॒ आयुः॑॥

सूक्तम्

अग्न॒ आ या॑ह्य॒ग्निभि॒र्होता॑रं त्वा वृणीमहे। आ त्वाम॑नक्तु॒ प्रय॑ता ह॒विष्म॑ती॒ यजि॑ष्ठं ब॒र्हिरा॒सदे॑॥

अग्नि यह नाम ईश्वर का परम प्रसिद्ध है। उसकी स्तुति प्रार्थना हम मनुष्य सदा करें॥१॥

अच्छा॒ हि त्वा॑ सहसः सूनो अङ्गिरः॒ स्रुच॒श्चर॑न्त्यध्व॒रे। ऊ॒र्जो नपा॑तं घृ॒तके॑शमीमहे॒ऽग्निं य॒ज्ञेषु॑ पू॒र्व्यम्॥

यह सम्पूर्ण सूक्त यज्ञिय अग्नि में भी घट सकता है, अतः बहुत से विशेषण ऐसे रक्खे गए हैं कि वे दोनों के वाचक हों, दोनों अर्थों को देने में समर्थ हों, जैसे (सहसः+सूनुः) इसका अग्नि पक्ष में बल का पुत्र अर्थ है, क्योंकि बलपूर्वक रगड़ से अग्नि उत्पन्न होता है। इत्यादि॥२॥

अग्ने॑ क॒विर्वे॒धा अ॑सि॒ होता॑ पावक॒ यक्ष्यः॑। म॒न्द्रो यजि॑ष्ठो अध्व॒रेष्वीड्यो॒ विप्रे॑भिः शुक्र॒ मन्म॑भिः॥

ईश्वर ही सदा पूज्य है, यह इसका अभिप्राय है॥३॥

अद्रो॑घ॒मा व॑होश॒तो य॑विष्ठ्य दे॒वाँ अ॑जस्र वी॒तये॑। अ॒भि प्रयां॑सि॒ सुधि॒ता व॑सो गहि॒ मन्द॑स्व धी॒तिभि॑र्हि॒तः॥

कभी किसी की द्रोह चिन्ता न करे और सदा सत्पुरुषों को अपने गृह पर बुलाकर सत्कार करे और प्रयत्नपूर्वक अन्नोपार्जन कर दरिद्रोपकार किया करे॥४॥

त्वमित्स॒प्रथा॑ अ॒स्यग्ने॑ त्रातॠ॒तस्क॒विः। त्वां विप्रा॑सः समिधान दीदिव॒ आ वि॑वासन्ति वे॒धसः॑॥

जिस परमेश्वर को सब ही सेवते हैं, हे मनुष्यो! तुम भी उसी की सेवा करो, जो सत्यरूप और महाकवि है, जिससे बड़ा कोई नहीं॥५॥

शोचा॑ शोचिष्ठ दीदि॒हि वि॒शे मयो॒ रास्व॑ स्तो॒त्रे म॒हाँ अ॑सि। दे॒वानां॒ शर्म॒न्मम॑ सन्तु सू॒रयः॑ शत्रू॒षाहः॑ स्व॒ग्नयः॑॥

यह ईश्वर से आशीर्वाद माँगना है। उसी की कृपा से धन, जन, बल और प्रताप प्राप्त होते हैं। हमारे स्वजन और परिजन भी जगत् के हितकारी हों और नित्य नैमित्तिक कर्मों में सदा आसक्त रहें॥६॥

यथा॑ चिद्वृ॒द्धम॑त॒समग्ने॑ सं॒जूर्व॑सि॒ क्षमि॑। ए॒वा द॑ह मित्रमहो॒ यो अ॑स्म॒ध्रुग्दु॒र्मन्मा॒ कश्च॒ वेन॑ति॥

यह सूक्त भौतिकाग्नि में भी प्रयुक्त होता है, अतः इसके शब्दादि द्व्यर्थक हैं। अग्नि पक्ष में जैसे अग्नि बहुत बढ़ते हुए काष्ठ को भी भस्मकर पृथिवी में मिला देता है, तद्वत् मेरे शत्रु को भी भस्म कर इत्यादि। ऐसे-२ मन्त्रों से यह शिक्षा मिलती है कि किसी की अनिष्टचिन्ता नहीं करनी चाहिये, किन्तु परस्पर मित्र के समान व्यवहार करते हुए जीवन बिताना चाहिये। इस थोड़े से जीवन में जहाँ तक हो, उपकार कर जाओ। इति॥७॥

मा नो॒ मर्ता॑य रि॒पवे॑ रक्ष॒स्विने॒ माघशं॑साय रीरधः। अस्रे॑धद्भिस्त॒रणि॑भिर्यविष्ठ्य शि॒वेभिः॑ पाहि पा॒युभिः॑॥

हे मनुष्यो! दुर्जनों का सङ्ग छोड़ उत्तम पुरुषों के साथ वास और संवाद करो॥८॥

पा॒हि नो॑ अग्न॒ एक॑या पा॒ह्यु१॒॑त द्वि॒तीय॑या। पा॒हि गी॒र्भिस्ति॒सृभि॑रूर्जां पते पा॒हि च॑त॒सृभि॑र्वसो॥

प्रथम मनुष्य अपनी वाणी मधुर और सत्य बनावें, तब वेद-शास्त्रों के वाक्यों को इस प्रकार पढ़ें और व्याख्यान करें कि लोग मोहित हों और उनके हृदय से अज्ञान निकल बाहर भाग जाय, तब आत्मा के अभ्यन्तर से जो-२ विचार उत्पन्न हों, उन्हें बहुत यत्न से लिखता जाय, उन पर सदा ध्यान देवे और उन्हें बढ़ाता जाय। तत्पश्चात् आत्मा के साथ जो ईश्वरीय आदेश हों, उन्हें एकान्त और निश्चिन्त हो विचारे और जगत् को सुनावे। यह तब ही हो सकता है, जब अन्तःकरण शुद्ध हो॥९॥

पा॒हि विश्व॑स्माद्र॒क्षसो॒ अरा॑व्णः॒ प्र स्म॒ वाजे॑षु नोऽव। त्वामिद्धि नेदि॑ष्ठं दे॒वता॑तय आ॒पिं नक्षा॑महे वृ॒धे॥

हे मनुष्यो! जब तुम ईश्वर की शरण में प्राप्त होगे, तब ही तुम्हारे सकल विघ्न दूर होंगे। ईश्वर को ही अपना समीपी सम्बन्धी और बन्धु समझो, उसके आश्रय में सदा वास करो॥१०॥

आ नो॑ अग्ने वयो॒वृधं॑ र॒यिं पा॑वक॒ शंस्य॑म्। रास्वा॑ च न उपमाते पुरु॒स्पृहं॒ सुनी॑ती॒ स्वय॑शस्तरम्॥

धन या जन वैसा हो, जो प्रशंसनीय हो अर्थात् लोकोपकारी और उद्योगी हो। जिस धन से अनाथों और असमर्थों की रक्षा न हुई, तो वह किस काम का। धनादिकों की तब ही प्रशंसा हो सकती है, जब उनका सदुपयोग और साहाय्यार्थ हो। बहुत आदमी धन प्राप्त कर उसका उपयोग न जान उससे धर्म के स्थान में अधर्म कमाते हैं॥११॥

येन॒ वंसा॑म॒ पृत॑नासु॒ शर्ध॑त॒स्तर॑न्तो अ॒र्य आ॒दिशः॑। स त्वं नो॑ वर्ध॒ प्रय॑सा शचीवसो॒ जिन्वा॒ धियो॑ वसु॒विदः॑॥

हमारे बाह्य और आन्तरिक शत्रु हैं। उनको सर्वदा दबा रखने के उपाय सोचें और अपनी बुद्धि और कर्मों को ईश्वर की प्रार्थना से शुद्ध और तेज बनावें॥१२॥

शिशा॑नो वृष॒भो य॑था॒ग्निः शृङ्गे॒ दवि॑ध्वत्। ति॒ग्मा अ॑स्य॒ हन॑वो॒ न प्र॑ति॒धृषे॑ सु॒जम्भः॒ सह॑सो य॒हुः॥

ईश्वर परम न्यायी है, केवल प्रार्थना से वह प्रसन्न नहीं होता, किन्तु जो कोई उसकी आज्ञा पर चलता है, वही उसका प्रिय है॥१३॥

न॒हि ते॑ अग्ने वृषभ प्रति॒धृषे॒ जम्भा॑सो॒ यद्वि॒तिष्ठ॑से। स त्वं नो॑ होतः॒ सुहु॑तं ह॒विष्कृ॑धि॒ वंस्वा॑ नो॒ वार्या॑ पु॒रु॥

हे मनुष्यो! परमात्मा के न्याय से डरो और अपनी आवश्यकता के लिये उसी के निकट प्रार्थना करो॥१४॥

शेषे॒ वने॑षु मा॒त्रोः सं त्वा॒ मर्ता॑स इन्धते। अत॑न्द्रो ह॒व्या व॑हसि हवि॒ष्कृत॒ आदिद्दे॒वेषु॑ राजसि॥

द्यावा पृथिवी का नाम माता है। ईश्वर के नाम पर ही अग्निहोत्रादि शुभकर्म करने चाहियें, क्योंकि अग्नि आदि देवों में वही विराजमान है। वह मनुष्य के प्रत्येक कर्म को देखता है। वही कर्मफलदाता है॥१५॥

स॒प्त होता॑र॒स्तमिदी॑ळते॒ त्वाग्ने॑ सु॒त्यज॒मह्र॑यम्। भि॒नत्स्यद्रिं॒ तप॑सा॒ वि शो॒चिषा॒ प्राग्ने॑ तिष्ठ॒ जनाँ॒ अति॑॥

यज्ञ में परमात्मा की ही स्तुति प्रार्थना करनी चाहिये। सप्त होता, दो नयन, दो कर्ण, दो नासिकाएँ और एक जिह्वा ये सात हैं। अथवा होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा और यजमान यजमान-पत्नी और पत्नी की सहायिका। यह इसका आशय है। इत्यादि॥१६॥

अ॒ग्निम॑ग्निं वो॒ अध्रि॑गुं हु॒वेम॑ वृ॒क्तब॑र्हिषः। अ॒ग्निं हि॒तप्र॑यसः शश्व॒तीष्वा होता॑रं चर्षणी॒नाम्॥

भाव यह है कि जो सदा अग्निहोत्रादि कर्म करते हों और सुखी हों, वे दूसरों की भलाई के लिये ईश्वर से प्रार्थना करें॥१७॥

केते॑न॒ शर्म॑न्त्सचते सुषा॒मण्यग्ने॒ तुभ्यं॑ चिकि॒त्वना॑। इ॒ष॒ण्यया॑ नः पुरु॒रूप॒मा भ॑र॒ वाजं॒ नेदि॑ष्ठमू॒तये॑॥

हे मनुष्यो! जहाँ तुम निवास करो, वहाँ पवित्र बना रक्खो। वहाँ सर्वदा ईश्वर की स्तुति प्रार्थना के लिये पवित्र स्थान बनाओ और उसी की आज्ञा पर सदा चला करो, तब ही तुम्हारा कल्याण होगा॥१८॥

अग्ने॒ जरि॑तर्वि॒श्पति॑स्तेपा॒नो दे॑व र॒क्षसः॑। अप्रो॑षिवान्गृ॒हप॑तिर्म॒हाँ अ॑सि दि॒वस्पा॒युर्दु॑रोण॒युः॥

हे मनुष्यो! भगवान् को ही अपना और जगत् का पालक मानकर पूजो॥१९॥

मा नो॒ रक्ष॒ आ वे॑शीदाघृणीवसो॒ मा या॒तुर्या॑तु॒माव॑ताम्। प॒रो॒ग॒व्यू॒त्यनि॑रा॒मप॒ क्षुध॒मग्ने॒ सेध॑ रक्ष॒स्विनः॑॥

जगत् में ऐसा न्याय और शिक्षा फैलावे कि मनुष्य परस्पर द्वेष द्रोह करना छोड़ मित्र होकर रहें। तब ही वे सुखी रहकर ईश्वर की भी उपासना कर सकते हैं॥२०॥

उ॒भयं॑ शृ॒णव॑च्च न॒ इन्द्रो॑ अ॒र्वागि॒दं वचः॑। स॒त्राच्या॑ म॒घवा॒ सोम॑पीतये धि॒या शवि॑ष्ठ॒ आ ग॑मत्॥

वह परमदेव परम धनाढ्य परम बलिष्ठ और परमोदार है, उसी को अपनी वाणी, प्रार्थना और स्तुति सुनाकर प्रसन्न करें॥१॥

तं हि स्व॒राजं॑ वृष॒भं तमोज॑से धि॒षणे॑ निष्टत॒क्षतुः॑। उ॒तोप॒मानां॑ प्रथ॒मो नि षी॑दसि॒ सोम॑कामं॒ हि ते॒ मनः॑॥

जिसकी स्तुति प्रार्थना जगत् कर रहा है, जिसका महत्त्व यह सम्पूर्ण भुवन दिखला रहा है, वही पूज्य है॥२॥

आ वृ॑षस्व पुरूवसो सु॒तस्ये॒न्द्रान्ध॑सः। वि॒द्मा हि त्वा॑ हरिवः पृ॒त्सु सा॑स॒हिमधृ॑ष्टं चिद्दधृ॒ष्वणि॑म्॥

ईश्वर ही सब धन का अधिपति है, वही जगत् में सबको सुख पहुँचाता है, वही उपास्यदेव है॥३॥

अप्रा॑मिसत्य मघव॒न्तथेद॑स॒दिन्द्र॒ क्रत्वा॒ यथा॒ वशः॑। स॒नेम॒ वाजं॒ तव॑ शिप्रि॒न्नव॑सा म॒क्षू चि॒द्यन्तो॑ अद्रिवः॥

इसके द्वारा ईश्वर को धन्यवाद और प्रार्थना की जाती है। जो जन ईश्वर की कृपा से सांसारिक सब पदार्थों से सम्पन्न हैं, वे ईश्वर की प्राप्ति के लिये यत्न किया करें॥४॥

श॒ग्ध्यू॒३॒॑ षु श॑चीपत॒ इन्द्र॒ विश्वा॑भिरू॒तिभिः॑। भगं॒ न हि त्वा॑ य॒शसं॑ वसु॒विद॒मनु॑ शूर॒ चरा॑मसि॥

ईश्वर ही जगत् का भाग्य है, यह यशोरूप है। हे मनुष्यों! वह सृष्टि का अधिदैवत है, अतः उसी की स्तुति प्रार्थना करो॥५॥

पौ॒रो अश्व॑स्य पुरु॒कृद्गवा॑म॒स्युत्सो॑ देव हिर॒ण्ययः॑। नकि॒र्हि दानं॑ परि॒मर्धि॑ष॒त्त्वे यद्य॒द्यामि॒ तदा भ॑र॥

वेद प्रेममय स्तोत्रपद्धति है। किस प्रेम से किस सम्बन्ध से यहाँ प्रार्थना की जाती है, उस पर पाठकों को विचारना चाहिये। इसका भावार्थ स्पष्ट है॥६॥

त्वं ह्येहि॒ चेर॑वे वि॒दा भगं॒ वसु॑त्तये। उद्वा॑वृषस्व मघव॒न्गवि॑ष्टय॒ उदि॒न्द्राश्व॑मिष्टये॥

ईश्वर की प्रार्थना, उस पर पूर्ण विश्वास और जगत् में पूर्ण उद्योग करके सब कोई सुखी होवें। दीन हीन रहना एक प्रकार का पाप ही है, अतः वेद में वारंवार धन के लिये प्रार्थना आती है। भिक्षावृत्ति की चर्चा वेद में नहीं है। यह भी पाप ही है॥७॥

त्वं पु॒रू स॒हस्रा॑णि श॒तानि॑ च यू॒था दा॒नाय॑ मंहसे। आ पु॑रंद॒रं च॑कृम॒ विप्र॑वचस॒ इन्द्रं॒ गाय॒न्तोऽव॑से॥

हे मनुष्यों! ईश्वर के निकट सहस्र-२ अनन्त-२ पदार्थ हैं। वह परम कृपालु है, अतः संसारिक द्रव्य के लिये भी उसी की सेवा करो। विद्वान् लोग उसी की पूजा करते हैं॥८॥

अ॒वि॒प्रो वा॒ यदवि॑ध॒द्विप्रो॑ वेन्द्र ते॒ वचः॑। स प्र म॑मन्दत्त्वा॒या श॑तक्रतो॒ प्राचा॑मन्यो॒ अहं॑सन॥

अहंसन−“अहम्” यह नाम परमात्मा का इसलिये है कि वही एक मुख्य है, दूसरा उसके सदृश नहीं। उसकी स्तुति प्रार्थना ब्राह्मण से लेकर महा मूर्ख तक अपनी-२ भाषा द्वारा करे। जो मन, प्रेम और श्रद्धा से स्तुति करेगा, वह अवश्य सुखी होगा॥९॥

उ॒ग्रबा॑हुर्म्रक्ष॒कृत्वा॑ पुरंद॒रो यदि॑ मे शृ॒णव॒द्धव॑म्। व॒सू॒यवो॒ वसु॑पतिं श॒तक्र॑तुं॒ स्तोमै॒रिन्द्रं॑ हवामहे॥

ईश्वर के विशेषण में उग्रबाहु और पुरन्दर आदि शब्द दिखलाते हैं कि वह परम न्यायी है। इसके निकट पापी, अपराधी और नास्तिक खड़े नहीं हो सकते, अतः यदि मनुष्य निज कल्याण चाहें, तो असत्यादि दोष प्रथम सर्वथा त्याग देवें॥१०॥

न पा॒पासो॑ मनामहे॒ नारा॑यासो॒ न जळ्ह॑वः। यदिन्न्विन्द्रं॒ वृष॑णं॒ सचा॑ सु॒ते सखा॑यं कृ॒णवा॑महै॥

पूर्व गत अनेक मन्त्रों में दर्शाया गया है कि वह इन्द्रवाच्य परमदेव परमन्यायी शुद्ध विशुद्ध पापरहित और सदा पापियों को दण्ड देनेवाला है, अतः इस मन्त्र द्वारा उपदेश दिया जाता है कि हे मनुष्यों! यदि तुम परमात्मा को निज मित्र और इष्टदेव बनाना चाहते हो, तो निखिल पापों कुटिलताओं और दुर्व्यसनों को छोड़ अग्निहोत्रादि शुभकर्मों को करते हुए और धन विद्यादि गुण पाकर उनको सत्पात्रों में वितीर्ण करते हुए एक ही ईश्वर में प्रेमभक्ति और श्रद्धा करो॥११॥

उ॒ग्रं यु॑युज्म॒ पृत॑नासु सास॒हिमृ॒णका॑ति॒मदा॑भ्यम्। वेदा॑ भृ॒मं चि॒त्सनि॑ता र॒थीत॑मो वा॒जिनं॒ यमिदू॒ नश॑त्॥

सुख या दुःख सब काल में उसी के आश्रय में रहना चाहिये॥१२॥

यत॑ इन्द्र॒ भया॑महे॒ ततो॑ नो॒ अभ॑यं कृधि। मघ॑वञ्छ॒ग्धि तव॒ तन्न॑ ऊ॒तिभि॒र्वि द्विषो॒ वि मृधो॑ जहि॥

जो हमारे शत्रु हों या अहितचिन्तक हों, उनको ईश्वरीय न्याय पर छोड़ो॥१३॥

त्वं हि रा॑धस्पते॒ राध॑सो म॒हः क्षय॒स्यासि॑ विध॒तः। तं त्वा॑ व॒यं म॑घवन्निन्द्र गिर्वणः सु॒ताव॑न्तो हवामहे॥

वह ईश्वर ही धनपति और गृहपति है। उसी की कृपा से मनुष्य का गृह सुखमय और वर्धिष्णु होता है। विद्वानो! अतः उसी की आराधना करो॥१४॥

इन्द्रः॒ स्पळु॒त वृ॑त्र॒हा प॑र॒स्पा नो॒ वरे॑ण्यः। स नो॑ रक्षिषच्चर॒मं स म॑ध्य॒मं स प॒श्चात्पा॑तु नः पु॒रः॥

हे ईश! तू हमारी सब ओर से रक्षा कर, क्योंकि तू सब पापी और धर्मात्मा को जानता है॥१५॥

त्वं नः॑ प॒श्चाद॑ध॒रादु॑त्त॒रात्पु॒र इन्द्र॒ नि पा॑हि वि॒श्वतः॑। आ॒रे अ॒स्मत्कृ॑णुहि॒ दैव्यं॑ भ॒यमा॒रे हे॒तीरदे॑वीः॥

मनुष्यसमाज को जितना भय है, उतना किसी प्राणी को नहीं। कारण इसमें यह है−देखा गया है कभी-२ उन्मत्त राजा सम्पूर्ण देश को विविध यातनाओं के साथ भस्म कर देता है। कभी किसी विशेष वंश को निर्मूल कर देता है। कभी इस भयङ्करता से अपने शत्रु को मारता है कि सुनने मात्र से रोमाञ्च हो जाता है। इसके अतिरिक्त खेती करने में भी स्वतन्त्र नहीं है, राजा और जमींदार उससे कर लेते हैं। चोर डाकू आदि का भी भय सदा बना रहता है। इसी प्रकार विद्युत्पात, दुर्भिक्ष, अतिवृष्टि, महामारी आदि अनेक उपद्रवों के कारण मनुष्य भयभीत रहता है, अतः इस प्रकार की प्रार्थना आती है॥१६॥

अ॒द्याद्या॒ श्वःश्व॒ इन्द्र॒ त्रास्व॑ प॒रे च॑ नः। विश्वा॑ च नो जरि॒तॄन्त्स॑त्पते॒ अहा॒ दिवा॒ नक्तं॑ च रक्षिषः॥

वही रक्षक, पालक और आश्रय है, अतः सब प्रकार के विघ्नों से बचने के लिये उसी से प्रार्थना करनी चाहिये॥१७॥

प्र॒भ॒ङ्गी शूरो॑ म॒घवा॑ तु॒वीम॑घः॒ सम्मि॑श्लो वि॒र्या॑य॒ कम्। उ॒भा ते॑ बा॒हू वृष॑णा शतक्रतो॒ नि या वज्रं॑ मिमि॒क्षतुः॑॥

ईश्वर के बाहू आदि का वर्णन आरोप से होता है। वह परम न्यायी और सर्वद्रष्टा है, अतः हे मनुष्यों! पापों से डरो, नहीं तो उसका न्याय तुमको दण्ड देगा॥१८॥

प्रो अ॑स्मा॒ उप॑स्तुतिं॒ भर॑ता॒ यज्जुजो॑षति। उ॒क्थैरिन्द्र॑स्य॒ माहि॑नं॒ वयो॑ वर्धन्ति सो॒मिनो॑ भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑॥

ईश्वर मङ्गलमय है, उसके सब कार्य ही मङ्गलविधायक हैं। विद्वद्वर्ग भी उसकी परम महिमा को दिखला रहे हैं। अतः हे मनुष्यों! उसकी आज्ञा में सदा निवास करो॥१॥

अ॒यु॒जो अस॑मो॒ नृभि॒रेकः॑ कृ॒ष्टीर॒यास्यः॑। पू॒र्वीरति॒ प्र वा॑वृधे॒ विश्वा॑ जा॒तान्योज॑सा भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑॥

अहि॑तेन चि॒दर्व॑ता जी॒रदा॑नुः सिषासति। प्र॒वाच्य॑मिन्द्र॒ तत्तव॑ वी॒र्या॑णि करिष्य॒तो भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑॥

ईश्वर की कीर्ति और उसकी दया सदा गेय है, क्योंकि इससे प्रथम मन की प्रसन्नता रहती और कृतज्ञता का प्रकाश होता है और उसके उपकार अनन्त हैं, इसको सब जानें, जिससे आत्मा शुद्ध होकर उसकी ओर लगे॥३॥

आ या॑हि कृ॒णवा॑म त॒ इन्द्र॒ ब्रह्मा॑णि॒ वर्ध॑ना। येभिः॑ शविष्ठ चा॒कनो॑ भ॒द्रमि॒ह श्र॑वस्य॒ते भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑॥

उस महान् देव की आज्ञा पर चलते हुए उसी की कीर्ति का गान सब कोई करें, क्योंकि सबको कल्याण वही दे रहा है॥४॥

धृ॒ष॒तश्चि॑द्धृ॒षन्मनः॑ कृ॒णोषी॑न्द्र॒ यत्त्वम्। ती॒व्रैः सोमैः॑ सपर्य॒तो नमो॑भिः प्रति॒भूष॑तो भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑॥

वह महेश्वर अतिशय महाबलिष्ठ है और जो कोई उसके निर्धारित पथ पर चलते हैं, उनको और भी अध्यात्मरूप से बलिष्ठ बनाता जाता है॥५॥

अव॑ चष्ट॒ ऋची॑षमोऽव॒ताँ इ॑व॒ मानु॑षः। जु॒ष्ट्वी दक्ष॑स्य सो॒मिनः॒ सखा॑यं कृणुते॒ युजं॑ भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑॥

ईश्वर उसी का साहाय्य करता है, जो स्वयं उद्योगी है और उसके पथ पर चलता है॥६॥

विश्वे॑ त इन्द्र वी॒र्यं॑ दे॒वा अनु॒ क्रतुं॑ ददुः। भुवो॒ विश्व॑स्य॒ गोप॑तिः पुरुष्टुत भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑॥

गृ॒णे तदि॑न्द्र ते॒ शव॑ उप॒मं दे॒वता॑तये। यद्धंसि॑ वृ॒त्रमोज॑सा शचीपते भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑॥

हम सब मिल कर प्रतिदिन धन्यवाद देवें, क्योंकि वह हमको प्रतिक्षण सुख दे रहा है॥८॥

सम॑नेव वपुष्य॒तः कृ॒णव॒न्मानु॑षा यु॒गा। वि॒दे तदिन्द्र॒श्चेत॑न॒मध॑ श्रु॒तो भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑॥

हे मनुष्यों! जैसे ईश्वर अपनी अधीनता में सबको रखता है, तद्वत् अपने आचरणों से सत्पुरुषों को विवश करो॥९॥

उज्जा॒तमि॑न्द्र ते॒ शव॒ उत्त्वामुत्तव॒ क्रतु॑म्। भूरि॑गो॒ भूरि॑ वावृधु॒र्मघ॑व॒न्तव॒ शर्म॑णि भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑॥

भूरिगो। गौ यह नाम पृथिवी का है, यह प्रसिद्ध है। यहाँ उपलक्षण है अर्थात् सम्पूर्ण संसार से अभिप्राय है। यद्वा संसार और गो शब्द का धात्वर्थ एक ही प्रतीत होता है “संसरतीति संसारः गच्छतीति गौः”। इस कारण ये दोनों शब्द ऐसे स्थलों में पर्य्यायवाची हैं॥१०॥

अ॒हं च॒ त्वं च॑ वृत्रह॒न्त्सं यु॑ज्याव स॒निभ्य॒ आ। अ॒रा॒ती॒वा चि॑दद्रि॒वोऽनु॑ नौ शूर मंसते भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑॥

इसका अभिप्राय यह है कि हमको तब ही सुख प्राप्त हो सकता है, जब हम ईश्वर से मिलें। मिलने का आशय यह है कि जिस स्वभाव का वह है, उसी स्वभाव के हम भी होवें। वह सत्य है, हम सत्य होवें। वह उपकारी है, हम उपकारी होवें। वह परम उदार है, हम परमोदार होवें इत्यादि। ऐसे-२ विषय में सबकी एक ही सम्मति भी होती है॥११॥

स॒त्यमिद्वा उ॒ तं व॒यमिन्द्रं॑ स्तवाम॒ नानृ॑तम्। म॒हाँ असु॑न्वतो व॒धो भूरि॒ ज्योतीं॑षि सुन्व॒तो भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑॥

आशय इसका यह है कि बहुत से मनुष्य असत्यव्यवहार के लिये भी ईश्वर को प्रसन्न करना चाहते हैं, किन्तु वह उनकी बड़ी भारी गलती है। भगवान् सत्यस्वरूप है, वह किसी के लिये भी असत्य व्यवहार नहीं करता। वह किसी का पक्षपाती नहीं। जो कोई भूल में पड़कर ईश्वर को अपने पक्ष में समझ असत्य काम करते हैं, वे अवश्य दण्ड पावेंगे॥१२॥

स पू॒र्व्यो म॒हानां॑ वे॒नः क्रतु॑भिरानजे। यस्य॒ द्वारा॒ मनु॑ष्पि॒ता दे॒वेषु॒ धिय॑ आन॒जे॥

देव शब्द सर्वपदार्थवाची है। यह वेद में प्रसिद्ध है। धी इस शब्द के अनेक प्रयोग हैं। विज्ञान, कर्म, ज्ञान, चैतन्य आदि इसके अर्थ होते हैं। अर्धर्च का आशय यह है कि उस ईश्वर की कृपा से ही मननशील पुरुष प्रत्येक पदार्थ में ज्ञान और कर्म देखते हैं। प्रत्येक पदार्थ को ज्ञानमय और कर्ममय समझते हैं। यद्वा प्रत्येक पदार्थ में ईश्वरीय कौशल और क्रिया देखते हैं॥१॥

दि॒वो मानं॒ नोत्स॑द॒न्त्सोम॑पृष्ठासो॒ अद्र॑यः। उ॒क्था ब्रह्म॑ च॒ शंस्या॑॥

हे मनुष्यों! जब स्थावर भी उसका महत्त्व दिखला रहे हैं, तब तुम वाणी और ज्ञान प्राप्त करके भी यदि उसकी महती कीर्ति को न दिखलाते, गाते, तो तुम महा कृतघ्न हो॥२॥

स वि॒द्वाँ अङ्गि॑रोभ्य॒ इन्द्रो॒ गा अ॑वृणो॒दप॑। स्तु॒षे तद॑स्य॒ पौंस्य॑म्॥

अङ्गिरस्−यह नाम प्राणसहित जीव का है। यदि यह सृष्टि न होती, तो सदा ही ये नित्य जीव कहीं निष्क्रिय पड़े रहते। इनका विकास न होता। अतः इन्द्र ने इनके कल्याण के लिये यह सृष्टि रची है। इस कारण भी जीवों द्वारा वह स्तवनीय और पूजनीय है॥३॥

स प्र॒त्नथा॑ कविवृ॒ध इन्द्रो॑ वा॒कस्य॑ व॒क्षणिः॑। शि॒वो अ॒र्कस्य॒ होम॑न्यस्म॒त्रा ग॒न्त्वव॑से॥

जिस कारण सत्पुरुषों को वह सदा कल्याण पहुँचाता है, अतः यदि हम भी सन्मार्ग पर चलेंगे, तो वह हमारे लिये भी सुखकारी होगा, इसमें सन्देह नहीं॥४॥

आदू॒ नु ते॒ अनु॒ क्रतुं॒ स्वाहा॒ वर॑स्य॒ यज्य॑वः। श्वा॒त्रम॒र्का अ॑नूष॒तेन्द्र॑ गो॒त्रस्य॑ दा॒वने॑॥

हम जीव भी वैसे ही सत्यमार्गावलम्बी हों, उसकी कीर्ति का गान करें॥५॥

इन्द्रे॒ विश्वा॑नि वी॒र्या॑ कृ॒तानि॒ कर्त्वा॑नि च। यम॒र्का अ॑ध्व॒रं वि॒दुः॥

सृष्टि आदि की रचना पूर्वकाल में हो चुकी है और कितने लोक-लोकान्तर अब भी बन रहे हैं और कितने अभी होनेवाले हैं, ये सब ही उसी का महत्त्व है, अतः उसी को गाओ॥६॥

यत्पाञ्च॑जन्यया वि॒शेन्द्रे॒ घोषा॒ असृ॑क्षत। अस्तृ॑णाद्ब॒र्हणा॑ वि॒पो॒३॒॑ऽर्यो मान॑स्य॒ स क्षयः॑॥

इ॒यमु॑ ते॒ अनु॑ष्टुतिश्चकृ॒षे तानि॒ पौंस्या॑। प्राव॑श्च॒क्रस्य॑ वर्त॒निम्॥

इससे भगवान् शिक्षा देते हैं कि अन्यान्य देवों को छोड़ कर केवल ईश्वर को ही स्रष्टा, पाता, संहर्त्ता समझो और उसी की महती शक्ति को देख इसके निकट शिर झुकाओ॥८॥

अ॒स्य वृष्णो॒ व्योद॑न उ॒रु क्र॑मिष्ट जी॒वसे॑। यवं॒ न प॒श्व आ द॑दे॥

इसका अभिप्राय यह है कि ईश्वर जीवलोक को बहुत अन्न देवें, जिससे इसमें उत्सव हो और ये प्राणी प्रसन्न हो उसकी कीर्ति गावें॥९॥

तद्दधा॑ना अव॒स्यवो॑ यु॒ष्माभि॒र्दक्ष॑पितरः। स्याम॑ म॒रुत्व॑तो वृ॒धे॥

हे मनुष्यों! ईश्वर हमारा पिता है, हम उसके पुत्र हैं, अतः हमारा जीवन उसके गुणों और यशों को सदा बढ़ावे अर्थात् हम उसके समान पवित्र सत्य आदि होवें। हम उसको कदापि न त्यागें॥१०॥

बळृ॒त्विया॑य॒ धाम्न॒ ऋक्व॑भिः शूर नोनुमः। जेषा॑मेन्द्र॒ त्वया॑ यु॒जा॥

हम अपने अन्तःकरण से उसकी उपासना करें, जिससे वह सत्य अर्थात् फलप्रद हो और उसी की सहायता से अपने-अपने निखिल विघ्नों को दूर किया करें॥११॥

अ॒स्मे रु॒द्रा मे॒हना॒ पर्व॑तासो वृत्र॒हत्ये॒ भर॑हूतौ स॒जोषाः॑। यः शंस॑ते स्तुव॒ते धायि॑ प॒ज्र इन्द्र॑ज्येष्ठा अ॒स्माँ अ॑वन्तु दे॒वाः॥

उत्त्वा॑ मन्दन्तु॒ स्तोमाः॑ कृणु॒ष्व राधो॑ अद्रिवः। अव॑ ब्रह्म॒द्विषो॑ जहि॥

इस सूक्त में बहुत सरल प्रार्थना की गई है, भाव भी स्पष्ट ही है। हम लोग अपने आचरण शुद्ध करें और हृदय से ईश्वर की प्रार्थना करें, जिससे हमारे कोई शत्रु न रहने पावें॥१॥

प॒दा प॒णीँर॑रा॒धसो॒ नि बा॑धस्व म॒हाँ अ॑सि। न॒हि त्वा॒ कश्च॒न प्रति॑॥

पणि=प्रायः वाणिज्य करनेवाले के लिये आता है। यह भी देखा गया है कि प्रायः वाणिज्यकर्त्ता धनिक होते हैं। किन्तु जो धन पाकर व्यय नहीं करते, ऐसे लोभी पुरुष को वेदों में पणि कहते हैं। धनसंचय करके क्या करना चाहिये, यह विषय यद्यपि सुबोध है, तथापि सम्प्रति यह जटिल सा हो गया है। देशहित कार्य्य में धनव्यय करना, यह निर्वाद है, किन्तु देशहित भी क्या है, इसका जानना कठिन है॥२॥

त्वमी॑शिषे सु॒ताना॒मिन्द्र॒ त्वमसु॑तानाम्। त्वं राजा॒ जना॑नाम्॥

ईश्वर को कोई माने या न माने, उसकी प्रार्थना कोई करे या न करे, किन्तु वह सबका शासन राजवत् करता है। कर्मानुसार अनुग्रह और निग्रह करता है, अतः वही सर्वथा पूज्यतम है॥३॥

एहि॒ प्रेहि॒ क्षयो॑ दि॒व्या॒३॒॑घोष॑ञ्चर्षणी॒नाम्। ओभे पृ॑णासि॒ रोद॑सी॥

ईश्वर परमपवित्र है, वह अशुद्धि को नहीं चाहता, अतः यदि उसकी सेवा में रहना चाहते हो, तो वैसे ही बनो॥४॥

त्यं चि॒त्पर्व॑तं गि॒रिं श॒तव॑न्तं सह॒स्रिण॑म्। वि स्तो॒तृभ्यो॑ रुरोजिथ॥

जलवर्षणकर्ता भी वही देव है। सृष्टि की आदि में कहाँ से ये मेघ आए, इनकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई, यदि मेघ न हो, तो जीव भी यहाँ न होते इत्यादि भावना सदा करनी चाहिये॥५॥

व॒यमु॑ त्वा॒ दिवा॑ सु॒ते व॒यं नक्तं॑ हवामहे। अ॒स्माकं॒ काम॒मा पृ॑ण॥

जब समय हो, तब ही ईश्वर की प्रार्थना करे और उससे अपना अभीष्ट निवेदन करे॥६॥

क्व१॒॑ स्य वृ॑ष॒भो युवा॑ तुवि॒ग्रीवो॒ अना॑नतः। ब्र॒ह्मा कस्तं स॑पर्यति॥

जब उसके रहने का कोई पता नहीं है, तब कौन उसकी पूजाविधान कर सकता है अर्थात् वह अगम्य अगोचर है॥७॥

कस्य॑ स्वि॒त्सव॑नं॒ वृषा॑ जुजु॒ष्वाँ अव॑ गच्छति। इन्द्रं॒ क उ॑ स्वि॒दा च॑के॥

ईदृग् ऋचाओं से उस परमदेव की अवगम्यता और दुर्बोधता दिखलाई जाती है। उस महती शक्ति को विरले ही विद्वान् जानते हैं॥८॥

कं ते॑ दा॒ना अ॑सक्षत॒ वृत्र॑ह॒न्कं सु॒वीर्या॑। उ॒क्थे क उ॑ स्वि॒दन्त॑मः॥

उसके अनुग्रहपात्र कौन हैं, इस पर सब कोई विचार करें॥९॥

अ॒यं ते॒ मानु॑षे॒ जने॒ सोमः॑ पू॒रुषु॑ सूयते। तस्येहि॒ प्र द्र॑वा॒ पिब॑॥

पूर्व ऋचाओं में दिखलाया गया है कि वह किसके याग में जाता है, वह किसके गृह पर जाता है या नहीं। इसमें प्रार्थना है कि हे भगवन्! समस्त मनुष्यजातियों में तेरी पूजा होती है। तू उस पर कृपा कर। इत्यादि॥१०॥

अ॒यं ते॑ शर्य॒णाव॑ति सु॒षोमा॑या॒मधि॑ प्रि॒यः। आ॒र्जी॒कीये॑ म॒दिन्त॑मः॥

याग दो प्रकार के हैं। जो विविध द्रव्यों से किया जाता है, वह बाह्य और जो इस शरीर में बुद्धि द्वारा अनुष्ठित होता है, वह आभ्यन्तर याग है। इसी को मानसिक, आध्यात्मिक आदि भी कहते हैं और यही यज्ञ श्रेष्ठ भी है॥११॥

तम॒द्य राध॑से म॒हे चारुं॒ मदा॑य॒ घृष्व॑ये। एही॑मिन्द्र॒ द्रवा॒ पिब॑॥

यदि॑न्द्र॒ प्रागपा॒गुद॒ङ्न्य॑ग्वा हू॒यसे॒ नृभिः॑। आ या॑हि॒ तूय॑मा॒शुभिः॑॥

यद्वा॑ प्र॒स्रव॑णे दि॒वो मा॒दया॑से॒ स्व॑र्णरे। यद्वा॑ समु॒द्रे अन्ध॑सः॥

आ त्वा॑ गी॒र्भिर्म॒हामु॒रुं हु॒वे गामि॑व॒ भोज॑से। इन्द्र॒ सोम॑स्य पी॒तये॑॥

जो महान् और उरु अर्थात् सर्वत्र विस्तीर्ण है, वह स्वयं संसार की रक्षा में प्रवृत्त है, तथापि प्रेमवश भक्तजन उसका आह्वान और प्रार्थना करते हैं॥३॥

आ त॑ इन्द्र महि॒मानं॒ हर॑यो देव ते॒ महः॑। रथे॑ वहन्तु॒ बिभ्र॑तः॥

हे मनुष्यों! ईश्वर की महिमा इस संसार में देखो। इसी में यह विराजमान है। यह इससे उपदेश देते हैं॥४॥

इन्द्र॑ गृणी॒ष उ॑ स्तु॒षे म॒हाँ उ॒ग्र ई॑शान॒कृत्। एहि॑ नः सु॒तं पिब॑॥

ईश्वर सबसे महान् है और वही धन का भी स्वामी है और उग्र भी है, क्योंकि उसके निकट पापी नहीं ठहर सकते, अतः उसकी स्तुति प्रार्थना अवश्य करनी चाहिये॥५॥

सु॒ताव॑न्तस्त्वा व॒यं प्रय॑स्वन्तो हवामहे। इ॒दं नो॑ ब॒र्हिरा॒सदे॑॥

सुतावन्तः=इससे यह दिखलाते हैं कि प्रथम शुभकर्मी बनो, प्रयस्वन्तः=तब सकल सामग्रीसम्पन्न होओ, तब तुम ईश्वर को बुलाने के अधिकारी होवोगे॥६॥

यच्चि॒द्धि शश्व॑ता॒मसीन्द्र॒ साधा॑रण॒स्त्वम्। तं त्वा॑ व॒यं ह॑वामहे॥

शश्वताम्=इसका अर्थ चिरन्तन और सदा स्थायी है। मनुष्यसमाज प्रवाहरूप से अविनश्वर है, अतः यह शाश्वत है। परमात्मा सबका साधारण पोषक है, इसमें सन्देह स्थल ही नहीं, अतः प्रत्येक शुभकर्म में प्रथम उसी का स्मरण, कीर्त्तन, पूजन व प्रार्थना करना उचित है॥७॥

इ॒दं ते॑ सो॒म्यं मध्वधु॑क्ष॒न्नद्रि॑भि॒र्नरः॑। जु॒षा॒ण इ॑न्द्र॒ तत्पि॑ब॥

इससे यह शिक्षा दी जाती है कि पर्वत के टुकड़ों से अन्न प्रस्तुत करने के लिये अनेक साधन बनाने चाहियें, जैसे चक्री और मसाला आदि पीसने के लिये शिला और खल बनाए जाते हैं। जब-२ कोई नूतन वस्तु प्रस्तुत हो, तब-२ ईश्वर के नाम पर प्रथम उस वस्तु को रक्खे, तब सब मिल कर ग्रहण करें। अग्नि में होमना यह सहजोपाय है॥८॥

विश्वाँ॑ अ॒र्यो वि॑प॒श्चितोऽति॑ ख्य॒स्तूय॒मा ग॑हि। अ॒स्मे धे॑हि॒ श्रवो॑ बृ॒हत्॥

यह हम लोगों को अच्छे प्रकार मालूम है कि ईश्वर ज्ञानमय है, अतः ज्ञानी जन उसके प्रिय हैं। भक्तों से भी प्रिय ज्ञानी है। ज्ञान से बढ़कर कोई पवित्र वस्तु नहीं। परन्तु ईश्वर की प्रार्थना मूर्ख और पण्डित दोनों करते हैं। अतः यह स्वाभाविक प्रार्थना है। अपने स्वार्थ के लिये सब ही उसकी स्तुति प्रार्थना करते हैं॥९॥

दा॒ता मे॒ पृष॑तीनां॒ राजा॑ हिरण्य॒वीना॑म्। मा दे॑वा म॒घवा॑ रिषत्॥

मनुष्यों की प्रिय वस्तु गौ है, क्योंकि थोड़े ही परिश्रम से वह बहुत उपकार करती है। स्वच्छन्दतया वन में चरकर बहुत दूध देती है। अतः इस पशु की प्राप्ति के लिये अधिक प्रार्थना आती है और जो जन धन-जन-ज्ञानादिकों से हीन हैं, वे समझते ही हैं कि हमारे ऊपर उसकी उतनी कृपा नहीं है, अतः “मघवा रुष्ट न हो” यह प्रार्थना है॥१०॥

स॒हस्रे॒ पृष॑तीना॒मधि॑ श्च॒न्द्रं बृ॒हत्पृ॒थु। शु॒क्रं हिर॑ण्य॒मा द॑दे॥

यह ऋचा यह शिक्षा देती है कि उसकी कृपा से जिसको जैसा धन प्राप्त हो, वैसा ईश्वर से निवेदन करे और अपनी कृतज्ञता प्रकाश करे। वही धन ठीक है, जो शुक्र=शुद्ध हो अर्थात् पापों से उत्पन्न न हुआ हो और चन्द्र अर्थात् आनन्दजनक हो। शुभकर्म और सुदान में लगाने से धन सुखप्रद होता है। इत्यादि॥११॥

नपा॑तो दु॒र्गह॑स्य मे स॒हस्रे॑ण सु॒राध॑सः। श्रवो॑ दे॒वेष्व॑क्रत॥

इस मन्त्र से अपने पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र और दौहित्रादिकों को सुखी होने के लिये ईश्वर से प्रार्थना करें॥१२॥

तरो॑भिर्वो वि॒दद्व॑सु॒मिन्द्रं॑ स॒बाध॑ ऊ॒तये॑। बृ॒हद्गाय॑न्तः सु॒तसो॑मे अध्व॒रे हु॒वे भरं॒ न का॒रिण॑म्॥

अध्वर=संसार। अध्व+र। जिसमें अनेक मार्ग हों। जीवन के धर्मों के ज्ञानों के और रचना आदिकों के जहाँ शतशः मार्ग देख पड़ते हैं। इस शब्द का अर्थ आजकल याग किया जाता है। इसका बृहत् अर्थ लेना चाहिये। याग करने का भी बोध इस संसार के देखने से ही होता है। आम्र प्रतिवर्ष सहस्रशः फल देता है। एक कूष्माण्डबीज शतशः कूष्माण्ड पैदा करता है। इस सबका क्या उद्देश्य है, किस अभिप्राय से इतने फल एक वृक्ष में लगते हैं। विचार से परोपकार ही प्रतीत होता है। उस वृक्ष का उतने फलों से कुछ प्रयोजन नहीं दीखता। ये ही उदाहरण मनुष्यजीवन को भी परोपकार और परस्पर साहाय्य की ओर ले जाते हैं, इसी से अनेक यागादि विधान उत्पन्न हुए हैं॥

न यं दु॒ध्रा वर॑न्ते॒ न स्थि॒रा मुरो॒ मदे॑ सुशि॒प्रमन्ध॑सः। य आ॒दृत्या॑ शशमा॒नाय॑ सुन्व॒ते दाता॑ जरि॒त्र उ॒क्थ्य॑म्॥

आशय यह है कि जो शुभकर्म में निरत हैं, वे उसकी कृपा से सुखी रहते हैं॥२॥

यः श॒क्रो मृ॒क्षो अश्व्यो॒ यो वा॒ कीजो॑ हिर॒ण्ययः॑। स ऊ॒र्वस्य॑ रेजय॒त्यपा॑वृति॒मिन्द्रो॒ गव्य॑स्य वृत्र॒हा॥

परमेश्वर सर्वशक्तिमान् व शुद्धादि गुण भूषित है, अतः वही मनुष्यों का कीर्तनीय, स्मरणीय और पूजनीय है॥३॥

निखा॑तं चि॒द्यः पु॑रुसम्भृ॒तं वसूदिद्वप॑ति दा॒शुषे॑। व॒ज्री सु॑शि॒प्रो हर्य॑श्व॒ इत्क॑र॒दिन्द्रः॒ क्रत्वा॒ यथा॒ वश॑त्॥

वह सब प्रकार हितकारी स्वतन्त्रकर्ता है, अतः वही एक उपास्यदेव है॥४॥

यद्वा॒वन्थ॑ पुरुष्टुत पु॒रा चि॑च्छूर नृ॒णाम्। व॒यं तत्त॑ इन्द्र॒ सं भ॑रामसि य॒ज्ञमु॒क्थं तु॒रं वचः॑॥

जो कोई ईश्वरीय नियम पर चलते हैं, वे इस ऋचा द्वारा प्रार्थना करें। उसने जो-जो कर्तव्य चलाए हैं, उनको विद्वान् जैसे निवाहते हैं, हम भी उनका निर्वाह करें॥५॥

सचा॒ सोमे॑षु पुरुहूत वज्रिवो॒ मदा॑य द्युक्ष सोमपाः। त्वमिद्धि ब्र॑ह्म॒कृते॒ काम्यं॒ वसु॒ देष्ठः॑ सुन्व॒ते भुवः॑॥

सोम=संसार। पुरु=बहुत। देष्ठ+दातृतमम्। ब्रह्मकृत्। ब्रह्म=स्तोत्र॥६॥

व॒यमे॑नमि॒दा ह्योऽपी॑पेमे॒ह व॒ज्रिण॑म्। तस्मा॑ उ अ॒द्य स॑म॒ना सु॒तं भ॒रा नू॒नं भू॑षत श्रु॒ते॥

ऐसे-ऐसे मन्त्र उपदेश-परंपरा की सिद्धि के लिये हैं। जो उपदेशक प्रतिदिन नियम पालते आए हैं, वे इसके अधिकारी हैं। वे शिक्षा देवें कि हे मनुष्यों! हम आजकल, परसों, गतदिन और आगामी दिन अपने आचरणों से उसको प्रसन्न रखते हैं और रक्खेंगे। तुम लोग भी वैसा करो॥७॥

वृक॑श्चिदस्य वार॒ण उ॑रा॒मथि॒रा व॒युने॑षु भूषति। सेमं नः॒ स्तोमं॑ जुजुषा॒ण आ ग॒हीन्द्र॒ प्र चि॒त्रया॑ धि॒या॥

उस परमदेव को सन्त, असन्त, चोर, डाकू, मूर्ख, विद्वान् सब ही भजते हैं, परन्तु वे अपने-अपने कर्म के अनुसार फल पाते हैं॥८॥

कदू॒ न्व१॒॑स्याकृ॑त॒मिन्द्र॑स्यास्ति॒ पौंस्य॑म्। केनो॒ नु कं॒ श्रोम॑तेन॒ न शु॑श्रुवे ज॒नुषः॒ परि॑ वृत्र॒हा॥

वह ईश्वर सब प्रकार से पूर्ण धाम है। उसे अब कुछ कर्त्तव्य नहीं। वह सृष्टि के आरम्भ से प्रसिद्ध है, उसी की उपासना करो॥९॥

कदू॑ म॒हीरधृ॑ष्टा अस्य॒ तवि॑षीः॒ कदु॑ वृत्र॒घ्नो अस्तृ॑तम्। इन्द्रो॒ विश्वा॑न्बेक॒नाटाँ॑ अह॒र्दृश॑ उ॒त क्रत्वा॑ प॒णीँर॒भि॥

बेकनाट−संस्कृत में इसके कुसीदी, वृद्धिजीवी आदि नामों से पुकारते हैं। जो द्विगुण त्रिगुण सूद खाता है। शास्त्र, राजा और समाज के नियम से जितना सूद बंधा हुआ है, उससे द्विगुण त्रिगुण जो सूद लेता है, वह बेकनाट है। इस शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार लोग करते हैं। बे+क+नाट=द्विशब्द के अर्थ में बे शब्द है। मैं एक रुपया आज देता हूँ, ठीक एक वर्ष में दो रुपये मुझे दोगे, इस प्रकार गुण प्राप्त होने पर जो नाट=नाचता है, उसे बेकनाट कहते हैं। उसकी शक्ति अनन्त है। वह जगत् के शासन के लिये दुष्टों पर सदा शासन करता है, यह इसका आशय है॥१०॥

व॒यं घा॑ ते॒ अपू॒र्व्येन्द्र॒ ब्रह्मा॑णि वृत्रहन्। पु॒रू॒तमा॑सः पुरुहूत वज्रिवो भृ॒तिं न प्र भ॑रामसि॥

वृत्रहन्−वृत्रान् विघ्नान् हन्तीति वृत्रहा। वृत्र=विघ्न, दुःख, क्लेश, मेघ, अन्धकार, अज्ञान आदि। पुरुहूत=पुरु=बहुत। हूत=आहूत, पूजित। हम लोगों को उचित है कि उस परमदेव को नवीन-नवीन स्तोत्र बनाकर सुनावें॥११॥

पू॒र्वीश्चि॒द्धि त्वे तु॑विकूर्मिन्ना॒शसो॒ हव॑न्त इन्द्रो॒तयः॑। ति॒रश्चि॑द॒र्यः सव॒ना व॑सो गहि॒ शवि॑ष्ठ श्रु॒धि मे॒ हव॑म्॥

व॒यं घा॑ ते॒ त्वे इद्विन्द्र॒ विप्रा॒ अपि॑ ष्मसि। न॒हि त्वद॒न्यः पु॑रुहूत॒ कश्च॒न मघ॑व॒न्नस्ति॑ मर्डि॒ता॥

ईश्वर से बढ़कर पालक पोषक व कृपालु कोई नहीं, अतः उसी की उपासना प्रेमभक्ति और श्रद्धा से करनी चाहिये॥१३॥

त्वं नो॑ अ॒स्या अम॑तेरु॒त क्षु॒धो॒३॒॑ऽभिश॑स्ते॒रव॑ स्पृधि। त्वं न॑ ऊ॒ती तव॑ चि॒त्रया॑ धि॒या शिक्षा॑ शचिष्ठ गातु॒वित्॥

इस ऋचा में अज्ञान, दरिद्रता और निन्दा से बचने के लिये और रक्षा सहायता और श्रेष्ठ बुद्धि प्राप्त करने के लिये शिक्षा देते हैं॥१४॥

सोम॒ इद्वः॑ सु॒तो अ॑स्तु॒ कल॑यो॒ मा बि॑भीतन। अपेदे॒ष ध्व॒स्माय॑ति स्व॒यं घै॒षो अपा॑यति॥

हे मनुष्यों! तुम सदा शुभकर्म करो, जिनसे तुम्हारे सर्व भय दूर हो जाएँगे और शोक मोह आदि क्लेश भी प्राप्त न होंगे॥१५॥

त्यान्नु क्ष॒त्रियाँ॒ अव॑ आदि॒त्यान्या॑चिषामहे। सु॒मृ॒ळी॒काँ अ॒भिष्ट॑ये॥

इस मन्त्र में रक्षकों और रक्ष्यों के कर्त्तव्य का वर्णन करते हैं। सर्व प्रकार से रक्षक सुखप्रद हों और रक्ष्य उनसे सदा अपनी रक्षा करावें, इसके लिये परस्पर प्रेम और कर वेतन आदि की सुव्यवस्था होनी चाहिये॥१॥

मि॒त्रो नो॒ अत्यं॑ह॒तिं वरु॑णः पर्षदर्य॒मा। आ॒दि॒त्यासो॒ यथा॑ वि॒दुः॥

मित्र=जो स्नेहमय और प्रेमागार हो। वरुण=जो न्यायदृष्टि से दण्ड दे और सत्यता का स्तम्भ हो। अर्य्यमा=अर्य्य=वैश्य, मा=माननीय=वैश्यों का माननीय। यद्वा न्याय के लिये जिसके निकट लोग पहुँचें, वह अर्य्यमा=अभिगमनीय। अंहति=जो प्राप्त होकर प्रजाओं का हनन करे, जिसका आगमन असह्य हो। सभासद् वे हों, जो बड़े बुद्धिमान्, बड़े परिश्रमी, बड़े उद्योगी, सत्यवादी, निर्लोभ और परहितशक्त हों॥२॥

तेषां॒ हि चि॒त्रमु॒क्थ्यं१॒॑ वरू॑थ॒मस्ति॑ दा॒शुषे॑। आ॒दि॒त्याना॑मरं॒कृते॑॥

जो राष्ट्र के उच्चाधिकारी हों, वे सदा उपकारी जनों में इनाम बाँटा करें। इससे देश की वृद्धि होती जाती है। केवल अपने स्वार्थ में कदापि भी मग्न नहीं होना चाहिये॥३॥

महि॑ वो मह॒तामवो॒ वरु॑ण॒ मित्रार्य॑मन्। अवां॒स्या वृ॑णीमहे॥

राष्ट्रीय सभासदों के निकट प्रजागण सदा अपनी-अपनी आवश्यकताएँ जनाया करें और उनसे कराया करें॥४॥

जी॒वान्नो॑ अ॒भि धे॑त॒नादि॑त्यासः पु॒रा हथा॑त्। कद्ध॑ स्थ हवनश्रुतः॥

यद्वः॑ श्रा॒न्ताय॑ सुन्व॒ते वरू॑थ॒मस्ति॒ यच्छ॒र्दिः। तेना॑ नो॒ अधि॑ वोचत॥

परिश्रमी और सुकर्मी जनों को राज्य की ओर से सब सुविधा मिलनी चाहिये, यह शिक्षा इससे देते हैं॥६॥

अस्ति॑ देवा अं॒होरु॒र्वस्ति॒ रत्न॒मना॑गसः। आदि॑त्या॒ अद्भु॑तैनसः॥

सभासद् अपने सदाचार को वैसा बनावें कि वे कभी पाप और अपराध करते हुए न पाए जाएँ, क्योंकि हिंसक पापी जनों को महादण्ड और निरपराधी को श्रेय मिलता है॥७॥

मा नः॒ सेतुः॑ सिषेद॒यं म॒हे वृ॑णक्तु न॒स्परि॑। इन्द्र॒ इद्धि श्रु॒तो व॒शी॥

हम लोगों को सदा शुभकर्म के सेवन में रहना चाहिये, जिससे ईश्वरीय दण्ड हम पर न गिरे। हमारा सम्पूर्ण जीवन प्राणिहित हो॥८॥

मा नो॑ मृ॒चा रि॑पू॒णां वृ॑जि॒नाना॑मविष्यवः। देवा॑ अ॒भि प्र मृ॑क्षत॥

सभाध्यक्षगण वैसा प्रबन्ध करें, जिससे प्रजाओं में कोई बाधा न आने पावे॥९॥

उ॒त त्वाम॑दिते मह्य॒हं दे॒व्युप॑ ब्रुवे। सु॒मृ॒ळी॒काम॒भिष्ट॑ये॥

अदिति=यह राज्यसम्बन्धी प्रकरण है और मित्र वरुण और अर्य्यमा आदि प्रतिनिधियों का वर्णन है, अतः यहाँ अदिति शब्द से सभा का ग्रहण है। यह भी एक वैदिक शैली है कि सभा को सम्बोधित करके प्रजागण अपनी प्रार्थना सुनावें॥१०॥

पर्षि॑ दी॒ने ग॑भी॒र आँ उग्र॑पुत्रे॒ जिघां॑सतः। माकि॑स्तो॒कस्य॑ नो रिषत्॥

दीन गभीर शब्द से अल्प और अधिक क्लेश द्योतित होता है। यहाँ गभीर शब्द का जल भी अर्थ सायण करते हैं। यद्यपि उदक नाम में इस शब्द का पाठ है, तथापि यहाँ स्वाभाविक अर्थ यह प्रतीत होता है कि छोटे बड़े सब संकट से आप हमारी रक्षा करती हैं, अतः आप धन्यवाद के पात्र हैं। आगे हमारा बीज नष्ट न हो, सो उपाय कीजिये॥११॥

अ॒ने॒हो न॑ उरुव्रज॒ उरू॑चि॒ वि प्रस॑र्तवे। कृ॒धि तो॒काय॑ जी॒वसे॑॥

अनेहाः=अहिंसित अपाप इत्यादि। उरुव्रजा=जिस कारण राष्ट्रिय सभा का प्रभाव सम्पूर्ण देश में पड़ता है, अतः वह उरुव्रजा और बहुतों का शासन करती है, अतः वह उरुचि कहाती है। उस सभा का सब ही आदर करते हैं, इस कारण भी वह उरुचि कहाती है॥१२॥

ये मू॒र्धानः॑ क्षिती॒नामद॑ब्धासः॒ स्वय॑शसः। व्र॒ता रक्ष॑न्ते अ॒द्रुहः॑॥

जो समय-समय पर समाजों में श्रेष्ठ गुणों से भूषित हों, वे सभासद् चुने जाएँ॥—१३॥

ते न॑ आ॒स्नो वृका॑णा॒मादि॑त्यासो मु॒मोच॑त। स्ते॒नं ब॒द्धमि॑वादिते॥

प्रजा कितने प्रकारों से लूटी जाती है, इसका दृश्य यदि देखना हो, तो आँख फैलाकर ग्राम-ग्राम में देखो। मनुष्य वृकों और व्याघ्रों से भी बढ़कर स्वजातियों के हिंसक बन रहे हैं। सभा को उचित है कि इन उपद्रवों से प्रजा की रक्षा करे॥१४॥

अपो॒ षु ण॑ इ॒यं शरु॒रादि॑त्या॒ अप॑ दुर्म॒तिः। अ॒स्मदे॒त्वज॑घ्नुषी॥

अज्ञानता और दरिद्रता ये दोनों महापाप हैं, इनको यथाशक्ति सदा क्षीण हीन बनाया करो॥१५॥

शश्व॒द्धि वः॑ सुदानव॒ आदि॑त्या ऊ॒तिभि॑र्व॒यम्। पु॒रा नू॒नं बु॑भु॒ज्महे॑॥

राज्य-कर्मचारियों का अच्छे काम होने पर अभिनन्दन करें॥१६॥

शश्व॑न्तं॒ हि प्र॑चेतसः प्रति॒यन्तं॑ चि॒देन॑सः। देवाः॑ कृणु॒थ जी॒वसे॑॥

पापियों, अपराधियों, चोरों, व्यसनियों इत्यादि प्रकार के मनुष्यों को अच्छा बनाना भी राष्ट्र का काम है॥१७॥

तत्सु नो॒ नव्यं॒ सन्य॑स॒ आदि॑त्या॒ यन्मुमो॑चति। ब॒न्धाद्ब॒द्धमि॑वादिते॥

हे सभ्यो! प्रजाओं में नूतन-नूतन उपाय और साहाय्य पहुँचाने का प्रबन्ध करो •॥१८॥

नास्माक॑मस्ति॒ तत्तर॒ आदि॑त्यासो अति॒ष्कदे॑। यू॒यम॒स्मभ्यं॑ मृळत॥

जिस कारण राष्ट्रिय सभा के अधीन शतशः सहस्रशः सेनाएँ कोष और प्रबन्ध रहते हैं और वे सब प्रजाओं की ओर से ही एकत्रित रहते हैं, अतः सभा का बल प्रजापेक्षया अधिक हो जाता है, अतः सभा को ही मुख्यतया प्रजाओं की रक्षा आदि का प्रबन्ध करना चाहिये॥१९॥

मा नो॑ हे॒तिर्वि॒वस्व॑त॒ आदि॑त्याः कृ॒त्रिमा॒ शरुः॑। पु॒रा नु ज॒रसो॑ वधीत्॥

मरना सबको अवश्य ही है, परन्तु जरावस्था के पूर्व मरना प्रबन्ध और अविवेक की न्यूनता से होता है, अतः राज्य की ओर से रोगादिनिवृत्ति का पूरा प्रबन्ध होना उचित है॥२०॥

वि षु द्वेषो॒ व्यं॑ह॒तिमादि॑त्यासो॒ वि संहि॑तम्। विष्व॒ग्वि वृ॑हता॒ रपः॑॥

राज्य की ओर से बड़े-बड़े विवेकी विद्वानों को देश की दशाओं के निरीक्षण के लिये नियुक्त करो और उनके कथनानुसार राज्यप्रबन्ध करो, तब निखिल उपद्रव शान्त रहेंगे॥२१॥

आ त्वा॒ रथं॒ यथो॒तये॑ सु॒म्नाय॑ वर्तयामसि। तु॒वि॒कू॒र्मिमृ॑ती॒षह॒मिन्द्र॒ शवि॑ष्ठ॒ सत्प॑ते॥

तुवि=बहुत। शविष्ठ=शव+इष्ठ। शव=बल। सब ही उसी की प्रार्थना करें॥१॥

तुवि॑शुष्म॒ तुवि॑क्रतो॒ शची॑वो॒ विश्व॑या मते। आ प॑प्राथ महित्व॒ना॥

तुवि=बहुत। १−उरु २−तुवि ३−पुरु ४−भूरि ५−शश्वत् ६−विश्व ७−परीणसा ८−व्यानशि ९−शत १०−सहस्र ११−सलिल और १२−कुवित् ये १२ (द्वादश) बहुनाम हैं। निघण्टु ३। १। शुष्म=बल। शची=कर्म। निघण्टु देखो। हे मनुष्यों! जिसके बल, प्रज्ञा और कर्म अनन्त-अनन्त हैं, जो स्वयं ज्ञानरूप से सर्वत्र व्याप्त है, वही सबका पूज्य है॥२॥

यस्य॑ ते महि॒ना म॒हः परि॑ ज्मा॒यन्त॑मी॒यतुः॑। हस्ता॒ वज्रं॑ हिर॒ण्यय॑म्॥

ज्मायन्तम्=ज्मा=पृथिवी। यहाँ यह शब्द उपलक्षक है अर्थात् केवल पृथिवी पर ही नहीं कि जो सर्वत्र व्यापक है। वज्र=संसार में जो ईश्वरीय नियम व्यापक है, उसी को वेद में वज्र और अद्रि आदि कहते हैं। उन ही नियमों से सब अनुग्रह और निग्रह पा रहे हैं। हस्त=उसके हाथ पैर, देह आदि नहीं है, तथापि मनुष्य के बोध के लिये इस प्रकार का वर्णन आता है। विश्वतश्चक्षुरुत॥३॥

वि॒श्वान॑रस्य व॒स्पति॒मना॑नतस्य॒ शव॑सः। एवै॑श्च चर्षणी॒नामू॒ती हु॑वे॒ रथा॑नाम्॥

जिस कारण वह सबका पालक, शासक और अनुग्राहक है और सर्वशक्तिमान् है, अतः जगत् के कल्याण के लिये उसी की मैं उपासना करता हूँ॥४॥

अ॒भिष्ट॑ये स॒दावृ॑धं॒ स्व॑र्मीळ्हेषु॒ यं नरः॑। नाना॒ हव॑न्त ऊ॒तये॑॥

उसका महान् यश है, जिसको सब ही गा रहे हैं। हम भी सदा उसी की उपासना करें॥५॥

प॒रोमा॑त्र॒मृची॑षम॒मिन्द्र॑मु॒ग्रं सु॒राध॑सम्। ईशा॑नं चि॒द्वसू॑नाम्॥

परमात्मा अनन्त-अनन्त है, तथापि जीवों पर दया करनेवाला भी है, अतः वह उपास्य है॥६॥

तंत॒मिद्राध॑से म॒ह इन्द्रं॑ चोदामि पी॒तये॑। यः पू॒र्व्यामनु॑ष्टुति॒मीशे॑ कृष्टी॒नां नृ॒तुः॥

हे मनुष्यों! उसी की कीर्ति गाओ, जो सबका स्वामी है। वह इन्द्र नामधारी जगदीश है॥७॥

न यस्य॑ ते शवसान स॒ख्यमा॒नंश॒ मर्त्यः॑। नकिः॒ शवां॑सि ते नशत्॥

वह जगदीश अनन्त शक्तिसम्पन्न है। उसी की शक्ति की मात्रा से यह समस्त जगत् शक्तिमान् हो रहा है, तब उसको कौन पा सकता है। उसकी मैत्री परम पवित्र शुद्ध सत्यवादी पा सकते हैं, किन्तु वैसे नर विरले हैं॥८॥

त्वोता॑स॒स्त्वा यु॒जाप्सु सूर्ये॑ म॒हद्धन॑म्। जये॑म पृ॒त्सु व॑ज्रिवः॥

अप्सु+सूर्य्ये=सूर्य्य को मैं बहुत दिन देखूँ, इस प्रकार की प्रार्थना बहुधा आती है, परन्तु जल में शतवर्ष स्नान करूँ, इस प्रकार की प्रार्थना बहुत स्वल्प है। परन्तु जलवर्षण की प्रार्थना अधिक है। अतः अप्सु=इसका अर्थ जलनिमित्त भी हो सकता है। भारतवासियों को ग्रीष्म ऋतु में जल-स्नान का सुख मालूम है और सृष्टि में जैसे सूर्य्य आदि अद्भुत पदार्थ हैं, तद्वत् जल भी है। अपने शुद्ध आचरण से आयु आदि धन बढ़ावें॥९॥

तं त्वा॑ य॒ज्ञेभि॑रीमहे॒ तं गी॒र्भिर्गि॑र्वणस्तम। इन्द्र॒ यथा॑ चि॒दावि॑थ॒ वाजे॑षु पुरु॒माय्य॑म्॥

सर्व अवस्था में ज्ञान ही जन को बचाता है, अतः ज्ञानग्रहण का अभ्यास करना चाहिये॥१०॥

यस्य॑ ते स्वा॒दु स॒ख्यं स्वा॒द्वी प्रणी॑तिरद्रिवः। य॒ज्ञो वि॑तन्त॒साय्यः॑॥

ईश्वर के साथ प्रेम या भक्ति से क्या आनन्द प्राप्त होता है, इसको कोई योगी ध्यानी और ज्ञानी ही अनुभव कर सकते हैं, उसका प्रेम मधुमय है। हे मनुष्यों! उसकी भक्ति करो॥११॥

उ॒रु ण॑स्त॒न्वे॒३॒॑ तन॑ उ॒रु क्षया॑य नस्कृधि। उ॒रु णो॑ यन्धि जी॒वसे॑॥

क्षय=वैदिक भाषा में क्षय शब्द निवासार्थक है। यन्धि=यम धातु दानार्थक है। आशय इसका यह है कि हम शुभ कर्म करें, अवश्य उसका फल सुख मिलेगा॥१२॥

उ॒रुं नृभ्य॑ उ॒रुं गव॑ उ॒रुं रथा॑य॒ पन्था॑म्। दे॒ववी॑तिं मनामहे॥

मनुष्यों का शुभ यज्ञादि कर्म केवल अपने ही लिये नहीं, किन्तु जड़ और चेतन दोनों का कल्याणकारी है॥१३॥

उप॑ मा॒ षड्द्वाद्वा॒ नरः॒ सोम॑स्य॒ हर्ष्या॑। तिष्ठ॑न्ति स्वादुरा॒तयः॑॥

षट्=नयन आदि इन्द्रिय संख्या में छै हैं, परन्तु साथ ही (द्वा) दो-दो हैं। अतः मन्त्र में “षट्” और “द्वा-द्वा” पद आए हैं। ये इन्द्रियगण यद्यपि सबको मिले हैं, तथापि विशेष पुरुष ही इनके गुणों और कार्य्यों से सुपरिचित हैं और विरले ही इनसे वास्तविक काम लेते हैं। ईश्वर की कृपा से जिनके इन्द्रियगण यथार्थ नायक और दानी हैं, वे ही पुरुष धन्य हैं॥१४॥

ऋ॒ज्रावि॑न्द्रो॒त आ द॑दे॒ हरी॒ ऋक्ष॑स्य सू॒नवि॑। आ॒श्व॒मे॒धस्य॒ रोहि॑ता॥

हे नरो! यह पवित्र शरीर तुमको दिया गया है, इससे शुभ कर्म करो॥१५॥

सु॒रथाँ॑ आतिथि॒ग्वे स्व॑भी॒शूँरा॒र्क्षे। आ॒श्व॒मे॒धे सु॒पेश॑सः॥

षळश्वाँ॑ आतिथि॒ग्व इ॑न्द्रो॒ते व॒धूम॑तः। सचा॑ पू॒तक्र॑तौ सनम्॥

वारंवार इसलिये इस प्रकार का वर्णन आता है कि उपासक अपने इन्द्रियगणों को वश में करके इनसे पवित्र काम लेवे॥१७॥

ऐषु॑ चेत॒द्वृष॑ण्वत्य॒न्तॠ॒ज्रेष्वरु॑षी। स्व॒भी॒शुः कशा॑वती॥

इन इन्द्रियों के साथ अद्भुत शक्तिशालिनी जो विवेकवती बुद्धि है, उसको मनन आदि व्यापारों से सदा बढ़ाना और शुद्ध-शुद्ध रखना चाहिये, यह सम्पूर्ण जगत् इसी के वश में है॥१८॥

न यु॒ष्मे वा॑जबन्धवो निनि॒त्सुश्च॒न मर्त्यः॑। अ॒व॒द्यमधि॑ दीधरत्॥

यह शुद्ध इन्द्रियों का वर्णन है। जिनके इन्द्रिय शुद्ध और विज्ञानयुक्त हैं, वे धन्यवाद के पात्र हैं॥१९॥

प्रप्र॑ वस्त्रि॒ष्टुभ॒मिषं॑ म॒न्दद्वी॑रा॒येन्द॑वे। धि॒या वो॑ मे॒धसा॑तये॒ पुरं॒ध्या वि॑वासति॥

मन्दद्वीर उसका नाम है, जो गरीबों और असमर्थों को अन्यायी पुरुषों से बचाता है और स्वयं ब्रह्मचर्य्यादि धर्म पालने और शारीरिक मानसिक शक्तियों को बढ़ाते हुए सदा देशहित कार्य्य में नियुक्त रहता है। परमात्मा ऐसे पुरुषों से प्रसन्न होता है। इससे यह शिक्षा मिलती है कि प्रत्येक नर-नारी को वीर वीरा बनना चाहिये॥१॥

न॒दं व॒ ओद॑तीनां न॒दं योयु॑वतीनाम्। पतिं॑ वो॒ अघ्न्या॑नां धेनू॒नामि॑षुध्यसि॥

इस ऋचा में ओदती, योयुवती और धेनु ये तीनों स्त्रीलिङ्ग शब्द हैं। इससे दिखलाते हैं कि जैसे स्त्रीजाति का रक्षक ईश्वर है, वैसे ही प्रत्येक वीर पुरुष को उचित है कि वे स्त्रियों पर कभी अत्याचार न करें॥२॥

ता अ॑स्य॒ सूद॑दोहसः॒ सोमं॑ श्रीणन्ति॒ पृश्न॑यः। जन्म॑न्दे॒वानां॒ विश॑स्त्रि॒ष्वा रो॑च॒ने दि॒वः॥

जैसे गाएँ मधुर दूध देती हैं, वैसे ही सब पदार्थ मधुरता उत्पन्न कर रहे हैं। इसको देखिये और विचारिये॥३॥

अ॒भि प्र गोप॑तिं गि॒रेन्द्र॑मर्च॒ यथा॑ वि॒दे। सू॒नुं स॒त्यस्य॒ सत्प॑तिम्॥

परमेश्वर को प्रत्यक्ष देखते नहीं, अतः उसके अस्तित्व में लोग संदिग्ध रहते हैं और उसकी पूजा-पाठ में आलस्य करते हैं। इस कारण विश्वासार्थ कहा जाता है कि विज्ञात पुरुष जैसे देखते और उसको पूजते, तद्वत् उसको भी समझो। क्योंकि यदि वह न हो, तो ये पृथिवी आदि कहाँ से आएँ। उसको विचारो॥४॥

आ हर॑यः ससृज्रि॒रेऽरु॑षी॒रधि॑ ब॒र्हिषि॑। यत्रा॒भि सं॒नवा॑महे॥

बर्हिष् यह आकाश का नाम है, निघण्टु १। ३। इससे ईश्वर की महती शक्ति दिखलाई गई है॥५॥

इन्द्रा॑य॒ गाव॑ आ॒शिरं॑ दुदु॒ह्रे व॒ज्रिणे॒ मधु॑। यत्सी॑मुपह्व॒रे वि॒दत्॥

इसका आशय यह है कि जिस परमात्मा की प्रीति के लिये मानो ये सम्पूर्ण जगत् ही अपना-अपना स्वत्व दे रहे हैं और ईश्वर सर्वत्र व्यापक होने के कारण वह वहाँ ही उसे पा भी रहा है, तब स्वल्प मनुष्य उसको क्या दे सकेगा। तथापि हे मनुष्यों! तुम्हारे निकट जो कुछ हो, उसकी प्रीत्यर्थ उसको दो॥६॥

उद्यद्ब्र॒ध्नस्य॑ वि॒ष्टपं॑ गृ॒हमिन्द्र॑श्च॒ गन्व॑हि। मध्वः॑ पी॒त्वा स॑चेवहि॒ त्रिः स॒प्त सख्युः॑ प॒दे॥

त्रिः+सप्त=२१−भाष्यकार सायण आदि समझते हैं कि देवताओं के स्थानों में इक्कीसवाँ उत्तम सूर्य्य का स्थान है। वही परम पद भी कहलाता है। किन्तु यह व्याख्या वेद की नहीं हो सकती। क्योंकि देवों के सब स्थान मिलकर (२१) इक्कीस ही हैं, इसका भी कोई निश्चय नहीं। अतः यह वर्णन अध्यात्म है। इस शिर में दो नयन, दो कर्ण, दो नासिकाएँ और एक रसना, ये सातों अपने-अपने विषयों के विचारकर्ता हैं। उत्तम, मध्यम और अधम भेद से इनके तीन प्रकार के विचार हैं, अतः ७*३=२१ प्रकार के अनुभव या विचार इस शिर में सदा होते रहते हैं, अतः यही शिर एकविंशति विचारों से युक्त है। सखा=परमात्मा का सखा जीव है। उसका मुख्य स्थान शिर ही है। जैसे लोक में मित्र को बुलाकर लोग सत्कार करते हैं, वैसे ही यह उपासक जीवात्मा परमात्मा को अपने-अपने स्थान में बुलाता है और उसे मधु समर्पित करता है।

अर्च॑त॒ प्रार्च॑त॒ प्रिय॑मेधासो॒ अर्च॑त। अर्च॑न्तु पुत्र॒का उ॒त पुरं॒ न धृ॒ष्ण्व॑र्चत॥

उसको छोड़ अन्य की उपासना या प्रार्थना न करो, यह इसका आशय है॥८॥

अव॑ स्वराति॒ गर्ग॑रो गो॒धा परि॑ सनिष्वणत्। पिङ्गा॒ परि॑ चनिष्कद॒दिन्द्रा॑य॒ ब्रह्मोद्य॑तम्॥

यह संसार महायुद्धक्षेत्र है। इसमें प्रतिक्षण अपने-अपने अस्तित्व के लिये सभी जीव युद्ध कर रहे हैं। मनुष्य-समाज में अन्य जीवों की अपेक्षा अधिकसंग्राम है। अतः इसमें कौन बचेगा और कौन मरेगा, इसका निश्चय नहीं, इस हेतु प्रथम परमात्मा का स्मरण करो॥९॥

आ यत्पत॑न्त्ये॒न्यः॑ सु॒दुघा॒ अन॑पस्फुरः। अ॒प॒स्फुरं॑ गृभायत॒ सोम॒मिन्द्रा॑य॒ पात॑वे॥

अपा॒दिन्द्रो॒ अपा॑द॒ग्निर्विश्वे॑ दे॒वा अ॑मत्सत। वरु॑ण॒ इदि॒ह क्ष॑य॒त्तमापो॑ अ॒भ्य॑नूषत व॒त्सं सं॒शिश्व॑रीरिव॥

सु॒दे॒वो अ॑सि वरुण॒ यस्य॑ ते स॒प्त सिन्ध॑वः। अ॒नु॒क्षर॑न्ति का॒कुदं॑ सू॒र्म्यं॑ सुषि॒रामि॑व॥

यो व्यतीँ॒रफा॑णय॒त्सुयु॑क्ताँ॒ उप॑ दा॒शुषे॑। त॒क्वो ने॒ता तदिद्वपु॑रुप॒मा यो अमु॑च्यत॥

अतीदु॑ श॒क्र ओ॑हत॒ इन्द्रो॒ विश्वा॒ अति॒ द्विषः॑। भि॒नत्क॒नीन॑ ओद॒नं प॒च्यमा॑नं प॒रो गि॒रा॥

अ॒र्भ॒को न कु॑मार॒कोऽधि॑ तिष्ठ॒न्नवं॒ रथ॑म्। स प॑क्षन्महि॒षं मृ॒गं पि॒त्रे मा॒त्रे वि॑भु॒क्रतु॑म्॥

आ तू सु॑शिप्र दम्पते॒ रथं॑ तिष्ठा हिर॒ण्यय॑म्। अध॑ द्यु॒क्षं स॑चेवहि स॒हस्र॑पादमरु॒षं स्व॑स्ति॒गाम॑ने॒हस॑म्॥

तं घे॑मि॒त्था न॑म॒स्विन॒ उप॑ स्व॒राज॑मासते। अर्थं॑ चिदस्य॒ सुधि॑तं॒ यदेत॑व आव॒र्तय॑न्ति दा॒वने॑॥

अनु॑ प्र॒त्नस्यौक॑सः प्रि॒यमे॑धास एषाम्। पूर्वा॒मनु॒ प्रय॑तिं वृ॒क्तब॑र्हिषो हि॒तप्र॑यस आशत॥

सूक्तम्

यो राजा॑ चर्षणी॒नां याता॒ रथे॑भि॒रध्रि॑गुः। विश्वा॑सां तरु॒ता पृत॑नानां॒ ज्येष्ठो॒ यो वृ॑त्र॒हा गृ॒णे॥

वह सर्वधाता, विधाता और पिता पालक है, उसकी पूजा करो॥१॥

इन्द्रं॒ तं शु॑म्भ पुरुहन्म॒न्नव॑से॒ यस्य॑ द्वि॒ता वि॑ध॒र्तरि॑। हस्ता॑य॒ वज्रः॒ प्रति॑ धायि दर्श॒तो म॒हो दि॒वे न सूर्यः॑॥

हे मनुष्यों! देखो ईश्वर के कैसे अखण्डनीय नियम हैं, जिनके वश में चराचर चल रहे हैं॥२॥

नकि॒ष्टं कर्म॑णा नश॒द्यश्च॒कार॑ स॒दावृ॑धम्। इन्द्रं॒ न य॒ज्ञैर्वि॒श्वगू॑र्त॒मृभ्व॑स॒मधृ॑ष्टं धृ॒ष्ण्वो॑जसम्॥

अषा॑ळ्हमु॒ग्रं पृत॑नासु सास॒हिं यस्मि॑न्म॒हीरु॑रु॒ज्रयः॑। सं धे॒नवो॒ जाय॑माने अनोनवु॒र्द्यावः॒ क्षामो॑ अनोनवुः॥

हे मनुष्यों! वह जगदीश महान्यायी और महोग्र है, जिसकी आज्ञा में यह सम्पूर्ण जगत् चल रहा है, उसकी कीर्ति का गान करो॥४॥

यद्द्याव॑ इन्द्र ते श॒तं श॒तं भूमी॑रु॒त स्युः। न त्वा॑ वज्रिन्त्स॒हस्रं॒ सूर्या॒ अनु॒ न जा॒तम॑ष्ट॒ रोद॑सी॥

आ प॑प्राथ महि॒ना वृष्ण्या॑ वृष॒न्विश्वा॑ शविष्ठ॒ शव॑सा। अ॒स्माँ अ॑व मघव॒न्गोम॑ति व्र॒जे वज्रि॑ञ्चि॒त्राभि॑रू॒तिभिः॑॥

जिस कारण वह देव स्वयं सम्पूर्ण जगत् को सुखों से पूर्ण कर रहा है, अतः धन्यवादार्थ उसकी कीर्ति गाओ॥६॥

न सी॒मदे॑व आप॒दिषं॑ दीर्घायो॒ मर्त्यः॑। एत॑ग्वा चि॒द्य एत॑शा यु॒योज॑ते॒ हरी॒ इन्द्रो॑ यु॒योज॑ते॥

अदेव−इससे यह दिखलाया गया है कि जो ईश्वरोपासना से रहित है, वह इसलोक और परलोक दोनों में दुःखभागी होता है॥७॥

तं वो॑ म॒हो म॒हाय्य॒मिन्द्रं॑ दा॒नाय॑ स॒क्षणि॑म्। यो गा॒धेषु॒ य आर॑णेषु॒ हव्यो॒ वाजे॒ष्वस्ति॒ हव्यः॑॥

हे मनुष्यों! वह ईश्वर जीवों को प्रतिक्षण दान दे रहा है। सुख, दुःख, सम्पत्ति, विपत्ति, नदी, समुद्र, अरण्य, जल और स्थल सर्वत्र और सब काल में उसकी उपासना करो॥८॥

उदू॒ षु णो॑ वसो म॒हे मृ॒शस्व॑ शूर॒ राध॑से। उदू॒ षु म॒ह्यै म॑घवन्म॒घत्त॑य॒ उदि॑न्द्र॒ श्रव॑से म॒हे॥

इस ऋचा में महासम्पत्ति महाधन और महाकीर्ति के लिये ईश्वर से प्रार्थना है। निःसन्देह जो तन मन से ईश्वर के निकट प्राप्त होते हैं, उनका मनोरथ अवश्य सिद्ध होता है, उसमें विश्वास कर उसकी आज्ञा पर चलो॥९॥

त्वं न॑ इन्द्र ऋत॒युस्त्वा॒निदो॒ नि तृ॑म्पसि। मध्ये॑ वसिष्व तुविनृम्णो॒र्वोर्नि दा॒सं शि॑श्नथो॒ हथैः॑॥

जिस कारण ईश्वर सत्यप्रिय है, अतः असत्यवादी और उपद्रवियों को दण्ड देता है और सत्यवादियों को दान। अतः हे मनुष्यों! सत्यप्रिय बनो॥१०॥

अ॒न्यव्र॑त॒ममा॑नुष॒मय॑ज्वान॒मदे॑वयुम्। अव॒ स्वः सखा॑ दुधुवीत॒ पर्व॑तः सु॒घ्नाय॒ दस्युं॒ पर्व॑तः॥

लोगों को उचित है कि वे केवल ईश्वर की उपासना करें। समाजों में, देशों में या ग्रामों में राक्षसी काम न करें। स्त्रीलम्पटता, बालहत्यादि पातक में प्रवृत्त न हों। राजा अपने प्रबन्ध से समाज को सुधारा करे॥११॥

त्वं न॑ इन्द्रासां॒ हस्ते॑ शविष्ठ दा॒वने॑। धा॒नानां॒ न सं गृ॑भायास्म॒युर्द्विः सं गृ॑भायास्म॒युः॥

यह प्रेममय प्रार्थना है, जैसे बालक अपने पिता माता से खानपान के लिये याचना करता रहता है, तद्वत् सबका समान पिता उस जगदीश से हम अपनी आवश्यकताएँ माँगें॥१२॥

सखा॑यः॒ क्रतु॑मिच्छत क॒था रा॑धाम श॒रस्य॑। उप॑स्तुतिं भो॒जः सू॒रिर्यो अह्र॑यः॥

इसका आशय विस्पष्ट है प्रत्येक मनुष्य को शुभ कर्म करना चाहिये। यज्ञादि करने से केवल आत्मा का ही उपकार नहीं होता, किन्तु देशवासियों को भी इससे बहुत लाभ पहुँचता है और दुराचारों से बचता है, शरीर में रोग नहीं होता। मरणपर्य्यन्त सुख से जीवन बीतता है॥१३॥

भूरि॑भिः समह॒ ऋषि॑भिर्ब॒र्हिष्म॑द्भिः स्तविष्यसे। यदि॒त्थमेक॑मेक॒मिच्छर॑ व॒त्सान्प॑रा॒ददः॑॥

इसका आशय यह है कि उसकी पूजा जब महा महर्षि करते हैं, तब हम क्यों न करें और जब देखते हैं कि जो उपासक हैं, उनको क्रमशः धन की वृद्धि होती है। परमात्मा एक-एक देकर उसको लाख दे देता है, अतः वही चिन्तनीय है॥१४॥

क॒र्ण॒गृह्या॑ म॒घवा॑ शौरदे॒व्यो व॒त्सं न॑स्त्रि॒भ्य आन॑यत्। अ॒जां सू॒रिर्न धात॑वे॥

ईश्वर जिसको देना चाहता है, उसको अनेक उपायों से देता है। मानो तीनों लोकों में से कहीं से आनकर उसको अभिलषित देता है, क्योंकि वह महाधनेश्वर है। हे मनुष्यों! उसकी उपासना प्रेम से करो॥१५॥

त्वं नो॑ अग्ने॒ महो॑भिः पा॒हि विश्व॑स्या॒ अरा॑तेः। उ॒त द्वि॒षो मर्त्य॑स्य॥

इससे यह शिक्षा देते हैं कि तुम प्रथम निष्कारण शत्रुता न करो। केवल मनुष्यता क्या है, इस पर पूर्ण विचार कर इसका प्रचार करो। अपने अन्तःकरण से सर्वथा हिंसाभाव निकाल दो॥१॥

न॒हि म॒न्युः पौरु॑षेय॒ ईशे॒ हि वः॑ प्रियजात। त्वमिद॑सि॒ क्षपा॑वान्॥

जिस कारण परमात्मा ही पृथिवीश्वर है, अतः उसके ऊपर मनुष्य का प्रभाव नहीं पड़ सकता, किन्तु उसका प्रभाव मनुष्यों के ऊपर पड़ता है, क्योंकि वह क्षपावान्=पृथिवीश्वर है। कोई इस शब्द का अर्थ रात्रिस्वामी भी करते हैं। क्षपा=रात्रि॥२॥

स नो॒ विश्वे॑भिर्दे॒वेभि॒रूर्जो॑ नपा॒द्भद्र॑शोचे। र॒यिं दे॑हि वि॒श्ववा॑रम्॥

ऊर्ज्=बल। नपात्=न गिरानेवाला। जो बल को न गिरावे, वह ऊर्जोनपात् अर्थात् बलप्रद है। देव=यह शब्द सर्वपदार्थवाचक है। मन्त्र का आशय यह है कि सकल प्राणियों के साथ मुझको भी साहाय्य दे॥३॥

न तम॑ग्ने॒ अरा॑तयो॒ मर्तं॑ युवन्त रा॒यः। यं त्राय॑से दा॒श्वांस॑म्॥

परमात्मा की कृपा जिस पर होती है, उसको कौन शक्ति कल्याण-मार्ग से पृथक् कर सकती है॥४॥

यं त्वं वि॑प्र मे॒धसा॑ता॒वग्ने॑ हि॒नोषि॒ धना॑य। स तवो॒ती गोषु॒ गन्ता॑॥

गो शब्द अनेकार्थ प्रसिद्ध है। जो कोई देवयज्ञ करता है, उसको सब प्रकार के धन प्राप्त होते हैं और (गौ) सकल इन्द्रिय उसके वशीभूत होते हैं॥५॥

त्वं र॒यिं पु॑रु॒वीर॒मग्ने॑ दा॒शुषे॒ मर्ता॑य। प्र णो॑ नय॒ वस्यो॒ अच्छ॑॥

वस्यः=जो आनन्द सर्वत्र व्यापक है, वह मुक्तिरूप सुख है। उसी की ओर लोगों को जाना चाहिये। वह इस लोक में भी विद्यमान है, परन्तु उसको केवल विद्वान् ही अनुभव कर सकता है॥६॥

उ॒रु॒ष्या णो॒ मा परा॑ दा अघाय॒ते जा॑तवेदः। दु॒रा॒ध्ये॒३॒॑ मर्ता॑य॥

मनुष्य को उचित है कि अपनी ही जाति के अशुभ करने में न लगा रहे और सदा अनिष्टचिन्तन से अपने मन को दूषित न करे, अन्यथा महती हानि होगी॥७॥

अग्ने॒ माकि॑ष्टे दे॒वस्य॑ रा॒तिमदे॑वो युयोत। त्वमी॑शिषे॒ वसू॑नाम्॥

इसका आशय है कि ईश्वर प्रतिक्षण वायु, जल, अन्न और आनन्द का दान दे रहा है। दुष्टजन इनको भी अपने आचरणों से गन्दा बनाते रहते हैं अथवा गौ, मेष, अश्व, हाथी आदि इनको चुरा-चुरा कर नष्ट न करने पावें, क्योंकि ईश्वर सबका रक्षक है॥८॥

स नो॒ वस्व॒ उप॑ मा॒स्यूर्जो॑ नपा॒न्माहि॑नस्य। सखे॑ वसो जरि॒तृभ्यः॑॥

ईश्वर बलदा, सखा और वासदाता है। हे मनुष्यों! इसका तुम अनुभव और विचार करो। वह जैसे हमको विविध दान और महत्त्व दे रहा है, वैसे तुमको भी देगा, यदि उसकी आज्ञा पर चलो॥९॥

अच्छा॑ नः शी॒रशो॑चिषं॒ गिरो॑ यन्तु दर्श॒तम्। अच्छा॑ य॒ज्ञासो॒ नम॑सा पुरू॒वसुं॑ पुरुप्रश॒स्तमू॒तये॑॥

हमारे जितने शुभकर्म धन और पुत्रादिक हों, वे सब ईश्वर के लिये ही होवें॥१०॥

अ॒ग्निं सू॒नुं सह॑सो जा॒तवे॑दसं दा॒नाय॒ वार्या॑णाम्। द्वि॒ता यो भूद॒मृतो॒ मर्त्ये॒ष्वा होता॑ म॒न्द्रत॑मो वि॒शि॥

यद्यपि वह स्वयं कर्मानुसार आनन्द दे रहा है, तथापि अपनी-अपनी इच्छापूर्त्ति के लिये उसकी प्रार्थना प्रतिदिन करे॥११॥

अ॒ग्निं वो॑ देवय॒ज्यया॒ग्निं प्र॑य॒त्य॑ध्व॒रे। अ॒ग्निं धी॒षु प्र॑थ॒मम॒ग्निमर्व॑त्य॒ग्निं क्षैत्रा॑य॒ साध॑से॥

सब वस्तु की प्राप्ति के लिये सब काल में उसी की स्तुति प्रार्थना करनी चाहिये॥१२॥

अ॒ग्निरि॒षां स॒ख्ये द॑दातु न॒ ईशे॒ यो वार्या॑णाम्। अ॒ग्निं तो॒के तन॑ये॒ शश्व॑दीमहे॒ वसुं॒ सन्तं॑ तनू॒पाम्॥

वह ईश सबका सखा और पोषक है, अतः सर्व वस्तु के लिये उससे प्रार्थना करें॥१३॥

अ॒ग्निमी॑ळि॒ष्वाव॑से॒ गाथा॑भिः शी॒रशो॑चिषम्। अ॒ग्निं रा॒ये पु॑रुमीळ्ह श्रु॒तं नरो॒ऽग्निं सु॑दी॒तये॑ छ॒र्दिः॥

जो ईश्वर प्राणिमात्र को निवास और भोजन दे रहा है, उसकी स्तुति प्रार्थना हम मनुष्य करें॥१४॥

अ॒ग्निं द्वेषो॒ योत॒वै नो॑ गृणीमस्य॒ग्निं शं योश्च॒ दात॑वे। विश्वा॑सु वि॒क्ष्व॑वि॒तेव॒ हव्यो॒ भुव॒द्वस्तु॑ॠषू॒णाम्॥

किसी के साथ हम द्वेष न करें, जहाँ तक हो, जगत् में सुख पहुँचावें और उस ईश्वर की स्तुति प्रार्थना करें, जो सबका अधीश्वर है॥१५॥

ह॒विष्कृ॑णुध्व॒मा ग॑मदध्व॒र्युर्व॑नते॒ पुनः॑। वि॒द्वाँ अ॑स्य प्र॒शास॑नम्॥

यज्ञारम्भ के पूर्व समग्र सामग्री एकत्रित कर लोगों को बुला अध्वर्यु ईश्वर की स्तुति प्रार्थना प्रथम करे॥१॥

नि ति॒ग्मम॒भ्यं१॒॑शुं सीद॒द्धोता॑ म॒नावधि॑। जु॒षा॒णो अ॑स्य स॒ख्यम्॥

होता कुछ उच्च आसन पर बैठ ईश्वर का ध्यान करे॥२॥

अ॒न्तरि॑च्छन्ति॒ तं जने॑ रु॒द्रं प॒रो म॑नी॒षया॑। गृ॒भ्णन्ति॑ जि॒ह्वया॑ स॒सम्॥

यज्ञ में जिसकी स्तुति प्रार्थना होती है, वह कहाँ है, इस शङ्का पर कहते हैं कि प्राणियों के मध्य में ही उसको खोजो और स्तुति द्वारा उसको ग्रहण करो॥३॥

जा॒म्य॑तीतपे॒ धनु॑र्वयो॒धा अ॑रुह॒द्वन॑म्। दृ॒षदं॑ जि॒ह्वयाव॑धीत्॥

चर॑न्व॒त्सो रुश॑न्नि॒ह नि॑दा॒तारं॒ न वि॑न्दते। वेति॒ स्तोत॑व अ॒म्ब्य॑म्॥

उ॒तो न्व॑स्य॒ यन्म॒हदश्वा॑व॒द्योज॑नं बृ॒हद्। दा॒मा रथ॑स्य॒ ददृ॑शे॥

दु॒हन्ति॑ स॒प्तैका॒मुप॒ द्वा पञ्च॑ सृजतः। ती॒र्थे सिन्धो॒रधि॑ स्व॒रे॥

आ द॒शभि॑र्वि॒वस्व॑त॒ इन्द्रः॒ कोश॑मचुच्यवीत्। खेद॑या त्रि॒वृता॑ दि॒वः॥

परि॑ त्रि॒धातु॑रध्व॒रं जू॒र्णिरे॑ति॒ नवी॑यसी। मध्वा॒ होता॑रो अञ्जते॥

सि॒ञ्चन्ति॒ नम॑साव॒तमु॒च्चाच॑क्रं॒ परि॑ज्मानम्। नी॒चीन॑बार॒मक्षि॑तम्॥

अ॒भ्यार॒मिदद्र॑यो॒ निषि॑क्तं॒ पुष्क॑रे॒ मधु॑। अ॒व॒तस्य॑ वि॒सर्ज॑ने॥

गाव॒ उपा॑वताव॒तं म॒ही य॒ज्ञस्य॑ र॒प्सुदा॑। उ॒भा कर्णा॑ हिर॒ण्यया॑॥

आ सु॒ते सि॑ञ्चत॒ श्रियं॒ रोद॑स्योरभि॒श्रिय॑म्। र॒सा द॑धीत वृष॒भम्॥

ते जा॑नत॒ स्वमो॒क्यं१॒॑ सं व॒त्सासो॒ न मा॒तृभिः॑। मि॒थो न॑सन्त जा॒मिभिः॑॥

उप॒ स्रक्वे॑षु॒ बप्स॑तः कृण्व॒ते ध॒रुणं॑ दि॒वि। इन्द्रे॑ अ॒ग्ना नमः॒ स्वः॑॥

अधु॑क्षत्पि॒प्युषी॒मिष॒मूर्जं॑ स॒प्तप॑दीम॒रिः। सूर्य॑स्य स॒प्त र॒श्मिभिः॑॥

सोम॑स्य मित्रावरु॒णोदि॑ता॒ सूर॒ आ द॑दे। तदातु॑रस्य भेष॒जम्॥

उ॒तो न्व॑स्य॒ यत्प॒दं ह॑र्य॒तस्य॑ निधा॒न्य॑म्। परि॒ द्यां जि॒ह्वया॑तनत्॥

उदी॑राथामृताय॒ते यु॒ञ्जाथा॑मश्विना॒ रथ॑म्। अन्ति॒ षद्भू॑तु वा॒मवः॑॥

राजा और अमात्यादिकों को इस प्रकार प्रबन्ध करना चाहिये कि प्रजाओं को अपने समीप में सम्पूर्ण रक्षा की सामग्री समझें॥१॥

नि॒मिष॑श्चि॒ज्जवी॑यसा॒ रथे॒ना या॑तमश्विना। अन्ति॒ षद्भू॑तु वा॒मवः॑॥

इसका स्पष्ट है, अतः लिखा नहीं गया॥२॥

उप॑ स्तृणीत॒मत्र॑ये हि॒मेन॑ घ॒र्मम॑श्विना। अन्ति॒ षद्भू॑तु वा॒मवः॑॥

नोट−अत्रि० १−ईश्वर को छोड़कर तीनों लोकों में जिसका कोई रक्षक नहीं है, वह अत्रि। यद्वा−

कुह॑ स्थः॒ कुह॑ जग्मथुः॒ कुह॑ श्ये॒नेव॑ पेतथुः। अन्ति॒ षद्भू॑तु वा॒मवः॑॥

प्रजाओं के निकट यदि राजा या राजसाहाय्य न पहुँचे, तो जहाँ वे हों, वहाँ से उनको बुला लाना चाहिये। राजा सर्वकार्य को छोड़ इस रक्षाधर्म का सब प्रकार से पालन करे॥४॥

यद॒द्य कर्हि॒ कर्हि॑ चिच्छुश्रू॒यात॑मि॒मं हव॑म्। अन्ति॒ षद्भू॑तु वा॒मवः॑॥

अ॒श्विना॑ याम॒हूत॑मा॒ नेदि॑ष्ठं या॒म्याप्य॑म्। अन्ति॒ षद्भू॑तु वा॒मवः॑॥

अव॑न्त॒मत्र॑ये गृ॒हं कृ॑णु॒तं यु॒वम॑श्विना। अन्ति॒ षद्भू॑तु वा॒मवः॑॥

वरे॑थे अ॒ग्निमा॒तपो॒ वद॑ते व॒ल्ग्वत्र॑ये। अन्ति॒ षद्भू॑तु वा॒मवः॑॥

प्र स॒प्तव॑ध्रिरा॒शसा॒ धारा॑म॒ग्नेर॑शायत। अन्ति॒ षद्भू॑तु वा॒मवः॑॥

इ॒हा ग॑तं वृषण्वसू शृणु॒तं म॑ इ॒मं हव॑म्। अन्ति॒ षद्भू॑तु वा॒मवः॑॥

किमि॒दं वां॑ पुराण॒वज्जर॑तोरिव शस्यते। अन्ति॒ षद्भू॑तु वा॒मवः॑॥

स॒मा॒नं वां॑ सजा॒त्यं॑ समा॒नो बन्धु॑रश्विना। अन्ति॒ षद्भू॑तु वा॒मवः॑॥

यो वां॒ रजां॑स्यश्विना॒ रथो॑ वि॒याति॒ रोद॑सी। अन्ति॒ षद्भू॑तु वा॒मवः॑॥

विमान या रथ वैसा बनावे, जिसकी गति तीन लोक में अहत हो॥१३॥

आ नो॒ गव्ये॑भि॒रश्व्यैः॑ स॒हस्रै॒रुप॑ गच्छतम्। अन्ति॒ षद्भू॑तु वा॒मवः॑॥

राजा देश को धन-धान्य से पूर्ण रक्खे, प्रजा में कभी दुर्भिक्षादि पीड़ा न हो॥१४॥

मा नो॒ गव्ये॑भि॒रश्व्यैः॑ स॒हस्रे॑भि॒रति॑ ख्यतम्। अन्ति॒ षद्भू॑तु वा॒मवः॑॥

पशुओं की भी न्यूनता देश में न हो, वैसा प्रबन्ध करे॥१५॥

अ॒रु॒णप्सु॑रु॒षा अ॑भू॒दक॒र्ज्योति॑ॠ॒ताव॑री। अन्ति॒ षद्भू॑तु वा॒मवः॑॥

अ॒श्विना॒ सु वि॒चाक॑शद्वृ॒क्षं प॑रशु॒माँ इ॑व। अन्ति॒ षद्भू॑तु वा॒मवः॑॥

पुरं॒ न धृ॑ष्ण॒वा रु॑ज कृ॒ष्णया॑ बाधि॒तो वि॒शा। अन्ति॒ षद्भू॑तु वा॒मवः॑॥

वि॒शोवि॑शो वो॒ अति॑थिं वाज॒यन्तः॑ पुरुप्रि॒यम्। अ॒ग्निं वो॒ दुर्यं॒ वचः॑ स्तु॒षे शू॒षस्य॒ मन्म॑भिः॥

प्रत्येक मनुष्य अपने-अपने ज्ञान के अनुसार उसकी स्तुति प्रार्थना और तद्द्वारा विवेकलाभ की चेष्टा करें॥१॥

यं जना॑सो ह॒विष्म॑न्तो मि॒त्रं न स॒र्पिरा॑सुतिम्। प्र॒शंस॑न्ति॒ प्रश॑स्तिभिः॥

ईश्वर को निज मित्र जान उससे प्रेम करें और उसी की आज्ञा पर चलें॥२॥

पन्यां॑सं जा॒तवे॑दसं॒ यो दे॒वता॒त्युद्य॑ता। ह॒व्यान्यैर॑यद्दि॒वि॥

दिवि=यह सम्पूर्ण जगत् दिव्य सुरम्य और आनन्दप्रद है। उद्यत्=इसमें जितने पदार्थ हैं, वे उद्योग की शिक्षा दे रहे हैं। परन्तु हम मनुष्य अज्ञानवश इसको दुःखमय बनाते हैं। अतः जिससे सर्व ज्ञान की उत्पत्ति हुई है, उसकी उपासना करो, जिससे सुमति प्राप्त हो॥३॥

आग॑न्म वृत्र॒हन्त॑मं॒ ज्येष्ठ॑म॒ग्निमान॑वम्। यस्य॑ श्रु॒तर्वा॑ बृ॒हन्ना॒र्क्षो अनी॑क॒ एध॑ते॥

श्रुतर्वा=जो ईश्वर की आज्ञाओं को सदा सुना करते हैं और उनपर चलते हैं। आर्क्ष=ऋक्षमित्र। यहाँ ऋक्ष शब्द मनुष्यवाची है॥४॥

अ॒मृतं॑ जा॒तवे॑दसं ति॒रस्तमां॑सि दर्श॒तम्। घृ॒ताह॑वन॒मीड्य॑म्॥

अमृत=जिस कारण उसकी कभी मृत्यु नहीं होती, अन्धकार से वह पर और उन्हें निर्मूल करनेवाला है और सर्ववस्तुप्रदाता है, अतः वही पूज्य है॥५॥

स॒बाधो॒ यं जना॑ इ॒मे॒३॒॑ऽग्निं ह॒व्येभि॒रीळ॑ते। जुह्वा॑नासो य॒तस्रु॑चः॥

परमात्मा की प्रार्थना से निखिल बाधाएँ दूर होती हैं, अतः हे मनुष्यों! अग्निहोत्रादि शुभकर्म करते हुए उसकी कीर्ति का गान करो॥६॥

इ॒यं ते॒ नव्य॑सी म॒तिरग्ने॒ अधा॑य्य॒स्मदा। मन्द्र॒ सुजा॑त॒ सुक्र॒तोऽमू॑र॒ दस्माति॑थे॥

जो सदा ईश्वर की आज्ञा पर चलते हैं, उनको परमात्मा सुबुद्धि देते हैं, जिससे वे कभी विपत्तिग्रस्त नहीं होते॥७॥

सा ते॑ अग्ने॒ शंत॑मा॒ चनि॑ष्ठा भवतु प्रि॒या। तया॑ वर्धस्व॒ सुष्टु॑तः॥

हे मनुष्यों! यदि उसकी कृपा से तुममें नवीन और तीव्र बुद्धि उत्पन्न हो, तो उससे जगत् का कल्याण और ईश्वर की स्तुति करो॥८॥

सा द्यु॒म्नैर्द्यु॒म्निनी॑ बृ॒हदुपो॑प॒ श्रव॑सि॒ श्रवः॑। दधी॑त वृत्र॒तूर्ये॑॥

हे मनुष्यों! ईश्वर से प्राप्त सुबुद्धि द्वारा हम लोग विज्ञान और यश प्राप्त करें, किसी को हानि न पहुँचावें॥९॥

अश्व॒मिद्गां र॑थ॒प्रां त्वे॒षमिन्द्रं॒ न सत्प॑तिम्। यस्य॒ श्रवां॑सि॒ तूर्व॑थ॒ पन्य॑म्पन्यं च कृ॒ष्टयः॑॥

हे मनुष्यों! जिसकी कीर्ति सर्वत्र व्याप्त है, उसका गान करो, और का नहीं॥१०॥

यं त्वा॑ गो॒पव॑नो गि॒रा चनि॑ष्ठदग्ने अङ्गिरः। स पा॑वक श्रुधी॒ हव॑म्॥

जो इस संसार का रसस्वरूप और संशोधक है, उसी की स्तुति प्रार्थना ऋषिगण करते आए हैं। हम लोग भी उनका अनुकरण करें॥११॥

यं त्वा॒ जना॑स॒ ईळ॑ते स॒बाधो॒ वाज॑सातये। स बो॑धि वृत्र॒तूर्ये॑॥

जिस कारण मानवजाति रोगशोकादि अनेक उपद्रवों से युक्त है, अतः उन सबकी निवृत्ति के लिये ईश्वर से प्रार्थना करें॥१२॥

अ॒हं हु॑वा॒न आ॒र्क्षे श्रु॒तर्व॑णि मद॒च्युति॑। शर्धां॑सीव स्तुका॒विनां॑ मृ॒क्षा शी॒र्षा च॑तु॒र्णाम्॥

अहम्=इस पद से केवल एक ऋषि का बोध नहीं, किन्तु जो कोई ईश्वर से प्रार्थना करे, उस सबके लिये अहम् पद आया है। इसका आशय यह है कि प्रत्येक ज्ञानी जन अपनी जाति के कल्याण के लिये ईश्वर से प्रार्थना करे, जिससे मनुष्यमात्र के ज्ञानेन्द्रिय ज्ञान की प्राप्ति के लिये चेष्टा करें॥१३॥

मां च॒त्वार॑ आ॒शवः॒ शवि॑ष्ठस्य द्रवि॒त्नवः॑। सु॒रथा॑सो अ॒भि प्रयो॒ वक्ष॒न्वयो॒ न तुग्र्य॑म्॥

अपने विषय में अति निपुण (द्रवित्नवः) आलस्यरहित (सुरथासः) शरीररूप सुन्दर रथयुक्त (चत्वारः) चक्षु, श्रोत्र, घ्राण और रसनारूप चार ज्ञान इन्द्रिय (माम्) मुझको (प्रयः) विविध सुख (अभि+वक्षन्) पहुँचा रहे हैं। (न) जैसे (वयः) नौकाएँ (तुग्य्रम्) भोज्यादि पदार्थ को इधर-उधर पहुँचाते हैं॥१४॥

स॒त्यमित्त्वा॑ महेनदि॒ परु॒ष्ण्यव॑ देदिशम्। नेमा॑पो अश्व॒दात॑रः॒ शवि॑ष्ठादस्ति॒ मर्त्यः॑॥

जिस कारण परमदेव सब प्रकार से हम लोगों को सुख पहुँचा रहा है और धनादि उपार्जन के लिये बुद्धि विवेक पुरुषार्थ देता है, अतः उसकी आज्ञा पर चलकर कल्याणाभिलाषी होवें॥१५॥

यु॒क्ष्वा हि दे॑व॒हूत॑माँ॒ अश्वाँ॑ अग्ने र॒थीरि॑व। नि होता॑ पू॒र्व्यः स॑दः॥

वह जगदीश सूर्य्यादि सम्पूर्ण जगत् का शासक दाता और पूर्ण है, उसको अपने हृदय में स्थापित कर स्तुति करें॥१॥

उ॒त नो॑ देव दे॒वाँ अच्छा॑ वोचो वि॒दुष्ट॑रः। श्रद्विश्वा॒ वार्या॑ कृधि॥

भगवान् हमारे हृदयप्रदेश में उपदेश देता है और इस जगत् के प्रत्येक पदार्थ भी मनुष्यों को सदुपदेश दे रहे हैं, परन्तु इस तत्त्व को विरले ही विद्वान् समझते हैं। हे मनुष्यों! इसकी शरण में आकर इस जगत् का अध्ययन करो॥२॥

त्वं ह॒ यद्य॑विष्ठ्य॒ सह॑सः सूनवाहुत। ऋ॒तावा॑ य॒ज्ञियो॒ भुवः॑॥

यविष्ठ्य=जीव से जगत् को और सूर्य्यादि लोकों को परस्पर मिलानेवाला होने से वह यविष्ठ्य कहाता है। आहुत, इसको उत्पन्न कर परमात्मा ने इसमें अपने को होम कर दिया, ऐसा वर्णन बहुधा आता है, अतः वह आहुत है। अन्यत् स्पष्ट है॥३॥

अ॒यम॒ग्निः स॑ह॒स्रिणो॒ वाज॑स्य श॒तिन॒स्पतिः॑। मू॒र्धा क॒वी र॑यी॒णाम्॥

जो परमात्मा सम्पूर्ण ज्ञान और धन का अधिपति है, वह हमको धन और ज्ञान दे॥४॥

तं ने॒मिमृ॒भवो॑ य॒था न॑मस्व॒ सहू॑तिभिः। नेदी॑यो य॒ज्ञम॑ङ्गिरः॥

सदा ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिये, जिससे हम लोग शुभकर्म में सदा प्रवृत्त रहें॥५॥

तस्मै॑ नू॒नम॒भिद्य॑वे वा॒चा वि॑रूप॒ नित्य॑या। वृष्णे॑ चोदस्व सुष्टु॒तिम्॥

जो परमेश्वर सर्वत्र प्रकृति के मध्य विराजमान हो रहा है, उसकी स्तुति प्रार्थना करो॥६॥

कमु॑ ष्विदस्य॒ सेन॑या॒ग्नेरपा॑कचक्षसः। प॒णिं गोषु॑ स्तरामहे॥

जिस कारण परमात्मा सर्वद्रष्टा और सर्वशासक है, इस हेतु अपनी सम्पूर्ण वस्तु उसके निकट समर्पित करे और उसकी इच्छा पर अपना कल्याण छोड़े॥७॥

मा नो॑ दे॒वानां॒ विशः॑ प्रस्ना॒तीरि॑वो॒स्राः। कृ॒शं न हा॑सु॒रघ्न्याः॑॥

हम मनुष्य वैसा शुद्धाचरण सत्यग्रहण कपटादिदोषराहित्य तथा ईश्वर की आराधनादि सद्गुण उपार्जन करें, जिससे सज्जनगण हमको न त्यागें॥८॥

मा नः॑ समस्य दू॒ढ्यः१॒॑ परि॑द्वेषसो अंह॒तिः। ऊ॒र्मिर्न नाव॒मा व॑धीत्॥

दुर्बुद्धियों और द्वेषी पुरुषों से हम सदा पृथक् रहें। ऐसा न हो कि उनका संसर्ग हम लोगों को भी कुपथ में ले जाकर नष्ट कर दे। जैसे कुपित समुद्रतरङ्ग जहाजों को तोड़कर डुबा देता है॥९॥

नम॑स्ते अग्न॒ ओज॑से गृ॒णन्ति॑ देव कृ॒ष्टयः॑। अमै॑र॒मित्र॑मर्दय॥

प्रत्येक आदमी को उचित है कि वह परस्पर द्रोह की चिन्ता से अलग रहे, तब ही जगत् के शत्रुसमूह चूर्ण हो सकते हैं॥१०॥

कु॒वित्सु नो॒ गवि॑ष्ट॒येऽग्ने॑ सं॒वेषि॑षो र॒यिम्। उरु॑कृदु॒रु ण॑स्कृधि॥

हम मनुष्य गौ आदि पशुओं को पाल कर उसके दुग्ध घृत आदि से यज्ञकर्म करके लोकोपकार करें॥११॥

मा नो॑ अ॒स्मिन्म॑हाध॒ने परा॑ वर्ग्भार॒भृद्य॑था। सं॒वर्गं॒ सं र॒यिं ज॑य॥

महाधन=इस संसार में जिस ओर देखते हैं, सम्पत्तियों का अन्त नहीं पाते, तथापि मनुष्य अज्ञानवश दुर्नीति के कारण दुःख पा रहा है, इससे ईश्वर इसकी रक्षा करे॥१२॥

अ॒न्यम॒स्मद्भि॒या इ॒यमग्ने॒ सिष॑क्तु दु॒च्छुना॑। वर्धा॑ नो॒ अम॑व॒च्छवः॑॥

हे ईश! तेरा कोप महामारी आदि रोग हम लोगों पर न आ गिरे, किन्तु जो जगत् के शत्रु और तेरी स्तुति आदि से रहित हैं, उनको भय दिखलावे॥१३॥

यस्याजु॑षन्नम॒स्विनः॒ शमी॒मदु॑र्मखस्य वा। तं घेद॒ग्निर्वृ॒धाव॑ति॥

प्रत्येक शुभकर्म में विद्वानों का सत्कार और उनसे शुद्धकर्म करावे, तभी कल्याण होता है॥१४॥

पर॑स्या॒ अधि॑ सं॒वतोऽव॑राँ अ॒भ्या त॑र। यत्रा॒हमस्मि॒ ताँ अ॑व॥

जहाँ पर ईश्वरभक्त ऋषिगण विराजमान होते हैं, वहाँ अवश्य कल्याण होता है॥१५॥

वि॒द्मा हि ते॑ पु॒रा व॒यमग्ने॑ पि॒तुर्यथाव॑सः। अधा॑ ते सु॒म्नमी॑महे॥

हे ईश! जिस हेतु आपका सहाय बहुत दिनों से हम लोग जानते हैं, इस हेतु आपसे उसकी अपेक्षा करते हैं॥१६॥

इ॒मं नु मा॒यिनं॑ हुव॒ इन्द्र॒मीशा॑न॒मोज॑सा। म॒रुत्व॑न्तं॒ न वृ॒ञ्जसे॑॥

जिस कारण वह इन्द्रवाच्य ईश्वर प्राणों का अधिपति, मित्र और जगत् का शासक महाराज है, अतः सब मित्र उसकी स्तुति करें॥१॥

अ॒यमिन्द्रो॑ म॒रुत्स॑खा॒ वि वृ॒त्रस्या॑भिन॒च्छिरः॑। वज्रे॑ण श॒तप॑र्वणा॥

वेदों में आलङ्कारिक वर्णन बहुत है। यहाँ जीव का सखा ईश्वर है। उसमें मनुष्यसखावत् आरोप करके वर्णन है। जैसे इस लोक में सखा हितकारी होता और अपने मित्र का विघ्ननाश के लिये चेष्टा करता है, तद्वत् मानो वह जगदीश भी करता है। इस हेतु वज्र आदि शब्द ईश्वर-पक्ष में अन्य अर्थ का द्योतक है। अर्थात् उसके जो न्याय और नियम हैं, वे ही शतपर्व वज्र हैं। भाव इसका यह है कि जो निष्कपट हो उसकी शरण में जाता है, वह सुखी होता है॥२॥

वा॒वृ॒धा॒नो म॒रुत्स॒खेन्द्रो॒ वि वृ॒त्रमै॑रयत्। सृ॒जन्त्स॑मु॒द्रिया॑ अ॒पः॥

इस ऋचा में विशेष बात यह दिखलाई गई है कि जल के परमाणुओं को मेघरूप में विरचनेवाला जगदीश ही है। कैसा आश्चर्य प्रबन्ध है, आकाश में मेघ दौड़ रहे हैं, हे मनुष्यों! इसकी अद्भुत कला देखो॥३॥

अ॒यं ह॒ येन॒ वा इ॒दं स्व॑र्म॒रुत्व॑ता जि॒तम्। इन्द्रे॑ण॒ सोम॑पीतये॥

जिस हेतु सम्पूर्ण चराचर जगत् को वह अपने अधीन रखता है, जिससे अव्यवस्था न होने पावे, अतः वह महान् देव स्तुत्य है॥४॥

म॒रुत्व॑न्तमृजी॒षिण॒मोज॑स्वन्तं विर॒प्शिन॑म्। इन्द्रं॑ गी॒र्भिर्ह॑वामहे॥

मानवजातियाँ अपनी-अपनी भाषा से उसकी स्तुति प्रार्थना करें॥५॥

इन्द्रं॑ प्र॒त्नेन॒ मन्म॑ना म॒रुत्व॑न्तं हवामहे। अ॒स्य सोम॑स्य पी॒तये॑॥

सोम=संसार=“षूङ् प्राणिगर्भविमोचने” ईश्वर इस जगत् की पुत्रवत् उत्पत्ति और पालन करता है, अतः इसको सोम भी कहते हैं। पीति=पा रक्षणे॥६॥

म॒रुत्वाँ॑ इन्द्र मीढ्वः॒ पिबा॒ सोमं॑ शतक्रतो। अ॒स्मिन्य॒ज्ञे पु॑रुष्टुत॥

इस जगत् में सृजन, पालन, दया, रक्षा परस्पर साहाय्य और संहार आदि व्यापार हो रहे हैं, वे सब ही ईश्वरीय यज्ञ हैं। इसको हे मनुष्यों! तुम भी पूर्ण करो॥७॥

तुभ्येदि॑न्द्र म॒रुत्व॑ते सु॒ताः सोमा॑सो अद्रिवः। हृ॒दा हू॑यन्त उ॒क्थिनः॑॥

ईश्वर ने इन पदार्थों को बनाया है, अतः ये भी प्रशंसनीय हैं। इनके आदर से उसका आदर होता है॥८॥

पिबेदि॑न्द्र म॒रुत्स॑खा सु॒तं सोमं॒ दिवि॑ष्टिषु। वज्रं॒ शिशा॑न॒ ओज॑सा॥

ईश्वर जिस कारण सकल आत्माओं का सखा है और ये आत्मा भोज्यादि पदार्थों के विना नहीं रह सकते, अतः पदार्थों की रक्षा करना उसका कर्त्तव्य है॥९॥

उ॒त्तिष्ठ॒न्नोज॑सा स॒ह पी॒त्वी शिप्रे॑ अवेपयः। सोम॑मिन्द्र च॒मू सु॒तम्॥

वही प्रभु सबको बल और शक्ति देता और वही रक्षक है, अन्य नहीं॥१०॥

अनु॑ त्वा॒ रोद॑सी उ॒भे क्रक्ष॑माणमकृपेताम्। इन्द्र॒ यद्द॑स्यु॒हाभ॑वः॥

जब-जब मनुष्य के ऊपर आपत्तियाँ आकर डरा जाएँ, तब-तब उसको प्रत्येक नरनारी धन्यवाद दे, उसकी कीर्ति गावे और परस्पर साहाय्य कर ईश्वर को समर्पण करे॥११॥

वाच॑म॒ष्टाप॑दीम॒हं नव॑स्रक्तिमृत॒स्पृश॑म्। इन्द्रा॒त्परि॑ त॒न्वं॑ ममे॥

ज॒ज्ञा॒नो नु श॒तक्र॑तु॒र्वि पृ॑च्छ॒दिति॑ मा॒तर॑म्। क उ॒ग्राः के ह॑ शृण्विरे॥

राजा को उचित है कि सभा के द्वारा देश के सम्पूर्ण वृत्तान्त और दशाएँ अवगत करे और अपने शत्रु-मित्र को पहिचाने॥१॥

आदीं॑ शव॒स्य॑ब्रवीदौर्णवा॒भम॑ही॒शुव॑म्। ते पु॑त्र सन्तु नि॒ष्टुरः॑॥

राजा को उचित है कि प्रजा में उपद्रवकारी जनों को सदा निरीक्षण में रक्खे और उन्हें सुशिक्षित बनावे॥२॥

समित्तान्वृ॑त्र॒हाखि॑द॒त्खे अ॒राँ इ॑व॒ खेद॑या। प्रवृ॑द्धो दस्यु॒हाभ॑वत्॥

राजा निरालस्य होकर प्रजाओं के सम्पूर्ण विघ्नों को दूर करने के लिये पूर्ण चेष्टा करे, तभी वह प्रजाप्रिय हो सकता है॥३॥

एक॑या प्रति॒धापि॑बत्सा॒कं सरां॑सि त्रिं॒शत॑म्। इन्द्रः॒ सोम॑स्य काणु॒का॥

अ॒भि ग॑न्ध॒र्वम॑तृणदबु॒ध्नेषु॒ रज॒स्स्वा। इन्द्रो॑ ब्र॒ह्मभ्य॒ इद्वृ॒धे॥

राजा का यह एक मुख्य कार्य्य है कि धर्म्म के प्रचारार्थ तद्विरोधियों का शासन किया करे, परन्तु इसके पूर्व धर्म्म क्या वस्तु है, इसको अपने अनुभव और विज्ञान-बल से निश्चित करे॥५॥

निरा॑विध्यद्गि॒रिभ्य॒ आ धा॒रय॑त्प॒क्वमो॑द॒नम्। इन्द्रो॑ बु॒न्दं स्वा॑ततम्॥

गिरि=यह शब्द उपलक्षक है। बहुत से दुष्ट पर्वतादि अगम्य स्थान में जा छिपते हैं, वहाँ भी उन्हें न रहने देवें और जब-जब प्रजाओं में अन्न की विकलता होवे, तब-तब राजा उसका पूरा प्रबन्ध करे॥६॥

श॒तब्र॑ध्न॒ इषु॒स्तव॑ स॒हस्र॑पर्ण॒ एक॒ इत्। यमि॑न्द्र चकृ॒षे युज॑म्॥

राजा के सर्व आयुध तीक्ष्ण और स्थायी हों॥७॥

तेन॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र॒ नृभ्यो॒ नारि॑भ्यो॒ अत्त॑वे। स॒द्यो जा॒त ऋ॑भुष्ठिर॥

जब-जब दुर्भिक्ष आदि आपत्ति आवे, तब-तब राजा उसके निवारण का पूरा प्रबन्ध करे॥८॥

ए॒ता च्यौ॒त्नानि॑ ते कृ॒ता वर्षि॑ष्ठानि॒ परी॑णसा। हृ॒दा वी॒ड्व॑धारयः॥

जो राजा मन में दृढ़ संकल्प रखता है, वह उत्तमोत्तम कार्य्य करके दिखलाता है॥९॥

विश्वेत्ता विष्णु॒राभ॑रदुरुक्र॒मस्त्वेषि॑तः। श॒तं म॑हि॒षान्क्षी॑रपा॒कमो॑द॒नं व॑रा॒हमिन्द्र॑ एमु॒षम्॥

मेघ से घासों और अन्नों की वृद्धि होती है, उनसे पशुओं की और पशुओं से दूध दही आदि की। जिसके राज्य में सदा वर्षा होती है और मनुष्य निरामय सुखी हों, तो समझना कि राजा धर्मात्मा है॥१०॥

तु॒वि॒क्षं ते॒ सुकृ॑तं सू॒मयं॒ धनुः॑ सा॒धुर्बु॒न्दो हि॑र॒ण्ययः॑। उ॒भा ते॑ बा॒हू रण्या॒ सुसं॑स्कृत ऋदू॒पे चि॑दृदू॒वृधा॑॥

राज्याधीश के सर्व आयुध प्रजारक्षक हों और शरीर मन और धन उनके ही हितकारी हों। अर्थात् राजा कभी स्वार्थी भोगविलासी और आलसी न हो॥११॥

पु॒रो॒ळाशं॑ नो॒ अन्ध॑स॒ इन्द्र॑ स॒हस्र॒मा भ॑र। श॒ता च॑ शूर॒ गोना॑म्॥

ईश्वर सर्व पदार्थ का दाता है, अतः अपनी आवश्यक वस्तु उससे माँगनी चाहिये॥१॥

आ नो॑ भर॒ व्यञ्ज॑नं॒ गामश्व॑म॒भ्यञ्ज॑नम्। सचा॑ म॒ना हि॑र॒ण्यया॑॥

जो आवश्यक वस्तु हों, वे ही ईश्वर से माँगें॥२॥

उ॒त नः॑ कर्ण॒शोभ॑ना पु॒रूणि॑ धृष्ण॒वा भ॑र। त्वं हि शृ॑ण्वि॒षे व॑सो॥

जो ईश सबको वास देता है और प्राणियों पर दया रखता है, वही प्रार्थनीय है॥३॥

नकीं॑ वृधी॒क इ॑न्द्र ते॒ न सु॒षा न सु॒दा उ॒त। नान्यस्त्वच्छू॑र वा॒घतः॑॥

ईश्वर से बढ़कर कोई जीव नहीं, अतः वही उपास्यदेव है॥४॥

नकी॒मिन्द्रो॒ निक॑र्तवे॒ न श॒क्रः परि॑शक्तवे। विश्वं॑ शृणोति॒ पश्य॑ति॥

जिस कारण वह सर्वद्रष्टा सर्वश्रोता है, अतः उसको कोई भी परास्त नहीं करता। हे मनुष्यों! उसी की उपासना करो॥५॥

स म॒न्युं मर्त्या॑ना॒मद॑ब्धो॒ नि चि॑कीषते। पु॒रा नि॒दश्चि॑कीषते॥

जिस हेतु ईश्वर सर्वज्ञ और सर्वान्तर्य्यामी है, अतः सबके हृदय की बात जान शुभाशुभ फल देता है। इस हेतु हृदय में भी किसी का अनिष्टचिन्तन न करे॥६॥

क्रत्व॒ इत्पू॒र्णमु॒दरं॑ तु॒रस्या॑स्ति विध॒तः। वृ॒त्र॒घ्नः सो॑म॒पाव्नः॑॥

परमात्मा मनुष्य के सुकर्म से ही प्रसन्न होता है, इसलिये उसकी इच्छा के अनुसार मनुष्य सन्मार्ग पर चले॥७॥

त्वे वसू॑नि॒ संग॑ता॒ विश्वा॑ च सोम॒ सौभ॑गा। सु॒दात्वप॑रिह्वृता॥

जिस कारण सम्पूर्ण संसार का अधिपति वह परमात्मा है, अतः उसके लिये दान देना कठिन नहीं। यदि हम मानव अन्तःकरण से अपना अभीष्ट माँगें, तो वह अवश्य उसको पूर्ण करेगा॥८॥

त्वामिद्य॑व॒युर्मम॒ कामो॑ ग॒व्युर्हि॑रण्य॒युः। त्वाम॑श्व॒युरेष॑ते॥

हम लोगों की इच्छा सब पदार्थ चाहती है, यह मनुष्य का स्वाभाविक गुण है॥९॥

तवेदि॑न्द्रा॒हमा॒शसा॒ हस्ते॒ दात्रं॑ च॒ना द॑दे। दि॒नस्य॑ वा मघव॒न्त्सम्भृ॑तस्य वा पू॒र्धि यव॑स्य का॒शिना॑॥

परमात्मा से हम मनुष्य उतने ही पदार्थ माँगें, जिनसे हम अपना निर्वाह अच्छी तरह कर सकें॥१०॥

अ॒यं कृ॒त्नुरगृ॑भीतो विश्व॒जिदु॒द्भिदित्सोमः॑। ऋषि॒र्विप्रः॒ काव्ये॑न॥

परमात्मा सर्वगुणसम्पन्न है, अतः वही स्तुत्य और प्रार्थनीय है॥१॥

अ॒भ्यू॑र्णोति॒ यन्न॒ग्नं भि॒षक्ति॒ विश्वं॒ यत्तु॒रम्। प्रेम॒न्धः ख्य॒न्निः श्रो॒णो भू॑त्॥

परमात्मा की अचिन्त्य शक्ति है, इस कारण विपरीत बातें भी होती हैं, इसमें आश्चर्य्य करना नहीं चाहिये॥२॥

त्वं सो॑म तनू॒कृद्भ्यो॒ द्वेषो॑भ्यो॒ऽन्यकृ॑तेभ्यः। उ॒रु य॒न्तासि॒ वरू॑थम्॥

जो परमात्मा की आज्ञा पर चलते हैं, वे ईर्ष्या, द्वेष आदियों से स्वयं रहित हो जाते हैं, इसलिये उनकी भी कोई निन्दा नहीं करता। इस प्रकार परमात्मा सज्जनों को दुष्टता से बचाते रहते हैं॥३॥

त्वं चि॒त्ती तव॒ दक्षै॑र्दि॒व आ पृ॑थि॒व्या ऋ॑जीषिन्। यावी॑र॒घस्य॑ चि॒द्द्वेषः॑॥

इससे यह शिक्षा दी जाती है कि मनुष्यमात्र द्वेष और निन्दा आदि अवगुण त्याग दे, तब ही जगत् का कल्याण है॥४॥

अ॒र्थिनो॒ यन्ति॒ चेदर्थं॒ गच्छा॒निद्द॒दुषो॑ रा॒तिम्। व॒वृ॒ज्युस्तृष्य॑तः॒ काम॑म्॥

हे मनुष्यों! तुम परस्पर साहाय्य करो। न जाने तुम्हारे ऊपर भी अचिन्त्य आपत्ति आवे और सहायता की आकाङ्क्षा हो, इसलिये परस्पर प्रेम और भ्रातृभाव से वर्ताव करो॥५॥

वि॒दद्यत्पू॒र्व्यं न॒ष्टमुदी॑मृता॒युमी॑रयत्। प्रेमायु॑स्तारी॒दती॑र्णम्॥

उपासक धैर्य्य से ईश्वर की उपासना करें, सज्जनों की रक्षा, अपनी आयु बढ़ावें॥६॥

सु॒शेवो॑ नो मृळ॒याकु॒रदृ॑प्तक्रतुरवा॒तः। भवा॑ नः सोम॒ शं हृ॒दे॥

जब उपासना द्वारा परमात्मा हृदय में विराजमान होता है, तब ही वह सुखकारी होता है॥७॥

मा नः॑ सोम॒ सं वी॑विजो॒ मा वि बी॑भिषथा राजन्। मा नो॒ हार्दि॑ त्वि॒षा व॑धीः॥

मनुष्य जब पाप और अन्याय करता है, तब ही उसके हृदय में भय उत्पन्न होता और क्षुधा से शरीर जलने लगता है, इसलिये वैसा काम न करे॥८॥

अव॒ यत्स्वे स॒धस्थे॑ दे॒वानां॑ दुर्म॒तीरीक्षे॑। राज॒न्नप॒ द्विषः॑ सेध॒ मीढ्वो॒ अप॒ स्रिधः॑ सेध॥

हम लोग जब-जब सज्जनों को निन्दित होते हुए देखें, तो उचित है कि उन निन्दकों को उचित दण्ड देवें॥९॥

न॒ह्य१॒॑न्यं ब॒ळाक॑रं मर्डि॒तारं॑ शतक्रतो। त्वं न॑ इन्द्र मृळय॥

ईश्वर ही जीवमात्र का सुखकारी होने के कारण सेव्य और स्तुत्य है॥१॥

यो नः॒ शश्व॑त्पु॒रावि॒थामृ॑ध्रो॒ वाज॑सातये। स त्वं न॑ इन्द्र मृळय॥

ईश्वर सदा जीवों की रक्षा किया करता है, इसलिये अन्तःकरण से अपने अभीष्ट की प्राप्ति के लिये उससे प्रार्थना करे॥२॥

किम॒ङ्ग र॑ध्र॒चोद॑नः सुन्वा॒नस्या॑वि॒तेद॑सि। कु॒वित्स्वि॑न्द्र णः॒ शकः॑॥

वह देव दीनों और उपासकों की रक्षा किया करता है, अतः क्या वह हमारी रक्षा न करेगा॥३॥

इन्द्र॒ प्र णो॒ रथ॑मव प॒श्चाच्चि॒त्सन्त॑मद्रिवः। पु॒रस्ता॑देनं मे कृधि॥

महा संग्राम में विजयप्राप्ति के लिये उसी से प्रार्थना करे॥४॥

हन्तो॒ नु किमा॑ससे प्रथ॒मं नो॒ रथं॑ कृधि। उ॒प॒मं वा॑ज॒यु श्रवः॑॥

हम इस तरह ईश्वर से प्रार्थना करें कि महासंग्राम में भी विजयी होवें॥५॥

अवा॑ नो वाज॒युं रथं॑ सु॒करं॑ ते॒ किमित्परि॑। अ॒स्मान्त्सु जि॒ग्युष॑स्कृधि॥

ईश्वर हम लोगों के रथ को विजयी और हमको विजेता बनावे॥६॥

इन्द्र॒ दृह्य॑स्व॒ पूर॑सि भ॒द्रा त॑ एति निष्कृ॒तम्। इ॒यं धीॠ॒त्विया॑वती॥

यह स्वाभाविक बात है कि जीवों का झुकाव उस परमात्मा की ओर है, इसलिये प्रत्येक विद्वान् का समग्र शुभकर्म उसी की ओर और उसी के उद्देश्य से होता है॥७॥

मा सी॑मव॒द्य आ भा॑गु॒र्वी काष्ठा॑ हि॒तं धन॑म्। अ॒पावृ॑क्ता अर॒त्नयः॑॥

प्रत्येक मनुष्य को उचित है कि किसी स्वार्थवश किसी की निन्दा वा स्तुति न करे, अन्यथा संसार में अनेक अशान्तियाँ फैलती हैं॥८॥

तु॒रीयं॒ नाम॑ य॒ज्ञियं॑ य॒दा कर॒स्तदु॑श्मसि। आदित्पति॑र्न ओहसे॥

पितृनाम, मातृनाम, आचार्यनाम और यज्ञसम्बन्धी नाम ये चार नाम होते हैं। सोमयाज आदि यज्ञिय नाम हैं। मनुष्य जब शुभकर्म में प्रवेश करता है, तब से ही ईश्वर को अपना स्वामी समझने लगता है॥९॥

अवी॑वृधद्वो अमृता॒ अम॑न्दीदेक॒द्यूर्दे॑वा उ॒त याश्च॑ देवीः। तस्मा॑ उ॒ राधः॑ कृणुत प्रश॒स्तं प्रा॒तर्म॒क्षू धि॒याव॑सुर्जगम्यात्॥

सूक्तम्

आ तू न॑ इन्द्र क्षु॒मन्तं॑ चि॒त्रं ग्रा॒भं सं गृ॑भाय। म॒हा॒ह॒स्ती दक्षि॑णेन॥

वेद आरोप करके कहीं वर्णन करते हैं, अतः यहाँ हस्त का निरूपण है। ज्ञानादिक जो प्रशस्त धन है, उसकी याचना उससे करनी चाहिये॥१॥

वि॒द्मा हि त्वा॑ तुविकू॒र्मिं तु॒विदे॑ष्णं तु॒वीम॑घम्। तु॒वि॒मा॒त्रमवो॑भिः॥

ईश्वर सर्वशक्तिमान् सर्वधन सर्वदाता है, अतः वही प्रार्थ्य और स्तुत्य है॥२॥

न॒हि त्वा॑ शूर दे॒वा न मर्ता॑सो॒ दित्स॑न्तम्। भी॒मं न गां वा॒रय॑न्ते॥

वह ईश्वर सबसे बलवान् है और अपने कार्य्य में परम स्वतन्त्र है, अतः वहाँ किसी की शक्ति काम नहीं करती॥३॥

एतो॒ न्विन्द्रं॒ स्तवा॒मेशा॑नं॒ वस्वः॑ स्व॒राज॑म्। न राध॑सा मर्धिषन्नः॥

जो जन ईश्वर में विश्वास कर उसकी आज्ञा पर चलता रहता है, उसको बाह्य या आन्तरिक बाधा नहीं पहुँच सकती॥४॥

प्र स्तो॑ष॒दुप॑ गासिष॒च्छ्रव॒त्साम॑ गी॒यमा॑नम्। अ॒भि राध॑सा जुगुरत्॥

सब प्रकार उसमें मन लगावें, यह इसका आशय है॥५॥

आ नो॑ भर॒ दक्षि॑णेना॒भि स॒व्येन॒ प्र मृ॑श। इन्द्र॒ मा नो॒ वसो॒र्निर्भा॑क्॥

यहाँ पुरुषत्व का आरोप करके वर्णन किया गया है, इसलिये दक्षिण और सव्य शब्द का प्रयोग है। ईश्वर हम लोगों का चारों ओर से भरण-पोषण कर रहा है और विस्तृत धन और वास दे रहा है, अतः वही मनुष्यों का पूज्य देव है॥६॥

उप॑ क्रम॒स्वा भ॑र धृष॒ता धृ॑ष्णो॒ जना॑नाम्। अदा॑शूष्टरस्य॒ वेदः॑॥

धनसम्पन्न रहने पर भी जो असमर्थों को नहीं देता, उसका धन नष्ट हो जाय॥७॥

इन्द्र॒ य उ॒ नु ते॒ अस्ति॒ वाजो॒ विप्रे॑भिः॒ सनि॑त्वः। अ॒स्माभिः॒ सु तं स॑नुहि॥

सब कोई भगवान् से यह प्रार्थना करें कि प्रत्येक मनुष्य को तुल्य अधिकार मिले॥८॥

स॒द्यो॒जुव॑स्ते॒ वाजा॑ अ॒स्मभ्यं॑ वि॒श्वश्च॑न्द्राः। वशै॑श्च म॒क्षू ज॑रन्ते॥

ईश्वर हम लोगों को वह धन दे, जिससे जगत् में उपकार आनन्द हो॥९॥

आ प्र द्र॑व परा॒वतो॑ऽर्वा॒वत॑श्च वृत्रहन्। मध्वः॒ प्रति॒ प्रभ॑र्मणि॥

ती॒व्राः सोमा॑स॒ आ ग॑हि सु॒तासो॑ मादयि॒ष्णवः॑। पिबा॑ द॒धृग्यथो॑चि॒षे॥

इ॒षा म॑न्द॒स्वादु॒ तेऽरं॒ वरा॑य म॒न्यवे॑। भुव॑त्त इन्द्र॒ शं हृ॒दे॥

आ त्व॑शत्र॒वा ग॑हि॒ न्यु१॒॑क्थानि॑ च हूयसे। उ॒प॒मे रो॑च॒ने दि॒वः॥

तुभ्या॒यमद्रि॑भिः सु॒तो गोभिः॑ श्री॒तो मदा॑य॒ कम्। प्र सोम॑ इन्द्र हूयते॥

इन्द्र॑ श्रु॒धि सु मे॒ हव॑म॒स्मे सु॒तस्य॒ गोम॑तः। वि पी॒तिं तृ॒प्तिम॑श्नुहि॥

य इ॑न्द्र चम॒सेष्वा सोम॑श्च॒मूषु॑ ते सु॒तः। पिबेद॑स्य॒ त्वमी॑शिषे॥

यो अ॒प्सु च॒न्द्रमा॑ इव॒ सोम॑श्च॒मूषु॒ ददृ॑शे। पिबेद॑स्य॒ त्वमी॑शिषे॥

यं ते॑ श्ये॒नः प॒दाभ॑रत्ति॒रो रजां॒स्यस्पृ॑तम्। पिबेद॑स्य॒ त्वमी॑शिषे॥

दे॒वाना॒मिदवो॑ म॒हत्तदा वृ॑णीमहे व॒यम्। वृष्णा॑म॒स्मभ्य॑मू॒तये॑॥

ते नः॑ सन्तु॒ युजः॒ सदा॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा। वृ॒धास॑श्च॒ प्रचे॑तसः॥

अति॑ नो विष्पि॒ता पु॒रु नौ॒भिर॒पो न प॑र्षथ। यू॒यमृ॒तस्य॑ रथ्यः॥

वा॒मं नो॑ अस्त्वर्यमन्वा॒मं व॑रुण॒ शंस्य॑म्। वा॒मं ह्या॑वृणी॒महे॑॥

वा॒मस्य॒ हि प्र॑चेतस॒ ईशा॑नाशो रिशादसः। नेमा॑दित्या अ॒घस्य॒ यत्॥

व॒यमिद्वः॑ सुदानवः क्षि॒यन्तो॒ यान्तो॒ अध्व॒न्ना। देवा॑ वृ॒धाय॑ हूमहे॥

अधि॑ न इन्द्रैषां॒ विष्णो॑ सजा॒त्या॑नाम्। इ॒ता मरु॑तो॒ अश्वि॑ना॥

प्र भ्रा॑तृ॒त्वं सु॑दान॒वोऽध॑ द्वि॒ता स॑मा॒न्या। मा॒तुर्गर्भे॑ भरामहे॥

यू॒यं हि ष्ठा सु॑दानव॒ इन्द्र॑ज्येष्ठा अ॒भिद्य॑वः। अधा॑ चिद्व उ॒त ब्रु॑वे॥

प्रेष्ठं॑ वो॒ अति॑थिं स्तु॒षे मि॒त्रमि॑व प्रि॒यम्। अ॒ग्निं रथं॒ न वेद्य॑म्॥

क॒विमि॑व॒ प्रचे॑तसं॒ यं दे॒वासो॒ अध॑ द्वि॒ता। नि मर्त्ये॑ष्वाद॒धुः॥

त्वं य॑विष्ठ दा॒शुषो॒ नॄँः पा॑हि शृणु॒धी गिरः॑। रक्षा॑ तो॒कमु॒त त्मना॑॥

कया॑ ते अग्ने अङ्गिर॒ ऊर्जो॑ नपा॒दुप॑स्तुतिम्। वरा॑य देव म॒न्यवे॑॥

दाशे॑म॒ कस्य॒ मन॑सा य॒ज्ञस्य॑ सहसो यहो। कदु॑ वोच इ॒दं नमः॑॥

अधा॒ त्वं हि न॒स्करो॒ विश्वा॑ अ॒स्मभ्यं॑ सुक्षि॒तीः। वाज॑द्रविणसो॒ गिरः॑॥

कस्य॑ नू॒नं परी॑णसो॒ धियो॑ जिन्वसि दम्पते। गोषा॑ता॒ यस्य॑ ते॒ गिरः॑॥

तं म॑र्जयन्त सु॒क्रतुं॑ पुरो॒यावा॑नमा॒जिषु॑। स्वेषु॒ क्षये॑षु वा॒जिन॑म्॥

क्षेति॒ क्षेमे॑भिः सा॒धुभि॒र्नकि॒र्यं घ्नन्ति॒ हन्ति॒ यः। अग्ने॑ सु॒वीर॑ एधते॥

आ मे॒ हवं॑ नास॒त्याश्वि॑ना॒ गच्छ॑तं यु॒वम्। मध्वः॒ सोम॑स्य पी॒तये॑॥

इ॒मं मे॒ स्तोम॑मश्विने॒मं मे॑ शृणुतं॒ हव॑म्। मध्वः॒ सोम॑स्य पी॒तये॑॥

अ॒यं वां॒ कृष्णो॑ अश्विना॒ हव॑ते वाजिनीवसू। मध्वः॒ सोम॑स्य पी॒तये॑॥

शृ॒णु॒तं ज॑रि॒तुर्हवं॒ कृष्ण॑स्य स्तुव॒तो न॑रा। मध्वः॒ सोम॑स्य पी॒तये॑॥

छ॒र्दिर्य॑न्त॒मदा॑भ्यं॒ विप्रा॑य स्तुव॒ते न॑रा। मध्वः॒ सोम॑स्य पी॒तये॑॥

गच्छ॑तं दा॒शुषो॑ गृ॒हमि॒त्था स्तु॑व॒तो अ॑श्विना। मध्वः॒ सोम॑स्य पी॒तये॑॥

यु॒ञ्जाथां॒ रास॑भं॒ रथे॑ वी॒ड्व॑ङ्गे वृषण्वसू। मध्वः॒ सोम॑स्य पी॒तये॑॥

त्रि॒व॒न्धु॒रेण॑ त्रि॒वृता॒ रथे॒ना या॑तमश्विना। मध्वः॒ सोम॑स्य पी॒तये॑॥

नू मे॒ गिरो॑ नास॒त्याश्वि॑ना॒ प्राव॑तं यु॒वम्। मध्वः॒ सोम॑स्य पी॒तये॑॥

उ॒भा हि द॒स्रा भि॒षजा॑ मयो॒भुवो॒भा दक्ष॑स्य॒ वच॑सो बभू॒वथुः॑। ता वां॒ विश्व॑को हवते तनूकृ॒थे मा नो॒ वि यौ॑ष्टं स॒ख्या मु॒मोच॑तम्॥

क॒था नू॒नं वां॒ विम॑ना॒ उप॑ स्तवद्यु॒वं धियं॑ ददथु॒र्वस्य॑इष्टये। ता वां॒ विश्व॑को हवते तनूकृ॒थे मा नो॒ वि यौ॑ष्टं स॒ख्या मु॒मोच॑तम्॥

यु॒वं हि ष्मा॑ पुरुभुजे॒ममे॑ध॒तुं वि॑ष्णा॒प्वे॑ द॒दथु॒र्वस्य॑इष्टये। ता वां॒ विश्व॑को हवते तनूकृ॒थे मा नो॒ वि यौ॑ष्टं स॒ख्या मु॒मोच॑तम्॥

उ॒त त्यं वी॒रं ध॑न॒सामृ॑जी॒षिणं॑ दू॒रे चि॒त्सन्त॒मव॑से हवामहे। यस्य॒ स्वादि॑ष्ठा सुम॒तिः पि॒तुर्य॑था॒ मा नो॒ वि यौ॑ष्टं स॒ख्या मु॒मोच॑तम्॥

ऋ॒तेन॑ दे॒वः स॑वि॒ता श॑मायत ऋ॒तस्य॒ शृङ्ग॑मुर्वि॒या वि प॑प्रथे। ऋ॒तं सा॑साह॒ महि॑ चित्पृतन्य॒तो मा नो॒ वि यौ॑ष्टं स॒ख्या मु॒मोच॑तम्॥

द्यु॒म्नी वां॒ स्तोमो॑ अश्विना॒ क्रिवि॒र्न सेक॒ आ ग॑तम्। मध्वः॑ सु॒तस्य॒ स दि॒वि प्रि॒यो न॑रा पा॒तं गौ॒रावि॒वेरि॑णे॥

पिब॑तं घ॒र्मं मधु॑मन्तमश्वि॒ना ब॒र्हिः सी॑दतं नरा। ता म॑न्दसा॒ना मनु॑षो दुरो॒ण आ नि पा॑तं॒ वेद॑सा॒ वयः॑॥

आ वां॒ विश्वा॑भिरू॒तिभिः॑ प्रि॒यमे॑धा अहूषत। ता व॒र्तिर्या॑त॒मुप॑ वृ॒क्तब॑र्हिषो॒ जुष्टं॑ य॒ज्ञं दिवि॑ष्टिषु॥

पिब॑तं॒ सोमं॒ मधु॑मन्तमश्वि॒ना ब॒र्हिः सी॑दतं सु॒मत्। ता वा॑वृधा॒ना उप॑ सुष्टु॒तिं दि॒वो ग॒न्तं गौ॒रावि॒वेरि॑णम्॥

आ नू॒नं या॑तमश्वि॒नाश्वे॑भिः प्रुषि॒तप्सु॑भिः। दस्रा॒ हिर॑ण्यवर्तनी शुभस्पती पा॒तं सोम॑मृतावृधा॥

व॒यं हि वां॒ हवा॑महे विप॒न्यवो॒ विप्रा॑सो॒ वाज॑सातये। ता व॒ल्गू द॒स्रा पु॑रु॒दंस॑सा धि॒याश्वि॑ना श्रु॒ष्ट्या ग॑तम्॥

तं वो॑ द॒स्ममृ॑ती॒षहं॒ वसो॑र्मन्दा॒नमन्ध॑सः। अ॒भि व॒त्सं न स्वस॑रेषु धे॒नव॒ इन्द्रं॑ गी॒र्भिर्न॑वामहे॥

द्यु॒क्षं सु॒दानुं॒ तवि॑षीभि॒रावृ॑तं गि॒रिं न पु॑रु॒भोज॑सम्। क्षु॒मन्तं॒ वाजं॑ श॒तिनं॑ सह॒स्रिणं॑ म॒क्षू गोम॑न्तमीमहे॥

न त्वा॑ बृ॒हन्तो॒ अद्र॑यो॒ वर॑न्त इन्द्र वी॒ळवः॑। यद्दित्स॑सि स्तुव॒ते माव॑ते॒ वसु॒ नकि॒ष्टदा मि॑नाति ते॥

योद्धा॑सि॒ क्रत्वा॒ शव॑सो॒त दं॒सना॒ विश्वा॑ जा॒ताभि म॒ज्मना॑। आ त्वा॒यम॒र्क ऊ॒तये॑ ववर्तति॒ यं गोत॑मा॒ अजी॑जनन्॥

प्र हि रि॑रि॒क्ष ओज॑सा दि॒वो अन्ते॑भ्य॒स्परि॑। न त्वा॑ विव्याच॒ रज॑ इन्द्र॒ पार्थि॑व॒मनु॑ स्व॒धां व॑वक्षिथ॥

नकिः॒ परि॑ष्टिर्मघवन्म॒घस्य॑ ते॒ यद्दा॒शुषे॑ दश॒स्यसि॑। अ॒स्माकं॑ बोध्यु॒चथ॑स्य चोदि॒ता मंहि॑ष्ठो॒ वाज॑सातये॥

बृ॒हदिन्द्रा॑य गायत॒ मरु॑तो वृत्र॒हन्त॑मम्। येन॒ ज्योति॒रज॑नयन्नृता॒वृधो॑ दे॒वं दे॒वाय॒ जागृ॑वि॥

अपा॑धमद॒भिश॑स्तीरशस्ति॒हाथेन्द्रो॑ द्यु॒म्न्याभ॑वत्। दे॒वास्त॑ इन्द्र स॒ख्याय॑ येमिरे॒ बृह॑द्भानो॒ मरु॑द्गण॥

प्र व॒ इन्द्रा॑य बृह॒ते मरु॑तो॒ ब्रह्मा॑र्चत। वृ॒त्रं ह॑नति वृत्र॒हा श॒तक्र॑तु॒र्वज्रे॑ण श॒तप॑र्वणा॥

अ॒भि प्र भ॑र धृष॒ता धृ॑षन्मनः॒ श्रव॑श्चित्ते असद्बृ॒हत्। अर्ष॒न्त्वापो॒ जव॑सा॒ वि मा॒तरो॒ हनो॑ वृ॒त्रं जया॒ स्वः॑॥

यज्जाय॑था अपूर्व्य॒ मघ॑वन्वृत्र॒हत्या॑य। तत्पृ॑थि॒वीम॑प्रथय॒स्तद॑स्तभ्ना उ॒त द्याम्॥

तत्ते॑ य॒ज्ञो अ॑जायत॒ तद॒र्क उ॒त हस्कृ॑तिः। तद्विश्व॑मभि॒भूर॑सि॒ यज्जा॒तं यच्च॒ जन्त्व॑म्॥

आ॒मासु॑ प॒क्वमैर॑य॒ आ सूर्यं॑ रोहयो दि॒वि। घ॒र्मं न साम॑न्तपता सुवृ॒क्तिभि॒र्जुष्टं॒ गिर्व॑णसे बृ॒हत्॥

आ नो॒ विश्वा॑सु॒ हव्य॒ इन्द्रः॑ स॒मत्सु॑ भूषतु। उप॒ ब्रह्मा॑णि॒ सव॑नानि वृत्र॒हा प॑रम॒ज्या ऋची॑षमः॥

त्वं दा॒ता प्र॑थ॒मो राध॑साम॒स्यसि॑ स॒त्य ई॑शान॒कृत्। तु॒वि॒द्यु॒म्नस्य॒ युज्या वृ॑णीमहे पु॒त्रस्य॒ शव॑सो म॒हः॥

ब्रह्मा॑ त इन्द्र गिर्वणः क्रि॒यन्ते॒ अन॑तिद्भुता। इ॒मा जु॑षस्व हर्यश्व॒ योज॒नेन्द्र॒ या ते॒ अम॑न्महि॥

त्वं हि स॒त्यो म॑घव॒न्नना॑नतो वृ॒त्रा भूरि॑ न्यृ॒ञ्जसे॑। स त्वं श॑विष्ठ वज्रहस्त दा॒शुषे॒ऽर्वाञ्चं॑ र॒यिमा कृ॑धि॥

त्वमि॑न्द्र य॒शा अ॑स्यृजी॒षी श॑वसस्पते। त्वं वृ॒त्राणि॑ हंस्यप्र॒तीन्येक॒ इदनु॑त्ता चर्षणी॒धृता॑॥

तमु॑ त्वा नू॒नम॑सुर॒ प्रचे॑तसं॒ राधो॑ भा॒गमि॑वेमहे। म॒हीव॒ कृत्तिः॑ शर॒णा त॑ इन्द्र॒ प्र ते॑ सु॒म्ना नो॑ अश्नवन्॥

क॒न्या॒३॒॑ वार॑वाय॒ती सोम॒मपि॑ स्रु॒तावि॑दत्। अस्तं॒ भर॑न्त्यब्रवी॒दिन्द्रा॑य सुनवै त्वा श॒क्राय॑ सुनवै त्वा॥

अ॒सौ य एषि॑ वीर॒को गृ॒हंगृ॑हं वि॒चाक॑शद्। इ॒मं जम्भ॑सुतं पिब धा॒नाव॑न्तं कर॒म्भिण॑मपू॒पव॑न्तमु॒क्थिन॑म्॥

आ च॒न त्वा॑ चिकित्सा॒मोऽधि॑ च॒न त्वा॒ नेम॑सि। शनै॑रिव शन॒कैरि॒वेन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥

कु॒विच्छक॑त्कु॒वित्कर॑त्कु॒विन्नो॒ वस्य॑स॒स्कर॑त्। कु॒वित्प॑ति॒द्विषो॑ य॒तीरिन्द्रे॑ण सं॒गमा॑महै॥

इ॒मानि॒ त्रीणि॑ वि॒ष्टपा॒ तानी॑न्द्र॒ वि रो॑हय। शिर॑स्त॒तस्यो॒र्वरा॒मादि॒दं म॒ उपो॒दरे॑॥

अ॒सौ च॒ या न॑ उ॒र्वरादि॒मां त॒न्वं१॒॑ मम॑। अथो॑ त॒तस्य॒ यच्छिरः॒ सर्वा॒ ता रो॑म॒शा कृ॑धि॥

खे रथ॑स्य॒ खेऽन॑सः॒ खे यु॒गस्य॑ शतक्रतो। अ॒पा॒लामि॑न्द्र॒ त्रिष्पू॒त्व्यकृ॑णोः॒ सूर्य॑त्वचम्॥

पान्त॒मा वो॒ अन्ध॑स॒ इन्द्र॑म॒भि प्र गा॑यत। वि॒श्वा॒साहं॑ श॒तक्र॑तुं॒ मंहि॑ष्ठं चर्षणी॒नाम्॥

पु॒रु॒हू॒तं पु॑रुष्टु॒तं गा॑था॒न्यं१॒॑ सन॑श्रुतम्। इन्द्र॒ इति॑ ब्रवीतन॥

इन्द्र॒ इन्नो॑ म॒हानां॑ दा॒ता वाजा॑नां नृ॒तुः। म॒हाँ अ॑भि॒ज्ञ्वा य॑मत्॥

अपा॑दु शि॒प्र्यन्ध॑सः सु॒दक्ष॑स्य प्रहो॒षिणः॑। इन्दो॒रिन्द्रो॒ यवा॑शिरः॥

तम्व॒भि प्रार्च॒तेन्द्रं॒ सोम॑स्य पी॒तये॑। तदिद्ध्य॑स्य॒ वर्ध॑नम्॥

अ॒स्य पी॒त्वा मदा॑नां दे॒वो दे॒वस्यौज॑सा। विश्वा॒भि भुव॑ना भुवत्॥

त्यमु॑ वः सत्रा॒साहं॒ विश्वा॑सु गी॒र्ष्वाय॑तम्। आ च्या॑वयस्यू॒तये॑॥

यु॒ध्मं सन्त॑मन॒र्वाणं॑ सोम॒पामन॑पच्युतम्। नर॑मवा॒र्यक्र॑तुम्॥

शिक्षा॑ ण इन्द्र रा॒य आ पु॒रु वि॒द्वाँ ऋ॑चीषम। अवा॑ नः॒ पार्ये॒ धने॑॥

अत॑श्चिदिन्द्र ण॒ उपा या॑हि श॒तवा॑जया। इ॒षा स॒हस्र॑वाजया॥

अया॑म॒ धीव॑तो॒ धियोऽर्व॑द्भिः शक्र गोदरे। जये॑म पृ॒त्सु व॑ज्रिवः॥

व॒यमु॑ त्वा शतक्रतो॒ गावो॒ न यव॑से॒ष्वा। उ॒क्थेषु॑ रणयामसि॥

विश्वा॒ हि म॑र्त्यत्व॒नानु॑का॒मा श॑तक्रतो। अग॑न्म वज्रिन्ना॒शसः॑॥

त्वे सु पु॑त्र शव॒सोऽवृ॑त्र॒न्काम॑कातयः। न त्वामि॒न्द्राति॑ रिच्यते॥

स नो॑ वृष॒न्त्सनि॑ष्ठया॒ सं घो॒रया॑ द्रवि॒त्न्वा। धि॒यावि॑ड्ढि॒ पुरं॑ध्या॥

यस्ते॑ नू॒नं श॑तक्रत॒विन्द्र॑ द्यु॒म्नित॑मो॒ मदः॑। तेन॑ नू॒नं मदे॑ मदेः॥

यस्ते॑ चि॒त्रश्र॑वस्तमो॒ य इ॑न्द्र वृत्र॒हन्त॑मः। य ओ॑जो॒दात॑मो॒ मदः॑॥

वि॒द्मा हि यस्ते॑ अद्रिव॒स्त्वाद॑त्तः सत्य सोमपाः। विश्वा॑सु दस्म कृ॒ष्टिषु॑॥

इन्द्रा॑य॒ मद्व॑ने सु॒तं परि॑ ष्टोभन्तु नो॒ गिरः॑। अ॒र्कम॑र्चन्तु का॒रवः॑॥

यस्मि॒न्विश्वा॒ अधि॒ श्रियो॒ रण॑न्ति स॒प्त सं॒सदः॑। इन्द्रं॑ सु॒ते ह॑वामहे॥

त्रिक॑द्रुकेषु॒ चेत॑नं दे॒वासो॑ य॒ज्ञम॑त्नत। तमिद्व॑र्धन्तु नो॒ गिरः॑॥

आ त्वा॑ विश॒न्त्विन्द॑वः समु॒द्रमि॑व॒ सिन्ध॑वः। न त्वामि॒न्द्राति॑ रिच्यते॥

वि॒व्यक्थ॑ महि॒ना वृ॑षन्भ॒क्षं सोम॑स्य जागृवे। य इ॑न्द्र ज॒ठरे॑षु ते॥

अरं॑ त इन्द्र कु॒क्षये॒ सोमो॑ भवतु वृत्रहन्। अरं॒ धाम॑भ्य॒ इन्द॑वः॥

अर॒मश्वा॑य गायति श्रु॒तक॑क्षो॒ अरं॒ गवे॑। अर॒मिन्द्र॑स्य॒ धाम्ने॑॥

अरं॒ हि ष्म॑ सु॒तेषु॑ णः॒ सोमे॑ष्विन्द्र॒ भूष॑सि। अरं॑ ते शक्र दा॒वने॑॥

प॒रा॒कात्ता॑च्चिदद्रिव॒स्त्वां न॑क्षन्त नो॒ गिरः॑। अरं॑ गमाम ते व॒यम्॥

ए॒वा ह्यसि॑ वीर॒युरे॒वा शूर॑ उ॒त स्थि॒रः। ए॒वा ते॒ राध्यं॒ मनः॑॥

ए॒वा रा॒तिस्तु॑वीमघ॒ विश्वे॑भिर्धायि धा॒तृभिः॑। अधा॑ चिदिन्द्र मे॒ सचा॑॥

मो षु ब्र॒ह्मेव॑ तन्द्र॒युर्भुवो॑ वाजानां पते। मत्स्वा॑ सु॒तस्य॒ गोम॑तः॥

मा न॑ इन्द्रा॒भ्या॒३॒॑दिशः॒ सूरो॑ अ॒क्तुष्वा य॑मन्। त्वा यु॒जा व॑नेम॒ तत्॥

त्वयेदि॑न्द्र यु॒जा व॒यं प्रति॑ ब्रुवीमहि॒ स्पृधः॑। त्वम॒स्माकं॒ तव॑ स्मसि॥

त्वामिद्धि त्वा॒यवो॑ऽनु॒नोनु॑वत॒श्चरा॑न्। सखा॑य इन्द्र का॒रवः॑॥

उद्घेद॒भि श्रु॒ताम॑घं वृष॒भं नर्या॑पसम्। अस्ता॑रमेषि सूर्य॥

नव॒ यो न॑व॒तिं पुरो॑ बि॒भेद॑ बा॒ह्वो॑जसा। अहिं॑ च वृत्र॒हाव॑धीत्॥

स न॒ इन्द्रः॑ शि॒वः सखाश्वा॑व॒द्गोम॒द्यव॑मत्। उ॒रुधा॑रेव दोहते॥

यद॒द्य कच्च॑ वृत्रहन्नु॒दगा॑ अ॒भि सू॑र्य। सर्वं॒ तदि॑न्द्र ते॒ वशे॑॥

यद्वा॑ प्रवृद्ध सत्पते॒ न म॑रा॒ इति॒ मन्य॑से। उ॒तो तत्स॒त्यमित्तव॑॥

ये सोमा॑सः परा॒वति॒ ये अ॑र्वा॒वति॑ सुन्वि॒रे। सर्वाँ॒स्ताँ इ॑न्द्र गच्छसि॥

तमिन्द्रं॑ वाजयामसि म॒हे वृ॒त्राय॒ हन्त॑वे। स वृषा॑ वृष॒भो भु॑वत्॥

इन्द्रः॒ स दाम॑ने कृ॒त ओजि॑ष्ठः॒ स मदे॑ हि॒तः। द्यु॒म्नी श्लो॒की स सो॒म्यः॥

गि॒रा वज्रो॒ न सम्भृ॑तः॒ सब॑लो॒ अन॑पच्युतः। व॒व॒क्ष ऋ॒ष्वो अस्तृ॑तः॥

दु॒र्गे चि॑न्नः सु॒गं कृ॑धि गृणा॒न इ॑न्द्र गिर्वणः। त्वं च॑ मघव॒न्वशः॑॥

यस्य॑ ते॒ नू चि॑दा॒दिशं॒ न मि॒नन्ति॑ स्व॒राज्य॑म्। न दे॒वो नाध्रि॑गु॒र्जनः॑॥

अधा॑ ते॒ अप्र॑तिष्कुतं दे॒वी शुष्मं॑ सपर्यतः। उ॒भे सु॑शिप्र॒ रोद॑सी॥

त्वमे॒तद॑धारयः कृ॒ष्णासु॒ रोहि॑णीषु च। परु॑ष्णीषु॒ रुश॒त्पयः॑॥

वि यदहे॒रध॑ त्वि॒षो विश्वे॑ दे॒वासो॒ अक्र॑मुः। वि॒दन्मृ॒गस्य॒ ताँ अमः॑॥

आदु॑ मे निव॒रो भु॑वद्वृत्र॒हादि॑ष्ट॒ पौंस्य॑म्। अजा॑तशत्रु॒रस्तृ॑तः॥

श्रु॒तं वो॑ वृत्र॒हन्त॑मं॒ प्र शर्धं॑ चर्षणी॒नाम्। आ शु॑षे॒ राध॑से म॒हे॥

अ॒या धि॒या च॑ गव्य॒या पुरु॑णाम॒न्पुरु॑ष्टुत। यत्सोमे॑सोम॒ आभ॑वः॥

बो॒धिन्म॑ना॒ इद॑स्तु नो वृत्र॒हा भूर्या॑सुतिः। शृ॒णोतु॑ श॒क्र आ॒शिष॑म्॥

कया॒ त्वं न॑ ऊ॒त्याभि प्र म॑न्दसे वृषन्। कया॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र॥

कस्य॒ वृषा॑ सु॒ते सचा॑ नि॒युत्वा॑न्वृष॒भो र॑णत्। वृ॒त्र॒हा सोम॑पीतये॥

अ॒भी षु ण॒स्त्वं र॒यिं म॑न्दसा॒नः स॑ह॒स्रिण॑म्। प्र॒य॒न्ता बो॑धि दा॒शुषे॑॥

पत्नी॑वन्तः सु॒ता इ॒म उ॒शन्तो॑ यन्ति वी॒तये॑। अ॒पां जग्मि॑र्निचुम्पु॒णः॥

इ॒ष्टा होत्रा॑ असृक्ष॒तेन्द्रं॑ वृ॒धासो॑ अध्व॒रे। अच्छा॑वभृ॒थमोज॑सा॥

इ॒ह त्या स॑ध॒माद्या॒ हरी॒ हिर॑ण्यकेश्या। वो॒ळ्हाम॒भि प्रयो॑ हि॒तम्॥

तुभ्यं॒ सोमाः॑ सु॒ता इ॒मे स्ती॒र्णं ब॒र्हिर्वि॑भावसो। स्तो॒तृभ्य॒ इन्द्र॒मा व॑ह॥

आ ते॒ दक्षं॒ वि रो॑च॒ना दध॒द्रत्ना॒ वि दा॒शुषे॑। स्तो॒तृभ्य॒ इन्द्र॑मर्चत॥

आ ते॑ दधामीन्द्रि॒यमु॒क्था विश्वा॑ शतक्रतो। स्तो॒तृभ्य॑ इन्द्र मृळय॥

भ॒द्रम्भ॑द्रं न॒ आ भ॒रेष॒मूर्जं॑ शतक्रतो। यदि॑न्द्र मृ॒ळया॑सि नः॥

स नो॒ विश्वा॒न्या भ॑र सुवि॒तानि॑ शतक्रतो। यदि॑न्द्र मृ॒ळया॑सि नः॥

त्वामिद्वृ॑त्रहन्तम सु॒ताव॑न्तो हवामहे। यदि॑न्द्र मृ॒ळया॑सि नः॥

उप॑ नो॒ हरि॑भिः सु॒तं या॒हि म॑दानां पते। उप॑ नो॒ हरि॑भिः सु॒तम्॥

द्वि॒ता यो वृ॑त्र॒हन्त॑मो वि॒द इन्द्रः॑ श॒तक्र॑तुः। उप॑ नो॒ हरि॑भिः सु॒तम्॥

त्वं हि वृ॑त्रहन्नेषां पा॒ता सोमा॑ना॒मसि॑। उप॑ नो॒ हरि॑भिः सु॒तम्॥

इन्द्र॑ इ॒षे द॑दातु न ऋभु॒क्षण॑मृ॒भुं र॒यिम्। वा॒जी द॑दातु वा॒जिन॑म्॥

सूक्तम्

गौर्ध॑यति म॒रुतां॑ श्रव॒स्युर्मा॒ता म॒घोना॑म्। यु॒क्ता वह्नी॒ रथा॑नाम्॥

यस्या॑ दे॒वा उ॒पस्थे॑ व्र॒ता विश्वे॑ धा॒रय॑न्ते। सूर्या॒मासा॑ दृ॒शे कम्॥

तत्सु नो॒ विश्वे॑ अ॒र्य आ सदा॑ गृणन्ति का॒रवः॑। म॒रुतः॒ सोम॑पीतये॥

अस्ति॒ सोमो॑ अ॒यं सु॒तः पिब॑न्त्यस्य म॒रुतः॑। उ॒त स्व॒राजो॑ अ॒श्विना॑॥

पिब॑न्ति मि॒त्रो अ॑र्य॒मा तना॑ पू॒तस्य॒ वरु॑णः। त्रि॒ष॒ध॒स्थस्य॒ जाव॑तः॥

उ॒तो न्व॑स्य॒ जोष॒माँ इन्द्रः॑ सु॒तस्य॒ गोम॑तः। प्रा॒तर्होते॑व मत्सति॥

कद॑त्विषन्त सू॒रय॑स्ति॒र आप॑ इव॒ स्रिधः॑। अर्ष॑न्ति पू॒तद॑क्षसः॥

कद्वो॑ अ॒द्य म॒हानां॑ दे॒वाना॒मवो॑ वृणे। त्मना॑ च द॒स्मव॑र्चसाम्॥

आ ये विश्वा॒ पार्थि॑वानि प॒प्रथ॑न्रोच॒ना दि॒वः। म॒रुतः॒ सोम॑पीतये॥

त्यान्नु पू॒तद॑क्षसो दि॒वो वो॑ मरुतो हुवे। अ॒स्य सोम॑स्य पी॒तये॑॥

त्यान्नु ये वि रोद॑सी तस्त॒भुर्म॒रुतो॑ हुवे। अ॒स्य सोम॑स्य पी॒तये॑॥

त्यं नु मारु॑तं ग॒णं गि॑रि॒ष्ठां वृष॑णं हुवे। अ॒स्य सोम॑स्य पी॒तये॑॥

आ त्वा॒ गिरो॑ र॒थीरि॒वास्थुः॑ सु॒तेषु॑ गिर्वणः। अ॒भि त्वा॒ सम॑नूष॒तेन्द्र॑ व॒त्सं न मा॒तरः॑॥

आ त्वा॑ शु॒क्रा अ॑चुच्यवुः सु॒तास॑ इन्द्र गिर्वणः। पिबा॒ त्व१॒॑स्यान्ध॑स॒ इन्द्र॒ विश्वा॑सु ते हि॒तम्॥

पिबा॒ सोमं॒ मदा॑य॒ कमिन्द्र॑ श्ये॒नाभृ॑तं सु॒तम्। त्वं हि शश्व॑तीनां॒ पती॒ राजा॑ वि॒शामसि॑॥

श्रु॒धी हवं॑ तिर॒श्च्या इन्द्र॒ यस्त्वा॑ सप॒र्यति॑। सु॒वीर्य॑स्य॒ गोम॑तो रा॒यस्पू॑र्धि म॒हाँ अ॑सि॥

इन्द्र॒ यस्ते॒ नवी॑यसीं॒ गिरं॑ म॒न्द्रामजी॑जनत्। चि॒कि॒त्विन्म॑नसं॒ धियं॑ प्र॒त्नामृ॒तस्य॑ पि॒प्युषी॑म्॥

तमु॑ ष्टवाम॒ यं गिर॒ इन्द्र॑मु॒क्थानि॑ वावृ॒धुः। पु॒रूण्य॑स्य॒ पौंस्या॒ सिषा॑सन्तो वनामहे॥

एतो॒ न्विन्द्रं॒ स्तवा॑म शु॒द्धं शु॒द्धेन॒ साम्ना॑। शु॒द्धैरु॒क्थैर्वा॑वृ॒ध्वांसं॑ शु॒द्ध आ॒शीर्वा॑न्ममत्तु॥

इन्द्र॑ शु॒द्धो न॒ आ ग॑हि शु॒द्धः शु॒द्धाभि॑रू॒तिभिः॑। शु॒द्धो र॒यिं नि धा॑रय शु॒द्धो म॑मद्धि सो॒म्यः॥

इन्द्र॑ शु॒द्धो हि नो॑ र॒यिं शु॒द्धो रत्ना॑नि दा॒शुषे॑। शु॒द्धो वृ॒त्राणि॑ जिघ्नसे शु॒द्धो वाजं॑ सिषाससि॥

अ॒स्मा उ॒षास॒ आति॑रन्त॒ याम॒मिन्द्रा॑य॒ नक्त॒मूर्म्याः॑ सु॒वाचः॑। अ॒स्मा आपो॑ मा॒तरः॑ स॒प्त त॑स्थु॒र्नृभ्य॒स्तरा॑य॒ सिन्ध॑वः सुपा॒राः॥

अति॑विद्धा विथु॒रेणा॑ चि॒दस्त्रा॒ त्रिः स॒प्त सानु॒ संहि॑ता गिरी॒णाम्। न तद्दे॒वो न मर्त्य॑स्तुतुर्या॒द्यानि॒ प्रवृ॑द्धो वृष॒भश्च॒कार॑॥

इन्द्र॑स्य॒ वज्र॑ आय॒सो निमि॑श्ल॒ इन्द्र॑स्य बा॒ह्वोर्भूयि॑ष्ठ॒मोजः॑। शी॒र्षन्निन्द्र॑स्य॒ क्रत॑वो निरे॒क आ॒सन्नेष॑न्त॒ श्रुत्या॑ उपा॒के॥

मन्ये॑ त्वा य॒ज्ञियं॑ य॒ज्ञिया॑नां॒ मन्ये॑ त्वा॒ च्यव॑न॒मच्यु॑तानाम्। मन्ये॑ त्वा॒ सत्व॑नामिन्द्र के॒तुं मन्ये॑ त्वा वृष॒भं च॑र्षणी॒नाम्॥

आ यद्वज्रं॑ बा॒ह्वोरि॑न्द्र॒ धत्से॑ मद॒च्युत॒मह॑ये॒ हन्त॒वा उ॑। प्र पर्व॑ता॒ अन॑वन्त॒ प्र गावः॒ प्र ब्र॒ह्माणो॑ अभि॒नक्ष॑न्त॒ इन्द्र॑म्॥

तमु॑ ष्टवाम॒ य इ॒मा ज॒जान॒ विश्वा॑ जा॒तान्यव॑राण्यस्मात्। इन्द्रे॑ण मि॒त्रं दि॑धिषेम गी॒र्भिरुपो॒ नमो॑भिर्वृष॒भं वि॑शेम॥

वृ॒त्रस्य॑ त्वा श्व॒सथा॒दीष॑माणा॒ विश्वे॑ दे॒वा अ॑जहु॒र्ये सखा॑यः। म॒रुद्भि॑रिन्द्र स॒ख्यं ते॑ अ॒स्त्वथे॒मा विश्वाः॒ पृत॑ना जयासि॥

त्रिः ष॒ष्टिस्त्वा॑ म॒रुतो॑ वावृधा॒ना उ॒स्रा इ॑व रा॒शयो॑ य॒ज्ञिया॑सः। उप॒ त्वेमः॑ कृ॒धि नो॑ भाग॒धेयं॒ शुष्मं॑ त ए॒ना ह॒विषा॑ विधेम॥

ति॒ग्ममायु॑धं म॒रुता॒मनी॑कं॒ कस्त॑ इन्द्र॒ प्रति॒ वज्रं॑ दधर्ष। अ॒ना॒यु॒धासो॒ असु॑रा अदे॒वाश्च॒क्रेण॒ ताँ अप॑ वप ऋजीषिन्॥

म॒ह उ॒ग्राय॑ त॒वसे॑ सुवृ॒क्तिं प्रेर॑य शि॒वत॑माय प॒श्वः। गिर्वा॑हसे॒ गिर॒ इन्द्रा॑य पू॒र्वीर्धे॒हि त॒न्वे॑ कु॒विद॒ङ्ग वेद॑त्॥

उ॒क्थवा॑हसे वि॒भ्वे॑ मनी॒षां द्रुणा॒ न पा॒रमी॑रया न॒दीना॑म्। नि स्पृ॑श धि॒या त॒न्वि॑ श्रु॒तस्य॒ जुष्ट॑तरस्य कु॒विद॒ङ्ग वेद॑त्॥

तद्वि॑विड्ढि॒ यत्त॒ इन्द्रो॒ जुजो॑षत्स्तु॒हि सु॑ष्टु॒तिं नम॒सा वि॑वास। उप॑ भूष जरित॒र्मा रु॑वण्यः श्रा॒वया॒ वाचं॑ कु॒विद॒ङ्ग वेद॑त्॥

अव॑ द्र॒प्सो अं॑शु॒मती॑मतिष्ठदिया॒नः कृ॒ष्णो द॒शभिः॑ स॒हस्रैः॑। आव॒त्तमिन्द्रः॒ शच्या॒ धम॑न्त॒मप॒ स्नेहि॑तीर्नृ॒मणा॑ अधत्त॥

द्र॒प्सम॑पश्यं॒ विषु॑णे॒ चर॑न्तमुपह्व॒रे न॒द्यो॑ अंशु॒मत्याः॑। नभो॒ न कृ॒ष्णम॑वतस्थि॒वांस॒मिष्या॑मि वो वृषणो॒ युध्य॑ता॒जौ॥

अध॑ द्र॒प्सो अं॑शु॒मत्या॑ उ॒पस्थेऽधा॑रयत्त॒न्वं॑ तित्विषा॒णः। विशो॒ अदे॑वीर॒भ्या॒३॒॑चर॑न्ती॒र्बृह॒स्पति॑ना यु॒जेन्द्रः॑ ससाहे॥

त्वं ह॒ त्यत्स॒प्तभ्यो॒ जाय॑मानोऽश॒त्रुभ्यो॑ अभवः॒ शत्रु॑रिन्द्र। गू॒ळ्हे द्यावा॑पृथि॒वी अन्व॑विन्दो विभु॒मद्भ्यो॒ भुव॑नेभ्यो॒ रणं॑ धाः॥

त्वं ह॒ त्यद॑प्रतिमा॒नमोजो॒ वज्रे॑ण वज्रिन्धृषि॒तो ज॑घन्थ। त्वं शुष्ण॒स्यावा॑तिरो॒ वध॑त्रै॒स्त्वं गा इ॑न्द्र॒ शच्येद॑विन्दः॥

त्वं ह॒ त्यद्वृ॑षभ चर्षणी॒नां घ॒नो वृ॒त्राणां॑ तवि॒षो ब॑भूथ। त्वं सिन्धूँ॑रसृजस्तस्तभा॒नान्त्वम॒पो अ॑जयो दा॒सप॑त्नीः॥

स सु॒क्रतू॒ रणि॑ता॒ यः सु॒तेष्वनु॑त्तमन्यु॒र्यो अहे॑व रे॒वान्। य एक॒ इन्नर्यपां॑सि॒ कर्ता॒ स वृ॑त्र॒हा प्रतीद॒न्यमा॑हुः॥

स वृ॑त्र॒हेन्द्र॑श्चर्षणी॒धृत्तं सु॑ष्टु॒त्या हव्यं॑ हुवेम। स प्रा॑वि॒ता म॒घवा॑ नोऽधिव॒क्ता स वाज॑स्य श्रव॒स्य॑स्य दा॒ता॥

स वृ॑त्र॒हेन्द्र॑ ऋभु॒क्षाः स॒द्यो ज॑ज्ञा॒नो हव्यो॑ बभूव। कृ॒ण्वन्नपां॑सि॒ नर्या॑ पु॒रूणि॒ सोमो॒ न पी॒तो हव्यः॒ सखि॑भ्यः॥

या इ॑न्द्र॒ भुज॒ आभ॑रः॒ स्व॑र्वाँ॒ असु॑रेभ्यः। स्तो॒तार॒मिन्म॑घवन्नस्य वर्धय॒ ये च॒ त्वे वृ॒क्तब॑र्हिषः॥

यमि॑न्द्र दधि॒षे त्वमश्वं॒ गां भा॒गमव्य॑यम्। यज॑माने सुन्व॒ति दक्षि॑णावति॒ तस्मि॒न्तं धे॑हि॒ मा प॒णौ॥

य इ॑न्द्र॒ सस्त्य॑व्र॒तो॑ऽनु॒ष्वाप॒मदे॑वयुः। स्वैः ष एवै॑र्मुमुर॒त्पोष्यं॑ र॒यिं स॑नु॒तर्धे॑हि॒ तं ततः॑॥

यच्छ॒क्रासि॑ परा॒वति॒ यद॑र्वा॒वति॑ वृत्रहन्। अत॑स्त्वा गी॒र्भिर्द्यु॒गदि॑न्द्र के॒शिभिः॑ सु॒तावाँ॒ आ वि॑वासति॥

यद्वासि॑ रोच॒ने दि॒वः स॑मु॒द्रस्याधि॑ वि॒ष्टपि॑। यत्पार्थि॑वे॒ सद॑ने वृत्रहन्तम॒ यद॒न्तरि॑क्ष॒ आ ग॑हि॥

स नः॒ सोमे॑षु सोमपाः सु॒तेषु॑ शवसस्पते। मा॒दय॑स्व॒ राध॑सा सू॒नृता॑व॒तेन्द्र॑ रा॒या परी॑णसा॥

मा न॑ इन्द्र॒ परा॑ वृण॒ग्भवा॑ नः सध॒माद्यः॑। त्वं न॑ ऊ॒ती त्वमिन्न॒ आप्यं॒ मा न॑ इन्द्र॒ परा॑ वृणक्॥

अ॒स्मे इ॑न्द्र॒ सचा॑ सु॒ते नि ष॑दा पी॒तये॒ मधु॑। कृ॒धी ज॑रि॒त्रे म॑घव॒न्नवो॑ म॒हद॒स्मे इ॑न्द्र॒ सचा॑ सु॒ते॥

न त्वा॑ दे॒वास॑ आशत॒ न मर्त्या॑सो अद्रिवः। विश्वा॑ जा॒तानि॒ शव॑साभि॒भूर॑सि॒ न त्वा॑ दे॒वास॑ आशत॥

विश्वाः॒ पृत॑ना अभि॒भूत॑रं॒ नरं॑ स॒जूस्त॑तक्षु॒रिन्द्रं॑ जज॒नुश्च॑ रा॒जसे॑। क्रत्वा॒ वरि॑ष्ठं॒ वर॑ आ॒मुरि॑मु॒तोग्रमोजि॑ष्ठं त॒वसं॑ तर॒स्विन॑म्॥

समीं॑ रे॒भासो॑ अस्वर॒न्निन्द्रं॒ सोम॑स्य पी॒तये॑। स्व॑र्पतिं॒ यदीं॑ वृ॒धे धृ॒तव्र॑तो॒ ह्योज॑सा॒ समू॒तिभिः॑॥

ने॒मिं न॑मन्ति॒ चक्ष॑सा मे॒षं विप्रा॑ अभि॒स्वरा॑। सु॒दी॒तयो॑ वो अ॒द्रुहोऽपि॒ कर्णे॑ तर॒स्विनः॒ समृक्व॑भिः॥

तमिन्द्रं॑ जोहवीमि म॒घवा॑नमु॒ग्रं स॒त्रा दधा॑न॒मप्र॑तिष्कुतं॒ शवां॑सि। मंहि॑ष्ठो गी॒र्भिरा च॑ य॒ज्ञियो॑ व॒वर्त॑द्रा॒ये नो॒ विश्वा॑ सु॒पथा॑ कृणोतु व॒ज्री॥

त्वं पुर॑ इन्द्र चि॒किदे॑ना॒ व्योज॑सा शविष्ठ शक्र नाश॒यध्यै॑। त्वद्विश्वा॑नि॒ भुव॑नानि वज्रि॒न्द्यावा॑ रेजेते पृथि॒वी च॑ भी॒षा॥

तन्म॑ ऋ॒तमि॑न्द्र शूर चित्र पात्व॒पो न व॑ज्रिन्दुरि॒ताति॑ पर्षि॒ भूरि॑। क॒दा न॑ इन्द्र रा॒य आ द॑शस्येर्वि॒श्वप्स्न्य॑स्य स्पृह॒याय्य॑स्य राजन्॥

इन्द्रा॑य॒ साम॑ गायत॒ विप्रा॑य बृह॒ते बृ॒हत्। ध॒र्म॒कृते॑ विप॒श्चिते॑ पन॒स्यवे॑॥

त्वमि॑न्द्राभि॒भूर॑सि॒ त्वं सूर्य॑मरोचयः। वि॒श्वक॑र्मा वि॒श्वदे॑वो म॒हाँ अ॑सि॥

वि॒भ्राज॒ञ्ज्योति॑षा॒ स्व१॒॑रग॑च्छो रोच॒नं दि॒वः। दे॒वास्त॑ इन्द्र स॒ख्याय॑ येमिरे॥

एन्द्र॑ नो गधि प्रि॒यः स॑त्रा॒जिदगो॑ह्यः। गि॒रिर्न वि॒श्वत॑स्पृ॒थुः पति॑र्दि॒वः॥

अ॒भि हि स॑त्य सोमपा उ॒भे ब॒भूथ॒ रोद॑सी। इन्द्रासि॑ सुन्व॒तो वृ॒धः पति॑र्दि॒वः॥

त्वं हि शश्व॑तीना॒मिन्द्र॑ द॒र्ता पु॒रामसि॑। ह॒न्ता दस्यो॒र्मनो॑र्वृ॒धः पति॑र्दि॒वः॥

अधा॒ ही॑न्द्र गिर्वण॒ उप॑ त्वा॒ कामा॑न्म॒हः स॑सृ॒ज्महे॑। उ॒देव॒ यन्त॑ उ॒दभिः॑॥

वार्ण त्वा॑ य॒व्याभि॒र्वर्ध॑न्ति शूर॒ ब्रह्मा॑णि। वा॒वृ॒ध्वांसं॑ चिदद्रिवो दि॒वेदि॑वे॥

यु॒ञ्जन्ति॒ हरी॑ इषि॒रस्य॒ गाथ॑यो॒रौ रथ॑ उ॒रुयु॑गे। इ॒न्द्र॒वाहा॑ वचो॒युजा॑॥

त्वं न॑ इ॒न्द्रा भ॑रँ॒ ओजो॑ नृ॒म्णं श॑तक्रतो विचर्षणे। आ वी॒रं पृ॑तना॒षह॑म्॥

त्वं हि नः॑ पि॒ता व॑सो॒ त्वं मा॒ता श॑तक्रतो ब॒भूवि॑थ। अधा॑ ते सु॒म्नमी॑महे॥

त्वां शु॑ष्मिन्पुरुहूत वाज॒यन्त॒मुप॑ ब्रुवे शतक्रतो। स नो॑ रास्व सु॒वीर्य॑म्॥

त्वामि॒दा ह्यो नरोऽपी॑प्यन्वज्रि॒न्भूर्ण॑यः। स इ॑न्द्र॒ स्तोम॑वाहसामि॒ह श्रु॒ध्युप॒ स्वस॑र॒मा ग॑हि॥

मत्स्वा॑ सुशिप्र हरिव॒स्तदी॑महे॒ त्वे आ भू॑षन्ति वे॒धसः॑। तव॒ श्रवां॑स्युप॒मान्यु॒क्थ्या॑ सु॒तेष्वि॑न्द्र गिर्वणः॥

श्राय॑न्त इव॒ सूर्यं॒ विश्वेदिन्द्र॑स्य भक्षत। वसू॑नि जा॒ते जन॑मान॒ ओज॑सा॒ प्रति॑ भा॒गं न दी॑धिम॥

अन॑र्शरातिं वसु॒दामुप॑ स्तुहि भ॒द्रा इन्द्र॑स्य रा॒तयः॑। सो अ॑स्य॒ कामं॑ विध॒तो न रो॑षति॒ मनो॑ दा॒नाय॑ चो॒दय॑न्॥

त्वमि॑न्द्र॒ प्रतू॑र्तिष्व॒भि विश्वा॑ असि॒ स्पृधः॑। अ॒श॒स्ति॒हा ज॑नि॒ता वि॑श्व॒तूर॑सि॒ त्वं तू॑र्य तरुष्य॒तः॥

अनु॑ ते॒ शुष्मं॑ तु॒रय॑न्तमीयतुः क्षो॒णी शिशुं॒ न मा॒तरा॑। विश्वा॑स्ते॒ स्पृधः॑ श्नथयन्त म॒न्यवे॑ वृ॒त्रं यदि॑न्द्र॒ तूर्व॑सि॥

इ॒त ऊ॒ती वो॑ अ॒जरं॑ प्रहे॒तार॒मप्र॑हितम्। आ॒शुं जेता॑रं॒ हेता॑रं र॒थीत॑म॒मतू॑र्तं तुग्र्या॒वृध॑म्॥

इ॒ष्क॒र्तार॒मनि॑ष्कृतं॒ सह॑स्कृतं श॒तमू॑तिं श॒तक्र॑तुम्। स॒मा॒नमिन्द्र॒मव॑से हवामहे॒ वस॑वानं वसू॒जुव॑म्॥

अ॒यं त॑ एमि त॒न्वा॑ पु॒रस्ता॒द्विश्वे॑ दे॒वा अ॒भि मा॑ यन्ति प॒श्चात्। य॒दा मह्यं॒ दीध॑रो भा॒गमि॒न्द्रादिन्मया॑ कृणवो वी॒र्या॑णि॥

दधा॑मि ते॒ मधु॑नो भ॒क्षमग्रे॑ हि॒तस्ते॑ भा॒गः सु॒तो अ॑स्तु॒ सोमः॑। अस॑श्च॒ त्वं द॑क्षिण॒तः सखा॒ मेऽधा॑ वृ॒त्राणि॑ जङ्घनाव॒ भूरि॑॥

प्र सु स्तोमं॑ भरत वाज॒यन्त॒ इन्द्रा॑य स॒त्यं यदि॑ स॒त्यमस्ति॑। नेन्द्रो॑ अ॒स्तीति॒ नेम॑ उ त्व आह॒ क ईं॑ ददर्श॒ कम॒भि ष्ट॑वाम॥

अ॒यम॑स्मि जरितः॒ पश्य॑ मे॒ह विश्वा॑ जा॒तान्य॒भ्य॑स्मि म॒ह्ना। ऋ॒तस्य॑ मा प्र॒दिशो॑ वर्धयन्त्यादर्दि॒रो भुव॑ना दर्दरीमि॥

आ यन्मा॑ वे॒ना अरु॑हन्नृ॒तस्यँ॒ एक॒मासी॑नं हर्य॒तस्य॑ पृ॒ष्ठे। मन॑श्चिन्मे हृ॒द आ प्रत्य॑वोच॒दचि॑क्रद॒ञ्छिशु॑मन्तः॒ सखा॑यः॥

विश्वेत्ता ते॒ सव॑नेषु प्र॒वाच्या॒ या च॒कर्थ॑ मघवन्निन्द्र सुन्व॒ते। पारा॑वतं॒ यत्पु॑रुसम्भृ॒तं वस्व॒पावृ॑णोः शर॒भाय॒ ऋषि॑बन्धवे॥

प्र नू॒नं धा॑वता॒ पृथ॒ङ्नेह यो वो॒ अवा॑वरीत्। नि षीं॑ वृ॒त्रस्य॒ मर्म॑णि॒ वज्र॒मिन्द्रो॑ अपीपतत्॥

मनो॑जवा॒ अय॑मान आय॒सीम॑तर॒त्पुर॑म्। दिवं॑ सुप॒र्णो ग॒त्वाय॒ सोमं॑ व॒ज्रिण॒ आभ॑रत्॥

स॒मु॒द्रे अ॒न्तः श॑यत उ॒द्ना वज्रो॑ अ॒भीवृ॑तः। भर॑न्त्यस्मै सं॒यतः॑ पु॒रःप्र॑स्रवणा ब॒लिम्॥

यद्वाग्वद॑न्त्यविचेत॒नानि॒ राष्ट्री॑ दे॒वानां॑ निष॒साद॑ म॒न्द्रा। चत॑स्र॒ ऊर्जं॑ दुदुहे॒ पयां॑सि॒ क्व॑ स्विदस्याः पर॒मं ज॑गाम॥

दे॒वीं वाच॑मजनयन्त दे॒वास्तां वि॒श्वरू॑पाः प॒शवो॑ वदन्ति। सा नो॑ म॒न्द्रेष॒मूर्जं॒ दुहा॑ना धे॒नुर्वाग॒स्मानुप॒ सुष्टु॒तैतु॑॥

सखे॑ विष्णो वित॒रं वि क्र॑मस्व॒ द्यौर्दे॒हि लो॒कं वज्रा॑य वि॒ष्कभे॑। हना॑व वृ॒त्रं रि॒णचा॑व॒ सिन्धू॒निन्द्र॑स्य यन्तु प्रस॒वे विसृ॑ष्टाः॥

ऋध॑गि॒त्था स मर्त्यः॑ शश॒मे दे॒वता॑तये। यो नू॒नं मि॒त्रावरु॑णाव॒भिष्ट॑य आच॒क्रे ह॒व्यदा॑तये॥

वर्षि॑ष्ठक्षत्रा उरु॒चक्ष॑सा॒ नरा॒ राजा॑ना दीर्घ॒श्रुत्त॑मा। ता बा॒हुता॒ न दं॒सना॑ रथर्यतः सा॒कं सूर्य॑स्य र॒श्मिभिः॑॥

प्र यो वां॑ मित्रावरुणाजि॒रो दू॒तो अद्र॑वत्। अयः॑शीर्षा॒ मदे॑रघुः॥

न यः स॒म्पृच्छे॒ न पुन॒र्हवी॑तवे॒ न सं॑वा॒दाय॒ रम॑ते। तस्मा॑न्नो अ॒द्य समृ॑तेरुरुष्यतं बा॒हुभ्यां॑ न उरुष्यतम्॥

प्र मि॒त्राय॒ प्रार्य॒म्णे स॑च॒थ्य॑मृतावसो। व॒रू॒थ्यं१॒॑ वरु॑णे॒ छन्द्यं॒ वचः॑ स्तो॒त्रं राज॑सु गायत॥

ते हि॑न्विरे अरु॒णं जेन्यं॒ वस्वेकं॑ पु॒त्रं ति॑सॄ॒णाम्। ते धामा॑न्य॒मृता॒ मर्त्या॑ना॒मद॑ब्धा अ॒भि च॑क्षते॥

आ मे॒ वचां॒स्युद्य॑ता द्यु॒मत्त॑मानि॒ कर्त्वा॑। उ॒भा या॑तं नासत्या स॒जोष॑सा॒ प्रति॑ ह॒व्यानि॑ वी॒तये॑॥

रा॒तिं यद्वा॑मर॒क्षसं॒ हवा॑महे यु॒वाभ्यां॑ वाजिनीवसू। प्राचीं॒ होत्रां॑ प्रति॒रन्ता॑वितं नरा गृणा॒ना ज॒मद॑ग्निना॥

आ नो॑ य॒ज्ञं दि॑वि॒स्पृशं॒ वायो॑ या॒हि सु॒मन्म॑भिः। अ॒न्तः प॒वित्र॑ उ॒परि॑ श्रीणा॒नो॒३॒॑ऽयं शु॒क्रो अ॑यामि ते॥

वेत्य॑ध्व॒र्युः प॒थिभी॒ रजि॑ष्ठैः॒ प्रति॑ ह॒व्यानि॑ वी॒तये॑। अधा॑ नियुत्व उ॒भय॑स्य नः पिब॒ शुचिं॒ सोमं॒ गवा॑शिरम्॥

बण्म॒हाँ अ॑सि सूर्य॒ बळा॑दित्य म॒हाँ अ॑सि। म॒हस्ते॑ स॒तो म॑हि॒मा प॑नस्यते॒ऽद्धा दे॑व म॒हाँ अ॑सि॥

बट् सू॑र्य॒ श्रव॑सा म॒हाँ अ॑सि स॒त्रा दे॑व म॒हाँ अ॑सि। म॒ह्ना दे॒वाना॑मसु॒र्यः॑ पु॒रोहि॑तो वि॒भु ज्योति॒रदा॑भ्यम्॥

इ॒यं या नीच्य॒र्किणी॑ रू॒पा रोहि॑ण्या कृ॒ता। चि॒त्रेव॒ प्रत्य॑दर्श्याय॒त्य१॒॑न्तर्द॒शसु॑ बा॒हुषु॑॥

प्र॒जा ह॑ ति॒स्रो अ॒त्याय॑मीयु॒र्न्य१॒॑न्या अ॒र्कम॒भितो॑ विविश्रे। बृ॒हद्ध॑ तस्थौ॒ भुव॑नेष्व॒न्तः पव॑मानो ह॒रित॒ आ वि॑वेश॥

मा॒ता रु॒द्राणां॑ दुहि॒ता वसू॑नां॒ स्वसा॑दि॒त्याना॑म॒मृत॑स्य॒ नाभिः॑। प्र नु वो॑चं चिकि॒तुषे॒ जना॑य॒ मा गामना॑गा॒मदि॑तिं वधिष्ट॥

व॒चो॒विदं॒ वाच॑मुदी॒रय॑न्तीं॒ विश्वा॑भिर्धी॒भिरु॑प॒तिष्ठ॑मानाम्। दे॒वीं दे॒वेभ्यः॒ पर्ये॒युषीं॒ गामा मा॑वृक्त॒ मर्त्यो॑ द॒भ्रचे॑ताः॥

त्वम॑ग्ने बृ॒हद्वयो॒ दधा॑सि देव दा॒शुषे॑। क॒विर्गृ॒हप॑ति॒र्युवा॑॥

स न॒ ईळा॑नया स॒ह दे॒वाँ अ॑ग्ने दुव॒स्युवा॑। चि॒किद्वि॑भान॒वा व॑ह॥

त्वया॑ ह स्विद्यु॒जा व॒यं चोदि॑ष्ठेन यविष्ठ्य। अ॒भि ष्मो॒ वाज॑सातये॥

औ॒र्व॒भृ॒गु॒वच्छुचि॑मप्नवान॒वदा हु॑वे। अ॒ग्निं स॑मु॒द्रवा॑ससम्॥

हु॒वे वात॑स्वनं क॒विं प॒र्जन्य॑क्रन्द्यं॒ सहः॑। अ॒ग्निं स॑मु॒द्रवा॑ससम्॥

आ स॒वं स॑वि॒तुर्य॑था॒ भग॑स्येव भु॒जिं हु॑वे। अ॒ग्निं स॑मु॒द्रवा॑ससम्॥

अ॒ग्निं वो॑ वृ॒धन्त॑मध्व॒राणां॑ पुरू॒तम॑म्। अच्छा॒ नप्त्रे॒ सह॑स्वते॥

अ॒यं यथा॑ न आ॒भुव॒त्त्वष्टा॑ रू॒पेव॒ तक्ष्या॑। अ॒स्य क्रत्वा॒ यश॑स्वतः॥

अ॒यं विश्वा॑ अ॒भि श्रियो॒ऽग्निर्दे॒वेषु॑ पत्यते। आ वाजै॒रुप॑ नो गमत्॥

विश्वे॑षामि॒ह स्तु॑हि॒ होतॄ॑णां य॒शस्त॑मम्। अ॒ग्निं य॒ज्ञेषु॑ पू॒र्व्यम्॥

शी॒रं पा॑व॒कशो॑चिषं॒ ज्येष्ठो॒ यो दमे॒ष्वा। दी॒दाय॑ दीर्घ॒श्रुत्त॑मः॥

तमर्व॑न्तं॒ न सा॑न॒सिं गृ॑णी॒हि वि॑प्र शु॒ष्मिण॑म्। मि॒त्रं न या॑त॒यज्ज॑नम्॥

उप॑ त्वा जा॒मयो॒ गिरो॒ देदि॑शतीर्हवि॒ष्कृतः॑। वा॒योरनी॑के अस्थिरन्॥

यस्य॑ त्रि॒धात्ववृ॑तं ब॒र्हिस्त॒स्थावसं॑दिनम्। आप॑श्चि॒न्नि द॑धा प॒दम्॥

प॒दं दे॒वस्य॑ मी॒ळ्हुषोऽना॑धृष्टाभिरू॒तिभिः॑। भ॒द्रा सूर्य॑ इवोप॒दृक्॥

अग्ने॑ घृ॒तस्य॑ धी॒तिभि॑स्तेपा॒नो दे॑व शो॒चिषा॑। आ दे॒वान्व॑क्षि॒ यक्षि॑ च॥

तं त्वा॑जनन्त मा॒तरः॑ क॒विं दे॒वासो॑ अङ्गिरः। ह॒व्य॒वाह॒मम॑र्त्यम्॥

प्रचे॑तसं त्वा क॒वेऽग्ने॑ दू॒तं वरे॑ण्यम्। ह॒व्य॒वाहं॒ नि षे॑दिरे॥

न॒हि मे॒ अस्त्यघ्न्या॒ न स्वधि॑ति॒र्वन॑न्वति। अथै॑ता॒दृग्भ॑रामि ते॥

यद॑ग्ने॒ कानि॒ कानि॑ चि॒दा ते॒ दारू॑णि द॒ध्मसि॑। ता जु॑षस्व यविष्ठ्य॥

यदत्त्यु॑प॒जिह्वि॑का॒ यद्व॒म्रो अ॑ति॒सर्प॑ति। सर्वं॒ तद॑स्तु ते घृ॒तम्॥

अ॒ग्निमिन्धा॑नो॒ मन॑सा॒ धियं॑ सचेत॒ मर्त्यः॑। अ॒ग्निमी॑धे वि॒वस्व॑भिः॥

अद॑र्शि गातु॒वित्त॑मो॒ यस्मि॑न्व्र॒तान्या॑द॒धुः। उपो॒ षु जा॒तमार्य॑स्य॒ वर्ध॑नम॒ग्निं न॑क्षन्त नो॒ गिरः॑॥

प्र दैवो॑दासो अ॒ग्निर्दे॒वाँ अच्छा॒ न म॒ज्मना॑। अनु॑ मा॒तरं॑ पृथि॒वीं वि वा॑वृते त॒स्थौ नाक॑स्य॒ सान॑वि॥

यस्मा॒द्रेज॑न्त कृ॒ष्टय॑श्च॒र्कृत्या॑नि कृण्व॒तः। स॒ह॒स्र॒सां मे॒धसा॑ताविव॒ त्मना॒ग्निं धी॒भिः स॑पर्यत॥

प्र यं रा॒ये निनी॑षसि॒ मर्तो॒ यस्ते॑ वसो॒ दाश॑त्। स वी॒रं ध॑त्ते अग्न उक्थशं॒सिनं॒ त्मना॑ सहस्रपो॒षिण॑म्॥

स दृ॒ळ्हे चि॑द॒भि तृ॑णत्ति॒ वाज॒मर्व॑ता॒ स ध॑त्ते॒ अक्षि॑ति॒ श्रवः॑। त्वे दे॑व॒त्रा सदा॑ पुरूवसो॒ विश्वा॑ वा॒मानि॑ धीमहि॥

यो विश्वा॒ दय॑ते॒ वसु॒ होता॑ म॒न्द्रो जना॑नाम्। मधो॒र्न पात्रा॑ प्रथ॒मान्य॑स्मै॒ प्र स्तोमा॑ यन्त्य॒ग्नये॑॥

अश्वं॒ न गी॒र्भी र॒थ्यं॑ सु॒दान॑वो मर्मृ॒ज्यन्ते॑ देव॒यवः॑। उ॒भे तो॒के तन॑ये दस्म विश्पते॒ पर्षि॒ राधो॑ म॒घोना॑म्॥

प्र मंहि॑ष्ठाय गायत ऋ॒ताव्ने॑ बृह॒ते शु॒क्रशो॑चिषे। उप॑स्तुतासो अ॒ग्नये॑॥

आ वं॑सते म॒घवा॑ वी॒रव॒द्यशः॒ समि॑द्धो द्यु॒म्न्याहु॑तः। कु॒विन्नो॑ अस्य सुम॒तिर्नवी॑य॒स्यच्छा॒ वाजे॑भिरा॒गम॑त्॥

प्रेष्ठ॑मु प्रि॒याणां॑ स्तु॒ह्या॑सा॒वाति॑थिम्। अ॒ग्निं रथा॑नां॒ यम॑म्॥

उदि॑ता॒ यो निदि॑ता॒ वेदि॑ता॒ वस्वा य॒ज्ञियो॑ व॒वर्त॑ति। दु॒ष्टरा॒ यस्य॑ प्रव॒णे नोर्मयो॑ धि॒या वाज॒ सिषा॑सतः॥

मा नो॑ हृणीता॒मति॑थि॒र्वसु॑र॒ग्निः पु॑रुप्रश॒स्त ए॒षः। यः सु॒होता॑ स्वध्व॒रः॥

मो ते रि॑ष॒न्ये अच्छो॑क्तिभिर्व॒सोऽग्ने॒ केभि॑श्चि॒देवैः॑। की॒रिश्चि॒द्धि त्वामीट्टे॑ दू॒त्या॑य रा॒तह॑व्यः स्वध्व॒रः॥

11

आग्ने॑ याहि म॒रुत्स॑खा रु॒द्रेभिः॒ सोम॑पीतये। सोभ॑र्या॒ उप॑ सुष्टु॒तिं मा॒दय॑स्व॒ स्व॑र्णरे॥

मण्डलम्

सूक्तम्

स्वादि॑ष्ठया॒ मदि॑ष्ठया॒ पव॑स्व सोम॒ धार॑या। इन्द्रा॑य॒ पात॑वे सु॒तः॥

यों तो परमात्मा के अपहत पाप्मादि अनन्त गुण हैं, पर शान्तस्वभाव परमात्मा के शान्ति के देनेवाले सौम्य स्वभावादि ही हैं। परमात्मा के सौम्य स्वभाव के धारण करने से पुरुष शान्तिसम्पन्न हो जाता है। फिर उसको अपने स्वरूप में एक प्रकार का आनन्द प्रतीत होने लगता है, जिससे एक प्रकार का हर्ष उत्पन्न होता है। मद यहाँ हर्ष का नाम है, किसी मादक द्रव्य का नहीं। कई एक टीकाकारों ने इस मण्डल को मदकारक सोम द्रव्य में लगाया है, वह भूल की है, क्योंकि इस मण्डल में परमात्मा के गुण-कर्म्म-स्वभावों का वर्णन है, किसी द्रव्यविशेष का नहीं॥१॥

र॒क्षो॒हा वि॒श्वच॑र्षणिर॒भि योनि॒मयो॑हतम्। द्रुणा॑ स॒धस्थ॒मास॑दत्॥

हे परमात्मन्! आप सर्वत्र परिपूर्ण और विश्व के दृष्टा हो तथा पापकारी हिंसक राक्षसों के हन्ता हो, आप हमारे हृदय में आकर विराजमान हों॥२॥

व॒रि॒वो॒धात॑मो भव॒ मंहि॑ष्ठो वृत्र॒हन्त॑मः। पर्षि॒ राधो॑ म॒घोना॑म्॥

परमात्मा से सब ऐश्वर्य्यों की प्राप्ति होती है और परमात्मा ही अज्ञान से बचाकर मनुष्य को सन्मार्ग में ले जाता है, इसलिये सर्वोपरि देव परमात्मा से ऐश्वर्य की प्रार्थना करनी चाहिये॥३॥

अ॒भ्य॑र्ष म॒हानां॑ दे॒वानां॑ वी॒तिमन्ध॑सा। अ॒भि वाज॑मु॒त श्रवः॑॥

परमात्मा की कृपा से मनुष्य देव-पदवी को प्राप्त होता है और परमात्मा की कृपा से सब प्रकार का बल मिलता है, इसलिये मनुष्य को चाहिये कि वह एकमात्र परमात्मा की शरण को प्राप्त हो॥४॥

त्वामच्छा॑ चरामसि॒ तदिदर्थं॑ दि॒वेदि॑वे। इन्दो॒ त्वे न॑ आ॒शसः॑॥

जो पुरुष प्रतिदिन निष्काम कर्म्म करते हुए अपने जीवन को व्यतीत करते हैं और ईश्वर से भिन्न किसी अन्य देव की उपासना नहीं करते, वे परमात्मस्वरूप को प्राप्त होते हैं॥५॥१६॥

पु॒नाति॑ ते परि॒स्रुतं॒ सोमं॒ सूर्य॑स्य दुहि॒ता। वारे॑ण॒ शश्व॑ता॒ तना॑॥

जो पुरुष श्रद्धा द्वारा ईश्वर को प्राप्त होता है, वह मानों प्रकाश की पुत्री द्वारा अपने सौम्यस्वभाव को बनाता है। जिस प्रकार सूर्य्य की पुत्री उषा मनुष्यों के हृदय में आह्लाद उत्पन्न करती है, इसी प्रकार जिन मनुष्यों के ह्रदय में श्रद्धा देवी का निवास है, वे लोग उषा देवी के समान सबके आह्लादजनक सौम्यस्वभाव को उत्पन्न करते हैं॥कई एक लोग इसके ये अर्थ करते हैं कि सूर्य्य की पुत्री कोई व्यक्तिविशेष श्रद्धा थी, यह अर्थ वेद के आशय से सर्वथा विरुद्ध है, क्योंकि उसका सौम्यस्वभाव के साथ क्या सम्बन्ध ? यहाँ स्वभाव के साथ उसी श्रद्धा देवी का सम्बन्ध है, जो मनुष्य के शील को उत्तम बनाती है॥६॥

तमी॒मण्वीः॑ सम॒र्य आ गृ॒भ्णन्ति॒ योष॑णो॒ दश॑। स्वसा॑रः॒ पार्ये॑ दि॒वि॥

जो पुरुष श्रद्धा के भावों से युक्त होता है, उसे धृति, क्षमा, दम, स्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध, ये धर्म्म के दश रूप आकर प्राप्त होते हैं। तात्पर्य्य यह है कि वेदशास्त्र और ईश्वर पर श्रद्धा रखनेवाले पुरुष को ही धार्मिक भाव आकर प्राप्त होते हैं, अन्य को नहीं॥७॥

तमीं॑ हिन्वन्त्य॒ग्रुवो॒ धम॑न्ति बाकु॒रं दृति॑म्। त्रि॒धातु॑ वार॒णं मधु॑॥

जो पुरुष श्रद्धा के भाव रखनेवाले होते हैं, उनके सूक्ष्म, स्थूल और कारण तीनों प्रकार के शरीर दृढ और शत्रुओं के वारण करनेवाले होते हैं। अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक तीनों प्रकार के बल उन पुरुषों को आकर प्राप्त होते हैं, जो श्रद्धा का भाव रखते हैं॥८॥

अ॒भी॒३॒॑ममघ्न्या॑ उ॒त श्री॒णन्ति॑ धे॒नवः॒ शिशु॑म्। सोम॒मिन्द्रा॑य॒ पात॑वे॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि जो पुरुष श्रद्धा के भाववाले हैं, उनको गौ आदि ऐश्वर्य्य और सदुपदेशरूपी पवित्र वाणियें उनकी रक्षा के लिये सदा उद्यत रहती हैं। इस मन्त्र में गौ को (अघ्न्या)=अहिंसनीय माना गया है; इससे स्पष्ट सिद्ध होता है कि गौ मेघ आदि यज्ञों के अर्थ किसी हिंसाप्रधान यज्ञ के नहीं, किन्तु गाव इन्द्रियाणि मेध्यन्ते यस्मिन् स गोमेधः, जिसमें ज्ञानयज्ञ द्वारा इन्द्रियाँ पवित्र की जाएँ, उसका नाम गोमेध है। इसी प्रकार अश्वेमेध नरमेध आदि यज्ञ भी ज्ञानप्रधान यज्ञों के ही बोधक हैं, हिंसारूप यज्ञों के बोधक नहीं॥९॥

अ॒स्येदिन्द्रो॒ मदे॒ष्वा विश्वा॑ वृ॒त्राणि॑ जिघ्नते। शूरो॑ म॒घा च॑ मंहते॥

श्रद्धा के भाव से ही विज्ञानी पुरुष अज्ञानरूपी शत्रुओं का नाश करता है और श्रद्धा के भाव से ही वीर पुरुष युद्ध में शत्रुओं को जीतता है। श्रद्धा के भाव से ही ऐश्वर्य्य को प्राप्त होता है॥१०॥पहला सूक्त और सत्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

पव॑स्व देव॒वीरति॑ प॒वित्रं॑ सोम॒ रंह्या॑। इन्द्र॑मिन्दो॒ वृषा वि॑श॥

परमात्मा की कृपा से ही पवित्रता प्राप्त होती है और परमात्मा की कृपा से ही पुरुष सब प्रकार के ऐश्वर्य्य से सम्पन होता है। जिस पुरुष के मन में परमात्मदेव का आविर्भाव होता है, वह सौम्य स्वभावयुक्त होकर कल्याण को प्राप्त होता है॥१॥

आ व॑च्यस्व॒ महि॒ प्सरो॒ वृषे॑न्दो द्यु॒म्नव॑त्तमः। आ योनिं॑ धर्ण॒सिः स॑दः॥

परमात्मा कोटानुकोटि ब्रह्माण्डों का आधार है, उसी के शासन में द्युलोक भूलोक स्वर्गलोक इत्यादि लोक-लोकान्तर परिभ्रमण करते हैं, वही इस चराचर ब्रह्माण्ड का आधार है। मनुष्य को उसी परमात्मा की उपासना करनी चाहिये॥२॥

अधु॑क्षत प्रि॒यं मधु॒ धारा॑ सु॒तस्य॑ वे॒धसः॑। अ॒पो व॑सिष्ट सु॒क्रतुः॑॥

परमात्मा के गुण-कर्म्म-स्वभाव ऐसे हैं कि जिससे एकमात्र परमात्मा ही सुकर्म्मा कहा जा सकता है अर्थात् परमात्मा के ज्ञानादि सदा एकरस हैं, इसी अभिप्राय से उपनिषदों में यह कथन है कि “न तस्य कार्य्यं करणञ्च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते।  परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च॥“ श्वे० ६। ८॥न उस से मट्टी के घट के समान कोई कार्य्य उत्पन्न होता है और न वह मट्टी के समान अन्य किसी पदार्थ का कारण है, किन्तु वह अपनी स्वाभाविक शक्तियों से इस संसार की रचना करता हुआ सर्वकर्ता और सर्वनियन्ता कहलाता है॥३॥

म॒हान्तं॑ त्वा म॒हीरन्वापो॑ अर्षन्ति॒ सिन्ध॑वः। यद्गोभि॑र्वासयि॒ष्यसे॑॥

परमात्मा की शक्ति में पृथिवी, जल, वायु इत्यादि सम्पूर्ण तत्त्व तथा लोक-लोकान्तर परिभ्रमण करते हैं। उसी महतोभूत के आश्रित होकर यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ठहरा हुआ है। इसका वर्णन “एतस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद् यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदः” “एतस्य वाक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्य्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः” “भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्य्यः भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः” इत्यादि द्वारा जिसका ब्रहमाण्ड और उपनिषदों में वर्णन किया गया है, उसी पूर्ण पुरुष का वर्णन इस मन्त्र में है। मालूम होता है कि पूर्वोक्त प्रमाण, जो परमात्मा को सर्वाधार वर्णन करते हैं, वे इसी मन्त्र के आधार पर हैं॥४॥

स॒मु॒द्रो अ॒प्सु मा॑मृजे विष्ट॒म्भो ध॒रुणो॑ दि॒वः। सोमः॑ प॒वित्रे॑ अस्म॒युः॥

परमात्मा सबको प्यार करता है, वह सर्वाधिकरण सर्वाश्रय तथा सर्वनियन्ता है॥५॥१८॥

अचि॑क्रद॒द्वृषा॒ हरि॑र्म॒हान्मि॒त्रो न द॑र्श॒तः। सं सूर्ये॑ण रोचते॥

वह परमात्मा जो आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक तापरूपी शत्रुओं का नाश करनेवाला मित्र की तरह सब प्राणियों का सन्मार्गप्रदर्शक तथा आत्मज्ञान द्वारा सबके हृदय में प्रकाशित है, उसी के आह्वानरूप वेदवाणीयें हैं और वही परमात्मा सब कामनाओं का पूर्ण करनेवाला है, इसलिये उसी एकमात्र परमात्मा की शरण में सबको जाना उचित है॥६॥

गिर॑स्त इन्द॒ ओज॑सा मर्मृ॒ज्यन्ते॑ अप॒स्युवः॑। याभि॒र्मदा॑य॒ शुम्भ॑से॥

परमात्मा अपने कर्म्मबोधक वेदवाक्यों से सदैव पुरुषों को सत्कर्म्मों में उद्बोधन करता है, जिससे वे ब्रह्मानन्दोपभोग के भागी बनें, जैसा कि अन्यत्र भी वेदवाक्यों में वर्णन किया है, “क्रतो स्मर क्लिबे स्मर कृतस्मर यजु० ४०। १५। ” “कुर्वन्नेवेह कर्म्माणि जिजीविषेच्छतसमाः यजु० ४०। २। ” इत्यादि वाक्यों में कर्म्मयोग का वर्णन भली-भाँति पाया जाता है, उसी कर्म्मयोग का वर्णन इस मन्त्र में है। उपनिषदों में इसको इस प्रकार वर्णन किया है “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत् कवयो वदन्ति कठ० ३। १४। ”= उठो जागो अपने कर्तव्यों को समझकर अपना आचरण करो तथा अन्य लोगों को कर्तव्यपरायण बनाओ, यह भाव उपनिषत्कार ऋषियों ने भी उक्त वेदमन्त्रों से लिया है॥कई एक लोग यह कहते हैं कि वेदों में विधिवाद नहीं अर्थात् ऐसा करो ऐसा न करो, इस प्रकार विधि तथा निषेध के बोधक वेदवाक्य नहीं मिलते। उनको स्मरण रखना चाहिये कि जब वेद ने गिराओं का विशेषण “अपस्युवः” यह कर्मों का उद्बोधक दिया, फिर विधिवाद अर्थात् अनुज्ञा में क्या न्यूनता रह जाती है। विधि विधान अनुज्ञा आज्ञा ये सब एकार्थवाची शब्द हैं। इस प्रकार वेदों ने शुभ कर्म्मों के करने का विधान सर्वत्र किया है। एवं निषेध के बोधक भी सहस्रशः वेदवाक्य पाए जाते हैं, जैसा कि “मा शिश्नदेवा अपि गुर्ऋतं नः। ऋग् ७। २१। ५=” मूर्त्यादि चिह्नों के पुजारी मेरी सच्चाई को नहीं पाते। एवं “नैनमूर्ध्वन्न तिर्य्यञ्च न मध्ये परिजग्रभत्। यजु० ३१। १। ” परमात्मा को किसी स्थान में कोई बन्द नहीं कर सकता। इत्यादि अनेक मन्त्र निषेधबोधक पाए जाते हैं। इस प्रकार वेद का विधि-निषेध द्वारा हित का शासक होना ही इसकी अपूर्वता है॥७॥

तं त्वा॒ मदा॑य॒ घृष्व॑य उ लोककृ॒त्नुमी॑महे। तव॒ प्रश॑स्तयो म॒हीः॥

हे परमात्मन्! आपका स्तवन प्रत्येक वस्तु कर रही है और आप सम्पूर्ण संसार के उत्पति-स्थिति-संहार करनेवाले हैं। आपकी प्राप्ति से सम्पूर्ण अज्ञानों की निवृत्ति होती है, इसलिये हम आपको प्राप्त होते हैं॥८॥

अ॒स्मभ्य॑मिन्दविन्द्र॒युर्मध्वः॑ पवस्व॒ धार॑या। प॒र्जन्यो॑ वृष्टि॒माँ इ॑व॥

जिस प्रकार मेघ अपनी वृष्टि से भूमि का सिञ्चन कर देता है, उसी प्रकार हे परमात्मन्! आप अपनी आनन्दरूप वृष्टि से हमको पवित्र तथा सिक्त करें॥९॥

गो॒षा इ॑न्दो नृ॒षा अ॑स्यश्व॒सा वा॑ज॒सा उ॒त। आ॒त्मा य॒ज्ञस्य॑ पू॒र्व्यः॥

हे परमात्मन्। आपकी कृपा से अभ्युदय और निःश्रेयस दोनों फलों की प्राप्ति होती है। जिन पर आप कृपालु होते हैं, उनको हृष्ट-पुष्ट गौ और बलीवर्द तथा उत्तमोत्तम घोड़े एव नाना प्रकार की सेनायें इत्यादि अभ्युदय के सब साधन देते हैं और जिन पर आपकी कृपा होती है, उन्हीं को आत्मिक बल देकर यम नियमों द्वारा संयमी बनाकर निःश्रेयस प्रदान करते हैं ॥१०॥१९॥दूसरा सूक्त और उन्नीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

ए॒ष दे॒वो अम॑र्त्यः पर्ण॒वीरि॑व दीयति। अ॒भि द्रोणा॑न्या॒सद॑म्॥

दीव्यतीति देवः=जो सबको प्रकाश करे, उसको देव कहते हैं। सर्वप्रकाशक देव अनादिसिद्ध और अविनाशी है, उसकी गति प्रत्येक ब्रह्माण्ड में है, वही परमात्मा इस संसार की उत्पति स्थिति संहार का करनेवाला है, उसी की उपासना सबको करनी चाहिये॥१॥

ए॒ष दे॒वो वि॒पा कृ॒तोऽति॒ ह्वरां॑सि धावति। पव॑मानो॒ अदा॑भ्यः॥

जिस परमात्मा का विद्वान् लोग वर्णन करते हैं, वह उपासना करने से उपासकों के हृदय में आविर्भाव को प्राप्त होता है॥२॥

ए॒ष दे॒वो वि॑प॒न्युभिः॒ पव॑मान ऋता॒युभिः॑। हरि॒र्वाजा॑य मृज्यते॥

जिस पूर्णपुरुष को विद्वान् लोग इन्द्रियागोचर कथन करते हैं, वही पूर्ण पुरुष ज्ञानयज्ञ द्वारा ज्ञानियों के ज्ञानगम्य होकर उपास्य भाव को प्राप्त होता है॥३॥

ए॒ष विश्वा॑नि॒ वार्या॒ शूरो॒ यन्नि॑व॒ सत्व॑भिः। पव॑मानः सिषासति॥

परमात्मदेव अपने ऐश्वर्य्यों का विभाग पात्र-अपात्र समझकर करता है। जिसको वह अपने ऐश्वर्य्य का पात्र समझता है, उसको ऐश्वर्य्य देता है और जिसको अपात्र समझता है, उससे ऐश्वर्य्य हर लेता है। जिस प्रकार पात्र अपनी बनावट और अपने गुण-कर्म्म-स्वभाव से पात्रता को प्राप्त है, वा यों कहो कि पूर्वकृत प्रारब्ध कर्मों से वह उपादेय वस्तु को प्राप्त होने योग्य बनाता है॥जो लोग निष्कर्म्म मन्दभागी और आलसी हैं, वे सदैव ईश्वर के ऐश्वर्य्य से वञ्चित रहते हैं, इसीलिये उनको अपात्र कहा है। उक्त मन्त्र में शूरवीर का दृष्टान्त इस अभिप्राय से दिया है कि जिस प्रकार शूरवीर के निपटारा करने के बाद किसी को अतोष तथा ननु नच करने का अवकाश नहीं मिलता, उसी प्रकार परमात्मा के निपटारा करने पर फिर किसी को झगड़े अथवा ननु नच करने का अवकाश नहीं रहता॥४॥

ए॒ष दे॒वो र॑थर्यति॒ पव॑मानो दशस्यति। आ॒विष्कृ॑णोति वग्व॒नुम्॥

वही परमात्मा सबके लिये पवित्रता का धाम है। सब लोग आत्मिक, शारीरिक तथा सामाजिक पवित्रताएँ उसी से प्राप्त करते हैं, इसलिये वही परमदेव एकमात्र उपासनीय है॥७॥१०॥

ए॒ष विप्रै॑र॒भिष्टु॑तो॒ऽपो दे॒वो वि गा॑हते। दध॒द्रत्ना॑नि दा॒शुषे॑॥

विद्वान् लोग जिस परमात्मा का नाना प्रकार से वर्णन करते हैं, वही इन्द्रियागोचर और एकमात्र ज्ञानगम्य परमात्मा सर्वाधार, सर्वकर्ता, अजर, अमर और कूटस्थनित्य है, इसी की उपासना सबको करनी चाहिये॥६॥

ए॒ष दिवं॒ वि धा॑वति ति॒रो रजां॑सि॒ धार॑या। पव॑मानः॒ कनि॑क्रदत्॥

परमात्मा नाना प्रकार के परमाणुओं से द्युलोकादि लोक-लोकान्तरों का आच्छादन करता है और अपनी सत्ता से सर्वत्र विराजमान हुआ सबको शुभ मार्ग की ओर बुला रहा है॥७॥

ए॒ष दिवं॒ व्यास॑रत्ति॒रो रजां॒स्यस्पृ॑तः। पव॑मानः स्वध्व॒रः॥

वह नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव परमात्मा सर्वत्र विराजमान है और उसी की सत्ता से सब लोक-लोकान्तर परिभ्रमण करते हैं॥८॥

ए॒ष प्र॒त्नेन॒ जन्म॑ना दे॒वो दे॒वेभ्यः॑ सु॒तः। हरिः॑ प॒वित्रे॑ अर्षति॥

जो लोग अपने अन्तःकरण को पवित्र करते हैं और परमात्मा के निष्पापादि भावों को धारण करते हैं, उनके हृदय में परमात्मा आकर प्रकट होता है॥जो मन्त्र में जन्म शब्द आया है, इसके अर्थ जन्मधारण के नहीं किन्तु ‘जनी प्रादुर्भावे’ धातु से मनिन् प्रत्यय करने से जन्म शब्द सिद्ध होता है, जिसके अर्थ आविभार्व के हैं, किसी उत्पत्तिविशेष के नहीं। इसी अभिप्राय से मन्त्र में प्रत्न शब्द को विशेषण देकर जन्म का वर्णन किया है, जिसके अर्थ अनादिसिद्ध आविर्भाव के हैं, न कि उत्पत्ति के॥तात्पर्य यह है कि वह अनादिसिद्ध परमात्मा निष्पाप आत्माओं में प्रकट होता है॥९॥

ए॒ष उ॒ स्य पु॑रुव्र॒तो ज॑ज्ञा॒नो ज॒नय॒न्निषः॑। धार॑या पवते सु॒तः॥

जो परमात्मा अनन्तकर्म्मा है, वही अपनी शक्ति से सब लोक-लोकान्तरों को उत्पन्न करता है और वही अपनी पवित्रता से सबको पवित्र करता है। अनन्तकर्म्मा, यहाँ परमात्मा को उसकी अनन्त शक्तियों के अभिप्राय से वर्णन किया है, किसी शारीरिक कर्म के अभिप्राय से नहीं॥१०॥२१॥तीसरा सूक्त और इक्कीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सना॑ च सोम॒ जेषि॑ च॒ पव॑मान॒ महि॒ श्रवः॑। अथा॑ नो॒ वस्य॑सस्कृधि॥

परमात्मा अभ्युदय और निःश्रेयस दोनों के दाता हैं। जिन लोगों को अधिकारी समझते हैं, उनको अभ्युदय नाना प्रकार के ऐश्वर्य्य प्रदान करते हैं और जिसको मोक्ष का अधिकारी समझते हैं, उसको मोक्षसुख प्रदान करते हैं। जो मन्त्र में जेषि यह शब्द है, इसके अर्थ परमात्मा की जीत को बोधन नहीं करते, किन्तु तदनुयायियों की जीत को बोधन करते हैं। क्योंकि परमात्मा तो सदा ही विजयी है। वस्तुतः न उसका कोई शत्रु और न उसका कोई मित्र है। जो सत्कर्म्मी पुरुष हैं, वे ही उसके मित्र कहे जाते हैं और जो असत्कर्म्मी हैं, उन में शत्रुभाव आरोपित किया जाता है। वास्तव में ये दोनों भाव मनुष्यकल्पित हैं। ईश्वर सदा सबके लिये समदर्शी है॥१॥

सना॒ ज्योतिः॒ सना॒ स्व१॒॑र्विश्वा॑ च सोम॒ सौभ॑गा। अथा॑ नो॒ वस्य॑सस्कृधि॥

परमात्मा नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वभाव है। उसी की कृपा से नाना विधि के सौभाग्य मिलते हैं और मोक्षसुख मिलता है॥२॥

सना॒ दक्ष॑मु॒त क्रतु॒मप॑ सोम॒ मृधो॑ जहि। अथा॑ नो॒ वस्य॑सस्कृधि॥

जो पुरुष शुद्धभाव से परमात्मपरायण होते हैं, परमात्मा उनके पापकर्म्मों को हर लेता है और नाना प्रकार के चातुर्य्य उनको प्रदान करता है॥३॥

पवी॑तारः पुनी॒तन॒ सोम॒मिन्द्रा॑य॒ पात॑वे। अथा॑ नो॒ वस्य॑सस्कृधि॥

विद्वान् लोग जब किसी पुरुष को दीक्षित करें, तो शान्त्यादि गुणसम्पन्न परमात्मा का सबसे प्रथम उपदेश करें। तदनन्तर अभ्युदय और निःश्रेयस का विस्तृत उपदेश करके इस सांसारिक यात्रा में दक्ष बनाएँ॥४॥

त्वं सूर्ये॑ न॒ आ भ॑ज॒ तव॒ क्रत्वा॒ तवो॒तिभिः॑। अथा॑ नो॒ वस्य॑सस्कृधि॥

हे परमात्मन्! आप ज्ञान और कर्म द्वारा हमारी सर्वदा रक्षा करें और ऐहिक तथा पारलौकिक सुख से हमको सदैव सम्पन्न करें॥५॥२२॥

तव॒ क्रत्वा॒ तवो॒तिभि॒र्ज्योक्प॑श्येम॒ सूर्य॑म्। अथा॑ नो॒ वस्य॑सस्कृधि॥

ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगी पुरुष अपने आत्मभूत सामर्थ्य से परमात्मा के स्वरूप का अनुभव करके सदैव आनन्द का लाभ करते हैं॥६॥

अ॒भ्य॑र्ष स्वायुध॒ सोम॑ द्वि॒बर्ह॑सं र॒यिम्। अथा॑ नो॒ वस्य॑सस्कृधि॥

स्वप्रकाश परमात्मा अज्ञान को निवृत्त करके सदैव सुख का प्रकाश करता है॥७॥

अ॒भ्य१॒॑र्षान॑पच्युतो र॒यिं स॒मत्सु॑ सास॒हिः। अथा॑ नो॒ वस्य॑सस्कृधि॥

जो लोग न्यायशील हैं, उनको परमात्मा विजयी बनाता है और अन्यायकारी दुरात्माओं का सदैव दमन करता है॥८॥

त्वां य॒ज्ञैर॑वीवृध॒न्पव॑मान॒ विध॑र्मणि। अथा॑ नो॒ वस्य॑सस्कृधि॥

र॒यिं न॑श्चि॒त्रम॒श्विन॒मिन्दो॑ वि॒श्वायु॒मा भ॑र। अथा॑ नो॒ वस्य॑सस्कृधि॥

परमात्मा सत्कर्मों द्वारा जिन पुरुषों को ऐश्वर्य के पात्र समझता है, उनको सब ऐश्वर्यों से और ज्ञानादि गुणों से परिपूर्ण करता है॥१०॥चौथा सूक्त और तेइसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

समि॑द्धो वि॒श्वत॒स्पतिः॒ पव॑मानो॒ वि रा॑जति। प्री॒णन्वृषा॒ कनि॑क्रदत्॥

इस संसार में परमात्मा ही केवल ऐसा पदार्थ है, जो स्वसत्ता से विराजमान है अर्थात् जो परसत्ता की सहायता नहीं चाहता। अन्य प्रकृति तथा जीव परमात्मसत्ता के अधीन होकर रहते हैं, इसी अभिप्राय से परमात्मा को यहाँ समिद्ध कहा गया है अर्थात् स्वप्रकाशरूपता से वर्णन किया गया है॥१॥

तनू॒नपा॒त्पव॑मानः॒ शृङ्गे॒ शिशा॑नो अर्षति। अ॒न्तरि॑क्षेण॒ रार॑जत्॥

इस मन्त्र में परमात्मा को क्षेत्रज्ञरूप से वर्णन किया गया है अर्थात् प्रकृति तथा प्रकृति के कार्य पदार्थों में परमात्मा कूटस्थरूपता से विराजमान है, इस भाव को उपनिषदों में यों वर्णन किया है कि “यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्यामन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरम्” बृ. ३। ७। १ जो परमात्मा पृथिवी में रहता है और पृथिवी जिसको नहीं जानती तथा पृथिवी उसका शरीर है और वह शरीरीरूप से वर्तमान है। शरीर के अर्थ यहाँ शीर्यते इति शरीरम् जो शीर्णता अर्थात् नाश को प्राप्त हो, उसको शरीर कहते हैं। परमात्मा जीव के समान शरीर-शरीरी भाव को धारण नहीं करता, किन्तु साक्षीरूप से सर्व शरीरों में विद्यमान है, भोक्तारूप से नहीं, इसी अभिप्राय से “सम्भोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेष्यात्” १। २। ८ ब्रह्मसूत्र में यह वर्णन किया है कि परमात्मा भोक्ता नहीं, क्योंकि वह सब शरीरों में विशेषरूप से व्यापक है और गीता में ‘क्षेत्रज्ञमपि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत’ इस श्लोक में इस भाव को भली-भाँति वर्णन किया है कि सब क्षेत्ररूपी शरीरों में क्षेत्रज्ञ परमात्मा है। मालूम होता है कि गीता उपनिषद् तथा ब्रह्मसूत्रों में यह भाव इत्यादि पूर्वोक्त मन्त्रों से आया है॥२॥

ई॒ळेन्यः॒ पव॑मानो र॒यिर्वि रा॑जति द्यु॒मान्। मधो॒र्धारा॑भि॒रोज॑सा॥

उपासक को चाहिये कि वह उपास्यदेव की उपासना करे, जो स्वप्रकाश और सबको पवित्र करनेवाला तथा आनन्द की वृष्टि से सबको आनन्दित करता है, वही धारणा-ध्यानादि योगज वृत्तियों से साक्षात् करने योग्य है॥३॥

ब॒र्हिः प्रा॒चीन॒मोज॑सा॒ पव॑मानः स्तृ॒णन्हरिः॑। दे॒वेषु॑ दे॒व ई॑यते॥

वह देव, जो सब दिव्य वस्तुओं में दिव्यस्वरूप है, वही एकमात्र उपासनीय है, अन्य नहीं। इस देव शब्द की व्याख्या “एषो देवः प्रदिशोऽनु सर्वा” यजु० ३२। ४॥इस वेदवाक्य में स्पष्ट रीति से पाया जाती है और “एको देवः सर्वभूतेषु गूढः” श्वे०। ६। ११। इत्यादि उपनिषद्वाक्यों में इसी देव का वर्णन पाया जाता है। इसी देव का इस मन्त्र में जगत् की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय का एकमात्र हेतु कथन किया है। ज्ञात होता है कि “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद् विजिज्ञासस्व तद् ब्रह्म” तै०। ३। १। इत्यादि वाक्यों में जगत् की उत्पत्ति स्थिति तथा प्रलय का हेतु जो ब्रह्मा को माना गया है, वह इसी वेदमन्त्र के आधार पर है। केवल भेद इतना है कि उपनिषद्वाक्यों में ब्रह्म शब्द है, यहाँ बर्हि शब्द है। ब्रह्म और बर्हि दोनों एकार्थवाची शब्द हैं, क्योंकि दोनों “बृहि वृद्धौ” इस धातु से सिद्ध होते हैं॥जिन लोगों ने बर्हि के माने कुशासन और हरिः के माने यहाँ हरे रङ्गवाले सोम के किये हैं, उन्होंने अत्यन्त भूल की है, क्योंकि उपक्रम-उपसंहार में यहाँ परमात्मा का वर्णन है और परमात्मवाची शब्द ही इस मण्डल में अधिकता से पाये जाते हैं॥४॥

उदातै॑र्जिहते बृ॒हद्द्वारो॑ दे॒वीर्हि॑र॒ण्ययीः॑। पव॑मानेन॒ सुष्टु॑ताः॥

जो लोग प्रकृति-पुरुष की विद्या को जानते हैं कि परमात्मा निमित्त कारण और प्रकृति संसार का उपादान कारण है अर्थात् प्रकृति में ही नाना प्रकार की विद्याओं के बीज भरे पड़े हैं, उसके तत्त्वज्ञान से वे लोग सब दिशाओं में फैल सकते हैं। तात्पर्य यह है कि अभ्युदय तथा निःश्रेयस दोनों के विज्ञान से होते हैं, एक के विज्ञान से नहीं॥५॥२४॥

सु॒शि॒ल्पे बृ॑ह॒ती म॒ही पव॑मानो वृषण्यति। नक्तो॒षासा॒ न द॑र्श॒ते॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि उषःकाल अपने स्वाभाविक धर्म से ऐसा उत्तम है कि अन्य कोई काल नहीं, इससे मनुष्य की ईश्वरोपासना की ओर स्वाभाविक रुचि होती है, इसलिये इस ब्राह्ममुहूर्त का वर्णन वेदों में बहुधा आता है। इसी भाव को लेकर मनु आदि ग्रन्थो में ‘ब्राह्मे मुहूर्ते बुद्ध्येत’ इत्यादि कहा है कि ब्राह्म मुहूर्त में उठे और परमात्मा का चिन्तन करे॥६॥

उ॒भा दे॒वा नृ॒चक्ष॑सा॒ होता॑रा॒ दैव्या॑ हुवे। पव॑मान॒ इन्द्रो॒ वृषा॑॥

ज्ञानयोगी और कर्मयोगी पुरुष जैसा परमात्मा का साक्षात्कार कर सकता है, इस प्रकार अन्य कोई भी नहीं कर सकता, क्योंकि कर्म द्वारा मनुष्य शक्ति बढ़ा कर ईश्वर की दया का पात्र बनता है और ज्ञान द्वारा उसका साक्षात्कार करता है। इसी अभिप्राय से “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा वृणुते तनूं स्वाम्” कठ. २। २३॥अर्थात् बहुत पढ़ने-पढ़ाने से परमात्मा का साक्षात्कार नहीं होता, किन्तु जब पुरुष सत्कर्मी बनकर अपने आपको ईश्वर के ज्ञान का पात्र बनाता है, तो वह उसको लाभ करता है। पात्र से तात्पर्य यहाँ अधिकारी का है। वह अधिकारी ज्ञान तथा कर्म दोनों से उत्पन्न होता है, केवल ज्ञान से नहीं, इसका नाम समसमुच्चय है अर्थात् ज्ञानयोग तथा कर्मयोग दोनों साधनों से सम्पन्न होने पर जिज्ञासु परमात्मा का लाभ करता है, अन्यथा नहीं॥जिन लोगों ने क्रमसमुच्चय मानकर केवल ज्ञान की ही मुख्यता सिद्ध की है, उनके मत में वेद का कोई प्रमाण ऐसा नहीं मिलता, जो कर्म से ज्ञान को बड़ा व मुख्य सिद्ध करे, क्योंकि “कुर्वन्नेवेह कर्माणि” यजुः ४०। २ इत्यादि मन्त्रों में कर्म का वर्णन यावदायुष कर्तव्यत्वेन वर्णन किया है और जो “तमेव विदित्वाति मृत्युमेति” यजुः ३१। १८। इस प्रमाण को देकर कर्म की मुख्यता का खण्डन करते हैं, सो ठीक नहीं, क्योंकि इसमें भी विदित्वा और एति ये दोनों क्रिया हैं अर्थात् उसको जानकर प्राप्त होते हैं, ये भी दोनों क्रिया हैं, इससे सिद्ध है कि जानना भी एक प्रकार की क्रिया ही है, इसलिये ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञानम् ऐसी व्युत्पत्ति करने पर ज्ञान भी एक कर्म की विशेष अवस्था ही सिद्ध होता है, कुछ भिन्न वस्तु नहीं। इसी अभिप्राय से “न तस्य कार्य्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते। परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च” श्वे. ६। ८। इत्यादि उपनिषद् वाक्यों में क्रिया की प्रधानता पाई जाती है, क्योंकि “ज्ञानबलाभ्यां सहिता क्रिया ज्ञानबलक्रिया” है और व्याकरण का सामान्य नियम ये पाया जाता है कि अप्रधान में तृतीया होती है और ज्ञानबल में तृतीया है, इसलिये क्रिया से उक्त वाक्य में कर्मप्रधानता पाई जाती है। अथवा यों कहो कि “एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति” सांख्ययोग अर्थात् ज्ञानयोग और कर्मयोग दोनों सूक्ष्म विचार करने में एक ही है अर्थात् अवबोधात्मक कर्म का नाम ज्ञान है और केवल अनुष्ठानात्मक कर्म का नाम कर्म है और जो मुक्ति का साक्षात् साधन अवबोधात्मक कर्म है, इसलिये वहाँ भी ज्ञान कर्म का समुच्चय है अर्थात् मिलाप है, दोनों मिलकर ही मुक्ति के साधन हैं, एक नहीं॥७॥

भार॑ती॒ पव॑मानस्य॒ सर॑स्व॒तीळा॑ म॒ही। इ॒मं नो॑ य॒ज्ञमा ग॑मन्ति॒स्रो दे॒वीः सु॒पेश॑सः॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि पुरुषों! तुम ज्ञानयज्ञप्राप्ति के लिये प्रार्थना करो। इसी अभिप्राय से उक्त मन्त्र में विद्याविधायक भारती सरस्वती और इला ये नाम आये हैं। भारती सरस्वती और विद्या ये एकार्थवाची शब्द हैं। इस प्रकार परमात्मा ने विद्यावृद्धि के लिये जीवों की प्रार्थना द्वारा उपदेश किया है। जैसा कि “धियो यो नः प्रचोदयात्” इस वेदमन्त्र में विद्यावृद्धि का उपदेश है, ऐसा ही उक्त मन्त्र में विद्या के लिये उपदेश है॥८॥

त्वष्टा॑रमग्र॒जां गो॒पां पु॑रो॒यावा॑न॒मा हु॑वे। इन्दु॒रिन्द्रो॒ वृषा॒ हरिः॒ पव॑मानः प्र॒जाप॑तिः॥

इस मन्त्र में परमात्मा ने सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलयकर्त्ता पुरुषविशेष का इस ज्ञानयज्ञ में उपास्यरूप से निर्देश किया है और त्वष्टादि द्वितीयान्त इसलिये हैं कि उपासनात्मक क्रिया के ये सब कर्म हैं अर्थात् इनकी उपासना उक्त यज्ञ में की जाती है॥९॥

वन॒स्पतिं॑ पवमान॒ मध्वा॒ सम॑ङ्ग्धि॒ धार॑या। स॒हस्र॑वल्शं॒ हरि॑तं॒ भ्राज॑मानं हिर॒ण्यय॑म्॥

परमात्मा से प्रार्थना है कि वह चराचर ब्रह्माण्डगत वनस्पति का सिञ्चन करे। इस स्वभावोक्ति अलङ्कार द्वारा परमात्मा के वृष्टिकर्तृत्वभाव का निरूपण किया है। इसी प्रकार अन्यत्र भी वेदमन्त्रों में “कल्माषग्रीवो रक्षिता वीरुध इषवः” अथ ३। ६। २७। ५। इत्यादि स्थलों में वनस्पति को परमात्मा के ग्रीवास्थानी वर्णन किया है। इसी प्रकार वनस्पति को विराट्स्वरूप की शोभा वर्णन करते हुए ईश्वर से स्वभावसिद्ध प्रार्थना है॥१०॥

विश्वे॑ देवाः॒ स्वाहा॑कृतिं॒ पव॑मान॒स्या ग॑त। वा॒युर्बृह॒स्पतिः॒ सूर्यो॒ऽग्निरिन्द्रः॑ स॒जोष॑सः॥

इस सूक्त के उपसंहार में विद्वानों की सङ्गति कथन की है कि उक्तगुणसम्पन्न विद्वान् लोग ज्ञानयज्ञ में आकर विविध प्रकार के ज्ञानों को उपलब्ध करें। तात्पर्य यह है कि इस मन्त्र में ज्ञानयज्ञ का सर्वोपरि वर्णन किया है। वस्तुतः ज्ञानयज्ञ सर्वोपरि है। इसी अभिप्राय से गीता में कहा है कि “श्रेयान् द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप”! हे शत्रुतापक अर्जुन! द्रव्यमय यज्ञों से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है॥११॥५वाँ सूक्त और २५वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

म॒न्द्रया॑ सोम॒ धार॑या॒ वृषा॑ पवस्व देव॒युः। अव्यो॒ वारे॑ष्वस्म॒युः॥

परमात्मा इस ब्रह्माण्ड में सर्वत्र विराजमान है। दैवी सम्पत्तिवाले लोग उसको पा सकते हैं। इस अभिप्राय से परमात्मा को इस मन्त्र में देवप्रिय कथन किया गया है। वस्तुतः परमात्मा न किसी का प्रिय और न किसी का द्वेषी है॥१॥

अ॒भि त्यं मद्यं॒ मद॒मिन्द॒विन्द्र॒ इति॑ क्षर। अ॒भि वा॒जिनो॒ अर्व॑तः॥

इस मन्त्र में सर्वोपरि हर्षजनक परमात्मा के प्रेम की प्रार्थना की गयी है॥२॥

अ॒भि त्यं पू॒र्व्यं मदं॑ सुवा॒नो अ॑र्ष प॒वित्र॒ आ। अ॒भि वाज॑मु॒त श्रवः॑॥

अनु॑ द्र॒प्सास॒ इन्द॑व॒ आपो॒ न प्र॒वता॑सरन्। पु॒ना॒ना इन्द्र॑माशत॥

जिस प्रकार सर्वत्र बहते हुए जल इस पृथिवी को नाना प्रकार के लता गुल्मादिकों से सुशोभित करते हैं, इसी प्रकार परमात्मा अपनी व्यापकता से प्रत्येक प्राणी में आह्लाद उत्पन्न करता है॥४॥

यमत्य॑मिव वा॒जिनं॑ मृ॒जन्ति॒ योष॑णो॒ दश॑। वने॒ क्रीळ॑न्त॒मत्य॑विम्॥

जिस प्रकार पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पाँच कर्मेन्द्रिय ये दशों मिल कर जीवात्मा की महिमा को बताते हैं, इसी प्रकार पाँच सूक्ष्मभूत और स्थूलभूत ये दोनों प्रकृतियें मिलकर परमात्मा के महत्त्व का वर्णन करते हैं। कई एक लोगों ने दश के अर्थ यहाँ दश उँगुलियें दी हैं, उनके मत में सोम रस दश उँगुलियों से लपेटकर खाया जाता है, इसलिये दश से उन्होंने दश उँगुलियें ली हैं। पहले तो ये वात अन्यथा है कि सोमरस उँगुलियों से खाया जाता है, क्योंकि सोमरस पीने की चीज है, खाने की नहीं। अन्य युक्ति ये है कि इस मण्डल के प्रथम सूक्त मं० ७ में गृभ्णन्ति योषणा दश ये पाठ आया है, जिससे दश इन्द्रियों का ग्रहण किया गया है, उँगुलियों का नहीं॥५॥२६॥

तं गोभि॒र्वृष॑णं॒ रसं॒ मदा॑य दे॒ववी॑तये। सु॒तं भरा॑य॒ सं सृ॑ज॥

परमात्मा उपदेश करता है कि हे जीव तू सर्वोपरि ब्रह्मानन्द के देनेवाले ब्रह्मा को एकमात्र लक्ष्य बनाकर उस के साथ तू अपनी चित्तवृत्तियों का योग कर, इसका नाम आध्यात्मिक योग है। रस के अर्थ यहाँ ब्रह्मा के हैं, किसी रसविशेष के नहीं, क्योंकि “रसो वै सः रसं ह्येवायं लब्ध्वा आनन्दी भवति” तै० २। ७। अर्थात् वह ब्रह्मा आनन्दस्वरूप है और उसके आनन्द को लाभ करके जीव आनन्दित होता है॥६॥

दे॒वो दे॒वाय॒ धार॒येन्द्रा॑य पवते सु॒तः। पयो॒ यद॑स्य पी॒पय॑त्॥

परमात्मा ही सब आनन्दों का आविर्भाव करनेवाला है। वह जिन पुरुषों को ब्रह्मानन्द का पात्र समझता है, उनको आनन्द प्रदान करता है।  यहाँ देव शब्द के अर्थ परमात्मा और दूसरे देव शब्द के अर्थ जिज्ञासु के–“स्याच्चैकस्य ब्रह्मशब्दवत्” ब्र० सू० २। ३। ५। इस सूत्र से ब्रह्मशब्द के समान है अर्थात् “तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व तपो ब्रह्मेति” तै० ३। २। इस वाक्य में पहले ब्रह्मा शब्द के अर्थ ईश्वर के हैं, दूसरे ब्रह्म शब्द के अर्थ तप के हैं। जिस प्रकार इसमें एक ही स्थान में दो अर्थ हो जाते हैं, उसी प्रकार उक्त मन्त्र में देव शब्द के दो अर्थ करने में कोई दोष नहीं॥७॥

आ॒त्मा य॒ज्ञस्य॒ रंह्या॑ सुष्वा॒णः प॑वते सु॒तः। प्र॒त्नं नि पा॑ति॒ काव्य॑म्॥

परमात्मा सब यज्ञों का आत्मा है अर्थात् ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, ध्यानयज्ञ, ज्ञानयज्ञ इत्यादि कोई यज्ञ भी उसकी सत्ता के विना नहीं हो सकता। इसी अभिप्राय से ब्रह्मज्ञान की कई पुस्तकों में परमात्मा को अधियज्ञरूप से वर्णन किया है। जो इस मन्त्र में काव्य शब्द आया है, वह ‘कवते इति कविः’ इस व्युत्पत्ति से ज्ञानी का अभिधायक है और ‘कवेः कर्म काव्यम्’ इस प्रकार सर्वज्ञ परमात्मा की रचनारूप वेद का नाम यहाँ काव्य है, किसी आधुनिक काव्य का नहीं। तात्पर्य यह है कि वह अपने ज्ञानरूपी वेद-काव्य द्वारा उपदेश करके सृष्टि की रक्षा करता है॥८॥

ए॒वा पु॑ना॒न इ॑न्द्र॒युर्मदं॑ मदिष्ठ वी॒तये॑। गुहा॑ चिद्दधिषे॒ गिरः॑॥

असृ॑ग्र॒मिन्द॑वः प॒था धर्म॑न्नृ॒तस्य॑ सु॒श्रियः॑। वि॒दा॒ना अ॑स्य॒ योज॑नम्॥

जो पुरुष परमात्मा और प्रकृति के सम्बन्ध को जानते हैं और परमात्मा के यथार्थ ज्ञान को जानकर उसके धर्मपथ पर चलते हैं, वे संसार में ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं॥१॥

प्र धारा॒ मध्वो॑ अग्रि॒यो म॒हीर॒पो वि गा॑हते। ह॒विर्ह॒विष्षु॒ वन्द्यः॑॥

सर्वजनवन्दनीय परमात्मा लोक-लोकान्तरों में सर्वत्र ही अपने मधुर आनन्द की वृष्टि करता है॥२॥

प्र यु॒जो वा॒चो अ॑ग्रि॒यो वृषाव॑ चक्रद॒द्वने॑। सद्मा॒भि स॒त्यो अ॑ध्व॒रः॥

परमात्मा सत्यस्वरूप अर्थात् त्रिकालाबाध्य है, ऐसे सत्यादि पदों से उपनिषदों में “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” ये लक्षण किये गये हैं॥३॥

परि॒ यत्काव्या॑ क॒विर्नृ॒म्णा वसा॑नो॒ अर्ष॑ति। स्व॑र्वा॒जी सि॑षासति॥

पव॑मानो अ॒भि स्पृधो॒ विशो॒ राजे॑व सीदति। यदी॑मृ॒ण्वन्ति॑ वे॒धसः॑॥

राजा की उपमा यहाँ इसलिये दी गयी है कि राजा का शासन लोकप्रसिद्ध है, इस अभिप्राय से यहाँ राजा का दृष्टान्त है। ईश्वर के समान बल्सूचना के अभिप्राय से नहीं और जो मन्त्र में बहुवचन है, वह व्यत्यय से है॥५॥२८॥

अव्यो॒ वारे॒ परि॑ प्रि॒यो हरि॒र्वने॑षु सीदति। रे॒भो व॑नुष्यते म॒ती॥

परमात्मा सब लोक-लोकान्तरों में व्यापक है और भक्तों की बुद्धि में विराजमान है अर्थात् जिसकी बुद्धि उपासनादि सत्कर्मों से निर्मल हो जाती है, उसी की बुद्धि में परमात्मा का आभास पड़ता है॥६॥

स वा॒युमिन्द्र॑म॒श्विना॑ सा॒कं मदे॑न गच्छति। रणा॒ यो अ॑स्य॒ धर्म॑भिः॥

जो पुरुष परमात्मा के अपहतपाप्मादि धर्मों को धारण करता है, वह ज्ञानी विज्ञानी आदिकों की सब पदवियों को प्राप्त होता है अर्थात् अभिमान के साथ ज्ञानी विज्ञानी विद्वानों के मद को मर्दन कर सकता है॥७॥

आ मि॒त्रावरु॑णा॒ भगं॒ मध्वः॑ पवन्त ऊ॒र्मयः॑। वि॒दा॒ना अ॑स्य॒ शक्म॑भिः॥

ईश्वरपरायण लोग केवल अपने आपका ही उद्धार नहीं करते, किन्तु अपने भावों से सम्पूर्ण संसार का उद्धार करते हैं॥८॥

अ॒स्मभ्यं॑ रोदसी र॒यिं मध्वो॒ वाज॑स्य सा॒तये॑। श्रवो॒ वसू॑नि॒ सं जि॑तम्॥

परमात्मा जब प्रसन्न होता है तो नाना प्रकार की विभूतियों का प्रदान करता है, क्योंकि जो विभूतियें हैं, वे सब परमात्मा का ऐश्वर्य हैं, जैसा कि “यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंशसंभवम्” गीता। अर्थात् जो कुछ विभूतिवाली या शोभावाली या बलवाली वस्तु है, वह सब परमात्मा के ऐश्वर्य की सूचक है॥९॥यह सातवाँ सूक्त और उनतीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥७॥२९॥

ए॒ते सोमा॑ अ॒भि प्रि॒यमिन्द्र॑स्य॒ काम॑मक्षरन्। वर्ध॑न्तो अस्य वी॒र्य॑म्॥

“बलमसि बलं मे देहि वीर्यमसि वीर्यं मे देहि ” अथ० २। ३। १७ जिस प्रकार इस मन्त्र में परमात्मा से बल वीर्यादिकों की प्रार्थना है, इसी प्रकार इस मन्त्र में भी परमात्मा से बल वीर्यादिकों की प्रार्थना है॥१॥

पु॒ना॒नास॑श्चमू॒षदो॒ गच्छ॑न्तो वा॒युम॒श्विना॑। ते नो॑ धान्तु सु॒वीर्य॑म्॥

इन्द्र॑स्य सोम॒ राध॑से पुना॒नो हार्दि॑ चोदय। ऋ॒तस्य॒ योनि॑मा॒सद॑म्॥

सत्य का स्थान एकमात्र परमात्मा ही है, इसी अभिप्राय से “ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसः” इस मन्त्र में यह लिखा है कि दीप्तिमान् परमात्मा से ऋत और सत्य अर्थात् ऋत शास्त्रीयसत्य, और सत्य वस्तुगतसत्य ये दोनों प्रकार के सत्य परमात्मा के आधार पर ही स्थिर रहते हैं, इस अभिप्राय से यहाँ परमात्मा को ऋत की योनि कहा गया है। योनि के अर्थ यहाँ कारण के हैं॥३॥

मृ॒जन्ति॑ त्वा॒ दश॒ क्षिपो॑ हि॒न्वन्ति॑ स॒प्त धी॒तयः॑। अनु॒ विप्रा॑ अमादिषुः॥

पाँच सूक्ष्म और पाँच स्थूलभूत उसकी शुद्धि व ऐश्वर्य का कारण इस अभिप्राय से वर्णन किये गये हैं कि उन्हीं भूतों के कार्यरूप इन्द्रिय कर्म और ज्ञान द्वारा उसको उपलब्ध करते हैं और उस उपलब्धि को पाकर विद्वान् लोग आनन्द को प्राप्त होते हैं॥४॥

दे॒वेभ्य॑स्त्वा॒ मदा॑य॒ कं सृ॑जा॒नमति॑ मे॒ष्यः॑। सं गोभि॑र्वासयामसि॥

जो पुरुष अज्ञानी हैं, उनकी बुद्धि का विषय ईश्वर नहीं होता, इसलिये कहा गया है कि उनकी बुद्धि को अतिक्रमण कर जाता है और जो लोग शुद्ध इन्द्रियोंवाले हैं, वे लोग उसको बुद्धि का विषय बनाकर आनन्द को उपलब्ध करते हैं॥५॥३०॥

पु॒ना॒नः क॒लशे॒ष्वा वस्त्रा॑ण्यरु॒षो हरिः॑। परि॒ गव्या॑न्यव्यत॥

परमात्मा इस संसार की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय का कारण है, इसलिये उसको हरि रूप से कथन किया है, वह परमात्मा विद्युत् के समान गतिशील होकर सबको चमत्कृत करता है। उसी की ज्योति को ज्ञानवृत्ति द्वारा उपलब्ध करके योगी आनन्दित होते हैं॥६॥

म॒घोन॒ आ प॑वस्व नो ज॒हि विश्वा॒ अप॒ द्विषः॑। इन्दो॒ सखा॑य॒मा वि॑श॥

परमात्मा उपदेश करता है कि हे पुरुषों! तुम इस प्रकार के प्रार्थनारूप भाव को हृदय में उत्पन्न करो कि तुम्हारे सत्कर्मी सज्जनों की रक्षा हो और दुष्टों का नाश हो॥७॥

वृ॒ष्टिं दि॒वः परि॑ स्रव द्यु॒म्नं पृ॑थि॒व्या अधि॑। सहो॑ नः सोम पृ॒त्सु धाः॑॥

जो लोग परमात्मविश्वासी होते हैं, परमात्मा उनको युद्धों में विजयी और धनादि ऐश्वर्यों से नानाविधैश्वर्यसम्पन्न करता है॥८॥

नृ॒चक्ष॑सं त्वा व॒यमिन्द्र॑पीतं स्व॒र्विद॑म्। भ॒क्षी॒महि॑ प्र॒जामिष॑म्॥

जो लोग विद्वानों के सदुपदेश से सर्वज्ञत्वादि गुणयुक्त परमात्मा की उपासना करते हैं, वे संसार के आनन्द को भोगते हैं॥९॥यह आठवाँ सूक्त और इकतीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

परि॑ प्रि॒या दि॒वः क॒विर्वयां॑सि न॒प्त्यो॑र्हि॒तः। सु॒वा॒नो या॑ति क॒विक्र॑तुः॥

“न पततीति नप्ती” जिसके स्वरूप का नाश न हो, उसका नाम यहाँ नप्ती हुआ। इन दोनों का परमात्मा हित करनेवाला है अर्थात् प्रकृति को ब्रह्माण्ड की रचना में लगा कर हित करता है और जीव को कर्मफलभोग में लगा कर हित करता है। “वियन्ति व्याप्नुवन्ति इति वयांसि” जो सर्वत्र व्याप्त हो, उसको वयस् कहते हैं और बहुवचन यहाँ ईश्वर के सामर्थ्य के अनन्तत्वबोधन के लिये आया है, तात्पर्य यह निकला कि जो प्रकृति पुरुष का अधिष्ठाता और संसार का निर्माता तथा विधाता है, उसको यहाँ कविक्रतु आदि नामों से वर्णन किया है॥१॥

प्रप्र॒ क्षया॑य॒ पन्य॑से॒ जना॑य॒ जुष्टो॑ अ॒द्रुहे॑। वी॒त्य॑र्ष॒ चनि॑ष्ठया॥

यद्यपि परमात्मा सर्वव्यापक है, तथापि ऐश्वर्य के प्रदाता होकर उन्हीं पुरुषों के हृदय में विराजमान हो रहा है, जो पुरुष कर्मयोगी और रागद्वेष से रहित है, इसलिये पुरुष को चाहिये कि वह राग-द्वेष के भाव से रहित होकर निष्कामभाव से सदैव कर्मयोग में लगा रहे॥२॥

स सू॒नुर्मा॒तरा॒ शुचि॑र्जा॒तो जा॒ते अ॑रोचयत्। म॒हान्म॒ही ऋ॑ता॒वृधा॑॥

द्युलोक और पृथिवीलोक के मध्य में कर्मयोगी ही एक ऐसा पुरुष है, जो अपने कर्मों द्वारा संसार को प्रकाशित करता है। इसी अभिप्राय से उसको द्युलोक और पृथिवीलोक का सच्चा पुत्र कहा गया है॥३॥

स स॒प्त धी॒तिभि॑र्हि॒तो न॒द्यो॑ अजिन्वद॒द्रुहः॑। या एक॒मक्षि॑ वावृ॒धुः॥

इस मन्त्र में योगविद्या का वर्णन किया गया है, भाव यह है कि जब पुरुष अपने प्राणायाम द्वारा इडा पिङ्गलादि नाडियों को तृप्त कर देता है, तो वह उस अभ्यास से एकाग्रचित्त होकर अविनाशी परमात्मा के भाव को अनुभव करता है॥४॥

ता अ॒भि सन्त॒मस्तृ॑तं म॒हे युवा॑न॒मा द॑धुः। इन्दु॑मिन्द्र॒ तव॑ व्र॒ते॥

कर्मयोगी पुरुष अपने निष्काम कर्म द्वारा उस तत्त्व को प्राप्त होता है, जिसको योग में एकतत्त्वाभ्यास लिखा है अर्थात् उस तत्त्व की प्राप्ति के लिये कर्मयोगी होना आवश्यक है॥५॥३२॥

अ॒भि वह्नि॒रम॑र्त्यः स॒प्त प॑श्यति॒ वाव॑हिः। क्रिवि॑र्दे॒वीर॑तर्पयत्॥

जो परमात्मा महत्त्वादि सात प्रकार की प्रकृतियों से अलंकृत किया हुआ है और जिसको धारणा ध्यानादि बुद्धि की सात वृत्तियें विषय करती हैं, वह परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण हो रहा है, एकमात्र उसी परमात्मा की उपासना करनी चाहिये॥६॥

अवा॒ कल्पे॑षु नः पुम॒स्तमां॑सि सोम॒ योध्या॑। तानि॑ पुनान जङ्घनः॥

मनुष्य का परम शत्रु एकमात्र अज्ञान ही है, जो पुरुष अज्ञानरूपी शत्रु को नहीं जीतता, वह शूरवीर व विजयी कदापि नहीं कहला सकता, बहुत क्या, पुरुष में पुरुषत्व यही है कि वह अज्ञानरूपी शत्रु को जीतकर अभ्युदय और निःश्रेयसरूपी फलों को लाभ करे। इस अभिप्राय के लिये उक्त मन्त्र में अज्ञान के जीतने की परमात्मा से प्रार्थना की गई है और अज्ञानरूपी शत्रु की शत्रुता का वर्णन “पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्। ” गीता के इस श्लोक में सुप्रसिद्ध है कि हे जीव तू ज्ञान और विज्ञान के नाश करनेवाले परम शत्रु अज्ञान का सबसे पहले नाश कर॥७॥

नू नव्य॑से॒ नवी॑यसे सू॒क्ताय॑ साधया प॒थः। प्र॒त्न॒वद्रो॑चया॒ रुचः॑॥

जो पुरुष अपने जीवन को नित्य नूतन बनाना चाहे, उसका कर्तव्य है कि वह परमात्मा की ज्योति से देदीप्यमान होकर अपने आपको प्रकाशित करे और नित्य नूतन वेदवाणियों से अपने रास्तों को साफ करे अर्थात् वेदोक्त धर्मों पर स्वयं चले और लोगों को चलाये॥८॥

पव॑मान॒ महि॒ श्रवो॒ गामश्वं॑ रासि वी॒रव॑त्। सना॑ मे॒धां सना॒ स्वः॑॥

जिस जाति वा धर्म पर परमात्मा की अत्यन्त कृपा होती है, उसको परमात्मा नाना प्रकार के ऐश्वर्य के साधन प्रदान करता है और शुद्ध बुद्धि तथा सर्वोपरि आनन्द का प्रदान करता है॥९॥३३॥यह नवमाँ सूक्त और तेतीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

प्र स्वा॒नासो॒ रथा॑ इ॒वार्व॑न्तो॒ न श्र॑व॒स्यवः॑। सोमा॑सो रा॒ये अ॑क्रमुः॥

जिस प्रकार बिजली की जागृतिशील ध्वनि से सब पुरुष जाग्रत हो जाते हैं, इस प्रकार परमात्मा के शब्द से सब लोग उद्बुद्ध हो जाते हैं, अर्थात् परमात्मा नाना प्रकार के शब्दों से पुरुषों को उद्बोधन करता है और जिस प्रकार न्यायशील राजा अपनी प्रजा को ऐश्वर्य प्रदान करता है, इसी प्रकार वह सत्कर्मी पुरुषों को सदैव ऐश्वर्य प्रदान करता है॥१॥

हि॒न्वा॒नासो॒ रथा॑ इव दधन्वि॒रे गभ॑स्त्योः। भरा॑सः का॒रिणा॑मिव॥

जिस प्रकार कर्मयोगी सत्कर्म को करने में सदैव तत्पर रहता है, इसी प्रकार संसार की उत्पत्ति स्थिति प्रलयादि कर्मों में परमात्मा सदैव तत्पर रहता है अर्थात् उक्त कर्म उस में स्वतःसिद्ध और अनायास से होते हैं, इसी अभिप्राय से ब्राह्मणग्रन्थों में उसे “सर्वकर्मा सर्वगन्धः सर्वरसः” ऐसा प्रतिपादन किया है कि सर्व प्रकार के कर्म और सब प्रकार के गन्ध तथा रस उसी से अपनी-२ सत्ता का लाभ करते हैं। इस प्रकार परमात्मा सदैव गतिशील है, इसी अभिप्राय से गतिकर्मा रंहति धातु से निष्पन्न रथ की उपमा दी है। जो लोग उसको अक्रिय कहकर यह सिद्ध करते हैं कि शुद्ध ब्रह्म में कोई क्रिया नहीं होती, क्रिया करने की शक्ति माया के साथ मिलकर आती है, अन्यथा नहीं, इसलिये ईश्वर जगत् का कारण है, ब्रह्म नहीं, ऐसा कथन करनेवाले वैदिक सिद्धान्त से सर्वथा भिन्न हैं, क्योंकि वेदों में “भूमिं जनयन् देव एकः” यजुः १७। १९। “सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्’” “विश्वस्य कर्त्ता भुवनस्य गोप्ता” मुं० १। १। १ इत्यादि वेदोपनिषद् के वाक्यों में शुद्ध ब्रह्म में जगत्कर्तृत्व कदापि न पाया जाता, यदि ईश्वर में क्रिया न होती, इससे स्पष्ट सिद्ध है कि ईश्वर में क्रिया स्वतःसिद्ध है, इसी अभिप्राय से कहा है कि “स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च”॥२॥

राजा॑नो॒ न प्रश॑स्तिभिः॒ सोमा॑सो॒ गोभि॑रञ्जते। य॒ज्ञो न स॒प्त धा॒तृभिः॑॥

संसार भी एक यज्ञ है और इस यज्ञ के कार्यकारी ऋत्विगादि होता प्रकृति की शक्तियें हैं, जब परमात्मा इस बृहत् यज्ञ को करता है तो प्रकृति की शक्तियें उसमें ऋत्विगादि का काम करती हैं। इसी अभिप्राय से यह कथन किया है कि “तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः। तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये” यजुः ३१। ९। उस पुरुषमेध यज्ञ को करते हुए ऋषि लोग सर्वद्रष्टा परमात्मा को अपना लक्ष्य बनाते हैं। इस प्रकार परमात्मा का इस मन्त्र में यज्ञरूप से वर्णन किया है। इसी अभिप्राय से “यज्ञो वै विष्णुः” शत० इत्यादि वाक्यों में परमात्मा को यज्ञ कथन किया है॥३॥

परि॑ सुवा॒नास॒ इन्द॑वो॒ मदा॑य ब॒र्हणा॑ गि॒रा। सु॒ता अ॑र्षन्ति॒ धार॑या॥

द्युभ्वादि अनेक लोकों को उत्पन्न करनेवाला परमात्मा अपनी पवित्र वेदवाणी द्वारा हमको नाना विध के आनन्द प्रदान करता है॥४॥

आ॒पा॒नासो॑ वि॒वस्व॑तो॒ जन॑न्त उ॒षसो॒ भग॑म्। सूरा॒ अण्वं॒ वि त॑न्वते॥

परमात्मा प्रकृति की सूक्ष्मावस्था से अथवा यों कहो कि परमाणुओं से सृष्टि को उत्पन्न करता है और सूर्यादि प्रकाशमय ज्योतियों से उषारूप ऐश्वर्यों को उत्पन्न करता हुआ संसार के दुःखों का नाश करता है। तात्पर्य यह है कि उषःकाल होते ही जिस प्रकार सब ओर से आह्लाद उत्पन्न होता है, इस प्रकार का आह्लाद और समय में नहीं होता, इसलिये उषःकाल को यहाँ ऐश्वर्यरूप से कथन किया है। यद्यपि प्रातः, सन्ध्या, मध्याह्न इत्यादि सब काल परमात्मा की विभूति हैं, तथापि जिस प्रकार की उत्तम विभूति उषःकाल है, वैसी विभूति अन्यकाल नहीं, तात्पर्य यह है कि उषःकाल को उत्पन्न करके परमात्मा ने सब दुःखों को दूर किया है अर्थात् उक्त काल में योगी तथा रोगी सब प्रकार के लोग उस परमात्मा के आनन्द में उषःकाल में निमग्न हो जाते हैं। एक प्रकार से उषःकाल अपनी लालिमा के समान ब्रह्मोपासनारूपी रंग से सम्पूर्ण संसार को रञ्जित कर देता है॥५॥३४॥

अप॒ द्वारा॑ मती॒नां प्र॒त्ना ऋ॑ण्वन्ति का॒रवः॑। वृष्णो॒ हर॑स आ॒यवः॑॥

जो कर्मयोगी लोग कर्मयोग में तत्पर हैं और ईश्वर की उपासना में प्रतिदिन रत रहते हैं, वे अपनी बुद्धि को कुमार्ग की ओर कदापि नहीं जाने देते, तात्पर्य यह है कि कर्मयोगियों में अभ्यास की दृढ़ता के प्रभाव से ऐसा सामर्थ्य उत्पन्न हो जाता है कि उनकी बुद्धि सदैव सन्मार्ग की ओर ही जाती है, अन्यत्र नहीं॥६॥

स॒मी॒ची॒नास॑ आसते॒ होता॑रः स॒प्तजा॑मयः। प॒दमेक॑स्य॒ पिप्र॑तः॥

जो लोग एक परमात्मा की उपासना करते हैं, उन्हीं के सब कामों की पूर्ति होती है। तात्पर्य यह है कि ईश्वरपरायण लोगों के कार्यों में कदापि विघ्न नहीं होता॥७॥

नाभा॒ नाभिं॑ न॒ आ द॑दे॒ चक्षु॑श्चि॒त्सूर्ये॒ सचा॑। क॒वेरप॑त्य॒मा दु॑हे॥

उक्त कामधेनुरूप परमात्मा के ऐश्वर्य को वे लोग ढूढ़ सकते हैं, जो लोग उस परमात्मा को अपने हृदयरूपी कमल में साक्षीरूप से स्थिर समझ कर सत्कर्मी बनते हैं और वह परमात्मा अपनी प्रकाशरूप शक्ति से सूर्य का भी प्रकाशक है। इस मन्त्र में परमात्मा इस भाव का बोधन करते हैं कि जिज्ञासु पुरुषों! तुम उस प्रकाश से अपने हृदय को प्रकाशित करके संसार के पदार्थों को देखो, जो सर्वप्रकाशक है और जिससे यह भूतवर्ग अपनी उत्पत्ति और स्थिति का लाभ करता है, जैसा कि ‘नाभ्याऽआसीदन्तरिक्षम्’ “चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत” यजुः १। १२ इत्यादि मन्त्रों में वर्णन किया है कि उसी के नाभिरूप सामर्थ्य से अन्तरिक्षलोक उत्पन्न हुआ और उसी के चक्षुरूप सामर्थ्य से सूर्य उत्पन्न हुआ। चक्षु के अर्थ यहाँ ‘चष्टे पश्यत्यनेनेति चक्षुः’ अर्थात् अपने सात्त्विक सामर्थ्य से सूर्य को उत्पन्न किया, जैसा कि अन्यत्र भी कहा है कि “सत्वात्संजायते ज्ञानम्”। बहुत क्या, “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभि संविशन्ति तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्म” अर्थात् उसी से यह सब संसारवर्ग आविर्भाव को प्राप्त होता है और उससे लाभ करके स्थिर रहता है और अन्त में परमाणुरूप हो कर उसी में लय हो जाता है। उसी के जानने की इच्छा करनी चाहिये, वही सर्वोपरि ब्रह्म है। “बृंहते वर्धत इति ब्रह्म” जो सदैव वृद्धि को प्राप्त है अर्थात् जिससे कोई बड़ा नहीं, उसका नाम यहाँ ब्रह्म है॥८॥

अ॒भि प्रि॒या दि॒वस्प॒दम॑ध्व॒र्युभि॒र्गुहा॑ हि॒तम्। सूरः॑ पश्यति॒ चक्ष॑सा॥

जो इस संसाररूपी गुहा में स्थिर सूक्ष्म से अति सूक्ष्म परमात्मा है और जो भ्वादि लोकों का एकमात्र अधिकरण है, उस को आत्मज्ञानी विद्वान् ही जान सकते हैं, अन्य नहीं॥९॥३५॥यह दशवाँ सूक्त और पैतीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

उपा॑स्मै गायता नरः॒ पव॑माना॒येन्द॑वे। अ॒भि दे॒वाँ इय॑क्षते॥

परमात्मा उपदेश करता है कि हे मनुष्यों! तुम यज्ञादि कर्मों में विद्वानों की संगति करो और मिलकर अपने उपास्य देव का गायन करो॥१॥

अ॒भि ते॒ मधु॑ना॒ पयोऽथ॑र्वाणो अशिश्रयुः। दे॒वं दे॒वाय॑ देव॒यु॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे दृढ़विश्वासी विद्वानों! आप लोग उस रस का पान करो, जिससे बढ़कर संसार में अन्य कोई रस नहीं और उपास्यत्वेन उस देव का आश्रयण करो, जिससे बढ़ कर और कोई उपास्य नहीं। वास्तव में बात भी यही है कि परमात्मा के आनन्द के बराबर और कोई आनन्द नहीं, इसी अभिप्राय से कहा है कि “रसो ह्येव सः रसं हि लब्ध्वा एष आनन्दी भवति” तै० २। ७। परमात्मा रस अर्थात् आनन्दरूप है, उसके आनन्द को लाभ करके पुरुष आनन्दित होता है। इसी अभिप्राय से गीता में कहा है कि “यं लब्ध्वा नापरो लाभः” उसको प्राप्त करने के अनन्तर फिर कोई प्राप्तव्य वस्तु नहीं रहती॥२॥

स नः॑ पवस्व॒ शं गवे॒ शं जना॑य॒ शमर्व॑ते। शं रा॑ज॒न्नोष॑धीभ्यः॥

यहाँ ओषधि केवल उपलक्षण है, वस्तुतः प्रत्येक संसारवर्ग के लिये इस मन्त्र में कल्याण की प्रार्थना की गई है ॥३॥

ब॒भ्रवे॒ नु स्वत॑वसेऽरु॒णाय॑ दिवि॒स्पृशे॑। सोमा॑य गा॒थम॑र्चत॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे पुरुषो! तुम ऐसे पुरुष की स्तुति करो, जो पूर्ण पुरुष अर्थात् द्युभ्वादि सब लोकों में पूर्ण हो रहा है और तेजस्वी और सर्वव्यापक है। इस भाव को वेद के अन्यत्र भी कई एक स्थलों में वर्णन किया है, जैसा कि “यस्य भूमिः प्रमान्तरिक्षमुतोदरम्। दिवं यश्चक्रे मूर्धानं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः” अ १०। ४। ७ कि जिस की भूमि ज्ञान का साधन है, अन्तरिक्ष जिसका उदरस्थानीय है, जिस में द्युलोक मस्तक के सदृश कहा जा सकता है, उस सर्वोपरि ब्रह्म को हमारा नमस्कार है। जैसा इस मन्त्र में रूपकालङ्कार से द्युलोक को मूर्धास्थानीय कल्पना किया है, इसी प्रकार ‘दिविस्पृशम्’ इस शब्द में द्युलोक के साथ स्पर्श करनेवाला भी रूपकालङ्कार से वर्णन किया है, मुख्य नहीं। यही भाव “नभस्पृशं दीप्तमनेकवर्णम्” गीता इत्यादि के श्लोकों में वर्णित है॥४॥

हस्त॑च्युतेभि॒रद्रि॑भिः सु॒तं सोमं॑ पुनीतन। मधा॒वा धा॑वता॒ मधु॑॥

परमात्मा का वाग्रूपी वज्र जिस पुरुष की अविद्या की लता को काटता है, वह पुरुष सरलप्रकृति बन कर परमात्मा के आनन्दमय स्वरूप में निमग्न होता है॥५॥

नम॒सेदुप॑ सीदत द॒ध्नेद॒भि श्री॑णीतन। इन्दु॒मिन्द्रे॑ दधातन॥

जो लोग प्रार्थना से अपने हृदय को नम्र बनाते हैं, उनका मन परमात्मा के स्वरूप में अवश्यमेव स्थिर होता है॥६॥

अ॒मि॒त्र॒हा विच॑र्षणिः॒ पव॑स्व सोम॒ शं गवे॑। दे॒वेभ्यो॑ अनुकाम॒कृत्॥

संसार में असुर और देव दो प्रकार के मनुष्य पाये जाते हैं, असुर उनको कहते हैं, जो धर्म को त्याग करके केवल प्राणयात्रा में लग जाते हैं। अर्थ इसके इस प्रकार हैं “अस्यति धर्ममित्यसुरः’ यद्वा– ‘असुषु रमत इत्यसुरः” जो धर्म को छोड़ दे या प्राण में ही रमण करे, वह असुर है। और ‘दीव्यतीति देवः’ जो सदसद्विवेचिनी बुद्धि रखनेवाले ज्ञानी पुरुष हैं, उनको देव कहते हैं। जो असुर लोग हैं, उन्हीं को इस मन्त्र में अमित्र माना गया है अर्थात् दैवी सम्पत्तिवाले पुरुषों को परमात्मा बढ़ाता है और आसुरी सम्पत्तिवाले पुरुषों का संहार करता है॥७॥

इन्द्रा॑य सोम॒ पात॑वे॒ मदा॑य॒ परि॑ षिच्यसे। म॒न॒श्चिन्मन॑स॒स्पतिः॑॥

जो लोग उपासना द्वारा अपने हृदय में ईश्वर को विराजमान करते हैं, वे उसके मधुर आनन्द का पान करते हैं। तात्पर्य यह है कि यों तो परमात्मा सर्वव्यापक होने के कारण सब के हृदय में स्थिर है, पर जो लोग धारणा ध्यानादि साधनों से सम्पन्न होकर उस को अत्यन्त समीपी बनाते हैं, वे ही उसके मधुर आनन्द का पान कर सकते हैं, अन्य नहीं॥८॥

पव॑मान सु॒वीर्यं॑ र॒यिं सो॑म रिरीहि नः। इन्द॒विन्द्रे॑ण नो यु॒जा॥

जो लोग सत्कर्मी बनकर ईश्वरपरायण होते हैं, परमात्मा सर्वोपरि ऐश्वर्य का उन्हीं को दान देता है॥९॥३७॥यह ग्यारहवाँ सूक्त और सैंतीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥अब उक्त परमात्मा को यज्ञादि कर्मों का कर्तारूप से वर्णन करते हैं।

सोमा॑ असृग्र॒मिन्द॑वः सु॒ता ऋ॒तस्य॒ साद॑ने। इन्द्रा॑य॒ मधु॑मत्तमाः॥

जो सब प्रकार की सच्चाईयों का एकमात्र अधिकरण है और जिससे वसन्तादि यज्ञरूप ऋतुओं का परिवर्तन होता है, वही परमात्मा इस निखिल ब्रह्माण्ड का अधिपति है॥१॥

अ॒भि विप्रा॑ अनूषत॒ गावो॑ व॒त्सं न मा॒तरः॑। इन्द्रं॒ सोम॑स्य पी॒तये॑॥

जब तक पुरुष सौम्य स्वभाव परमात्मा का आश्रयण नहीं करता, तब तक उसके स्वभाव में सौम्य भाव नहीं आ सकते और उसका आश्रयण करना साधारण रीति से हो तो कोई अपूर्वता उत्पन्न नहीं कर सकता। जब पुरुष परमात्मा में इस प्रकार अनुरक्त होता है, जैसा कि वत्स अपनी माता में अनुरक्त होते हैं अथवा इन्द्रिय अपने शब्दादि विषयों में अनुरक्त होती है, इस प्रकार की अनुरक्ति के विना परमात्मा के भावों को पुरुष कदापि ग्रहण नहीं कर सकता॥२॥

म॒द॒च्युत्क्षे॑ति॒ साद॑ने॒ सिन्धो॑रू॒र्मा वि॑प॒श्चित्। सोमो॑ गौ॒री अधि॑ श्रि॒तः॥

कर्मयज्ञ योगयज्ञ जपयज्ञ इस प्रकार यज्ञ नाना प्रकार के हैं, परन्तु ‘यजनं यज्ञः’ जिसमें ईश्वर का उपासनारूप अथवा विद्वानों की संगतिरूप अथवा दानात्मक कर्म किये जायँ, उसका नाम यहाँ यज्ञ है और वह यज्ञ ईश्वर की प्राप्ति का सर्वोपरि साधन है। इसी अभिप्राय से ‘यज्ञो वै विष्णुः’ श.। ३७। परमात्मा का नाम भी यज्ञ है, इसी भाव को वर्णन करते हुये गीता में यह कहा है कि ‘एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे’ इस प्रकार के कई एक यज्ञ वेद में वर्णन किये गये हैं॥३॥

दि॒वो नाभा॑ विचक्ष॒णोऽव्यो॒ वारे॑ महीयते। सोमो॒ यः सु॒क्रतुः॑ क॒विः॥

जिस प्रकार ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ तै २। १ सत्य ज्ञान और अनन्तादि गुणोंवाला ब्रह्म है, यह वाक्य सिद्धवस्तु को बोधन करता है, इसी प्रकार उक्त मन्त्र भी सिद्ध वस्तु का बोधक है और जो इस में महीयते कहा गया है, ये भी सिद्धवस्तु का बोधक है, परन्तु इस से ये शङ्का कदापि नहीं होनी चाहिये कि इस में कर्तव्य का उपदेश नहीं, क्योंकि जब महीयते कह दिया तो अर्थ ये निकले कि वह पूजा जाता है। पूजा एक प्रकार का कर्म है, उसी को कर्तव्य कहते हैं। तात्पर्य ये निकला कि परमात्मा ने इस मन्त्र में उपदेश किया है कि तुम लोग उक्तगुणसम्पन्न परमात्मा का पूजन करो अर्थात् सन्ध्यावन्दनादि कर्मों से उसे वन्दनीय समझो॥४॥

यः सोमः॑ क॒लशे॒ष्वाँ अ॒न्तः प॒वित्र॒ आहि॑तः। तमिन्दुः॒ परि॑ षस्वजे॥

विद्वान् लोग परमात्मा की अभिव्यक्ति अर्थात् आविर्भाव को सब पवित्र वस्तुओं में उपलब्ध करते हैं। तात्पर्य ये है कि जो-जो विभूतिवाली वस्तु है, उसमें वे परमात्मा के तेज को अनुभव करते हैं। मालूम होता है कि ‘यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्’।  कि जो विभूतिवाली वस्तु अथवा शोभावाली वा यों कहो कि बलवाली है, वह सब परमात्मा के तेज से ही उत्पन्न हुई है। मालूम होता है गीता का यह भाव भी पूर्वोक्त मन्त्रों से ही लिखा गया है॥५॥३८॥

प्र वाच॒मिन्दु॑रिष्यति समु॒द्रस्याधि॑ वि॒ष्टपि॑। जिन्व॒न्कोशं॑ मधु॒श्चुत॑म्॥

परमात्मा के नियम से समुद्र अर्थात् अन्तरिक्ष में जलों का सञ्चय रहता है, क्योंकि समुद्र के अर्थ ये हैं, जिस में जलों का भली-भाँति सञ्चार हो अर्थात् इतस्ततः गमन हो, उसको समुद्र कहते हैं। अन्तरिक्षलोक में मेघों का इतस्ततः गमन होता है, इसलिये मुख्य नाम समुद्र इन्हीं का है। तात्पर्य ये है कि जिस परमात्मा ने इन विशाल नियमों को बनाया है, उसी परमात्मा ने वेदरूपी वाणी को प्रकट किया है ॥६॥

नित्य॑स्तोत्रो॒ वन॒स्पति॑र्धी॒नाम॒न्तः स॑ब॒र्दुघः॑। हि॒न्वा॒नो मानु॑षा यु॒गा॥

बुद्धियों का अन्त उसको इस अभिप्राय से कथन किया गया है कि मनुष्य की बुद्धि उसके पारावार को नहीं पा सकती, इसलिये उसने मनुष्यों पर अत्यन्त करुणा करके अपने वेदरूपी ज्ञान का प्रकाश किया है॥७॥

अ॒भि प्रि॒या दि॒वस्प॒दा सोमो॑ हिन्वा॒नो अ॑र्षति। विप्र॑स्य॒ धार॑या क॒विः॥

आ प॑वमान धारय र॒यिं स॒हस्र॑वर्चसम्। अ॒स्मे इ॑न्दो स्वा॒भुव॑म्॥

परमात्मा जिन पुरुषों के कर्मों द्वारा प्रसन्न होता है, उनको अनन्त प्रकार की दीप्तियोंवाले ग्रहों को देता है और नानाविध ऐश्वर्य से उनको सम्पन्न करता है॥९॥यह ऋग्वेद के छठे अष्टक में सातवाँ अध्याय और उन्तालीसवाँ वर्ग नवम मण्डल में बारहवाँ सूक्त समाप्त हुआ॥

सोमः॑ पुना॒नो अ॑र्षति स॒हस्र॑धारो॒ अत्य॑विः। वा॒योरिन्द्र॑स्य निष्कृ॒तम्॥

यद्यपि परमात्मा सर्वरक्षक है, वह किसी को द्वेषदृष्टि से नहीं देखता, तथापि वह सत्कर्मी पुरुषों को शुभ फल देता है और असत्कर्मियों को अशुभ, इसी अभिप्राय से उस को कर्मशील पुरुषों का प्यारा वर्णन किया है॥१॥

पव॑मानमवस्यवो॒ विप्र॑म॒भि प्र गा॑यत। सु॒ष्वा॒णं दे॒ववी॑तये॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे विद्वानों! तुम उस पुरुष की उपासना करो, जो सर्वप्रेरक है और सबको पवित्र करनेवाला है और व्यापकरूप से सर्वत्र स्थिर है॥२॥

पव॑न्ते॒ वाज॑सातये॒ सोमाः॑ स॒हस्र॑पाजसः। गृ॒णा॒ना दे॒ववी॑तये॥

जो लोग ईश्वर पर विश्वास रख कर अनन्त प्रकार के कला-कौशलादि बलों से सम्पन्न होते हैं, वे ही सब प्रजा को पवित्र करते हैं अर्थात् अपने ज्ञान से प्रजा की रक्षा करते हैं॥३॥

उ॒त नो॒ वाज॑सातये॒ पव॑स्व बृह॒तीरिषः॑। द्यु॒मदि॑न्दो सु॒वीर्य॑म्॥

ते नः॑ सह॒स्रिणं॑ र॒यिं पव॑न्ता॒मा सु॒वीर्य॑म्। सु॒वा॒ना दे॒वास॒ इन्द॑वः॥

यहाँ ‘व्यत्ययो बहुलम्’ इस सूत्र से एकवचन के स्थान में बहुवचन हुआ है, इसलिये ईश्वर का ही ग्रहण समझना चाहिये, किसी अन्य का नहीं॥५॥१॥

अत्या॑ हिया॒ना न हे॒तृभि॒रसृ॑ग्रं॒ वाज॑सातये। वि वार॒मव्य॑मा॒शवः॑॥

जो पुरुष ज्ञानस्वरूप परमात्मा की उपासना करते हैं और एकमात्र उसी का भरोसा रखते हैं, वे धर्मयुद्धों में सदैव विजयी होते हैं॥६॥

वा॒श्रा अ॑र्ष॒न्तीन्द॑वो॒ऽभि व॒त्सं न धे॒नवः॑। द॒ध॒न्वि॒रे गभ॑स्त्योः॥

उपासक पुरुष जब शुद्ध हृदय से ईश्वर की उपासना करता है, तो ईश्वर का प्रकाश उसको आकर प्रकाशित करता है। ‘उपास्यतेऽनेनेत्युपासनम्’ जिससे ईश्वर की समीपता लाभ की जाय, उस कर्म का नाम उपासन कर्म है। समीपता के अर्थ यहाँ ज्ञान द्वारा समीप होने के हैं, किसी देश द्वारा समीप होने के नहीं, इसलिये जब परमात्मा ज्ञान द्वारा समीप होता है, तो उसका प्रकाश उपासक के हृदय को अवश्यमेव प्रकाशित करता है॥७॥

जुष्ट॒ इन्द्रा॑य मत्स॒रः पव॑मान॒ कनि॑क्रदत्। विश्वा॒ अप॒ द्विषो॑ जहि॥

जो लोग ईश्वरपरायण होकर अपनी जीवनयात्रा करते हैं, परमात्मा उन के राग-द्वेषादि भावों को निवृत्त करता है॥८॥

अ॒प॒घ्नन्तो॒ अरा॑व्णः॒ पव॑मानाः स्व॒र्दृशः॑। योना॑वृ॒तस्य॑ सीदत॥

कर्मयोगी और ज्ञानयोगियों के यज्ञों में परमात्मा अपने सद्भावों से आकर विराजमान होता है। तात्पर्य यह है कि परमात्मा के भाव सत्कर्मों द्वारा अभिव्यक्त होते हैं, इसीलिये आकर विराजना कथन किया गया है। वस्तुतः परमात्मा सदैव कूटस्थनित्य है, कहीं जाता आता नहीं, इसी अभिप्राय से कहा है कि “तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके” यजु ४०। ५। वह अज्ञानियों की दृष्टि से दूर है, वास्तव में समीप है, इस प्रकार वेद उसको सर्वत्र गतिरहित वर्णन करता है॥९॥यह तेरहवाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

परि॒ प्रासि॑ष्यदत्क॒विः सिन्धो॑रू॒र्मावधि॑ श्रि॒तः। का॒रं बिभ्र॑त्पुरु॒स्पृह॑म्॥

उस परमात्मा ने इस ब्रह्माण्ड में नाना प्रकार की रचनाओं को बनाया है, कहीं महासागरों में अनन्त प्रकार की लहरें उठती हैं, कहीं हिमालय के उच्च शिखर नभोमण्डलवर्ती वायुओं से संघर्षण कर रहे हैं, एवं नाना प्रकार की रचनाओं का रचयिता वही परमात्मा है॥१॥

गि॒रा यदी॒ सब॑न्धवः॒ पञ्च॒ व्राता॑ अप॒स्यवः॑। प॒रि॒ष्कृ॒ण्वन्ति॑ धर्ण॒सिम्॥

ज्ञानयोगी पुरुष जब शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध इन पाँच विषयों को हटा कर अपने पाँचों ज्ञानेन्द्रियों को ईश्वर की ओर लगा देता है, तो इस सम्पूर्ण संसार को अलंकृत करता है। तात्पर्य यह है कि स्वभावतः बहिर्मुख इन्द्रियों को जिनको “पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः” कठ ४। १। स्वयंभू विधाता ने स्वभावतः बाहर की ओर बहनेवाली बनाया है, कोई एक धीर वीर पुरुष ही उनके वेग को बाहर से हटा कर उनको अन्तर्मुखी बनाता है, अन्य नहीं॥२॥

आद॑स्य शु॒ष्मिणो॒ रसे॒ विश्वे॑ दे॒वा अ॑मत्सत। यदी॒ गोभि॑र्वसा॒यते॑॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यों! तुम्हारे इन्द्रिय तुमको स्वभाव से बहिमुर्ख बनाते हैं। तुम यदि संयमी बन कर उनका संयम करो, तो इन्द्रिय परमात्मा के स्वरूप को विषय करके तुम्हें आनन्दित करेंगे। इसी अभिप्राय से उपनिषद् में कहा है कि “कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षत्” क० ४। १। कोई धीर पुरुष ही प्रत्यगात्मा को देख सकता है। यहाँ देखने के अर्थ व इन्द्रियगोचर करने के अर्थ मूर्तिमान् पदार्थ के समान देखने के नहीं, किन्तु जिस प्रकार निराकार और निरूप होने पर भी सुखु-दुःखादिकों का अनुभव होता है, इस प्रकार अनुभव का विषय बनाने का नाम यहाँ देखना व इन्द्रियगोचर करना है। इसी अभिप्राय से “दृश्यते त्वग्र्या बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः” कि वह सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा देखा जा सकता है, कहा है। सूक्ष्म बुद्धि से तात्पर्य यहाँ योगज सामर्थ्य का है अर्थात् चित्तवृत्तिनिरोध द्वारा परमात्मा का अनुभव हो सकता है। इसी अभिप्राय से कहा है कि “तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्” उस समय द्रष्टा के स्वरूप में स्थिति हो जाती है। इसी अभिप्राय से कहा है कि “यदि गोभिर्वसायते”॥३॥

नि॒रि॒णा॒नो वि धा॑वति॒ जह॒च्छर्या॑णि॒ तान्वा॑। अत्रा॒ सं जि॑घ्नते यु॒जा॥

ध्यान का विषय हुआ वह परमात्मा जिज्ञासुओं के अन्तःकरणों को निर्मल करता है और जिज्ञासुजन उस की उपासना करते हुए अज्ञान का नाश करके परम गति को प्राप्त होते हैं॥४॥

न॒प्तीभि॒र्यो वि॒वस्व॑तः शु॒भ्रो न मा॑मृ॒जे युवा॑। गाः कृ॑ण्वा॒नो न नि॒र्णिज॑म्॥

जो पुरुष अपने मन को शुद्ध करते हैं, वे उस पुरुष का साक्षात्कार करते हैं। उन पुरुषों की चित्तवृत्तियें उसको हस्तामलकवत् साक्षाद्रूप से अनुभव करती हैं अर्थात् शुद्ध मन द्वारा साक्षात् किये हुए परमात्मध्यान में फिर किसी प्रकार का भी संशय व विपर्ययज्ञान नहीं होता॥५॥३॥

अति॑ श्रि॒ती ति॑र॒श्चता॑ ग॒व्या जि॑गा॒त्यण्व्या॑। व॒ग्नुमि॑यर्ति॒ यं वि॒दे॥

जब धारणा-ध्यानादि योगाङ्गों से चित्त की वृत्तियें निर्मल होती हैं, तो उक्त परमात्मा को विषय करती हैं। जो पुरुष शब्दप्रमाण पर विश्वास करते हैं, वे साधनसम्पन्न वृत्तियों के द्वारा उसका अनुभव करते हैं, अन्य नहीं॥६॥

अ॒भि क्षिपः॒ सम॑ग्मत म॒र्जय॑न्तीरि॒षस्पति॑म्। पृ॒ष्ठा गृ॑भ्णत वा॒जिनः॑॥

परमात्मा सब पदार्थों का अधिकरण है अर्थात् उसी की सत्ता से सब पदार्थ स्थिर हो रहे हैं। उस बलस्वरूप परमात्मा का साक्षात्कार समाधि अवस्था के विना कदापि नहीं हो सकता॥७॥

परि॑ दि॒व्यानि॒ मर्मृ॑श॒द्विश्वा॑नि सोम॒ पार्थि॑वा। वसू॑नि याह्यस्म॒युः॥

पार्थिवानि यह कथन यहाँ उपलक्षणमात्र है अर्थात् पृथिवीलोक अथवा द्युलोक के जितने ऐश्वर्य हैं, उनको परमात्मा हमें प्रदान करे। इस सूक्त में परमात्मा के सर्वाश्रयत्व और सर्वदातृत्वादि अनेक प्रकार के गुणों का वर्णन किया है॥८॥४॥यह चौदहवाँ सूक्त और चौथा वर्ग पूरा हुआ॥

ए॒ष धि॒या या॒त्यण्व्या॒ शूरो॒ रथे॑भिरा॒शुभिः॑। गच्छ॒न्निन्द्र॑स्य निष्कृ॒तम्॥

परमात्मा जीवों को कर्मों का फल भुगाने के लिये इस संसाररूपी रचना को रचता है और अपनी विविध शक्तियों के द्वारा सर्वत्र परिपूर्ण हो रहा है अर्थात् जिस-२ स्थान में परमात्मा की व्यापकता है, उस-२ स्थान में परमात्मा अनन्त शक्तियों के साथ विराजमान है॥१॥

ए॒ष पु॒रू धि॑यायते बृह॒ते दे॒वता॑तये। यत्रा॒मृता॑स॒ आस॑ते॥

परमात्मा अनन्तकर्मा है, उसकी शक्तियों के पारावार को कोई पा नहीं सकता। इसी अभिप्राय से कहा है “तस्मिन् दृष्टे परावरे” उस परावर ब्रह्म के   जानने पर हृदय की ग्रन्थि खुल जाती है और इसी अभिप्राय से “परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते” इत्यादि वाक्यों में उपनिषत्कार ऋषियों ने भी कहा है कि उसकी शक्तियें असंख्यात हैं, उसी को जान कर मनुष्य अमृत पद को लाभ कर सकता है, अन्यथा नहीं॥२॥

ए॒ष हि॒तो वि नी॑यते॒ऽन्तः शु॒भ्राव॑ता प॒था। यदी॑ तु॒ञ्जन्ति॒ भूर्ण॑यः॥

जो लोग यम-नियमों का पालन करते हैं, वे अपने अन्तःकरण में परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं और परम पद को लाभ करते हैं॥३॥

ए॒ष शृङ्गा॑णि॒ दोधु॑व॒च्छिशी॑ते यू॒थ्यो॒३॒॑ वृषा॑। नृ॒म्णा दधा॑न॒ ओज॑सा॥

वही परमात्मा कोटानुकोटि ब्रह्माण्डों का चलानेवाला है और उसी ने इन ब्रह्माण्डों में विद्युत् आदि शक्तियों को उत्पन्न करके अनेक प्रकार के आकर्षण विकर्षण आदि गुणों को उत्पन्न किया है। एकमात्र उसकी उपासना करने से मनुष्य सद्गति को लाभ कर सकता है॥४॥

ए॒ष रु॒क्मिभि॑रीयते वा॒जी शु॒भ्रेभि॑रं॒शुभिः॑। पतिः॒ सिन्धू॑नां॒ भव॑न्॥

प्रकृति परिणामिनी नित्य है। परमात्मा की कृति अर्थात् यत्न से प्रकृति परिणामभाव को धारण करती है। उस से महत्तत्त्व और महत्तत्त्व से अहंकार और अहंकार से पञ्चतन्मात्र, इस प्रकार सृष्टि की रचना होती है। इस अभिप्राय से उसको स्यन्दनशील अर्थात् बहनेवाली प्रकृतियों का अधिपति कथन किया गया है। उक्त प्रकार के गुणोंवाला परमात्मा उस पुरुष के हृदय में अपनी अनन्त शक्तियों का आविर्भाव करता है, जो पुरुष अपनी अनन्य भक्ति से उसकी उपासना करता है॥५॥

ए॒ष वसू॑नि पिब्द॒ना परु॑षा ययि॒वाँ अति॑। अव॒ शादे॑षु गच्छति॥

जो पुरुष अपने पवित्र भावों से परमात्मपरायण होते हैं, परमात्मा उनकी अवश्यमेव रक्षा करता है॥६॥

ए॒तं मृ॑जन्ति॒ मर्ज्य॒मुप॒ द्रोणे॑ष्वा॒यवः॑। प्र॒च॒क्रा॒णं म॒हीरिषः॑॥

उपासकों को चाहिये कि वे उपासनासमय में परमात्मा के विराट्स्वरूप का ध्यान करते हुए उसके गुणों द्वारा उसका उपासन करें अर्थात् उसकी शक्तियों का अनुसन्धान करते हुए उसके विराट्स्वरूप को भी अपनी बुद्धि में स्थिर करें॥७॥

ए॒तमु॒ त्यं दश॒ क्षिपो॑ मृ॒जन्ति॑ स॒प्त धी॒तयः॑। स्वा॒यु॒धं म॒दिन्त॑मम्॥

परमात्मा अपनी स्वतन्त्रसत्ता से विराजमान है। जब वह श्रेष्ठों का उद्धार और दुष्टों का दमन करता है, तब उसे किसी शस्त्रादि साधन की आवश्यकता नहीं, किन्तु उसका स्वरूप ही आयुध का काम करता है। इस प्रकार के स्वतन्त्रसत्तासम्पन्न परमात्मा को हृदय में धारण करनेवाले अत्यन्त आनन्द को प्राप्त होते हैं॥८॥७॥यह पन्द्रहवाँ सूक्त और पाँचवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र ते॑ सो॒तार॑ ओ॒ण्यो॒३॒॑ रसं॒ मदा॑य॒ घृष्व॑ये। सर्गो॒ न त॒क्त्येत॑शः॥

परमात्मा उपदेश करता है कि हे मनुष्यों! तुम ऐसे रस का पान करो, जिससे तुम में बल उत्पन्न हो और शत्रुओं पर विजयी होने के लिये तुम सिंह के समान आक्रमण कर सको! यहाँ इस रस के अर्थ किसी रसविशेष के नहीं किन्तु आह्लादजनक रसमात्र के हैं॥वा यों कहो कि सौम्य स्वभाव उत्पन्न करनेवाले रस के हैं, इसलिये इसको सोमरस भी कहा जा सकता है और ‘धात्वर्थ’ भी इसका यह है कि ‘रस आस्वादने रस्यते स्वाद्यत इति’ जो आनन्द से वा आनन्द के लिये आस्वादन किया जाय, उसका नाम यहाँ रस है। इस प्रकरण में यह शङ्का नहीं करनी चाहिये कि सोम के अर्थ रस के और कहीं सोम के अर्थ ईश्वर के ऐसा व्यत्यय क्यों ? इसका उत्तर यह है कि “स्याच्चैकस्य ब्रह्मशब्दवत्” २। ३। ५। इस ब्रह्मसूत्र में इस बात का निर्णय कर दिया है कि एक प्रकरण ही नहीं, किन्तु एक वाक्य में भी तात्पर्य भेद से दो अर्थ हो जाते हैं, जैसे कि “तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व तपो ब्रह्म” तै० ३। २। तप से ब्रह्म की जिज्ञासा करो और तप ब्रह्म है। यहाँ पहले ब्रह्म शब्द के अर्थ ईश्वर के और द्वितीय ब्रह्म शब्द के अर्थ तप के हैं और यह नियम वेद ब्राह्मण उपनिषद् और शास्त्र सर्वत्र ही पाया जाता है, जैसे कि शतपथ में यज्ञ नाम यज्ञ का भी और यज्ञ नाम ईश्वर का भी है। अग्नि नाम भौतिक अग्नि का भी और अग्नि नाम ईश्वर का भी है॥इस नियम के अनुसार यहाँ सोम के अर्थ कहीं सोम रस के और कहीं ईश्वर के किये गये हैं, इसमें कोई दोष नहीं॥१॥

क्रत्वा॒ दक्ष॑स्य र॒थ्य॑म॒पो वसा॑न॒मन्ध॑सा। गो॒षामण्वे॑षु सश्चिम॥

जीवों की प्रार्थना द्वारा ईश्वर उपदेश करते हैं कि हे जीवों! तुम ऐसे रस की प्राप्ति की प्रार्थना करो, जिससे तुम्हारी चतुराई बढ़े, तुम्हारी स्फूर्ति बढ़े और तुम्हारी इन्द्रियों की शक्तियाँ बढ़ें और तुम ऐश्वर्यसम्पन्न होओ॥२॥

अन॑प्तम॒प्सु दु॒ष्टरं॒ सोमं॑ प॒वित्र॒ आ सृ॑ज। पु॒नी॒हीन्द्रा॑य॒ पात॑वे॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यों! तुम दैवी सम्पत्ति के देनेवाले अर्थात् सौम्य स्वभाव के बनानेवाले सोम रस की प्रार्थना करो, ताकि तुम कर्मयोगियों को कर्मों में तत्पर करने के लिये पर्याप्त हो॥तात्पर्य यह है कि जो पुरुष अन्नादि ओषधियों के रसों का पान करके अपने कामों में तत्पर होते हैं, वे पूरे-२ कर्मयोगी बन सकते हैं और जो लोग मादक द्रव्यों का सेवन करते हैं, वे अपनी इन्द्रियों की शक्तियों को नष्ट-भ्रष्ट करके स्वयं भी नाश को प्राप्त हो जाते हैं॥३॥

प्र पु॑ना॒नस्य॒ चेत॑सा॒ सोमः॑ प॒वित्रे॑ अर्षति। क्रत्वा॑ स॒धस्थ॒मास॑दत्॥

सोमरस, जो कि पवित्र और सुन्दर द्रव्यों से निकाला गया है अर्थात् जो स्वभाव को सौम्य बनाता है, उसका रस मनुष्य में शुभ बुद्धि को उत्पन्न करता है॥४॥

प्र त्वा॒ नमो॑भि॒रिन्द॑व॒ इन्द्र॒ सोमा॑ असृक्षत। म॒हे भरा॑य का॒रिणः॑॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे शूरवीर लोगो! मैंने तुम्हारे लिये अनन्त प्रकार के रसों को उत्पन्न किया है, जिनका उपभोग करके तुम आह्लादित होकर अन्यायकारी शत्रुओं के विजय के लिये शक्तिसम्पन्न हो सकते हो॥५॥

पु॒ना॒नो रू॒पे अ॒व्यये॒ विश्वा॒ अर्ष॑न्न॒भि श्रियः॑। शूरो॒ न गोषु॑ तिष्ठति॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे शूरवीर पुरुषों! तुम सम्पूर्ण ऐश्वर्यों को भोगते हुए भी इन्द्रिय के वशीभूत लोग शूरवीरता के धर्म को कदापि धारण नहीं कर सकते, इसलिये शूरवीरों के लिये संयमी बनना अत्यावश्यक है॥६॥

दि॒वो न सानु॑ पि॒प्युषी॒ धारा॑ सु॒तस्य॑ वे॒धसः॑। वृथा॑ प॒वित्रे॑ अर्षति॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे शूरवीर पुरुषों! तुम संयमी बनो, इन्द्रियारामी मत बनो। इन्द्रियारामी पुरुषों में जो सोमादि रसों की धाराएँ पड़ती हैं, वे मानों इस प्रकार पडती हैं, जिस प्रकार चोटी के ऊपर पड़ता हुआ जल इधर-उधर बह जाता है और उसमें कोई विचित्र भाव उत्पन्न नहीं करता। इसी प्रकार असंयमियों का दुग्धादि रसों का उपभोग करना है। यहाँ चोटी पर जल गिरने के दृष्टान्त से परमात्मा ने स्पष्ट रीति से बोधन कर दिया कि जो पुरुष वीर्य ही का संयम नहीं करते, न वे धीर वीर बन सकते हैं, न वे ज्ञानी विज्ञानी व ध्यानी बन सकते हैं। उक्त सब प्रकार की पदवियों के लिये मनुष्य का संयमी बनना अत्यन्त आवश्यक है। इसी अभिप्राय से योगसूत्र में कहा है कि ‘ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः’ यो० साध० ३८। ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठा अर्थात् इन्द्रियसंयमी बनने से पुरुष को वीर्य का लाभ होता है॥७॥

त्वं सो॑म विप॒श्चितं॒ तना॑ पुना॒न आ॒युषु॑। अव्यो॒ वारं॒ वि धा॑वसि॥

जो पुरुष परमात्मा का वरण करता है अर्थात् एकमात्र उसी पर विश्वास रखकर उसी को उपास्य देव ठहराता है, उसकी परमात्मा अवश्यमेव रक्षा करता है। वार शब्द का अर्थ यहाँ यह है कि ‘वृणुते इति वारः’ जो वरण करे, वह वार है। इसी प्रकार ‘सूते चराचरं जगदिति सोमः’ इस मन्त्र में सोम के अर्थ परमात्मा के हैं। तात्पर्य यह है कि उक्त परमात्मा की उपासना करनेवाला पुरुष सदैव कृतकार्य होता है, क्योंकि परमात्मा उसका रक्षक होता है, इसलिये उपासक के लिये परमात्मपरायण होना आवश्यक है॥८॥यह सोलहवाँ सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र नि॒म्नेने॑व॒ सिन्ध॑वो॒ घ्नन्तो॑ वृ॒त्राणि॒ भूर्ण॑यः। सोमा॑ असृग्रमा॒शवः॑॥

जो लोग शुद्ध हृदय से उसकी उपासना करते हैं और यम-नियमों द्वारा अपने आत्मा को संस्कृत करते हैं, उनके हृदय में अतिशीघ्र परमात्मा का प्रकाश उत्पन्न होता है॥१॥

अ॒भि सु॑वा॒नास॒ इन्द॑वो वृ॒ष्टयः॑ पृथि॒वीमि॑व। इन्द्रं॒ सोमा॑सो अक्षरन्॥

जिस प्रकार वर्षाकाल की वृष्टियें धरातल को सिक्त करके नाना प्रकार के अङ्कुर उत्पन्न करती हैं, इसी प्रकार परमात्मा की कृपादृष्टियें उपासकों के हृदय में नाना प्रकार के ज्ञान-विज्ञानादि भावों को उत्पन्न करती हैं॥२॥

अत्यू॑र्मिर्मत्स॒रो मदः॒ सोमः॑ प॒वित्रे॑ अर्षति। वि॒घ्नन्रक्षां॑सि देव॒युः॥

जिस पुरुष ने ज्ञानयोग और कर्मयोग द्वारा अपने आत्मा को संस्कृत किया है, वह ईश्वर के ज्ञान का पात्र कहलाता है। उक्त पात्र के हृदय में परमात्मा अपने ज्ञान को अवश्यमेव प्रकट करता है, जैसा कि “यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा वृणुते तनूं स्वाम्” क० ३। २३। जिसको यह पात्र समझता है, उसको अपना आत्मा समझकर स्वीकार करता है॥३॥

आ क॒लशे॑षु धावति प॒वित्रे॒ परि॑ षिच्यते। उ॒क्थैर्य॒ज्ञेषु॑ वर्धते॥

जब वेदवेत्ता लोग मधुर ध्वनि से यज्ञों में उक्त परमात्मा का स्तवन करते हैं, तो मानों उसका साक्षात् रूप भान होने लगता है॥४॥

अति॒ त्री सो॑म रोच॒ना रोह॒न्न भ्रा॑जसे॒ दिव॑म्। इ॒ष्णन्त्सूर्यं॒ न चो॑दयः॥

परमात्मा की सत्ता से पृथिवी अन्तरिक्ष और द्यौ ये तीनों लोक स्थिर हैं और उसी की सत्ता में सूर्य चन्द्रमा आदि तेजस्वी पदार्थ सब स्थिर हैं अर्थात् उसी के नियम में विराजमान हैं, ‘भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः। भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः’ क० २। ६॥५॥

अ॒भि विप्रा॑ अनूषत मू॒र्धन्य॒ज्ञस्य॑ का॒रवः॑। दधा॑ना॒श्चक्ष॑सि प्रि॒यम्॥

यज्ञ के प्रारम्भ में उद्गाता आदि लोग पहले परमात्मा के महत्त्व का गायन करके फिर यज्ञ के अन्य कर्मों का आरम्भ करते हैं॥६॥

तमु॑ त्वा वा॒जिनं॒ नरो॑ धी॒भिर्विप्रा॑ अव॒स्यवः॑। मृ॒जन्ति॑ दे॒वता॑तये॥

याज्ञिक लोग जब ‘यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवम्’ इत्यादि मन्त्रों का पाठ करते हैं, केवल पाठ ही नहीं, किन्तु उसके वाच्यार्थ पर दृष्टि देकर तत्त्व का अनुशीलन करते हैं, तब परमात्मा का साक्षात्कार होता है। इसी अभिप्राय से कहा है कि ‘धीभिः त्वामृजन्ति’ अर्थात् बुद्धि द्वारा तुम्हारा परिशीलन करते हैं॥७॥

मधो॒र्धारा॒मनु॑ क्षर ती॒व्रः स॒धस्थ॒मास॑दः। चारु॑ॠ॒ताय॑ पी॒तये॑॥

जो लोग सत्कर्मों में स्थिर हैं और सत्कर्मों के प्रचार के लिये यज्ञादि कर्म करते हैं, उनके उत्साह को परमात्मा अवश्यमेव बढ़ाता है॥८॥यह सत्रहवाँ सूक्त और सातवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

परि॑ सुवा॒नो गि॑रि॒ष्ठाः प॒वित्रे॒ सोमो॑ अक्षाः। मदे॑षु सर्व॒धा अ॑सि॥

परमात्मा विद्युदादि सब शक्तियों में विराजमान है, क्योंकि वह सर्वव्यापक है और जो-२ विभूतिवाली वस्तु हैं, उनमें सब प्रकार की शोभा के धारण करानेवाला परमात्मा ही है, कोई अन्य नहीं। तात्पर्य यह है कि यद्यपि व्यापकरूप से परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण है, तथापि विभूतिवाली वस्तुओं में उसकी अभिव्यक्ति विशेषरूप से पायी जाती है, इसी अभिप्राय से कहा है कि ‘मदेषु सर्वधा असि’॥१॥

त्वं विप्र॒स्त्वं क॒विर्मधु॒ प्र जा॒तमन्ध॑सः। मदे॑षु सर्व॒धा अ॑सि॥

परमात्मा ने अपनी विचित्र शक्तियों से नानाविध के रस उत्पन्न किये हैं और नानाप्रकार के ऐश्वर्य उत्पन्न किये हैं। वस्तुतः परमात्मा ही सब एश्वर्यों का अधिष्ठान और सब रसों की खान है॥२॥

तव॒ विश्वे॑ स॒जोष॑सो दे॒वासः॑ पी॒तिमा॑शत। मदे॑षु सर्व॒धा अ॑सि॥

परमात्मा के आनन्द को विज्ञानी लोग ही वस्तुतः पा सकते हैं, अन्य नहीं। कारण यह कि विविध प्रकार के ज्ञान के विना उसका आनन्द मिलना अति कठिन है॥३॥

आ यो विश्वा॑नि॒ वार्या॒ वसू॑नि॒ हस्त॑योर्द॒धे। मदे॑षु सर्व॒धा अ॑सि॥

जो सम्पूर्ण वस्तुओं को अपने हस्तगत करना चाहते हो, तो ईश्वर के उपासक बनो॥४॥

य इ॒मे रोद॑सी म॒ही सं मा॒तरे॑व॒ दोह॑ते। मदे॑षु सर्व॒धा अ॑सि॥

माता शब्द यहाँ उपलक्षणमात्र है, वास्तव में भाव यह है कि जीवों की माता-पिता के समान जो पृथिवीलोक और द्युलोक हैं, इनसे नानाविध भोग पैदा करनेवाला एकमात्र परमात्मा ही है, कोई अन्य नहीं॥५॥

परि॒ यो रोद॑सी उ॒भे स॒द्यो वाजे॑भि॒रर्ष॑ति। मदे॑षु सर्व॒धा अ॑सि॥

यद्यपि परमात्मा के ऐश्वर्य से कोई स्थान भी खाली नहीं, तथापि प्राकृत ऐश्वर्यों का स्थान जैसा द्युलोक और पृथिवीलोक है, ऐसा अन्य नहीं, इसी भाव से इन दोनों का वर्णन विशेष रीति से किया है॥६॥

स शु॒ष्मी क॒लशे॒ष्वा पु॑ना॒नो अ॑चिक्रदत्। मदे॑षु सर्व॒धा अ॑सि॥

जिस प्रकार परमात्मा के अन्तरिक्ष उदर और द्युलोक मूर्धस्थानी रूपकालङ्कार से माने गये हैं, इसी प्रकार उसके शब्दों को भी रूपकालङ्कार से कल्पना की गयी है। वास्तव में वह परमात्मा ‘अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम्’ कि वह शब्दस्पर्शादिगुणों से रहित है और अव्यय=अविनाशी है इत्यादि वाक्यों द्वारा शब्दादि गुणों से सर्वथा रहित वर्णन किया गया है। उपनिषदों का यह भाव भी ‘स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम्’ यजु० ४०। ८ कि वह निराकार परमात्मा सर्वत्र व्यापक है इत्यादि वेदमन्त्रों से लिया गया है॥७॥यह अठारहवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

यत्सो॑म चि॒त्रमु॒क्थ्यं॑ दि॒व्यं पार्थि॑वं॒ वसु॑। तन्नः॑ पुना॒न आ भ॑र॥

इससे परमात्मा से विविध धनादि ऐश्वर्य पाने के लिये शिक्षा की प्रार्थना है॥१॥

यु॒वं हि स्थः स्व॑र्पती॒ इन्द्र॑श्च सोम॒ गोप॑ती। ई॒शा॒ना पि॑प्यतं॒ धियः॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा ने जीवों को प्रार्थना द्वारा यह शिक्षा दी है कि तुम अपने अध्यापकों से और ईश्वर से सदैव शुभ शिक्षा की प्रार्थना किया करो॥२॥

वृषा॑ पुना॒न आ॒युषु॑ स्त॒नय॒न्नधि॑ ब॒र्हिषि॑। हरिः॒ सन्योनि॒मास॑दत्॥

परमात्मा जब प्रकृति के साथ मिलता है अर्थात् अपनी कृति से प्रकृति में नाना प्रकार की चेष्टायें उत्पन्न करता है, तो प्रकृति में पञ्चतन्मात्रादि कार्य उत्पन्न होते हैं अर्थात् सूक्ष्म भूतों के कारण उत्पन्न होते हैं। इस कार्यावस्था में प्रकृतिरूप योनि अर्थात् उपादान कारण का परमात्मा आश्रयण करता है, जैसा कि ‘योनिश्चेह गीयते’ वे० १। ४। २७। इस व्याससूत्र में भी योनिनाम प्रकृति का स्पष्ट है॥३॥

अवा॑वशन्त धी॒तयो॑ वृष॒भस्याधि॒ रेत॑सि। सू॒नोर्व॒त्सस्य॑ मा॒तरः॑॥

गऊ अपने बच्चे को दुग्ध पिलाकर जिस प्रकार परिपुष्ट करती है, इसी प्रकार प्रकृति अपने इस कार्यरूप ब्रह्माण्ड को अपने परमाण्वादि दुग्धों द्वारा परिपुष्ट करती है। तात्पर्य यह है कि प्रकृति इस जगत् का उपादान कारण है, परमात्मा निमित्त कारण है और यह संसार वत्ससमान प्रकृति और वृषभरूपी पुरुष का कार्य है॥४॥

कु॒विद्वृ॑ष॒ण्यन्ती॑भ्यः पुना॒नो गर्भ॑मा॒दध॑त्। याः शु॒क्रं दु॑ह॒ते पयः॑॥

तात्पर्य यह है कि जलादि सूक्ष्म भूतों से यह ब्रह्माण्ड स्थूलावस्था में आता है। पञ्च तन्मात्रा के कार्य जो पाँच सूक्ष्म भूत उन्हीं का कार्य यह सब संसार है, जैसा कि ‘तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः, आकाशाद्वायुः, वायोरग्निरग्नेरापोऽद्भ्यः पृथिवी’ तै० २। १॥इत्यादि वाक्यों में निरूपण किया है कि परमात्मारूपी निमित्त कारण से प्रथम आकाशरूप तत्त्व का आर्विभाव हुआ, जो एक अतिसूक्ष्मतत्त्व और जिसका शब्द गुण है फिर उससे वायु और वायु के संघर्षण से अग्नि और अग्नि से फिर जल आर्विभाव में अर्थात् स्थूलावस्था में आया। उसके अनन्तर पृथिवी ने स्थूलरूप को धारण किया, यह कार्यक्रम है, जिसको उक्त मन्त्र ने वर्णन किया है॥५॥

उप॑ शिक्षापत॒स्थुषो॑ भि॒यस॒मा धे॑हि॒ शत्रु॑षु। पव॑मान वि॒दा र॒यिम्॥

मित्रदल से तात्पर्य यहाँ उस दल का है, जो न्यायकारी और दोनों पर दया और प्रेम करनेवाला हो। शत्रुदल से तात्पर्य उस दल का है, जो “शातयतीति शत्रुः” शुभगुणों का नाश करनेवाला हो, इसलिये उक्त मन्त्रार्थ में अन्याय का दोष नहीं, क्योंकि न्याय यही चाहता है कि दैवी सम्पत्ति के गुण रखनेवाले वृद्धि को प्राप्त हों और आसुरी सम्पत्ति के रखनेवाले नाश को प्राप्त हों॥६॥

नि शत्रोः॑ सोम॒ वृष्ण्यं॒ नि शुष्मं॒ नि वय॑स्तिर। दू॒रे वा॑ स॒तो अन्ति॑ वा॥

प्र क॒विर्दे॒ववी॑त॒येऽव्यो॒ वारे॑भिरर्षति। सा॒ह्वान्विश्वा॑ अ॒भि स्पृधः॑॥

परमात्मा विद्वानों को ज्ञानप्रदान से और न्यायकारी सैनिकों को बलप्रदान से तृप्त करता है॥१॥

स हि ष्मा॑ जरि॒तृभ्य॒ आ वाजं॒ गोम॑न्त॒मिन्व॑ति। पव॑मानः सह॒स्रिण॑म्॥

परमात्मा परमात्मपरायण पुरुषों को अनन्त प्रकार का बल और बुद्धि प्रदान करता है॥२॥

परि॒ विश्वा॑नि॒ चेत॑सा मृ॒शसे॒ पव॑से म॒ती। स नः॑ सोम॒ श्रवो॑ विदः॥

परमात्मपरायण पुरुषों की परमात्मा सब प्रकार की रक्षा करता है और उनको ऐश्वर्य प्रदान करता है॥३॥

अ॒भ्य॑र्ष बृ॒हद्यशो॑ म॒घव॑द्भ्यो ध्रु॒वं र॒यिम्। इषं॑ स्तो॒तृभ्य॒ आ भ॑र॥

परमात्मा सदाचारी और संयमी पुरुषों के धनादि ऐश्वर्य और यश को दृढ करता है॥४॥

त्वं राजे॑व सुव्र॒तो गिरः॑ सो॒मा वि॑वेशिथ। पु॒ना॒नो व॑ह्ने अद्भुत॥

परमात्मा सब नियमों का नियन्ता है। नियम पालने की शक्ति मनुष्यों में उसी की कृपा से आती है॥५॥

स वह्नि॑र॒प्सु दु॒ष्टरो॑ मृ॒ज्यमा॑नो॒ गभ॑स्त्योः। सोम॑श्च॒मूषु॑ सीदति॥

यद्यपि परमात्मा के भाव सर्वत्र भावित हैं, तथापि जैसे न्यायकारी सम्राजों की सेनाओं में उनके रौद्र वीर भयानकादि भाव प्रस्फुटित होते हैं, ऐसे अन्यत्र नहीं॥६॥

क्री॒ळुर्म॒खो न मं॑ह॒युः प॒वित्रं॑ सोम गच्छसि। दध॑त्स्तो॒त्रे सु॒वीर्य॑म्॥

संसार की यह विविध प्रकार की रचना, जिसके पारावार को मनुष्य मन से भी नहीं पा सकता, वह परमात्मा के आगे एक लीलामात्र है॥७॥यह बीसवाँ सूक्त और दसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

ए॒ते धा॑व॒न्तीन्द॑वः॒ सोमा॒ इन्द्रा॑य॒ घृष्व॑यः। म॒त्स॒रासः॑ स्व॒र्विदः॑॥

परमात्मा स्वयंप्रकाश और अपने प्रभुत्वभाव से सर्वत्रैव विराजमान है॥१॥

प्र॒वृ॒ण्वन्तो॑ अभि॒युजः॒ सुष्व॑ये वरिवो॒विदः॑। स्व॒यं स्तो॒त्रे व॑य॒स्कृतः॑॥

जिन लोगों को परमात्मा की विविध प्रकार की रचना पर विश्वास है तथा जो परमात्मा की अनन्य भक्ति करते हैं, उनको परमात्मा अनन्त प्रकार के ऐश्वर्य प्रदान करता है॥२॥

वृथा॒ क्रीळ॑न्त॒ इन्द॑वः स॒धस्थ॑म॒भ्येक॒मित्। सिन्धो॑रू॒र्मा व्य॑क्षरन्॥

सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों में जितने ग्रह-उपग्रह हैं, वे सब परमात्मा को ही आश्रित करते हैं॥३॥

ए॒ते विश्वा॑नि॒ वार्या॒ पव॑मानास आशत। हि॒ता न सप्त॑यो॒ रथे॑॥

जिस प्रकार उपग्रह सूर्य आदि ग्रहों के इतस्ततः भ्रमण करते हैं, इसी प्रकार सब लोक-लोकान्तर इस विराट् के इतस्ततः परिभ्रमण करते हैं॥४॥

आस्मि॑न्पि॒शङ्ग॑मिन्दवो॒ दधा॑ता वे॒नमा॒दिशे॑। यो अ॒स्मभ्य॒मरा॑वा॥

उक्त कोटानुकोटि ब्रह्माण्ड उसी निराकार परमात्मा के आधार पर स्थित है॥५॥

ऋ॒भुर्न रथ्यं॒ नवं॒ दधा॑ता॒ केत॑मा॒दिशे॑। शु॒क्राः प॑वध्व॒मर्ण॑सा॥

जीव करने में स्वतन्त्र और भोगने में परतन्त्र है। ईश्वर कर्मों के भुगाने में उसे ऐसे नियमों में निगडित रखता है, जिसका वह अतिक्रमण कदापि नहीं कर सकता। बड़े-२ सम्राटों को भी कर्मों का फल अवश्यमेव भोगना पड़ता है। इसी अभिप्राय से यह कहा है कि जिस प्रकार जीवों को अपने अधीन रखता है॥६॥

ए॒त उ॒ त्ये अ॑वीवश॒न्काष्ठां॑ वा॒जिनो॑ अक्रत। स॒तः प्रासा॑विषुर्म॒तिम्॥

जो लोग परमात्मा की ओर झुकते हैं, अर्थात् यमनियमादि साधन सम्पन्न होकर संयमी बनते हैं, वे ब्रह्मविद्या की पराकाष्ठा को प्राप्त होते हैं। इसी अभिप्राय से उपनिषदों में यह कहा है कि ‘सा काष्ठा सा परा गतिः’॥७॥यह इक्कीसवाँ सूक्त और ग्यारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

ए॒ते सोमा॑स आ॒शवो॒ रथा॑ इव॒ प्र वा॒जिनः॑। सर्गाः॑ सृ॒ष्टा अ॑हेषत॥

परमात्मा में अनन्त शक्तियें पायी जाती हैं। उसकी शक्तियें विद्युत् के समान क्रियाप्रधान है। उसने कोटानुकोटि ब्रह्माण्डों को रचा है, जो शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध इन पाँच तन्मात्रों के कार्य हैं और इनकी ऐसी अचिन्त्य रचना है, जिसका अनुशीलन मनुष्य मन से भी भली-भाँति नहीं कर सकता॥१॥

ए॒ते वाता॑ इवो॒रवः॑ प॒र्जन्य॑स्येव वृ॒ष्टयः॑। अ॒ग्नेरि॑व भ्र॒मा वृथा॑॥

जिस प्रकार अग्नि की ज्वलनशक्ति स्वाभाविक है, इसी प्रकार वे ब्रह्माण्ड भी स्वाभाविक गतिशील बनाये गये हैं। स्वाभाविक से तात्पर्य यहाँ आकस्मिक नहीं है, किन्तु नियमपूर्वक भ्रमण का है। जैसे सूर्य चन्द्र आदि ईश्वरदत्त नियम से सदैव परिभ्रमण करते हैं, इसी प्रकार ये सब ब्रह्माण्ड ईश्वरदत्त नियम से परिभ्रमण करते हैं। इसी अभिप्राय से कहा है कि ‘भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः’ क० २। ६। उस के भय से अग्नि तपती है और उसी के भय से सूर्य तपता है। जिस प्रकार इसमें ईश्वराधीनता अग्न्यादि तत्त्वों की वर्णन की गयी है, इसी प्रकार सब कार्यजात ईश्वराधीन है॥२॥

ए॒ते पू॒ता वि॑प॒श्चितः॒ सोमा॑सो॒ दध्या॑शिरः। वि॒पा व्या॑नशु॒र्धियः॑॥

परमात्मा की रचना में जो कोटानुकोटि ब्रह्माण्ड हैं, वे सब ज्ञानी विज्ञानियों के ही समझ में आ सकते हैं, अन्यों के नहीं॥३॥

ए॒ते मृ॒ष्टा अम॑र्त्याः ससृ॒वांसो॒ न श॑श्रमुः। इय॑क्षन्तः प॒थो रजः॑॥

यों तो संसार में दिव्यादिव्य अनेक प्रकार के नक्षत्र हैं, पर जो दिव्य नक्षत्र हों, उनकी ज्योति प्रतिपल सहस्त्रों मील चलती हुई भी अभी तक इस भूगोल के साथ स्पर्श नहीं करने पायी। तात्पर्य यह है कि इस दिव्यरचनारूप ब्रह्माण्डों की इयत्ता को पाना परमात्मा का काम ही है, खद्योतकल्प क्षुद्र जीव केवल इनकी रचना को कुछ-कुछ अनुभव करता है, सब नहीं। हाँ योगी जन जो परमात्मा के योग में रत हैं, वे लोग साधारण लोगों से परमात्मा की रचना को अधिक अनुभव करते हैं। इसी अभिप्राय से वेद में अन्यत्र भी यह कहा है कि ‘को अद्धा वेद क इह प्रवोचत् कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः’ १०। ११। १३० कौन जान सकता है और कौन कह सकता है कि यह विविध प्रकार की सृष्टि परमात्मा ने कहाँ से और किस शक्ति से किस समय उत्पन्न की। इससे आगे यह निरूपण किया है कि इसका पूर्णरूप से ज्ञाता वह परमात्मा ही है, कोई अन्य नहीं। इसी अभिप्राय से ‘परिच्छिन्नं न सर्वोपादानम्’ सां० १। ७६॥इत्यादि सूत्रों में साख्यशास्त्र में प्रकृति को विभु माना है, पर वहाँ यह व्यवस्था समझनी चाहिये कि प्रकृति सापेक्ष विभु है अर्थात् अन्य कार्यों की अपेक्षा विभु है। वास्तव में इयत्तारहित विभु एकमात्र परमात्मा ही है, कोई अन्य वस्तु नहीं॥४॥

ए॒ते पृ॒ष्ठानि॒ रोद॑सोर्विप्र॒यन्तो॒ व्या॑नशुः। उ॒तेदमु॑त्त॒मं रजः॑॥

उक्त ब्रह्माण्डों की विविध रचना में परमात्मा ने इस प्रकार का आकर्षण और विकर्षण उत्पन्न किया है, जिसमें एक दूसरे के आश्रित होकर प्रतिक्षण गतिशील बन रहे हैं। वा यों कहो कि सत्त्व रज और तम प्रकृति के ये तीनों गुण अर्थात् प्रकृति की ये तीनों अवस्थायें जिस प्रकार एक दूसरे का आश्रयण करती हैं, इस प्रकार एक दूसरे को आश्रयण करता हुआ प्रत्येक ब्रह्माण्ड इस नभोमण्डल में वायुवेग से उत्तेजित तृण के समान प्रतिक्षण चल रहा है, कोई स्थिर नहीं॥५॥

तन्तुं॑ तन्वा॒नमु॑त्त॒ममनु॑ प्र॒वत॑ आशत। उ॒तेदमु॑त्त॒माय्य॑म्॥

प्रत्येक ब्रह्माण्ड मानों तन्तुरूप से अर्थात् रचनारूप यज्ञ से परमात्मा की संसृति को बढ़ा रहा है॥६॥

त्वं सो॑म प॒णिभ्य॒ आ वसु॒ गव्या॑नि धारयः। त॒तं तन्तु॑मचिक्रदः॥

इस सूक्त की समाप्ति करते हुए अर्थात् इस अगाध रचियता का वर्णन करते हुए परमात्मा रुद्ररूप का वर्णन करके इस सूक्त का उपसंहार करते हैं ‘रोदयति राक्षसानिति रुद्रः’ जो अन्यायकारी राक्षसों को रुला दे, उसका नाम यहाँ रुद्र है। वह रूद्ररूप परमात्मा अन्यायकारी दुष्ट दस्युओं से धन जन और राज्य श्री का अपहरण कर लेता है और न्यायकारी दान्त शान्त देवताओं को प्रदान कर देता है, इसी का नाम देवासुर-संग्राम है और इसी का नाम दैवी और आसुरी सम्पति है। देवासुर संग्राम है और इसी का नाम दैवी और आसुरी सम्पत्ति है। यह व्यवहार परमात्मा की विविध रचना में घटीयन्त्र के समान सदैव होता रहता है। जिस तरह घटीयन्त्र अर्थात् रहट के पात्र जो कभी भरे हुए होते हैं, वे ही ऊँचे चढ़ कर गर्व करते हुए सर्वथा रीते हो जाते हैं और जो रीते हो जाते हैं, वे ही विनय और नम्रता करते हुए भर जाते हैं अर्थात् परिपूर्ण हो जाते हैं वेही नियम और नम्रता करते हुए भर जाते हैं अर्थात् परिपूर्ण हो जाते हैं, इस लिए सदैव परमात्मा की विनयभाव से पूर्ण होने की अभिलाषा प्रत्येक अभ्युदयाभिलाषी को करनी चहिये॥७॥यह बाईसवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सोमा॑ असृग्रमा॒शवो॒ मधो॒र्मद॑स्य॒ धार॑या। अ॒भि विश्वा॑नि॒ काव्या॑॥

परमात्मा ने प्रकृति की सूक्ष्मावस्था से कोटि-२ ब्रह्माण्डों को उत्पन्न किया और तदनन्तर उसने विधिनिषेधात्मक सब विद्याभण्डार वेदों को रचा।   जैसा कि “तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे” इत्यादि वेदमन्त्र और “जन्माद्यस्य यतः” इत्यादि सूत्रों से प्रतिपादन कर आये हैं॥१॥

अनु॑ प्र॒त्नास॑ आ॒यवः॑ प॒दं नवी॑यो अक्रमुः। रु॒चे ज॑नन्त॒ सूर्य॑म्॥

प्रकृति की विविध प्रकार की शक्तियों से परमात्मा सम्पूर्ण कार्यों को उत्पन्न करता है। इन सब कार्यों का उपादान कारण प्रकृति अनादि है। इसी भाव से मन्त्रों में ‘प्रत्नासः’ पद से वर्णन किया है॥२॥

आ प॑वमान नो भरा॒र्यो अदा॑शुषो॒ गय॑म्। कृ॒धि प्र॒जाव॑ती॒रिषः॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा का नाम है “ऋच्छति गच्छति सर्वत्र प्राप्नोति इत्यर्य्यः परमात्मा” जो सर्वत्र व्यापक हो, उस का नाम अर्य है। उस अर्य परमात्मा से यह प्रार्थना की गयी है कि हे परमात्मन्! आप हमको दैवी सम्पत्ति के गुण दें अर्थात् हम को ऐसे पवित्र भाव दें, जिस से हम में आसुर भाव कदापि न आवे। जो पुरुष सदैव देवताओं के गुणों से सम्पन्न होने की प्रार्थना करते हैं, परमात्मा उन्हें सदैव दिव्य गुणों का दान देता है॥३॥

अ॒भि सोमा॑स आ॒यवः॒ पव॑न्ते॒ मद्यं॒ मद॑म्। अ॒भि कोशं॑ मधु॒श्चुत॑म्॥

सब विभूतियों की खानरूप ब्रह्माण्डों का वर्णन किया है। तात्पर्य यह है कि इस संसार में नानाप्रकार की वस्तुएँ जिन ब्रह्माण्डों में उत्पन्न होती हैं, उनको सोम नाम से कथन किया गया है॥४॥

सोमो॑ अर्षति धर्ण॒सिर्दधा॑न इन्द्रि॒यं रस॑म्। सु॒वीरो॑ अभिशस्ति॒पाः॥

जो ब्रह्माण्ड कोटि-२ नक्षत्रों को धारण किये हुए है और जिनमें नानाप्रकार के रस उत्पन्न होते हैं, उनका जन्मदाता एकमात्र परमात्मा ही है, अन्य कोई नहीं। इस मन्त्र में ब्रह्माण्डादिपति परमात्मा का वर्णन किया गया है और उसी की सत्ता से धारण किये हुए ब्रह्माण्डों का वर्णन है॥५॥

इन्द्रा॑य सोम पवसे दे॒वेभ्यः॑ सध॒माद्यः॑। इन्दो॒ वाजं॑ सिषाससि॥

परमात्मा ही कर्मयोगी को कर्म्मों में लगने का बल देता है और परमात्मा ही सत्कर्मी पुरुषों को यज्ञ करने का सामर्थ्य प्रदान करता है। बहुत क्या, परमात्मा ही अन्य धनादि सम्पूर्ण ऐश्वर्यों का प्रदान करता है॥६॥

अ॒स्य पी॒त्वा मदा॑ना॒मिन्द्रो॑ वृ॒त्राण्य॑प्र॒ति। ज॒घान॑ ज॒घन॑च्च॒ नु॥

परमात्मा उपदेश करता है कि हे मानुषों! सब आनन्दों से बढ़ कर ब्रह्मानन्द है। इस आनन्द के आगे सब प्रकार के मादक द्रव्य भी निरानन्द प्रतीत होते हैं। वास्तव में मदकारक वस्तु मनुष्य की बुद्धि का नाश करके आनन्ददायक प्रतीत होती है और ब्रह्मानन्द का भान किसी प्रकार के मद को उत्पन्न नहीं करता, किन्तु आह्लाद को उत्पन्न करता है, इसीलिये सब प्रकार के मद उसके सामने तुच्छ हो जाते हैं। जिस प्रकार राजमद, धनमद, यौवनमद, रूपमद इत्यादि सब मद विद्यानन्द के आगे तुच्छ प्रतीत होते हैं, इसी प्रकार विद्यानन्द योगानन्द इत्यादि आनन्द ब्रह्मानन्द के आगे सब फीके हो जाते हैं। इसी अभिप्राय से मन्त्र में कहा है कि “मदानाम्” सब मदों में से सच्चा मद एकमात्र परमात्मा का आनन्द है। इसी अभिप्राय से कहा है कि “रसो ह्येव हि स रसं ह्येव लब्ध्वा आनन्दी भवति” परमात्मा आनन्दस्वरूप है। उस आनन्दस्वरूप को लाभ करके पुरुष आनन्दित होता है॥७॥यह तेईसवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र सोमा॑सो अधन्विषुः॒ पव॑मानास॒ इन्द॑वः। श्री॒णा॒ना अ॒प्सु मृ॑ञ्जत॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यों! तुम परमात्मा के गुणों का चिन्तन करके अपने मन वाणी तथा शरीर को शुद्ध करो। जिस प्रकार जल शरीर की शुद्धि करता है, परमात्मोपासन मन की शुद्धि करता है और स्वाध्याय अर्थात् वेदाध्ययन वाणी की शुद्धि करता है, इसी प्रकार परमात्मा के ब्रह्मचर्य्यादि गुण शरीर मन और वाणी की शुद्धि करते हैं। ‘ब्रह्म’ नाम यहाँ वेद का है। इस व्रत में इन्द्रियों का संयम भी करना अत्यावश्यक होता है, इसलिये ब्रह्मचर्य्य का अर्थ जितेन्द्रियता भी है। मुख्य अर्थ इसके वेदाध्ययन व्रत के ही हैं। वेदाध्ययन व्रत इन्द्रिय संयमद्वारा शरीर की शुद्धि करता है, ज्ञानद्वारा मन की शुद्धि करता है और अध्ययनद्वारा वाणी की शुद्धि करता है, इसी प्रकार परमात्मा के सत्य ज्ञान और अनन्तादि गुण आह्लाद उत्पन्न करके मन वाणी तथा शरीर की शुद्धि के कारण होते हैं। इसी अभिप्राय से उपनिषदों ने “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” तै० २। २। इत्यादि वाक्यों में परमात्मा के सत्यादि गुणों का वर्णन किया है॥१॥

अ॒भि गावो॑ अधन्विषु॒रापो॒ न प्र॒वता॑ य॒तीः। पु॒ना॒ना इन्द्र॑माशत॥

कर्मयोगी पुरुषों की इन्द्रियें परमात्मा का साक्षात्कार करती हैं। यहाँ साक्षात्कार से तात्पर्य यह है कि वे परमात्मा को विषय करती हैं। जैसा कि “दृश्यते त्वग्र्या बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः” कठ० ३। १२। इस वाक्य में निराकार परमात्मा बुद्धि का विषय माना गया है। इसी प्रकार कर्मयोगी पुरुष की इन्द्रियें परमात्मा के साक्षात्कार के सामर्थ्य का लाभ करती हैं॥२॥

प्र प॑वमान धन्वसि॒ सोमेन्द्रा॑य॒ पात॑वे। नृभि॑र्य॒तो वि नी॑यसे॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि जो पुरुष कर्मयोगी व ज्ञानयोगी हैं, उनकी तृप्ति का कारण एकमात्र परमात्मा ही है। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार परमात्मा में ज्ञान बल क्रिया इत्यादि धर्म स्वभाविक पाये जाते हैं, इसी प्रकार कर्मयोगी और ज्ञानयोगी पुरुष भी साधनसम्पन्न हो कर उन धर्मों को धारण करते हैं॥३॥

त्वं सो॑म नृ॒माद॑नः॒ पव॑स्व चर्षणी॒सहे॑। सस्नि॒र्यो अ॑नु॒माद्यः॑॥

परमात्मा किसी से राग द्वेष नहीं करते, सब को स्वकर्मानुकूल फल देते हैं। अर्थात् एकमात्र परमात्मा ही पक्षपात से शून्य होकर न्याय करते हैं, इसीलिये परमात्मा को यहाँ “चर्षणीसह” अर्थात् सव पर दया करनेवाला कहा गया है॥४॥

इन्दो॒ यदद्रि॑भिः सु॒तः प॒वित्रं॑ परि॒धाव॑सि। अर॒मिन्द्र॑स्य॒ धाम्ने॑॥

परमात्मा अपनी व्यापकता से कर्मयोगी पुरुषों के अन्तःकरणों को अलंकृत करता है। यद्यपि परमात्मा प्रत्येक पुरुष के अन्तःकरण को विभूषित करता है तथापि कर्मयोग वा ज्ञानयोग द्वारा जिन पुरुषों ने अपने अन्तःकरणों को निर्मल बनाया है, उनके अन्तःकरण में परमात्मा का प्रकाश विशेषरूप से प्रतीत होता है, इसीलिये योगियों के अन्तःकरणों का विशेषरूप से प्रकाशित होना कथन किया गया है॥५॥

पव॑स्व वृत्रहन्तमो॒क्थेभि॑रनु॒माद्यः॑। शुचिः॑ पाव॒को अद्भु॑तः॥

परमात्मा ही इस संसार में आश्चर्यमय है अर्थात् अन्य सब वस्तुओं का पारावार मिल जाता है। एकमात्र परमात्मा ही ऐसा पदार्थ है, जिसका पारावार नहीं। यद्यपि जिज्ञासु पुरुष उस पूर्ण को पूर्णरूप से नहीं जान सकता, तथापि उसके ज्ञानमात्र से अर्थात् “अस्ति इत्येवोपलब्धव्यः” उसकी सत्ता के साक्षात्कार से पुरुष आनन्द का अनुभव करता है। केवल एकमात्र परमात्मा ही आनन्दमय है, अन्य सब उसी के आनन्द का लाभ करके आनन्द पाते हैं, अन्यथा नहीं॥६॥

शुचिः॑ पाव॒क उ॑च्यते॒ सोमः॑ सु॒तस्य॒ मध्वः॑। दे॒वा॒वीर॑घशंस॒हा॥

जो लोग पापमय जीवन व्यतीत करते हैं, परमात्मा उनकी वृद्धि कदापि नहीं करता। यद्यपि पापी पुरुष भी कहीं-कहीं फलते-फूलते हुए देखे जाते हैं, तथापि उनका परिणाम अच्छा कदापि नहीं होता। अन्त में ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ का सिद्धान्त ही ठीक रहता है कि जिस ओर धर्म होता है, उसी पक्ष की जय होती है। इस तात्पर्य से मन्त्र में यह कथन किया है कि परमात्मा पापी पुरुष और उनका अनुमोदन करनेवाले दोनों का नाश करता है॥७॥यह चौबीसवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग तथा पहिला अनुवाक समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

पव॑स्व दक्ष॒साध॑नो दे॒वेभ्यः॑ पी॒तये॑ हरे। म॒रुद्भ्यो॑ वा॒यवे॒ मदः॑॥

परमात्मा के आनन्द का अनुभव केवल ज्ञानयोगी और कर्मयोगी पुरुष ही कर सकते हैं, अन्य नहीं। जो पुरुष अयोगी है अर्थात् जिस पुरुष का किसी तत्त्व के साथ योग नहीं, वह कर्मयोगी व ज्ञानयोगी नहीं बन सकता॥१॥

पव॑मान धि॒या हि॒तो॒३॒॑ऽभि योनिं॒ कनि॑क्रदत्। धर्म॑णा वा॒युमा वि॑श॥

परमात्मा उपदेश करता है कि जो लोग शुद्ध बुद्धि द्वारा परमात्मा की उपासना करते हैं, उनके हृदय को परमात्मा सदैव शुद्ध करता है। तात्पर्य यह है कि अपहतपाप्मादि परमात्मा के गुणों को वही पुरुष धारण कर सकता है, जो पुरुष योगसाधनादि द्वारा संस्कृत की हुई बुद्धि के साथ परमात्मा का ध्यान करता है। इसी अभिप्राय से कहा है कि “दृश्यते त्वग्र्या बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः” कठ० ३। १२॥तथा “यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्। तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति” मु० ३१३। जब जिज्ञासु पुरुष उस स्वतःप्रकाश ब्रह्म को अपने योगज सामर्थ्य से देखता है, तो पुण्य पाप से छूटता है अर्थात् जिस प्रकार वह परमपुरुष निष्पाप है, उसी प्रकार वह भी निष्पाप होकर उसके सत्यादि गुणों को धारण करता है। इसी का नाम बैदिक मत में मुक्ति है अर्थात् पापरूपी मल से छूट कर ब्रह्म के अमृतभावादि धर्मों को धारण करने का नाम मुक्ति है, इसीलिये “ब्रह्मविदाप्नोति परम्” और “अमृततत्वमानशुः” इत्यादि उपनिषद्वाक्यों में उसको अमृत शब्द से कथन किया है, केवल उपनिषदों में ही नहीं, किन्तु वेद के बहुत से मन्त्रों में अमृत शब्द से मुक्त पुरुषों का कथन किया है, जैसे कि “कस्य नूनं कतमस्यामृतानां मनामहे” ऋग्० १। २। २४। १॥और “अग्नेर्वयं प्रथमस्यामृतानां मनामहे” ऋग्० १। २४। १॥इत्यादि मन्त्रों से स्पष्ट है कि अमृत यहाँ मुक्त पुरुषों का नाम है, क्योंकि अमृतानाम् यह निर्धारणषष्ठी है और निर्धारण बहुतों में से ही किया जाता है। इससे स्पष्ट है कि बहुत शब्द से यहाँ मुक्त जीव ही लिये जा सकते हैं, अन्य नहीं॥जो लोग इन मन्त्रों के अर्थ पुनर्जन्म के करके अमृतों के अर्थ देवताओं के करते हैं, उनके मत में भी देव मुक्त पुरुष ही हो सकते हैं। यदि कहा जाय कि देव विद्वानों का नाम है, तो यहाँ यह स्मरण रखने योग्य है कि यहाँ विद्वानों का कोई प्रसङ्ग नहीं, प्रसङ्ग यहाँ मुक्त पुरुषों का ही है। युक्ति इसमें यह है कि बहुत जीवों को अमृतभाव प्राप्त हो। तभी ‘अमृतानाम्’ यह बहुवचन कहा जा सकता है। यदि उत्पत्तिनाश न होने के अभिप्राय से यहाँ अमृत शब्द का प्रयोग होता, तो “न मृत्युरासीदमृतं न” इस मन्त्र में मृत्यु के मुकाबिले में अमृत शब्द का प्रयोग न होता। मृत्यु के प्रतिपक्षी अमृत शब्द का प्रयोग इस बात को सिद्ध करता है कि जिस पुरुष ने अमृतपद का लाभ किया है, उसी का नाम यहाँ अमृत है, अन्य का नहीं। इससे स्पष्ट रीति से मुक्त पुरुषों का ग्रहण पाया जाता है॥जो लोग उक्त मन्त्रों के यह अर्थ करते हैं कि उक्त दोनों मन्त्र बद्ध जीवों की प्रार्थना का वर्णन करते हैं, वे वेद के आशय से सर्वथा अनभिज्ञ हैं, क्योंकि बद्ध जीव की प्रार्थना पुनः माता-पिता के बन्धन में पड़ने की कदापि नहीं हो सकती, क्योंकि इन मन्त्रों के अन्त में “पितरं च दृशेयं मातरं च” अर्थात् मैं पुनः माता-पिता को देखूँ, यह कदापि नहीं हो सकता, क्योंकि माता-पिता का देखना वही चाहता है, जिसने देर में इस संसारचक्र के माता-पिता को त्यागा हुआ है। इससे स्पष्ट सिद्ध है कि यहाँ मुक्त जीव की प्रार्थना है, बद्ध जीव की नहीं। इसके विषय में “स यो वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति। ” इस प्रमाण से यह पाया जाता है कि ब्रह्मवेत्ता मुक्त पुरुष का भी कुल होता है। उसके कुल में कोई अब्रह्मवित् नहीं होता। अथवा इसके अर्थ ये भी किये जा सकते हैं कि मुक्त पुरुष का जन्म “अब्रह्मवित्कुले=अब्रह्मविदां कुले न भवति” अर्थात् अब्रह्मवेत्ताओं के कुल में नहीं होता, किन्तु ब्रह्मवेत्ताओं के ही कुल में होता है। इससे स्पष्ट सिद्ध है कि मुक्त पुरुष का जन्म लोकोपकार के लिये फिर भी होता है। इसी का नाम मुक्ति से पुनरावृत्ति है। इतना ही नहीं “यं यं लोकं मनसा संविभाति विशुद्धसत्त्वः कामयते यांश्च कामान्। तं तं लोकं जयते तांश्च कामान्” मुक्त पुरुष जिस-जिस लोकविशेष की कामना करता है, उसी-उसी लोकविशेष में जाकर उत्पन्न होता है। इसी अभिप्राय से “ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृतात् परिमुच्यन्ति सर्वे” इस वाक्य में मुक्ति से पुनरावृत्ति का कथन किया है। जो यह कहा जाता है कि “त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योमुर्क्षीय मामृतात्” इस मन्त्र में अमृत रहने की प्रार्थना की गयी है। इससे मुक्ति नित्य सिद्ध होती है। इसका उत्तर यह है कि यदि स्वभावसिद्ध मुक्ति से पुनरावृत्ति नहीं होती, तो मुक्त रहने की प्रार्थना ही क्यों की जाती। जिस प्रकार दुःखनिवृत्ति की प्रार्थना है, तो दुःख प्राप्त था, तब दुःखनिवृत्ति की प्रार्थना है। इसी प्रकार मुक्ति से पुनरावृत्ति प्राप्त थी, तभी उससे न छूटने की प्रार्थना की गयी। अन्य बात यह है कि प्रार्थना जिस वस्तु की की जाती है, वह सम्पूर्ण ही पुरुष को ज्यो की त्यों प्राप्त हो, यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जिन मन्त्रों में यह प्रार्थना है कि हे ईश्वर! आप हमको सब ऐश्वर्य दें, तो क्या जीव को कभी सब ऐश्वर्य प्राप्त हो सकता है ? यदि यह कहा जाय कि यहाँ उपचार है अर्थात् सब ऐश्वर्य से तात्पर्य बहुत ऐश्वर्य का है, तो क्या “मृत्योमुर्क्षीय मामृतात्” इस वाक्य में अधिक काल तक मुक्त से अविमुक्त होने के अर्थ नहीं लिये जा सकते ?अस्तु। मुख्य प्रसङ्ग यह है कि अमृतपद वेद में बहुधा मुक्ति के लिये आता है और कहीं-२ ब्रह्मस्वरूप के लिये भी आता है। उक्त मन्त्र में अमृत पद ब्रह्म के स्वरूप को कथन करता है, इसलिये कोई दोष नहीं, क्योंकि अमृतपद के निर्णय के लिये विशेष नियम यह है कि जहाँ अमृत पद में एकवचन होता है, वहाँ प्रायः अमृत शब्द ईश्वर के स्वरूप का बोधक होता है और जहाँ द्विवचन वा बहुवचन होता है, वहाँ मुक्त पुरुषों का ग्रहण होता है। इस नियम का व्यभिचार केवल “न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि” इस वाक्य में पाया जाता है। इसका कारण यह है कि यहाँ अमृत पद मृत्यु का प्रतिद्वन्दी है, इसलिये यहाँ एकवचन भी मुक्ति को कहता है, अन्यत्र कहीं नहीं। अन्यत्र सर्वत्रैव अमृत शब्द एकवचनान्त है। वेद में सर्वत्र अमृत पद ईश्वर के स्वरूप को कथन करता है, इसलिये “मृत्योमुर्क्षीय मामृतात्” यहाँ ईश्वर के स्वरूप से मत दूर हो, यह अर्थ है॥२॥

सं दे॒वैः शो॑भते॒ वृषा॑ क॒विर्योना॒वधि॑ प्रि॒यः। वृ॒त्र॒हा दे॑व॒वीत॑मः॥

यद्यपि परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण है, तथापि उसको साक्षात् करनेवाले विद्वानों के हृदय में विशेषरूप से विराजमान है। इसी अभिप्राय से गीता में कहा है कि “नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः” माया के सम्बन्ध के कारण परमात्मा सबको अपने-२ हृदय में प्रतीत नहीं होता, वरन् सबके हृदय में आकाशवत् परिपूर्णरूप से विराजमान है॥३॥

विश्वा॑ रू॒पाण्या॑वि॒शन्पु॑ना॒नो या॑ति हर्य॒तः। यत्रा॒मृता॑स॒ आस॑ते॥

परमात्मा प्रत्येक वस्तु के भीतर व्यापक है अर्थात् वह प्रत्येक रूप में प्रविष्ट है। इसी तात्पर्य से उपनिषद् में कथन किया है “रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव” प्रत्येक रूप में परमात्मा तद्रूप हो रहा है अर्थात् उसी की सत्ता से उस रूप की मनोहरता है। इस प्रकार का जो सर्वाधिकरण परमात्मा है, उसी में मुक्त पुरुष जाकर निवास करते हैं॥४॥

अ॒रु॒षो ज॒नय॒न्गिरः॒ सोमः॑ पवत आयु॒षक्। इन्द्रं॒ गच्छ॑न्क॒विक्र॑तुः॥

शुभाशुभ कर्मों के द्वारा परमात्मा प्रत्येक जीव को प्राप्त है। अर्थात् उनको शुभाशुभ कर्मों के फल देता है और वही परमात्मा वेदरूप वाणियों का प्रकाश करके पुरुषों को शुभाशुभ मार्ग दर्शाकर शुभ कर्मों की ओर प्रेरणा करता है॥५॥

आ प॑वस्व मदिन्तम प॒वित्रं॒ धार॑या कवे। अ॒र्कस्य॒ योनि॑मा॒सद॑म्॥

जो लोग शुद्ध हृदय से परमात्मा की उपासना करते हैं, उनके हृदय में ज्ञान का प्रकाश अवश्यमेव होता है। वे लोग सूर्य्य के समान प्रकाशमान होते हैं॥६॥यह पच्चीसवाँ सूक्त और पन्द्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

तम॑मृक्षन्त वा॒जिन॑मु॒पस्थे॒ अदि॑ते॒रधि॑। विप्रा॑सो॒ अण्व्या॑ धि॒या॥

जिन लोगों ने निर्विकल्प-सविकल्प समाधियों द्वारा अपने चितवृत्ति को स्थिर करके बुद्धि को परमात्मविषयिणी बनाया है, वे लोग सूक्ष्म से सूक्ष्म परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं। अर्थात् उसको आत्मसुख के समान अनुभव का विषय बना लेते हैं। तात्पर्य्य यह है कि जिस प्रकार अपने आनन्दादि गुण प्रतीत होते हैं, इसी प्रकार योगी पुरुषों को परमात्मा के आनन्दादि गुणों की प्रतीति होती है॥१॥

तं गावो॑ अ॒भ्य॑नूषत स॒हस्र॑धार॒मक्षि॑तम्। इन्दुं॑ ध॒र्तार॒मा दि॒वः॥

जो परमात्मा द्युभ्वादि लोकों का आधार है और जिसमें अनन्त प्रकार की वस्तुएँ निवास करती हैं, वह शुद्ध इन्द्रियों द्वारा साक्षात्कार किया जाता है॥२॥

तं वे॒धां मे॒धया॑ह्य॒न्पव॑मान॒मधि॒ द्यवि॑। ध॒र्ण॒सिं भूरि॑धायसम्॥

उक्त परमात्मा जो सब लोक-लोकान्तरों का आधार है, उसको योगादि साधनों द्वारा संस्कृत बुद्धि से योगीजन विषय करते हैं। इस मन्त्र में जो परमात्मा को वेधा अर्थात् “विधति लोकान् विदधातीति वा वेधाः” विधातारूप से वर्णन किया है, इसका तात्पर्य यह है कि परमात्मा सब वस्तुओं का निर्माणकर्ता है, इसी अभिप्राय से “सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्” ऋ. सू. १९ में यह कथन किया है कि सूर्य चन्द्रमा आदि ज्योतिर्मय पदार्थों का निर्माण एकमात्र परमात्मा ने ही किया है। सूर्य चन्द्रमा यहाँ उपलक्षण है, वस्तुतः सब ब्रह्माण्डों का निर्माता एक परमात्मा ही है, कोई अन्य नहीं॥३॥

तम॑ह्यन्भु॒रिजो॑र्धि॒या सं॒वसा॑नं वि॒वस्व॑तः। पतिं॑ वा॒चो अदा॑भ्यम्॥

जिस प्रकाशस्वरूप परमात्मा से ऋगादि चारों वेद उत्पन्न होते हैं अर्थात् ऋगादि वेद जिसकी वाणीरूप हैं, वह परमात्मा योगीजनों के ध्यानगोचर होकर उनको आनन्द का प्रदान करता है॥४॥

तं साना॒वधि॑ जा॒मयो॒ हरिं॑ हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः। ह॒र्य॒तं भूरि॑चक्षसम्॥

उक्त परमात्मा ही जगत् के जन्मादिकों का हेतु है अर्थात् उसी से जगत् की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय होता है। वह परमात्मा हिमालय के उच्च से उच्च प्रदेशों में और सागर के गम्भीर से गम्भीर स्थानों में विराजमान है। उस सर्वज्ञ का साक्षात्कार चित्तवृत्ति- निरोधरूपी योगद्वारा ही हो सकता है, अन्यथा नहीं॥५॥

तं त्वा॑ हिन्वन्ति वे॒धसः॒ पव॑मान गिरा॒वृध॑म्। इन्द॒विन्द्रा॑य मत्स॒रम्॥

यह छब्बीसवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

ए॒ष क॒विर॒भिष्टु॑तः प॒वित्रे॒ अधि॑ तोशते। पु॒ना॒नो घ्नन्नप॒ स्रिधः॑॥

परमात्मा दुष्टों का दमन करके सदाचारियों को उन्नतिशील बनाता है। उसके पाने के लिये अपने अन्तःकरण को पवित्र बनाना चाहिये। जो लोग अपने अन्तःकरण को पवित्र नहीं बनाते, वे उसको कदापि उपलब्ध नहीं कर सकते॥१॥

ए॒ष इन्द्रा॑य वा॒यवे॑ स्व॒र्जित्परि॑ षिच्यते। प॒वित्रे॑ दक्ष॒साध॑नः॥

जो लोग परमात्मा पर दृढ़ विश्वास रखते हैं, उनको परमात्मा सुनीति का दान देता है और वह परमात्मा जिन लोगों ने विषयजन्य सुख को जीत लिया है, उन्हीं की चित्तवृत्तियों का विषय होता है। वा यों कहो कि कर्मयोगी लोग अपने उग्र कर्मों द्वारा उसको उपलब्ध करके उसके भावों को प्राप्त होते हैं। जो लोग आलसी बनकर अपने जन्म को व्यर्थ व्यतीत करते हैं, उनका उद्धार कदापि नहीं होता॥२॥

ए॒ष नृभि॒र्वि नी॑यते दि॒वो मू॒र्धा वृषा॑ सु॒तः। सोमो॒ वने॑षु विश्व॒वित्॥

ईश्वर की आज्ञा को पालन करनेवाले नम्र पुरुषों के लिये परमात्मा सौम्यस्वभाव है और जो उद्दण्ड अनाज्ञाकारी हैं, उनके लिये परमात्मा उग्ररूप है। उक्त परमात्मा से सदैव अपने कल्याण की प्रार्थना करनी चाहिये॥३॥

ए॒ष ग॒व्युर॑चिक्रद॒त्पव॑मानो हिरण्य॒युः। इन्दुः॑ सत्रा॒जिदस्तृ॑तः॥

परमात्मा जिन लोगों पर प्रसन्न होता है, उनको भूम्यादि धनों का स्वामी बनाता है और उनको हिरण्यादि ऐश्वर्यों का स्वामी बनाकर उनसे शत्रुओं को परास्त कराता है॥४॥

ए॒ष सूर्ये॑ण हासते॒ पव॑मानो॒ अधि॒ द्यवि॑। प॒वित्रे॑ मत्स॒रो मदः॑॥

परमात्मा की सत्ता से ही सूर्य-चन्द्रमा आदि प्रकाशित होते हैं और वही परमात्मा सब लोकान्तरों का अधिष्ठाता है; उसी में चित्तवृत्ति लगाने से पुरुष आनन्दित होता है, अन्यथा नहीं॥५॥

ए॒ष शु॒ष्म्य॑सिष्यदद॒न्तरि॑क्षे॒ वृषा॒ हरिः॑। पु॒ना॒न इन्दु॒रिन्द्र॒मा॥

सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म जो सर्वव्यापक और सब कामनाओं का देनेवाला है, वह अपने निवास का स्थान एकमात्र कर्मयोगी पुरुषों को समझता है। यद्यपि ब्रह्म सर्वव्यापक है, तथापि विशेषाभिव्यक्ति उसकी कर्मयोगियों के हृदय में ही होती है, अन्यत्र नहीं। तात्पर्य यह है कि कर्मयोगी पुरुष अपने कर्मों द्वारा उसकी आज्ञाओं को पालन करके दिखला देता है, अन्य लोग आलस्य में पड़े-पड़े ही समय को बिता देते हैं, इसलिये इस मन्त्र में कर्मयोगी पुरुष को ज्ञान का मुख्यपात्र निरूपण किया गया है॥६॥यह २७ वाँ सूक्त और १७ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

ए॒ष वा॒जी हि॒तो नृभि॑र्विश्व॒विन्मन॑स॒स्पतिः॑। अव्यो॒ वारं॒ वि धा॑वति॥

इस मन्त्र में परमात्मा को मनसस्पति इसलिये कहा गया कि मन उसके सात्त्विकरूप सामर्थ्य से उत्पन्न हुआ है, इसलिये मन से ज्ञान उत्पन्न होता है। वा यों कहो कि मन का निरोध केवल उसी की कृपा से हो सकता है, इसलिये मनसस्पति कहा है। तात्पर्य यह है कि आत्मिक बल बढ़ानेवाले पुरुषों को चाहिये कि सब ओर से अपने मन का निरोध करके अपने मन को उसी परमात्मा में लगायें॥१॥

ए॒ष प॒वित्रे॑ अक्षर॒त्सोमो॑ दे॒वेभ्यः॑ सु॒तः। विश्वा॒ धामा॑न्यावि॒शन्॥

“यस्मिन्सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः” यजुः। विज्ञानी पुरुष के लिये सब भूत उसका निवासस्थान हैं और इसी प्रकार “य आत्मनि तिष्ठन् आत्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरम्” बृ० अन्तर्यामि ब्रा०। इत्यादि वाक्यों में यह प्रतिपादन किया है कि जीवात्मा उसका शरीरस्थानी है अर्थात् जिस प्रकार जीवात्मा अपने शरीर का प्रेरक है, उसी प्रकार वह जीवात्मा का प्रेरक है, इसलिये मन्त्र में ‘धामान्याविशन्’ का कथन किया है अर्थात् शरीररूपी धाम में वह विराजमान है॥२॥

ए॒ष दे॒वः शु॑भाय॒तेऽधि॒ योना॒वम॑र्त्यः। वृ॒त्र॒हा दे॑व॒वीत॑मः॥

तात्पर्य यह है कि योनि नाम यहाँ कारण का है, वह कारण प्रकृतिरूपी कारण है अर्थात् प्रकृति परिणामिनी नित्य है और ब्रह्म कूटस्थ नित्य है। परिणामी नित्य उसको कहते हैं कि जो वस्तु अपने स्वरूप को बदले और नाश को न प्राप्त हो और कूटस्थ नित्य उसको कहते हैं कि जो स्वरूप से नित्य हो अर्थात् जिसके स्वरूप में किसी प्रकार का विकार न आये। उक्त प्रकार से यहाँ परमात्मा को कूटस्थरूप से वर्णन किया है॥३॥

ए॒ष वृषा॒ कनि॑क्रदद्द॒शभि॑र्जा॒मिभि॑र्य॒तः। अ॒भि द्रोणा॑नि धावति॥

तात्पर्य यह है कि परमात्मा दश सूक्ष्मभूत और दश स्थूलभूतों को व्याप्त करके स्थिर है, इसीलिये “स भूमिं सर्वतस्पृत्वाऽत्यतिष्ठद् दशाङ्गुलम्” यह कथन किया है कि वह कार्यमात्र को अपने में व्याप्त करके दश प्रकार के भूतों को भी अतिक्रमण करके विराजमान है॥४॥

ए॒ष सूर्य॑मरोचय॒त्पव॑मानो॒ विच॑र्षणिः। विश्वा॒ धामा॑नि विश्व॒वित्॥

इस मन्त्र में परमात्मा को सूर्य का भी प्रकाशक कथन किया है।  तात्पर्य यह है कि यह जड़ सूर्य उसकी सत्ता में प्रकाशित होता है। जो लोग गायत्री आदि मन्त्रों में इस जड़ सूर्य को उपास्य बताया करते हैं, उनको “सूर्यमरोचयत्” इस वाक्य से यह शिक्षा लेनी चाहिये कि यदि वेद का तात्पर्य जड़ सूर्य को उपास्य देव कथन करने का होता, तो इस जड़ सूर्य को उससे प्रकाश पाकर प्रकाशित होना न कथन किया जाता और न “सूर्याचन्द्रमसौ धाता” इत्यादि वाक्यों से इस जड़ सूर्यादि का निर्माता कथन किया जाता॥५॥

ए॒ष शु॒ष्म्यदा॑भ्यः॒ सोमः॑ पुना॒नो अ॑र्षति। दे॒वा॒वीर॑घशंस॒हा॥

जो लोग स्वयं पापों अथवा पापियों की प्रशंसा करते हैं, उनको परमात्मा कदापि प्राप्त नहीं होता। परमात्मप्राप्ति के लिये सदैव सरल प्रकृति होनी चाहिये। तात्पर्य यह है कि परमात्मप्राप्ति विना दैवी सम्पत्ति के नहीं होती।  दैवी सम्पत्ति के गुण ये हैं−तेज, तेजस्वी होना, धृति-दृढ़ता, क्षमा, शौच, अद्रोह, अहिंसा, सत्य, अक्रोध इत्यादि अनेक प्रकार के दैवी सम्पत्ति के गुण हैं और जो लोग आसुरी सम्पत्तिवाले हैं, उनमें निम्नलिखित अवगुण होते हैं−दम्भ दर्प=गर्व, अभिमान, क्रोध, पारुष्य इत्यादि। इस मन्त्र में परमात्मा ‘अदाभ्यः’ पद से इस बात का उपदेश करता है कि दम्भ दर्पादि छोड़कर तुम लोग सन्मार्ग का ग्रहण करो॥६॥यह अट्ठाईसवाँ सूक्त और अठारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्रास्य॒ धारा॑ अक्षर॒न्वृष्णः॑ सु॒तस्यौज॑सा। दे॒वाँ अनु॑ प्र॒भूष॑तः॥

परमात्मा उपदेश करता है कि हे पुरुषो! तुम विद्वानों की संगति के विना कदापि अभ्युदय को नहीं प्राप्त हो सकते। जिस देश के लोग नाना प्रकार की विद्याओं के वेत्ता विद्वानों के अनुयायी बनते हैं, उस देश का ऐश्वर्य देश-देशान्तरों में फैल जाता है। इसलिये हे अभ्युदयाभिलाषी जनों! तुम भी विद्वानों के अनुयायी बनो॥१॥

सप्तिं॑ मृजन्ति वे॒धसो॑ गृ॒णन्तः॑ का॒रवो॑ गि॒रा। ज्योति॑र्जज्ञा॒नमु॒क्थ्य॑म्॥

परमात्मा उपदेश करता है कि हे विद्वानों! तुम अपनी शक्तियों को वेदरूपी वाणी द्वारा बढ़ाओ। जो लोग अपनी शक्तियों को ईश्वराज्ञा से बढ़ाते हैं, उनका ऐश्वर्य विश्वव्यापी हो जाता है॥२॥

सु॒षहा॑ सोम॒ तानि॑ ते पुना॒नाय॑ प्रभूवसो। वर्धा॑ समु॒द्रमु॒क्थ्य॑म्॥

परमात्मा उपदेश करता है कि जो लोग अपनी कीर्ति को नभोमण्डलव्यापिनी बनाना चाहें, उनका कर्तव्य है कि वे परमात्मपरायण होकर कर्मयोगी बनें। कर्मयोगी पुरुष के विना किसी पुरुष का ऐश्वर्य बढ़ नहीं सकता॥३॥

विश्वा॒ वसू॑नि सं॒जय॒न्पव॑स्व सोम॒ धार॑या। इ॒नु द्वेषां॑सि स॒ध्र्य॑क्॥

इस मन्त्र में इस बात का उपदेश किया है कि जो पुरुष अपना अभ्युदय चाहे, वह रागद्वेषरूपी समुद्र की लहरों में कदापि न पड़े। क्योंकि जो लोग राग-द्वेष के प्रवाह में पड़कर बह जाते हैं, वे आत्मिक सामाजिक तथा शारीरिक तीनों की उन्नतियों को नहीं कर सकते, इसलिये पुरुष को चाहिये कि वह राग-द्वेष के भावों से सर्वथा दूर रहे॥४॥

रक्षा॒ सु नो॒ अर॑रुषः स्व॒नात्स॑मस्य॒ कस्य॑ चित्। नि॒दो यत्र॑ मुमु॒च्महे॑॥

अभ्युदयशाली मनुष्य का कर्तव्य यह होना चाहिये कि वह कदर्य कदापि न बने। जो पुरुष कदर्य होता है, वह सर्वदैव संसार में निन्दनीय रहता है, इसलिये हे पुरुषो! तुम कदर्यता कायरता और प्रमत्तता इत्यादि भावों को छोड़कर उदारता वीरता और अप्रमत्तता इत्यादि भावों को धारण करो॥५॥

एन्दो॒ पार्थि॑वं र॒यिं दि॒व्यं प॑वस्व॒ धार॑या। द्यु॒मन्तं॒ शुष्म॒मा भ॑र॥

जो पुरुष उक्त प्रकार के अवगुणों से रहित होते हैं, उनको परमात्मा द्युलोक पृथिवीलोक के ऐश्वर्यों से भरपूर करता है॥६॥यह २९ वाँ सूक्त और १९ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र धारा॑ अस्य शु॒ष्मिणो॒ वृथा॑ प॒वित्रे॑ अक्षरन्। पु॒ना॒नो वाच॑मिष्यति॥

जितने प्रकार के संसार में बल पाये जाते हैं, उन सबमें से वाणी का बल सबसे बड़ा है, इस अभिप्राय से परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे पुरुषो! यदि तुम सर्वोपरि बल को उपलब्ध करना चाहते हो, तो वाणीरूप बल की इच्छा करो। जो पुरुष वाणीरूप बल को उपलब्ध करते हैं, उनके लिये सोमादि रसों से बल लेने की आवश्यकता नहीं॥१॥

इन्दु॑र्हिया॒नः सो॒तृभि॑र्मृ॒ज्यमा॑नः॒ कनि॑क्रदत्। इय॑र्ति व॒ग्नुमि॑न्द्रि॒यम्॥

सदुपदेशकों द्वारा जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है, वे शब्द बलप्रद होते हैं, इसलिये हे श्रोता लोगो! तुमको चाहिये कि तुम सदैव सदुपदेशकों से उपदेश सुनकर अपने आपको तेजस्वी और ब्रह्मवर्चस्वी बनाओ॥२॥

आ नः॒ शुष्मं॑ नृ॒षाह्यं॑ वी॒रव॑न्तं पुरु॒स्पृह॑म्। पव॑स्व सोम॒ धार॑या॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि जो पुरुष सर्वोपरि बल की कामना करते हुए अपने आपको उस बल के योग्य बनाते हैं, उनको संसार में न्याय नियम फैलाने के लिये सर्वोपरि बल अवश्यमेव मिलता है॥३॥

प्र सोमो॒ अति॒ धार॑या॒ पव॑मानो असिष्यदत्। अ॒भि द्रोणा॑न्या॒सद॑म्॥

परमात्मा उपदेश करता है कि हे मनुष्यों! यदि तुम अपने आपको सत्कर्मी बनाओ, तो ज्ञान का प्रवाह तुम्हारे अभ्युदयरूपी अङ्कुरों को अवश्यमेव अभ्युदयशाली बनायेगा॥४॥

अ॒प्सु त्वा॒ मधु॑मत्तमं॒ हरिं॑ हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः। इन्द॒विन्द्रा॑य पी॒तये॑॥

जो पुरुष धार्मिक बन के सदुपदेश करते हैं, वे मानो सब रसों में से अपने आपको माधुर्य्यसम्पन्न सिद्ध करते हैं और वे ही लोग उपदेष्टा बनकर संसार में लोगों को कर्मयोग का उपदेश करते हैं॥५॥

सु॒नोता॒ मधु॑मत्तमं॒ सोम॒मिन्द्रा॑य व॒ज्रिणे॑। चारुं॒ शर्धा॑य मत्स॒रम्॥

परमात्मा उपदेश करता है कि हे विद्वान् पुरुषो! तुम उत्तमोत्तम ओषधियों से सौम्य स्वभाव बनानेवाले रसों को उत्पन्न करो, जिन रसों का पान करके कर्मयोगी पुरुष अपने कर्तव्यों में दृढ़ रहें और जिन रसों से हर्ष को प्राप्त होकर संसार में सर्वोपरि बल को उत्पन्न करें॥६॥यह तीसवाँ सूक्त और बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र सोमा॑सः स्वा॒ध्यः१॒॑ पव॑मानासो अक्रमुः। र॒यिं कृ॑ण्वन्ति॒ चेत॑नम्॥

जो लोग उच्चोद्देश्य से अर्थात् देश की रक्षा के लिये शत्रुओं पर आक्रमण करते हैं, वे लोग अपने ऐश्वर्य को पुनरुज्जीवित करके अपने यश को विमल करके दशों दिशाओं में फैलाते हैं॥१॥

दि॒वस्पृ॑थि॒व्या अधि॒ भवे॑न्दो द्युम्न॒वर्ध॑नः। भवा॒ वाजा॑नां॒ पतिः॑॥

परमात्मा इस प्रकार उपदेश करता है कि हे शूरवीरों! तुम लोग अपने परिश्रम के अनन्तर उस पराशक्ति से इस प्रकार की प्रार्थना करो कि हमारा ऐश्वर्य्य सर्वत्र फैले और हम द्युलोक और पृथिवीलोक के बीच में शान्ति को फैलायें॥तात्पर्य यह है कि मनुष्य कैसा ही ऐश्वर्यशाली हो अथवा तेजस्वी और ब्रह्मवर्चस्वी हो, पर फिर भी उसे पराशक्ति की सहायता लेनी पड़ती है, जिसने इस संसार को अपने नियमो में बाँध रखा है॥२॥

तुभ्यं॒ वाता॑ अभि॒प्रिय॒स्तुभ्य॑मर्षन्ति॒ सिन्ध॑वः। सोम॒ वर्ध॑न्ति ते॒ महः॑॥

परमात्मा के नियम से शूरवीर उत्पन्न होकर उसके यश को बढ़ाते हैं और परमात्मा के नियम से ही सिन्धु आदि महानद स्यन्दमान होकर सम्पूर्ण धरातल को सिञ्चित करते हैं॥३॥

आ प्या॑यस्व॒ समे॑तु ते वि॒श्वतः॑ सोम॒ वृष्ण्य॑म्। भवा॒ वाज॑स्य संग॒थे॥

जो लोग एकमात्र परमात्मा को अपना आधार बनाते हैं, वे सब प्रकार से ऐश्वर्य्यशाली होते हैं और संग्रामजनित विपत्तियों में परमात्मा उनकी सहायता करता है॥४॥

तुभ्यं॒ गावो॑ घृ॒तं पयो॒ बभ्रो॑ दुदु॒ह्रे अक्षि॑तम्। वर्षि॑ष्ठे॒ अधि॒ सान॑वि॥

परमात्मरचित इस ब्रह्माण्ड में नाना प्रकार के घृतदुग्धादि रस दिनरात प्रवाहरूप से स्यन्दमान हो रहे हैं, बहुत क्या, जो-जो विभूतिवाली वस्तु है, उससे परमात्मा का ऐश्वर्य सर्वत्र देदीप्यमान हो रहा है। इसी अभिप्राय से कहा है कि “यद्यद्विभूतिमत् सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।  तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्” । जो-जो विभूतिवाली वस्तु अथवा ऐश्वर्य और शोभावाली हो, वह सब परमात्मा के प्रकृतिरूप अंश से उत्पन्न हुई है॥५॥

स्वा॒यु॒धस्य॑ ते स॒तो भुव॑नस्य पते व॒यम्। इन्दो॑ सखि॒त्वमु॑श्मसि॥

सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों के नियन्ता और निखिल ज्ञानों के अवगन्ता परमात्मा से जो लोग मैत्री करते हैं, वे लोग इस संसार में परमानन्द का लाभ करते हैं॥इस अभेद सम्बन्ध का नाम उपनिषदों में ‘अहंग्रह’ उपासना है और इस उपासना का पद प्रतीकोपासना से बहुत ऊँचा है। इसी अभिप्राय से कहा है कि “अहं वा त्वमसि भगवो देवते त्वं चाहमस्मि” हे भगवन्! मैं तू और तू मेरा रूप है, इसमें कोई भेद नहीं। इस उपासना का नाम आध्यात्मिकोपासना है। इसको वेद अन्यत्र भी प्रतिपादन करता है, जैसा कि “यस्मिन्सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः” और आधिदैविकोपासना वह कहलाती है, जिसमें सूर्य्यचन्द्रमादि में व्यापक समझ कर परमात्मा की उपासना की जाती है कि “य आदित्ये तिष्ठन् आदित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरम् “ जो आदित्य इस सूर्य्य में रहता है, जिसको सूर्य्य नहीं जानता और सूर्य्य जिसका शरीरस्थानी है, वह तुम्हारा अन्तर्यामी अमृतरूप ब्रह्म है। इसी को प्रतीकोपासन नाम से कहा जाता है अर्थात् “प्रतीक उपासनं प्रतीकोपासनम्” जो प्रतीक=सूर्य्य चन्द्रादिकों में व्यापक समझ कर ब्रह्म की उपासना की जाती है, उसका नाम प्रतीकोपासन है अथवा “प्रतीकेनोपासनं प्रतीकोपासनम्” जो प्रतीक के द्वारा उपासन किया जाता है, उसको भी प्रतीकोपासन कहते हैं। जैसा कि वेदमन्त्रों द्वारा ईश्वर का उपासन किया जाता है। और जो लोग “प्रतीकस्योपासनं प्रतीकोपासनम्” इस प्रकार षष्ठीसमास करके प्रतीक अर्थात् मूर्ति की उपासना सिद्ध करते हैं, वे वेदोपनिषदों के रहस्य को नहीं जानते, क्योंकि वेदों का तात्पर्य आध्यात्मिक आधिदैविक अर्थात् आत्मा में और सूर्य्यादि दिव्य वस्तुओं में व्यापक समझ कर ब्रह्मोपासन करने का है। मृण्मयी अथवा धातुमयी किसी मूर्ति का निर्माण करके उसकी पूजा करने का नहीं॥तात्पर्य यह है कि वेदों के आध्यात्मिक आधिदैविक और आधिभौतिक तीनों प्रकार से अर्थ करने से भी आधुनिक मूर्तिपूजा सिद्ध नहीं होती॥आधुनिक मूर्तियाँ, जो वैदिकधर्मी अर्थात् वेदों को सर्वोपरि प्रमाण माननेवाले आर्य्य लोग बनाते हैं अथवा यों कहो कि अपने आपको हिन्दू नाम से सम्बोधन करनेवाले बना लेते हैं, वे केवल बौद्धधर्मानुयायी लोगों का अनुकरण करके बनाते हैं॥पुष्ट प्रमाण इसके लिये यह है कि वेदाभिमानी लोगों की कोई मूर्ति भी बुद्धमूर्तियों से प्राचीन नहीं पायी जाती, किन्तु सब अर्वाचीन हैं अर्थात् नवीन हैं॥६॥यह ३१ वाँ सूक्त और २१ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र सोमा॑सो मद॒च्युतः॒ श्रव॑से नो म॒घोनः॑। सु॒ता वि॒दथे॑ अक्रमुः॥

जो पुरुष शुद्ध भाव से यज्ञ करते हैं, उनको परमात्मा अपने आनन्दस्त्रोत से सदैव अभिषिक्त करता है। यज्ञ के अर्थ यहाँ (१) शुद्धान्तःकरण से ईश्वरोपासन, (२) ब्रह्मविद्यादि उत्तमोत्तम पदार्थों का दान (३) और कला-कौशल द्वारा विद्युदादि पदार्थों को उपयोग में लाना, ये तीन हैं। जो पुरुष उक्त पदार्थों की संगति करनेवाले यज्ञों को करता है, वह अवश्यमेव ऐश्वर्यसम्पन्न होता है॥१॥

आदीं॑ त्रि॒तस्य॒ योष॑णो॒ हरिं॑ हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः। इन्दु॒मिन्द्रा॑य पी॒तये॑॥

जो लोग परमात्मा की भक्ति में रत हैं, उनकी इन्द्रियवृत्तियें परमात्मज्ञान की उपलब्धि के लिये सदैव तत्पर रहती हैं ॥२॥

आदीं॑ हं॒सो यथा॑ ग॒णं विश्व॑स्यावीवशन्म॒तिम्। अत्यो॒ न गोभि॑रज्यते॥

जीवात्मा जब तक अपनी सजातीय वस्तु के साथ सम्बन्ध नहीं लगाता, तब तक उसे आनन्द कदापि प्राप्त नहीं हो सकता, इस भाव का इस मन्त्र में उपदेश किया है कि जिस प्रकार हंस अपने सजातीय गण में मिलकर आनन्दित होता है, इस प्रकार जीवात्मा भी उस चिद्घन ब्रह्म में मिल जाता है। जीवात्मा को हंस की उपमा इस वास्ते दी है कि “हन्त्यविद्यामिति हंसः” यह जीव अविद्या का हनन करता है। यहाँ विज्ञानी जीव का वर्णन है और ब्रह्मप्राप्ति से जीव अविद्या का हनन करता है, जैसे कि ‘सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति’ छा०॥३॥

उ॒भे सो॑माव॒चाक॑शन्मृ॒गो न त॒क्तो अ॑र्षसि। सीद॑न्नृ॒तस्य॒ योनि॒मा॥

परमात्मा इस प्रकृति के कार्य चराचर ब्रह्माण्ड में ओत-प्रोत हो रहा है अर्थात् प्रकृति एक प्रकार से गहन वन है और परमात्मा सिंह के समान इस वन का स्वामी है। इस मन्त्र में परमात्मा की व्यापकता और शोर्य-क्रौर्यादि गुणों के भाव से परमात्मा की रौद्ररूपता वर्णन की है।  

अ॒भि गावो॑ अनूषत॒ योषा॑ जा॒रमि॑व प्रि॒यम्। अग॑न्ना॒जिं यथा॑ हि॒तम्॥

इस मन्त्र में कर्मयोगी और ज्ञानयोगियों की ओर से परमात्मा की प्रार्थना कथन की गयी है और परमात्मनिष्ठप्रियता की तुलना चन्द्रमा के साथ की है अर्थात् जिस प्रकार चन्द्रमा आह्लादक होने से सर्वप्रिय है, इसी प्रकार परमात्मा भी आह्लादक होने से सर्वप्रिय है। कई एक टीकाकार “योषा जारम्” के अर्थ स्त्री के जार के करते हैं अर्थात् जैसे स्त्री को अपना यार प्यारा होता है, उसी प्रकार मुझ उपासक को तुम प्यारे हो। पहले तो यह दृष्टान्त विषम है, क्योंकि स्त्री को सर्वदा यार प्यारा नहीं लगता, किन्तु जब तक मोहमयी युवावस्था रहती है, तभी तक प्यारा लगता है और दूसरे जार शब्द के अर्थ सर्वत्र वेदमन्त्रों में तमोनिवर्तक आह्लादक गुण के हैं, जैसा कि ‘स्वसारं जारोऽभ्येति पश्वात्” इस मन्त्र में जार के अर्थ आह्लादक गुण के ही सब भाष्यकारों ने किये हैं। इससे स्पष्ट सिद्ध है कि ‘योषा जार’ यहाँ चन्द्रमा का नाम है, किसी लम्पट कामी पुरुष का नहीं॥५॥

अ॒स्मे धे॑हि द्यु॒मद्यशो॑ म॒घव॑द्भ्यश्च॒ मह्यं॑ च। स॒निं मे॒धामु॒त श्रवः॑॥

कर्मयोग और ज्ञानयोग के द्वारा परमात्मा निम्नलिखित गुणों का प्रदान करता है, धन बुद्धि सुकीर्ति इत्यादि ॥६॥यह ३२ वाँ सूक्त और २२ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र सोमा॑सो विप॒श्चितो॒ऽपां न य॑न्त्यू॒र्मयः॑। वना॑नि महि॒षा इ॑व॥

वेदरूपी वाणी में इस प्रकार आकर्षण शक्ति है, जैसे कि पूर्णिमा के चन्द्रमा में आकर्षण शक्ति होती है। अर्थात् पूर्णिमा को चन्द्रमा के आह्लादक धर्म की ओर सब लोग प्रवाहित होते हैं, इसी प्रकार ओजस्विनी वेदवाक् अपनी ओर विमल दृष्टिवाले लोगों को खींचती है ॥१॥

अ॒भि द्रोणा॑नि ब॒भ्रवः॑ शु॒क्रा ऋ॒तस्य॒ धार॑या। वाजं॒ गोम॑न्तमक्षरन्॥

जो लोग वेदविद्या का सदुपदेश देते हैं, उनके सदुपदेश से सब प्रकार के अन्नादिक ऐश्वर्य बढ़ते हैं॥२॥

सु॒ता इन्द्रा॑य वा॒यवे॒ वरु॑णाय म॒रुद्भ्यः॑। सोमा॑ अर्षन्ति॒ विष्ण॑वे॥

जिन लोगों ने माता-पिता और आचार्य से सिद्धि को प्राप्त किया है, वे ज्ञान-कर्म-उपासना द्वारा ईश्वर को उपलब्ध करते हैं॥३॥

ति॒स्रो वाच॒ उदी॑रते॒ गावो॑ मिमन्ति धे॒नवः॑। हरि॑रेति॒ कनि॑क्रदत्॥

जो लोग वैदिक सूक्तों द्वारा वर्णित परमात्मा के स्वरूप को अपने ध्यान में लाना चाहते हैं, वे भली-भाँति परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं। तात्पर्य यह है कि परमात्मा शब्दगम्य है, तर्कों से उसका साक्षात्कार नहीं होता, क्योंकि तर्क की कोई आस्था नहीं। प्रथम के तर्क को द्वितीय, जिसकी अधिक बुद्धि है, काट देता है। द्वितीय के तर्क को तृतीय, तृतीय के तर्क को चतुर्थ। वेद पूर्ण पुरुष का ज्ञान है, इसलिये उसमें दोष नहीं॥४॥

अ॒भि ब्रह्मी॑रनूषत य॒ह्वीॠ॒तस्य॑ मा॒तरः॑। म॒र्मृ॒ज्यन्ते॑ दि॒वः शिशु॑म्॥

वेदवाणियें परमात्मा के साथ वाच्यवाचकभावसम्बन्ध से रहती हैं, इसीलिये इनको ब्रह्मी कहा गया है, जैसा कि गीता में “एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति” जिस प्रकार पुरुष ब्राह्मी स्थिति को पाकर मोह को नहीं प्राप्त होता, इसी प्रकार वेदवाणियें पुरुष के अज्ञान को सर्वथा छिन्न-भिन्न कर देती हैं॥५॥

रा॒यः स॑मु॒द्राँश्च॒तुरो॒ऽस्मभ्यं॑ सोम वि॒श्वतः॑। आ प॑वस्व सह॒स्रिणः॑॥

परमात्मा के पास नाना प्रकार के रत्नों के भरे हुए अनन्त समुद्र हैं, परन्तु शब्दार्णवरूप समुद्रों से सब प्रकार के ऐश्वर्य उत्पन्न होते हैं, इससे परमात्मा से शब्दार्णवरूप समुद्र की प्रार्थना करनी चाहिये॥६॥यह ३३ वाँ सूक्त और २३ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र सु॑वा॒नो धार॑या॒ तनेन्दु॑र्हिन्वा॒नो अ॑र्षति। रु॒जद्दृ॒ळ्हा व्योज॑सा॥

परमात्मा की ऐसी अद्भुत सत्ता है कि वह निरवयव होकर भी सम्पूर्ण सावयव पदार्थों का अधिष्ठान है। उसी के आधार पर यह चराचर जगत् स्थिर है और वह सर्वप्रेरक होकर कर्मरूपी चक्र द्वारा सबको प्रेरणा करता है॥१॥

सु॒त इन्द्रा॑य वा॒यवे॒ वरु॑णाय म॒रुद्भ्यः॑। सोमो॑ अर्षति॒ विष्ण॑वे॥

यद्यपि परमात्मा व्यापक होने के कारण सर्वत्र विद्यमान है, तथापि उसकी अभिव्यक्ति कर्मयोग ज्ञानयोग तथा अन्य साधनों द्वारा जिन लोगों ने अपने अन्तःकरण को निर्मल किया है, उनके हृदय में विशेषरूप से होती है॥२॥

वृषा॑णं॒ वृष॑भिर्य॒तं सु॒न्वन्ति॒ सोम॒मद्रि॑भिः। दु॒हन्ति॒ शक्म॑ना॒ पयः॑॥

जो लोग कर्मयोगी तथा ज्ञानयोगी बनकर अभ्यास करते हैं, वे ही लोग ब्रह्मामृतरूप दुग्ध को परमात्मरूप कामधेनु से दोहन करते हैं, अन्य नहीं॥३॥

भुव॑त्त्रि॒तस्य॒ मर्ज्यो॒ भुव॒दिन्द्रा॑य मत्स॒रः। सं रू॒पैर॑ज्यते॒ हरिः॑॥

परमात्मा की रचना से उसकी सत्ता का स्पष्ट प्रमाण मिलता है अर्थात् जो नियम इस ब्रह्माण्ड में पाये जाते हैं, उनका नियन्ता वही अवश्य मानना पड़ता है। उस नियन्ता का साक्षात्कार यम-नियमादि साधनों द्वारा होता है, अन्यथा नहीं॥४॥

अ॒भीमृ॒तस्य॑ वि॒ष्टपं॑ दुह॒ते पृश्नि॑मातरः। चारु॑ प्रि॒यत॑मं ह॒विः॥

कर्म्मयोगी पुरुष अपने कर्म्मों से उसका साक्षात्कार अर्थात् उपासनाकर्म्म द्वारा उसकी सत्ता का लाभ करते हैं ॥५॥

समे॑न॒मह्रु॑ता इ॒मा गिरो॑ अर्षन्ति स॒स्रुतः॑। धे॒नूर्वा॒श्रो अ॑वीवशत्॥

शुभ सङ्कल्पों के मन में उत्पन्न हो जाने से परमात्मा उनका फल अवश्यमेव देता है। तात्पर्य यह है कि उपासना-प्रार्थना भी एक प्रकार के कर्म्म हैं, उनका फल उनको अवश्य मिलता है। इसलिये प्रार्थना केवल माँगना ही नहीं, किन्तु एक प्रकार का कर्म्म है। वह निष्फल कदापि नहीं जा सकता॥६॥यह ३४ वाँ सूक्त और २४ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ नः॑ पवस्व॒ धार॑या॒ पव॑मान र॒यिं पृ॒थुम्। यया॒ ज्योति॑र्वि॒दासि॑ नः॥

जो पुरुष अपने आपको परमात्मज्ञान का पात्र बनाते हैं, परमात्मा उन्हें आनन्द की वृष्टि से सिञ्चित करते हैं॥१॥

इन्दो॑ समुद्रमीङ्खय॒ पव॑स्व विश्वमेजय। रा॒यो ध॒र्ता न॒ ओज॑सा॥

परमात्मा की कृपा से ही धनादि सब ऐश्वर्य पुरुष को प्राप्त होते हैं, इसलिये पुरुष को सदैव परमात्मपरायण होने का यत्न करना चाहिये॥२॥

त्वया॑ वी॒रेण॑ वीरवो॒ऽभि ष्या॑म पृतन्य॒तः। क्षरा॑ णो अ॒भि वार्य॑म्॥

जो लोग अन्यायकारी शत्रुओं के विजय करने का संकल्प रखते हैं, परमात्मा उन्हें अन्यायकारियों के दमन का बल प्रदान करता है, ताकि अन्यायकारियों को मर्दन करके वे संसार में न्याय का प्रचार करें॥३॥

प्र वाज॒मिन्दु॑रिष्यति॒ सिषा॑सन्वाज॒सा ऋषिः॑। व्र॒ता वि॑दा॒न आयु॑धा॥

परमात्मा सन्मार्गगामी पुरुषों को सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों का प्रदान करता है। जो लोग परमात्मा की आज्ञा मानकर उसका अनुष्ठान करते हैं, वे ही परमात्मा के भक्त व सदाचारी कहलाते हैं, अन्य नहीं॥४॥

तं गी॒र्भिर्वा॑चमीङ्ख॒यं पु॑ना॒नं वा॑सयामसि। सोम॒ जन॑स्य॒ गोप॑तिम्॥

परमात्मा के स्व अन्तःकरण में धारण करने का उपाय यह है कि पुरुष उसके सद्गुणों का चिन्तन करके उसके स्वरूप में मग्न हो जाय, इसी का नाम परमात्मप्राप्ति वा परमात्मयोग है॥५॥

विश्वो॒ यस्य॑ व्र॒ते जनो॑ दा॒धार॒ धर्म॑ण॒स्पतेः॑। पु॒ना॒नस्य॑ प्र॒भूव॑सोः॥

परमात्मा के नियम में ही सब सूर्य्यादि पदार्थ अपने-अपने धर्म्मों को धारण करते हैं अर्थात् उसके नियमों का कोई भी उल्लङ्घन नहीं कर सकता। उस परमात्मा के महत्त्व को स्वहृदय में धारण करना प्रत्येक पुरुष का कर्तव्य है॥६॥यह ३५ वाँ सूक्त और २५ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अस॑र्जि॒ रथ्यो॑ यथा प॒वित्रे॑ च॒म्वोः॑ सु॒तः। कार्ष्म॑न्वा॒जी न्य॑क्रमीत्॥

यद्यपि परमात्मा अपनी व्यापकता से प्रत्येक पुरुष के हृदय में विद्यमान है, तथापि जो पुरुष अपने अन्तःकरण को निर्मल रखते हैं, उनके हृदय में उसकी स्फुट प्रतीति होती है, इसी अभिप्राय से कथन किया है कि वह भक्तों के हृदय में विराजमान है॥१॥

स वह्निः॑ सोम॒ जागृ॑विः॒ पव॑स्व देव॒वीरति॑। अ॒भि कोशं॑ मधु॒श्चुत॑म्॥

सम्पूर्ण वस्तुओं में से परमात्मा ही एकमात्र आनन्दमय है। उसी के आनन्द को उपलब्ध करके जीव आनन्दित होते हैं, इसलिये उसी आनन्दरूप सागर से सुख की प्रार्थना करनी चाहिये ॥२॥

स नो॒ ज्योतीं॑षि पूर्व्य॒ पव॑मान॒ वि रो॑चय। क्रत्वे॒ दक्षा॑य नो हिनु॥

जो लोग परमात्मज्योति का ध्यान करते हैं, वे पवित्र होकर सदैव कामों में प्रवृत्त रहते हैं ॥३॥

शु॒म्भमा॑न ऋता॒युभि॑र्मृ॒ज्यमा॑नो॒ गभ॑स्त्योः। पव॑ते॒ वारे॑ अ॒व्यये॑॥

जो पुरुष शुभ काम करते हुए श्रवण मनन निदिध्यासनादि साधनों में युक्त रहते हैं, वे मुक्ति पद के अधिकारी होते हैं ॥४॥

स विश्वा॑ दा॒शुषे॒ वसु॒ सोमो॑ दि॒व्यानि॒ पार्थि॑वा। पव॑ता॒मान्तरि॑क्ष्या॥

जो लोग अपने स्वभाव को सौम्य बनाते हैं अर्थात् ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव को लक्ष्य रखकर अपने गुण-कर्म-स्वभाव को भी उसी प्रकार का पवित्र बानाते हैं, वे सब ऐश्वर्यों को प्राप्त होते हैं ॥५॥

आ दि॒वस्पृ॒ष्ठम॑श्व॒युर्ग॑व्य॒युः सो॑म रोहसि। वी॒र॒युः श॑वसस्पते॥

ईश्वर सदाचारी और न्यायकारी लोगों के लिये धीरत्व वीरत्वादि धर्मों को धारण करता है और गो अश्वादि सब प्रकार के धनों से उन्हें सम्पन्न करता है ॥६॥वह ३६ वाँ सूक्त और २६ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

स सु॒तः पी॒तये॒ वृषा॒ सोमः॑ प॒वित्रे॑ अर्षति। वि॒घ्नन्रक्षां॑सि देव॒युः॥

परमात्मा दैवी सम्पत्तिवाले पुरुषों के हृदय में आकर विराजमान होता है और उनके सव विघ्नों को दूर करके उनको कृतकार्य बनाता है। यद्यपि परमात्मा सर्वत्र विद्यमान है, तथापि वह देवभाव को धारण करनेवाले मनुष्यों को ज्ञान द्वारा प्रतीत होता है, अन्यों को नहीं। इस अभिप्राय से यहाँ देवताओं के हृदय में उसका निवास कथन किया गया है, अन्यों के हृदयों में नहीं॥१॥

स प॒वित्रे॑ विचक्ष॒णो हरि॑रर्षति धर्ण॒सिः। अ॒भि योनिं॒ कनि॑क्रदत्॥

परमात्मा ही इन सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों का अधिष्ठाता तथा विधाता है ॥२॥

स वा॒जी रो॑च॒ना दि॒वः पव॑मानो॒ वि धा॑वति। र॒क्षो॒हा वार॑म॒व्यय॑म्॥

सूर्य चन्द्रमादि सब लोक-लोकान्तर उसी के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं। स्वयंप्रकाश एकमात्र वही परमात्मा है। अन्य कोई वस्तु स्वतःप्रकाश नहीं ॥३॥

स त्रि॒तस्याधि॒ सान॑वि॒ पव॑मानो अरोचयत्। जा॒मिभिः॒ सूर्यं॑ स॒ह॥

सब प्रकार की विद्यायें उसी परमात्मा से मिलती हैं और वही परमात्मा राजनीति से राजधर्मों का निर्माता तथा विधाता है ॥४॥

स वृ॑त्र॒हा वृषा॑ सु॒तो व॑रिवो॒विददा॑भ्यः। सोमो॒ वाज॑मिवासरत्॥

जिस प्रकार सूर्य (वृत्र) मेघों को छिन्न-भिन्न करके धरातल को जल से सुसिञ्चित कर देता है, इसी प्रकार परमात्मा सब प्रकार के आवरणों को छिन्न-भिन्न करके अपने ज्ञान का प्रकाश कर देता है॥५॥

स दे॒वः क॒विने॑षि॒तो॒३॒॑ऽभि द्रोणा॑नि धावति। इन्दु॒रिन्द्रा॑य मं॒हना॑॥

यद्यपि परमात्मा सर्वत्र विद्यमान है, तथापि विद्याप्रदीप से जो लोग अपने अन्तःकरणों को देदीप्यमान करते हैं, उनके हृदय में उसकी अभिव्यक्ति होती है। इस अभिप्राय से यहाँ परमात्मा का विद्वानों के हृदय में निवास करना कथन किया गया है॥६॥यह ३७ वाँ और २७ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

ए॒ष उ॒ स्य वृषा॒ रथोऽव्यो॒ वारे॑भिरर्षति। गच्छ॒न्वाजं॑ सह॒स्रिण॑म्॥

परमात्मा का ज्ञान विद्वानों द्वारा इस संसार में प्रचार पाता है, इस अभिप्राय से परमात्मा ने उक्त मन्त्र में विद्वानों की मुख्यता निरूपण की है॥१॥

ए॒तं त्रि॒तस्य॒ योष॑णो॒ हरिं॑ हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः। इन्दु॒मिन्द्रा॑य पी॒तये॑॥

सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणोंवाली माया, जो प्रकृति है, उसका एकमात्र अधिपति परमात्मा ही है, कोई अन्य नहीं। जो-जो पदार्थ इन्द्रियगोचर होते हैं, वे सब मायिक हैं अर्थात् मायारूपी उपादानकारण से बने हुए हैं। परमात्मा मायारहित होने से अदृश्य है। उसका साक्षात्कार केवल बुद्धिवृत्ति से होता है। बाह्य चक्षुरादि इन्द्रियों से नहीं। इसी अभिप्राय से यहाँ परमात्मा को बुद्धिवृत्ति का विषय कहा गया है॥२॥

ए॒तं त्यं ह॒रितो॒ दश॑ मर्मृ॒ज्यन्ते॑ अप॒स्युवः॑। याभि॒र्मदा॑य॒ शुम्भ॑ते॥

जो लोग योगादिसाधनों द्वारा अपने मन का संयम करते हैं अथवा यों कहिये कि जिन्होंने पापवासनाओं का अपने मन की पवित्रता से नाश कर दिया है, परमात्मा उन्हीं के ज्ञान का विषय होता है, मलिनात्माओं का कदापि नहीं॥३॥

ए॒ष स्य मानु॑षी॒ष्वा श्ये॒नो न वि॒क्षु सी॑दति। गच्छ॑ञ्जा॒रो न यो॒षित॑म्॥

जिस प्रकार चन्द्रमा अपने शीत स्पर्श और आह्लाद को देता हुआ प्रजा को प्रसन्न करता है, उसी प्रकार परमात्मा अपने शान्त्यादि और आनन्दादि गुणों से सब प्रजाओं को प्रसन्न करता है। कई एक टीकाकार इसके ये अर्थ करते हैं कि जिस प्रकार (जार) यार अपनी प्रिय स्त्री को शीघ्रता से आकर प्राप्त होता है, इस प्रकार वह हम को आकर प्राप्त हो। “जार” के अर्थ स्त्रीलम्पट पुरुष के उन्होंने भ्रान्ति से समझे हैं, क्योंकि (जारयति जारः) इस व्युत्पत्ति से रात्रि का स्वाभाविक धर्म जो अन्धकार है, उसको नाश करनेवाला चन्द्रमा ही हो सकता है। इस अभिप्राय से “जार” शब्द यहाँ चन्द्रमा को कहता है, किसी पुरुषविशेष को नहीं। स्त्रीलम्पट पुरुषविशेष अर्थ करके यहाँ अल्पश्रुत टीकाकारों ने वेद को कलङ्कित किया है॥४॥

ए॒ष स्य मद्यो॒ रसोऽव॑ चष्टे दि॒वः शिशुः॑। य इन्दु॒र्वार॒मावि॑शत्॥

इस संसार में सर्वद्रष्टा एकमात्र परमात्मा ही है। उससे भिन्न सब जीव अल्पज्ञ हैं। योगी पुरुष भी अन्यों की अपेक्षा सर्वज्ञ कहे जाते हैं, वास्तव में सर्वज्ञ नहीं॥५॥

ए॒ष स्य पी॒तये॑ सु॒तो हरि॑रर्षति धर्ण॒सिः। क्रन्द॒न्योनि॑म॒भि प्रि॒यम्॥

इस प्रकृतिरूपी ब्रह्माण्ड के रोम-रोम में व्याप्त और वेदादि विद्याओं का आविर्भावकर्ता एकमात्र परमात्मा ही है॥६॥यह ३८ वाँ सूक्त और २८ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ॒शुर॑र्ष बृहन्मते॒ परि॑ प्रि॒येण॒ धाम्ना॑। यत्र॑ दे॒वा इति॒ ब्रव॑न्॥

यज्ञादि शुभकर्मों में परमात्मा के भाव वर्णन किये जाते हैं, इसलिये परमात्मा की अभिव्यक्ति यज्ञादिस्थलों में मानी गई है। वास्तव में परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण है॥१॥

प॒रि॒ष्कृ॒ण्वन्ननि॑ष्कृतं॒ जना॑य या॒तय॒न्निषः॑। वृ॒ष्टिं दि॒वः परि॑ स्रव॥

परमात्मा के संसार में अद्भुत कर्म ये हैं कि उसने द्युलोक को वर्षणशील बनाया है और सूर्यादि लोकों को तेजोमय तथा पृथिवीलोक को दृढ बनाया है इत्यादि विचित्र भावों का कर्ता एकमात्र परमात्मा ही है॥२॥

सु॒त ए॑ति प॒वित्र॒ आ त्विषिं॒ दधा॑न॒ ओज॑सा। वि॒चक्षा॑णो विरो॒चय॑न्॥

यद्यपि परमात्मा सर्वव्यापक है, तथापि उसका स्थान विद्वानों के हृदय को इसलिये वर्णन किया गया है कि विद्वान् लोग अपने हृदय को उसके ज्ञान का पात्र बनाते हैं॥३॥

अ॒यं स यो दि॒वस्परि॑ रघु॒यामा॑ प॒वित्र॒ आ। सिन्धो॑रू॒र्मा व्यक्ष॑रत्॥

उसी परमात्मा की अद्भुत शक्ति और सत्ता से सूर्यचन्द्रमादिकों का परिभ्रमण और नदियों का प्रवहन इत्यादि सम्पूर्ण गतियें उत्पन्न होती हैं॥४॥

आ॒विवा॑सन्परा॒वतो॒ अथो॑ अर्वा॒वतः॑ सु॒तः। इन्द्रा॑य सिच्यते॒ मधु॑॥

जीवात्मा के लिये आनन्द का स्रोत एकमात्र वही परमात्मा है॥५॥

स॒मी॒ची॒ना अ॑नूषत॒ हरिं॑ हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः। योना॑वृ॒तस्य॑ सीदत॥

याज्ञिक पुरुष अपने अन्तःकरण को यज्ञवेदिस्थानी बनाकर परमात्मज्ञान को हवनीय बनाकर इस ज्ञानमय यज्ञ से प्रजा को सुगन्धित करते हैं। तात्पर्य यह है कि अध्यात्मयज्ञ ही एकमात्र परमात्मप्राप्ति का मुख्य साधन है, अन्य जलस्थलादि कोई वस्तु भी परमात्मप्राप्ति का मुख्य साधन नहीं॥६॥यह ३९ वाँ सूक्त और २९ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

पु॒ना॒नो अ॑क्रमीद॒भि विश्वा॒ मृधो॒ विच॑र्षणिः। शु॒म्भन्ति॒ विप्रं॑ धी॒तिभिः॑॥

परमात्मा सत्कर्मी पुरुषों को शुभ स्वभाव प्रदान करता है। तात्पर्य यह है कि सत्कर्मियों को उनके शुभकर्म्मानुसार शुभ फल देता है और दुष्कर्मियों को दुष्कर्मानुसार अशुभ फल देता है॥१॥

आ योनि॑मरु॒णो रु॑ह॒द्गम॒दिन्द्रं॒ वृषा॑ सु॒तः। ध्रु॒वे सद॑सि सीदति॥

कर्मयोगी पुरुषों को परमात्मा सदैव उत्साह देकर सत्कर्मों में प्रवृत्त करता है॥२॥

नू नो॑ र॒यिं म॒हामि॑न्दो॒ऽस्मभ्यं॑ सोम वि॒श्वतः॑। आ प॑वस्व सह॒स्रिण॑म्॥

सत्कर्मी पुरुष भी जब तक परमात्मा से अपने ऐश्वर्य की वृद्धि की प्रार्थना नहीं करते, तब तक उनका अभ्युदय नहीं होता। यद्यपि अभ्युदय पूर्वकृत शुभकर्मों का फल है, तथापि जब तक मनुष्य का अभ्युदयशाली शील नहीं बनता, तब तक वह अभ्युदय को कदाचित् भी नहीं चाहता, इसलिये अभ्युदयशाली शील बनाने के लिये अभ्युदय की प्रार्थना अवश्य करनी चाहिये॥३॥

विश्वा॑ सोम पवमान द्यु॒म्नानी॑न्द॒वा भ॑र। वि॒दाः स॑ह॒स्रिणी॒रिषः॑॥

सब प्रकार के ऐश्वर्यों का दाता एकमात्र परमात्मा ही है, इसलिये उससे ऐश्वर्यों की प्रार्थना करनी चाहिये॥४॥

स नः॑ पुना॒न आ भ॑र र॒यिं स्तो॒त्रे सु॒वीर्य॑म्। ज॒रि॒तुर्व॑र्धया॒ गिरः॑॥

जो लोग परमात्मपरायण होकर अपनी वाक्शक्ति को बढ़ाते हैं, परमात्मा उन्हें वाग्मी अर्थात् सुन्दर वक्ता बनाता है॥५॥

पु॒ना॒न इ॑न्द॒वा भ॑र॒ सोम॑ द्वि॒बर्ह॑सं र॒यिम्। वृष॑न्निन्दो न उ॒क्थ्य॑म्॥

जो लोग परमात्मा के गुण-कर्मानुसार अपने स्वभाव को बनाते हैं, परमात्मा उन्हें ऐहिक और पारलौकिक दोनों प्रकार के सुख प्रदान करता है॥६॥यह ४० वाँ सूक्त और ३० वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र ये गावो॒ न भूर्ण॑यस्त्वे॒षा अ॒यासो॒ अक्र॑मुः। घ्नन्तः॑ कृ॒ष्णामप॒ त्वच॑म्॥

परमात्मा सब लोक-लोकान्तरों को उत्पन्न करता है, उसी की सत्ता से सब पृथिव्यादिलोक गति कर रहे हैं॥१॥

सु॒वि॒तस्य॑ मनाम॒हेऽति॒ सेतुं॑ दुरा॒व्य॑म्। सा॒ह्वांसो॒ दस्यु॑मव्र॒तम्॥

परमात्मा इस चराचर जगत् का सेतु है अर्थात् मर्य्यादा है, उसी की मर्य्यादा में सूर्य्य-चन्द्रादि सब लोक परिभ्रमण करते हैं। मनुष्यों को चाहिये कि उस मर्य्यादा पुरुषोत्तम को सदैव अपना लक्ष्य बनावें॥२॥

शृ॒ण्वे वृ॒ष्टेरि॑व स्व॒नः पव॑मानस्य शु॒ष्मिणः॑। चर॑न्ति वि॒द्युतो॑ दि॒वि॥

परमात्मा की विद्युदादि अनेक शक्तियें हैं, इसलिये उसे अनन्तशक्ति ब्रह्म कहा जाता है॥३॥

आ प॑वस्व म॒हीमिषं॒ गोम॑दिन्दो॒ हिर॑ण्यवत्। अश्वा॑व॒द्वाज॑वत्सु॒तः॥

परमात्मा अपनी स्वसत्ता से विराजमान है। अर्थात् परमात्मा सबका अधिष्ठान होकर सब वस्तुओं को प्रकाशित कर रहा है और वह स्वयंप्रकाश है॥४॥

स प॑वस्व विचर्षण॒ आ म॒ही रोद॑सी पृण। उ॒षाः सूर्यो॒ न र॒श्मिभिः॑॥

परमात्मा ही एकमात्र पवित्रता का केन्द्र है। पवित्रता चाहनेवालों को चाहिये कि पवित्र होने के लिये उसी परमात्मा की उपासना करके अपने आपको पवित्र बनायें॥५॥

परि॑ णः शर्म॒यन्त्या॒ धार॑या सोम वि॒श्वतः॑। सरा॑ र॒सेव॑ वि॒ष्टप॑म्॥

आनन्दस्त्रोत एकमात्र परमात्मा ही है, इसलिये आनन्दाभिलाषी जनों को चाहिये कि उसी आनन्दाम्बुधि का रसपान करके अपने आपको आनन्दित करें॥६॥यह ४१ वाँ सूक्त और ३१ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

ज॒नय॑न्रोच॒ना दि॒वो ज॒नय॑न्न॒प्सु सूर्य॑म्। वसा॑नो॒ गा अ॒पो हरिः॑॥

उसी परमात्मा ने सूर्य्यादि सब लोकों को उत्पन्न किया और उसी की सत्ता से स्थिर होकर सब लोक-लोकान्तर अपनी-अपनी स्थिति को लाभ कर रहे हैं॥१॥

ए॒ष प्र॒त्नेन॒ मन्म॑ना दे॒वो दे॒वेभ्य॒स्परि॑। धार॑या पवते सु॒तः॥

परमात्मा अपने वैदिक ज्ञान से सब लोगों को ज्ञानी-विज्ञानी बनाकर आनन्दित करता है॥२॥

वा॒वृ॒धा॒नाय॒ तूर्व॑ये॒ पव॑न्ते॒ वाज॑सातये। सोमाः॑ स॒हस्र॑पाजसः॥

इस संसार में सर्वशक्तिमान् एकमात्र परमात्मा से सब प्रकार के अभ्युदय की प्रार्थना करनी चाहिये। जो लोग उक्त परमात्मा से अभ्युदय की प्रार्थना करके उद्योगी बनते हैं, वे अवश्यमेव अभ्युदय को प्राप्त होते हैं॥३॥

दु॒हा॒नः प्र॒त्नमित्पयः॑ प॒वित्रे॒ परि॑ षिच्यते। क्रन्द॑न्दे॒वाँ अ॑जीजनत्॥

परमात्मा ने वेदवाणीरूपी कामधेनु को ब्रह्मानन्द से परिपूर्ण कर दिया है। जो लोग इस अमृतरस को पान करना चाहते हों, वे उक्त अमृतप्रदायिनी ब्रह्मविद्यारूपी वेदवाग्धेनु को वत्सवत् उसके प्रेमपात्र बनकर इस दुग्धामृत को पान करें॥४॥

अ॒भि विश्वा॑नि॒ वार्या॒भि दे॒वाँ ऋ॑ता॒वृधः॑। सोमः॑ पुना॒नो अ॑र्षति॥

यद्यपि परमात्मा दयामय और सर्वहितकारी है, तथापि उद्योगी पुरुषों को पवित्र करता हुआ अभ्युदयरूप फल देता है, अनुद्योगियों को नहीं॥५॥

गोम॑न्नः सोम वी॒रव॒दश्वा॑व॒द्वाज॑वत्सु॒तः। पव॑स्व बृह॒तीरिषः॑॥

परमात्मा ही वीर धर्म का दाता है। उसकी कृपा से वीरपुरुष उत्पन्न होकर दुष्टों का दलन और श्रेष्ठों का परिपालन करते हैं॥६॥३२॥यह ४२ वाँ सूक्त और ३२ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

यो अत्य॑ इव मृ॒ज्यते॒ गोभि॒र्मदा॑य हर्य॒तः। तं गी॒र्भिर्वा॑सयामसि॥

जो लोग परमात्मा की प्रार्थना उपासना और स्तुति करते हैं, वे अवश्यमेव परमात्मा के स्वरूप को अनुभव करते हैं॥१॥

तं नो॒ विश्वा॑ अव॒स्युवो॒ गिरः॑ शुम्भन्ति पू॒र्वथा॑। इन्दु॒मिन्द्रा॑य पी॒तये॑॥

वही परमात्मा मनुष्य की पूर्ण तृप्ति के लिये पर्याप्त होता है। अन्य शब्द-स्पर्शादि विषय इसको कदाचित्त् भी तृप्त नहीं कर सकते॥२॥

पु॒ना॒नो या॑ति हर्य॒तः सोमो॑ गी॒र्भिः परि॑ष्कृतः। विप्र॑स्य॒ मेध्या॑तिथेः॥

जो लोग ज्ञानयोगी बनकर ज्ञानप्रदीप से अपने हृदयमन्दिर को प्रदीप्त करते हैं, उनके हृदयरूपी मन्दिर में परमात्मा का पूर्णतया आभास होता है॥३॥

पव॑मान वि॒दा र॒यिम॒स्मभ्यं॑ सोम सु॒श्रिय॑म्। इन्दो॑ स॒हस्र॑वर्चसम्॥

वही परमात्मा अनन्त प्रकार के अभ्युदयों का दाता है अर्थात् ब्रह्मवर्चसादि सब तेज उसी की सत्ता से उपलब्ध होते हैं॥४॥

इन्दु॒रत्यो॒ न वा॑ज॒सृत्कनि॑क्रन्ति प॒वित्र॒ आ। यदक्षा॒रति॑ देव॒युः॥

दैवी सम्पत्तिवाले पुरुषों के हृदय में परमात्मा की ज्योति सदैव देदीप्यमान रहती है। मलिनान्तःकरण आसुरी सम्पत्तिवालों के हृदय उस दैवी दिव्यज्योति से सर्वथा वञ्चित रहते हैं॥५॥

पव॑स्व॒ वाज॑सातये॒ विप्र॑स्य गृण॒तो वृ॒धे। सोम॒ रास्व॑ सु॒वीर्य॑म्॥

कर्मयोगी पुरुष, जो अपने उद्योग से सदैव अभ्युदयाभिलाषी रहते हैं, उनको परमात्मा अनन्त प्रकार के ऐश्वर्य प्रदान करता है ॥६॥

प्र ण॑ इन्दो म॒हे तन॑ ऊ॒र्मिं न बिभ्र॑दर्षसि। अ॒भि दे॒वाँ अ॒यास्यः॑॥

जो पुरुष अनुष्ठानशील नहीं अर्थात् उद्योगी बनकर कर्म्मयोग में तत्पर नहीं है, वह पुरुष कदाचित् भी परमात्मा को नहीं पा सकता, इसलिये उद्योगी बनकर कर्म्म में तत्पर होना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य होना चाहिये ॥१॥

म॒ती जु॒ष्टो धि॒या हि॒तः सोमो॑ हिन्वे परा॒वति॑। विप्र॑स्य॒ धार॑या क॒विः॥

वेद यद्यपि परमात्मा का ज्ञान है, तथापि उस ज्ञान का आर्विभाव परमात्मा करता है। इसी अभिप्राय से उसे वेदों का निर्माता वा कर्त्ता कथन किया है, वास्तव में वेद नित्य है ॥२॥

अ॒यं दे॒वेषु॒ जागृ॑विः सु॒त ए॑ति प॒वित्र॒ आ। सोमो॑ याति॒ विच॑र्षणिः॥

अन्य लोगों की जागृति नैमित्तिकी होती है अर्थात् स्वतःसिद्ध नहीं होती। एकमात्र परमात्मा की जागृति ही स्वतःसिद्ध है अर्थात् परमात्मा ही ज्ञानस्वरूप है, अन्य सब जीव पराधीन ज्ञानवाले हैं ॥३॥

स नः॑ पवस्व वाज॒युश्च॑क्रा॒णश्चारु॑मध्व॒रम्। ब॒र्हिष्माँ॒ आ वि॑वासति॥

परमात्मा अपनी व्यापक सत्ता से सब लोक-लोकान्तरों को एकदेशी बनाकर व्यापकरूप से स्थिर है। उक्त यज्ञ में उसकी प्रकाशकभाव से प्रकाशित होने की प्रार्थना की गई है ॥४॥

स नो॒ भगा॑य वा॒यवे॒ विप्र॑वीरः स॒दावृ॑धः। सोमो॑ दे॒वेष्वा य॑मत्॥

कर्म्मयोगी तथा ज्ञानयोगी पुरुषों की शक्तियों के बढ़ाने के लिये परमात्मा सदैव उद्यत रहता है ॥५॥

स नो॑ अ॒द्य वसु॑त्तये क्रतु॒विद्गा॑तु॒वित्त॑मः। वाजं॑ जेषि॒ श्रवो॑ बृ॒हत्॥

कवि शब्द के अर्थ यहाँ सर्वज्ञ के हैं। ज्ञानी-विज्ञानी सब में से एकमात्र परमात्मा ही सर्वोपरि कवि सर्वत्र है, अन्य कोई नहीं॥६॥यह ४४ वाँ सूक्त और पहला वर्ग समाप्त हुआ ॥

स प॑वस्व॒ मदा॑य॒ कं नृ॒चक्षा॑ दे॒ववी॑तये। इन्द॒विन्द्रा॑य पी॒तये॑॥

जीवात्मा के हृदयमन्दिर को एकमात्र परमात्मा ही प्रकाशित करता है, अन्य कोई भी जीव को सत्यज्ञान के प्रकाश का दाता नहीं ॥१॥

स नो॑ अर्षा॒भि दू॒त्यं१॒॑ त्वमिन्द्रा॑य तोशसे। दे॒वान्त्सखि॑भ्य॒ आ वर॑म्॥

परमात्मा सदाचारियों को सुख और दुष्कर्मियों को दुःख देता है। परमात्मा के राज्य में किसी के साथ भी अन्याय नहीं होता। इस बात को ध्यान में रखकर मनुष्य को सदैव सदाचारी बनने का यत्न करना चाहिये॥२॥

उ॒त त्वाम॑रु॒णं व॒यं गोभि॑रञ्ज्मो॒ मदा॑य॒ कम्। वि नो॑ रा॒ये दुरो॑ वृधि॥

जो लोग अपनी इन्द्रियों का संयम करते हैं, वे ही उस परमात्मा के शुद्ध स्वरूप को अनुभव कर सकते हैं, अन्य नहीं॥३॥

अत्यू॑ प॒वित्र॑मक्रमीद्वा॒जी धुरं॒ न याम॑नि। इन्दु॑र्दे॒वेषु॑ पत्यते॥

यद्यपि प्रकृति और जीव ये दोनों पदार्थ भी अपनी सत्ता से विद्यमान हैं, तथापि अधिकरण अर्थात् सबका आधार बनकर एकमात्र परमात्मा ही स्थिर है, इसलिये उसको (धुर) रूप अर्थात् सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों के आधाररूप से कथन किया गया है॥४॥

समी॒ सखा॑यो अस्वर॒न्वने॒ क्रीळ॑न्त॒मत्य॑विम्। इन्दुं॑ ना॒वा अ॑नूषत॥

परमात्मा के ज्ञान का साधन मनुष्य के पास एकमात्र उसका स्तोत्र वेद ही है, अन्य कोई ग्रन्थ उसके पूर्णज्ञान का साधन नहीं ॥५॥

तया॑ पवस्व॒ धार॑या॒ यया॑ पी॒तो वि॒चक्ष॑से। इन्दो॑ स्तो॒त्रे सु॒वीर्य॑म्॥

परमात्मा अपनी ज्ञानरूप धारा से सबके अन्तःकरणों को सिञ्चित करता है। तात्पर्य यह है कि उसका ज्ञानरूप प्रकाश प्रत्येक पुरुष के हृदय में पड़ता है, परन्तु सुपात्र पुरुष ही पात्र बनकर उसका ग्रहण कर सकते हैं, अन्य नहीं॥६॥यह ४५ वाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

असृ॑ग्रन्दे॒ववी॑त॒येऽत्या॑सः॒ कृत्व्या॑ इव। क्षर॑न्तः पर्वता॒वृधः॑॥

परमात्मा ज्ञानरूप यज्ञ के लिये ज्ञानी-विज्ञानी पुरुषों को उत्पन्न करता है, इसलिये सब मनुष्यों को चाहिये कि वे कर्म्मयोगी तथा ज्ञानयोगी विद्वानों को बुलाकर अपने यज्ञादि कर्म्मों का आरम्भ किया करें ॥१॥

परि॑ष्कृतास॒ इन्द॑वो॒ योषे॑व॒ पित्र्या॑वती। वा॒युं सोमा॑ असृक्षत॥

कर्म्मयोगी पुरुष उक्त पदार्थों से अति सूक्ष्मभाव निकालकर प्रजाओं में प्रचार करते हैं, इसलिये प्रत्येक पुरुष को चाहिये कि वह कर्म्मयोगी विद्वानों का सत्कार करे, ताकि विज्ञान की वृद्धि होकर प्रजाओं में सुख का संचार हो॥२॥

ए॒ते सोमा॑स॒ इन्द॑वः॒ प्रय॑स्वन्तश्च॒मू सु॒ताः। इन्द्रं॑ वर्धन्ति॒ कर्म॑भिः॥

कर्म्मयोगियों के प्रभाव से ही सैनिक बल की वृद्धि होती है और कर्म्मयोगियों के प्रभाव से ही सम्राट् सम्पूर्ण देश-देशान्तरों का शासन करता है, इसलिये परमात्मा ने इन मन्त्रों में कर्म्मयोगियों के सत्कार का वर्णन किया है॥३॥

आ धा॑वता सुहस्त्यः शु॒क्रा गृ॑भ्णीत म॒न्थिना॑। गोभिः॑ श्रीणीत मत्स॒रम्॥

मनुष्यों को चाहिये कि वे कर्म्मयोगियों से प्रार्थना करके अपने देश के क्रिया-कौशल की वृद्धि करें॥४॥

स प॑वस्व धनंजय प्रय॒न्ता राध॑सो म॒हः। अ॒स्मभ्यं॑ सोम गातु॒वित्॥

परमात्मा की कृपा से सदुपदेशक उत्पन्न होकर देश में सदुपदेश देकर देश का कल्याण करते हैं॥५॥

ए॒तं मृ॑जन्ति॒ मर्ज्यं॒ पव॑मानं॒ दश॒ क्षिपः॑। इन्द्रा॑य मत्स॒रं मद॑म्॥

परमात्मा ही जीवात्मा के लिये एकमात्र आनन्द का स्त्रोत है। उसी के आनन्द का लाभ करके जीव आनन्दित होता है॥६॥३॥यह ४६ वाँ सूक्त और तीसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒या सोमः॑ सुकृ॒त्यया॑ म॒हश्चि॑द॒भ्य॑वर्धत। म॒न्दा॒न उद्वृ॑षायते॥

हे अभ्युदयाभिलाषी जनों! यदि आप अभ्युदय को चाहते हैं, तो एकमात्र परमात्मा की शरण को प्राप्त होकर उद्योगी बनें ॥१॥

कृ॒तानीद॑स्य॒ कर्त्वा॒ चेत॑न्ते दस्यु॒तर्ह॑णा। ऋ॒णा च॑ धृ॒ष्णुश्च॑यते॥

देवऋण, पितृऋण, ऋषिऋण इन तीन ऋणों को उतारने योग्य वही पुरुष हो सकता है, जो परमात्माज्ञापालन करता हुआ उद्योगी बनता है ॥२॥

आत्सोम॑ इन्द्रि॒यो रसो॒ वज्रः॑ सहस्र॒सा भु॑वत्। उ॒क्थं यद॑स्य॒ जाय॑ते॥

जीवात्मा के लिये परमात्मा ने अनन्त शक्तियें प्रदान की हैं, परन्तु उन सबका आविर्भाव तभी होता है, जब जीवात्मा वेदों द्वारा उन शक्तियों का ज्ञाता बनता है ॥३॥

स्व॒यं क॒विर्वि॑ध॒र्तरि॒ विप्रा॑य॒ रत्न॑मिच्छति। यदी॑ मर्मृ॒ज्यते॒ धियः॑॥

परमात्मा किसी को बिना कारण ऊँच नीच नहीं बनाता, किन्तु कर्म्मानुकूल फल देता है, इसलिये उद्योगी और सदाचारियों को ही ऐश्वर्य्य मिलता है, अन्यों को नहीं ॥४॥

सि॒षा॒सतू॑ रयी॒णां वाजे॒ष्वर्व॑तामिव। भरे॑षु जि॒ग्युषा॑मसि॥

जो संग्रामों में कर्मयोगी बनकर विजय की इच्छा करते हैं, परमात्मा उन्हीं को विजयी बनाता है ॥५॥यह ४७वाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ॥

तं त्वा॑ नृ॒म्णानि॒ बिभ्र॑तं स॒धस्थे॑षु म॒हो दि॒वः। चारुं॑ सुकृ॒त्यये॑महे॥

सम्पूर्ण ऐश्वर्यों का धारण करनेवाला एकमात्र परमात्मा ही है॥१॥

संवृ॑क्तधृष्णुमु॒क्थ्यं॑ म॒हाम॑हिव्रतं॒ मद॑म्। श॒तं पुरो॑ रुरु॒क्षणि॑म्॥

परमात्मा सत्य के विरोधी अनन्त दुष्टों का भी नाश करनेवाला है, इसलिये सत्यव्रती होने के लिये उसी प्रकाशस्वरूप परमात्मा की उपासना की आवश्यकता है; उससे सम्पूर्ण अज्ञानों को दूर करके एकमात्र अपने सच्चे ज्ञान का प्रकाश करें॥२॥

अत॑स्त्वा र॒यिम॒भि राजा॑नं सुक्रतो दि॒वः। सु॒प॒र्णो अ॑व्य॒थिर्भ॑रत्॥

सम्पूर्ण लोक-लोकान्तरों का अधिपति एकमात्र परमात्मा ही है, इसलिए उसी परमात्मा की उपासना करनी चाहिए, जिससे बढ़कर जीव का कोई अन्य स्वामी नहीं हो सकता ॥३॥

विश्व॑स्मा॒ इत्स्व॑र्दृ॒शे साधा॑रणं रज॒स्तुर॑म्। गो॒पामृ॒तस्य॒ विर्भ॑रत्॥

जिस प्रकार प्रकृति के तीनों गुणों में से रजोगुण की प्रधानता है अर्थात् रजोगुण सत्त्वगुण और तमोगुण को धारण किये हुए रहता है, इसी प्रकार से परमात्मा के सत्, चित् और आनन्द इन तीनों गुणों में से चित् की प्रधानता है। अर्थात् चित् ही सत् और आनन्द का भी प्रकाशक है। इसी प्रकार परमात्मा के तेजोमय गुण को प्रधान समझकर उसके उपलब्ध करने की चेष्टा करनी चाहिए ॥४॥

अधा॑ हिन्वा॒न इ॑न्द्रि॒यं ज्यायो॑ महि॒त्वमा॑नशे। अ॒भि॒ष्टि॒कृद्विच॑र्षणिः॥

जीवों के अन्दर अन्तर्यामी रूप से व्याप्त एकमात्र परमात्मा ही है, कोई अन्य देव नहीं ॥५॥यह ४८ वाँ सूक्त और ५ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

पव॑स्व वृ॒ष्टिमा सु नो॒ऽपामू॒र्मिं दि॒वस्परि॑। अ॒य॒क्ष्मा बृ॑ह॒तीरिषः॑॥

परमात्मा ने ही द्युलोक को वर्षणशील और पृथिवीलोक को नानाविध अन्नादि ओषधियों की उत्पत्ति का स्थान बनाया है॥१॥

तया॑ पवस्व॒ धार॑या॒ यया॒ गाव॑ इ॒हागम॑न्। जन्या॑स॒ उप॑ नो गृ॒हम्॥

हे परमात्मन्! आप हमारी इन्द्रियों को अन्तर्मुखी बनाकर हमको संयमी बनाइये॥२॥

घृ॒तं प॑वस्व॒ धार॑या य॒ज्ञेषु॑ देव॒वीत॑मः। अ॒स्मभ्य॑य वृ॒ष्टिमा प॑व॥

जो लोग ज्ञानयज्ञ या कर्म में तत्पर होकर परमात्मा का यजन करते हैं, परमात्मा उनको सर्वेश्वर्यसम्पन्न बनाता है ॥३॥

स न॑ ऊ॒र्जे व्य१॒॑व्ययं॑ प॒वित्रं॑ धाव॒ धार॑या। दे॒वासः॑ शृ॒णव॒न्हि क॑म्॥

जो लोग दिव्य शक्तिवाले होते हैं, वे ही परमात्मा की वेदरूपी वाणी का श्रवण मनन आदि कर सकते हैं, अन्य नहीं ॥४॥

पव॑मानो असिष्यद॒द्रक्षां॑स्यप॒जङ्घ॑नत्। प्र॒त्न॒वद्रो॒चय॒न्रुचः॑॥

परमात्मा चराचर के हृदय में स्थिर है, इसलिए उसकी स्थिति को अत्यन्त सन्निहित मानकर सदैव परमात्मपरायण होना चाहिए॥यह ४९ वाँ सूक्त और ६ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

उत्ते॒ शुष्मा॑स ईरते॒ सिन्धो॑रू॒र्मेरि॑व स्व॒नः। वा॒णस्य॑ चोदया प॒विम्॥

परमात्मा की शक्तियें अनन्त हैं और नित्य हैं। यद्यपि प्रकृति और जीवात्मा की शक्तियें अनादि अनन्त होने से नित्य हैं, तथापि वे अल्पाश्रित होने से अल्प और परिणामी नित्य हैं, कूटस्थ नित्य नहीं॥तात्पर्य यह है कि जीव और प्रकृति के भाव उत्पत्तिविनाशशाली हैं और ईश्वर के भाव सदा एकरस हैं ॥१॥

प्र॒स॒वे त॒ उदी॑रते ति॒स्रो वाचो॑ मख॒स्युवः॑। यदव्य॒ एषि॒ सान॑वि॥

परमात्मा का आविर्भाव और तिरोभाव वास्तव में नहीं होता; क्योंकि वह कूटस्थ नित्य अर्थात् एकरस सदा आविनाशी है। उसका आविर्भाव तिरोभाव उसके कीर्तनप्रयुक्त कहा जा सकता है। अर्थात् जहाँ उसका कीर्तन होता है, उसका नाम आविर्भाव है और जहाँ उसका अकीर्तन है वहाँ तिरोभाव है। उक्त आविर्भाव तिरोभाव मनुष्य के ज्ञान के अभिप्राय से है। अर्थात् ज्ञानियों के हृदय में उसका आविर्भाव है और अज्ञानियों के हृदय में तिरोभाव है ॥२॥

अव्यो॒ वारे॒ परि॑ प्रि॒यं हरिं॑ हिन्व॒न्त्यद्रि॑भिः। पव॑मानं मधु॒श्चुत॑म्॥

कर्मयोगी या ज्ञानयोगी विद्वान् दोनों अपने शुद्धान्तःकरण से परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं ॥३॥

आ प॑वस्व मदिन्तम प॒वित्रं॒ धार॑या कवे। अ॒र्कस्य॒ योनि॑मा॒सद॑म्॥

परमात्मा ही अपने ज्ञानप्रदीप से उपासकों के हृदयरूपी मन्दिर को प्रकाशित करता है ॥४॥

स प॑वस्व मदिन्तम॒ गोभि॑रञ्जा॒नो अ॒क्तुभिः॑। इन्द॒विन्द्रा॑य पी॒तये॑॥

जीव की सच्ची तृप्ति परमात्मानन्द से ही होती है, अन्यथा नहीं ॥५॥यह ५० वाँ सूक्त और ७ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अध्व॑र्यो॒ अद्रि॑भिः सु॒तं सोमं॑ प॒वित्र॒ आ सृ॑ज। पु॒नी॒हीन्द्रा॑य॒ पात॑वे॥

परमात्मा की प्राप्ति के लिए अन्तःकरण का पवित्र होना अत्यावश्यक है, इसलिए प्रत्येक जिज्ञासु को चाहिये कि पहले अपने अन्तःकरण को पवित्र करे ॥१॥

दि॒वः पी॒यूष॑मुत्त॒मं सोम॒मिन्द्रा॑य व॒ज्रिणे॑। सु॒नोता॒ मधु॑मत्तमम्॥

जो अपनी तृप्ति के लिए एकमात्र परमात्मा को ध्यान का विषय बनाते हैं, वे उस ब्रह्मामृत का पान करते हैं, अन्य नहीं ॥२॥

तव॒ त्य इ॑न्दो॒ अन्ध॑सो दे॒वा मधो॒र्व्य॑श्नते। पव॑मानस्य म॒रुतः॑॥

ब्रह्मामृतरसास्वाद के लिए दिव्य शक्तियों को उपलब्ध करना अत्यावश्यक है, इसलिए उक्त मन्त्र में परमात्मा ने दिव्य शक्तियों का उपदेश किया है ॥३॥

त्वं हि सो॑म व॒र्धय॑न्त्सु॒तो मदा॑य॒ भूर्ण॑ये। वृष॑न्त्स्तो॒तार॑मू॒तये॑॥

सर्वोपरि नीति और व्यवहारकुशलता की नीति एकमात्र परमात्मा द्वारा उपदिष्ट वेदों से ही मिल सकती है, अन्यत्र नहीं ॥४॥

अ॒भ्य॑र्ष विचक्षण प॒वित्रं॒ धार॑या सु॒तः। अ॒भि वाज॑मु॒त श्रवः॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा से ऐश्वर्यप्राप्ति की प्रार्थना की गई है ॥५॥बह ५१ वाँ सूक्त और ८ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

परि॑ द्यु॒क्षः स॒नद्र॑यि॒र्भर॒द्वाजं॑ नो॒ अन्ध॑सा। सु॒वा॒नो अ॑र्ष प॒वित्र॒ आ॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे जिज्ञासुजनों! तुम लोग जब अपने अन्तःकरण को पवित्र बनाकर सम्पूर्ण ऐश्वर्यों को उपलब्ध करने की जिज्ञासा अपने हृदय में उत्पन्न करोगे, तब तुम ऐश्वर्य को उपलब्ध करोगे ॥१॥

तव॑ प्र॒त्नेभि॒रध्व॑भि॒रव्यो॒ वारे॒ परि॑ प्रि॒यः। स॒हस्र॑धारो या॒त्तना॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा वेदमार्ग के आश्रयण का उपदेश करते हैं ॥२॥

च॒रुर्न यस्तमी॑ङ्ख॒येन्दो॒ न दान॑मीङ्खय। व॒धैर्व॑धस्नवीङ्खय॥

इस मन्त्र में परमात्मा ने सत्कर्म्मी बनाने का उपदेश दिया है ॥३॥

नि शुष्म॑मिन्दवेषां॒ पुरु॑हूत॒ जना॑नाम्। यो अ॒स्माँ आ॒दिदे॑शति॥

इस मन्त्र में परमात्मा ने इस बात का उपदेश दिया है कि जो पुरुष विद्या तथा बल को उपलब्ध करके सत्कर्म्मी तथा विनीत बनते हैं, उन्ही से संसार शिक्षा का लाभ करता है ॥४॥

श॒तं न॑ इन्द ऊ॒तिभिः॑ स॒हस्रं॑ वा॒ शुची॑नाम्। पव॑स्व मंह॒यद्र॑यिः॥

परमात्मा ने मनुष्य के ऐश्वर्य के लिए सैंकड़ों और सहस्त्रों शक्तियों को उत्पन्न किया है। मनुष्य को चाहिए कि कर्मयोगी बनकर उन शक्तियों का लाभ करे ॥५॥यह ५२ वाँ सूक्त और ९ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

उत्ते॒ शुष्मा॑सो अस्थू॒ रक्षो॑ भि॒न्दन्तो॑ अद्रिवः। नु॒दस्व॒ याः प॑रि॒स्पृधः॑॥

परमात्मा में राग-द्वेषादि भावों का गन्ध भी नहीं है। जो लोग परमात्मोपदिष्ट मार्ग को छोड़कर यथेष्टाचार में रत हैं, उनके यथायोग्य फल देने के कारण परमात्मा उनका द्वेष्टा कथन किया गया है ॥१॥

अ॒या नि॑ज॒घ्निरोज॑सा रथसं॒गे धने॑ हि॒ते। स्तवा॒ अबि॑भ्युषा हृ॒दा॥

जो पुरुष शुभ कार्य करते हुए परमात्मा के उपासनासमय निर्भयता से उसकी समक्षता लाभ करते हैं, वे सदैव तेजस्वी और ब्रह्मवर्चस्वी आदि दिव्यभावों को उपलब्ध करते हैं॥२॥

अस्य॑ व्र॒तानि॒ नाधृषे॒ पव॑मानस्य दू॒ढ्या॑। रु॒ज यस्त्वा॑ पृत॒न्यति॑॥

परमात्मा दुराचारियों का अधःपतन करते हैं और सदाचारियों को सदैव उन्नतिशील बनाते हैं॥३॥

तं हि॑न्वन्ति मद॒च्युतं॒ हरिं॑ न॒दीषु॑ वा॒जिन॑म्। इन्दु॒मिन्द्रा॑य मत्स॒रम्॥

आनन्दस्त्रोत परमात्मा ही सबका प्रकाशक है, उसी के प्रकाश से सम्पूर्ण विश्व प्रकाशित होता है॥४॥यह ५३ वाँ सूक्त और १० वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒स्य प्र॒त्नामनु॒ द्युतं॑ शु॒क्रं दु॑दुह्रे॒ अह्र॑यः। पयः॑ सहस्र॒सामृषि॑म्॥

उक्त कामधेनुरूप परमात्मा से विद्वान् सदाचारी लोग दुग्धामृत के दोग्धा बनकर संसार में ब्रह्मामृत का संचार करते हैं ॥१॥

अ॒यं सूर्य॑ इवोप॒दृग॒यं सरां॑सि धावति। स॒प्त प्र॒वत॒ आ दिव॑म्॥

जिस प्रकार अन्य ग्रह-उपग्रहों को अपेक्षा से सूर्य स्वयंप्रकाश है, इसी प्रकार सूर्य आदिकों की अपेक्षा से परमात्मा स्वयंप्रकाश है। उस स्वयंप्रकाश स्वयंज्योति की उपासना करके सबको पवित्र बनने का यत्न करना चाहिए ॥२॥

अ॒यं विश्वा॑नि तिष्ठति पुना॒नो भुव॑नो॒परि॑। सोमो॑ दे॒वो न सूर्यः॑॥

उसी सर्वपावन परमात्मा की उपासना करनी चाहिये ॥३॥

परि॑ णो दे॒ववी॑तये॒ वाजाँ॑ अर्षसि॒ गोम॑तः। पु॒ना॒न इ॑न्दविन्द्र॒युः॥

परमात्मा की कृपा से ही मनुष्य को दिव्य शक्तियें मिलती हैं। परमात्मा ही अपनी अपार दया से मनुष्य को देवभाव प्रदान करता है।  हे देवत्व के अभिलाषी जनों! आपको चाहिये कि आप सदैव उस दिव्यगुण परमात्मा की उपासना करते रहें ॥४॥यह ५४ वाँ सूक्त और ११ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

यवं॑यवं नो॒ अन्ध॑सा पु॒ष्टम्पु॑ष्टं॒ परि॑ स्रव। सोम॒ विश्वा॑ च॒ सौभ॑गा॥

सम्पूर्ण ऐश्वर्य और सम्पूर्ण सौभाग्य को देनेवाला एकमात्र परमात्मा ही है, कोई अन्य नहीं ॥१॥

इन्दो॒ यथा॒ तव॒ स्तवो॒ यथा॑ ते जा॒तमन्ध॑सः। नि ब॒र्हिषि॑ प्रि॒ये स॑दः॥

परमात्मा यज्ञादि स्थानों को अपने विचित्र भावों से विभूषित करता है ॥२॥

उ॒त नो॑ गो॒विद॑श्व॒वित्पव॑स्व सो॒मान्ध॑सा। म॒क्षूत॑मेभि॒रह॑भिः॥

सम्पूर्ण ऐश्वर्यों का अधिपति एकमात्र परमात्मा ही है, इसलिए उसी की उपासना और प्रार्थना करनी चाहिये ॥३॥

यो जि॒नाति॒ न जीय॑ते॒ हन्ति॒ शत्रु॑म॒भीत्य॑। स प॑वस्व सहस्रजित्॥

काल सब पदार्थों के आयु को क्षय करके आप स्वयं अविनाशी बना रहता है, परन्तु काल का अविनाशित्व भी सापेक्ष है अर्थात् अनित्य पदार्थों की अपेक्षा काल को नित्य कहा जाता है, परन्तु परमात्मा की अपेक्षा से काल भी अनित्य है, इसलिए परमात्मा सर्वोपरि कूटस्थ नित्य है। उसी की उपासना मनुष्य को शुद्ध हृदय से करनी चाहिये ॥४॥यह ५५ वाँ सूक्त और १२ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

परि॒ सोम॑ ऋ॒तं बृ॒हदा॒शुः प॒वित्रे॑ अर्षति। वि॒घ्नन्रक्षां॑सि देव॒युः॥

परमात्मा कर्मों का यथायोग्य फलप्रदाता है; इसलिए उसके उपासक को चाहिए कि वह सत्कर्म करता हुआ उसका उपासक बने, ताकि उसे परमात्मा के दण्ड का फल न भोगना पड़े। तात्पर्य यह है कि प्रार्थना उपासना से केवल हृदय की शुद्धि होती है, पापों की क्षमा नहीं होती ॥१॥

यत्सोमो॒ वाज॒मर्ष॑ति श॒तं धारा॑ अप॒स्युवः॑। इन्द्र॑स्य स॒ख्यमा॑वि॒शन्॥

वास्तव में परमात्मा कोई मित्र या अमित्र नहीं। जो लोग परमात्मा की आज्ञापालन करने से उसके अनुकूल चलते हैं, उनसे वह स्नेह करता है, इसलिए वे मित्र कहलाते हैं और प्रतिकूलवर्ती लोग स्नेह के पात्र नहीं होते, इसलिए अमित्र कहलाते हैं, इसीलिए यहाँ मित्र शब्द आया है। कुछ मानुषी मैत्री के भाव से नहीं ॥२॥

अ॒भि त्वा॒ योष॑णो॒ दश॑ जा॒रं न क॒न्या॑नूषत। मृ॒ज्यसे॑ सोम सा॒तये॑॥

संस्कारी पुरुषों की इन्द्रियवृत्तियें उसको विषय करती हैं, असंस्कारियों को नहीं ॥३॥

त्वमिन्द्रा॑य॒ विष्ण॑वे स्वा॒दुरि॑न्दो॒ परि॑ स्रव। नॄन्त्स्तो॒तॄन्पा॒ह्यंह॑सः॥

ज्ञानयोगी अपने ज्ञान के प्रभाव से ईश्वर का साक्षात्कार करता है और अनिष्ट कर्मों से बचता है ॥४॥यह ५६ वाँ सूक्त और १३ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र ते॒ धारा॑ अस॒श्चतो॑ दि॒वो न य॑न्ति वृ॒ष्टयः॑। अच्छा॒ वाजं॑ सह॒स्रिण॑म्॥

जिन लोगों ने सत्कर्मों द्वारा अपने आपको ज्ञान का पात्र बनाया है, उनके अन्तःकरण में परमात्मा की सुधामयी वृष्टि सदैव होती रहती है ॥१॥

अ॒भि प्रि॒याणि॒ काव्या॒ विश्वा॒ चक्षा॑णो अर्षति। हरि॑स्तुञ्जा॒न आयु॑धा॥

उसका दण्डरूप वज्र दुष्टों के लिए सदैव उद्यत रहता है और सत्कर्मी सदैव उससे निर्भय रहते हैं ॥२॥

स म॑र्मृजा॒न आ॒युभि॒रिभो॒ राजे॑व सुव्र॒तः। श्ये॒नो न वंसु॑ षीदति॥

जैसे ब्रह्माण्डगत प्रत्येक पदार्थ में विद्युत् व्याप्त है, इसी प्रकार परमात्मशक्ति भी सर्वत्र व्याप्त है ॥३॥

स नो॒ विश्वा॑ दि॒वो वसू॒तो पृ॑थि॒व्या अधि॑। पु॒ना॒न इ॑न्द॒वा भ॑र॥

सम्पूर्ण सम्पत्तियों का स्वामी एकमात्र परमात्मा ही है, इसलिए ऐश्वर्यप्राप्ति के लिए उसी की शरणागत होना आवश्यक है ॥४॥यह ५७ वाँ सूक्त और १४ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

तर॒त्स म॒न्दी धा॑वति॒ धारा॑ सु॒तस्यान्ध॑सः। तर॒त्स म॒न्दी धा॑वति॥

पापियों को तारने का अभिप्राय यह है कि जो लोग पाप का प्रायश्चित्त करके उसकी शरण को प्राप्त होते हैं, वे फिर कदापि पाप से पीड़ित नहीं होते। अथवा यों कहो कि पापमय संचित कर्मों की स्थिति उनके हृदय से दूर हो जाती है। अन्य पापों को ईश्वर कदापि क्षमा नहीं करता ॥१॥

उ॒स्रा वे॑द॒ वसू॑नां॒ मर्त॑स्य दे॒व्यव॑सः। तर॒त्स म॒न्दी धा॑वति॥

परमात्मा के आनन्द से ही आनन्दित होकर सब प्राणी सुख को उपलब्ध करते हैं अर्थात् आनन्दमय एकमात्र परमात्मा ही है, कोई अन्य नहीं ॥२॥

ध्व॒स्रयोः॑ पुरु॒षन्त्यो॒रा स॒हस्रा॑णि दद्महे। तर॒त्स म॒न्दी धा॑वति॥

परमात्मा की ज्ञानशक्ति और कर्मशक्ति का लाभ करके कर्मयोगी और ज्ञानयोगी अपने कर्तव्य में तत्पर रहते हैं ॥३॥

आ ययो॑स्त्रिं॒शतं॒ तना॑ स॒हस्रा॑णि च॒ दद्म॑हे। तर॒त्स म॒न्दी धा॑वति॥

यद्यपि साधारणतया मनुष्य के आयु की अवधि सौ वर्ष तक है, तथापि कर्मयोगी अपने उग्र कर्मों द्वारा अपनी आयु को बढ़ा सकते हैं, इसीलिए “भूयश्व शरदः श्तात्“ इस वाक्य में सौ से अधिक की प्रार्थना की गई है और जो इस मन्त्र में पापों के नाश का कथन है, वह पापवासना के क्षय के अभिप्राय से है, प्रारब्ध कर्मों के नाश के अभिप्राय से नहीं ॥४॥यह ५८ वाँ सूक्त और १५ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

पव॑स्व गो॒जिद॑श्व॒जिद्वि॑श्व॒जित्सो॑म रण्य॒जित्। प्र॒जाव॒द्रत्न॒मा भ॑र॥

परमात्मा की दया से ही पुरुष को विविध प्रकार के रत्नों का लाभ होता है ॥१॥

पव॑स्वा॒द्भ्यो अदा॑भ्यः॒ पव॒स्वौष॑धीभ्यः। पव॑स्व धि॒षणा॑भ्यः॥

तात्पर्य यह है कि परमात्मा सब शक्तियों के ऊपर विराजमान है। उसका शासन करनेवाली कोई अन्य शक्ति नहीं ॥२॥

त्वं सो॑म॒ पव॑मानो॒ विश्वा॑नि दुरि॒ता त॑र। क॒विः सी॑द॒ नि ब॒र्हिषि॑॥

मलिन वासनाओं के क्षय के लिये परमात्मा से सदैव प्रार्थना करनी चाहिये ॥३॥

पव॑मान॒ स्व॑र्विदो॒ जाय॑मानोऽभवो म॒हान्। इन्दो॒ विश्वाँ॑ अ॒भीद॑सि॥

उसी परमात्मा की उपासना से सब इष्ट फलों की प्राप्ति होती है ॥४॥यह ५९वाँ सूक्त और १६वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र गा॑य॒त्रेण॑ गायत॒ पव॑मानं॒ विच॑र्षणिम्। इन्दुं॑ स॒हस्र॑चक्षसम्॥

परमात्मा उपदेश करता है कि हे मनुष्यों! तुम वेदाध्ययन से अपने आपको पवित्र करो ॥१॥

तं त्वा॑ स॒हस्र॑चक्षस॒मथो॑ स॒हस्र॑भर्णसम्। अति॒ वार॑मपाविषुः॥

इस मन्त्र में परमात्मा की सर्वज्ञता का वर्णन किया गया है और एकमात्र उसी को उपास्यदेव वर्णन किया है ॥२॥

अति॒ वारा॒न्पव॑मानो असिष्यदत्क॒लशाँ॑ अ॒भि धा॑वति। इन्द्र॑स्य॒ हार्द्या॑वि॒शन्॥

परमात्मा ज्ञानप्रद होकर शुद्धान्तःकरणों में सदैव विराजमान रहता है, इसलिये परमात्मज्ञान के लिये बुद्धि का निर्मल करना अत्यावश्यक है ॥३॥

इन्द्र॑स्य सोम॒ राध॑से॒ शं प॑वस्व विचर्षणे। प्र॒जाव॒द्रेत॒ आ भ॑र॥

इस मन्त्र में परमात्मा से अभ्युदय की प्रार्थना की गई है कि हे परमात्मन्! आप हमको कर्मयोगी बनाकर अभ्युदयशील बनाएँ ॥४॥यह ६० वाँ सूक्त और १७ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

अ॒या वी॒ती परि॑ स्रव॒ यस्त॑ इन्दो॒ मदे॒ष्वा। अ॒वाह॑न्नव॒तीर्नव॑॥

इस मन्त्र में क्षात्रधर्म्म का वर्णन है और परमात्मा से इस विषय का बल माँगा गया है कि हम सब प्रकार से शत्रुओं का नाश करके संसार में न्याय का प्रचार करें ॥१॥

पुरः॑ स॒द्य इ॒त्थाधि॑ये॒ दिवो॑दासाय॒ शम्ब॑रम्। अध॒ त्यं तु॒र्वशं॒ यदु॑म्॥

कर्म्मयोगी लोग शत्रुओं के पुरों को सर्वप्रकार से भेदन कर सकते हैं, अन्य नहीं ॥२॥

परि॑ णो॒ अश्व॑मश्व॒विद्गोम॑दिन्दो॒ हिर॑ण्यवत्। क्षरा॑ सह॒स्रिणी॒रिषः॑॥

इस मन्त्र में कर्म्मयोगियों के द्वारा अनन्त प्रकार के ऐश्वर्यों की उपलब्धि का वर्णन किया गया है ॥३॥

पव॑मानस्य ते व॒यं प॒वित्र॑मभ्युन्द॒तः। स॒खि॒त्वमा वृ॑णीमहे॥

इस मन्त्र में परमात्मा के सद्गुणों को धारण करके परमात्मा के साथ मैत्री भाव का वर्णन किया गया है ॥४॥

ये ते॑ प॒वित्र॑मू॒र्मयो॑ऽभि॒क्षर॑न्ति॒ धार॑या। तेभि॑र्नः सोम मृळय॥

कर्म्मयोगी के उद्योगादि भावों को धारण करके स्वयं उद्योगी बनने का उपदेश इस मन्त्र में किया गया है ॥५॥

स नः॑ पुना॒न आ भ॑र र॒यिं वी॒रव॑ती॒मिष॑म्। ईशा॑नः सोम वि॒श्वतः॑॥

विद्वान् लोग अपने विद्याबल से अपने देश को ऐश्वर्यों से परिपूर्ण करते हैं, इसलिये विद्वानों का सत्कार करना परम कर्तव्य है ॥६॥

ए॒तमु॒ त्यं दश॒ क्षिपो॑ मृ॒जन्ति॒ सिन्धु॑मातरम्। समा॑दि॒त्येभि॑रख्यत॥

ईश्वर का साक्षात्कार बुद्धि की वृत्तियों के द्वारा होता है ॥७॥

समिन्द्रे॑णो॒त वा॒युना॑ सु॒त ए॑ति प॒वित्र॒ आ। सं सूर्य॑स्य र॒श्मिभिः॑॥

कर्म्मयोगी सूक्ष्म से सूक्ष्म पदार्थों की सिद्धि कर लेता है। अर्थात् उससे कोई काम भी अशक्य नहीं। कर्म्मयोगी के सामर्थ्य में समग्र काम हैं। इस बात का वर्णन इस मन्त्र में किया गया है ॥८॥

स नो॒ भगा॑य वा॒यवे॑ पू॒ष्णे प॑वस्व॒ मधु॑मान्। चारु॑र्मि॒त्रे वरु॑णे च॥

इस मन्त्र में परमात्मा से उद्योग की प्रार्थना की गई है। परमात्मा की परमकृपा से ही पुरुष उद्योगी बनकर परम ऐश्वर्य को प्राप्त होता है ॥९॥

उ॒च्चा ते॑ जा॒तमन्ध॑सो दि॒वि षद्भूम्या द॑दे। उ॒ग्रं शर्म॒ महि॒ श्रवः॑॥

कर्म्मयोगी पुरुष के उत्पन्न किये हुए कलाकौशल से सम्पूर्ण लोग लाभ उठाते हैं ॥१०॥

ए॒ना विश्वा॑न्य॒र्य आ द्यु॒म्नानि॒ मानु॑षाणाम्। सिषा॑सन्तो वनामहे॥

इस मन्त्र में स्वामिभक्ति का वर्णन किया गया है। तात्पर्य्य यह है कि स्वामिभक्ति से पुरुष उच्च पदवी को प्राप्त होता है ॥११॥

स न॒ इन्द्रा॑य॒ यज्य॑वे॒ वरु॑णाय म॒रुद्भ्यः॑। व॒रि॒वो॒वित्परि॑ स्रव॥

अग्नि तथा जलादि सब पदार्थ कर्मयोगी पुरुषों के द्वारा सब प्रकार के सुखो को उत्पन्न करते हैं ॥१२॥

उपो॒ षु जा॒तम॒प्तुरं॒ गोभि॑र्भ॒ङ्गं परि॑ष्कृतम्। इन्दुं॑ दे॒वा अ॑यासिषुः॥

अभ्युदयाभिलाषी जनों को चाहिये कि वे उक्तगुणवाले कर्मयोगी का आश्रयण करें ॥१३॥

तमिद्व॑र्धन्तु नो॒ गिरो॑ व॒त्सं सं॒शिश्व॑रीरिव। य इन्द्र॑स्य हृदं॒सनिः॑॥

इस मन्त्र में स्वामिभक्ति का उपदेश किया गया है ॥१४॥

अर्षा॑ णः सोम॒ शं गवे॑ धु॒क्षस्व॑ पि॒प्युषी॒मिष॑म्। वर्धा॑ समु॒द्रमु॒क्थ्य॑म्॥

हे मनुष्यों! यदि आप ऐश्वर्य को बढ़ाना चाहते हैं, तो कर्मयोगियों से प्रार्थना करके उद्योगी बनिये ॥१५॥

पव॑मानो अजीजनद्दि॒वश्चि॒त्रं न त॑न्य॒तुम्। ज्योति॑र्वैश्वान॒रं बृ॒हत्॥

कर्मयोगी द्वारा ही विद्युदादि पदार्थ उपयोग में आ सकते हैं, इसलिये हे मनुष्यों! तुमको चाहिये कि तुम कर्मयोगियों को उत्पन्न करके अपने देश को अभ्युदयशाली बनाओ ॥१६॥

पव॑मानस्य ते॒ रसो॒ मदो॑ राजन्नदुच्छु॒नः। वि वार॒मव्य॑मर्षति॥

इस मन्त्र में ईश्वर की भक्ति का उपदेश किया गया है। ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव को समझकर जो पुरुष ईश्वरपरायण होता है, उसको सब प्रकार के ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं ॥१७॥

पव॑मान॒ रस॒स्तव॒ दक्षो॒ वि रा॑जति द्यु॒मान्। ज्योति॒र्विश्वं॒ स्व॑र्दृ॒शे॥

परमात्मा की कृपा से मनुष्य में दिव्य शक्तियें उत्पन्न होती हैं, जिससे मनुष्य देवभाव को धारण करता है ॥१८॥

यस्ते॒ मदो॒ वरे॑ण्य॒स्तेना॑ पव॒स्वान्ध॑सा। दे॒वा॒वीर॑घशंस॒हा॥

इस मन्त्र में परमात्मा से आनन्दोपलब्धि की प्रार्थना की गई है ॥

जघ्नि॑र्वृ॒त्रम॑मि॒त्रियं॒ सस्नि॒र्वाजं॑ दि॒वेदि॑वे। गो॒षा उ॑ अश्व॒सा अ॑सि॥

परमात्मा का वज्र दुष्टों के दमन के लिये सदैव उद्यत रहता है। इस मन्त्र में परमात्मा की दण्डशक्ति का वर्णन किया गया है ॥२०॥

सम्मि॑श्लो अरु॒षो भ॑व सूप॒स्थाभि॒र्न धे॒नुभिः॑। सीद॑ञ्छ्ये॒नो न योनि॒मा॥

परमात्मा की शक्तियें विद्युत् के समान सदैव उग्ररूप से विद्यमान रहती हैं। जो पुरुष उनके विरुद्ध करता है, उसको आत्मिक सामाजिक और शारीरिकरूप से अवश्यमेव दण्ड मिलता है ॥२१॥

स प॑वस्व॒ य आवि॒थेन्द्रं॑ वृ॒त्राय॒ हन्त॑वे। व॒व्रि॒वांसं॑ म॒हीर॒पः॥

इस मन्त्र में सर्वशक्तिसम्पन्न परमात्मा से रक्षा की प्रार्थना की गई है ॥२२॥

सु॒वीरा॑सो व॒यं धना॒ जये॑म सोम मीढ्वः। पु॒ना॒नो व॑र्ध नो॒ गिरः॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा से प्रगल्भवक्ता बनने की प्रार्थना की गई है ॥२३॥

त्वोता॑स॒स्तवाव॑सा॒ स्याम॑ व॒न्वन्त॑ आ॒मुरः॑। सोम॑ व्र॒तेषु॑ जागृहि॥

जो परमात्मा अपने नियमों में सदैव जागृत है अर्थात् जिसके नियम सदैव अटल हैं, उन नियमों के अनुयायी होकर हम ईश्वरनियमविरोधियों का दलन करें ॥२४॥

अ॒प॒घ्नन्प॑वते॒ मृधोऽप॒ सोमो॒ अरा॑व्णः। गच्छ॒न्निन्द्र॑स्य निष्कृ॒तम्॥

जो अपने रक्षक स्वामी अर्थात् राजा को देय धन (कर) नहीं देते, वे राजनियम से दण्डनीय होते हैं ॥२५॥

म॒हो नो॑ रा॒य आ भ॑र॒ पव॑मान ज॒ही मृधः॑। रास्वे॑न्दो वी॒रव॒द्यशः॑॥

इस मन्त्र में राजधर्म का उपदेश है। जो पुरुष राजधर्मपालन करते हैं, वे वीर पुरुषों को उत्पन्न करके प्रजा को सर्वथा सुरक्षित करते हैं ॥२६॥

न त्वा॑ श॒तं च॒न ह्रुतो॒ राधो॒ दित्स॑न्त॒मा मि॑नन्। यत्पु॑ना॒नो म॑ख॒स्यसे॑॥

जो राजा प्रजा की रक्षा के निमित्त ‘कर’ लेता है, उसे कोई दूषित नहीं कर सकता है और उसकी रक्षा से सुरक्षित होकर प्रजा सर्वथैव निर्विघ्न रहती है, उससे दुष्ट दस्यु आदि कोई विघ्न उत्पन्न नहीं कर सकते ॥२७॥

पव॑स्वेन्दो॒ वृषा॑ सु॒तः कृ॒धी नो॑ य॒शसो॒ जने॑। विश्वा॒ अप॒ द्विषो॑ जहि॥

इस मन्त्र में परमात्मा से यशस्वी बनने की प्रार्थना की गई है ॥२८॥

अस्य॑ ते स॒ख्ये व॒यं तवे॑न्दो द्यु॒म्न उ॑त्त॒मे। सा॒स॒ह्याम॑ पृतन्य॒तः॥

इस मन्त्र में परमात्मा ने राजधर्म में साहाय्य का उपदेश किया है ॥२९॥

या ते॑ भी॒मान्यायु॑धा ति॒ग्मानि॒ सन्ति॒ धूर्व॑णे। रक्षा॑ समस्य नो नि॒दः॥

तीक्ष्ण शस्त्रोंवाले सेनापति प्रजाओं को सब प्रकार की विपत्तियों से बचाते हैं ॥३०॥यह ६१ वाँ सूक्त और २३ वाँ वर्ग समाप्त हुआ।

ए॒ते अ॑सृग्र॒मिन्द॑वस्ति॒रः प॒वित्र॑मा॒शवः॑। विश्वा॑न्य॒भि सौभ॑गा॥

हस मन्त्र में सेनापति के गुणों का वर्णन किया है ॥१॥

वि॒घ्नन्तो॑ दुरि॒ता पु॒रु सु॒गा तो॒काय॑ वा॒जिनः॑। तना॑ कृ॒ण्वन्तो॒ अर्व॑ते॥

जो सेनापति प्रजा की सन्तानों को व्यापक होने के लिये सब रास्तों को निष्कण्टक बनाता है, उक्तगुणोंवाला सेनापति राज का अङ्ग होकर राज्य की रक्षा करता है ॥२॥

कृ॒ण्वन्तो॒ वरि॑वो॒ गवे॒ऽभ्य॑र्षन्ति सुष्टु॒तिम्। इळा॑म॒स्मभ्यं॑ सं॒यत॑म्॥

जो सेनापति प्रजा के लिये ऐश्वर्य उत्पन्न करता है और प्रजा की प्रार्थनाओं पर ध्यान देता है, वह धर्म का पालन करता हुआ भली-भाँति प्रजाओं की रक्षा करता है ॥३॥

असा॑व्यं॒शुर्मदा॑या॒प्सु दक्षो॑ गिरि॒ष्ठाः। श्ये॒नो न योनि॒मास॑दत्॥

उक्त गुणसम्पन्न सेनापति ईश्वर की आज्ञा से उत्पन्न होता है। तात्पर्य यह है कि ईश्वर उपदेश करता है कि मनुष्यों! तुम उक्तगुणोंवाले पुरुष को सेनापति मानो और ऐसे सेनापतियों से राजधर्म का दृढ़ प्रबन्ध करके रक्षा का प्रचार करो ॥४॥

शु॒भ्रमन्धो॑ दे॒ववा॑तम॒प्सु धू॒तो नृभिः॑ सु॒तः। स्वद॑न्ति॒ गावः॒ पयो॑भिः॥

जिस देश में प्रजा की रक्षा करनेवाले सेनाधीश होते हैं, उस देश की प्रजा नाना प्रकार के अन्नों को दुग्ध से मिश्रित करके उपभोग करती है। तात्पर्य यह है कि राजधर्म से सुरक्षित ही ऐश्वर्य को भोग सकते हैं, अन्य नहीं, इसलिये परमात्मा ने इस मन्त्र में राजधर्म का उपदेश किया है ॥५॥

आदी॒मश्वं॒ न हेता॒रोऽशू॑शुभन्न॒मृता॑य। मध्वो॒ रसं॑ सध॒मादे॑॥

जो लोग कर्मकाण्डी बनकर यज्ञ करते हैं, वे लोग अपने शुभ कर्मों से प्रजा को विभूषित करते हैं ॥६॥

यास्ते॒ धारा॑ मधु॒श्चुतोऽसृ॑ग्रमिन्द ऊ॒तये॑। ताभिः॑ प॒वित्र॒मास॑दः॥

परमात्मा उपदेश करता है कि सेनाधीश अपनी सुरक्षारूप वृष्टि से प्रजाओं को आनन्द से सुसिञ्चित करे ॥७॥

सो अ॒र्षेन्द्रा॑य पी॒तये॑ ति॒रो रोमा॑ण्य॒व्यया॑। सीद॒न्योना॒ वने॒ष्वा॥

इस मन्त्र में यह प्रतिपादन किया गया है कि राजधर्म की रक्षा द्वारा देश में ज्ञान और विज्ञानी की वृद्धि होती है ॥८॥

त्वमि॑न्दो॒ परि॑ स्रव॒ स्वादि॑ष्ठो॒ अङ्गि॑रोभ्यः। व॒रि॒वो॒विद्घृ॒तं पयः॑॥

प्रजाओं को चाहिये कि वे सदैव अपने राजपुरुषों से ऐश्वर्य की प्रार्थना करके संसार में ऐश्वर्य बढ़ाने का यत्न करें ॥९॥

अ॒यं विच॑र्षणिर्हि॒तः पव॑मानः॒ स चे॑तति। हि॒न्वा॒न आप्यं॑ बृ॒हत्॥

जो सेनापति अपने कर्म में तत्पर रहता है अर्थात् राजधर्म का यथाविधि पालन करता है, वह प्रजा में सब प्रकार से सुख उत्पन्न करता है ॥१०॥

ए॒ष वृषा॒ वृष॑व्रतः॒ पव॑मानो अशस्ति॒हा। कर॒द्वसू॑नि दा॒शुषे॑॥

उक्तगुणसम्पन्न सेनापति सब प्रकार के ऐश्वर्य उत्पन्न करके प्रजा में सुख बढ़ाता है ॥११॥

आ प॑वस्व सह॒स्रिणं॑ र॒यिं गोम॑न्तम॒श्विन॑म्। पु॒रु॒श्च॒न्द्रं पु॑रु॒स्पृह॑म्॥

इस मन्त्र में परमात्मा ने सेनाधीश के गुणों का वर्णन किया है कि सेनाधीश सहस्र प्रकार के ऐश्वर्यों को प्रजाजनों के लिये उत्पन्न करे ॥१२॥

ए॒ष स्य परि॑ षिच्यते मर्मृ॒ज्यमा॑न आ॒युभिः॑। उ॒रु॒गा॒यः क॒विक्र॑तुः॥

परमात्मा उपदेश करता है कि जो उक्तगुणसम्पन्न पुरुष है, वही सेनापति के पद पर नियुक्त करना चाहिये ॥१३॥

स॒हस्रो॑तिः श॒ताम॑घो वि॒मानो॒ रज॑सः क॒विः। इन्द्रा॑य पवते॒ मदः॑॥

जो विद्वानों का रक्षक तथा सत्कार करनेवाला और विद्या के प्रचार में प्रेमी होता है, वही सेनापति प्रशंसित कहा जाता है ॥१४॥

गि॒रा जा॒त इ॒ह स्तु॒त इन्दु॒रिन्द्रा॑य धीयते। विर्योना॑ वस॒तावि॑व॥

जिस प्रकार शस्त्र अपने नियत स्थानों में स्थित होकर राजधर्म की रक्षा करते हैं, इसी प्रकार सेनापति अपने पद पर स्थिर होकर राजधर्म की रक्षा करता है ॥१५॥

पव॑मानः सु॒तो नृभिः॒ सोमो॒ वाज॑मिवासरत्। च॒मूषु॒ शक्म॑ना॒सद॑म्॥

सोम यहाँ सेनाधीश का नाम है, क्योंकि सेनाधीश को भी धीरता के लिये सौम्य स्वभाव की आवश्यकता है, इसलिये उसे सोमरूप से वर्णन किया है ॥१६॥

तं त्रि॑पृ॒ष्ठे त्रि॑वन्धु॒रे रथे॑ युञ्जन्ति॒ यात॑वे। ऋषी॑णां स॒प्त धी॒तिभिः॑॥

परमात्मा उपदेश करता है कि हे पुरुषों! तुम अपने सेनापतिओं के लिये ऐसे यान बनाओ, जो अनन्त प्रकार के आकर्षण-विकर्षणादि गुणों से युक्त हों और जल, स्थल तथा नभमण्डल में सर्वत्रैव अव्याहतगति होकर गमन कर सकें ॥१७॥

तं सो॑तारो धन॒स्पृत॑मा॒शुं वाजा॑य॒ यात॑वे। हरिं॑ हिनोत वा॒जिन॑म्॥

हे प्रजाजनों! तुम लोग जो उक्तगुणसम्पन्न पुरुष है, उसको अपने अभ्युदय के लिये सेनाधीशादि पदों पर नियुक्त करो ॥१८॥

आ॒वि॒शन्क॒लशं॑ सु॒तो विश्वा॒ अर्ष॑न्न॒भि श्रियः॑। शूरो॒ न गोषु॑ तिष्ठति॥

जो पुरुष जितेन्द्रिय और दृढ़व्रती होते हैं, वे ही राजधर्म के लिये उपयुक्त होते हैं, अन्य नहीं ॥१९॥

आ त॑ इन्दो॒ मदा॑य॒ कं पयो॑ दुहन्त्या॒यवः॑। दे॒वा दे॒वेभ्यो॒ मधु॑॥

हे परमात्मन्! आपके अनुयायी लोग कामधेनुरूप पृथिव्यादिलोक-लोकान्तरों से अनन्त प्रकार के अमृतों को दुहते हैं ॥२०॥

आ नः॒ सोमं॑ प॒वित्र॒ आ सृ॒जता॒ मधु॑मत्तमम्। दे॒वेभ्यो॑ देव॒श्रुत्त॑मम्॥

हे प्रजाजनों! तुम ऐसे सेनापति वरण करो, जो मधुर स्वभाववाला हो और सबकी प्रार्थनाओं पर ध्यान देनेवाला हो ॥२१॥

ए॒ते सोमा॑ असृक्षत गृणा॒नाः श्रव॑से म॒हे। म॒दिन्त॑मस्य॒ धार॑या॥

उक्त गुणोंवाले सेनापति संसार में यश और बल बढ़ाने के लिये उत्पन्न किये जाते हैं ॥२२॥

अ॒भि गव्या॑नि वी॒तये॑ नृ॒म्णा पु॑ना॒नो अ॑र्षसि। स॒नद्वा॑जः॒ परि॑ स्रव॥

जो सेनापति पृथिव्यादि रत्नों को निर्विघ्न करने के लिये अपनी जीवनयात्रा करते हैं, वे सेनाधीशादि पदों के लिये उपयुक्त होते हैं ॥२३॥

उ॒त नो॒ गोम॑ती॒रिषो॒ विश्वा॑ अर्ष परि॒ष्टुभः॑। गृ॒णा॒नो ज॒मद॑ग्निना॥

परमात्मा उपदेश करता है कि हे प्रजाननो! तुम लोग उक्तगुणसम्पन्न राजपुरुषों के सदैव अनुयायी बने रहो, ताकि वे तुम्हारे लिये पृथिव्यादिलोक-लोकान्तरों के ऐश्वर्यों से तुम्हें विभूषित करें ॥२४॥

पव॑स्व वा॒चो अ॑ग्रि॒यः सोम॑ चि॒त्राभि॑रू॒तिभिः॑। अ॒भि विश्वा॑नि॒ काव्या॑॥

इस मन्त्र में परमेश्वर से रक्षार्थ प्रार्थना की गई है ॥२५॥

त्वं स॑मु॒द्रिया॑ अ॒पो॑ऽग्रि॒यो वाच॑ ई॒रय॑न्। पव॑स्व विश्वमेजय॥

इस मन्त्र में परमात्मा की कृपा से ही सब पदार्थ निर्विघ्र रह सकते हैं, अन्यथा नहीं, इसी का वर्णन किया गया है ॥२६॥

तुभ्ये॒मा भुव॑ना कवे महि॒म्ने सो॑म तस्थिरे। तुभ्य॑मर्षन्ति॒ सिन्ध॑वः॥

इस मन्त्र में परमात्मा के महत्त्व का वर्णन किया गया है कि अनेक प्रकार के भुवनों की रचना और समुद्रों की रचना उस के महत्त्व का वर्णन करती है अर्थात् सम्पूर्ण प्रकृति के कार्य उसके एकदेश में हैं। परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण हो रहा है। अर्थात् परमात्मा अनन्त है और प्रकृति तथा प्रकृति के कार्य सान्त हैं ॥२७॥

प्र ते॑ दि॒वो न वृ॒ष्टयो॒ धारा॑ यन्त्यस॒श्चतः॑। अ॒भि शु॒क्रामु॑प॒स्तिर॑म्॥

जिस प्रकार सेनापति की सेनायें इतस्ततः विचरती हुई उसके महत्त्व को बतलाती हैं, उसी प्रकार अनन्त ब्रह्माण्ड परमात्मा के महत्त्व को सेनाओं की नाईं सुशोभित करते हैं ॥२८॥

इन्द्रा॒येन्दुं॑ पुनीतनो॒ग्रं दक्षा॑य॒ साध॑नम्। ई॒शा॒नं वी॒तिरा॑धसम्॥

इस मन्त्र में सेनापति की आज्ञापालन करना कथन किया गया है। जो लोग ऐश्वर्यशाली होना चाहें, वे अपने सेनाधीश की आज्ञा का पालन करें ॥२९॥

पव॑मान ऋ॒तः क॒विः सोमः॑ प॒वित्र॒मास॑दत्। दध॑त्स्तो॒त्रे सु॒वीर्य॑म्॥

इस मन्त्र में राजधर्म की रक्षार्थ परिश्रमी बनने के लिये ईश्वर से प्रार्थना की गई है ॥३०॥यह ६२ वाँ सूक्त और २९ वाँ वर्ग समाप्त हुआ।

आ प॑वस्व सह॒स्रिणं॑ र॒यिं सो॑म सु॒वीर्य॑म्। अ॒स्मे श्रवां॑सि धारय॥

राजधर्म की पूर्ति के लिये इस मन्त्र में अनेक प्रकार के बलों की परमात्मा से याचना की गई है ॥१॥

इष॒मूर्जं॑ च पिन्वस॒ इन्द्रा॑य मत्स॒रिन्त॑मः। च॒मूष्वा नि षी॑दसि॥

राजधर्म के लिये अनन्त प्रकार के ऐश्वर्य की आवश्यकता होती है, इसलिये परमात्मा से इस मन्त्र में अनन्त सामर्थ्य की प्रार्थना की गई है ॥२॥

सु॒त इन्द्रा॑य॒ विष्ण॑वे॒ सोमः॑ क॒लशे॑ अक्षरत्। मधु॑माँ अस्तु वा॒यवे॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा ने सर्वोपरि शील की शिक्षा दी है कि हे पुरुषों! तुम अपने अन्तःकरण को शुद्ध बनाओ, ताकि तुमारा अन्तःकरण धृत्यादि धर्म के लक्षणों को धारण करके राजधर्म के धारण के योग्य बने ॥३॥

ए॒ते अ॑सृग्रमा॒शवोऽति॒ ह्वरां॑सि ब॒भ्रवः॑। सोमा॑ ऋ॒तस्य॒ धार॑या॥

परमात्मा उपदेश करता है कि राजधर्मानुयायी पुरुषों! तुम लोग उग्र स्वभाव को बनाओ, ताकि दुष्ट दस्यु और राक्षस तुम्हारे रौद्र स्वभाव से भयभीत होकर कोई अनाचार न फैला सकें ॥४॥

इन्द्रं॒ वर्ध॑न्तो अ॒प्तुरः॑ कृ॒ण्वन्तो॒ विश्व॒मार्य॑म्। अ॒प॒घ्नन्तो॒ अरा॑व्णः॥

परमात्मा से प्रार्थना है कि परमात्मा श्रेष्ठ स्वभाव का प्रदान करे, ताकि आर्यता को धारण करके पुरुष राजधर्म का शासन करे ॥५॥

सु॒ता अनु॒ स्वमा रजो॒ऽभ्य॑र्षन्ति ब॒भ्रवः॑। इन्द्रं॒ गच्छ॑न्त॒ इन्द॑वः॥

जो लोग अपनी चित्तवृत्तियों को निर्मल करते हैं, वे एक प्रकार से व्यवसायात्मक बुद्धि को बनाते हैं। अथवा यों कहो कि “तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्” यो. १। ३। इस योगसूत्र में वर्णित किये हुए आत्मस्वरूप में स्थिति पाकर शुद्ध होते हैं। चित्तवृत्ति, संकल्प ये पर्याय शब्द हैं। परमात्मा ने इस मन्त्र में इस बात का उपदेश किया है कि हे मनुष्यों! आप शुद्ध संकल्प होकर मेरी और आयें ॥६॥

अ॒या प॑वस्व॒ धार॑या॒ यया॒ सूर्य॒मरो॑चयः। हि॒न्वा॒नो मानु॑षीर॒पः॥

इस मन्त्र में परमात्मा से यथायोग्य न्याय की प्रार्थना है। यद्यपि परमात्मा स्वभावसिद्ध न्यायकारी है, तथापि परमात्मा ने इस मन्त्र में “हिन्वानः मानुषीरपः” इस वाक्य से यथायोग्य कर्मों का फलप्रदाता कथन करके यह सिद्ध किया कि तुम परमात्मा के न्याय तथा नियम के अनुकूल काम करो ॥७॥

अयु॑क्त॒ सूर॒ एत॑शं॒ पव॑मानो म॒नावधि॑। अ॒न्तरि॑क्षेण॒ यात॑वे॥

परमात्मा ने अपने सामर्थ्य से अनन्त शक्ति उत्पन्न की हैं ॥८॥

उ॒त त्या ह॒रितो॒ दश॒ सूरो॑ अयुक्त॒ यात॑वे। इन्दु॒रिन्द्र॒ इति॑ ब्रु॒वन्॥

जो पुरुष अपनी इन्द्रियवृत्तियों को सब ओर से हटाकर एक परमात्मा में लगाते हैं, वे परमानन्द को प्राप्त होते हैं। इस मन्त्र में परमात्मा ने इन्द्रियवृत्तियों को रोककर ईश्वर में लगाने का उपदेश किया है। इसका नाम ईश्वरयोग है। “पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूस्तस्मात् पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्” परमात्मा ने इन्द्रियों को बहिर्मुखी बनाया है, इसलिये वे बाहर की ओर जाती हैं। इनके रोकने का उपाय उक्त मन्त्र में बतलाया है ॥९॥

परी॒तो वा॒यवे॑ सु॒तं गिर॒ इन्द्रा॑य मत्स॒रम्। अव्यो॒ वारे॑षु सिञ्चत॥

परमात्मा उपदेश करता है कि जो वेदवेत्ता लोग ज्ञानयोग तथा कर्मयोग का उपदेश करते हैं, वे मानों अमृत की वृष्टि से अकर्मण्यतारूप मृत्यु से मृत लोगों का पुनरुज्जीवन करते हैं ॥१०॥

पव॑मान वि॒दा र॒यिम॒स्मभ्यं॑ सोम दु॒ष्टर॑म्। यो दू॒णाशो॑ वनुष्य॒ता॥

इस मन्त्र में परमात्मा ने उस अलभ्य लाभ का उपदेश किया है, जो ज्ञान-विज्ञानरूपी धन है। ज्ञान-विज्ञानरूप धन को कोई पुरुष बलात्कार से छीन वा चुरा नहीं सकता, इसीलिये कहा है कि हे वेदानुयायियों! आप उक्त धन का संचय करें ॥११॥

अ॒भ्य॑र्ष सह॒स्रिणं॑ र॒यिं गोम॑न्तम॒श्विन॑म्। अ॒भि वाज॑मु॒त श्रवः॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा ने अनन्त प्रकार के धनों की उपलब्धि का उपदेश किया है ॥१२॥

सोमो॑ दे॒वो न सूर्योऽद्रि॑भिः पवते सु॒तः। दधा॑नः क॒लशे॒ रस॑म्॥

परमात्मदेव ही प्रत्येक पदार्थ रस को उत्पन्न करता है और वही अपनी शक्तियों से सबको पवित्र करता है ॥१३॥

ए॒ते धामा॒न्यार्या॑ शु॒क्रा ऋ॒तस्य॒ धार॑या। वाजं॒ गोम॑न्तमक्षरन्॥

परमात्मा उपदेश करता है कि श्रेष्ठ पुरुषों की स्थिति का हेतु एकमात्र शुभस्वभाव वा शील ही समझना चाहिये। अर्थात् शुभशील से उनकी दृढ़ता और उनका आर्यत्व बना रहता है, इसलिये शील को सम्पादन करना आर्यों का परम कर्तव्य है ॥१४॥

सु॒ता इन्द्रा॑य व॒ज्रिणे॒ सोमा॑सो॒ दध्या॑शिरः। प॒वित्र॒मत्य॑क्षरन्॥

परमात्मा कर्मयोगी पुरुष के लिये आनन्द की वृष्टि करता है। इसका तात्पर्य यह है कि उद्योगी पुरुषों के लिये परमात्मा सदैव आनन्द का प्रदान करता है। यद्यपि परमात्मा का आनन्द सबके सन्निहित है, तथापि उसके आनन्द को उद्योगी कर्मयोगी ही लाभ कर सकते हैं। इस अपूर्वता का इस मन्त्र में उपदेश किया गया है ॥१५॥

प्र सो॑म॒ मधु॑मत्तमो रा॒ये अ॑र्ष प॒वित्र॒ आ। मदो॒ यो दे॑व॒वीत॑मः॥

जो पुरुष परमात्मा के आनन्द का अनुसन्धान करते हैं अर्थात् परमात्मा को ध्येय बनाकर उसके आह्लाद से आह्लादित होते हैं, वे सब प्रकार से अभ्युदय के पात्र होते हैं ॥१६॥

तमी॑ मृजन्त्या॒यवो॒ हरिं॑ न॒दीषु॑ वा॒जिन॑म्। इन्दु॒मिन्द्रा॑य मत्स॒रम्॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि जो लोग आवरण को दूर करके परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं, वे सब प्रकार के अभ्युदयों को प्राप्त होते हैं ॥१७॥

आ प॑वस्व॒ हिर॑ण्यव॒दश्वा॑वत्सोम वी॒रव॑त्। वाजं॒ गोम॑न्त॒मा भ॑र॥

जो लोग परमात्मपरायण होते हैं, उनको परमात्मा विज्ञानादि अनन्त प्रकार के ऐश्वर्य से परिपूर्ण करता है ॥१८॥

परि॒ वाजे॒ न वा॑ज॒युमव्यो॒ वारे॑षु सिञ्चत। इन्द्रा॑य॒ मधु॑मत्तमम्॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि जो लोग कर्मयोगी और उद्योगी बनकर अपने लक्ष्य की पूर्ति में कटिबद्ध रहते हैं, परमात्मा वीरों के समान उनकी रक्षा करता है ॥१९॥

क॒विं मृ॑जन्ति॒ मर्ज्यं॑ धी॒भिर्विप्रा॑ अव॒स्यवः॑। वृषा॒ कनि॑क्रदर्षति॥

इस मन्त्र में परमात्मा ने इस बात का उपदेश किया है कि जो लोग संस्कृत बुद्धि द्वारा उसका ध्यान करते हैं, उनको परमात्मा का साक्षात्कार होता है। इसीलिये उपनिषद में कहा है कि “दृश्यते त्वग्र्या बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिमिः” कि सूक्ष्मदर्शी लोग सूक्ष्मबुद्धि द्वारा उसके साक्षात्कार को प्राप्त होते हैं ॥२०॥

वृष॑णं धी॒भिर॒प्तुरं॒ सोम॑मृ॒तस्य॒ धार॑या। म॒ती विप्राः॒ सम॑स्वरन्॥

इस मन्त्र से परमात्मा के साक्षात्कार करने का उपदेश किया है ॥२१॥

पव॑स्व देवायु॒षगिन्द्रं॑ गच्छतु ते॒ मदः॑। वा॒युमा रो॑ह॒ धर्म॑णा॥

जो पुरुष ज्ञानयोगी वा कर्मयोगी बनकर परमात्मा के उपासक बनते हैं, परमात्मा उन्हें तद्धर्मतापत्ति योग द्वारा पवित्र करता है अर्थात् अपने शिष्यादिभावों को प्रदान करके उनको शुद्ध करता है ॥२२॥

पव॑मान॒ नि तो॑शसे र॒यिं सो॑म श्र॒वाय्य॑म्। प्रि॒यः स॑मु॒द्रमा वि॑श॥

इस मन्त्र में परमात्मा के रौद्रभाव का वर्णन किया है। जैसा कि “भयं वज्रमुद्यतम्” इस उपनिषद्वाक्य में परमात्मा के वज्र को भयरूप से वर्णन किया गया है। इसी प्रकार यहाँ परमात्मा का स्वरूप दुष्टों के प्रति भयप्रद वर्णन किया है ॥२३॥

अ॒प॒घ्नन्प॑वसे॒ मृधः॑ क्रतु॒वित्सो॑म मत्स॒रः। नु॒दस्वादे॑वयुं॒ जन॑म्॥

इस मन्त्र में भी परमात्मा के रौद्ररूप का वर्णन किया गया है ॥२४॥

पव॑माना असृक्षत॒ सोमाः॑ शु॒क्रास॒ इन्द॑वः। अ॒भि विश्वा॑नि॒ काव्या॑॥

इस मन्त्र में इस बात का कथन है कि परमात्मा सब ज्ञानों का स्त्रोत तथा वेद का प्रकाशक है। जैसा कि “तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे” इत्यादि मन्त्रों में अन्यत्र भी वर्णन किया है कि परमात्मा से ऋगादि वेद उत्पन्न हुए ॥२५॥

पव॑मानास आ॒शवः॑ शु॒भ्रा अ॑सृग्र॒मिन्द॑वः। घ्नन्तो॒ विश्वा॒ अप॒ द्विषः॑॥

परमात्मा उपदेश करता है कि जो शूरवीर अन्यायकारी दुष्टों को दमन करते हैं, वे देश के लिये अनन्त प्रकार के ऐश्वर्य को उत्पन्न करते हैं ॥२६॥

पव॑माना दि॒वस्पर्य॒न्तरि॑क्षादसृक्षत। पृ॒थि॒व्या अधि॒ सान॑वि॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि पुरुषो! तुम अपने शूरवीरतादि धर्मों से इस संसार के उच्च शिखर पर विराजमान होकर सबकी रक्षा करो ॥२७॥

पु॒ना॒नः सो॑म॒ धार॒येन्दो॒ विश्वा॒ अप॒ स्रिधः॑। ज॒हि रक्षां॑सि सुक्रतो॥

धीरवीरतादि गुणसम्पन्न शूरवीर दुराचारी राक्षसों का नाश करके देश में सदाचार का प्रचार करता है ॥२८॥

अ॒प॒घ्नन्त्सो॑म र॒क्षसो॒ऽभ्य॑र्ष॒ कनि॑क्रदत्। द्यु॒मन्तं॒ शुष्म॑मुत्त॒मम्॥

जिस देश में सौम्यस्वभावयुक्त शूरवीर उत्पन्न होते हैं, उस देश में सर्वोपरि बल और ऐश्वर्य उत्पन्न होता है। तात्पर्य यह है कि ऐश्वर्य उत्पन्न करने के लिये धीरवीरतादि गुणों का धारण करना अत्यावश्यक है ॥२९॥

अ॒स्मे वसू॑नि धारय॒ सोम॑ दि॒व्यानि॒ पार्थि॑वा। इन्दो॒ विश्वा॑नि॒ वार्या॑॥

परमात्मा ने इस मन्त्र में इस बात का उपदेश किया है कि जो लोग सौम्य स्वभावयुक्त शूरवीरों के अनुयायी होकर देश का परिपालन करते हैं, वे नाना प्रकार के रत्नों को धारण करके ऐश्वर्यशाली होते हैं ॥३०॥यह ६३ वाँ सूक्त और ३५ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

वृषा॑ सोम द्यु॒माँ अ॑सि॒ वृषा॑ देव॒ वृष॑व्रतः। वृषा॒ धर्मा॑णि दधिषे॥

हे परमात्मन्! आप नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-स्वभाव हैं और आपकी मर्यादा में ही सब लोक-लोकान्तर स्थिर हैं। आप अपनी धर्ममर्यादा में हमको भी स्थिर कीजिये ॥१॥

वृष्ण॑स्ते॒ वृष्ण्यं॒ शवो॒ वृषा॒ वनं॒ वृषा॒ मदः॑। स॒त्यं वृ॑ष॒न्वृषेद॑सि॥

इस मन्त्र में एकमात्र परमात्मा को उपास्यरूप से वर्णन किया गया है। तात्पर्य यह है कि ईश्वर से भिन्न सत्यादि गुणों का धाम अन्य कोई पदार्थ नहीं है ॥२॥

अश्वो॒ न च॑क्रदो॒ वृषा॒ सं गा इ॑न्दो॒ समर्व॑तः। वि नो॑ रा॒ये दुरो॑ वृधि॥

परमात्मा जिन पर कृपा करता है, उन पुरुषों की ज्ञानेन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रिय की शक्तियों को बढ़ाता है। तात्पर्य यह है कि उद्योगी पुरुष वा यों कहो कि सत्कर्मी पुरुषों की शक्तियों को परमात्मा बढ़ाता है। आलसी और दुराचारियों की नहीं ॥३॥

असृ॑क्षत॒ प्र वा॒जिनो॑ ग॒व्या सोमा॑सो अश्व॒या। शु॒क्रासो॑ वीर॒याशवः॑॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यों! तुम लोग उक्त गुणसम्पन्न परमात्मा को अपना उपास्य बनाओ ॥४॥

शु॒म्भमा॑ना ऋता॒युभि॑र्मृ॒ज्यमा॑ना॒ गभ॑स्त्योः। पव॑न्ते॒ वारे॑ अ॒व्यये॑॥

जो लोग सत्य के अभिलाषी हैं, उनको परमात्मा सदैव पवित्र करता है। क्योंकि परमात्मा भक्तों पर और सत्याभिलाषियों पर अपनी कृपा करके उनका उद्धार करता है ॥५॥

ते विश्वा॑ दा॒शुषे॒ वसु॒ सोमा॑ दि॒व्यानि॒ पार्थि॑वा। पव॑न्ता॒मान्तरि॑क्ष्या॥

जो लोग परमात्मा की आज्ञा का पालन करते हैं, परमात्मा उनको सब प्रकार के ऐश्वर्य प्रदान करता है ॥६॥

पव॑मानस्य विश्ववि॒त्प्र ते॒ सर्गा॑ असृक्षत। सूर्य॑स्येव॒ न र॒श्मयः॑॥

परमात्मा के कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड सूर्य की रश्मियों के समान देदीप्यमान हो रहे हैं। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार सूर्य अपनी ज्योति से अनन्त ब्रह्माण्डों को प्रकाशित करता है, उस प्रकार अन्य भी तेजोमय ब्रह्माण्ड लोक-लोकान्तरों को प्रकाश करनेवाले परमात्मा की रचना में अनन्त हैं। इसी अभिप्राय से वेद में अन्यत्र भी कहा है कि “को अद्धा वेद क इह प्रवोचत्” इत्यादि मन्त्रों में यह वर्णन किया है कि परमात्मा की रचनाओं के अन्त को कौन जान सकता है और कौन इसको पूर्णरूप से कथन कर सकता है ॥७॥

के॒तुं कृ॒ण्वन्दि॒वस्परि॒ विश्वा॑ रू॒पाभ्य॑र्षसि। स॒मु॒द्रः सो॑म पिन्वसे॥

परमात्मा ने अपनी रचना में सूर्य तथा चन्द्रमा को प्रकाश के केतु बनाकर संसार की शोभा को बढ़ाया है और आनन्द का सागर होने से परमात्मा का नाम समुद्र है ॥८॥

हि॒न्वा॒नो वाच॑मिष्यसि॒ पव॑मान॒ विध॑र्मणि। अक्रा॑न्दे॒वो न सूर्यः॑॥

इस मन्त्र में सूर्य का दृष्टान्त देकर परमात्मा का स्वतः प्रकाश वर्णन किया है॥यद्यपि वास्तव में सूर्य स्वतःप्रकाश नहीं है, तथापि लोक की प्रसिद्धि से सूर्य को स्वतःप्रकाश मानकर यहाँ सूर्य का दृष्टान्त दिया गया है। वास्तव में परमात्मा निरपेक्ष स्वतःप्रकाश है ॥९॥

इन्दुः॑ पविष्ट॒ चेत॑नः प्रि॒यः क॑वी॒नां म॒ती। सृ॒जदश्वं॑ र॒थीरि॑व॥

इस मन्त्र में परमात्मा को चेतनस्वरूप वर्णन करने के लिये चेतन शब्द स्पष्ट आया है। जो लोग यह कहा करते हैं कि वेद में परमात्मा को ज्ञानस्वरूप कहनेवाले शब्द नहीं आते, उनको इस मन्त्र से शिक्षा लेनी चाहिये ॥१०॥

ऊ॒र्मिर्यस्ते॑ प॒वित्र॒ आ दे॑वा॒वीः प॒र्यक्ष॑रत्। सीद॑न्नृ॒तस्य॒ योनि॒मा॥

परमात्मा शुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुषों के हृदयों को अपनी सुधामयी वृष्टि से सिञ्चित कर देता है ॥११॥

स नो॑ अर्ष प॒वित्र॒ आ मदो॒ यो दे॑व॒वीत॑मः। इन्द॒विन्द्रा॑य पी॒तये॑॥

परमात्मा का वह आनन्द, जो देवताओं के लिये तृप्तिकारक है अर्थात् जिसके अधिकारी दिव्य गुणवाले सदाचारी पुरुष है, वह आनन्द केवल कर्मयोगी और ज्ञानयोगियों को ही उपलब्ध हो सकता है, अन्यों को नहीं। इसलिये सबको चाहिये कि कर्मयोगी और ज्ञानयोगी बनकर उस आनन्द की प्राप्ति का यत्न करें ॥१२॥

इ॒षे प॑वस्व॒ धार॑या मृ॒ज्यमा॑नो मनी॒षिभिः॑। इन्दो॑ रु॒चाभि गा इ॑हि॥

जो लोग शुद्ध अन्तःकरण से परमात्मा की उपासना करते हैं, परमात्मा उनकी शक्तियों को बढ़ाता है और उनकी इन्द्रियों को विमल करके ऐश्वर्यप्राप्ति के योग्य बनाता है ॥१३॥

पु॒ना॒नो वरि॑वस्कृ॒ध्यूर्जं॒ जना॑य गिर्वणः। हरे॑ सृजा॒न आ॒शिर॑म्॥

परमात्मा दुष्टों की शक्तियों को हर लेता है और श्रेष्ठों को अभ्युदय दे करके बढ़ाता है॥

पु॒ना॒नो दे॒ववी॑तय॒ इन्द्र॑स्य याहि निष्कृ॒तम्। द्यु॒ता॒नो वा॒जिभि॑र्य॒तः॥

कर्मयोगी यहाँ उपलक्षणमात्र है। तात्पर्य यह है कि कर्मयोगी तथा ज्ञानयोगी अथवा अन्य कोई उपासक हो, इन सबको एकमात्र ईश्वर की ही उपासना करनी चाहिये, किसी अन्य की नहीं ॥१५॥

प्र हि॑न्वा॒नास॒ इन्द॒वोऽच्छा॑ समु॒द्रमा॒शवः॑। धि॒या जू॒ता अ॑सृक्षत॥

सर्वप्रकाशक और सबका प्रेरक परमात्मा संयमी पुरुषों के ध्यान का विषय होता है, अन्यों के नहीं ॥१६॥

म॒र्मृ॒जा॒नास॑ आ॒यवो॒ वृथा॑ समु॒द्रमिन्द॑वः। अग्म॑न्नृ॒तस्य॒ योनि॒मा॥

उक्त सर्वशक्तिसम्पन्न परमात्मा विना परिश्रम के ही अन्तरिक्षादि लोकों में गमन कर सकता है, अन्य नहीं ॥१७॥

परि॑ णो याह्यस्म॒युर्विश्वा॒ वसू॒न्योज॑सा। पा॒हि नः॒ शर्म॑ वी॒रव॑त्॥

जो लोग सदाचारी हैं और सदाचारी से अपने शील को बनाते हैं, परमात्मा उनकी सदैव रक्षा करता है ॥१८॥

मिमा॑ति॒ वह्नि॒रेत॑शः प॒दं यु॑जा॒न ऋक्व॑भिः। प्र यत्स॑मु॒द्र आहि॑तः॥

जब यज्ञ करते हैं, तब उनके नम्रीभूत अन्तःकरणों में परमात्मा निवास करता है। यज्ञ शब्द के अर्थ यहाँ उपासनात्मक यज्ञ के हैं। यों तो जपयज्ञ, योगयज्ञ, कर्मयज्ञ इत्यादि अनेक प्रकार के यज्ञों में यज्ञ शब्द आता है, जिनके करनेवाले ऋत्विक् कहलाते हैं, परन्तु यहाँ ऋत्विक् शब्द का अर्थ उपासक है। जो ऋतु में अर्थात् प्रकृति के प्रत्येक भाव में उपासना करते हैं, उनको यहाँ ऋत्विक् कहा गया है ॥१९॥

आ यद्योनिं॑ हिर॒ण्यय॑मा॒शुॠ॒तस्य॒ सीद॑ति। जहा॒त्यप्र॑चेतसः॥

तात्पर्य यह है कि ज्ञान से प्रकाशित अन्तःकरणों को परमात्मा अपनी शक्ति से विभूषित करता है, अज्ञानावृत अन्तःकरणों को नहीं, इसीलिये यहाँ “अप्रेचतसः जहाति” यह लिखा है। वास्तव में परमात्मा न किसी स्थान को छोड़ता है, न पकड़ता है ॥२०॥

अ॒भि वे॒ना अ॑नूष॒तेय॑क्षन्ति॒ प्रचे॑तसः। मज्ज॒न्त्यवि॑चेतसः॥

जो लोग शुद्ध मनवाले हैं, वे परमात्मा के तत्त्वज्ञान से मुक्ति के भागी होते हैं और अज्ञानी लोग बार-बार जन्म लेते हैं और मरते हैं, परन्तु फिर भी परमात्मा के तत्त्व को नहीं पाते। इसीलिये उनका यहाँ डूबना दिखलाया है ॥२१॥

इन्द्रा॑येन्दो म॒रुत्व॑ते॒ पव॑स्व॒ मधु॑मत्तमः। ऋ॒तस्य॒ योनि॑मा॒सद॑म्॥

परमात्मा कर्मयोगी और ज्ञानयोगी के हृदयमण्डप को विभूषित करता है और उनके सत्यव्रतात्मक यज्ञ को सदैव सुशोभित करता है ॥२२॥

तं त्वा॒ विप्रा॑ वचो॒विदः॒ परि॑ ष्कृण्वन्ति वे॒धसः॑। सं त्वा॑ मृजन्त्या॒यवः॑॥

जो लोग कर्मयोगी हैं तथा योगसाधनरूपी कर्मों द्वारा परमात्मा को अपने ध्यान का विषय बनाते हैं, वे परमात्मा के साक्षात्कार को प्राप्त होते हैं, अन्य नहीं ॥२३॥

रसं॑ ते मि॒त्रो अ॑र्य॒मा पिब॑न्ति॒ वरु॑णः कवे। पव॑मानस्य म॒रुतः॑॥

जो पुरुष कर्मयोगी तथा ज्ञानयोगी है, वही उस परमात्मा के आनन्द को पान कर सकता है, अन्य नहीं। तात्पर्य यह है कि परमात्मा के समान परमात्मा का आनन्द भी सर्वत्र परिपूर्ण है, परन्तु विना उक्त उपदेश से वा यों कहो कि सर्वोपरि साधन के विना उसके आनन्द का कोई भी उपभोग नहीं कर सकता, इसीलिये यहाँ उक्त प्रकार के योगियों का कथन किया है कि उक्त योगी ही उसके आनन्द को भोगते हैं ॥२४॥

त्वं सो॑म विप॒श्चितं॑ पुना॒नो वाच॑मिष्यसि। इन्दो॑ स॒हस्र॑भर्णसम्॥

वेदवाणी के समान कोई अन्य भूषण ज्ञान का ज्ञापक नहीं है। वह सहस्त्रों प्रकार के भूषणों की शोभा को धारण किये हुई है। जो पुरुष इस विद्याभूषण को धारण करता है, वह सर्वोपरि दर्शनीय बनता है ॥२५॥

उ॒तो स॒हस्र॑भर्णसं॒ वाचं॑ सोम मख॒स्युव॑म्। पु॒ना॒न इ॑न्द॒वा भ॑र॥

परमात्मा से प्रार्थना है कि उक्त प्रकार का विद्याभूषण हमको प्रदान करें ॥२६॥

पु॒ना॒न इ॑न्दवेषां॒ पुरु॑हूत॒ जना॑नाम्। प्रि॒यः स॑मु॒द्रमा वि॑श॥

जो लोग विद्या और विनय से सम्पन्न हैं, उनके अन्तःकरण को परमात्मा अवश्यमेव पवित्र करता है ॥२७॥

दवि॑द्युतत्या रु॒चा प॑रि॒ष्टोभ॑न्त्या कृ॒पा। सोमाः॑ शु॒क्रा गवा॑शिरः॥

परमात्मा जिन लोगों पर अपनी कृपादृष्टि करता है, उनका कल्याण अवश्यमेव होता है ॥२८॥

हि॒न्वा॒नो हे॒तृभि॑र्य॒त आ वाजं॑ वा॒ज्य॑क्रमीत्। सीद॑न्तो व॒नुषो॑ यथा॥

परमात्मा ने इस मन्त्र में बल का उपदेश किया है कि जिस प्रकार योद्धा सेनापति अपने बल के गर्व से अन्य सेनाधीशों को जीतकर स्वाधीन कर लेता है, इसी प्रकार सर्वोपरि बलस्वरूप परमात्मा सम्पूर्ण लोक-लोकान्तरों को अपने वशीभूत किए हुए है ॥२९॥

ऋ॒धक्सो॑म स्व॒स्तये॑ संजग्मा॒नो दि॒वः क॒विः। पव॑स्व॒ सूर्यो॑ दृ॒शे॥

इस मन्त्र में परमात्मा ने ज्ञान का उपदेश किया है कि हे उपासक जनों! आप अपने ज्ञान की वृद्धि के लिये सर्वोपरि शक्ति से अपने मङ्गल की उपासना सदैव करते रहें ॥३०॥यह ६४ वाँ सूक्त और ४१ वाँ वर्ग समाप्त हुआ। ऋग्वेद के ९वें मण्डल में ७वें अष्टक का पहला अध्याय समाप्त हुआ ॥

हि॒न्वन्ति॒ सूर॒मुस्र॑यः॒ स्वसा॑रो जा॒मय॒स्पति॑म्। म॒हामिन्दुं॑ मही॒युवः॑॥

परमात्मा उपदेश करता है कि हे जीवो! तुम जगज्जन्मादिहेतुभूत महाशक्ति को विषय करनेवाली संस्कृत बुद्धियों को उत्पन्न करो, ताकि इन्द्रियागोचर उस सूक्ष्मशक्ति का तुम ध्यान द्वारा साक्षात्कार कर सको ॥१॥

पव॑मान रु॒चारु॑चा दे॒वो दे॒वेभ्य॒स्परि॑। विश्वा॒ वसू॒न्या वि॑श॥

परमात्मा को सर्वोपरि देव इसलिये कथन किया गया है कि उन दिव्यशक्ति के आगे सब शक्तियें तुच्छ हैं, इसीलिये अन्यत्र भी वेद में कहा गया है कि “एषो देवः प्रदिशोऽनुसर्वः”। यह सर्वोपरि देव सर्वत्र परिपूर्ण है। यहाँ उसी स्वजातीय विजातीय स्वगतभेदशून्य देव से यह प्रार्थना की गई है कि हे प्रभो! आप आकर हमारे हृदयों को शुद्ध करें ॥२॥

आ प॑वमान सुष्टु॒तिं वृ॒ष्टिं दे॒वेभ्यो॒ दुवः॑। इ॒षे प॑वस्व सं॒यत॑म्॥

परमात्मा संयमी जनों को ऐश्वर्य प्रदान करता है और जो लोग दिव्यगुणसम्पन्न हैं, उनको ही सुधामयी वृष्टि से परमात्मा सिञ्चित करता है॥तात्पर्य यह है कि परमात्मा की कृपाओं के पाने के लिये प्रथम मनुष्य को स्वयं पात्र बनना चाहिये। अर्थात् मनुष्य अधिकारी बनके उसके ऐश्वर्यों का पात्र बने ॥३

वृषा॒ ह्यसि॑ भा॒नुना॑ द्यु॒मन्तं॑ त्वा हवामहे। पव॑मान स्वा॒ध्यः॑॥

जो पुरुष परमात्मपरायण होते हैं, उन्हीं के परिश्रम सफल होते हैं। इस अभिप्राय से यह वर्णन किया है कि परमात्मा उद्योगी पुरुषों के उद्योगों को सफल करें ॥४॥

आ प॑वस्व सु॒वीर्यं॒ मन्द॑मानः स्वायुध। इ॒हो ष्वि॑न्द॒वा ग॑हि॥

इस मन्त्र में परमात्मा के आह्वान करने का तात्पर्य स्वकर्माभिमुख करने का है अर्थात् आप हमारे कर्मों के अनुकूल फलप्रदान करें। परमात्मा सर्वव्यापक है, इसलिये एक स्थान से उठकर किसी दूसरे स्थान में जाना उसका नहीं हो सकता। इस प्रकार बुलाने का तात्पर्य सर्वत्र हृदयदेश में अवगत करने का समझना चाहिये, कुछ अन्य नहीं ॥५॥

यद॒द्भिः प॑रिषि॒च्यसे॑ मृ॒ज्यमा॑नो॒ गभ॑स्त्योः। द्रुणा॑ स॒धस्थ॑मश्नुषे॥

जो पुरुष सत्कर्म करता है, उसकी आत्मा को परमात्मा स्वशक्तियों से विभूषित करता है ॥६॥

प्र सोमा॑य व्यश्व॒वत्पव॑मानाय गायत। म॒हे स॒हस्र॑चक्षसे॥

परमात्मा उपदेश करता है कि हे मनुष्यों! तुम उस पूर्ण पुरुष की उपासना करो, जो सर्वशक्तिसम्पन्न और सब संसार का हर्त्ता ,धर्त्ता तथा कर्त्ता है। इसी अभिप्राय से वेद में अन्यत्र भी कहा है कि सूर्य चन्द्रमा आदि सब पदार्थों का कर्त्ता एकमात्र परमात्मा है ॥७॥

यस्य॒ वर्णं॑ मधु॒श्चुतं॒ हरिं॑ हि॒न्वन्त्यद्रि॑भिः। इन्दु॒मिन्द्रा॑य पी॒तये॑॥

जो लोग अपनी चित्तवृत्तियों को निरोध करके परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं, वे ही कर्मयोगी कहला सकते हैं, अन्य नहीं ॥८॥

तस्य॑ ते वा॒जिनो॑ व॒यं विश्वा॒ धना॑नि जि॒ग्युषः॑। स॒खि॒त्वमा वृ॑णीमहे॥

इस मन्त्र में परमात्मा के साथ मैत्रीभाव का उपदेश है। तात्पर्य यह है कि जो सर्वशक्तिसम्पन्न परमात्मा से मित्रता का भाव रखते हैं, वे लोग परमात्मा के प्रिय गुणों को अपने में अवश्यमेव धारण करते हैं॥९॥

वृषा॑ पवस्व॒ धार॑या म॒रुत्व॑ते च मत्स॒रः। विश्वा॒ दधा॑न॒ ओज॑सा॥

परमात्मा आनन्दस्वरूप है, उसमें दुःख का लेश भी नहीं। उसके आनन्द को ज्ञानी तथा विज्ञानी कर्मयोगी और ज्ञानयोगी ही पा सकते हैं, अन्य नहीं॥१०॥

तं त्वा॑ ध॒र्तार॑मो॒ण्योः॒३॒॑ पव॑मान स्व॒र्दृश॑म्। हि॒न्वे वाजे॑षु वा॒जिन॑म्॥

जो लोग योगयज्ञ, ध्यानयज्ञ, विज्ञानयज्ञ, संग्रामयज्ञ और ज्ञानयज्ञ इत्यादि सब यज्ञों में एकमात्र परमात्मा का आश्रयण करते हैं, वे लोग अवश्यमेव कृतकार्य होते हैं। तात्पर्य यह है कि परमात्मा की सहायता बिना किसी भी यज्ञ की पूर्ति नहीं होती, इसलिये मनुष्यों को चाहिये कि वे सदैव परमात्मा की सहायता लेकर अपने उद्देश्य की पूर्ति करें॥११॥

अ॒या चि॒त्तो वि॒पानया॒ हरिः॑ पवस्व॒ धार॑या। युजं॒ वाजे॑षु चोदय॥

जो लोग सत्कर्मी बनने के लिये परमात्मा से प्रार्थना करते हैं, परमात्मा उन्हें अवश्यमेव शुभकर्मों में लगाता है॥१२॥

आ न॑ इन्दो म॒हीमिषं॒ पव॑स्व वि॒श्वद॑र्शतः। अ॒स्मभ्यं॑ सोम गातु॒वित्॥

परमात्मा उपदेश करता है कि हे मनुष्यों! तुमको अपनी पवित्रता की प्रार्थना केवल उसी देव से करनी चाहिये, जो सर्व ब्रह्माण्डों का ज्ञाता और सर्वोत्पादक है॥१३॥

आ क॒लशा॑ अनूष॒तेन्दो॒ धारा॑भि॒रोज॑सा। एन्द्र॑स्य पी॒तये॑ विश॥

जो पुरुष कर्म करने में तत्पर रहते हैं अर्थात् उद्योगी हैं, परमात्मा उनको अपने प्रकाश से परमोद्योगी बनाता है॥१४॥

यस्य॑ ते॒ मद्यं॒ रसं॑ ती॒व्रं दु॒हन्त्यद्रि॑भिः। स प॑वस्वाभिमाति॒हा॥

कर्मयोगियों के सब विघ्नों को हनन करनेवाला परमात्मा उनके उद्योग को सफल करता है॥१५॥

राजा॑ मे॒धाभि॑रीयते॒ पव॑मानो म॒नावधि॑। अ॒न्तरि॑क्षेण॒ यात॑वे॥

आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक इत्यादि सब यज्ञों में परमात्मा ही यज्ञदेव है और यज्ञ को पवित्र करनेवाला है तथा परलोकयात्रा में जीव का एकमात्र सहारा परमात्मा ही है। उक्त गुणसम्पन्न परमात्मा की उपासना एकमात्र संस्कृत बुद्धि द्वारा ही करनी चाहिये॥१६॥

आ न॑ इन्दो शत॒ग्विनं॒ गवां॒ पोषं॒ स्वश्व्य॑म्। वहा॒ भग॑त्तिमू॒तये॑॥

जो लोग परमात्मा की अनन्य भक्ति करते हैं, परमात्मा उनकी सब प्रकार से रक्षा करता है और उनकी इन्द्रियों को सहस्त्र प्रकार की शक्तियों से सम्पन्न करता है अर्थात् ज्ञान-विज्ञानादि शक्तियों से उनकी सहस्त्र प्रकार की शक्तियें बढ़ जाती हैं। इसी का नाम इन्द्रियों की सहस्त्रशक्ति है॥१७॥

आ नः॑ सोम॒ सहो॒ जुवो॑ रू॒पं न वर्च॑से भर। सु॒ष्वा॒णो दे॒ववी॑तये॥

परमात्मा जिन पुरुषों में दैवी सम्पत्ति के गुण देता है, उनको तेजस्वी बनाता है और सब प्रकार के ऐश्वर्यों का भण्डार बना कर उनको सर्वोपरि बनाता है॥१८॥

अर्षा॑ सोम द्यु॒मत्त॑मो॒ऽभि द्रोणा॑नि॒ रोरु॑वत्। सीद॑ञ्छ्ये॒नो न योनि॒मा॥

परमात्मा स्वयंप्रकाश है और उसी के प्रकाश से सब पदार्थ प्रकाशित होते हैं॥१९॥

अ॒प्सा इन्द्रा॑य वा॒यवे॒ वरु॑णाय म॒रुद्भ्यः॑। सोमो॑ अर्षति॒ विष्ण॑वे॥

जो लोग ज्ञानयोग, कर्मयोग इत्यादि योगों से परमात्मा की आज्ञा का पालन करते हैं, उनको परमात्मा अपनी ज्ञानगति से अवश्यमेव प्राप्त होता है॥२०॥

इषं॑ तो॒काय॑ नो॒ दध॑द॒स्मभ्यं॑ सोम वि॒श्वतः॑। आ प॑वस्व सह॒स्रिण॑म्॥

इस मन्त्र में परमात्मा से अभ्युदयप्राप्ति की प्रार्थना की गई है॥२१॥

ये सोमा॑सः परा॒वति॒ ये अ॑र्वा॒वति॑ सुन्वि॒रे। ये वा॒दः श॑र्य॒णाव॑ति॥

इस मन्त्र का यह तात्पर्य है कि परमात्मा सब प्रकार के विद्वानों को पवित्र करता है।

य आ॑र्जी॒केषु॒ कृत्व॑सु॒ ये मध्ये॑ प॒स्त्या॑नाम्। ये वा॒ जने॑षु प॒ञ्चसु॑॥

इस मन्त्र में विद्वानों के गुणों का वर्णन किया है। पाँच प्रकार के मनुष्यों की विद्या का तात्पर्य यहाँ यह है कि जो विद्वान् ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र इन चारों वर्णों में उपदेश कर सकते हैं और पाँचवें उन मनुष्यों में जो सर्वथा असंस्कारी हैं अर्थात् दस्युभाव को प्राप्त हैं, इन सबको सुधार सकते हैं, वे प्रजा के लिये सदैव कल्याणकारी होते हैं॥२३॥

ते नो॑ वृ॒ष्टिं दि॒वस्परि॒ पव॑न्ता॒मा सु॒वीर्य॑म्। सु॒वा॒ना दे॒वास॒ इन्द॑वः॥

द्युलोक से वृष्टि करने का तात्पर्य यहाँ हिमालय आदि दिव्य स्थानों से जल की धाराओं से सींच देने का है। जो विद्वान् व्यवहारविषय के सब विद्याओं के वेत्ता होते हैं, वे अपने विद्याबल से प्रजा में सुवृष्टि करके अद्भुत पराक्रम को उत्पन्न कर देते हैं। उक्त विद्वानों से शिक्षा लेकर सुरक्षित होने का उपदेश यहाँ परमात्मा ने किया है॥२४॥

पव॑ते हर्य॒तो हरि॑र्गृणा॒नो ज॒मद॑ग्निना। हि॒न्वा॒नो गोरधि॑ त्व॒चि॥

इससे परमात्मा से इस बात की प्रार्थना की है कि आप सर्वोपरि विद्वान् उत्पन्न करके हमारा कल्याण करें॥२५॥

प्र शु॒क्रासो॑ वयो॒जुवो॑ हिन्वा॒नासो॒ न सप्त॑यः। श्री॒णा॒ना अ॒प्सु मृ॑ञ्जत॥

परमात्मा उपदेश करता है कि हे जीवों! जिस प्रकार ज्ञानेन्द्रिय के सप्तद्वार जल में शुद्ध किये हुए सुन्दर ज्ञान के साधन बनते हैं, इसी प्रकार यज्ञों में वर्णन किये हुए विद्वान् ज्ञान द्वारा तुम्हारे कल्याणकारी होते हैं॥१६॥

तं त्वा॑ सु॒तेष्वा॒भुवो॑ हिन्वि॒रे दे॒वता॑तये। स प॑वस्वा॒नया॑ रु॒चा॥

जो परमात्मा अपने ज्ञानप्रदीप से भक्तों के हृदय को पवित्र करते हैं, वे हमारे अन्तःकरण को पवित्र करें॥१७॥

आ ते॒ दक्षं॑ मयो॒भुवं॒ वह्नि॑म॒द्या वृ॑णीमहे। पान्त॒मा पु॑रु॒स्पृह॑म्॥

जो उपासक उक्तगुणसम्पन्न परमात्मा की उपासना करते हैं, वे सब प्रकार से शुद्ध होकर परमात्मभाव को प्राप्त होते हैं॥२८॥

आ म॒न्द्रमा वरे॑ण्य॒मा विप्र॒मा म॑नी॒षिण॑म्। पान्त॒मा पु॑रु॒स्पृह॑म्॥

उक्तगुणसम्पन्न परमात्मा का वरण करना अर्थात् सब प्रकार से स्वीकार करना इस मन्त्र में बताया गया है। “आ” शब्द यहाँ प्रत्येकगुणसम्पन्न परमात्मा को भली-भाँति वर्णन करने के लिये आया है॥२९॥

आ र॒यिमा सु॑चे॒तुन॒मा सु॑क्रतो त॒नूष्वा। पान्त॒मा पु॑रु॒स्पृह॑म्॥

इस मन्त्र में नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव सर्वरक्षक पतितपावन परमात्मा के गुणों का वर्णन किया गया है और उसको एकमात्र उपास्य देव माना है॥३०॥यह ६५ वाँ सूक्त और ६ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

पव॑स्व विश्वचर्षणे॒ऽभि विश्वा॑नि॒ काव्या॑। सखा॒ सखि॑भ्य॒ ईड्यः॑॥

जो लोग परमात्मा से मित्र के समान प्रेम करते हैं अर्थात् जिनको परमात्मा मित्र के समान प्रिय लगता है, उनको परमात्मा कवित्व की अद्भुत शक्ति देते हैं॥१॥

ताभ्यां॒ विश्व॑स्य राजसि॒ ये प॑वमान॒ धाम॑नी। प्र॒ती॒ची सो॑म त॒स्थतुः॑॥

परमात्मा सब लोक-लोकान्तरों में विराजमान है। ज्ञान क्रिया और बल ये तीनों प्रकार के उसके प्राचीन धाम हैं, जिनसे वह सबको प्रेरणा करता है॥२॥

परि॒ धामा॑नि॒ यानि॑ ते॒ त्वं सो॑मासि वि॒श्वतः॑। पव॑मान ऋ॒तुभिः॑ कवे॥

परमात्मा उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय तीनों प्रकार की क्रियाओं का हेतु है। अर्थात् उसी से संसार की उत्पत्ति और उसी में स्थिति और उसी से प्रलय होता है॥३॥

पव॑स्व ज॒नय॒न्निषो॒ऽभि विश्वा॑नि॒ वार्या॑। सखा॒ सखि॑भ्य ऊ॒तये॑॥

जो लोग परमात्मपरायण होते हैं, परमात्मा उन्हें सब प्रकार के आनन्दों से विभूषित करता है॥४॥

तव॑ शु॒क्रासो॑ अ॒र्चयो॑ दि॒वस्पृ॒ष्ठे वि त॑न्वते। प॒वित्रं॑ सोम॒ धाम॑भिः॥

परमात्मा की ज्योति सर्वत्र दीप्तिमती है, उसके प्रकाश से एक रेणु भी खाली नहीं। द्युलोक में उसका प्रकाश इस प्रकार फैला हुआ है, जैसे मकड़ी के जाले के तन्तुओं के आतान-वितान का पारावार नहीं मिलता, इसी प्रकार उसका पारावार नहीं॥अथवा यों कहो कि मयूरपिच्छ की शोभा के समान उसके द्युलोक की अनन्त प्रकार की शोभा है, जिसको परमात्मज्योति ने देदीप्यमान किया है॥५॥

तवे॒मे स॒प्त सिन्ध॑वः प्र॒शिषं॑ सोम सिस्रते। तुभ्यं॑ धावन्ति धे॒नवः॑॥

परमात्मा के शासन में वेदादि वाणियों के प्रवाह बहते हैं। अथवा यों कहो कि ज्ञानेन्द्रियों के सप्त छिद्रों के द्वारा प्राण सिन्धु के समान प्रतिक्षण क्रिया को प्राप्त हो रहे हैं। अथवा यों कहो कि सम्पूर्ण भूत, सिन्धु आदि नदियों के समान उसी से निकलकर उसी के स्वरूप में प्रतिदिन स्त्रवित होते हैं॥६॥

प्र सो॑म याहि॒ धार॑या सु॒त इन्द्रा॑य मत्स॒रः। दधा॑नो॒ अक्षि॑ति॒ श्रवः॑॥

परमात्मा का यश अक्षय है, इसलिए अन्यत्र भी वेद ने वर्णन किया है कि “यस्य नाम महद्यशः” जिसका सबसे बड़ा यश है, वह परमात्मा निराकारभाव से सर्वत्र व्यापक हो रहा है॥७॥

समु॑ त्वा धी॒भिर॑स्वरन्हिन्व॒तीः स॒प्त जा॒मयः॑। विप्र॑मा॒जा वि॒वस्व॑तः॥

उपासक लोग बुद्धिवृत्तियों द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं। वा यों कहो कि यम-नियम आदि सात अङ्गों द्वारा समाधि की सिद्धि करते हैं। अर्थात् समाधि साध्य पदार्थ है और सात उसके साधन हैं ॥८॥

मृ॒जन्ति॑ त्वा॒ सम॒ग्रुवोऽव्ये॑ जी॒रावधि॒ ष्वणि॑। रे॒भो यद॒ज्यसे॒ वने॑॥

इस मन्त्र में सर्वरक्षक परमात्मा के साक्षात्कार का वर्णन किया गया है कि कर्मयोगी लोग अपने कर्मण्यतायोग से परमात्मपरायण होकर परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं॥९॥

पव॑मानस्य ते कवे॒ वाजि॒न्त्सर्गा॑ असृक्षत। अर्व॑न्तो॒ न श्र॑व॒स्यवः॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा को निमित्तकारण वर्णन किया है कि परमात्मा इस सृष्टि का निमित्त कारण है। उपादानकारण प्रकृति है और निमित्तकारण परमात्मा है। इसी से यहाँ विद्युत् का दृष्टान्त दिया गया है॥१०॥

अच्छा॒ कोशं॑ मधु॒श्चुत॒मसृ॑ग्रं॒ वारे॑ अ॒व्यये॑। अवा॑वशन्त धी॒तयः॑॥

परमात्मा ही एकमात्र सर्व लोक-लोकान्तरों का अधिकरण है॥११॥

अच्छा॑ समु॒द्रमिन्द॒वोऽस्तं॒ गावो॒ न धे॒नवः॑। अग्म॑न्नृ॒तस्य॒ योनि॒मा॥

इस मन्त्र से यह सिद्ध किया है कि परमात्मा एकमात्र शब्दगम्य है। अर्थात् सर्वज्ञ परमात्मा की वेदवाणी ही उसको विषय करती हैं। अन्य प्रमाणों का विषय सुगमता से परमात्मा नहीं होता॥१२॥

प्र ण॑ इन्दो म॒हे रण॒ आपो॑ अर्षन्ति॒ सिन्ध॑वः। यद्गोभि॑र्वासयि॒ष्यसे॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा ने ज्ञान और कर्म का समुच्चय कथन किया है कि जब ज्ञान और कर्म दोनों मिलते हैं, तब ही यज्ञ की पूर्ति होती है, अन्यथा नहीं॥१३॥

अस्य॑ ते स॒ख्ये व॒यमिय॑क्षन्त॒स्त्वोत॑यः। इन्दो॑ सखि॒त्वमु॑श्मसि॥

परमात्मा के साक्षात्कार से जब मनुष्य अत्यन्त सन्निहित हो जाता है, तब ब्रह्म के सत्यादि गुणों के धारण करने से उसमें ब्रह्मसाम्य हो जाता है। उसी का नाम ब्रह्ममैत्री है। इसी भाव का कथन इस मन्त्र में किया है कि हे परमात्मन्! हम तुम्हारे मैत्रीभाव को प्राप्त हों ॥१४॥

आ प॑वस्व॒ गवि॑ष्टये म॒हे सो॑म नृ॒चक्ष॑से। एन्द्र॑स्य ज॒ठरे॑ विश॥

परमात्मा उपदेश करता है कि मैं कर्मयोगी तथा ज्ञानयोगियों के हृदय में अवश्यमेव निवास करता हूँ। यद्यपि परमात्मा सर्वत्र है, तथापि परमात्मा की अभिव्यक्ति जैसी ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगी के हृदय में होती है, वैसी अन्यत्र नहीं होती। इसी अभिप्राय से यहाँ कर्मयोगी के हृदय में विराजमान होना लिखा गया है और “वैश्वानरस्तद्धर्मव्यपदेशात्” इस सूत्र में परमात्मा को “वैश्वानर” अग्निरूप से कथन किया गया है ॥

म॒हाँ अ॑सि सोम॒ ज्येष्ठ॑ उ॒ग्राणा॑मिन्द॒ ओजि॑ष्ठः। युध्वा॒ सञ्छश्व॑ज्जिगेथ॥

परमात्मा सूर्य-चन्द्रमादिकों की रचना करता हुआ अर्थात् उत्पत्तिसमय में विनाशरूपी सब विरोधी शक्तियों को जीतता है। इस प्रकार परमात्मा सर्वविजयी कथन किया गया है, किसी युद्धविशेष के अभिप्राय से नहीं॥१६॥

य उ॒ग्रेभ्य॑श्चि॒दोजी॑या॒ञ्छूरे॑भ्यश्चि॒च्छूर॑तरः। भू॒रि॒दाभ्य॑श्चि॒न्मंही॑यान्॥

इस मन्त्र में यह वर्णन किया है कि परमात्मा अजर अमर तथा अविनाशी है। जैसा कि “तेजोऽसि तेजो मयि धेहि।  वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि।  बलमसि बलं मयि धेहि” इत्यादि मन्त्रों में परमात्मा को बलस्वरूप कथन किया गया है। इसी प्रकार इस मन्त्र में भी परमात्मा को बलस्वरूपवाला कथन किया गया है॥१७॥

त्वं सो॑म॒ सूर॒ एष॑स्तो॒कस्य॑ सा॒ता त॒नूना॑म्। वृ॒णी॒महे॑ स॒ख्याय॑ वृणी॒महे॒ युज्या॑य॥

इस मन्त्र में परमात्मा को सर्वोपरि मित्ररूप से कथन किया गया है। वस्तुतः मित्र शब्द के अर्थ स्नेह करने के हैं। वास्तव में परमात्मा के बराबर स्नेह करनेवाला कोई नहीं है। इसी भाव को “त्वं वा अहमस्मि भवो देवते अहं वा त्वमसि” इस उपनिषद् में भली-भाँति वर्णन किया है कि तू मैं और मैं तू हूँ। अर्थात् मैं आपके निष्पाप आदि गुणों को धारण करके शुद्ध आत्मा बनूँ॥१८॥

अग्न॒ आयूं॑षि पवस॒ आ सु॒वोर्ज॒मिषं॑ च नः। आ॒रे बा॑धस्व दु॒च्छुना॑म्॥

इस मन्त्र में परमात्मा ने विघ्नकारी राक्षसों से बचने का उपदेश किया है कि हे पुरुषों! तुम विघ्नकारी अवैदिक पुरुष जो राक्षस हैं, उनके हटाने में सदैव तत्पर रहो॥१९॥

अ॒ग्निॠषिः॒ पव॑मानः॒ पाञ्च॑जन्यः पु॒रोहि॑तः। तमी॑महे महाग॒यम्॥

जो परमात्मा सर्वगत परिपूर्ण और नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव है, जिसकी उपासना से ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय दोनों बलवीर्यसंपन्न होकर ऐश्वर्य के उपलब्ध करने का सर्वोपरि हेतु बनते हैं, हम एकमात्र उक्तगुणसंपन्न परमात्मा को ही अपना उपास्य समझें॥२०॥

अग्ने॒ पव॑स्व॒ स्वपा॑ अ॒स्मे वर्चः॑ सु॒वीर्य॑म्। दध॑द्र॒यिं मयि॒ पोष॑म्॥

जो पुरुष परमात्मपरायण होते हैं, परमात्मा उनमें सब प्रकार के ऐश्वर्यों को धारण कराता है॥२१॥

पव॑मानो॒ अति॒ स्रिधो॒ऽभ्य॑र्षति सुष्टु॒तिम्। सूरो॒ न वि॒श्वद॑र्शतः॥

जो पुरुष संयमी बनकर ईश्वरपरायण होते हैं, परमात्मा उन पर अवश्यमेव कृपा करता है॥२२॥

स म॑र्मृजा॒न आ॒युभिः॒ प्रय॑स्वा॒न्प्रय॑से हि॒तः। इन्दु॒रत्यो॑ विचक्ष॒णः॥

योगी लोग जब परमात्मा का ध्यान करते हैं, तब परमात्मा उन्हें आत्मस्वरूपवत् भान होता है। इसी अभिप्राय से योगसूत्र में कहा है कि “तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्” समाधिवेला में उपासक के स्वरूप में परमात्मा की स्थिति होती है॥२३॥

पव॑मान ऋ॒तं बृ॒हच्छु॒क्रं ज्योति॑रजीजनत्। कृ॒ष्णा तमां॑सि॒ जङ्घ॑नत्॥

परमात्मा के साक्षात्कार से अज्ञान की निवृत्ति और परमानन्द की प्राप्ति होती है। अथवा यों कहो कि “सता सौम्य तदा सम्पन्नो भवति” उस समय योगी सद्ब्रह्म के साथ सह अवस्थान को प्राप्त होता है। अर्थात् उस समय सद्ब्रह्म से भिन्न और कुछ प्रतीत नहीं होता। इसी अभिप्राय से योगसूत्र में लिखा है कि “ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा” उस समय सद्रूप ब्राह्मी प्रज्ञा हो जाती है। ऋत, सत्य ये पर्यायशब्द हैं॥२४॥

पव॑मानस्य॒ जङ्घ्न॑तो॒ हरे॑श्च॒न्द्रा अ॑सृक्षत। जी॒रा अ॑जि॒रशो॑चिषः॥

जब योगी जन उस परमात्मा को लक्ष्य बनाकर उसका ध्यान करते हैं, तब अपूर्व ज्योति उत्पन्न होती है। वा यों कहो कि अजर अमर भाव देनेवाला ब्रह्मज्ञान उस समय मनुष्य की बुद्धि को प्रकाशित करता है। इसी का नाम ब्राह्मी प्रज्ञा है। इसी अभिप्राय से गीता में कृष्ण जी ने कहा है कि “एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति” हे अर्जुन! यह ब्राह्मी स्तिथि है, इसको पाकर फिर पुरुष मोह को प्राप्त नहीं होता॥२५॥

पव॑मानो र॒थीत॑मः शु॒भ्रेभिः॑ शु॒भ्रश॑स्तमः। हरि॑श्चन्द्रो म॒रुद्ग॑णः॥

विद्वान् लोग नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव परमात्मा की उपासना करते हैं, किसी अन्य की नहीं॥२६॥

पव॑मानो॒ व्य॑श्नवद्र॒श्मिभि॑र्वाज॒सात॑मः। दध॑त्स्तो॒त्रे सु॒वीर्य॑म्॥

स्वयंज्योति परमात्मा से ही विद्वानों को ब्रह्मवर्चस मिलता है, इसलिए एकमात्र उसी ईश्वर की उपासना करनी चाहिए॥२७॥

प्र सु॑वा॒न इन्दु॑रक्षाः प॒वित्र॒मत्य॒व्यय॑म्। पु॒ना॒न इन्दु॒रिन्द्र॒मा॥

यद्यपि मनुष्यमात्र के हृदय में परमात्मा विराजमान है। उससे एक अणुमात्र भी खाली नहीं है, तथापि कर्मयोगी और ज्ञानयोगियों के हृदय में योगज सामर्थ्य से अधिक अभिव्यक्ति समझी जाती है। इस अभिप्राय से परमात्मा का आवेश यहाँ योगीजनों के हृदय में कथन किया गया है॥२८॥

ए॒ष सोमो॒ अधि॑ त्व॒चि गवां॑ क्रीळ॒त्यद्रि॑भिः। इन्द्रं॒ मदा॑य॒ जोहु॑वत्॥

परमात्मा की कृपा से ही कर्मयोगी जन प्राण-अपान की गति को रोककर प्राणायाम करते हैं और वही परमात्मा इस ब्रह्माण्डरूपी अद्भुत कर्मक्षेत्र में उनसे सर्वोपरि कर्म कराता है। इसमें “अधित्वचि” नाम मन का है, क्योंकि “इन्द्रियाणां शक्तिं तनोतीति त्वक्” इससे यहाँ आध्यात्मिक यज्ञ का अभिप्राय है। सायणाचार्य ने यहाँ “अधित्वचि” इसके अत्यन्त घृणित अर्थ किये थे। अर्थात् “गवामधित्वचि” इसका “अनडुहचर्मणि” अर्थ किये हैं। सायणाचार्य के मत में अनुडुहचर्म बिछाकर उसके ऊपर सोम कूटा जाता था। विचार करने से यह अर्थ योग्यता से भी विरुद्ध है, क्योंकि सोम किसी कड़ी चीज पर ही कूटा जा सकता है, न कि चमड़े पर। कुछ हो, परन्तु “गवामधित्वचि” इसके “अनुडुहचर्मणि” अर्थ करना वेद के आशय से सर्वथा विरुद्ध है॥२९॥

यस्य॑ ते द्यु॒म्नव॒त्पयः॒ पव॑मा॒नाभृ॑तं दि॒वः। तेन॑ नो मृळ जी॒वसे॑॥

परमात्मा के ऐश्वर्यरूपी अमृत का जब तक मनुष्य पान नहीं करता, तब तक उसके ऐश्वर्य की वृद्धि कदापि नहीं होती। इसलिए अपने जीवन की वृद्धि के लिए इन्द्रियसंयम द्वारा ईश्वराज्ञा का पालन करता हुआ पुरुष १०० वर्ष जीने की इच्छा करे। इस अभिप्राय से वेद में अन्यत्र भी कहा गया है कि “जीवेम शरदः शतम्, पश्येम शरदः शतम्” इत्यादि। इसी अभिप्राय से मनु-धर्मशास्त्र में कहा है कि “सदाचारेण पुरुषः शतवर्षाणि जीवति” ब्रह्मचर्य आदि व्रतों से मनुष्य सैकड़ों बरस तक जीवित रहता है॥३०॥यह छियासठवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

त्वं सो॑मासि धार॒युर्म॒न्द्र ओजि॑ष्ठो अध्व॒रे। पव॑स्व मंह॒यद्र॑यिः॥

इस मन्त्र में परमात्मा को सर्वाधार कथन किया गया है और सम्पूर्ण धनों का दाता रूप से वर्णन किया गया है॥१॥

त्वं सु॒तो नृ॒माद॑नो दध॒न्वान्म॑त्स॒रिन्त॑मः। इन्द्रा॑य सू॒रिरन्ध॑सा॥

परमात्मा उद्योगी पुरुषों को अपने ऐश्वर्य से ऐश्वर्यशाली बनाते हैं ॥२॥

त्वं सु॑ष्वा॒णो अद्रि॑भिर॒भ्य॑र्ष॒ कनि॑क्रदत्। द्यु॒मन्तं॒ शुष्म॑मुत्त॒मम्॥

परमात्मा वेदवाणियों के द्वारा ज्ञानरूपी बल को प्रदान करता है॥३॥

इन्दु॑र्हिन्वा॒नो अ॑र्षति ति॒रो वारा॑ण्य॒व्यया॑। हरि॒र्वाज॑मचिक्रदत्॥

इस मन्त्र में अज्ञान को निवृत्त करके ईश्वर के सद्गुणों के धारण का उपदेश किया गया है॥४॥

इन्दो॒ व्यव्य॑मर्षसि॒ वि श्रवां॑सि॒ वि सौभ॑गा। वि वाजा॑न्त्सोम॒ गोम॑तः॥

परमात्मा सत्कर्मों द्वारा जिस पुरुष को अपने ऐश्वर्य का पात्र समझता है, उसे अनन्त प्रकार के बल, सौभाग्य तथा यश का प्रदान करता है॥५॥

आ न॑ इन्दो शत॒ग्विनं॑ र॒यिं गोम॑न्तम॒श्विन॑म्। भरा॑ सोम सह॒स्रिण॑म्॥

परमात्मा सहस्रों प्रकार के ऐश्वर्यों का प्रदान करनेवाला है॥६॥

पव॑मानास॒ इन्द॑वस्ति॒रः प॒वित्र॑मा॒शवः॑। इन्द्रं॒ यामे॑भिराशत॥

जो पुरुष ज्ञानयोग वा कर्मयोग द्वारा अपने आपको ईश्वर के ज्ञान का पात्र बनाते हैं, उन्हें परमात्मा अपने अनन्त गुणों से प्राप्त होता है। अर्थात् वह परमात्मा के सच्चिदादि अनेक गुणों का लाभ करता है॥७॥

क॒कु॒हः सो॒म्यो रस॒ इन्दु॒रिन्द्रा॑य पू॒र्व्यः। आ॒युः प॑वत आ॒यवे॑॥

इन्द्र शब्द के अर्थ यहाँ केवल कर्मयोगी नहीं, किन्तु कर्मयोगी, ज्ञानयोगी दोनों के हैं। तात्पर्य यह है कि जो पुरुष कर्म वा ज्ञान द्वारा परमात्मा को उपलब्ध करना चाहते हैं, उनके लिए परमात्मा सदैव सुलभ है॥८॥

हि॒न्वन्ति॒ सूर॒मुस्र॑यः॒ पव॑मानं मधु॒श्चुत॑म्। अ॒भि गि॒रा सम॑स्वरन्॥

विद्वान् लोग वेदवाणियों द्वारा पूर्वोक्त परमात्मा की स्तुति करते हैं॥९॥

अ॒वि॒ता नो॑ अ॒जाश्वः॑ पू॒षा याम॑नियामनि। आ भ॑क्षत्क॒न्या॑सु नः॥

परमात्मा ईश्वरपरायण लोगों के लिए सदैव कल्याणकारी होता है॥१०॥

अ॒यं सोमः॑ कप॒र्दिने॑ घृ॒तं न प॑वते॒ मधु॑। आ भ॑क्षत्क॒न्या॑सु नः॥

परमात्मा कर्मयोगियों को कमनीय पदार्थों का प्रदान करता है॥११॥

अ॒यं त॑ आघृणे सु॒तो घृ॒तं न प॑वते॒ शुचि॑। आ भ॑क्षत्क॒न्या॑सु नः॥

जो लोग परमात्मसुखोपलब्धि के लिए सत्कर्म करते हैं, उन्हें परमात्मा मङ्गलमय बनाता है॥१२॥

वा॒चो ज॒न्तुः क॑वी॒नां पव॑स्व सोम॒ धार॑या। दे॒वेषु॑ रत्न॒धा अ॑सि॥

परमात्मा ही वस्तुतः आदिकवि है। उसकी कवित्व शक्ति का अनुकरण करके अन्य कवियों ने अपने-अपने भावों को प्रकट किया है॥१३॥

आ क॒लशे॑षु धावति श्ये॒नो वर्म॒ वि गा॑हते। अ॒भि द्रोणा॒ कनि॑क्रदत्॥

विद्युत् निराकार होकर भी सबसे तेजस्वी, ओजस्वी और शब्दायमान है। इसी प्रकार निराकार परमात्मा तेजस्वी, ओजस्वी तथा शब्दयोनि होकर विराजमान है। यहाँ विद्युत् का दृष्टान्त अत्यन्त बल और निराकार के अभिप्राय से है, किसी और अभिप्राय से नहीं ॥१४॥

परि॒ प्र सो॑म ते॒ रसोऽस॑र्जि क॒लशे॑ सु॒तः। श्ये॒नो न त॒क्तो अ॑र्षति॥

जिस प्रकार परमात्मा सर्वत्र व्यापक है, इसी प्रकार उसके आनन्द आदि गुण भी सर्वत्र व्यापक हैं॥१५॥

पव॑स्व सोम म॒न्दय॒न्निन्द्रा॑य॒ मधु॑मत्तमः॥

उद्योगी पुरुष को परमात्मा उत्साहित करके पवित्र करता है॥१६॥

असृ॑ग्रन्दे॒ववी॑तये वाज॒यन्तो॒ रथा॑ इव॥

“आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु” कठ. १। २। ३।  इस वाक्य में जैसे शरीर को रथ बनाया है, इसी प्रकार यहाँ भी रथ का दृष्टान्त है। तात्पर्य यह है कि जिन पुरुषों के शरीर दृढ़ होते हैं, वा यों कहो कि परमात्मा पूर्वकर्मानुसार जिन पुरुषों के शरीरों को दृढ़ बनाता है, वे कर्मयोग के लिए अत्यन्त उपयोगी होते हैं॥१७॥

ते सु॒तासो॑ म॒दिन्त॑माः शु॒क्रा वा॒युम॑सृक्षत॥

तात्पर्य यह है कि जिसको परमात्मा उत्तम शील देता है, वही कर्मयोगी बनता है, अन्य नहीं॥१८॥

ग्राव्णा॑ तु॒न्नो अ॒भिष्टु॑तः प॒वित्रं॑ सोम गच्छसि। दध॑त्स्तो॒त्रे सु॒वीर्य॑म्॥

उपासक लोगों से उपासना किया हुआ परमात्मा उनके लिए सुन्दर बल का प्रदान करता है॥१९॥

ए॒ष तु॒न्नो अ॒भिष्टु॑तः प॒वित्र॒मति॑ गाहते। र॒क्षो॒हा वार॑म॒व्यय॑म्॥

इस मन्त्र में परमात्मा के दण्डदातृत्व और अविनाशित्वादि धर्मों का कथन किया गया है॥२०॥

यदन्ति॒ यच्च॑ दूर॒के भ॒यं वि॒न्दति॒ मामि॒ह। पव॑मान॒ वि तज्ज॑हि॥

इस मन्त्र में परमात्मा से भय और विघ्नों के नाश करने की प्रार्थना की गयी है॥२१॥

पव॑मानः॒ सो अ॒द्य नः॑ प॒वित्रे॑ण॒ विच॑र्षणिः। यः पो॒ता स पु॑नातु नः॥

इस मन्त्र में अपूर्वता का उपदेश किया गया है कि उपासनाकाल में उपासक अपनी पवित्रता का अनुसन्धान करे और उसकी न्यूनता देखकर उसकी याचना परमेश्वर से अवश्यमेव करे॥२२॥

यत्ते॑ प॒वित्र॑म॒र्चिष्यग्ने॒ वित॑तम॒न्तरा। ब्रह्म॒ तेन॑ पुनीहि नः॥

ब्रह्म शब्द के अर्थ यहाँ परमात्मा के हैं। सायणाचार्य ने इसके अर्थ शरीर के किये हैं, जो कि वेदाशय से सर्वथा विरुद्ध है॥२३॥

यत्ते॑ प॒वित्र॑मर्चि॒वदग्ने॒ तेन॑ पुनीहि नः। ब्र॒ह्म॒स॒वैः पु॑नीहि नः॥

परमात्मा सूर्यादि सब दिव्य पदार्थों का प्रकाशक है और उसी के प्रकाश से प्रकाशित होकर सब तेजोमय प्रतीत होते हैं॥२४॥

उ॒भाभ्यां॑ देव सवितः प॒वित्रे॑ण स॒वेन॑ च। मां पु॑नीहि वि॒श्वतः॑॥

जो लोग अपने में ज्ञानयोग और कर्मयोग की न्यूनता समझते हैं, वे परमात्मा से ज्ञानयोग तथा कर्मयोग की प्रार्थना करें॥२५॥

त्रि॒भिष्ट्वं दे॑व सवित॒र्वर्षि॑ष्ठैः सोम॒ धाम॑भिः। अग्ने॒ दक्षैः॑ पुनीहि नः॥

इस मन्त्र में स्थूल, सूक्ष्म और कारण इन तीनों शरीरों के शुद्धि की प्रार्थना है। प्रलयकाल में जीवात्मा जब प्रकृतिलीन होकर रहता है, उसका नाम कारणशरीर है तथा जिसके द्वारा जन्मान्तरों को प्राप्त होता है, उसका नाम सूक्ष्मशरीर है और तीसरा स्थूलशरीर है। इन तीनों शरीरों की पवित्रता का उपदेश यहाँ किया गया है॥२६॥

पु॒नन्तु॒ मां दे॑वज॒नाः पु॒नन्तु॒ वस॑वो धि॒या। विश्वे॑ देवाः पुनी॒त मा॒ जात॑वेदः पुनी॒हि मा॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा ने विद्वानों के उपदेश द्वारा पवित्रता का उपदेश दिया है कि हे जीवो! तुम अपने विद्वानों से तथा ब्रह्मचारी गणों से सदैव सद्बुद्धि का ग्रहण किया करो॥२७॥

प्र प्या॑यस्व॒ प्र स्य॑न्दस्व॒ सोम॒ विश्वे॑भिरं॒शुभिः॑। दे॒वेभ्य॑ उत्त॒मं ह॒विः॥

परमात्मा ही एकमात्र तृप्ति का कारण है। वह अपने ज्ञान के प्रदान से हमको तृप्त करे॥२८॥

उप॑ प्रि॒यं पनि॑प्नतं॒ युवा॑नमाहुती॒वृध॑म्। अग॑न्म॒ बिभ्र॑तो॒ नमः॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा नम्रतादि भावों का उपदेश करता है कि हे मनुष्यों! नम्रतादि भावों को धारण करते हुए उक्त प्रकार की प्रार्थनाओं से मुझको प्राप्त हो॥२९॥

अ॒लाय्य॑स्य पर॒शुर्न॑नाश॒ तमा प॑वस्व देव सोम। आ॒खुं चि॑दे॒व दे॑व सोम॥

परमात्मा जिनमें दैवी संपत्ति के गुण समझता है, उनको वृद्धियुक्त करता है और जिनमें आसुरी भाव के अवगुण देखता है, उनका नाश करता है॥३०॥

यः पा॑वमा॒नीर॒ध्येत्यृषि॑भिः॒ सम्भृ॑तं॒ रस॑म्। सर्वं॒ स पू॒तम॑श्नाति स्वदि॒तं मा॑त॒रिश्व॑ना॥

जो लोग परमात्मा के पवित्र गुणों का सहारा लेते हैं, वे ब्रह्मानन्दरस का पान करते हैं और उनके लिए वायु के पवित्र किये हुए पदार्थ मधुर रसों के प्रदाता होते हैं। तात्पर्य यह है कि वायु फलों में एक प्रकार का माधुर्य उत्पन्न करता है, उस माधुर्य के भोक्ता पुण्यात्मा ही हो सकते हैं, अन्य नहीं॥३१॥

पा॒व॒मा॒नीर्यो अ॒ध्येत्यृषि॑भिः॒ सम्भृ॑तं॒ रस॑म्। तस्मै॒ सर॑स्वती दुहे क्षी॒रं स॒र्पिर्मधू॑द॒कम्॥

जो लोग परमात्मा के शरणागत होते हैं, उनके लिए मानो (सरस्वती) ब्रह्मविद्या स्वयं दुहनेवाली बनकर दूध घी मधु और नाना प्रकार के रसों का दोहन करती है। वा यों कहो माता के समान (सरस्वती) विद्या नाना प्रकार के रसों को अपने विज्ञानमय स्तनों से पान कराती है॥३२॥यह ६७ वाँ सूक्त और १८ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

प्र दे॒वमच्छा॒ मधु॑मन्त॒ इन्द॒वोऽसि॑ष्यदन्त॒ गाव॒ आ न धे॒नवः॑। ब॒र्हि॒षदो॑ वच॒नाव॑न्त॒ ऊध॑भिः परि॒स्रुत॑मु॒स्रिया॑ नि॒र्णिजं॑ धिरे॥

परमात्मा के मार्ग का उपदेश करनेवाले विद्वान् वाग्धेनु के समान सद्ज्ञान का उपदेश करते हैं। जिस प्रकार सद्वाणी सद् ज्ञान को उत्पन्न करती है, इसी प्रकार सम्यग्ज्ञाता विद्वान् सत् का उपदेश करके सच्चे ज्ञान का उपदेश करते हैं॥१॥

स रोरु॑वद॒भि पूर्वा॑ अचिक्रददुपा॒रुहः॑ श्र॒थय॑न्त्स्वादते॒ हरिः॑। ति॒रः प॒वित्रं॑ परि॒यन्नु॒रु ज्रयो॒ नि शर्या॑णि दधते दे॒व आ वर॑म्॥

सदुपदेश द्वारा अज्ञानों को निवृत्त करना पूर्ण विद्वान् का ही काम है। पूर्ण विद्वान् के उपदेश से मनुष्य ज्ञानी और विद्वानी बनकर मनुष्यजन्म के फल को उपलब्ध करता है॥२॥

वि यो म॒मे य॒म्या॑ संय॒ती मदः॑ साकं॒वृधा॒ पय॑सा पिन्व॒दक्षि॑ता। म॒ही अ॑पा॒रे रज॑सी वि॒वेवि॑ददभि॒व्रज॒न्नक्षि॑तं॒ पाज॒ आ द॑दे॥

कर्मयोगी विद्वान् के उपदेश से ही मनुष्य को पृथिवीलोक और द्युलोक का ज्ञान होता है और उसी के सदुपदेश से अक्षय फल मिलता है॥३॥

स मा॒तरा॑ वि॒चर॑न्वा॒जय॑न्न॒पः प्र मेधि॑रः स्व॒धया॑ पिन्वते प॒दम्। अं॒शुर्यवे॑न पिपिशे य॒तो नृभिः॒ सं जा॒मिभि॒र्नस॑ते॒ रक्ष॑ते॒ शिरः॑॥

कर्मयोगी का यह कर्तव्य है कि वह अकर्मण्यता दोष से ग्रस्त मनुष्यों में उद्योग उत्पन्न करके उनमें जागृति उत्पन्न करे॥४॥

सं दक्षे॑ण॒ मन॑सा जायते क॒विॠ॒तस्य॒ गर्भो॒ निहि॑तो य॒मा प॒रः। यूना॑ ह॒ सन्ता॑ प्रथ॒मं वि ज॑ज्ञतु॒र्गुहा॑ हि॒तं जनि॑म॒ नेम॒मुद्य॑तम्॥

जो परमात्मा सूक्ष्मरूप से सबके अन्तःकरण में विराजमान है, उसको कर्मयोगी और ज्ञानयोगी ही सुलभता से लाभ कर सकते हैं, अन्य नहीं॥५॥

म॒न्द्रस्य॑ रू॒पं वि॑विदुर्मनी॒षिणः॑ श्ये॒नो यदन्धो॒ अभ॑रत्परा॒वतः॑। तं म॑र्जयन्त सु॒वृधं॑ न॒दीष्वाँ उ॒शन्त॑मं॒शुं प॑रि॒यन्त॑मृ॒ग्मिय॑म्॥

आनन्दमय परमात्मा का साक्षात्कार कर्मयोग और ज्ञानयोग द्वारा संस्कृत बुद्धि से ही हो सकता है, अन्यथा नहीं। इसी अभिप्राय से कहा है कि “दृश्यते त्वग्र्या बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः” उसको सूक्ष्म बुद्धि से सूक्ष्मदर्शी ही देख सकते हैं, अन्य नहीं॥६॥

त्वां मृ॑जन्ति॒ दश॒ योष॑णः सु॒तं सोम॒ ऋषि॑भिर्म॒तिभि॑र्धी॒तिभि॑र्हि॒तम्। अव्यो॒ वारे॑भिरु॒त दे॒वहू॑तिभि॒र्नृभि॑र्य॒तो वाज॒मा द॑र्षि सा॒तये॑॥

परमात्मा ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगियों को अनन्त बल देता है, इसलिए मनुष्य को ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगी अवश्य बनना चाहिए॥७॥

प॒रि॒प्र॒यन्तं॑ व॒य्यं॑ सुषं॒सदं॒ सोमं॑ मनी॒षा अ॒भ्य॑नूषत॒ स्तुभः॑। यो धार॑या॒ मधु॑माँ ऊ॒र्मिणा॑ दि॒व इय॑र्ति॒ वाचं॑ रयि॒षाळम॑र्त्यः॥

परमात्मा अपनी दिव्यशक्ति से पवित्र वेदवाणी का प्रकाश करता है और स्वयं आमरणधर्मा होकर जगज्जन्मादि का हेतु है॥८॥

अ॒यं दि॒व इ॑यर्ति॒ विश्व॒मा रजः॒ सोमः॑ पुना॒नः क॒लशे॑षु सीदति। अ॒द्भिर्गोभि॑र्मृज्यते॒ अद्रि॑भिः सु॒तः पु॑ना॒न इन्दु॒र्वरि॑वो विदत्प्रि॒यम्॥

ज्ञानयोगी और कर्मयोगी को परमात्मा अनन्त प्रकार के ऐश्वर्य देता है॥९॥

ए॒वा नः॑ सोम परिषि॒च्यमा॑नो॒ वयो॒ दध॑च्चि॒त्रत॑मं पवस्व। अ॒द्वे॒षे द्यावा॑पृथि॒वी हु॑वेम॒ देवा॑ ध॒त्त र॒यिम॒स्मे सु॒वीर॑म्॥

जो लोग कर्मयोगी और ज्ञानयोगियों की संगति में रहते हैं, उनके लिए परमात्मा नानाविध ऐश्वर्यों को देता है और द्युलोक और पृथिवीलोक उनके द्वेषियों से सर्वथा रहित हो जाता है। अर्थात् वे मित्रता की दृष्टि से सबको देखते हैं॥१०॥यह ६८ वाँ सूक्त और २० वाँ वर्ग समाप्त हुआ।

इषु॒र्न धन्व॒न्प्रति॑ धीयते म॒तिर्व॒त्सो न मा॒तुरुप॑ स॒र्ज्यूध॑नि। उ॒रुधा॑रेव दुहे॒ अग्र॑ आय॒त्यस्य॑ व्र॒तेष्वपि॒ सोम॑ इष्यते॥

जिस प्रकार धन्वी लक्ष्यभेदन करनेवाला मनुष्य इतस्ततः वृत्तियों को रोककर एकमात्र अपने लक्ष्य में वृत्ति लगाता है, इसी प्रकार परमात्मा के उपासकों को चाहिए कि वे सब ओर से वृत्ति को रोककर एकमात्र परमात्मा की उपासना करें॥१॥

उपो॑ म॒तिः पृ॒च्यते॑ सि॒च्यते॒ मधु॑ म॒न्द्राज॑नी चोदते अ॒न्तरा॒सनि॑। पव॑मानः संत॒निः प्र॑घ्न॒तामि॑व॒ मधु॑मान्द्र॒प्सः परि॒ वार॑मर्षति॥

जो पुरुष शान्तिभाव से परमात्मा के नियमानुकुल चलते हैं, परमात्मा उन्हें शान्तिरूप से उनके कर्मानुकूल फल देता है और जो परमात्मा के नियमों का उल्लङ्घन करते हैं, उनके लिए परमात्मा दण्ड देता है। इसी अभिप्राय से यहाँ शूर वीरों के बाणों के समान परमात्मा को कथन किया गया है। जैसा कि “महद्भयं वज्रमुद्यतम्” उठे हुए वज्र की तरह परमात्मा भयप्रद है॥२॥

अव्ये॑ वधू॒युः प॑वते॒ परि॑ त्व॒चि श्र॑थ्नी॒ते न॒प्तीरदि॑तेॠ॒तं य॒ते। हरि॑रक्रान्यज॒तः सं॑य॒तो मदो॑ नृ॒म्णा शिशा॑नो महि॒षो न शो॑भते॥

जो पुरुष संयमी बनकर निष्काम यज्ञ करते हैं, उन पुरुषों के लिए परमात्मा शुभ संतानों और शुभ फलों को उत्पन्न करता है॥३॥

उ॒क्षा मि॑माति॒ प्रति॑ यन्ति धे॒नवो॑ दे॒वस्य॑ दे॒वीरुप॑ यन्ति निष्कृ॒तम्। अत्य॑क्रमी॒दर्जु॑नं॒ वार॑म॒व्यय॒मत्कं॒ न नि॒क्तं परि॒ सोमो॑ अव्यत॥

जो पुरुष ब्रह्मचारी बनकर शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक तीनों प्रकार के बल अपने में उत्पन्न करता है, वह परमात्मा के सामर्थ्य का पात्र होता है॥४॥

अमृ॑क्तेन॒ रुश॑ता॒ वास॑सा॒ हरि॒रम॑र्त्यो निर्णिजा॒नः परि॑ व्यत। दि॒वस्पृ॒ष्ठं ब॒र्हणा॑ नि॒र्णिजे॑ कृतोप॒स्तर॑णं च॒म्वो॑र्नभ॒स्मय॑म्॥

अजरामरादिभावयुक्त परमात्मा अपने प्रकृतिरूपी बर्हिष् से सब संसार को आच्छादित किये हुए है॥५॥

सूर्य॑स्येव र॒श्मयो॑ द्रावयि॒त्नवो॑ मत्स॒रासः॑ प्र॒सुपः॑ सा॒कमी॑रते। तन्तुं॑ त॒तं परि॒ सर्गा॑स आ॒शवो॒ नेन्द्रा॑दृ॒ते प॑वते॒ धाम॒ किं च॒न॥

उक्तगुणसंपन्न परमात्मा के द्वारा सूर्य की रश्मियों के समान अनन्त प्रकार की सृष्टियें उत्पन्न होती हैं॥६॥

सिन्धो॑रिव प्रव॒णे नि॒म्न आ॒शवो॒ वृष॑च्युता॒ मदा॑सो गा॒तुमा॑शत। शं नो॑ निवे॒शे द्वि॒पदे॒ चतु॑ष्पदे॒ऽस्मे वाजाः॑ सोम तिष्ठन्तु कृ॒ष्टयः॑॥

परमात्मा करुणासिन्धु हैं। जिस प्रकार क्षुद्र नदियाँ समुद्र में मिलकर महासागर हो जाती हैं, इसी प्रकार उक्त परमात्मा को मिलकर उपासक महत्त्व को धारण करता है॥७॥

आ नः॑ पवस्व॒ वसु॑म॒द्धिर॑ण्यव॒दश्वा॑व॒द्गोम॒द्यव॑मत्सु॒वीर्य॑म्। यू॒यं हि सो॑म पि॒तरो॒ मम॒ स्थन॑ दि॒वो मू॒र्धानः॒ प्रस्थि॑ता वय॒स्कृतः॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा से ऐश्वर्य की प्रार्थना की गई है॥८॥

ए॒ते सोमाः॒ पव॑मानास॒ इन्द्रं॒ रथा॑ इव॒ प्र य॑युः सा॒तिमच्छ॑। सु॒ताः प॒वित्र॒मति॑ य॒न्त्यव्यं॑ हि॒त्वी व॒व्रिं ह॒रितो॑ वृ॒ष्टिमच्छ॑॥

इस मन्त्र में शील की प्रार्थना है, जिस शुभ शील से मनुष्य ऐश्वर्यसंपन्न होता है॥९॥

इन्द॒विन्द्रा॑य बृह॒ते प॑वस्व सुमृळी॒को अ॑नव॒द्यो रि॒शादाः॑। भरा॑ च॒न्द्राणि॑ गृण॒ते वसू॑नि दे॒वैर्द्या॑वापृथिवी॒ प्राव॑तं नः॥

इस मन्त्र में कर्मयोगी के लिए ऐश्वर्यप्रदान का वर्णन किया गया है॥१०॥यह ६९ वाँ सूक्त और २२ वाँ वर्ग समाप्त हुआ।

त्रिर॑स्मै स॒प्त धे॒नवो॑ दुदुह्रे स॒त्यामा॒शिरं॑ पू॒र्व्ये व्यो॑मनि। च॒त्वार्य॒न्या भुव॑नानि नि॒र्णिजे॒ चारू॑णि चक्रे॒ यदृ॒तैरव॑र्धत॥

परमात्मा ने प्रकृति उपादान कारण से इस संसार को उत्पन्न किया और वह इस प्रकार की प्रकृति से महत्तत्त्व और महत्तत्त्व से अहंकार और अहंकार से पञ्चतन्मात्र अर्थात् शब्द स्पर्श रूप रस तथा गन्ध इन से पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पाँच कर्मेन्द्रिय एवं पञ्च-भूत अर्थात् पृथिवी जल तेज वायु आकाश और २१ वाँ अहंकार इन २१ प्रकृतियों से परमात्मा ने संसार को उत्पन्न किया। महत्तत्त्व को यहाँ इसलिये नहीं गिना कि वह वैदिक लोगों के मन्तव्य में एक प्रकार की प्रकृति ही है। तात्पर्य यह है कि प्रकृति इस संसार का परिणामी उपादान कारण है। अर्थात् प्रकृति के परिणाम से इस संसार की रचना हुई है और परमात्मा कूटस्थ नित्य है। उसका किसी प्रकार से परिणाम वा परिवर्तन नहीं होता॥१॥

स भिक्ष॑माणो अ॒मृत॑स्य॒ चारु॑ण उ॒भे द्यावा॒ काव्ये॑ना॒ वि श॑श्रथे। तेजि॑ष्ठा अ॒पो मं॒हना॒ परि॑ व्यत॒ यदी॑ दे॒वस्य॒ श्रव॑सा॒ सदो॑ वि॒दुः॥

जो पुरुष परमात्मा के महत्त्व को जानते हैं, वे ही इस जगत् की अद्भुत सत्ता जान सकते हैं, अन्य नहीं॥१॥

ते अ॑स्य सन्तु के॒तवोऽमृ॑त्य॒वोऽदा॑भ्यासो ज॒नुषी॑ उ॒भे अनु॑। येभि॑र्नृ॒म्णा च॑ दे॒व्या॑ च पुन॒त आदिद्राजा॑नं म॒नना॑ अगृभ्णत॥

जो लोग लोक और परलोक को लक्ष्य रखकर शुभ कर्म करते हैं, वे ही परमात्मा के ज्ञानपात्र हो सकते हैं, अन्य नहीं॥३॥

स मृ॒ज्यमा॑नो द॒शभिः॑ सु॒कर्म॑भिः॒ प्र म॑ध्य॒मासु॑ मा॒तृषु॑ प्र॒मे सचा॑। व्र॒तानि॑ पा॒नो अ॒मृत॑स्य॒ चारु॑ण उ॒भे नृ॒चक्षा॒ अनु॑ पश्यते॒ विशौ॑॥

जो पुरुष तपश्चर्यादि कर्मों को करता है, वही पुरुष ज्ञान तथा कर्म के प्रभाव से सर्वत्राभिव्यक्त परमात्मा को ज्ञानदृष्टि से देख सकता है, अन्य नहीं॥४॥

स म॑र्मृजा॒न इ॑न्द्रि॒याय॒ धाय॑स॒ ओभे अ॒न्ता रोद॑सी हर्षते हि॒तः। वृषा॒ शुष्मे॑ण बाधते॒ वि दु॑र्म॒तीरा॒देदि॑शानः शर्य॒हेव॑ शु॒रुधः॑॥

परमात्मा अपने सच्चिदानन्दरूप से सर्वत्रैव परिपूर्ण हो रहा है और वह अपनी दमनरूप शक्ति से दुष्टों को दमन करके सत्पुरुषों का उद्धार करता है॥५॥

स मा॒तरा॒ न ददृ॑शान उ॒स्रियो॒ नान॑ददेति म॒रुता॑मिव स्व॒नः। जा॒नन्नृ॒तं प्र॑थ॒मं यत्स्व॑र्णरं॒ प्रश॑स्तये॒ कम॑वृणीत सु॒क्रतुः॑॥

जो पुरुष ब्रह्मामृतवर्षिणी धेनु के समान परमात्मा को कामधेनु समझकर उसकी उपासना करता है, वह अन्य किसी सुख की अभिलाषा नहीं करता॥६॥

रु॒वति॑ भी॒मो वृ॑ष॒भस्त॑वि॒ष्यया॒ शृङ्गे॒ शिशा॑नो॒ हरि॑णी विचक्ष॒णः। आ योनिं॒ सोमः॒ सुकृ॑तं॒ नि षी॑दति ग॒व्ययी॒ त्वग्भ॑वति नि॒र्णिग॒व्ययी॑॥

परमात्मा जीवरूपी शक्ति और प्रकृतिरूपी शक्ति दोनों का अधिष्ठाता है, वा यों कहो कि उक्त दोनों दीप्तियों को उत्पन्न करके परमात्मा इस ब्रह्माण्ड की रचना करता है॥७॥

शुचिः॑ पुना॒नस्त॒न्व॑मरे॒पस॒मव्ये॒ हरि॒र्न्य॑धाविष्ट॒ सान॑वि। जुष्टो॑ मि॒त्राय॒ वरु॑णाय वा॒यवे॑ त्रि॒धातु॒ मधु॑ क्रियते सु॒कर्म॑भिः॥

जो लोग अपने इन्द्रियसंयम द्वारा वा यज्ञादि कर्मों द्वारा इस शरीर का संस्कार करते हैं, वे मानो इस शरीर को मधुमय बनाते हैं। जैसे कि “महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः” इत्यादि वाक्यों में यह कहा है कि अनुष्ठान से पुरुष इस तनु को ब्राह्मी अर्थात् ब्रह्मा से सम्बन्ध रखनेवाली बना लेता है। इसी भाव का उपदेश इस मन्त्र में किया गया है॥८॥

पव॑स्व सोम दे॒ववी॑तये॒ वृषेन्द्र॑स्य॒ हार्दि॑ सोम॒धान॒मा वि॑श। पु॒रा नो॑ बा॒धाद्दु॑रि॒ताति॑ पारय क्षेत्र॒विद्धि दिश॒ आहा॑ विपृच्छ॒ते॥

परमात्मा जीवों को शुभमार्ग का उपदेश करके आनेवाले दुःखों से पहिले ही बचाता है॥९॥

हि॒तो न सप्ति॑र॒भि वाज॑म॒र्षेन्द्र॑स्येन्दो ज॒ठर॒मा प॑वस्व। ना॒वा न सिन्धु॒मति॑ पर्षि वि॒द्वाञ्छूरो॒ न युध्य॒न्नव॑ नो नि॒दः स्पः॑॥

परमात्मा सूर्य के समान अज्ञानरूप अन्धकार को दूर करके हमारे हृदय में ज्ञानदीप्ति का प्रकाश करता है॥१०॥यह ७० वाँ सूक्त और २४ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ दक्षि॑णा सृज्यते शु॒ष्म्या॒३॒॑सदं॒ वेति॑ द्रु॒हो र॒क्षसः॑ पाति॒ जागृ॑विः। हरि॑रोप॒शं कृ॑णुते॒ नभ॒स्पय॑ उप॒स्तिरे॑ च॒म्वो॒३॒॑र्ब्रह्म॑ नि॒र्णिजे॑॥

परमात्मा ने इस ब्रह्माण्ड को द्रवीभूत अथवा यों कहो कि वाष्परूप परमाणुओं से आच्छादित किया हुआ है, उसी सर्वोपरि उपास्य देव की उपासक लोग अपनी उपासनारूप दक्षिणा से उपासना करें॥१॥

प्र कृ॑ष्टि॒हेव॑ शू॒ष ए॑ति॒ रोरु॑वदसु॒र्यं१॒॑ वर्णं॒ नि रि॑णीते अस्य॒ तम्। जहा॑ति व॒व्रिं पि॒तुरे॑ति निष्कृ॒तमु॑प॒प्रुतं॑ कृणुते नि॒र्णिजं॒ तना॑॥

जो पुरुष परमात्मज्ञान के पात्र हैं, परमात्मा उनको पूर्णज्ञान देकर जरामरणादिभावों से निर्मुक्त करके अमृत बना देता है॥२॥

अद्रि॑भिः सु॒तः प॑वते॒ गभ॑स्त्योर्वृषा॒यते॒ नभ॑सा॒ वेप॑ते म॒ती। स मो॑दते॒ नस॑ते॒ साध॑ते गि॒रा ने॑नि॒क्ते अ॒प्सु यज॑ते॒ परी॑मणि॥

जो परमात्मा के पात्र होते हैं, वे प्रथम स्वयं उद्योगी बनते हैं फिर परमात्मा उनके उद्योग द्वारा उनको शुद्ध करके परमानन्द का भागी बनाता है॥३॥

परि॑ द्यु॒क्षं सह॑सः पर्वता॒वृधं॒ मध्वः॑ सिञ्चन्ति ह॒र्म्यस्य॑ स॒क्षणि॑म्। आ यस्मि॒न्गावः॑ सुहु॒ताद॒ ऊध॑नि मू॒र्धञ्छ्री॒णन्त्य॑ग्रि॒यं वरी॑मभिः॥

परमात्मा उपासक को ज्ञानी तथा विज्ञानी बनाकर उसका उद्धार करता है॥४॥

समी॒ रथं॒ न भु॒रिजो॑रहेषत॒ दश॒ स्वसा॑रो॒ अदि॑तेरु॒पस्थ॒ आ। जिगा॒दुप॑ ज्रयति॒ गोर॑पी॒च्यं॑ प॒दं यद॑स्य म॒तुथा॒ अजी॑जनन्॥

इस मन्त्र में यह बतलाया गया है कि मनुष्य प्राणायाम द्वारा संयमी बनकर उन्नतिशील बने॥५॥

श्ये॒नो न योनिं॒ सद॑नं धि॒या कृ॒तं हि॑र॒ण्यय॑मा॒सदं॑ दे॒व एष॑ति। ए रि॑णन्ति ब॒र्हिषि॑ प्रि॒यं गि॒राश्वो॒ न दे॒वाँ अप्ये॑ति य॒ज्ञियः॑॥

जो लोग परमात्मा का साक्षात्कार करना चाहें, वे अपने हृदय में उसका ध्यान करें॥६॥

परा॒ व्य॑क्तो अरु॒षो दि॒वः क॒विर्वृषा॑ त्रिपृ॒ष्ठो अ॑नविष्ट॒ गा अ॒भि। स॒हस्र॑णीति॒र्यतिः॑ परा॒यती॑ रे॒भो न पू॒र्वीरु॒षसो॒ वि रा॑जति॥

अनादिकाल से परमात्मा अनेक उषःकालों को प्रकाशित करता हुआ सर्वत्र विद्यमान है॥७॥

त्वे॒षं रू॒पं कृ॑णुते॒ वर्णो॑ अस्य॒ स यत्राश॑य॒त्समृ॑ता॒ सेध॑ति स्रि॒धः। अ॒प्सा या॑ति स्व॒धया॒ दैव्यं॒ जनं॒ सं सु॑ष्टु॒ती नस॑ते॒ सं गोअ॑ग्रया॥

इस मन्त्र में इस बात का वर्णन किया गया है कि परमात्मा प्रत्येक रूप से प्रदीप्त करनेवाला है। उसी की सत्ता से सम्पूर्ण पदार्थ स्थिर हैं और स्वयं वह निर्लेप होकर इन सब चीजों में विराजमान है॥८॥

उ॒क्षेव॑ यू॒था प॑रि॒यन्न॑रावी॒दधि॒ त्विषी॑रधित॒ सूर्य॑स्य। दि॒व्यः सु॑प॒र्णोऽव॑ चक्षत॒ क्षां सोमः॒ परि॒ क्रतु॑ना पश्यते॒ जाः॥

परमात्मा अपनी ज्ञानदृष्टि से सम्पूर्ण पदार्थों को देखता है और सूर्यादि लोक-लोकान्तरों का प्रकाशक है॥९॥यह ७१ वाँ सूक्त और २६ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

हरिं॑ मृजन्त्यरु॒षो न यु॑ज्यते॒ सं धे॒नुभिः॑ क॒लशे॒ सोमो॑ अज्यते। उद्वाच॑मी॒रय॑ति हि॒न्वते॑ म॒ती पु॑रुष्टु॒तस्य॒ कति॑ चित्परि॒प्रियः॑॥

जो लोग अपनी इन्द्रियों को संस्कृत बनाते हैं अर्थात् शुद्ध मनवाले होते हैं, परमात्मा अवश्यमेव उनके ध्यान का विषय होता है॥१॥

सा॒कं व॑दन्ति ब॒हवो॑ मनी॒षिण॒ इन्द्र॑स्य॒ सोमं॑ ज॒ठरे॒ यदा॑दु॒हुः। यदी॑ मृ॒जन्ति॒ सुग॑भस्तयो॒ नरः॒ सनी॑ळाभिर्द॒शभिः॒ काम्यं॒ मधु॑॥

जब कर्मयोगी लोग उस परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं, तब सामाजिक बल उत्पन्न होता है अर्थात् बहुत से लोगों की संगति होकर परमात्मा के यश का गान करते हैं॥२॥

अर॑ममाणो॒ अत्ये॑ति॒ गा अ॒भि सूर्य॑स्य प्रि॒यं दु॑हि॒तुस्ति॒रो रव॑म्। अन्व॑स्मै॒ जोष॑मभरद्विनंगृ॒सः सं द्व॒यीभिः॒ स्वसृ॑भिः क्षेति जा॒मिभिः॑॥

जितेन्द्रिय पुरुष के यश को स्तोता लोग गान करते हैं, क्योंकि उनके हाथ में इन्द्रिय-रूपी घोड़ों की रासें रहती हैं। इसी अभिप्राय से उपनिषत् में यह कहा है कि “सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्” वही पुरुष इस संसाररूपी मार्ग को तैर करके विष्णु के परम पद को प्राप्त होता है, अन्य नहीं॥३॥

नृधू॑तो॒ अद्रि॑षुतो ब॒र्हिषि॑ प्रि॒यः पति॒र्गवां॑ प्र॒दिव॒ इन्दु॑ॠ॒त्वियः॑। पुरं॑धिवा॒न्मनु॑षो यज्ञ॒साध॑नः॒ शुचि॑र्धि॒या प॑वते॒ सोम॑ इन्द्र ते॥

जो लोक-लोकान्तरों का अधिपति परमात्मा है, उसको जब मनुष्य ज्ञानदृष्टि से लाभ कर लेता है, तब आनन्दित हो जाता है॥४॥

नृबा॒हुभ्यां॑ चोदि॒तो धार॑या सु॒तो॑ऽनुष्व॒धं प॑वते॒ सोम॑ इन्द्र ते। आप्राः॒ क्रतू॒न्त्सम॑जैरध्व॒रे म॒तीर्वेर्न द्रु॒षच्च॒म्वो॒३॒॑रास॑द॒द्धरिः॑॥

कर्मयोगी उद्योगी पुरुष धर्मयुद्ध में अन्यायकारी शत्रुओं पर विजय पाते हैं और विद्युत् के समान सर्वव्यापक परमात्मा पर भरोसा रखकर इस संसार में अपनी गति करते हैं॥५॥

अं॒शुं दु॑हन्ति स्त॒नय॑न्त॒मक्षि॑तं क॒विं क॒वयो॒ऽपसो॑ मनी॒षिणः॑। समी॒ गावो॑ म॒तयो॑ यन्ति सं॒यत॑ ऋ॒तस्य॒ योना॒ सद॑ने पुन॒र्भुवः॑॥

जो लोग सर्वाधार और सर्वेश्वर परमात्मा के ज्ञान को लाभ करते हैं, वे ही उसके सच्चाई के यज्ञ के ऋत्विक् बन सकते हैं, अन्य नहीं॥६॥

नाभा॑ पृथि॒व्या ध॒रुणो॑ म॒हो दि॒वो॒३॒॑ऽपामू॒र्मौ सिन्धु॑ष्व॒न्तरु॑क्षि॒तः। इन्द्र॑स्य॒ वज्रो॑ वृष॒भो वि॒भूव॑सुः॒ सोमो॑ हृ॒दे प॑वते॒ चारु॑ मत्स॒रः॥

जो लोग उक्त गुण से विशिष्ट परमात्मा का उपासन करते हैं और उसमें अटल विश्वास रखते हैं, परमात्मा उनको अवश्यमेव पवित्र करता है और जो हतविश्वास होकर ईश्वर के नियम का उल्लङ्घन करते हैं, परमात्मा उनके मद को चूर्ण करने के लिये वज्र के समान उद्यत रहता है॥७॥

स तू प॑वस्व॒ परि॒ पार्थि॑वं॒ रजः॑ स्तो॒त्रे शिक्ष॑न्नाधून्व॒ते च॑ सुक्रतो। मा नो॒ निर्भा॒ग्वसु॑नः सादन॒स्पृशो॑ र॒यिं पि॒शङ्गं॑ बहु॒लं व॑सीमहि॥

हे परमात्मन्! आपकी कृपा से हम लोग पृथिवी तथा अन्तरिक्षलोक के चारों ओर परिभ्रमण करें और नाना प्रकार के धनों को प्राप्त करें॥८॥

आ तू न॑ इन्दो श॒तदा॒त्वश्व्यं॑ स॒हस्र॑दातु पशु॒मद्धिर॑ण्यवत्। उप॑ मास्व बृह॒ती रे॒वती॒रिषोऽधि॑ स्तो॒त्रस्य॑ पवमान नो गहि॥

जो पुरुष अपने कर्मयोग और उद्योग के अनन्तर अपने कर्मों को ईश्वरार्पण कर देता है अर्थात् निष्काम भाव से कर्मों को करता है, परमात्मा अवश्यमेव उसका उद्धार करता है॥९॥यह ७२ वाँ सूक्त और २८ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

स्रक्वे॑ द्र॒प्सस्य॒ धम॑तः॒ सम॑स्वरन्नृ॒तस्य॒ योना॒ सम॑रन्त॒ नाभ॑यः। त्रीन्त्स मू॒र्ध्नो असु॑रश्चक्र आ॒रभे॑ स॒त्यस्य॒ नावः॑ सु॒कृत॑मपीपरन्॥

इस मन्त्र में असुरों के तीन लोकों का वर्णन किया है और वे तीन लोक काम, कोध और लोभ हैं। इसी अभिप्राय से गीता में यह कहा है कि “त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥” और इनसे विपरीत कर्मयोगियों को यज्ञ की नाभि और यज्ञ का मुखरूप वर्णन किया है॥१॥

स॒म्यक्स॒म्यञ्चो॑ महि॒षा अ॑हेषत॒ सिन्धो॑रू॒र्मावधि॑ वे॒ना अ॑वीविपन्। मधो॒र्धारा॑भिर्ज॒नय॑न्तो अ॒र्कमित्प्रि॒यामिन्द्र॑स्य त॒न्व॑मवीवृधन्॥

जो लोग परमात्मा के महत्त्व को धारण करके महान् पुरुष बनते हैं, वे इस भवसागर की लहरों से पार हो जाते हैं और परमात्मा के यश को गान करके अन्य लोगों को भी अभ्युदयशाली बनाकर इस भवसागर की धार से पार कर देते हैं॥२॥

प॒वित्र॑वन्तः॒ परि॒ वाच॑मासते पि॒तैषां॑ प्र॒त्नो अ॒भि र॑क्षति व्र॒तम्। म॒हः स॑मु॒द्रं वरु॑णस्ति॒रो द॑धे॒ धीरा॒ इच्छे॑कुर्ध॒रुणे॑ष्वा॒रभ॑म्॥

परमात्मा उपदेश करता है कि पवित्र कर्मोंवाले पुरुष वाग्मी बनते हैं और वे ही इस भवसागर की लहरों से पार हो सकते हैं, अन्य नहीं। इसी अभिप्राय से उपनिषत् में यह कहा है कि “कश्चिद्धीर आत्मानमैक्षत्” यह संसार छुरे की धार है, कोई धीर पुरुष ही इस धार का अतिक्रमण कर सकता है, अन्य नहीं। भवसागर की लहरें और छुरे की धार यह एक अत्यन्त उत्तेजना उत्पन्न करने के लिये वाणी का अलङ्कार है॥३॥

स॒हस्र॑धा॒रेऽव॒ ते सम॑स्वरन्दि॒वो नाके॒ मधु॑जिह्वा अस॒श्चतः॑। अस्य॒ स्पशो॒ न नि मि॑षन्ति॒ भूर्ण॑यः प॒देप॑दे पा॒शिनः॑ सन्ति॒ सेत॑वः॥

परमात्मा के आनन्द की सहस्त्रों धाराएँ इस संसार में इतस्ततः सर्वत्र बह रही हैं। जो पुरुष परमात्मा की आज्ञाओं का पालन करता है, वही उन आनन्दों को प्राप्त करता है, अन्य नहीं॥४॥

पि॒तुर्मा॒तुरध्या ये स॒मस्व॑रन्नृ॒चा शोच॑न्तः सं॒दह॑न्तो अव्र॒तान्। इन्द्र॑द्विष्टा॒मप॑ धमन्ति मा॒यया॒ त्वच॒मसि॑क्नीं॒ भूम॑नो दि॒वस्परि॑॥

मनुष्य इस संसार में चार प्रकार से शिक्षा को प्राप्त करता है। वे चार प्रकार ये हैं कि माता, पिता, आचार्य और गुरु। इसी अभिप्राय से उपनिषत् में कहा है कि “मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् पुरुषो वेद”॥५॥

प्र॒त्नान्माना॒दध्या ये स॒मस्व॑र॒ञ्छ्लोक॑यन्त्रासो रभ॒सस्य॒ मन्त॑वः। अपा॑न॒क्षासो॑ बधि॒रा अ॑हासत ऋ॒तस्य॒ पन्थां॒ न त॑रन्ति दु॒ष्कृतः॑॥

जो लोग आप्त-पुरुषों के वाक्यों पर विश्वास करते हैं और सामाजिक बल को धारण करते हैं, परमात्मा उनकी सदैव रक्षा करता है॥६॥

स॒हस्र॑धारे॒ वित॑ते प॒वित्र॒ आ वाचं॑ पुनन्ति क॒वयो॑ मनी॒षिणः॑। रु॒द्रास॑ एषामिषि॒रासो॑ अ॒द्रुहः॒ स्पशः॒ स्वञ्चः॑ सु॒दृशो॑ नृ॒चक्ष॑सः॥

जो लोग परमात्मा के स्वरूप में चितवृत्ति को लगाकर अपने आपको पवित्र करते हैं, वे ही कर्मयोगी और ज्ञानयोगी बन सकते हैं, अन्य नहीं  ॥७॥

ऋ॒तस्य॑ गो॒पा न दभा॑य सु॒क्रतु॒स्त्री ष प॒वित्रा॑ हृ॒द्य१॒॑न्तरा द॑धे। वि॒द्वान्त्स विश्वा॒ भुव॑ना॒भि प॑श्य॒त्यवाजु॑ष्टान्विध्यति क॒र्ते अ॑व्र॒तान्॥

जो लोग परमात्मा पर अटल विश्वास रखनेवाले हैं, वे किसी से दबाये नहीं जा सकते हैं॥८॥

ऋ॒तस्य॒ तन्तु॒र्वित॑तः प॒वित्र॒ आ जि॒ह्वाया॒ अग्रे॒ वरु॑णस्य मा॒यया॑। धीरा॑श्चि॒त्तत्स॒मिन॑क्षन्त आश॒तात्रा॑ क॒र्तमव॑ पदा॒त्यप्र॑भुः॥

जो कर्मयोगी और उद्योगी पुरुष है, उन्हीं के अन्तःकरण में परमात्मा निवास करता है॥९॥यह ७३ वाँ सूक्त और ३० वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

शिशु॒र्न जा॒तोऽव॑ चक्रद॒द्वने॒ स्व१॒॑र्यद्वा॒ज्य॑रु॒षः सिषा॑सति। दि॒वो रेत॑सा सचते पयो॒वृधा॒ तमी॑महे सुम॒ती शर्म॑ स॒प्रथः॑॥

जब पुरुष दूध पीनेवाले बच्चे के समान मुक्तकण्ठ से परमात्मा के आगे रोता है, तब परमात्मा उसे अवश्यमेव ऐश्वर्य देता है॥१॥

दि॒वो यः स्क॒म्भो ध॒रुणः॒ स्वा॑तत॒ आपू॑र्णो अं॒शुः प॒र्येति॑ वि॒श्वतः॑। सेमे म॒ही रोद॑सी यक्षदा॒वृता॑ समीची॒ने दा॑धार॒ समिषः॑ क॒विः॥

जिस परमात्मा ने द्युलोक और पृथिवीलोकादिकों को लीलामात्र से धारण किया है, वही सब ऐश्वर्यों का दाता है, अन्य नहीं॥२॥

महि॒ प्सरः॒ सुकृ॑तं सो॒म्यं मधू॒र्वी गव्यू॑ति॒रदि॑तेॠ॒तं य॒ते। ईशे॒ यो वृ॒ष्टेरि॒त उ॒स्रियो॒ वृषा॒पां ने॒ता य इ॒तऊ॑तिॠ॒ग्मियः॑॥

सन्मार्ग चाहनेवाले पुरुषों को उचित है कि वे सच्चाई का यज्ञ करने के लिये परमात्मा की शरण लें॥३॥

आ॒त्म॒न्वन्नभो॑ दुह्यते घृ॒तं पय॑ ऋ॒तस्य॒ नाभि॑र॒मृतं॒ वि जा॑यते। स॒मी॒ची॒नाः सु॒दान॑वः प्रीणन्ति॒ तं नरो॑ हि॒तमव॑ मेहन्ति॒ पेर॑वः॥

जो पुरुष परमात्मा की आज्ञाओं का पालन करते हैं, परमात्मा उनके लिये अपनी दानशील शक्तियों से अनन्त प्रकार के ऐश्वर्यों की वृष्टि करता है॥४॥

अरा॑वीदं॒शुः सच॑मान ऊ॒र्मिणा॑ देवा॒व्यं१॒॑ मनु॑षे पिन्वति॒ त्वच॑म्। दधा॑ति॒ गर्भ॒मदि॑तेरु॒पस्थ॒ आ येन॑ तो॒कं च॒ तन॑यं च॒ धाम॑हे॥

परमात्मा की कृपा से ही सुकर्मा पुरुष को नीरोग और दिव्य शरीर मिलता है, जिससे वह सत्सन्तति को प्राप्त होकर इस संसार में अभ्युदयशाली बनता है॥५॥

स॒हस्र॑धा॒रेऽव॒ ता अ॑स॒श्चत॑स्तृ॒तीये॑ सन्तु॒ रज॑सि प्र॒जाव॑तीः। चत॑स्रो॒ नाभो॒ निहि॑ता अ॒वो दि॒वो ह॒विर्भ॑रन्त्य॒मृतं॑ घृत॒श्चुतः॑॥

परमात्मा जिन पर प्रसन्न होता है, उनको चारों प्रकार के फलों का प्रदान करता है॥६॥

श्वे॒तं रू॒पं कृ॑णुते॒ यत्सिषा॑सति॒ सोमो॑ मी॒ढ्वाँ असु॑रो वेद॒ भूम॑नः। धि॒या शमी॑ सचते॒ सेम॒भि प्र॒वद्दि॒वस्कव॑न्ध॒मव॑ दर्षदु॒द्रिण॑म्॥

जो लोग अनन्य भक्ति द्वारा परमात्मपरायण होते हैं, परमात्मा उनको अवश्यमेव तेजस्वी बनाता है और जो दुष्कर्मी बनकर अन्याय करते हैं, परमात्मा उनको अवश्यमेव दण्ड देता है॥७॥

अध॑ श्वे॒तं क॒लशं॒ गोभि॑र॒क्तं कार्ष्म॒न्ना वा॒ज्य॑क्रमीत्सस॒वान्। आ हि॑न्विरे॒ मन॑सा देव॒यन्तः॑ क॒क्षीव॑ते श॒तहि॑माय॒ गोना॑म्॥

जो पुरुष शुद्धि की पराकाष्ठा को पहुँच जाता है, परमात्मा उस पर अवश्यमेव दया करता है॥८॥

अ॒द्भिः सो॑म पपृचा॒नस्य॑ ते॒ रसोऽव्यो॒ वारं॒ वि प॑वमान धावति। स मृ॒ज्यमा॑नः क॒विभि॑र्मदिन्तम॒ स्वद॒स्वेन्द्रा॑य पवमान पी॒तये॑॥

जो लोग कर्मयोग से अपने को पवित्र बनाते हैं, उनके लिये परमात्मा अवश्यमेव अपने ब्रह्मामृत का प्रदान करते हैं॥९॥यह ७४ वाँ सूक्त और ३२ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒भि प्रि॒याणि॑ पवते॒ चनो॑हितो॒ नामा॑नि य॒ह्वो अधि॒ येषु॒ वर्ध॑ते। आ सूर्य॑स्य बृह॒तो बृ॒हन्नधि॒ रथं॒ विष्व॑ञ्चमरुहद्विचक्ष॒णः॥

इस निखिल ब्रह्माण्ड का निर्माता परमात्मा सूर्यादि सब लोक-लोकान्तरों का प्रकाशक है। इसी अभिप्राय से कहा है कि “न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः” अर्थात् परमेश्वर का प्रकाशक कोई नहीं, वही सबका प्रकाशक है॥१॥

ऋ॒तस्य॑ जि॒ह्वा प॑वते॒ मधु॑ प्रि॒यं व॒क्ता पति॑र्धि॒यो अ॒स्या अदा॑भ्यः। दधा॑ति पु॒त्रः पि॒त्रोर॑पी॒च्यं१॒॑ नाम॑ तृ॒तीय॒मधि॑ रोच॒ने दि॒वः॥

जीव के शुभाशुभ सब कर्मों का अधिपति परमात्मा है। उसी प्रकाशस्वरूप परमात्मा से सब द्युभ्वादि लोक-लोकान्तरों का प्रकाश होता है॥२॥

अव॑ द्युता॒नः क॒लशाँ॑ अचिक्रद॒न्नृभि॑र्येमा॒नः कोश॒ आ हि॑र॒ण्यये॑। अ॒भीमृ॒तस्य॑ दो॒हना॑ अनूष॒ताधि॑ त्रिपृ॒ष्ठ उ॒षसो॒ वि रा॑जति॥

परमात्मा उषा के प्रकाशित सूर्यादिकों का भी प्रकाशक है और वह पुण्यात्माओं के स्वच्छ अन्तःकरण को हिरण्मय पात्र के समान प्रदीप्त करता है अर्थात् जो पुरुष परमात्मपरायण होना चाहे, वह पहिले अपने अन्तःकरण को स्वच्छ बनाये॥३॥

अद्रि॑भिः सु॒तो म॒तिभि॒श्चनो॑हितः प्ररो॒चय॒न्रोद॑सी मा॒तरा॒ शुचिः॑। रोमा॒ण्यव्या॑ स॒मया॒ वि धा॑वति॒ मधो॒र्धारा॒ पिन्व॑माना दि॒वेदि॑वे॥

द्युलोक और पृथिव्यादि लोक-लोकान्तरों का प्रकाशक परमात्मा अपनी सुधामयी-वृष्टि से सदैव पवित्र करता है॥४॥

परि॑ सोम॒ प्र ध॑न्वा स्व॒स्तये॒ नृभिः॑ पुना॒नो अ॒भि वा॑सया॒शिर॑म्। ये ते॒ मदा॑ आह॒नसो॒ विहा॑यस॒स्तेभि॒रिन्द्रं॑ चोदय॒ दात॑वे म॒घम्॥

जो लोग एकमात्र परमात्मा का आश्रयण करते हैं, परमात्मा उनकी सर्वथा रक्षा करते हैं, क्योंकि सर्वनियन्ता और सबका अधिष्ठाता एकमात्र वही है। जैसा कि हम पूर्व भी अनेक स्थलों में लिख आये हैं कि “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद्विजिज्ञासस्व तद् ब्रह्म” तै० ३। १॥“सर्वाणि वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो वा एभ्यो ज्यानाकाशः परायणम्” छा० ६। १४। १॥“आत्मैवेदं सर्वम्” छा० ७। २५। २॥“पुरुष एवेदं सर्वम्” ऋ० ८। ४। १७। १॥“स एव जातः स जनिष्यमाणः” यजु० ३२। ४॥“नित्यो नित्यानाम्” कठ० ५। १३॥“नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मम्” मु० १। १। ६॥“सत्यं हैव ब्रह्म” बृ० ५। ४। १॥“ब्रह्मवादिनो हि प्रवदन्ति नित्यम्” श्वे० ३। २१॥“यो विश्वस्य जगतः प्राणतस्पतिः” ऋ० १। ७। १२। ५॥“यः प्राणतो निमिषतो माहित्वैक इद्राजा जगतो बभूव” ऋ० ८। ७। ३। ३॥“यो भूतं च भव्यं च सर्वं यश्चाधितिष्ठति” अथ० १०। ८। ४। १॥“ब्रह्म गामश्वं जनयन्त ओषधीर्वनस्पतीन् पृथिवीं पर्वताँ अपः। सूर्यं दिवि रोहयन्तः सुदानव आर्या व्रताः विसृजन्तो अधिक्षमि”॥इत्यादि वेदोपनिषदों के वचनों से प्रसिद्ध है कि परमात्मा ही सबका अधिष्ठान है। अधिष्ठान, अधिकरण, आश्रय ये एक ही वस्तु के नाम हैं। उसी परमात्मा ने इस चराचरात्मक संसार को उत्पन्न किया है, जिसको कोई आश्चर्यरूप से देख रहा है, कोई आश्चर्यरूप से सुन रहा है और कोई इस गूढ तत्त्व को न समझकर अज्ञानावस्था में पड़ा हुआ है। पर इसमें कोई सन्देह नहीं कि इसके कर्तृत्व का कोई तिरस्कार नहीं कर सकता। अर्थात् नास्तिक से नास्तिक भी जब इस बात का विचार करता है कि इस विविध रचनासंयुक्त विश्व को किसने उत्पन्न किया, तो उसकी दृष्टि भी किसी अद्भुत शक्ति पर ही ठहरती है। अस्तु–ये विचार तो उन लोगों के हैं, जो ब्रह्म को तर्कगम्य मानते हैं और जिन आस्तिक लोगों के विचार में ब्रह्म शब्दगम्य है, उनके लिये प्रमाणान्तर की आवश्यकता नहीं। इसीलिये हमने ऋ. मं. १०। सू. ६५। मं. ११ में यह स्पष्ट कर दिया कि ब्रह्म ने इस संसार को पहिले सूक्ष्मावस्था में बनाया और फिर स्थूलावस्था में मेघाकार, फिर पृथिवी, वनस्पति, ओषधि और फिर गवाश्वादिरूप से इस संसार की सृष्टि की॥कई एक लोग उक्त मन्त्र के ये अर्थ करते हैं कि “दिवि रोहयन्तः” द्युलोक में आरोहण करते हुए और सूर्यलोक को आरोहण करते हुए “सुदानवः” दानशील लोग ब्रह्म=अन्न, गो, अश्वादि सृष्टि को (जनयन्तः) पैदा करते भये। इस अर्थ को न केवल सायणाचार्य ने किया है, किन्तु विलसन ग्रिफिथ  इत्यादि यूरोपियन विद्वानों ने भी यही अर्थ किये हैं और वे लोग हेतु यह देते हैं कि “जनयन्तः” यह बहुवचन उक्त देवों में घट सकता है, ब्रह्म में नहीं। यदि उनसे यह पूछा जाय कि “आर्या व्रता विसृजन्त” इस वाक्य में “व्रता” का “व्रतानि” कैसे बना लिया और “आर्या” का “श्रेष्ठानि” कैसे बना लिया, तो उत्तर यही मिलेगा कि वेद में इस लौकिक व्याकरण का बल नहीं चलता। यदि इसी प्रकार लौकिक व्याकरण का त्याग करना है, तो “ब्रह्म” को कर्ता रखकर यह अर्थ क्यों न किया जाय कि ब्रह्म ने सम्पूर्ण पृथिवी-पर्वतादि पदार्थों को उत्पन्न किया। इस उदाहरण से हमारा तात्पर्य व्याकरण की लघुता करने का नहीं, किन्तु जो लोग व्याकरण का अन्यथा उपयोग करके वेदार्थ को बिगाड़ते हैं, उनकी भूल दूर करने का है। इसी प्रकार मं. १ सू० २४ मं ८। में “पन्थानं” के स्थान में वेद में “पन्थां” पाठ है और “सूर्यस्य” के स्थान में “सूर्याय” है। इसी प्रकार अनेक स्थलों में “विप्रेभिः” “प्रचैः” “रथीः” इत्यादि अनेक प्रयोग ऐसे पाए जाते हैं, जो अज्ञों के गर्व को भञ्जन करके वैदिक साहित्य के गर्व को स्थिर करते हैं। अस्तु–मुख्य प्रसङ्ग यह है कि “आशिरम्” हमारे आध्यात्मिक लक्ष्य की पूर्ति करनेवाला परमात्मा हममें कर्मयोगियों को उत्पन्न करके हमको कर्मयोगी तथा उद्योगी बनाये ॥५॥यह श्रीमद् आर्यमुनि के द्वारा उपनिबद्ध ऋक्संहिताभाष्य के सातवें अष्टक में द्वितीय अध्याय समाप्त हुआ॥

ध॒र्ता दि॒वः प॑वते॒ कृत्व्यो॒ रसो॒ दक्षो॑ दे॒वाना॑मनु॒माद्यो॒ नृभिः॑। हरिः॑ सृजा॒नो अत्यो॒ न सत्व॑भि॒र्वृथा॒ पाजां॑सि कृणुते न॒दीष्वा॥

प्रत्येक प्राकृत पदार्थ में परमात्मा की सत्ता विद्यमान है और वही द्युलोकादि का अधिकरण है॥१॥

शूरो॒ न ध॑त्त॒ आयु॑धा॒ गभ॑स्त्योः॒ स्वः१॒॑ सिषा॑सन्रथि॒रो गवि॑ष्टिषु। इन्द्र॑स्य॒ शुष्म॑मी॒रय॑न्नप॒स्युभि॒रिन्दु॑र्हिन्वा॒नो अ॑ज्यते मनी॒षिभिः॑॥

परमात्मा कर्मों के फल देने के अभिप्राय से सर्वत्र सृष्टि में अपनी न्यायरूपी शक्ति से सम्पूर्ण प्रजा में विराजमान होकर कर्मों के यथायोग्य फल देता है॥२॥

इन्द्र॑स्य सोम॒ पव॑मान ऊ॒र्मिणा॑ तवि॒ष्यमा॑णो ज॒ठरे॒ष्वा वि॑श। प्र णः॑ पिन्व वि॒द्युद॒भ्रेव॒ रोद॑सी धि॒या न वाजाँ॒ उप॑ मासि॒ शश्व॑तः॥

परमात्मा सत्कर्मों द्वारा मनुष्यों को इस प्रकार प्रदीप्त करता है, जिस प्रकार बिजली मेघमण्डलों और द्यु तथा पृथिवीलोक को प्रदीप्त करती है, इसलिये उसकी ज्ञानरूपी दीप्ति का लाभ करने के लिये सदैव उद्यत रहना चाहिये॥३॥

विश्व॑स्य॒ राजा॑ पवते स्व॒र्दृश॑ ऋ॒तस्य॑ धी॒तिमृ॑षि॒षाळ॑वीवशत्। यः सूर्य॒स्यासि॑रेण मृ॒ज्यते॑ पि॒ता म॑ती॒नामस॑मष्टकाव्यः॥

परमात्मा सब ज्ञानों का केन्द्र है और उसको कोई ज्ञानविषय नहीं कर सकता, इसलिये वह अतीन्द्रिय है अर्थात् “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” उसको वाणी और मन दोनों ही विषय नहीं कर सकते। अर्थात् वह वाणी का लक्ष्यार्थ है, वाच्यार्थ नहीं॥४॥

वृषे॑व यू॒था परि॒ कोश॑मर्षस्य॒पामु॒पस्थे॑ वृष॒भः कनि॑क्रदत्। स इन्द्रा॑य पवसे मत्स॒रिन्त॑मो॒ यथा॒ जेषा॑म समि॒थे त्वोत॑यः॥

परमात्मा हमारे ज्ञान-विज्ञानादि कोशों की रक्षा करनेवाला है और वह उद्योगी और कर्मयोगियों को सदैव पवित्र करता है। यह ७६ वाँ सूक्त और पहिला वर्ग समाप्त हुआ॥

ए॒ष प्र कोशे॒ मधु॑माँ अचिक्रद॒दिन्द्र॑स्य॒ वज्रो॒ वपु॑षो॒ वपु॑ष्टरः। अ॒भीमृ॒तस्य॑ सु॒दुघा॑ घृत॒श्चुतो॑ वा॒श्रा अ॑र्षन्ति॒ पय॑सेव धे॒नवः॑॥

सब सच्चाइयों का आश्रय एकमात्र वाणी है। जो पुरुष वाणी को मीठा और सब कामनाओं की दोहन करनेवाली बनाते हैं, वे इस संसार में सदैव सुखलाभ करते हैं॥१॥

स पू॒र्व्यः प॑वते॒ यं दि॒वस्परि॑ श्ये॒नो म॑था॒यदि॑षि॒तस्ति॒रो रजः॑। स मध्व॒ आ यु॑वते॒ वेवि॑जान॒ इत्कृ॒शानो॒रस्तु॒र्मन॒साह॑ बि॒भ्युषा॑॥

परमात्मा प्रकृति के रजोरूप परमाणुओं का संयोग करके इस सृष्टि को उत्पन्न करता है॥२॥

ते नः॒ पूर्वा॑स॒ उप॑रास॒ इन्द॑वो म॒हे वाजा॑य धन्वन्तु॒ गोम॑ते। ई॒क्षे॒ण्या॑सो अ॒ह्यो॒३॒॑ न चार॑वो॒ ब्रह्म॑ब्रह्म॒ ये जु॑जु॒षुर्ह॒विर्ह॑विः॥

प्राचीन और अर्वाचीन अर्थात् पुराने और नये दोनों प्रकार के विद्वान् जो वेद को ईश्वर प्राप्ति के लिये पढ़ते हैं और हवनादि यज्ञों को कर्म्मकाण्ड के लिये करते हैं, वे इस संसार में दर्शनीय और सदाचार फैलाने के हेतु होते हैं, अन्य नहीं॥३॥

अ॒यं नो॑ वि॒द्वान्व॑नवद्वनुष्य॒त इन्दुः॑ स॒त्राचा॒ मन॑सा पुरुष्टु॒तः। इ॒नस्य॒ यः सद॑ने॒ गर्भ॑माद॒धे गवा॑मुरु॒ब्जम॒भ्यर्ष॑ति व्र॒जम्॥

जो विद्वान् इश्वरीयज्ञान पर विश्वास करता है, वह मनुष्यजन्म के फल को प्राप्त करता है॥४॥

चक्रि॑र्दि॒वः प॑वते॒ कृत्व्यो॒ रसो॑ म॒हाँ अद॑ब्धो॒ वरु॑णो हु॒रुग्य॒ते। असा॑वि मि॒त्रो वृ॒जने॑षु य॒ज्ञियोऽत्यो॒ न यू॒थे वृ॑ष॒युः कनि॑क्रदत्॥

जो विद्वान् धीर, वीर, दृढव्रती और अपने विद्याप्रभाव से कुटिल वा मायावी पुरुषों को दबाने की शक्ति रखता है। वह इस मनुष्यसमाज में वृषभ के समान गर्जता हुआ अपने सदाचारी समाज की रक्षा करता है॥५॥यह ७७ वाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र राजा॒ वाचं॑ ज॒नय॑न्नसिष्यदद॒पो वसा॑नो अ॒भि गा इ॑यक्षति। गृ॒भ्णाति॑ रि॒प्रमवि॑रस्य॒ तान्वा॑ शु॒द्धो दे॒वाना॒मुप॑ याति निष्कृ॒तम्॥

जो पुरुष परमात्मा के जगत्कर्तृत्व में विश्वास करता है, वह उसकी उपासना द्वारा शुद्ध होकर देवपद को प्राप्त होता है॥१॥

इन्द्रा॑य सोम॒ परि॑ षिच्यसे॒ नृभि॑र्नृ॒चक्षा॑ ऊ॒र्मिः क॒विर॑ज्यसे॒ वने॑। पू॒र्वीर्हि ते॑ स्रु॒तयः॒ सन्ति॒ यात॑वे स॒हस्र॒मश्वा॒ हर॑यश्चमू॒षदः॑॥

जो लोग परमात्मा की भक्ति में विश्वास करते हैं, परमात्मा उनके बल को अवश्यमेव बढ़ाता है अर्थात् उत्पत्ति स्थिति और संहाररूप परमात्मा की शक्तियें कर्मयोगियों की आज्ञापालन करने के लिये उपस्थित होती हैं॥२॥

स॒मु॒द्रिया॑ अप्स॒रसो॑ मनी॒षिण॒मासी॑ना अ॒न्तर॒भि सोम॑मक्षरन्। ता ईं॑ हिन्वन्ति ह॒र्म्यस्य॑ स॒क्षणिं॒ याच॑न्ते सु॒म्नं पव॑मान॒मक्षि॑तम्॥

विद्युदादि अनन्त शक्तियें अन्तरिक्ष में स्थिर हैं, उनकी याचना न करके लोग अनन्त शक्तिमद् ब्रह्म से अक्षय पद की याचना करते हैं॥३॥

गो॒जिन्नः॒ सोमो॑ रथ॒जिद्धि॑रण्य॒जित्स्व॒र्जिद॒ब्जित्प॑वते सहस्र॒जित्। यं दे॒वास॑श्चक्रि॒रे पी॒तये॒ मदं॒ स्वादि॑ष्ठं द्र॒प्सम॑रु॒णं म॑यो॒भुव॑म्॥

परमात्मा के आगे इस संसार की सब शक्तियें तुच्छ हैं अर्थात् वह सर्वविजयी है। उसी से विद्वान् लोग नित्य सुख की प्रार्थना करते हैं॥४॥

ए॒तानि॑ सोम॒ पव॑मानो अस्म॒युः स॒त्यानि॑ कृ॒ण्वन्द्रवि॑णान्यर्षसि। ज॒हि शत्रु॑मन्ति॒के दू॑र॒के च॒ य उ॒र्वीं गव्यू॑ति॒मभ॑यं च नस्कृधि॥

शत्रु से तात्पर्य यहाँ अन्यायकारी मनुष्यों का है। वे मनुष्य दूरवर्ती वा निकटवर्ती हों, उन सबके नाश की प्रार्थना इस मन्त्र में परमात्मा से की गयी है॥५॥यह ७८ वाँ सूक्त और तीसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

अ॒चो॒दसो॑ नो धन्व॒न्त्विन्द॑वः॒ प्र सु॑वा॒नासो॑ बृ॒हद्दि॑वेषु॒ हर॑यः। वि च॒ नश॑न्न इ॒षो अरा॑तयो॒ऽर्यो न॑शन्त॒ सनि॑षन्त नो॒ धियः॑॥

जो लोग परमात्मपरायण होकर अपने कर्म्मों का शुभ रीति से अनुष्ठान करते हैं, परमात्मा उनकी सदैव रक्षा करते हैं अर्थात् वे लोग आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक तीनों प्रकार के यज्ञों से अपनी तथा अपने समाज की उन्नति करते हैं॥१॥

प्र णो॑ धन्व॒न्त्विन्द॑वो मद॒च्युतो॒ धना॑ वा॒ येभि॒रर्व॑तो जुनी॒मसि॑। ति॒रो मर्त॑स्य॒ कस्य॑ चि॒त्परि॑ह्वृतिं व॒यं धना॑नि वि॒श्वधा॑ भरेमहि॥

मनुष्य को परमात्मा से सदैव इस प्रकार के बल की याचना करनी चाहिये कि वह किसी मनुष्य को अन्याय से पीड़ा देकर धन का संग्रह न करे, किन्तु यदि धनसंग्रह की इच्छा हो, तो वह अपने शत्रुओं को पराजय करके धन का लाभ करे॥२॥

उ॒त स्वस्या॒ अरा॑त्या अ॒रिर्हि ष उ॒तान्यस्या॒ अरा॑त्या॒ वृको॒ हि षः। धन्व॒न्न तृष्णा॒ सम॑रीत॒ ताँ अ॒भि सोम॑ ज॒हि प॑वमान दुरा॒ध्यः॑॥

हे परमात्मन्! आप जो दुराराध्य शत्रु हैं अर्थात् दुःख से वशीभूत होनेवाले हैं, उनका हनन करें। शत्रु से तात्पर्य कामरूप शत्रु का भी है। इसी अभिप्राय से गीता में कृष्ण जी ने कहा है कि “पाप्मानं प्रजह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्” ज्ञान और विज्ञान को नाश करनेवाले इस पापी काम का नाश करो॥३॥

दि॒वि ते॒ नाभा॑ पर॒मो य आ॑द॒दे पृ॑थि॒व्यास्ते॑ रुरुहुः॒ सान॑वि॒ क्षिपः॑। अद्र॑यस्त्वा बप्सति॒ गोरधि॑ त्व॒च्य१॒॑प्सु त्वा॒ हस्तै॑र्दुदुहुर्मनी॒षिणः॑॥

जो लोग चित्तवृत्तिनिरोध द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं, वे परमात्मा की विभूति में सर्वोपरि होकर विराजमान होते हैं॥४॥

ए॒वा त॑ इन्दो सु॒भ्वं॑ सु॒पेश॑सं॒ रसं॑ तुञ्जन्ति प्रथ॒मा अ॑भि॒श्रियः॑। निदं॑निदं पवमान॒ नि ता॑रिष आ॒विस्ते॒ शुष्मो॑ भवतु प्रि॒यो मदः॑॥

परमात्मा का आनन्द परमात्मयोगियों के लिये सदैव आह्लादक है और दुराचारी दुष्टों के लिये परमात्मा का बल नाश का हेतु है, इसलिये परमात्मपरायण पुरुषों को चाहिये कि वे सदैव परमात्मा के नियमों के पालन में तत्पर रहें॥५॥यह ७९ वाँ सूक्त और ४ वाँ वर्ग समाप्त हुआ।

सोम॑स्य॒ धारा॑ पवते नृ॒चक्ष॑स ऋ॒तेन॑ दे॒वान्ह॑वते दि॒वस्परि॑। बृह॒स्पते॑ र॒वथे॑ना॒ वि दि॑द्युते समु॒द्रासो॒ न सव॑नानि विव्यचुः॥

मनुष्य को चाहिये कि प्रथम शब्दब्रह्म का ज्ञाता बने, फिर मुख्य ब्रह्म का ज्ञाता बनकर लोगों को सदुपदेश दे॥१॥

यं त्वा॑ वाजिन्न॒घ्न्या अ॒भ्यनू॑ष॒तायो॑हतं॒ योनि॒मा रो॑हसि द्यु॒मान्। म॒घोना॒मायुः॑ प्रति॒रन्महि॒ श्रव॒ इन्द्रा॑य सोम पवसे॒ वृषा॒ मदः॑॥

परमात्मा इस हिरण्यमय प्रकृति-रूपी ज्योति का अधिकरण है। वा यों कहो कि इस हिरण्यमय प्रकृति ने उसके स्वरूप को आच्छादन किया है। इसी अभिप्राय से उपनिषद् में कहा है कि ‘हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्’ हिरण्यमय पात्र से परमात्मा का स्वरूप ढका हुआ है॥२॥

एन्द्र॑स्य कु॒क्षा प॑वते म॒दिन्त॑म॒ ऊर्जं॒ वसा॑नः॒ श्रव॑से सुम॒ङ्गलः॑। प्र॒त्यङ्स विश्वा॒ भुव॑ना॒भि प॑प्रथे॒ क्रीळ॒न्हरि॒रत्यः॑ स्यन्दते॒ वृषा॑॥

तं त्वा॑ दे॒वेभ्यो॒ मधु॑मत्तमं॒ नरः॑ स॒हस्र॑धारं दुहते॒ दश॒ क्षिपः॑। नृभिः॑ सोम॒ प्रच्यु॑तो॒ ग्राव॑भिः सु॒तो विश्वा॑न्दे॒वाँ आ प॑वस्वा सहस्रजित्॥

जो लोग परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं, परमात्मा उन्हें अवश्य पवित्र करते हैं॥४॥

तं त्वा॑ ह॒स्तिनो॒ मधु॑मन्त॒मद्रि॑भिर्दु॒हन्त्य॒प्सु वृ॑ष॒भं दश॒ क्षिपः॑। इन्द्रं॑ सोम मा॒दय॒न्दैव्यं॒ जनं॒ सिन्धो॑रिवो॒र्मिः पव॑मानो अर्षसि॥

जो पुरुष कर्म्मयोग वा ज्ञानयोग द्वारा अपने आपको परमात्मा की कृपा का पात्र बनाते हैं, परमात्मा उन्हें सिन्धु की लहरों के समान अपने आनन्दरूपी वारि से सिञ्चित करता है॥५॥यह अस्सीवाँ सूक्त और पाचवाँ वर्ग समाप्त हुआ।

प्र सोम॑स्य॒ पव॑मानस्यो॒र्मय॒ इन्द्र॑स्य यन्ति ज॒ठरं॑ सु॒पेश॑सः। द॒ध्ना यदी॒मुन्नी॑ता य॒शसा॒ गवां॑ दा॒नाय॒ शूर॑मु॒दम॑न्दिषुः सु॒ताः॥

परमात्मा के सदुपदेश ज्ञानयोगी को पवित्र करते हैं और उसके उत्साह को प्रतिदिन बढ़ाते हैं॥१॥

अच्छा॒ हि सोमः॑ क॒लशाँ॒ असि॑ष्यद॒दत्यो॒ न वोळ्हा॑ र॒घुव॑र्तनि॒र्वृषा॑। अथा॑ दे॒वाना॑मु॒भय॑स्य॒ जन्म॑नो वि॒द्वाँ अ॑श्नोत्य॒मुत॑ इ॒तश्च॒ यत्॥

मनुष्य की उन्नति के लिये इस लोक में ज्ञान और कर्म्म दो ही साधन हैं, इसलिये मनुष्य को चाहिये कि वह इन दोनों मार्गों का अवलम्बन करे॥२॥

आ नः॑ सोम॒ पव॑मानः किरा॒ वस्विन्दो॒ भव॑ म॒घवा॒ राध॑सो म॒हः। शिक्षा॑ वयोधो॒ वस॑वे॒ सु चे॒तुना॒ मा नो॒ गय॑मा॒रे अ॒स्मत्परा॑ सिचः॥

इश्वरोपासकों को चाहिये कि ईश्वर की प्राप्ति के हेतु ईश्वर के परम ऐश्वर्य्य का कदापि त्याग न करें और ईश्वर से भी सदा यही प्रार्थना करें कि हे परमेश्वर! आप हमको ऐश्वर्य्य से कदापि वियुक्त न करें॥३॥

आ नः॑ पू॒षा पव॑मानः सुरा॒तयो॑ मि॒त्रो ग॑च्छन्तु॒ वरु॑णः स॒जोष॑सः। बृह॒स्पति॑र्म॒रुतो॑ वा॒युर॒श्विना॒ त्वष्टा॑ सवि॒ता सु॒यमा॒ सर॑स्वती॥

परमात्मा उपदेश करता है, कि हे मनुष्यों! तुम सामाजिक उन्नति के लिये पूर्वोक्त विद्वान् का संग्रह करो, ताकि तुम सब विद्याओं में निपुण होकर संसार में अभ्युदयशाली बनो॥४॥

उ॒भे द्यावा॑पृथि॒वी वि॑श्वमि॒न्वे अ॑र्य॒मा दे॒वो अदि॑तिर्विधा॒ता। भगो॒ नृशंस॑ उ॒र्व१॒॑न्तरि॑क्षं॒ विश्वे॑ दे॒वाः पव॑मानं जुषन्त॥

परमात्मा की विभूति द्युलोक, पृथिवीलोक, अन्तरिक्षलोक ये सब लोक-लोकान्तर हैं और इन सब लोक-लोकान्तरों के ज्ञाता विद्वान् भी परमात्मा की विभूति हैं॥५॥यह ८१ वाँ सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ॥

असा॑वि॒ सोमो॑ अरु॒षो वृषा॒ हरी॒ राजे॑व द॒स्मो अ॒भि गा अ॑चिक्रदत्। पु॒ना॒नो वारं॒ पर्ये॑त्य॒व्ययं॑ श्ये॒नो न योनिं॑ घृ॒तव॑न्तमा॒सद॑म्॥

“सूते चराचरं जगदिति सोमः” जो इस चराचर ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करता है, उसका नाम सोम है। यह शब्द “षूङ् प्राणिगर्भविमोचने” से सिद्ध होता है और उसी धातु से असावि यह प्रयोग है। जिसके अर्थ किसी वस्तु को उत्पन्न करने के हैं और सायणाचार्य्य ने जो इसके अर्थ सोम के कुटे जाने के किये हैं, वह कदापि ठीक नहीं हो सकते, क्योंकि सोम तो यहाँ कर्ता है, कर्म्म नहीं और यदि कोई यह कहे कि यहाँ कर्म्म में प्रत्यय है, तो सोम में तृतीया क्यों नहीं, तो इसका उत्तर यह है कि यह वैदिक प्रयोग है॥१॥

क॒विर्वे॑ध॒स्या पर्ये॑षि॒ माहि॑न॒मत्यो॒ न मृ॒ष्टो अ॒भि वाज॑मर्षसि। अ॒प॒सेध॑न्दुरि॒ता सो॑म मृळय घृ॒तं वसा॑नः॒ परि॑ यासि नि॒र्णिज॑म्॥

इस मन्त्र में सर्वज्ञ परमात्मा से यह प्रार्थना है कि हे परमात्मन्! आप हमको शुद्ध करें और सब प्रकार के सुख प्रदान करें। यहाँ सोम के लिये कवि शब्द आया है। सायण के मत में यहाँ सोमलता को ही कवि=सर्वज्ञ कथन किया गया है। वास्तव में वेदों में कवि शब्द जड़ के लिये कहीं भी नहीं आता। इतना ही नहीं, किन्तु “कविर्मनीषी, परिभूः, स्वयम्भूः” य० ४०। ८ इत्यादि वाक्यों में कवि शब्द परमात्मा के लिये आया है, इस प्रकार उक्त मन्त्र में कवि शब्द से परमात्मा का ग्रहण करना चाहिये, जड़ सोम का नहीं॥२॥

प॒र्जन्यः॑ पि॒ता म॑हि॒षस्य॑ प॒र्णिनो॒ नाभा॑ पृथि॒व्या गि॒रिषु॒ क्षयं॑ दधे। स्वसा॑र॒ आपो॑ अ॒भि गा उ॒तास॑र॒न्त्सं ग्राव॑भिर्नसते वी॒ते अ॑ध्व॒रे॥

परमात्मा इस चराचर ब्रह्माण्ड का उत्पादक है और पर्जन्य के समान सबका तृप्तिकारक है।  उसी परमात्मा से सब प्रकार की शान्ति और रक्षा उत्पन्न होती हैं॥३॥

जा॒येव॒ पत्या॒वधि॒ शेव॑ मंहसे॒ पज्रा॑या गर्भ शृणु॒हि ब्रवी॑मि ते। अ॒न्तर्वाणी॑षु॒ प्र च॑रा॒ सु जी॒वसे॑ऽनि॒न्द्यो वृ॒जने॑ सोम जागृहि॥

परमात्मा उपदेश करता है कि हे जीव! तुमको अपने कर्तव्य में सदैव जागृत रहना चाहिये। जो पुरुष अपने कर्तव्य में नहीं जागता, उसका संसार में जीना निष्फल है। यहाँ सोम शब्द का अर्थ जीवात्मा है। जैसे कि “स्याच्चैकस्य ब्रह्मशब्दवत्” ब्र० सू० २। ३। ५॥यहाँ ब्रह्मसूत्र के अनुसार प्रकरणभेद में अर्थ का भेद हो जाता है, इसी प्रकार यहाँ शिक्षा देने के प्रकरण से सोम नाम जीवात्मा का है॥४॥

यथा॒ पूर्वे॑भ्यः शत॒सा अमृ॑ध्रः सहस्र॒साः प॒र्यया॒ वाज॑मिन्दो। ए॒वा प॑वस्व सुवि॒ताय॒ नव्य॑से॒ तव॑ व्र॒तमन्वापः॑ सचन्ते॥

परमात्मा उपदेश करता है कि हे जीवों! तुम्हारे पूर्व जन्म बहुत व्यतीत हुए हैं, तुम इस नूतन जन्म में सत्कर्म करके अभ्युदयशाली और तेजस्वी बनो। यहाँ और उत्तर जन्मों का कथन सृष्टि को प्रवाहरूप से अनादि मानकर है और यही भाव ‘सूर्य्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्” इस मन्त्र में वर्णन किया गया है॥५॥यह ८२ वाँ सूक्त और ७ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प॒वित्रं॑ ते॒ वित॑तं ब्रह्मणस्पते प्र॒भुर्गात्रा॑णि॒ पर्ये॑षि वि॒श्वतः॑। अत॑प्ततनू॒र्न तदा॒मो अ॑श्नुते शृ॒तास॒ इद्वह॑न्त॒स्तत्समा॑शत॥

इस मन्त्र में तप का वर्णन स्पष्ट रीति से किया गया है। जो लोग तपस्वी हैं, वे ही परमात्मा को प्राप्त हो सकते हैं, अन्य नहीं। यहाँ शरीर का तप एक उपलक्षणमात्र है। वास्तव में आध्यात्मिकादि सब प्रकार के तपों का यहाँ ग्रहण है॥१॥

तपो॑ष्प॒वित्रं॒ वित॑तं दि॒वस्प॒दे शोच॑न्तो अस्य॒ तन्त॑वो॒ व्य॑स्थिरन्। अव॑न्त्यस्य पवी॒तार॑मा॒शवो॑ दि॒वस्पृ॒ष्ठमधि॑ तिष्ठन्ति॒ चेत॑सा॥

इस मन्त्र में परमात्मा ने इस बात का उपदेश किया है कि संसार में तप ही सर्वोपरि है। जो लोग तपस्वी हैं, वे सर्वोपरि उच्च पद को ग्रहण करते हैं, इसलिए हे मनुष्यों तुम तपस्वी बनो॥२॥

अरू॑रुचदु॒षसः॒ पृश्नि॑रग्रि॒य उ॒क्षा बि॑भर्ति॒ भुव॑नानि वाज॒युः। मा॒या॒विनो॑ ममिरे अस्य मा॒यया॑ नृ॒चक्ष॑सः पि॒तरो॒ गर्भ॒मा द॑धुः॥

इस मन्त्र में परमात्मा के स्वरूप का वर्णन है कि वह प्रकाशस्वरूप है और लोक-लोकान्तरों का अधिष्ठान है। सब बलों का केन्द्र है और सब मायावियों की माया को मर्दन करनेवाला है। तात्पर्य यह है कि उसी पूर्ण पुरुष की उपासना से पुरुष तपस्वी बन सकता है॥३॥

ग॒न्ध॒र्व इ॒त्था प॒दम॑स्य रक्षति॒ पाति॑ दे॒वानां॒ जनि॑मा॒न्यद्भु॑तः। गृ॒भ्णाति॑ रि॒पुं नि॒धया॑ नि॒धाप॑तिः सु॒कृत्त॑मा॒ मधु॑नो भ॒क्षमा॑शत॥

“तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः” उस विष्णु के परमपद को सदा विद्वान् लोग देखते हैं। उसी व्यापक परमात्मा के परमपद का इस मन्त्र में वर्णन किया है कि उस परमात्मा के उपासक लोग ब्रह्मानन्द को भोगते हैं, अन्य नहीं॥४॥

ह॒विर्ह॑विष्मो॒ महि॒ सद्म॒ दैव्यं॒ नभो॒ वसा॑नः॒ परि॑ यास्यध्व॒रम्। राजा॑ प॒वित्र॑रथो॒ वाज॒मारु॑हः स॒हस्र॑भृष्टिर्जयसि॒ श्रवो॑ बृ॒हत्॥

इस मन्त्र में परमात्मा को सहस्त्र शक्तियोंवाला वर्णन किया है। जैसा कि “सहस्त्रशीर्षा पुरुषः” इस मन्त्र में वर्णन किया गया है। उस अनन्तशक्ति युक्त परमात्मा की उपासना करके जो पुरुष तपस्वी बनते हैं, वे इस भवनिधि से पार होते हैं॥५॥यह ८३ वाँ सूक्त और ८ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

पव॑स्व देव॒माद॑नो॒ विच॑र्षणिर॒प्सा इन्द्रा॑य॒ वरु॑णाय वा॒यवे॑। कृ॒धी नो॑ अ॒द्य वरि॑वः स्वस्ति॒मदु॑रुक्षि॒तौ गृ॑णीहि॒ दैव्यं॒ जन॑म्॥

परमात्मा उपदेश करता है कि हे मनुष्यों! आप ज्ञानी-विज्ञानी बनकर कर्म्मों के नियन्ता देव से यह प्रार्थना करो कि हे भगवन्! आप अपने ज्ञान द्वारा हमको अविनाशी बनाएँ और हमारी दरिद्रता मिटाकर आप हमको एश्वर्ययुक्त करें॥१॥

आ यस्त॒स्थौ भुव॑ना॒न्यम॑र्त्यो॒ विश्वा॑नि॒ सोमः॒ परि॒ तान्य॑र्षति। कृ॒ण्वन्त्सं॒चृतं॑ वि॒चृत॑म॒भिष्ट॑य॒ इन्दुः॑ सिषक्त्यु॒षसं॒ न सूर्यः॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा ने ज्ञानी-विज्ञानी लोगों को सूर्य्य की प्रभा के समान वर्णन किया। तात्पर्य यह है कि ज्ञान-विज्ञान द्वारा ही पुरुष तेजस्वी और सूर्य्य के समान प्रभाकर बन सकता है, अन्यथा नहीं॥२॥

आ यो गोभिः॑ सृ॒ज्यत॒ ओष॑धी॒ष्वा दे॒वानां॑ सु॒म्न इ॒षय॒न्नुपा॑वसुः। आ वि॒द्युता॑ पवते॒ धार॑या सु॒त इन्द्रं॒ सोमो॑ मा॒दय॒न्दैव्यं॒ जन॑म्॥

जो विद्वान् पुरुष ईश्वरीय विद्या को प्राप्त होकर संसार की रक्षा करना चाहते हैं, परमात्मा उनके सुख की सदैव वृद्धि करता है॥३॥

ए॒ष स्य सोमः॑ पवते सहस्र॒जिद्धि॑न्वा॒नो वाच॑मिषि॒रामु॑ष॒र्बुध॑म्। इन्दुः॑ समु॒द्रमुदि॑यर्ति वा॒युभि॒रेन्द्र॑स्य॒ हार्दि॑ क॒लशे॑षु सीदति॥

“समुद्रमिति अन्तरिक्षनामसु पठितम्” नि० २। १०। ७॥समुद्रवन्त्यस्मादाप इति समुद्रः” जिससे जलों का प्रवाह बहे, उसका नाम यहाँ समुद्र है। तात्पर्य यह है कि जिस परमात्मा ने अन्तरिक्षलोक को वर्षणशील और पृथिवीलोक को दृढ़ता प्रदान की है, वह लोक-लोकान्तरों का पति परमात्मा अपनी ज्ञानगति से कर्मयोगी के हृदय में आकर विराजमान होता है ॥४॥

अ॒भि त्यं गावः॒ पय॑सा पयो॒वृधं॒ सोमं॑ श्रीणन्ति म॒तिभिः॑ स्व॒र्विद॑म्। ध॒नं॒ज॒यः प॑वते॒ कृत्व्यो॒ रसो॒ विप्रः॑ क॒विः काव्ये॑ना॒ स्व॑र्चनाः॥

जो परमात्मा पूर्वोक्त गुणों से सम्पन्न है, उसका ज्ञानयोगी अपने चित्तवृत्तिनिरोधरूपी योगद्वारा साक्षात्कार करते हैं॥७॥यह ८४ वाँ सूक्त और नवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

इन्द्रा॑य सोम॒ सुषु॑तः॒ परि॑ स्र॒वापामी॑वा भवतु॒ रक्ष॑सा स॒ह। मा ते॒ रस॑स्य मत्सत द्वया॒विनो॒ द्रवि॑णस्वन्त इ॒ह स॒न्त्विन्द॑वः॥

जो लोग सत्यासत्य में विवेक नहीं कर सकते और असत्य को त्यागकर दृढ़तापूर्वक सत्य का ग्रहण नहीं कर सकते, वे सदैव सत्यामृत के सागर में गोते खाते रहते हैं, इसलिये मनुष्य को चाहिये कि वह सत्यासत्य का विवेक करके सत्यग्राही बने॥१॥

अ॒स्मान्त्स॑म॒र्ये प॑वमान चोदय॒ दक्षो॑ दे॒वाना॒मसि॒ हि प्रि॒यो मदः॑। ज॒हि शत्रूँ॑र॒भ्या भ॑न्दनाय॒तः पिबे॑न्द्र॒ सोम॒मव॑ नो॒ मृधो॑ जहि॥

जो लोग परमात्मपरायण होकर परमात्मा के स्वरूप में ध्यान द्वारा प्रविष्ट होते हैं, परमात्मा उन्हें अवश्यमेव ग्रहण करता है॥२॥

अद॑ब्ध इन्दो पवसे म॒दिन्त॑म आ॒त्मेन्द्र॑स्य भवसि धा॒सिरु॑त्त॒मः। अ॒भि स्व॑रन्ति ब॒हवो॑ मनी॒षिणो॒ राजा॑नम॒स्य भुव॑नस्य निंसते॥

इस मन्त्र में परमात्मा को आत्मा शब्द से वर्णन किया है। अर्थात् “अतति सर्वत्र व्याप्नोतीति आत्मा” जो सर्वत्र व्यापक हो, उसका नाम आत्मा है। यहाँ सर्वोत्पादक सोम परमात्मा को व्यापकरूप से वर्णन किया है। जो लोग सोम शब्द को जड़लतावाचक ही मानते हैं, उनको इस मन्त्र से शिक्षा लेनी चाहिये कि सोम यहाँ सर्वव्यापक परमात्मा का नाम है॥३॥

स॒हस्र॑णीथः श॒तधा॑रो॒ अद्भु॑त॒ इन्द्रा॒येन्दुः॑ पवते॒ काम्यं॒ मधु॑। जय॒न्क्षेत्र॑म॒भ्य॑र्षा॒ जय॑न्न॒प उ॒रुं नो॑ गा॒तुं कृ॑णु सोम मीढ्वः॥

परमात्मा में ज्ञान की अनन्त शक्तियें हैं और आनन्द की अनन्त शक्तियें हैं। बहुत क्या ? सब आनन्दों की वृष्टि करनेवाला एकमात्र परमात्मा ही है, इसलिये उपासकों को चाहिये कि उस सर्वैश्वर्य्यप्रद परमात्मा की उपासना करें॥५॥

कनि॑क्रदत्क॒लशे॒ गोभि॑रज्यसे॒ व्य१॒॑व्ययं॑ स॒मया॒ वार॑मर्षसि। म॒र्मृ॒ज्यमा॑नो॒ अत्यो॒ न सा॑न॒सिरिन्द्र॑स्य सोम ज॒ठरे॒ सम॑क्षरः॥

परमात्मा का अविनाशीभाव जब मनुष्य के हृदय में आता है, तो मनुष्य मानों ईश्वर के समीप पहुँच जाता है। इसी का नाम परमात्मप्राप्ति है। वास्तव में परमात्मा किसी के पास चलकर नहीं आता और न किसी से दूर जाता है। इसी अभिप्राय से वेद में लिखा है कि “तद्दूरे तद्वन्तिके” अर्थात् वह अज्ञानियों से दूर और ज्ञानियों के समीप है॥५॥

स्वा॒दुः प॑वस्व दि॒व्याय॒ जन्म॑ने स्वा॒दुरिन्द्रा॑य सु॒हवी॑तुनाम्ने। स्वा॒दुर्मि॒त्राय॒ वरु॑णाय वा॒यवे॒ बृह॒स्पत॑ये॒ मधु॑माँ॒ अदा॑भ्यः॥

जो पुरुष परमात्मा का उपासन करते हैं, उनकी कुटिलतायें ज्ञानयोग से दग्ध हो जाती हैं, इसलिये वे सर्वप्रिय हो जाते हैं॥६॥१०॥

अत्यं॑ मृजन्ति क॒लशे॒ दश॒ क्षिपः॒ प्र विप्रा॑णां म॒तयो॒ वाच॑ ईरते। पव॑माना अ॒भ्य॑र्षन्ति सुष्टु॒तिमेन्द्रं॑ विशन्ति मदि॒रास॒ इन्द॑वः॥

पव॑मानो अ॒भ्य॑र्षा सु॒वीर्य॑मु॒र्वीं गव्यू॑तिं॒ महि॒ शर्म॑ स॒प्रथः॑। माकि॑र्नो अ॒स्य परि॑षूतिरीश॒तेन्दो॒ जये॑म॒ त्वया॒ धनं॑धनम्॥

जिन लोगों के ऐश्वर्य्यसम्बन्धी इन्द्रिय विशाल होते हैं, वे किसी के साथ द्वेष नहीं करते और बुद्धिबल के ही सब ऐश्वर्य्य उनके अधीन हो जाते हैं॥८॥

अधि॒ द्याम॑स्थाद्वृष॒भो वि॑चक्ष॒णोऽरू॑रुच॒द्वि दि॒वो रो॑च॒ना क॒विः। राजा॑ प॒वित्र॒मत्ये॑ति॒ रोरु॑वद्दि॒वः पी॒यूषं॑ दुहते नृ॒चक्ष॑सः॥

द्युलोक के नक्षत्रादिकों का प्रकाशक स्वयंप्रकाश परमात्मा ही है। उसी से सूर्य्यचन्द्रादिकों का प्रकाश होता है। वही स्वतःप्रकाशस्वरूप परमात्मा (पीयूषं) अमृत का धाम है। उसी से नित्य सुख मुक्ति की इच्छा करनी चाहिये॥९॥

दि॒वो नाके॒ मधु॑जिह्वा अस॒श्चतो॑ वे॒ना दु॑हन्त्यु॒क्षणं॑ गिरि॒ष्ठाम्। अ॒प्सु द्र॒प्सं वा॑वृधा॒नं स॑मु॒द्र आ सिन्धो॑रू॒र्मा मधु॑मन्तं प॒वित्र॒ आ॥

याज्ञिक लोग जो नित्य मुक्तिसुख की इच्छा करते हैं, वे आनन्दमय परमात्मा का अपने पवित्र अन्तःकरण में ध्यान करते हैं। जिस प्रकार जलादि पदार्थों के सूक्ष्मरूप परमाणु इस विस्तृत नभोमण्डल में व्याप्त हो जाते हैं, इसी प्रकार परमात्मा के अपहतपाप्मादि धर्म्म उनके रोम-रोम में व्याप्त हो जाते हैं। अर्थात् वे सर्वाङ्ग से पवित्र होकर परमात्मा के भावों को ग्रहण करते हैं॥१०॥

नाके॑ सुप॒र्णमु॑पपप्ति॒वांसं॒ गिरो॑ वे॒नाना॑मकृपन्त पू॒र्वीः। शिशुं॑ रिहन्ति म॒तयः॒ पनि॑प्नतं हिर॒ण्ययं॑ शकु॒नं क्षाम॑णि॒ स्थाम्॥

परमात्मा विद्वानों की वाणी द्वारा मनुष्यों के हृदय में प्रकाशित होता है, इसलिये मनुष्यों को चाहिये कि वे सदोपदेश द्वारा उसका ग्रहण करें॥११॥

ऊ॒र्ध्वो ग॑न्ध॒र्वो अधि॒ नाके॑ अस्था॒द्विश्वा॑ रू॒पा प्र॑ति॒चक्षा॑णो अस्य। भा॒नुः शु॒क्रेण॑ शो॒चिषा॒ व्य॑द्यौ॒त्प्रारू॑रुच॒द्रोद॑सी मा॒तरा॒ शुचिः॑॥

परमात्मा अपने प्रकाश से सूर्य्यचन्द्रादिकों का प्रकाशक है और सम्पूर्ण विश्व का निर्माता, विधाता और अधिष्ठाता है, उसी की उपासना सब लोगों को करनी चाहिये॥१२॥यह ८५ वें सूक्त का ११ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

प्र त॑ आ॒शवः॑ पवमान धी॒जवो॒ मदा॑ अर्षन्ति रघु॒जा इ॑व॒ त्मना॑। दि॒व्याः सु॑प॒र्णा मधु॑मन्त॒ इन्द॑वो म॒दिन्त॑मासः॒ परि॒ कोश॑मासते॥

जो लोग पदार्थान्तरों से चित्तवृत्ति को हटाकर एकमात्र परमात्मा का ध्यान करते हैं, उनके अन्तःकरण को प्रकाशित करने के लिये परमात्मा दिव्यभाव से आकर उपस्थित हो जाते हैं॥१॥

प्र ते॒ मदा॑सो मदि॒रास॑ आ॒शवोऽसृ॑क्षत॒ रथ्या॑सो॒ यथा॒ पृथ॑क्। धे॒नुर्न व॒त्सं पय॑सा॒भि व॒ज्रिण॒मिन्द्र॒मिन्द॑वो॒ मधु॑मन्त ऊ॒र्मयः॑॥

परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे उपासक! तुम्हारे शरीररूपी रथ के लिये ज्ञान के विचित्र भाव घोड़ों के समान जिस प्रकार घोड़े रथ को गतिशील बनाते हैं, इसी प्रकार विज्ञानी पुरुष की चित्तवृत्तियें उसके शरीर को गतिशील बनाती हैं॥२॥

अत्यो॒ न हि॑या॒नो अ॒भि वाज॑मर्ष स्व॒र्वित्कोशं॑ दि॒वो अद्रि॑मातरम्। वृषा॑ प॒वित्रे॒ अधि॒ सानो॑ अ॒व्यये॒ सोमः॑ पुना॒न इ॑न्द्रि॒याय॒ धाय॑से॥

परमात्मा विद्युदादि पदार्थों के समान गतिशील है और प्रकाशमात्र के आधार निधियों का निर्म्माता है। वही परमात्मा पवित्र अन्तःकरणवाले पुरुष को ऐश्वर्य्यसम्पन्न करता है॥३॥

प्र त॒ आश्वि॑नीः पवमान धी॒जुवो॑ दि॒व्या अ॑सृग्र॒न्पय॑सा॒ धरी॑मणि। प्रान्तॠष॑यः॒ स्थावि॑रीरसृक्षत॒ ये त्वा॑ मृ॒जन्त्यृ॑षिषाण वे॒धसः॑॥

जो लोग दृढ़ता से ईश्वर की उपासना करते हैं, परमात्मा उनके ध्यान का विषय अवश्यमेव होता है। अर्थात् जब तक पुरुष सब ओर से अपनी चित्तवृत्तियों को हटाकर एकमात्र ईश्वरपरायण नहीं होता, तब तक वह सूक्ष्म से सूक्ष्म परमात्मा उसकी बुद्धि का विषय कदापि नहीं होता। इसी अभिप्राय से कहा है कि ‘दृश्यते त्वग्र्या बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः’ वह सूक्ष्मदर्शियों की सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ही देखा जाता है, अन्यथा नहीं॥४॥

विश्वा॒ धामा॑नि विश्वचक्ष॒ ऋभ्व॑सः प्र॒भोस्ते॑ स॒तः परि॑ यन्ति के॒तवः॑। व्या॒न॒शिः प॑वसे सोम॒ धर्म॑भिः॒ पति॒र्विश्व॑स्य॒ भुव॑नस्य राजसि॥

जो यह संसार का पति है, वह अपहतपाप्मादि धर्म्मों से सर्वत्र परिपूर्ण हो रहा है। सायणादि भाष्यकार ‘धर्म्मभिः’ के अर्थ भी सोम के वहने के करते हैं। यदि कोई इनसे पूछे कि, अस्तु धर्म्म के अर्थ वहन ही सही, पर “पतिर्विश्वस्य भुवनस्य” इस वाक्य के अर्थ जड़ सोम में कैसे संगत होते हैं। क्योंकि एक लताविशेषवस्तु सम्पूर्ण लोक-लोकान्तरों का पति कैसे हो सकती है। वास्तव में बात यह है कि मन्त्रों के आध्यात्मिक अर्थों को छोड़कर इनको केवल भौतिक अर्थ ही प्रिय लगते हैं॥५॥१२॥

उ॒भ॒यतः॒ पव॑मानस्य र॒श्मयो॑ ध्रु॒वस्य॑ स॒तः परि॑ यन्ति के॒तवः॑। यदी॑ प॒वित्रे॒ अधि॑ मृ॒ज्यते॒ हरिः॒ सत्ता॒ नि योना॑ क॒लशे॑षु सीदति॥

जो पुरुष अपने अन्तःकरणों को सत्कर्म्म द्वारा शुद्ध बनाते हैं, उन्हीं के अन्तःकरणों में परमात्मा प्रतिबिम्बित होता है, अन्यों के नहीं  ॥६॥

य॒ज्ञस्य॑ के॒तुः प॑वते स्वध्व॒रः सोमो॑ दे॒वाना॒मुप॑ याति निष्कृ॒तम्। स॒हस्र॑धारः॒ परि॒ कोश॑मर्षति॒ वृषा॑ प॒वित्र॒मत्ये॑ति॒ रोरु॑वत्॥

परमात्मा अपनी अनन्तशक्ति से सर्वत्र विराजमान है, यद्यपि वह सर्वत्र विद्यमान है, तथापि उसकी अभिव्यक्ति विद्वानों के अन्तःकरण में ही होती है, अन्यत्र नहीं॥७॥

राजा॑ समु॒द्रं न॒द्यो॒३॒॑ वि गा॑हते॒ऽपामू॒र्मिं स॑चते॒ सिन्धु॑षु श्रि॒तः। अध्य॑स्था॒त्सानु॒ पव॑मानो अ॒व्ययं॒ नाभा॑ पृथि॒व्या ध॒रुणो॑ म॒हो दि॒वः॥

यद्यपि स्थूल दृष्टि से ये पृथिव्यादिलोक अन्य पदार्थों के अधिष्ठान प्रतीत होते हैं, तथापि सर्वाधिष्ठान एक मात्र परमात्मा ही है, क्योंकि सब लोक-लोकान्तरों की रचना करनेवाला और नदियों को सागरों के साथ संगत करनेवाला और ग्रह-उपग्रहों को सूर्य्यादि बड़ी-बड़ी ज्योतियों में संगत करनेवाला एकमात्र परमात्मा ही सबका अधिष्ठान है, कोई अन्य वस्तु नहीं॥८॥

दि॒वो न सानु॑ स्त॒नय॑न्नचिक्रद॒द्द्यौश्च॒ यस्य॑ पृथि॒वी च॒ धर्म॑भिः। इन्द्र॑स्य स॒ख्यं प॑वते वि॒वेवि॑द॒त्सोमः॑ पुना॒नः क॒लशे॑षु सीदति॥

इस मन्त्र में परमात्मा ने इस बात का निरूपण किया है कि द्युलोक और पृथिवीलोक किसी चेतन वस्तु के सहारे से स्थिर हैं और उस चेतन ने भी जगत्कर्तृत्वादि धर्मों से इनको धारण किया है। वेद में इतना स्पष्ट ईश्वरवाद होने पर भी सायणादि भाष्यकार इन मन्त्रों को जड़ सोमलता में लगाते हैं और ऐसे मिथ्या अर्थ करना ब्राह्मण और उपनिषदों से सर्वथा विरुद्ध है। देखो “सा च प्रशासनात्” २। ३। ११। इस सूत्र में महर्षि व्यास ने “शतपथब्राह्मण” के आधार पर यह लिखा है, कि “एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि! द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठतः” बृ. ३। ८। ९। इस अक्षर की आज्ञा में हे गार्गि! द्युलोक और पृथिवीलोक स्थिर हैं। इससे स्पष्ट सिद्ध है कि यहाँ ईश्वर का वर्णन है, जड़ सोम का नहीं॥९॥

ज्योति॑र्य॒ज्ञस्य॑ पवते॒ मधु॑ प्रि॒यं पि॒ता दे॒वानां॑ जनि॒ता वि॒भूव॑सुः। दधा॑ति॒ रत्नं॑ स्व॒धयो॑रपी॒च्यं॑ म॒दिन्त॑मो मत्स॒र इ॑न्द्रि॒यो रसः॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा को नानाविध रत्नों का धाता, विधाता और निर्माता कथन किया है। अर्थात् वही सृष्टि का धारण करनेवाला है, वही पालन करनेवाला है और वही प्रलय करनेवाला है। इस मन्त्र में “मत्सर” और मदादिक जो नाम आये हैं, वे परमात्मा के गौरव को कथन करते हैं। आधुनिक संस्कृत में मद मत्सरादि नाम बुरे अर्थों में आने लगे हैं। वेद में इनके ये अर्थ न थे। इससे स्पष्ट सिद्ध होता है कि आधुनिक संस्कृत और वैदिक संस्कृत में बड़ा प्रभेद है ॥१०॥१३॥

अ॒भि॒क्रन्द॑न्क॒लशं॑ वा॒ज्य॑र्षति॒ पति॑र्दि॒वः श॒तधा॑रो विचक्ष॒णः। हरि॑र्मि॒त्रस्य॒ सद॑नेषु सीदति मर्मृजा॒नोऽवि॑भिः॒ सिन्धु॑भि॒र्वृषा॑॥

उपासकों को चाहिये कि अपने मनोरूप मन्दिर को इस प्रकार से मार्जित करें, जिससे परमात्मा का निवासस्थान बनकर मन उनकी उपासना का मुख्य साधन बने॥१२॥

अग्रे॒ सिन्धू॑नां॒ पव॑मानो अर्ष॒त्यग्रे॑ वा॒चो अ॑ग्रि॒यो गोषु॑ गच्छति। अग्रे॒ वाज॑स्य भजते महाध॒नं स्वा॑यु॒धः सो॒तृभिः॑ पूयते॒ वृषा॑॥

परमात्मा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध इन पञ्चतन्मात्राओं के आदिकारण अहंकार और महत्तत्त्व तथा प्रकृति से भी पहले विराजमान था। उसी ने इस शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धादि गुणयुक्त संसार का निर्माण किया है। जिन विचित्र शक्तियों से परमात्मा इन सूक्ष्म से सूक्ष्म तत्त्वों का निर्माता है, उनसे हमारे हृदय को शुद्ध करे॥१२॥

अ॒यं म॒तवा॑ञ्छकु॒नो यथा॑ हि॒तोऽव्ये॑ ससार॒ पव॑मान ऊ॒र्मिणा॑। तव॒ क्रत्वा॒ रोद॑सी अन्त॒रा क॑वे॒ शुचि॑र्धि॒या प॑वते॒ सोम॑ इन्द्र ते॥

परमात्मा कर्म्मों के द्वारा शुभफलों का प्रदाता है, इसलिये मनुष्यों को चाहिये कि वे उत्तम कर्म्म करें, ताकि उन्हें कर्म्मानुसार उत्तम फल मिले॥१३॥

द्रा॒पिं वसा॑नो यज॒तो दि॑वि॒स्पृश॑मन्तरिक्ष॒प्रा भुव॑ने॒ष्वर्पि॑तः। स्व॑र्जज्ञा॒नो नभ॑सा॒भ्य॑क्रमीत्प्र॒त्नम॑स्य पि॒तर॒मा वि॑वासति॥

स्वर्गलोक के अर्थ यहाँ सुख की अवस्थाविशेष के हैं॥१४॥

सो अ॑स्य वि॒शे महि॒ शर्म॑ यच्छति॒ यो अ॑स्य॒ धाम॑ प्रथ॒मं व्या॑न॒शे। प॒दं यद॑स्य पर॒मे व्यो॑म॒न्यतो॒ विश्वा॑ अ॒भि सं या॑ति सं॒यतः॑॥

“तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः” इत्यादि विष्णु के स्वरूप निरूपण करनेवाले मन्त्रों में जो विष्णु के स्वरूप का वर्णन है, वही वर्णन यहाँ “पद” शब्द से किया है। पद के अर्थ किसी अङ्गविशेष के नहीं, किन्तु स्वरूप के हैं॥१५॥

प्रो अ॑यासी॒दिन्दु॒रिन्द्र॑स्य निष्कृ॒तं सखा॒ सख्यु॒र्न प्र मि॑नाति सं॒गिर॑म्। मर्य॑ इव युव॒तिभिः॒ सम॑र्षति॒ सोमः॑ क॒लशे॑ श॒तया॑म्ना प॒था॥

जिस प्रकार स्त्रियें अपने सदाचार से मर्यादा को बान्धती हैं, वा यों कहो कि मर्यादापुरुषोत्तम पुरुषों को उत्पन्न करके मर्य्यादा बान्धती हैं, इसी प्रकार परमात्मा वेदमर्य्यादारूप वैदिक पथ से महापुरुषों को उत्पन्न करके मर्य्यादा बान्धते हैं॥१६॥

प्र वो॒ धियो॑ मन्द्र॒युवो॑ विप॒न्युवः॑ पन॒स्युवः॑ सं॒वस॑नेष्वक्रमुः। सोमं॑ मनी॒षा अ॒भ्य॑नूषत॒ स्तुभो॒ऽभि धे॒नवः॒ पय॑सेमशिश्रयुः॥

जो पुरुष समाहित चित्त से ईश्वर का ध्यान करते हैं, उनकी चित्तवृत्तियें प्रबल प्रवाह से ईश्वर की ओर झुक जाती हैं॥१७॥

आ नः॑ सोम सं॒यतं॑ पि॒प्युषी॒मिष॒मिन्दो॒ पव॑स्व॒ पव॑मानो अ॒स्रिध॑म्। या नो॒ दोह॑ते॒ त्रिरह॒न्नस॑श्चुषी क्षु॒मद्वाज॑व॒न्मधु॑मत्सु॒वीर्य॑म्॥

स्वनियमानुकूल चलनेवाले पुरुषों के लिये परमात्मा अक्षय धन को प्रदान करते हैं॥१८॥

वृषा॑ मती॒नां प॑वते विचक्ष॒णः सोमो॒ अह्नः॑ प्रतरी॒तोषसो॑ दि॒वः। क्रा॒णा सिन्धू॑नां क॒लशाँ॑ अवीवश॒दिन्द्र॑स्य॒ हार्द्या॑वि॒शन्म॑नी॒षिभिः॑॥

जो लोग सदुपदेशकों के सदुपदेश को श्रद्धापूर्वक ग्रहण करते हैं, उनके अन्तःकरणों को परमात्मा अवश्यमेव पवित्र करता है॥१९॥

म॒नी॒षिभिः॑ पवते पू॒र्व्यः क॒विर्नृभि॑र्य॒तः परि॒ कोशाँ॑ अचिक्रदत्। त्रि॒तस्य॒ नाम॑ ज॒नय॒न्मधु॑ क्षर॒दिन्द्र॑स्य वा॒योः स॒ख्याय॒ कर्त॑वे॥

कर्मयोगी और ज्ञानयोगी लोग परमात्मगुणों के धारण करने से परमात्मा के साथ एक प्रकार की मैत्री उत्पन्न करते हैं। अर्थात् “अहं वा त्वमसि भगवो देव त्वं वा अहमस्मि” कि “मैं तू” और “तू मैं” इस प्रकार की अहंग्रह उपासना द्वारा अर्थात् अभेदोपासना द्वारा परमात्मा का ध्यान करते हैं॥२०॥

अ॒यं पु॑ना॒न उ॒षसो॒ वि रो॑चयद॒यं सिन्धु॑भ्यो अभवदु लोक॒कृत्। अ॒यं त्रिः स॒प्त दु॑दुहा॒न आ॒शिरं॒ सोमो॑ हृ॒दे प॑वते॒ चारु॑ मत्स॒रः॥

परमात्मा ने प्रकृति से महत्तत्त्व उत्पन्न किया और महत्तत्त्व से जो अहंकारादि एकविंशति गण है, उसी का यहाँ “त्रिः सप्त” शब्द से गणन है, किसी अन्य का नहीं॥२१॥

पव॑स्व सोम दि॒व्येषु॒ धाम॑सु सृजा॒न इ॑न्दो क॒लशे॑ प॒वित्र॒ आ। सीद॒न्निन्द्र॑स्य ज॒ठरे॒ कनि॑क्रद॒न्नृभि॑र्य॒तः सूर्य॒मारो॑हयो दि॒वि॥

परमात्मा सूर्य-चन्द्रमादिकों का निर्माण करता हुआ इस विविध प्रकार की रचना का निर्माण करके प्रजा को उद्योगी बनाने के लिये कर्मयोगी की कर्माग्नि को प्रदीप्त करता है॥२२॥

अद्रि॑भिः सु॒तः प॑वसे प॒वित्र॒ आँ इन्द॒विन्द्र॑स्य ज॒ठरे॑ष्वावि॒शन्। त्वं नृ॒चक्षा॑ अभवो विचक्षण॒ सोम॑ गो॒त्रमङ्गि॑रोभ्योऽवृणो॒रप॑॥

“गौर्वाग्गृहीता अनेनेति गोत्रं शरीरम्” जो वाणी को ग्रहण करे, उसका नाम यहाँ गोत्र है। इस प्रकार यहाँ शरीर और प्राणों का वर्णन इस मन्त्र में किया गया है और सायणाचार्य ने गोत्र के अर्थ यहाँ मेघ के किये हैं और “अङ्गिरोभ्यः” के अर्थ कुछ नहीं किये है। यदि सायणाचार्य के अर्थों को उपयुक्त भी माना जाय, तो अर्थ ये बनते हैं कि हे सोमलते! तुम अङ्गिरादि ऋषियों से मेघों को दूर करो। इस प्रकार सर्वथा असंबद्ध प्रलाप हो जाता है। वास्तव में यह प्रकरण कर्मयोगी का है और उसी को प्राणों की पुष्टि के द्वारा विघ्नों को दूर करना लिखा है॥२३॥

त्वां सो॑म॒ पव॑मानं स्वा॒ध्योऽनु॒ विप्रा॑सो अमदन्नव॒स्यवः॑। त्वां सु॑प॒र्ण आभ॑रद्दि॒वस्परीन्दो॒ विश्वा॑भिर्म॒तिभिः॒ परि॑ष्कृतम्॥

जो लोग विद्या द्वारा अपनी बुद्धि का परिष्कार करते हैं, वे ही परमात्मा की विभूति को जान सकते हैं, अन्य नहीं॥२४॥

अव्ये॑ पुना॒नं परि॒ वार॑ ऊ॒र्मिणा॒ हरिं॑ नवन्ते अ॒भि स॒प्त धे॒नवः॑। अ॒पामु॒पस्थे॒ अध्या॒यवः॑ क॒विमृ॒तस्य॒ योना॑ महि॒षा अ॑हेषत॥

सदा सद्विवेकी लोग अन्य उपास्य देवों की उपासना को छोड़कर सब कर्म्मों के अधिष्ठाता परमात्मा की ही एकमात्र उपासना करते हैं, किसी अन्य की नहीं॥२५॥

इन्दुः॑ पुना॒नो अति॑ गाहते॒ मृधो॒ विश्वा॑नि कृ॒ण्वन्त्सु॒पथा॑नि॒ यज्य॑वे। गाः कृ॑ण्वा॒नो नि॒र्णिजं॑ हर्य॒तः क॒विरत्यो॒ न क्रीळ॒न्परि॒ वार॑मर्षति॥

जो लोग परमात्मा की आज्ञाओं का पालन करते हैं, परमात्मा उनके लिये सब रास्तों को सुगम करता है॥२६॥

अ॒स॒श्चतः॑ श॒तधा॑रा अभि॒श्रियो॒ हरिं॑ नव॒न्तेऽव॒ ता उ॑द॒न्युवः॑। क्षिपो॑ मृजन्ति॒ परि॒ गोभि॒रावृ॑तं तृ॒तीये॑ पृ॒ष्ठे अधि॑ रोच॒ने दि॒वः॥

द्युलोकादिकों के प्रकाशक परमात्मा को मनुष्य ज्ञान की वृत्तियों से ही साक्षात्कार करता है, अन्यथा नहीं॥२७॥

तवे॒माः प्र॒जा दि॒व्यस्य॒ रेत॑स॒स्त्वं विश्व॑स्य॒ भुव॑नस्य राजसि। अथे॒दं विश्वं॑ पवमान ते॒ वशे॒ त्वमि॑न्दो प्रथ॒मो धा॑म॒धा अ॑सि॥

परमात्मा सबका अधिकरण है, इसलिये सब भूतों का निवासस्थान वही है॥२८॥

त्वं स॑मु॒द्रो अ॑सि विश्व॒वित्क॑वे॒ तवे॒माः पञ्च॑ प्र॒दिशो॒ विध॑र्मणि। त्वं द्यां च॑ पृथि॒वीं चाति॑ जभ्रिषे॒ तव॒ ज्योतीं॑षि पवमान॒ सूर्यः॑॥

सम्पूर्ण भूतों की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का हेतु होने से परमात्मा का नाम समुद्र है। उसी सर्वाधार सर्वनिधि महासागर से इस सम्पूर्ण संसार की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय होते हैं, किसी अन्य से नहीं॥२९॥

त्वं प॒वित्रे॒ रज॑सो॒ विध॑र्मणि दे॒वेभ्यः॑ सोम पवमान पूयसे। त्वामु॒शिजः॑ प्रथ॒मा अ॑गृभ्णत॒ तुभ्ये॒मा विश्वा॒ भुव॑नानि येमिरे॥

परमात्मा सम्पूर्ण लोक-लोकान्तरों की उत्पत्ति का कर्ता है और उसी की विभूति को सब लोक-लोकान्तर प्रदीप्त कर रहे हैं॥३०॥

प्र रे॒भ ए॒त्यति॒ वार॑म॒व्ययं॒ वृषा॒ वने॒ष्वव॑ चक्रद॒द्धरिः॑। सं धी॒तयो॑ वावशा॒ना अ॑नूषत॒ शिशुं॑ रिहन्ति म॒तयः॒ पनि॑प्नतम्॥

जो लोग चित्तवृत्ति को अन्य प्रवाहों से हटाकर एकमात्र परमात्मा का ध्यान करते हैं, वे ही परमात्मा को भली-भाँति साक्षात्कार करते हैं, अन्य नहीं॥३१॥

स सूर्य॑स्य र॒श्मिभिः॒ परि॑ व्यत॒ तन्तुं॑ तन्वा॒नस्त्रि॒वृतं॒ यथा॑ वि॒दे। नय॑न्नृ॒तस्य॑ प्र॒शिषो॒ नवी॑यसीः॒ पति॒र्जनी॑ना॒मुप॑ याति निष्कृ॒तम्॥

परमात्मा इस संसार में प्रथम, मध्यम, उत्तम तीन प्रकार के ब्रह्मचर्य्य की मर्यादा को निर्माण करता है। उन कृतब्रह्मचर्य्य पुरुषों से शुभ सन्तति का प्रवाह संसार में प्रचलित होता है॥३२॥

राजा॒ सिन्धू॑नां पवते॒ पति॑र्दि॒व ऋ॒तस्य॑ याति प॒थिभिः॒ कनि॑क्रदत्। स॒हस्र॑धारः॒ परि॑ षिच्यते॒ हरिः॑ पुना॒नो वाचं॑ ज॒नय॒न्नुपा॑वसुः॥

परमात्मा अपनी वेदरूपी वाणी को उत्पन्न करके सदा उपदेश करता है। परमात्मानुयायी पुरुषों को चाहिये कि उसकी आज्ञानुसार अपना जीवन बनायें॥३३॥

पव॑मान॒ मह्यर्णो॒ वि धा॑वसि॒ सूरो॒ न चि॒त्रो अव्य॑यानि॒ पव्य॑या। गभ॑स्तिपूतो॒ नृभि॒रद्रि॑भिः सु॒तो म॒हे वाजा॑य॒ धन्या॑य धन्वसि॥

जिस प्रकार सूर्य्य अपनी किरणों द्वारा स्वाश्रित पदार्थों को प्रकाशित करता है, इसी प्रकार परमात्मा अपनी ज्ञानशक्ति से अपने भक्तों का प्रकाशक है॥३४॥

इष॒मूर्जं॑ पवमाना॒भ्य॑र्षसि श्ये॒नो न वंसु॑ क॒लशे॑षु सीदसि। इन्द्रा॑य॒ मद्वा॒ मद्यो॒ मदः॑ सु॒तो दि॒वो वि॑ष्ट॒म्भ उ॑प॒मो वि॑चक्ष॒णः॥

परमात्मा द्युभ्वादि लोकों का आधार है और उसी के आधार में चराचर सृष्टि की स्थिति है और वेदादि विद्याओं का प्रवक्ता होने से वह सर्वोपरि विचक्षण है॥३५॥

स॒प्त स्वसा॑रो अ॒भि मा॒तरः॒ शिशुं॒ नवं॑ जज्ञा॒नं जेन्यं॑ विप॒श्चित॑म्। अ॒पां ग॑न्ध॒र्वं दि॒व्यं नृ॒चक्ष॑सं॒ सोमं॒ विश्व॑स्य॒ भुव॑नस्य रा॒जसे॑॥

परमात्मा का ध्यान इसलिये किया जाता है कि परमात्मा अपहतपाप्मादि गुणों को देकर उपासक को भी दिव्य दृष्टि दे, ताकि उपासक लोक-लोकान्तरों के ज्ञान को उपलब्ध कर सकें। इसी अभिप्राय से योग में लिखा है कि ‘भुवनज्ञानं सूर्य्ये संयमात्’ परमात्मा में चित्तवृत्ति का निरोध करने से लोक-लोकान्तरों का ज्ञान होता है॥३६॥

ई॒शा॒न इ॒मा भुव॑नानि॒ वीय॑से युजा॒न इ॑न्दो ह॒रितः॑ सुप॒र्ण्यः॑। तास्ते॑ क्षरन्तु॒ मधु॑मद्घृ॒तं पय॒स्तव॑ व्र॒ते सो॑म तिष्ठन्तु कृ॒ष्टयः॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा के नियम में स्थिर रहने का वर्णन है, जैसा कि “अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि” इत्यादि मन्त्रों में व्रत की प्रार्थना है। यहाँ भी परमात्मा के नियमरूप व्रत के परिपालन की प्रार्थना है ॥३७॥

त्वं नृ॒चक्षा॑ असि सोम वि॒श्वतः॒ पव॑मान वृषभ॒ ता वि धा॑वसि। स नः॑ पवस्व॒ वसु॑म॒द्धिर॑ण्यवद्व॒यं स्या॑म॒ भुव॑नेषु जी॒वसे॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा को कर्मों के साक्षीरूप से वर्णन किया है ॥३८॥

गो॒वित्प॑वस्व वसु॒विद्धि॑रण्य॒विद्रे॑तो॒धा इ॑न्दो॒ भुव॑ने॒ष्वर्पि॑तः। त्वं सु॒वीरो॑ असि सोम विश्व॒वित्तं त्वा॒ विप्रा॒ उप॑ गि॒रेम आ॑सते॥

इस मन्त्र में परमात्मा को ज्ञान, प्रकाश और क्रिया इत्यादि अनन्त गुणों के आधाररूप से वर्णन किया है। इसी आशय को लेकर (स्वाभाविकी ज्ञान बल क्रिया) इत्यादि उपनिषद्वाक्यों में परमात्मा को ज्ञानबलक्रिया का आधार वर्णन किया है॥३९॥

उन्मध्व॑ ऊ॒र्मिर्व॒नना॑ अतिष्ठिपद॒पो वसा॑नो महि॒षो वि गा॑हते। राजा॑ प॒वित्र॑रथो॒ वाज॒मारु॑हत्स॒हस्र॑भृष्टिर्जयति॒ श्रवो॑ बृ॒हत्॥

महिष शब्द के अर्थ यहाँ महापुरुष के हैं। “महिष इति महन्नामसु पठितम्। ” नि. अ.। ३। खं. १३॥महिष यह निरुक्त में महत्त्व का वाचक है। महापुरुष यहाँ कर्मयोगी और ज्ञानयोगी को माना है। उक्त पुरुषों में महत्त्व परमात्मा के सद्गुणों के धारण करने से आता है, इसीलिये इनको महापुरुष कहा है ॥४०॥

स भ॒न्दना॒ उदि॑यर्ति प्र॒जाव॑तीर्वि॒श्वायु॒र्विश्वाः॑ सु॒भरा॒ अह॑र्दिवि। ब्रह्म॑ प्र॒जाव॑द्र॒यिमश्व॑पस्त्यं पी॒त इ॑न्द॒विन्द्र॑म॒स्मभ्यं॑ याचतात्॥

इस मन्त्र में ऐश्वर्य्य की प्रार्थना करते हुए वेदों के सदुपदेशरूपी महत्त्व का वर्णन किया है ॥४१॥

सो अग्रे॒ अह्नां॒ हरि॑र्हर्य॒तो मदः॒ प्र चेत॑सा चेतयत॒त अनु॒ द्युभिः॑। द्वा जना॑ या॒तय॑न्न॒न्तरी॑यते॒ नरा॑ च॒ शंसं॒ दैव्यं॑ च ध॒र्तरि॑॥

वह परमात्मा इस प्रकृति की नानाविध शक्तियों को संयोजन करता हुआ कर्मयोगी और ज्ञानयोगी दोनों प्रकार के पुरुषों को प्रशंसनीय बनाता है ॥४२॥

अ॒ञ्जते॒ व्य॑ञ्जते॒ सम॑ञ्जते॒ क्रतुं॑ रिहन्ति॒ मधु॑ना॒भ्य॑ञ्जते। सिन्धो॑रुच्छ्वा॒से प॒तय॑न्तमु॒क्षणं॑ हिरण्यपा॒वाः प॒शुमा॑सु गृभ्णते॥

परमात्मा पतितोद्धारक है। जो पुरुष अपने मन्द कर्मों से गिरकर भी उद्योगी बना रहता है, परमात्मा उसका अवश्यमेव उद्धार करता है ॥४३॥

वि॒प॒श्चिते॒ पव॑मानाय गायत म॒ही न धारात्यन्धो॑ अर्षति। अहि॒र्न जू॒र्णामति॑ सर्पति॒ त्वच॒मत्यो॒ न क्रीळ॑न्नसर॒द्वृषा॒ हरिः॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा की उपासना का कथन किया गया है कि हे उपासक लोगों! तुम उस सर्वज्ञ पुरुष की उपासना करो, जो सर्वोपरि विज्ञानी ओर पतितोद्धारक है। इस मन्त्र में “विपश्चिते” शब्द परमात्मा के लिये आया है और पहिले-पहिल “विपश्चित्” शब्द मेधावी के लिये वेद में ही आया है, इसी का अनुकरण आधुनिक कोषों में भी किया गया है ॥४४॥

अ॒ग्रे॒गो राजाप्य॑स्तविष्यते वि॒मानो॒ अह्नां॒ भुव॑ने॒ष्वर्पि॑तः। हरि॑र्घृ॒तस्नुः॑ सु॒दृशी॑को अर्ण॒वो ज्यो॒तीर॑थः पवते रा॒य ओ॒क्यः॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा को सर्वाधिकरणरूप से वर्णन किया है, जैसा कि “यस्मिन् विश्वानि भुवनानि तस्थुः” ऋ.। १०। १२ ६। में यही वर्णन किया है कि सर्व लोक-लोकान्तर उसी में निवास करते हैं॥४५॥

अस॑र्जि स्क॒म्भो दि॒व उद्य॑तो॒ मदः॒ परि॑ त्रि॒धातु॒र्भुव॑नान्यर्षति। अं॒शुं रि॑हन्ति म॒तयः॒ पनि॑प्नतं गि॒रा यदि॑ नि॒र्णिज॑मृ॒ग्मिणो॑ य॒युः॥

जब उपासक शुद्धभाव से उसका स्वतन करता है, तो उसकी प्राप्ति अवश्यमेव होती है ॥४६॥

प्र ते॒ धारा॒ अत्यण्वा॑नि मे॒ष्यः॑ पुना॒नस्य॑ सं॒यतो॑ यन्ति॒ रंह॑यः। यद्गोभि॑रिन्दो च॒म्वोः॑ सम॒ज्यस॒ आ सु॑वा॒नः सो॑म क॒लशे॑षु सीदसि॥

जब उपासक बाह्यवृत्तियों का निरोध करके अन्तर्मुख होकर परमात्मा का ध्यान करता है, तो वह परमात्मा के साक्षात्कार को अवश्यमेव प्राप्त होता है ॥४७॥

पव॑स्व सोम क्रतु॒विन्न॑ उ॒क्थ्योऽव्यो॒ वारे॒ परि॑ धाव॒ मधु॑ प्रि॒यम्। ज॒हि विश्वा॑न्र॒क्षस॑ इन्दो अ॒त्रिणो॑ बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

इस मन्त्र में राक्षसों से तात्पर्य्य यज्ञविघ्नकारी दुष्टाचारियों से है, क्योंकि “रक्षन्ति येभ्यस्ते राक्षसाः” जिनसे रक्षा की जाय, उनका नाम यहाँ राक्षस है। तात्पर्य्य यह है कि सब विघ्नों से बचाकर परमात्मा हमारे यज्ञों की पूर्ति करे ॥४८॥यह ८६ वाँ सूक्त और २१ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र तु द्र॑व॒ परि॒ कोशं॒ नि षी॑द॒ नृभिः॑ पुना॒नो अ॒भि वाज॑मर्ष। अश्वं॒ न त्वा॑ वा॒जिनं॑ म॒र्जय॒न्तोऽच्छा॑ ब॒र्ही र॑श॒नाभि॑र्नयन्ति॥

यहाँ (वाजी) नाम बलवान् का है, बलस्वरूप परमात्मा से यहाँ हृदय की शुद्धि की प्रार्थना की गई है। जो लोग ‘वाजी’ के अर्थ घोड़ा करके वेदों के अर्थों को उच्चभाव से गिराकर निन्दित बना देते हैं, वे अत्यन्त भूल करते हैं। ‘वाज’ शब्द के अर्थ अन्न, ऐश्वर्य्य और बल ही हैं, इसलिये “ये वाजिनं परिपश्यन्ति पक्वम्” इत्यादि मन्त्रों में ऐश्वर्य के परिपक्व करने का अर्थ है, घोड़ा मारने का नहीं॥१॥

स्वा॒यु॒धः प॑वते दे॒व इन्दु॑रशस्ति॒हा वृ॒जनं॒ रक्ष॑माणः। पि॒ता दे॒वानां॑ जनि॒ता सु॒दक्षो॑ विष्ट॒म्भो दि॒वो ध॒रुणः॑ पृथि॒व्याः॥

यहाँ सुदक्षादि नामों से उक्त परमात्मा प्रकारान्तर से वर्णन किया है ॥२॥

ऋषि॒र्विप्रः॑ पुरए॒ता जना॑नामृ॒भुर्धीर॑ उ॒शना॒ काव्ये॑न। स चि॑द्विवेद॒ निहि॑तं॒ यदा॑सामपी॒च्यं१॒॑ गुह्यं॒ नाम॒ गोना॑म्॥

‘ऋषति सर्वत्र गच्छति व्यापकत्वेन सर्वं व्याप्नोति’ इति ऋषिः, परमात्मा जो सर्वत्र व्यापक है, उसका नाम यहाँ ऋषि है। यहाँ ऋषि, विप्र इत्यादि नामों से परमात्मा का वर्णन किया है, किसी जड़ वस्तु का नहीं ॥३॥

ए॒ष स्य ते॒ मधु॑माँ इन्द्र॒ सोमो॒ वृषा॒ वृष्णे॒ परि॑ प॒वित्रे॑ अक्षाः। स॒ह॒स्र॒साः श॑त॒सा भू॑रि॒दावा॑ शश्वत्त॒मं ब॒र्हिरा वा॒ज्य॑स्थात्॥

बर्हिः, इति ‘अन्तरिक्षनामसु पठितम्’ नि. अ.। २। खं. १। बर्हिः शब्द के मुख्यार्थ अन्तरिक्ष हैं। जिस प्रकार अन्तरिक्ष नाना प्रकार की ज्योतियों का आधार और अनन्त प्रकार कामनारूप वृष्टियों का आधार है, इसी प्रकार यज्ञ भी अन्तरिक्ष के समान विस्तृत है। यहाँ रूपकालङ्कार से यज्ञ को बर्हिःरूप से वर्णन किया है ॥४॥

ए॒ते सोमा॑ अ॒भि ग॒व्या स॒हस्रा॑ म॒हे वाजा॑या॒मृता॑य॒ श्रवां॑सि। प॒वित्रे॑भिः॒ पव॑माना असृग्रञ्छ्रव॒स्यवो॒ न पृ॑त॒नाजो॒ अत्याः॑॥

जो लोग संसार में विजेता बनना चाहें, वे परमात्मा के विचित्र भावों को धारण करें। जिस प्रकार सत्पुरुष के भावों को धारण करने से पुरुष सत्पुरुष बन सकता है, इसी प्रकार उस आदिपुरुष परमात्मा के गुणों के धारण करने से उपासक सत्पुरुष महापुरुष बन सकता है, इसका नाम परमात्मयोग है॥५॥

परि॒ हि ष्मा॑ पुरुहू॒तो जना॑नां॒ विश्वास॑र॒द्भोज॑ना पू॒यमा॑नः। अथा भ॑र श्येनभृत॒ प्रयां॑सि र॒यिं तुञ्जा॑नो अ॒भि वाज॑मर्ष॥

इस मन्त्र में परमात्मा को सर्वैश्वर्य्यप्रदातारूप से वर्णन किया है ॥६॥

ए॒ष सु॑वा॒नः परि॒ सोमः॑ प॒वित्रे॒ सर्गो॒ न सृ॒ष्टो अ॑दधाव॒दर्वा॑। ति॒ग्मे शिशा॑नो महि॒षो न शृङ्गे॒ गा ग॒व्यन्न॒भि शूरो॒ न सत्वा॑॥

जो लोग श्रवण-मननादि साधनों के द्वारा अपने अन्तःकरण को ज्ञान का पात्र बनाते हैं, परमात्मा उनके अन्तःकरण को अवश्यमेव ज्ञान से भरपूर करता है ॥७॥

ए॒षा य॑यौ पर॒माद॒न्तरद्रेः॒ कूचि॑त्स॒तीरू॒र्वे गा वि॑वेद। दि॒वो न वि॒द्युत्स्त॒नय॑न्त्य॒भ्रैः सोम॑स्य ते पवत इन्द्र॒ धारा॑॥

परमात्मा अपने भक्त के हृदय में अपने भावों को प्रकाश करता है ॥८॥

उ॒त स्म॑ रा॒शिं परि॑ यासि॒ गोना॒मिन्द्रे॑ण सोम स॒रथं॑ पुना॒नः। पू॒र्वीरिषो॑ बृह॒तीर्जी॑रदानो॒ शिक्षा॑ शचीव॒स्तव॒ ता उ॑प॒ष्टुत्॥

इस मन्त्र में परमात्मा शुभ शिक्षाओं का उपदेश करता है और ऐश्वर्यप्रदान के भावों का प्रकाश करता है ॥९॥यह ८७ वाँ सूक्त और २३ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

अ॒यं सोम॑ इन्द्र॒ तुभ्यं॑ सुन्वे॒ तुभ्यं॑ पवते॒ त्वम॑स्य पाहि। त्वं ह॒ यं च॑कृ॒षे त्वं व॑वृ॒ष इन्दुं॒ मदा॑य॒ युज्या॑य॒ सोम॑म्॥

जो लोग परमात्मा को शुद्धभाव से वर्णन करते हैं, परमात्मा उनको अवश्यमेव शुद्धि प्रदान करता है ॥१॥

स ईं॒ रथो॒ न भु॑रि॒षाळ॑योजि म॒हः पु॒रूणि॑ सा॒तये॒ वसू॑नि। आदीं॒ विश्वा॑ नहु॒ष्या॑णि जा॒ता स्व॑र्षाता॒ वन॑ ऊ॒र्ध्वा न॑वन्त॥

परमात्मा हमको अनन्त प्रकार के ऐश्वर्य्य प्रदान करे और हमारे अन्यायकारी प्रतिपक्षियों को दूर करे ॥२॥

वा॒युर्न यो नि॒युत्वाँ॑ इ॒ष्टया॑मा॒ नास॑त्येव॒ हव॒ आ शम्भ॑विष्ठः। वि॒श्ववा॑रो द्रविणो॒दा इ॑व॒ त्मन्पू॒षेव॑ धी॒जव॑नोऽसि सोम॥

इस मन्त्र में पूर्वोक्त गुणसम्पन्न परमात्मा से यह प्रार्थना है कि हे परमात्मन्! आप हमारे अन्तःकरण को शुद्ध करें ॥३॥

इन्द्रो॒ न यो म॒हा कर्मा॑णि॒ चक्रि॑र्ह॒न्ता वृ॒त्राणा॑मसि सोम पू॒र्भित्। पै॒द्वो न हि त्वमहि॑नाम्नां ह॒न्ता विश्व॑स्यासि सोम॒ दस्योः॑॥

परमात्मा सब प्रकार के अज्ञानों का नाश करनेवाला है। उसकी कृपा से उपासक में ऐसा प्रभाव उत्पन्न होता है, जिससे वह विद्युत् के समान तेजस्वी बनकर विरोधी शक्तियों का दलन करता है ॥४॥

अ॒ग्निर्न यो वन॒ आ सृ॒ज्यमा॑नो॒ वृथा॒ पाजां॑सि कृणुते न॒दीषु॑। जनो॒ न युध्वा॑ मह॒त उ॑प॒ब्दिरिय॑र्ति॒ सोमः॒ पव॑मान ऊ॒र्मिम्॥

अग्नि जिस प्रकार सब तेजों को तिरस्कृत करके अपने में मिला लेता है अर्थात् विद्युदादि तेज जैसे अन्य तुच्छ तेजों को तिरस्कृत कर देता है, इसी प्रकार परमात्मा के समक्ष सब तेज तुच्छ हैं अर्थात् परमात्मा ही सब ज्योतियों की ज्योति होने से स्वयंज्योति है ॥५॥

ए॒ते सोमा॒ अति॒ वारा॒ण्यव्या॑ दि॒व्या न कोशा॑सो अ॒भ्रव॑र्षाः। वृथा॑ समु॒द्रं सिन्ध॑वो॒ न नीचीः॑ सु॒तासो॑ अ॒भि क॒लशाँ॑ असृग्रन्॥

जिन पुरुषों का अन्तःकरण पवित्र है, अर्थात् जिन्होंने श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन द्वारा अपने अन्तःकरणों को शुद्ध किया है, परमात्मा के ज्ञान का प्रवाह उनके अन्तःकरणों की ओर स्वतः ही प्रवाहित होता है ॥६॥

शु॒ष्मी शर्धो॒ न मारु॑तं पव॒स्वान॑भिशस्ता दि॒व्या यथा॒ विट्। आपो॒ न म॒क्षू सु॑म॒तिर्भ॑वा नः स॒हस्रा॑प्साः पृतना॒षाण्न य॒ज्ञः॥

परमात्मा का बल सब बलों में से मुख्य है, इसीलिये “य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उषासते” ऋ.। मं.। १०। २१। २ इत्यादि मन्त्रों में जिसको सर्वोपरि बलस्वरूप कथन किया गया है, वह हमको बल प्रदान करे ॥७॥

राज्ञो॒ नु ते॒ वरु॑णस्य व्र॒तानि॑ बृ॒हद्ग॑भी॒रं तव॑ सोम॒ धाम॑। शुचि॒ष्ट्वम॑सि प्रि॒यो न मि॒त्रो द॒क्षाय्यो॑ अर्य॒मेवा॑सि सोम॥

इस मन्त्र में परमात्मा ने व्रतपालन का उपदेश किया। जो पुरुष व्रती होकर परमात्मा के नियम का पालन करता है, वह परमात्मा की आज्ञाओं का पालन करता है ॥८॥यह ८८ वाँ सूक्त और २४ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

प्रो स्य वह्निः॑ प॒थ्या॑भिरस्यान्दि॒वो न वृ॒ष्टिः पव॑मानो अक्षाः। स॒हस्र॑धारो असद॒न्न्य१॒॑स्मे मा॒तुरु॒पस्थे॒ वन॒ आ च॒ सोमः॑॥

जिस प्रकार माता की गोद में पुत्र सानन्द विराजमान होता है, इसी प्रकार उपासक लोग उसके अङ्क में विराजमान हैं ॥१॥तात्पर्य यह है कि ईश्वरविश्वासी भक्तों को ईश्वर पर इतना विश्वास होता है कि वे माता के समान उसकी गोद में विराजमान होकर किसी दुःख का अनुभव नहीं करते ॥

राजा॒ सिन्धू॑नामवसिष्ट॒ वास॑ ऋ॒तस्य॒ नाव॒मारु॑ह॒द्रजि॑ष्ठाम्। अ॒प्सु द्र॒प्सो वा॑वृधे श्ये॒नजू॑तो दु॒ह ईं॑ पि॒ता दु॒ह ईं॑ पि॒तुर्जाम्॥

जो पुरुष कर्मयोगी बनकर परमात्मा की आज्ञा के अनुसार परमात्मा के नियमों का पालन करता है, वह परमात्मा के साक्षात्कार को अवश्यमेव प्राप्त होता है ॥२॥

सिं॒हं न॑सन्त॒ मध्वो॑ अ॒यासं॒ हरि॑मरु॒षं दि॒वो अ॒स्य पति॑म्। शूरो॑ यु॒त्सु प्र॑थ॒मः पृ॑च्छते॒ गा अस्य॒ चक्ष॑सा॒ परि॑ पात्यु॒क्षा॥

जो पुरुष परमात्मपरायण होते हैं, परमात्मा उनकी अपने ज्ञान के द्वारा रक्षा करता है ॥३॥

मधु॑पृष्ठं घो॒रम॒यास॒मश्वं॒ रथे॑ युञ्जन्त्युरुच॒क्र ऋ॒ष्वम्। स्वसा॑र ईं जा॒मयो॑ मर्जयन्ति॒ सना॑भयो वा॒जिन॑मूर्जयन्ति॥

इस मन्त्र में “जामि” नाम चित्तवृत्ति का है, क्योंकि वृत्ति मन से उत्पन्न होने के कारण अन्य वृत्तियें भी उसके साथ सम्बन्ध रखने के कारण जामि कहलाती हैं ॥उक्त वृत्तियें जब परमात्मा का साक्षात्कार करती हैं, तो उपासक में आत्मिकबल उत्पन्न होता है अर्थात् शारीरिक, आत्मिक, सामाजिक तीनों प्रकार के बल की उत्पत्ति का कारण एकमात्र परमात्मा है, कोई अन्य नहीं ॥४॥

चत॑स्र ईं घृत॒दुहः॑ सचन्ते समा॒ने अ॒न्तर्ध॒रुणे॒ निष॑त्ताः। ता ई॑मर्षन्ति॒ नम॑सा पुना॒नास्ता ईं॑ वि॒श्वतः॒ परि॑ षन्ति पू॒र्वीः॥

प्रकृति की परमाणुरूप शक्तियों से ईश्वर का ऐश्वर्य विभूषित हो रहा है। इन सब शक्तियों का केन्द्र एकमात्र परमात्मा ही है। उसी एकमात्र परब्रह्म में ये उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय करती हैं अर्थात् आविर्भाव का नाम उत्पत्ति और सूक्ष्मरूप से विराजमान होने का नाम प्रलय है ॥५॥

वि॒ष्ट॒म्भो दि॒वो ध॒रुणः॑ पृथि॒व्या विश्वा॑ उ॒त क्षि॒तयो॒ हस्ते॑ अस्य। अस॑त्त॒ उत्सो॑ गृण॒ते नि॒युत्वा॒न्मध्वो॑ अं॒शुः प॑वत इन्द्रि॒याय॑॥

द्युभ्वादिलोकों का अधिकरण एकमात्र वही परमात्मा है अर्थात् उसी परमात्मा के सहारे सब ब्रह्माण्डों की स्थिति है। इस प्रकार यहाँ परमात्मा को अधिकरणरूप से वर्णन किया है ॥६॥

व॒न्वन्नवा॑तो अ॒भि दे॒ववी॑ति॒मिन्द्रा॑य सोम वृत्र॒हा प॑वस्व। श॒ग्धि म॒हः पु॑रुश्च॒न्द्रस्य॑ रा॒यः सु॒वीर्य॑स्य॒ पत॑यः स्याम॥

हे परमात्मन्! आपकी कृपा से हम सब लोक-लोकान्तरों के पति हों ॥७॥यह ८९ वाँ सूक्त २५ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

प्र हि॑न्वा॒नो ज॑नि॒ता रोद॑स्यो॒ रथो॒ न वाजं॑ सनि॒ष्यन्न॑यासीत्। इन्द्रं॒ गच्छ॒न्नायु॑धा सं॒शिशा॑नो॒ विश्वा॒ वसु॒ हस्त॑योरा॒दधा॑नः॥

जो-जो विभूतिवाली वस्तु हैं, उन सब में परमात्मा का तेज विराजमान है, इसलिये यहाँ परमात्मा के आयुधों का वर्णन किया है, वास्तव में परमात्मा किसी आयुध को धारण नहीं करता, क्योंकि वह निराकार है॥१॥

अ॒भि त्रि॑पृ॒ष्ठं वृष॑णं वयो॒धामा॑ङ्गू॒षाणा॑मवावशन्त॒ वाणीः॑। वना॒ वसा॑नो॒ वरु॑णो॒ न सिन्धू॒न्वि र॑त्न॒धा द॑यते॒ वार्या॑णि॥

यहाँ तीनों प्रकार के ब्रह्मचर्य का वर्णन अर्थात् ब्रह्मचर्य प्रथम २४ वें वर्ष तक दूसरा ३६ और तीसरा ४० इनको प्रथम, मध्यम, उत्तम कहते हैं। जो पुरुष उक्त प्रकार के ब्रह्मचर्यों को धारण करते हैं, उनको परमात्मा सब प्रकार के ऐश्वर्य्य प्रदान करता है॥२॥

शूर॑ग्रामः॒ सर्व॑वीरः॒ सहा॑वा॒ञ्जेता॑ पवस्व॒ सनि॑ता॒ धना॑नि। ति॒ग्मायु॑धः क्षि॒प्रध॑न्वा स॒मत्स्वषा॑ळ्हः सा॒ह्वान्पृत॑नासु॒ शत्रू॑न्॥

यहाँ परमात्मा का रुद्रधर्म का निरूपण किया। रुद्रधर्म को धारण करनेवाला परमात्मा वीरों के अनन्त सङ्घों में शक्ति उत्पन्न करके संसार से पाप की निवृत्ति करता है। उस अनन्त शक्तियुक्त परमात्मा के अतितीक्ष्ण शस्त्र हैं, जिससे वह अन्यायकारियों की सेना को विदीर्ण करता है॥३॥

उ॒रुग॑व्यूति॒रभ॑यानि कृ॒ण्वन्त्स॑मीची॒ने आ प॑वस्वा॒ पुरं॑धी। अ॒पः सिषा॑सन्नु॒षसः॒ स्व१॒॑र्गाः सं चि॑क्रदो म॒हो अ॒स्मभ्यं॒ वाजा॑न्॥

जो लोग परमात्मा के उपदेश किये हुए शुभमार्गों पर चलते हैं, परमात्मा उनको शुभमार्गों की प्राप्ति कराता है॥४॥

मत्सि॑ सोम॒ वरु॑णं॒ मत्सि॑ मि॒त्रं मत्सीन्द्र॑मिन्दो पवमान॒ विष्णु॑म्। मत्सि॒ शर्धो॒ मारु॑तं॒ मत्सि॑ दे॒वान्मत्सि॑ म॒हामिन्द्र॑मिन्दो॒ मदा॑य॥

इस मन्त्र में कर्मयोगी के क्रिया कौशल्य की पूर्ति के लिये परमात्मा से प्रार्थना की गई है कि हे परमात्मन्! आप कर्मयोगी को सब प्रकार से निपुण करिये॥५॥

ए॒वा राजे॑व॒ क्रतु॑माँ॒ अमे॑न॒ विश्वा॒ घनि॑घ्नद्दुरि॒ता प॑वस्व। इन्दो॑ सू॒क्ताय॒ वच॑से॒ वयो॑ धा यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

इसमें परमात्मा से कल्याण की प्रार्थना की गई है॥६॥यह ९० वाँ सूक्त और २६ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

अस॑र्जि॒ वक्वा॒ रथ्ये॒ यथा॒जौ धि॒या म॒नोता॑ प्रथ॒मो म॑नी॒षी। दश॒ स्वसा॑रो॒ अधि॒ सानो॒ अव्येऽज॑न्ति॒ वह्निं॒ सद॑ना॒न्यच्छ॑॥

इस मन्त्र में प्राणायाम का वर्णन किया है। जो लोग भली-भाँति प्राणायाम करते हैं, वे आध्यात्मिक यज्ञ करते हैं॥१॥

वी॒ती जन॑स्य दि॒व्यस्य॑ क॒व्यैरधि॑ सुवा॒नो न॑हु॒ष्ये॑भि॒रिन्दुः॑। प्र यो नृभि॑र॒मृतो॒ मर्त्ये॑भिर्मर्मृजा॒नोऽवि॑भि॒र्गोभि॑र॒द्भिः॥

जो लोग सत्कर्मों के द्वारा कर्मयज्ञ का सम्पादन करते हैं, वे उत्तम सुख के भागी होते हैं॥२॥

वृषा॒ वृष्णे॒ रोरु॑वदं॒शुर॑स्मै॒ पव॑मानो॒ रुश॑दीर्ते॒ पयो॒ गोः। स॒हस्र॒मृक्वा॑ प॒थिभि॑र्वचो॒विद॑ध्व॒स्मभिः॒ सूरो॒ अण्वं॒ वि या॑ति॥

जो लोग वेदवाणियों का अभ्यास करते हैं, वे सूक्ष्म से सूक्ष्म पदार्थों को प्राप्त होते हैं॥३॥

रु॒जा दृ॒ळ्हा चि॑द्र॒क्षसः॒ सदां॑सि पुना॒न इ॑न्द ऊर्णुहि॒ वि वाजा॑न्। वृ॒श्चोपरि॑ष्टात्तुज॒ता व॒धेन॒ ये अन्ति॑ दू॒रादु॑पना॒यमे॑षाम्॥

जो पुरुष शम-दमादि साधनसम्पन्न होकर परमात्मपरायण होते हैं, परमात्मा उनके सब विघ्नों को दूर करता है और उनके विघ्नकारी राक्षसों का दमन करके उनके मार्ग को सुगम करता है॥४॥

स प्र॑त्न॒वन्नव्य॑से विश्ववार सू॒क्ताय॑ प॒थः कृ॑णुहि॒ प्राचः॑। ये दुः॒षहा॑सो व॒नुषा॑ बृ॒हन्त॒स्ताँस्ते॑ अश्याम पुरुकृत्पुरुक्षो॥

परमात्मा के स्वभाव अर्थात् परमात्मा के सत्यादि धर्मों को राक्षस लोग धारण नहीं कर सकते। उनको केवल दैवी सम्पत्तिवाले ही धारण कर सकते हैं, अन्य नहीं। इस मन्त्र में देवभाव के दिव्यगुणों का और राक्षसों के दुर्गुणों का वर्णन है॥५॥

ए॒वा पु॑ना॒नो अ॒पः स्व१॒॑र्गा अ॒स्मभ्यं॑ तो॒का तन॑यानि॒ भूरि॑। शं नः॒ क्षेत्र॑मु॒रु ज्योतीं॑षि सोम॒ ज्योङ्नः॒ सूर्यं॑ दृ॒शये॑ रिरीहि॥

जो लोग ईश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं, परमात्मा उनके लिये सब प्रकार के ऐश्वर्य्य प्रदान करता है ॥६॥यह ९१ वाँ सूक्त और पहला वर्ग समाप्त हुआ॥

परि॑ सुवा॒नो हरि॑रं॒शुः प॒वित्रे॒ रथो॒ न स॑र्जि स॒नये॑ हिया॒नः। आप॒च्छ्लोक॑मिन्द्रि॒यं पू॒यमा॑नः॒ प्रति॑ दे॒वाँ अ॑जुषत॒ प्रयो॑भिः॥

जो लोग शुद्ध अन्तःकरण से परमात्मा की उपासना करते हैं, परमात्मा उनके अन्तःकरण में पवित्र ज्ञान प्रादुर्भूत करता है॥१॥

अच्छा॑ नृ॒चक्षा॑ असरत्प॒वित्रे॒ नाम॒ दधा॑नः क॒विर॑स्य॒ योनौ॑। सीद॒न्होते॑व॒ सद॑ने च॒मूषूपे॑मग्म॒न्नृष॑यः स॒प्त विप्राः॑॥

जो पुरुष कर्मयोगी है, उसके पाँचों प्राण मन तथा बुद्धि वशीकृत होते हैं। उक्त साधनों द्वारा परमात्मा का अपने अन्तःकरण में साक्षात्कार करता है॥२॥

प्र सु॑मे॒धा गा॑तु॒विद्वि॒श्वदे॑वः॒ सोमः॑ पुना॒नः सद॑ एति॒ नित्य॑म्। भुव॒द्विश्वे॑षु॒ काव्ये॑षु॒ रन्तानु॒ जना॑न्यतते॒ पञ्च॒ धीरः॑॥

योगी पुरुष प्राणायाम द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार करता है, इसी अभिप्राय से यह कथन किया है कि योगी को परमात्मा प्राप्त होता है। वास्तव में परमात्मा सर्वव्यापक है, उसका जाना-आना कहीं नहीं होता॥३॥

तव॒ त्ये सो॑म पवमान नि॒ण्ये विश्वे॑ दे॒वास्त्रय॑ एकाद॒शासः॑। दश॑ स्व॒धाभि॒रधि॒ सानो॒ अव्ये॑ मृ॒जन्ति॑ त्वा न॒द्यः॑ स॒प्त य॒ह्वीः॥

इस मन्त्र में योगविद्या का वर्णन किया है और सप्तनद्यः से तात्पर्य सात प्रकार की नाड़ियों का है, जिनको इड़ा, पिङ्गलादि नामों से कथन किया जाता है। तात्पर्य यह है कि योगी पुरुष उक्त नाड़ियों के द्वारा संयम करके परमात्मयोगी बनें अर्थात् परमात्मा में युक्त हों॥४॥

तन्नु स॒त्यं पव॑मानस्यास्तु॒ यत्र॒ विश्वे॑ का॒रवः॑ सं॒नस॑न्त। ज्योति॒र्यदह्ने॒ अकृ॑णोदु लो॒कं प्राव॒न्मनुं॒ दस्य॑वे कर॒भीक॑म्॥

इस मन्त्र में परमात्मा के सद्रूप का वर्णन किया और उक्त परमात्मा को सब ज्योतियों का प्रकाशक माना है॥५॥

परि॒ सद्मे॑व पशु॒मान्ति॒ होता॒ राजा॒ न स॒त्यः समि॑तीरिया॒नः। सोमः॑ पुना॒नः क॒लशाँ॑ अयासी॒त्सीद॑न्मृ॒गो न म॑हि॒षो वने॑षु॥

इस मन्त्र में राजधर्म का वर्णन है कि जिस प्रकार राजा लोग सत्यासत्य की निर्णय करनेवाली सभा को प्राप्त होते हैं, इसी प्रकार विद्वान् लोग भी न्याय के निर्णय करनेवाली सभाओं को प्राप्त होकर संसार का उद्धार करते हैं॥तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार राजा लोग अपने न्यायरूपी सत्य से संसार का उद्धार करते हैं, इसी प्रकार विद्वान् लोग अपने सदुपदेशों द्वारा संसार का उद्धार करते हैं ॥६॥यह ९२ वाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

सा॒क॒मुक्षो॑ मर्जयन्त॒ स्वसा॑रो॒ दश॒ धीर॑स्य धी॒तयो॒ धनु॑त्रीः। हरिः॒ पर्य॑द्रव॒ज्जाः सूर्य॑स्य॒ द्रोणं॑ ननक्षे॒ अत्यो॒ न वा॒जी॥

योगी पुरुष जब अपने मन का निरोध करता है, तो उसकी इन्द्रियरूप वृत्तियें परमात्मा का साक्षात्कार करती हैं॥१॥

सं मा॒तृभि॒र्न शिशु॑र्वावशा॒नो वृषा॑ दधन्वे पुरु॒वारो॑ अ॒द्भिः। मर्यो॒ न योषा॑म॒भि नि॑ष्कृ॒तं यन्त्सं ग॑च्छते क॒लश॑ उ॒स्रिया॑भिः॥

जिस प्रकार ऐश्वर्य्यप्रद प्रकृतिरूपी विभूति को उद्योगी पुरुष धारण करता है, इसी प्रकार प्रकृति की नानाशक्तिरूप विभूति को कर्मयोगी पुरुष धारण करता है॥२॥

उ॒त प्र पि॑प्य॒ ऊध॒रघ्न्या॑या॒ इन्दु॒र्धारा॑भिः सचते सुमे॒धाः। मू॒र्धानं॒ गावः॒ पय॑सा च॒मूष्व॒भि श्री॑णन्ति॒ वसु॑भि॒र्न नि॒क्तैः॥

इस मन्त्र में इस बात की प्रार्थना है कि परमात्मा गौ, अश्वादि उत्तम धनों को हमको प्रदान करे॥३॥

स नो॑ दे॒वेभिः॑ पवमान र॒देन्दो॑ र॒यिम॒श्विनं॑ वावशा॒नः। र॒थि॒रा॒यता॑मुश॒ती पुरं॑धिरस्म॒द्र्य१॒॑गा दा॒वने॒ वसू॑नाम्॥

जिन पुरुषों पर परमात्मा अत्यन्त प्रसन्न होता है, उनको धनादि ऐश्वर्य्य की हेतु सर्व शक्तियों से परिपूर्ण करता है॥४॥

नू नो॑ र॒यिमुप॑ मास्व नृ॒वन्तं॑ पुना॒नो वा॒ताप्यं॑ वि॒श्वश्च॑न्द्रम्। प्र व॑न्दि॒तुरि॑न्दो ता॒र्यायुः॑ प्रा॒तर्म॒क्षू धि॒याव॑सुर्जगम्यात्॥

इस मन्त्र में प्रकाशस्वरूप परमात्मा से ऐश्वर्य्य की प्रार्थना की गई है ॥५॥यह ९३ वाँ सूक्त और तीसरा वर्ग समाप्त हुआ॥

अधि॒ यद॑स्मिन्वा॒जिनी॑व॒ शुभः॒ स्पर्ध॑न्ते॒ धियः॒ सूर्ये॒ न विशः॑। अ॒पो वृ॑णा॒नः प॑वते कवी॒यन्व्र॒जं न प॑शु॒वर्ध॑नाय॒ मन्म॑॥

परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण है। जो लोग उसके साक्षात् करने के लिये अपनी चित्तवृत्तियों का निरोध करते हैं, परमात्मा उनके ज्ञान का विषय अवश्यमेव होता है ॥१॥

द्वि॒ता व्यू॒र्ण्वन्न॒मृत॑स्य॒ धाम॑ स्व॒र्विदे॒ भुव॑नानि प्रथन्त। धियः॑ पिन्वा॒नाः स्वस॑रे॒ न गाव॑ ऋता॒यन्ती॑र॒भि वा॑वश्र॒ इन्दु॑म्॥

इस मन्त्र में परमात्मा के द्वैतवाद का वर्णन किया है॥२॥

परि॒ यत्क॒विः काव्या॒ भर॑ते॒ शूरो॒ न रथो॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑। दे॒वेषु॒ यशो॒ मर्ता॑य॒ भूष॒न्दक्षा॑य रा॒यः पु॑रु॒भूषु॒ नव्यः॑॥

परमात्मा सर्वज्ञ है और अपनी सर्वज्ञता से सबके ज्ञान में प्रवेश करता है॥३॥

श्रि॒ये जा॒तः श्रि॒य आ निरि॑याय॒ श्रियं॒ वयो॑ जरि॒तृभ्यो॑ दधाति। श्रियं॒ वसा॑ना अमृत॒त्वमा॑य॒न्भव॑न्ति स॒त्या स॑मि॒था मि॒तद्रौ॑॥

जो परमात्मोपासक हैं, उनको परमात्मा सब प्रकार का ऐश्वर्य्य देता है॥४॥

इष॒मूर्ज॑म॒भ्य१॒॑र्षाश्वं॒ गामु॒रु ज्योतिः॑ कृणुहि॒ मत्सि॑ दे॒वान्। विश्वा॑नि॒ हि सु॒षहा॒ तानि॒ तुभ्यं॒ पव॑मान॒ बाध॑से सोम॒ शत्रू॑न्॥

परमात्मा अनन्तशक्तिरूप है। जब वह अपने भक्तों को पात्र समझता है, तो सब प्रकार के अन्यायकारियों को दमन करके सुनीति और धर्म का प्रचार संसार में फैला देता है। तात्पर्य यह है कि जो लोग परमात्मा की दया का पात्र बनते हैं, उन्हीं के शत्रुभूत दुष्ट दस्युओं का परमात्मा दमन करता है, अन्यों के नहीं ॥५॥यह ९४ वाँ सूक्त और चौथा वर्ग समाप्त हुआ॥

कनि॑क्रन्ति॒ हरि॒रा सृ॒ज्यमा॑नः॒ सीद॒न्वन॑स्य ज॒ठर॑ऋ पुना॒नः। नृभि॑र्य॒तः कृ॑णुते नि॒र्णिजं॒ गा अतो॑ म॒तीर्ज॑नयत स्व॒धाभिः॑॥

वास्तव में परमात्मा सर्वव्यापक है। उसके लिये विराजमान होना और विराजमान न होना कथन नहीं किया जा सकता। विराजमान होना यहाँ साक्षात्कार के अभिप्राय से कथन किया गया है ॥१॥

हरिः॑ सृजा॒नः प॒थ्या॑मृ॒तस्येय॑र्ति॒ वाच॑मरि॒तेव॒ नाव॑म्। दे॒वो दे॒वानां॒ गुह्या॑नि॒ नामा॒विष्कृ॑णोति ब॒र्हिषि॑ प्र॒वाचे॑॥

परमात्मा ने ब्रह्मयज्ञ के लिये बहुत सी संज्ञाओं को निर्माण किया, अर्थात् शब्दब्रह्म जो वेद है, उसका निर्माण अर्थात् आविर्भाव संज्ञा-संज्ञिभाव पर निर्भर करता है, इसीलिये संज्ञा-संज्ञिभाव को रहस्यरूप से कथन किया गया है॥२॥

अ॒पामि॒वेदू॒र्मय॒स्तर्तु॑राणाः॒ प्र म॑नी॒षा ई॑रते॒ सोम॒मच्छ॑। न॒म॒स्यन्ती॒रुप॑ च॒ यन्ति॒ सं चा च॑ विशन्त्युश॒तीरु॒शन्त॑म्॥

इसमें परमात्मा की विभूतियों का वर्णन है कि परमात्मा की विभूतियें परमात्मा के भावों को प्रतिक्षण द्योतन करती हैं, जिनसे परमात्मपरायण पुरुष परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं ॥३॥

तं म॑र्मृजा॒नं म॑हि॒षं न साना॑वं॒शुं दु॑हन्त्यु॒क्षणं॑ गिरि॒ष्ठाम्। तं वा॑वशा॒नं म॒तयः॑ सचन्ते त्रि॒तो बि॑भर्ति॒ वरु॑णं समु॒द्रे॥

इस मन्त्र में परमात्मा के स्वरूप का वर्णन है कि वह अत्यन्त सूक्ष्म और दुर्विज्ञेय है। उसको संयमी पुरुष साक्षात्कार कर सकते हैं ॥४॥

इष्य॒न्वाच॑मुपव॒क्तेव॒ होतुः॑ पुना॒न इ॑न्दो॒ वि ष्या॑ मनी॒षाम्। इन्द्र॑श्च॒ यत्क्षय॑थः॒ सौभ॑गाय सु॒वीर्य॑स्य॒ पत॑यः स्याम॥

इस मन्त्र में उक्त परमात्मा से बल की प्रार्थना की गयी है ॥५॥यह ९५ वाँ सूक्त और पाँचवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र से॑ना॒नीः शूरो॒ अग्रे॒ रथा॑नां ग॒व्यन्ने॑ति॒ हर्ष॑ते अस्य॒ सेना॑। भ॒द्रान्कृ॒ण्वन्नि॑न्द्रह॒वान्त्सखि॑भ्य॒ आ सोमो॒ वस्त्रा॑ रभ॒सानि॑ दत्ते॥

इस मन्त्र में राजधर्म का वर्णन है कि परमात्मपरायण पुरुष राजधर्म द्वारा अनन्त प्रकार के ऐश्वर्यों को प्राप्त होते हैं ॥१॥

सम॑स्य॒ हरिं॒ हर॑यो मृजन्त्यश्वह॒यैरनि॑शितं॒ नमो॑भिः। आ ति॑ष्ठति॒ रथ॒मिन्द्र॑स्य॒ सखा॑ वि॒द्वाँ ए॑ना सुम॒तिं या॒त्यच्छ॑॥

जो लोग नम्रभाव से परमात्मा की उपासना करते हैं, वे असंस्कृत होकर भी शुद्ध हो जाते हैं अर्थात् उनकी शुद्धि का कारण एकमात्र परमात्मोपासनरूपी संस्कार ही है, कोई अन्य संस्कार नहीं ॥२॥

स नो॑ देव दे॒वता॑ते पवस्व म॒हे सो॑म॒ प्सर॑स इन्द्र॒पानः॑। कृ॒ण्वन्न॒पो व॒र्षय॒न्द्यामु॒तेमामु॒रोरा नो॑ वरिवस्या पुना॒नः॥

इस मन्त्र में कर्मयोग का वर्णन है कि कर्मयोगी अपने योगजकर्म द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार करता है ॥३॥

अजी॑त॒येऽह॑तये पवस्व स्व॒स्तये॑ स॒र्वता॑तये बृह॒ते। तदु॑शन्ति॒ विश्व॑ इ॒मे सखा॑य॒स्तद॒हं व॑श्मि पवमान सोम॥

जो लोग परमात्मा की आज्ञाओं का पालन करते हैं, वे किसी से दबाये व दीन नहीं किये जा सकते ॥४॥

सोमः॑ पवते जनि॒ता म॑ती॒नां ज॑नि॒ता दि॒वो ज॑नि॒ता पृ॑थि॒व्याः। ज॒नि॒ताग्नेर्ज॑नि॒ता सूर्य॑स्य जनि॒तेन्द्र॑स्य जनि॒तोत विष्णोः॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा के सर्वकर्तृत्व का वर्णन किया है ॥५॥

ब्र॒ह्मा दे॒वानां॑ पद॒वीः क॑वी॒नामृषि॒र्विप्रा॑णां महि॒षो मृ॒गाणा॑म्। श्ये॒नो गृध्रा॑णां॒ स्वधि॑ति॒र्वना॑नां॒ सोमः॑ प॒वित्र॒मत्ये॑ति॒ रेभ॑न्॥

इस मन्त्र में कवि, विप्र, ब्रह्मादि मुख्य-२ शक्तियोंवाले पुरुषों का दृष्टान्त देकर परमात्मा की मुख्यता वर्णन की है ॥६॥

प्रावी॑विपद्वा॒च ऊ॒र्मिं न सिन्धु॒र्गिरः॒ सोमः॒ पव॑मानो मनी॒षाः। अ॒न्तः पश्य॑न्वृ॒जने॒माव॑रा॒ण्या ति॑ष्ठति वृष॒भो गोषु॑ जा॒नन्॥

परमात्मा सबका अन्तर्यामी है। वह सर्वान्तर्यामी होकर सर्वप्रेरक है, “यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्यामन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः” इत्यादि वाक्य उक्त वेद के आधार पर निर्माण किये गये हैं ॥७॥

स म॑त्स॒रः पृ॒त्सु व॒न्वन्नवा॑तः स॒हस्र॑रेता अ॒भि वाज॑मर्ष। इन्द्रा॑येन्दो॒ पव॑मानो मनी॒ष्यं१॒॑शोरू॒र्मिमी॑रय॒ गा इ॑ष॒ण्यन्॥

जो पुरुष अनन्यभक्ति से अर्थात् एकमात्र ईश्वरपरायण होकर ईश्वर की उपासना करते हैं, परमात्मा उन्हें अवश्यमेव आनन्द का प्रदान करता है ॥८॥

परि॑ प्रि॒यः क॒लशे॑ दे॒ववा॑त॒ इन्द्रा॑य॒ सोमो॒ रण्यो॒ मदा॑य। स॒हस्र॑धारः श॒तवा॑ज॒ इन्दु॑र्वा॒जी न सप्तिः॒ सम॑ना जिगाति॥

जो लोग ब्रह्मविद्या द्वारा परमात्मा के तत्त्व का चिन्तन करते हैं, परमात्मा अवश्यमेव उनके ज्ञान का विषय होता है ॥९॥

स पू॒र्व्यो व॑सु॒विज्जाय॑मानो मृजा॒नो अ॒प्सु दु॑दुहा॒नो अद्रौ॑। अ॒भि॒श॒स्ति॒पा भुव॑नस्य॒ राजा॑ वि॒दद्गा॒तुं ब्रह्म॑णे पू॒यमा॑नः॥

शुद्धभाव से उपासना करनेवाले लोगों को परमात्मा सर्वप्रकार के ऐश्वर्य्य और पवित्रताओं का प्रदान करता है ॥१०॥

त्वया॒ हि नः॑ पि॒तरः॑ सोम॒ पूर्वे॒ कर्मा॑णि च॒क्रुः प॑वमान॒ धीराः॑। व॒न्वन्नवा॑तः परि॒धीँरपो॑र्णु वी॒रेभि॒रश्वै॑र्म॒घवा॑ भवा नः॥

परमात्मा की आज्ञापालन करने से देश में ज्ञानी तथा विज्ञानी पुरुषों की उत्पत्ति होती है और देश ऐश्वर्य्यसम्पन्न होता है, इस प्रकार राक्षसभाव निवृत्त होकर सभ्यता के भाव का प्रचार होता है ॥११॥

यथाप॑वथा॒ मन॑वे वयो॒धा अ॑मित्र॒हा व॑रिवो॒विद्ध॒विष्मा॑न्। ए॒वा प॑वस्व॒ द्रवि॑णं॒ दधा॑न॒ इन्द्रे॒ सं ति॑ष्ठ ज॒नयायु॑धानि॥

परमात्मपरायण पुरुष परमात्मा में चित्तवृत्तिनिरोध द्वारा अनन्त प्रकार के ऐश्वर्य्य और आयुधों को उत्पन्न करके देश को अभ्युदयशाली बनाते हैं ॥१२॥

पव॑स्व सोम॒ मधु॑माँ ऋ॒तावा॒पो वसा॑नो॒ अधि॒ सानो॒ अव्ये॑। अव॒ द्रोणा॑नि घृ॒तवा॑न्ति सीद म॒दिन्त॑मो मत्स॒र इ॑न्द्र॒पानः॑॥

जिन पुरुषों के अन्तःकरण प्रेमरूप वारि से नम्रभाव को ग्रहण किये हुए हैं, उनमें परमात्मा के भाव आविर्भाव को प्राप्त होते हैं ॥१३॥

वृ॒ष्टिं दि॒वः श॒तधा॑रः पवस्व सहस्र॒सा वा॑ज॒युर्दे॒ववी॑तौ। सं सिन्धु॑भिः क॒लशे॑ वावशा॒नः समु॒स्रिया॑भिः प्रति॒रन्न॒ आयुः॑॥

जो पुरुष परमात्मा के ज्ञानविज्ञानादि भावों को धारण करके अपने को योग्य बनाते हैं, परमात्मा उनके ऐश्वर्य्य को अवश्यमेव बढ़ाता है ॥१४॥

ए॒ष स्य सोमो॑ म॒तिभिः॑ पुना॒नोऽत्यो॒ न वा॒जी तर॒तीदरा॑तीः। पयो॒ न दु॒ग्धमदि॑तेरिषि॒रमु॒र्वि॑व गा॒तुः सु॒यमो॒ न वोळ्हा॑॥

परमात्मा के सदृश इस संसार में कोई नियन्ता नहीं, उसी के नियम में सब लोक-लोकान्तर भ्रमण करते हैं ॥१५॥

स्वा॒यु॒धः सो॒तृभिः॑ पू॒यमा॑नो॒ऽभ्य॑र्ष॒ गुह्यं॒ चारु॒ नाम॑। अ॒भि वाजं॒ सप्ति॑रिव श्रव॒स्याभि वा॒युम॒भि गा दे॑व सोम॥

जो लोग परमात्मा पर विश्वास रखते हैं, वे अवश्यमेव संयमी बनकर इन्द्रियों के स्वामी बनते हैं ॥१६॥

शिशुं॑ जज्ञा॒नं ह॑र्य॒तं मृ॑जन्ति शु॒म्भन्ति॒ वह्निं॑ म॒रुतो॑ ग॒णेन॑। क॒विर्गी॒र्भिः काव्ये॑ना क॒विः सन्त्सोमः॑ प॒वित्र॒मत्ये॑ति॒ रेभ॑न्॥

परमात्मा के अनन्त सामर्थ्य से यह ब्रह्माण्ड सूक्ष्म से स्थूलावस्था को प्राप्त होता है और उसी से प्रलयावस्था को प्राप्त हो जाता है ॥१७॥

ऋषि॑मना॒ य ऋ॑षि॒कृत्स्व॒र्षाः स॒हस्र॑णीथः पद॒वीः क॑वी॒नाम्। तृ॒तीयं॒ धाम॑ महि॒षः सिषा॑स॒न्त्सोमो॑ वि॒राज॒मनु॑ राजति॒ ष्टुप्॥

परमात्मा सब लोक-लोकान्तरों का नियन्ता है तथा मुक्तिधाम में विराजमान पुरुषों का भी नियन्ता है ॥१८॥

च॒मू॒षच्छ्ये॒नः श॑कु॒नो वि॒भृत्वा॑ गोवि॒न्दुर्द्र॒प्स आयु॑धानि॒ बिभ्र॑त्। अ॒पामू॒र्मिं सच॑मानः समु॒द्रं तु॒रीयं॒ धाम॑ महि॒षो वि॑वक्ति॥

परमात्मा इस विविध रचना का नियन्ता है। उसने अन्तरिक्षलोक को सम्पूर्ण भूतों के इतस्ततः भ्रमण का स्थान बनाया है ॥१९॥

मर्यो॒ न शु॒भ्रस्त॒न्वं॑ मृजा॒नोऽत्यो॒ न सृत्वा॑ स॒नये॒ धना॑नाम्। वृषे॑व यू॒था परि॒ कोश॒मर्ष॒न्कनि॑क्रदच्च॒म्वो॒३॒॑रा वि॑वेश॥

जिस प्रकार मनुष्य इस स्थूल शरीर को चलाता है अर्थात् जीवरूप से इसका अधिष्ठाता है, एवं परमात्मा इस प्रकृतिरूप शरीर का अधिष्ठाता है ॥२०॥

पव॑स्वेन्दो॒ पव॑मानो॒ महो॑भिः॒ कनि॑क्रद॒त्परि॒ वारा॑ण्यर्ष। क्रीळ॑ञ्च॒म्वो॒३॒॑रा वि॑श पू॒यमा॑न॒ इन्द्रं॑ ते॒ रसो॑ मदि॒रो म॑मत्तु॥

परमात्मा के आन्दाम्बुधि रस को केवल कर्म्मयोगी ही पान कर सकता है, आलसी निरुद्यमी लोग उक्त आनन्द के अधिकारी कदापि नहीं हो सकते ॥२१॥

प्रास्य॒ धारा॑ बृह॒तीर॑सृग्रन्न॒क्तो गोभिः॑ क॒लशाँ॒ आ वि॑वेश। साम॑ कृ॒ण्वन्त्सा॑म॒न्यो॑ विप॒श्चित्क्रन्द॑न्नेत्य॒भि सख्यु॒र्न जा॒मिम्॥

परमात्मा अपने भक्तों को सदैव सुरक्षित रखता है। जिस प्रकार मित्र अपने मित्र पर सदैव रक्षा के लिये हाथ प्रसारित करता है, एवं स्वमर्य्यादानुयायी लोगों पर ईश्वर सदैव कृपादृष्टि करता है ॥२२॥

अ॒प॒घ्नन्ने॑षि पवमान॒ शत्रू॑न्प्रि॒यां न जा॒रो अ॒भिगी॑त॒ इन्दुः॑। सीद॒न्वने॑षु शकु॒नो न पत्वा॒ सोमः॑ पुना॒नः क॒लशे॑षु॒ सत्ता॑॥

अन्य पदार्थ जीवात्मा का ऐसा संस्कार नहीं कर सकते, जैसा कि परमात्मा करता है अर्थात् परमात्मज्ञान के संस्कार द्वारा जीवात्मा सर्वथा शुद्ध हो जाता है ॥२३॥

आ ते॒ रुचः॒ पव॑मानस्य सोम॒ योषे॑व यन्ति सु॒दुघाः॑ सुधा॒राः। हरि॒रानी॑तः पुरु॒वारो॑ अ॒प्स्वचि॑क्रदत्क॒लशे॑ देवयू॒नाम्॥

यों तो परमात्मा चराचर ब्रह्माण्ड में सर्वत्रैव देदीप्यमान है, पर भक्तपुरुषों के स्वच्छ अन्तःकरणों में परमात्मा की अभिव्यक्ति सबसे अधिक दीप्तिमती होती है ॥२४॥यह ९६ वाँ सूक्त और दसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

अ॒स्य प्रे॒षा हे॒मना॑ पू॒यमा॑नो दे॒वो दे॒वेभिः॒ सम॑पृक्त॒ रस॑म्। सु॒तः प॒वित्रं॒ पर्ये॑ति॒ रेभ॑न्मि॒तेव॒ सद्म॑ पशु॒मान्ति॒ होता॑॥

विद्वान् पुरुषों के शिष्य अर्थात् जो पुरुष वेदवेत्ता विद्वानों से शिक्षा पाकर विभूषित होते हैं, वे सदैव ऐश्वर्य्य से विभूषित रहते हैं ॥१॥

भ॒द्रा वस्त्रा॑ सम॒न्या॒३॒॑ वसा॑नो म॒हान्क॒विर्नि॒वच॑नानि॒ शंस॑न्। आ व॑च्यस्व च॒म्वोः॑ पू॒यमा॑नो विचक्ष॒णो जागृ॑विर्दे॒ववी॑तौ॥

जो पुरुष अपने आध्यात्मिकादि यज्ञों में उक्त विद्वानों की प्रशंसा तथा सत्कार करते हैं, वे अभ्युदयशील होते हैं ॥२॥

समु॑ प्रि॒यो मृ॑ज्यते॒ सानो॒ अव्ये॑ य॒शस्त॑रो य॒शसां॒ क्षैतो॑ अ॒स्मे। अ॒भि स्व॑र॒ धन्वा॑ पू॒यमा॑नो यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

स्वस्तिवाचन द्वारा मङ्गल को करनेवाले पुरुष सदैव उन्नतिशील होते हैं ॥३॥

प्र गा॑यता॒भ्य॑र्चाम दे॒वान्त्सोमं॑ हिनोत मह॒ते धना॑य। स्वा॒दुः प॑वाते॒ अति॒ वार॒मव्य॒मा सी॑दाति क॒लशं॑ देव॒युर्नः॑॥

परमात्मा उपदेश करता है कि हे पुरुषों! तुम कल्याण की प्राप्ति के लिये विद्वानों का सत्कार करो ॥४॥

इन्दु॑र्दे॒वाना॒मुप॑ स॒ख्यमा॒यन्त्स॒हस्र॑धारः पवते॒ मदा॑य। नृभिः॒ स्तवा॑नो॒ अनु॒ धाम॒ पूर्व॒मग॒न्निन्द्रं॑ मह॒ते सौभ॑गाय॥

जिन पुरुषों के मध्य में एक भी कर्मयोगी होता है, वह सबको उद्योगी बनाकर पवित्र बना देता है ॥५॥

स्तो॒त्रे रा॒ये हरि॑रर्षा पुना॒न इन्द्रं॒ मदो॑ गच्छतु ते॒ भरा॑य। दे॒वैर्या॑हि स॒रथं॒ राधो॒ अच्छा॑ यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

जो परमात्मा प्रलयकाल में सब वस्तुओं का एकमात्र आधार होता हुआ विराजमान है, वह परमात्मा हमको आनन्द प्रदान करे ॥६॥

प्र काव्य॑मु॒शने॑व ब्रुवा॒णो दे॒वो दे॒वानां॒ जनि॑मा विवक्ति। महि॑व्रतः॒ शुचि॑बन्धुः पाव॒कः प॒दा व॑रा॒हो अ॒भ्ये॑ति॒ रेभ॑न्॥

जो उत्तम विद्वान् हैं, वे अपनी रचना द्वारा पुनर्जन्मादि सिद्धान्तों का वर्णन करते हैं। वराह शब्द यहाँ सर्वोपरि तेजस्वी विद्वान् के लिये आया है। सायणाचार्य्य कहते हैं कि पाँव से भूमि को खोदता हुआ वराह जिस प्रकार शब्द करता है, इसी प्रकार सोम भी शब्द करता हुआ आता है। कई एक नवीन लोग इसको वराहावतार में भी लगाते हैं, अस्तु। वराहावतार वा सोम के पक्ष में काव्य का बनाना और उपदेश करना कदापि संगत नहीं हो सकता, इसलिये वराह के अर्थ यहाँ विद्वान् के ही हैं ॥७॥

प्र हं॒सास॑स्तृ॒पलं॑ म॒न्युमच्छा॒मादस्तं॒ वृष॑गणा अयासुः। आ॒ङ्गू॒ष्यं१॒॑ पव॑मानं॒ सखा॑यो दु॒र्मर्षं॑ सा॒कं प्र व॑दन्ति वा॒णम्॥

जो पुरुष परमात्मा के सद्गुणों को परम प्रेम से धारण करते हैं, वे मानो परमात्मा के साथ मैत्री करते हैं। वास्तव में परमात्मा किसी का शत्रु वा मित्र नहीं कहा जा सकता ॥८॥

स रं॑हत उरुगा॒यस्य॑ जू॒तिं वृथा॒ क्रीळ॑न्तं मिमते॒ न गावः॑। प॒री॒ण॒सं कृ॑णुते ति॒ग्मशृ॑ङ्गो॒ दिवा॒ हरि॒र्ददृ॑शे॒ नक्त॑मृ॒ज्रः॥

यद्यपि परमात्मा समय-समय पर उत्पत्ति, स्थिति और संहार का कारण है, तथापि उसके स्वरूप में कोई विकार न उत्पन्न होने से वह सदैव एकरस है ॥९॥

इन्दु॑र्वा॒जी प॑वते॒ गोन्यो॑घा॒ इन्द्रे॒ सोमः॒ सह॒ इन्व॒न्मदा॑य। हन्ति॒ रक्षो॒ बाध॑ते॒ पर्यरा॑ती॒र्वरि॑वः कृ॒ण्वन्वृ॒जन॑स्य॒ राजा॑॥

कर्म्मयोगी उद्योगी पुरुषों के सब विघ्नों की निवृत्ति करके परमात्मा कर्म्मयोगी के लिये आत्मभावों का प्रकाश करता है ॥१०॥

अध॒ धार॑या॒ मध्वा॑ पृचा॒नस्ति॒रो रोम॑ पवते॒ अद्रि॑दुग्धः। इन्दु॒रिन्द्र॑स्य स॒ख्यं जु॑षा॒णो दे॒वो दे॒वस्य॑ मत्स॒रो मदा॑य॥

अज्ञान की निवृत्ति के लिये परमात्मा की उपासना सर्वोपरि साधन है ॥११॥

अ॒भि प्रि॒याणि॑ पवते पुना॒नो दे॒वो दे॒वान्त्स्वेन॒ रसे॑न पृ॒ञ्चन्। इन्दु॒र्धर्मा॑ण्यृतु॒था वसा॑नो॒ दश॒ क्षिपो॑ अव्यत॒ सानो॒ अव्ये॑॥

परमात्मा सूत्रात्मारूप से सब सूक्ष्म और स्थूल भूतों में विराजमान है और उसी ने आदि सृष्टि में वर्णाश्रमों का गुण, कर्म, स्वभाव द्वारा विभाग किया है ॥१२॥

वृषा॒ शोणो॑ अभि॒कनि॑क्रद॒द्गा न॒दय॑न्नेति पृथि॒वीमु॒त द्याम्। इन्द्र॑स्येव व॒ग्नुरा शृ॑ण्व आ॒जौ प्र॑चे॒तय॑न्नर्षति॒ वाच॒मेमाम्॥

सब आनन्दों की राशि एकमात्र परमात्मा ही है, इसलिये उसी में चित्तवृत्ति का निरोध करके ब्रह्मानन्द का उपभोग करना चाहिये ॥१३॥

र॒साय्यः॒ पय॑सा॒ पिन्व॑मान ई॒रय॑न्नेषि॒ मधु॑मन्तमं॒शुम्। पव॑मानः संत॒निमे॑षि कृ॒ण्वन्निन्द्रा॑य सोम परिषि॒च्यमा॑नः॥

अभ्युदय और निःश्रेयस का प्रदाता एकमात्र परमात्मा ही है, इसलिये मनुष्य को चाहिये कि उसी परमात्मा की दृढ़ भक्ति से सब प्रकार के ऐश्वर्य्य और मुक्ति का लाभ करे ॥१४॥

ए॒वा प॑वस्व मदि॒रो मदा॑योदग्रा॒भस्य॑ न॒मय॑न्वध॒स्नैः। परि॒ वर्णं॒ भर॑माणो॒ रुश॑न्तं ग॒व्युर्नो॑ अर्ष॒ परि॑ सोम सि॒क्तः॥

जो लोग अनन्य भक्ति से परमात्मा का भजन करते हैं, परमात्मा उनके अज्ञान के बीज को छिन्न-भिन्न करके अवश्यमेव ज्ञान का प्रकाश करता है ॥१५॥

जु॒ष्ट्वी न॑ इन्दो सु॒पथा॑ सु॒गान्यु॒रौ प॑वस्व॒ वरि॑वांसि कृ॒ण्वन्। घ॒नेव॒ विष्व॑ग्दुरि॒तानि॑ वि॒घ्नन्नधि॒ ष्णुना॑ धन्व॒ सानो॒ अव्ये॑॥

जो लोग परमात्मा का प्रीति से सेवन करते हैं अर्थात् सर्वोपरि प्रिय एकमात्र परमात्मा ही जिनको प्रतीत होता है, वे कर्मयोगी तथा ज्ञानयोगी होकर इस संसार में स्वतन्त्रतापूर्वक विचरते हैं ॥१६॥

वृ॒ष्टिं नो॑ अर्ष दि॒व्यां जि॑ग॒त्नुमिळा॑वतीं शं॒गयीं॑ जी॒रदा॑नुम्। स्तुके॑व वी॒ता ध॑न्वा विचि॒न्वन्बन्धूँ॑रि॒माँ अव॑राँ इन्दो वा॒यून्॥

यद्यपि परमात्मा स्व-स्व कर्मानुकूल ऊँच-नीच गति प्रदान करता है, तथापि वह सन्तानों के समान जीवमात्र की भलाई चाहता है, इसलिये कर्मों द्वारा सुधार करके सबको शुभ मार्ग में प्रेरित करता है ॥१७॥

ग्र॒न्थिं न वि ष्य॑ ग्रथि॒तं पु॑ना॒न ऋ॒जुं च॑ गा॒तुं वृ॑जि॒नं च॑ सोम। अत्यो॒ न क्र॑दो॒ हरि॒रा सृ॑जा॒नो मर्यो॑ देव धन्व प॒स्त्या॑वान्॥

परमात्मा स्वभाव से न्यायकारी है। वह आप उपासकों के अन्तःकरण को शुद्धि प्रदान करता है और अनाचारियों को रुद्ररूप से विनाश करता हुआ इस संसार में धर्म और नीति को स्थापन करता है ॥१८॥

जुष्टो॒ मदा॑य दे॒वता॑त इन्दो॒ परि॒ ष्णुना॑ धन्व॒ सानो॒ अव्ये॑। स॒हस्र॑धारः सुर॒भिरद॑ब्धः॒ परि॑ स्रव॒ वाज॑सातौ नृ॒षह्ये॑॥

जो लोग परमात्मपरायण होते हैं, परमात्मा उनकी सदैव रक्षा करता है ॥१९॥

अ॒र॒श्मानो॒ ये॑ऽर॒था अयु॑क्ता॒ अत्या॑सो॒ न स॑सृजा॒नास॑ आ॒जौ। ए॒ते शु॒क्रासो॑ धन्वन्ति॒ सोमा॒ देवा॑स॒स्ताँ उप॑ याता॒ पिब॑ध्यै॥

इस मन्त्र में परमात्मा के गुण-कर्म-स्वभाव के सेवन करने का उपदेश है अर्थात् परमात्मा के गुणों के धारण करने से पुरुष पवित्र और तेजस्वी हो जाता है ॥२०॥

ए॒वा न॑ इन्दो अ॒भि दे॒ववी॑तिं॒ परि॑ स्रव॒ नभो॒ अर्ण॑श्च॒मूषु॑। सोमो॑ अ॒स्मभ्यं॒ काम्यं॑ बृ॒हन्तं॑ र॒यिं द॑दातु वी॒रव॑न्तमु॒ग्रम्॥

जो लोग अनन्य भक्ति से ईश्वर की उपासना करते हैं, ईश्वर उनको अनन्त प्रकार के ऐश्वर्य्य प्रदान करता है ॥२१॥

तक्ष॒द्यदी॒ मन॑सो॒ वेन॑तो॒ वाग्ज्येष्ठ॑स्य वा॒ धर्म॑णि॒ क्षोरनी॑के। आदी॑माय॒न्वर॒मा वा॑वशा॒ना जुष्टं॒ पतिं॑ क॒लशे॒ गाव॒ इन्दु॑म्॥

जो लोग कर्मयज्ञ तथा ज्ञानयज्ञ द्वारा मन का संस्कार करते हैं, उनका शुद्ध मन परमात्मा के ज्ञान का लाभ करता है ॥२२॥

प्र दा॑नु॒दो दि॒व्यो दा॑नुपि॒न्व ऋ॒तमृ॒ताय॑ पवते सुमे॒धाः। ध॒र्मा भु॑वद्वृज॒न्य॑स्य॒ राजा॒ प्र र॒श्मिभि॑र्द॒शभि॑र्भारि॒ भूम॑॥

परमात्मा इस चराचर जगत् का निर्माण करनेवाला है, उसी ने सम्पूर्ण संसार को रचकर धर्म की मर्यादा को बाँधा है ॥२३॥

प॒वित्रे॑भिः॒ पव॑मानो नृ॒चक्षा॒ राजा॑ दे॒वाना॑मु॒त मर्त्या॑नाम्। द्वि॒ता भु॑वद्रयि॒पती॑ रयी॒णामृ॒तं भ॑र॒त्सुभृ॑तं॒ चार्विन्दुः॑॥

परमात्मा ने प्रकृतिरूपी परिणामिनित्य और जीवरूपी कूटस्थनित्य द्वैत को धारण किया है। इस प्रकार जीव और प्रकृति का परमात्मा से भेद है, इस विषय का वर्णन वेद के कई एक स्थानों में अन्यत्र भी पाया जाता है। जैसा कि “न तं विदाथ य इमा जजानान्यद् युष्माकमन्तरं बभूव। ” यजुर्वेद १७। ३। तुम उसको नहीं जानते, जिसने इस संसार को उत्पन्न किया है, वह तुम से भिन्न है। इस मन्त्र में द्वैतवाद का वर्णन स्पष्ट रीति से पाया जाता है ॥२४॥

अर्वाँ॑ इव॒ श्रव॑से सा॒तिमच्छेन्द्र॑स्य वा॒योर॒भि वी॒तिम॑र्ष। स नः॑ स॒हस्रा॑ बृह॒तीरिषो॑ दा॒ भवा॑ सोम द्रविणो॒वित्पु॑ना॒नः॥

परमात्मा ज्ञानयोगी को नाना प्रकार के ऐश्वर्य्य प्रदान करता है, इसलिये मनुष्य को चाहिये कि वह ज्ञानयोग का सम्पादन करे ॥२५॥

दे॒वा॒व्यो॑ नः परिषि॒च्यमा॑नाः॒ क्षयं॑ सु॒वीरं॑ धन्वन्त॒ सोमाः॑। आ॒य॒ज्यवः॑ सुम॒तिं वि॒श्ववा॑रा॒ होता॑रो॒ न दि॑वि॒यजो॑ म॒न्द्रत॑माः॥

सुसम्पत्ति तथा सुन्दर सन्तान एकमात्र पुण्य कर्म्मों से प्राप्त होती है, इसलिये पुण्यात्मा बनकर पुण्यों का सञ्चय करना चाहिये ॥२६॥

ए॒वा दे॑व दे॒वता॑ते पवस्व म॒हे सो॑म॒ प्सर॑से देव॒पानः॑। म॒हश्चि॒द्धि ष्मसि॑ हि॒ताः स॑म॒र्ये कृ॒धि सु॑ष्ठा॒ने रोद॑सी पुना॒नः॥

परमात्मा सब लोक-लोकान्तरों को अनायास से धारण कर रहा है। उसी सर्वाधार परमात्मा की सुरक्षा से पुरुष सुरक्षित रहता है, अतएव शुभ कर्म्म करते हुए एकमात्र उसी से सुरक्षा की प्रार्थना करनी चाहिये ॥२७॥

अश्वो॒ नो क्र॑दो॒ वृष॑भिर्युजा॒नः सिं॒हो न भी॒मो मन॑सो॒ जवी॑यान्। अ॒र्वा॒चीनैः॑ प॒थिभि॒र्ये रजि॑ष्ठा॒ आ प॑वस्व सौमन॒सं न॑ इन्दो॥

जो लोग परमात्मा से मन की शुद्धि की प्रार्थना करते हैं, परमात्मा उनके मन को शुद्ध करके उन्हें शुभ बुद्धि प्रदान करता है ॥२८॥

श॒तं धारा॑ दे॒वजा॑ता असृग्रन्त्स॒हस्र॑मेनाः क॒वयो॑ मृजन्ति। इन्दो॑ स॒नित्रं॑ दि॒व आ प॑वस्व पुरए॒तासि॑ मह॒तो धन॑स्य॥

परमात्मा के ऐश्वर्य्य को सब लोक-लोकान्तर वर्णन करते हैं। जो कुछ यह ब्रह्माण्ड है, वह परमात्मा की विभूति है अर्थात् यह सब चराचर जगत् परमात्मा के एकदेश में स्थिर है और परमात्मा इसको अपने में अभिव्याप्त करके सर्वत्र परिपूर्ण हो रहा है ॥२९॥

दि॒वो न सर्गा॑ अससृग्र॒मह्नां॒ राजा॒ न मि॒त्रं प्र मि॑नाति॒ धीरः॑। पि॒तुर्न पु॒त्रः क्रतु॑भिर्यता॒न आ प॑वस्व वि॒शे अ॒स्या अजी॑तिम्॥

जो लोग परमात्मा से सन्तानों की शुद्धि की प्रार्थना करते हैं, परमात्मा उनकी सन्तानों को अवश्यमेव शुद्धि प्रदान करता है ॥३०॥

प्र ते॒ धारा॒ मधु॑मतीरसृग्र॒न्वारा॒न्यत्पू॒तो अ॒त्येष्यव्या॑न्। पव॑मान॒ पव॑से॒ धाम॒ गोनां॑ जज्ञा॒नः सूर्य॑मपिन्वो अ॒र्कैः॥

इस मन्त्र में परमात्मा की ज्योतियों का वर्णन है अर्थात् परमात्मा की दिव्य ज्योतियाँ सब पदार्थों को पवित्र करती हैं ॥३१॥

कनि॑क्रद॒दनु॒ पन्था॑मृ॒तस्य॑ शु॒क्रो वि भा॑स्य॒मृत॑स्य॒ धाम॑। स इन्द्रा॑य पवसे मत्स॒रवा॑न्हिन्वा॒नो वाचं॑ म॒तिभिः॑ कवी॒नाम्॥

जो लोग ज्ञानयोगी व कर्मयोगी हैं, परमात्मा उनके उद्योग को अवश्यमेव सफल करता है ॥३२॥

दि॒व्यः सु॑प॒र्णोऽव॑ चक्षि सोम॒ पिन्व॒न्धाराः॒ कर्म॑णा दे॒ववी॑तौ। एन्दो॑ विश क॒लशं॑ सोम॒धानं॒ क्रन्द॑न्निहि॒ सूर्य॒स्योप॑ र॒श्मिम्॥

इस मन्त्र में परमात्मा के स्वरूप का वर्णन किया है कि परमात्मा स्वतः ज्ञानस्वरूप है अर्थात् स्वतःप्रकाश है ॥३३॥

ति॒स्रो वाच॑ ईरयति॒ प्र वह्नि॑ॠ॒तस्य॑ धी॒तिं ब्रह्म॑णो मनी॒षाम्। गावो॑ यन्ति॒ गोप॑तिं पृ॒च्छमा॑नाः॒ सोमं॑ यन्ति म॒तयो॑ वावशा॒नाः॥

जो लोग अपने शील को बनाते हैं अर्थात् सदाचारी बनकर परमात्मपरायण होते हैं, परमात्मा उन्हें अवश्यमेव अपने ज्ञान से प्रदीप्त करता है ॥३४॥

सोमं॒ गावो॑ धे॒नवो॑ वावशा॒नाः सोमं॒ विप्रा॑ म॒तिभिः॑ पृ॒च्छमा॑नाः। सोमः॑ सु॒तः पू॑यते अ॒ज्यमा॑नः॒ सोमे॑ अ॒र्कास्त्रि॒ष्टुभः॒ सं न॑वन्ते॥

कर्म, उपासना तथा ज्ञान, तीनों प्रकार के भावों को वर्णन करनेवाली वेदरूपी वाणियें एकमात्र परमात्मा में ही संगत होती हैं अथवा यों कहो कि जिस प्रकार सब नदियें समुद्र की ओर प्रवाहित होती हैं, इसी प्रकार वेदरूपी वाणियें परमात्मरूपी समुद्र की शरण लेती हैं ॥३५॥

ए॒वा नः॑ सोम परिषि॒च्यमा॑न॒ आ प॑वस्व पू॒यमा॑नः स्व॒स्ति। इन्द्र॒मा वि॑श बृह॒ता रवे॑ण व॒र्धया॒ वाचं॑ ज॒नया॒ पुरं॑धिम्॥

जो लोग उपासना द्वारा परमात्मा के स्वरूप का साक्षात्कार करते हैं, परमात्मा उन्हें अवश्यमेव शुद्ध करता है ॥३६॥

आ जागृ॑वि॒र्विप्र॑ ऋ॒ता म॑ती॒नां सोमः॑ पुना॒नो अ॑सदच्च॒मूषु॑। सप॑न्ति॒ यं मि॑थु॒नासो॒ निका॑मा अध्व॒र्यवो॑ रथि॒रासः॑ सु॒हस्ताः॑॥

उक्त विशेषणोंवाले ज्ञानयोगी और कर्मयोगी परमात्मा को प्राप्त होते हैं ॥३७॥

स पु॑ना॒न उप॒ सूरे॒ न धातोभे अ॑प्रा॒ रोद॑सी॒ वि ष आ॑वः। प्रि॒या चि॒द्यस्य॑ प्रिय॒सास॑ ऊ॒ती स तू धनं॑ का॒रिणे॒ न प्र यं॑सत्॥

अविद्यान्धकार को परमात्मरूपी सूर्य्य ही निवृत्त करता है, भौतिक प्रकाश उस अन्धकार के निवृत्त करने के लिये समर्थ नहीं होता ॥३८॥

स व॑र्धि॒ता वर्ध॑नः पू॒यमा॑नः॒ सोमो॑ मी॒ढ्वाँ अ॒भि नो॒ ज्योति॑षावीत्। येना॑ नः॒ पूर्वे॑ पि॒तरः॑ पद॒ज्ञाः स्व॒र्विदो॑ अ॒भि गा अद्रि॑मु॒ष्णन्॥

जिस प्रकार पूर्वज लोग परमात्मा की उपासना करते थे, उसी प्रकार की उपासनाओं का विधान इस मन्त्र में किया गया है। तात्पर्य्य यह है कि “सूर्य्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्” इत्यादि मन्त्रों में जो इसे सृष्टिप्रवाहरूप से वर्णन किया है, उसी भाव को यहाँ प्रकारान्तर से वर्णन किया है ॥३९॥

अक्रा॑न्त्समु॒द्रः प्र॑थ॒मे विध॑र्मञ्ज॒नय॑न्प्र॒जा भुव॑नस्य॒ राजा॑। वृषा॑ प॒वित्रे॒ अधि॒ सानो॒ अव्ये॑ बृ॒हत्सोमो॑ वावृधे सुवा॒न इन्दुः॑॥

म॒हत्तत्सोमो॑ महि॒षश्च॑कारा॒पां यद्गर्भोऽवृ॑णीत दे॒वान्। अद॑धा॒दिन्द्रे॒ पव॑मान॒ ओजोऽज॑नय॒त्सूर्ये॒ ज्योति॒रिन्दुः॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा को सूर्य्यादिकों के प्रकाशकरूप से वर्णन किया है, इसी अभिप्राय से उपनिषत्कार ऋषियों ने परमात्मा को सूर्य्यादिकों का प्रकाशक माना है ॥४१॥

मत्सि॑ वा॒युमि॒ष्टये॒ राध॑से च॒ मत्सि॑ मि॒त्रावरु॑णा पू॒यमा॑नः। मत्सि॒ शर्धो॒ मारु॑तं॒ मत्सि॑ दे॒वान्मत्सि॒ द्यावा॑पृथि॒वी दे॑व सोम॥

परमात्मा उद्योगियों के हृदय में सर्वदा उत्साह उत्पन्न करता है। जिस प्रकार सूर्य्य चक्षुवाले लोगों का प्रकाशक है, इसी प्रकार अनुद्योगी परम आलसियों के लिये परमात्मा उद्योग-दीपक नहीं ॥४२॥

ऋ॒जुः प॑वस्व वृजि॒नस्य॑ ह॒न्तापामी॑वां॒ बाध॑मानो॒ मृध॑श्च। अ॒भि॒श्री॒णन्पयः॒ पय॑सा॒भि गोना॒मिन्द्र॑स्य॒ त्वं तव॑ व॒यं सखा॑यः॥

इस मन्त्र में सब दुःखों के दूर करनेवाले परमात्मा से दुःखनिवृत्ति की प्रार्थना है अर्थात् आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक उक्त तीनों प्रकार के तापों की निवृत्ति परमात्मा से कथन की गयी है। सायणाचार्य्य ‘ऋजुः पवस्व’ के अर्थ यहाँ सोमरस के सीधा होकर बहने के करते हैं अर्थात् क्षर के करते हैं, सो “पूञ् पवने” धातु के ये अर्थ सर्वत्र अयुक्त हैं ॥४३॥

मध्वः॒ सूदं॑ पवस्व॒ वस्व॒ उत्सं॑ वी॒रं च॑ न॒ आ प॑वस्वा॒ भगं॑ च। स्वद॒स्वेन्द्रा॑य॒ पव॑मान इन्दो र॒यिं च॑ न॒ आ प॑वस्वा समु॒द्रात्॥

परमात्मा कर्मयोगी अर्थात् उद्योगी पुरुषों पर प्रसन्न होकर उन्हें नाना प्रकार के ऐश्वर्य्य प्रदान करता है, इसलिये पुरुष को चाहिये कि वह उद्योगी बनकर परमात्मा के ऐश्वर्य्य का अधिकारी बने ॥४४॥

सोमः॑ सु॒तो धार॒यात्यो॒ न हित्वा॒ सिन्धु॒र्न नि॒म्नम॒भि वा॒ज्य॑क्षाः। आ योनिं॒ वन्य॑मसदत्पुना॒नः समिन्दु॒र्गोभि॑रसर॒त्सम॒द्भिः॥

इस मन्त्र में रूपकालङ्कार से यह वर्णन किया है कि परमात्मा नम्र स्वभाववाले पुरुषों को निम्नभूमि के समान सुसिञ्चित करता है ॥४५॥

ए॒ष स्य ते॑ पवत इन्द्र॒ सोम॑श्च॒मूषु॒ धीर॑ उश॒ते तव॑स्वान्। स्व॑र्चक्षा रथि॒रः स॒त्यशु॑ष्मः॒ कामो॒ न यो दे॑वय॒तामस॑र्जि॥

परमात्मा ही सब कामनाओं का मूल है। जो लोग ऐश्वर्य्य की कामनावाले हैं, उनको चाहिये कि वे कर्मयोगी और उद्योगी बनकर उससे ऐश्वर्य्यों की प्राप्ति के अभिलाषी बनें ॥४६॥

ए॒ष प्र॒त्नेन॒ वय॑सा पुना॒नस्ति॒रो वर्पां॑सि दुहि॒तुर्दधा॑नः। वसा॑नः॒ शर्म॑ त्रि॒वरू॑थम॒प्सु होते॑व याति॒ सम॑नेषु॒ रेभ॑न्॥

जिस प्रकार होता अथवा उद्गातादि ऋत्विग् लोग वेदों का गायन करते हुए इस विविध रचनारूप विराट् का वर्णन करते हैं, इसी प्रकार परमात्मा स्वयं उद्गातारूप होकर वेदरूप गीति के द्वारा चराचर ब्रह्माण्डों का वर्णन करता है अर्थात् प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा इस चराचर जगत् की विविध रचना का हेतु एक भाव परमात्मा ही है, कोई अन्य नहीं ॥४७॥

नू न॒स्त्वं र॑थि॒रो दे॑व सोम॒ परि॑ स्रव च॒म्वोः॑ पू॒यमा॑नः। अ॒प्सु स्वादि॑ष्ठो॒ मधु॑माँ ऋ॒तावा॑ दे॒वो न यः स॑वि॒ता स॒त्यम॑न्मा॥

इस मन्त्र में परमात्मा से स्व-स्वामिभाव की प्रार्थना की गई है अथवा यों कहो कि प्रेर्य और प्रेरकभाव से परमात्मा की उपासना की गई है ॥४८॥

अ॒भि वा॒युं वी॒त्य॑र्षा गृणा॒नो॒३॒॑ऽभि मि॒त्रावरु॑णा पू॒यमा॑नः। अ॒भी नरं॑ धी॒जव॑नं रथे॒ष्ठाम॒भीन्द्रं॒ वृष॑णं॒ वज्र॑बाहुम्॥

इस मन्त्र में परमात्मा की प्राप्ति के पात्र ज्ञानयोगी, कर्मयोगी और शूरवीरों का वर्णन किया है। तात्पर्य यह है कि जो पुरुष परमात्मा की कृपा का पात्र बनना चाहे, उसे स्वयं उद्योगी वा कर्मयोगी अथवा शूरवीर बनना चाहिये, क्योंकि परमात्मा स्वयं बलस्वरूप है, इसलिये जो बलिष्ठ पुरुष हैं, वे उसकी कृपा का पात्र बन सकते हैं, अन्य नहीं ॥४९॥

अ॒भि वस्त्रा॑ सुवस॒नान्य॑र्षा॒भि धे॒नूः सु॒दुघाः॑ पू॒यमा॑नः। अ॒भि च॒न्द्रा भर्त॑वे नो॒ हिर॑ण्या॒भ्यश्वा॑न्र॒थिनो॑ देव सोम॥

इस मन्त्र में पुनरपि ऐश्वर्य प्राप्ति की प्रार्थना है कि हे परमात्मन्! आप हमको ऐश्वर्यशाली बनने के लिये ऐश्वर्य्य प्रदान करें। पुनः-पुनः ऐश्वर्य की प्रार्थना करना अर्थपुनरुक्ति नहीं, किन्तु अभ्यास अर्थात् दृढ़ता के लिये उपदेश हैं, जैसा कि “आत्मा वारे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः” इत्यादिकों में बार-बार चित्तवृत्ति का लगाना परमात्मा में कथन किया गया है, इसी प्रकार यहाँ भी दृढ़ता के लिये उसी अर्थ का पुनः-पुनः कथन है। जो अज्ञानियों को वेद में पुनरुक्ति दोष प्रतीत होता है, ऐसा नहीं है। वेद में पुनरुक्ति दोष नहीं, यह केवल अज्ञानियों की भ्रान्ति है ॥५०॥

अ॒भी नो॑ अर्ष दि॒व्या वसू॑न्य॒भि विश्वा॒ पार्थि॑वा पू॒यमा॑नः। अ॒भि येन॒ द्रवि॑णम॒श्नवा॑मा॒भ्या॑र्षे॒यं ज॑मदग्नि॒वन्नः॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा से भोक्तृत्वशक्ति की प्रार्थना की गई है। तात्पर्य्य यह है कि जो पुरुष स्वामी होकर ऐश्वर्य्यों को भोग सकता है, वही ऐश्वर्य्यसम्पन्न कहलाता है, अन्य नहीं। इसी अभिप्राय से उपनिषदों में अन्नाद अर्थात् ऐश्वर्य्यों के भोक्ता होने की प्रार्थना की गई है॥५१॥

अ॒या प॒वा प॑वस्वै॒ना वसू॑नि माँश्च॒त्व इ॑न्दो॒ सर॑सि॒ प्र ध॑न्व। ब्र॒ध्नश्चि॒दत्र॒ वातो॒ न जू॒तः पु॑रु॒मेध॑श्चि॒त्तक॑वे॒ नरं॑ दात्॥

जो लोग उक्त प्रकार से शक्तिसम्पन्न होने की ईश्वर से प्रार्थना करते हैं, परमात्मा उन्हें अवश्यमेव ऐश्वर्य्यसम्पन्न बनाता है ॥५२॥

उ॒त न॑ ए॒ना प॑व॒या प॑व॒स्वाधि॑ श्रु॒ते श्र॒वाय्य॑स्य ती॒र्थे। ष॒ष्टिं स॒हस्रा॑ नैगु॒तो वसू॑नि वृ॒क्षं न प॒क्वं धू॑नव॒द्रणा॑य॥

जो लोग उक्त प्रकार से कर्मयोगी वा उद्योगी बनते हैं, परमात्मा उन्हें अवश्यमेव अविद्यारूपी शत्रुओं के हनन करने का सामर्थ्य देता है ॥५३॥

मही॒मे अ॑स्य॒ वृष॒नाम॑ शू॒षे माँश्च॑त्वे वा॒ पृश॑ने वा॒ वध॑त्रे। अस्वा॑पयन्नि॒गुतः॑ स्ने॒हय॒च्चापा॒मित्राँ॒ अपा॒चितो॑ अचे॒तः॥

इस मन्त्र में आस्तिकधर्म के प्रचार करने के लिये अर्थात् वैदिक धर्म की शिक्षाओं के लिये तेजस्वी भावों का वर्णन किया है ॥५४॥

सं त्री प॒वित्रा॒ वित॑तान्ये॒ष्यन्वेकं॑ धावसि पू॒यमा॑नः। असि॒ भगो॒ असि॑ दा॒त्रस्य॑ दा॒तासि॑ म॒घवा॑ म॒घव॑द्भ्य इन्दो॥

परमात्मा सब ऐश्वर्य्यों का स्वामी है और सब धनिकों से धनी है, इसलिये उसी की कृपा से सब ऐश्वर्यों की प्राप्ति होती है, अन्यथा नहीं॥५५॥

ए॒ष वि॑श्व॒वित्प॑वते मनी॒षी सोमो॒ विश्व॑स्य॒ भुव॑नस्य॒ राजा॑। द्र॒प्साँ ई॒रय॑न्वि॒दथे॒ष्विन्दु॒र्वि वार॒मव्यं॑ स॒मयाति॑ याति॥

जो परमात्मज्ञान के अधिकारी हैं, परमात्मा उन्हीं को प्राप्त होता है, अन्यों को नहीं ॥५६॥

इन्दुं॑ रिहन्ति महि॒षा अद॑ब्धाः प॒दे रे॑भन्ति क॒वयो॒ न गृध्राः॑। हि॒न्वन्ति॒ धीरा॑ द॒शभिः॒ क्षिपा॑भिः॒ सम॑ञ्जते रू॒पम॒पां रसे॑न॥

इस मन्त्र में प्राणायाम के द्वारा परमात्मा की प्राप्ति का वर्णन किया है ॥५७॥

त्वया॑ व॒यं पव॑मानेन सोम॒ भरे॑ कृ॒तं वि चि॑नुयाम॒ शश्व॑त्। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥

जो लोग सदाचारी अध्यापकों वा उपदेशकों द्वारा परमात्मज्ञान की शिक्षा पाते हैं, वे अवश्यमेव अज्ञान का नाश करके ज्ञानरूपी प्रदीप से प्रदीप्त होते हैं ॥५८॥यह ९७ वाँ सूक्त और २२ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

अ॒भि नो॑ वाज॒सात॑मं र॒यिम॑र्ष पुरु॒स्पृह॑म्। इन्दो॑ स॒हस्र॑भर्णसं तुविद्यु॒म्नं वि॑भ्वा॒सह॑म्॥

इस मन्त्र में अक्षय धन की प्राप्ति का वर्णन है ॥१॥

परि॒ ष्य सु॑वा॒नो अ॒व्ययं॒ रथे॒ न वर्मा॑व्यत। इन्दु॑र॒भि द्रुणा॑ हि॒तो हि॑या॒नो धारा॑भिरक्षाः॥

परमात्मा का साक्षात्कार मनुष्य को सर्वथा सुरक्षित करता है ॥२॥

परि॒ ष्य सु॑वा॒नो अ॑क्षा॒ इन्दु॒रव्ये॒ मद॑च्युतः। धारा॒ य ऊ॒र्ध्वो अ॑ध्व॒रे भ्रा॒जा नैति॑ गव्य॒युः॥

परमात्मा विद्युत् की दीप्ति के समान सर्वत्र परिपूर्ण है ॥३॥

स हि त्वं दे॑व॒ शश्व॑ते॒ वसु॒ मर्ता॑य दा॒शुषे॑। इन्दो॑ सह॒स्रिणं॑ र॒यिं श॒तात्मा॑नं विवाससि॥

सामर्थ्ययुक्त पुरुष को परमात्मा ऐश्वर्य्य प्रदान करता है, इसलिये ऐश्वर्य्यसम्पन्न होना परमावश्यक है ॥४॥

व॒यं ते॑ अ॒स्य वृ॑त्रह॒न्वसो॒ वस्वः॑ पुरु॒स्पृहः॑। नि नेदि॑ष्ठतमा इ॒षः स्याम॑ सु॒म्नस्या॑ध्रिगो॥

परमात्मा की उपासना द्वारा मनुष्य अविद्या का नाश करके विद्या का प्रकाश करता है ॥५॥

द्विर्यं पञ्च॒ स्वय॑शसं॒ स्वसा॑रो॒ अद्रि॑संहतम्। प्रि॒यमिन्द्र॑स्य॒ काम्यं॑ प्रस्ना॒पय॑न्त्यू॒र्मिण॑म्॥

इस मन्त्र में प्राणायामादि विद्या द्वारा अथवा यों कहो कि चित्तवृत्तियों द्वारा परमात्मा के साक्षात्कार का वर्णन किया है ॥६॥

परि॒ त्यं ह॑र्य॒तं हरिं॑ ब॒भ्रुं पु॑नन्ति॒ वारे॑ण। यो दे॒वान्विश्वाँ॒ इत्परि॒ मदे॑न स॒ह गच्छ॑ति॥

इस मन्त्र में परमात्मा का स्वातन्त्र्य-वर्णन किया है ॥७॥

अ॒स्य वो॒ ह्यव॑सा॒ पान्तो॑ दक्ष॒साध॑नम्। यः सू॒रिषु॒ श्रवो॑ बृ॒हद्द॒धे स्व१॒॑र्ण ह॑र्य॒तः॥

उस परमात्मा के सर्वोत्तम स्वादुमय आनन्द को कर्मयोगी ही पा सकते हैं, अन्य नहीं ॥८॥

स वां॑ य॒ज्ञेषु॑ मानवी॒ इन्दु॑र्जनिष्ट रोदसी। दे॒वो दे॑वी गिरि॒ष्ठा अस्रे॑ध॒न्तं तु॑वि॒ष्वणि॑॥

जीवमात्र के शुभ-अशुभ कर्मों के फलों का दाता एकमात्र परमात्मा ही है ॥९॥

इन्द्रा॑य सोम॒ पात॑वे वृत्र॒घ्ने परि॑ षिच्यसे। नरे॑ च॒ दक्षि॑णावते दे॒वाय॑ सदना॒सदे॑॥

परमात्मा कर्मयोगी तथा अनुष्ठानी विद्वानों का ही साक्षात्करणार्ह है ॥१०॥

ते प्र॒त्नासो॒ व्यु॑ष्टिषु॒ सोमाः॑ प॒वित्रे॑ अक्षरन्। अ॒प॒प्रोथ॑न्तः सनु॒तर्हु॑र॒श्चितः॑ प्रा॒तस्ताँ अप्र॑चेतसः॥

परमात्मा का आनन्द सौम्य स्वभाववाले ही भोग सकते हैं, कुटिल चित्तवाले नहीं ॥११॥

तं स॑खायः पुरो॒रुचं॑ यू॒यं व॒यं च॑ सू॒रयः॑। अ॒श्याम॒ वाज॑गन्ध्यं स॒नेम॒ वाज॑पस्त्यम्॥

परमात्मा ही के आनन्द भोगने का प्रयत्न करना चाहिये, क्योंकि सच्चा आनन्द वही है ॥१२॥यह अट्ठानवाँ सूक्त और चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

आ ह॑र्य॒ताय॑ धृ॒ष्णवे॒ धनु॑स्तन्वन्ति॒ पौंस्य॑म्। शु॒क्रां व॑य॒न्त्यसु॑राय नि॒र्णिजं॑ वि॒पामग्रे॑ मही॒युवः॑॥

जो लोग तेजस्वी बनना चाहते हैं, वे परमात्मोपासक बनें ॥१॥

अध॑ क्ष॒पा परि॑ष्कृतो॒ वाजाँ॑ अ॒भि प्र गा॑हते। यदी॑ वि॒वस्व॑तो॒ धियो॒ हरिं॑ हि॒न्वन्ति॒ यात॑वे॥

जो लोग परमात्मोपासक हैं, वे ही युद्ध में विजय पाते हैं ॥२॥

तम॑स्य मर्जयामसि॒ मदो॒ य इ॑न्द्र॒पात॑मः। यं गाव॑ आ॒सभि॑र्द॒धुः पु॒रा नू॒नं च॑ सू॒रयः॑॥

कर्म्मयोगी लोग अपने अन्तःकरण को शुद्ध करके परमात्मानन्द का अनुभव करते हैं ॥३॥

तं गाथ॑या पुरा॒ण्या पु॑ना॒नम॒भ्य॑नूषत। उ॒तो कृ॑पन्त धी॒तयो॑ दे॒वानां॒ नाम॒ बिभ्र॑तीः॥

परमात्मा को सर्वोत्कृष्ट मानकर उपासना करनी चाहिये ॥४॥

तमु॒क्षमा॑णम॒व्यये॒ वारे॑ पुनन्ति धर्ण॒सिम्। दू॒तं न पू॒र्वचि॑त्तय॒ आ शा॑सते मनी॒षिणः॑॥

परमात्मा सम्पूर्ण जगत् का आधार है, इससे उसी की उपासना प्रथम करनी चाहिये ॥५॥

स पु॑ना॒नो म॒दिन्त॑मः॒ सोम॑श्च॒मूषु॑ सीदति। प॒शौ न रेत॑ आ॒दध॒त्पति॑र्वचस्यते धि॒यः॥

आनन्दप्रद, विजयादिप्रदाता और प्रलयादिकर्त्ता केवल परमात्मा ही है, इससे वही उपास्य है ॥६॥

स मृ॑ज्यते सु॒कर्म॑भिर्दे॒वो दे॒वेभ्यः॑ सु॒तः। वि॒दे यदा॑सु संद॒दिर्म॒हीर॒पो वि गा॑हते॥

कर्मयोगी, जो परमात्मोपासक है, वह सब बलों का आश्रय हो सकता है ॥७॥

सु॒त इ॑न्दो प॒वित्र॒ आ नृभि॑र्य॒तो वि नी॑यसे। इन्द्रा॑य मत्स॒रिन्त॑मश्च॒मूष्वा नि षी॑दसि॥

जो मनुष्य शुद्धान्तःकरण से कर्मयोगयुक्त होता है, परमात्मा उसी की सहायता करता है ॥८॥यह निन्यानवाँ सूक्त और छब्बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

अ॒भी न॑वन्ते अ॒द्रुहः॑ प्रि॒यमिन्द्र॑स्य॒ काम्य॑म्। व॒त्सं न पूर्व॒ आयु॑नि जा॒तं रि॑हन्ति मा॒तरः॑॥

अभ्युदय की इच्छा करनेवाले मनुष्य को कर्मयोगी ही सबसे प्रिय मानना चाहिये ॥१॥

पु॒ना॒न इ॑न्द॒वा भ॑र॒ सोम॑ द्वि॒बर्ह॑सं र॒यिम्। त्वं वसू॑नि पुष्यसि॒ विश्वा॑नि दा॒शुषो॑ गृ॒हे॥

जो पुरुष आत्मा और पर में सुखः-दुखादि को समान समझकर परोपकार करते हैं, परमात्मा उनको उन्नतिशील करता है ॥२॥

त्वं धियं॑ मनो॒युजं॑ सृ॒जा वृ॒ष्टिं न त॑न्य॒तुः। त्वं वसू॑नि॒ पार्थि॑वा दि॒व्या च॑ सोम पुष्यसि॥

कर्मयोगी पुरुष ही मन के स्थैर्य को प्राप्त करके विविध ऐश्वर्य का स्वामी बनता है ॥३॥

परि॑ ते जि॒ग्युषो॑ यथा॒ धारा॑ सु॒तस्य॑ धावति। रंह॑माणा॒ व्य१॒॑व्ययं॒ वारं॑ वा॒जीव॑ सान॒सिः॥

परमात्मा का साक्षात्कार करनेवाले ही परमात्मानन्द पाते हैं ॥४॥

क्रत्वे॒ दक्षा॑य नः कवे॒ पव॑स्व सोम॒ धार॑या। इन्द्रा॑य॒ पात॑वे सु॒तो मि॒त्राय॒ वरु॑णाय च॥

परमात्मा का साक्षात्कार कर्मयोगी अध्यापक तथा उपदेशक सबों की तृप्ति करता है ॥५॥

पव॑स्व वाज॒सात॑मः प॒वित्रे॒ धार॑या सु॒तः। इन्द्रा॑य सोम॒ विष्ण॑वे दे॒वेभ्यो॒ मधु॑मत्तमः॥

वस्तुतः परमात्मा के ऐश्वर्य्य तथा विभूति के आनन्द को ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगी ही भोगते हैं, अन्य नहीं ॥६॥

त्वां रि॑हन्ति मा॒तरो॒ हरिं॑ प॒वित्रे॑ अ॒द्रुहः॑। व॒त्सं जा॒तं न धे॒नवः॒ पव॑मान॒ विध॑र्मणि॥

परमात्मा की प्राप्ति का सर्वोपरि साधन प्रेम है ॥७॥

पव॑मान॒ महि॒ श्रव॑श्चि॒त्रेभि॑र्यासि र॒श्मिभिः॑। शर्ध॒न्तमां॑सि जिघ्नसे॒ विश्वा॑नि दा॒शुषो॑ गृ॒हे॥

परमात्मा के ज्ञानरूप प्रकाश से सब अज्ञानों का नाश होता है ॥८॥

त्वं द्यां च॑ महिव्रत पृथि॒वीं चाति॑ जभ्रिषे। प्रति॑ द्रा॒पिम॑मुञ्चथाः॒ पव॑मान महित्व॒ना॥

परमात्मा ने द्युलोक और पृथिवीलोक को ऐश्वर्यशाली बनाकर उसे अपने रक्षारूप कवच से आच्छादित किया। ऐसी विचित्र रचना से इस ब्रह्माण्ड को रचा है कि उसके महत्त्व को कोई नहीं पा सकता ॥९॥यह १०० वाँ सूक्त और २८ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

पु॒रोजि॑ती वो॒ अन्ध॑सः सु॒ताय॑ मादयि॒त्नवे॑। अप॒ श्वानं॑ श्नथिष्टन॒ सखा॑यो दीर्घजि॒ह्व्य॑म्॥

परमात्मा शब्दब्रह्म का एकमात्र कारण है, इसलिये मुख्यतः करके उसी को बृहस्पति वा वाचस्पति कहा जा सकता है, इसी अभिप्राय से परमात्मा के लिये बहुधा कवि शब्द आया है, इस तात्पर्य से यहाँ परमात्मा को दीर्घजिह्व्य कहा है॥१॥

यो धार॑या पाव॒कया॑ परिप्र॒स्यन्द॑ते सु॒तः। इन्दु॒रश्वो॒ न कृत्व्यः॑॥

यहाँ विद्युत् का दृष्टान्त केवल परमात्मा की पूर्णताबोधन करने के लिये आया है॥२॥

तं दु॒रोष॑म॒भी नरः॒ सोमं॑ वि॒श्वाच्या॑ धि॒या। य॒ज्ञं हि॑न्व॒न्त्यद्रि॑भिः॥

परमात्मा को वेद में यज्ञ शब्द से कथन किया गया है, जैसा कि “तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे” वर्णन किया है कि सर्वपूज्य परमात्मा से ऋगादि चारों वेद प्रगट हुए, इसी अभिप्राय से यहाँ भी परमात्मा को यज्ञरूप से वर्णन किया है॥३॥

सु॒तासो॒ मधु॑मत्तमाः॒ सोमा॒ इन्द्रा॑य म॒न्दिनः॑। प॒वित्र॑वन्तो अक्षरन्दे॒वान्ग॑च्छन्तु वो॒ मदाः॑॥

परमात्मा के अपहतपाप्मादि धर्मों का धारण करना इस मन्त्र में वर्णन किया गया है अर्थात् परमात्मा के सौम्यस्वभावादिकों को जव जीव धारण कर लेता है, तो वह शुद्ध होकर ज्ञानयोगी व कर्मयोगी बन सकता है, अन्यथा नहीं॥४॥

इन्दु॒रिन्द्रा॑य पवत॒ इति॑ दे॒वासो॑ अब्रुवन्। वा॒चस्पति॑र्मखस्यते॒ विश्व॒स्येशा॑न॒ ओज॑सा॥

परमात्मा कर्मयोगी तथा ज्ञानयोगी को अपने सद्गुणों द्वारा पवित्र करता है अर्थात् परमात्मा के गुण कर्म स्वभावों के धारण करने का नाम ही परम पवित्रता है॥५॥

स॒हस्र॑धारः पवते समु॒द्रो वा॑चमीङ्ख॒यः। सोमः॒ पती॑ रयी॒णां सखेन्द्र॑स्य दि॒वेदि॑वे॥

परमात्मा को सहस्रधार इसलिये कथन किया गया है कि वह अनन्तशक्तियुक्त है। धारा शब्द के अर्थ यहाँ शक्ति है। “सम्यग् द्रवन्ति भूतानि यस्मिन् स समुद्रः” इस व्युत्पत्ति से यहाँ समुद्र नाम परमात्मा का है, इसी अभिप्राय से उपनिषद् में कहा है  कि, “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति” यहाँ (पवते) के अर्थ सायणाचार्य्य ने क्षरति किये हैं, जो व्याकरण से सर्वथा विरुद्ध है॥६॥

अ॒यं पू॒षा र॒यिर्भगः॒ सोमः॑ पुना॒नो अ॑र्षति। पति॒र्विश्व॑स्य॒ भूम॑नो॒ व्य॑ख्य॒द्रोद॑सी उ॒भे॥

इस मन्त्र में द्युलोक और पृथिवीलोक का प्रकाशक परमात्मा को कथन किया है। इससे स्पष्ट सिद्ध है कि सोम शब्द के अर्थ यहाँ सृष्टिकर्ता परमात्मा के हैं, किसी जड़ वस्तु के नहीं ॥७॥

समु॑ प्रि॒या अ॑नूषत॒ गावो॒ मदा॑य॒ घृष्व॑यः। सोमा॑सः कृण्वते प॒थः पव॑मानास॒ इन्द॑वः॥

गावः शब्द के अर्थ यहाँ इन्द्रियवृत्तियों के हैं, किसी गौ, बैल आदि पशुविशेष के नहीं, क्योंकि “सर्वेऽपि रश्मयो गाव उच्यन्ते” नि० २। १०। इस प्रमाण से प्रकाशक रश्मियों का नाम यहाँ गावः है॥८॥

य ओजि॑ष्ठ॒स्तमा भ॑र॒ पव॑मान श्र॒वाय्य॑म्। यः पञ्च॑ चर्ष॒णीर॒भि र॒यिं येन॒ वना॑महै॥

यहाँ परमात्मा के आनन्द को लाभ करके आनन्दित होने का वर्णन है॥९॥

सोमाः॑ पवन्त॒ इन्द॑वो॒ऽस्मभ्यं॑ गातु॒वित्त॑माः। मि॒त्राः सु॑वा॒ना अ॑रे॒पसः॑ स्वा॒ध्यः॑ स्व॒र्विदः॑॥

परमात्मा के गुणों के वर्णन करने से ज्ञान और पवित्रता बढ़ती है॥१०॥

सु॒ष्वा॒णासो॒ व्यद्रि॑भि॒श्चिता॑ना॒ गोरधि॑ त्व॒चि। इष॑म॒स्मभ्य॑म॒भितः॒ सम॑स्वरन्वसु॒विदः॑॥

यहाँ इन्द्रियों का अधिकरण जो मन है, उसका नाम अधित्वक् है, इस अभिप्राय से अधित्वचि के माने अन्तःकरण के हो सकते हैं। कई एक लोग इसके यह अर्थ करते हैं कि सोम कूटनेवाले अनडुह्-चर्म का नाम अधित्वक् है अर्थात् गोचर्म में सोम कूटने का यहाँ वर्णन है, यह अर्थ वेद के आशय से सर्वथा विरुद्ध है, क्योंकि ईश्वर के गुणवर्णन में गोचर्म का क्या काम॥११॥

ए॒ते पू॒ता वि॑प॒श्चितः॒ सोमा॑सो॒ दध्या॑शिरः। सूर्या॑सो॒ न द॑र्श॒तासो॑ जिग॒त्नवो॑ ध्रु॒वा घृ॒ते॥

जो लोग साधनसम्पन्न होकर अपने शील को बनाते हैं, उनके अन्तःकरणरूप दर्पण में परमात्मा के सद्गुण अवश्यमेव प्रतिबिम्बित होते हैं॥१२॥

प्र सु॑न्वा॒नस्यान्ध॑सो॒ मर्तो॒ न वृ॑त॒ तद्वचः॑। अप॒ श्वान॑मरा॒धसं॑ ह॒ता म॒खं न भृग॑वः॥

इस मन्त्र में हिंसा के दृष्टान्त से नास्तिकों की संगति का त्याग वर्णन किया है॥१३॥

आ जा॒मिरत्के॑ अव्यत भु॒जे न पु॒त्र ओ॒ण्योः॑। सर॑ज्जा॒रो न योष॑णां व॒रो न योनि॑मा॒सद॑म्॥

यहाँ कई दृष्टान्तों से परमात्मा की प्राप्ति का वर्णन किया है। कई एक लोग यहाँ “जारो न योषणां” के अर्थ स्त्रैण पुरुष अर्थात् स्त्रीलम्पट पुरुष के करते हैं, यह अर्थ वेद के आशय से सर्वथा विरुद्ध है, क्योंकि वेद सदाचार का रास्ता बतलाता है, दुराचार का नहीं॥१४॥

स वी॒रो द॑क्ष॒साध॑नो॒ वि यस्त॒स्तम्भ॒ रोद॑सी। हरिः॑ प॒वित्रे॑ अव्यत वे॒धा न योनि॑मा॒सद॑म्॥

जो लोग अपने अन्तःकरणों  को पवित्र बनाते हैं अर्थात् मन, बुद्धि आदिकों को शुद्ध करते हैं, उनके अन्तःकरणों में परमात्मा का आविर्भाव होता है॥१५॥

अव्यो॒ वारे॑भिः पवते॒ सोमो॒ गव्ये॒ अधि॑ त्व॒चि। कनि॑क्रद॒द्वृषा॒ हरि॒रिन्द्र॑स्या॒भ्ये॑ति निष्कृ॒तम्॥

यहाँ कई एक लोग (गव्ये अधित्वचि) के अर्थ गोचर्म के करते हैं, ऐसा करना वेद के आशय से सर्वथा विरुद्ध है। न केवल वेदाशय से विरुद्ध है, किन्तु प्रसिद्धि से भी विरुद्ध है, क्योंकि अधित्वचि के अर्थ गोचर्म पर गर्जना किये गये हैं और गोचर्म पर गर्जना अनुभव से सर्वथा विरुद्ध है। इस अधित्वचि के अर्थ मनरूप अधिष्ठाता के ही ठीक हैं, किसी अन्य वस्तु के नहीं ॥१६॥यह १०१ वाँ सूक्त और तीसरा वर्ग समाप्त हुआ ॥

क्रा॒णा शिशु॑र्म॒हीनां॑ हि॒न्वन्नृ॒तस्य॒ दीधि॑तिम्। विश्वा॒ परि॑ प्रि॒या भु॑व॒दध॑ द्वि॒ता॥

इस मन्त्र में द्वैतवाद का वर्णन स्पष्टरीति से किया गया है॥१॥

उप॑ त्रि॒तस्य॑ पा॒ष्यो॒३॒॑रभ॑क्त॒ यद्गुहा॑ प॒दम्। य॒ज्ञस्य॑ स॒प्त धाम॑भि॒रध॑ प्रि॒यम्॥

इस मन्त्र में महत्तत्त्वादि कार्य्य-कारणों द्वारा सृष्टि का निरूपण किया गया है॥२॥

त्रीणि॑ त्रि॒तस्य॒ धार॑या पृ॒ष्ठेष्वेर॑या र॒यिम्। मिमी॑ते अस्य॒ योज॑ना॒ वि सु॒क्रतुः॑॥

प्रकृति के सत्त्व, रज, तम, तीनों गुणों द्वारा परमात्मा इस ब्रह्माण्ड की रचना करता है॥३॥

ज॒ज्ञा॒नं स॒प्त मा॒तरो॑ वे॒धाम॑शासत श्रि॒ये। अ॒यं ध्रु॒वो र॑यी॒णां चिके॑त॒ यत्॥

इसमें महत्तत्त्वादि सातों प्रकृतियों का वर्णन है॥४॥

अ॒स्य व्र॒ते स॒जोष॑सो॒ विश्वे॑ दे॒वासो॑ अ॒द्रुहः॑। स्पा॒र्हा भ॑वन्ति॒ रन्त॑यो जु॒षन्त॒ यत्॥

जो लोग राग-द्वेषरहित होकर परमात्मा की भक्ति करते हैं, वे अपने सामर्थ्य से संसार का बहुत उपकार कर सकते हैं॥५॥

यमी॒ गर्भ॑मृता॒वृधो॑ दृ॒शे चारु॒मजी॑जनन्। क॒विं मंहि॑ष्ठमध्व॒रे पु॑रु॒स्पृह॑म्॥

जो इस चराचर ब्रह्माण्ड का उत्पादक परमात्मा है, उसकी उपासना ज्ञानयज्ञ, योगयज्ञ, तपोयज्ञ इत्यादि अनन्त प्रकार के यज्ञों द्वारा की जाती है॥६॥

स॒मी॒ची॒ने अ॒भि त्मना॑ य॒ह्वी ऋ॒तस्य॑ मा॒तरा॑। त॒न्वा॒ना य॒ज्ञमा॑नु॒षग्यद॑ञ्ज॒ते॥

जो लोग इस कार्य्यसंसार और इसके कारणभूत ब्रह्म के साथ यथायोग्य व्यवहार करते हैं, वे शक्तिसम्पन्न होकर इस संसार की यात्रा करते हैं॥७॥

क्रत्वा॑ शु॒क्रेभि॑र॒क्षभि॑ॠ॒णोरप॑ व्र॒जं दि॒वः। हि॒न्वन्नृ॒तस्य॒ दीधि॑तिं॒ प्राध्व॒रे॥

इस मन्त्र में अज्ञान की निवृत्ति के साधनों का वर्णन है अर्थात् जो पुरुष ज्ञानादि द्वारा जप-तप आदि संयमसम्पन्न होकर तेजस्वी बनते हैं, वे अज्ञान को निवृत्त करके प्रकाशस्वरूप ब्रह्म में विराजमान होते हैं ॥८॥यह १०२ वाँ सूक्त और पाँचवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

प्र पु॑ना॒नाय॑ वे॒धसे॒ सोमा॑य॒ वच॒ उद्य॑तम्। भृ॒तिं न भ॑रा म॒तिभि॒र्जुजो॑षते॥

जो लोग परमात्मपरायण होते हैं, परमात्मा उन्हें अवश्यमेव ऐश्वर्य्यों से भरपूर करता है, वा यों कहो कि जिस प्रकार स्वामी भृत्य को भृति देकर प्रसन्न होता है, इसी प्रकार परमात्मा अपने उपासकों का भरण-पोषण करके उन्हें उन्नतिशील बनाता है॥१॥

परि॒ वारा॑ण्य॒व्यया॒ गोभि॑रञ्जा॒नो अ॑र्षति। त्री ष॒धस्था॑ पुना॒नः कृ॑णुते॒ हरिः॑॥

जो लोग अन्तःकरण के मल-विक्षेपादि दोषों को दूर करते हैं, वे लोग परमात्मज्ञान के अधिकारी बनकर परमात्मज्ञान का लाभ करते हैं ॥२॥

परि॒ कोशं॑ मधु॒श्चुत॑म॒व्यये॒ वारे॑ अर्षति। अ॒भि वाणी॒ॠषी॑णां स॒प्त नू॑षत॥

परमात्मा उपासक की ज्ञानेन्द्रियों को निर्मल करके उनमें शुद्ध ज्ञान प्रकाशित करता है॥३॥

परि॑ णे॒ता म॑ती॒नां वि॒श्वदे॑वो॒ अदा॑भ्यः। सोमः॑ पुना॒नश्च॒म्वो॑र्विश॒द्धरिः॑॥

परमात्मा शुभ बुद्धियों का प्रदान करनेवाला है॥४॥

परि॒ दैवी॒रनु॑ स्व॒धा इन्द्रे॑ण याहि स॒रथ॑म्। पु॒ना॒नो वा॒घद्वा॒घद्भि॒रम॑र्त्यः॥

इस मन्त्र में दैवी सम्पत्ति के गुणों का वर्णन किया है॥५॥

परि॒ सप्ति॒र्न वा॑ज॒युर्दे॒वो दे॒वेभ्यः॑ सु॒तः। व्या॒न॒शिः पव॑मानो॒ वि धा॑वति॥

इसमें परमात्मा की व्यापकता को विद्युत् के दृष्टान्त से स्पष्ट किया है ॥६॥यह १०३ वाँ सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ॥

सूक्तम्

सखा॑य॒ आ नि षी॑दत पुना॒नाय॒ प्र गा॑यत। शिशुं॒ न य॒ज्ञैः परि॑ भूषत श्रि॒ये॥

उपासक लोग परमात्मा का ज्ञानयज्ञादि द्वारा आह्वान करके उसके ज्ञान का सर्वत्र प्रचार करते हैं॥१॥

समी॑ व॒त्सं न मा॒तृभिः॑ सृ॒जता॑ गय॒साध॑नम्। दे॒वा॒व्यं१॒॑ मद॑म॒भि द्विश॑वसम्॥

परमात्मा दैवीसम्पत्तिवाले पुरुषों को अपनी दिव्य शक्तियों से विभूषित करता है और जो लोग अनाचारी आसुरी भाव से सम्पन्न हैं, उनको परमात्मज्ञान की ज्योति से देवपुरुषों के समान लाभ नहीं होता। तात्पर्य्य यह है कि दिव्यपुरुषों में परमात्मा की ज्योति प्रतिबिम्बित होती है और तमरूप भावों से दूषित पुरुषों में नहीं॥२॥

पु॒नाता॑ दक्ष॒साध॑नं॒ यथा॒ शर्धा॑य वी॒तये॑। यथा॑ मि॒त्राय॒ वरु॑णाय॒ शंत॑मः॥

जिस प्रकार ग्रह-उपग्रहों का केन्द्र सूर्य है, इसी प्रकार सब ज्ञानों का आधार परमात्मा है। जो लोग ज्ञानी तथा विज्ञानी बनकर देश का सुधार करना चाहते हैं, उनको चाहिये कि परमात्मा से ज्ञानरूपी दीप्ति का लाभ करें॥३॥

अ॒स्मभ्यं॑ त्वा वसु॒विद॑म॒भि वाणी॑रनूषत। गोभि॑ष्टे॒ वर्ण॑म॒भि वा॑सयामसि॥

परमात्मा अनन्तगुणसम्पन्न है। उसके गुणों के वर्णन को जो पुरुष श्रवण, मनन और निदिध्पासन द्वारा चित्त में बसाते हैं, वे पुरुष अवश्यमेव ज्ञानयोगी बनते हैं॥४॥

स नो॑ मदानां पत॒ इन्दो॑ दे॒वप्स॑रा असि। सखे॑व॒ सख्ये॑ गातु॒वित्त॑मो भव॥

परमात्मा सबको सन्मार्ग दिखलानेवाला है और जिस प्रकार मित्र अपने मित्र का हितचिन्तन करता है, इस प्रकार परमात्मा सबका हित चिन्तन करनेवाला है॥५॥

सने॑मि कृ॒ध्य१॒॑स्मदा र॒क्षसं॒ कं चि॑द॒त्रिण॑म्। अपादे॑वं द्व॒युमंहो॑ युयोधि नः॥

परमात्मा पापी पुरुषों का हनन करके निष्कपटता का प्रचार करता है ॥६॥यह १०४ वाँ सूक्त और सातवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

तं वः॑ सखायो॒ मदा॑य पुना॒नम॒भि गा॑यत। शिशुं॒ न य॒ज्ञैः स्व॑दयन्त गू॒र्तिभिः॑॥

जो लोग परमात्मा के यश का गायन करते हैं, वे अवश्यमेव परमात्मज्ञान को प्राप्त होते हैं॥१॥

सं व॒त्स इ॑व मा॒तृभि॒रिन्दु॑र्हिन्वा॒नो अ॑ज्यते। दे॒वा॒वीर्मदो॑ म॒तिभिः॒ परि॑ष्कृतः॥

जो लोग अपनी चित्तवृत्तियों को निर्मल करके उस परमात्मा का ध्यान करते हैं, परमात्मा अवश्यमेव उनके ध्यान का विषय होता है॥२॥

अ॒यं दक्षा॑य॒ साध॑नो॒ऽयं शर्धा॑य वी॒तये॑। अ॒यं दे॒वेभ्यो॒ मधु॑मत्तमः सु॒तः॥

सब प्रकार की नीति का साधन एकमात्र परमात्मा है। जो विद्वान् नीतिनिपुण होना चाहते हैं, वे भी एकमात्र परमात्मा की शरण लें॥३॥

गोम॑न्न इन्दो॒ अश्व॑वत्सु॒तः सु॑दक्ष धन्व। शुचिं॑ ते॒ वर्ण॒मधि॒ गोषु॑ दीधरम्॥

जो लोग परमात्मा के शुद्धस्वरूप का ध्यान करते हैं, परमात्मा उनके ज्ञान को अपनी ज्योति से अवश्यमेव देदीप्यमान करता है॥४॥

स नो॑ हरीणां पत॒ इन्दो॑ दे॒वप्स॑रस्तमः। सखे॑व॒ सख्ये॒ नर्यो॑ रु॒चे भ॑व॥

जिस प्रकार सूर्य्य अन्य पदार्थों के तेज को देदीप्यमान करता है, इसी प्रकार परमात्मा भी ज्ञान-विज्ञानादि तेजों में लोगों को देदीप्यमान करता है॥५॥

सने॑मि॒ त्वम॒स्मदाँ अदे॑वं॒ कं चि॑द॒त्रिण॑म्। सा॒ह्वाँ इ॑न्दो॒ परि॒ बाधो॒ अप॑ द्व॒युम्॥

परमात्मा मायावी पुरुषों से अपने भक्तों की रक्षा अवश्यमेव करता है अर्थात् परमात्मा के सामने मायावी पुरुषों की माया और दम्भियों का दम्भ कदापि नहीं चलता ॥६॥यह १०५ वाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

इन्द्र॒मच्छ॑ सु॒ता इ॒मे वृष॑णं यन्तु॒ हर॑यः। श्रु॒ष्टी जा॒तास॒ इन्द॑वः स्व॒र्विदः॑॥

जो पुरुष उद्योगी हैं अर्थात् कर्मयोगी हैं, उनको परमात्मा के गुणों की उपलब्धि अवश्यमेव होती है॥१॥

अ॒यं भरा॑य सान॒सिरिन्द्रा॑य पवते सु॒तः। सोमो॒ जैत्र॑स्य चेतति॒ यथा॑ वि॒दे॥

परमात्मा विजयी पुरुषों को धर्म से जो विजय करनेवाले हैं, उनको अवश्यमेव अपने ज्ञान से बोधन करता है और अपने ऐश्वर्य्य से उन्हें सदैव उत्साहित बनाता है॥२॥

अ॒स्येदिन्द्रो॒ मदे॒ष्वा ग्रा॒भं गृ॑भ्णीत सान॒सिम्। वज्रं॑ च॒ वृष॑णं भर॒त्सम॑प्सु॒जित्॥

कर्मयोगी को चाहिये कि वह एकमात्र परमात्मा की अनन्य भक्ति करे, अन्य किसी की उपासना न करे॥३॥

प्र ध॑न्वा सोम॒ जागृ॑वि॒रिन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव। द्यु॒मन्तं॒ शुष्म॒मा भ॑रा स्व॒र्विद॑म्॥

परमात्मा अपनी शक्तियों से सदैव जागृत है और वह कर्मयोगी को सदैव जागृति देकर सावधान करता है॥४॥

इन्द्रा॑य॒ वृष॑णं॒ मदं॒ पव॑स्व वि॒श्वद॑र्शतः। स॒हस्र॑यामा पथि॒कृद्वि॑चक्ष॒णः॥

परमात्मा कर्मयोगी के लिये सब प्रकार के ऐश्वर्य्य प्रदान करता है और उनको अपने ज्ञान से प्रकाशित करता है॥५॥

अ॒स्मभ्यं॑ गातु॒वित्त॑मो दे॒वेभ्यो॒ मधु॑मत्तमः। स॒हस्रं॑ याहि प॒थिभिः॒ कनि॑क्रदत्॥

परमात्मा अनन्त मार्गों द्वारा अपने ज्ञान का प्रकाश करता है अर्थात् इस विविध रचना से उसके भक्त अनन्त प्रकार से उसके ज्ञान को उपलब्ध करते हैं। अनन्त ब्रह्माण्डों की रचना द्वारा और इस विशाल नभोमण्डल में अपनी दिव्य ज्योतियों से परमात्मा सदैव गर्ज रहा है। परमात्मा का यही गर्जन है और निराकार परमात्मा किसी प्रकार भी गर्जन नहीं करता॥६॥

पव॑स्व दे॒ववी॑तय॒ इन्दो॒ धारा॑भि॒रोज॑सा। आ क॒लशं॒ मधु॑मान्त्सोम नः सदः॥

ब्रह्मानन्द जो सब आनन्दों से बढ़कर आनन्द है, जिसको उपनिषत्कारों ने “रसो वै सः रसं ह्येवायं लब्ध्वा आनन्दी भवति” इत्यादि वाक्यों में वर्णन किया है, वह आनन्दरूप परमात्मा अपने भक्तों को अवश्यमेव अपने ब्रह्मानन्द से आनन्दित करता है॥७॥

तव॑ द्र॒प्सा उ॑द॒प्रुत॒ इन्द्रं॒ मदा॑य वावृधुः। त्वां दे॒वासो॑ अ॒मृता॑य॒ कं प॑पुः॥

ब्रह्मानन्द वा ब्रह्मामृतरूपी रस, जो सब रसों से अधिक स्वादु है, उसका पान ब्रह्मपरायण ज्ञानयोगी और कर्मयोगी ही कर सकते हैं, अन्य नहीं॥८॥

आ नः॑ सुतास इन्दवः पुना॒ना धा॑वता र॒यिम्। वृ॒ष्टिद्या॑वो रीत्यापः स्व॒र्विदः॑॥

जिस प्रकार बाह्य जगत् में परमात्मा की शक्तियों से अनन्त प्रकार की वृष्टि होती है, इसी प्रकार कर्मयोगी और ज्ञानयोगी पुरुषों के अन्तःकरण में परमात्मा की ज्ञानरूपी वृष्टि सदैव होती रहती है, इसको योगशास्त्र की परिभाषा में धर्ममेघसमाधि के नाम से कहा गया है अर्थात् धर्मरूपी मेघ से योगी जन सदैव सुसिञ्चित रहते हैं॥९॥

सोमः॑ पुना॒न ऊ॒र्मिणाव्यो॒ वारं॒ वि धा॑वति। अग्रे॑ वा॒चः पव॑मानः॒ कनि॑क्रदत्॥

जो पुरुष सद्गुणसम्पन्न हैं, उनको परमात्मा अपने आनन्द में निमग्न करता है अर्थात् ब्रह्माम्बुधि में वे लोग अपने आपको सदैव शान्तिमय वारि से स्नान कराते हैं॥१०॥

धी॒भिर्हि॑न्वन्ति वा॒जिनं॒ वने॒ क्रीळ॑न्त॒मत्य॑विम्। अ॒भि त्रि॑पृ॒ष्ठं म॒तयः॒ सम॑स्वरन्॥

परमात्मा कालातीत है अर्थात् भूत, भविष्यत् और वर्तमान ये तीनों काल उसकी इयत्ता अर्थात् हद्द नहीं बाँध सकते। तात्पर्य यह है कि काल की गति कार्य्य पदार्थों में है, कारणों में नहीं, वा यों कहो कि नित्य पदार्थों में काल का व्यवहार नहीं होता, किन्तु अनित्यों में होता है, इसी अभिप्राय से परमात्मा को यहाँ कालातीतरूप से वर्णन किया है॥११॥

अस॑र्जि क॒लशाँ॑ अ॒भि मी॒ळ्हे सप्ति॒र्न वा॑ज॒युः। पु॒ना॒नो वाचं॑ ज॒नय॑न्नसिष्यदत्॥

उपासकों को चाहिये कि वे उपासना से प्रथम अपने अन्तःकरणों को शुद्ध करें, क्योंकि वह उपास्य देव स्वच्छ अन्तःकरणों में ही अपनी अभिव्यक्ति को प्रकट करता है॥१२॥

पव॑ते हर्य॒तो हरि॒रति॒ ह्वरां॑सि॒ रंह्या॑। अ॒भ्यर्ष॑न्त्स्तो॒तृभ्यो॑ वी॒रव॒द्यशः॑॥

परमात्मा परमात्मपरायण लोगों को सरलभाव प्रदान करके उनकी कुटिलताओं को दूर करता है और उनको वीर सन्तान देकर लोक-परलोक में तेजस्वी बनाता है॥१३॥

अ॒या प॑वस्व देव॒युर्मधो॒र्धारा॑ असृक्षत। रेभ॑न्प॒वित्रं॒ पर्ये॑षि वि॒श्वतः॑॥

परमात्मा का शब्दायमान होना इसी तात्पर्य्य से है कि वह अपने वेदरूपी शब्दब्रह्म द्वारा शब्दायमान है अर्थात् वेद के सदुपदेश द्वारा लोगों को बोधित करता है ॥१४॥यह १०६ वाँ सूक्त और ११ वाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

परी॒तो षि॑ञ्चता सु॒तं सोमो॒ य उ॑त्त॒मं ह॒विः। द॒ध॒न्वाँ यो नर्यो॑ अ॒प्स्व१॒॑न्तरा सु॒षाव॒ सोम॒मद्रि॑भिः॥

सोम, जो सम्पूर्ण संसार की उत्पत्ति का कारण है और जो सौम्य स्वभावों का प्रदान करनेवाला है, वह सोमरूप परमात्मा संसार में ओत-प्रोत हो रहा है। उसका अपनी ज्ञानरूपी वृत्तियों द्वारा साक्षात् करना ही वृत्तियों से सिञ्चन करना है॥१॥

नू॒नं पु॑ना॒नोऽवि॑भिः॒ परि॑ स्र॒वाद॑ब्धः सुर॒भिन्त॑रः। सु॒ते चि॑त्त्वा॒प्सु म॑दामो॒ अन्ध॑सा श्री॒णन्तो॒ गोभि॒रुत्त॑रम्॥

हे परमात्मा सच्चिदानन्दस्वरूप हैं, आपका स्वरूप अखण्डनीय है, इसलिये आपका ध्यान व्यापकभाव से ही किया जा सकता है, अन्यथा नहीं॥२॥

परि॑ सुवा॒नश्चक्ष॑से देव॒माद॑नः॒ क्रतु॒रिन्दु॑र्विचक्ष॒णः॥

जिस समय उस निराकार का ध्यान किया जाता है, उस समय उसके सद्गुण उपासक के हृदय में आविर्भाव को प्राप्त होते हैं अर्थात् उसके सत्, चित्, आनन्द इत्यादि रूप प्रतीत होने लगते हैं, यही परमात्मदेव का साक्षात्कार है॥३॥

पु॒ना॒नः सो॑म॒ धार॑या॒पो वसा॑नो अर्षसि। आ र॑त्न॒धा योनि॑मृ॒तस्य॑ सीद॒स्युत्सो॑ देव हिर॒ण्ययः॑॥

वह ज्योतिस्वरूप परमात्मा अपनी दिव्य ज्योति से उपासक के अज्ञान को छिन्न-भिन्न करके उसमें विमल ज्ञान का प्रकाश करता है॥४॥

दु॒हा॒न ऊध॑र्दि॒व्यं मधु॑ प्रि॒यं प्र॒त्नं स॒धस्थ॒मास॑दत्। आ॒पृच्छ्यं॑ ध॒रुणं॑ वा॒ज्य॑र्षति॒ नृभि॑र्धू॒तो वि॑चक्ष॒णः॥

जो पुरुष धारणा-ध्यानादि साधनों से सम्पन्न हैं, वे ही उस निराकार ज्योति के ज्ञान के पात्र बन सकते हैं, अन्य नहीं॥५॥

पु॒ना॒नः सो॑म॒ जागृ॑वि॒रव्यो॒ वारे॒ परि॑ प्रि॒यः। त्वं विप्रो॑ अभ॒वोऽङ्गि॑रस्तमो॒ मध्वा॑ य॒ज्ञं मि॑मिक्ष नः॥

परमात्मा उपासकों के यज्ञों को अपनी ज्ञानमयी वृष्टि द्वारा सुसिञ्चित करके आनन्दित करते हैं॥६॥

सोमो॑ मी॒ढ्वान्प॑वते गातु॒वित्त॑म॒ ऋषि॒र्विप्रो॑ विचक्ष॒णः। त्वं क॒विर॑भवो देव॒वीत॑म॒ आ सूर्यं॑ रोहयो दि॒वि॥

इस मन्त्र का आशय यह है कि परमात्मा ज्ञानादि गुणों द्वारा उपासक के हृदय को दीप्तिमान् बनाते हैं॥७॥

सोम॑ उ षुवा॒णः सो॒तृभि॒रधि॒ ष्णुभि॒रवी॑नाम्। अश्व॑येव ह॒रिता॑ याति॒ धार॑या म॒न्द्रया॑ याति॒ धार॑या॥

जिस प्रकार विद्युत् अपनी शक्तियों द्वारा नाना कार्य्यों का हेतु होती है, इसी प्रकार परमात्मा अपने ज्ञान-कर्मरूपी शक्ति द्वारा सब ब्रह्माण्डों की रचना का हेतु है॥८॥

अ॒नू॒पे गोमा॒न्गोभि॑रक्षाः॒ सोमो॑ दु॒ग्धाभि॑रक्षाः। स॒मु॒द्रं न सं॒वर॑णान्यग्मन्म॒न्दी मदा॑य तोशते॥

इस मन्त्र में अज्ञान को भङ्ग करके परमात्मा का साक्षात्कार करना वर्णन किया गया है॥९॥

आ सो॑म सुवा॒नो अद्रि॑भिस्ति॒रो वारा॑ण्य॒व्यया॑। जनो॒ न पु॒रि च॒म्वो॑र्विश॒द्धरिः॒ सदो॒ वने॑षु दधिषे॥

इस मन्त्र में परमात्मा की व्यापकता वर्णन की गई है॥१०॥

स मा॑मृजे ति॒रो अण्वा॑नि मे॒ष्यो॑ मी॒ळ्हे सप्ति॒र्न वा॑ज॒युः। अ॒नु॒माद्यः॒ पव॑मानो मनी॒षिभिः॒ सोमो॒ विप्रे॑भि॒ॠक्व॑भिः॥

जो सर्वोपरि ब्रह्मानन्द है, जिसके आगे और सब आनन्द फीके हैं, वह एकमात्र परमात्मपरायण होने से ही उपलब्ध होता है, अन्यथा नहीं॥११॥

प्र सो॑म दे॒ववी॑तये॒ सिन्धु॒र्न पि॑प्ये॒ अर्ण॑सा। अं॒शोः पय॑सा मदि॒रो न जागृ॑वि॒रच्छा॒ कोशं॑ मधु॒श्चुत॑म्॥

परमात्मा सर्वव्यापक है, उसका आनन्द यद्यपि सर्वत्र परिपूर्ण है, तथापि उसको चित्त की निर्मलता द्वारा उपलब्ध करनेवाले उपासक प्राप्त कर सकते हैं, अन्य नहीं॥१२॥

आ ह॑र्य॒तो अर्जु॑ने॒ अत्के॑ अव्यत प्रि॒यः सू॒नुर्न मर्ज्यः॑। तमीं॑ हिन्वन्त्य॒पसो॒ यथा॒ रथं॑ न॒दीष्वा गभ॑स्त्योः॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि संचित कर्म, प्रारब्ध और क्रियमाण इन तीनों प्रकार के कर्मों का ज्ञाता एकमात्र परमात्मा ही है॥१३॥

अ॒भि सोमा॑स आ॒यवः॒ पव॑न्ते॒ मद्यं॒ मद॑म्। स॒मु॒द्रस्याधि॑ वि॒ष्टपि॑ मनी॒षिणो॑ मत्स॒रासः॑ स्व॒र्विदः॑॥

ज्ञानी और विज्ञानी लोग ही अपने जप तप आदि संयमों द्वारा परमात्मा के आनन्द को उपलब्ध करते हैं और वही अधिकारी होते हैं, अन्य नहीं॥१४॥

तर॑त्समु॒द्रं पव॑मान ऊ॒र्मिणा॒ राजा॑ दे॒व ऋ॒तं बृ॒हत्। अर्ष॑न्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य॒ धर्म॑णा॒ प्र हि॑न्वा॒न ऋ॒तं बृ॒हत्॥

जिस देश में अध्यापक तथा उपदेशक अपनी शुभ शिक्षा द्वारा लोगों को सुशिक्षित करते हैं, परमात्मा उस देश का अवश्यमेव कल्याण करता है॥१५॥

नृभि॑र्येमा॒नो ह॑र्य॒तो वि॑चक्ष॒णो राजा॑ दे॒वः स॑मु॒द्रियः॑॥

परमात्मा के ज्ञान से कर्मयोगी नानाविध फलों को लाभ करता है, यहाँ कर्मयोगी यह उपलक्षणमात्र है, वास्तव में ज्ञानयोगी, उद्योगी, तपस्वी और संयमी सब प्रकार के पुरुषों का यहाँ ग्रहण है॥१६॥

इन्द्रा॑य पवते॒ मदः॒ सोमो॑ म॒रुत्व॑ते सु॒तः। स॒हस्र॑धारो॒ अत्यव्य॑मर्षति॒ तमी॑ मृजन्त्या॒यवः॑॥

यहाँ भी कर्मयोगी उपलक्षणमात्र है, वास्तव में सब प्रकार के योगियों का यहाँ ग्रहण है कि वह परमात्मा का साक्षात्कार करके सुरक्षित रहकर आह्लादक तथा सुखकारी पदार्थों का उपभोग करते हैं॥१७॥

पु॒ना॒नश्च॒मू ज॒नय॑न्म॒तिं क॒विः सोमो॑ दे॒वेषु॑ रण्यति। अ॒पो वसा॑नः॒ परि॒ गोभि॒रुत्त॑रः॒ सीद॒न्वने॑ष्वव्यत॥

द्युभ्वादि लोक-लोकान्तर एकमात्र परमात्मा ही के आधार पर स्थित होने से योगीजन सर्वत्र सुरक्षित रहता है॥१८॥

तवा॒हं सो॑म रारण स॒ख्य इ॑न्दो दि॒वेदि॑वे। पु॒रूणि॑ बभ्रो॒ नि च॑रन्ति॒ मामव॑ परि॒धीँरति॒ ताँ इ॑हि॥

इस मन्त्र में यह प्रार्थना की गई है कि हे परमात्मन्! वैदिक कर्मानुष्ठान में विघ्न करनेवाले मनुष्यों से हमारी रक्षा करें, “रक्षत्यस्मादिति रक्षः, रक्ष एव राक्षसः” यहाँ राक्षस शब्द से विघ्नकारी मनुष्यों का ग्रहण है, किसी जातिविशेष का नहीं॥१९॥

उ॒ताहं नक्त॑मु॒त सो॑म ते॒ दिवा॑ स॒ख्याय॑ बभ्र॒ ऊध॑नि। घृ॒णा तप॑न्त॒मति॒ सूर्यं॑ प॒रः श॑कु॒ना इ॑व पप्तिम॥

“बिभर्तीति बभ्रुः”=जो सबको धारण करनेवाला परमात्मा है, उसी की उपासना करनी योग्य है॥२०॥

मृ॒ज्यमा॑नः सुहस्त्य समु॒द्रे वाच॑मिन्वसि। र॒यिं पि॒शङ्गं॑ बहु॒लं पु॑रु॒स्पृहं॒ पव॑माना॒भ्य॑र्षसि॥

परमात्मा की उपासना करने से सब प्रकार के ऐश्वर्य मिलते हैं, इसलिये ऐश्वर्य्य की चाहनावाले पुरुष को उसकी उपासना करनी चाहिये॥२१॥

मृ॒जा॒नो वारे॒ पव॑मानो अ॒व्यये॒ वृषाव॑ चक्रदो॒ वने॑। दे॒वानां॑ सोम पवमान निष्कृ॒तं गोभि॑रञ्जा॒नो अ॑र्षसि॥

अभ्युदय और निःश्रेयस का हेतु एकमात्र परमात्मा ही है, इसलिये उसी की उपासना करनी चाहिये॥२२॥

पव॑स्व॒ वाज॑सातये॒ऽभि विश्वा॑नि॒ काव्या॑। त्वं स॑मु॒द्रं प्र॑थ॒मो वि धा॑रयो दे॒वेभ्यः॑ सोम मत्स॒रः॥

हे परमात्मन्! इस नभोमण्डल अर्थात् कोटि-कोटि ब्रह्माण्डों को एकमात्र आपने ही धारण किया है, इसलिये आप कृपा करके हमारे भावों को पवित्र बनायें, जिससे हम आपकी उपासना में प्रवृत्त रहें॥२३॥

स तू प॑वस्व॒ परि॒ पार्थि॑वं॒ रजो॑ दि॒व्या च॑ सोम॒ धर्म॑भिः। त्वां विप्रा॑सो म॒तिभि॑र्विचक्षण शु॒भ्रं हि॑न्वन्ति धी॒तिभिः॑॥

इस ब्रह्माण्ड के परमाणुरूप सूक्ष्म कारण को एकमात्र परमात्मा ही धारण करता तथा पवित्र करता है, इसलिये हे भगवन्! हममें भी वह शक्ति प्रदान करें कि हम कर्मयोगी बनकर ऐश्वर्यशाली हों॥२४॥

पव॑माना असृक्षत प॒वित्र॒मति॒ धार॑या। म॒रुत्व॑न्तो मत्स॒रा इ॑न्द्रि॒या हया॑ मे॒धाम॒भि प्रयां॑सि च॥

परमात्मा के अपहतपाप्मादि स्वभाव उपासना द्वारा मनुष्य को शुद्ध करते हैं, इसलिये मनुष्य को उसकी उपासना में सदा रत रहना चाहिये॥२५॥

अ॒पो वसा॑नः॒ परि॒ कोश॑मर्ष॒तीन्दु॑र्हिया॒नः सो॒तृभिः॑। ज॒नय॒ञ्ज्योति॑र्म॒न्दना॑ अवीवश॒द्गाः कृ॑ण्वा॒नो न नि॒र्णिज॑म्॥

सूर्य-चन्द्रादि नाना ज्योतियों को उत्पन्न करनेवाला परमात्मा सब कर्मों का अध्यक्ष है, वह अपनी कृपा से हमारे अन्तःकरण को प्राप्त हो॥२६॥यह १०७ वाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ॥

पव॑स्व॒ मधु॑मत्तम॒ इन्द्रा॑य सोम क्रतु॒वित्त॑मो॒ मदः॑। महि॑ द्यु॒क्षत॑मो॒ मदः॑॥

इस मन्त्र में परमात्मा से शुभ कर्म्मों की ओर लगने की प्रार्थना की गई है कि हे शुभकर्मों में प्रेरक परमात्मन्! आप हमारे सब कर्मों को भली-भाँति जानते हुए भी अपनी कृपा से हमें शुभ कर्मों की ओर प्रेरित करें, जिस से कि हम कर्मयोगी बनकर आपकी समीपता का लाभ कर सकें॥१॥

यस्य॑ ते पी॒त्वा वृ॑ष॒भो वृ॑षा॒यते॒ऽस्य पी॒ता स्व॒र्विदः॑। स सु॒प्रके॑तो अ॒भ्य॑क्रमी॒दिषोऽच्छा॒ वाजं॒ नैत॑शः॥

इस मन्त्र का आशय यह है कि वेद के सदुपदेश द्वारा कर्मयोगी शोभन प्रज्ञावाला हो जाता है। यहाँ अश्व के दृष्टान्त से कर्मयोगी के बल और पराक्रम का वर्णन किया है कि जिस प्रकार अश्व संग्राम में विजय प्राप्त करता है, इसी प्रकार कर्मयोगी विज्ञान द्वारा सब शत्रुओं का पराजय करनेवाला होता है॥२॥

त्वं ह्य१॒॑ङ्ग दैव्या॒ पव॑मान॒ जनि॑मानि द्यु॒मत्त॑मः। अ॒मृ॒त॒त्वाय॑ घो॒षयः॑॥

वही परमपिता परमात्मा विद्वान् तथा सत्कर्मी जीवों को कल्याण के देनेवाले और वही सबका पालन पोषण करनेवाले हैं ॥३॥

येना॒ नव॑ग्वो द॒ध्यङ्ङ॑पोर्णु॒ते येन॒ विप्रा॑स आपि॒रे। दे॒वानां॑ सु॒म्ने अ॒मृत॑स्य॒ चारु॑णो॒ येन॒ श्रवां॑स्यान॒शुः॥

परमात्मा ही अपने अनादिसिद्ध ज्ञान द्वारा लोगों को सन्मार्ग की प्रेरणा करता, वही सद्विद्यारूपी वेदों से सबका सुधार करता और वही सबको आनन्द प्रदान करनेवाला है॥४॥

ए॒ष स्य धार॑या सु॒तोऽव्यो॒ वारे॑भिः पवते म॒दिन्त॑मः। क्रीळ॑न्नू॒र्मिर॒पामि॑व॥

यहाँ समुद्र की लहरों का दृष्टान्त अनायास के अभिप्राय से है, साकार के अभिप्राय से नहीं अर्थात् जिस प्रकार मनुष्य अनायास ही श्वासादि व्यवहार करता है, इसी प्रकार लीलामात्र से परमात्मा इस संसार की रचना करता है॥५॥

य उ॒स्रिया॒ अप्या॑ अ॒न्तरश्म॑नो॒ निर्गा अकृ॑न्त॒दोज॑सा। अ॒भि व्र॒जं त॑त्निषे॒ गव्य॒मश्व्यं॑ व॒र्मीव॑ धृष्ण॒वा रु॑ज॥

वह पूर्ण परमात्मा जो इस ब्रह्माण्ड में सर्वत्र परिपूर्ण हो रहा है, वही मङ्गलमय प्रभु सब विघ्नों को निवृत्त करके कल्याण का देनेवाला और वही सब पापों का क्षय करनेवाला है॥६॥

आ सो॑ता॒ परि॑ षिञ्च॒ताश्वं॒ न स्तोम॑म॒प्तुरं॑ रज॒स्तुर॑म्। व॒न॒क्र॒क्षमु॑द॒प्रुत॑म्॥

विद्युदादि नानाविध कियाशक्तियों का प्रदाता, निर्माता तथा प्रकाशक एकमात्र परमात्मा ही है, वही सबका उपासनीय और वही सबको कल्याण का देनेवाला है॥७॥

स॒हस्र॑धारं वृष॒भं प॑यो॒वृधं॑ प्रि॒यं दे॒वाय॒ जन्म॑ने। ऋ॒तेन॒ य ऋ॒तजा॑तो विवावृ॒धे राजा॑ दे॒व ऋ॒तं बृ॒हत्॥

इस मन्त्र में प्रकृति को “ऋत” इस अभिप्राय से कहा गया है कि प्रकृति परिणामी नित्य है–अर्थात् परिणाम को प्राप्त होकर नाश नहीं होती, शेष सब अर्थ स्पष्ट है॥८॥

अ॒भि द्यु॒म्नं बृ॒हद्यश॒ इष॑स्पते दिदी॒हि दे॑व देव॒युः। वि कोशं॑ मध्य॒मं यु॑व॥

इस मन्त्र में परमपिता से ऐश्वर्य्यप्राप्ति की प्रार्थना की गई है कि हे परमात्मन्! आप ऐश्वर्य्यरूप सम्पूर्ण कोषों के पति हैं, कृपा करके हमें भी विशेषरूप से सम्पत्तिशील बनावें॥९॥

आ व॑च्यस्व सुदक्ष च॒म्वोः॑ सु॒तो वि॒शां वह्नि॒र्न वि॒श्पतिः॑। वृ॒ष्टिं दि॒वः प॑वस्व री॒तिम॒पां जिन्वा॒ गवि॑ष्टये॒ धियः॑॥

जिस प्रकार अग्नि एक पदार्थ को स्थानान्तर को प्राप्त कर देती है अर्थात् अपनी तेजोमयी शक्ति से गतिशील बना देती है, इसी प्रकार परमात्मा ज्ञानी तथा शुभकर्मी पुरुष को गतिशील बनाता है, जिससे पुरुष शक्तिसम्पन्न होकर उसकी समीपता को उपलब्ध करता है॥१०॥

ए॒तमु॒ त्यं म॑द॒च्युतं॑ स॒हस्र॑धारं वृष॒भं दिवो॑ दुहुः। विश्वा॒ वसू॑नि॒ बिभ्र॑तम्॥

ज्ञानवृत्तियें परमात्मा का साक्षात्कार इस प्रकार करती हैं कि आवरण भङ्ग करके सर्वव्यापक को अभिव्यक्त करती हैं, इसी का नाम वृत्तिव्याप्ति है॥११॥

वृषा॒ वि ज॑ज्ञे ज॒नय॒न्नम॑र्त्यः प्र॒तप॒ञ्ज्योति॑षा॒ तमः॑। स सुष्टु॑तः क॒विभि॑र्नि॒र्णिजं॑ दधे त्रि॒धात्व॑स्य॒ दंस॑सा॥

इस मन्त्र में परमात्मा को जायमान उपचार से कथन किया गया है, वस्तुतः नहीं, वास्तव में वह अजर, अमरादि गुणसम्पन्न है। वह अपने उपासकों की कामनाओं को पूर्ण करनेवाला और उनको सद्गति का प्रदाता है॥१२॥

स सु॑न्वे॒ यो वसू॑नां॒ यो रा॒यामा॑ने॒ता य इळा॑नाम्। सोमो॒ यः सु॑क्षिती॒नाम्॥

सब पदार्थों का अधिष्ठाता परमात्मा है अर्थात् परमात्मा सब पदार्थों का आधार और सब पदार्थ आधेय हैं। हे भगवन्! आप हमारे ऊपर ज्ञान की वृष्टि करें, जिस से कि हम लोग आपकी समीपता को प्राप्त होकर आनन्द का उपभोग कर सकें॥१३॥

यस्य॑ न॒ इन्द्रः॒ पिबा॒द्यस्य॑ म॒रुतो॒ यस्य॑ वार्य॒मणा॒ भगः॑। आ येन॑ मि॒त्रावरु॑णा॒ करा॑मह॒ एन्द्र॒मव॑से म॒हे॥

जो परमात्मा नाना प्रकार की विद्यायें और इन विद्याओं के वेत्ता कर्मयोगी तथा ज्ञानयोगियों को उत्पन्न करता, जिससे शिक्षा प्राप्त करके अध्यापक तथा उपदेशक धर्मोपदेश करते और जो दुष्टदमन के लिये रक्षक उत्पन्न करता है, वही हमारा पूजनीय देव है, उसी की उपासना करनी योग्य है॥१४॥

इन्द्रा॑य सोम॒ पात॑वे॒ नृभि॑र्य॒तः स्वा॑यु॒धो म॒दिन्त॑मः। पव॑स्व॒ मधु॑मत्तमः॥

हे आनन्दवर्द्धक तथा आह्लादजनक गुणसम्पन्न परमात्मन्! आप ऐसी कृपा करें कि हम लोग ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगी बनकर आपका साक्षात्कार करते हुए आनन्द को प्राप्त हों॥१५॥

इन्द्र॑स्य॒ हार्दि॑ सोम॒धान॒मा वि॑श समु॒द्रमि॑व॒ सिन्ध॑वः। जुष्टो॑ मि॒त्राय॒ वरु॑णाय वा॒यवे॑ दि॒वो वि॑ष्ट॒म्भ उ॑त्त॒मः॥

कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड जिस परमात्मा के आधार पर स्थिर हैं और जो कर्मयोगी तथा ज्ञानयोगी इत्यादि योगी जनों का विद्याप्रदाता है, वही एकमात्र उपास्य देव है॥१६॥यह १०८ वाँ सूक्त और १९ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

परि॒ प्र ध॒न्वेन्द्रा॑य सोम स्वा॒दुर्मि॒त्राय॑ पू॒ष्णे भगा॑य॥

परमात्मा उद्योगी तथा कर्मयोगियों के लिये नानाविध स्वादु फलों को उत्पन्न करता है अर्थात् सब प्रकार के ऐश्वर्य्य और धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष इन चारों फलों का भोक्ता कर्मयोगी तथा उद्योगी ही हो सकता है, अन्य नहीं, इसलिये पुरुष को कर्मयोगी तथा उद्योगी बनना चाहिये॥१॥

इन्द्र॑स्ते सोम सु॒तस्य॑ पेयाः॒ क्रत्वे॒ दक्षा॑य॒ विश्वे॑ च दे॒वाः॥

परमात्मानन्द के पान करने का अधिकार एकमात्र दैवीसम्पत्तिवाले पुरुषों को ही हो सकता है, अन्य को नहीं, इसी अभिप्राय से यहाँ कर्मयोगी, ज्ञानयोगी तथा देवों के लिये ब्रह्मामृत का वर्णन किया गया है॥२॥

ए॒वामृता॑य म॒हे क्षया॑य॒ स शु॒क्रो अ॑र्ष दि॒व्यः पी॒यूषः॑॥

यहाँ मुक्तिरूप सुख का “पीयूष” शब्द से वर्णन किया है। ब्रह्मानन्द का नाम ही पीयूष है और उसी को अमृत, पीयूष, मुक्ति इत्यादि नाना प्रकार के शब्दों से कथन किया गया है॥३॥

पव॑स्व सोम म॒हान्त्स॑मु॒द्रः पि॒ता दे॒वानां॒ विश्वा॒भि धाम॑॥

परमपिता परमात्मा जो आकाशवत् सर्वत्र परिपूर्ण है, उसी की उपासना से मनुष्य मुक्तिधाम को प्राप्त हो सकता है, अन्यथा नहीं॥४॥

शु॒क्रः प॑वस्व दे॒वेभ्यः॑ सोम दि॒वे पृ॑थि॒व्यै शं च॑ प्र॒जायै॑॥

परमात्मा सम्पूर्ण प्रजाओं के लिये आनन्द की वृष्टि करनेवाला है अर्थात् वही आनन्द का स्रोत होने के कारण उसी से आनन्द की लहरें इतस्ततः प्रचार पाती हैं, किसी अन्य स्रोत से नहीं॥५॥

दि॒वो ध॒र्तासि॑ शु॒क्रः पी॒यूषः॑ स॒त्ये विध॑र्मन्वा॒जी प॑वस्व॥

द्युलोक का धारक, अमृत, देदीप्यमान तथा बलस्वरूप परमात्मा, जिसने सूर्य्य, चन्द्रमादि सब लोक-लोकान्तरों को निर्माण किया है, वही हम सबका एकमात्र उपास्य देव है, अन्य नहीं॥६॥

पव॑स्व सोम द्यु॒म्नी सु॑धा॒रो म॒हामवी॑ना॒मनु॑ पू॒र्व्यः॥

सर्वोपरि परमात्मा, जिसका यश महान्=सबसे बड़ा है, वही हमारा रक्षक और वही एकमात्र उपास्य देव है॥७॥

नृभि॑र्येमा॒नो ज॑ज्ञा॒नः पू॒तः क्षर॒द्विश्वा॑नि म॒न्द्रः स्व॒र्वित्॥

परमात्मा का साक्षात्कार संयमी पुरुषों को ही होता है अर्थात् जप, तप, संयम तथा अनुष्ठान द्वारा वही लोग साक्षात्कार करते हैं। वह परमात्मा अपनी दिव्य ज्योतियों से सर्वत्र आविर्भाव को प्राप्त और नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्तस्वभाव है, वह पिता हमें सब प्रकार का सुख प्रदान करे॥८॥

इन्दुः॑ पुना॒नः प्र॒जामु॑रा॒णः कर॒द्विश्वा॑नि॒ द्रवि॑णानि नः॥

जो परमात्मा सम्पूर्ण प्रजाओं के ऐश्वर्य्य को बढ़ाता और जो स्वतःप्रकाश तथा स्वयंभू है, वही हमारा उपास्यदेव है, उसी की उपासना करता हुआ पुरुष आनन्दलाभ करता है, अन्यथा नहीं॥९॥

पव॑स्व सोम॒ क्रत्वे॒ दक्षा॒याश्वो॒ न नि॒क्तो वा॒जी धना॑य॥

जिस प्रकार विद्युत् प्रत्येक पदार्थ को देदीप्यमान करता और सब पदार्थों का प्रकाशक तथा उद्दीपक है, इसी प्रकार परमात्मा सबको उद्बोधन करके अपने-अपने कर्मों में प्रवृत करता है और कर्मयोगी पुरुष को सदैव धन का लाभ होता है॥१०॥

तं ते॑ सो॒तारो॒ रसं॒ मदा॑य पु॒नन्ति॒ सोमं॑ म॒हे द्यु॒म्नाय॑॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि उपासक लोग इस विराट् स्वरूप को देखकर ईश्वर की धारणा अपने हृदय में करते हैं, यही इस ऐश्वर्य्य को पवित्र बनाना है॥११॥

शिशुं॑ जज्ञा॒नं हरिं॑ मृजन्ति प॒वित्रे॒ सोमं॑ दे॒वेभ्य॒ इन्दु॑म्॥

जो ऋतु-ऋतु में यज्ञों द्वारा परमात्मा का यजन करते हैं, उनका नाम “ऋत्विग्” है अर्थात् इस विराट् स्वरूप की महिमा को देखकर जो आध्यात्मिक यज्ञादि द्वारा परमात्मा की उपासना करते हैं, उन्हीं को परमात्मा का साक्षात्कार होता है॥१२॥

इन्दुः॑ पविष्ट॒ चारु॒र्मदा॑या॒पामु॒पस्थे॑ क॒विर्भगा॑य॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि जो पुरुष यज्ञादि कर्म तथा अन्य सत्कर्म करते हैं, उन्हीं को परमात्मा पवित्र बनाता है, जिससे वह ऐश्वर्य्यप्राप्ति द्वारा आनन्दोपभोग करते हैं॥१३॥

बिभ॑र्ति॒ चार्विन्द्र॑स्य॒ नाम॒ येन॒ विश्वा॑नि वृ॒त्रा ज॒घान॑॥

इस मन्त्र का तात्पर्य यह है कि यद्यपि स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण ये तीनों प्रकार के शरीर सब जीवों को प्राप्त हैं, परन्तु कर्मयोगी के सूक्ष्मशरीर में परमात्मा एक प्रकार का दिव्यभाव उत्पन्न कर देता है, जिससे अज्ञान का नाश और ज्ञान की वृद्धि होती है, इस भाव से मन्त्र में कर्मयोगी के शरीर को बनाना लिखा है॥१४॥

पिब॑न्त्यस्य॒ विश्वे॑ दे॒वासो॒ गोभिः॑ श्री॒तस्य॒ नृभिः॑ सु॒तस्य॑॥

परमात्मा का आनन्द इन्द्रियसंयम द्वारा दृढ़ अभ्यास के विना कदापि नहीं मिल सकता, इसलिये पुरुष को चाहिये कि वह श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन द्वारा दृढ़ अभ्यास करके परमात्मा के आनन्द को लाभ करें॥१५॥

प्र सु॑वा॒नो अ॑क्षाः स॒हस्र॑धारस्ति॒रः प॒वित्रं॒ वि वार॒मव्य॑म्॥

जब तक मनुष्य में अज्ञान बना रहता है तब तक वह परमात्मा का साक्षात्कार कदापि नहीं कर सकता, इसलिये जिज्ञासु को आवश्यक है कि वह परमात्मा के स्वरूप को ढकनेवाले अज्ञान का नाश करके परमात्मदर्शन करे। अज्ञान, अविद्या तथा आवरण ये सब पर्य्याय शब्द हैं॥१६॥

स वा॒ज्य॑क्षाः स॒हस्र॑रेता अ॒द्भिर्मृ॑जा॒नो गोभिः॑ श्रीणा॒नः॥

जब दृढ़ अभ्यास से परमात्मा का परिपक्व ज्ञान हो जाता है, तब परमात्मज्ञान, जो अमृत के समान है, वह उपासक को आनन्द प्रदान करता है, इसी का नाम यहाँ सिञ्चन करना है॥१७॥

प्र सो॑म या॒हीन्द्र॑स्य कु॒क्षा नृभि॑र्येमा॒नो अद्रि॑भिः सु॒तः॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि जो पुरुष उसी एकमात्र परब्रह्म परमात्मा को अपना लक्ष्य बनाते हैं, उनको परमपिता परमात्मा अवश्य देदीप्यमान करते हैं॥१८॥

अस॑र्जि वा॒जी ति॒रः प॒वित्र॒मिन्द्रा॑य॒ सोमः॑ स॒हस्र॑धारः॥

परमपिता परमात्मा जो इस चराचर ब्रह्माण्ड का अधिपति है, वह अनन्त सामर्थ्ययुक्त है, उसके सामर्थ्य को उपदेशों द्वारा कर्मयोगी लाभ करता है॥१९॥

अ॒ञ्जन्त्ये॑नं॒ मध्वो॒ रसे॒नेन्द्रा॑य॒ वृष्ण॒ इन्दुं॒ मदा॑य॥

परमात्मयोग के अर्थ ब्रह्मविषयणी वृत्ति द्वारा परमात्मा के योग का नाम “परमात्मयोग” है अर्थात् उपासक लोग ज्ञानवृत्ति द्वारा परमात्मा के समीपी होकर परमात्मरूप माधुर्य रस को पान करते हुए तृप्त होते हैं॥२०॥

दे॒वेभ्य॑स्त्वा॒ वृथा॒ पाज॑से॒ऽपो वसा॑नं॒ हरिं॑ मृजन्ति॥

विद्याप्राप्ति द्वारा विद्वान् बनना, बलवान् होना तथा नानाविध ऐश्वर्य्य प्राप्त करके ऐश्वर्य्यशाली बनना परमात्मा की उपलब्धि के विना कदापि नहीं हो सकता, इसलिये ऐश्वर्य्य की इच्छा करनेवाले पुरुषों का कर्तव्य है कि वह ज्ञानद्वारा परमात्मा को उपलब्ध करें॥२१॥

इन्दु॒रिन्द्रा॑य तोशते॒ नि तो॑शते श्री॒णन्नु॒ग्रो रि॒णन्न॒पः॥

इस मन्त्र का आशय यह है कि सुख की इच्छावाले पुरुष को मन्दकर्मों का सर्वथा त्याग करना चाहिये। जब तक पुरुष मन्द कर्म नहीं छोड़ता, तब तक वह परमात्मपरायण कदापि नहीं हो सकता और न सुख उपलब्ध कर सकता है, इसी अभिप्राय से मन्त्र में अज्ञान के नाश द्वारा मन्द कर्मों के त्याग का विधान किया है॥२२॥यह १०९ वाँ सूक्त और २१ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

पर्यू॒ षु प्र ध॑न्व॒ वाज॑सातये॒ परि॑ वृ॒त्राणि॑ स॒क्षणिः॑। द्वि॒षस्त॒रध्या॑ ऋण॒या न॑ ईयसे॥

जो पुरुष ईश्वरपरायण होकर उसकी आज्ञा का पालन करते हैं, वे ही परमात्मा को उपलब्ध करनेवाले कहे जाते हैं, या यों कहो कि उन्हीं को परमात्मप्राप्ति होती है और वे ही अपने ऋणों से मुक्त होते और वे ही शत्रुओं का नाश करके संसार में अभय होकर विचरते हैं। स्मरण रहे कि पूर्वस्थान को त्यागकर स्थानान्तरप्राप्तिरूप प्राप्ति परमात्मा में नहीं घट सकती॥१॥

अनु॒ हि त्वा॑ सु॒तं सो॑म॒ मदा॑मसि म॒हे स॑मर्य॒राज्ये॑। वाजाँ॑ अ॒भि प॑वमान॒ प्र गा॑हसे॥

मन्त्र में ऐश्वर्य्यों के लक्ष्य का तात्पर्य्य यह है कि ईश्वर में आध्यात्मिक तथा आधिभौतिक दोनों प्रकार के ऐश्वर्य्य हैं। जो पुरुष मुक्तिसुख को लक्ष्य रखते हैं, उनको निःश्रेयसरूप आध्यात्मिक ऐश्वर्य्य प्राप्त होता है और जो सांसारिक सुख को लक्ष्य रखकर ईश्वरपरायण होते हैं, उनको परमात्मा अभ्युदयरूप आधिभौतिक ऐश्वर्य्य प्रदान करते हैं॥२॥

अजी॑जनो॒ हि प॑वमान॒ सूर्यं॑ वि॒धारे॒ शक्म॑ना॒ पयः॑। गोजी॑रया॒ रंह॑माणः॒ पुरं॑ध्या॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि वह परमपिता परमात्मा, जो अभ्युदय तथा निःश्रेयस का दाता है, उसका प्रभुत्व विद्युत् से भी अधिकतर है॥३॥

अजी॑जनो अमृत॒ मर्त्ये॒ष्वाँ ऋ॒तस्य॒ धर्म॑न्न॒मृत॑स्य॒ चारु॑णः। सदा॑सरो॒ वाज॒मच्छा॒ सनि॑ष्यदत्॥

हे परमात्मन्! आप सदा एकरस सर्वत्र विराजमान और सदैव सब प्राणियों को अहर्निश देखते हुए विचरते हैं, अतएव प्रार्थना है कि आप हमें अपनी भक्ति का दान दें कि हम आपकी आज्ञा का पालन करते हुए ऐश्वर्य्यशाली हों। विचरने से तात्पर्य्य अपनी व्यापक शक्ति द्वारा सर्वत्र विराजमान होने का है, चलने का नहीं॥४॥

अ॒भ्य॑भि॒ हि श्रव॑सा त॒तर्दि॒थोत्सं॒ न कं चि॑ज्जन॒पान॒मक्षि॑तम्। शर्या॑भि॒र्न भर॑माणो॒ गभ॑स्त्योः॥

इस मन्त्र का आशय यह है कि जिस प्रकार सूर्य्य अपनी गरमी तथा प्रकाश शक्ति से प्रजा के सब विकार तथा अपगुणों को दूर करके शुभगुण देता है, इसी प्रकार परमात्मा सदाचारी पुरुषों के दोष दूर करके उनमें सद्गुणों का आधान कर देता है, इसलिये पुरुष को कर्मयोगी तथा सदाचारी होना परमावश्यक है॥५॥

आदीं॒ के चि॒त्पश्य॑मानास॒ आप्यं॑ वसु॒रुचो॑ दि॒व्या अ॒भ्य॑नूषत। वारं॒ न दे॒वः स॑वि॒ता व्यू॑र्णुते॥

भाव यह है कि जिस प्रकार सूर्य्य की प्रभा चहुँ ओर व्याप्त हो जाती है, इसी प्रकार ब्रह्मविद्यावेत्ता पुरुषों की ब्रह्मविषयिणी बुद्धि विस्तृत होकर सब ओर परमात्मा का अवलोकन करती है और ऐसे पुरुष परमात्मपरायण होकर ब्रह्मानन्द का उपभोग करते हैं॥६॥

त्वे सो॑म प्रथ॒मा वृ॒क्तब॑र्हिषो म॒हे वाजा॑य॒ श्रव॑से॒ धियं॑ दधुः। स त्वं नो॑ वीर वी॒र्या॑य चोदय॥

इस मन्त्र में परमात्मा से यह प्रार्थना की गई है कि हे भगवन्! हम बड़े-बड़े यज्ञ करते हुए ऐश्वर्यसम्पादन करें अथवा वीर पुरुषों के गुणों को धारण करते हुए बलवान् बनें, क्योंकि आप ही की कृपा से मनुष्य वीरतादि गुणों को धारण कर सकता है, अन्यथा नहीं॥७॥

दि॒वः पी॒यूषं॑ पू॒र्व्यं यदु॒क्थ्यं॑ म॒हो गा॒हाद्दि॒व आ निर॑धुक्षत। इन्द्र॑म॒भि जाय॑मानं॒ सम॑स्वरन्॥

द्युलोक का अमृत परमात्मा को इस अभिप्राय से कथन किया गया है कि “पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि” ऋग्. १०। ९०। ३। इस मन्त्र में यह वर्णन किया है कि यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उसके एकदेश में है और अनन्त परमात्मा अमृतरूप से द्युलोक में विस्तृत हो रहा है अर्थात् उसका अमृतस्वरूप अनन्त नभोमण्डल में सर्वत्र परिपूर्ण हो रहा है, ऐसे सर्वव्यापक परमात्मा की उपासक लोग स्तुति करते हैं॥८॥

अध॒ यदि॒मे प॑वमान॒ रोद॑सी इ॒मा च॒ विश्वा॒ भुव॑ना॒भि म॒ज्मना॑। यू॒थे न नि॒ष्ठा वृ॑ष॒भो वि ति॑ष्ठसे॥

जिस प्रकार मण्डलाधिपति अपने मण्डल के मध्य में स्थिर होकर सबको स्वाधीन रखता है, इसी प्रकार परमात्मा सम्पूर्ण लोक-लोकान्तरों को बल से धारण करके सर्वत्र स्थित हो रहा है, या यों कहो कि उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलयरूप परमात्मशक्ति सदा एकरस दृढ़ता से विराजमान रहती है, उसमें कभी रुकावट नहीं होती॥९॥

सोमः॑ पुना॒नो अ॒व्यये॒ वारे॒ शिशु॒र्न क्रीळ॒न्पव॑मानो अक्षाः। स॒हस्र॑धारः श॒तवा॑ज॒ इन्दुः॑॥

परमात्मा के गुण तथा शक्तियें अनन्त हैं और जिनसे उसके स्वरूप का निरूपण किया जाता है, वे गुण भी उसमें अनन्त हैं, इसलिये अनन्तस्वरूप की अनन्तरूप से ही उपासना करनी चाहिये॥१०॥

ए॒ष पु॑ना॒नो मधु॑माँ ऋ॒तावेन्द्रा॒येन्दुः॑ पवते स्वा॒दुरू॒र्मिः। वा॒ज॒सनि॑र्वरिवो॒विद्व॑यो॒धाः॥

इस मन्त्र का आशय यह है कि जो पुरुष उक्त गुणोंवाले परमात्मा की ओर क्रियाशक्ति तथा ज्ञानशक्ति से बढ़ते हैं, उनको परमपिता परमात्मा अवश्य प्राप्त होते और उन पर सब ओर से आनन्द की वृष्टि करते हैं॥११॥

स प॑वस्व॒ सह॑मानः पृत॒न्यून्त्सेध॒न्रक्षां॒स्यप॑ दु॒र्गहा॑णि। स्वा॒यु॒धः सा॑स॒ह्वान्त्सो॑म॒ शत्रू॑न्॥

इस मन्त्र में परमात्मा से यह प्रार्थना की गई है कि हे भगवन्! आप कुमार्ग में प्रवृत्त दुष्ट पुरुषों से हमारी रक्षा करें। जिनसे रक्षा की जाती है, उनका नाम “राक्षस” है, सो हे पिता! आप सम्पूर्ण विघ्नकारी पुरुषों से हमारी रक्षा करते हुए हमें अभय प्रदान करें ॥१२॥यह ११० वाँ सूक्त और तेईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

अ॒या रु॒चा हरि॑ण्या पुना॒नो विश्वा॒ द्वेषां॑सि तरति स्व॒युग्व॑भिः॒ सूरो॒ न स्व॒युग्व॑भिः। धारा॑ सु॒तस्य॑ रोचते पुना॒नो अ॑रु॒षो हरिः॑। विश्वा॒ यद्रू॒पा प॑रि॒यात्यृक्व॑भिः स॒प्तास्ये॑भि॒ॠक्व॑भिः॥

इस मन्त्र में रूपकालंकार से शूरवीर की सूर्य्य के साथ तुलना की गई है अर्थात् जिस प्रकार सूर्य्य अपने तेजोमय प्रभामण्डल से अन्धकार को छिन्न-भिन्न करता है, इसी प्रकार शूरवीर योधा शत्रुओं को छिन्न-भिन्न करके स्वयं स्थिर होता है॥१॥

त्वं त्यत्प॑णी॒नां वि॑दो॒ वसु॒ सं मा॒तृभि॑र्मर्जयसि॒ स्व आ दम॑ ऋ॒तस्य॑ धी॒तिभि॒र्दमे॑। प॒रा॒वतो॒ न साम॒ तद्यत्रा॒ रण॑न्ति धी॒तयः॑। त्रि॒धातु॑भि॒ररु॑षीभि॒र्वयो॑ दधे॒ रोच॑मानो॒ वयो॑ दधे॥

इस मन्त्र का भावार्थ यह है कि जिस प्रकार ब्रह्मोपासक ब्रह्मयज्ञ में ब्रह्म के ज्ञानादि ऐश्वर्यों को धारण करते हैं, इसी प्रकार शूरवीर कर्मयज्ञ में परमात्मा के अभ्युदयरूप ऐश्वर्य को धारण करते हुए इस त्रिधातुमय शरीर के प्रयत्न को सफल करते हैं॥२॥

पूर्वा॒मनु॑ प्र॒दिशं॑ याति॒ चेकि॑त॒त्सं र॒श्मिभि॑र्यतते दर्श॒तो रथो॒ दैव्यो॑ दर्श॒तो रथः॑। अग्म॑न्नु॒क्थानि॒ पौंस्येन्द्रं॒ जैत्रा॑य हर्षयन्। वज्र॑श्च॒ यद्भव॑थो॒ अन॑पच्युता स॒मत्स्वन॑पच्युता॥

इस मन्त्र में शूरवीर के तेज की दिव्य तेज से तुलना की गई है, कि जिस प्रकार द्युलोकवर्ती तेज अन्धकार को दूर करके सर्वत्र प्रकाश का संचार करता है, इसी प्रकार शूरवीर का तेज तमोरूप शुत्रओं का हनन करके अभ्युदयरूप ऐश्वर्य्य का संचार करता है॥३॥यह १११ वाँ सूक्त और चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

ना॒ना॒नं वा उ॑ नो॒ धियो॒ वि व्र॒तानि॒ जना॑नाम्। तक्षा॑ रि॒ष्टं रु॒तं भि॒षग्ब्र॒ह्मा सु॒न्वन्त॑मिच्छ॒तीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥

इस मन्त्र का अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार पुरुष अपने अनुकूल पदार्थ को सुसंस्कृत करके बहुमूल्य बना देता है, इसी प्रकार राज्याभिषेकयोग्य राजपुरुष को परमात्मा संस्कृत करके राज्य के योग्य बनाता है॥१॥

जर॑तीभि॒रोष॑धीभिः प॒र्णेभिः॑ शकु॒नाना॑म्। का॒र्मा॒रो अश्म॑भि॒र्द्युभि॒र्हिर॑ण्यवन्तमिच्छ॒तीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥

जो राजा दीप्तिवाले अस्त्र-शस्त्र तथा विमानादि द्वारा सर्वत्र गतिशील होता है, वह परमात्मा की कृपा से ही उत्पन्न होता है, या यों कहो कि पूर्वकृत प्रारब्ध कर्मों के अनुसार परमात्मा ही ऐसे राजा को अभिषिक्त करता है॥२॥

का॒रुर॒हं त॒तो भि॒षगु॑पलप्र॒क्षिणी॑ न॒ना। नाना॑धियो वसू॒यवोऽनु॒ गा इ॑व तस्थि॒मेन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥

इस मन्त्र में परमात्मा से उच्चोद्देश्य की प्रार्थना की गई है कि हे भगवन्! यद्यपि मेरी बुद्धि मुझे कवि, वैद्य तथा शिल्पी आदि नाना भावों की ओर ले जाती है, तथापि आप ऐश्वर्य्यप्राप्ति के लिये मेरे मन की प्रेरणा करके मुझे उच्चैश्वर्य्य की ओर प्रेरित करें। रमेशचन्द्रदत्त तथा अन्य कई एक यूरोपियन भाष्यकारों ने इस मन्त्र के यह अर्थ किये हैं कि मैं कारू अर्थात् सूत बुननेवाला हूँ, मेरा पिता वैद्य और माता धान कूटती है, इस प्रकार नाना जातिवाले हम एक ही परिवार के अङ्ग हैं, इससे उन्होंने यह सिद्ध किया है कि वेदों में ब्राह्मणादि वर्णों का वर्णन नहीं, अस्तु, इसका हम विस्तारपूर्वक खण्डन उपसंहार में करेंगे॥३॥

अश्वो॒ वोळ्हा॑ सु॒खं रथं॑ हस॒नामु॑पम॒न्त्रिणः॑। शेपो॒ रोम॑ण्वन्तौ भे॒दौ वारिन्म॒ण्डूक॑ इच्छ॒तीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥

मन्त्र का अर्थ स्पष्ट है। यहाँ यह लिखना अनुपयुक्त नहीं कि इस मन्त्र के अर्थ सायणाचार्य्य तथा आजकल के कई वैदिक ज्ञानाभिमानियों ने अत्यन्त निन्दित किये हैं, जो ऐश्वर्य्यप्रकरण से कोई सम्बन्ध नहीं रखते, उनका हम विस्तारपूर्वक खण्डन उपसंहार में करेंगे ॥४॥यह ११२ वाँ सूक्त और पच्चीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

श॒र्य॒णाव॑ति॒ सोम॒मिन्द्रः॑ पिबतु वृत्र॒हा। बलं॒ दधा॑न आ॒त्मनि॑ करि॒ष्यन्वी॒र्यं॑ म॒हदिन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि जो राजा कर्मयोगी तथा ज्ञानयोगियों के सदुपदेश से ब्रह्मानन्दपान करता है, वह राजा बनने योग्य होता है। हे परमात्मन्! ऐसे राजा को राज्याभिषेक से अभिषिक्त करें॥१॥

आ प॑वस्व दिशां पत आर्जी॒कात्सो॑म मीढ्वः। ऋ॒त॒वा॒केन॑ स॒त्येन॑ श्र॒द्धया॒ तप॑सा सु॒त इन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥

इस मन्त्र का आशय यह है कि जो राजा सरल भाव से प्रजा पर शासन करता हुआ श्रद्धा, तप तथा सत्यादि गुणों को धारण करता है, ऐसे कर्मशील राजा के राज्य को परमात्मा अटल बनाता है॥२॥

प॒र्जन्य॑वृद्धं महि॒षं तं सूर्य॑स्य दुहि॒ताभ॑रत्। तं ग॑न्ध॒र्वाः प्रत्य॑गृभ्ण॒न्तं सोमे॒ रस॒माद॑धु॒रिन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि श्रद्धायुक्त राजा ही ऐश्वर्य्यशाली होता और परमात्मा उसी को राज्याभिषेक के योग्य बनाता है अर्थात् आस्तिक राजा ही अटल ऐश्वर्य्य भोगता है, अन्य नहीं॥३॥

ऋ॒तं वद॑न्नृतद्युम्न स॒त्यं वद॑न्त्सत्यकर्मन्। श्र॒द्धां वद॑न्त्सोम राजन्धा॒त्रा सो॑म॒ परि॑ष्कृत॒ इन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥

जो स्वयं यज्ञादि कर्म करता, औरों को यज्ञादि कर्म करने का उपदेश करता, ऐसे सत्यभाषण और सत्य के आश्रित कर्म करनेवाले राजा के राज्य को परमात्मा अटल बनाता है॥४॥

स॒त्यमु॑ग्रस्य बृह॒तः सं स्र॑वन्ति संस्र॒वाः। सं य॑न्ति र॒सिनो॒ रसाः॑ पुना॒नो ब्रह्म॑णा हर॒ इन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥

वेदवेत्ता विद्वान् से शिक्षा पाया हुआ जो राजा अपने सत्यादि धर्मों का त्याग नहीं करता, उसका राज्य अवश्यमेव चिरस्थायी होता और वह सांसारिक अनेक रसों का भोक्ता होता है॥५॥

यत्र॑ ब्र॒ह्मा प॑वमान छन्द॒स्यां॒३॒॑ वाचं॒ वद॑न्। ग्राव्णा॒ सोमे॑ मही॒यते॒ सोमे॑नान॒न्दं ज॒नय॒न्निन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥

इस मन्त्र का आशय यह है कि वेदवेत्ता विद्वान् संन्यासावस्था में वेदरूप वाणी का प्रकाश करता हुआ अर्थात् वैदिक धर्म का उपदेश करता हुआ चित्तवृत्तिनिरोध द्वारा परमात्मा में लीन होकर इतस्ततः विचरता है, वह सबके पवित्र करनेवाला होता है, हे परमात्मन्! आप ऐसे संन्यासी को पूर्णाभिषिक्त करें॥६॥

यत्र॒ ज्योति॒रज॑स्रं॒ यस्मिँ॑ल्लो॒के स्व॑र्हि॒तम्। तस्मि॒न्मां धे॑हि पवमाना॒मृते॑ लो॒के अक्षि॑त॒ इन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥

इस मन्त्र में यह प्रार्थना की गई है कि हे परमात्मन्! ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगी के लिये सदुपदेशरूप वाणी प्रदान करें और वृद्धि तथा क्षय से रहित अमृत अवस्था प्राप्त करायें, जिससे वेदरूप वाणी का प्रकाश हो और आप अपनी कृपा से ज्ञानयोगी को अभिषिक्त करें॥७॥

यत्र॒ राजा॑ वैवस्व॒तो यत्रा॑व॒रोध॑नं दि॒वः। यत्रा॒मूर्य॒ह्वती॒राप॒स्तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥

इस मन्त्र का भाव यह है कि परमात्मा ज्ञानयोगी को सत्य तथा अमृत के निर्णय में अभिषिक्त करता है अर्थात् ज्ञानयोगीरूप राजा सत्य तथा अनृत का निर्णय करके अपने विवेकरूप राज्य को अटल बनाता है॥८॥

यत्रा॑नुका॒मं चर॑णं त्रिना॒के त्रि॑दि॒वे दि॒वः। लो॒का यत्र॒ ज्योति॑ष्मन्त॒स्तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥

मुक्त पुरुष मुक्ति अवस्था में अव्याहतगति होकर विचरता है अर्थात् उसको उस अवस्था में किसी प्रकार का बन्धन नहीं रहता, या यों कहो कि वह स्वतन्त्रतापूर्वक ईश्वरीय सत्ता में सम्मिलित होता है। हे परमपिता परमात्मन्! आप ज्ञानयोगी तथा कर्मयोगी को अभिषिक्त करके वह अवस्था प्राप्त करायें॥९॥

यत्र॒ कामा॑ निका॒माश्च॒ यत्र॑ ब्र॒ध्नस्य॑ वि॒ष्टप॑म्। स्व॒धा च॒ यत्र॒ तृप्ति॑श्च॒ तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥

हे परमात्मन्! जो ब्रह्मज्ञान का उच्चपद है और जहाँ स्वधा से तृप्ति होती है, वह मोक्षरूप सुख मुझे प्रदान कीजिये, या यों कहो कि वह मुक्तिसुख जिससे एकमात्र ब्रह्मानन्द का ही अनुभव होता है, अन्य विषय सुख आदि जिस अवस्था में सब तुच्छ हो जाते हैं, वह मुक्ति अवस्था मुझे प्राप्त करायें॥१०॥

यत्रा॑न॒न्दाश्च॒ मोदा॑श्च॒ मुदः॑ प्र॒मुद॒ आस॑ते। काम॑स्य॒ यत्रा॒प्ताः कामा॒स्तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥

हे भगवन्! जिस अवस्था में आनन्द तथा मोक्ष होता है और जहाँ सब कामनायें पूर्ण होती हैं, वह अवस्था मुझे प्राप्त करायें या यों कहो कि हे परमात्मन्! उस मुक्ति अवस्था में जहाँ आनन्द ही आनन्द प्रतीत होता है, अन्य सब भाव उस समय तुच्छ हो जाते हैं, वह मुक्ति अवस्था मुझे प्राप्त हो॥११॥यह ११३ वाँ सूक्त और सत्ताईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

य इन्दोः॒ पव॑मान॒स्यानु॒ धामा॒न्यक्र॑मीत्। तमा॑हुः सुप्र॒जा इति॒ यस्ते॑ सो॒मावि॑ध॒न्मन॒ इन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥

जो पुरुष कर्म, उपासना तथा ज्ञान द्वारा परमात्मप्राप्ति का भले प्रकार अनुष्ठान करता है, या यों कहो कि जब उपासक अनन्य भक्ति से परमात्मपरायण होकर उसी की उपासना में तत्पर रहता है, तब परमात्मा उसके अन्तःकरण में स्वसत्ता का आविर्भाव उत्पन्न करते हैं॥१॥

ऋषे॑ मन्त्र॒कृतां॒ स्तोमैः॒ कश्य॑पोद्व॒र्धय॒न्गिरः॑। सोमं॑ नमस्य॒ राजा॑नं॒ यो ज॒ज्ञे वी॒रुधां॒ पति॒रिन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥

जो परमात्मा चराचर ब्रह्माण्डों का पति है, उससे यहाँ ज्ञानयोग की प्रार्थना की गई है कि हे परमात्मन्! ज्ञानवर्द्धक वाणियों द्वारा उपासक के हृदय में ज्ञान की वृद्धि करें॥२॥

स॒प्त दिशो॒ नाना॑सूर्याः स॒प्त होता॑र ऋ॒त्विजः॑। दे॒वा आ॑दि॒त्या ये स॒प्त तेभिः॑ सोमा॒भि र॑क्ष न॒ इन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥

इस मन्त्र में मुक्त पुरुष की विभूति का वर्णन किया गया है कि उसकी सब लोकों में दिव्य दृष्टि हो जाती है। “दिशा” शब्द का तात्पर्य यहाँ लोक में है और वह भूः, भुवः तथा स्वरादि सात लोक हैं अर्थात् विकृतिरूप से कार्य्य और प्रकृतिरूप से जो कारण हैं, वे सातों अखण्डनीय शक्तियें उसके लिये मङ्गलमय होती हैं॥३॥

यत्ते॑ राजञ्छृ॒तं ह॒विस्तेन॑ सोमा॒भि र॑क्ष नः। अ॒रा॒ती॒वा मा न॑स्तारी॒न्मो च॑ नः॒ किं च॒नाम॑म॒दिन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥

इस मन्त्र में मुक्तिरूपी फल का उपसंहार करते हुए सब विघ्नों की शान्ति के लिये प्रार्थना की गयी है कि हे सर्वरक्षक भगवन्! वैदिक कर्म तथा वैदिक अनुष्ठान के विरोधी शत्रुओं से हमारी सब प्रकार से रक्षा करें, ताकि वे हमारे किसी अनुष्ठान में विघ्नकारी न हों और अपनी परम कृपा से मोक्षसम्बन्धी ऐश्वर्य हमें प्रदान करें, यह हमारी आपसे सविनय प्रार्थना है॥४॥यह ११४ वाँ सूक्त, सातवाँ अनुवाक और अट्ठाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥यह श्रीमदार्य्यमुनि के द्वारा उपनिबद्ध ऋक्संहिता के भाष्य में सातवें अष्टक में नवम मण्डल समाप्त हुआ॥

मण्डलम्

सूक्तम्

अग्रे॑ बृ॒हन्नु॒षसा॑मू॒र्ध्वो अ॑स्थान्निर्जग॒न्वान्तम॑सो॒ ज्योति॒षागा॑त्। अ॒ग्निर्भा॒नुना॒ रुश॑ता॒ स्वङ्ग॒ आ जा॒तो विश्वा॒ सद्मा॑न्यप्राः॥

प्रतिदिन प्रातर्वेलासम्बन्धी पीलिमाओं के उपरान्त महान् अग्नि सूर्य ऊपर आकाश में रात्रि या पृथिवी-पृष्ठ से निकलकर आता है; तब अपने तापक प्रकाश से सब स्थानों, लोक-लोकान्तरों को प्रकाशित कर देता है। ऐसे ही विद्यासूर्य विद्वान् अज्ञानान्धकार को नष्ट करता है-करे॥१॥

स जा॒तो गर्भो॑ असि॒ रोद॑स्यो॒रग्ने॒ चारु॒र्विभृ॑त॒ ओष॑धीषु। चि॒त्रः शिशुः॒ परि॒ तमां॑स्य॒क्तून्प्र मा॒तृभ्यो॒ अधि॒ कनि॑क्रदद्गाः॥

पृथिवलोक और द्युलोक का गर्भ-गर्भसमान मध्य में रहनेवाला तथा उनका और उन पर स्थित पदार्थों को दर्शाने-बतानेवाला सूर्य है।  पृथिवी पर से अग्निरूप से अन्धकारों को दूर भगाता है, सूर्यरूप से रात्रियों को परे हटाता है। ऐसे हे विद्यासूर्य विद्वान्! मानवसमाज एवं प्रत्येक गृह में प्रवचन कर अज्ञानान्धाकर-अविद्यारात्रि को भगाकर सावधान करें॥२॥

विष्णु॑रि॒त्था प॑र॒मम॑स्य वि॒द्वाञ्जा॒तो बृ॒हन्न॒भि पा॑ति तृ॒तीय॑म्। आ॒सा यद॑स्य॒ पयो॒ अक्र॑त॒ स्वं सचे॑तसो अ॒भ्य॑र्च॒न्त्यत्र॑॥

द्युलोक में सूर्य को सम्भालनेवाला महान् व्यापक परमात्मा है, विद्वान् जन उस परमात्मा की स्तुति कर उससे अध्यात्मरस अपने अन्दर आत्मसात् करें तथा विद्यासूर्य विद्वान् अपने ऊँचे ज्ञानपीठ से विराजमान हुए परमात्मा से प्राप्त वेद-ज्ञान का ज्ञानरस देकर जनमात्र को परमात्मा के उपासक बनावें॥३॥

अत॑ उ त्वा पितु॒भृतो॒ जनि॑त्रीरन्ना॒वृधं॒ प्रति॑ चर॒न्त्यन्नैः॑। ता ईं॒ प्रत्ये॑षि॒ पुन॑र॒न्यरू॑पा॒ असि॒ त्वं वि॒क्षु मानु॑षीषु॒ होता॑॥

सूर्य ओषधियों में अन्न धारण करता है, प्राणियों के लिये उनमें जीवन-पोषण शक्ति देता है। पुनः पकी-सूखी हो जाने पर पार्थिव अग्नि के रूप में होकर उन्हें जला देता है, जो मनुष्यों के लिये भोजन होम आदि अभीष्ट कार्य का साधक बनता है। विद्यासूर्य विद्वान् अपने ज्ञानोपदेश से ओषधियों को फलने, रक्षण करने और प्राणियों को उनके सेवन से स्वस्थ रहने तथा दीर्घ जीवन तक पुष्टि प्राप्त करने के लिये समर्थ बनावें॥४॥

होता॑रं चि॒त्रर॑थमध्व॒रस्य॑ य॒ज्ञस्य॑यज्ञस्य के॒तुं रुश॑न्तम्। प्रत्य॑र्धिं दे॒वस्य॑देवस्य म॒ह्ना श्रि॒या त्व१॒॑ग्निमति॑थिं॒ जना॑नाम्॥

प्रत्येक जीवनयज्ञ होमयज्ञ का सम्पादक, तथा प्रत्येक ग्रह तारे का प्रकाशक, ज्ञानी जन का उत्साहक, उत्पन्न प्राणियों के अन्दर अपनी दीप्ति द्वारा प्रवेश कर उत्साहित करनेवाला सूर्य है; उसका प्रातः अथवा अन्य विधियों से सेवन करना चाहिये। ऐसे हे विद्यासूर्य विद्वान्! कर्मपरायण जन के कर्मयाग और ज्ञानीजन के ज्ञानयज्ञ को सम्पन्न करावें, तथा जनमात्र में जीवननिर्वाहक साधनों का प्रवचन करें॥५॥

स तु वस्त्रा॒ण्यध॒ पेश॑नानि॒ वसा॑नो अ॒ग्निर्नाभा॑ पृथि॒व्याः। अ॒रु॒षो जा॒तः प॒द इळा॑याः पु॒रोहि॑तो राजन्यक्षी॒ह दे॒वान्॥

महान् अग्नि सूर्य आकाश में वर्षा के स्थान मेघ में विद्युद्रूप से प्रकट हो, चमचमाती तिरछी तरङ्गरूप साड़ी वस्त्र पहिना हुआ सा, वायु आदि देवों के सहयोग से वृष्टि का निमित्त बनता है। विद्यासूर्य विद्वान् विद्यालङ्कृत हुआ विद्या-स्थान में बैठकर प्रवचनामृत की वृष्टि करे॥६॥

आ हि द्यावा॑पृथि॒वी अ॑ग्न उ॒भे सदा॑ पु॒त्रो न मा॒तरा॑ त॒तन्थ॑। प्र या॒ह्यच्छो॑श॒तो य॑वि॒ष्ठाथा व॑ह सहस्ये॒ह दे॒वान्॥

सूर्य महान् अग्नि है, वह तीनों लोकों से संयुक्त होता है, द्युलोक में साक्षात् सूर्यरूप से, अन्तरिक्ष में विद्युद्रूप से और पृथिवी पर अग्निरूप से प्रसिद्ध होता है। सूर्य के प्रकाश का जीवन में उपयोग लेना चाहिये। विद्यासूर्य विद्वान् केवल अपने वंश या स्थान में ही ज्ञान का प्रकाश नही करते, किन्तु राष्ट्रभर में अपितु पृथिवीभर में करते हैं॥७॥

पि॒प्री॒हि दे॒वाँ उ॑श॒तो य॑विष्ठ वि॒द्वाँ ऋ॒तूँॠ॑तुपते यजे॒ह। ये दैव्या॑ ऋ॒त्विज॒स्तेभि॑रग्ने॒ त्वं होतॄ॑णाम॒स्याय॑जिष्ठः॥

ज्योतिषी विद्वानों के लिये सूर्य एक ज्ञान ग्रहण कराने का साधन है। ऋतु या कालविभाग सूर्य से ही होते हैं तथा दिशाओं में वर्त्तमान ग्रह, तारे आदि का ज्ञान भी सूर्य से ही मिलता है। विद्यासूर्य विद्वान् के द्वारा दिव्य ज्ञानों की प्राप्ति होती है। वह सुखद समय का निर्माण करता है, जीवनयात्रा की दिशाओं को दिखाता है॥१॥

वेषि॑ हो॒त्रमु॒त पो॒त्रं जना॑नां मन्धा॒तासि॑ द्रविणो॒दा ऋ॒तावा॑। स्वाहा॑ व॒यं कृ॒णवा॑मा ह॒वींषि॑ दे॒वो दे॒वान्य॑जत्व॒ग्निरर्ह॑न्॥

प्राणियों के भोजन और जीवनरक्षा का निमित्त सूर्य है। वही सोना आदि धन पृथिवी में उत्पत्र करने का भी निमित्त है, सत्यज्ञान मननशक्ति का भी वही दाता है। ज्योतिषी लोग उससे बहुत कुछ ज्ञान लेते हैं। विद्यासूर्य विद्वान् से मनुष्य भोजन-पदार्थ और स्वास्थ्य का ज्ञान करें तथा दानादि कर्तव्य को सीखें॥२॥

आ दे॒वाना॒मपि॒ पन्था॑मगन्म॒ यच्छ॒क्नवा॑म॒ तदनु॒ प्रवो॑ळ्हुम्। अ॒ग्निर्वि॒द्वान्त्स य॑जा॒त्सेदु॒ होता॒ सो अ॑ध्व॒रान्त्स ऋ॒तून्क॑ल्पयाति॥

सूर्य का ज्ञान मानव के लिये अत्यन्त आवश्यक है। आकाश में गृह तारों के गतिमार्गों के ज्ञान का निमित्त, ज्योतिर्विद्या का आधार तथा जीवों में प्राणों का प्रेरक एवं लोकों पर ऋतु सञ्चार का कारण वही सूर्य है। विद्यासूर्य विद्वान् से दिव्य जीवन के मार्ग को जानना चाहिये और प्राणविद्या तथा काल-ज्ञान को ग्रहण करना चाहिये॥३॥

यद्वो॑ व॒यं प्र॑मि॒नाम॑ व्र॒तानि॑ वि॒दुषां॑ देवा॒ अवि॑दुष्टरासः। अ॒ग्निष्टद्विश्व॒मा पृ॑णाति वि॒द्वान्येभि॑र्दे॒वाँ ऋ॒तुभिः॑ क॒ल्पया॑ति॥

ग्रहों के ज्ञान में अनभिज्ञ जन जो भूल कर देते हैं, सूर्य को ठीक-ठीक समझने पर वह भूल दूर हो जाती है। कारण कि सूर्य ही कालक्रम से ग्रहों को सर्व गति-मार्गों में चलाता है। विद्वानों के शिक्षण में कहीं अपनी अयोग्यता से भूल या भ्रान्ति प्रतीत हो, तो विद्यासूर्य महा विद्वान् से पूर्ति करनी चाहिये॥४॥

यत्पा॑क॒त्रा मन॑सा दी॒नद॑क्षा॒ न य॒ज्ञस्य॑ मन्व॒ते मर्त्या॑सः। अ॒ग्निष्टद्धोता॑ क्रतु॒विद्वि॑जा॒नन्यजि॑ष्ठो दे॒वाँ ऋ॑तु॒शो य॑जाति॥

जनसाधारण अल्पज्ञान के कारण नहीं जानते कि द्युमण्डल में ग्रह तारों को सूर्य अपने आश्रय में रखकर, उनका आकर्षण बल से कालक्रम में गतिप्रेरक है, यह ज्योतिर्वित् ही जानते हैं। अल्पज्ञान के कारण जो मनुष्य पदार्थों को समझने में असमर्थ हों और उनके प्रयोग को न जान सकें, तो उन्हें ज्योतिर्विद्वानों से जानना चाहिये॥५॥

विश्वे॑षां॒ ह्य॑ध्व॒राणा॒मनी॑कं चि॒त्रं के॒तुं जनि॑ता त्वा ज॒जान॑। स आ य॑जस्व नृ॒वती॒रनु॒ क्षा स्पा॒र्हा इषः॑ क्षु॒मती॑र्वि॒श्वज॑न्याः॥

द्युमण्डल में मार्गवाले य मार्ग में चलनेवाले ग्रहों का नेता तथा दर्शक सूर्य है और उसका परमात्मा उत्पादक है, सूर्य स्वतः नहीं। प्राणियोंवाली पृथिवियों और कमनीय अन्न उत्पन्न करनेवाला सबको योग्य वर्षाओं का प्राप्त करानेवाला सूर्य है। विद्यासूर्य विद्वान् को परमात्मा बनाता है। वह विद्यासूर्य विद्वान् राष्ट्रभूमि को सुख शान्ति व जीवनरक्षा की अमृतवर्षा से सिञ्चित करे॥६॥

यं त्वा॒ द्यावा॑पृथि॒वी यं त्वाप॒स्त्वष्टा॒ यं त्वा॑ सु॒जनि॑मा ज॒जान॑। पन्था॒मनु॑ प्रवि॒द्वान्पि॑तृ॒याणं॑ द्यु॒मद॑ग्ने समिधा॒नो वि भा॑हि॥

परमात्मा अनायास तीनों लोकों में बृहन् अग्नि को उत्पन्न करता है, जिसे द्युलोक सूर्यरूप में, अन्तरिक्ष विद्युद्रूप में, पृथिवी अग्निरूप में पुनः प्रकट  करता है। ऐसा वह बृहत् अग्नि वर्ष-परिमाण को बतलाता हुआ अपनी दीप्ति से जगत् को प्रकाशित करता है। विद्यासूर्य विद्वान् को समग्र ज्ञान से सम्पादन के लिये गुरुकुल बनाने में राज्याधिकारी और प्रजाजन भी पूरा साहाय्य देवें॥७॥

इ॒नो रा॑जन्नर॒तिः समि॑द्धो॒ रौद्रो॒ दक्षा॑य सुषु॒माँ अ॑दर्शि। चि॒किद्वि भा॑ति भा॒सा बृ॑ह॒तासि॑क्नीमेति॒ रुश॑तीम॒पाज॑न्॥

महान् अग्नि सूर्य तीनों लोकों पर प्रकाशमान हुआ उनका स्वामी सा बना हुआ है। वह एक ही लोक पर रमण नहीं करता, अपितु सब लोकों पर प्रभावकारी है और वैद्युत शक्तियों से सम्पन्न वह संसार को बल देता है! प्राणियों और ओषधियों को उत्पक्ति शक्ति और उभरने की प्रेरणा देनेवाला साक्षात् दृष्ट होता है-ज्योति से चमकता है। वही सबको चेताने-जगानेवाला है। अपनी ज्योति को फेंकता हुआ रात्रि का अन्त करता है-प्रातर्वेला बनाता है। ऐसे ही विद्यासूर्य विद्वान् सूर्यसमान प्रतापी राजा अपने विद्या से या अधिकार से तीनों लोकों का उपयोग करता है। ज्ञान धर्म का प्रकाश फैलाकर अविद्या रात्रि को एवं पापभावना को मिटाता है॥१॥

कृ॒ष्णां यदेनी॑म॒भि वर्प॑सा॒ भूज्ज॒नय॒न्योषां॑ बृह॒तः पि॒तुर्जाम्। ऊ॒र्ध्वं भा॒नुं सूर्य॑स्य स्तभा॒यन्दि॒वो वसु॑भिरर॒तिर्वि भा॑ति॥

आकाश में फैलनेवाली उषा को अपनाकर सूर्य अपने तेज से रात्रि को दबा लेता है, तो पृथिवी पर दिन प्रकट होता है और जब सूर्य अपनी ज्योति को पृथिवी से परे आकाश में रोक लेता है तो रात्रि हो जाती है तब भी सूर्य आकाश के ग्रह तारों में प्रतिफलित होता है और उन्हें प्रकाशित करता है। दिन में पृथिवी को प्रकाशित करता हुआ दीखता है, रात्रि में ग्रह तथा नक्षत्रों को प्रकाशित करता है। ऐसे ही विद्यासूर्य विद्वान् महान् पिता परमात्मा की वेदविद्यारूपी ज्ञानज्योति को अपनाकर सदा उसे संसार में फैलाते हैं, साक्षात् सभाओं में, असाक्षात् घर परिवारों में-दिन में विद्यालयों में रात्रि को जनसाधारण में॥२॥

भ॒द्रो भ॒द्रया॒ सच॑मान॒ आगा॒त्स्वसा॑रं जा॒रो अ॒भ्ये॑ति प॒श्चात्। सु॒प्र॒के॒तैर्द्युभि॑र॒ग्निर्वि॒तिष्ठ॒न्रुश॑द्भि॒र्वर्णै॑र॒भि रा॒मम॑स्थात्॥

सूर्य प्रकाशरूप शक्ति से सङ्गत है। वह जब आगे-आगे भागनेवाली रात्रि को प्राप्त होता है, तो क्षीण-जीर्ण होनेवाली वह उस-उस स्थान से क्षीण होती चली जाती है। जब उषा-प्रकाश शक्ति के पीछे प्रकाशमान सूर्य ऊपर चढ़ता जाता है, उसके ऊपर चढ़ने से पृथिवी आदि लोकों के पृष्ठ पर सुपात्र होकर दिन होते हैं। प्रकाशमय रंगों से अन्धकार में सूर्य घुस बैठता है। ऐसे ही विद्यासूर्य विद्वान् अपनी ज्ञानज्योति से युक्त-ज्ञान-ज्योतिष्मान् बना हुआ अविद्या भ्रान्ति को हटाता है। ज्ञान प्रकाशों से अज्ञानान्धकारवाले स्थानों में घुसकर उसे भगा देता है॥३॥

अ॒स्य यामा॑सो बृह॒तो न व॒ग्नूनिन्धा॑ना अ॒ग्नेः सख्युः॑ शि॒वस्य॑। ईड्य॑स्य॒ वृष्णो॑ बृह॒तः स्वासो॒ भामा॑सो॒ याम॑न्न॒क्तव॑श्चिकित्रे॥

सूर्य की प्रकाशतरङ्ग स्तुत्य उपासनीय परमात्मा के स्तवन-गुणगान करती हुई सी उपास्य परमात्मा के ज्ञान मार्ग में-उपासना मार्ग में प्रकाशस्तम्भ बन जाती हैं। इसी प्रकार विद्यासूर्य विद्वान् के ज्ञानप्रकाश परमात्मा की ओर ज्ञानप्रेरक होने चाहियें॥४॥

स्व॒ना न यस्य॒ भामा॑सः॒ पव॑न्ते॒ रोच॑मानस्य बृह॒तः सु॒दिवः॑। ज्येष्ठे॑भि॒र्यस्तेजि॑ष्ठैः क्रीळु॒मद्भि॒र्वर्षि॑ष्ठेभिर्भा॒नुभि॒र्नक्ष॑ति॒ द्याम्॥

प्रकाशमान सूर्य की प्रकाशतरङ्ग संसार में सर्वत्र क्रीडा सी करती हुई गति करती हैं, उपासक जैसे परमात्मा की स्तुति करते हुए संसार में विचरते हैं और अन्त में मोक्ष में विराजते हैं, ऐसे विद्यासूर्य विद्वान् की ज्ञानतरङ्ग संसार में फैला करती हैं। ऐसा विद्या-सूर्य विद्वान् का परमधाम विद्याधाम-विद्याप्रतिष्ठान है॥४॥

अ॒स्य शुष्मा॑सो ददृशा॒नप॑वे॒र्जेह॑मानस्य स्वनयन्नि॒युद्भिः॑। प्र॒त्नेभि॒र्यो रुश॑द्भिर्दे॒वत॑मो॒ वि रेभ॑द्भिरर॒तिर्भाति॒ विभ्वा॑॥

तापक वज्रवाले सूर्य की रश्मियाँ नियन्त्रण गुणों य सर्वत्र घुसनेवाले वातसूत्रों द्वारा सब लोकों को स्वायत्त करती हैं, आकर्षित करती हैं, आकाश में चमकनेवालों पिण्डों ग्रहों को इसकी रश्मियाँ घोषित करती हैं, जिनसे यह प्रकाशित हो रहा है। इसी प्रकार विद्यासूर्य विद्वान् ब्रह्मास्त्रवाला होता है, उनकी ज्ञानरश्मियाँ लोगों को आकर्षित करनेवाली होती हैं, वे शाश्वतिक वेद ज्ञानवाली हैं और लोगों को संसार में रहने का उपदेश देती हैं॥६॥

स आ व॑क्षि॒ महि॑ न॒ आ च॑ सत्सि दि॒वस्पृ॑थि॒व्योर॑र॒तिर्यु॑व॒त्योः। अ॒ग्निः सु॒तुकः॑ सु॒तुके॑भि॒रश्वै॒ रभ॑स्वद्भी॒ रभ॑स्वाँ॒ एह ग॑म्याः॥

सूर्य द्युलोक और पृथिवीलोक के मध्य में होता हुआ भी दूर से दूर द्युलोक में तथा पृथिवीलोक में भी सुगमता से प्राप्त करानेवाली रश्मियों द्वारा प्राप्त होता है, उन रश्मियों का प्रकाश सुख देनेवाला है, ऐसे ही विद्यासूर्य विद्वान् अपने वंश और समाज या राष्ट्र में रहकर भी दोनों को अपनी ज्ञानधाराओं और शिष्यों द्वारा उन्हें आलोकित करता है॥७॥

प्र ते॑ यक्षि॒ प्र त॑ इयर्मि॒ मन्म॒ भुवो॒ यथा॒ वन्द्यो॑ नो॒ हवे॑षु। धन्व॑न्निव प्र॒पा अ॑सि॒ त्वम॑ग्न इय॒क्षवे॑ पू॒रवे॑ प्रत्न राजन्॥

नित्य वर्त्तमान परमात्मा ही आत्मसमर्पण का पात्र है, अनित्य वस्तु नहीं, उसकी उपासना प्रार्थना करनी चाहिये; वही तापतृष्णा को मिटानेवाला है, स्थायी सुख शान्ति देनेवाला है॥१॥

यं त्वा॒ जना॑सो अ॒भि सं॒चर॑न्ति॒ गाव॑ उ॒ष्णमि॑व व्र॒जं य॑विष्ठ। दू॒तो दे॒वाना॑मसि॒ मर्त्या॑नाम॒न्तर्म॒हाँश्च॑रसि रोच॒नेन॑॥

परमात्मा उत्पत्तिरहित होने से बाल्य और वार्धक्य से रहित सदा युवा है। जनमात्र उसकी शरण लेते हैं, जैसे शीतपीड़ित गौएँ गोशाला की। परमात्मा मुमुक्षु और साधारण जनों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है, दुःख का निवारक है, वह प्रभावकारी तेज से सब में व्याप्त है, उसकी उपासना करनी चाहिये॥२॥

शिशुं॒ न त्वा॒ जेन्यं॑ व॒र्धय॑न्ती मा॒ता बि॑भर्ति सचन॒स्यमा॑ना। धनो॒रधि॑ प्र॒वता॑ यासि॒ हर्य॒ञ्जिगी॑षसे प॒शुरि॒वाव॑सृष्टः॥

प्राणियों की माता पृथिवी जयशील विद्युद्रूप अग्नि को बढ़ावा देती है और वह विद्युद् अग्नि वृष्टि के निमित्त चमकती और कड़कती है॥३॥

मू॒रा अ॑मूर॒ न व॒यं चि॑कित्वो महि॒त्वम॑ग्ने॒ त्वम॒ङ्ग वि॑त्से। शये॑ व॒व्रिश्चर॑ति जि॒ह्वया॒दन्रे॑रि॒ह्यते॑ युव॒तिं वि॒श्पतिः॒ सन्॥

परमात्मा सदा सावधान सर्वज्ञ है, अतः विस्तृत संसार को जानता है। अल्पज्ञ होने से मनुष्य सारे संसार को नहीं जान सकता है। परमात्मा संसार में व्याप्त रहता है, प्रलय में जगत् को चाट जाता है-अपने अन्दर ग्रहण कर लेता है। एवं विद्युत् चमक कर चेतानेवाली है, वह मेघ में छिपी हुई रहती है, उसे अपनी तरङ्गों से खा जाती है-चाट जाती है, तभी वृष्टि होती है। वृष्टि का कारण विद्युत् है॥४॥

कूचि॑ज्जायते॒ सन॑यासु॒ नव्यो॒ वने॑ तस्थौ पलि॒तो धू॒मके॑तुः। अ॒स्ना॒तापो॑ वृष॒भो न प्र वे॑ति॒ सचे॑तसो॒ यं प्र॒णय॑न्त॒ मर्ताः॑॥

एक पार्थिव अग्नि है, जो धुएँ से जानी जाती है-धूमवान् है, सूखी लकड़ियों में उत्पन्न होती है। दूसरी विद्युत् रूप जो शुभ्र-श्वेत है, जल में स्थित होकर भी जल से भीगती बुझती नहीं है, जिसे प्रज्ञावान् जन उत्पन्न करते हैं। विद्युत् का आविष्कार किया जाना चाहिये, उससे अनेक उपयोग लिये जाते हैं॥५॥

त॒नू॒त्यजे॑व॒ तस्क॑रा वन॒र्गू र॑श॒नाभि॑र्द॒शभि॑र॒भ्य॑धीताम्। इ॒यं ते॑ अग्ने॒ नव्य॑सी मनी॒षा यु॒क्ष्वा रथं॒ न शु॒चय॑द्भि॒रङ्गैः॑॥

अग्नि या विद्युत् के आविष्करण में नवीन या प्रशस्त विचारधारा से कार्य लेना चाहिये, दोनों भुजाओं को त्यागभाव से उन रस्सियों को दण्डों सहित उस कार्य में बाँध दें, किसी ऐसे साधन से जिससे विद्युत् का प्रभाव न पहुँचे॥६॥

ब्रह्म॑ च ते जातवेदो॒ नम॑श्चे॒यं च॒ गीः सद॒मिद्वर्ध॑नी भूत्। रक्षा॑ णो अग्ने॒ तन॑यानि तो॒का रक्षो॒त न॑स्त॒न्वो॒३॒॑ अप्र॑युच्छन्॥

परमात्मा सब उत्पन्न अग्नि आदि का जाननेवाला है-सर्वज्ञ है, उसके लिये मनन उपासन स्तुति यज्ञ आदि करने चाहियें, जो हमारे आत्मा में उसके साक्षात् स्वरूप को बढ़ानेवाले हैं और वह परमात्मा हमारी तथा हमारे पुत्र-पौत्रों आदि की सदा ही निःसंकोच रक्षा करनेवाला है॥७॥

एकः॑ समु॒द्रो ध॒रुणो॑ रयी॒णाम॒स्मद्धृ॒दो भूरि॑जन्मा॒ वि च॑ष्टे। सिष॒क्त्यूध॑र्नि॒ण्योरु॒पस्थ॒ उत्स॑स्य॒ मध्ये॒ निहि॑तं प॒दं वेः॥

विविध अन्न-धनों का उत्पन्नकर्ता तथा धारक विविधरूप में उत्पन्न हुआ अग्नि है। वह हार्दिक भावों का विकास करता है, अन्तरिक्ष में छिपे सूक्ष्म जल को सींचता है, मेघ में रखे जल को पकड़कर नीचे बिखेरता है। इसी प्रकार विद्युद्रूप अग्नि की तरह विद्वान् ज्ञानामृत की वृष्टि अपने अन्तःस्थल से निकालकर जनसमाज में बिखेरता है। राजा भी विज्ञानसाधनों द्वारा मेघ से तथा कूप आदि द्वारा राष्ट्र में जल पहुँचाकर अन्नादि को उत्पन्न करावे॥१॥

स॒मा॒नं नी॒ळं वृष॑णो॒ वसा॑नाः॒ सं ज॑ग्मिरे महि॒षा अर्व॑तीभिः। ऋ॒तस्य॑ प॒दं क॒वयो॒ नि पा॑न्ति॒ गुहा॒ नामा॑नि दधिरे॒ परा॑णि॥

आकाश में मेघ आग्नेय तत्त्व के सहारे ठहरते हैं, जब वे विद्युत् से युक्त हो जाते हैं, तब वृष्टि की ओर उन्मुख होते हैं। उनमें जल के स्वरूप को वृष्टिविज्ञानवेत्ता जन स्वरक्षित रखते हैं और जहाँ चाहते हैं, बरसा लेते हैं। इसी प्रकार ज्ञानाग्नि को धारण-कर बुद्धि ज्योति से युक्त होकर, ज्ञानामृत की वृष्टि के लक्ष्य को अपने में धारण कर विद्वान् लोग होते हैं और इच्छानुसार उसकी वृष्टि करते हैं॥२॥

ऋ॒ता॒यिनी॑ मा॒यिनी॒ सं द॑धाते मि॒त्वा शिशुं॑ जज्ञतुर्व॒र्धय॑न्ती। विश्व॑स्य॒ नाभिं॒ चर॑तो ध्रु॒वस्य॑ क॒वेश्चि॒त्तन्तुं॒ मन॑सा वि॒यन्तः॑॥

द्युलोक और पृथिवीलोक का पुत्ररूप अग्नि है, उसे विद्वान् सुरक्षित करते हैं-लाभ लेते हैं, पुत्रोत्पत्ति चाहनेवाले माता-पिता उचित आहार-व्यवहार द्वारा अपने अन्दर सन्तति बीज रस को बनावें और अपनी प्रबल शुभ भावना से गर्भाधान करें, तो उत्तम पुत्र की प्राप्ति होती है॥३॥

ऋ॒तस्य॒ हि व॑र्त॒नयः॒ सुजा॑त॒मिषो॒ वाजा॑य प्र॒दिवः॒ सच॑न्ते। अ॒धी॒वा॒सं रोद॑सी वावसा॒ने घृ॒तैरन्नै॑र्वावृधाते॒ मधू॑नाम्॥

सृष्टि या ब्रह्माण्ड में वर्तमान पिण्ड ग्रह आदि सुप्रसिद्ध अग्निरूप सूर्य से बल पाते हैं, द्युलोक और पृथिवीलोक दोनों अपने ऊपर धारण करते हैं। तेजों अन्नों-तेजशक्ति अन्नशक्ति को प्राप्त कर मनुष्यादि प्रजाओं को समृद्ध करने के लिए द्युलोक सूर्य से तेज शक्ति को लेता है, पृथिवीलोक सूर्य से अन्न शक्ति को लेता है। ऐसे ही प्रतापी गुणवान् राजा प्रजाओं को ज्ञानप्रकाश प्रदान करने की व्यवस्था तथा भोजन की व्यवस्था करे॥४॥

स॒प्त स्वसॄ॒ररु॑षीर्वावशा॒नो वि॒द्वान्मध्व॒ उज्ज॑भारा दृ॒शे कम्। अ॒न्तर्ये॑मे अ॒न्तरि॑क्षे पुरा॒जा इ॒च्छन्व॒व्रिम॑विदत्पूष॒णस्य॑॥

सूर्य अपनी सात रङ्गवाली किरणों को जगत् को दृष्ट कराने के लिए जलमय आकाश से बाहर निकालता या उभारता है, जो जलमय आकाश में स्वयं प्रथम गुप्त रखता है, पुनः पृथिवी को भी स्वरूप देता है, जल को शोषित कर तथा बहाकर जलमय आकाश में बाहर दृष्ट कराता है। इसी प्रकार सूर्यसमान राजमान राजा सप्त व्यवस्थाओं को राष्ट्र में प्रचारित कर उनसे राष्ट्र को चमकावे, सब प्रकार से पुष्ट करे॥॥

स॒प्त म॒र्यादाः॑ क॒वय॑स्ततक्षु॒स्तासा॒मेका॒मिद॒भ्यं॑हु॒रो गा॑त्। आ॒योर्ह॑ स्क॒म्भ उ॑प॒मस्य॑ नी॒ळे प॒थां वि॑स॒र्गे ध॒रुणे॑षु तस्थौ॥

ऋषि जन जीवनयात्रा की सात मर्यादाएँ-सीमाएँ प्रतिबन्धरेखाएँ=चोरी आदि बनाते हैं, जिनकी ओर जाना नहीं चाहिये, उनमें से किसी एक पर भी आरूढ हो जाने पर मनुष्य पापी बन जाता है। उनसे बचा रहनेवाला ऋषिकल्प होकर, जीवनयात्रा के मार्गों का अन्त जहाँ हो जाता है, ऐसी प्रतिष्ठाओं-ऊँची स्थितियों में रमण करता हुआ परम प्रकाशमान के आश्रय-मोक्ष में विराजमान हो जाता है॥६॥

अस॑च्च॒ सच्च॑ पर॒मे व्यो॑म॒न्दक्ष॑स्य॒ जन्म॒न्नदि॑तेरु॒पस्थे॑। अ॒ग्निर्ह॑ नः प्रथम॒जा ऋ॒तस्य॒ पूर्व॒ आयु॑नि वृष॒भश्च॑ धे॒नुः॥

प्रकृति से प्रवृद्ध जगत् बना, इसमें चेतनतत्त्व मनुष्यादि और जड़ वृक्षादि हैं, जो परम व्यापक परमात्मा के अधीन हैं। वह प्रथम प्रसिद्ध महान् अग्नि-अग्रणायक परमात्मा प्रकृति से विकृति होने पर आदिसृष्टि के जीवन में पिता-रक्षक जनक और धात्री-माता भी होता है, आरम्भसृष्टि में परमात्मा ही माता-पिता का कार्य करता है। सदा उसकी उपासना करनी चाहिए और उसी की शरण लेनी चाहिए। इसी प्रकार राष्ट्र में राजा भी सब मनुष्यादि और वनस्पतियों के पालन करने की व्यवस्था करे, बैल आदि चार पैरवाले सवारी के योग्य पशुओं तथा दूध देनेवाली गौ आदि की॥७॥

अ॒यं स यस्य॒ शर्म॒न्नवो॑भिर॒ग्नेरेध॑ते जरि॒ताभिष्टौ॑। ज्येष्ठे॑भि॒र्यो भा॒नुभि॑ॠषू॒णां प॒र्येति॒ परि॑वीतो वि॒भावा॑॥

परमात्मा की उपासनारूप शरण में उपासक की रक्षा करनेवाले परमात्मा के बहुत से प्रकार हैं, जिनसे उसकी कार्यसिद्धि हो जाने पर उपासक समृद्ध हो जाता है, अभ्युदय और मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। परमात्मा सृष्टि के आरम्भ में अग्नि आदि परम ऋषियों के अन्दर साक्षात् प्राप्त होकर उन्हें निर्भ्रान्त ज्ञान प्रकाश-वेद को देता है॥१॥

यो भा॒नुभि॑र्वि॒भावा॑ वि॒भात्य॒ग्निर्दे॒वेभि॑ॠ॒तावाज॑स्रः। आ यो वि॒वाय॑ स॒ख्या सखि॒भ्योऽप॑रिह्वृतो॒ अत्यो॒ न सप्तिः॑॥

परमात्मा अपने प्रकाश से मुक्तात्माओं के साथ रहता है, वह सत्यज्ञानवान् एकरस है, उपासक आत्माओं का मित्र है, उन्हें सरलरूप से प्राप्त होता है। ऐसे ही सूर्य भी आकाश में वर्तमान हुआ अपने प्रकाश से ग्रहों के साथ मित्र सा बना रहता है॥२॥

ईशे॒ यो विश्व॑स्या दे॒ववी॑ते॒रीशे॑ वि॒श्वायु॑रु॒षसो॒ व्यु॑ष्टौ। आ यस्मि॑न्म॒ना ह॒वींष्य॒ग्नावरि॑ष्टरथः स्क॒भ्नाति॑ शू॒षैः॥

अग्रणायक परमात्मा उपासकों के लिये दिव्यभोगों और प्रकाशमय बुद्धि को प्रदान करने में समर्थ है, उसकी स्तुति प्रार्थना उपासना करनेवालों को वह पूर्ण आयु देता है॥३॥

शू॒षेभि॑र्वृ॒धो जु॑षा॒णो अ॒र्कैर्दे॒वाँ अच्छा॑ रघु॒पत्वा॑ जिगाति। म॒न्द्रो होता॒ स जु॒ह्वा॒३॒॑ यजि॑ष्ठः॒ सम्मि॑श्लो अ॒ग्निरा जि॑घर्ति दे॒वान्॥

परमात्मा उपासकों की अर्चनाओं से प्रसन्न होता है, उन पर कृपा करता है, वह उन्हें शीघ्र प्राप्त होता है-स्वीकार करता है या अपनाता है। वह परमात्मा आत्मा द्वारा सङ्गमनीय है, उपासकों को आनन्दामृत से सींच देता है॥४॥

तमु॒स्रामिन्द्रं॒ न रेज॑मानम॒ग्निं गी॒र्भिर्नमो॑भि॒रा कृ॑णुध्वम्। आ यं विप्रा॑सो म॒तिभि॑र्गृ॒णन्ति॑ जा॒तवे॑दसं जु॒ह्वं॑ स॒हाना॑म्॥

उत्पन्नमात्र संसार का ज्ञाता-सर्वज्ञ, शक्तिशाली विद्युत् वायु आदि को अपने अधीन रखनेवाला जिसका आदि ऋषि महानुभाव उपदेश करते रहे, उस सुखदाता, दुष्टों को दण्ड देनेवाले परमात्मा की स्तुति उपासना करनी चाहिये और योगाभ्यासों द्वारा साक्षात् करना चाहिये॥५॥

सं यस्मि॒न्विश्वा॒ वसू॑नि ज॒ग्मुर्वाजे॒ नाश्वाः॒ सप्ती॑वन्त॒ एवैः॑। अ॒स्मे ऊ॒तीरिन्द्र॑वाततमा अर्वाची॒ना अ॑ग्न॒ आ कृ॑णुष्व॥

परमात्मा की प्राप्ति सब सुखों की प्राप्ति है। जैसे बलपूर्ण संग्राम में अश्वबल आदि सब बल प्राप्त होते हैं, ऐसे ही परमात्मा हमारे अन्दर सब बल और जीवन देनेवाली रक्षा प्रीति तृप्तियों को प्रेरित करता है, अतः उसकी शरण और उपासना आवश्यक है॥६॥

अधा॒ ह्य॑ग्ने म॒ह्ना नि॒षद्या॑ स॒द्यो ज॑ज्ञा॒नो हव्यो॑ ब॒भूथ॑। तं ते॑ दे॒वासो॒ अनु॒ केत॑माय॒न्नधा॑वर्धन्त प्रथ॒मास॒ ऊमाः॑॥

जो उपासक परमात्मा की कृपा में रहकर, उसका रक्षण प्राप्त कर उसके स्वरूप का ज्ञान करते हैं, वे सदा उन्नति को प्राप्त होते हैं॥७॥

स्व॒स्ति नो॑ दि॒वो अ॑ग्ने पृथि॒व्या वि॒श्वायु॑र्धेहि य॒जथा॑य देव। सचे॑महि॒ तव॑ दस्म प्रके॒तैरु॑रु॒ष्या ण॑ उ॒रुभि॑र्देव॒ शंसैः॑॥

परमात्मा आकाश से वृष्टिजल और पृथिवी से विविध अन्नों को हमें शुभ जीवनयात्रा के लिए देता है, साथ ही वह अपने प्रशंसनीय ज्ञानप्रकाशों द्वारा हमारी रक्षा करता है, अतः उसकी सङ्गति और उपासना करनी चाहिये॥१॥

इ॒मा अ॑ग्ने म॒तय॒स्तुभ्यं॑ जा॒ता गोभि॒रश्वै॑र॒भि गृ॑णन्ति॒ राधः॑। य॒दा ते॒ मर्तो॒ अनु॒ भोग॒मान॒ड्वसो॒ दधा॑नो म॒तिभिः॑ सुजात॥

जो जन संयत इन्द्रियों और पवित्र अन्तःकरणों से सम्पन्न होकर परमात्मा के लिये आराधनीय स्तुतिवचन समर्पित करते हैं, उन ऐसे जनों द्वारा वह साक्षात् किया जाता है, ऐसे जन ही उसके आनन्दरस में विभोर होते हैं॥२॥

अ॒ग्निं म॑न्ये पि॒तर॑म॒ग्निमा॒पिम॒ग्निं भ्रात॑रं॒ सद॒मित्सखा॑यम्। अ॒ग्नेरनी॑कं बृह॒तः स॑पर्यं दि॒वि शु॒क्रं य॑ज॒तं सूर्य॑स्य॥

अग्रणायक परमात्मा हमारा पिता माता सखा सम्बन्धी है। उसे ऐसा ही मानना चाहिये-अपने अन्दर भावित करना चाहिये तथा संसार के महान् अग्निपिण्ड सूर्य का भी जो नायक तथा समस्त जगत् को प्रकाशित करनेवाला है, उस परमात्मा को उपकारक जानना और मानना चाहिये॥३॥

सि॒ध्रा अ॑ग्ने॒ धियो॑ अ॒स्मे सनु॑त्री॒र्यं त्राय॑से॒ दम॒ आ नित्य॑होता। ऋ॒तावा॒ स रो॒हिद॑श्वः पुरु॒क्षुर्द्युभि॑रस्मा॒ अह॑भिर्वा॒मम॑स्तु॥

जो प्रतिदिन परमात्मा की स्तुति करता है, उसकी स्तुतियाँ सफल हो जाती हैं, वह तेजस्वी और अच्छे दिनोंवाला होता है॥४॥

द्युभि॑र्हि॒तं मि॒त्रमि॑व प्र॒योगं॑ प्र॒त्नमृ॒त्विज॑मध्व॒रस्य॑ जा॒रम्। बा॒हुभ्या॑म॒ग्निमा॒यवो॑ऽजनन्त वि॒क्षु होता॑रं॒ न्य॑सादयन्त॥

ज्ञान-ज्योतियों से युक्त, मित्रसमान, अध्यात्म-यज्ञ के सम्पादक, समस्त प्रजाओं में व्यापक परमात्मा को अभ्यास-वैराग्य द्वारा उपासक जन साक्षात् अपने अन्दर बिठाते हैं॥५॥

स्व॒यं य॑जस्व दि॒वि दे॑व दे॒वान्किं ते॒ पाकः॑ कृणव॒दप्र॑चेताः। यथाय॑ज ऋ॒तुभि॑र्देव दे॒वाने॒वा य॑जस्व त॒न्वं॑ सुजात॥

परमात्मा ने आकाश के सूर्य आदि पदार्थों को उन-उन गुणों से युक्त उन-उन के समयानुसार रचा। यद्यपि जीवात्मा उनके रचने से पूर्व वर्त्तमान रहता है, परन्तु वह अल्पज्ञ-अल्पशक्ति होने से उनके रचने में उसका सहायक नहीं बन सकता, अपितु परमात्मा अपनी कृपा से ज्ञान दर्शन देकर जीवात्मा को गुणवान् और कर्म करने में समर्थ बनाता है॥६॥

भवा॑ नो अग्नेऽवि॒तोत गो॒पा भवा॑ वय॒स्कृदु॒त नो॑ वयो॒धाः। रास्वा॑ च नः सुमहो ह॒व्यदा॑तिं॒ त्रास्वो॒त न॑स्त॒न्वो॒३॒॑ अप्र॑युच्छन्॥

अग्रणायक परमात्मा के प्रति स्तुतिवचनों को अर्पित करने से वह बाहरी भयों से और रोगों से बचाता है तथा वही परमात्मा प्राण सञ्चालन करनेवाला व प्राणशक्ति धारण करानेवाला है और वह ही शरीर का भी नित्यरूप से त्राण करनेवाला है॥७॥

प्र के॒तुना॑ बृह॒ता या॑त्य॒ग्निरा रोद॑सी वृष॒भो रो॑रवीति। दि॒वश्चि॒दन्ताँ॑ उप॒माँ उदा॑नळ॒पामु॒पस्थे॑ महि॒षो व॑वर्ध॥

महान् अग्नि द्यावापृथिवीमय जगत् में प्राप्त है, पृथिवी पर अग्निरूप में जलता हुआ-शब्द करता हुआ, द्युलोक में समस्त पिण्डों प्रान्तभागों को प्रकाश देता हुआ सूर्यरूप में, अन्तरिक्ष में मेघस्थ हुआ विद्युद्रूप में मिलता है। ऐसे ही विद्वान् या राजा की बल-ज्ञान-गुणख्याति विद्वन्मण्डल एवं साधारण जनों में हो जाया करती है॥१॥

मु॒मोद॒ गर्भो॑ वृष॒भः क॒कुद्मा॑नस्रे॒मा व॒त्सः शिमी॑वाँ अरावीत्। स दे॒वता॒त्युद्य॑तानि कृ॒ण्वन्त्स्वेषु॒ क्षये॑षु प्रथ॒मो जि॑गाति॥

महान् तेजोबल से सम्पन्न द्यावापृथिवीमय जगत् के अन्दर विकसित हुआ प्राणियों को प्रकाशसुख में बसानेवाला है, वह अल्प होता हुआ भी बलपूर्ण है, बड़े-बड़े बलशाली कार्यों को करनेवाला है। द्युलोक में सूर्यरूप से, अन्तरिक्ष में विद्युद्रूप से, पृथिवी पर अग्निरूप से प्रमुखतया वर्तमान है। राजा या विद्वान् को अग्नि से अनेक प्रकार का कार्य लेकर विविध लाभों को प्राप्त करना चाहिये तथा स्वयं भी उसी की भाँति अन्यों के लिये लाभदायी-उपकारक बनना चाहिये॥२॥

आ यो मू॒र्धानं॑ पि॒त्रोरर॑ब्ध॒ न्य॑ध्व॒रे द॑धिरे॒ सूरो॒ अर्णः॑। अस्य॒ पत्म॒न्नरु॑षी॒रश्व॑बुध्ना ऋ॒तस्य॒ योनौ॑ त॒न्वो॑ जुषन्त॥

महान् अग्नि का प्रथम स्थान सूर्यमण्डल है, सूर्यरूप अग्नि का दूसरा स्थान लोकों को मार्ग देनेवाला अन्तरिक्ष है, सूर्यरश्मियों और जलकण धाराओं से सम्पन्न मेघ में विद्युद्रूप से है। तीसरा स्थान पृथिवी पर यज्ञादि श्रेष्ठ कर्म में है, उसे साक्षात् ज्वाला में अग्निरूप से मनुष्यादि कार्य में लाते हैं। इस ऐसे अग्नि को जानकर विद्वान् और राजा इस जैसे बनकर विद्याप्रचार और राष्ट्रव्यवहार को समृद्ध करें॥३॥

उ॒षउ॑षो॒ हि व॑सो॒ अग्र॒मेषि॒ त्वं य॒मयो॑रभवो वि॒भावा॑। ऋ॒ताय॑ स॒प्त द॑धिषे प॒दानि॑ ज॒नय॑न्मि॒त्रं त॒न्वे॒३॒॑ स्वायै॑॥

अग्निरूप सूर्य अपने प्रकाश या तेज से संसार को सुरक्षार्थ आच्छादित करता है, यज्ञादि श्रेष्ठकर्मों के संपादनार्थ अग्नि को पृथिवी पर प्रकट करता है, वह अग्नि सूर्य की सात रङ्गवाली किरणों द्वारा पृथिवी पर प्रकट होती है, सूर्यकान्त मणि के प्रयोग से कुत्रिम ढंग से भी प्रकट होती है। इसी प्रकार विद्वान् तथा राजा भी प्रति प्रातःकाल समाज या राष्ट्र के स्त्री-पुरुषों को बोध दे-सावधान करे। उन्हें उत्तम कार्य करने के लिये सप्तछन्दवाले ज्ञान को तथा सात मर्यादाओं की व्यवस्था को बनाये रखने के लिये प्रेरित करे॥४॥

भुव॒श्चक्षु॑र्म॒ह ऋ॒तस्य॑ गो॒पा भुवो॒ वरु॑णो॒ यदृ॒ताय॒ वेषि॑। भुवो॑ अ॒पां नपा॑ज्जातवेदो॒ भुवो॑ दू॒तो यस्य॑ ह॒व्यं जुजो॑षः॥

सूर्यरूप अग्नि ब्रह्माण्ड को दिखाता या चमकता है। रश्मिमान् होने से रश्मियों द्वारा जलकणों को खींचकर आकाश में मेघों को बनाता और समय पर पुनः बरसाता है और पुनः मेघ में पहुँच कर विद्युद्रूप होकर जलों को थामता है, बरसाता भी है। पृथिवी पर अग्निरूप में ओषधि आदि को प्रेरित कर आहार कराता है। ऐसे ही विद्वान् या राजा समाज और राष्ट्र को उत्तम नीति द्वारा चमकावे, सुख की वर्षा करे और भोज्य पदार्थों को सुखमय बनावे॥५॥

भुवो॑ य॒ज्ञस्य॒ रज॑सश्च ने॒ता यत्रा॑ नि॒युद्भिः॒ सच॑से शि॒वाभिः॑। दि॒वि मू॒र्धानं॑ दधिषे स्व॒र्षां जि॒ह्वाम॑ग्ने चकृषे हव्य॒वाह॑म्॥

अग्नि की ज्वाला सुखसम्भाजिका है। वह होमे हुए पदार्थ वहन करके सूर्य तक ले जाती है। नियत आहुतियों से संयुक्त होकर ही अग्नि यज्ञ को और यज्ञ से रञ्जनीय हुए देश या वातावरण को उत्तम बनाती है। ऐसे ही विद्वान् की वाणी मीठी और कल्याणकारी होकर समाज में ऊपर तक पहुँचकर वातावरण को अच्छा बनाती है॥६॥

अ॒स्य त्रि॒तः क्रतु॑ना व॒व्रे अ॒न्तरि॒च्छन्धी॒तिं पि॒तुरेवैः॒ पर॑स्य। स॒च॒स्यमा॑नः पि॒त्रोरु॒पस्थे॑ जा॒मि ब्रु॑वा॒ण आयु॑धानि वेति॥

परमपिता परमात्मा के आश्रयरूप उपासना के हेतु तीन शरीरों में जानेवाले आत्मा को योगाभ्यास करना चाहिये। बन्धन को काटनेवाले अध्यात्मबलरूप शस्त्र ही हैं। जैसे माता-पिता के आश्रय में बालक सुरक्षित रहता है, ऐसे ही आत्मा परमात्मा के आश्रय में बन्धनरहित निर्भय और सुरक्षित हो जाता है॥७॥

स पित्र्या॒ण्यायु॑धानि वि॒द्वानिन्द्रे॑षित आ॒प्त्यो अ॒भ्य॑युध्यत्। त्रि॒शी॒र्षाणं॑ स॒प्तर॑श्मिं जघ॒न्वान्त्वा॒ष्ट्रस्य॑ चि॒न्निः स॑सृजे त्रि॒तो गाः॥

योग द्वारा परमात्मा से आत्मा को अध्यात्मबल प्राप्त होता है, तो स्थूलसूक्ष्मकारणशरीरोंवाले और सात लगामों-पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ मन तथा उपस्थेन्द्रियवाले शरीर को वह पराजित करता है। शरीर के कारणरूप गर्भधारण करानेवाले गर्भबीजप्रभाव की वासनाओं को भी निकाल फेंकता है॥८॥

भूरीदिन्द्र॑ उ॒दिन॑क्षन्त॒मोजोऽवा॑भिन॒त्सत्प॑ति॒र्मन्य॑मानम्। त्वा॒ष्ट्रस्य॑ चिद्वि॒श्वरू॑पस्य॒ गोना॑माचक्रा॒णस्त्रीणि॑ शी॒र्षा परा॑ वर्क्॥

मुमुक्षुजनों का पालक परमात्मा अपने मुमुक्षु उपासकों के विरोधी अपने को बड़ा बलवान् माननेवाले अभिमानी को छिन्न-भिन्न कर देता है। पुनः वीर्य से उत्पन्न प्राणिमात्र को प्राप्त, इस देह की लगामों को-पुनर्जन्म में ले जानेवाली लगामों को नष्ट करता है और तीनों देहों के शिरों को उपासक आत्मा से पृथक् कर उसे मोक्ष में पहुँचा देता है॥९॥

आपो॒ हि ष्ठा म॑यो॒भुव॒स्ता न॑ ऊ॒र्जे द॑धातन। म॒हे रणा॑य॒ चक्ष॑से॥

जल अवश्य सुखकारण और जीवनबल देनेवाले हैं। यथावसर शीतजल या उष्णजल उपयुक्त हुआ तथा महान् रमणीय दर्शन बाहिरी दृष्टि से नेत्र-शक्ति धारण करानेवाला, भीतरी दृष्टि से मानस शान्ति वा अध्यात्मदर्शन कराने का हेतु भी है। इसी प्रकार आप विद्वान् जन भी सुखसाधक, जीवन में प्रेरणा देनेवाले और अध्यात्मदर्शन के निमित्त हैं। उनका सङ्ग करना चाहिए॥१॥

यो वः॑ शि॒वत॑मो॒ रस॒स्तस्य॑ भाजयते॒ह नः॑। उ॒श॒तीरि॑व मा॒तरः॑॥

जलों के अन्दर तृप्तिकर स्वाद है, जोकि सुख देनेवाला है और भोजन को रस में परिणत करता है। इसी प्रकार आप विद्वान् जनों का ज्ञानरस आत्मा को सुख वा जीवन देता है। उनके उपदेशों का श्रवण करना चाहिये॥२॥

तस्मा॒ अरं॑ गमाम वो॒ यस्य॒ क्षया॑य॒ जिन्व॑थ। आपो॑ ज॒नय॑था च नः॥

जल का सार भाग शरीर में सात्म्य हो जाता है, वह समृद्ध करने, पुष्ट करने का निमित्त बनता है। इसी प्रकार आप विद्वान् जनों का ज्ञान-सार आत्मा में बैठ जाता है, जो आत्मा को बल देता है॥३॥

शं नो॑ दे॒वीर॒भिष्ट॑य॒ आपो॑ भवन्तु पी॒तये॑। शं योर॒भि स्र॑वन्तु नः॥

जल का स्नान और पान करने से शरीर में वर्तमान रोगों का शमन और भावी रोगभयों का पृथक्करण हो जाता है तथा दोनों ही प्रकार स्नान और पान सुख-शान्ति को प्राप्त कराते हैं। इसी प्रकार आपजनों के सङ्ग से बाहरी पापसंस्पर्श का अभाव और भीतरी पापताप की उपशान्ति होती है। अध्यात्म से आपः-व्यापक परमात्मा के जगत् में प्रत्यक्षीकरण और अन्तरात्मा में साक्षात् अनुभव से सच्चा सुख और शान्ति की प्राप्ति होती है-अमृत की वर्षा होती है॥४॥

ईशा॑ना॒ वार्या॑णां॒ क्षय॑न्तीश्चर्षणी॒नाम्। अ॒पो या॑चामि भेष॒जम्॥

जलों के सेवन करने से शरीर में उत्तम गुण प्राप्त होते हैं, मानो वे संसार में निवास कराने व दीर्घ जीवन के हेतु हैं। जल सुखकारक औषध है, इसका सेवन करना ही चाहिए। इसी प्रकार आप्त जनों के सङ्ग से उत्तम गुणों की प्राप्ति और मानवसमाज में अच्छा स्थान मिलता है। सचमुच उनका सङ्ग आत्मिक औषध है॥५॥

अ॒प्सु मे॒ सोमो॑ अब्रवीद॒न्तर्विश्वा॑नि भेष॒जा। अ॒ग्निं च॑ वि॒श्वश॑म्भुवम्॥

जलों में सर्वरोगों को दूर करनेवाले गुण हैं, विविध रीति से सेवन करने से-स्नान, पान, स्पर्श, मार्जन, आचमन आदि द्वारा वे प्राप्त होते हैं। जलों के अन्दर अग्नि भी है, वह स्वास्थ्य का संरक्षण करती है। वह जलों में स्वतः प्रविष्ट है, विद्युद्रूप से बाहर प्रकट होती है। इसी प्रकार आप्त जन, लोगों के आन्तरिक दोषों को दूर करते हैं और उनमें गुणों का आधान करते हैं॥६॥

आपः॑ पृणी॒त भे॑ष॒जं वरू॑थं त॒न्वे॒३॒॑ मम॑। ज्योक्च॒ सूर्यं॑ दृ॒शे॥

जल रोग को दूर करनेवाले औषध को देता है साथ ही सूर्य को देखने की शक्ति को लुप्त नहीं होने देता-दृष्टि को बढ़ाता है-आँखों में मार्जन आदि करने से। इसी प्रकार आप्त विद्वान् अपने सत्सङ्ग-उपदेश से दोषों को दूर करते हैं और अध्यात्मदृष्टि देते हैं॥७॥

इ॒दमा॑पः॒ प्र व॑हत॒ यत्किं च॑ दुरि॒तं मयि॑। यद्वा॒हम॑भिदु॒द्रोह॒ यद्वा॑ शे॒प उ॒तानृ॑तम्॥

जल मनुष्य के देहमलों को अलग करता है, तमोगुण, आलस्य, असावधानता को मिटाता है, क्रोध को शान्त करता है। बुरा कहने, निन्दा करने, अहित वचन बोलने से उत्पन्न क्लेश को भी दूर करता है-उस प्रवृत्ति को हटाता है। जल से स्नान, नेत्रमार्जन और उसके पान द्वारा मनुष्य पापकर्म के उपरान्त पश्चात्ताप करता है। इसी प्रकार आप्तजन के सत्सङ्ग से मलिनता, तमोगुण की प्रवृत्ति, क्रोधभावना और निन्दा से परे हो जाता है॥८॥

आपो॑ अ॒द्यान्व॑चारिषं॒ रसे॑न॒ सम॑गस्महि। पय॑स्वानग्न॒ आ ग॑हि॒ तं मा॒ सं सृ॑ज॒ वर्च॑सा॥

जलों का ठीक-ठीक सेवन करने से, उचितरूप से स्नान, मार्जन और पान करने से लाभ लेने चाहिएँ। इसी प्रकार आप्त जनों से साक्षात् सत्सङ्ग तथा उपदेश ग्रहण कर अपने बाह्य वातावरण को बनावें और आन्तरिक सुख-शान्ति को प्राप्त करें तथा इन जलों एवं आप्त जनों के स्वामी प्रेरक परमात्मा के तेज आनन्द से अपने को तेजस्वी और आनन्दी बनावें॥९॥

ओ चि॒त्सखा॑यं स॒ख्या व॑वृत्यां ति॒रः पु॒रू चि॑दर्ण॒वं ज॑ग॒न्वान्। पि॒तुर्नपा॑त॒मा द॑धीत वे॒धा अधि॒ क्षमि॑ प्रत॒रं दीध्या॑नः॥

सूर्योदय होने पर दिन पृथिवी के ऊपर और रात्रि नीचे होती है। गृहस्थाश्रम में पति से नम्र हो गृहस्थधर्म की याचना पत्नी करे तथा पितृ-ऋण से अनृण होने के लिये पुत्र की उत्पत्ति करे। प्रस्तुत मन्त्र पर सायण ने जो अश्लील अर्थ दिया है, संदेहनिवृत्ति के लिये उसकी समीक्षा दी जा रही है−१−क्या यहाँ विवस्वान् कोई देहधारी मनुष्य है कि जिसके यम-यमी सन्तानों की कथा वेद वर्णन करता है ? क्या वैदिक काल से पूर्व उनकी उत्पत्ति हो चुकी थी अथवा अलङ्कार है, जैसा कि नवीन लोग कहते हैं कि विवस्वान् सूर्य है, उसका लड़का दिन और लड़की रात्रि है। ऐसा यदि मानते हैं, तो वह अप्रकाशमान निर्जन देश कौनसा है, जहाँ रात्रि गयी ?२−“अर्णवं समुद्रैकदेशमवान्तरद्वीपम्”समीक्षा−यहाँ ‘अर्णवम्’ का अर्थ ‘अवान्तरद्वीपम्’ अत्यन्त गौणलक्षण में ही हो सकता है। ३−“जगन्वान् गतवती यमी” यहाँ जगन्वान् पुल्लिङ्ग को स्त्रीलिङ्ग का विशेषण करना शब्द के साथ बलात्कार ही है। ४−“ओववृत्याम्=आवर्त्तयामि=त्वत्सम्भोगं करोमि” यहाँ “त्वत्सम्भोगं करोमि=तेरा सम्भोग करती हूँ” यह कहना और सम्भोग की प्रार्थना भी करते जाना यह कितना विपरीत अर्थ है!५−“पितुः=आवयोर्भविष्यतः पुत्रस्य पितृभूतस्य तवार्थाय=हम दोनों के होनेवाले पुत्र का तुझ पितृरूप के निमित्त” यह अर्थ अत्यन्त दुःसाध्य और गौरवदोषयुक्त है। ६−अधिक्षमि=अधि पृथिव्यां पृथिवीस्थानीयनभोदरे इत्यर्थः”= “पृथिवीस्थानीय नभोदर में। ” द्वीपान्तर में स्थिति और नभोदर में गर्भाधान हो, यह असम्बद्ध अर्थ है। ७−“पुत्रस्य जननार्थमावां ध्यायन्नादधीत प्रजापतिः=पुत्रजननार्थ हम दोनों का ध्यान करता हुआ प्रजापति गर्भाधान करे” कितनी असङ्गति है-प्रस्ताव और प्रार्थना पति से और आधान करे प्रजापति!॥१॥

न ते॒ सखा॑ स॒ख्यं व॑ष्ट्ये॒तत्सल॑क्ष्मा॒ यद्विषु॑रूपा॒ भवा॑ति। म॒हस्पु॒त्रासो॒ असु॑रस्य वी॒रा दि॒वो ध॒र्तार॑ उर्वि॒या परि॑ ख्यन्॥

स्त्री-पुरुष का विवाह समान गुण-कर्म-स्वभाव और रूप के अनुसार होना चाहिये, विपरीत विवाह असंतोषजनक और समाज में अपवाद और अनादर करनेवाला होता है॥२॥समीक्षा (सायणभाष्य)−“सखा=गर्भवासलक्षणेन” यहाँ सखिपद मुख्यवृत्ति से भ्राता की ओर न घटते हुए देखकर सायण को खींचातानी करके उक्त विशेषण लगाना पड़ा तथा “सलक्ष्मा= समानयोनित्वलक्षण; विषुरूपा भगिनीत्वात् विषमरूपा” यहाँ से ‘योनित्व’ और ‘भगिनीत्वात्’ ये अध्याहार पद निकाल दें, तो सायण के मत में एक ही वस्तु के लिये ‘समानलक्षण’ और ‘विषमरूपा’ विपरीत अर्थ होंगे। वास्तव में अपने कल्पनाजन्य अर्थ को सिद्ध करने के लिये उन्होंने यह अनावश्यक अध्याहार किया॥२॥

उ॒शन्ति॑ घा॒ ते अ॒मृता॑स ए॒तदेक॑स्य चित्त्य॒जसं॒ मर्त्य॑स्य। नि ते॒ मनो॒ मन॑सि धाय्य॒स्मे जन्युः॒ पति॑स्त॒न्व१॒॑मा वि॑विश्याः॥

विवाह के अनन्तर किसी रोगादि से पत्नी कुरूप हो जावे, तो भी कम से कम एक पुत्र तो उत्पन्न करें, ऐसी व्यवस्था धर्मोपदेश से और शासन से करें॥३॥समीक्षा (सायण भाष्य)−“एकस्य चित्सर्वस्य जगतो मुख्यस्यापि प्रजापत्यादेः स्वदुहितृभगिन्यादीनां सम्बन्धोऽस्तीति शेषः” ‘एकस्य चित्’ यहाँ एक का अर्थ मुख्य करके प्रजापति आदि का अप्रासङ्गिक अध्याहार किया है। तथा ‘जन्युरिति लुप्तोपममेतत् जन्युरिव यथा जनयिता प्रजापतिः’ यहाँ प्रथम तो लुप्तोपमा गौरव है, दूसरे ‘जायते-इति जन्युः=जन्+युच् से युच् प्रत्यय हुआ है, णिजन्त से नहीं। जो यह जनयिता अर्थ किया है, वह तथा उपयुक्त अध्याहार अपनी कल्पनासिद्धि के लिये खींचातानी है॥३॥

न यत्पु॒रा च॑कृ॒मा कद्ध॑ नू॒नमृ॒ता वद॑न्तो॒ अनृ॑तं रपेम। ग॒न्ध॒र्वो अ॒प्स्वप्या॑ च॒ योषा॒ सा नो॒ नाभिः॑ पर॒मं जा॒मि तन्नौ॑॥

विवाह वेदमन्त्रों द्वारा प्रतिज्ञापूर्वक हो, प्रतिज्ञाओं का उल्लङ्घन कभी न हो। कारणवश दूर-दूर पर भी स्नेहसमाचार बना रहे। दिन-रात पृथिवी के साथ समकक्ष में होते हैं, पर उनके ओर-छोर मिले रहते हैं, यही प्रातः-सायं कहलाते हैं॥४॥

गर्भे॒ नु नौ॑ जनि॒ता दम्प॑ती कर्दे॒वस्त्वष्टा॑ सवि॒ता वि॒श्वरू॑पः। नकि॑रस्य॒ प्र मि॑नन्ति व्र॒तानि॒ वेद॑ नाव॒स्य पृ॑थि॒वी उ॒त द्यौः॥

सृष्टि में जोड़े पदार्थ ईश्वरीय व्यस्था से हैं, उनके टूटने से सृष्टि नहीं चलेगी। ऐसे ही गृहस्थ-नियम का भी उल्लङ्घन न करें। वर-वधू का विवाह अन्य विवाहित जनों के साक्ष्य में होना चाहिए, संन्यासी व ब्रह्मचारी का विवाह में साक्ष्य अपेक्षित नहीं॥५॥समीक्षा (सायणभाष्य)-“मातुरुदरे सहवासजनित्वं दम्पतित्वं पृथिवी भूमिर्वेद जानाति, उतापि च द्यौर्द्युलोकोऽपि जानाति। ” प्रस्तुत व्याख्या में द्यावापृथिवी सहवासजनित दम्पतित्व कैसे जानते हैं, इस बात को सायण अपनी कल्पनासिद्धि के आग्रह के कारण स्पष्ट न कर सके।

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को अ॒स्य वे॑द प्रथ॒मस्याह्नः॒ क ईं॑ ददर्श॒ क इ॒ह प्र वो॑चत्। बृ॒हन्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य॒ धाम॒ कदु॑ ब्रव आहनो॒ वीच्या॒ नॄन्॥

स्त्री-पुरुषों के विवाहसम्बन्ध दूर स्थान पर होना चाहिए, निकट स्थानवालों का विवाहसम्बन्ध उपयोगी नहीं होता। कभी संकट होने पर पितृकुलों को सहायक बनना चाहिए॥६॥ समीक्षा (सायणभाष्य)-“मित्रस्य वरुणस्य मित्रावरुणयोर्बृहन्महद्धाम स्थानमहोरात्रं यदस्ति। ” यहाँ “दिन और रात मित्रावरुण के धाम हैं” यह सायण का कथन उनकी अभीष्ट व्याख्या से विपरीत है, क्योंकि ‘दिन-रात’ स्थान नहीं हैं। दूसरे यहाँ इस प्रकार कहने की क्या आवश्यकता है, क्योंकि यदि दिन-रात के पितृकुल मित्रावरुण के धाम माने जावें, तब तो यहाँ दिन-रात का अपने संवाद दुःखवृत्तान्त को सुनाना उचित ही है, जो हमारी अर्थयोजना के साथ सम्बन्ध रखता है॥

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य॒मस्य॑ मा य॒म्यं१॒॑ काम॒ आग॑न्त्समा॒ने योनौ॑ सह॒शेय्या॑य। जा॒येव॒ पत्ये॑ त॒न्वं॑ रिरिच्यां॒ वि चि॑द्वृहेव॒ रथ्ये॑व च॒क्रा॥

विवाह युवा और युवती का होना चाहिए और उन्हें विवाहोपरान्त पारस्परिक व्यवहार लज्जा का त्याग करके बरतना चाहिए। अपने गृहस्थ के भार को-रथ को वहन करते हुए चक्रों के समान आपत्ति-विपत्ति में भी सुचारुरूप से वहन करते चलना चहिए॥७॥

न ति॑ष्ठन्ति॒ न नि मि॑षन्त्ये॒ते दे॒वानां॒ स्पश॑ इ॒ह ये चर॑न्ति। अ॒न्येन॒ मदा॑हनो याहि॒ तूयं॒ तेन॒ वि वृ॑ह॒ रथ्ये॑व च॒क्रा॥

ग्रह-तारे आकाश में सदैव गतिशील रहते हैं, सूर्य के द्वारा उन्हें ज्योति प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त इस मन्त्र से यह भी स्पष्ट है कि सन्तानोत्पादन में असमर्थ पति द्वारा पत्नी को नियोग की आज्ञा प्राप्त हो जाने पर यदि वह ब्रह्मचारिणी रहना चाहे, तो रह सकती है, सन्तानप्राप्ति की इच्छा हो, तो नियोग करे॥८॥समीक्षा (सायणभाष्य)-‘ये स्पशोऽहोरात्रादयश्चाराश्चरन्ति” यहाँ यम-यमी को सायण दिन-रात नहीं समझता है, किन्तु मन्त्र १० में “अहोरात्रयोरस्मै यमाय कल्पितं भागम्” में यम का सम्बन्ध दिन-रात से वर्णित किया है। यह पारस्परिक विरोध है॥८॥

रात्री॑भिरस्मा॒ अह॑भिर्दशस्ये॒त्सूर्य॑स्य॒ चक्षु॒र्मुहु॒रुन्मि॑मीयात्। दि॒वा पृ॑थि॒व्या मि॑थु॒ना सब॑न्धू य॒मीर्य॒मस्य॑ बिभृया॒दजा॑मि॥

पृथिवी आदि पिण्ड बहुत दिन-रातों-अहर्गणों के पश्चात् घिस-घिसकर परमाणु बनकर हीन हो जाते हैं। गृहस्थ जनों के लिये इस मन्त्र में उपदेश है कि विवाहित स्त्री-पुरुष संकट आने पर परस्पर सहयोग करें। एक दूसरे का व्यवहार आपस में स्नेहपूर्ण और सहयोग की भावना से युक्त हो॥९॥

आ घा॒ ता ग॑च्छा॒नुत्त॑रा यु॒गानि॒ यत्र॑ जा॒मयः॑ कृ॒णव॒न्नजा॑मि। उप॑ बर्बृहि वृष॒भाय॑ बा॒हुम॒न्यमि॑च्छस्व सुभगे॒ पतिं॒ मत्॥

ज्योतिष के रहस्य को स्पष्ट करते हुए मन्त्र में कहा गया है कि एक समय ऐसा आयेगा कि ये अलग-अलग रूप में न रहकर एक हो जावेंगे, वह सृष्टि का प्रलयकाल होगा। गृहस्थ के लिये वेद का आदेश है कि जो पति गर्भाधान करने में असमर्थ है, वह सन्तानाभिलाषिणी पति को नियोग से सन्तानोत्पत्ति करने की अनुमति दे देवे॥१०॥समीक्षा (सायणभाष्य)-“यत्र येषु कालेषु जामयो भगिन्यो-अज्राम्यभ्रातरं पतिं कृण्वन्करिष्यन्ति” यमी जो सायण के मत में भगिनी है, वह इसी वैदिक समय में ही सम्भोग करने को तैयार है, फिर यह कैसा हेतु वचन है ? हाँ, यदि वाक्य वचन हो कि यम भ्राता अभ्राता का कार्य करेगा, ऐसा उत्तर समय आवेगा, तब तो हेतु दर्शाना ठीक भी था, किन्तु सायण की अर्थयोजना हेतुदोष से युक्त है॥१०॥

किं भ्राता॑स॒द्यद॑ना॒थं भवा॑ति॒ किमु॒ स्वसा॒ यन्निॠ॑तिर्नि॒गच्छा॑त्। काम॑मूता ब॒ह्वे॒३॒॑तद्र॑पामि त॒न्वा॑ मे त॒न्वं१॒॑ सं पि॑पृग्धि॥

सन्तानोपत्ति या गर्भाधान की स्थापना में असमर्थ स्त्री-पुरुष भाई बहन की भाँति रहें॥११॥समीक्षा (सायणभाष्य)−“यस्मिन् भ्रातरि सति स्वसादिकमनाथं नाथरहितं भवाति-भवति स भ्राता किमसत् किं भवति न भवतीत्यर्थः किं च यस्यां भगिन्यां सत्यां भ्रातरं निर्ऋतिर्दुःखं निगच्छात् नियमेन गच्छति प्राप्नोति सा किमु किंवा भवति। ” इस स्थान पर सायण की खींचतान की कोई सीमा नहीं रह गई। “अनाथम्” क्रियाविशेषण को ‘स्वसा’ का विशेषण करता है परन्तु ‘अनाथम्’ शब्द नपुंसकलिङ्ग है और ‘स्वसा’ शब्द स्त्रीलिङ्ग है, इसलिए ‘आदिकम्’ शब्द अधिक जोड़कर ‘स्वसादिकम्’ लिखता है। यहाँ पर क्या भ्राता के साथ स्वसा से भिन्न-व्यक्ति का भी सम्बन्ध है, जो ‘आदिकम्’ पद अधिक जोड़ा है ? यदि ‘आदिकम्’ से ‘दुहिता’ ‘माता’ भी सम्बन्ध रखते हैं, तब तो भ्राता नहीं होगा, अपितु दुहिता के साथ पिता और माता के साथ पुत्र का सम्बन्ध होगा, अतः यह कल्पना निर्बल है। तथा ‘वह ऐसा भ्राता न होने के बराबर ही है, जिसके होते हुए बहिन अनाथ रहे’ यह हेतु भी निरथर्क है, क्योंकि वह यम उस यमी को अविवाहित रहने का उपदेश तो दे ही नहीं रहा था। अपितु पूर्व मन्त्र में आज्ञा दे चुका था “अन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत्” फिर कैसे इस मिथ्या हेतु की वेद में स्थापना है ? इसी प्रकार ‘वह बहिन भी कुछ नहीं, जिसके होते हुए भाई को दुःख प्राप्त हो’, यह हेतु भी अयुक्त है। उस यम को क्या दुःख था ? क्या उसका कोई विवाह नहीं करता था ? अथवा वह महादरिद्र था, जिससे उसको दूसरी स्त्री न मिल सकती हो। इन हेतुओं को सामान्य बुद्धि के व्यक्ति भी स्वीकार नहीं कर सकते। इस प्रकार अपनी कल्पनासिद्धि के लिए सायण को अनावश्यक खींचतान करनी पड़ी॥११॥

न वा उ॑ ते त॒न्वा॑ त॒न्वं१॒॑ सं प॑पृच्यां पा॒पमा॑हु॒र्यः स्वसा॑रं नि॒गच्छा॑त्। अ॒न्येन॒ मत्प्र॒मुदः॑ कल्पयस्व॒ न ते॒ भ्राता॑ सुभगे वष्ट्ये॒तत्॥

भाई-बहन का विवाह नहीं होना चाहिए, ऐसा करना पाप है। कदाचित् कोई ऐसा करे भी, तो समाज को पाप कहकर उसकी निन्दा करनी चाहिये और उसे रोकना चाहिये। गर्भाधान में असमर्थ पति नियोग की आज्ञा देने के अनन्तर पत्नी के साथ भ्रातृसम व्यवहार करे और पुनः उसके द्वारा सम्भोग के लिये आग्रह किये जाने पर दृढता से निषेध कर दे॥१२॥

ब॒तो ब॑तासि यम॒ नैव ते॒ मनो॒ हृद॑यं चाविदाम। अ॒न्या किल॒ त्वां क॒क्ष्ये॑व यु॒क्तं परि॑ ष्वजाते॒ लिबु॑जेव वृ॒क्षम्॥

यदि स्त्री में कोई दोष है, जिसके कारण वह सन्तानोत्पत्ति में असमर्थ है, तो उसे भी चाहिए कि वह पति को दूसरी स्त्री से सन्तानोत्पत्ति के लिये अनुमति दे देवे॥१३॥

अ॒न्यमू॒ षु त्वं य॑म्य॒न्य उ॒ त्वां परि॑ ष्वजाते॒ लिबु॑जेव वृ॒क्षम्। तस्य॑ वा॒ त्वं मन॑ इ॒च्छा स वा॒ तवाधा॑ कृणुष्व सं॒विदं॒ सुभ॑द्राम्॥

सन्तानोपत्ति में असमर्थ होते हुए भी यदि वैराग्यवशात् या परोपकारकार्यवशात् नियोग न करें और संयम से रहें, तो यह अनुचित नहीं, अपितु अधिक अच्छा है॥१४॥

वृषा॒ वृष्णे॑ दुदुहे॒ दोह॑सा दि॒वः पयां॑सि य॒ह्वो अदि॑ते॒रदा॑भ्यः। विश्वं॒ स वे॑द॒ वरु॑णो॒ यथा॑ धि॒या स य॒ज्ञियो॑ यजतु य॒ज्ञियाँ॑ ऋ॒तून्॥

सुखवृष्टिकर्ता महान् परमात्मा आस्तिक व नास्तिक मनवालों को तथा न्यायकारी या अन्यायकारी राजाओं को जानता है-वह सर्ववेत्ता है। अपने धाम-मोक्षधाम से आनन्दरसों की वृष्टि करता है, अपनी सर्वज्ञता से यथावसर सङ्गमनीय है, वह अपना समागमलाभ देता है। सूर्य महान् पिण्ड सब प्रदेशों पर प्रखरताप से प्राप्त हुआ मेघ में जलांशों को भरता है, वही ऋतुओं का प्रसार करनेवाला है, सङ्गमनीय है॥१॥

रप॑द्गन्ध॒र्वीरप्या॑ च॒ योष॑णा न॒दस्य॑ ना॒दे परि॑ पातु मे॒ मनः॑। इ॒ष्टस्य॒ मध्ये॒ अदि॑ति॒र्नि धा॑तु नो॒ भ्राता॑ नो ज्ये॒ष्ठः प्र॑थ॒मो वि वो॑चति॥

मन की व्यापनशील मनोवृत्ति परमात्मा से मिलानेवाली है, राजा की राष्ट्र में फैली राजनीति-न्यायनीति भी परमात्मा से मिलानेवाली होती है। सूर्य से व्याप्त अग्नि ही विद्युद्रूप में मेघ में दृष्टिगोचर होती है। परमात्मा के स्तवन से, घोषणीय राजा की घोषणा से, मेघ की गर्जना से, मानव के मनोभाव पूर्ण होते हैं। अनश्वरमोक्ष में विराजमान होना, अच्छिन्न राष्ट्र में रहना, सतत पार्थिव अन्नादि भोगों से तृप्त होना, साथ ही परमात्मा द्वारा हमें स्वीकार करना, राजा द्वारा शुभवचन-अभयवचन देना, मेघ का वाक्शक्ति देना आदि सुख हमारे लिये सदैव बने रहें॥२॥

सो चि॒न्नु भ॒द्रा क्षु॒मती॒ यश॑स्वत्यु॒षा उ॑वास॒ मन॑वे॒ स्व॑र्वती। यदी॑मु॒शन्त॑मुश॒तामनु॒ क्रतु॑म॒ग्निं होता॑रं वि॒दथा॑य॒ जीज॑नन्॥

आस्तिक की मानसवृत्ति प्रतिभा, न्यायकारी राजा की राष्ट्रभूमि या प्रजा, परमात्मा की कृपा से उसके लिये शीघ्र अच्छी सेवनीया व दिव्यभोग देनेवाली, यश्स्करी, सुख पहुँचानेवाली हो जाती है। परमात्मा को चाहनेवाले को सुखदाता परमात्मा भी चाहता है। उपासक जन उसके अनुकूल चलने से, उसे स्वात्मा में अनुभव करने से साक्षात् करते हैं॥३॥

अध॒ त्यं द्र॒प्सं वि॒भ्वं॑ विचक्ष॒णं विराभ॑रदिषि॒तः श्ये॒नो अ॑ध्व॒रे। यदी॒ विशो॑ वृ॒णते॑ द॒स्ममार्या॑ अ॒ग्निं होता॑र॒मध॒ धीर॑जायत॥

उपासक आत्मा अध्यात्मयज्ञ में प्रशंसनीय प्रवृत्तिवाला होकर ईश्वर से प्रेरित हुआ महान् हर्षप्रद मोक्षपद को प्राप्त करता है। जब दर्शनीय सुखदाता परमात्मा की उपासक उपासना करते हैं, तो वह उनका आधार होकर उनके अन्दर साक्षात् होता है। राजा राजसूययज्ञ में प्रशंसनीय गतिप्रवृत्तिवाला होकर परमात्मा से प्रेरित हुआ भूपतिपद-राजपद को प्राप्त करता है॥४॥

सदा॑सि र॒ण्वो यव॑सेव॒ पुष्य॑ते॒ होत्रा॑भिरग्ने॒ मनु॑षः स्वध्व॒रः। विप्र॑स्य वा॒ यच्छ॑शमा॒न उ॒क्थ्यं१॒॑ वाजं॑ सस॒वाँ उ॑प॒यासि॒ भूरि॑भिः॥

जैसे बुभुक्षित पशु के लिए घास रमणीय-प्रिय-प्यारा होता है, ऐसे ही आस्तिक मनवाले के लिये वेदवाणियों द्वारा तू प्रिय है। परमात्मा स्तुति करनेवालों का व राजसूय यज्ञ का आधार है। स्वात्मसमपर्ण द्वारा तृप्त करनेवाले स्तुतिवचनों को वह पसन्द करता है और अनेक प्रकार से उपासकों की रक्षा करता है॥४॥

उदी॑रय पि॒तरा॑ जा॒र आ भग॒मिय॑क्षति हर्य॒तो हृ॒त्त इ॑ष्यति। विव॑क्ति॒ वह्निः॑ स्वप॒स्यते॑ म॒खस्त॑वि॒ष्यते॒ असु॑रो॒ वेप॑ते म॒ती॥

आस्तिक मनवाले तथा प्रजापालक राजा के अध्यात्मयज्ञ और राजसूय को परमात्मा समृद्ध करता है, उसके पास से दुर्भाव मिट जाता है, दुष्ट अत्याचारी भी नष्ट हो जाता है॥६॥

यस्ते॑ अग्ने सुम॒तिं मर्तो॒ अक्ष॒त्सह॑सः सूनो॒ अति॒ स प्र शृ॑ण्वे। इषं॒ दधा॑नो॒ वह॑मानो॒ अश्वै॒रा स द्यु॒माँ अम॑वान्भूषति॒ द्यून्॥

जो मनुष्य परमात्मा की वेदवाणी को अपने अन्दर आचरित कर लेता है, वह तेजस्वी तथा अध्यात्मगुणों से सम्पन्न हो जाता है तथा वह कमनीय भोगों को प्राप्त करता हुआ प्रशस्त इन्द्रियोंवाला होकर अपने को भूषित करता है। इसी प्रकार राजा भी विद्युदादि वाहनों से युक्त होकर भूषित होता है॥७॥

यद॑ग्न ए॒षा समि॑ति॒र्भवा॑ति दे॒वी दे॒वेषु॑ यज॒ता य॑जत्र। रत्ना॑ च॒ यद्वि॒भजा॑सि स्वधावो भा॒गं नो॒ अत्र॒ वसु॑मन्तं वीतात्॥

यह सङ्गमनीय परमात्मा की समागम धारा इन्द्रियों में आ जाती है, तो आस्तिक मनस्वी को रमणीय सुख प्राप्त हो जाते हैं। मोक्ष में बसानेवाला धन भी मिल जाता है, ऐसे सङ्गमनीय परमात्मा की समागमप्रतीति राष्ट्र के विद्वानों में पहुँच जाती है, तो राजा को रत्न और अन्न प्रचुर प्राप्त होता है॥८॥

श्रु॒धी नो॑ अग्ने॒ सद॑ने स॒धस्थे॑ यु॒क्ष्वा रथ॑म॒मृत॑स्य द्रवि॒त्नुम्। आ नो॑ वह॒ रोद॑सी दे॒वपु॑त्रे॒ माकि॑र्दे॒वाना॒मप॑ भूरि॒ह स्याः॑॥

आस्तिक मनवाले उपासक जन की प्रार्थना को परमात्मा सुनता-स्वीकार करता है। जब कोई हदय में श्रद्धा और ध्यान द्वारा परमात्मा का स्मरण करता है, वह अभ्युदय और निःश्रेयस को प्राप्त करता है, कोई भी आस्तिक मनवाला अभ्युदय निःश्रेयस से वञ्चित नहीं रहता है॥९॥

द्यावा॑ ह॒ क्षामा॑ प्रथ॒मे ऋ॒तेना॑भिश्रा॒वे भ॑वतः सत्य॒वाचा॑। दे॒वो यन्मर्ता॑न्य॒जथा॑य कृ॒ण्वन्त्सीद॒द्धोता॑ प्र॒त्यङ्स्वमसुं॒ यन्॥

आरम्भसृष्टि के प्रकृष्ट माता-पिताओं को ज्ञान और सत्यवाणी द्वारा घोषित कराने के निमित्त परमात्मा उनके हृदय में बैठ अध्यात्म-यज्ञ कराता है तथा श्रेष्ठ राजा राणी को राजसूय कराने के निमित्त विद्वान् पुरोहित अपनाकर वेदि पर बैठता है॥१॥

दे॒वो दे॒वान्प॑रि॒भूॠ॒तेन॒ वहा॑ नो ह॒व्यं प्र॑थ॒मश्चि॑कि॒त्वान्। धू॒मके॑तुः स॒मिधा॒ भाऋ॑जीको म॒न्द्रो होता॒ नित्यो॑ वा॒चा यजी॑यान्॥

परमात्मा आरम्भ-सृष्टि में आदिविद्वानों पर कृपा से परिभूत होता है, उनकी प्रार्थना सुनता-स्वीकार करता है, अज्ञानों को दूर करता है, अपनी प्रसिद्ध दीप्ति होने से चेताता है और उन्हें श्रेष्ठ मार्ग पर चलाता है, नित्य अपनानेवाला है। राजा भी राज्यप्रधान पुरुषों को शासित करे, उनके प्रार्थनीय कथन को सुने, अपने ज्ञानप्रकाश से सावधान कर उनकी सत्याचरणशीलता से उनका शरण्य बने॥२॥

स्वावृ॑ग्दे॒वस्या॒मृतं॒ यदी॒ गोरतो॑ जा॒तासो॑ धारयन्त उ॒र्वी। विश्वे॑ दे॒वा अनु॒ तत्ते॒ यजु॑र्गुर्दु॒हे यदेनी॑ दि॒व्यं घृ॒तं वाः॥

सर्वत्र व्याप्त परमात्मा के अपने निजी अनश्वर सुख को जीवन्मुक्त धारण करते हैं। उन्हें ऐसा लगता है, जैसे नदी दिव्य जल रिसा रही है। उसे पाकर वे उसका गान स्तवन करते हैं॥३॥

अर्चा॑मि वां॒ वर्धा॒यापो॑ घृतस्नू॒ द्यावा॑भूमी शृणु॒तं रो॑दसी मे। अहा॒ यद्द्यावोऽसु॑नीति॒मय॒न्मध्वा॑ नो॒ अत्र॑ पि॒तरा॑ शिशीताम्॥

माता-पिता बालक को संरक्षण, पोषण, स्नेह से पालते हैं, परमात्मा भी माता-पिता के समान या सूर्य पृथिवी के समान प्रकाश और स्निग्ध रस-दूध पिलाता है। दिन रात का विभागकर्ता वही परमात्मा है॥४॥

किं स्वि॑न्नो॒ राजा॑ जगृहे॒ कद॒स्याति॑ व्र॒तं च॑कृमा॒ को वि वे॑द। मि॒त्रश्चि॒द्धि ष्मा॑ जुहुरा॒णो दे॒वाञ्छ्लोको॒ न या॒तामपि॒ वाजो॒ अस्ति॑॥

परमात्मा को कौन सा स्तुतिवचन स्वीकार होता है तथा उसके किस कर्मशासन आदेश-उपदेश का आचरण या पालन करना चाहिए, यह तो उपासक धीर मुमुक्षु जान सकता है। वह ऐसे मुमुक्षु उपासक का बुलाने स्मरण करने योग्य मित्र है, स्तुति को सुननेवाला, स्तुति सुनने में समर्थ, अमृत भोग देनेवाला उन्हें प्राप्त हो जाता है॥५॥

दु॒र्मन्त्वत्रा॒मृत॑स्य॒ नाम॒ सल॑क्ष्मा॒ यद्विषु॑रूपा॒ भवा॑ति। य॒मस्य॒ यो म॒नव॑ते सु॒मन्त्वग्ने॒ तमृ॑ष्व पा॒ह्यप्र॑युच्छन्॥

उपासक जब इसी जन्म में अपनी मानवी बुद्धि को दैवी बुद्धि सुसूक्ष्मा बनाकर अमृतस्वरूप परमात्मा के लोकप्रसिद्ध तथा गुह्यस्वरूप को जान लेता है, तो उसकी परमात्मा रक्षा करता है॥६॥

यस्मि॑न्दे॒वा वि॒दथे॑ मा॒दय॑न्ते वि॒वस्व॑तः॒ सद॑ने धा॒रय॑न्ते। सूर्ये॒ ज्योति॒रद॑धुर्मा॒स्य१॒॑क्तून्परि॑ द्योत॒निं च॑रतो॒ अज॑स्रा॥

परमात्मा में मुमुक्षुजन आनन्द प्राप्त करते हैं, उसे अपने हृदय में धारण करते हैं। वह सूर्य में प्रकाश चन्द्रमा में अन्धकार एवं चमकनेवाले तारों को आश्रित करता है। सूर्य और चन्द्रमा निरन्तर परमात्मा के आश्रय में रहते हैं। इसी तरह परमात्मा द्वारा उपासक हृदय में प्रकाश तेज और मन में शान्ति प्राप्त करता है, ज्ञानविकास करता है॥७॥

यस्मि॑न्दे॒वा मन्म॑नि सं॒चर॑न्त्यपी॒च्ये॒३॒॑ न व॒यम॑स्य विद्म। मि॒त्रो नो॒ अत्रादि॑ति॒रना॑गान्त्सवि॒ता दे॒वो वरु॑णाय वोचत्॥

मुमुक्षु आत्माएँ मननीय स्तुति करने योग्य हृदयस्थित परमात्मा में समागम करते हैं। साधारण जन उसे नहीं जान पाते हैं। इसी जन्म में वह कर्मार्थ प्रेरक सखा अविनाशी माता, उत्पादक पिता, ज्ञानदाता गुरु, मोक्षार्थ वरनेवाला बन्धु हम पापरहितों पुण्यात्माओं को बुलाता है, कल्याणवचन सुनाता है॥८॥

श्रु॒धी नो॑ अग्ने॒ सद॑ने स॒धस्थे॑ यु॒क्ष्वा रथ॑म॒मृत॑स्य द्रवि॒त्नुम्। आ नो॑ वह॒ रोद॑सी दे॒वपु॑त्रे॒ माकि॑र्दे॒वाना॒मप॑ भूरि॒ह स्याः॑॥

यु॒जे वां॒ ब्रह्म॑ पू॒र्व्यं नमो॑भि॒र्वि श्लोक॑ एतु प॒थ्ये॑व सू॒रेः। शृ॒ण्वन्तु॒ विश्वे॑ अ॒मृत॑स्य पु॒त्रा आ ये धामा॑नि दि॒व्यानि॑ त॒स्थुः॥

गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करनेवाले वर-वधुओं का विवाह पुरोहित द्वारा वेदमन्त्रों को वेदि पर बैठे हुए समस्त जन सुनें, मानो विवाह के साक्षी बनें॥१॥

य॒मे इ॑व॒ यत॑माने॒ यदैतं॒ प्र वां॑ भर॒न्मानु॑षा देव॒यन्तः॑। आ सी॑दतं॒ स्वमु॑ लो॒कं विदा॑ने स्वास॒स्थे भ॑वत॒मिन्द॑वे नः॥

विवाह को चुकने पर गृहस्थ बन्धन में जब स्त्री-पुरुष बँध जावें, तो आस्तिक जन उनका अनुमोदन करें और वे अपने घर में गृहस्थ को चलाने के लिए जैसे द्युलोक पृथिवीलोक संसार को चलाते हैं, ऐसे अपने को समझकर स्थिर रहें। इस प्रकार अन्य गृहस्थ आश्रमियों की भाँति यज्ञादि श्रेष्ठकर्म करते रहें॥२॥ 

पञ्च॑ प॒दानि॑ रु॒पो अन्व॑रोहं॒ चतु॑ष्पदी॒मन्वे॑मि व्र॒तेन॑। अ॒क्षरे॑ण॒ प्रति॑ मिम ए॒तामृ॒तस्य॒ नाभा॒वधि॒ सं पु॑नामि॥

मानव को गृहस्थ आश्रम पूरा करने के पश्चात् वैराग्यवान्-वानप्रस्थ होकर पाँच कोशों का अनुभव करना चाहिए तथा जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति और तुरीय अवस्थाओं में भी चलते हुए योगाभ्यास के द्वारा ‘ओ३म्’ अविनाशी ब्रह्म के साथ अपनी सङ्गतिरूप अध्यात्मयज्ञ के अन्दर अपने को पवित्र करना चाहिए॥३॥

दे॒वेभ्यः॒ कम॑वृणीत मृ॒त्युं प्र॒जायै॒ कम॒मृतं॒ नावृ॑णीत। बृह॒स्पतिं॑ य॒ज्ञम॑कृण्वत॒ ऋषिं॑ प्रि॒यां य॒मस्त॒न्वं१॒॑ प्रारि॑रेचीत्॥

सर्वज्ञ अन्तर्यामी परमात्मा उपासना करते हुए मुमुक्षुओं के लिये जरा के अनन्तर ही मृत्यु को करता है, मध्य में नहीं और उनसे भिन्न नास्तिक जनों की देह को काल प्राणों से रिक्त कर देता है, उनको अमृत की प्राप्ति नहीं होती॥४॥

स॒प्त क्ष॑रन्ति॒ शिश॑वे म॒रुत्व॑ते पि॒त्रे पु॒त्रासो॒ अप्य॑वीवतन्नृ॒तम्। उ॒भे इद॑स्यो॒भय॑स्य राजत उ॒भे य॑तेते उ॒भय॑स्य पुष्यतः॥

आत्मा जब शरीर धारण करके संसार में प्राणवान् होता है, तब प्राण इसके पुत्र के समान रक्षार्थ सञ्चार करते हैं और जीवनयज्ञ को आगे बढ़ाते हैं। इस जीवात्मा के दो रूपों मुमुक्षुरूप और बारम्बार जन्म लेनेवाले मनुष्यरूप का बृहस्पति और यम स्वामित्व करते हैं और मुक्ति तथा बारम्बार जन्म देकर भुक्ति-भोग फल देते हैं॥५॥

प॒रे॒यि॒वांसं॑ प्र॒वतो॑ म॒हीरनु॑ ब॒हुभ्यः॒ पन्था॑मनुपस्पशा॒नम्। वै॒व॒स्व॒तं सं॒गम॑नं॒ जना॑नां य॒मं राजा॑नं ह॒विषा॑ दुवस्य॥

विश्वकाल संसार के सब पदार्थों को व्याप्त और प्राप्त है। वही सबकी उत्पत्ति, स्थिति और नाश का निमित्त है। उस सूर्यपुत्र को आयुवर्धक पदार्थों के होम द्वारा स्वानुकूल बनाना चाहिए॥१॥

य॒मो नो॑ गा॒तुं प्र॑थ॒मो वि॑वेद॒ नैषा गव्यू॑ति॒रप॑भर्त॒वा उ॑। यत्रा॑ नः॒ पूर्वे॑ पि॒तरः॑ परे॒युरे॒ना ज॑ज्ञा॒नाः प॒थ्या॒३॒॑ अनु॒ स्वाः॥

प्रत्येक प्राणी के गर्भकाल ने ही जीवन की गति को आरम्भ कर दिया है। यावत् शरीरपात हो यह जीवनगति चलती रहती है। उस काल के अधीन होकर जनक आदि भी यात्रा करते हैं, अपितु संसार के सभी जड़-चेतन पदार्थ अपनी-अपनी प्रकृति, योनि किंवा कर्मानुसार परिणाम और पुष्प-फलादि को प्राप्त करते हैं। इस प्रकार यह यात्रा सबके लिए अवश्यम्भावी है॥२॥

मात॑ली क॒व्यैर्य॒मो अङ्गि॑रोभि॒र्बृह॒स्पति॒ॠक्व॑भिर्वावृधा॒नः। याँश्च॑ दे॒वा वा॑वृ॒धुर्ये च॑ दे॒वान्त्स्वाहा॒न्ये स्व॒धया॒न्ये म॑दन्ति॥

मनुष्यों को चाहिए कि अपने व्यक्तिगत जीवन की उन्नति के लिए निज जीवनाग्नि, जीवनकाल और जीवनप्राण को उत्तममोत्तम भोजनों के सेवन से उपयुक्त बनावें तथा समाज वा सर्वप्राणियों के हितार्थ अग्निहोत्र से भौतिक अग्नि, सामष्टिक काल और मेघमण्डल को उपयुक्त करते रहें॥३॥‘मातलिरिन्द्रस्य सारथिस्तद्वानिन्द्रो मातली’ (सायण) यहाँ ‘मातलि इन्द्र का सारथि और उस सारथि से युक्त मातली इन्द्र है’ यह तथा मातली का इन्द्र अर्थ करना सर्वथा अनुपपन्न है, क्योंकि प्रथम तो मातली इन्द्र का सारथि हो, इसके लिए निरुक्तादि वैदिक साहित्य में स्थान नहीं, दूसरे इकारान्त शब्द से मत्वर्थीय इन् प्रत्यय हो ही नहीं सकता, उसका विधान अकारान्त से है। इसलिये मातली का इन्द्र अर्थ करना अनुचित है॥

इ॒मं य॑म प्रस्त॒रमा हि सीदाङ्गि॑रोभिः पि॒तृभिः॑ संविदा॒नः। आ त्वा॒ मन्त्राः॑ कविश॒स्ता व॑हन्त्वे॒ना रा॑जन्ह॒विषा॑ मादयस्व॥

प्राणशक्ति के अभ्यास और वैद्यक सिद्धान्तों के अनुसार खानपान हवनादि क्रियाओं से मनुष्य दीर्घजीवी और सुखी हो सकता है॥४॥

अङ्गि॑रोभि॒रा ग॑हि य॒ज्ञिये॑भि॒र्यम॑ वैरू॒पैरि॒ह मा॑दयस्व। विव॑स्वन्तं हुवे॒ यः पि॒ता ते॒ऽस्मिन्य॒ज्ञे ब॒र्हिष्या नि॒षद्य॑॥

भिन्न-भिन्न पर्व दिवसों में जबकि सूर्यरश्मियाँ भी यज्ञ में संयुक्त हों, ऐसे स्थान पर पार्वण यज्ञ समयानुकूल बनाने के लिए करने चाहिये॥५॥

अङ्गि॑रसो नः पि॒तरो॒ नव॑ग्वा॒ अथ॑र्वाणो॒ भृग॑वः सो॒म्यासः॑। तेषां॑ व॒यं सु॑म॒तौ य॒ज्ञिया॑ना॒मपि॑ भ॒द्रे सौ॑मन॒से स्या॑म॥

प्रेहि॒ प्रेहि॑ प॒थिभिः॑ पू॒र्व्येभि॒र्यत्रा॑ नः॒ पूर्वे॑ पि॒तरः॑ परे॒युः। उ॒भा राजा॑ना स्व॒धया॒ मद॑न्ता य॒मं प॑श्यासि॒ वरु॑णं च दे॒वम्॥

जीव का आयु को पूर्ण करके मृत्युरूप अन्तकाल और फिर पुनर्जन्म के लिये मेघ के सूक्ष्म जलरूप वरुण का प्राप्त करना अनिवार्य है। अतः जीवन की अस्थिरता को ध्यान में रखते हुए उत्तम कर्ममार्गों पर चलना चाहिये॥७॥

सं ग॑च्छस्व पि॒तृभिः॒ सं य॒मेने॑ष्टापू॒र्तेन॑ पर॒मे व्यो॑मन्। हि॒त्वाया॑व॒द्यं पुन॒रस्त॒मेहि॒ सं ग॑च्छस्व त॒न्वा॑ सु॒वर्चाः॑॥

प्रत्येक जीव वर्तमान देहपात के अनन्तर पुनः प्राणों और जीवनकाल से सङ्गत होता है और कर्मों के अनुसार पुनः नूतन नाड़ी आदि से युक्त शरीर को धारण करता है॥८॥

अपे॑त॒ वी॑त॒ वि च॑ सर्प॒तातो॒ऽस्मा ए॒तं पि॒तरो॑ लो॒कम॑क्रन्। अहो॑भिर॒द्भिर॒क्तुभि॒र्व्य॑क्तं य॒मो द॑दात्यव॒सान॑मस्मै॥

शरीरपात हो जाने के पश्चात् जीव सूर्य की पृथिवीसम्बन्धी रश्मियों को प्राप्त होता है, पुनः अन्तरिक्षसम्बन्धी किरणों को और पश्चात् द्युस्थान के गमन-क्रम से संबन्ध रखता है, इस प्रकार पुनर्जन्मप्राप्ति के लिये स्थिर करता है॥९॥

अति॑ द्रव सारमे॒यौ श्वानौ॑ चतुर॒क्षौ श॒बलौ॑ सा॒धुना॑ प॒था। अथा॑ पि॒तॄन्त्सु॑वि॒दत्राँ॒ उपे॑हि य॒मेन॒ ये स॑ध॒मादं॒ मद॑न्ति॥

देहान्त के पश्चात् जीव शीघ्र-शीघ्र दिन रातों को सूर्यरश्मियों द्वारा पुनर्जन्मार्थ प्राप्त होता है॥१०॥

यौ ते॒ श्वानौ॑ यम रक्षि॒तारौ॑ चतुर॒क्षौ प॑थि॒रक्षी॑ नृ॒चक्ष॑सौ। ताभ्या॑मेनं॒ परि॑ देहि राजन्त्स्व॒स्ति चा॑स्मा अनमी॒वं च॑ धेहि॥

जीव का जीवनसमय समाप्त हो जाने पर फिर से नया जीवन मिलता है, जो कि शुद्ध और स्वस्थ होकर दिन-रात के साथ पुनर्वहन करता है॥११॥

उ॒रू॒ण॒साव॑सु॒तृपा॑ उदुम्ब॒लौ य॒मस्य॑ दू॒तौ च॑रतो॒ जनाँ॒ अनु॑। ताव॒स्मभ्यं॑ दृ॒शये॒ सूर्या॑य॒ पुन॑र्दाता॒मसु॑म॒द्येह भ॒द्रम्॥

दिन और रात आयुरूप जीवनकाल के दूत बन कर बारम्बार सूर्यदर्शन कराते हुए जीव को अन्तिम काल तक ले जाते हैं एवं पुनर्जन्म भी धारण कराते हैं॥१२॥

य॒माय॒ सोमं॑ सुनुत य॒माय॑ जुहुता ह॒विः। य॒मं ह॑ य॒ज्ञो ग॑च्छत्य॒ग्निदू॑तो॒ अरं॑कृतः॥

आयुर्वैदिक ढंग से ओषधिरस का होम जीवन को चिरकालीन बनाने का हेतु है॥१३॥

य॒माय॑ घृ॒तव॑द्ध॒विर्जु॒होत॒ प्र च॑ तिष्ठत। स नो॑ दे॒वेष्वा य॑मद्दी॒र्घमायुः॒ प्र जी॒वसे॑॥

हव्य वस्तुओं में घृत मिलाकर या घृत के साथ हवन करने से इन्द्रिय-शक्तियाँ चिरस्थायी रहती हैं॥१४॥

य॒माय॒ मधु॑मत्तमं॒ राज्ञे॑ ह॒व्यं जु॑होतन। इ॒दं नम॒ ऋषि॑भ्यः पूर्व॒जेभ्यः॒ पूर्वे॑भ्यः पथि॒कृद्भ्यः॑॥

समय को उपयोगी बनाने के लिये मधु या मिष्ट वस्तु से युक्त हवि का होम करना चाहिये। इस प्रकार सोमादि ओषधि का रस घृत और मधु से मिश्रित हवियों का हवन करना आदि उत्तम कर्म पुराने ऋषियों के लिये शिष्टाचार का अनुष्ठान भी समझना चाहिये॥१५॥

त्रिक॑द्रुकेभिः पतति॒ षळु॒र्वीरेक॒मिद्बृ॒हत्। त्रि॒ष्टुब्गा॑य॒त्री छन्दां॑सि॒ सर्वा॒ ता य॒म आहि॑ता॥

काल ‘भूत वर्तमान भविष्यत्’ रूप तीनों चक्रों द्वारा छः ऋतुओं में विभक्त हो जाता है। न केवल प्राणियों के लिये ही यह काल यमन करनेवाला है, अपितु पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्यौ एवं तीनों लोकों अर्थात् सम्पूर्ण भुवन समय के नियन्त्रण में रहता है, अत एव समय का परिज्ञान और उस के उचित लाभ उठाना चाहिये॥१६॥

उदी॑रता॒मव॑र॒ उत्परा॑स॒ उन्म॑ध्य॒माः पि॒तरः॑ सो॒म्यासः॑। असुं॒ य ई॒युर॑वृ॒का ऋ॑त॒ज्ञास्ते नो॑ऽवन्तु पि॒तरो॒ हवे॑षु॥

यज्ञ के योग से सूर्य की रश्मियाँ जड़-चेतन प्राणीमात्र के जीवनरस को उन्नत करनेवाली बनती हैं। अत एव यज्ञ के उपयोग-ज्ञान से उन रश्मियों को अपने जीवन के लिये उन्नायक बनावें॥१॥

इ॒दं पि॒तृभ्यो॒ नमो॑ अस्त्व॒द्य ये पूर्वा॑सो॒ य उप॑रास ई॒युः। ये पार्थि॑वे॒ रज॒स्या निष॑त्ता॒ ये वा॑ नू॒नं सु॑वृ॒जना॑सु वि॒क्षु॥

सूर्य के पूर्व पश्चिम रूप उदयास्त मार्ग से प्राप्त किरणों तथा पृथिवी के अन्दर पार्थिव वस्तुओं और आकाशस्थ पदार्थों से प्राप्त रश्मियों को यज्ञक्रिया से उपयोगी बनाना चाहिये॥२॥

आहं पि॒तॄन्त्सु॑वि॒दत्राँ॑ अवित्सि॒ नपा॑तं च वि॒क्रम॑णं च॒ विष्णोः॑। ब॒र्हि॒षदो॒ ये स्व॒धया॑ सु॒तस्य॒ भज॑न्त पि॒त्वस्त इ॒हाग॑मिष्ठाः॥

यज्ञक्रिया का फल बहुत दूर तक व्यापता है और उस यज्ञ का अनुष्ठान परिचित शुभविद्यासम्पन्न विद्वानों के द्वारा करना चाहिये। पुनः उन विद्वानों को उनकी इच्छानुसार भोजन खिलाना चाहिये॥३॥

बर्हि॑षदः पितर ऊ॒त्य१॒॑र्वागि॒मा वो॑ ह॒व्या च॑कृमा जु॒षध्व॑म्। त आ ग॒ताव॑सा॒ शंत॑मे॒नाथा॑ नः॒ शं योर॑र॒पो द॑धात॥

यज्ञ में विद्वानों को निमन्त्रित करके उनसे अपनी रोगनिवृत्ति और आपत्तियों से बचने के लिये कुछ न कुछ ज्ञान प्राप्त करना चाहिये॥४॥

उप॑हूताः पि॒तरः॑ सो॒म्यासो॑ बर्हि॒ष्ये॑षु नि॒धिषु॑ प्रि॒येषु॑। त आ ग॑मन्तु॒ त इ॒ह श्रु॑व॒न्त्वधि॑ ब्रुवन्तु॒ ते॑ऽवन्त्व॒स्मान्॥

यज्ञ में क्रियाकुशल विद्वानों को निमन्त्रित करना तथा उनसे अपने विविध प्रश्नों का समाधान और उपदेश सुनना चाहिये और सत्कारार्थ इच्छानुकूल गौ आदि पदार्थ दक्षिणा में देने चाहियें॥५॥

आच्या॒ जानु॑ दक्षिण॒तो नि॒षद्ये॒मं य॒ज्ञम॒भि गृ॑णीत॒ विश्वे॑। मा हिं॑सिष्ट पितरः॒ केन॑ चिन्नो॒ यद्व॒ आगः॑ पुरु॒षता॒ करा॑म॥

विद्वानों को दक्षिणभाग में आसन पर बिठलाकर यज्ञ का आरम्भ करना चाहिये। अपनी भूल के सम्भव होने से उनसे नम्रतापूर्वक गलती को स्वीकार करना चाहिये॥६॥

आसी॑नासो अरु॒णीना॑मु॒पस्थे॑ र॒यिं ध॑त्त दा॒शुषे॒ मर्त्या॑य। पु॒त्रेभ्यः॑ पितर॒स्तस्य॒ वस्वः॒ प्र य॑च्छत॒ त इ॒होर्जं॑ दधात॥

यज्ञ सेवन करनेवाले मनुष्य तथा उनकी सन्तति में जीवनरस बल और प्राणशक्तियों का सूर्य की रश्मियाँ वास कराती हैं॥७॥

ये नः॒ पूर्वे॑ पि॒तरः॑ सो॒म्यासो॑ऽनूहि॒रे सो॑मपी॒थं वसि॑ष्ठाः। तेभि॑र्य॒मः सं॑ररा॒णो ह॒वींष्यु॒शन्नु॒शद्भिः॑ प्रतिका॒मम॑त्तु॥

प्रातःकाल की सूर्यरश्मियाँ यज्ञ में उपयुक्त हुई-हुई हमारे अन्दर कार्य-कुशलता की प्रेरणा करती हैं और उदयकाल का सूर्य भी हमारी मानस प्रसन्नता और शारीरिक सुखजीवनी का हेतु बनता है॥८॥

ये ता॑तृ॒षुर्दे॑व॒त्रा जेह॑माना होत्रा॒विदः॒ स्तोम॑तष्टासो अ॒र्कैः। आग्ने॑ याहि सुवि॒दत्रे॑भिर॒र्वाङ्स॒त्यैः क॒व्यैः पि॒तृभि॑र्घर्म॒सद्भिः॑॥

मध्याह्नकाल में सूर्य की किरणें प्राणियों के अङ्ग-अङ्ग में घुस जाती हैं और प्राणों का शोधन करती हैं। इनका विज्ञान के द्वारा उपयोग होना चाहिये॥९॥

ये स॒त्यासो॑ हवि॒रदो॑ हवि॒ष्पा इन्द्रे॑ण दे॒वैः स॒रथं॒ दधा॑नाः। आग्ने॑ याहि स॒हस्रं॑ देवव॒न्दैः परैः॒ पूर्वैः॑ पि॒तृभि॑र्घर्म॒सद्भिः॑॥

जो सूर्य की किरणें जल का भक्षण या शोषण करती हुई हों, उनके प्रकाश से किन्हीं दिव्य बातों का परिचय लेना चाहिये॥१०॥

अग्नि॑ष्वात्ताः पितर॒ एह ग॑च्छत॒ सदः॑सदः सदत सुप्रणीतयः। अ॒त्ता ह॒वींषि॒ प्रय॑तानि ब॒र्हिष्यथा॑ र॒यिं सर्व॑वीरं दधातन॥

सूर्य की रश्मियाँ यज्ञ के संपर्क से सुगन्धगुणयुक्त होकर यज्ञमण्डल के घर-घर में प्रवेश करती हैं और लाभप्रद होती हैं॥११॥

त्वम॑ग्न ईळि॒तो जा॑तवे॒दोऽवा॑ड्ढ॒व्यानि॑ सुर॒भीणि॑ कृ॒त्वी। प्रादाः॑ पि॒तृभ्यः॑ स्व॒धया॒ ते अ॑क्षन्न॒द्धि त्वं दे॑व॒ प्रय॑ता ह॒वींषि॑॥

अग्नि में हव्य वस्तु अति सुगन्ध को प्राप्त होती है और पुनः अग्नि में सूक्ष्म होकर किरणों के आधार पर और भी सूक्ष्म बन कर फैल जाती है॥१२॥

ये चे॒ह पि॒तरो॒ ये च॒ नेह याँश्च॑ वि॒द्म याँ उ॑ च॒ न प्र॑वि॒द्म। त्वं वे॑त्थ॒ यति॒ ते जा॑तवेदः स्व॒धाभि॑र्य॒ज्ञं सुकृ॑तं जुषस्व॥

अग्नि में किया हुआ यज्ञ अपने घर, दूसरे के घर तथा वर्तमान समय और दूसरे समय एवं विज्ञात और अविज्ञात सूर्य की किरणों को प्राप्त होता है॥१३॥

ये अ॑ग्निद॒ग्धा ये अन॑ग्निदग्धा॒ मध्ये॑ दि॒वः स्व॒धया॑ मा॒दय॑न्ते। तेभिः॑ स्व॒राळसु॑नीतिमे॒तां य॑थाव॒शं त॒न्वं॑ कल्पयस्व॥

उत्तरायण और दक्षिणायन के अन्त में होनेवाली वर्षा की कारणभूत सूर्यकिरणों को आकाश से सुवृष्टि के लिये यज्ञाग्नि प्रेरित करती है, जिस से जीवशरीर यथायोग्य प्राणशक्ति को धारण कर सकता है॥१४॥

मैन॑मग्ने॒ वि द॑हो॒ माभि शो॑चो॒ मास्य॒ त्वचं॑ चिक्षिपो॒ मा शरी॑रम्। य॒दा शृ॒तं कृ॒णवो॑ जातवे॒दोऽथे॑मेनं॒ प्र हि॑णुतात्पि॒तृभ्यः॑॥

शवदहन के लिये इतना इन्धन होना चाहिये कि जिससे शव कच्चा न रह जावे और बहुत इन्धन होने पर भी अग्नि इधर-उधर चारों तरफ जलकर ही न रह जावे, इसके लिये ठोस इन्धन का प्रयोग करना चाहिये तथा अङ्ग-अङ्ग चटक-चटक कर इधर-उधर न उड़ जावें या गिर जावें, ऐसे न चटकानेवाले इन्धन से शव को जलाना चाहिये, जिससे अग्नि के द्वारा शव सूक्ष्म होकर सूर्यकिरणों में प्राप्त हो सके॥१॥

शृ॒तं य॒दा कर॑सि जातवे॒दोऽथे॑मेनं॒ परि॑ दत्तात्पि॒तृभ्यः॑। य॒दा गच्छा॒त्यसु॑नीतिमे॒तामथा॑ दे॒वानां॑ वश॒नीर्भ॑वाति॥

आत्मा के वियुक्त होते ही यह शरीर पृथिवी आदि भूतों में मिलने लगता है। अग्नि में जलने से सूर्य की रश्मियाँ इस का उक्त छेदन-भेदन जल्दी कर देती हैं॥२॥

सूर्यं॒ चक्षु॑र्गच्छतु॒ वात॑मा॒त्मा द्यां च॑ गच्छ पृथि॒वीं च॒ धर्म॑णा। अ॒पो वा॑ गच्छ॒ यदि॒ तत्र॑ ते हि॒तमोष॑धीषु॒ प्रति॑ तिष्ठा॒ शरी॑रैः॥

देहपात के अनन्तर देह तो अपने-अपने कारण पदार्थों में लीन हो जाता है और जीव स्वकर्मानुसार प्रकाशमय, जलमय, पृथिवीमय लोकों तथा वृक्षादि की जड़योनियों तक प्राप्त होता है॥३॥

अ॒जो भा॒गस्तप॑सा॒ तं त॑पस्व॒ तं ते॑ शो॒चिस्त॑पतु॒ तं ते॑ अ॒र्चिः। यास्ते॑ शि॒वास्त॒न्वो॑ जातवेद॒स्ताभि॑र्वहैनं सु॒कृता॑मु लो॒कम्॥

देहान्त के साथ ही अग्नितत्त्व जो सब जगह तेजोरूप से वर्तमान है, वह पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युस्थान के क्रम से ले जाता है॥४॥

अव॑ सृज॒ पुन॑रग्ने पि॒तृभ्यो॒ यस्त॒ आहु॑त॒श्चर॑ति स्व॒धाभिः॑। आयु॒र्वसा॑न॒ उप॑ वेतु॒ शेषः॒ सं ग॑च्छतां त॒न्वा॑ जातवेदः॥

देहान्त के पश्चात् मृत पुरुष के दो परिणाम अग्नि द्वारा होते हैं। एक शवाग्नि से शवदहन होकर उसके सूक्ष्म कण सूर्यरश्मियों को प्राप्त होते हैं। दूसरे सर्वत्र विद्यमान सूक्ष्माग्नि तेज देहान्त के साथ ही जीव को पुनर्जन्म में जाने के लिये प्रेरक बनता है॥५॥

यत्ते॑ कृ॒ष्णः श॑कु॒न आ॑तु॒तोद॑ पिपी॒लः स॒र्प उ॒त वा॒ श्वाप॑दः। अ॒ग्निष्टद्वि॒श्वाद॑ग॒दं कृ॑णोतु॒ सोम॑श्च॒ यो ब्रा॑ह्म॒णाँ आ॑वि॒वेश॑॥

अग्नि और सोम विश्वभैषज और सर्वभयनिवारक पदार्थ हैं। यह एक आयुर्वेदिक और रक्षाविज्ञान का सिद्धान्त वर्णित है। मनुष्य-जीवन में भयानक पक्षी, कृमि, सर्प और व्याघ्रादि प्राणियों से प्राप्त भय और पीड़ा का निवारण अग्नि और सोम से करना चाहिये। तथा उक्त जन्तुओं से आक्रमित मरे हुये मनुष्य का अग्नि सोम द्वारा शवदहन करने से रोगसंक्रामक कारणों का प्रतिकार हो जाता है, क्योंकि ऐसा किये बिना अन्य प्राणी उनके विषसम्पर्क आदि से बच न सकेंगे॥६॥

अ॒ग्नेर्वर्म॒ परि॒ गोभि॑र्व्ययस्व॒ सं प्रोर्णु॑ष्व॒ पीव॑सा॒ मेद॑सा च। नेत्त्वा॑ धृ॒ष्णुर्हर॑सा॒ जर्हृ॑षाणो द॒धृग्वि॑ध॒क्ष्यन्प॑र्य॒ङ्खया॑ते॥

शवदहनवेदि का परिमाण इतना होना चाहिये कि मृत शरीर सुगमता से पूरा आ जावे और उसके प्रत्येक नस, नाड़ी, मांस, चर्बी आदि अंशों में अग्नि का प्रवेश भली प्रकार हो सके। शवदहन करनेवालों को यह ध्यान रखना चाहिये कि चिता में अग्नि इस प्रकार जलाई जावे कि वह अतितीक्ष्ण और बलवान् होकर विपरीतता से जलाती हुई शवाङ्गों को इधर-उधर न फेंक दे॥७॥

इ॒मम॑ग्ने चम॒सं मा वि जि॑ह्वरः प्रि॒यो दे॒वाना॑मु॒त सो॒म्याना॑म्। ए॒ष यश्च॑म॒सो दे॑व॒पान॒स्तस्मि॑न्दे॒वा अ॒मृता॑ मादयन्ते॥

शवगन्ध के प्रतिकारार्थ अन्त्येष्टि कर्म के समय अग्नि में घृत और सुगन्ध पदार्थों की आहुतियाँ देनी चाहियें। वे आहुतियाँ शवदोष का सम्पर्क हटाकर सूर्य तथा चन्द्रमा की किरणों को अनुकूलता की साधक बनाती हैं, विशेषतः सूर्यरश्मियों को सुखकारक बनाती हैं॥८॥

क्र॒व्याद॑म॒ग्निं प्र हि॑णोमि दू॒रं य॒मरा॑ज्ञो गच्छतु रिप्रवा॒हः। इ॒हैवायमित॑रो जा॒तवे॑दा दे॒वेभ्यो॑ ह॒व्यं व॑हतु प्रजा॒नन्॥

घृत और सुगन्ध कपूर आदि वस्तुओं की आहुति से शवदुर्गन्धवाहक अग्निज्वालाओं की शान्ति हो जाती है और सुगन्धित हव्यप्रसारक अग्निज्वालाओं का उदय होता है॥९॥

यो अ॒ग्निः क्र॒व्यात्प्र॑वि॒वेश॑ वो गृ॒हमि॒मं पश्य॒न्नित॑रं जा॒तवे॑दसम्। तं ह॑रामि पितृय॒ज्ञाय॑ दे॒वं स घ॒र्ममि॑न्वात्पर॒मे स॒धस्थे॑॥

चिताग्नि में दी हुई होमाहुति प्रेतहारों के भीतर घुसी शवगन्धाग्नि के सम्पर्क को हटाती है, जिससे उनके जीवन प्राण में खराबी नहीं आती, किन्तु सूक्ष्म होकर ऊपर आकाश में शवगन्ध छिन्न-भिन्न हो जाती है॥१०॥

यो अ॒ग्निः क्र॑व्य॒वाह॑नः पि॒तॄन्यक्ष॑दृता॒वृधः॑। प्रेदु॑ ह॒व्यानि॑ वोचति दे॒वेभ्य॑श्च पि॒तृभ्य॒ आ॥

शवाग्नि में घृतादि हव्य डालने से शवमांस के चटपटा शब्द को भी दबाकर हव्य की सरसर ध्वनि के साथ उक्त अग्नि देवयज्ञ और पितृयज्ञ के रूप को धारण कर लेती है॥११॥

उ॒शन्त॑स्त्वा॒ नि धी॑मह्यु॒शन्तः॒ समि॑धीमहि। उ॒शन्नु॑श॒त आ व॑ह पि॒तॄन्ह॒विषे॒ अत्त॑वे॥

संस्कारों और मङ्गलकार्यों में अग्निहोम करना चाहिये॥१२॥

यं त्वम॑ग्ने स॒मद॑ह॒स्तमु॒ निर्वा॑पया॒ पुनः॑। कि॒याम्ब्वत्र॑ रोहतु पाकदू॒र्वा व्य॑ल्कशा॥

शवाग्नि से दग्ध स्थान को प्रथम अग्नि से रहित करना चाहिए, पुनः उसमें इतना जलसिञ्चन करे, कि जिससे वहाँ अच्छी दूब घास उत्पन्न हो सके॥१३॥

शीति॑के॒ शीति॑कावति॒ ह्लादि॑के॒ ह्लादि॑कावति। म॒ण्डू॒क्या॒३॒॑ सु सं ग॑म इ॒मं स्व१॒॑ग्निं ह॑र्षय॥

शवाग्नि के पश्चात् उस भूमि का उपचार इस प्रकार होना चाहिये कि वहाँ ठण्डी-ठण्डी दूब और सुगन्धलता उगकर भूमि हरी-भरी और मेण्डकियों के साथ सुन्दर प्रतीत होने लगे एवं शवाग्नि के प्रभाव का कोई भी चिह्न न रहे॥१४॥

सूक्तम्

त्वष्टा॑ दुहि॒त्रे व॑ह॒तुं कृ॑णो॒तीती॒दं विश्वं॒ भुव॑नं॒ समे॑ति। य॒मस्य॑ मा॒ता प॑र्यु॒ह्यमा॑ना म॒हो जा॒या विव॑स्वतो ननाश॥

विश्वरचयिता परमात्मा विश्व को रचने के लिये प्रकृति को विस्तार देकर जगत् का निर्माण करता है; जो जगत् की निर्मात्री प्रकृति पूर्वरूप में नहीं रहती है, किन्तु जगद्रूप में आकर विलीन हो जाती है, इसी प्रकार सूर्य जब अपनी उषा को आगे करता है-फैलाता है, रात्रिरूप जाया उसके उदय होने पर विलीन हो जाती है॥१॥

अपा॑गूहन्न॒मृतां॒ मर्त्ये॑भ्यः कृ॒त्वी सव॑र्णामददु॒र्विव॑स्वते। उ॒ताश्विना॑वभर॒द्यत्तदासी॒दज॑हादु॒ द्वा मि॑थु॒ना स॑र॒ण्यूः॥

मनुष्यों के हितार्थ सूर्य की रश्मियों ने उषा को भी छिपा दिया या परमात्मा की शक्तियों ने प्रकृति को भी विलीन कर दिया। प्रकृति जड़ है उससे जड़ सृष्टि का विस्तार होता है-उषा प्रकाशवती है, उससे दिन का प्रकाश होता है। सृष्टि में वायु और विद्युत् प्रकट हो जाते हैं॥२॥

पू॒षा त्वे॒तश्च्या॑वयतु॒ प्र वि॒द्वानन॑ष्टपशु॒र्भुव॑नस्य गो॒पाः। स त्वै॒तेभ्यः॒ परि॑ ददत्पि॒तृभ्यो॒ऽग्निर्दे॒वेभ्यः॑ सुविद॒त्रिये॑भ्यः॥

१−सूर्य उत्पन्नमात्र प्राणियों का रक्षक है, उसकी रश्मियाँ नष्ट नहीं होतीं, वह रश्मियों के द्वारा प्रसिद्धरूप में जाना जाता है। म्रियमाण-मरते हुए प्राणी को इस देह से पृथक् कर देता है। परन्तु परमात्मा माता-पिताओं आदि के लिये पुनर्जन्मार्थ देता है और मुक्ति के पात्र उत्तम अधिकारी को मुक्तों में सौंप देता है॥२- प्राणी मात्र का पोषक रक्षक परमात्मा नित्य वर्तमान ज्ञानदृष्टि से देखनेवालों का स्वामी है, वह उन मुक्त जीवात्माओं के मध्य में प्रकृष्ट ज्ञानवान् अर्थात् सर्वज्ञ है। वह ही संसार के मातापिताओं में जीवात्मा को जन्मार्थ भेजता है और शोभन ऐश्वर्यवाले मुक्तों में भी मोक्षार्थ भेजता है॥३॥

आयु॑र्वि॒श्वायुः॒ परि॑ पासति त्वा पू॒षा त्वा॑ पातु॒ प्रप॑थे पु॒रस्ता॑त्। यत्रास॑ते सु॒कृतो॒ यत्र॒ ते य॒युस्तत्र॑ त्वा दे॒वः स॑वि॒ता द॑धातु॥

सब प्रकार की आयु देनेवाला स्वयं आयुरूप शरण परमात्मा उपासक या सत्पात्र आत्मा की रक्षा करता है। वह जीवनयात्रा के पथाग्र-मार्ग के मुख पर प्रथम ही रक्षण करता है, पुण्य आत्माओं को मोक्ष में पहुँचाता है॥४॥

पू॒षेमा आशा॒ अनु॑ वेद॒ सर्वाः॒ सो अ॒स्माँ अभ॑यतमेन नेषत्। स्व॒स्ति॒दा आघृ॑णिः॒ सर्व॑वी॒रोऽप्र॑युच्छन्पु॒र ए॑तु प्रजा॒नन्॥

परमात्मा हमारा पोषण करता है, वह सारी दिशाओं में वर्तमान प्राणी अप्राणी को जानता है। भयरहित मार्ग से उपासकों को जीवन-यात्रा कराता है, प्रसिद्ध ज्योति और समस्त बलों से युक्त हुआ बिना प्रमाद या उपेक्षा के हमें बोध देता है। हमें सबसे पूर्व उसकी उपासना करनी चाहिए॥५॥

प्रप॑थे प॒थाम॑जनिष्ट पू॒षा प्रप॑थे दि॒वः प्रप॑थे पृथि॒व्याः। उ॒भे अ॒भि प्रि॒यत॑मे स॒धस्थे॒ आ च॒ परा॑ च चरति प्रजा॒नन्॥

परमात्मा उपासकों को जीवनयात्रा के पथाग्र पर समर्थ बनाता है। मोक्षमार्ग में भी और संसार के मार्ग में भी जो सुख प्राप्त होता है, आत्मा वह परमात्मा की कृपा से अभ्युदय और निःश्रेयस को अनुभव करता है। संसार में संसार के सुखों का सेवन करता है और वैराग्य से उनको त्यागकर मोक्ष को प्राप्त करता है॥६॥

सर॑स्वतीं देव॒यन्तो॑ हवन्ते॒ सर॑स्वतीमध्व॒रे ता॒यमा॑ने। सर॑स्वतीं सु॒कृतो॑ अह्वयन्त॒ सर॑स्वती दा॒शुषे॒ वार्यं॑ दात्॥

स्तुतिवाणी के द्वारा पुण्यात्मा या मुमुक्षुजन अपना परमात्मा को समर्पण करके अभीष्ट मोक्ष पद को प्राप्त होते हैं॥७॥

सर॑स्वति॒ या स॒रथं॑ य॒याथ॑ स्व॒धाभि॑र्देवि पि॒तृभि॒र्मद॑न्ती। आ॒सद्या॒स्मिन्ब॒र्हिषि॑ मादयस्वानमी॒वा इष॒ आ धे॑ह्य॒स्मे॥

मानसिक भावनाओं के साथ जब परमात्मा की स्तुति अध्यात्मयज्ञ में की जाती है, तो वह हमें सब रोगों से अलग रखती हुई कमनीय भोगों को धारण कराती है॥८॥

सर॑स्वतीं॒ यां पि॒तरो॒ हव॑न्ते दक्षि॒णा य॒ज्ञम॑भि॒नक्ष॑माणाः। स॒ह॒स्रा॒र्घमि॒ळो अत्र॑ भा॒गं रा॒यस्पोषं॒ यज॑मानेषु धेहि॥

अध्यात्मयज्ञ को मनोभाव जब प्राप्त हो जाते हैं और आत्मसमर्पण परमात्मा के प्रति कर दिया जाता है, तो सहस्रगुणित सुखलाभ पोषण आत्मयाजी मुमुक्षु को मिलता है॥९॥

आपो॑ अ॒स्मान्मा॒तरः॑ शुन्धयन्तु घृ॒तेन॑ नो घृत॒प्वः॑ पुनन्तु। विश्वं॒ हि रि॒प्रं प्र॒वह॑न्ति दे॒वीरुदिदा॑भ्यः॒ शुचि॒रा पू॒त ए॑मि॥

जल अपने स्नेह से तथा आप्त विद्वान् अपने तेज-ज्ञान से हमें पवित्र किया करते हैं। उनसे यथोचित लाभ लेकर मानव निर्मल व निष्पाप हो जाते हैं और उन्नति के पथ को प्राप्त करते हैं॥१०॥

द्र॒प्सश्च॑स्कन्द प्रथ॒माँ अनु॒ द्यूनि॒मं च॒ योनि॒मनु॒ यश्च॒ पूर्वः॑। स॒मा॒नं योनि॒मनु॑ सं॒चर॑न्तं द्र॒प्सं जु॑हो॒म्यनु॑ स॒प्त होत्राः॑॥

द्युस्थानीय लोकों को सूर्य उनकी अपेक्षा पूर्वभावी रूप से प्राप्त होता है और इस पृथिवी पर पश्चात् प्राप्त होता है। सात रश्मियाँ उस सूर्य के साथ विचरण करती हैं। उनका उपयोग मनुष्यों को चिकित्सा के लिये करना चाहिए। इसी प्रकार पृथिवी पर ओषधिरस को भी चिकित्सा के लिए उपयोग में लाना चाहिये॥११॥

यस्ते॑ द्र॒प्सः स्कन्द॑ति॒ यस्ते॑ अं॒शुर्बा॒हुच्यु॑तो धि॒षणा॑या उ॒पस्था॑त्। अ॒ध्व॒र्योर्वा॒ परि॑ वा॒ यः प॒वित्रा॒त्तं ते॑ जुहोमि॒ मन॑सा॒ वष॑ट्कृतम्॥

परमात्मा का रचा सूर्य या रसरूप जलांशु अन्तरिक्ष के माध्यम से पृथिवी पर प्राप्त होता है, उस सूर्य या जल का मन से विचार करके अधिकाधिक उपयोग करना चाहिए॥१२॥

यस्ते॑ द्र॒प्सः स्क॒न्नो यस्ते॑ अं॒शुर॒वश्च॒ यः प॒रः स्रु॒चा। अ॒यं दे॒वो बृह॒स्पतिः॒ सं तं सि॑ञ्चतु॒ राध॑से॥

आध्यात्मिक दृष्टि में परमात्मा का आनन्दरस और ज्ञानज्योति स्तुति करने से इस जीवन में और परजीवन में प्राप्त होते हैं। प्राण उन्हें सुखसमृद्धि के लिए जीवन में प्रवाहित कर देता है॥१३॥

पय॑स्वती॒रोष॑धयः॒ पय॑स्वन्माम॒कं वचः॑। अ॒पां पय॑स्व॒दित्पय॒स्तेन॑ मा स॒ह शु॑न्धत॥

परमात्मा की कृपा से ओषधियाँ मानवों के लिए गुणवती एवं ताप को-रोग को दूर करनेवाली होती हैं। उनके ठीक सेवन से परमात्मा का स्तुतिवचन सफल होता है। इसी प्रकार जल भी बहुत गुणवाला होता है, जो हमारा अनेक प्रकार से शोधन करता है॥१४॥

परं॑ मृत्यो॒ अनु॒ परे॑हि॒ पन्थां॒ यस्ते॒ स्व इत॑रो देव॒याना॑त्। चक्षु॑ष्मते शृण्व॒ते ते॑ ब्रवीमि॒ मा नः॑ प्र॒जां री॑रिषो॒ मोत वी॒रान्॥

मारनेवाला काल पुनः-पुनः जन्मधारण करनेवाले साधारण जनों को पुनः-पुनः मारता रहता है, परन्तु देवयान-मोक्षमार्ग की ओर जानेवाले मुमुक्षुओं को पुनः-पुनः या मध्य में नहीं मारता, उन्हें पूर्ण अवस्था प्रदान करता है॥१॥

मृ॒त्योः प॒दं यो॒पय॑न्तो॒ यदैत॒ द्राघी॑य॒ आयुः॑ प्रत॒रं दधा॑नाः। आ॒प्याय॑मानाः प्र॒जया॒ धने॑न शु॒द्धाः पू॒ता भ॑वत यज्ञियासः॥

अध्यात्मयज्ञ करनेवाले मुमुक्षुजन मृत्यु के कारणरूप अज्ञान और विषयसेवन को त्यागते हैं और स्वास्थ्यपूर्ण लम्बी आयु को प्राप्त करते हैं। सन्तान तथा ऐश्वर्य से भरपूर होते हुए शुद्ध और पवित्र अन्तःकरणवाले बन जाया करते हैं॥२॥

इ॒मे जी॒वा वि मृ॒तैराव॑वृत्र॒न्नभू॑द्भ॒द्रा दे॒वहू॑तिर्नो अ॒द्य। प्राञ्चो॑ अगाम नृ॒तये॒ हसा॑य॒ द्राघी॑य॒ आयुः॑ प्रत॒रं दधा॑नाः॥

जो जीव मृत्यु के कारणों अज्ञान व्यसनसेवन से अलग हो जाते हैं, वे अपने जीवन में परमात्मा की कल्याणकारी स्तुति करते हुए दीर्घकाल तक स्वास्थ्यपूर्ण आयु प्राप्त करते हैं और जीवन का विनोद, हर्ष, श्रेष्ठ मार्ग पर चलते हुए लिया करते हैं॥३॥

इ॒मं जी॒वेभ्यः॑ परि॒धिं द॑धामि॒ मैषां॒ नु गा॒दप॑रो॒ अर्थ॑मे॒तम्। श॒तं जी॑वन्तु श॒रदः॑ पुरू॒चीर॒न्तर्मृ॒त्युं द॑धतां॒ पर्व॑तेन॥

परमात्मा दीर्घ जीवन चाहनेवाले मुमुक्षु जनों के लिए नियत परिधि बनाता है। कोई भी मुमुक्षु उसमें रहकर शीघ्र मृत्यु का ग्रास नहीं बनता है, किन्तु सौ या बहुत वर्षों तक वे जीते हैं, ब्रह्मचर्यरूप पर्वत को मृत्यु लाँघ नहीं सकती है॥४॥

यथाहा॑न्यनुपू॒र्वं भव॑न्ति॒ यथ॑ ऋ॒तव॑ ऋ॒तुभि॒र्यन्ति॑ सा॒धु। यथा॒ न पूर्व॒मप॑रो॒ जहा॑त्ये॒वा धा॑त॒रायूं॑षि कल्पयैषाम्॥

जैसे दिन-रात आनुपूर्वी क्रम से निरन्तर होते रहते हैं तथा जैसे ऋतुएँ एक दूसरे क्रम से चलती रहती हैं अथवा जैसे पुर्वोत्पन्न पिता के पश्चात् पुत्र और पुत्र भावी पिता के पीछे उसका पुत्र वंश-परम्परा से होते रहते हैं, इसी प्रकार मुमुक्षुओं के जीवन भी आगे-आगे चलते रहते हैं॥५॥

आ रो॑ह॒तायु॑र्ज॒रसं॑ वृणा॒ना अ॑नुपू॒र्वं यत॑माना॒ यति॒ ष्ठ। इ॒ह त्वष्टा॑ सु॒जनि॑मा स॒जोषा॑ दी॒र्घमायुः॑ करति जी॒वसे॑ वः॥

परमात्मा सभी मुमुक्षु आत्माओं को जरा अवस्था तक पहुँचाता है, जबकि वे मुमुक्षुओं की सरणि के अनुसार आचरण करते हों। जितनी प्रीति मुमुक्षु परमात्मा से करते हैं, परमात्मा भी उनसे उतनी ही प्रीति करता है और उन्हें दीर्घायु प्रदान करता है॥६॥

इ॒मा नारी॑रविध॒वाः सु॒पत्नी॒राञ्ज॑नेन स॒र्पिषा॒ सं वि॑शन्तु। अ॒न॒श्रवो॑ऽनमी॒वाः सु॒रत्ना॒ आ रो॑हन्तं॒ जन॑यो॒ योनि॒मग्रे॑॥

शव के साथ जानेवाली स्त्रियाँ जो पतिवाली और युवति हों, वे किसी जलाशय तक पहुँचकर वहाँ नेत्र मुख आदि धोकर पुनः आँसू रहित स्वस्थ हुई घर को वापिस चली आवें॥७॥

उदी॑र्ष्व नार्य॒भि जी॑वलो॒कं ग॒तासु॑मे॒तमुप॑ शेष॒ एहि॑। ह॒स्त॒ग्रा॒भस्य॑ दिधि॒षोस्तवे॒दं पत्यु॑र्जनि॒त्वम॒भि सं ब॑भूथ॥

विधवा अपने पूर्वपति की सम्पत्ति आदि के अधिकार को भोग सकती है तथा उसके प्रतिनिधि और अपनी सन्तान को उत्पन्न कर सकती है॥८॥

धनु॒र्हस्ता॑दा॒ददा॑नो मृ॒तस्या॒स्मे क्ष॒त्राय॒ वर्च॑से॒ बला॑य। अत्रै॒व त्वमि॒ह व॒यं सु॒वीरा॒ विश्वाः॒ स्पृधो॑ अ॒भिमा॑तीर्जयेम॥

पूर्व शासक के उसके शासनकाल का समय हो जाने पर उत्तराधिकारी उसके शस्त्र और शासन को हाथ में संभाल ले और क्षात्रधर्म, राष्ट्रवृद्धि और शरीरबल के लिए राज्यशासन पद पर विराजमान होकर अपने सैनिकों को ऐसा बनाये, जिससे वे विरोधी अभिमानी शत्रुसेनाओं को जीत लें॥९॥

उप॑ सर्प मा॒तरं॒ भूमि॑मे॒तामु॑रु॒व्यच॑सं पृथि॒वीं सु॒शेवा॑म्। ऊर्ण॑म्रदा युव॒तिर्दक्षि॑णावत ए॒षा त्वा॑ पातु॒ निॠ॑तेरु॒पस्था॑त्॥

आरम्भ सृष्टि में सब जीवों की एकमात्र माता पृथिवी ही होती है। अत एव उस समय मनुष्यों की भी अमैथुनी सृष्टि होती है। नानाभेदों से मनुष्यादि शरीरों का प्रादुभार्व होता है। आरम्भ सृष्टि में पृथ्वी युवति जैसी या कृषिभूमि जैसी कोमल होती है॥१०॥

उच्छ्व॑ञ्चस्व पृथिवि॒ मा नि बा॑धथाः सूपाय॒नास्मै॑ भव सूपवञ्च॒ना। मा॒ता पु॒त्रं यथा॑ सि॒चाभ्ये॑नं भूम ऊर्णुहि॥

जीवगर्भ जब भूमि में आता है, तो भूमि ऊपर के पृष्ट पर पुलकित उफनी हुई पोली सी हो जाती है, जिससे आसानी के साथ जीव बढ़ सके और वह गर्भ की आवश्यकताओं को पूरा करती है। गर्भ के पूर्ण होते ही उसको ऊपर उभरने-बाहर प्रकट करने में योग्य होती है तथा बाहर प्रकट हो जाने पर ओषधियों से उसका पोषण करती है, अतएव उस समय जीव सब प्रकार कुशल कुमारावस्था में उत्पन्न होते हैं॥११॥

उ॒च्छ्वञ्च॑माना पृथि॒वी सु ति॑ष्ठतु स॒हस्रं॒ मित॒ उप॒ हि श्रय॑न्ताम्। ते गृ॒हासो॑ घृत॒श्चुतो॑ भवन्तु वि॒श्वाहा॑स्मै शर॒णाः स॒न्त्वत्र॑॥

जीवसृष्टि के लिए पृथिवी ऊपर पोली और मृदु कुछ काल तक बनी रहती है। पुनः उनमें असंख्य जीव आश्रित रहते हैं, अत एव आज तक भी स्व-स्वजातीय सङ्घ में रहने का स्वभाव प्रायः सभी जीवों में वर्तमान है। आत्मा के लिए गर्भगृह स्वाभाविक रस देते हुए शरणीय हैं॥१२॥

उत्ते॑ स्तभ्नामि पृथि॒वीं त्वत्परी॒मं लो॒गं नि॒दध॒न्मो अ॒हं रि॑षम्। ए॒तां स्थूणां॑ पि॒तरो॑ धारयन्तु॒ तेऽत्रा॑ य॒मः साद॑ना ते मिनोतु॥

आरम्भ सृष्टि भूगोल के ऊँचें भाग पर होती है। वह भाग जलमिश्रित भूगोल से पर्वतभूमि के रूप में ऊपर खींचा जाता है। उस उठे हुए भूभाग को सूर्य की रश्मियाँ धारण करती हैं और सूर्य अपनी रश्मियों द्वारा जीवात्मा के गर्भादि को प्राप्त कराता है, अतएव उसका दूसरा नाम सविता है॥१३॥

प्र॒ती॒चीने॒ मामह॒नीष्वाः॑ प॒र्णमि॒वा द॑धुः। प्र॒तीची॑ध जग्रभा॒ वाच॒मश्वं॑ रश॒नया॑ यथा॥

जीवन के अग्रिम भाग में मोक्षप्राप्ति के निमित्त उपासक अपने को परमात्मा के प्रति सौंप देते हैं स्तुतिवाणी के द्वारा, जैसे बाण के फलक को लक्ष्य पर धरते हैं, ऐसे ही। वह स्तुति परमात्मा के लिए अपनी और अनुकूल बनानेवाली ऐसी ही है, जैसे घोड़े को अनुकूल बनाने के लिए घास होती है॥१४॥

नि व॑र्तध्वं॒ मानु॑ गाता॒स्मान्त्सि॑षक्त रेवतीः। अग्नी॑षोमा पुनर्वसू अ॒स्मे धा॑रयतं र॒यिम्॥

गौओं के स्वामी के लिए गौवें पुष्कल दूध देनेवाली हों, राजा के लिए प्रजाएँ धन और बल देनेवाली हों, इन्द्रियस्वामी आत्मा के लिए इन्द्रियाँ निर्दोष भोग देनेवाली हों और वे स्व-व्यापारों का सम्पादन करके स्वस्थान पर सदा स्वस्थ रहें। ऐसे ही प्राण-अपान भी प्रत्येक प्राणी को चिर-जीवन दायक होवें॥१॥

पुन॑रेना॒ नि व॑र्तय॒ पुन॑रेना॒ न्या कु॑रु। इन्द्र॑ एणा॒ नि य॑च्छत्व॒ग्निरे॑ना उ॒पाज॑तु॥

गौ आदि पशुओं, प्रजाओं, तथा इन्द्रियों को नित्य नियम में रखना चाहिए और परमात्मा से इनके यथावत् नियन्त्रण के लिए बल माँगना चाहिए॥२॥

पुन॑रे॒ता नि व॑र्तन्ताम॒स्मिन्पु॑ष्यन्तु॒ गोप॑तौ। इ॒हैवाग्ने॒ नि धा॑रये॒ह ति॑ष्ठतु॒ या र॒यिः॥

गौ आदि पशु, प्रजाएँ तथा इन्द्रियाँ पुनः-पुनः व्यापार करके लौट आएँ और मुझ स्वामी के अधीन पुष्ट होवें। परमात्मा पुष्टि व सम्पत्ति को मेरे अधीन स्थिर रखे॥३॥

यन्नि॒यानं॒ न्यय॑नं सं॒ज्ञानं॒ यत्प॒राय॑णम्। आ॒वर्त॑नं नि॒वर्त॑नं॒ यो गो॒पा अपि॒ तं हु॑वे॥

गौओं, प्रजाओं, इन्द्रियों का नित्य स्वकार्य में प्रवेश होना-जाना-स्थिर होना और उनसे लाभ लेना; कार्य से पुनः निवृत्त होना फिर कार्य में लगना आदि क्रियाएँ सब रक्षक परमात्मा के अधीन हैं। उसकी हम स्तुति करें॥४॥

य उ॒दान॒ड्व्यय॑नं॒ य उ॒दान॑ट् प॒राय॑णम्। आ॒वर्त॑नं नि॒वर्त॑न॒मपि॑ गो॒पा नि व॑र्तताम्॥

गौवों, प्रजाओं, इन्द्रियों का रक्षक परमात्मा उनकी सारी गति प्रवृत्तियों का अधिष्ठाता है। वह हमें प्राप्त हो॥५॥

आ नि॑वर्त॒ नि व॑र्तय॒ पुन॑र्न इन्द्र॒ गा दे॑हि। जी॒वाभि॑र्भुनजामहै॥

परमात्मा हमें गौवों, प्रजाओं, इन्द्रियों को प्रदान करे, जिससे हम उनके सम्बन्ध से भोगों को प्राप्त करें॥६॥

परि॑ वो वि॒श्वतो॑ दध ऊ॒र्जा घृ॒तेन॒ पय॑सा। ये दे॒वाः के च॑ य॒ज्ञिया॒स्ते र॒य्या सं सृ॑जन्तु नः॥

सत्सङ्ग करने योग्य विद्वान् जन हमें रमणीय ज्ञान से संयुक्त करते हैं। हम भी उनको अन्न, घृत, दुग्ध आदि से परितृप्त करें॥७॥

आ नि॑वर्तन वर्तय॒ नि नि॑वर्तन वर्तय। भूम्या॒श्चत॑स्रः प्र॒दिश॒स्ताभ्य॑ एना॒ नि व॑र्तय॥

हे अन्यत्र से हमारी ओर प्राप्त होनेवाले परमात्मन्! तू हमारे अभिमुख हो, हमें अपनी ओर ले तथा भूमि की चारों दिशाओं से गौ आदियों को हमें प्राप्त करा॥८॥

भ॒द्रं नो॒ अपि॑ वातय॒ मनः॑॥

परमात्मा या राजा हमारे अन्तःकरण को कल्याणकारी मार्ग पर चलाये, उपासक तथा प्रजाएँ इस बात की अभिलाषा करें॥१॥

अ॒ग्निमी॑ळे भु॒जां यवि॑ष्ठं शा॒सा मि॒त्रं दु॒र्धरी॑तुम्। यस्य॒ धर्म॒न्त्स्व१॒॑रेनीः॑ सप॒र्यन्ति॑ मा॒तुरूधः॑॥

समस्त पालकों में उपासक के लिए परमात्मा और प्रजा के लिए राजा मित्रसमान और विरोधी के लिए दण्डदाता है। उसकी स्तुति या प्रशंसा करनी चाहिए। उपासक और प्रजा सुख को लक्ष्य करके उसका सत्कार कर प्राप्त करते हैं, जैसे बच्चे माता के स्तन को प्राप्त होते हैं॥२॥

यमा॒सा कृ॒पनी॑ळं भा॒साके॑तुं व॒र्धय॑न्ति। भ्राज॑ते॒ श्रेणि॑दन्॥

शक्ति का सदन परमात्मा या राजा ज्ञानप्रकाशक होता है, उसकी उपासना या आश्रय से उपासक अपने आत्मा में उसे साक्षात् करते हैं और प्रजाएँ राजा के आश्रय से वृद्धि प्राप्त करती हैं। परमात्मा प्राणिगण को और राजा प्रजाओं को भोजन देता है॥३॥

अ॒र्यो वि॒शां गा॒तुरे॑ति॒ प्र यदान॑ड्दि॒वो अन्ता॑न्। क॒विर॒भ्रं दीद्या॑नः॥

मनुष्यों के मध्य में क्रान्तदर्शी परमात्मा व्याप्त है और प्रजाजनों के मध्य में मेधावी राजा प्राप्त होता है। वह ऐसा गतिशील ज्ञानी जनों को जानता हुआ उनमें साक्षात् होता है, जैसे चमकता हुआ विद्युद्रूप अग्नि मेघ को प्राप्त होता है॥४॥

जु॒षद्ध॒व्या मानु॑षस्यो॒र्ध्वस्त॑स्था॒वृभ्वा॑ य॒ज्ञे। मि॒न्वन्त्सद्म॑ पु॒र ए॑ति॥

परमात्मा या राजा अध्यात्मयज्ञ या राजसूययज्ञ में प्रार्थनावचन या उपहारवस्तुओं को स्वीकार करता है, शिरोधार्य होता हुआ उपासकों के हृदय में परमात्मा और राजभवन में राजा विराजमान है॥५॥

स हि क्षेमो॑ ह॒विर्य॒ज्ञः श्रु॒ष्टीद॑स्य गा॒तुरे॑ति। अ॒ग्निं दे॒वा वाशी॑मन्तम्॥

प्राप्त करने योग्य परमात्मा या राजा के लिए जो प्रार्थनावचन या उपहार दिया जाता है, वह उपासकों या प्रजाजनों का कल्याण साधता है। उस स्तुतिपात्र प्रशंसापात्र परमात्मा या राजा को उपासक या विद्वान् प्रजाजन प्राप्त किया करते हैं॥६॥

य॒ज्ञा॒साहं॒ दुव॑ इषे॒ऽग्निं पूर्व॑स्य॒ शेव॑स्य। अद्रेः॑ सू॒नुमा॒युमा॑हुः॥

परमात्मा या राजा स्तुतिकर्ता अथवा प्रशंसक को आगे प्रेरित करता है। वह परमात्मा या राजा आयुरूप-आयु देनेवाला होता है। अध्यात्मयज्ञ में परमात्मा आश्रयणीय है। दोनों ही श्रेष्ठ सुख के देनेवाले हैं॥७॥

नरो॒ ये के चा॒स्मदा विश्वेत्ते वा॒म आ स्युः॑। अ॒ग्निं ह॒विषा॒ वर्ध॑न्तः॥

सब श्रेष्ठ जन परमात्मा या राजा को प्रार्थनाओं द्वारा प्रशंसाओं द्वारा बढ़ाते हुए उसके आश्रय में रहते हैं॥८॥

कृ॒ष्णः श्वे॒तो॑ऽरु॒षो यामो॑ अस्य ब्र॒ध्न ऋ॒ज्र उ॒त शोणो॒ यश॑स्वान्। हिर॑ण्यरूपं॒ जनि॑ता जजान॥

संसार परमात्मा के अधीन है और राष्ट्र प्रदेश राजा के अधीन होता है। संसार या राष्ट्र प्रदेश आकर्षक, निर्दोष, रोचमान, महान्, अकुटिल, अन्नों भोगों से सम्पन्न और प्रगतिशील होना बनाना चाहिए। इनका उत्पादक परमात्मा है और राजा इनको सम्पन्न करता है॥९॥

ए॒वा ते॑ अग्ने विम॒दो म॑नी॒षामूर्जो॑ नपाद॒मृते॑भिः स॒जोषाः॑। गिर॒ आ व॑क्षत्सुम॒तीरि॑या॒न इष॒मूर्जं॑ सुक्षि॒तिं विश्व॒माभाः॑॥

अग्रणायक परमात्मा किसी के बल को गिरानेवाला नहीं होता। ऐसे ही राजा को भी किसी प्रजा के बल को नहीं गिरना चाहिए। प्रत्येक स्तोता अथवा प्रजाजन उसके साथ प्रीति को प्राप्त हों। उपासक या प्रजाजन उसके लिए स्तुति तथा प्रशंसा को समर्पित करते रहें, जिससे कि परमात्मा या राजा सब प्रकार के अन्नों व बलों तथा उत्तम निवास को प्रदान करता रहे॥१०॥

आग्निं न स्ववृ॑क्तिभि॒र्होता॑रं त्वा वृणीमहे। य॒ज्ञाय॑ स्ती॒र्णब॑र्हिषे॒ वि वो॒ मदे॑ शी॒रं पा॑व॒कशो॑चिषं॒ विव॑क्षसे॥

होमयज्ञ में जैसे अग्नि को वरते हैं, ऐसे ही अध्यात्मयज्ञ में हृदय के अन्दर उस पवित्र दीप्तिमान् सर्वत्र व्यापक परमात्मा को विशेष आनन्दप्राप्ति के लिए वरना चाहिए॥१॥

त्वामु॒ ते स्वा॒भुवः॑ शु॒म्भन्त्यश्व॑राधसः। वेति॒ त्वामु॑प॒सेच॑नी॒ वि वो॒ मद॒ ऋजी॑तिरग्न॒ आहु॑ति॒र्विव॑क्षसे॥

जितेन्द्रिय, संयमी, अपने अन्तःकरण को भावित करनेवाले शिवसंकल्पी जन तेरी स्तुति किया करते हैं। उसकी उपयोगी स्तुति से तू उसके अन्दर महत्त्वरूप में साक्षात् होता है, इसलिए तुझे वरते हैं॥२॥

त्वे ध॒र्माण॑ आसते जु॒हूभिः॑ सिञ्च॒तीरि॑व। कृ॒ष्णा रू॒पाण्यर्जु॑ना॒ वि वो॒ मदे॒ विश्वा॒ अधि॒ श्रियो॑ धिषे॒ विव॑क्षसे॥

परमात्मा के गुणों को धारण करनेवाले उसमें ऐसे विराजते हैं, जैसे होमाग्नि में आहुतियाँ भिन्न-भिन्न रूपों को छोड़ती-विराजती हुई आश्रय लेती हैं। ऐसे वे उपासक सारी सम्पदाओं को तेरे अन्दर प्राप्त करते हैं, तू उसका महान् देव है॥३॥

यम॑ग्ने॒ मन्य॑से र॒यिं सह॑सावन्नमर्त्य। तमा नो॒ वाज॑सातये॒ वि वो॒ मदे॑ य॒ज्ञेषु॑ चि॒त्रमा भ॑रा॒ विव॑क्षसे॥

परमात्मा जन्ममरण से रहित और बहुत बलवान् है, इसलिए सारे संसार को संभालने में समर्थ है। मानव के लिए जिस सम्पत्ति को श्रेष्ठ समझता है, उस मुक्तिरूप सम्पदा को प्राप्त कराता है। अध्यात्म-प्रसङ्गों में हर्ष के निमित्त परमात्मा का वरण करना चाहिए, वह बड़ा महान् है॥४॥

अ॒ग्निर्जा॒तो अथ॑र्वणा वि॒दद्विश्वा॑नि॒ काव्या॑। भुव॑द्दू॒तो वि॒वस्व॑तो॒ वि वो॒ मदे॑ प्रि॒यो य॒मस्य॒ काम्यो॒ विव॑क्षसे॥

स्थिरचित्तवाला योगी परमात्मा को अपने आत्मा में साक्षात् करता है। साक्षात् हुआ परमात्मा उपासक के अन्दर वेदज्ञान को समझने की योग्यता प्रदान करता है। उस संयमी उपासक का परमात्मा प्यारा बनता है। उसे अपने हर्ष, आनन्द के लिए अपनाना चाहिए॥५॥

त्वां य॒ज्ञेष्वी॑ळ॒तेऽग्ने॑ प्रय॒त्य॑ध्व॒रे। त्वं वसू॑नि॒ काम्या॒ वि वो॒ मदे॒ विश्वा॑ दधासि दा॒शुषे॒ विव॑क्षसे॥

यजनीय श्रेष्ठ कर्मों में, ध्यान में परमात्मा की साधारण जन स्तुति करते हैं-श्रेष्ठ कर्मों की सिद्धि के लिए, परन्तु जो उसमें अपने आत्मा को सपर्पित कर देता है, उसके लिए वह परमात्मा समस्त सुख की वस्तुएँ प्रदान करता है, अतः हर्ष व आनन्द के निमित्त उसको वरना चाहिए॥६॥

त्वां य॒ज्ञेष्वृ॒त्विजं॒ चारु॑मग्ने॒ नि षे॑दिरे। घृ॒तप्र॑तीकं॒ मनु॑षो॒ वि वो॒ मदे॑ शु॒क्रं चेति॑ष्ठम॒क्षभि॒र्विव॑क्षसे॥

अध्यात्मयज्ञ के प्रसङ्गों में तेजस्वी, अध्यात्मयज्ञ के सम्पादक, सावधान करनेवाले परमात्मा की उपासकजन शरण लें, वही आनन्द हर्ष का साधक है और महान् है॥७॥

अग्ने॑ शु॒क्रेण॑ शो॒चिषो॒रु प्र॑थयसे बृ॒हत्। अ॒भि॒क्रन्द॑न्वृषायसे॒ वि वो॒ मदे॒ गर्भं॑ दधासि जा॒मिषु॒ विव॑क्षसे॥

अपने शुभ्र तेज से बहुप्रख्यात सर्वत्र व्यापक महान् परमात्मा ज्ञान का उपदेश करता हुआ तथा अमृतवृष्टि बरसाता हुआ उपासकों के अन्दर साक्षात् होता है। उसे आनन्द हर्ष के निमित्त वरना चाहिए॥८॥

कुह॑ श्रु॒त इन्द्रः॒ कस्मि॑न्न॒द्य जने॑ मि॒त्रो न श्रू॑यते। ऋषी॑णां वा॒ यः क्षये॒ गुहा॑ वा॒ चर्कृ॑षे गि॒रा॥

परमात्मदर्शन की योग्यतावाले ऋषियों के हृदय में और बुद्धि में स्तुति द्वारा परमात्मा साक्षात् किया जाता है, वह आज भी श्रेष्ठ मनुष्य के अन्दर मित्र समान स्नेही प्रेरक बनकर साक्षात् होता है॥१॥

इ॒ह श्रु॒त इन्द्रो॑ अ॒स्मे अ॒द्य स्तवे॑ व॒ज्र्यृची॑षमः। मि॒त्रो न यो जने॒ष्वा यश॑श्च॒क्रे असा॒म्या॥

परमात्मा मनुष्यों में मित्र के समान पूर्णरूप से यश अन्न और धन प्राप्त कराता है, मन्त्रों का परिज्ञान कराता है, स्तोताओं का मान करता है और स्तुति के अनुरूप फल देता है। ऐसा वह परमात्मा हमारे लिए उपासनीय है॥२॥

म॒हो यस्पतिः॒ शव॑सो॒ असा॒म्या म॒हो नृ॒म्णस्य॑ तूतु॒जिः। भ॒र्ता वज्र॑स्य धृ॒ष्णोः पि॒ता पु॒त्रमि॑व प्रि॒यम्॥

परमात्मा महान् बल-आत्मबल का स्वामी तथा रक्षक एवं पालक है, महान् धन-मोक्ष का प्रदान करनेवाला है। वह दृढ़ अभ्यासी ओजस्वी उपासक प्रियपुत्र के प्रति पिता के समान व्यवहार करता है॥३॥

यु॒जा॒नो अश्वा॒ वात॑स्य॒ धुनी॑ दे॒वो दे॒वस्य॑ वज्रिवः। स्यन्ता॑ प॒था वि॒रुक्म॑ता सृजा॒नः स्तो॒ष्यध्व॑नः॥

उपासक जन को जीवन देनेवाले प्राण तथा जीवन शक्तिरूप प्राण के श्वास-प्रश्वासों को घोड़ों की भाँति युक्त करता हुआ देवयान मार्ग से जीवनयात्रा के मार्गों को पार करता है, अतः वह परमात्मा स्तुत्य है॥४॥

त्वं त्या चि॒द्वात॒स्याश्वागा॑ ऋ॒ज्रा त्मना॒ वह॑ध्यै। ययो॑र्दे॒वो न मर्त्यो॑ य॒न्ता नकि॑र्वि॒दाय्यः॑॥

प्राण के ऋजुगामी श्वास-प्रश्वासों को चलाने के लिए परमात्मा तू ही समर्थ है। तुझसे अतिरिक्त न कोई मुमुक्षु, न कोई इसका ज्ञाता ही है॥५॥

अध॒ ग्मन्तो॒शना॑ पृच्छते वां॒ कद॑र्था न॒ आ गृ॒हम्। आ ज॑ग्मथुः परा॒काद्दि॒वश्च॒ ग्मश्च॒ मर्त्य॑म्॥

जीवन के अन्तकाल में जीवन की कामना करनेवाला आत्मा जाते हुए प्राणापानों से पूछता है, तुम क्यों जाते हो ? यहीं ठहरे रहो अर्थात् मरणकाल में भी आत्मा इन प्राणापानों को नहीं त्यागना चाहता। यही चाहता है कि मेरे इस नश्वर देह में प्राण बने रहें। चाहे द्युलोक से चाहे पृथिवीलोक से आयें। प्राण-अपान किस प्रयोजन के लिए आये हैं, यह ठीक-ठीक समझ मनुष्य को उसके उपयोग के लिए आचरण करना चाहिए॥६॥

आ न॑ इन्द्र पृक्षसे॒ऽस्माकं॒ ब्रह्मोद्य॑तम्। तत्त्वा॑ याचाम॒हेऽवः॒ शुष्णं॒ यद्धन्नमा॑नुषम्॥

परमात्मा भलीभाँति हमारे साथ सम्पर्क करता है, इसलिए हमारी स्तुति-स्तवन उसके प्रति होना चाहिए। हम उसके सुखमय रक्षण को चाहते हैं। वह दैव-बल रखता है एवं राक्षसबल को नष्ट करता है॥७॥

अ॒क॒र्मा दस्यु॑र॒भि नो॑ अम॒न्तुर॒न्यव्र॑तो॒ अमा॑नुषः। त्वं तस्या॑मित्रह॒न्वध॑र्दा॒सस्य॑ दम्भय॥

धर्म-कर्मरहित, गर्वित, अन्यथाचारी, मनुष्यस्वभाव से भिन्न, दूसरों को दबानेवाले, सतानेवाले को परमात्मा या राजा नष्ट किया करता है॥८॥

त्वं न॑ इन्द्र शूर॒ शूरै॑रु॒त त्वोता॑सो ब॒र्हणा॑। पु॒रु॒त्रा ते॒ वि पू॒र्तयो॒ नव॑न्त क्षो॒णयो॑ यथा॥

परमात्मा तथा राजा अपनी पराक्रमशक्तियों या सैनिकों के द्वारा पापों या पापियों का संहार करके रक्षा करता है-कठिन से कठिन स्थितियों में भी। तेरी कामपूर्तियों को साधक विशेषरूप से प्राप्त होते हैं, जैसे निवास के लिए भूप्रदेश सर्वत्र प्राप्त होते हैं॥९॥

त्वं तान्वृ॑त्र॒हत्ये॑ चोदयो॒ नॄन्का॑र्पा॒णे शू॑र वज्रिवः। गुहा॒ यदी॑ कवी॒नां वि॒शां नक्ष॑त्रशवसाम्॥

परमात्मा मुमुक्षुजनों के पापनाशन-कार्य में या राजा आक्रमणकारी की हत्या के अवसर पर कृपाणयुक्त संग्राम में बल की प्रेरणा करता है। अध्यात्म ऐश्वर्यरूप धनवाले विद्वानों को परमात्मा जैसे प्रेरणा देता है, ऐसे ही राजा भी बलवान् पुरुषों को प्रेरणा देता है॥१०॥

म॒क्षू ता त॑ इन्द्र दा॒नाप्न॑स आक्षा॒णे शू॑र वज्रिवः। यद्ध॒ शुष्ण॑स्य द॒म्भयो॑ जा॒तं विश्वं॑ स॒याव॑भिः॥

ओजस्वी तथा पराक्रमी परमात्मा या राजा अपने मोक्षप्रदायक कर्मों द्वारा रक्षण करता है। व्याप्त हुआ या प्राप्त हुआ शोषण करनेवाले पापों या शत्रुओं को वह नष्ट करता है॥११॥

माकु॒ध्र्य॑गिन्द्र शूर॒ वस्वी॑र॒स्मे भू॑वन्न॒भिष्ट॑यः। व॒यंव॑यं त आसां सु॒म्ने स्या॑म वज्रिवः॥

पराक्रमी परमात्मा या राजा हमारी बसानेवाली आकाङ्क्षाओं को व्यर्थ नहीं जाने देता। हम सब परमात्मा तथा राजा के दिये हुए आकाङ्क्षा-सुख में निरन्तर रहें॥१२॥

अ॒स्मे ता त॑ इन्द्र सन्तु स॒त्याहिं॑सन्तीरुप॒स्पृशः॑। वि॒द्याम॒ यासां॒ भुजो॑ धेनू॒नां न व॑ज्रिवः॥

परमात्मा या राजा के दयासम्पर्क या दयादृष्टियाँ उपासकों या प्रजाओं के लिए कल्याणकारी हुआ करती हैं। वे जीवन में सफलता को लाती हैं और गौवों से प्राप्त होनेवाले दूध की भाँति हैं॥१३॥

अ॒ह॒स्ता यद॒पदी॒ वर्ध॑त॒ क्षाः शची॑भिर्वे॒द्याना॑म्। शुष्णं॒ परि॑ प्रदक्षि॒णिद्वि॒श्वाय॑वे॒ नि शि॑श्नथः॥

जो हाथों से न ग्रहण करने योग्य, न पैरों से प्राप्त करने योग्य आध्यात्मभूमि-योगभूमि होती है, वह निवेदन करने योग्य स्तुतियों द्वारा बढ़ती है-सम्पुष्ट होती है। मोक्षसम्बन्धी आयु को प्राप्त कराने के लिए परमात्मा बन्धनकारक रागादि को सर्वथा नष्ट कर देता है एवं राजा जो प्रजा न हाथों और न पैरों से बन्धन के योग्य-अनुशासनरहित है और जो भूमि हाथों से खेती करने के अयोग्य और पदयात्रा के अयोग्य कण्टकाकीर्ण है, उस ऐसी प्रजा एवं भूमि को राजा उपयोगी बनाता है ज्ञानशिक्षाओं से या विविध उपायों से। जो प्रजाओं में या राष्ट्रभूमि में औरों का शोषण करनेवाले चोर आदि या दुर्भिक्ष कदाचित् आ जाएँ, उन्हें नष्ट करता है॥१४॥

पिबा॑पि॒बेदि॑न्द्र शूर॒ सोमं॒ मा रि॑षण्यो वसवान॒ वसुः॒ सन्। उ॒त त्रा॑यस्व गृण॒तो म॒घोनो॑ म॒हश्च॑ रा॒यो रे॒वत॑स्कृधी नः॥

अपने गुणों से आच्छादित करनेवाला परमात्मा तथा राजा उपासकों तथा प्रजाओं को बसानेवाला होता है। उपासकों के उपासना-रस को स्वीकार करता है तथा राजा राजसूययज्ञ में प्रजा द्वारा दिये सोमरस तथा भूमि में उत्पन्न अन्नादि भार को स्वीकार करता है। परमात्मा की स्तुति करनेवाले उपासकों की परमात्मा रक्षा करता है और उन्हें मोक्ष प्रदान करता है। राजा भी श्रेष्ठाचारी जनों की रक्षा करता है और उन्हें सम्पन्न बनाता है॥१५॥

यजा॑मह॒ इन्द्रं॒ वज्र॑दक्षिणं॒ हरी॑णां र॒थ्यं१॒॑ विव्र॑तानाम्। प्र श्मश्रु॒ दोधु॑वदू॒र्ध्वथा॑ भू॒द्वि सेना॑भि॒र्दय॑मानो॒ वि राध॑सा॥

जो राजा या शासक भिन्न-भिन्न कर्म करनेवाला प्रजाओं की रक्षार्थ शस्त्रास्त्रसम्पन्न हो, सेनाओं द्वारा तथा धनधान्य सम्पत्ति से पालना करता हुआ प्रभावशाली हो, उसका सत्कार प्रजाजन किया करें॥१॥

हरी॒ न्व॑स्य॒ या वने॑ वि॒दे वस्विन्द्रो॑ म॒घैर्म॒घवा॑ वृत्र॒हा भु॑वत्। ऋ॒भुर्वाज॑ ऋभु॒क्षाः प॑त्यते॒ शवोऽव॑ क्ष्णौमि॒ दास॑स्य॒ नाम॑ चित्॥

राजा के सभाविभाग और सेनाविभाग दुःखनाशक और सुखप्रापक होते हुए प्रजा के लिए धन प्राप्त करानेवाले होने चाहिए। ऐसा राजा शत्रुनाशक, मेधावी, महान् बलवान् होकर शासन करता है। प्रजा को दुःख देनेवाले शत्रु के बल और नाम तक को मिटा देता है॥२॥

य॒दा वज्रं॒ हिर॑ण्य॒मिदथा॒ रथं॒ हरी॒ यम॑स्य॒ वह॑तो॒ वि सू॒रिभिः॑। आ ति॑ष्ठति म॒घवा॒ सन॑श्रुत॒ इन्द्रो॒ वाज॑स्य दी॒र्घश्र॑वस॒स्पतिः॑॥

विद्वानों द्वारा राजा या शासक ओजस्वी सर्वहित-रमणीय तथा स्वरमणीय तथा राष्ट्र का वहन करते हैं, एवं परम्परा से प्रसिद्ध दीर्घकालीन कीर्तिवाले भोग-ऐश्वर्य का स्वामी राजा बनता है॥३॥

सो चि॒न्नु वृ॒ष्टिर्यू॒थ्या॒३॒॑ स्वा सचाँ॒ इन्द्रः॒ श्मश्रू॑णि॒ हरि॑ता॒भि प्रु॑ष्णुते। अव॑ वेति सु॒क्षयं॑ सु॒ते मधूदिद्धू॑नोति॒ वातो॒ यथा॒ वन॑म्॥

राष्ट्र में उत्तम वृष्टि होने पर राजा सभा के साथ हरे-भरे कृषि धान्यों को देखकर अपने को सफल मानता है और विरोधी दुष्टकाल आदि को नष्ट करता है॥४॥

यो वा॒चा विवा॑चो मृ॒ध्रवा॑चः पु॒रू स॒हस्राशि॑वा ज॒घान॑। तत्त॒दिद॑स्य॒ पौंस्यं॑ गृणीमसि पि॒तेव॒ यस्तवि॑षीं वावृ॒धे शवः॑॥

राजा अपने शासन वज्र से विविध वाणीवाले और हिंसक वाणीवाले अहितचिन्तक जनों या शत्रुओं का हनन करे तथा पिता की भाँति प्रजा के बल और धन को बढ़ाता रहे, वह प्रजा द्वारा प्रशंसा के योग्य होता है॥५॥

स्तोमं॑ त इन्द्र विम॒दा अ॑जीजन॒न्नपू॑र्व्यं पुरु॒तमं॑ सु॒दान॑वे। वि॒द्मा ह्य॑स्य॒ भोज॑नमि॒नस्य॒ यदा प॒शुं न गो॒पाः क॑रामहे॥

प्रजा को उत्तम सुख देनेवाले राजा के राष्ट्र में विशेषरूप से हर्षित सुखी प्रजा बहुत प्रकार से उत्तम अन्न आदि तथा उपहार दिया करें। ऐसे सुख देनेवाले शासक का प्रजाएँ सत्कार किया करती हैं। जैसे दूध देनेवाले पशु का प्रतिदान-आहारदान से सत्कार करते हैं॥६॥

माकि॑र्न ए॒ना स॒ख्या वि यौ॑षु॒स्तव॑ चेन्द्र विम॒दस्य॑ च॒ ऋषेः॑। वि॒द्मा हि ते॒ प्रम॑तिं देव जामि॒वद॒स्मे ते॑ सन्तु स॒ख्या शि॒वानि॑॥

शासक और शास्य प्रजा वर्ग के पारस्परिक सखिभाव सदा बने रहने चाहिए और वंशज सम्बन्ध के समान कल्याणकारी होवें॥७॥

इन्द्र॒ सोम॑मि॒मं पि॑ब॒ मधु॑मन्तं च॒मू सु॒तम्। अ॒स्मे र॒यिं नि धा॑रय॒ वि वो॒ मदे॑ सह॒स्रिणं॑ पुरूवसो॒ विव॑क्षसे॥

सभा और सेना में सम्पन्न राज्य ऐश्वर्य को राजा उत्तमरूप से भोगे। प्रजाओं के लिये सहस्रगुणित अर्थात् जितना राज्य शुल्क ग्रहण करे, उससे बहुत गुणें धन से प्रजा का पालन पोषण करे। प्रजा भी अपने हर्ष आनन्द के प्राप्त करने के निमित्त राजा की प्रशंसा किया करे, क्योंकि राजा एक महान् गुणवाला होता है॥१॥

त्वां य॒ज्ञेभि॑रु॒क्थैरुप॑ ह॒व्येभि॑रीमहे। शची॑पते शचीनां॒ वि वो॒ मदे॒ श्रेष्ठं॑ नो धेहि॒ वार्यं॒ विव॑क्षसे॥

प्रजाजनों को प्रजाहित तथा राष्ट्रहित विविध कर्मों में प्रेरित करनेवाले राजा का यज्ञिय भावनाओं, प्रशंसावचनों और उपहारों के द्वारा सत्कार करना चाहिये, क्योंकि राजा उन्हें श्रेष्ठ और वाञ्छनीय सुख प्रदान करता है॥२॥

यस्पति॒र्वार्या॑णा॒मसि॑ र॒ध्रस्य॑ चोदि॒ता। इन्द्र॑ स्तोतॄ॒णाम॑वि॒ता वि वो॒ मदे॑ द्वि॒षो नः॑ पा॒ह्यंह॑सो॒ विव॑क्षसे॥

प्रजाओं द्वारा वरने योग्य धनों का स्वामी राजा होता है। वह हितसाधक धन को प्रदान करता है तथा विद्यागुणों के प्रशंसक विद्वानों का रक्षक होता है, शत्रु और पाप से सब को बचाता है, सुख के निमित्त उसकी प्रशंसा करनी चाहिये, क्योंकि वह महान् है॥३॥

यु॒वं श॑क्रा माया॒विना॑ समी॒ची निर॑मन्थतम्। वि॒म॒देन॒ यदी॑ळि॒ता नास॑त्या नि॒रम॑न्थतम्॥

बुद्धिमान् सभापति और सेनापति राष्ट्रैश्वर्य को सिद्ध करते हैं और आनन्द से विराजमान हुए प्रजा के सुख को सिद्ध करते हैं॥४॥

विश्वे॑ दे॒वा अ॑कृपन्त समी॒च्योर्नि॒ष्पत॑न्त्योः। नास॑त्यावब्रुवन्दे॒वाः पुन॒रा व॑हता॒दिति॑॥

राष्ट्रैश्वर्य के लिये निरन्तर प्रगति करते हुए परस्पर सहयोग में वर्तमान हुए सभापति और सेनापतियों के कर्म को समस्त विद्वान् बल देवें और अनुमति देवें कि वे राष्ट्र का वहन करें-चलावें॥५॥

मधु॑मन्मे प॒राय॑णं॒ मधु॑म॒त्पुन॒राय॑नम्। ता नो॑ देवा दे॒वत॑या यु॒वं मधु॑मतस्कृतम्॥

कुशल राजसभेश तथा सेनेश के द्वारा सञ्चालित तथा रक्षित राष्ट्र में वर्त्तमान राष्ट्रपति का अन्य राष्ट्र में जाना मधुमय अर्थात् कल्याणकारी हो, वहाँ की प्रजाओं के लिये भी तथा अपने राष्ट्र में फिर आगमन भी कल्याणकारी हो, ऐसे सभेश और सेनेश स्वराष्ट्रवासियों को कल्याण से युक्त करें॥६॥

भ॒द्रं नो॒ अपि॑ वातय॒ मनो॒ दक्ष॑मु॒त क्रतु॑म्। अधा॑ ते स॒ख्ये अन्ध॑सो॒ वि वो॒ मदे॒ रण॒न्गावो॒ न यव॑से॒ विव॑क्षसे॥

परमात्मा के मित्रभाव में रहने पर वह हमारे मन, प्राणबल और इन्द्रियों के बल को कल्याणमार्ग की ओर चलाता है। उसके आश्रय पर ऐसे आनन्द में रमण करते हैं, जैसे गौवें घास के अन्दर रमण करती हैं॥१॥

हृ॒दि॒स्पृश॑स्त आसते॒ विश्वे॑षु सोम॒ धाम॑सु। अधा॒ कामा॑ इ॒मे मम॒ वि वो॒ मदे॒ वि ति॑ष्ठन्ते वसू॒यवो॒ विव॑क्षसे॥

सभी स्थानों में तुझे प्राप्त करने को, तेरे अन्दर वास के इच्छुक उपासकों की कामनाएँ बनी रहती हैं॥२॥

उ॒त व्र॒तानि॑ सोम ते॒ प्राहं मि॑नामि पा॒क्या॑। अधा॑ पि॒तेव॑ सू॒नवे॒ वि वो॒ मदे॑ मृ॒ळा नो॑ अ॒भि चि॑द्व॒धाद्विव॑क्षसे॥

विशेष परिपक्व बुद्धि से परमात्मा के आदेशों को पालन करना चाहिये। वह पुत्र को पिता के समान होनेवाले घातक प्रहार से बचाता है॥३॥

समु॒ प्र य॑न्ति धी॒तयः॒ सर्गा॑सोऽव॒ताँ इ॑व। क्रतुं॑ नः सोम जी॒वसे॒ वि वो॒ मदे॑ धा॒रया॑ चम॒साँ इ॑व॒ विव॑क्षसे॥

उपासकों की प्रज्ञाएँ और कर्मप्रवृत्तियाँ परमात्मा की ओर ऐसे झुकी रहती हैं, जैसे जलप्रवाह निम्न स्थान की ओर झुके रहते हैं। वह हमारे जीवन के लिये हमें अपने आनन्दरसों का पात्र बनाता है। हमें उसकी शरण में रहना चाहिये॥४॥

तव॒ त्ये सो॑म॒ शक्ति॑भि॒र्निका॑मासो॒ व्यृ॑ण्विरे। गृत्स॑स्य॒ धीरा॑स्त॒वसो॒ वि वो॒ मदे॑ व्र॒जं गोम॑न्तम॒श्विनं॒ विव॑क्षसे॥

वाञ्छनीय परमात्मा का नियम से नित्य योगाभ्यास आदि द्वारा ध्यान करनेवाले उपासक जन शोभन इन्द्रियवाले और प्रशस्त मनवाले शरीर की प्राप्त होते हैं। तभी वे परमात्मा का हर्षप्रद स्वरूप अनुभव करते हैं॥५॥

प॒शुं नः॑ सोम रक्षसि पुरु॒त्रा विष्ठि॑तं॒ जग॑त्। स॒माकृ॑णोषि जी॒वसे॒ वि वो॒ मदे॒ विश्वा॑ स॒म्पश्य॒न्भुव॑ना॒ विव॑क्षसे॥

परमात्मा आत्मा का रक्षक है। सभी प्राणियों के जीवन के लिये सर्व प्रकार की विविध सृष्टि करता है। उसके हर्षप्रद स्वरूप को प्राप्त करना चाहिये॥६॥

त्वं नः॑ सोम वि॒श्वतो॑ गो॒पा अदा॑भ्यो भव। सेध॑ राज॒न्नप॒ स्रिधो॒ वि वो॒ मदे॒ मा नो॑ दुः॒शंस॑ ईशता॒ विव॑क्षसे॥

परमात्मा किसी से भी बाधित न होनेवाला सदा रक्षक और हिंसकों को नष्ट करनेवाला है। हम पर अन्यथा अधिकार करनेवाले न हों, अतः उसके विशेष हर्षप्रद स्वरूप को हम धारण करें। वह महान् है॥७॥

त्वं नः॑ सोम सु॒क्रतु॑र्वयो॒धेया॑य जागृहि। क्षे॒त्र॒वित्त॑रो॒ मनु॑षो॒ वि वो॒ मदे॑ द्रु॒हो नः॑ पा॒ह्यंह॑सो॒ विव॑क्षसे॥

परमात्मा उपासक को उत्तम बुद्धि देनेवाला एवं जीवन-प्रदाता है तथा उत्तम देह को भी प्राप्त करानेवाला है। वह द्रोही मनुष्य और पाप से भी बचाता है। इसलिये विशेष हर्ष के निमित्त उसकी स्तुति करनी चाहिये॥८॥

त्वं नो॑ वृत्रहन्त॒मेन्द्र॑स्येन्दो शि॒वः सखा॑। यत्सीं॒ हव॑न्ते समि॒थे वि वो॒ मदे॒ युध्य॑मानास्तो॒कसा॑तौ॒ विव॑क्षसे॥

परमात्मा उपासक के पापों को नष्ट करनेवाला और आनन्दरस से पूर्ण करनेवाला कल्याणकारी मित्र है। गृहस्थ आश्रम में संतानों की प्राप्ति के लिये वह स्तुति करने योग्य है॥९॥

अ॒यं घ॒ स तु॒रो मद॒ इन्द्र॑स्य वर्धत प्रि॒यः। अ॒यं क॒क्षीव॑तो म॒हो वि वो॒ मदे॑ म॒तिं विप्र॑स्य वर्धय॒द्विव॑क्षसे॥

शीघ्र प्रियकारी परमात्मा उपासक के हृदय में साक्षात् होता है। वह संयमी उपासक की बुद्धि को बढ़ाता है, उत्पन्न करता है। इसलिये उसकी स्तुति करनी चाहिये॥१०॥

अ॒यं विप्रा॑य दा॒शुषे॒ वाजाँ॑ इयर्ति॒ गोम॑तः। अ॒यं स॒प्तभ्य॒ आ वरं॒ वि वो॒ मदे॒ प्रान्धं श्रो॒णं च॑ तारिष॒द्विव॑क्षसे॥

स्वात्मसमर्पण-कर्ता उपासक के लिये परमात्मा प्रशंसनीय अमृत भोगों को प्रदान करता है। उन प्रगतिशील उपासकों के लिये श्रवण करने योग्य उत्कृष्ट वर मोक्षाननद को बढ़ाता है। उसकी स्तुति करनी चाहिये॥११॥

प्र ह्यच्छा॑ मनी॒षा स्पा॒र्हा यन्ति॑ नि॒युतः॑। प्र द॒स्रा नि॒युद्र॑थः पू॒षा अ॑विष्टु॒ माहि॑नः॥

उपासकों की प्रशस्त मानसिक स्तुतियाँ पोषणकर्ता परमात्मा को जब प्राप्त होती हैं, तो वह दर्शनीय महान् मोक्षदाता परमात्मा उसके लिये मोक्षस्थान को सुरक्षित रखता है॥१॥

यस्य॒ त्यन्म॑हि॒त्वं वा॒ताप्य॑म॒यं जनः॑। विप्र॒ आ वं॑सद्धी॒तिभि॒श्चिके॑त सुष्टुती॒नाम्॥

बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि जिस पोषण-कर्त्ता परमात्मा की कृपा से अन्नादि भोग को अपने कर्मानुसार प्राप्त करता है, सेवन करता है, उस परमात्मा को स्तुतियों द्वारा स्मरण करे॥२॥

स वे॑द सुष्टुती॒नामिन्दु॒र्न पू॒षा वृषा॑। अ॒भि प्सुरः॑ प्रुषायति व्र॒जं न॒ आ प्रु॑षायति॥

पोषणकर्त्ता परमात्मा स्तुतियों द्वारा चन्द्रमा की भाँति अपने आनन्द रस से उपासकों को तृप्त करता है और प्रत्येक इन्द्रियस्थान में भी अपने आनन्द की अनुभूति कराता है॥३॥

मं॒सी॒महि॑ त्वा व॒यम॒स्माकं॑ देव पूषन्। म॒ती॒नां च॒ साध॑नं॒ विप्रा॑णां चाध॒वम्॥

उसके अस्तित्व माननेवाले, उस उत्पन्न पथ पर ले जानेवाले पापशासक परमात्मा को उपासक जन स्तुतियों द्वारा प्रसन्न करते हैं-अनुकूल बनाते हैं॥४॥

प्रत्य॑र्धिर्य॒ज्ञाना॑मश्वह॒यो रथा॑नाम्। ऋषिः॒ स यो मनु॑र्हितो॒ विप्र॑स्य यावयत्स॒खः॥

परमात्मा समस्त श्रेष्ठ कर्मों का पोषक, रमणीय पदार्थों का महान् प्रेरक, मननशील उपासकों का हितकर मिलनेवाला मित्र और पोषणकर्त्ता सर्वज्ञ है॥५॥

आ॒धीष॑माणायाः॒ पतिः॑ शु॒चाया॑श्च शु॒चस्य॑ च। वा॒सो॒वा॒योऽवी॑ना॒मा वासां॑सि॒ मर्मृ॑जत्॥

उषा और सूर्य का स्वामी परमात्मा समस्त पृथिव्यादी पिण्डों के वस्त्ररूप मण्डलों आवरणों को उषा और सूर्य के द्वारा शोभन करता है॥६॥

इ॒नो वाजा॑नां॒ पति॑रि॒नः पु॑ष्टी॒नां सखा॑। प्र श्मश्रु॑ हर्य॒तो दू॑धो॒द्वि वृथा॒ यो अदा॑भ्यः॥

परमात्मा सब जगत् का स्वामी सब बलों का स्वामी सब आत्मा-पुष्टिवालों का सखारूप स्वामी है। कामना करनेवाले उपासक का रोम हर्षित कर देता है। ऐसा वह अबाध्य स्वामी उपासनायोग्य है॥७॥

आ ते॒ रथ॑स्य पूषन्न॒जा धुरं॑ ववृत्युः। विश्व॑स्या॒र्थिनः॒ सखा॑ सनो॒जा अन॑पच्युतः॥

परमात्मा के आश्रय मोक्ष धाम की प्राप्ति उसकी स्तुतियों के द्वारा होती है। प्रत्येक उपासकों का वह शाश्वतिक अनश्वर मित्र है॥८॥

अ॒स्माक॑मू॒र्जा रथं॑ पू॒षा अ॑विष्टु॒ माहि॑नः। भुव॒द्वाजा॑नां वृ॒ध इ॒मं नः॑ शृणव॒द्धव॑म्॥

परमात्मा महान् पोषक है। वह अपने शाश्वतिक ज्ञानबल से हमारे लिये मोक्ष को प्रदान करता है और विविध अमृतान्न भोगों का बढ़ानेवाला हमारी प्रार्थना को स्वीकार करनेवाला है॥९॥

अस॒त्सु मे॑ जरितः॒ साभि॑वे॒गो यत्सु॑न्व॒ते यज॑मानाय॒ शिक्ष॑म्। अना॑शीर्दाम॒हम॑स्मि प्रह॒न्ता स॑त्य॒ध्वृतं॑ वृजिना॒यन्त॑मा॒भुम्॥

परमात्मा का यह शाश्वतिक स्वभाव है कि वह अपने प्रति समर्पणकर्त्ता उपासक को अपना आनन्द प्रदान करता है और नास्तिक, पापाचरण, अन्यथा पीडक मनुष्य को नष्ट करता है॥१॥

यदीद॒हं यु॒धये॑ सं॒नया॒न्यदे॑वयून्त॒न्वा॒३॒॑ शूशु॑जानान्। अ॒मा ते॒ तुम्रं॑ वृष॒भं प॑चानि ती॒व्रं सु॒तं प॑ञ्चद॒शं नि षि॑ञ्चम्॥

परमात्मा की सहायता से उपासक जन बड़े क्रोधी और नास्तिक जनों के साथ आत्मशक्ति से युद्ध करके उनको परमात्मा के उपासक-आस्तिक बनाते हैं और अपने अन्दर के प्रबल पापों को समाप्त करते हैं तथा निज मन और आत्मा में ओज-आत्मिक तेज को धारण करते हैं॥२॥

नाहं तं वे॑द॒ य इति॒ ब्रवी॒त्यदे॑वयून्त्स॒मर॑णे जघ॒न्वान्। य॒दावाख्य॑त्स॒मर॑ण॒मृघा॑व॒दादिद्ध॑ मे वृष॒भा प्र ब्रु॑वन्ति॥

मनुष्य किसी भी संग्राम-प्रसङ्ग में अपने विरोधी को बिना परमात्मा की सहायता पाये परास्त नहीं कर सकता। देवासुरवृत्तियों के आन्तरिक संग्राम में परमात्मा की सहायता की आवश्यकता है, अतः उस परमात्मा के गुण, कर्म, पौरुष की स्तुति करनी चाहिये॥३॥

यदज्ञा॑तेषु वृ॒जने॒ष्वासं॒ विश्वे॑ स॒तो म॒घवा॑नो म आसन्। जि॒नामि॒ वेत्क्षेम॒ आ सन्त॑मा॒भुं प्र तं क्षि॑णां॒ पर्व॑ते पाद॒गृह्य॑॥

परमात्मा के बल अनन्त हैं, जो कि मनुष्यों द्वारा न जानने योग्य हैं। अध्यात्मयज्ञ करनेवाले उपासक उसे जानते हैं-मानते हैं। उसके कल्याण के निमित्त आक्रमणकारी पाप और पापी को अपने अज्ञात बलों से वह नष्ट-भ्रष्ट कर देता है॥४॥

न वा उ॒ मां वृ॒जने॑ वारयन्ते॒ न पर्व॑तासो॒ यद॒हं म॑न॒स्ये। मम॑ स्व॒नात्कृ॑धु॒कर्णो॑ भयात ए॒वेदनु॒ द्यून्कि॒रणः॒ समे॑जात्॥

परमात्मा को उसके बलप्रदर्शन से कोई हटा नहीं सकता। पर्वत जैसे महान् बलवान् भी उसको रोक नहीं सकते। सूर्य भी उसके अधीन चमकता है, प्रकाश देता है और अल्पशक्तिवाला जीवात्मा उससे भय खाता है-कर्मों के अनुसार फलों को भोगता ही है॥५॥

दर्श॒न्न्वत्र॑ शृत॒पाँ अ॑नि॒न्द्रान्बा॑हु॒क्षदः॒ शर॑वे॒ पत्य॑मानान्। घृषुं॑ वा॒ ये नि॑नि॒दुः सखा॑य॒मध्यू॒ न्वे॑षु प॒वयो॑ ववृत्युः॥

नास्तिक आक्रमणकारी दूसरों का रक्त, मांस पीने खानेवाले जनों को परमात्मा देखता है-जानता है और उसका विरोध करनेवाले आस्तिक जन को भी जानता है, वह सर्वज्ञ परमात्मा दुष्टों पर प्रहार करता है॥६॥

अभू॒र्वौक्षी॒र्व्यु१॒॑ आयु॑रान॒ड्दर्ष॒न्नु पूर्वो॒ अप॑रो॒ नु द॑र्षत्। द्वे प॒वस्ते॒ परि॒ तं न भू॑तो॒ यो अ॒स्य पा॒रे रज॑सो वि॒वेष॑॥

परमात्मा संसार के बीजरूप अव्यक्त प्रकृति को सींचता है। अपनी शक्ति से सींचकर वृक्ष बनाता है और जीवन धारण्वाले आत्मा को भी व्याप्त होता है। परमात्मा संसार तथा प्रकृति के भी बाहर है। इन दोनों प्रकृति और जीवात्मा को स्ववश किये हुए है, इसीलिये वह प्रकृति को विभक्त कर संसार को बनाने में और जीवात्मा को कर्मफल देने में समर्थ है॥७॥

गावो॒ यवं॒ प्रयु॑ता अ॒र्यो अ॑क्ष॒न्ता अ॑पश्यं स॒हगो॑पा॒श्चर॑न्तीः। हवा॒ इद॒र्यो अ॒भितः॒ समा॑य॒न्किय॑दासु॒ स्वप॑तिश्छन्दयाते॥

गौएँ जैसे चरती हुई अपने गोपाल स्वामी द्वारा पुकारी जाती हुई उसके पास पहुँचती हैं। वह उन्हें अनेक प्रकार के स्नेह भाव प्रदर्शित करता है। उसी प्रकार स्तुति करनेवाले उपासक जन परमात्मा के प्रति स्नेह भाव को रखते हुए उसके स्नेह के भागी बनते हैं॥८॥

सं यद्वयं॑ यव॒सादो॒ जना॑नाम॒हं य॒वाद॑ उ॒र्वज्रे॑ अ॒न्तः। अत्रा॑ यु॒क्तो॑ऽवसा॒तार॑मिच्छा॒दथो॒ अयु॑क्तं युनजद्वव॒न्वान्॥

उत्पन्न हुए प्राणियों, अन्न खानेवाले मनुष्यों और घास खानेवाले पशुओं के हृदय में परमात्मा विराजमान है। उस सहयोगी परमात्मा को समागमार्थ चाहे और मनको उसके अन्दर जोड़े-लगावे॥९॥

अत्रेदु॑ मे मंससे स॒त्यमु॒क्तं द्वि॒पाच्च॒ यच्चतु॑ष्पात्संसृ॒जानि॑। स्त्री॒भिर्यो अत्र॒ वृष॑णं पृत॒न्यादयु॑द्धो अस्य॒ वि भ॑जानि॒ वेदः॑॥

मनुष्य को यह बात निश्चय जाननी चाहिये कि दो पैरवाले और चार पैरवाले सभी प्राणी मात्र को परमात्मा उत्पन्न करता है। जो उस के प्रति विरोध करता है, वह उसे धन और बल से विहीन कर देता है॥१०॥

यस्या॑न॒क्षा दु॑हि॒ता जात्वास॒ कस्तां वि॒द्वाँ अ॒भि म॑न्याते अ॒न्धाम्। क॒त॒रो मे॒निं प्रति॒ तं मु॑चाते॒ य ईं॒ वहा॑ते॒ य ईं॑ वा वरे॒यात्॥

ज्ञान-शून्य प्रकृति जीवमात्र के लिये विविध भोगों का दोहन करती है। जो प्रलयकाल में अपने रूप में रहती है, उसे कोई विद्वान् स्वरूपतः ठीक-ठीक नहीं जान सकता और न उससे मुक्त हो सकता है। उसके बन्धन में प्रत्येक जीव रहता है, परन्तु जो उसको ठीक सहन करने में समर्थ होता है, वह ही उससे मुक्त हो सकता है॥११॥

किय॑ती॒ योषा॑ मर्य॒तो व॑धू॒योः परि॑प्रीता॒ पन्य॑सा॒ वार्ये॑ण। भ॒द्रा व॒धूर्भ॑वति॒ यत्सु॒पेशाः॑ स्व॒यं सा मि॒त्रं व॑नुते॒ जने॑ चित्॥

वह वधू भाग्यशालिनी है, जो वधू को चाहनेवाले वर की प्रशंसाभाजन अन्य वस्तुओं द्वारा सन्तुष्ट रहती है और सुभूषित हुई जनसमुदाय में वर को वरती है॥१२॥

प॒त्तो ज॑गार प्र॒त्यञ्च॑मत्ति शी॒र्ष्णा शिरः॒ प्रति॑ दधौ॒ वरू॑थम्। आसी॑न ऊ॒र्ध्वामु॒पसि॑ क्षिणाति॒ न्य॑ङ्ङुत्ता॒नामन्वे॑ति॒ भूमि॑म्॥

उपासक जन परमात्मा को जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय स्थानवाले स्वरूप से अनुभव करते हैं। वह परमात्मा उत्पन्न जगत् को विलीन कर प्रकृतिरूप में कर देता है, पुनः उस व्याप्त प्रकृति को अपने आश्रय जगद्रूप में परिणत कर देता है॥१३॥

बृ॒हन्न॑च्छा॒यो अ॑पला॒शो अर्वा॑ त॒स्थौ मा॒ता विषि॑तो अत्ति॒ गर्भः॑। अ॒न्यस्या॑ व॒त्सं रि॑ह॒ती मि॑माय॒ कया॑ भु॒वा नि द॑धे धे॒नुरूधः॑॥

परमात्मा महान् स्वस्वरूप में अनुपम केवल फलभोग से रहित सर्वत्र व्याप्त सब का निर्माता और अधिष्ठाता है। सब संसार को अपने अन्दर रखता है, सबकी स्थिति का स्थापक है। जीवात्मा को अपने आश्रय में कर्मफल भोग कराता है॥१४॥

स॒प्त वी॒रासो॑ अध॒रादुदा॑यन्न॒ष्टोत्त॒रात्ता॒त्सम॑जग्मिर॒न्ते। नव॑ प॒श्चाता॑त्स्थिवि॒मन्त॑ आय॒न्दश॒ प्राक्सानु॒ वि ति॑र॒न्त्यश्नः॑॥

परमात्मा ने घूमनेवाले पृथिवी आदि लोकों को, वायु आदि सूक्ष्म वसुओं को, चन्द्र आदि आश्रय पानेवाले ग्रहों और दूसरों को आश्रय देनेवाली दिशाओं को उत्पन्न कर धारा हुआ है॥१५॥

द॒शा॒नामेकं॑ कपि॒लं स॑मा॒नं तं हि॑न्वन्ति॒ क्रत॑वे॒ पार्या॑य। गर्भं॑ मा॒ता सुधि॑तं व॒क्षणा॒स्ववे॑नन्तं तु॒षय॑न्ती बिभर्ति॥

इन्द्रियों का इष्टदेव आत्मा है, उसे वे अपवर्ग-मोक्ष, भोगार्थ कर्म करने के लिये प्रेरित करती हैं। शरीर की नाड़ियों और भिन्न-भिन्न अङ्गों में प्रकृति स्थान देती है, शरीर को न छोड़ने की इच्छा रखनेवाले उस आत्मा को प्रकृति सन्तोष देती हुई धारण करती है॥१६॥

पीवा॑नं मे॒षम॑पचन्त वी॒रा न्यु॑प्ता अ॒क्षा अनु॑ दी॒व आ॑सन्। द्वा धनुं॑ बृह॒तीम॒प्स्व१॒॑न्तः प॒वित्र॑वन्ता चरतः पु॒नन्ता॑॥

आत्मा जब शरीर में आता है, तब प्रथम दशों प्राण प्राप्त होते हैं। उसके पीछे इन्द्रियों का विकास होता है और शरीर सर्वाङ्गों से पूर्ण हो जाता है। अन्दर के रसों को पवित्र करते हुए स्वयं पवित्र स्वरूप प्राण-अपान, श्वास-प्रश्वास चलते हैं॥१७॥

वि क्रो॑श॒नासो॒ विष्व॑ञ्च आय॒न्पचा॑ति॒ नेमो॑ न॒हि पक्ष॑द॒र्धः। अ॒यं मे॑ दे॒वः स॑वि॒ता तदा॑ह॒ द्र्व॑न्न॒ इद्व॑नवत्स॒र्पिर॑न्नः॥

भिन्न-भिन्न प्रकार के मानसिक गतिवाले जन विविध प्रकार से परमात्मा को पुकारते हुए या उसकी प्रार्थना करते हुए संसार में जन्म पाते हैं। कुछ परमात्मा और उसके ज्ञान को अपने अन्दर धारण कर पाते हैं और कुछ नहीं। उत्पादक परमात्मा अपने ज्ञान का उपदेश करेगा, ऐसी आशा रखता हुआ कोई आत्मा आता है। दूध घृत वनस्पति फल अन्न का भोक्ता सात्त्विक आहारी जन परमात्मा के ज्ञान को आत्मसात् करता है॥१८॥

अप॑श्यं॒ ग्रामं॒ वह॑मानमा॒राद॑च॒क्रया॑ स्व॒धया॒ वर्त॑मानम्। सिष॑क्त्य॒र्यः प्र यु॒गा जना॑नां स॒द्यः शि॒श्ना प्र॑मिना॒नो नवी॑यान्॥

परमात्मा अपनी विभु गति से जड़-जङ्गम-प्राणीसमूहरूप संसार को चलाता है और वह प्रथम से ही उत्पन्न होनेवाले प्राणियों के गुप्त इन्द्रियों को प्रकट करता हुआ स्त्री-पुरुषरूप युगलों को नियत करता है। जिससे कि प्राणी-संसार चले-चलता रहे॥१९॥

ए॒तौ मे॒ गावौ॑ प्रम॒रस्य॑ यु॒क्तौ मो षु प्र से॑धी॒र्मुहु॒रिन्म॑मन्धि। आप॑श्चिदस्य॒ वि न॑श॒न्त्यर्थं॒ सूर॑श्च म॒र्क उप॑रो बभू॒वान्॥

मरणधर्मशील प्राण-अपान गति करते हैं। बारम्बार शरीर पृथक् होते रहते हैं। पुनः-पुनः जन्मधारण करने के निमित्त बनते हैं। उपासक की आन्तरिक भावनाएँ पुनः-पुनः शरीरधारण करने से बचकर मोक्ष को चाहती हैं॥२०॥

अ॒यं यो वज्रः॑ पुरु॒धा विवृ॑त्तो॒ऽवः सूर्य॑स्य बृह॒तः पुरी॑षात्। श्रव॒ इदे॒ना प॒रो अ॒न्यद॑स्ति॒ तद॑व्य॒थी ज॑रि॒माण॑स्तरन्ति॥

दुःखों से बचानेवाला जीवों के अन्दर जीवनप्राण होता है। सूर्य के समान जगत्प्रकाशक परमात्मा की कृपा से यह प्राप्त होता है। इससे ऊँचा मोक्ष जीवन है, जिसको दोषरहित स्तुति करनेवाले उपासक प्राप्त किया करते हैं॥२१॥

वृ॒क्षेवृ॑क्षे॒ निय॑ता मीमय॒द्गौस्ततो॒ वयः॒ प्र प॑तान्पूरु॒षादः॑। अथे॒दं विश्वं॒ भुव॑नं भयात॒ इन्द्रा॑य सु॒न्वदृष॑ये च॒ शिक्ष॑त्॥

प्रत्येक प्राणिशरीर नश्वर है, उसके लिये मृत्यु नियत है। नाना प्रकार के आघातों और रोगों से मृत्यु का ग्रास बन जाता है। यह देख उपासक अमृतरूप परमात्मा की उपासना करता है॥२२॥

दे॒वानां॒ माने॑ प्रथ॒मा अ॑तिष्ठन्कृ॒न्तत्रा॑देषा॒मुप॑रा॒ उदा॑यन्। त्रय॑स्तपन्ति पृथि॒वीम॑नू॒पा द्वा बृबू॑कं वहतः॒ पुरी॑षम्॥

आरम्भ सृष्टि में देवों अर्थात् प्रमुख सूर्य आदि पदार्थों का निर्माण होता है। आकाश में से मेघ जल बरसाते हैं। पृथिवी के वनस्पति आदि पदार्थों को मेघ वायु और सूर्य उत्पन्न तथा पुष्ट करते हैं। सूर्य जलों को भापरूप में ऊपर खींचता है और वायु उन्हें धारण करता है, पुनः वृष्टिरूप में जल वर्षता है॥२३॥

सा ते॑ जी॒वातु॑रु॒त तस्य॑ विद्धि॒ मा स्मै॑ता॒दृगप॑ गूहः सम॒र्ये। आ॒विः स्वः॑ कृणु॒ते गूह॑ते बु॒सं स पा॒दुर॑स्य नि॒र्णिजो॒ न मु॑च्यते॥

सूर्य, वायु और मेघ प्राणधारी को जीवन देनेवाले हैं। जिस परमात्मा ने ये रचे हैं, उसे जानना चाहिये। जीवनयात्रा या जीवनसंग्राम में उसे भूलना न चाहिये, वह जीवन के सुख को प्रकाशित करता है। उसका पालन आदि व्यवहार क्षीण नहीं होता है॥२४॥

विश्वो॒ ह्य१॒॑न्यो अ॒रिरा॑ज॒गाम॒ ममेदह॒ श्वशु॑रो॒ ना ज॑गाम। ज॒क्षी॒याद्धा॒ना उ॒त सोमं॑ पपीया॒त्स्वा॑शितः॒ पुन॒रस्तं॑ जगायात्॥

जब शरीर बनना आरम्भ होता है, तब प्राण प्रथम से ही अपना कार्य आरम्भ कर देता है। आत्मा उस समय स्वज्ञानशक्ति से कार्य आरम्भ नहीं करता है। जब वह कार्य आरम्भ करने लगता है, तब जन्म पाकर संसार में अन्नादि को भोगता है और सोमादि ओषधियों का रस पान करता है। इस प्रकार संसार के भोगों को भोगकर वह अमर धाम मोक्ष को भी प्राप्त होता है। इस प्रकार राष्ट्र में राष्ट्रमन्त्री प्रथम राष्ट्र की व्यवस्था करता है। पुनः राष्ट्रपतिशासन अधिकार सम्भालता है। वह राष्ट्र में भाँति-भाँति के भोगों को भोगता है और सोमादि ओषधियों का रसपान करता है, अपने ऊँचे प्रतिष्ठापद को प्राप्त करता है॥१॥

स रोरु॑वद्वृष॒भस्ति॒ग्मशृ॑ङ्गो॒ वर्ष्म॑न्तस्थौ॒ वरि॑म॒न्ना पृ॑थि॒व्याः। विश्वे॑ष्वेनं वृ॒जने॑षु पामि॒ यो मे॑ कु॒क्षी सु॒तसो॑मः पृ॒णाति॑॥

शरीर के अन्दर चेतनाशक्तिमान् आत्मा चेतनत्व की अङ्गों में वृष्टि करता हुआ अपने को घोषित करता है-सिद्ध करता है। शरीर के अन्दर सर्वश्रेष्ठ हृदयप्रदेश में विराजमान रहता है। जीवन प्राण उसके भोग और अपवर्ग में साधन बनता है, ऐसे साधनरूप प्राण की वह रक्षा करता है तथा राष्ट्र में शस्त्रशक्तिमान् सुखवर्षक राजा राष्ट्रवासी प्रजाओं में सुख की वृष्टि करता हुआ अपने को प्रसिद्ध करता है। राष्ट्रभूमि के राजशासन पद पर विराजमान होता है। उसका राजमन्त्री सभाभाग और सेनाभाग को परिपुष्ट बनाता है। ऐसे राजमन्त्री की वह रक्षा करता है॥२॥

अद्रि॑णा ते म॒न्दिन॑ इन्द्र॒ तूया॑न्त्सु॒न्वन्ति॒ सोमा॒न्पिब॑सि॒ त्वमे॑षाम्। पच॑न्ति ते वृष॒भाँ अत्सि॒ तेषां॑ पृ॒क्षेण॒ यन्म॑घवन्हू॒यमा॑नः॥

आत्मा जब शरीर में आता है, तब उसे अनुमोदित करनेवाले वैद्य और प्रसन्न करनेवाले पारिवारिक जन अनेक रसों और भोग्य पदार्थों को उसके लिये तय्यार करते हैं और स्नेह से खिलाते पिलाते हैं, जिससे कि शरीर पुष्ट होता चला जावे तथा राजा राजपद पर विराजमान होता है, तब उसके प्रशंसक पुरोहित और प्रसन्न करनेवाले राजकर्मचारी सोमादि ओषधियों के रस और भोगों को तय्यार करते हैं। वह स्नेह से आदर पाया हुआ उनका सेवन करता है॥३॥

इ॒दं सु मे॑ जरित॒रा चि॑किद्धि प्रती॒पं शापं॑ न॒द्यो॑ वहन्ति। लो॒पा॒शः सिं॒हं प्र॒त्यञ्च॑मत्साः क्रो॒ष्टा व॑रा॒हं निर॑तक्त॒ कक्षा॑त्॥

प्राण की शक्ति से शरीर की नाड़ियाँ दूषित रस को नीचे बहा देती हैं और प्राण की शक्ति से घास खानेवाला लघु पशु भी सिंह आदि जैसे पशु को पछाड़ देता है तथा राष्ट्रमन्त्री ऐसी व्यवस्था करे कि नदियाँ दूषित पदार्थों को नीचे बहा ले जावें और राष्ट्रमन्त्री शाक अन्न आदि से पुष्ट होने की ऐसी व्यवस्था करे कि उनके खानेवाला सिंह आदि जैसे बलवान् विरोधी जन को पछाड़ दे॥४॥

क॒था त॑ ए॒तद॒हमा चि॑केतं॒ गृत्स॑स्य॒ पाक॑स्त॒वसो॑ मनी॒षाम्। त्वं नो॑ वि॒द्वाँ ऋ॑तु॒था वि वो॑चो॒ यमर्धं॑ ते मघवन्क्षे॒म्या धूः॥

आत्मा द्वारा प्राण पोषणीय है। समय-समय पर अपनी ज्ञानचेतना से वह उस प्राण की रक्षा करता है, अपनी चेतनाशक्ति से चेताता है तथा राजा के द्वारा राजमन्त्री रक्षणीय है। वह समय-समय पर उसे आदेश देता रहे और जो उसकी शासनशक्ति है, उससे भी अवगत रहे॥५॥

ए॒वा हि मां त॒वसं॑ व॒र्धय॑न्ति दि॒वश्चि॑न्मे बृह॒त उत्त॑रा॒ धूः। पु॒रू स॒हस्रा॒ नि शि॑शामि सा॒कम॑श॒त्रंय हि मा॒ जनि॑ता ज॒जान॑॥

शरीर में आत्मा बलवान् होता है। उसे शरीराङ्ग समृद्ध करते हैं। उसकी शरीर को धारण करने की शक्ति द्युलोक से भी उत्कृष्ट होती है, सहस्रों दोषों को क्षीण कर देता है। परमात्मा इसे शत्रुरहित शरीर में प्रकट करता है तथा राष्ट्र में राजा बलवान् होता है। उसे राज्य के अङ्ग समृद्ध करते हैं। उसकी राष्ट्र को धारण करने की शक्ति द्युलोक से भी उत्कृष्ट होती है। वह सहस्रों शत्रुओं को एक साथ नष्ट कर देता है। परमात्मा उसे शत्रुरहित बनाता है॥६॥

ए॒वा हि मां त॒वसं॑ ज॒ज्ञुरु॒ग्रं कर्म॑न्कर्म॒न्वृष॑णमिन्द्र दे॒वाः। वधीं॑ वृ॒त्रं वज्रे॑ण मन्दसा॒नोऽप॑ व्र॒जं म॑हि॒ना दा॒शुषे॑ वम्॥

शरीर के अन्दर परमात्मा जैसे आत्मा को बसाता है, ऐसे ही दिव्य शक्तियाँ रक्तवाहक जीवनप्रद सुखवर्षक प्राण को बसाती हैं। प्राण ओज के साथ विकसित होता हुआ आवरक रोग और मन को शरीर से बाहर निकालता है। इस प्रदान करनेवाले अङ्ग के लिए मार्ग खोलता है तथा राष्ट्र में परमात्मा जैसे अपने आदेशों नियमों से राजा को बनाता है, ऐसे ही विद्वान् लोग राज्यमन्त्री को बनाते हैं। राष्ट्र के प्रत्येक कर्मविभाग में सुख को बरसानेवाला राज्यमन्त्री होता है। वह बाहरी आक्रमणकारी को नष्ट करता है और शुल्कोपहार देनेवाले का मार्ग खोलता है॥७॥

दे॒वास॑ आयन्पर॒शूँर॑बिभ्र॒न्वना॑ वृ॒श्चन्तो॑ अ॒भि वि॒ड्भिरा॑यन्। नि सु॒द्र्वं१॒॑ दध॑तो व॒क्षणा॑सु॒ यत्रा॒ कृपी॑ट॒मनु॒ तद्द॑हन्ति॥

प्राणीशरीर के दूषित हो जाने पर शल्यचिकित्सक तथा ओषधचिकित्सक नाड़ियों में बहते हुए रक्त के स्थान पर जलवाले अङ्ग को शस्त्र से छेद कर या औषधों से दग्ध कर स्वस्थ बनाते हैं तथा राष्ट्र बाह्य उपद्रव से ग्रस्त हो, तो शस्त्रधारी योद्धाओं और विविध सेनाओं के द्वारा उपद्रवकारियों को नष्ट करके क्षत-विक्षत किये हुए शत्रुओं के शरीरों को जलाशय के समीप भस्म कर दें॥८॥

श॒शः क्षु॒रं प्र॒त्यञ्चं॑ जगा॒राद्रिं॑ लो॒गेन॒ व्य॑भेदमा॒रात्। बृ॒हन्तं॑ चिदृह॒ते र॑न्धयानि॒ वय॑द्व॒त्सो वृ॑ष॒भं शूशु॑वानः॥

प्राण के प्रबल होने पर शश जैसा छोटा प्राणी भी तीक्ष्ण पञ्जोंवाले सिंह जैसे पशु को परास्त कर देता है। मांसवाले अङ्ग पर्वतसदृश कठोर प्रदेश को छिन्न-भिन्न कर देता है। लघु शरीर के लिए महा शरीरवाले को दबा देता है। प्राण के प्रभाव से छोटा बच्चा भी बड़े सींगवाले को भगा देता है तथा कुशल राज्यमन्त्री के प्रभाव से साधारण प्रजाजन साधन से शस्त्रधारी शत्रु को परास्त कर देता है। हीन कायावाले प्रजाजन के लिए साँडसदृश सींगवाले को दूर भगा देता है॥९॥

सु॒प॒र्ण इ॒त्था न॒खमा सि॑षा॒याव॑रुद्धः परि॒पदं॒ न सिं॒हः। नि॒रु॒द्धश्चि॑न्महि॒षस्त॒र्ष्यावा॑न्गो॒धा तस्मा॑ अ॒यथं॑ कर्षदे॒तत्॥

शरीर में प्राण अपने प्रबल बन्धन को बाँधता है-या फैलाता है अपने क्षेत्र में, जैसे सिंह अपने रक्षास्थान को सुरक्षित रखता है और बलवान् भैंसे सदृश रोगों को प्रबल नाड़ी शक्ति से उसे बाहर निकाल फैंकता है तथा राष्ट्र में सुप्रगतिशील राज्यमन्त्री तीक्ष्ण शस्त्रों को रक्षार्थ बाँधता है। अपने क्षेत्र में सिंह जैसे अपने रक्षास्थान को पकड़ता है और भैंसे जैसे बलवान् शत्रु को विद्युत्तन्त्री द्वारा अपने क्षेत्र से बाहर निकाल फैंकता है॥१०॥

तेभ्यो॑ गो॒धा अ॒यथं॑ कर्षदे॒तद्ये ब्र॒ह्मणः॑ प्रति॒पीय॒न्त्यन्नैः॑। सि॒म उ॒क्ष्णो॑ऽवसृ॒ष्टाँ अ॑दन्ति स्व॒यं बला॑नि त॒न्वः॑ शृणा॒नाः॥

शरीर में अन्नदोषों से हुए रोग प्राण को हानि पहुँचाते हैं और शरीर के बलों को नष्ट करते हुए रसरक्त-सेचक पिण्डों को भी गला देते हैं, तथा राष्ट्र में अन्न को निमित्त बना-कर उपद्रवकारी राज्यमन्त्री को पीड़ित करते हैं और राष्ट्र के बलों को उद्दण्ड होकर नष्ट करते हुए राष्ट्र के बढ़ानेवाले विभागों को ध्वस्त करते हैं, उनको बिजली की तन्त्री या अस्त्रशक्ति से राष्ट्र से बाहर निकाल देना चाहिये॥११॥

ए॒ते शमी॑भिः सु॒शमी॑ अभूव॒न्ये हि॑न्वि॒रे त॒न्वः१॒॑ सोम॑ उ॒क्थैः। नृ॒वद्वद॒न्नुप॑ नो माहि॒ वाजा॑न्दि॒वि श्रवो॑ दधिषे॒ नाम॑ वी॒रः॥

उत्तम सुख के निमित्त अन्नों द्वारा श्रेष्ठ देहधारी बनना आत्मशक्ति के द्वारा उत्तम अध्यात्मभोगों को सिद्ध करना, यशस्वी प्रसिद्ध करना जीवन का लक्ष्य है तथा विविध अन्नों से राष्ट्र में सुखप्रसार करना, श्रेष्ठ कर्मों के आचरणों से शरीरवान् बनाना, राजा के आदेश में रहकर सुख भोगना, यशस्वी प्रसिद्ध करना, राज्य की सफलता है॥१२॥

वने॒ न वा॒ यो न्य॑धायि चा॒कञ्छुचि॑र्वां॒ स्तोमो॑ भुरणावजीगः। यस्येदिन्द्रः॑ पुरु॒दिने॑षु॒ होता॑ नृ॒णां नर्यो॒ नृत॑मः क्ष॒पावा॑न्॥

प्रलय के अनन्तर अग्नि आदि ऋषियों के अन्दर हितैषी परमात्मा के द्वारा प्रसिद्ध हुआ वेद प्रलयपर्यन्त मनुष्यों के कल्याणार्थ अध्यापक और पढ़ानेवाले के द्वारा पोषणीय-रक्षणीय है। वह परमात्मा उपासनीय है॥१॥

प्र ते॑ अ॒स्या उ॒षसः॒ प्राप॑रस्या नृ॒तौ स्या॑म॒ नृत॑मस्य नृ॒णाम्। अनु॑ त्रि॒शोकः॑ श॒तमाव॑ह॒न्नॄन्कुत्से॑न॒ रथो॒ यो अस॑त्सस॒वान्॥

महान् नेता परमात्मा की ज्ञानज्योति वेद सदा मार्गदर्शक है। उसमें वर्णित स्तुति, प्रार्थना, उपासना या ज्ञान, कर्म, उपासना में दीप्ति हुआ-प्रकाशमान हुआ परमात्मा का उपासक ज्ञान का धारण करनेवाला सबको ज्ञान देनेवाला आश्रय करने के योग्य है॥२॥

कस्ते॒ मद॑ इन्द्र॒ रन्त्यो॑ भू॒द्दुरो॒ गिरो॑ अ॒भ्यु१॒॑ग्रो वि धा॑व। कद्वाहो॑ अ॒र्वागुप॑ मा मनी॒षा आ त्वा॑ शक्यामुप॒मं राधो॒ अन्नैः॑॥

उपासक को परमात्मा की ऐसे मन्त्रों द्वारा स्तुतियाँ करनी चाहिये, जिससे कि वह परमात्मा उन्हें स्वीकार करे और अपने अन्दर किये उपासनाभावों से वह प्राप्त हो सके॥३॥

कदु॑ द्यु॒म्नमि॑न्द्र॒ त्वाव॑तो॒ नॄन्कया॑ धि॒या क॑रस॒य कन्न॒ आग॑न्। मि॒त्रो न स॒त्य उ॑रुगाय भृ॒त्या अन्ने॑ समस्य॒ यदस॑न्मनी॒षाः॥

परमात्मा उपासक जनों का मित्र है, उसकी विशेष स्तुति करनी चाहिये, जिससे संसार में रहते हुए ऊँचा यशस्वी बने और मुक्ति में उसके सङ्ग का आनन्दलाभ ले सके॥४॥

प्रेर॑य॒ सूरो॒ अर्थं॒ न पा॒रं ये अ॑स्य॒ कामं॑ जनि॒धा इ॑व॒ ग्मन्। गिर॑श्च॒ ये ते॑ तुविजात पू॒र्वीर्नर॑ इन्द्र प्रति॒शिक्ष॒न्त्यन्नैः॑॥

परमात्मा की स्तुति करनेवाले तथा उपासनारसों को भेंट देनेवाले उपासक जन अपने अभीष्ट मोक्ष को प्राप्त होते हैं, जैसे गृहस्थजन गृहस्थाश्रम के सुख को प्राप्त होते हैं॥५॥

मात्रे॒ नु ते॒ सुमि॑ते इन्द्र पू॒र्वी द्यौर्म॒ज्मना॑ पृथि॒वी काव्ये॑न। वरा॑य ते घृ॒तव॑न्तः सु॒तासः॒ स्वाद्म॑न्भवन्तु पी॒तये॒ मधू॑नि॥

परमात्मा ने अपने महान् बल ओर रचनाकौशल से द्युलोक और पृथ्वीलोक को रचा तथा रसीले अन्नों फलों से पूर्ण वनस्पतियों को भी उत्पन्न किया है। उपासक जन उसका संयम से मधुर स्वाद लेते हैं। वह स्तुति करने योग्य है॥६॥

आ मध्वो॑ अस्मा असिच॒न्नम॑त्र॒मिन्द्रा॑य पू॒र्णं स हि स॒त्यरा॑धाः। स वा॑वृधे॒ वरि॑म॒न्ना पृ॑थि॒व्या अ॒भि क्रत्वा॒ नर्यः॒ पौंस्यै॑श्च॥

अपने अन्तःकरण को उपासना द्वारा भरपूर करना चाहिये। परमात्मा ही स्थायी सुख का आधार है। वह शरीर के श्रेष्ठ प्रदेश हृदय में ज्ञान और योगाभ्यासों के द्वारा साक्षात् होता है॥७॥

व्या॑न॒ळिन्द्रः॒ पृत॑नाः॒ स्वोजा॒ आस्मै॑ यतन्ते स॒ख्याय॑ पू॒र्वीः। आ स्मा॒ रथं॒ न पृत॑नासु तिष्ठ॒ यं भ॒द्रया॑ सुम॒त्या चो॒दया॑से॥

ओजस्वी तथा ऐश्वर्यवान् परमात्मा मनुष्यों के अन्तःकरणों में व्याप्त रहता है। उपासक जन मित्रभाव के लिए उसे अपनाना चाहते हैं। उनके अन्दर परमात्मा अपने आनन्दरस को स्तुतियों द्वारा प्रेरित किया करता है॥८॥

सूक्तम्

प्र दे॑व॒त्रा ब्रह्म॑णे गा॒तुरे॑त्व॒पो अच्छा॒ मन॑सो॒ न प्रयु॑क्ति। म॒हीं मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य धा॒सिं पृ॑थु॒ज्रय॑से रीरधा सुवृ॒क्तिम्॥

राजा राजपद पर विराजमान होकर प्रजाओं के रक्षणहेतु उनसे सम्पर्क बनाये रखे और पुरोहित को चाहिये कि वह राजा को ऐश्वर्यभोग के साथ-साथ मुक्तिप्राप्ति के साधनों का उपदेश देता रहे॥१॥

अध्व॑र्यवो ह॒विष्म॑न्तो॒ हि भू॒ताच्छा॒प इ॑तोश॒तीरु॑शन्तः। अव॒ याश्चष्टे॑ अरु॒णः सु॑प॒र्णस्तमास्य॑ध्वमू॒र्मिम॒द्या सु॑हस्ताः॥

नवराजा के राजसूययज्ञ में ऋत्विग्जन आमन्त्रित हुए राजसूययज्ञ का आरम्भ करें और प्रजाजन भी उस राजसूययज्ञ में राजा को राजपद पर विराजमान हुए को देखें। वह राजा उन प्रजाओं का उत्तम पालन करने का लक्ष्य बनाकर उन्हें अपनावे। प्रजाएँ भी उसे विविध उपहार प्रदान करें॥२॥

अध्व॑र्यवो॒ऽप इ॑ता समु॒द्रम॒पां नपा॑तं ह॒विषा॑ यजध्वम्। स वो॑ दददू॒र्मिम॒द्या सुपू॑तं॒ तस्मै॒ सोमं॒ मधु॑मन्तं सुनोत॥

राजसूययज्ञ में ऋत्विक् लोग प्रजाजनों का राजा के साथ उपहार द्वारा परिचय समागम करावें। प्रजाओं द्वारा प्राप्त उपहार में से राजा ऋत्विजों को भी प्रदान कर उसका सत्कार करे॥३॥

यो अ॑नि॒ध्मो दीद॑यद॒प्स्व१॒॑न्तर्यं विप्रा॑स॒ ईळ॑ते अध्व॒रेषु॑। अपां॑ नपा॒न्मधु॑मतीर॒पो दा॒ याभि॒रिन्द्रो॑ वावृ॒धे वी॒र्या॑य॥

स्वदेशी जनों में जो जन अपने गुणप्रभावों से प्रसिद्ध होता है, पुरोहितादि ऋत्विज् लोग राजसूय यज्ञ द्वारा राजपद पर उसे बिठाते हैं। प्रजाजनों द्वारा राजा बल पराक्रम को प्राप्त होता है, उसे सदा प्रजा को सुखी रखना चाहिये॥४॥

याभिः॒ सोमो॒ मोद॑ते॒ हर्ष॑ते च कल्या॒णीभि॑र्युव॒तिभि॒र्न मर्यः॑। ता अ॑ध्वर्यो अ॒पो अच्छा॒ परे॑हि॒ यदा॑सि॒ञ्चा ओष॑धीभिः पुनीतात्॥

राजा को चाहिये कि प्रजाओं के साथ समागम और हर्ष आनन्द को प्राप्त करे। ऋत्विक् जैसे राजा का राज्याभिषेक करे, वैसे प्रजा के प्रतिनिधि प्रमुखजनों को अधिकारपद पर नियुक्त करने ले लिये अभिषिक्त एवं प्रतिज्ञाबद्ध करे॥५॥

ए॒वेद्यूने॑ युव॒तयो॑ नमन्त॒ यदी॑मु॒शन्नु॑श॒तीरेत्यच्छ॑। सं जा॑नते॒ मन॑सा॒ सं चि॑कित्रेऽध्व॒र्यवो॑ धि॒षणाप॑श्च दे॒वीः॥

राजा प्रजाजन परस्पर वैर भाव से रहित एक दूसरे से मिश्रण स्वभाव रखनेवाले होने चाहिएँ और राष्ट्र के अन्य नेताजन भी उत्तम गुणों से युक्त हुए सहमति से वर्तें॥६॥

यो वो॑ वृ॒ताभ्यो॒ अकृ॑णोदु लो॒कं यो वो॑ म॒ह्या अ॒भिश॑स्ते॒रमु॑ञ्चत्। तस्मा॒ इन्द्रा॑य॒ मधु॑मन्तमू॒र्मिं दे॑व॒माद॑नं॒ प्र हि॑णोतनापः॥

राजा जैसे प्रजाओं को कृपा और रक्षा से स्वीकार करता है-अपनाता है तथा विरोधी के प्रहारों से बचाता है, वैसे ही प्रजा को भी राजा के लिये भाँति-भाँति की उत्तम वस्तुएँ भेंट देनी चाहिये॥७॥

प्रास्मै॑ हिनोत॒ मधु॑मन्तमू॒र्मिं गर्भो॒ यो वः॑ सिन्धवो॒ मध्व॒ उत्सः॑। घृ॒तपृ॑ष्ठ॒मीड्य॑मध्व॒रेष्वापो॑ रेवतीः शृणु॒ता हवं॑ मे॥

प्रजाएँ राष्ट्र का आधार हैं, उनकी ओर से मर्यादा से दिया हुआ राजा के लिये उपहारभाग ग्रहण करने योग्य है, राष्ट्रकार्य में उत्साह व प्रेरणा का देनेवाला है, इसलिये अवश्य देना चाहिये॥८॥

तं सि॑न्धवो मत्स॒रमि॑न्द्र॒पान॑मू॒र्मिं प्र हे॑त॒ य उ॒भे इय॑र्ति। म॒द॒च्युत॑मौशा॒नं न॑भो॒जां परि॑ त्रि॒तन्तुं॑ वि॒चर॑न्त॒मुत्स॑म्॥

प्रजाओं द्वारा राजा के लिये अपने योगक्षेम से बचे हुए दातव्यभाग को देना ही चाहिये। वह राजा के लिए साधिकार प्राप्त करने योग्य है। राजा और प्रजा के लिये राष्ट्र में सुख का संचार करनेवाला उभयलोक-सिद्धि के लिए दातव्य है॥९॥

आ॒वर्वृ॑तती॒रध॒ नु द्वि॒धारा॑ गोषु॒युधो॒ न नि॑य॒वं चर॑न्तीः। ऋषे॒ जनि॑त्री॒र्भुव॑नस्य॒ पत्नी॑र॒पो व॑न्दस्व स॒वृधः॒ सयो॑नीः॥

राजसूययज्ञ में राजा के सत्कार के साथ-साथ पुरोहित जन उस देश के वासी तथा राष्ट्र को समृद्ध करनेवाली और नियमितरूप से संतोष के साथ अन्नादि भोग करनेवाली प्रजाओं का भी स्वागत करे॥१०॥

हि॒नोता॑ नो अध्व॒रं दे॑वय॒ज्या हि॒नोत॒ ब्रह्म॑ स॒नये॒ धना॑नाम्। ऋ॒तस्य॒ योगे॒ वि ष्य॑ध्व॒मूधः॑ श्रुष्टी॒वरी॑र्भूतना॒स्मभ्य॑मापः॥

राजसूययज्ञ को पुरोहितजन आस्तिक भावों तथा परमात्मा के विशेष स्तुति-वचनों द्वारा प्रारम्भ करें और बढ़ावें, प्रजाजनों का पूर्ण सहयोग प्राप्त करें, जिससे कि राजा-प्रजा दोनों राष्ट्रसम्पत्ति से सुख प्राप्त करें-सुखलाभ लें॥११॥

आपो॑ रेवतीः॒ क्षय॑था॒ हि वस्वः॒ क्रतुं॑ च भ॒द्रं बि॑भृ॒थामृतं॑ च। रा॒यश्च॒ स्थ स्व॑प॒त्यस्य॒ पत्नीः॒ सर॑स्वती॒ तद्गृ॑ण॒ते वयो॑ धात्॥

किसी भी राष्ट्र में राष्ट्रशासक प्रजाओं द्वारा निर्वाचित किया हुआ होना चाहिए। प्रजाएँ ही वास्तव में राष्ट्र की स्वामिनी हैं। वे उत्तम सन्तान की धनी हैं, उनकी सभा राजा के शासन की विशेष विचारक शक्ति है॥१२॥

प्रति॒ यदापो॒ अदृ॑श्रमाय॒तीर्घृ॒तं पयां॑सि॒ बिभ्र॑ती॒र्मधू॑नि। अ॒ध्व॒र्युभि॒र्मन॑सा संविदा॒ना इन्द्रा॑य॒ सोमं॒ सुषु॑तं॒ भर॑न्तीः॥

राजसूययज्ञ में प्रजाएँ भी ऋत्विजों की अनुमति में रहती हैं। घृत और मधुर आदि वस्तुएँ होमने को लावें तथा राजा के लिये अनुकूल उपहार भी भेंट करें॥१३॥

एमा अ॑ग्मन्रे॒वती॑र्जी॒वध॑न्या॒ अध्व॑र्यवः सा॒दय॑ता सखायः। नि ब॒र्हिषि॑ धत्तन सोम्यासो॒ऽपां नप्त्रा॑ संविदा॒नास॑ एनाः॥

प्रजाएँ राष्ट्र में राष्ट्रिय जीवन को बल देनेवाली होती हैं। उनसे यथायोग्य सहयोग लेना और अवसर-अवसर पर मन्त्रणा करनी चाहिये॥१४॥

आग्म॒न्नाप॑ उश॒तीर्ब॒र्हिरेदं न्य॑ध्व॒रे अ॑सदन्देव॒यन्तीः॑। अध्व॑र्यवः सुनु॒तेन्द्रा॑य॒ सोम॒मभू॑दु वः सु॒शका॑ देवय॒ज्या॥

प्रजाएँ अपने ऊपर सुखदाता शासनकर्ता राजा को चाहती हैं। वे राजसूययज्ञ में विराजें और ऋत्विज् लोग राजसूययज्ञ को चलाते हुए प्रजा के सहयोग से राजा के राज्यैश्वर्य पद को सम्पन्न करें॥१५॥

आ नो॑ दे॒वाना॒मुप॑ वेतु॒ शंसो॒ विश्वे॑भिस्तु॒रैरव॑से॒ यज॑त्रः। तेभि॑र्व॒यं सु॑ष॒खायो॑ भवेम॒ तर॑न्तो॒ विश्वा॑ दुरि॒ता स्या॑म॥

परमात्मा के साक्षात् समागम की कामना करनी चाहिए, यतियोगियों के सत्सङ्ग उपदेशों के अनुसार साधना कर निष्पाप हो संसारसागर को पार करें॥१॥

परि॑ चि॒न्मर्तो॒ द्रवि॑णं ममन्यादृ॒तस्य॑ प॒था नम॒सा वि॑वासेत्। उ॒त स्वेन॒ क्रतु॑ना॒ सं व॑देत॒ श्रेयां॑सं॒ दक्षं॒ मन॑सा जगृभ्यात्॥

ज्ञानधन जहाँ से भी मिले ले लेना चाहिये और उसका सबसे अधिक सदुपयोग मोक्षमार्ग में लगाना है। वह मानव का श्रेष्ठ बल है॥२॥

अधा॑यि धी॒तिरस॑सृग्र॒मंशा॑स्ती॒र्थे न द॒स्ममुप॑ य॒न्त्यूमाः॑। अ॒भ्या॑नश्म सुवि॒तस्य॑ शू॒षं नवे॑दसो अ॒मृता॑नामभूम॥

योगबुद्धि प्राप्त हो जाने पर ध्यान के प्रवाह योगी को संसारसागर से तारनेवाले बन जाते हैं और उसका अपूर्व अध्यात्म जन्म होकर वह मुक्ति का अधिकारी बन जाता है॥३॥

नित्य॑श्चाकन्या॒त्स्वप॑ति॒र्दमू॑ना॒ यस्मा॑ उ दे॒वः स॑वि॒ता ज॒जान॑। भगो॑ वा॒ गोभि॑रर्य॒मेम॑नज्या॒त्सो अ॑स्मै॒ चारु॑श्छदयदु॒त स्या॑त्॥

परमात्मा कर्मफलों का दाता है, स्तुतियों के द्वारा वह उपासक को उसके कमनीय सुखों को देनेवाला है॥४॥

इ॒यं सा भू॑या उ॒षसा॑मिव॒ क्षा यद्ध॑ क्षु॒मन्तः॒ शव॑सा स॒माय॑न्। अ॒स्य स्तु॒तिं ज॑रि॒तुर्भिक्ष॑माणा॒ आ नः॑ श॒ग्मास॒ उप॑ यन्तु॒ वाजाः॑॥

परमात्मा की रचित पृथ्वी हमें सदा आधार देनेवाली उषा के समान सहायक है। मेघ अन्न उत्पत्ति के निमित बरसते हैं और परमात्मा के उपदेशवाले हमें उसकी कृपा से प्राप्त होते हैं॥५॥

अ॒स्येदे॒षा सु॑म॒तिः प॑प्रथा॒नाभ॑वत्पू॒र्व्या भूम॑ना॒ गौः। अ॒स्य सनी॑ळा॒ असु॑रस्य॒ योनौ॑ समा॒न आ भर॑णे॒ बिभ्र॑माणाः॥

प्राणस्वरूप परमात्मा की स्तुति शाश्वतिक वेदवाणी द्वारा विस्तृत होती है। तदनुसार स्तुति करनेवाले मोक्ष में समान आश्रय को प्राप्त होते हैं॥६॥

किं स्वि॒द्वनं॒ क उ॒ स वृ॒क्ष आ॑स॒ यतो॒ द्यावा॑पृथि॒वी नि॑ष्टत॒क्षुः। सं॒त॒स्था॒ने अ॒जरे॑ इ॒तऊ॑ती॒ अहा॑नि पू॒र्वीरु॒षसो॑ जरन्त॥

परमात्मा ने अपने व्यापक तथा प्रकाशक स्वरूप से सृष्टि के प्रमुख द्युमण्डल और पृथ्वीमण्डल को रचा है और इसके बीच में दिन-रातों तथा प्रभातवेलाओं को प्रकट किया, जो अन्य प्राणी आदि वस्तुओं की जीर्णता के साथ जीर्णता को प्राप्त होती रहती हैं॥७॥

नैताव॑दे॒ना प॒रो अ॒न्यद॑स्त्यु॒क्षा स द्यावा॑पृथि॒वी बि॑भर्ति। त्वचं॑ प॒वित्रं॑ कृणुत स्व॒धावा॒न्यदीं॒ सूर्यं॒ न ह॒रितो॒ वह॑न्ति॥

परमात्मा द्यावापृथिवीमय जगत् को शक्ति देता है। उससे कोई बड़ा शक्तिमान् नहीं है। जैसे सूर्यकिरणें सूर्य के आश्रित हो सूर्य को दर्शाती हैं, ऐसे ही जगत्पदार्थ परमात्मा के आश्रित हो उसे दर्शाते हैं॥८॥

स्ते॒गो न क्षामत्ये॑ति पृ॒थ्वीं मिहं॒ न वातो॒ वि ह॑ वाति॒ भूम॑। मि॒त्रो यत्र॒ वरु॑णो अ॒ज्यमा॑नो॒ऽग्निर्वने॒ न व्यसृ॑ष्ट॒ शोक॑म्॥

परमात्मा समस्त फैली हुई सृष्टि के अन्दर और बाहर भी है। सारे पृथ्वी आदि पिण्डों को दूर-दूर तक बिखेरे हुए है। सब उस परमात्मा के आश्रय पर विद्युत्, अग्नि आदि पदार्थ हैं। अपने प्रकाश से वह संसार को प्रकाशित कर रहा है॥९॥

स्त॒रीर्यत्सूत॑ स॒द्यो अ॒ज्यमा॑ना॒ व्यथि॑रव्य॒थीः कृ॑णुत॒ स्वगो॑पा। पु॒त्रो यत्पूर्वः॑ पि॒त्रोर्जनि॑ष्ट श॒म्यां गौर्ज॑गार॒ यद्ध॑ पृ॒च्छान्॥

संसार में मनुष्य या जीव शरीरधारण करते हैं। सांसारिक या औत्पत्तिक पीड़ा प्रत्येक को होनी अनिवार्य है, परन्तु जब वेदाध्ययन कर परमात्मा की अर्चना करता है, तो सब पीड़ाओं से छूट जाता है॥१०॥

उ॒त कण्वं॑ नृ॒षदः॑ पु॒त्रमा॑हुरु॒त श्या॒वो धन॒माद॑त्त वा॒जी। प्र कृ॒ष्णाय॒ रुश॑दपिन्व॒तोध॑ॠ॒तमत्र॒ नकि॑रस्मा अपीपेत्॥

ज्ञानी उपासक परमात्मा के पुत्रसमान होता है। संसार में जैसे पिता अपनी अमूल्य सम्पति पुत्र को दे देता है, ऐसे ही परमात्मा भी अपने ज्ञान अमृत आनन्द को ज्ञानी उपासक के लिये दे देता है॥११॥

प्र सु ग्मन्ता॑ धियसा॒नस्य॑ स॒क्षणि॑ व॒रेभि॑र्व॒राँ अ॒भि षु प्र॒सीद॑तः। अ॒स्माक॒मिन्द्र॑ उ॒भयं॑ जुजोषति॒ यत्सो॒म्यस्यान्ध॑सो॒ बुबो॑धति॥

परमात्मा हमारे श्रेष्ठ कर्म और श्रेष्ठ ज्ञान को पसन्द कराता है। उपासना द्वारा ध्यान करने योग्य अपने स्वरूप को प्राप्त कराता है। उसकी सङ्गति में गृहस्थजन गृहस्थ को उन्नत करते हुए प्रसन्न रहते हैं॥१॥

वी॑न्द्र यासि दि॒व्यानि॑ रोच॒ना वि पार्थि॑वानि॒ रज॑सा पुरुष्टुत। ये त्वा॒ वह॑न्ति॒ मुहु॑रध्व॒राँ उप॒ ते सु व॑न्वन्तु वग्व॒नाँ अ॑रा॒धसः॑॥

परमात्मा आकाश गृह नक्षत्रों और पृथ्वी के मनोभावन पदार्थों में यहाँ पर व्याप्त हो रहा है। उपासक जन उसकी स्तुति द्वारा विशेष सुख प्राप्त करते हैं॥२॥

तदिन्मे॑ छन्त्स॒द्वपु॑षो॒ वपु॑ष्टरं पु॒त्रो यज्जानं॑ पि॒त्रोर॒धीय॑ति। जा॒या पतिं॑ वहति व॒ग्नुना॑ सु॒मत्पुं॒स इद्भ॒द्रो व॑ह॒तुः परि॑ष्कृतः॥

पति-पत्नी का सम्बन्ध होना गृहस्थ आश्रम कहलाता है और वह सन्तान की उत्पत्ति के लिये है। वह उसका सच्चा सुख है। सुयोग्य पत्नी और सुयोग्य पति ईश्वर की कृपा से प्राप्त होते हैं। यही गृहस्थ का सुन्दर फल है॥३॥

तदित्स॒धस्थ॑म॒भि चारु॑ दीधय॒ गावो॒ यच्छास॑न्वह॒तुं न धे॒नवः॑। मा॒ता यन्मन्तु॑र्यू॒थस्य॑ पू॒र्व्याभि वा॒णस्य॑ स॒प्तधा॑तु॒रिज्जनः॑॥

गृहस्थ के घर में गौवें दूध देनेवाली हों और सन्तानों की माता श्रेष्ठ गुणों से युक्त तथा सर्वाङ्गपूर्ण होवें, ऐसा घर आदर्श है॥४॥

प्र वोऽच्छा॑ रिरिचे देव॒युष्प॒दमेको॑ रु॒द्रेभि॑र्याति तु॒र्वणिः॑। ज॒रा वा॒ येष्व॒मृते॑षु दा॒वने॒ परि॑ व॒ ऊमे॑भ्यः सिञ्चता॒ मधु॑॥

मुमुक्षु विद्वान् का इष्ट देव नेता परमात्मा ही है। वह उसके लिये मोक्ष पद प्रदान करता है। मुमुक्षुजनों के लिये मधुर खान-पान की वस्तुएँ समर्पित करना पुण्य कार्य है। दुष्टों को रुलानेवाले उसके बल हैं॥५॥

नि॒धी॒यमा॑न॒मप॑गूळ्हम॒प्सु प्र मे॑ दे॒वानां॑ व्रत॒पा उ॑वाच। इन्द्रो॑ वि॒द्वाँ अनु॒ हि त्वा॑ च॒चक्ष॒ तेना॒हम॑ग्ने॒ अनु॑शिष्ट॒ आगा॑म्॥

विद्या की कामना करनेवाले का आचार्य संसार के परमाणु-परमाणु में और प्राणों में व्याप्त है। उपासक उसको अपने अन्दर साक्षात् करते हैं॥६॥

अक्षे॑त्रवित्क्षेत्र॒विदं॒ ह्यप्रा॒ट् स प्रैति॑ क्षेत्र॒विदानु॑शिष्टः। ए॒तद्वै भ॒द्रम॑नु॒शास॑नस्यो॒त स्रु॒तिं वि॑न्दत्यञ्ज॒सीना॑म्॥

किसी विद्याविशेष को जाननेवाला उसके जाननेवाले के पास जाकर ज्ञान प्राप्त करे, यह कल्याणकारी व्यवहार है और परम्परा से चली आई पद्धतियों में रीति है॥७॥

अ॒द्येदु॒ प्राणी॒दम॑मन्नि॒माहापी॑वृतो अधयन्मा॒तुरूधः॑। एमे॑नमाप जरि॒मा युवा॑न॒महे॑ळ॒न्वसुः॑ सु॒मना॑ बभूव॥

आत्मा जैसे ही गर्भ में रहता है, प्राण लेना-श्वास लेना आरम्भ कर देता है। गर्भ में रहता हुआ अपने को अनुभव करता है। गर्भ से बाहर आकर माता के स्तन को पीता है, पुनः युवा बनता है, फिर जरावस्था को प्राप्त हुआ भी उसका अनादर न करता हुआ भी शरीर में प्रसन्न रहता है॥८॥

ए॒तानि॑ भ॒द्रा क॑लश क्रियाम॒ कुरु॑श्रवण॒ दद॑तो म॒घानि॑। दा॒न इद्वो॑ मघवानः॒ सो अ॑स्त्व॒यं च॒ सोमो॑ हृ॒दि यं बिभ॑र्मि॥

समस्त ज्ञानकलाओं से पूर्ण और आज्ञाकारी सुननेवाले शिष्य जिसके हों, वह आचार्य कहलाता है। उसके लिये भाँति-भाँति के धन वस्त्र आदि भेंट करने चाहियें। वह आचार्य भी अपने ज्ञान का दान उनके हृदयों में भली-भाँति बिठा दे॥९॥

प्र मा॑ युयुज्रे प्र॒युजो॒ जना॑नां॒ वहा॑मि स्म पू॒षण॒मन्त॑रेण। विश्वे॑ दे॒वासो॒ अध॒ माम॑रक्षन्दुः॒शासु॒रागा॒दिति॒ घोष॑ आसीत्॥

विद्वान् गुरुजन ज्ञान देकर मनुष्यों को सत्कर्म में प्रेरित करते हैं तथा परमात्मा की ओर प्रवृत्त करते हैं, जिससे कि वे परमात्मा को आन्तरिक भाव से अनुभव करते हैं। संसार में वे अधिक काल तक जीवन धारण करते हैं, अन्यथा मृत्यु या कठिन रोग के भारी दुःख को भोगते हैं॥१॥

सं मा॑ तपन्त्य॒भितः॑ स॒पत्नी॑रिव॒ पर्श॑वः। नि बा॑धते॒ अम॑तिर्न॒ग्नता॒ जसु॒र्वेर्न वे॑वीयते म॒तिः॥

जीवात्मा जब माता के गर्भ में जाता है, तो तङ्ग स्थान में पीड़ा अनुभव करता है तथा अज्ञता और कर्म करने में असमर्थता भी उसे पीड़ित करती है, मृत्यु का भय भी छाया हुआ रहता है॥२॥

मूषो॒ न शि॒श्ना व्य॑दन्ति मा॒ध्य॑ स्तो॒तारं॑ ते शतक्रतो। स॒कृत्सु नो॑ मघवन्निन्द्र मृळ॒याधा॑ पि॒तेव॑ नो भव॥

मानसिक वासनाएँ मनुष्य के आन्तरिक जीवन को खाती रहती हैं। उनसे बचने का उपाय केवल परमात्मा की शरण है या उसकी उपासना है। मानव के सांसारिक कल्याण और मोक्ष पाने का भी परम साधन है॥३॥

कु॒रु॒श्रव॑णमावृणि॒ राजा॑नं॒ त्रास॑दस्यवम्। मंहि॑ष्ठं वा॒घता॒मृषिः॑॥

अध्यात्मदर्शी विद्वानों द्वारा उपदेश पाया हुआ उपासक सुखदाता परमात्मा की प्रार्थना नित्य किया करे॥४॥

यस्य॑ मा ह॒रितो॒ रथे॑ ति॒स्रो वह॑न्ति साधु॒या। स्तवै॑ स॒हस्र॑दक्षिणे॥

परमात्मा की स्तुति-उपासना द्वारा मनुष्य मोक्ष का भागी बनता है॥५॥

यस्य॒ प्रस्वा॑दसो॒ गिर॑ उप॒मश्र॑वसः पि॒तुः। क्षेत्रं॒ न र॒ण्वमू॒चुषे॑॥

उच्च ज्ञानश्रवण करानेवाला परमात्मा पिता के समान है, उसकी मन्त्रवाणियाँ बहुत आनन्दरस प्रदान करती हैं। स्तुति करनेवाले के लिये रमणीय शरण प्राप्त होती है॥६॥

अधि॑ पुत्रोपमश्रवो॒ नपा॑न्मित्रातिथेरिहि। पि॒तुष्टे॑ अस्मि वन्दि॒ता॥

परमात्मा अनुरागी उपासक का उत्कर्ष की ओर ले जानेवाला और वेदज्ञान-श्रवण का करानेवाला है। पुत्र की भाँति उसका मान करना चाहिए॥७॥

यदीशी॑या॒मृता॑नामु॒त वा॒ मर्त्या॑नाम्। जीवे॒दिन्म॒घवा॒ मम॑॥

मानव का संसार में जीना सफल तभी समझा जाता है, जब कि वह सांसारिक सुखलाभ लेने के साथ अमृत-मोक्ष सुख का भी अपने को पात्र या अधिकारी बनावे॥८॥

न दे॒वाना॒मति॑ व्र॒तं श॒तात्मा॑ च॒न जी॑वति। तथा॑ यु॒जा वि वा॑वृते॥

विद्वानों द्वारा उपदिष्ट आचरण तथा अग्नि सूर्य आदि पदार्थों के नियमों को तोड़कर सौ वर्ष की आयु को कोई प्राप्त नहीं कर सकता और परमात्मा के समागम से भी उसे अलग होना पड़ता है॥९॥

प्रा॒वे॒पा मा॑ बृह॒तो मा॑दयन्ति प्रवाते॒जा इरि॑णे॒ वर्वृ॑तानाः। सोम॑स्येव मौजव॒तस्य॑ भ॒क्षो वि॒भीद॑को॒ जागृ॑वि॒र्मह्य॑मच्छान्॥

अक्ष जुआ खेलने के पाशे जुआरी को जुआ खेलने में सोमपान जैसा हर्ष अनुभव कराते हैं और जागृति देते हैं, ऐसा वह समझा करता है॥१॥

न मा॑ मिमेथ॒ न जि॑हीळ ए॒षा शि॒वा सखि॑भ्य उ॒त मह्य॑मासीत्। अ॒क्षस्या॒हमे॑कप॒रस्य॑ हे॒तोरनु॑व्रता॒मप॑ जा॒याम॑रोधम्॥

द्यूतदोष के कारण मनुष्य सुख देनेवाली अनुकूल पत्नी को भी अपने से अलग कर बैठता है॥२॥

द्वेष्टि॑ श्व॒श्रूरप॑ जा॒या रु॑णद्धि॒ न ना॑थि॒तो वि॑न्दते मर्डि॒तार॑म्। अश्व॑स्येव॒ जर॑तो॒ वस्न्य॑स्य॒ नाहं वि॑न्दामि कित॒वस्य॒ भोग॑म्॥

जुआ खेलनेवाले के प्रति उसकी सास घृणा करती है। पत्नी उसे नहीं चाहती है। कोई सुख देनेवाला उसे नहीं मिलता। उचित भोगों से वञ्चित रहता है॥३॥

अ॒न्ये जा॒यां परि॑ मृशन्त्यस्य॒ यस्यागृ॑ध॒द्वेद॑ने वा॒ज्य१॒॑क्षः। पि॒ता मा॒ता भ्रात॑र एनमाहु॒र्न जा॑नीमो॒ नय॑ता ब॒द्धमे॒तम्॥

जुए का व्यसन जब किसी को लग जाता है, तो वह कहीं से भी धन मिले, चाहे चोरी से मिले, उसे जुए पर लगा देता है। धन खोकर अपनी पत्नी की दुर्दशा कराता है, माता, पिता, भाई उसका साथ नहीं देते। इस प्रकार दुखी होकर अपने जीवन को समाप्त कर देता है॥४॥

यदा॒दीध्ये॒ न द॑विषाण्येभिः परा॒यद्भ्योऽव॑ हीये॒ सखि॑भ्यः। न्यु॑प्ताश्च ब॒भ्रवो॒ वाच॒मक्र॑तँ॒ एमीदे॑षां निष्कृ॒तं जा॒रिणी॑व॥

जुए का व्यसन जब किसी को पड़ जाता है, उससे बचना कठिन हो जाता है। बचने की भावना या संकल्प होते हुए भी पुराने साथियों को और जुए के स्थान को देखकर जुए की ओर फिर चल पड़ता है। यह व्यसन बहुत बुरा है और इससे बचना चाहिये॥५॥

स॒भामे॑ति कित॒वः पृ॒च्छमा॑नो जे॒ष्यामीति॑ त॒न्वा॒३॒॑ शूशु॑जानः। अ॒क्षासो॑ अस्य॒ वि ति॑रन्ति॒ कामं॑ प्रति॒दीव्ने॒ दध॑त॒ आ कृ॒तानि॑॥

जुआरी शरीर में आवेश खाया हुआ, बोलता हुआ जुआरियों की मण्डली में जय की इच्छा से जाता है। प्रतिपक्षी को लक्ष्य करके कि ये पाशे मुझे जय दिलाएँगे, ऐसी उसकी भावना है॥६॥

अ॒क्षास॒ इद॑ङ्कु॒शिनो॑ नितो॒दिनो॑ नि॒कृत्वा॑न॒स्तप॑नास्तापयि॒ष्णवः॑। कु॒मा॒रदे॑ष्णा॒ जय॑तः पुन॒र्हणो॒ मध्वा॒ सम्पृ॑क्ताः कित॒वस्य॑ ब॒र्हणा॑॥

जुए के पाशे जीतते हुए के लिये पीड़ा देनेवाले, बुरी तरह मृत्यु करानेवाले, मिठाई से लिप्त विषान्न के समान हैं, इनसे सदा बचना ही चाहिए॥७॥

त्रि॒प॒ञ्चा॒शः क्री॑ळति॒ व्रात॑ एषां दे॒व इ॑व सवि॒ता स॒त्यध॑र्मा। उ॒ग्रस्य॑ चिन्म॒न्यवे॒ ना न॑मन्ते॒ राजा॑ चिदेभ्यो॒ नम॒ इत्कृ॑णोति॥

नी॒चा व॑र्तन्त उ॒परि॑ स्फुरन्त्यह॒स्तासो॒ हस्त॑वन्तं सहन्ते। दि॒व्या अङ्गा॑रा॒ इरि॑णे॒ न्यु॑प्ताः शी॒ताः सन्तो॒ हृद॑यं॒ निर्द॑हन्ति॥

जुए के पाशे चाहे हराते हुए हों, चाहे जिताते हुए हों, वे ठण्डे अङ्गारे से बनकर जुआरी के हृदय को जलाते रहते हैं-अशान्त किये रहते हैं, इसलिये जुआ खेलना बुरा है॥९॥

जा॒या त॑प्यते कित॒वस्य॑ ही॒ना मा॒ता पु॒त्रस्य॒ चर॑तः॒ क्व॑ स्वित्। ऋ॒णा॒वा बिभ्य॒द्धन॑मि॒च्छमा॑नो॒ऽन्येषा॒मस्त॒मुप॒ नक्त॑मेति॥

जुआरी के घर में पत्नी भी दुःखी रहती है। स्वयं भी वह ऋण देनेवाले से भय खाये रहता है। दुखी होकर के घरों में चोरी करने लगता है। यह दुर्दशा जुआ खेलने से होती है॥१०॥

स्त्रियं॑ दृ॒ष्ट्वाय॑ कित॒वं त॑तापा॒न्येषां॑ जा॒यां सुकृ॑तं च॒ योनि॑म्। पू॒र्वा॒ह्णे अश्वा॑न्युयु॒जे हि ब॒भ्रून्त्सो अ॒ग्नेरन्ते॑ वृष॒लः प॑पाद॥

जुआरी जुए के परिणाम से अपने पत्नी को दुखी देखता हुआ और दरिद्रता का अनुभव करता हुआ तथा अन्यों की पत्नी और घरों को सुखी सम्पन्न पाता हुआ पश्चात्ताप करता है, तो रात्रि के पश्चात् प्रातः सावधान हुआ अपने उत्थानार्थ परमात्मा का स्मरण करता है॥११॥

यो वः॑ सेना॒नीर्म॑ह॒तो ग॒णस्य॒ राजा॒ व्रात॑स्य प्रथ॒मो ब॒भूव॑। तस्मै॑ कृणोमि॒ न धना॑ रुणध्मि॒ दशा॒हं प्राची॒स्तदृ॒तं व॑दामि॥

जब जुआ खेलने से पूर्ण ग्लानि हो जावे, तो जुआरियों के प्रमुख नेता को स्पष्ट कह दे कि मैं अब जुए में धन नहीं लगाऊँगा तथा खुले स्थान में सब दिशाओं की ओर देखते हुए और सब प्रजाओं के सामने अपने दृढ़ संकल्प की घोषणा कर दे कि अब जुआ नहीं खेलूँगा। इस प्रकार इस दुर्व्यसन से बचने का महान् उपाय है॥१२॥

अ॒क्षैर्मा दी॑व्यः कृ॒षिमित्कृ॑षस्व वि॒त्ते र॑मस्व ब॒हु मन्य॑मानः। तत्र॒ गावः॑ कितव॒ तत्र॑ जा॒या तन्मे॒ वि च॑ष्टे सवि॒तायम॒र्यः॥

जुए जैसे विषम व्यवहार एवं पाप की कमाई से बचकर स्वश्रम से उपार्जित कृषि से प्राप्त अन्न और भोग श्रेष्ठ हैं। इससे पारिवारिक व्यवस्था और पशुओं का लाभ भी मिलता है, परमात्मा भी अनुकूल सुखदायक बनता है॥१३॥

मि॒त्रं कृ॑णुध्वं॒ खलु॑ मृ॒ळता॑ नो॒ मा नो॑ घो॒रेण॑ चरता॒भि धृ॒ष्णु। नि वो॒ नु म॒न्युर्वि॑शता॒मरा॑तिर॒न्यो ब॑भ्रू॒णां प्रसि॑तौ॒ न्व॑स्तु॥

जुआ खेलनेवाला जुए खेलने के दोषदर्शन से विरक्त हो जाता है, तो उसके पुराने साथी द्वेष करने लगते हैं। वह उन्हें समझावे कि वे मित्रभाव करने लगें और कोई भी जुए के बन्धन में न फँसे॥१४॥

अबु॑ध्रमु॒ त्य इन्द्र॑वन्तो अ॒ग्नयो॒ ज्योति॒र्भर॑न्त उ॒षसो॒ व्यु॑ष्टिषु। म॒ही द्यावा॑पृथि॒वी चे॑तता॒मपो॒ऽद्या दे॒वाना॒मव॒ आ वृ॑णीमहे॥

प्रातःकाल होते ही अन्धकार को हटानेवाली सूर्य की किरणें द्युलोक पृथिवीलोक को प्रकाशित कर देती हैं। उन पर कार्य प्रारम्भ हो जाने के लिये जीवनरक्षा के निमित्त उनको सेवन करना चाहिए तथा प्रातः होते ही अज्ञानान्धकार मिटानेवाले परमात्मा के उपासक विद्वान् जाग जाते हैं, स्त्री-पुरुषों को कार्य-व्यवहार चलाने को ज्ञानप्रकाश देते हैं, उनके रक्षण में जीवन उन्नत करना चाहिए॥१॥

दि॒वस्पृ॑थि॒व्योरव॒ आ वृ॑णीमहे मा॒तॄन्त्सिन्धू॒न्पर्व॑ताञ्छर्य॒णाव॑तः। अ॒ना॒गा॒स्त्वं सूर्य॑मु॒षास॑मीमहे भ॒द्रं सोमः॑ सुवा॒नो अ॒द्या कृ॑णोतु नः॥

पृथिवीस्थ जलाशय और आकाश के मेघ हमारे रक्षा करनेवाले हैं, वे ओषधियाँ उत्पन्न करते हैं, सूर्य उषा-सुन्दर प्रभात वेला और चन्द्रमा उत्तम कल्याणप्रद प्रकाश देनेवाले हैं तथा माता पिता अन्नज्ञानदाता रक्षक हो सर्वत्र जानेवाले उपदेशक ज्ञानधर्म का उपदेश, विद्यासूर्य विद्वान् और विदुषी तथा नव स्नातक भी कल्याणकारी ज्ञान दें॥२॥

द्यावा॑ नो अ॒द्य पृ॑थि॒वी अना॑गसो म॒ही त्रा॑येतां सुवि॒ताय॑ मा॒तरा॑। उ॒षा उ॒च्छन्त्यप॑ बाधताम॒घं स्व॒स्त्य१॒॑ग्निं स॑मिधा॒नमी॑महे॥

द्युलोक पृथिवीलोक परमात्मा ने निर्दोष मनुष्यों के लिये कल्याणकारी बनाये।  प्रातः वेला भी अज्ञान आदि दोषों को दूर करनेवाली बनाई है। अग्नि भी मनुष्य का कल्याण साधनेवाली रची है तथा ज्ञानप्रकाश करनेवाली विद्वत्सभा और अन्नादि की व्यवस्था करनेवाली समिति समाज या राष्ट्र में निर्दोष मनुष्यों की रक्षा करती है। उत्तम सुख प्राप्त कराती है। घर में नई वधू भी दुःख को हटाती है। प्रतिदिन अग्निहोत्र करनेवाले का कल्याण होता है॥३॥

इ॒यं न॑ उ॒स्रा प्र॑थ॒मा सु॑दे॒व्यं॑ रे॒वत्स॒निभ्यो॑ रे॒वती॒ व्यु॑च्छतु। आ॒रे म॒न्युं दु॑र्वि॒दत्र॑स्य धीमहि स्व॒स्त्य१॒॑ग्निं स॑मिधा॒नमी॑महे॥

घर में विकसित हुई उषा या प्राप्त होती हुई नव वधू घर एवं परिवार का विकास करती हुई आती है। घर में रहनेवाले पारिवारिक जनों के लिए प्रकाश और सन्तान को प्रदान करती है। उस द्वारा सन्ध्या आदि धर्माचरण से गृहस्थ परमात्मा की ओर चलता है॥४॥

प्र याः सिस्र॑ते॒ सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॒र्ज्योति॒र्भर॑न्तीरु॒षसो॒ व्यु॑ष्टिषु। भ॒द्रा नो॑ अ॒द्य श्रव॑से॒ व्यु॑च्छत स्व॒स्त्य१॒॑ग्निं स॑मिधा॒नमी॑महे॥

प्रातःकाल सूर्य की किरणें ज्योति को लेकर आती हैं और पृथ्वी पर फैलती हैं। वे अन्धकार को नष्ट करने के साथ अन्न की उत्पत्ति में कल्याणकारी सिद्ध होती हैं। तथा प्रथम घर में विद्वान् पति की नई विदुषी वधू आती है, तो शोभा लक्ष्मी का प्रसार करती है। गृहस्थ के लिये यश देती हुई कल्याणकारी बनती है॥५॥

अ॒न॒मी॒वा उ॒षस॒ आ च॑रन्तु न॒ उद॒ग्नयो॑ जिहतां॒ ज्योति॑षा बृ॒हत्। आयु॑क्षाताम॒श्विना॒ तूतु॑जिं॒ रथं॑ स्व॒स्त्य१॒॑ग्निं स॑मिधा॒नमी॑महे॥

प्रभातवेलाएँ रोगनिवारक हुआ करती हैं। उनसे लाभ उठाना चाहिए। अग्निहोत्र भी सुखदायक होते हैं और संसार में प्रवर्तमान दिन-रात को भी सुखदायक बनाना चाहिये तथा घर में वधुएँ रोगों का निवारण करनेवाली हों और पुरुष भी विद्वान् होते हुए ज्ञान से ऊपर उठें। स्त्री-पुरुष गृहस्थ का सच्चा सुख लें॥६॥

श्रेष्ठं॑ नो अ॒द्य स॑वित॒र्वरे॑ण्यं भा॒गमा सु॑व॒ स हि र॑त्न॒धा असि॑। रा॒यो जनि॑त्रीं धि॒षणा॒मुप॑ ब्रुवे स्व॒स्त्य१॒॑ग्निं स॑मिधा॒नमी॑महे॥

परमात्मा की उपासना से वह सर्वश्रेष्ठ मोक्षसुख और सांसारिक सच्चे सुख को ही प्रदान करता है॥७॥

पिप॑र्तु मा॒ तदृ॒तस्य॑ प्र॒वाच॑नं दे॒वानां॒ यन्म॑नु॒ष्या॒३॒॑ अम॑न्महि। विश्वा॒ इदु॒स्राः स्पळुदे॑ति॒ सूर्यः॑ स्व॒स्त्य१॒॑ग्निं स॑मिधा॒नमी॑महे॥

समस्तविद्याप्रकाशक परमात्मा सृष्टि के आरम्भ में अग्नि आदि परम ऋषियों को उनके अन्दर साक्षात् वेदज्ञान का उपदेश मनुष्यों के कल्याणार्थ देता है॥८॥

अ॒द्वे॒षो अ॒द्य ब॒र्हिषः॒ स्तरी॑मणि॒ ग्राव्णां॒ योगे॒ मन्म॑नः॒ साध॑ ईमहे। आ॒दि॒त्यानां॒ शर्म॑णि॒ स्था भु॑रण्यसि स्व॒स्त्य१॒॑ग्निं स॑मिधा॒नमी॑महे॥

मानव के वर्तमान युग में अध्यात्मज्ञान की वृद्धि होनी चाहिए। वेदविद्वानों के संयोग में और ब्रह्मचर्यादि व्रत द्वारा परमात्मा के उपासनारूप शरण में मनोरथों की सिद्धि होती है॥९॥

आ नो॑ ब॒र्हिः स॑ध॒मादे॑ बृ॒हद्दि॒वि दे॒वाँ ई॑ळे सा॒दया॑ स॒प्त होतॄ॑न्। इन्द्रं॑ मि॒त्रं वरु॑णं सा॒तये॒ भगं॑ स्व॒स्त्य१॒॑ग्निं स॑मिधा॒नमी॑महे॥

मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, नेत्र, कान और वाणी के द्वारा परमात्मा का ध्यान उपासना आदि कर्म करके मनुष्य ऐश्वर्यवान् प्रेरक वरनेवाले भजनीय परमात्मा को अनुकूल बनाकर ऊँचा अध्यात्मसुख प्राप्त करता है॥१०॥

त आ॑दित्या॒ आ ग॑ता स॒र्वता॑तये वृ॒धे नो॑ य॒ज्ञम॑वता सजोषसः। बृह॒स्पतिं॑ पू॒षण॑म॒श्विना॒ भगं॑ स्व॒स्त्य१॒॑ग्निं स॑मिधा॒नमी॑महे॥

मनुष्य जब श्रद्धा से योगाभ्यासरूप अध्यात्मयज्ञ का सेवन करता है, तो परमात्मा उस उपासक के अनुकूल उसकी जीवनवृद्धि-जीवनविकास के लिये पूर्ण सहायक बनता है॥११॥

तन्नो॑ देवा यच्छत सुप्रवाच॒नं छ॒र्दिरा॑दित्याः सु॒भरं॑ नृ॒पाय्य॑म्। पश्वे॑ तो॒काय॒ तन॑याय जी॒वसे॑ स्व॒स्त्य१॒॑ग्निं स॑मिधा॒नमी॑महे॥

आदि सृष्टि के विद्वान् इश्वरोक्त वेदज्ञान का उपदेश जो मनुष्यों के लिये कल्याणकर है, उसका उपदेश दिया करते हैं। उसका अध्ययन प्रत्येक परिवार को करना हितकर है॥१२॥

विश्वे॑ अ॒द्य म॒रुतो॒ विश्व॑ ऊ॒ती विश्वे॑ भवन्त्व॒ग्नयः॒ समि॑द्धाः। विश्वे॑ नो दे॒वा अव॒सा ग॑मन्तु॒ विश्व॑मस्तु॒ द्रवि॑णं॒ वाजो॑ अ॒स्मे॥

परमात्मा ने प्राण और शरीर के अन्य अङ्ग तथा सूर्यादि प्रकाशमान पदार्थ जीवनरक्षा के लिये प्रदान किये हैं। विद्वान् जन भी हमारी रक्षा करते हैं। विद्यादि धन और बल हमारे उपयोग के लिये हैं॥१३॥

यं दे॑वा॒सोऽव॑थ॒ वाज॑सातौ॒ यं त्राय॑ध्वे॒ यं पि॑पृ॒थात्यंहः॑। यो वो॑ गोपी॒थे न भ॒यस्य॒ वेद॒ ते स्या॑म दे॒ववी॑तये तुरासः॥

विद्वानों के संरक्षण में दोषों से बचकर ज्ञान का सेवन कर संसारसागर को पार करते हुए दिव्य सुखवाली मुक्ति के लिये यत्न करना चाहिये॥१४॥

उ॒षासा॒नक्ता॑ बृह॒ती सु॒पेश॑सा॒ द्यावा॒क्षामा॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा। इन्द्रं॑ हुवे म॒रुतः॒ पर्व॑ताँ अ॒प आ॑दि॒त्यान्द्यावा॑पृथि॒वी अ॒पः स्वः॑॥

महत्त्वपूर्ण दिन-रात, अग्नि, मेघ, सूर्य, वायु, पर्वत, जल, किरणें, प्रकाश, भूतल, अन्तरिक्ष, प्रकाशलोक, परमात्मा, नाडीगत प्राण, जोड़ोंवाले अङ्ग रस लेनेवाले रक्ताशय तेज और धारण बल अवकाश-रोम छिद्रादि और मस्तिष्क जीवन में धारण करने योग्य उपयोगी पदार्थ हैं॥१॥

द्यौश्च॑ नः पृथि॒वी च॒ प्रचे॑तस ऋ॒ताव॑री रक्षता॒मंह॑सो रि॒षः। मा दु॑र्वि॒दत्रा॒ निॠ॑तिर्न ईशत॒ तद्दे॒वाना॒मवो॑ अ॒द्या वृ॑णीमहे॥

संसार में सूर्य और पृथिवी चेतना और जल देनेवाले अन्धकार और पीड़ा से बचानेवाले हैं। इनसे उचित लाभ लेने से घोरापत्ति या अकाल मृत्यु से बच सकते हैं। तथा माता पिता सत्याचरण और ज्ञान का उपदेश देकर चेतानेवाले पाप से बचानेवाले और घोर विपत्ति में काम आनेवाले हैं। इनका हमें रक्षण प्राप्त करना चाहिये॥२॥

विश्व॑स्मान्नो॒ अदि॑तिः पा॒त्वंह॑सो मा॒ता मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य रे॒वतः॑। स्व॑र्व॒ज्ज्योति॑रवृ॒कं न॑शीमहि॒ तद्दे॒वाना॒मवो॑ अ॒द्या वृ॑णीमहे॥

पुष्टि देनेवाले सूर्य-चन्द्रमा और प्राण-अपान को निर्माण करनेवाली परमात्मशक्ति की शरण लेकर हम दोषों पापों से बचे रहें, तो सुखमय अनश्वर ज्योति को प्राप्त कर सकते हैं और भौतिक देवों और विद्वानों का रक्षण भी पा सकते हैं॥३॥

ग्रावा॒ वद॒न्नप॒ रक्षां॑सि सेधतु दु॒ष्ष्वप्न्यं॒ निॠ॑तिं॒ विश्व॑म॒त्रिण॑म्। आ॒दि॒त्यं शर्म॑ म॒रुता॑मशीमहि॒ तद्दे॒वाना॒मवो॑ अ॒द्या वृ॑णीमहे॥

विद्वान् उपदेशक अपने उपदेश द्वारा लोगों के बाधक वस्तु, शयनकाल में प्राप्त आलस्य आदि और जाग्रत् में मृत्यु भय और शोक को दूर करता है-हटाता है। इस प्रकार उन ऊँचे जीवन्मुक्तों की सुखशरण लेनी चाहिए॥४॥

एन्द्रो॑ ब॒र्हिः सीद॑तु॒ पिन्व॑ता॒मिळा॒ बृह॒स्पतिः॒ साम॑भिॠ॒क्वो अ॑र्चतु। सु॒प्र॒के॒तं जी॒वसे॒ मन्म॑ धीमहि॒ तद्दे॒वाना॒मवो॑ अ॒द्या वृ॑णीमहे॥

जीवनवृद्धि के लिए परमात्मा हृदय में साक्षात् हो। अन्न रसादि सामग्री हमारे शरीर को पुष्ट करे। आत्मा उत्तम स्तुतियों से परमात्मा की अर्चना करे। बुद्धि उत्तम निर्णय और मन अच्छा मनन करे, तो जीवन सफल है॥५॥

दि॒वि॒स्पृशं॑ य॒ज्ञम॒स्माक॑मश्विना जी॒राध्व॑रं कृणुतं सु॒म्नमि॒ष्टये॑। प्रा॒चीन॑रश्मि॒माहु॑तं घृ॒तेन॒ तद्दे॒वाना॒मवो॑ अ॒द्या वृ॑णीमहे॥

अध्यापक और उपदेशक तथा दिन और रात प्रगति मार्गवाले या विद्यामय मार्गवाले परमात्मसम्बन्धी सुख पहुँचानेवाले अध्यात्मयज्ञ को कल्याण के लिये सम्पन्न करें, जिससे परमात्मा का साक्षात्कार हो सके॥६॥

उप॑ ह्वये सु॒हवं॒ मारु॑तं ग॒णं पा॑व॒कमृ॒ष्वं स॒ख्याय॑ श॒म्भुव॑म्। रा॒यस्पोषं॑ सौश्रव॒साय॑ धीमहि॒ तद्दे॒वाना॒मवो॑ अ॒द्या वृ॑णीमहे॥

ऊँचे विद्वान्, जीवन्मुक्त, पवित्रकारक, कल्याणसाधक, ज्ञानधन के वर्द्धक तथा उपदेश देनेवाले महानुभावों की मित्रता और उनसे उपदेश का लाभ लेना चाहिये॥७॥

अ॒पां पेरुं॑ जी॒वध॑न्यं भरामहे देवा॒व्यं॑ सु॒हव॑मध्वर॒श्रिय॑म्। सु॒र॒श्मिं सोम॑मिन्द्रि॒यं य॑मीमहि॒ तद्दे॒वाना॒मवो॑ अ॒द्या वृ॑णीमहे॥

परमात्मा आप्त जनों का पालक, जीवन का लक्ष्यपूरक, मुमुक्षुओं द्वारा प्राप्त करने योग्य-अध्यात्मयज्ञ का श्रीभूत और ज्ञानानन्द का प्रसारक है, ऐसा मन में निश्चय करके उसकी उपासना करनी चाहिये॥८॥

स॒नेम॒ तत्सु॑स॒निता॑ स॒नित्व॑भिर्व॒यं जी॒वा जी॒वपु॑त्रा॒ अना॑गसः। ब्र॒ह्म॒द्विषो॒ विष्व॒गेनो॑ भरेरत॒ तद्दे॒वाना॒मवो॑ अ॒द्या वृ॑णीमहे॥

पापरहित हुए, जीते हुए माता पिताओं के पुत्र जीते रहते हैं। परमात्मज्ञान को प्राप्त हुए विद्वान् द्वारा दिए गये परमात्मज्ञान के भागी होना चाहिये। परमात्मा से द्वेष करनेवाले नास्तिक जन पाप का फल भोगते हैं॥९॥

ये स्था मनो॑र्य॒ज्ञिया॒स्ते शृ॑णोतन॒ यद्वो॑ देवा॒ ईम॑हे॒ तद्द॑दातन। जैत्रं॒ क्रतुं॑ रयि॒मद्वी॒रव॒द्यश॒स्तद्दे॒वाना॒मवो॑ अ॒द्या वृ॑णीमहे॥

मुमुक्षु या जीवन्मुक्त विद्वान् अपने आयु के ज्ञान को अन्य जनों के लिये प्रदान करें तथा पाप अज्ञान पर विजय पानेवाले पुष्टिप्रद, प्राणप्रद और यशोवर्द्धक ऊँचे ज्ञान का भी उपदेश दें॥१०॥

म॒हद॒द्य म॑ह॒तामा वृ॑णीम॒हेऽवो॑ दे॒वानां॑ बृह॒ताम॑न॒र्वणा॑म्। यथा॒ वसु॑ वी॒रजा॑तं॒ नशा॑महै॒ तद्दे॒वाना॒मवो॑ अ॒द्या वृ॑णीमहे॥

गुणी श्रेष्ठ महाविद्वानों द्वारा ज्ञान का श्रवण कर प्राण आदि के बल को सुसम्पन्न करें॥११॥

म॒हो अ॒ग्नेः स॑मिधा॒नस्य॒ शर्म॒ण्यना॑गा मि॒त्रे वरु॑णे स्व॒स्तये॑। श्रेष्ठे॑ स्याम सवि॒तुः सवी॑मनि॒ तद्दे॒वाना॒मवो॑ अ॒द्या वृ॑णीमहे॥

महान् प्रकाशमान सर्वनेता परमात्मा की सुखशरण निष्पाप जन ही प्राप्त कर सकते हैं। उन्हें ही परमात्मा उत्तम कर्म करने की प्रेरणा देता है-अपनाता है, जो उसके शासन में रहते हैं॥१२॥

ये स॑वि॒तुः स॒त्यस॑वस्य॒ विश्वे॑ मि॒त्रस्य॑ व्र॒ते वरु॑णस्य दे॒वाः। ते सौभ॑गं वी॒रव॒द्गोम॒दप्नो॒ दधा॑तन॒ द्रवि॑णं चि॒त्रम॒स्मे॥

उत्पन्नकर्ता, सच्चे शासक, प्रेरक और वरनेवाले परमात्मा के नियम में रहनेवाले सर्व विषयों में प्रवेश किये हुए विद्वान् जन जीवनबल, संयमशक्ति तथा सौभाग्य, ज्ञानबल और कर्तव्यबल मनुष्यों के अन्दर धारण करावें॥१३॥

स॒वि॒ता प॒श्चाता॑त्सवि॒ता पु॒रस्ता॑त्सवि॒तोत्त॒रात्ता॑त्सवि॒ताध॒रात्ता॑त्। स॒वि॒ता नः॑ सुवतु स॒र्वता॑तिं सवि॒ता नो॑ रासतां दी॒र्घमायुः॑॥

उत्पादक प्रेरक परमात्मा के आदेश के अनुसार रहने पर वह सर्व दिशाओं से रक्षा करता है और कल्याणकारी वस्तु एवं जीवन प्रदान करता है॥१४॥

नमो॑ मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य॒ चक्ष॑से म॒हो दे॒वाय॒ तदृ॒तं स॑पर्यत। दू॒रे॒दृशे॑ दे॒वजा॑ताय के॒तवे॑ दि॒वस्पु॒त्राय॒ सूर्या॑य शंसत॥

परमात्मा दिन-रात संसार तथा प्रलय का क्रमशः प्रकट करनेवाला है। उसकी प्राप्ति के लिये सत्यसंकल्प सत्यभाषण का आचरण करना चाहिये, वह दूरदर्शी, सर्वद्रष्टा, समस्त अग्नि आदि देवों का उत्पादक, वेदज्ञान द्वारा सचेत करनेवाला, मोक्ष को सब सांसारिक दोषों से पृथक् रखनेवाला है, उसकी सदा स्तुति करनी चाहिए॥१॥

सा मा॑ स॒त्योक्तिः॒ परि॑ पातु वि॒श्वतो॒ द्यावा॑ च॒ यत्र॑ त॒तन॒न्नहा॑नि च। विश्व॑म॒न्यन्नि वि॑शते॒ यदेज॑ति वि॒श्वाहापो॑ वि॒श्वाहोदे॑ति॒ सूर्यः॑॥

परमात्मा की सत्य वाणी-श्रुति वेदवाणी मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करती है। उसी सत्य वाणी के अनुसार आकाश से लेकर पृथ्वीपर्यन्त लोक-लोकान्तर और अहर्गण तथा  रात्रिगण प्रसारित हो रहे हैं-क्रमशः चालू हैं। सब जड़ और चेतन पदार्थ अपने-अपने स्वरूप में स्थित चेष्टा करते हैं तथा तदनुसार जलधाराएँ बहती हैं, सूर्य उदय होता है, ऐसे उस परमात्मा का ध्यान और उसकी वेदवाणी का ज्ञान करना चाहिये॥२॥

न ते॒ अदे॑वः प्र॒दिवो॒ नि वा॑सते॒ यदे॑त॒शेभिः॑ पत॒रै र॑थ॒र्यसि॑। प्रा॒चीन॑म॒न्यदनु॑ वर्तते॒ रज॒ उद॒न्येन॒ ज्योति॑षा यासि सूर्य॥

परमात्मा को न माननेवाला नास्तिक पुरुष उसके सामने नहीं ठहर सकता। वह शक्तितरङ्गों से सबको अपने अधिकार में किये हुए है। वह नास्तिक अन्य दुःखस्थानों को ही प्राप्त होता है तथा सूर्य के सम्मुख अन्धकार नहीं ठहर सकता। उसकी प्रखर ज्योतियों से ताड़ित हुआ किसी स्थान में चला जाता है। उस ज्ञानप्रकाशक परमात्मा और सूर्य की शरण लेना चाहिए॥३॥

येन॑ सूर्य॒ ज्योति॑षा॒ बाध॑से॒ तमो॒ जग॑च्च॒ विश्व॑मुदि॒यर्षि॑ भा॒नुना॑। तेना॒स्मद्विश्वा॒मनि॑रा॒मना॑हुति॒मपामी॑वा॒मप॑ दु॒ष्ष्वप्न्यं॑ सुव॥

परमात्मा अपने ज्ञानप्रकाश से अज्ञानान्धकार को हटाता है और समस्त जगत् को उद्भूत करता है-प्रसिद्ध करता है तथा दुर्भिक्षता और बुरे स्वप्नों को हटाता है तथा सूर्य अपनी रश्मि द्वारा अन्धकार को भगाता है, जगत् को चमकाता है। अन्नादि भोग्य पदार्थों के अभाव और निद्रादोष को दूर करता है॥४॥

विश्व॑स्य॒ हि प्रेषि॑तो॒ रक्ष॑सि व्र॒तमहे॑ळयन्नु॒च्चर॑सि स्व॒धा अनु॑। यद॒द्य त्वा॑ सूर्योप॒ब्रवा॑महै॒ तं नो॑ दे॒वा अनु॑ मंसीरत॒ क्रतु॑म्॥

प्रार्थना द्वारा प्रेरित हुआ परमात्मा शुभ कर्मकर्त्ता मनुष्य के शुभ संकल्प को पूरा करता है।  ऐसे मनुष्य के शुभ संकल्प का विद्वान् जन अनुमोदन किया करते हैं।

तं नो॒ द्यावा॑पृथि॒वी तन्न॒ आप॒ इन्द्रः॑ शृण्वन्तु म॒रुतो॒ हवं॒ वचः॑। मा शूने॑ भूम॒ सूर्य॑स्य सं॒दृशि॑ भ॒द्रं जीव॑न्तो जर॒णाम॑शीमहि॥

परमात्मा के वेदज्ञान के अनुसार उसकी प्रार्थना करते हुए, कभी आलस्य में न रहकर जीवन बिताते हुए, सम्पूर्ण आयु को प्राप्त कर सकते हैं। तथा माता-पिता के आदेश में रहकर और विद्वानों से श्रवण करते हुए अपना जीवन ऊँचा व पूर्णायुवाला बना सकते हैं॥६॥

वि॒श्वाहा॑ त्वा सु॒मन॑सः सु॒चक्ष॑सः प्र॒जाव॑न्तो अनमी॒वा अना॑गसः। उ॒द्यन्तं॑ त्वा मित्रमहो दि॒वेदि॑वे॒ ज्योग्जी॒वाः प्रति॑ पश्येम सूर्य॥

परमात्मा का सक्षात्कार पवित्र मनवाले तथा प्रतिदिन उसकी स्तुति करनेवाले किया करते हैं और वे लोग निरोग एवं उत्तम सन्ततिवाले बन जाते हैं॥७॥

महि॒ ज्योति॒र्बिभ्र॑तं त्वा विचक्षण॒ भास्व॑न्तं॒ चक्षु॑षेचक्षुषे॒ मयः॑। आ॒रोह॑न्तं बृह॒तः पाज॑स॒स्परि॑ व॒यं जी॒वाः प्रति॑ पश्येम सूर्य॥

महान् ज्योति को धारण किये परमात्मा या सूर्य का आश्रय लेने से प्रत्येक नेत्रवान् प्राणी को दर्शनशक्ति और जीवनशक्ति मिलती है॥८॥

यस्य॑ ते॒ विश्वा॒ भुव॑नानि के॒तुना॒ प्र चेर॑ते॒ नि च॑ वि॒शन्ते॑ अ॒क्तुभिः॑। अ॒ना॒गा॒स्त्वेन॑ हरिकेश सू॒र्याह्ना॑ह्ना नो॒ वस्य॑सावस्य॒सोदि॑हि॥

परमात्मा के द्वारा दिये ज्ञान से मनुष्य अपना व्यवहार करते हैं पुनः रात्रि में विश्राम पाते हैं। उसके द्वारा दिये ज्ञान से निष्पाप होकर उसका साक्षात् करते हैं एवं सूर्य के प्रकाश से सारे प्राणी दिन का व्यवहार करके रात्रि में विश्राम करते हैं॥९॥

शं नो॑ भव॒ चक्ष॑सा॒ शं नो॒ अह्ना॒ शं भा॒नुना॒ शं हि॒मा शं घृ॒णेन॑। यथा॒ शमध्व॒ञ्छमस॑द्दुरो॒णे तत्सू॑र्य॒ द्रवि॑णं धेहि चि॒त्रम्॥

परमात्मा अपने ज्ञानप्रकाश से सब दिनों और सब ऋतुओं में हमारे लिए कल्याणकारी और अपना साक्षात् दर्शनरूप आनन्दधन प्राप्त कराता है एवं सूर्य भी अपने अन्धकारनाशक प्रकाश द्वारा सब दिनों और सब ऋतुओं में कल्याणकारी हो॥१०॥

अ॒स्माकं॑ देवा उ॒भया॑य॒ जन्म॑ने॒ शर्म॑ यच्छत द्वि॒पदे॒ चतु॑ष्पदे। अ॒दत्पिब॑दू॒र्जय॑मान॒माशि॑तं॒ तद॒स्मे शं योर॑र॒पो द॑धातन॥

जीवन्मुक्त, परमात्मा की उपासना करनेवाले अपने सत्योपदेश के द्वारा हमें और हमारे पशुओं के लिए हित साधते हैं और निर्दोष सुख को प्राप्त कराते हैं। एवं सूर्य की किरणें और उनके जाननेवाले विद्वान् भी हमें और हमारे पशुओं को उत्तम जीवन प्रदान करते हैं॥११॥

यद्वो॑ देवाश्चकृ॒म जि॒ह्वया॑ गु॒रु मन॑सो वा॒ प्रयु॑ती देव॒हेळ॑नम्। अरा॑वा॒ यो नो॑ अ॒भि दु॑च्छुना॒यते॒ तस्मि॒न्तदेनो॑ वसवो॒ नि धे॑तन॥

विद्वानों के प्रति कभी भी मन, वाणी और आचरण से पाप नहीं करना चाहिए और न क्रोध। अपितु जो अपने प्रति द्वेष या ईर्ष्या करनेवाला शत्रु है, उसके ऐसे आचरण को उपदेश द्वारा दूर करने की प्रार्थना करनी चाहिए॥१२॥

अ॒स्मिन्न॑ इन्द्र पृत्सु॒तौ यश॑स्वति॒ शिमी॑वति॒ क्रन्द॑सि॒ प्राव॑ सा॒तये॑। यत्र॒ गोषा॑ता धृषि॒तेषु॑ खा॒दिषु॒ विष्व॒क्पत॑न्ति दि॒द्यवो॑ नृ॒षाह्ये॑॥

राजा अपने मनुष्यों व प्रजाओं की रक्षा के लिए संग्राम में नाशकारी शत्रु सैनिकों के ऊपर तीक्ष्ण शस्त्रों का प्रयोग करे॥१॥

स नः॑ क्षु॒मन्तं॒ सद॑ने॒ व्यू॑र्णुहि॒ गोअ॑र्णसं र॒यिमि॑न्द्र श्र॒वाय्य॑म्। स्याम॑ ते॒ जय॑तः शक्र मे॒दिनो॒ यथा॑ व॒यमु॒श्मसि॒ तद्व॑सो कृधि॥

राजा को चाहिए कि राष्ट्र में खेती करने के लिए पर्याप्त भूमि और जल का प्रबन्ध रखे। राष्ट्र की समृद्धि के लिए पूर्ण समर्थ रहे। आपात युद्ध में विजय करता हुआ अपनी स्नेही प्रजाओं की कामना को पूरा करता रहे॥२॥

यो नो॒ दास॒ आर्यो॑ वा पुरुष्टु॒तादे॑व इन्द्र यु॒धये॒ चिके॑तति। अ॒स्माभि॑ष्टे सु॒षहाः॑ सन्तु॒ शत्र॑व॒स्त्वया॑ व॒यं तान्व॑नुयाम संग॒मे॥

प्रजा को चाहिए कि अपने राजा का सदा साथ दे। जिससे वह राष्ट्र में धर्मकर्म-विहीन और सदाचारसम्पन्न परन्तु नास्तिक, विरुद्ध चिन्तन करनेवाले जनों को दण्ड देने में समर्थ हो॥३॥

यो द॒भ्रेभि॒र्हव्यो॒ यश्च॒ भूरि॑भि॒र्यो अ॒भीके॑ वरिवो॒विन्नृ॒षाह्ये॑। तं वि॑खा॒दे सस्नि॑म॒द्य श्रु॒तं नर॑म॒र्वाञ्च॒मिन्द्र॒मव॑से करामहे॥

प्रजाजनों को ऐसा राजा बनाना चाहिए, जो संग्राम के सब साधनों और विजय के प्रकारों को जानता हो। जो बहुत क्या, थोड़े से सेनिकों द्वारा भी विजय करने में समर्थ हो॥४॥

स्व॒वृजं॒ हि त्वाम॒हमि॑न्द्र शु॒श्रवा॑नानु॒दं वृ॑षभ रध्र॒चोद॑नम्। प्र मु॑ञ्चस्व॒ परि॒ कुत्सा॑दि॒हा ग॑हि॒ किमु॒ त्वावा॑न्मु॒ष्कयो॑र्ब॒द्ध आ॑सते॥

राजा सैन्य, शारीरिक, मानसिक और आत्मिक बलों से सम्पन्न हुआ तथा पापकर्म और विषयों से रहित और संयमी होकर समस्त भीतरी और बाहरी संग्रामों पर विजय पाता है॥५॥

यो वां॒ परि॑ज्मा सु॒वृद॑श्विना॒ रथो॑ दो॒षामु॒षासो॒ हव्यो॑ ह॒विष्म॑ता। श॒श्व॒त्त॒मास॒स्तमु॑ वामि॒दं व॒यं पि॒तुर्न नाम॑ सु॒हवं॑ हवामहे॥

राजा के द्वारा पृथिवीभर पर-स्थान-स्थान पर अध्यापक और उपदेशक नियुक्त करने चाहिए, जिसका ज्ञानप्रवाह सब लोगों को श्रवण करने के लिए मिले और अपना जीवन सुखी बना सकें एवं आग्नेय तथा सोम्य पदार्थों के रथ-यानविशेष निर्माण कराकर प्रजामात्र को यात्रा का अवसर देकर सुखी बनाना चाहिए॥१॥

चो॒दय॑तं सू॒नृताः॒ पिन्व॑तं॒ धिय॒ उत्पुरं॑धीरीरयतं॒ तदु॑श्मसि। य॒शसं॑ भा॒गं कृ॑णुतं नो अश्विना॒ सोमं॒ न चारुं॑ म॒घव॑त्सु नस्कृतम्॥

आध्यापक और उपदेशक हमारे अन्दर अपने उपदेश से बुद्धियों का विकास करते हैं। श्रेष्ठकर्म में प्रवृत्त करते हैं। हमें अपने मानवीय जीवनभाग सदाचार की प्रेरणा देते हैं और सुन्दर ऐश्वर्य को प्रदान करते है और विद्युत् की दो धाराएँ हमारे बुद्धिविकास का कारण बनती हैं। विशेष क्रिया द्वारा ऐश्वर्य भी प्राप्त कराती हैं॥२॥

अ॒मा॒जुर॑श्चिद्भवथो यु॒वं भगो॑ऽना॒शोश्चि॑दवि॒तारा॑प॒मस्य॑ चित्। अ॒न्धस्य॑ चिन्नासत्या कृ॒शस्य॑ चिद्यु॒वामिदा॑हुर्भि॒षजा॑ रु॒तस्य॑ चित्॥

राष्ट्र के अन्दर ऐसे कुशल ओषधिचिकित्सक और शल्यचिकित्सक वैद्य होने चाहिए, जो गृहस्थ में वर्तमान दम्पति के शरीर को स्वस्थ रख सकें तथा भोजन करने में असमर्थ, रक्तादि धातुक्षीण निर्बल मनुष्य, नेत्रहीन, कृश, और रोगी मनुष्य की रक्षा और चिकित्सा कर सकें। एवं आग्नेय सोम्य पदार्थ सूर्य की दो किरणें या विद्युत् की दो तरङ्गों द्वारा उनकी रक्षा की जा सके, ऐसे साधनों का आविष्कार करें॥३॥

यु॒वं च्यवा॑नं स॒नयं॒ यथा॒ रथं॒ पुन॒र्युवा॑नं च॒रथा॑य तक्षथुः। निष्टौ॒ग्र्यमू॑हथुर॒द्भ्यस्परि॒ विश्वेत्ता वां॒ सव॑नेषु प्र॒वाच्या॑॥

राष्ट्र के अन्दर ओषधिचिकित्सक तथा शल्यचिकित्सक वैद्य होने चाहिए, जो जीर्ण शरीरवाले या विकलित अङ्गवाले को फिर से युवा जैसा बना सकें। एवं आग्नेय सोम्य पदार्थों द्वारा जलयान आदि यानविशेष चलाकर या बनवाकर यात्रा के लिए सुविधाओं को जुटावें, विशेषतया व्यापारियों के उपयोगार्थ॥४॥

पु॒रा॒णा वां॑ वी॒र्या॒३॒॑ प्र ब्र॑वा॒ जनेऽथो॑ हासथुर्भि॒षजा॑ मयो॒भुवा॑। ता वां॒ नु नव्या॒वव॑से करामहे॒ऽयं ना॑सत्या॒ श्रद॒रिर्यथा॒ दध॑त्॥

ओषधिचिकित्सक और शल्यचिकित्सक तथा आग्नेय सोम्य पदार्थ रोगी को अच्छा करने में समर्थ हों। वे इस कार्य में प्रशंसा के योग्य होते हैं॥५॥

इ॒यं वा॑मह्वे शृणु॒तं मे॑ अश्विना पु॒त्राये॑व पि॒तरा॒ मह्यं॑ शिक्षतम्। अना॑पि॒रज्ञा॑ असजा॒त्याम॑तिः पु॒रा तस्या॑ अ॒भिश॑स्ते॒रव॑ स्पृतम्॥

अध्यापक और उपदेशकों से कुमारी कन्याएँ भी शिक्षा ग्रहण करें। विशेषतः अमर जीवन बनानेवाली-जीवन्मुक्त होनेवाली कन्याएँ अध्यात्मज्ञान का उपदेश लें॥६॥

यु॒वं रथे॑न विम॒दाय॑ शु॒न्ध्युवं॒ न्यू॑हथुः पुरुमि॒त्रस्य॒ योष॑णाम्। यु॒वं हवं॑ वध्रिम॒त्या अ॑गच्छतं यु॒वं सुषु॑तिं चक्रथुः॒ पुरं॑धये॥

अध्यापक और उपदेशक या अध्यापिका और उपदेशिका अपने शिष्य और शिष्याओं को पूर्ण ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणी बनाकर दोनों का यथायोग्य विवाहसम्बन्ध नियुक्त-स्थापित करें। उन्हें उत्तम सन्तान सुखसम्पत्ति से युक्त करें॥७॥

यु॒वं विप्र॑स्य जर॒णामु॑पे॒युषः॒ पुनः॑ क॒लेर॑कृणुतं॒ युव॒द्वयः॑। यु॒वं वन्द॑नमृश्य॒दादुदू॑पथुर्यु॒वं स॒द्यो वि॒श्पला॒मेत॑वे कृथः॥

अध्यापक और उपदेशक ज्ञानोपार्जित करनेवाले जराप्राप्त मेधावी को अपने अमृतमय उपदेश से पुनः युवकसदृश बना देते हैं। उपासक जन को तो अनेक मानसिक पीड़ाप्रद रोगों से ऊपर उठा देते हैं तथा प्रजा से विपरीत हुई प्रजापालिका या राजसभा को भी अनुकूल कर देते हैं॥८॥

यु॒वं ह॑ रे॒भं वृ॑षणा॒ गुहा॑ हि॒तमुदै॑रयतं ममृ॒वांस॑मश्विना। यु॒वमृ॒बीस॑मु॒त त॒प्तमत्र॑य॒ ओम॑न्वन्तं चक्रथुः स॒प्तव॑ध्रये॥

अध्यापक और उपदेशक सुख के बरसानेवाले होते हैं। वे हृदय में विराजमान मरणासन्न स्तोता जीव को अमर बना देते है और शरीर के संताप को दूर करते हैं। इन्द्रियों के विषयों से विरक्त हुए को सुरक्षित और अमृतभोग का भागी बना देते हैं॥९॥

यु॒वं श्वे॒तं पे॒दवे॑ऽश्वि॒नाश्वं॑ न॒वभि॒र्वाजै॑र्नव॒ती च॑ वा॒जिन॑म्। च॒र्कृत्यं॑ ददथुर्द्राव॒यत्स॑खं॒ भगं॒ न नृभ्यो॒ हव्यं॑ मयो॒भुव॑म्॥

अध्यापक और उपदेशक सुख के इच्छुक अधिकारी को उसके अन्तःकरण और ज्ञानेन्द्रियसम्बन्धी प्रवृत्तियों से युक्त देह को पुनः-पुनः सुखभोग का साधन बनाते हैं॥१०॥

न तं रा॑जानावदिते॒ कुत॑श्च॒न नांहो॑ अश्नोति दुरि॒तं नकि॑र्भ॒यम्। यम॑श्विना सुहवा रुद्रवर्तनी पुरोर॒थं कृ॑णु॒थः पत्न्या॑ स॒ह॥

उत्तम अध्यापक और उपदेशक अपने ज्ञान में अखण्डित सर्वत्र बुलाने योग्य-आमन्त्रण करने योग्य कष्ट को निवृत्त करनेवाले जिसे ज्ञान देते हैं, उसे कोई पाप और भय प्राप्त नहीं होता और पत्नी के साथ ऊँचे गृहस्थ रथ पर आरूढ़ होता है॥११॥

आ तेन॑ यातं॒ मन॑सो॒ जवी॑यसा॒ रथं॒ यं वा॑मृ॒भव॑श्च॒क्रुर॑श्विना। यस्य॒ योगे॑ दुहि॒ता जाय॑ते दि॒व उ॒भे अह॑नी सु॒दिने॑ वि॒वस्व॑तः॥

सुरक्षित स्त्री-पुरुष बड़े वेगवाले रथयान से इधर-उधर जाकर यात्रा करें। नववधू गृहस्थ में आकर उत्तम पुत्र-पुत्रियाँ उत्पन्न करें। आग्नेय सोम्य पदार्थों के द्वारा शिल्पी वैज्ञानिक लोग यथार्थ याननिर्माण करें॥१२॥

ता व॒र्तिर्या॑तं ज॒युषा॒ वि पर्व॑त॒मपि॑न्वतं श॒यवे॑ धे॒नुम॑श्विना। वृक॑स्य चि॒द्वर्ति॑काम॒न्तरा॒स्या॑द्यु॒वं शची॑भिर्ग्रसि॒ताम॑मुञ्चतम्॥

राष्ट्र के प्रधान पुरुष राजा और मन्त्री को चाहिए कि उनकी प्रजा की वृत्ति या सेना अज्ञानवश शासनबन्धन में आ जाये अथवा शत्रु के बन्धन में आ जाये, तो उसे छोड़ने तथा छुड़वाने का प्रयत्न करें॥१३॥

ए॒तं वां॒ स्तोम॑मश्विनावक॒र्मात॑क्षाम॒ भृग॑वो॒ न रथ॑म्। न्य॑मृक्षाम॒ योष॑णां॒ न मर्ये॒ नित्यं॒ न सू॒नुं तन॑यं॒ दधा॑नाः॥

अश्ववाले-राष्ट्रवाले राष्ट्रशासक प्रधान पुरुष राजा व मन्त्री के लिए प्रशंसनीय उपहार देना और उनके आदेश का पालन करना चाहिए। तेजस्वी विद्वान् विमान आदि यान बनावें और वस्त्र-भूषण आदि से सुभूषित करके कन्याओं के विवाह की व्यवस्था करें। उत्तम पुत्र-पौत्र गृहस्थ में प्राप्त करें॥१४॥

रथं॒ यान्तं॒ कुह॒ को ह॑ वां नरा॒ प्रति॑ द्यु॒मन्तं॑ सुवि॒ताय॑ भूषति। प्रा॒त॒र्यावा॑णं वि॒भ्वं॑ वि॒शेवि॑शे॒ वस्तो॑र्वस्तो॒र्वह॑मानं धि॒या शमि॑॥

सुशिक्षित स्त्री-पुरुषों को विशेष सुख के लिए अपने गृहस्थ रथ को, जो प्रथम अवस्था में प्राप्त होता है, उसे प्रजामात्र के लिए उत्तमरूप से चलाकर दूसरों के लिए आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए॥१॥

कुह॑ स्विद्दो॒षा कुह॒ वस्तो॑र॒श्विना॒ कुहा॑भिपि॒त्वं क॑रतः॒ कुहो॑षतुः। को वां॑ शयु॒त्रा वि॒धवे॑व दे॒वरं॒ मर्यं॒ न योषा॑ कृणुते स॒धस्थ॒ आ॥

गृहस्थ स्त्री-पुरुषों को सदा प्रेम के साथ रहना चाहिए। जैसे विवाहकाल में वर-वधू स्नेह करते थे, वह स्नेह बना रहे। कदाचित् मृत्यु आदि कारणवश दोनों का वियोग हो जाये, तो सन्तान की इच्छा होने पर नियोग से सन्तानलाभ कर सकते हैं॥२॥

प्रा॒तर्ज॑रेथे जर॒णेव॒ काप॑या॒ वस्तो॑र्वस्तोर्यज॒ता ग॑च्छथो गृ॒हम्। कस्य॑ ध्व॒स्रा भ॑वथः॒ कस्य॑ वा नरा राजपु॒त्रेव॒ सव॒नाव॑ गच्छथः॥

स्थविर गृहस्थ स्त्री-पुरुष के योग्य होते हैं। वे प्रतिदिन सम्मानित हुए, गृहस्थ के घर में राजकुमारों की भाँति सम्मान पाये हुए, उनके दोषों को दूर करने के लिए भिन्न-भिन्न उत्सवों में सम्मिलित हों॥३॥

यु॒वां मृ॒गेव॑ वार॒णा मृ॑ग॒ण्यवो॑ दो॒षा वस्तो॑र्ह॒विषा॒ नि ह्व॑यामहे। यु॒वं होत्रा॑मृतु॒था जुह्व॑ते न॒रेषं॒ जना॑य वहथः शुभस्पती॥

वृद्ध गृहस्थ जन नवगृहस्थों के घरों में पहुँचें। उन्हें गृहस्थ-संचालन के अपने अनुभवों से अवगत कराएँ। नवगृहस्थ भी वृद्ध स्त्री-पुरुषों को समय–समय पर आमन्त्रित करें, उनका उपहार एवं सत्कार से स्वागत करें॥४॥

यु॒वां ह॒ घोषा॒ पर्य॑श्विना य॒ती राज्ञ॑ ऊचे दुहि॒ता पृ॒च्छे वां॑ नरा। भू॒तं मे॒ अह्न॑ उ॒त भू॑तम॒क्तवेऽश्वा॑वते र॒थिने॑ शक्त॒मर्व॑ते॥

राज्य के वृद्ध तथा माननीय स्त्री-पुरुषों का सम्पर्क राज्यसभा से होना चाहिये। वह राज्य की घोषणा राज्य के वृद्ध-मान्य स्त्री-पुरुषों में सद्भाव से करती रहे और उसे शिरोधार्य करके यातायात के लिए रथों और घोड़ों की समृद्धि करते रहें॥५॥

यु॒वं क॒वी ष्ठः॒ पर्य॑श्विना॒ रथं॒ विशो॒ न कुत्सो॑ जरि॒तुर्न॑शायथः। यु॒वोर्ह॒ मक्षा॒ पर्य॑श्विना॒ मध्वा॒सा भ॑रत निष्कृ॒तं न योष॑णा॥

स्त्री-पुरुष शिक्षित होकर सुखद राजा के शासन में रहते हुए और परमात्मा की स्तुति करते हुए गृहस्थ जीवन का सुख संचित करें।  सद्गृहिणी रहने के स्थान को सुसंस्कृत रखे॥६॥

यु॒वं ह॑ भु॒ज्युं यु॒वम॑श्विना॒ वशं॑ यु॒वं शि॒ञ्जार॑मु॒शना॒मुपा॑रथुः। यु॒वो ररा॑वा॒ परि॑ स॒ख्यमा॑सते यु॒वोर॒हमव॑सा सु॒म्नमा च॑के॥

शिक्षित स्त्री-पुरुषों को यथासाधन चारों वर्णों को सहयोग देना और उनके सहयोग से सुख की कामना करनी चाहिए॥७॥

यु॒वं ह॑ कृ॒शं यु॒वम॑श्विना श॒युं यु॒वं वि॒धन्तं॑ वि॒धवा॑मुरुष्यथः। यु॒वं स॒निभ्यः॑ स्त॒नय॑न्तमश्वि॒नाप॑ व्र॒जमू॑र्णुथः स॒प्तास्य॑म्॥

सुशिक्षित स्त्री-पुरुषों को चाहिए कि वे क्षीण, असावधान, विधुर और विधवाओं की रक्षा करें तथा वेदवक्ता अथितियों के लिए यत्न-तत्र जाने की सुविधा दें॥८॥

जनि॑ष्ट॒ योषा॑ प॒तय॑त्कनीन॒को वि चारु॑हन्वी॒रुधो॑ दं॒सना॒ अनु॑। आस्मै॑ रीयन्ते निव॒नेव॒ सिन्ध॑वो॒ऽस्मा अह्ने॑ भवति॒ तत्प॑तित्व॒नम्॥

कन्या और कुमार ब्रह्मचर्य के पालन से जब एक-दूसरे की कामना करने और समागम के योग्य हों, तो उनका विवाह होना चाहिए, बिना कामना और योग्यता के नहीं। तभी पवित्र आचरण आदि द्वारा गृहस्थ में सुख सम्पतियाँ, नदियाँ जैसे निम्न स्थान में प्राप्त होती हैं, वैसे प्राप्त होती हैं॥९॥

जी॒वं रु॑दन्ति॒ वि म॑यन्ते अध्व॒रे दी॒र्घामनु॒ प्रसि॑तिं दीधियु॒र्नरः॑। वा॒मं पि॒तृभ्यो॒ य इ॒दं स॑मेरि॒रे मयः॒ पति॑भ्यो॒ जन॑यः परि॒ष्वजे॑॥

जो स्त्री-पुरुष गृहस्थ आश्रम को स्वीकार करते हैं, उन्हें आजीवन परस्पर स्नेहबन्धन की प्रतिज्ञा करनी चाहिए और उसे निभाना चाहिए। सन्तानप्राप्ति की आकाङ्क्षा गृहस्थी जनों को रखनी चाहिए॥१०॥

न तस्य॑ विद्म॒ तदु॒ षु प्र वो॑चत॒ युवा॑ ह॒ यद्यु॑व॒त्याः क्षेति॒ योनि॑षु। प्रि॒योस्रि॑यस्य वृष॒भस्य॑ रे॒तिनो॑ गृ॒हं ग॑मेमाश्विना॒ तदु॑श्मसि॥

वृद्ध स्त्री-पुरुषों को नवविवाहित, गृहस्थधर्म के संचालन में समर्थ के घर में गृहस्थ आश्रम को सुचारु रूप में चलाने के लिए तथा उनके यहाँ सुसन्तान हो, यह कामना रखते हुए जाना चाहिए॥११॥

आ वा॑मगन्त्सुम॒तिर्वा॑जिनीवसू॒ न्य॑श्विना हृ॒त्सु कामा॑ अयंसत। अभू॑तं गो॒पा मि॑थु॒ना शु॑भस्पती प्रि॒या अ॑र्य॒म्णो दुर्याँ॑ अशीमहि॥

गृहपत्नियों के अन्दर पुरातन सुशिक्षित स्त्री-पुरुषों के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए। वे उनसे गृहविज्ञान की शिक्षा प्राप्त करें, जिससे कि अपनी गार्हस्थ्य-कामनाएँ नियन्त्रित रहें॥१२॥

ता म॑न्दसा॒ना मनु॑षो दुरो॒ण आ ध॒त्तं र॒यिं स॒हवी॑रं वच॒स्यवे॑। कृ॒तं ती॒र्थं सु॑प्रपा॒णं शु॑भस्पती स्था॒णुं प॑थे॒ष्ठामप॑ दुर्म॒तिं ह॑तम्॥

सुशिक्षित वृद्ध स्त्री-पुरुष नवगृहस्थों को सुख पहुँचानेवाले उसके घर में उपदेश के इच्छुक जन के लिए सन्तति धन की प्राप्ति जिस प्रकार हो सके और गृहस्थाश्रम पापरहित सुख पहुँचानेवाला बन सके, ऐसे उपाय करें और गृहस्थ के मार्ग में आनेवाली दुर्वासना और जड़ता को नष्ट करने का यत्न करें॥१३॥

क्व॑ स्विद॒द्य क॑त॒मास्व॒श्विना॑ वि॒क्षु द॒स्रा मा॑दयेते शु॒भस्पती॑। क ईं॒ नि ये॑मे कत॒मस्य॑ जग्मतु॒र्विप्र॑स्य वा॒ यज॑मानस्य वा गृ॒हम्॥

कल्याण का उपदेश देनेवाले सुशिक्षित वृद्ध स्त्री-पुरुषों के पास जाकर पूछना चाहिए कि आप किस घर में उपदेश देते हो, कहाँ तुम सत्कार और हर्ष को प्राप्त करते हो, कौन गृहस्थ आदर से अपने घर रखता है ? इस प्रकार उनसे पूछकर वैसे ही शिष्टाचारपूर्वक बर्ताव कर अपने घर बुलाकर लाभ उठाएँ॥१४॥

स॒मा॒नमु॒ त्यं पु॑रुहू॒तमु॒क्थ्यं१॒॑ रथं॑ त्रिच॒क्रं सव॑ना॒ गनि॑ग्मतम्। परि॑ज्मानं विद॒थ्यं॑ सुवृ॒क्तिभि॑र्व॒यं व्यु॑ष्टा उ॒षसो॑ हवामहे॥

प्रातःकाल उषा वेला में स्तुति प्रार्थना उपासना तृप्तिसाधन अङ्गोंवाले अनुभव करने योग्य मोक्ष को निर्दोष भावनाओं-क्रियाओं से जीवन में धारण करना चाहिए॥१॥

प्रा॒त॒र्युजं॑ नास॒त्याधि॑ तिष्ठथः प्रात॒र्यावा॑णं मधु॒वाह॑नं॒ रथ॑म्। विशो॒ येन॒ गच्छ॑थो॒ यज्व॑रीर्नरा की॒रेश्चि॑द्य॒ज्ञं होतृ॑मन्तमश्विना॥

नासिका के प्राण और अपान-श्वास और प्रश्वास, प्राणायाम के ढंग से प्रातः चलाने से मधुरता प्राप्त करानेवाले मोक्ष की ओर ले जाते हैं। अध्यात्मयज्ञ करनेवाली प्रजाओं को यथार्थरूप से प्राप्त होते हैं-कार्य करते हैं। स्तुतिकर्त्ता आत्मा के अध्यात्मयज्ञ को भली-भाँति चलाते हैं॥२॥

अ॒ध्व॒र्युं वा॒ मधु॑पाणिं सु॒हस्त्य॑म॒ग्निधं॑ वा धृ॒तद॑क्षं॒ दमू॑नसम्। विप्र॑स्य वा॒ यत्सव॑नानि॒ गच्छ॒थोऽत॒ आ या॑तं मधु॒पेय॑मश्विना॥

जो मनुष्य मन से परमात्मा का मनन, हाथों से यथाशक्ति दान, संयतमन होकर करता है, उस ऐसे मेधावी पुरुष के प्राण अपान जीवन के सच्चे सुख और मोक्ष को प्राप्त करने के निमित्त बनते हैं॥३॥

अस्ते॑व॒ सु प्र॑त॒रं लाय॒मस्य॒न्भूष॑न्निव॒ प्र भ॑रा॒ स्तोम॑मस्मै। वा॒चा वि॑प्रास्तरत॒ वाच॑म॒र्यो नि रा॑मय जरितः॒ सोम॒ इन्द्र॑म्॥

स्तुति करनेवाले उपासक अपने आत्मा को बाण बना कर बाण फेंकनेवाले की भाँति परमात्मा में समर्पित करें, तथा विरोधी जन के वाक्प्रहार को अपने उपदेश भरे वचन से शान्त करें॥१॥

दोहे॑न॒ गामुप॑ शिक्षा॒ सखा॑यं॒ प्र बो॑धय जरितर्जा॒रमिन्द्र॑म्। कोशं॒ न पू॒र्णं वसु॑ना॒ न्यृ॑ष्ट॒मा च्या॑वय मघ॒देया॑य॒ शूर॑म्॥

परमात्मा आनन्दधन से पूर्ण है और मित्र के समान है, स्तुत्य है। उसकी स्तुति करने से वह अपने आध्यात्मिक आनन्दधन से उपासक को तृप्त कर देता है॥२॥

किम॒ङ्ग त्वा॑ मघवन्भो॒जमा॑हुः शिशी॒हि मा॑ शिश॒यं त्वा॑ शृणोमि। अप्न॑स्वती॒ मम॒ धीर॑स्तु शक्र वसु॒विदं॒ भग॑मि॒न्द्रा भ॑रा नः॥

परमात्मा सबका पालन करने में समर्थ है, वह अपनी कृपा से सबको यथायोग्य भोग देता है। विशेषतः उपासक को आध्यात्मिक ऐश्वर्य भी प्रदान करता है। उसकी उपासना करनी चाहिए॥३॥

त्वां जना॑ ममस॒त्येष्वि॑न्द्र संतस्था॒ना वि ह्व॑यन्ते समी॒के। अत्रा॒ युजं॑ कृणुते॒ यो ह॒विष्मा॒न्नासु॑न्वता स॒ख्यं व॑ष्टि॒ शूरः॑॥

मानव के सामने आनेवाले विरोधी जन संघर्ष लेने के लिए आह्वान करें। संग्राम में भले ही धकेलना चाहें, परन्तु उपासक-परमात्मा की स्तुति करनेवाले को घबराने की आवश्यकता नहीं। उसकी सहायता परमात्मा करता है॥४॥

धनं॒ न स्य॒न्द्रं ब॑हु॒लं यो अ॑स्मै ती॒व्रान्त्सोमाँ॑ आसु॒नोति॒ प्रय॑स्वान्। तस्मै॒ शत्रू॑न्त्सु॒तुका॑न्प्रा॒तरह्नो॒ नि स्वष्ट्रा॑न्यु॒वति॒ हन्ति॑ वृ॒त्रम्॥

योगाभ्यास करनेवाले कामादि शत्रुओं को नष्ट करने में समर्थ होते हैं तथा बुद्धि के आवरक अज्ञान को हटाकर ज्ञानप्रकाश को उन्नत करके परमात्मा के आनन्द को भी प्राप्त करते हैं॥५॥

यस्मि॑न्व॒यं द॑धि॒मा शंस॒मिन्द्रे॒ यः शि॒श्राय॑ म॒घवा॒ काम॑म॒स्मे। आ॒राच्चि॒त्सन्भ॑यतामस्य॒ शत्रु॒र्न्य॑स्मै द्यु॒म्ना जन्या॑ नमन्ताम्॥

वह राजा प्रशंसा के योग्य है जो अपनी प्रजा के लिये आवश्यक निर्वाह की वस्तुओं का प्रबन्ध करता है तथा विरोधी शत्रु आदि जिससे दूर से ही भय खाते हैं, वह राष्ट्र की भोगसम्पत्ति का अधिकारी है॥६॥

आ॒राच्छत्रु॒मप॑ बाधस्व दू॒रमु॒ग्रो यः शम्बः॑ पुरुहूत॒ तेन॑। अ॒स्मे धे॑हि॒ यव॑म॒द्गोम॑दिन्द्र कृ॒धी धियं॑ जरि॒त्रे वाज॑रत्नाम्॥

राजा को चाहिए अपने तीक्ष्ण शस्त्र से शत्रु को पीड़ित करे या दूर करे और प्रजाजनों के लिए दुग्ध आदि मिश्रित भोजन मिलता रहे, ऐसी व्यवस्था करे॥७॥

प्र यम॒न्तर्वृ॑षस॒वासो॒ अग्म॑न्ती॒व्राः सोमा॑ बहु॒लान्ता॑स॒ इन्द्र॑म्। नाह॑ दा॒मानं॑ म॒घवा॒ नि यं॑स॒न्नि सु॑न्व॒ते व॑हति॒ भूरि॑ वा॒मम्॥

राष्ट्र में विविध ऐश्वर्यों को अपने विविध कला व्यापार से बढ़ानेवाले जो श्रेष्ठ महानुभाव हैं, उन पर राजा किसी प्रकार के प्रतिबन्ध न लगाये, अपितु उनको राष्ट्र के ऊँचे पद व सहायता दे॥८॥

उ॒त प्र॒हाम॑ति॒दीव्या॑ जयाति कृ॒तं यच्छ्व॒घ्नी वि॑चि॒नोति॑ का॒ले। यो दे॒वका॑मो॒ न धना॑ रुणद्धि॒ समित्तं रा॒या सृ॑जति स्व॒धावा॑न्॥

राजा को चाहिए कि जो विनाशकारी विरोधी शत्रु हो, उसे साधनों से स्वाधीन करे और जो शान्तिप्रिय हो, उसे धनादि की सहायता दे॥९॥

गोभि॑ष्टरे॒माम॑तिं दु॒रेवां॒ यवे॑न॒ क्षुधं॑ पुरुहूत॒ विश्वा॑म्। व॒यं राज॑भिः प्रथ॒मा धना॑न्य॒स्माके॑न वृ॒जने॑ना जयेम॥

राष्ट्र की प्रजाएँ शासकों की सहायता से धनसम्पत्ति का उपार्जन करें। अपने बल से अपने कार्यों में सफलता प्राप्त करें। विविध भोजनों से क्षुधा की निवृत्ति करें एवं नाना विद्याओं के अध्ययन से अज्ञानबुद्धि को दूर करें॥१०॥

बृह॒स्पति॑र्नः॒ परि॑ पातु प॒श्चादु॒तोत्त॑रस्मा॒दध॑रादघा॒योः। इन्द्रः॑ पु॒रस्ता॑दु॒त म॑ध्य॒तो नः॒ सखा॒ सखि॑भ्यो॒ वरि॑वः कृणोतु॥

किसी भी दिशा में वर्त्तमान अनिष्टकारी से परमात्मा रक्षा करता है, जब कि हम सखासमान गुण आचरण को कर लेते हैं॥११॥

सूक्तम्

अच्छा॑ म॒ इन्द्रं॑ म॒तयः॑ स्व॒र्विदः॑ स॒ध्रीची॒र्विश्वा॑ उश॒तीर॑नूषत। परि॑ ष्वजन्ते॒ जन॑यो॒ यथा॒ पतिं॒ मर्यं॒ न शु॒न्ध्युं म॒घवा॑नमू॒तये॑॥

मनुष्य की वाणियाँ जो परमात्मा की स्तुति करनेवाली हैं, परमात्मा का समागम कराने-मोक्ष प्राप्त कराने की परम साधन हैं॥१॥

न घा॑ त्व॒द्रिगप॑ वेति मे॒ मन॒स्त्वे इत्कामं॑ पुरुहूत शिश्रय। राजे॑व दस्म॒ नि ष॒दोऽधि॑ ब॒र्हिष्य॒स्मिन्त्सु सोमे॑ऽव॒पान॑मस्तु ते॥

परमात्मा में मन को ऐसा लगाना चाहिए कि उसी के अन्दर सब इच्छाएँ पूरी हो सकें। मन ठीक परमात्मा में लग जाने पर इधर-उधर भटकना छोड़ देता है। उपासक परमात्मा को अपने हृदय में तब साक्षात् कर लेता है॥२॥

वि॒षू॒वृदिन्द्रो॒ अम॑तेरु॒त क्षु॒धः स इद्रा॒यो म॒घवा॒ वस्व॑ ईशते। तस्येदि॒मे प्र॑व॒णे स॒प्त सिन्ध॑वो॒ वयो॑ वर्धन्ति वृष॒भस्य॑ शु॒ष्मिणः॑॥

परमात्मा कुटिलों पर कृपा नहीं करता। उनको किसी न किसी ढंग से दण्ड देता है। अज्ञान और बहुत भोगेच्छा को भी निवृत्त करता है। समस्त बाहरी और आन्तरिक धन का स्वामी है। उसी के शासन से नदियाँ प्रवाहित होती हुई अन्न को बढ़ाती हैं और उसी में प्राण प्रगति करते हुए जीवन को बढ़ाते हैं॥३॥

वयो॒ न वृ॒क्षं सु॑पला॒शमास॑द॒न्त्सोमा॑स॒ इन्द्रं॑ म॒न्दिन॑श्चमू॒षदः॑। प्रैषा॒मनी॑कं॒ शव॑सा॒ दवि॑द्युतद्वि॒दत्स्व१॒॑र्मन॑वे॒ ज्योति॒रार्य॑म्॥

जैसे पक्षी हरे-भरे सुन्दर पत्तोंवाले वृक्ष पर बैठ कर आनन्द लेते हैं, ऐसे स्तुति करनेवाले उपासक समाधिस्थ, शान्त हो परमात्मा के आश्रय में आनन्द लेते हैं। उनका मुख आत्मतेज से दीप्त हो जाता है और उन्हें श्रेष्ठ सुखद ज्ञानज्योति प्राप्त हो जाती है॥४॥

कृ॒तं न श्व॒घ्नी वि चि॑नोति॒ देव॑ने सं॒वर्गं॒ यन्म॒घवा॒ सूर्यं॒ जय॑त्। न तत्ते॑ अ॒न्यो अनु॑ वी॒र्यं॑ शक॒न्न पु॑रा॒णो म॑घव॒न्नोत नूत॑नः॥

परमात्मा के अधीन बड़े-बड़े शक्तिशाली सूर्य जैसे पिण्ड हैं। जो सूर्य ब्रह्माण्ड में प्रकाश फेंकता है, वह परमात्मा के अधीन होकर ही फेंकता है। सूर्य शाश्वतिक नहीं है, न अन्य जड़ वस्तुओं जैसा अर्वाचीन है, क्योंकि उसके प्रकाश से ही वनस्पति आदि जीवन धारण करती हैं॥५॥

विशं॑विशं म॒घवा॒ पर्य॑शायत॒ जना॑नां॒ धेना॑ अव॒चाक॑श॒द्वृषा॑। यस्याह॑ श॒क्रः सव॑नेषु॒ रण्य॑ति॒ स ती॒व्रैः सोमैः॑ सहते पृतन्य॒तः॥

परमात्मा प्रत्येक मनुष्यादि प्राणी का अन्तःसाक्षी है, वह स्तुतिकर्ता मनुष्य की स्तुतिवाणी को जानता है। वह समस्त स्तुतिप्रसङ्गों में रमण करता है। स्तुति करनेवाले के कामादि शत्रुओं को नष्ट करता है॥६॥

आपो॒ न सिन्धु॑म॒भि यत्स॒मक्ष॑र॒न्त्सोमा॑स॒ इन्द्रं॑ कु॒ल्या इ॑व ह्र॒दम्। वर्ध॑न्ति॒ विप्रा॒ महो॑ अस्य॒ साद॑ने॒ यवं॒ न वृ॒ष्टिर्दि॒व्येन॒ दानु॑ना॥

नदियाँ जैसे समुद्र को और नहरें जैसे बड़े जलाशय अथवा नदी को प्राप्त होती हैं, ऐसे ही उपासकों के उपासनाप्रवाह परमात्मा को प्राप्त होते हैं और वे उपासनाप्रवाह उपासकों के अन्दर परमात्मा को प्रवृद्ध करते हैं, जैसे मेघजल से खेती के अन्न प्रवृद्ध होते हैं॥७॥

वृषा॒ न क्रु॒द्धः प॑तय॒द्रज॒स्स्वा यो अ॒र्यप॑त्नी॒रकृ॑णोदि॒मा अ॒पः। स सु॑न्व॒ते म॒घवा॑ जी॒रदा॑न॒वेऽवि॑न्द॒ज्ज्योति॒र्मन॑वे ह॒विष्म॑ते॥

परमात्मा अपने उपासकों को अपनाता है, उनके अन्दर से उनके कामादि शत्रुओं को ऐसे उखाड़ फेंकता है, जैसे बलवान् वृषभ पृथिवीस्तर से धूलिकणों को उखाड़ फेंकता है। उसका स्वभाव है कि आत्मसमर्पी उपासनारस सम्पादन करनेवाले, अन्यों को जीवन देनेवाले के लिए अपनी ज्योति-अपने स्वरूप को प्राप्त कराता है॥८॥

उज्जा॑यतां पर॒शुर्ज्योति॑षा स॒ह भू॒या ऋ॒तस्य॑ सु॒दुघा॑ पुराण॒वत्। वि रो॑चतामरु॒षो भा॒नुना॒ शुचिः॒ स्व१॒॑र्ण शु॒क्रं शु॑शुचीत॒ सत्प॑तिः॥

परमात्मा अपने उपासकों के कामादि शत्रुओं को अपने तेज से नष्ट करता है। दूध देनेवाली गौ की भाँति उसकी कृपा अमृतपान कराती है और वह हमारे अन्दर अपने तेजस्वरूप का दर्शन भी कराता है॥९॥

गोभि॑ष्टरे॒माम॑तिं दु॒रेवां॒ यवे॑न॒ क्षुधं॑ पुरुहूत॒ विश्वा॑म्। व॒यं राज॑भिः प्रथ॒मा धना॑न्य॒स्माके॑न वृ॒जने॑ना जयेम॥

राष्ट्र की प्रजाएँ शासकों की सहायता से धनसम्पत्ति का उपार्जन करें। अपने बल से अपने कार्यों में सफलता प्राप्त करें। विविध भोजनों से क्षुधा की निवृत्ति करें एवं नाना विद्याओं के अध्ययन से अज्ञानबुद्धि को दूर करें॥१०॥

बृह॒स्पति॑र्नः॒ परि॑ पातु प॒श्चादु॒तोत्त॑रस्मा॒दध॑रादघा॒योः। इन्द्रः॑ पु॒रस्ता॑दु॒त म॑ध्य॒तो नः॒ सखा॒ सखि॑भ्यो॒ वरि॑वः कृणोतु॥

किसी भी दिशा में वर्त्तमान अनिष्टकारी से परमात्मा रक्षा करता है, जब कि हम सखासमान गुण आचरण को कर लेते हैं॥११॥

आ या॒त्विन्द्रः॒ स्वप॑ति॒र्मदा॑य॒ यो धर्म॑णा तूतुजा॒नस्तुवि॑ष्मान्। प्र॒त्व॒क्षा॒णो अति॒ विश्वा॒ सहां॑स्यपा॒रेण॑ मह॒ता वृष्ण्ये॑न॥

परमात्मा अपने उपासकों को स्वीकार करता है और आनन्द देने के लिए उन्हें प्राप्त होता है तथा उनके कामादि शत्रुओं को नष्ट करता है। एवं राजा प्रजाजनों को अपनावे, उन्हें सुखी बनावे और शत्रुओं तथा दुःखों को सदा दूर किया करे॥१॥

सु॒ष्ठामा॒ रथः॑ सु॒यमा॒ हरी॑ ते मि॒म्यक्ष॒ वज्रो॑ नृपते॒ गभ॑स्तौ। शीभं॑ राजन्त्सु॒पथा या॑ह्य॒र्वाङ्वर्धा॑म ते प॒पुषो॒ वृष्ण्या॑नि॥

मुमुक्षुओं का पालक परमात्मा अपनी कृपा और प्रसाद से उपासकों के अन्दर अध्यात्ममार्ग द्वारा प्राप्त होता है। एवं प्रजा का पालक राजा अपने सेनाविभाग और सभाविभाग के द्वारा प्रजाओं का हित चाहता हुआ यानादि द्वारा उनमें प्राप्त होता है। इसी प्रकार गतिशक्तियों का रक्षक अपनी दो धाराओं के द्वारा किसी कलायन्त्र में उपयुक्त और प्रयुक्त होता है॥२॥

एन्द्र॒वाहो॑ नृ॒पतिं॒ वज्र॑बाहुमु॒ग्रमु॒ग्रास॑स्तवि॒षास॑ एनम्। प्रत्व॑क्षसं वृष॒भं स॒त्यशु॑ष्म॒मेम॑स्म॒त्रा स॑ध॒मादो॑ वहन्तु॥

उत्तम गुणवाले परमात्मा को तपस्वी उपासक प्राप्त करते हैं, दूसरे नहीं। ऐसे ही प्रतापी राजा को तेजस्वी सहायक कर्मचारी अपने अनुकूल बनाते हैं॥३॥

ए॒वा पतिं॑ द्रोण॒साचं॒ सचे॑तसमू॒र्जः स्क॒म्भं ध॒रुण॒ आ वृ॑षायसे। ओजः॑ कृष्व॒ सं गृ॑भाय॒ त्वे अप्यसो॒ यथा॑ केनि॒पाना॑मि॒नो वृ॒धे॥

परमात्मा संसार का संचालक तथा सर्वज्ञ, बलों का आधार और हमारा रक्षक है, स्वामी है। हमें उसकी उपासना करनी चाहिये। एवं राजा-राष्ट्र के संचालक को प्रत्येक गतिविधि में सावधान, सैन्य आदि बलों का रखनेवाला और प्रजापालक होना चाहिए॥४॥

गम॑न्न॒स्मे वसू॒न्या हि शंसि॑षं स्वा॒शिषं॒ भर॒मा या॑हि सो॒मिनः॑। त्वमी॑शिषे॒ सास्मिन्ना स॑त्सि ब॒र्हिष्य॑नाधृ॒ष्या तव॒ पात्रा॑णि॒ धर्म॑णा॥

परमात्मा की उपासना करनेवालों के समीप आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त हो जाती हैं और परमात्मा भी उनके हृदय में साक्षात् हो जाता है। कोई बाधक कामादि दोष परमात्मा से उन्हें विचलित नहीं कर सकता है एवं प्रजाजन जब राजा के शासन के अनुकूल चलते हैं, तो सुखसाधन वस्तुएँ उन्हें सुगमतया प्राप्त हो जाती हैं। उनके मध्य में राजा राजपद पर विराजमान होकर उनकी पूरी रक्षा करता है। राजा के रक्षण से उन्हें कोई हटा नहीं सकता॥५॥

पृथ॒क्प्राय॑न्प्रथ॒मा दे॒वहू॑त॒योऽकृ॑ण्वत श्रव॒स्या॑नि दु॒ष्टरा॑। न ये शे॒कुर्य॒ज्ञियां॒ नाव॑मा॒रुह॑मी॒र्मैव ते न्य॑विशन्त॒ केप॑यः॥

अध्यात्मगुणों को धारण करनेवाले मुमुक्षु जन ऊँचे उठते हुए संसारनदी को पार करके मोक्षधाम को प्राप्त होते हैं। निकृष्ट जन उन दिव्यगुणों को धारण करने में असमर्थ होकर इसी संसार में जन्म-जन्मान्तर धारण करते रहते हैं, पुत्रादि के मोह में पड़े रहते हैं॥६॥

ए॒वैवापा॒गप॑रे सन्तु दू॒ढ्योऽश्वा॒ येषां॑ दु॒र्युज॑ आयुयु॒ज्रे। इ॒त्था ये प्रागुप॑रे॒ सन्ति॑ दा॒वने॑ पु॒रूणि॒ यत्र॑ व॒युना॑नि॒ भोज॑ना॥

विषयलोलुप असंयमी जन दुर्बुद्धि, नीचगति को प्राप्त होते हैं, परन्तु विषयों से उपरत वैराग्यवान् उपासनाशील अनन्त आनन्द से पूर्ण मोक्ष को प्राप्त होते हैं॥७॥

गि॒रीँरज्रा॒न्रेज॑मानाँ अधारय॒द्द्यौः क्र॑न्दद॒न्तरि॑क्षाणि कोपयत्। स॒मी॒ची॒ने धि॒षणे॒ वि ष्क॑भायति॒ वृष्णः॑ पी॒त्वा मद॑ उ॒क्थानि॑ शंसति॥

परमात्मा मेघों को बरसाता है, लोक-लोकान्तरों को चलाता है, उपासकों के उपासनारसों को स्वीकार कर वेदमन्त्र का प्रवचन करता है॥८॥

इ॒मं बि॑भर्मि॒ सुकृ॑तं ते अङ्कु॒शं येना॑रु॒जासि॑ मघवञ्छफा॒रुजः॑। अ॒स्मिन्त्सु ते॒ सव॑ने अस्त्वो॒क्यं॑ सु॒त इ॒ष्टौ म॑घवन्बो॒ध्याभ॑गः॥

परमात्मा ने समस्त मनुष्यों को ठीक मार्ग में चलने के लिए वेदज्ञान का उपदेश दिया है। उससे विपरीत चलनेवालों को वह दण्ड देता है, किन्तु जो उसके अनुसार आचरण करते हैं, उसकी उपासना करते हैं, उनके हृदयसदन में उन्हें वह साक्षात् होता है। उनकी स्तुति प्रार्थना को पूरा करता है॥९॥

गोभि॑ष्टरे॒माम॑तिं दु॒रेवां॒ यवे॑न॒ क्षुधं॑ पुरुहूत॒ विश्वा॑म्। व॒यं राज॑भिः प्रथ॒मा धना॑न्य॒स्माके॑न वृ॒जने॑ना जयेम॥

राष्ट्र की प्रजाएँ शासकों की सहायता से धनसम्पत्ति का उपार्जन करें। अपने बल से अपने कार्यों में सफलता प्राप्त करें। विविध भोजनों से क्षुधा की निवृत्ति करें एवं नाना विद्याओं के अध्ययन से अज्ञानबुद्धि को दूर करें॥१०॥

बृह॒स्पति॑र्नः॒ परि॑ पातु प॒श्चादु॒तोत्त॑रस्मा॒दध॑रादघा॒योः। इन्द्रः॑ पु॒रस्ता॑दु॒त म॑ध्य॒तो नः॒ सखा॒ सखि॑भ्यो॒ वरि॑वः कृणोतु॥

किसी भी दिशा में वर्त्तमान अनिष्टकारी से परमात्मा रक्षा करता है, जब कि हम सखासमान गुण आचरण को कर लेते हैं॥११॥

दि॒वस्परि॑ प्रथ॒मं ज॑ज्ञे अ॒ग्निर॒स्मद्द्वि॒तीयं॒ परि॑ जा॒तवे॑दाः। तृ॒तीय॑म॒प्सु नृ॒मणा॒ अज॑स्र॒मिन्धा॑न एनं जरते स्वा॒धीः॥

परमात्मा ने प्रथम द्युलोक में सूर्य अग्नि को उत्पन्न किया, दूसरे पृथिवी पर अग्नि को उत्पन्न किया, तीसरे अन्तरिक्ष में विद्युदग्नि को उत्पन्न किया। इस प्रकार मनुष्य को इन अग्नियों को देखकर परमात्मा का मनन करते हुए, जरापर्यन्त इनसे लाभ लेते हुए परमात्मा की स्तुति करनी चाहिए॥१॥

वि॒द्मा ते॑ अग्ने त्रे॒धा त्र॒याणि॑ वि॒द्मा ते॒ धाम॒ विभृ॑ता पुरु॒त्रा। वि॒द्मा ते॒ नाम॑ पर॒मं गुहा॒ यद्वि॒द्मा तमुत्सं॒ यत॑ आज॒गन्थ॑॥

मनुष्य जैसे अन्य-अन्य विज्ञानों में कुशलता प्राप्त करता है, वैसे-वैसे उसे अग्निविज्ञान में भी कुशलता प्राप्त करनी चाहिए। अर्थात् अग्नि के भिन्न-भिन्न रूप और उसके भिन्न-भिन्न उत्पत्तिस्थान तथा खनिज पदार्थ जिनसे अग्नि उत्पन्न होती है, उन्हें भी जानना चाहिए॥२॥

स॒मु॒द्रे त्वा॑ नृ॒मणा॑ अ॒प्स्व१॒॑न्तर्नृ॒चक्षा॑ ईधे दि॒वो अ॑ग्न॒ ऊध॑न्। तृ॒तीये॑ त्वा॒ रज॑सि तस्थि॒वांस॑म॒पामु॒पस्थे॑ महि॒षा अ॑वर्धन्॥

परमात्मा आग्नेय तत्त्व को द्युलोक में सूर्यरूप से, अन्तरिक्ष में विद्युद्रूप से, पृथिवी पर पार्थिव अग्नि के रूप में उत्पन्न करता है, पुनः ऋत्विक् लोग य विद्वान् उसे अपने विविध कार्यों में प्रकट करके उपयोग में लाते हैं॥३॥

अक्र॑न्दद॒ग्निः स्त॒नय॑न्निव॒ द्यौः क्षामा॒ रेरि॑हद्वी॒रुधः॑ सम॒ञ्जन्। स॒द्यो ज॑ज्ञा॒नो वि हीमि॒द्धो अख्य॒दा रोद॑सी भा॒नुना॑ भात्य॒न्तः॥

द्युलोक में सूर्यरूप से अग्नि प्रकाशमान होता है, अन्तरिक्ष में विद्युद्रूप से और पृथ्वी पर काष्ठ इन्धन द्वारा पार्थिव अग्नि के रूप में प्रकाशित होता है, इस प्रकार अग्नितत्त्व द्यावापृथ्वीमय जगत् में प्रसिद्ध हुआ अन्य प्रदार्थों का प्रकाशक है॥४॥

श्री॒णामु॑दा॒रो ध॒रुणो॑ रयी॒णां म॑नी॒षाणां॒ प्रार्प॑णः॒ सोम॑गोपाः। वसुः॑ सू॒नुः सह॑सो अ॒प्सु राजा॒ वि भा॒त्यग्र॑ उ॒षसा॑मिधा॒नः॥

सूर्य संसार में प्राणशक्ति का प्रेरक है, नाना प्रकार की पुष्टियों को देनेवाला है। बुद्धियों का प्रेरक, उत्पन्न होनेवाले पदार्थों को बढ़ानेवाला, बलवर्धक, आकाश के पिण्डों को प्रकाश देनेवाला और उषावेलाओं के पश्चात् प्रकाशित होनेवाला या उदय होनेवाला उपयोगी पिण्ड है॥५॥

विश्व॑स्य के॒तुर्भुव॑नस्य॒ गर्भ॒ आ रोद॑सी अपृणा॒ज्जाय॑मानः। वी॒ळुं चि॒दद्रि॑मभिनत्परा॒यञ्जना॒ यद॒ग्निमय॑जन्त॒ पञ्च॑॥

सूर्य संसार में प्रगति देनेवाला है, आकाश और पृथ्वी के मध्य में अपने प्रकाश को भर देता है। मनुष्यमात्र जब सामूहिकरूप से यजन करते हैं और यज्ञ में मेघ बनते हैं, उन मेघों को पृथ्वी पर बरसा देनेवाला सूर्य है। वह मेघों को छिन्न-भिन्न कर पृथ्वी पर बरसा देता है, जो प्राणियों के पोषण का निमित्त बनता है॥६॥

उ॒शिक्पा॑व॒को अ॑र॒तिः सु॑मे॒धा मर्ते॑ष्व॒ग्निर॒मृतो॒ नि धा॑यि। इय॑र्ति धू॒मम॑रु॒षं भरि॑भ्र॒दुच्छु॒क्रेण॑ शो॒चिषा॒ द्यामिन॑क्षन्॥

परमात्मा प्राणियों की कल्याण कामना करता हुआ सबके अन्दर व्यापक होकर जीवनप्रकाश प्रदान करता है और विशिष्ट मनुष्यों को मोक्ष की ओर भी प्रेरित करता है॥७॥

दृ॒शा॒नो रु॒क्म उ॑र्वि॒या व्य॑द्यौद्दु॒र्मर्ष॒मायुः॑ श्रि॒ये रु॑चा॒नः। अ॒ग्निर॒मृतो॑ अभव॒द्वयो॑भि॒र्यदे॑नं॒ द्यौर्ज॒नय॑त्सु॒रेताः॑॥

परमात्मा सर्वत्र एकरस विराजमान है। अबाध्य ज्ञान को विशेषरूप से अपने आश्रयी उपासक के लिए देता है और उत्तम प्राणों से समृद्ध करता है॥८॥

यस्ते॑ अ॒द्य कृ॒णव॑द्भद्रशोचेऽपू॒पं दे॑व घृ॒तव॑न्तमग्ने। प्र तं न॑य प्रत॒रं वस्यो॒ अच्छा॒भि सु॒म्नं दे॒वभ॑क्तं यविष्ठ॥

परमात्मा का ज्ञानप्रकाश कल्याणकारी है, वह समागम के योग्य है। जो उपासक संयम द्वारा अपनी इन्द्रियों को तेजस्वी बना लेता है, उसे परमात्मा सांसारिक सुख भोगों से उत्कृष्ट सुखविशेषरूप मोक्ष को प्राप्त कराता है॥९॥

आ तं भ॑ज सौश्रव॒सेष्व॑ग्न उ॒क्थौ॑क्थ॒ आ भ॑ज श॒स्यमा॑ने। प्रि॒यः सूर्ये॑ प्रि॒यो अ॒ग्ना भ॑वा॒त्युज्जा॒तेन॑ भि॒नद॒दुज्जनि॑त्वैः॥

परमात्मा का जो श्रवण, मनन, निदिध्यासन, साक्षात्कार करता है तथा उसकी स्तुति करने में लगा रहता है, वह सर्वप्रकाशक, अग्रनेता परमात्मा का प्रिय हो जाता है। वह किसी भी काल में पापकर्म नहीं करता है, पापकर्म के दुःख को नहीं भोगता है॥१०॥

त्वाम॑ग्ने॒ यज॑माना॒ अनु॒ द्यून्विश्वा॒ वसु॑ दधिरे॒ वार्या॑णि। त्वया॑ स॒ह द्रवि॑णमि॒च्छमा॑ना व्र॒जं गोम॑न्तमु॒शिजो॒ वि व॑व्रुः॥

परमात्मा के आदेशानुकूल जीवन के सब दिनों में वरणीय धनों को मनुष्य प्राप्त करते हैं और वे अपने लिए ज्ञानमार्ग का विस्तार करते हैं॥११॥

अस्ता॑व्य॒ग्निर्न॒रां सु॒शेवो॑ वैश्वान॒र ऋषि॑भिः॒ सोम॑गोपाः। अ॒द्वे॒षे द्यावा॑पृथि॒वी हु॑वेम॒ देवा॑ ध॒त्त र॒यिम॒स्मे सु॒वीर॑म्॥

परमात्मा मनुष्यों का सुखदाता, उपासकों का रक्षक है। वह ज्ञानप्रकाशदाता तथा धारणकर्ता भी है, सदा उसकी स्तुति करते हुए अध्यात्मधन की याचना करनी चाहिए॥१२॥

प्र होता॑ जा॒तो म॒हान्न॑भो॒विन्नृ॒षद्वा॑ सीदद॒पामु॒पस्थे॑। दधि॒र्यो धायि॒ स ते॒ वयां॑सि य॒न्ता वसू॑नि विध॒ते त॑नू॒पाः॥

परमात्मा सब जड़-जङ्गम का आधार है। सूक्ष्मातिसूक्ष्म का भी ज्ञाता, प्राणियों को रक्षा के साधन देनेवाला, जीवनशक्ति तथा जीवन के लिए उपयोगी वस्तुओं का देनेवाला, सबका आश्रयणीय और उपास्य है॥१॥

इ॒मं वि॒धन्तो॑ अ॒पां स॒धस्थे॑ प॒शुं न न॒ष्टं प॒दैरनु॑ ग्मन्। गुहा॒ चत॑न्तमु॒शिजो॒ नमो॑भिरि॒च्छन्तो॒ धीरा॒ भृग॑वोऽविन्दन्॥

उपासक जन परमात्मा की खोज स्तुतियों और अध्यात्मयज्ञों के द्वारा करते हैं, पुनः उसे हृदय में साक्षात् प्राप्त कर लेते हैं॥२॥

इ॒मं त्रि॒तो भूर्य॑विन्ददि॒च्छन्वै॑भूव॒सो मू॒र्धन्यघ्न्या॑याः। स शेवृ॑धो जा॒त आ ह॒र्म्येषु॒ नाभि॒र्युवा॑ भवति रोच॒नस्य॑॥

जो मनुष्य मेधावी और स्तुति, प्रार्थना, उपासना से सम्पन्न होता है, वह सर्वत्र व्यापक परमात्मा के प्रिय पुत्र के समान उपासक होता है। वह वाणी के मूर्धा स्वरूप ‘ओ३म्’ नाम के जप से सुखस्वरूप परमात्मा का साक्षात् करता है, जो सब सुखों में ऊँचा श्रेष्ठ सुख है॥३॥

म॒न्द्रं होता॑रमु॒शिजो॒ नमो॑भिः॒ प्राञ्चं॑ य॒ज्ञं ने॒तार॑मध्व॒राणा॑म्। वि॒शाम॑कृण्वन्नर॒तिं पा॑व॒कं ह॑व्य॒वाहं॒ दध॑तो॒ मानु॑षेषु॥

मनुष्यों में जो परमात्मा को अपने अन्दर धारण करने के अत्यन्त इच्छुक होते हैं और पवित्र आचरणवाले तथा श्रद्धा से उपासना करते हैं, वे ही प्राणिमात्र के स्वामी हर्षित करनेवाले परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं॥४॥

प्र भू॒र्जय॑न्तं म॒हां वि॑पो॒धां मू॒रा अमू॑रं पु॒रां द॒र्माण॑म्। नय॑न्तो॒ गर्भं॑ व॒नां धियं॑ धु॒र्हिरि॑श्मश्रुं॒ नार्वा॑णं॒ धन॑र्चम्॥

परमात्मा समस्त जड़-चेतन को अपने अधिकार में रखे हुए है। वह अपने उपासकों की वासनाओं को नष्ट करता है। अल्पज्ञानी मनुष्य उसकी उपासना से कुशल बन जाते हैं। उस तेजस्वी परमात्मा की यथार्थ अर्चना और उसके प्रति आस्तिक बुद्धि मनुष्यों को रखनी चाहिए॥५॥

नि प॒स्त्या॑सु त्रि॒तः स्त॑भू॒यन्परि॑वीतो॒ योनौ॑ सीदद॒न्तः। अतः॑ सं॒गृभ्या॑ वि॒शां दमू॑ना॒ विध॑र्मणाय॒न्त्रैरी॑यते॒ नॄन्॥

मनुष्यों के शारीरिक मानसिक तथा आत्मिक सुखों का विस्तार करनेवाला परमात्मा है। वह उनके कर्मानुसार फल देता है। मुमुक्षु उपासकों के हृदय में स्वतः साक्षात् होता है। उसे किसी यानादि साधन की आवश्यकता नहीं है॥६॥

अ॒स्याजरा॑सो द॒माम॒रित्रा॑ अ॒र्चद्धू॑मासो अ॒ग्नयः॑ पाव॒काः। श्वि॒ती॒चयः॑ श्वा॒त्रासो॑ भुर॒ण्यवो॑ वन॒र्षदो॑ वा॒यवो॒ न सोमाः॑॥

उपासक के बाधकों को नष्ट करनेवाला, उनसे रक्षा करनेवाला परमात्मा अजर, अर्चनीय, तेजवाला, पवित्रकर्ता, शुभ्रस्वरूपवाला, शीघ्रकारी, पालनकर्ता, उपासक के हृदय में प्राप्त होनेवाला, शान्त गतिमान् और ज्ञानप्रकाशक है॥७॥

प्र जि॒ह्वया॑ भरते॒ वेपो॑ अ॒ग्निः प्र व॒युना॑नि॒ चेत॑सा पृथि॒व्याः। तमा॒यवः॑ शु॒चय॑न्तं पाव॒कं म॒न्द्रं होता॑रं दधिरे॒ यजि॑ष्ठम्॥

परमात्मा वेदद्वारा मनुष्यों को कर्मविधान का उपदेश देता है तथा वेद के द्वारा ही विस्तृत सृष्टि के ज्ञानक्रमों को भी जनाता है। वह परमात्मा सबके द्वारा स्तुति करने और धारण करने योग्य है॥८॥

द्यावा॒ यम॒ग्निं पृ॑थि॒वी जनि॑ष्टा॒माप॒स्त्वष्टा॒ भृग॑वो॒ यं सहो॑भिः। ई॒ळेन्यं॑ प्रथ॒मं मा॑त॒रिश्वा॑ दे॒वास्त॑तक्षु॒र्मन॑वे॒ यज॑त्रम्॥

द्युलोक, पृथिवीलोक, जलप्रवाह, किरणें और वायु तथा आकाश के पदार्थ परमात्मा को अपना नायक और कर्ता के रूप में मननशील मनुष्य के लिए दर्शाते हैं-सिद्ध करते हैं। उस परमात्मा की उपासना करनी चाहिए॥९॥

यं त्वा॑ दे॒वा द॑धि॒रे ह॑व्य॒वाहं॑ पुरु॒स्पृहो॒ मानु॑षासो॒ यज॑त्रम्। स याम॑न्नग्ने स्तुव॒ते वयो॑ धाः॒ प्र दे॑व॒यन्य॒शसः॒ सं हि पू॒र्वीः॥

परमात्मा प्रार्थनावचनों को स्वीकार करता है, वह सङ्गमनीय है, उसे चाहनेवाले मनुष्य धारण करते हैं-उपासना में लाते हैं। उपासक जन उसकी कृपा से नानाप्रकार के यशों को और आध्यात्मिक सम्पत्तियों को प्राप्त करते हैं॥१०॥

ज॒गृ॒भ्मा ते॒ दक्षि॑णमिन्द्र॒ हस्तं॑ वसू॒यवो॑ वसुपते॒ वसू॑नाम्। वि॒द्मा हि त्वा॒ गोप॑तिं शूर॒ गोना॑म॒स्मभ्यं॑ चि॒त्रं वृष॑णं र॒यिं दाः॑॥

परमात्मा समस्त धनों और सुखों को देनेवाले पदार्थों का स्वामी है, उसकी हम उपासना करें, तो वह हमें निश्चित धन और सुख से संपन्न कर सकता है॥१॥

स्वा॒यु॒धं स्वव॑सं सुनी॒थं चतुः॑समुद्रं ध॒रुणं॑ रयी॒णाम्। च॒र्कृत्यं॒ शंस्यं॒ भूरि॑वारम॒स्मभ्यं॑ चि॒त्रं वृष॑णं र॒यिं दाः॑॥

परमात्मा उत्तम आयु का देनेवाला, उत्तम रक्षक, धर्मार्थकाममोक्ष का साधक, विविध धनों का धारण करनेवाला है, ऐसे बहुत वरणीय पदार्थों के दाता सत्करणीय परमात्मा को जानना और मानना चाहिए, वह हमें निश्चित धन और सुख से संपन्न कर सकता है॥२॥

सु॒ब्रह्मा॑णं दे॒वव॑न्तं बृ॒हन्त॑मु॒रुं ग॑भी॒रं पृ॒थुबु॑ध्नमिन्द्र। श्रु॒तऋ॑षिमु॒ग्रम॑भिमाति॒षाह॑म॒स्मभ्यं॑ चि॒त्रं वृष॑णं र॒यिं दाः॑॥

परमात्मा उत्तम वेदज्ञान का स्वामी है। सबसे महान्, अनन्त, जगत् का आदि कारण, ऋषियों द्वारा श्रवण करने योग्य, सर्वोपरि विराजमान, अभिमानियों का मानमर्दक है। उस परमात्मा को जानना चाहिए, वह हमें निश्चितरूप से धन और सुख से संपन्न कर सकता है॥३॥

स॒नद्वा॑जं॒ विप्र॑वीरं॒ तरु॑त्रं धन॒स्पृतं॑ शूशु॒वांसं॑ सु॒दक्ष॑म्। द॒स्यु॒हनं॑ पू॒र्भिद॑मिन्द्र स॒त्यम॒स्मभ्यं॑ चि॒त्रं वृष॑णं र॒यिं दाः॑॥

परमात्मा अमृतान्न भोग का दाता, मेधावी लोगों द्वारा उपासनीय, संसारसागर से तरानेवाला, धन को प्राप्त करानेवाला, वर्धक, व्यापक, प्रशस्त बलवाला, दुष्टनाशक, मानसिक वासनाओं को दूर करनेवाला एवं अविनाशी है। वह सबके द्वारा जानने, मानने और उपासना करने योग्य है ॥४॥

अश्वा॑वन्तं र॒थिनं॑ वी॒रव॑न्तं सह॒स्रिणं॑ श॒तिनं॒ वाज॑मिन्द्र। भ॒द्रव्रा॑तं॒ विप्र॑वीरं स्व॒र्षाम॒स्मभ्यं॑ चि॒त्रं वृष॑णं र॒यिं दाः॑॥

व्याप्तिमान्-सबमें व्याप्त, मुमुक्षुओं के मोक्ष का स्वामी, अध्यात्मवीरों का स्वामी, सहस्रों और असंख्य अमृतान्न भोगों का स्वामी, कल्याणकारी वस्तु समूहों का स्वामी, मेधावी उपासकों का स्वामी परमात्मा मनुष्यों का सुखसम्भाजक जानने-मानने योग्य है, वह धन और सुखों से हमें अवश्य संपन्न करता है॥५॥

प्र स॒प्तगु॑मृ॒तधी॑तिं सुमे॒धां बृह॒स्पतिं॑ म॒तिरच्छा॑ जिगाति। य आ॑ङ्गिर॒सो नम॑सोप॒सद्यो॒ऽस्मभ्यं॑ चि॒त्रं वृष॑णं र॒यिं दाः॑॥

प्राणायाम आदि योगाभ्यास करनेवाला जन वेदवाणी के स्वामी, सर्वज्ञ, सत्यकर्मवाले महान् विश्व के स्वामी परमात्मा को स्तुति से प्राप्त करता है। जो परमात्मा हमें निश्चित धनों और सुखों को प्राप्त कराता है॥६॥

वनी॑वानो॒ मम॑ दू॒तास॒ इन्द्रं॒ स्तोमा॑श्चरन्ति सुम॒तीरि॑या॒नाः। हृ॒दि॒स्पृशो॒ मन॑सा व॒च्यमा॑ना अ॒स्मभ्यं॑ चि॒त्रं वृष॑णं र॒यिं दाः॑॥

उपासक की स्तुतियाँ अनुरागपूर्ण कल्याण चाहती हुई, हृदय में लगती हुई, अन्तःकरण से निकली हुई परमात्मा के लिए होनी चाहिए। वह परमात्मा हमारे लिए धनों और सुखों को प्राप्त कराता है॥७॥

यत्त्वा॒ यामि॑ द॒द्धि तन्न॑ इन्द्र बृ॒हन्तं॒ क्षय॒मस॑मं॒ जना॑नाम्। अ॒भि तद्द्यावा॑पृथि॒वी गृ॑णीताम॒स्मभ्यं॑ चि॒त्रं वृष॑णं र॒यिं दाः॑॥

उपासकों का अभीष्ट अमरधाम मोक्ष है। उसे प्राप्त करने के लिए परमात्मा से याचना करनी चाहिए। माता-पिता, अध्यापिका-अध्यापक, स्त्री-पुरुष, अपने पुत्रों और शिष्यों को उसकी प्राप्ति करने के यत्न का उपदेश दें॥८॥

अ॒हं भु॑वं॒ वसु॑नः पू॒र्व्यस्पति॑र॒हं धना॑नि॒ सं ज॑यामि॒ शश्व॑तः। मां ह॑वन्ते पि॒तरं॒ न ज॒न्तवो॒ऽहं दा॒शुषे॒ वि भ॑जामि॒ भोज॑नम्॥

परमात्मा मुक्तात्माओं के मोक्षरूप वास का पुरातन स्वामी है, प्राणिगणों के लिए विविध धनों और जीवननिर्वाहक भोगों को यथायोग्य देता है॥१॥

अ॒हमिन्द्रो॒ रोधो॒ वक्षो॒ अथ॑र्वणस्त्रि॒ताय॒ गा अ॑जनय॒महे॒रधि॑। अ॒हं दस्यु॑भ्यः॒ परि॑ नृ॒म्णमा द॑दे गो॒त्रा शिक्ष॑न्दधी॒चे मा॑त॒रिश्व॑ने॥

परमात्मा योगी-स्तुति प्रार्थना उपासना करनेवाले पापरहित आत्मा के लिए वेदज्ञान का उपदेश देता है और साधारण जनों के लिए सामान्य वाणी देता है।  अज्ञानी दुष्ट मनुष्य की सम्पत्ति, शक्ति को नष्ट कर देता है॥२॥

मह्यं॒ त्वष्टा॒ वज्र॑मतक्षदाय॒सं मयि॑ दे॒वासो॑ऽवृज॒न्नपि॒ क्रतु॑म्। ममानी॑कं॒ सूर्य॑स्येव दु॒ष्टरं॒ मामार्य॑न्ति कृ॒तेन॒ कर्त्वे॑न च॥

सूर्य अपने तापप्रकाश के देनेवाले परमात्मा को प्रदर्शित करता है। मुमुक्षुजन स्तुति-प्रार्थना-उपासना ईश्वर के प्रति समर्पित करते हैं तथा कर्म करनेवाले मनुष्य फल पाने के लिए भी परमात्मा के अधीन हैं॥३॥

अ॒हमे॒तं ग॒व्यय॒मश्व्यं॑ प॒शुं पु॑री॒षिणं॒ साय॑केना हिर॒ण्यय॑म्। पु॒रू स॒हस्रा॒ नि शि॑शामि दा॒शुषे॒ यन्मा॒ सोमा॑स उ॒क्थिनो॒ अम॑न्दिषुः॥

इन्द्रियसंयमी मनोनिरोधक सावधान आत्मा के प्रति परमात्मा पापनाशक अपने तेज से सहस्रगुणित धनलाभ देता है तथा स्तुति करनेवाले उपासक के उपासनारसों से हर्षित होकर भी वह उन्हें धनलाभ देता है॥४॥

अ॒हमिन्द्रो॒ न परा॑ जिग्य॒ इद्धनं॒ न मृ॒त्यवेऽव॑ तस्थे॒ कदा॑ च॒न। सोम॒मिन्मा॑ सु॒न्वन्तो॑ याचता॒ वसु॒ न मे॑ पूरवः स॒ख्ये रि॑षाथन॥

ऐश्वर्यवान् परमात्मा के यहाँ अध्यात्मधन की कमी नहीं होती, क्योंकि वह अमर है, अतः उसका अध्यात्म ऐश्वर्य भी अमर है। उपासनारस समर्पित करनेवाले उस धन की याचना किया करें और उसकी मित्रता के लिये यत्न करें, तो कभी पीड़ित न होवें॥५॥

अ॒हमे॒ताञ्छाश्व॑सतो॒ द्वाद्वेन्द्रं॒ ये वज्रं॑ यु॒धयेऽकृ॑ण्वत। आ॒ह्वय॑मानाँ॒ अव॒ हन्म॑नाहनं दृ॒ळ्हा वद॒न्नन॑मस्युर्नम॒स्विनः॑॥

वज्रधारी नास्तिक प्राणीजनों को वज्र की अपेक्षा न रखता भी हननशक्ति से सम्पन्न परमात्मा नष्ट कर देता है॥६॥

अ॒भी॒३॒॑दमेक॒मेको॑ अस्मि नि॒ष्षाळ॒भी द्वा किमु॒ त्रयः॑ करन्ति। खले॒ न प॒र्षान्प्रति॑ हन्मि॒ भूरि॒ किं मा॑ निन्दन्ति॒ शत्र॑वोऽनि॒न्द्राः॥

परमात्मा एक है, परन्तु वह अकेला भी अनेक या बहुतेरे निन्दकों नास्तिकों-पापियों के वर्गों को दण्ड दे सकता है, जैसे संग्रामस्थल में सैनिक हताहत कर दिये जाते हैं या जैसे खलिहान में अन्नपूलों को चूर-चूर कर दिया जाता है, ऐसे ही परमात्मा उन वर्गों को चूर-चूर देता है। वे निन्दक या नास्तिक परमात्मा का कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं॥७॥

अ॒हं गु॒ङ्गुभ्यो॑ अतिथि॒ग्वमिष्क॑र॒मिषं॒ न वृ॑त्र॒तुरं॑ वि॒क्षु धा॑रयम्। यत्प॑र्णय॒घ्न उ॒त वा॑ करञ्ज॒हे प्राहं म॒हे वृ॑त्र॒हत्ये॒ अशु॑श्रवि॥

जो मनुष्य परमात्मा के लिए उपांशु-अव्यक्त या मानसिक जप करता है, वह उनके अज्ञान को नष्ट करता है तथा जो ज्ञानी जन परमात्मा को प्राप्त करना चाहते हैं, वह उन्हें मोक्ष प्रदान करता है। परमात्मा की शरण लेनेवाले के प्रति जो पापचिन्तन करता है, उसको वह दण्ड देता है॥८॥

प्र मे॒ नमी॑ सा॒प्य इ॒षे भु॒जे भू॒द्गवा॒मेषे॑ स॒ख्या कृ॑णुत द्वि॒ता। दि॒द्युं यद॑स्य समि॒थेषु॑ मं॒हय॒मादिदे॑नं॒ शंस्य॑मु॒क्थ्यं॑ करम्॥

परमात्मा की स्तुति करनेवाला मोक्षसुख प्राप्त करने में समर्थ या अधिकारी बन जाता है तथा निरन्तर स्तुतियों के द्वारा परमात्मा की मित्रता को प्राप्त करता है, जिससे मोक्षसुख के साथ सांसारिक सच्चा सुख भी प्राप्त करता है और काम क्रोध आदि भीतरी शत्रु भी उसके नष्ट हो जाते हैं। परमात्मा द्वारा ज्ञानप्रकाश प्राप्त कर मनुष्यों में प्रसिद्धि प्राप्त करता है॥९॥

प्र नेम॑स्मिन्ददृशे॒ सोमो॑ अ॒न्तर्गो॒पा नेम॑मा॒विर॒स्था कृ॑णोति। स ति॒ग्मशृ॑ङ्गं वृष॒भं युयु॑त्सन्द्रु॒हस्त॑स्थौ बहु॒ले ब॒द्धो अ॒न्तः॥

परमात्मा मनुष्यों के एक वर्ग अर्थात् आस्तिक जनों में स्तुति करनेवालों के अन्दर कल्याणकारीरूप में साक्षात् होता है, दूसरे वर्ग नास्तिक वर्ग के सामने दण्ड देने को दण्डदातारूप में सामने आता है॥१०॥

आ॒दि॒त्यानां॒ वसू॑नां रु॒द्रिया॑णां दे॒वो दे॒वानां॒ न मि॑नामि॒ धाम॑। ते मा॑ भ॒द्राय॒ शव॑से ततक्षु॒रप॑राजित॒मस्तृ॑त॒मषा॑ळ्हम्॥

अड़तालीस वर्ष के ब्रह्मचारियों, चवालीस वर्ष के ब्रह्मचारियों और चौबीस वर्ष के ब्रह्मचारियों के पद को वह परमात्मा क्षीण नहीं करता, अपितु वे अपने कल्याण और स्वात्मबल के लिए उसे अपने अन्दर साक्षात् करते हैं। वह उन्हें कल्याण और आत्मबल देनेवाला है॥११॥

अ॒हं दां॑ गृण॒ते पूर्व्यं॒ वस्व॒हं ब्रह्म॑ कृणवं॒ मह्यं॒ वर्ध॑नम्। अ॒हं भु॑वं॒ यज॑मानस्य चोदि॒ताय॑ज्वनः साक्षि॒ विश्व॑स्मि॒न्भरे॑॥

परमात्मा की स्तुति  करनेवाला शाश्वतिक सुखमय मोक्ष को प्राप्त होता है। परमात्मा के गुणों का वर्णन करनेवाले वेद का परमात्मा प्रकाश करता है, तदनुसार अध्यात्मयाजी को वह प्रेरणा देता है, नास्तिक जनों को संसार में दण्ड देता है॥१॥

मां धु॒रिन्द्रं॒ नाम॑ दे॒वता॑ दि॒वश्च॒ ग्मश्चा॒पां च॑ ज॒न्तवः॑। अ॒हं हरी॒ वृष॑णा॒ विव्र॑ता र॒घू अ॒हं वज्रं॒ शव॑से धृ॒ष्ण्वा द॑दे॥

द्युलोक अन्तरिक्षलोक और पृथिवीलोक को जाननेवाले मनुष्य अर्थात् इन तीनों को जानकर इनके रचयिता परमात्मा को अपने अन्दर धारण करते हैं। परमात्मा इन्हें अपने दुःख नष्ट करनेवाले व सुख प्राप्त करानेवाले दयाप्रसाद को प्रदान करता है, जो कि अपने बल से जगत् का संचालन करता है॥२॥

अ॒हमत्कं॑ क॒वये॑ शिश्नथं॒ हथै॑र॒हं कुत्स॑मावमा॒भिरू॒तिभिः॑। अ॒हं शुष्ण॑स्य॒ श्नथि॑ता॒ वध॑र्यमं॒ न यो र॒र आर्यं॒ नाम॒ दस्य॑वे॥

परमात्मा स्तुति करनेवाले के व्यसन को शिथिल करता है-नष्ट करता है और अपनी रक्षणशक्तियों द्वारा दुष्कर्मों से बचाता है, शोक को नष्ट करता है। दुष्ट को दण्डप्रहार करता है, जो कि उसकी स्तुति नहीं करता है॥३॥

अ॒हं पि॒तेव॑ वेत॒सूँर॒भिष्ट॑ये॒ तुग्रं॒ कुत्सा॑य॒ स्मदि॑भं च रन्धयम्। अ॒हं भु॑वं॒ यज॑मानस्य रा॒जनि॒ प्र यद्भरे॒ तुज॑ये॒ न प्रि॒याधृषे॑॥

जो मनुष्य परमात्मा को पिता समान मानकर उसकी उपासना करता है, उसके प्रतिकूल उद्दण्ड जनों को तथा हाथी के समान उन्मत्त क्रूर जन को परमात्मा दण्ड देता है। वह उपासक का रक्षक है। परमात्मा हिंसक स्वभाववाले व्यक्ति को उसकी प्रिय वस्तु नहीं देता है॥४॥

अ॒हं र॑न्धयं॒ मृग॑यं श्रु॒तर्व॑णे॒ यन्माजि॑हीत व॒युना॑ च॒नानु॒षक्। अ॒हं वे॒शं न॒म्रमा॒यवे॑ऽकरम॒हं सव्या॑य॒ पड्गृ॑भिमरन्धयम्॥

परमात्मा का श्रवण करनेवाले का कामदोष नष्ट हो जाता है और जो उसे प्राप्त करता है, वह प्रज्ञान से युक्त हो जाता है तथा परमात्मा की ओर चलनेवाले के अन्दर का वासनादोष शिथिल हो जाता है। अध्यात्मैश्वर्य को चाहनेवाले का राग और मोह भी नष्ट हो जाता है॥५॥

अ॒हं स यो नव॑वास्त्वं बृ॒हद्र॑थं॒ सं वृ॒त्रेव॒ दासं॑ वृत्र॒हारु॑जम्। यद्व॒र्धय॑न्तं प्र॒थय॑न्तमानु॒षग्दू॒रे पा॒रे रज॑सो रोच॒नाक॑रम्॥

जो ब्रह्मचारी परमात्मा की प्राप्ति के लिए ब्रह्मचर्यसेवन करता है और जो संन्यासी परमात्मा में रमण करता है, उनके अन्दर प्रविष्ट कामभाव को परमात्मा ऐसे हटाता है कि ब्रह्मचारी के शरीर की वृद्धि होती चली जाये और संन्यासी के मन में ज्ञान की वृद्धि होती चली जाये॥६॥

अ॒हं सूर्य॑स्य॒ परि॑ याम्या॒शुभिः॒ प्रैत॒शेभि॒र्वह॑मान॒ ओज॑सा। यन्मा॑ सा॒वो मनु॑ष॒ आह॑ नि॒र्णिज॒ ऋध॑क्कृषे॒ दासं॒ कृत्व्यं॒ हथैः॑॥

उपासना करनेवाला आत्मा अपने स्वरूप को प्राप्त करने के लिए परमात्मा की उपासना करता है, तो वह जगत् का वहनकर्ता-संचालक परमात्मा अपने बल से सर्वत्र प्राप्त होता हुआ उपासक के नष्ट करनेवाले अज्ञान या पाप को अपने प्रकाशों से नष्ट करता है॥७॥

अ॒हं स॑प्त॒हा नहु॑षो॒ नहु॑ष्टरः॒ प्राश्रा॑वयं॒ शव॑सा तु॒र्वशं॒ यदु॑म्। अ॒हं न्य१॒॑न्यं सह॑सा॒ सह॑स्करं॒ नव॒ व्राध॑तो नव॒तिं च॑ वक्षयम्॥

परमात्मा नित्यमुक्त है। वह जीवन्मुक्त उपासक के काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-भय-शोकों को नष्ट कर देता है और उसे आत्मबल प्रदान करता है तथा अपना मङ्गलमय उपदेश भी देता है, अपितु उसके चारों अन्तःकरण, पाँचों ज्ञानेन्द्रियों की सांसारिक गतिप्रवृत्तियों को भी हटा देता है॥८॥

अ॒हं स॒प्त स्र॒वतो॑ धारयं॒ वृषा॑ द्रवि॒त्न्वः॑ पृथि॒व्यां सी॒रा अधि॑। अ॒हमर्णां॑सि॒ वि ति॑रामि सु॒क्रतु॑र्यु॒धा वि॑दं॒ मन॑वे गा॒तुमि॒ष्टये॑॥

परमात्मा शरीर के अन्दर प्राणों का संचार करता है, उस रक्त को नाड़ियों में बहाता है, इन्द्रियों की कामना के लिये विषयरसों को भी प्रदान करता है। ऐसे उस परमात्मा की उपासना करनी चाहिए॥९॥

अ॒हं तदा॑सु धारयं॒ यदा॑सु॒ न दे॒वश्च॒न त्वष्टाधा॑रय॒द्रुश॑त्। स्पा॒र्हं गवा॒मूध॑स्सु व॒क्षणा॒स्वा मधो॒र्मधु॒ श्वात्र्यं॒ सोम॑मा॒शिर॑म्॥

गौओं में दूध और नाड़ियों में रस मनुष्य के निर्वाह के वास्ते परमात्मा ही उत्पन्न करता है-धारण करता है। ये कार्य किसी देव अग्नि आदि का काम नहीं, न किसी शिल्पी का॥१०॥

ए॒वा दे॒वाँ इन्द्रो॑ विव्ये॒ नॄन्प्र च्यौ॒त्नेन॑ म॒घवा॑ स॒त्यरा॑धाः। विश्वेत्ता ते॑ हरिवः शचीवो॒ऽभि तु॒रासः॑ स्वयशो गृणन्ति॥

परमात्मा स्वाधार यशवाला है, मोक्षरूप धन का स्वामी है, मुमुक्षु उपासकों को अपनाता है, उन्हें मोक्ष प्रदान करता है। उसके दयाप्रसाद मानव के लिए भारी हितकर हैं। संयमी जन संसारसागर से तरने के लिए उसकी स्तुति करते हैं॥११॥

प्र वो॑ म॒हे मन्द॑माना॒यान्ध॒सोऽर्चा॑ वि॒श्वान॑राय विश्वा॒भुवे॑। इन्द्र॑स्य॒ यस्य॒ सुम॑खं॒ सहो॒ महि॒ श्रवो॑ नृ॒म्णं च॒ रोद॑सी सप॒र्यतः॑॥

परमात्मा विश्व का नायक और विश्व में व्यापक है। उसका महान् बल और महान् यश मुमुक्षु उपासकों के प्रति झुका हुआ है तथा ज्ञानशील और कर्मशील नर-नारी उसकी प्रशंसा करते हैं, मानते हैं॥१॥

सो चि॒न्नु सख्या॒ नर्य॑ इ॒नः स्तु॒तश्च॒र्कृत्य॒ इन्द्रो॒ माव॑ते॒ नरे॑। विश्वा॑सु धू॒र्षु वा॑ज॒कृत्ये॑षु सत्पते वृ॒त्रे वा॒प्स्व१॒॑भि शू॑र मन्दसे॥

परमात्मा उपासकों के लिए हितकर स्वामी है। वह सारी योजनाओं तथा बलकार्यों में स्तुत्य और सत्कार करने योग्य है॥२॥

के ते नर॑ इन्द्र॒ ये त॑ इ॒षे ये ते॑ सु॒म्नं स॑ध॒न्य१॒॑मिय॑क्षान्। के ते॒ वाजा॑यासु॒र्या॑य हिन्विरे॒ के अ॒प्सु स्वासू॒र्वरा॑सु॒ पौंस्ये॑॥

मोक्ष की इच्छा करनेवाले और अपने को उसके अधिकारी बनानेवाले विरले होते हैं, एवं परमात्मा के अमृतभोग को चाहनेवाले अपने को उन्नत किया करते हैं॥३॥

भुव॒स्त्वमि॑न्द्र॒ ब्रह्म॑णा म॒हान्भुवो॒ विश्वे॑षु॒ सव॑नेषु य॒ज्ञियः॑। भुवो॒ नॄँश्च्यौ॒त्नो विश्व॑स्मि॒न्भरे॒ ज्येष्ठ॑श्च॒ मन्त्रो॑ विश्वचर्षणे॥

परमात्मा महान् ज्ञानवान् है। सब आश्रमियों के समागम योग्य है। मुमुक्षुओं के अन्दर से रागादि दोषों को हटानेवाला है। समस्त भरण करनेवाले पदार्थों में ज्येष्ठ और ज्ञानप्रद है॥४॥

अवा॒ नु कं॒ ज्याया॑न्य॒ज्ञव॑नसो म॒हीं त॒ ओमा॑त्रां कृ॒ष्टयो॑ विदुः। असो॒ नु क॑म॒जरो॒ वर्धा॑श्च॒ विश्वेदे॒ता सव॑ना तूतु॒मा कृ॑षे॥

परमात्मा महान् है, उसकी रक्षणशक्ति भी महती है। वह अध्यात्मयाजी जनों की पूरी रक्षा करता है। उसकी स्तुति, प्रार्थना, उपासनाओं को अवश्य शीघ्र स्वीकार करता है॥५॥

ए॒ता विश्वा॒ सव॑ना तूतु॒मा कृ॑षे स्व॒यं सू॑नो सहसो॒ यानि॑ दधि॒षे। वरा॑य ते॒ पात्रं॒ धर्म॑णे॒ तना॑ य॒ज्ञो मन्त्रो॒ ब्रह्मोद्य॑तं॒ वचः॑॥

वेदों में कहें स्तुति, प्रार्थना, उपासना आदि कर्म परमात्मा को स्वीकार होते हैं। उस पात्रभूत स्तुतिकर्ता के लिए परमात्मा आध्यात्मिक धन प्रदान करता है, इसलिए स्तुतिकर्ता अपने श्रेष्ठकर्म, मनन, ज्ञान आदि परमात्मा के प्रति समर्पित करे॥६॥

ये ते॑ विप्र ब्रह्म॒कृतः॑ सु॒ते सचा॒ वसू॑नां च॒ वसु॑नश्च दा॒वने॑। प्र ते सु॒म्नस्य॒ मन॑सा प॒था भु॑व॒न्मदे॑ सु॒तस्य॑ सो॒म्यस्यान्ध॑सः॥

परमात्मा, स्तुति करनेवालों को सब धनों से ऊँचें धन मोक्ष को प्रदान करता है। जो मन से और सदाचरण से तथा साधुभाव से परमात्मा की उपासना करने में समर्थ होते हैं, उन पर वह कृपा बनाये रखता है॥७॥

म॒हत्तदुल्बं॒ स्थवि॑रं॒ तदा॑सी॒द्येनावि॑ष्टितः प्रवि॒वेशि॑था॒पः। विश्वा॑ अपश्यद्बहु॒धा ते॑ अग्ने॒ जात॑वेदस्त॒न्वो॑ दे॒व एकः॑॥

आत्मा शरीर के उत्पन्न होते ही जाना जानेवाला, जो परम्परा से जन्म धारण करता हुआ आ रहा है, वह प्राणों को धारण करता है।   उसे कर्मानुसार परमात्मदेव गर्भ को प्राप्त कराता है। तथा-आकाश में पुरातन काल से मेघों में उत्पन्न होते ही ज्ञान में आनेवाला विद्युत् अग्नि है। वह मेघजलों में ईश्वर की व्यवस्था से प्राप्त होता है और मेघजलों को गिराता है॥१॥

को मा॑ ददर्श कत॒मः स दे॒वो यो मे॑ त॒न्वो॑ बहु॒धा प॒र्यप॑श्यत्। क्वाह॑ मित्रावरुणा क्षियन्त्य॒ग्नेर्विश्वाः॑ स॒मिधो॑ देव॒यानीः॑॥

प्राणों के अन्दर आत्मा को कौनसा देव सुख देनेवाला आत्मा के अङ्गों को परमात्मा की ओर जानेवाली उसकी चेतनशक्तियों को जानता है। उसको समझना चाहिए। एवं-मेघजलों में निहित विद्युत् अग्नि की तरङ्गों को कौन वैज्ञानिक जानता है, जो परमात्मदेव को दर्शानेवाली हैं। उन्हें भी जानना चाहिए॥२॥

ऐच्छा॑म त्वा बहु॒धा जा॑तवेदः॒ प्रवि॑ष्टमग्ने अ॒प्स्वोष॑धीषु। तं त्वा॑ य॒मो अ॑चिकेच्चित्रभानो दशान्तरु॒ष्याद॑ति॒रोच॑मानम्॥

आत्मा शरीर के उत्पन्न होने के साथ ही जाना जाता है, वह मनुष्य, पशु, पक्षी प्राणियों में उष्णता धारण करनेवाली नाड़ियों में चेष्टाओं के होने से विद्यमान है। परमात्मा आत्मा का नियामक है। भिन्न-भिन्न शरीरों में जाने का इसका निमित्त बनाता है।  एवं विद्युत् प्रकट होते ही जाना जाता है। वह जलों में काष्ठादि में विद्यमान रहता है। इसे वैज्ञानिक लोग जानते हैं॥३॥

हो॒त्राद॒हं व॑रुण॒ बिभ्य॑दायं॒ नेदे॒व मा॑ यु॒नज॒न्नत्र॑ दे॒वाः। तस्य॑ मे त॒न्वो॑ बहु॒धा निवि॑ष्टा ए॒तमर्थं॒ न चि॑केता॒हम॒ग्निः॥

जीवात्मा को स्वभावतः मृत्यु से भय होता है। वह भय परमात्मा की शरण और उसके ध्यान बिना दूर नहीं हो सकता। उधर इन्द्रियाँ अपने-अपने विषय में आत्मा को खींचती हैं। आत्मा की शक्तियाँ और भी छिपी हुई हैं, जिनका विकास परमात्मा की शरण लेने पर होता है, जिनसे ब्रह्मानन्द का लाभ लेता है। एवं विद्युत् की उत्पत्ति जलों से होती है, चाहे वे मेघ-जल हों या पृथिवी के जल हों। जलों का अधिपति-शक्तिकेन्द्र वरुण नाम से कहा जाता है, जो जलों के सूक्ष्म कणों को ठोस रूप देता है। वैज्ञानिक लोग जल को ताड़ित करके विद्युत् बनाकर उसका यन्त्र में प्रयोग करते हैं। विद्युत् की तरङ्गों में बहुत शक्ति है, उसका सदुपयोग करना चाहिए॥४॥

एहि॒ मनु॑र्देव॒युर्य॒ज्ञका॑मोऽरं॒कृत्या॒ तम॑सि क्षेष्यग्ने। सु॒गान्प॒थः कृ॑णुहि देव॒याना॒न्वह॑ ह॒व्यानि॑ सुमन॒स्यमा॑नः॥

आत्मा समस्त अङ्गों का नेता है, इन्द्रियों के विषयों में पड़कर मृत्यु से भय करता है, परन्तु शिवसंकल्प बना कर आत्मबल प्राप्त कर और परमात्मा की स्तुति, प्रार्थना, उपासना करता हुआ मृत्यु से भय का अवसर नहीं है। एवं विद्युदग्नि यन्त्र का चालक बने बिना प्रयोग के अन्धेरे में पड़ी जैसी है, वैज्ञानिकों द्वारा यन्त्र में प्रयुक्त होकर बलवान् बनती है, यन्त्र द्वारा विविध लाभ पहुँचाता हुआ सफल तथा स्थिर रहता है॥५॥

अ॒ग्नेः पूर्वे॒ भ्रात॑रो॒ अर्थ॑मे॒तं र॒थीवाध्वा॑न॒मन्वाव॑रीवुः। तस्मा॑द्भि॒या व॑रुण दू॒रमा॑यं गौ॒रो न क्षे॒प्नोर॑विजे॒ ज्यायाः॑॥

आत्मा शरीर में जन्म लेकर आता है। जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है, अपने सामने अपने बड़ों को मरते देखता है, तो ज्ञानवान् आत्मा को मृत्यु से भय लगता है, शरीर से ग्लानि होती है, परन्तु परमात्मा की ओर जैसे-जैसे चलता है, उसकी स्तुति करता है, भयरहित होता है। एवं यन्त्र में प्रयुक्त अग्नि-विद्युदग्नि क्षीण होती जाती है, परन्तु उसकी क्षीणता से यन्त्रचालन में उसका महत्त्व बढ़ता है॥६॥

कु॒र्मस्त॒ आयु॑र॒जरं॒ यद॑ग्ने॒ यथा॑ यु॒क्तो जा॑तवेदो॒ न रिष्याः॑। अथा॑ वहासि सुमन॒स्यमा॑नो भा॒गं दे॒वेभ्यो॑ ह॒विषः॑ सुजात॥

शरीर में आकर आत्मा इन्द्रियों के भोगों के साथ संयम द्वारा अपनी ऐसी स्थिति बनाये, जिससे कि अजर आयु अर्थात् मोक्ष का आयु प्राप्त कर सके। एवं यन्त्र में विद्युत् को ऐसे युक्त करना चाहिए जिससे कि स्थिररूप में निरन्तर गतिशील बनी रहे, एतदर्थ कोई ठोस वज्र या द्रव पदार्थ का उसमें प्रयोग करना चाहिए॥७॥

प्र॒या॒जान्मे॑ अनुया॒जाँश्च॒ केव॑ला॒नूर्ज॑स्वन्तं ह॒विषो॑ दत्त भा॒गम्। घृ॒तं चा॒पां पुरु॑षं॒ चौष॑धीनाम॒ग्नेश्च॑ दी॒र्घमायु॑रस्तु देवाः॥

आत्मा को अर्थात् मनुष्य को इन्द्रियों द्वारा ऐसे भक्षणयोग्य पदार्थ और पेयपदार्थ लेने चाहिए, जिससे इस संसार में दीर्घजीवन मिले और इन्द्रियविषयों का सेवन ऐसे करें, जिससे संसार में फँस न सके, अपितु मोक्ष का दीर्घ जीवन मिले। एवं वैज्ञानिक जन जल ओषधि और खनिज पदार्थों द्वारा विद्युत् का आविष्कार ऐसा करें, जिससे कि उसके धनात्मक ऋणात्मक बलों के द्वारा उसका गतिक्रम लम्बा चले॥८॥

तव॑ प्रया॒जा अ॑नुया॒जाश्च॒ केव॑ल॒ ऊर्ज॑स्वन्तो ह॒विषः॑ सन्तु भा॒गाः। तवा॑ग्ने य॒ज्ञो॒३॒॑ऽयम॑स्तु॒ सर्व॒स्तुभ्यं॑ नमन्तां प्र॒दिश॒श्चत॑स्रः॥

मनुष्य के समस्त खान और पान और विषयभोग संसार में फँसनेवाले न हों, किन्तु सच्चे कल्याण और मोक्ष के साधन बनें। समस्त दिशाओं की प्रजाएँ तेरी प्रतिष्ठा करें, ऐसा अपने को बना। एवं विद्युत् के धनात्मक और ऋणात्मक तार अपने-अपने स्थान बन्धन में अलग-अलग हों, जो सारी यन्त्र की कलाओं को स्वाधीन करके चला सकें॥९॥

विश्वे॑ देवाः शा॒स्तन॑ मा॒ यथे॒ह होता॑ वृ॒तो म॒नवै॒ यन्नि॒षद्य॑। प्र मे॑ ब्रूत भाग॒धेयं॒ यथा॑ वो॒ येन॑ प॒था ह॒व्यमा वो॒ वहा॑नि॥

नवयुवक जब विवाहित हो जाएँ, तो अपने वृद्ध माता पिता आदि से गृहस्थ चलाने का उपदेश लें और उसकी भिन्न-भिन्न रीतियों पद्धतियों पर चलते हुए अपने जीवन को ढालें तथा उनके लिए उनकी यथोचित आवश्यकताओं को पूरा करें॥१॥

अ॒हं होता॒ न्य॑सीदं॒ यजी॑या॒न्विश्वे॑ दे॒वा म॒रुतो॑ मा जुनन्ति। अह॑रहरश्वि॒नाध्व॑र्यवं वां ब्र॒ह्मा स॒मिद्भ॑वति॒ साहु॑तिर्वाम्॥

मनुष्य को अपने वृद्ध सम्बन्धियों और विद्वानों से घर पर रहते हुए ज्ञान का जितना ग्रहण हो सके, करना चाहिए तथा अध्यापक और उपदेशकों से विधिपूर्वक ज्ञानलाभ करके चारों वेदों का वेत्ता होने की आकाङ्क्षा रखता हुआ मानवसमाज में अपने को ज्ञान की आहुति बना दे॥२॥

अ॒यं यो होता॒ किरु॒ स य॒मस्य॒ कमप्यू॑हे॒ यत्स॑म॒ञ्जन्ति॑ दे॒वाः। अह॑रहर्जायते मा॒सिमा॒स्यथा॑ दे॒वा द॑धिरे हव्य॒वाह॑म्॥

आत्मा ज्ञान का ग्रहण करनेवाला चेतन पदार्थ है। कर्मानुसार फल को प्राप्त करता है। यह ज्ञान द्वारा ज्ञानप्रकाश से प्रकाशवान् होता जाता है। सूर्य और चन्द्रमा की भाँति इसका ज्ञानप्रकाश इसे प्रसिद्ध करता है, जब कि यह विद्वानों की संगति में रहकर ज्ञानग्रहण करता चला जाये॥३॥

मां दे॒वा द॑धिरे हव्य॒वाह॒मप॑म्लुक्तं ब॒हु कृ॒च्छ्रा चर॑न्तम्। अ॒ग्निर्वि॒द्वान्य॒ज्ञं नः॑ कल्पयाति॒ पञ्च॑यामं त्रि॒वृतं॑ स॒प्तत॑न्तुम्॥

ब्रह्मचारी अज्ञान अवस्था में पड़ा हुआ ज्ञान ग्रहण करने का पात्र होकर ब्रह्मचर्य जैसे कठिन व्रतों का आचरण करता हुआ विद्वानों से सात गायत्री आदि छन्दोंवाले वेदज्ञान को ग्रहण करता है। उस ज्ञान को, जो इन्द्रियों के द्वारा यथार्थ आचरण करने में मन वचन और कर्म से जीवन में घटाने योग्य तथा जीवन को सफल बनानेवाला है॥४॥

आ वो॑ यक्ष्यमृत॒त्वं सु॒वीरं॒ यथा॑ वो देवा॒ वरि॑वः॒ करा॑णि। आ बा॒ह्वोर्वज्र॒मिन्द्र॑स्य धेया॒मथे॒मा विश्वाः॒ पृत॑ना जयाति॥

जिज्ञासु को विद्वानों की सेवा करनी चाहिए, जिससे कि विद्वानों से ज्ञानबल और आत्मिक बल प्राप्त हो सके एवं परमात्मा की उपासना भी करनी चाहिए। अज्ञाननाशक परमात्मा के ओज को अपने मन और आत्मा में धारण करके वासनाओं पर विजय पानी चाहिए॥५॥

त्रीणि॑ श॒ता त्री स॒हस्रा॑ण्य॒ग्निं त्रिं॒शच्च॑ दे॒वा नव॑ चासपर्यन्। औक्ष॑न्घृ॒तैरस्तृ॑णन्ब॒र्हिर॑स्मा॒ आदिद्धोता॑रं॒ न्य॑सादयन्त॥

तीन सहस्र तीन सौ उनतालीस शक्तियाँ, नाड़ियाँ या बाहरी दिव्य पदार्थ आत्मा की रक्षा करनेवाले हैं। भोजन के सूक्ष्म रसों के द्वारा आत्मा को तृप्त करते हैं। शरीर के अन्दर मांसादि के स्तर को फैलाते हैं-बढ़ाते हैं तथा आत्मा को स्थिर करते हैं॥६॥

यमैच्छा॑म॒ मन॑सा॒ सो॒३॒॑ऽयमागा॑द्य॒ज्ञस्य॑ वि॒द्वान्परु॑षश्चिकि॒त्वान्। स नो॑ यक्षद्दे॒वता॑ता॒ यजी॑या॒न्नि हि षत्स॒दन्त॑रः॒ पूर्वो॑ अ॒स्मत्॥

आत्मा शरीर के अन्दर इन्द्रियों से पूर्व आता है। वह शरीर के अङ्ग-प्रत्यङ्ग में अपनी चेतना को प्रसारित करता है और अपने को अनुभव करता है कि मैं यहाँ-इस शरीर में हूँ तथा परिवारिक जन प्रतीक्षा करते हैं कि हमारे बीच में नया आत्मा सन्तान के रूप में आये। आत्मा नित्य है, अतः पहले से ही है, वह शरीर में आकर जन्म ले लेता है॥१॥

अरा॑धि॒ होता॑ नि॒षदा॒ यजी॑यान॒भि प्रयां॑सि॒ सुधि॑तानि॒ हि ख्यत्। यजा॑महै य॒ज्ञिया॒न्हन्त॑ दे॒वाँ ईळा॑महा॒ ईड्याँ॒ आज्ये॑न॥

जब बालक विद्वानों की शरण में रहकर विद्वान् बन जाता है, तो घरवाले उसका स्वागत करें। उसके साथ में अन्य विद्वानों का भी स्वागत करें और स्निग्ध द्रव्यों का उपहार उन्हें दें॥२॥

सा॒ध्वीम॑कर्दे॒ववी॑तिं नो अ॒द्य य॒ज्ञस्य॑ जि॒ह्वाम॑विदाम॒ गुह्या॑म्। स आयु॒रागा॑त्सुर॒भिर्वसा॑नो भ॒द्राम॑कर्दे॒वहू॑तिं नो अ॒द्य॥

जन्म के अवसर पर बालक पारिवारिक जनों की प्रसन्नता का कारण बनता है। बड़ा होकर इन्द्रियों के भोगों को संयम से भोगता हुआ पारिवारिक जनों के सुख का निमित्त बनता है तथा घर में विद्वानों की संगति कराकर उसके विद्यामृत का लाभ भी पहुँचाता है, अतः बालकों को विद्याप्राप्ति करानी चाहिए॥३॥

तद॒द्य वा॒चः प्र॑थ॒मं म॑सीय॒ येनासु॑राँ अ॒भि दे॒वा असा॑म। ऊर्जा॑द उ॒त य॑ज्ञियासः॒ पञ्च॑ जना॒ मम॑ हो॒त्रं जु॑षध्वम्॥

जन्मावसर पर वेदवाणी के या प्रमुख नाम ‘ओ३म्‘ का स्मरण करना और जन्मे हुए बालक की जिह्वा पर ‘ओ३म्’ का लिखना और कान में सुनाना तथा सभा सत्सङ्ग के अवसर पर ‘ओ३म्’ का स्मरण करना चाहिए। उस अवसर पर स्थूलान्नभोजी या सूक्ष्म आहार करनेवाले मनुष्य मिलकर ‘ओ३म्’ का स्मरण और कीर्तन करें॥४॥

पञ्च॒ जना॒ मम॑ हो॒त्रं जु॑षन्तां॒ गोजा॑ता उ॒त ये य॒ज्ञिया॑सः। पृ॒थि॒वी नः॒ पार्थि॑वात्पा॒त्वंह॑सो॒ऽन्तरि॑क्षं दि॒व्यात्पा॑त्व॒स्मान्॥

गृहस्थ आश्रमी की आकाङ्क्षा-प्रार्थना होनी चाहिए कि उसके वचन को वेद-निष्णात और कर्मकाण्डी विद्वान् सुनें तथा उसका व्यवहार भी ऐसा होना चाहिए कि पृथिवी के पार्थिव दोषों से-उपद्रवों से बचा रहे और आकाश के आकाशीय वृष्टि-अतिवृष्टि आदि आघातों से बचा रहे॥५॥

तन्तुं॑ त॒न्वन्रज॑सो भा॒नुमन्वि॑हि॒ ज्योति॑ष्मतः प॒थो र॑क्ष धि॒या कृ॒तान्। अ॒नु॒ल्ब॒णं व॑यत॒ जोगु॑वा॒मपो॒ मनु॑र्भव ज॒नया॒ दैव्यं॒ जन॑म्॥

मानव को चाहिए श्रेष्ठ सन्तान और श्रेष्ठ शिष्य का विस्तार करे। अपने जीवन में धर्म्य मार्गों का आलम्बन करते हुए मननशील होकर उत्तम गुणयुक्त पुत्र और शिष्य के निर्माण में यत्न करता रहे॥६॥

अ॒क्षा॒नहो॑ नह्यतनो॒त सो॑म्या॒ इष्कृ॑णुध्वं रश॒ना ओत पिं॑शत। अ॒ष्टाव॑न्धुरं वहता॒भितो॒ रथं॒ येन॑ दे॒वासो॒ अन॑यन्न॒भि प्रि॒यम्॥

ज्ञान का संग्रह करनेवाले विद्वान् अपनी ज्ञानधाराओं से इन्द्रियों के छिद्रों-दोषों के बन्द करें-विषयों से नियन्त्रित करें और मन जो विषयों में रमण करता है, उसे स्वाधीन करके अपने को मोक्ष का भागी बनाएँ। यह ज्ञान का परम फल है॥७॥

अश्म॑न्वती रीयते॒ सं र॑भध्व॒मुत्ति॑ष्ठत॒ प्र त॑रता सखायः। अत्रा॑ जहाम॒ ये अस॒न्नशे॑वाः शि॒वान्व॒यमुत्त॑रेमा॒भि वाजा॑न्॥

परमात्मा के साथ मित्रभाव बनानेवाले लोगों को चाहिए कि वे संसारनदी को पार करने के लिए सावधानी के साथ पाप बोझे को त्याग करके शुभकर्मों को करें, जो नौका के समान तरानेवाले हैं॥८॥

त्वष्टा॑ मा॒या वे॑द॒पसा॑म॒पस्त॑मो॒ बिभ्र॒त्पात्रा॑ देव॒पाना॑नि॒ शंत॑मा। शिशी॑ते नू॒नं प॑र॒शुं स्वा॑य॒सं येन॑ वृ॒श्चादेत॑शो॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑॥

समस्त कर्म करनेवाले उत्कृष्ट मानव की अपेक्षा प्रशस्त कर्म करनेवाला परमात्मा है। वह सबके कर्मों को यथावत् जानता है। मुमुक्षुओं के कर्मानुसार मोक्ष में उन्हें साङ्कल्पिक मन श्रोत्र आदिओं आनन्द के पात्रों को सम्पन्न करता है॥९॥

स॒तो नू॒नं क॑वयः॒ सं शि॑शीत॒ वाशी॑भि॒र्याभि॑र॒मृता॑य॒ तक्ष॑थ। वि॒द्वांसः॑ प॒दा गुह्या॑नि कर्तन॒ येन॑ दे॒वासो॑ अमृत॒त्वमा॑न॒शुः॥

अपने लिए मुमुक्षु विद्वान् जैसे सांसारिक सुखों को वेदज्ञान से सिद्ध करते हैं, उसी प्रकार वेदज्ञान से मोक्ष को भी सिद्ध करते हैं। अपने की तरह दूसरों के भी दोनों सुखों को सिद्ध करने के लिए उन्हें वेद का प्रचार और उसके द्वारा अन्यों को प्रेरित करना चाहिए॥१०॥

गर्भे॒ योषा॒मद॑धुर्व॒त्समा॒सन्य॑पी॒च्ये॑न॒ मन॑सो॒त जि॒ह्वया॑। स वि॒श्वाहा॑ सु॒मना॑ यो॒ग्या अ॒भि सि॑षा॒सनि॑र्वनते का॒र इज्जिति॑म्॥

विद्वान् लोग विद्या के अन्दर जो अभिप्राय होता है, उसे अपने अन्दर धारण करते हैं, अन्यों के लिए मौखिक प्रवचन करते हैं। इसी प्रकार मन और वाणी से परमात्मा की स्तुति करके अपने जीवन को सफल बनाते हैं॥११॥

तां सु ते॑ की॒र्तिं म॑घवन्महि॒त्वा यत्त्वा॑ भी॒ते रोद॑सी॒ अह्व॑येताम्। प्रावो॑ दे॒वाँ आति॑रो॒ दास॒मोजः॑ प्र॒जायै॑ त्वस्यै॒ यदशि॑क्ष इन्द्र॥

परमात्मा का महत्त्व महान् है। उसकी गुणकीर्ति स्वतः सिद्ध है। ज्ञानी अज्ञानी दोनों वर्ग उसकी सता को अनुभव करते हुए भय करते हैं। वह सदाचारी ज्ञानियों की पूर्ण रक्षा करता है और असदाचरण करनेवाले दुष्ट जन को दण्ड देता है। अपितु देवश्रेणी की मनुष्यप्रजा को अपना अध्यात्मलाभ प्रदान करता है॥१॥

यदच॑रस्त॒न्वा॑ वावृधा॒नो बला॑नीन्द्र प्रब्रुवा॒णो जने॑षु। मा॒येत्सा ते॒ यानि॑ यु॒द्धान्या॒हुर्नाद्य शत्रुं॑ न॒नु पु॒रा वि॑वित्से॥

परमात्मा वेदज्ञान द्वारा जब अपने गुण वीर्यों का ऋषियों के अन्दर प्रवचन करता है, उनके कामादि शत्रुओं पर प्रहार करनेवाले अपने प्रभावों को प्रदर्शित करता है, वह उसकी सहजशक्ति है। उस परमात्मा का न इस कल्प में कोई शत्रु है न पहले कोई था। केवल मनुष्यों के आन्तरिक शत्रुओं पर प्रहार करना लक्ष्य है॥२॥

क उ॒ नु ते॑ महि॒मनः॑ समस्या॒स्मत्पूर्व॒ ऋष॒योऽन्त॑मापुः। यन्मा॒तरं॑ च पि॒तरं॑ च सा॒कमज॑नयथास्त॒न्वः१॒॑ स्वायाः॑॥

परमात्मा के महत्त्व का पूर्णरूप से कोई पार नहीं पा सकता कि उसने अपनी व्यापक शक्ति से तथा अव्यक्त प्रकृति से द्युलोक और पृथिवीलोक को-प्रकाशक और प्रकाश्य लोकों को कैसे बनाया है!॥३॥

च॒त्वारि॑ ते असु॒र्या॑णि॒ नामादा॑भ्यानि महि॒षस्य॑ सन्ति। त्वम॒ङ्ग तानि॒ विश्वा॑नि वित्से॒ येभिः॒ कर्मा॑णि मघवञ्च॒कर्थ॑॥

महान् परमात्मा के चार स्वाभाविक नाम हैं, जो ‘ओ३म्’ की चार मात्राओं द्वारा कहे जाते हैं-मन से समझे जाते हैं। ‘अ’ से जागरितस्थान ब्रह्म, ‘उ’ से स्वप्नस्थान ब्रह्म, ‘म्’ से सुषुप्तस्थान ब्रह्म, पश्चात् अमात्र-विराम से तुरीय ब्रह्म। अन्य नाम इन्हीं नामों के अन्तर्गत हो जाते हैं। ये नाम स्वाभाविक हैं, स्वरूपबोधक हैं। इनसे भिन्न ‘विष्णु’ आदि कर्मनाम हैं, सृष्टि आदि कर्मों को दर्शानेवाले हैं॥४॥

त्वं विश्वा॑ दधिषे॒ केव॑लानि॒ यान्या॒विर्या च॒ गुहा॒ वसू॑नि। काम॒मिन्मे॑ मघव॒न्मा वि ता॑री॒स्त्वमा॑ज्ञा॒ता त्वमि॑न्द्रासि दा॒ता॥

परमात्मा समस्त धनों-ऐश्वर्यों का स्वामी है, चाहे वे प्रसिद्ध-प्रत्यक्ष धन हों या इन्द्रियों से भोगने योग्य हों या गुप्त हों-मन आत्मा से भोगने योग्य हों। उनमें से परमात्मा यथाधिकार कमनीय धन को प्रदान करता है॥५॥

यो अद॑धा॒ज्ज्योति॑षि॒ ज्योति॑र॒न्तर्यो असृ॑ज॒न्मधु॑ना॒ सं मधू॑नि। अध॑ प्रि॒यं शू॒षमिन्द्रा॑य॒ मन्म॑ ब्रह्म॒कृतो॑ बृ॒हदु॑क्थादवाचि॥

परमात्मा प्रत्येक ज्योतिष्मान् सूर्य आदि के अन्दर ज्योति प्रदान करता है तथा प्रत्येक मधुरतायुक्त वस्तु में मधुरता को भरता है, ऐसे ही प्रशस्त वाणी से युक्त वेद को परमात्मा रचता है। उस वेद से लेकर स्तुति करनेवाले परमात्मा की स्तुतियाँ करते हैं॥६॥

दू॒रे तन्नाम॒ गुह्यं॑ परा॒चैर्यत्त्वा॑ भी॒ते अह्व॑येतां वयो॒धै। उद॑स्तभ्नाः पृथि॒वीं द्याम॒भीके॒ भ्रातुः॑ पु॒त्रान्म॑घवन्तित्विषा॒णः॥

जो लोग नास्तिक हैं, ईश्वर की उपासना नहीं करते हैं, वे परमात्मा के रहस्यपूर्ण नामों को नहीं समझ सकते हैं। उन्हें ईश्वर का भय करना चाहिए। जड़जगत् में प्रमुख द्युलोक और पृथ्वीलोक प्रकाशक और प्रकाश्य लोक उससे भय करते हुए जैसे संसार में अपना काम करते हैं और चेतन जगत् में राज्य तथा प्रजा जन भी उससे भय करते हुए अपना-अपना कर्त्तव्यपालन करते हैं। परमात्मा पितृवत् सब प्राणियों का रक्षक है॥१॥

म॒हत्तन्नाम॒ गुह्यं॑ पुरु॒स्पृग्येन॑ भू॒तं ज॒नयो॒ येन॒ भव्य॑म्। प्र॒त्नं जा॒तं ज्योति॒र्यद॑स्य प्रि॒यं प्रि॒याः सम॑विशन्त॒ पञ्च॑॥

परमात्मा के गहन मननीय स्वरूप को मुमुक्षु जन चाहते हैं, वह अपने स्वरूप सत्ता से या शक्ति से तीनों कालों में होनेवाले जगत् का उत्पत्तिकर्त्ता है। उसके प्रिय ज्योतिर्मय मोक्षधाम में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और निषाद उपासक बनकर स्थान पाने के अधिकारी हैं बिना भेदभाव के॥२॥

आ रोद॑सी अपृणा॒दोत मध्यं॒ पञ्च॑ दे॒वाँ ऋ॑तु॒शः स॒प्तस॑प्त। चतु॑स्त्रिंशता पुरु॒धा वि च॑ष्टे॒ सरू॑पेण॒ ज्योति॑षा॒ विव्र॑तेन॥

परमात्मा अपनी व्याप्ति से द्युलोक, अन्तरिक्षलोक, पृथिवीलोकों को पूर्ण कर रहा है-भर रहा है। पाँच ज्ञानेन्द्रियों और सर्पणशील सात प्राणकेन्द्रों को भी अपनी व्याप्ति से उनको अपने व्यवहार में समर्थ बना रहा है तथा अपनी विविध कर्मशक्ति से और ज्ञानज्योति से सबको देखता और प्रकाशित करता है॥३॥

यदु॑ष॒ औच्छः॑ प्रथ॒मा वि॒भाना॒मज॑नयो॒ येन॑ पु॒ष्टस्य॑ पु॒ष्टम्। यत्ते॑ जामि॒त्वमव॑रं॒ पर॑स्या म॒हन्म॑ह॒त्या अ॑सुर॒त्वमेक॑म्॥

परमात्मज्योति या दीप्ति समस्त दीप्तिमान् पदार्थों में भासित होती है। वह संसार की जननी है, यह उसका एकरूप है। दूसरा रूप मोक्ष-अमरजीवन की प्रदात्री है। वह ज्योति मनुष्य को उपासना से प्राप्त होती है॥४॥

वि॒धुं द॑द्रा॒णं सम॑ने बहू॒नां युवा॑नं॒ सन्तं॑ पलि॒तो ज॑गार। दे॒वस्य॑ पश्य॒ काव्यं॑ महि॒त्वाद्या म॒मार॒ स ह्यः समा॑न॥

आत्मा जब सोता है, तो अन्तःकरण को अपने अन्दर ले लेता है, जिससे कि जागृत अवस्था में जागृत के अर्थात् सांसारिक व्यवहार करता है। जागने पर वैसा ही हो जाता है। उसी प्रकार मरने के पीछे फिर देह को धारण करता है, जन्म लेता है। जागृत-स्वप्न या जन्म-मृत्यु ईश्वर की व्यवस्था से होते हैं। अन्तःकरण इन्द्रियों में प्रमुख करण है, जो चञ्चल भी है और निरुद्ध भी हो जाता है। निरुद्ध हुआ-हुआ कल्याण का साधन बनता है॥५॥

शाक्म॑ना शा॒को अ॑रु॒णः सु॑प॒र्ण आ यो म॒हः शूरः॑ स॒नादनी॑ळः। यच्चि॒केत॑ स॒त्यमित्तन्न मोघं॒ वसु॑ स्पा॒र्हमु॒त जेतो॒त दाता॑॥

परमात्मा सृष्टि के रचने और जीवों को कर्मफल देने में सर्वथा समर्थ है। वह किसी एक नियत देश में नहीं, अपितु अनन्त है। वह शाश्वतिक है, सत्यस्वरूप है। उसके कार्य सत्य हैं, व्यर्थ अर्थात् असत्य नहीं हैं। अधिकारी मुमुक्षुओं को चाहने योग्य और बसाने योग्य मोक्ष धन को देता है॥६॥

ऐभि॑र्ददे॒ वृष्ण्या॒ पौंस्या॑नि॒ येभि॒रौक्ष॑द्वृत्र॒हत्या॑य व॒ज्री। ये कर्म॑णः क्रि॒यमा॑णस्य म॒ह्न ऋ॑तेक॒र्ममु॒दजा॑यन्त दे॒वाः॥

आरम्भसृष्टि में उत्पन्न चार ऋषियों द्वारा मानव कल्याण के लिए परमात्मा ने वेदों का प्रकाश किया है। वे चार ऋषि केवल वेदप्रकाशनार्थ तथा मोक्षप्राप्ति के निमित्त ही प्रकट हुए थे, भोगार्थ नहीं॥७॥

यु॒जा कर्मा॑णि ज॒नय॑न्वि॒श्वौजा॑ अशस्ति॒हा वि॒श्वम॑नास्तुरा॒षाट्। पी॒त्वी सोम॑स्य दि॒व आ वृ॑धा॒नः शूरो॒ निर्यु॒धाध॑म॒द्दस्यू॑न्॥

परमात्मा समस्त बलों का स्वामी, सर्वज्ञ, अज्ञान-पापनाशक, ज्ञानवर्धक, कामादि दोषों का निवारक है। उसकी उपासना करनी चाहिए॥८॥

इ॒दं त॒ एकं॑ प॒र ऊ॑ त॒ एकं॑ तृ॒तीये॑न॒ ज्योति॑षा॒ सं वि॑शस्व। सं॒वेश॑ने त॒न्व१॒॑श्चारु॑रेधि प्रि॒यो दे॒वानां॑ पर॒मे ज॒नित्रे॑॥

जीवात्मा का वर्त्तमान जन्म यह शरीर इस समय है। यही केवल नहीं, अपितु अगला जन्म भी इसका है। इस प्रकार बार-बार जन्म लेना इसका परम्परा से चला आता है। परन्तु जब ये परमात्मज्योति को अपने अन्दर समा लेता है, तो इन दोनों जन्मों को त्यागकर या जन्म-जन्मान्तर के क्रम को त्यागकर तीसरे अध्यात्मस्थान मोक्ष को प्राप्त होता है, जहाँ ये अव्याध गति से विचरता हुआ मुक्तों की श्रेणी में आ जाता है॥१॥

त॒नूष्टे॑ वाजिन्त॒न्वं१॒॑ नय॑न्ती वा॒मम॒स्मभ्यं॒ धातु॒ शर्म॒ तुभ्य॑म्। अह्रु॑तो म॒हो ध॒रुणा॑य दे॒वान्दि॒वी॑व॒ ज्योतिः॒ स्वमा मि॑मीयाः॥

परिवार में जब आत्मा का जन्म होता है, तो वह सूर्य के समान घर को प्रकाशित करता है और समस्त घरवालों के लिए सुख देनेवाला हुआ-हुआ अपने को भी सुखी बनाता है। उससे भी आगे उत्तम सुख लेने के लिये विद्वानों की संगति में सूर्यसमान तेजस्वी उसे बनना चाहिये॥२॥

वा॒ज्य॑सि॒ वाजि॑नेना सुवे॒नीः सु॑वि॒तः स्तोमं॑ सुवि॒तो दिवं॑ गाः। सु॒वि॒तो धर्म॑ प्रथ॒मानु॑ स॒त्या सु॑वि॒तो दे॒वान्त्सु॑वि॒तोऽनु॒ पत्म॑॥

बालक को चरित्रवान् बनाना, धर्मपरायण, विद्वान्, अपने से बड़े विद्वानों की संगति में रहना, यशस्वी बनाना, परमात्मा का उपासक इत्यादि उत्तम गुणों से सम्पन्न करना माता-पिता आदि का कर्त्तव्य है॥३॥

म॒हि॒म्न ए॑षां पि॒तर॑श्च॒नेशि॑रे दे॒वा दे॒वेष्व॑दधु॒रपि॒ क्रतु॑म्। सम॑विव्यचुरु॒त यान्यत्वि॑षु॒रैषां॑ त॒नूषु॒ नि वि॑विशुः॒ पुनः॑॥

विद्वान् जन शिवसंकल्प या सद्भाव के अनुसार अपनी इन्द्रियों को चलाते हैं तथा गृहस्थ जन भी उनके उपदेशानुसार अपनी इन्द्रियों का स्वामित्व करते हैं और उन-उनके अपने स्थानों में अपनी शक्ति द्वारा प्रसिद्ध होते हैं॥४॥

सहो॑भि॒र्विश्वं॒ परि॑ चक्रमू॒ रजः॒ पूर्वा॒ धामा॒न्यमि॑ता॒ मिमा॑नाः। त॒नूषु॒ विश्वा॒ भुव॑ना॒ नि ये॑मिरे॒ प्रासा॑रयन्त पुरु॒ध प्र॒जा अनु॑॥

आत्माएँ कर्मबलों के आधार पर प्राणिलोकों में परिभ्रमण करती हैं-चक्र लगाती हैं। अपने अनुकूल सुखमय धामों में जाती हैं और पितृभूत होकर बहुत प्रकार से संतानों को उत्पन्न करती हैं। इस प्रकार आत्माओं के द्वारा वंशपरम्परा चलती है॥५॥

द्विधा॑ सू॒नवोऽसु॑रं स्व॒र्विद॒मास्था॑पयन्त तृ॒तीये॑न॒ कर्म॑णा। स्वां प्र॒जां पि॒तरः॒ पित्र्यं॒ सह॒ आव॑रेष्वदधु॒स्तन्तु॒मात॑तम्॥

गृहस्थ जन उत्तम सन्तान की उत्पत्ति के लिए संयमपूर्वक सुरक्षित जीवनतत्त्व गर्भाधान द्वारा ऋतु अनुसार योग्य पत्नी में संस्थापित करके संसारिक सुख को प्राप्त करें। पुनः त्यग और योगाभ्यास द्वारा अध्यात्मसुख भी प्राप्त करें॥६॥

ना॒वा न क्षोदः॑ प्र॒दिशः॑ पृथि॒व्याः स्व॒स्तिभि॒रति॑ दु॒र्गाणि॒ विश्वा॑। स्वां प्र॒जां बृ॒हदु॑क्थो महि॒त्वाव॑रेष्वदधा॒दा परे॑षु॥

जैसे कोई मनुष्य नौका से जलाशय को पार करता है या जैसे विस्तृत सृष्टि के प्रदेशों और दुर्गम स्थानों को यात्रा के साधनों से पार करता है, इसी प्रकार गृहस्थ में आये संकटों को अपने शुभचरित्रों से पार करे तथा अपने पुत्र-पुत्रियों का विवाहसम्बन्ध स्ववंशीय स्ववर्ण के या परवंशीय-परवर्ण के जनों में गुणकर्मानुसार करे॥७॥

मा प्र गा॑म प॒थो व॒यं मा य॒ज्ञादि॑न्द्र सो॒मिनः॑। मान्त स्थु॑र्नो॒ अरा॑तयः॥

मनुष्य को परमात्मा के उपदिष्ट वेद आदेश से पृथक् आचरण नहीं करना चाहिए। वही जीवन का सच्चा मार्ग है। आन्तरिक जीवन का शोषण करनेवाले जो कामादि दोष हैं, उनसे बचने का भी वेद द्वारा उपदिष्ट अध्यात्ममार्ग है॥१॥

यो य॒ज्ञस्य॑ प्र॒साध॑न॒स्तन्तु॑र्दे॒वेष्वात॑तः। तमाहु॑तं नशीमहि॥

अध्यात्मयज्ञ के साधन श्रवण, मनन और निदिध्यासन तथा साक्षात्कार को आचरण में लाना चाहिए  ॥२॥

मनो॒ न्वा हु॑वामहे नाराशं॒सेन॒ सोमे॑न। पि॒तॄ॒णां च॒ मन्म॑भिः॥

मनुष्यों के व्यवहार को बतानेवाले परमात्मा से प्रकाशित वेदज्ञान द्वारा तथा पालक ऋषियों के अनुभवों द्वारा मानसिक स्तर को ऊँचा बनाना चाहिए॥३॥

आ त॑ एतु॒ मनः॒ पुनः॒ क्रत्वे॒ दक्षा॑य जी॒वसे॑। ज्योक्च॒ सूर्यं॑ दृ॒शे॥

गृहस्थ को चाहिए कि अपने पुत्र के मानसिक स्तर को ऊँचा बनाये तथा उसके अन्दर कर्मप्रवृत्ति, शारीरिक शक्ति और जीवनशक्ति दिनों-दिन बढ़ती जाये, इस बात का ध्यान रखें तथा परमात्मा के प्रति आस्तिक भावना और अनुभूति भी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाये॥४॥

पुन॑र्नः पितरो॒ मनो॒ ददा॑तु॒ दैव्यो॒ जनः॑। जी॒वं व्रातं॑ सचेमहि॥

पारिवारिक जनों को चाहिए कि सन्तान को ऊँचे आचार्य से ऐसी शिक्षा दिलाएँ, कि प्राणिमात्र के प्रति यथोचित व्यवहारलाभ ग्रहण कर सके॥५॥

व॒यं सो॑म व्र॒ते तव॒ मन॑स्त॒नूषु॒ बिभ्र॑तः। प्र॒जाव॑न्तः सचेमहि॥

परमात्मा की उपासना करने के लिए मनुष्य को संयमी होना चाहिए और वेदानुसार धर्मचर्या पर चलना चाहिए॥६॥

यत्ते॑ य॒मं वै॑वस्व॒तं मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम्। तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑॥

मानसिक रोग का रोगी कल्पना से अन्यथा विचार करता हो कि न जाने क्या होगा! मरूँगा! तो कुशल चिकित्सक आश्वासन-चिकित्सा-पद्धति से उसे आश्वासन दे कि तू नहीं मरेगा, तेरे मन को इसी देह में रहने के लिए-दीर्घजीवन के लिए हम स्थिर करते हैं, तू चिन्ता न कर॥१॥

यत्ते॒ दिवं॒ यत्पृ॑थि॒वीं मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम्। तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑॥

मानस रोगी के रोगी का मन जागते हुए भ्रान्त होकर के ग्रह-तारों की  अन्यथा बातें करता हो, तो आश्वासन देकर स्वस्थ बनाना चाहिए॥२॥

यत्ते॒ भूमिं॒ चतु॑र्भृष्टिं॒ मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम्। तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑॥

मानस रोग के रोगी का मन भ्रान्त होकर जब-“मैं ऊँचे पर्वत पर हूँ, मुझे कौन उतारे, मैं खड्डे में हूँ, मुझे कौन उभारे, मैं रेतीली भूमि में पड़ा हूँ या मैं कीचड़ में धँसा जा रहा हूँ” आदि प्रलाप करे, तो उस समय उसको आश्वासन दिया जाये कि हमने वहाँ से तुझे बचा लिया है आदि। इस प्रकार उसकी चिकित्सा करे॥३॥

यत्ते॒ चत॑स्रः प्र॒दिशो॒ मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम्। तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑॥

मानसिक रोग के रोगी का मन जब कभी पूर्व, कभी पश्चिम, कभी उत्तर, कभी दक्षिण दिशा सम्बन्धी बातें क्षण-क्षण में बदल कर करे, तो उस ऐसे भ्रान्त मनवाले को उचित आश्वासनों द्वारा स्वस्थ एवं शान्त बनाएँ॥४॥

यत्ते॑ समु॒द्रम॑र्ण॒वं मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम्। तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑॥

मानसिक रोगग्रस्त का मन भ्रान्त हुआ-हुआ जल से आप्लावित समुद्र में अपने को तैरता हुआ या डूबता हुआ बतलाये, तो उसे इस प्रसङ्ग के निवारक आश्वासन देकर शान्त करें॥५॥

यत्ते॒ मरी॑चीः प्र॒वतो॒ मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम्। तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑॥

मानसिक रोगी का मन आशाओं की तरङ्गों में बहता चला जाये, तो उसको आशारोधक आश्वासनों एवं सान्त्वनापूर्ण आश्वासनों से स्वस्थ करना चाहिए, क्योंकि आशाओं का कोई अन्त नहीं है॥६॥

यत्ते॑ अ॒पो यदोष॑धी॒र्मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम्। तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑॥

मानसरोगग्रस्त रोगी का मन भ्रान्त हुआ जलों में पुनः-पुनः स्नान, पान, क्रीडन आदि में रुचि रख रहा हो तथा ओषधि-वनस्पतियों में उनके पुनः-पुनः स्मरण, आस्वादन रुचि या अरुचि में प्रवाहित हो तो तत्तदुपयुक्त  आश्वासन देकर रोगी के मन को शान्ति देनी चाहिए॥७॥

यत्ते॒ सूर्यं॒ यदु॒षसं॒ मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम्। तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑॥

मानसिक रोगी को जब भ्रान्ति से जाग्रत् में अथवा अर्द्धनिद्रा में सूर्य या उषा उसकी पीतिमा मन में बसी जा रही हो, आँखें भी खोलने को तैयार न हो और कहे कि सूर्य या प्रकाश बहुत तीव्र है, तो ऐसी अवस्था में मन को आश्वासन दें॥८॥

यत्ते॒ पर्व॑तान्बृह॒तो मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम्। तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑॥

मानसरोगग्रस्त मनुष्य जब भ्रान्त-सी अवस्था में अपने को पहाड़ों पर भटकता हुआ अनुभव करे और वैसी ही बातें करे, तो उसे भी सान्त्वनापूर्ण आश्वासनों से शान्त करे॥९॥

यत्ते॒ विश्व॑मि॒दं जग॒न्मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम्। तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑॥

मन के रोगी का मन भ्रान्त अवस्था में सारे संसार में कभी कहीं, कभी कहीं, क्षण-क्षण में भटक रहा हो, तो उसे भी यथोचित आश्वासन उपचारों से स्वस्थ करें॥१०॥

यत्ते॒ पराः॑ परा॒वतो॒ मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम्। तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑॥

मानसिकरोगग्रस्त मनुष्य का मन भ्रान्त हुआ दूर दिशाओं और दूर देशों में भटकता प्रतीत होता है, उसे भी यथोचित उपचारों एवं आश्वासनों से ठीक बनाना चाहिए॥११॥

यत्ते॑ भू॒तं च॒ भव्यं॑ च॒ मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम्। तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑॥

मानसिक रोग में ग्रस्त मनवाले व्यक्ति का मन कभी बहुत पुरानी बातों को सोचता रहता है, कभी भविष्य की अनावश्यक कल्पनाएँ करता रहता है, उसे भी विविध उपचारों और आश्वासनों से शान्त तथा स्वस्थ बनाना चाहिए॥१२॥

प्र ता॒र्यायुः॑ प्रत॒रं नवी॑य॒ स्थाता॑रेव॒ क्रतु॑मता॒ रथ॑स्य। अध॒ च्यवा॑न॒ उत्त॑वी॒त्यर्थं॑ परात॒रं सु निॠ॑तिर्जिहीताम्॥

गृहस्थ आश्रम में रहते हुए स्त्री-पुरुष गृहस्थ को ऐसे चलाएँ, जैसे कि कोई रथस्थ यात्री अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है। गृहस्थ का लक्ष्य है धर्माचरण करते हुए उत्तम सन्तान का उत्पन्न करना, उसकी आयु को बढ़ाना और उसे गुणवान् बनाना॥१॥

साम॒न्नु रा॒ये नि॑धि॒मन्न्वन्नं॒ करा॑महे॒ सु पु॑रु॒ध श्रवां॑सि। ता नो॒ विश्वा॑नि जरि॒ता म॑मत्तु परात॒रं सु निॠ॑तिर्जिहीताम्॥

जैसे कोई धनपति अपने यहाँ धन का कोष स्थापित करता है, ऐसे ही समतल भूमि में अन्न को उत्पन्न करके मानव को अपनी जीवनयात्रा को सुखपूर्वक चलाने के लिए अन्नसंग्रह करना चाहिए। इस प्रकार उन अन्नों से स्वयं तृप्त हों और अपने वृद्धों को भी तृप्त करें। भूख या भुखमरी अर्थात् दुर्भिक्ष आपत्ति जिससे न सताये, दूर रहे॥२॥

अ॒भी ष्व१॒॑र्यः पौंस्यै॑र्भवेम॒ द्यौर्न भूमिं॑ गि॒रयो॒ नाज्रा॑न्। ता नो॒ विश्वा॑नि जरि॒ता चि॑केत परात॒रं सु निॠ॑तिर्जिहीताम्॥

मनुष्यों को चाहिए परस्पर संगठन करके विविध पुरुषार्थों के द्वारा शत्रुओं पर प्रभाव डालकर स्वाधीन करें। जैसे सूर्य तापक रश्मियों से पृथिवी को तपाता है या जैसे जलधाराओं को पर्वत नीचे फेंकता है, इस प्रयोजन के लिए अपने वृद्ध नेता के नेतृत्व में रहकर पुरुषार्थ करें, जिससे कृच्छ्र आपत्ति भी दूर रहे॥३॥

मो षु णः॑ सोम मृ॒त्यवे॒ परा॑ दाः॒ पश्ये॑म॒ नु सूर्य॑मु॒च्चर॑न्तम्। द्युभि॑र्हि॒तो ज॑रि॒मा सू नो॑ अस्तु परात॒रं सु निॠ॑तिर्जिहीताम्॥

मनुष्य को ऐसा आचरण करना चाहिए, जिससे कि शीघ्र मृत्यु न हो और आगे आनेवाली जरावस्था भी सुख से बीते तथा अपने जीवनकाल में सूर्य को देखते रहें अर्थात् नेत्र आदि इन्द्रियशक्तियाँ न्यून न हों और कृच्छ्र आपत्ति भी दूर रहे॥४॥

असु॑नीते॒ मनो॑ अ॒स्मासु॑ धारय जी॒वात॑वे॒ सु प्र ति॑रा न॒ आयुः॑। रा॒र॒न्धि नः॒ सूर्य॑स्य सं॒दृशि॑ घृ॒तेन॒ त्वं त॒न्वं॑ वर्धयस्व॥

संयम के द्वारा परमात्मा की उपासना प्रार्थना करनेवाले मनुष्य के प्राणों को परमात्मा बढ़ाता है और अन्तःकरण को विकसित करता है, सुखरूप दीर्घजीवन प्रदान करता है। इन्द्रियों में देखने आदि की शक्ति बनाये रखता है तथा आत्मतेज को भी देता है॥५॥

असु॑नीते॒ पुन॑र॒स्मासु॒ चक्षुः॒ पुनः॑ प्रा॒णमि॒ह नो॑ धेहि॒ भोग॑म्। ज्योक्प॑श्येम॒ सूर्य॑मु॒च्चर॑न्त॒मनु॑मते मृ॒ळया॑ नः स्व॒स्ति॥

पुनर्जन्म में प्राण नेत्र आदि अङ्ग पूर्वजन्म के समान परमात्मा देता है। वह हमारे जीवन को सुखी बनाने के लिए सब साधन भोगपदार्थ देता है, उसका हमें कृतज्ञ होना चाहिए तथा उपासना करनी चाहिए॥६॥

पुन॑र्नो॒ असुं॑ पृथि॒वी द॑दातु॒ पुन॒र्द्यौर्दे॒वी पुन॑र॒न्तरि॑क्षम्। पुन॑र्नः॒ सोम॑स्त॒न्वं॑ ददातु॒ पुनः॑ पू॒षा प॒थ्यां॒३॒॑ या स्व॒स्तिः॥

पुनर्जन्म में पृथिवीलोक, अन्तरिक्षलोक और द्युलोक प्राण को देते हैं। इन तीनों के द्वारा प्राणशक्ति की स्थापना होती है। चन्द्रमा तथा ओषधि से शरीर का पोषण होता है और परमात्मा चेतन आत्मा को शरीर में प्रविष्ट करके जीवनयात्रा में प्रेरित करता है॥७॥

शं रोद॑सी सु॒बन्ध॑वे य॒ह्वी ऋ॒तस्य॑ मा॒तरा॑। भर॑ता॒मप॒ यद्रपो॒ द्यौः पृ॑थिवि क्ष॒मा रपो॒ मो षु ते॒ किं च॒नाम॑मत्॥

उत्तम सन्तान की उत्पत्ति के लिए माता पिता अपने शरीर में संयम द्वारा रजवीर्य को सुरक्षित रखें, पाप और अज्ञान से दूर रहें, ज्ञान और सद्गुणों को धारण करें। फिर भी यदि कोई दोष अपने अन्दर हो, तो ऐसा व्यवहार करें, जिससे सन्तान पर उसका प्रभाव न पड़े॥८॥

अव॑ द्व॒के अव॑ त्रि॒का दि॒वश्च॑रन्ति भेष॒जा। क्ष॒मा च॑रि॒ष्ण्वे॑क॒कं भर॑ता॒मप॒ यद्रपो॒ द्यौः पृ॑थिवि क्ष॒मा रपो॒ मो षु ते॒ किं च॒नाम॑मत्॥

मानव के रोगों या दोषों को दूर करने के लिए तीनों लोकों से भेषज प्राप्त होते हैं। द्युलोक से सूर्य रश्मियाँ, अन्तरिक्षलोक से वृष्टि जल और पृथिविलोक से खाद्य-भोज्य वनस्पति प्राप्त होती हैं। इनका उपयोग करके मनुष्य को स्वस्थ होना चाहिए तथा अपनी असावधानी से अपनी सन्तान को उक्त रोग या दोष से बचाये रखना चाहिए॥९॥

समि॑न्द्रेरय॒ गाम॑न॒ड्वाहं॒ य आव॑हदुशी॒नरा॑ण्या॒ अनः॑। भर॑ता॒मप॒ यद्रपो॒ द्यौः पृ॑थिवि क्ष॒मा रपो॒ मो षु ते॒ किं च॒नाम॑मत्॥

परमात्मा सबके शरीरों को चलानेवाले प्राण को प्रेरित करता है। प्रत्येक प्राणी भोगसृष्टि की कामना करता है। यदि कोई प्राणी असावधानता से भोगसृष्टि में पड़ता है, तो वह रोगी और दुःखी हो जाता है और अपनी सन्तान को भी दुःखी बनाता है। अतः सावधानी से भोगसृष्टि में विचरे॥१०॥

आ जनं॑ त्वे॒षसं॑दृशं॒ माही॑नाना॒मुप॑स्तुतम्। अग॑न्म॒ बिभ्र॑तो॒ नमः॑॥

महात्माओं में जो साक्षात् परमात्मदर्शी तथा उत्तमगुणसम्पन्न है, उसका सत्सङ्ग कुछ उपहार ले जाकर करना चाहिए॥१॥

अस॑मातिं नि॒तोश॑नं त्वे॒षं नि॑य॒यिनं॒ रथ॑म्। भ॒जेर॑थस्य॒ सत्प॑तिम्॥

गुण व बल में सबसे बढ़े-चढ़े नेता, तेजस्वी, शत्रुहन्ता, सांग्रामिक रथ के सँभालनेवाले की शरण लेनी चाहिए, उसको राजा बनाना चाहिए॥२॥

यो जना॑न्महि॒षाँ इ॑वातित॒स्थौ पवी॑रवान्। उ॒ताप॑वीरवान्यु॒धा॥

राजा या शासक ऐसा होना चाहिए, जो शत्रुओं को संग्राम में शस्त्रास्त्रों द्वारा परास्त करके स्वाधीन करे अथवा बिना शस्त्रास्त्र के भी शारीरिक बल द्वारा जैसे सिंह भैंसों को पछाड़ता है, ऐसे शत्रुओं को पछाड़े॥३॥

यस्ये॑क्ष्वा॒कुरुप॑ व्र॒ते रे॒वान्म॑रा॒य्येध॑ते। दि॒वी॑व॒ पञ्च॑ कृ॒ष्टयः॑॥

जिस राजा के शासन में मधुरोपदेष्टा शिक्षामन्त्री, प्रशस्त धनवान् अर्थमन्त्री और शत्रुओं को मारनेवाला सेनाध्यक्ष समृद्धि पाते हैं, उसकी पाँचों-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और निषाद प्रजाएँ और ज्ञानीजन, जैसे सूर्य के आश्रय में रश्मियाँ प्रकाशवाली और सबल होती हैं, ऐसे सबल होते हैं॥४॥

इन्द्र॑ क्ष॒त्रास॑मातिषु॒ रथ॑प्रोष्ठेषु धारय। दि॒वी॑व॒ सूर्यं॑ दृ॒शे॥

महारथी युद्धकुशल के अधीन अपने विविध सैन्य बलों को समर्पित करे-सौंपे, जैसे परमात्मा ने आकाश के अन्दर सब जगत् को प्रकाशित करने के लिए धारण कर रखा है॥५॥

अ॒गस्त्य॑स्य॒ नद्भ्यः॒ सप्ती॑ युनक्षि॒ रोहि॑ता। प॒णीन्न्य॑क्रमीर॒भि विश्वा॑न्राजन्नरा॒धसः॑॥

राजा को चाहिए कि निष्पाप-पाकर्मसम्पर्क से रहित, परमात्मा की स्तुति प्रार्थना उपासना करनेवाले ऋषि-मुनियों के लिए विशेष न्यायव्यवस्था और रक्षाप्रबन्धार्थ सभेश और सेनेश को नियुक्त करे तथा व्यापारियों के लिए व्यापारार्थ प्रेरणा दे और राष्ट्र में जो उद्दण्ड हों, उन पर पूरा नियन्त्रण रखे॥६॥

अ॒यं मा॒तायं पि॒तायं जी॒वातु॒राग॑मत्। इ॒दं तव॑ प्र॒सर्प॑णं॒ सुब॑न्ध॒वेहि॒ निरि॑हि॥

बालक या कुमार स्नेह में बाँधनेवाला होता है, वह विशेष स्नेहपात्र-दयापात्र होता है। जब वह रोगी हो जाये, तो कोई भी चिकित्सक माता के समान स्नेह करता हुआ या पिता के समान पालन करता हुआ उसके जीवन के लिए चिकित्सा करे और आश्वासन दे कि तू इसी शरीर में स्वस्थ और दीर्घजीवी हो जायेगा॥७॥

यथा॑ यु॒गं व॑र॒त्रया॒ नह्य॑न्ति ध॒रुणा॑य॒ कम्। ए॒वा दा॑धार ते॒ मनो॑ जी॒वात॑वे॒ न मृ॒त्यवेऽथो॑ अरि॒ष्टता॑तये॥

रोगी कुमार को चिकित्सक ऐसे धैर्य बँधाये और ऐसा उपचार करे, जैसे चर्मरस्सी से बैल को जूवे में जोड़ा जाता है, ऐसे उसके मन को रोग के चिन्तन से हटाकर आश्वासन और मनोरञ्जन के द्वारा स्वस्थता की ओर लगा दिया जाये॥८॥

यथे॒यं पृ॑थि॒वी म॒ही दा॒धारे॒मान्वन॒स्पती॑न्। ए॒वा दा॑धार ते॒ मनो॑ जी॒वात॑वे॒ न मृ॒त्यवेऽथो॑ अरि॒ष्टता॑तये॥

यह महत्त्वपूर्ण-महती पृथिवी ओषधि वनस्पतियों को जैसे संभालती है, ऐसे ही चिकित्सक को भी रोगी के मन को शरीर में दृढ़रूप से धैर्य देकर स्थिर करना चाहिए तथा ओषधियों से उसके मन को शान्त करना चाहिए। उसके जीवित रहने का यत्न करना चाहिए॥९॥

य॒माद॒हं वै॑वस्व॒तात्सु॒बन्धो॒र्मन॒ आभ॑रम्। जी॒वात॑वे॒ न मृ॒त्यवेऽथो॑ अरि॒ष्टता॑तये॥

योग्य चिकित्सक को चाहिए कि सुकुमार बालक के मन से मृत्यु के भय को दूर करे और उसे आश्वासन दे कि मैंने मृत्यु के कारण को दूर कर दिया है, तुझे जीवनधारण करने के लिए समर्थ बना दिया है॥१०॥

न्य१॒॑ग्वातोऽव॑ वाति॒ न्य॑क्तपति॒ सूर्यः॑। नी॒चीन॑म॒घ्न्या दु॑हे॒ न्य॑ग्भवतु ते॒ रपः॑॥

योग्य चिकित्सक मानसिक रोग के रोगी कुमार को आश्वासन दे कि जैसे ऊपर से वायु पृथिवी पर नीचे बहता है और जैसे सूर्य का ताप ऊपर से नीचे पृथिवी पर आता है तथा जैसे गौ का दूध स्तनों द्वारा नीचे आता है या बाहर आता है, ऐसे ही तेरा मन का रोग तेरे से निकलकर बाहर हो गया॥११॥

अ॒यं मे॒ हस्तो॒ भग॑वान॒यं मे॒ भग॑वत्तरः। अ॒यं मे॑ वि॒श्वभे॑षजो॒ऽयं शि॒वाभि॑मर्शनः॥

चिकित्सक बालक को अपने हाथों से स्पर्श करता हुआ आश्वासन दे कि तुझे स्वस्थ करना मेरे दाएँ-बाएँ हाथों का खेल है, तू घबरा नहीं। मेरे हाथों में तुझे स्वस्थ करने का औषध है और शान्ति देने की शक्ति भी है॥१२॥

सूक्तम्

इ॒दमि॒त्था रौद्रं॑ गू॒र्तव॑चा॒ ब्रह्म॒ क्रत्वा॒ शच्या॑म॒न्तरा॒जौ। क्रा॒णा यद॑स्य पि॒तरा॑ मंहने॒ष्ठाः पर्ष॑त्प॒क्थे अह॒न्ना स॒प्त होतॄ॑न्॥

जो वेदज्ञान का अध्ययन करके उद्यमशील तेजस्वी स्नातक बन जाये, उस अवसर पर उसके उपाध्याय माता-पिता तथा वृद्धजन अपने व्यावहारिक अनुभवों से उसके मन ज्ञानेन्द्रिय वाणी को संस्कृत करें, उसके व्यवहारों का ज्ञान प्रदान करें॥१॥

स इद्दा॒नाय॒ दभ्या॑य व॒न्वञ्च्यवा॑नः॒ सूदै॑रमिमीत॒ वेदि॑म्। तूर्व॑याणो गू॒र्तव॑चस्तमः॒ क्षोदो॒ न रेत॑ इ॒तऊ॑ति सिञ्चत्॥

गृहस्थ में जानेवाला विद्यास्नातक अपने गुणकर्मानुसार वधू का स्मरण करे। ऊँचे ज्ञानामृत तथा वेदामृत बरसानेवाले ऋत्विजों के सहयोग से वेदी तैयार कर विधानपूर्वक विवाह करे, अपने वंश की वृद्धि के लिए। साथ-साथ अपनी विद्या का लाभ देता रहे ऋषि-ऋण चुकाने के लिए॥२॥

मनो॒ न येषु॒ हव॑नेषु ति॒ग्मं विपः॒ शच्या॑ वनु॒थो द्रव॑न्ता। आ यः शर्या॑भिस्तुविनृ॒म्णो अ॒स्याश्री॑णीता॒दिशं॒ गभ॑स्तौ॥

स्नातक जब माता-पिता या स्त्री-पुरुषों में विद्याप्राप्ति के अनन्तर उपस्थित हो, तो उसका स्नेह से स्वागत करें और उसके विद्यावचनों को हाथ में जैसे ग्रहण करने के समान ग्रहण करें और उसे अपना अनुमोदन प्रदान करें॥३॥

कृ॒ष्णा यद्गोष्व॑रु॒णीषु॒ सीद॑द्दि॒वो नपा॑ताश्विना हुवे वाम्। वी॒तं मे॑ य॒ज्ञमा ग॑तं मे॒ अन्नं॑ वव॒न्वांसा॒ नेष॒मस्मृ॑तध्रू॥

स्नातक विद्या को अध्ययन करके ज्ञान का प्रकाश करनेवाला होता है। उसे अपने से बड़े सुशिक्षित स्त्री-पुरुषों को सम्बोधित करके कहना चाहिए कि मेरे ज्ञानप्रकाश के कार्य में कोई अज्ञान की धारा आ जाये, तो मुझे सावधान करें-चेतावें और कभी-कभी उन्हें अपने घर बुलाकर भोजन करावें॥४॥

प्रथि॑ष्ट॒ यस्य॑ वी॒रक॑र्ममि॒ष्णदनु॑ष्ठितं॒ नु नर्यो॒ अपौ॑हत्। पुन॒स्तदा वृ॑हति॒ यत्क॒नाया॑ दुहि॒तुरा अनु॑भृतमन॒र्वा॥

गृहस्थ का लक्ष्य सन्तान उत्पादन करना है, तदर्थ वीर्यसेचन करने पर कमनीय सन्तान को दोहनेवाली पत्नी में वह पुष्ट होकर सन्तान के रूप में उत्पन्न हो जाता है और वह युवा बन जाता है। तब पिता उसे पुत्र परम्परा चलाने के लिए उत्साहित करता है। जब वह पुत्र पुत्रवान् बन जाता है, तो फिर उसका पिता गृहस्थ को त्याग दे अन्य मनुष्यों के हितकार्य करने के लिए॥५॥

म॒ध्या यत्कर्त्व॒मभ॑वद॒भीके॒ कामं॑ कृण्वा॒ने पि॒तरि॑ युव॒त्याम्। म॒ना॒नग्रेतो॑ जहतुर्वि॒यन्ता॒ सानौ॒ निषि॑क्तं सुकृ॒तस्य॒ योनौ॑॥

युवती भार्या में पुत्रोत्पादन के लिए वीर्यनिषेक करना कर्त्तव्य होता है। जीवित पिता के होते हुए कम से कम प्रजा तो अवश्य उत्पन्न करे। इसके लिए गृहस्थ आश्रम पुण्य का स्थान है। विशेष सेवनीय जगत् में सन्तानपरम्परा के लिए निषेक करना आवश्यक है। यह गृहस्थाश्रम की परम्परा है॥६॥

पि॒ता यत्स्वां दु॑हि॒तर॑मधि॒ष्कन्क्ष्म॒या रेतः॑ संजग्मा॒नो नि षि॑ञ्चत्। स्वा॒ध्यो॑ऽजनय॒न्ब्रह्म॑ दे॒वा वास्तो॒ष्पतिं॑ व्रत॒पां निर॑तक्षन्॥

यदि पुरुष के पत्नीसमागम अर्थात् वीर्यसिञ्चन करने पर पुत्र को न प्राप्त करके केवल कन्या को प्राप्त करता है, तब वह कन्या पितृकर्म की रक्षिका तथा पिता के घर की-सम्पत्ति की स्वामी होती है। ऐसी वेद की परम्परा एवं वैदिक विद्वानों की मान्यता है॥७॥

स ईं॒ वृषा॒ न फेन॑मस्यदा॒जौ स्मदा परै॒दप॑ द॒भ्रचे॑ताः। सर॑त्प॒दा न दक्षि॑णा परा॒वृङ्न ता नु मे॑ पृश॒न्यो॑ जगृभ्रे॥

कन्या का पति पिता द्वारा दी हुई कन्या में सन्तान उत्पन्न करे, यह तो अभीष्ट है, परन्तु कन्या के पिता की भूमि आदि सारी सम्पत्ति लेने के लोभ में कन्या का ठुकराना-उसे त्याग देना निकृष्ट कार्य है। ऐसा नहीं करना चाहिए॥८॥

म॒क्षू न वह्निः॑ प्र॒जाया॑ उप॒ब्दिर॒ग्निं न न॒ग्न उप॑ सीद॒दूधः॑। सनि॑ते॒ध्मं सनि॑तो॒त वाजं॒ स ध॒र्ता ज॑ज्ञे॒ सह॑सा यवी॒युत्॥

कन्या का वोढा अर्थात् पति कन्या को कष्ट देनेवाला न बने और बलात् उसका स्पर्श न करे। विवाहकाल में अर्थात् विवाहसंस्कार में विधि से अग्न्याधान करके उसमें पुत्र उत्पन्न करने का अधिकारी बना है, अतः उसमें योग्य सन्तान को उत्पन्न करे, उसका कभी अनादर न करे॥९॥

म॒क्षू क॒नायाः॑ स॒ख्यं नव॑ग्वा ऋ॒तं वद॑न्त ऋ॒तयु॑क्तिमग्मन्। द्वि॒बर्ह॑सो॒ य उप॑ गो॒पमागु॑रदक्षि॒णासो॒ अच्यु॑ता दुदुक्षन्॥

नव स्नातक यज्ञवेदि पर विवाहसंस्कार में वधू की कामना करते हुए वेदमन्त्रों का उच्चारण तथा तदनुसार प्रतिज्ञा करते हुए योग्य कुमारी से विवाह करें। दोनों कुलों अर्थात् पितृ-कुल और श्वसुरकुल की कल्याणवृद्धि चाहते हुए स्वयं श्वसुरकुल से धन की कामना-दहेज-प्रप्ति की इच्छा न करते हुए गृहस्थ के स्थिर सुखों को प्राप्त करें॥१०॥

म॒क्षू क॒नायाः॑ स॒ख्यं नवी॑यो॒ राधो॒ न रेत॑ ऋ॒तमित्तु॑रण्यन्। शुचि॒ यत्ते॒ रेक्ण॒ आय॑जन्त सब॒र्दुघा॑याः॒ पय॑ उ॒स्रिया॑याः॥

विवाहसंस्कार में कुमारी का पत्नी-सम्बन्ध प्रशंसनीय धनरूप है। अपने प्राणों का तत्त्व-वीर्य पत्नी में जाकर के सन्तानरत्न को उत्पन्न करता है तथा पत्नी सब कामनाओं को दुहनेवाली है। गार्हस्थ्य अमृत को दुहनेवाली अर्थात् स्वानन्द को दुहनेवाली है॥११॥

प॒श्वा यत्प॒श्चा वियु॑ता बु॒धन्तेति॑ ब्रवीति व॒क्तरी॒ ररा॑णः। वसो॑र्वसु॒त्वा का॒रवो॑ऽने॒हा विश्वं॑ विवेष्टि॒ द्रवि॑ण॒मुप॒ क्षु॥

तदिन्न्व॑स्य परि॒षद्वा॑नो अग्मन्पु॒रू सद॑न्तो नार्ष॒दं बि॑भित्सन्। वि शुष्ण॑स्य॒ संग्र॑थितमन॒र्वा वि॒दत्पु॑रुप्रजा॒तस्य॒ गुहा॒ यत्॥

वैराग्यवान् आत्मा प्राणों से पूरित शरीर के अन्दर वर्तमान हुआ इन्द्रियों के विषयग्रहण छिद्रों को विषयरहित करके हृदयगुहा में परमात्मा को साक्षात् करता है॥१३॥

भर्गो॑ ह॒ नामो॒त यस्य॑ दे॒वाः स्व१॒॑र्ण ये त्रि॑षध॒स्थे नि॑षे॒दुः। अ॒ग्निर्ह॒ नामो॒त जा॒तवे॑दाः श्रु॒धी नो॑ होतॠ॒तस्य॒ होता॒ध्रुक्॥

परमात्मा का मुख्य या स्वाभाविक नाम ‘ओ३म्’ है। इसको जानने मानने और उपासना करने से दुःखों के मूल अर्थात् पाप भस्म हो जाते हैं तथा ज्ञान कर्म उपासना द्वारा मुमुक्षु रोग दुःखों से मुक्त हो जाते हैं। वह परमात्मा उपासकों के द्वारा किये हुए स्तुति प्रार्थना उपासना का स्वीकारकर्ता है॥१४॥

उ॒त त्या मे॒ रौद्रा॑वर्चि॒मन्ता॒ नास॑त्याविन्द्र गू॒र्तये॒ यज॑ध्यै। म॒नु॒ष्वद्वृ॒क्तब॑र्हिषे॒ ररा॑णा म॒न्दू हि॒तप्र॑यसा वि॒क्षु यज्यू॑॥

अध्यापक और उपदेशक जैसे गृहस्थ आश्रम वालों को सांसारिक व्यवहारों तथा विद्याओं का अध्यापन उपदेश करते हैं, ऐसे ही गृहस्थ से निवृत्त वैराग्यवान् होते हुए वानप्रस्थ भी अध्यात्मयज्ञ और अध्यात्मविद्या का उपदेश करें॥१५॥

अ॒यं स्तु॒तो राजा॑ वन्दि वे॒धा अ॒पश्च॒ विप्र॑स्तरति॒ स्वसे॑तुः। स क॒क्षीव॑न्तं रेजय॒त्सो अ॒ग्निं ने॒मिं न च॒क्रमर्व॑तो रघु॒द्रु॥

परमात्मा सारे संसार में व्यापक है और उससे बाहर भी है। वह सूर्य आदि को चलाता है-रथ के चक्र की भाँति। माता के गर्भ में जानेवाले जीवात्मा को भी जन्म-जन्मान्तर में चलाता है तथा पूर्ण ब्रह्मचारी को मोक्ष में प्रेरित करता है॥१६॥

स द्वि॒बन्धु॑र्वैतर॒णो यष्टा॑ सब॒र्धुं धे॒नुम॒स्वं॑ दु॒हध्यै॑। सं यन्मि॒त्रावरु॑णा वृ॒ञ्ज उ॒क्थैर्ज्येष्ठे॑भिरर्य॒मणं॒ वरू॑थैः॥

परमात्मा सृष्टि का उत्पादक है। वह जीवात्मा का सम्बन्ध सृष्टि और मुक्ति दोनों से कराता है। मुक्ति अनुत्पन्न है, उसका आनन्द स्थायी है। सृष्टि भोगप्रद है। सृष्टि के भोग और मुक्ति के आनन्द वितरण में समर्थ है। जीवात्मा को परमात्मा प्राणसाधन देता है। जब वह वैराग्यवान् होकर प्राणों को त्यागता है, तो मुक्ति में हो जाता है और प्राणों के सहारे से ही अनुत्पन्न प्रकृति के साथ जीवात्मा का सम्बन्ध होने पर भोग प्राप्त करता है। भोगों से ग्लानि होने पर अपवर्ग-मुक्ति में जाता है॥१७॥

तद्ब॑न्धुः सू॒रिर्दि॒वि ते॑ धियं॒धा नाभा॒नेदि॑ष्ठो रपति॒ प्र वेन॑न्। सा नो॒ नाभिः॑ पर॒मास्य वा॑ घा॒हं तत्प॒श्चा क॑ति॒थश्चि॑दास॥

जिसने उपासना द्वारा परमात्मा को अपना बन्धु बना लिया, वह ऐसा जीवन्मुक्त हुआ परमात्मा के अत्यन्त निकट अर्थात् उसके अन्दर विराजमान हो जाता है। परमात्मा द्वारा प्रज्ञा-बुद्धि उसे मोक्ष में पहुँचा देती है। अन्य मुक्त्तों की भाँति वह भी मुक्त हो जाता है॥१८॥

इ॒यं मे॒ नाभि॑रि॒ह मे॑ स॒धस्थ॑मि॒मे मे॑ दे॒वा अ॒यम॑स्मि॒ सर्वः॑। द्वि॒जा अह॑ प्रथम॒जा ऋ॒तस्ये॒दं धे॒नुर॑दुह॒ज्जाय॑माना॥

परमात्मा परमा देवता या वेदवाणी अथवा प्रज्ञा मेरा मोक्ष से सम्बन्ध करानेवाली है। अन्य जीवन्मुक्तों के साथ मेरा यह सहस्थान है-समानाश्रय है। मैं आत्मा सब कार्य करने में समर्थ हूँ। सृष्टि में मैं माता-पिता द्वारा प्रसिद्ध होता हूँ। प्रकृति से प्रकटित हुई यह सृष्टि मुझ आत्मा के लिए भोग का दोहन करती है॥१९॥

अधा॑सु म॒न्द्रो अ॑र॒तिर्वि॒भावाव॑ स्यति द्विवर्त॒निर्व॑ने॒षाट्। ऊ॒र्ध्वा यच्छ्रेणि॒र्न शिशु॒र्दन्म॒क्षू स्थि॒रं शे॑वृ॒धं सू॑त मा॒ता॥

प्रकृति के विकृतिरूप सब प्राणी शरीर हैं, उनमें रहनेवाला चेतन आत्मा है, जो दो मार्गों पर गति करता है-इस जन्म और अगले जन्म संसार और मोक्ष में। अतः वह नित्य है। इसकी ऊँची स्थिति मुक्ति है, जहाँ इसे स्थायी सुख मिलता है, वह सुख की दात्री है-सुख को उत्पन्न करती है, उसका सुख अत्यन्त प्रशंसनीय है॥२०॥

अधा॒ गाव॒ उप॑मातिं क॒नाया॒ अनु॑ श्वा॒न्तस्य॒ कस्य॑ चि॒त्परे॑युः। श्रु॒धि त्वं सु॑द्रविणो न॒स्त्वं या॑ळाश्व॒घ्नस्य॑ वावृधे सू॒नृता॑भिः॥

हृदय से परमात्मा की स्तुतियाँ करने से जो मनुष्य श्रान्त हो जाता है, परमात्मा उसको अपना कृपापात्र बनाता है, उसे अध्यात्मधन प्रदान करता है। उस ऐसे संयमी जन के अन्दर वह स्तुतियों से साक्षात् होता है॥२१॥

अध॒ त्वमि॑न्द्र वि॒द्ध्य१॒॑स्मान्म॒हो रा॒ये नृ॑पते॒ वज्र॑बाहुः। रक्षा॑ च नो म॒घोनः॑ पा॒हि सू॒रीन॑ने॒हस॑स्ते हरिवो अ॒भिष्टौ॑॥

जो परमात्मा के उपासक पापरहित अध्यात्मयज्ञ करनेवाले होते हैं, वे परमात्मा की दया और प्रसाद के पात्र बनते हैं। परमात्मा उन्हें अपना आनन्ददान देकर उनकी रक्षा करता है॥२२॥

अध॒ यद्रा॑जाना॒ गवि॑ष्टौ॒ सर॑त्सर॒ण्युः का॒रवे॑ जर॒ण्युः। विप्रः॒ प्रेष्ठः॒ स ह्ये॑षां ब॒भूव॒ परा॑ च॒ वक्ष॑दु॒त प॑र्षदेनान्॥

मुमुक्षु जनों में जब मोक्ष का इच्छुक हुआ परमात्मा की अत्यन्त स्तुति करता है, वह परमात्मा का अत्यन्त प्रिय बन जाता है और दूसरों को भी परमात्मा की स्तुति के लिए प्रेरित करता है, वह मानो संसारसागर से उन्हें पार कराता है॥२३॥

अधा॒ न्व॑स्य॒ जेन्य॑स्य पु॒ष्टौ वृथा॒ रेभ॑न्त ईमहे॒ तदू॒ नु। स॒र॒ण्युर॑स्य सू॒नुरश्वो॒ विप्र॑श्चासि॒ श्रव॑सश्च सा॒तौ॥

परमात्मा जगत् का उत्पादक, इसमें व्यापक और इसका नियन्ता है तथा हमार पोषणकर्ता है, उसके श्रवणीय यश और गुणों तथा सुखलाभ के लिए प्रार्थना करनी चाहिए॥२४॥

यु॒वोर्यदि॑ स॒ख्याया॒स्मे शर्धा॑य॒ स्तोमं॑ जुजु॒षे नम॑स्वान्। वि॒श्वत्र॒ यस्मि॒न्ना गिरः॑ समी॒चीः पू॒र्वीव॑ गा॒तुर्दाश॑त्सू॒नृता॑यै॥

उपासक को समस्त स्त्री-पुरुषों के प्रति मित्रभाव रखना चाहिए। इससे परमात्मा स्तुतियों को स्वीकार करता है-अपनाता है तथा उसे मोक्ष प्रदान करता है॥२५॥

स गृ॑णा॒नो अ॒द्भिर्दे॒ववा॒निति॑ सु॒बन्धु॒र्नम॑सा सू॒क्तैः। वर्ध॑दु॒क्थैर्वचो॑भि॒रा हि नू॒नं व्यध्वै॑ति॒ पय॑स उ॒स्रिया॑याः॥

परमात्मा जीवन्मुक्तों का इष्टदेव तथा उपासकों का बन्धु है। वह आप्त विद्वानों की स्तुतियों और सुवचनों द्वारा स्तुति में लाया जाता हुआ स्तुतिकर्ता को बढ़ाता है तथा उसे प्राप्त होता है, अध्यात्ममार्ग द्वारा-जैसे दूध को रिसानेवाली गौ के स्तनमार्ग से शीघ्र दूध प्राप्त होता है। अतः उसकी स्तुति करनी चाहिए॥२६॥

त ऊ॒ षु णो॑ म॒हो य॑जत्रा भू॒त दे॑वास ऊ॒तये॑ स॒जोषाः॑। ये वाजाँ॒ अन॑यता वि॒यन्तो॒ ये स्था नि॑चे॒तारो॒ अमू॑राः॥

मानव को अध्यात्मयाजी मुमुक्षुजनों का सङ्ग करके अपने रक्षण के लिए ज्ञान का ग्रहण करना चाहिए और मोक्ष के अमृतभोगों की प्राप्ति के लिए भी उनसे अध्यात्ममार्ग को जानना चाहिए॥२७॥

ये य॒ज्ञेन॒ दक्षि॑णया॒ सम॑क्ता॒ इन्द्र॑स्य स॒ख्यम॑मृत॒त्वमा॑न॒श। तेभ्यो॑ भ॒द्रम॑ङ्गिरसो वो अस्तु॒ प्रति॑ गृभ्णीत मान॒वं सु॑मेधसः॥

जो अध्यात्मयज्ञ और आत्मसमर्पण द्वारा अपने को सिद्ध-सुसज्जित करते हैं, वे परमात्मा के मित्र भाव और अमृतस्वरूप को प्राप्त करते हैं। वे ऐसे अन्य आत्माओं को सुख देनेवाले तथा उत्तम प्रेरणा करनेवाले एवं योग्य मनुष्य को अपने ज्ञान की शिक्षा देनेवाले कल्याण को प्राप्त होते हैं॥१॥

य उ॒दाज॑न्पि॒तरो॑ गो॒मयं॒ वस्वृ॒तेनाभि॑न्दन्परिवत्स॒रे व॒लम्। दी॒र्घा॒यु॒त्वम॑ङ्गिरसो वो अस्तु॒ प्रति॑ गृभ्णीत मान॒वं सु॑मेधसः॥

उत्तम आचार्य के अधीन विद्वान् शिष्यरूप में प्राप्त होते हैं। आचार्य उनके अज्ञान को नष्ट करके वाङ्मय ज्ञान को उत्थापित करता है। ऐसा आचार्य दीर्घजीवी होना चाहिए, जिससे संसार को लाभ पहुँचे। तथा-रश्मियाँ या किरणें सूर्य के आश्रित होती हैं। वह सूर्य अन्धकार को और मेघ को छिन्न-भिन्न करता है। उसका आग्नेय तेज संसार को प्रकाश प्रदान करता है। उसके प्रकाश का प्रदानक्रम दीर्घरूप में चलता रहे॥२॥

य ऋ॒तेन॒ सूर्य॒मारो॑हयन्दि॒व्यप्र॑थयन्पृथि॒वीं मा॒तरं॒ वि। सु॒प्र॒जा॒स्त्वम॑ङ्गिरसो वो अस्तु॒ प्रति॑ गृभ्णीत मान॒वं सु॑मेधसः॥

विद्वानों के द्वारा प्राप्त ज्ञान से श्रोता मोक्ष को प्राप्त होता है और उसके यहाँ श्रवणशील स्त्री होने से वह उत्तम सन्तान, उत्तम शिष्य को प्राप्त करता है, होता है। एवं सूर्यकिरणें तेजोधर्म सूर्य को द्युलोक में चमकाती हैं और पृथिवी के प्रथनशील होने से उस पर उत्तम वनस्पतियाँ उत्पन्न होती हैं॥३॥

अ॒यं नाभा॑ वदति व॒ल्गु वो॑ गृ॒हे देव॑पुत्रा ऋषय॒स्तच्छृ॑णोतन। सु॒ब्र॒ह्म॒ण्यम॑ङ्गिरसो वो अस्तु॒ प्रति॑ गृभ्णीत मान॒वं सु॑मेधसः॥

आरम्भ सृष्टि में योग्य चरम ऋषि मन्त्रार्थद्रष्टाओं के अन्तःकरण में परमात्मा वेद का प्रवचन करता है। वे अन्य आत्माओं को उसका उपदेश करते हैं। यह ब्रह्मप्राप्ति का सुखद साधन है॥४॥

विरू॑पास॒ इदृष॑य॒स्त इद्ग॑म्भी॒रवे॑पसः। ते अङ्गि॑रसः सू॒नव॒स्ते अ॒ग्नेः परि॑ जज्ञिरे॥

मन्त्रार्थों को जाननेवाले ऋषि मन्त्रों का यथार्थ प्रवचन किया करते हैं और वे यथार्थ कर्म का प्रतिपादन तथा आचरण करते हैं। वे ही परमात्मा के ध्यान से ऋषिरूप को धारण करते हैं, एवं मेघ में भिन्न-भिन्न रूपों में चमकनेवाले विद्युत्तरङ्गों का मेघ को गिराने का कर्म महत्त्वपूर्ण होता है॥५॥

ये अ॒ग्नेः परि॑ जज्ञि॒रे विरू॑पासो दि॒वस्परि॑। नव॑ग्वो॒ नु दश॑ग्वो॒ अङ्गि॑रस्तमो॒ सचा॑ दे॒वेषु॑ मंहते॥

ज्ञान का विशेष निरूपण करनेवाले साक्षाद्द्रष्टा ऋषि, ज्ञानपूर्ण और संयमी होकर मोक्ष के अधिकारी बनते हैं। वे विद्वानों में प्रशंसा को प्राप्त होते हैं॥६॥

इन्द्रे॑ण यु॒जा निः सृ॑जन्त वा॒घतो॑ व्र॒जं गोम॑न्तम॒श्विन॑म्। स॒हस्रं॑ मे॒ दद॑तो अष्टक॒र्ण्यः१॒॑ श्रवो॑ दे॒वेष्व॑क्रत॥

परमात्मा से सम्पर्क करनेवाले मेधावी ऋषि जन अन्य जनों को इन्द्रियों के संयम एवं मन के विकासार्थ ज्ञान का उपदेश अधिक से अधिक देते रहें॥७॥

प्र नू॒नं जा॑यताम॒यं मनु॒स्तोक्मे॑व रोहतु। यः स॒हस्रं॑ श॒ताश्वं॑ स॒द्यो दा॒नाय॒ मंह॑ते॥

ज्ञान का प्रदान करनेवाला दिनोंदिन बढ़े, छोटे बालक जिससे सहस्रगुणित ज्ञान आदान करने को समर्थ हो सकेगा॥८॥

न तम॑श्नोति॒ कश्च॒न दि॒व इ॑व॒ सान्वा॒रभ॑म्। सा॒व॒र्ण्यस्य॒ दक्षि॑णा॒ वि सिन्धु॑रिव पप्रथे॥

धन या अन्नदान से बढ़ कर ज्ञानदान है, उसका दाता उच्च स्थति को प्राप्त होता हुआ सूर्य के समान उत्कृष्ट है तथा नदी की भाँति उदार होता है, प्रसिद्ध होता है॥९॥

उ॒त दा॒सा प॑रि॒विषे॒ स्मद्दि॑ष्टी॒ गोप॑रीणसा। यदु॑स्तु॒र्वश्च॑ मामहे॥

प्रशस्त दर्शनीय बहुत विद्यावाले अध्यापक उपदेशक ज्ञान के दानियों की स्नानादि सेवा और प्रशंसा करनी चाहिए॥१०॥

स॒ह॒स्र॒दा ग्रा॑म॒णीर्मा रि॑ष॒न्मनुः॒ सूर्ये॑णास्य॒ यत॑मानैतु॒ दक्षि॑णा। साव॑र्णेर्दे॒वाः प्र ति॑र॒न्त्वायु॒र्यस्मि॒न्नश्रा॑न्ता॒ अस॑नाम॒ वाज॑म्॥

अन्नादि का दाता मनुष्यों की रक्षा करता है, परन्तु ज्ञान के दाता की दानक्रिया बढ़ती हुई सूर्य की दीप्ति के समान प्रसिद्ध हो जाती है, आयु को बढ़ाती है, उसके आश्रय ज्ञानी बन जाते हैं॥११॥

प॒रा॒वतो॒ ये दिधि॑षन्त॒ आप्यं॒ मनु॑प्रीतासो॒ जनि॑मा वि॒वस्व॑तः। य॒याते॒र्ये न॑हु॒ष्य॑स्य ब॒र्हिषि॑ दे॒वा आस॑ते॒ ते अधि॑ ब्रुवन्तु नः॥

विद्याओं में निष्णात यत्नशील वैराग्यवान् महाविद्वान् उच्च पद पर विराजमान दूर से प्राप्त ब्रह्मचारी को प्रीति से शिष्य बनाकर पढ़ावें और उपदेश संसार को देवें॥१॥

विश्वा॒ हि वो॑ नम॒स्या॑नि॒ वन्द्या॒ नामा॑नि देवा उ॒त य॒ज्ञिया॑नि वः। ये स्थ जा॒ता अदि॑तेर॒द्भ्यस्परि॒ ये पृ॑थि॒व्यास्ते म॑ इ॒ह श्रु॑ता॒ हव॑म्॥

विद्वान् जन द्युलोक में ज्ञाननिष्णात, अन्तरिक्षज्ञान में निष्णात तथा पृथिवी के ज्ञान में निष्णात होकर श्रेष्ठ कमनीय कर्म करते हैं, उनसे ज्ञानग्रहण और सत्सङ्गलाभ लेना चाहिए॥२॥

येभ्यो॑ मा॒ता मधु॑म॒त्पिन्व॑ते॒ पयः॑ पी॒यूषं॒ द्यौरदि॑ति॒रद्रि॑बर्हाः। उ॒क्थशु॑ष्मान्वृषभ॒रान्त्स्वप्न॑स॒स्ताँ आ॑दि॒त्याँ अनु॑ मदा स्व॒स्तये॑॥

ज्ञानप्रकाशमान जगत् का रचयिता परमात्मा जिन अखण्डित ब्रह्मचारियों को वेदज्ञान अमृत मोक्ष प्रदान करता है, उनको प्रत्येक प्रकार से अपने कल्याणार्थ तृप्त करना चाहिए॥३॥

नृ॒चक्ष॑सो॒ अनि॑मिषन्तो अ॒र्हणा॑ बृ॒हद्दे॒वासो॑ अमृत॒त्वमा॑नशुः। ज्यो॒तीर॑था॒ अहि॑माया॒ अना॑गसो दि॒वो व॒र्ष्माणं॑ वसते स्व॒स्तये॑॥

अकुण्ठित बुद्धिवाले अपने कर्त्तव्यों में अन्तर न करनेवाले पापरहित होकर मोक्षसुख को प्राप्त करते हैं और संसार में भी कल्याण को, जो अपने ऊपर आच्छादित है॥४॥

स॒म्राजो॒ ये सु॒वृधो॑ य॒ज्ञमा॑य॒युरप॑रिह्वृता दधि॒रे दि॒वि क्षय॑म्। ताँ आ वि॑वास॒ नम॑सा सुवृ॒क्तिभि॑र्म॒हो आ॑दि॒त्याँ अदि॑तिं स्व॒स्तये॑॥

जो ज्ञानवृद्ध और गुणवृद्ध तथा कामादि दोषों से रहित मोक्ष के अधिकारी जीवन्मुक्त महानुभाव हैं, उनकी सङ्गति करनी चाहिए अपनी कल्याण कामना के लिए॥५॥

को वः॒ स्तोमं॑ राधति॒ यं जुजो॑षथ॒ विश्वे॑ देवासो मनुषो॒ यति॒ ष्ठन॑। को वो॑ऽध्व॒रं तु॑विजाता॒ अरं॑ कर॒द्यो नः॒ पर्ष॒दत्यंहः॑ स्व॒स्तये॑॥

विद्वानों के पास जाकर के अपने कल्याणार्थ उनसे जिज्ञासा प्रकट करे और कहे कि आप महानुभाव समस्त विद्याओं में प्रविष्ट हो, हम कैसे पाप से पृथक् रहें और परमात्मा का साक्षात्कार कैसे करें, यह हमें समझाइये, जिससे हम कल्याण को प्राप्त कर सकें॥६॥

येभ्यो॒ होत्रां॑ प्रथ॒मामा॑ये॒जे मनुः॒ समि॑द्धाग्नि॒र्मन॑सा स॒प्त होतृ॑भिः। त आ॑दित्या॒ अभ॑यं॒ शर्म॑ यच्छत सु॒गा नः॑ कर्त सु॒पथा॑ स्व॒स्तये॑॥

ऐसे जीवन्मुक्त, जिन्होंने मन बुद्धि चित्त अहङ्कार श्रोत्र नेत्र और वाणी को परमात्मा में समर्पित किया हुआ है, उनसे वेद का ज्ञान तथा वेदोक्त स्तुति का शिक्षण लेकर अपने अन्दर परमात्मा का साक्षात् करे, यह कल्याण का साधन है॥७॥

य ईशि॑रे॒ भुव॑नस्य॒ प्रचे॑तसो॒ विश्व॑स्य स्था॒तुर्जग॑तश्च॒ मन्त॑वः। ते नः॑ कृ॒तादकृ॑ता॒देन॑स॒स्पर्य॒द्या दे॑वासः पिपृता स्व॒स्तये॑॥

मननशील सावधान विद्वान् अथवा परमात्मा सब उत्पन्न हुए स्थावर जङ्गम के जाननेवाले होते हैं। वे हमें वर्तमान और भविष्य में होनेवाले पापों से हमारे कल्याण के लिए हमें सावधान किया करते हैं। उनके उपदेश और सङ्गति में जीवन बिताना चाहिए॥८॥

भरे॒ष्विन्द्रं॑ सु॒हवं॑ हवामहेंऽहो॒मुचं॑ सु॒कृतं॒ दैव्यं॒ जन॑म्। अ॒ग्निं मि॒त्रं वरु॑णं सा॒तये॒ भगं॒ द्यावा॑पृथि॒वी म॒रुतः॑ स्व॒स्तये॑॥

कामवासना आदि दोषों से बचने के लिए तथा सुख शान्ति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रेरक धारक ज्ञानदाता परमात्मा की शरण लेनी चाहिए और उसकी स्तुति प्रार्थना उपासना करनी चाहिए॥९॥

सु॒त्रामा॑णं पृथि॒वीं द्याम॑ने॒हसं॑ सु॒शर्मा॑ण॒मदि॑तिं सु॒प्रणी॑तिम्। दैवीं॒ नावं॑ स्वरि॒त्रामना॑गस॒मस्र॑वन्ती॒मा रु॑हेमा स्व॒स्तये॑॥

मुक्ति संसारसागर से त्राण करनेवाली, उत्तम सुख देनेवाली, आत्मा को अपने स्वरूप में लानेवाली आदि सद्गुणों से युक्त दिव्य नौका के समान है। उसे हमें प्राप्त करना चाहिए॥१०॥

विश्वे॑ यजत्रा॒ अधि॑ वोचतो॒तये॒ त्राय॑ध्वं नो दु॒रेवा॑या अभि॒ह्रुतः॑। स॒त्यया॑ वो दे॒वहू॑त्या हुवेम शृण्व॒तो दे॑वा॒ अव॑से स्व॒स्तये॑॥

विद्याओं में निष्णात विद्वानों के पास शिष्यभाव से उपस्थित होकर विद्या ग्रहण करनी चाहिए। अपनी दुर्वासनाओं या दुष्प्रवृत्तियों को उनकी सङ्गति द्वारा दूर करना चाहिए। उनकी प्रशंसा अपने कल्याण के लिए-सद्भाव से करनी चाहिए॥११॥

अपामी॑वा॒मप॒ विश्वा॒मना॑हुति॒मपारा॑तिं दुर्वि॒दत्रा॑मघाय॒तः। आ॒रे दे॑वा॒ द्वेषो॑ अ॒स्मद्यु॑योतनो॒रु णः॒ शर्म॑ यच्छता स्व॒स्तये॑॥

विद्वानों से आत्मिक मानसिक शारीरिक दोषों को दूर करने के लिए नम्र प्रार्थना करनी चाहिए, जिससे सब प्रकार की सुख शान्ति और निरोगता प्राप्त हो सके॥१२॥

अरि॑ष्टः॒ स मर्तो॒ विश्व॑ एधते॒ प्र प्र॒जाभि॑र्जायते॒ धर्म॑ण॒स्परि॑। यमा॑दित्यासो॒ नय॑था सुनी॒तिभि॒रति॒ विश्वा॑नि दुरि॒ता स्व॒स्तये॑॥

अखण्ड ज्ञान ब्रह्मचर्यवाले विद्वानों के उपदेश व बताये हुए सदाचरण में जो मनुष्य रहता है, वह पाप से बचकर स्वस्थ रहता है और सन्तानों का सुख प्राप्त करता है॥१३॥

यं दे॑वा॒सोऽव॑थ॒ वाज॑सातौ॒ यं शूर॑साता मरुतो हि॒ते धने॑। प्रा॒त॒र्यावा॑णं॒ रथ॑मिन्द्र सान॒सिमरि॑ष्यन्त॒मा रु॑हेमा स्व॒स्तये॑॥

जीवन्मुक्त विद्वानों के सङ्ग से अमृत अन्न भोग प्राप्ति और पापरहित शुद्ध वृत्ति सम्पादन के लिए उपदेश ग्रहण करना चाहिए। उससे परमात्मा पूर्ण ब्रह्मचर्य से सम्पन्न को मुक्तिसुख प्रदान करता है॥१४॥

स्व॒स्ति नः॑ प॒थ्या॑सु॒ धन्व॑सु स्व॒स्त्य१॒॑प्सु वृ॒जने॒ स्व॑र्वति। स्व॒स्ति नः॑ पुत्रकृ॒थेषु॒ योनि॑षु स्व॒स्ति रा॒ये म॑रुतो दधातन॥

जीवन्मुक्त विद्वानों के शिक्षण से अपने मार्गों में आये मरुस्थलों, जलस्थलों, सन्तानोत्पत्तिवाले गृहस्थलों, धनप्रसङ्गों, दुःखरहित मोक्षों को सुखमय बनाना चाहिए॥१५॥

स्व॒स्तिरिद्धि प्रप॑थे॒ श्रेष्ठा॒ रेक्ण॑स्वत्य॒भि या वा॒ममेति॑। सा नो॑ अ॒मा सो अर॑णे॒ नि पा॑तु स्वावे॒शा भ॑वतु दे॒वगो॑पा॥

विद्वानों द्वारा कल्याणभावना तथा रक्षा जीवन के प्रारम्भिक मार्ग पर, घर में अथवा जंगल में हमें सदा प्राप्त होती रहे, ऐसा सदा यत्न करना चाहिए॥१६॥

ए॒वा प्ल॒तेः सू॒नुर॑वीवृधद्वो॒ विश्व॑ आदित्या अदिते मनी॒षी। ई॒शा॒नासो॒ नरो॒ अम॑र्त्ये॒नास्ता॑वि॒ जनो॑ दि॒व्यो गये॑न॥

अखण्डित ज्ञान और ब्रह्मचर्य से सम्पन्न, सब विषयों में निष्णात, जीवन्मुक्त, संसारसागर से पार होने और अन्यों को विद्यासम्पन्न बनाने के लिए सर्वज्ञ परमात्मा के द्वारा या उससे प्रेरित संसार में पदार्पण करते हैं॥१७॥

क॒था दे॒वानां॑ कत॒मस्य॒ याम॑नि सु॒मन्तु॒ नाम॑ शृण्व॒तां म॑नामहे। को मृ॑ळाति कत॒मो नो॒ मय॑स्करत्कत॒म ऊ॒ती अ॒भ्या व॑वर्तति॥

मनुष्य को यह विचार करना चाहिए कि इस संसारयात्रा में या जीवनयात्रा में सच्चा साथी कौन है। कौन देव मानने और स्मरण करने योग्य है। कौन सुख पहुँचाता है। कौन हमारा सच्चा रक्षक है तथा जीवन को सहारा देता है। ऐसा विवेचन करके जो इष्टदेव परमात्मा सिद्ध होता है, उसकी शरण लेनी चाहिए॥१॥

क्र॒तू॒यन्ति॒ क्रत॑वो हृ॒त्सु धी॒तयो॒ वेन॑न्ति वे॒नाः प॒तय॒न्त्या दिशः॑। न म॑र्डि॒ता वि॑द्यते अ॒न्य ए॑भ्यो दे॒वेषु॑ मे॒ अधि॒ कामा॑ अयंसत॥

मनुष्यों के अन्दर कुछ भावनात्मक शक्तियाँ काम करती रहती हैं। जैसे मन आदि के अन्दर सङ्कल्पधाराएँ उठती हैं। कामनाएँ जैसे प्रवृत्त होती रहती हैं, नाना प्रकार की बुद्धियाँ भी चलती हैं, अनेक उद्देश्य दिशाएँ भी उभरती रहती हैं। यद्यपि ये सब मनुष्य के सुख साधन के लिए होती हैं, फिर भी विद्वानों की सङ्गति से उनको और अधिक उत्कृष्ट बनाना चाहिए, जिससे वे अधिक सुखदायी बनें॥२॥

नरा॑ वा॒ शंसं॑ पू॒षण॒मगो॑ह्यम॒ग्निं दे॒वेद्ध॑म॒भ्य॑र्चसे गि॒रा। सूर्या॒मासा॑ च॒न्द्रम॑सा य॒मं दि॒वि त्रि॒तं वात॑मु॒षस॑म॒क्तुम॒श्विना॑॥

परमात्मा समस्त देवों के गुणों से युक्त है। वह मनुष्यों तथा ऋषियों द्वारा स्तुति करने योग्य और साक्षात् करने योग्य है॥३॥

क॒था क॒विस्तु॑वी॒रवा॒न्कया॑ गि॒रा बृह॒स्पति॑र्वावृधते सुवृ॒क्तिभिः॑। अ॒ज एक॑पात्सु॒हवे॑भि॒ॠक्व॑भि॒रहिः॑ शृणोतु बु॒ध्न्यो॒३॒॑ हवी॑मनि॥

वेदज्ञान का स्वामी परमात्मा स्तुति प्रार्थनाओं द्वारा जब स्तुत किया जाता है, तो वह किसी न किसी प्रकार स्तोता के अन्तरात्मा में सक्षात् होता है और वेदोक्त स्तुति प्रार्थनाओं को अवश्य स्वीकार करता है॥४॥

दक्ष॑स्य वादिते॒ जन्म॑नि व्र॒ते राजा॑ना मि॒त्रावरु॒णा वि॑वाससि। अतू॑र्तपन्थाः पुरु॒रथो॑ अर्य॒मा स॒प्तहो॑ता॒ विषु॑रूपेषु॒ जन्म॑सु॥

परमात्मा के नियमानुसार कर्मफल भोगने के लिए सृष्टि के भोग्य पदार्थ चेतन तत्त्व जीवात्मा के लिए हैं, उनके भोगार्थ वह देहधारण करता है। देह में प्रथम श्वास-प्रश्वास का प्रचालन करता है, जिससे उसकी प्रतीति होती है। वह भिन्न-भिन्न विषयों में रमण साधन मन से युक्त होता है तथा समस्त शरीर में अपनी चेतना का प्रसार प्राणों द्वारा करता है। वह शरीर का स्वामी भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म पाता है। आकाश में जब उषा-पीतिमा रात्रि के पश्चात् प्रकट होती है और सूर्य उदय होने को होता है, तो दिनरात युगलरूप में उनसे सङ्गत हुए प्रतीत होते हैं। सूर्य अपनी सात रङ्ग की किरणों से आकाशमण्डल में प्रकाश फैलाता है और प्रतिदिन भिन्न-भिन्न स्थितियों में उदय होता रहता है॥५॥

ते नो॒ अर्व॑न्तो हवन॒श्रुतो॒ हवं॒ विश्वे॑ शृण्वन्तु वा॒जिनो॑ मि॒तद्र॑वः। स॒ह॒स्र॒सा मे॒धसा॑ताविव॒ त्मना॑ म॒हो ये धनं॑ समि॒थेषु॑ जभ्रि॒रे॥

ऊँचे विद्वान् शास्त्र अनुसार आचरण करते हैं। वे ज्ञानप्राप्त कराने की प्रार्थना को अवश्य स्वीकार करते हैं। जब कोई इनकी गोष्ठी में शिष्यभाव से आता है या आवे और जो अज्ञान आदि के साथ संग्राम करने का इच्छुक होता है, उसे वे ज्ञान प्रदान करते हैं॥६॥

प्र वो॑ वा॒युं र॑थ॒युजं॒ पुरं॑धिं॒ स्तोमैः॑ कृणुध्वं स॒ख्याय॑ पू॒षण॑म्। ते हि दे॒वस्य॑ सवि॒तुः सवी॑मनि॒ क्रतुं॒ सच॑न्ते स॒चितः॒ सचे॑तसः॥

जीवन्मुक्त विद्वान् परमात्मा की मित्रता करने के लिए उसका स्तुतियों द्वारा सत्कार करते हैं, जो कि मोक्ष का प्रदान करनेवाला है। उस ऐसे परमात्मा को अपना इष्टदेव मान कर ही उसकी प्राप्ति के लिए सदाचरण किया करते हैं॥७॥

त्रिः स॒प्त स॒स्रा न॒द्यो॑ म॒हीर॒पो वन॒स्पती॒न्पर्व॑ताँ अ॒ग्निमू॒तये॑। कृ॒शानु॒मस्तॄ॑न्ति॒ष्यं॑ स॒धस्थ॒ आ रु॒द्रं रु॒द्रेषु॑ रु॒द्रियं॑ हवामहे॥

तीनों लोकों में फैली हुई सूर्य की रश्मियों तथा नदी और जलधाराओं, पर्वतों, विद्युत्, अग्नि, सूर्य मेघक्षेपक हवाओं का उपयोग विशेष विज्ञान तथा होम के द्वारा लेना चाहिए॥८॥

सर॑स्वती स॒रयुः॒ सिन्धु॑रू॒र्मिभि॑र्म॒हो म॒हीरव॒सा य॑न्तु॒ वक्ष॑णीः। दे॒वीरापो॑ मा॒तरः॑ सूदयि॒त्न्वो॑ घृ॒तव॒त्पयो॒ मधु॑मन्नो अर्चत॥

आकाश में मेघधाराएँ अन्तरिक्ष में वर्षा और पृथिवी पर बहती हुई नदियाँ हमारी रक्षा के निमित्त हैं। पृथिवी पर वर्तमान सारे जल अन्न को निर्माण करनेवाली तेजस्वी एवं मधुर होते हुए हमें तृप्त करते हैं। इनका हम उपयोग करें और इनके रचयिता परमात्मा का धन्यवाद करें॥९॥

उ॒त मा॒ता बृ॑हद्दि॒वा शृ॑णोतु न॒स्त्वष्टा॑ दे॒वेभि॒र्जनि॑भिः पि॒ता वचः॑। ऋ॒भु॒क्षा वाजो॒ रथ॒स्पति॒र्भगो॑ र॒ण्वः शंसः॑ शशमा॒नस्य॑ पातु नः॥

परमात्मा अपनी उत्पादनशक्तियों द्वारा जगत् की माता और पिता है। वह कर्मानुसार शरीर का निर्माण करता है। मेधावी जनों को बसाने वाला, स्तुति करनेवालों का स्तुतियोग्य मोक्षदाता है॥१०॥

र॒ण्वः संदृ॑ष्टौ पितु॒माँ इ॑व॒ क्षयो॑ भ॒द्रा रु॒द्राणां॑ म॒रुता॒मुप॑स्तुतिः। गोभिः॑ ष्याम य॒शसो॒ जने॒ष्वा सदा॑ देवास॒ इळ॑या सचेमहि॥

परमात्मा रमणीय आनन्दभण्डार है। वह जीवन्मुक्त विद्वानों की अनुमोदनीय कल्याणकारी आशा है। उसकी स्तुति द्वारा मनुष्यों में यश और प्रसिद्धि के पात्र बन जाते हैं॥११॥

यां मे॒ धियं॒ मरु॑त॒ इन्द्र॒ देवा॒ अद॑दात वरुण मित्र यू॒यम्। तां पी॑पयत॒ पय॑सेव धे॒नुं कु॒विद्गिरो॒ अधि॒ रथे॒ वहा॑थ॥

जिज्ञासु को जीवन्मुक्तों, अध्यापकों, उपदेशकों एवं प्रमुख आचार्यों से शिक्षण पाकर अपनी ज्ञान-शक्ति और कर्मशक्ति को बढ़ाना चाहिए। अन्त में मोक्ष का अधिकारी बने॥१२॥

कु॒विद॒ङ्ग प्रति॒ यथा॑ चिद॒स्य नः॑ सजा॒त्य॑स्य मरुतो॒ बुबो॑धथ। नाभा॒ यत्र॑ प्रथ॒मं सं॒नसा॑महे॒ तत्र॑ जामि॒त्वमदि॑तिर्दधातु नः॥

जीवन्मुक्त विद्वानों के पास जाकर वह ज्ञानग्रहण करना चाहिए, जिससे परमात्मा के साथ स्थायी सम्बन्ध बन जावे। वह अपना सम्बन्धी बनाकर मोक्ष का प्रमुख सुख दे सके और सदा विद्वानों का सहयोग मिलता रहे॥१३॥

ते हि द्यावा॑पृथि॒वी मा॒तरा॑ म॒ही दे॒वी दे॒वाञ्जन्म॑ना य॒ज्ञिये॑ इ॒तः। उ॒भे बि॑भृत उ॒भयं॒ भरी॑मभिः पु॒रू रेतां॑सि पि॒तृभि॑श्च सिञ्चतः॥

द्युलोक और पृथिवीलोक स्त्री-पुरुष के समान एक दूसरे को अपेक्षित करते हैं। वे दोनों रजवीर्य शक्तियों के द्वारा प्राणिवनस्पतियों को उत्पन्न करते हैं तथा उन्हें धारण करते हैं और पोषण करते हैं॥१४॥

वि षा होत्रा॒ विश्व॑मश्नोति॒ वार्यं॒ बृह॒स्पति॑र॒रम॑तिः॒ पनी॑यसी। ग्रावा॒ यत्र॑ मधु॒षुदु॒च्यते॑ बृ॒हदवी॑वशन्त म॒तिभि॑र्मनी॒षिणः॑॥

वेदवाणी समस्त पदार्थों में व्याप्त है अर्थात् उनके गुण और स्वरूपों का वर्णन करती है, वह मनुष्यवाणी के समान प्रतिहत नहीं होती, वह यथार्थ वाणी है। उसमें निष्णात विद्वान् ज्ञानमधु का सेवन करता है और बढ़ता चला जाता है॥१५॥

ए॒वा क॒विस्तु॑वी॒रवाँ॑ ऋत॒ज्ञा द्र॑विण॒स्युर्द्रवि॑णसश्चका॒नः। उ॒क्थेभि॒रत्र॑ म॒तिभि॑श्च॒ विप्रोऽपी॑पय॒द्गयो॑ दि॒व्यानि॒ जन्म॑॥

मेधावी विद्वान् ज्ञान ऐश्वर्य से सम्पन्न होकर संसार में विविध सम्पत्ति को चाहता हुआ उपार्जित तथा प्राप्त करता है। उससे अपने को तृप्त करता हुआ योग्य आचरणवाला होकर मोक्षसुखों का अधिकारी बनता है॥१६॥

ए॒वा प्ल॒तेः सू॒नुर॑वीवृधद्वो॒ विश्व॑ आदित्या अदिते मनी॒षी। ई॒शा॒नासो॒ नरो॒ अम॑र्त्ये॒नास्ता॑वि॒ जनो॑ दि॒व्यो गये॑न॥

अखण्डित ज्ञान और ब्रह्मचर्य से सम्पन्न, सब विषयों में निष्णात, जीवन्मुक्त, संसारसागर से पार होने और अन्यों को विद्यासम्पन्न बनाने के लिए सर्वज्ञ परमात्मा के द्वारा या उससे प्रेरित संसार में पदार्पण करते हैं॥१७॥

अ॒ग्निरिन्द्रो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा वा॒युः पू॒षा सर॑स्वती स॒जोष॑सः। आ॒दि॒त्या विष्णु॑र्म॒रुतः॒ स्व॑र्बृ॒हत्सोमो॑ रु॒द्रो अदि॑ति॒र्ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑॥

पृथिवी से लेकर आकाशपर्यन्त पदार्थों को तथा परमात्मा और मुक्ति का स्वरूप मनुष्य को जानना चाहिए। जानकर यथायोग्य लाभ लेना, परमात्मा की स्तुति प्रार्थना उपासना करना, अन्त में मुक्ति को पाना मानव का लक्ष्य है॥१॥

इ॒न्द्रा॒ग्नी वृ॑त्र॒हत्ये॑षु॒ सत्प॑ती मि॒थो हि॑न्वा॒ना त॒न्वा॒३॒॑ समो॑कसा। अ॒न्तरि॑क्षं॒ मह्या प॑प्रु॒रोज॑सा॒ सोमो॑ घृत॒श्रीर्म॑हि॒मान॑मी॒रय॑न्॥

अज्ञान नाश करने के लिए अग्नि और वायु, ये दो महान् शक्तिशाली पदार्थ हैं। समस्त वस्तुओं के यथार्थ स्वरूप को दर्शाते हैं। किसी यन्त्र में प्रयुक्त होकर बड़ा कार्य करते हैं। इसी प्रकार चन्द्रमा भी ओषधियों में रस प्रेरित करता है। इन सबका ज्ञान वर्णन करने में समर्थ होना चाहिए॥२॥

तेषां॒ हि म॒ह्ना म॑ह॒ताम॑न॒र्वणां॒ स्तोमाँ॒ इय॑र्म्यृत॒ज्ञा ऋ॑ता॒वृधा॑म्। ये अ॑प्स॒वम॑र्ण॒वं चि॒त्ररा॑धस॒स्ते नो॑ रासन्तां म॒हये॑ सुमि॒त्र्याः॥

मन्त्रोक्त विविध पदार्थों के विज्ञान द्वारा अनेक कलाकौशलों का आविष्कार करना चाहिए और अनेक मित्र सहयोगियों के सहयोग से इस कार्य को प्रगति देनी चाहिए॥३॥

स्व॑र्णरम॒न्तरि॑क्षाणि रोच॒ना द्यावा॒भूमी॑ पृथि॒वीं स्क॑म्भु॒रोज॑सा। पृ॒क्षा इ॑व म॒हय॑न्तः सुरा॒तयो॑ दे॒वाः स्त॑वन्ते॒ मनु॑षाय सू॒रयः॑॥

सृष्टि के महत्त्ववाले पदार्थों का स्वयं क्रियात्मक ज्ञान करके जो दूसरों को भी ज्ञान देते हैं, वे महानुभाव धन्य हैं॥४॥

मि॒त्राय॑ शिक्ष॒ वरु॑णाय दा॒शुषे॒ या स॒म्राजा॒ मन॑सा॒ न प्र॒युच्छ॑तः। ययो॒र्धाम॒ धर्म॑णा॒ रोच॑ते बृ॒हद्ययो॑रु॒भे रोद॑सी॒ नाध॑सी॒ वृतौ॑॥

परमात्मा मनुष्य को संसार में कर्म करने के लिए प्रेरित करता है और मोक्ष में सुख देने के लिए ग्रहण करता है। ऐसे उस दाता के प्रति अपना समर्पण करना चाहिए। वह परमात्मा कभी भी कर्मफल देने में प्रमाद नहीं करता है और द्यावापृथिवी उसके शासन में चलते हैं॥५॥

या गौर्व॑र्त॒निं प॒र्येति॑ निष्कृ॒तं पयो॒ दुहा॑ना व्रत॒नीर॑वा॒रतः॑। सा प्र॑ब्रुवा॒णा वरु॑णाय दा॒शुषे॑ दे॒वेभ्यो॑ दाशद्ध॒विषा॑ वि॒वस्व॑ते॥

वाणी सत्यत्व को प्राप्त करती है। बिना रुकावट के ज्ञानरूप दूध को दुहती हुई व्यवहार चलानेवाली है। इस वाणी से परमात्मा की स्तुति आदि की जाती है और अग्नि आदि देवों का गुणवर्णन किया जाता है, इसका उचित प्रयोग करना चाहिए॥६॥

दि॒वक्ष॑सो अग्निजि॒ह्वा ऋ॑ता॒वृध॑ ऋ॒तस्य॒ योनिं॑ विमृ॒शन्त॑ आसते। द्यां स्क॑भि॒त्व्य१॒॑प आ च॑क्रु॒रोज॑सा य॒ज्ञं ज॑नि॒त्वी त॒न्वी॒३॒॑ नि मा॑मृजुः॥

जो ज्ञान में परिपक्व और वक्ताजन होते हैं, वे परमात्मा का मनन करते हैं, उसे सारे ज्ञानों का मूल मानते हैं। ऐसे महानुभाव ज्ञान के वर्धक और सत्य के प्रचारक होते हुए अपने आत्मा को अध्यात्मयज्ञ के द्वारा पवित्र एवं अलङ्कृत करते हैं॥७॥

प॒रि॒क्षिता॑ पि॒तरा॑ पूर्व॒जाव॑री ऋ॒तस्य॒ योना॑ क्षयतः॒ समो॑कसा। द्यावा॑पृथि॒वी वरु॑णाय॒ सव्र॑ते घृ॒तव॒त्पयो॑ महि॒षाय॑ पिन्वतः॥

जगत् की सीमा पर ऊपर नीचे द्युलोक और पृथिवीलोक परमात्मा के आश्रय से वर्तमान हैं। समस्त प्राणिमात्र के लिए वे तेजस्वी जीवनधारक रस को सींचते हैं॥८॥

प॒र्जन्या॒वाता॑ वृष॒भा पु॑री॒षिणे॑न्द्रवा॒यू वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा। दे॒वाँ आ॑दि॒त्याँ अदि॑तिं हवामहे॒ ये पार्थि॑वासो दि॒व्यासो॑ अ॒प्सु ये॥

सुखवर्षक मेघ और वायु तथा जलमय विद्युत् और वायु, सूर्य का प्रक्षेपणधर्म और आकर्षणधर्म तथा सूर्य एवं पृथिवी के वनस्पति आदि पदार्थ, अन्तरिक्ष के स्तर दिशाएँ और द्युलोक के ग्रह तारे आदि हमारे उपयोगी एवं ज्ञानवृद्धि के लिए सिद्ध हों॥९॥

त्वष्टा॑रं वा॒युमृ॑भवो॒ य ओह॑ते॒ दैव्या॒ होता॑रा उ॒षसं॑ स्व॒स्तये॑। बृह॒स्पतिं॑ वृत्रखा॒दं सु॑मे॒धस॑मिन्द्रि॒यं सोमं॑ धन॒सा उ॑ ईमहे॥

मेधावी जन प्रतिदिन उषा वेला में अग्नि और वायु के द्वारा होम सम्पादन करें, स्वास्थ्य रक्षा के लिए। अध्यात्मयज्ञ अर्थात् संध्या के द्वारा परमात्मा की उपासना करके अध्यात्मधन-आत्मशान्ति का लाभ लें॥१०॥

ब्रह्म॒ गामश्वं॑ ज॒नय॑न्त॒ ओष॑धी॒र्वन॒स्पती॑न्पृथि॒वीं पर्व॑ताँ अ॒पः। सूर्यं॑ दि॒वि रो॒हय॑न्तः सु॒दान॑व॒ आर्या॑ व्र॒ता वि॑सृ॒जन्तो॒ अधि॒ क्षमि॑॥

सूर्य की किरणें कल्याण का प्रसार करनेवाली हैं। उनके द्वारा  पृथिवी में पौष्टिक शक्ति तथा अन्न की उत्पत्ति, गौ अश्व आदि प्राणियों में उपयोगी बल और कार्यशक्ति आती है। साधारण ओषधियाँ और फलवाले वृक्ष भी इनसे बल पाते हैं। सूर्य को आकाश में चमकाती हैं। रोगनिवृत्ति आदि श्रेष्ठ कर्मों में इनका प्रभावशाली उपयोग होता है॥११॥

भु॒ज्युमंह॑सः पिपृथो॒ निर॑श्विना॒ श्यावं॑ पु॒त्रं व॑ध्रिम॒त्या अ॑जिन्वतम्। क॒म॒द्युवं॑ विम॒दायो॑हथुर्यु॒वं वि॑ष्णा॒प्वं१॒॑ विश्व॑का॒याव॑ सृजथः॥

ज्योतिर्मय और रसमय शक्तियाँ-आग्नेय और सौम्य शक्तियाँ तथा योग्य स्त्री-पुरुष कृषिभूमि में बीज की वृद्धि के लिए उपयुक्त कार्य करें। कृषक को तथा व्यापारी को प्रोत्साहित करना चाहिए, जिससे कृषि तथा व्यापार भलीभाँति फलें-फूलें। इसकी सिद्धि के लिए वृष्टियोग भी सम्पन्न करना चाहिए॥१२॥

पावी॑रवी तन्य॒तुरेक॑पाद॒जो दि॒वो ध॒र्ता सिन्धु॒रापः॑ समु॒द्रियः॑। विश्वे॑ दे॒वासः॑ शृणव॒न्वचां॑सि मे॒ सर॑स्वती स॒ह धी॒भिः पुरं॑ध्या॥

अज्ञाननाशक परमात्मा की वेदवाणी अपने ज्ञान से मनुष्यों का उपकार करती है। मोक्ष का धारक परमात्मा तथा आप्त विद्वान् तथा ज्ञानवती नारी यथायोग्य आचरणों से मेरे निवेदनों को स्वीकार करें। एवं-द्युलोक का धारक सूर्यदेव और उसकी शक्ति और विद्युत् हमारे उपयोग में आवें। जल ऋतुएँ और नदियाँ हमारे लिए लाभप्रद बनें॥१३॥

विश्वे॑ दे॒वाः स॒ह धी॒भिः पुरं॑ध्या॒ मनो॒र्यज॑त्रा अ॒मृता॑ ऋत॒ज्ञाः। रा॒ति॒षाचो॑ अभि॒षाचः॑ स्व॒र्विदः॒ स्व१॒॑र्गिरो॒ ब्रह्म॑ सू॒क्तं जु॑षेरत॥

सब विषयों में प्रविष्ट विद्वान् यथार्थ कर्मों का उपदेश और बुद्धि को प्रदान किया करते हैं। वे जीवन्मुक्त ज्ञानी साक्षात् ब्रह्मज्ञान में प्रवृत्त करते हैं। एवं सर्वत्र बहनेवाली हवाएँ कर्मशील बनने के लिए प्रेरित करती हैं। स्थिर जीवन का निमित्त बनती हैं। तथा वायु से अनेक शब्दसंचार के कार्य सम्पन्न किये जाते हैं॥१४॥

दे॒वान्वसि॑ष्ठो अ॒मृता॑न्ववन्दे॒ ये विश्वा॒ भुव॑ना॒भि प्र॑त॒स्थुः। ते नो॑ रासन्तामुरुगा॒यम॒द्य यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

नव स्नातक विद्वान् को अपनी विद्यावृद्धि के लिए अन्य ऊँचे विद्वानों, जीवन्मुक्तों से ज्ञानवृद्धि करके आत्मशान्ति प्राप्त करनी चाहिए, जो सबसे उत्कृष्ट वस्तु है॥१५॥

दे॒वान्हु॑वे बृ॒हच्छ्र॑वसः स्व॒स्तये॑ ज्योति॒ष्कृतो॑ अध्व॒रस्य॒ प्रचे॑तसः। ये वा॑वृ॒धुः प्र॑त॒रं वि॒श्ववे॑दस॒ इन्द्र॑ज्येष्ठासो अ॒मृता॑ ऋता॒वृधः॑॥

बहुश्रुत, ज्ञानज्योति का प्रसार करनेवाले, आध्यात्मिक, परमात्मा को श्रेष्ठ उपास्य माननेवाले महाविद्वानों को समय-समय पर आमन्त्रित करके ज्ञानलाभ लेना चाहिए, जो जीवन को उत्तरोत्तर उन्नतिपथ पर ले जावें॥१॥

इन्द्र॑प्रसूता॒ वरु॑णप्रशिष्टा॒ ये सूर्य॑स्य॒ ज्योति॑षो भा॒गमा॑न॒शुः। म॒रुद्ग॑णे वृ॒जने॒ मन्म॑ धीमहि॒ माघो॑ने य॒ज्ञं ज॑नयन्त सू॒रयः॑॥

जो राजा से प्रेरित-प्रोत्साहित, श्रेष्ठ विद्वानों से शिक्षा पाये हुए, प्रखर ज्ञानप्रकाश को  प्राप्त हुए, परमात्मा के उपासक विद्वान् हैं, उनसे व्यवहारज्ञान और परमात्मज्ञान प्राप्त करके अभ्युदय और निःश्रेयस को पाना चाहिए॥२॥

इन्द्रो॒ वसु॑भिः॒ परि॑ पातु नो॒ गय॑मादि॒त्यैर्नो॒ अदि॑तिः॒ शर्म॑ यच्छतु। रु॒द्रो रु॒द्रेभि॑र्दे॒वो मृ॑ळयाति न॒स्त्वष्टा॑ नो॒ ग्नाभिः॑ सुवि॒ताय॑ जिन्वतु॥

परमात्मा वेदवाणियों के द्वारा हमारी आत्मस्थिति को ठीक करता है और उपदेशक विद्वान् अपने उपदेशों से हमें अच्छे मार्ग पर लाता है तथा राजा हमारे घरों को धनधान्य से पूर्ण करता है। एवं-वायु हमारे प्राणों का संचालन करता है, सूर्य रश्मियों द्वारा हमें सुखी करता है और अग्नि ज्वालाओं द्वारा हमारे कार्यों को सिद्ध करता है॥३॥

अदि॑ति॒र्द्यावा॑पृथि॒वी ऋ॒तं म॒हदिन्द्रा॒विष्णू॑ म॒रुतः॒ स्व॑र्बृ॒हत्। दे॒वाँ आ॑दि॒त्याँ अव॑से हवामहे॒ वसू॑न्रु॒द्रान्त्स॑वि॒तारं॑ सु॒दंस॑सम्॥

मनुष्य को अपनी रक्षार्थ माता-पिता, आचार्य, वैज्ञानिक, व्यावहारिक, उपदेशक, आदि महानुभावों के अनुभवों और ज्ञानों से लाभ उठाना चाहिए तथा परमरक्षक परमात्मा की उपासना से अध्यात्मलाभ लेना चाहिए॥४॥

सर॑स्वान्धी॒भिर्वरु॑णो धृ॒तव्र॑तः पू॒षा विष्णु॑र्महि॒मा वा॒युर॒श्विना॑। ब्र॒ह्म॒कृतो॑ अ॒मृता॑ वि॒श्ववे॑दसः॒ शर्म॑ नो यंसन्त्रि॒वरू॑थ॒मंह॑सः॥

राजा, सुप्रबन्ध करनेवाला पुरोहित, उत्तम याजक, उपदेशक, ब्रह्मज्ञान का अध्यापक, सुशिक्षित स्त्रीपुरुष, जीवन्मुक्त महानुभाव हमें आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक दुःखों से पृथक् रखें तथा पाप से संसारबन्धन से अलग मोक्षधाम को परमात्मा प्राप्त करावे, ऐसी आकाङ्क्षा है॥५॥

वृषा॑ य॒ज्ञो वृष॑णः सन्तु य॒ज्ञिया॒ वृष॑णो दे॒वा वृष॑णो हवि॒ष्कृतः॑। वृष॑णा॒ द्यावा॑पृथि॒वी ऋ॒ताव॑री॒ वृषा॑ प॒र्जन्यो॒ वृष॑णो वृष॒स्तुभः॑॥

परमात्मा हमारे समागम योग्य है, वह सुख की वर्षा करनेवाला हो, उसके सुखवर्षक होने पर उसकी कृपा से विद्वान्, राजा, राजसभा और प्रजा, दानी, उपासक तथा पुत्र ये सभी सुखवर्षक हों। इनके स्तुति करनेवाले उपासक भी हमारे लिए सुखों को प्राप्त करानेवाले बनें॥६॥

अ॒ग्नीषोमा॒ वृष॑णा॒ वाज॑सातये पुरुप्रश॒स्ता वृष॑णा॒ उप॑ ब्रुवे। यावी॑जि॒रे वृष॑णो देवय॒ज्यया॒ ता नः॒ शर्म॑ त्रि॒वरू॑थं॒ वि यं॑सतः॥

ज्ञानप्रकाशक और शान्तिप्रसारक विद्वान् अन्य जनों की सहायता से लोगों में ज्ञान और शान्ति का प्रसार करें, जिससे सुख की वृष्टि सर्वत्र हो॥७॥

धृ॒तव्र॑ताः क्ष॒त्रिया॑ यज्ञनि॒ष्कृतो॑ बृहद्दि॒वा अ॑ध्व॒राणा॑मभि॒श्रियः॑। अ॒ग्निहो॑तार ऋत॒सापो॑ अ॒द्रुहो॒ऽपो अ॑सृज॒न्ननु॑ वृत्र॒तूर्ये॑॥

जो मनुष्य दृढ़सङ्कल्पी, महाज्ञानी, श्रेष्ठ कर्म के आचरणकर्ता होते हैं, वे सच्चे धन के अधिकारी होते हैं तथा परमात्मा के उपासक, किसी से भी द्रोह न करनेवाले, बाहर भीतर सत्य से परिपूर्ण जो महानुभाव हैं, वे पाप को नष्ट करने के लिए यथावत् प्रयत्न कर सकते हैं॥८॥

द्यावा॑पृथि॒वी ज॑नयन्न॒भि व्र॒ताप॒ ओष॑धीर्व॒निना॑नि य॒ज्ञिया॑। अ॒न्तरि॑क्षं॒ स्व१॒॑रा प॑प्रुरू॒तये॒ वशं॑ दे॒वास॑स्त॒न्वी॒३॒॑ नि मा॑मृजुः॥

विद्वानों को चाहिए कृषि और उद्यानों में गोधूम आदि अन्नों और विविध फलों को पुष्ट मधुररूप से उत्पन्न करें तथा उनके द्वारा यज्ञों को रचाकर स्वास्थ्य प्राप्त करें और जनता के स्वास्थ्य को सम्पन्न करें, निर्मल विशुद्ध विचारों का प्रचार करें॥९॥

ध॒र्तारो॑ दि॒व ऋ॒भवः॑ सु॒हस्ता॑ वातापर्ज॒न्या म॑हि॒षस्य॑ तन्य॒तोः। आप॒ ओष॑धीः॒ प्र ति॑रन्तु नो॒ गिरो॒ भगो॑ रा॒तिर्वा॒जिनो॑ यन्तु मे॒ हव॑म्॥

महान् ज्ञानप्रकाशवाले परमात्मा की ज्ञानरश्मियाँ तथा सूर्य की प्रकाशरश्मियाँ एवं वायु और मेघ शिल्पियों की भाँति ओषधियों के सम्पादन में समर्थ हैं तथा ज्ञानी जन हमारी प्रार्थना को सुनते हैं-स्वीकार करते हैं॥१०॥

स॒मु॒द्रः सिन्धू॒ रजो॑ अ॒न्तरि॑क्षम॒ज एक॑पात्तनयि॒त्नुर॑र्ण॒वः। अहि॑र्बु॒ध्न्यः॑ शृणव॒द्वचां॑सि मे॒ विश्वे॑ दे॒वास॑ उ॒त सू॒रयो॒ मम॑॥

आकाश, सूर्य, पृथिवी समुद्र, नदी, जलाशय, विद्युत् तथा मेघ ये सब अनुकूल होवें तथा विद्वान् भी निवेदनों को सुननेवाले-स्वीकार करनेवाले हों, जिससे जनमात्र सुखी हो सके॥११॥

स्याम॑ वो॒ मन॑वो दे॒ववी॑तये॒ प्राञ्चं॑ नो य॒ज्ञं प्र ण॑यत साधु॒या। आदि॑त्या॒ रुद्रा॒ वस॑वः॒ सुदा॑नव इ॒मा ब्रह्म॑ श॒स्यमा॑नानि जिन्वत॥

विद्वानों की सङ्गति करके ज्ञान प्राप्त करना और आध्यात्मिक साधना में लगना चाहिए तथा उच्च, मध्यम और अवम ब्रह्मचारियों से उनके अधीत मन्त्रविज्ञानों का श्रवण करना चाहिए॥१२॥

दैव्या॒ होता॑रा प्रथ॒मा पु॒रोहि॑त ऋ॒तस्य॒ पन्था॒मन्वे॑मि साधु॒या। क्षेत्र॑स्य॒ पतिं॒ प्रति॑वेशमीमहे॒ विश्वा॑न्दे॒वाँ अ॒मृताँ॒ अप्र॑युच्छतः॥

ऊँचे अध्यापक और उपदेशकों से वेदाध्ययन और श्रवण करके तदनुसार आचरण करें और परमात्मा की स्तुति प्रार्थना उपासना करते हुए जीवन्मुक्तों की श्रेणी में हो जाएँ॥१३॥

वसि॑ष्ठासः पितृ॒वद्वाच॑मक्रत दे॒वाँ ईळा॑ना ऋषि॒वत्स्व॒स्तये॑। प्री॒ता इ॑व ज्ञा॒तयः॒ काम॒मेत्या॒स्मे दे॑वा॒सोऽव॑ धूनुता॒ वसु॑॥

वेदाध्ययन और ब्रह्मचर्य में निष्णात जो विद्वान् हों, उनका पिता के समान आदर करना चाहिए तथा ज्ञानलाभ लेना चाहिए। परमात्मा का साक्षात्कार किए हुए जीवन्मुक्तों को ऋषियों की भाँति सम्मानित करके अध्यात्मलाभ लेना चाहिए। विद्वानों को बन्धुओं के समान स्नेहदृष्टि से देखते हुए घर पर बुलाकर ज्ञानोपदेश ग्रहण करना चाहिए॥१४॥

दे॒वान्वसि॑ष्ठो अ॒मृता॑न्ववन्दे॒ ये विश्वा॒ भुव॑ना॒भि प्र॑त॒स्थुः। ते नो॑ रासन्तामुरुगा॒यम॒द्य यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

नव स्नातक विद्वान् को अपनी विद्यावृद्धि के लिए अन्य ऊँचे विद्वानों, जीवन्मुक्तों से ज्ञानवृद्धि करके आत्मशान्ति प्राप्त करनी चाहिए, जो सबसे उत्कृष्ट वस्तु है॥१५॥

इ॒मां धियं॑ स॒प्तशी॑र्ष्णीं पि॒ता न॑ ऋ॒तप्र॑जातां बृह॒तीम॑विन्दत्। तु॒रीयं॑ स्विज्जनयद्वि॒श्वज॑न्यो॒ऽयास्य॑ उ॒क्थमिन्द्रा॑य॒ शंस॑न्॥

जगत्पिता परमात्मा सात छन्दोंवाली वेदवाणी बहुत ज्ञान से भरी वाणी का उपदेश करता है। बिना किसी बाह्य प्रयत्न की अपेक्षा रखता हुआ सहज स्वभाव से जगत् को उत्पन्न करता है। मानवजीवन को सफल बनाने के लिए चार फलों में से अर्थात् धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष में से मोक्ष को आत्मा के लिए प्रदान करता है। उस ऐसे परमात्मा की हमें स्तुति-प्रार्थना-उपासना करनी चाहिए॥१॥

ऋ॒तं शंस॑न्त ऋ॒जु दीध्या॑ना दि॒वस्पु॒त्रासो॒ असु॑रस्य वी॒राः। विप्रं॑ प॒दमङ्गि॑रसो॒ दधा॑ना य॒ज्ञस्य॒ धाम॑ प्रथ॒मं म॑नन्त॥

आदि सृष्टि में परम ऋषि वेदज्ञान का उपदेश करते हैं, वे परमात्मा के ध्यान में मग्न हुए परमात्मा के पुत्रसमान, अपनी इन्द्रियों के स्वामी-संयमी होते हैं। वे परमात्मा के स्वरूप को यथार्थरूप से जानते हैं, वैसे ही दूसरों को भी जनाते हैं॥२॥

हं॒सैरि॑व॒ सखि॑भि॒र्वाव॑दद्भिरश्म॒न्मया॑नि॒ नह॑ना॒ व्यस्य॑न्। बृह॒स्पति॑रभि॒कनि॑क्रद॒द्गा उ॒त प्रास्तौ॒दुच्च॑ वि॒द्वाँ अ॑गायत्॥

वेदवचनों का वक्ता, स्तुतियों का कर्त्ता, महान् योगी विद्वान्, अन्य पाप के हनन कर्त्ता, अध्यामिक जनों के साथ, विषयपाषाणों के बन्धनों को काटता है और लोगों को सदुपदेश देकर सन्मार्ग दिखाता है॥३॥

अ॒वो द्वाभ्यां॑ प॒र एक॑या॒ गा गुहा॒ तिष्ठ॑न्ती॒रनृ॑तस्य॒ सेतौ॑। बृह॒स्पति॒स्तम॑सि॒ ज्योति॑रि॒च्छन्नुदु॒स्रा आक॒र्वि हि ति॒स्र आवः॑॥

वेदविद्या का वक्ता सांसारिक सुख व्यवहार को जहाँ सिद्ध करता है, वहाँ अध्यात्म-मोक्ष को भी सिद्ध करता है। संसार के बन्धन से तथा अज्ञान अन्धकार से अपने को पृथक् करता है एवं दूसरों को भी इनसे पृथक् होने की प्रेरणा देता है। वह ऐसा विद्वान् वेद का सच्चा प्रचारक आश्रयणीय है॥४॥

वि॒भिद्या॒ पुरं॑ श॒यथे॒मपा॑चीं॒ निस्त्रीणि॑ सा॒कमु॑द॒धेर॑कृन्तत्। बृह॒स्पति॑रु॒षसं॒ सूर्यं॒ गाम॒र्कं वि॑वेद स्त॒नय॑न्निव॒ द्यौः॥

वेद का यथार्थज्ञाता और वक्ता इसी शरीर में रहता हुआ अपनी सारी वासनाओं को छिन्न-भिन्न कर देता है। अनन्तर स्थूल सूक्ष्म कारण शरीर के बन्धनों से छूटकर परमात्मा की उच्च स्तुति और उसके आश्रय में रमण करता है॥५॥

इन्द्रो॑ व॒लं र॑क्षि॒तारं॒ दुघा॑नां क॒रेणे॑व॒ वि च॑कर्ता॒ रवे॑ण। स्वेदा॑ञ्जिभिरा॒शिर॑मि॒च्छमा॒नोऽरो॑दयत्प॒णिमा गा अ॑मुष्णात्॥

शासक को अपना प्रभाव राष्ट्र में ऐसा बढ़ाना चाहिए कि प्रजा को बहकानेवाला, राज्य कर से रोकनेवाला कोई हो, तो उसे घोषणा मात्र से आतङ्कित कर दे। जुआरियों को दण्ड दे और राष्ट्र में ऐसा प्रबन्ध और प्रतिबन्ध की व्यवस्था बनाये रखे, जिससे कोई चोरी भी न कर सके॥६॥

स ईं॑ स॒त्येभिः॒ सखि॑भिः शु॒चद्भि॒र्गोधा॑यसं॒ वि ध॑न॒सैर॑दर्दः। ब्रह्म॑ण॒स्पति॒र्वृष॑भिर्व॒राहै॑र्घ॒र्मस्वे॑देभि॒र्द्रवि॑णं॒ व्या॑नट्॥

जो राजा गुणवान्, पवित्र मनवाले सच्चे, प्रतिष्ठित, प्रमुख राष्ट्रिय जनों के सहयोग से अपहरणकर्त्ता को दण्ड देता है तथा पवित्र कार्य करनेवाले श्रेष्ठ अर्थात् सच्चाई से कमानेवालों के उपहाररूप में दिये धन को स्वीकार करता है, वह राजा होने योग्य है॥७॥

ते स॒त्येन॒ मन॑सा॒ गोप॑तिं॒ गा इ॑या॒नास॑ इषणयन्त धी॒भिः। बृह॒स्पति॑र्मि॒थोअ॑वद्यपेभि॒रुदु॒स्रिया॑ असृजत स्व॒युग्भिः॑॥

सत्याचरणयुक्त श्रेष्ठ पुरुष जब अपने सच्चे मन से श्रेष्ठ राजा का सहयोग करते हैं, उसकी सहायता करते हैं, तो राष्ट्र के अन्दर से निन्दनीय कर्म समाप्त हो जाते हैं। चोरी गये हुए पदार्थ भी खोजकर पुनः वापस ले लिए जाते हैं॥८॥

तं व॒र्धय॑न्तो म॒तिभिः॑ शि॒वाभिः॑ सिं॒हमि॑व॒ नान॑दतं स॒धस्थे॑। बृह॒स्पतिं॒ वृष॑णं॒ शूर॑सातौ॒ भरे॑भरे॒ अनु॑ मदेम जि॒ष्णुम्॥

सिंह के समान शौर्यसम्पन्न, राष्ट्रविषयक घोषणा करते हुए राजा को सभाभवन में प्रजाजन प्रोत्साहित करते हैं और संग्राम में सैनिक उसका अनुमोदन करते हैं॥९॥

य॒दा वाज॒मस॑नद्वि॒श्वरू॑प॒मा द्यामरु॑क्ष॒दुत्त॑राणि॒ सद्म॑। बृह॒स्पतिं॒ वृष॑णं व॒र्धय॑न्तो॒ नाना॒ सन्तो॒ बिभ्र॑तो॒ ज्योति॑रा॒सा॥

राजा सब प्रजाजनों के लिए अन्न की व्यवस्था भली प्रकार करता है, तो वह वास्तव में राजपद का अधिकारी कहलाता है। उसे प्रजा के लिए विविध वस्तुओं के द्वारा सुख का सम्पादन करना चाहिए। ऐसे राजा की प्रशंसा प्रजा मुख से भी करती है और मस्तिष्क में भी स्थान देती है॥१०॥

स॒त्यामा॒शिषं॑ कृणुता वयो॒धै की॒रिं चि॒द्ध्यव॑थ॒ स्वेभि॒रेवैः॑। प॒श्चा मृधो॒ अप॑ भवन्तु॒ विश्वा॒स्तद्रो॑दसी शृणुतं विश्वमि॒न्वे॥

राजपुरुषों को चाहिए कि प्रजा की प्रार्थना पर ध्यान दें और सच्चे उपदेष्टा की रक्षा करें। समस्त आपदाओं को राष्ट्र से दूर भगाएँ, प्राणियों की हितसाधिका राजसभा और सेना प्रजा के दुःख दर्द को सुनें॥११॥

इन्द्रो॑ म॒ह्ना म॑ह॒तो अ॑र्ण॒वस्य॒ वि मू॒र्धान॑मभिनदर्बु॒दस्य॑। अह॒न्नहि॒मरि॑णात्स॒प्त सिन्धू॑न्दे॒वैर्द्या॑वापृथिवी॒ प्राव॑तं नः॥

परमात्मा अपनी महती शक्ति से विज्ञानसागर, वाग्विद्या के मूर्द्धारूप वेद को प्रकट करता है। उसका प्रचार राजा को करना चाहिए। वेद अज्ञानान्धकार को दूर करते हैं, वे सात छन्दों से युक्त प्रवाहित होते हैं, राजसभा और प्रजागण को सब प्रकार से सुखप्रद सिद्ध होते हैं॥१२॥

उ॒द॒प्रुतो॒ न वयो॒ रक्ष॑माणा॒ वाव॑दतो अ॒भ्रिय॑स्येव॒ घोषाः॑। गि॒रि॒भ्रजो॒ नोर्मयो॒ मद॑न्तो॒ बृह॒स्पति॑म॒भ्य१॒॑र्का अ॑नावन्॥

परमात्मा की स्तुति करनेवाले जन हर्षित होकर भिन्न-भिन्न प्रकार से परमात्मा की स्तुति किया करते हैं। जल पर तैरनेवाले जलकाक जैसे हर्षध्वनि करते हैं, खेती करनेवाले हरे भरे-खेत में रक्षार्थ जैसे ध्वनियाँ करते हैं, वर्षण के लिए उद्यत मेघसमूह जैसे गर्जना करते हैं और पर्वत से गिरते हुए झरने जैसे झर्झर ध्वनि करते हैं, ऐसे ही स्तोताजन अपने मधुर वचनों से परमात्मा का विभिन्न पद्धतियों से स्तुतिगान करते हैं॥१॥

सं गोभि॑राङ्गिर॒सो नक्ष॑माणो॒ भग॑ इ॒वेद॑र्य॒मणं॑ निनाय। जने॑ मि॒त्रो न दम्प॑ती अनक्ति॒ बृह॑स्पते वा॒जया॒शूँरि॑वा॒जौ॥

जैसे कोई धनवान् धन में रमण करता हुआ होता है, ऐसे ही विद्वान् का शिष्य विद्या में रमण करता हुआ होता है और वह अपनी स्तुतियों द्वारा जगत् के स्वामी परमात्मा को भी अपने अन्दर साक्षात् करता है। उस ऐसे सच्चे पात्र को परमात्मा मोक्ष में प्रेरित करता है॥२॥

सा॒ध्व॒र्या अ॑ति॒थिनी॑रिषि॒रा स्पा॒र्हाः सु॒वर्णा॑ अनव॒द्यरू॑पाः। बृह॒स्पतिः॒ पर्व॑तेभ्यो वि॒तूर्या॒ निर्गा ऊ॑पे॒ यव॑मिव स्थि॒विभ्यः॑॥

परमात्मा सृष्टि के आरम्भ में आदि ऋषियों के हृदय-अन्तःकरण से संसार का कल्याण साधनेवाली वेदवाणियों का प्रकाश करता है, जो वेदवाणियाँ दोषों को दूर करनेवाली और प्रशंसनीय हैं। एवं राजा प्रजा का हित चाहता हुआ पर्वतों से नदियों के मार्ग को विकसित करता हुआ, उन्हें कुल्याओं के रूप में नीचे लाता है। प्रजा के लिए राज का यह कर्तव्य है कि वह उनकी इस प्रकार की सुविधाओं का सम्पादन करे॥३॥

आ॒प्रु॒षा॒यन्मधु॑न ऋ॒तस्य॒ योनि॑मवक्षि॒पन्न॒र्क उ॒ल्कामि॑व॒ द्योः। बृह॒स्पति॑रु॒द्धर॒न्नश्म॑नो॒ गा भूम्या॑ उ॒द्नेव॒ वि त्वचं॑ बिभेद॥

वेदज्ञान का स्वामी तथा राष्ट्र का स्वामी ज्ञान के पात्र जन को वेदज्ञान देकर उसके अन्तःकरण को विकसित करता है, जैसे विद्युत् अपनी विद्युत् धारा से मेघजल को बरसाकर भूमि को विकसित करती है, जैसे कृषक भूमि पर खेती में जल बहाकर विकसित करता है, शिल्पी जैसे कुआँ खोदकर जल निकालकर भूमि को विकसित करता है॥४॥

अप॒ ज्योति॑षा॒ तमो॑ अ॒न्तरि॑क्षादु॒द्नः शीपा॑लमिव॒ वात॑ आजत्। बृह॒स्पति॑रनु॒मृश्या॑ व॒लस्या॒भ्रमि॑व॒ वात॒ आ च॑क्र॒ आ गाः॥

जैसे सूर्य आकाशस्थ अन्धकार को हटाता है, जैसे प्रबल वायु जल के ऊपर से शैवाल-काई को दूर करता है और मेघों से जल को बरसाता है, ऐसे ही परमात्मा तथा वेद का विद्वान् वेदज्ञान द्वारा लोगों के अज्ञान अन्धकार को हटाता है॥५॥

य॒दा व॒लस्य॒ पीय॑तो॒ जसुं॒ भेद्बृह॒स्पति॑रग्नि॒तपो॑भिर॒र्कैः। द॒द्भिर्न जि॒ह्वा परि॑विष्ट॒माद॑दा॒विर्नि॒धीँर॑कृणोदु॒स्रिया॑णाम्॥

परमात्मा अज्ञान के आवरक बल को नष्ट करने के हेतु वेदमन्त्रों से ज्ञान को फैलाता है, जिन मन्त्रों में ज्ञान के कोष निहित हैं॥६॥

बृह॒स्पति॒रम॑त॒ हि त्यदा॑सां॒ नाम॑ स्व॒रीणां॒ सद॑ने॒ गुहा॒ यत्। आ॒ण्डेव॑ भि॒त्त्वा श॑कु॒नस्य॒ गर्भ॒मुदु॒स्रियाः॒ पर्व॑तस्य॒ त्मना॑जत्॥

परमात्मा वेदवाणियों के ज्ञान को आदि ऋषियों के अन्तःकरण में प्रकाशित और उनके मुख द्वारा उच्चारित कराता है। जैसे पक्षी अपने अण्डे में अपने बच्चे को प्रकट करता है, ऐसे वेद में से वह ज्ञान को प्रकट करता है॥७॥

अश्नापि॑नद्धं॒ मधु॒ पर्य॑पश्य॒न्मत्स्यं॒ न दी॒न उ॒दनि॑ क्षि॒यन्त॑म्। निष्टज्ज॑भार चम॒सं न वृ॒क्षाद्बृह॒स्पति॑र्विर॒वेणा॑ वि॒कृत्य॑॥

परमात्मा शरीर में बँधे आत्मा का उद्धार करता है, जैसे थोड़े पानी में तड़पती मछली को बाहर किया जाता है। उसके लिए वेद में से उस ज्ञान को प्रकट करता है, जैसे रसीले फलवाले वृक्ष से उसके पान करने योग्य रस को निकाला जाता है॥८॥

सोषाम॑विन्द॒त्स स्वः१॒॑ सो अ॒ग्निं सो अ॒र्केण॒ वि ब॑बाधे॒ तमां॑सि। बृह॒स्पति॒र्गोव॑पुषो व॒लस्य॒ निर्म॒ज्जानं॒ न पर्व॑णो जभार॥

आत्मा वेदप्रकाश के द्वारा अपने अन्दर से अज्ञानान्धकार को हटाकर परमात्मा का साक्षात्कार करता है। सब प्रकार के दुःखों से दूर होकर अनन्त सुख को भी प्राप्त करता है॥९॥

हि॒मेव॑ प॒र्णा मु॑षि॒ता वना॑नि॒ बृह॒स्पति॑नाकृपयद्व॒लो गाः। अ॒ना॒नु॒कृ॒त्यम॑पु॒नश्च॑कार॒ यात्सूर्या॒मासा॑ मि॒थ उ॒च्चरा॑तः॥

परमात्मा सूर्य और चन्द्रमा को तो दिन-रात में या दोनों पक्षों में बार-बार या पुनः-पुनः उदित करता है, परन्तु जीवात्माओं को अज्ञान से छुड़ाने के लिए वेदवाणियों या वेद के ज्ञान को एक बार ही प्रकट करता है, क्योंकि परमात्मा का ज्ञान पूर्ण है। उसे बार बार प्रकट करने की आवश्यकता नहीं॥१०॥

अ॒भि श्या॒वं न कृश॑नेभि॒रश्वं॒ नक्ष॑त्रेभिः पि॒तरो॒ द्याम॑पिंशन्। रात्र्यां॒ तमो॒ अद॑धु॒र्ज्योति॒रह॒न्बृह॒स्पति॑र्भि॒नदद्रिं॑ वि॒दद्गाः॥

उज्ज्वल घोड़े को सुनहरी भूषणों से लोक में जैसे सजाते हैं या रात्रि में गगन-मण्डल को नक्षत्र में प्रकाश देकर रश्मियाँ चमकती हैं-विकसित करती हैं, अथवा रात्रि के अन्धकारवाले स्थल को सूर्यकिरणें जैसे चमका देती हैं, ऐसे ही परम ऋषियों के आत्मा में वेदज्ञान को प्रकाशित करके परमात्मा चमका देता है॥११॥

इ॒दम॑कर्म॒ नमो॑ अभ्रि॒याय॒ यः पू॒र्वीरन्वा॒नोन॑वीति। बृह॒स्पतिः॒ स हि गोभिः॒ सो अश्वैः॒ स वी॒रेभिः॒ स नृभि॑र्नो॒ वयो॑ धात्॥

वेदवाणी को प्राप्त वेदवक्ता के लिए नमस्कार-स्वागत आदि करना चाहिए। उस वेदज्ञान का स्वामी परमात्मा शाश्वतिक वेदवाणियों का आदि सृष्टि में उपदेश करता है। वह इन्द्रियों के द्वारा मन बुद्धि चित्त अहङ्कारों के द्वारा और प्राणों, रक्तनाड़ियों के द्वारा शारीरिक जीवन और आध्यात्मिक जीवन को प्रदान करता है॥१२॥

सूक्तम्

भ॒द्रा अ॒ग्नेर्व॑ध्र्य॒श्वस्य॑ सं॒दृशो॑ वा॒मी प्रणी॑तिः सु॒रणा॒ उपे॑तयः। यदीं॑ सुमि॒त्रा विशो॒ अग्र॑ इ॒न्धते॑ घृ॒तेनाहु॑तो जरते॒ दवि॑द्युतत्॥

जिस राजा के अश्व तथा इन्द्रियाँ सुनियन्त्रित हों, प्रजा पर उसकी कृपादृष्टि हो, अच्छी प्रेरणा हो, छत्रछाया सुखदायक हो, प्रजाओं में परस्पर मित्रभाव हो, ऐसे राजा को प्रजाएँ उत्तम शासक मानती हैं और प्रशंसित करती हैं॥१॥

घृ॒तम॒ग्नेर्व॑ध्र्य॒श्वस्य॒ वर्ध॑नं घृ॒तमन्नं॑ घृ॒तम्व॑स्य॒ मेद॑नम्। घृ॒तेनाहु॑त उर्वि॒या वि प॑प्रथे॒ सूर्य॑ इव रोचते स॒र्पिरा॑सुतिः॥

नियन्त्रित घोड़ों और इन्द्रियोंवाला राजा, जिसका तेज ही लोगों का सम्मलेन साधन है, वह तेज से विशेषरूप में प्रसिद्ध होता है और सूर्य के समान वह सर्पणशील प्रजाओं द्वारा प्रेरित किया प्रकाशित होता है॥२॥

यत्ते॒ मनु॒र्यदनी॑कं सुमि॒त्रः स॑मी॒धे अ॑ग्ने॒ तदि॒दं नवी॑यः। स रे॒वच्छो॑च॒ स गिरो॑ जुषस्व॒ स वाजं॑ दर्षि॒ स इ॒ह श्रवो॑ धाः॥

जिस राजा के पास सैन्यबल प्रबल होता है और वह उस सैन्यबल को बढ़ाता है, प्रोत्साहित करता है, तो वह उसका साथ देनेवाले मित्र के समान हो जाता है, शत्रु को विदीर्ण करता है, उसके यश को बढ़ाता है॥३॥

यं त्वा॒ पूर्व॑मीळि॒तो व॑ध्र्य॒श्वः स॑मी॒धे अ॑ग्ने॒ स इ॒दं जु॑षस्व। स नः॑ स्ति॒पा उ॒त भ॑वा तनू॒पा दा॒त्रं र॑क्षस्व॒ यदि॒दं ते॑ अ॒स्मे॥

जीवात्मा की आन्तरिक अनुभूति है-वह अपने देह और वासना के बन्धन में समझता हुआ स्मरण करता है कि परमात्मा की स्तुति पूर्वजन्म में भी करता रहा, इस जन्म में भी करता हूँ बन्धन से छूटने के लिए।  परमात्मा आन्तरिक भावनाओं और मन आदि उपकरणों का रक्षक है तथा बाहरी रस-रक्त आदि धातुओं तथा शरीर का भी रक्षक है।  अपने उत्थान के लिए उसकी स्तुति प्रार्थना उपासना करनी चाहिए॥४॥

भवा॑ द्यु॒म्नी वा॑ध्र्यश्वो॒त गो॒पा मा त्वा॑ तारीद॒भिमा॑ति॒र्जना॑नाम्। शूर॑ इव धृ॒ष्णुश्च्यव॑नः सुमि॒त्रः प्र नु वो॑चं॒ वाध्र्य॑श्वस्य॒ नाम॑॥

मानव चाहे जितेन्द्रिय हो या वासना में बँधा हुआ हो, प्रत्येक अवस्था में उसका स्तुत्य देव परमात्मा है, वही रक्षक है।  मनुष्य संसार में उत्पन्न होकर अभिमान कर बैठते हैं, नास्तिक बन जाते हैं, परन्तु वे परमात्मा के ईश्वरत्व को मिटा नहीं सकते, किन्तु उसके अधीन कर्मफलों को भोगते हैं।  उसका महत्त्वपूर्ण स्वरूप समरण करने योग्य है॥५॥

सम॒ज्र्या॑ पर्व॒त्या॒३॒॑ वसू॑नि॒ दासा॑ वृ॒त्राण्यार्या॑ जिगेथ। शूर॑ इव धृ॒ष्णुश्च्यव॑नो॒ जना॑नां॒ त्वम॑ग्ने पृतना॒यूँर॒भि ष्याः॑॥

राजा को चाहिए, नदी समुद्र पर्वतों से धन अर्थात् विविध अन्नोत्पत्ति, रत्नप्राप्ति तथा पर्वतीय पदार्थों को प्राप्त कर संग्रह करे।  राष्ट्र में सेवक और स्वामी के सम्बन्ध को अच्छा बनाने का प्रयत्न करे।  एक दूसरे के प्रति किये अपराधों को नियन्त्रित करे। प्रत्येक जन अथवा वर्ग को अपने-अपने कार्य में प्रेरित करे।  विरोधियों को स्वाधीन रखे॥६॥

दी॒र्घत॑न्तुर्बृ॒हदु॑क्षा॒यम॒ग्निः स॒हस्र॑स्तरीः श॒तनी॑थ॒ ऋभ्वा॑। द्यु॒मान्द्यु॒मत्सु॒ नृभि॑र्मृ॒ज्यमा॑नः सुमि॒त्रेषु॑ दीदयो देव॒यत्सु॑॥

परमात्मा की ज्ञानदृष्टि महती है।  वह समस्त ज्ञानियों के अन्दर ज्ञान का प्रेरक है, स्तुति करनेवालों से प्राप्त होने योग्य है, उसे जो अपना देव मानते हैं, उनका वह मित्र बन जाता है।  एवं राजा की प्रजा पर ज्ञानदृष्टि बहतु ऊँची होनी चाहिए, अन्य नीतिमानों से ऊँचा नीतिमान् होना चाहिए, उसके अच्छे-अच्छे नायक सहायक हों और उसमें भक्ति रखनेवाले हों॥७॥

त्वे धे॒नुः सु॒दुघा॑ जातवेदोऽस॒श्चते॑व सम॒ना स॑ब॒र्धुक्। त्वं नृभि॒र्दक्षि॑णावद्भिरग्ने सुमि॒त्रेभि॑रिध्यसे देव॒यद्भिः॑॥

सर्वज्ञ शान्तस्वरूप परमात्मा के लिए स्तुति करनेवाले जन स्तुति भेंटरूप में देते हैं और आत्मसमर्पण करनेवाले जनों-अपना इष्टदेव माननेवाले जनों के द्वारा सक्षात् किया जाता है या प्रसिद्ध किया जाता है।  एवं जो राजा राष्ट्रधन का उपभोग करनेवाला है, इन्द्रियविषयों में आसक्त नहीं होता, उसकी प्रजा उसके लिए सुगमता से दुहनेवाली गौ के समान भेंट देनेवाली होती है और उसे अपने ऊपर शासक देव मानती हुई उसकी प्रसिद्धि करती है॥८॥

दे॒वाश्चि॑त्ते अ॒मृता॑ जातवेदो महि॒मानं॑ वाध्र्यश्व॒ प्र वो॑चन्। यत्स॒म्पृच्छं॒ मानु॑षी॒र्विश॒ आय॒न्त्वं नृभि॑रजय॒स्त्वावृ॑धेभिः॥

परमात्मा जितेन्द्रिय संयमी जन का उपास्य बनता है।  जीवन्मुक्त उसके गुणगान गाते हैं, साधारण मनुष्य उसके सम्बन्ध में अनेक प्रश्न करते हैं, वह अपने स्तुतिकर्त्ताओं के दोषों को नष्ट करता है॥९॥

पि॒तेव॑ पु॒त्रम॑बिभरु॒पस्थे॒ त्वाम॑ग्ने वध्र्य॒श्वः स॑प॒र्यन्। जु॒षा॒णो अ॑स्य स॒मिधं॑ यविष्ठो॒त पूर्वाँ॑ अवनो॒र्व्राध॑तश्चित्॥

मनुष्य इन्द्रियों को अपने वश में करता हुआ परमात्मा की उपासना करे, उसके प्रति श्रद्धा और स्नेह रखते हुए अपने हृदय में पूर्ण स्थान दे। इस प्रकार करने से उसके विरुद्ध विचारों दोषों को परमात्मा नष्ट कर देता है॥१०॥

शश्व॑द॒ग्निर्व॑ध्र्य॒श्वस्य॒ शत्रू॒न्नृभि॑र्जिगाय सु॒तसो॑मवद्भिः। सम॑नं चिददहश्चित्रभा॒नोऽव॒ व्राध॑न्तमभिनद्वृ॒धश्चि॑त्॥

परमात्मा जितेन्द्रिय मनुष्य के कामादि दोषों को और अन्य बढ़े-चढ़े विरोधी प्रभावों या दुर्गुणों को नष्ट करता है॥११॥

अ॒यम॒ग्निर्व॑ध्र्य॒श्वस्य॑ वृत्र॒हा स॑न॒कात्प्रेद्धो॒ नम॑सोपवा॒क्यः॑। स नो॒ अजा॑मीँरु॒त वा॒ विजा॑मीन॒भि ति॑ष्ठ॒ शर्ध॑तो वाध्र्यश्व॥

जितेन्द्रिय उपासक जब परमात्मा की उपासना करता है, तो परमात्मा उसे पापों से बचाता है तथा उसके साथ सम्बन्ध न रखनेवाले बाधकों को और विपरीत सम्बन्ध रखनेवाले बाधकों को वह दबा देता है॥१२॥

इ॒मां मे॑ अग्ने स॒मिधं॑ जुषस्वे॒ळस्प॒दे प्रति॑ हर्या घृ॒ताची॑म्। वर्ष्म॑न्पृथि॒व्याः सु॑दिन॒त्वे अह्ना॑मू॒र्ध्वो भ॑व सुक्रतो देवय॒ज्या॥

परमात्मा की आत्मभाव से प्रार्थना करनी चाहिए कि हे मेरे स्तुत्य देव! तू मेरे हृदय में विराजमान हो। आन्तरिक अन्धकार को दूर करके मेरे आत्मा को अपने प्रकाश से प्रकाशित कर। मुझे अपनी सङ्गति से मेरे जीवन के दिनों के ऊपर संरक्षक बनकर उत्कृष्ट बना। एवं विद्वान् के पास जाकर के प्रार्थना करनी चाहिए कि हे विद्वन्! शिष्यभाव से प्राप्त मैं अपने को तेरे समर्पित करता हूँ। मेरे आत्मा को अपने ज्ञान से प्रकाशमान बना, अज्ञानान्धकार को दूर कर, अपने जैसा विद्वान् मुझे बना, मेरे हृदय के अन्दर तेरा ज्ञानमय स्वरूप निहित हो जाये। मेरे जीवन के दिनों को ऊँचा बनाने के लिए मेरा संरक्षक बन॥१॥

आ दे॒वाना॑मग्र॒यावे॒ह या॑तु॒ नरा॒शंसो॑ वि॒श्वरू॑पेभि॒रश्वैः॑। ऋ॒तस्य॑ प॒था नम॑सा मि॒येधो॑ दे॒वेभ्यो॑ दे॒वत॑मः सुषूदत्॥

जीवन्मुक्तों को मोक्ष में प्रेरित करनेवाला और उनसे प्रशंसित विशेष गुणों से व्याप्त, अध्यात्मयज्ञ के मार्ग से मनन आदि के द्वारा निर्मल तथा प्रकाशमान करनेवाला, समस्त दिव्यगुण पदार्थों में उत्तम दिव्यगुणवाला, परमात्मा आनद रस को हृदय में निर्झरित करता है। एवं विद्या चाहनेवालों को आगे प्रेरित करनेवाला विद्वान्, उनके द्वारा प्रशंसनीय ज्ञानमार्ग से तथा विचार से अज्ञान को दूर करनेवाला, ज्ञानप्रकाश को देनेवाला ऊँचा गुणवान् होकर अन्तःकरण में ज्ञान को भरता है॥२॥

श॒श्व॒त्त॒ममी॑ळते दू॒त्या॑य ह॒विष्म॑न्तो मनु॒ष्या॑सो अ॒ग्निम्। वहि॑ष्ठै॒रश्वैः॑ सु॒वृता॒ रथे॒ना दे॒वान्व॑क्षि॒ नि ष॑दे॒ह होता॑॥

मनस्वी या मननशील परमात्मा के आनन्दरस या ज्ञानरस को ग्रहण कर सकता है। जो परमात्मा की उपासना में निरत रहता है, वह मोक्ष का भागी बनता है॥३॥

वि प्र॑थतां दे॒वजु॑ष्टं तिर॒श्चा दी॒र्घं द्रा॒घ्मा सु॑र॒भि भू॑त्व॒स्मे। अहे॑ळता॒ मन॑सा देव बर्हि॒रिन्द्र॑ज्येष्ठाँ उश॒तो य॑क्षि दे॒वान्॥

परमात्मा का ज्ञान जीवन्मुक्तों के अन्दर वृद्धि को प्राप्त होता है। वे लोग अपने ऊपर परमात्मा को ही उपास्य समझते हैं। परमात्मा उन्हें अपनी संगति का लाभ देता है, उनके द्वारा अन्य जन परमात्मा के ज्ञान का लाभ लेते हैं॥४॥

दि॒वो वा॒ सानु॑ स्पृ॒शता॒ वरी॑यः पृथि॒व्या वा॒ मात्र॑या॒ वि श्र॑यध्वम्। उ॒श॒तीर्द्वा॑रो महि॒ना म॒हद्भि॑र्दे॒वं रथं॑ रथ॒युर्धा॑रयध्वम्॥

घर की महिलाएँ अथवा प्रत्येक मनुष्य की इन्द्रियवृत्तियाँ सृष्टि के भोगों को आंशिकरूप में भोगें। इसी में कल्याण है, अधिक सेवन में नहीं। तथा महान् विद्वानों द्वारा सेवित तथा अनुमोदित विशेषरूप से मोक्षधाम का सुख, साधारणरूप से गृहस्थ का सुख भोगने योग्य है॥५॥

दे॒वी दि॒वो दु॑हि॒तरा॑ सुशि॒ल्पे उ॒षासा॒नक्ता॑ सदतां॒ नि योनौ॑। आ वां॑ दे॒वास॑ उशती उ॒शन्त॑ उ॒रौ सी॑दन्तु सुभगे उ॒पस्थे॑॥

विद्यासूर्य विद्वान् की दोहने योग्य विद्या और योग्य पत्नी अच्छे कर्म की साधिकाएँ बनती हैं, जबकि अच्छे और श्रवण स्थान में उनका उपयोग हो॥६॥

ऊ॒र्ध्वो ग्रावा॑ बृ॒हद॒ग्निः समि॑द्धः प्रि॒या धामा॒न्यदि॑तेरु॒पस्थे॑। पु॒रोहि॑तावृत्विजा य॒ज्ञे अ॒स्मिन्वि॒दुष्ट॑रा॒ द्रवि॑ण॒मा य॑जेथाम्॥

उत्तम विद्यावाले अध्यापक और उपदेशक निरन्तर अपने मस्तिष्क या हृदय में विद्या को उत्तरोत्तर बढ़ाते रहते हैं। वे दूसरों को भी निरन्तर विद्यादान देते रहते हैं॥७॥

तिस्रो॑ देवीर्ब॒र्हिरि॒दं वरी॑य॒ आ सी॑दत चकृ॒मा वः॑ स्यो॒नम्। म॒नु॒ष्वद्य॒ज्ञं सुधि॑ता ह॒वींषीळा॑ दे॒वी घृ॒तप॑दी जुषन्त॥

अध्यात्मयज्ञ के साधनेवाली तीन भावनाएँ और धारणाएँ जो कि स्तुति प्रार्थना और उपासना हैं, ये सफल तब हो सकती हैं, जब इनके अनुसार मन, बुद्धि, चित्त और अहङ्कार हों॥८॥

देव॑ त्वष्ट॒र्यद्ध॑ चारु॒त्वमान॒ड्यदङ्गि॑रसा॒मभ॑वः सचा॒भूः। स दे॒वानां॒ पाथ॒ उप॒ प्र वि॒द्वाँ उ॒शन्य॑क्षि द्रविणोदः सु॒रत्नः॑॥

परमात्मा जगत् का रचयिता जीवों के ऊपर अपनी दयारूप श्रेष्ठता को प्रकट करता है। जो उपासक तुझे अपना अङ्गी बनाकर आनन्द रस लेते हैं, उन्हें तू निश्चय अपना उपहार देता है॥९॥

वन॑स्पते रश॒नया॑ नि॒यूया॑ दे॒वानां॒ पाथ॒ उप॑ वक्षि वि॒द्वान्। स्वदा॑ति दे॒वः कृ॒णव॑द्ध॒वींष्यव॑तां॒ द्यावा॑पृथि॒वी हवं॑ मे॥

परमात्मा प्राणियों के भोग की रक्षा करता है। अपनी व्यापनशक्ति से उसे नियन्त्रित करके विद्वानों तक पहुँचाता है और प्राणियों को भोग्यपदार्थ प्रदान करता है। अन्नादि उत्पन्न करके खिलाता है॥१०॥

आग्ने॑ वह॒ वरु॑णमि॒ष्टये॑ न॒ इन्द्रं॑ दि॒वो म॒रुतो॑ अ॒न्तरि॑क्षात्। सीद॑न्तु ब॒र्हिर्विश्व॒ आ यज॑त्राः॒ स्वाहा॑ दे॒वा अ॒मृता॑ मादयन्ताम्॥

परमात्मा हमारी इष्टसिद्धि के लिए मेघमण्डल से जल को बरसाता है और अन्तरिक्ष से वर्षा करानेवाली हवाओं को प्रेरित करता है। एतदर्थ याजक लोग यजन करते हैं और जीवन्मुक्त विद्वान् हर्षित करते हैं॥११॥

बृह॑स्पते प्रथ॒मं वा॒चो अग्रं॒ यत्प्रैर॑त नाम॒धेयं॒ दधा॑नाः। यदे॑षां॒ श्रेष्ठं॒ यद॑रि॒प्रमासी॑त्प्रे॒णा तदे॑षां॒ निहि॑तं॒ गुहा॒विः॥

वेद का स्वामी परमात्मा सृष्टि के आरम्भ में आदि ऋषियों के पवित्र अन्तःकरण में वेद का प्रकाश करता है, जो पदार्थमात्र के गुण स्वरूप को बताता है, उसे वे ऋषि दूसरों को जनाते हैं॥१॥

सक्तु॑मिव॒ तित॑उना पु॒नन्तो॒ यत्र॒ धीरा॒ मन॑सा॒ वाच॒मक्र॑त। अत्रा॒ सखा॑यः स॒ख्यानि॑ जानते भ॒द्रैषां॑ ल॒क्ष्मीर्निहि॒ताधि॑ वा॒चि॥

परम ऋषि महानुभाव वाग्विषय को भली-भाँति शोधकर अपने अन्दर धारण करते हैं। वाणी के यथार्थ ज्ञान के साथ उनकी तन्मयता हो जाती है। ज्ञानसम्पत्ति की वे रक्षा करते हैं॥२॥

य॒ज्ञेन॑ वा॒चः प॑द॒वीय॑माय॒न्तामन्व॑विन्द॒न्नृषि॑षु॒ प्रवि॑ष्टाम्। तामा॒भृत्या॒ व्य॑दधुः पुरु॒त्रा तां स॒प्त रे॒भा अ॒भि सं न॑वन्ते॥

वेदवाणी एक-एक पद के साथ अर्थ को रखती हुई सात छन्दों में-मन्त्रों में ज्ञानयज्ञ तथा अध्यात्मयज्ञ से प्रकाशित होती है। जिसका भिन्न-भिन्न देशों में ऋषियों द्वारा प्रचार हो जाता है॥३॥

उ॒त त्वः॒ पश्य॒न्न द॑दर्श॒ वाच॑मु॒त त्वः॑ शृ॒ण्वन्न शृ॑णोत्येनाम्। उ॒तो त्व॑स्मै त॒न्वं१॒॑ वि स॑स्रे जा॒येव॒ पत्य॑ उश॒ती सु॒वासाः॑॥

वाणी को लिपिरूप में देखता हुआ भी लिपिज्ञानरहित नहीं देखता है और कोई अर्थज्ञानशून्य कानों से वाणी को सुनता हुआ नहीं सुन पाता, किन्तु ज्ञानवान् मनुष्य के लिए वाणी अपने सार्थ स्वरूप को ऐसे खोल कर रखती है, जैसे सुभूषित स्त्री अपने को खोलकर रख देती है गृहस्थसुख के लिए॥४॥

उ॒त त्वं॑ स॒ख्ये स्थि॒रपी॑तमाहु॒र्नैनं॑ हिन्व॒न्त्यपि॒ वाजि॑नेषु। अधे॑न्वा चरति मा॒ययै॒ष वाचं॑ शुश्रु॒वाँ अ॑फ॒लाम॑पु॒ष्पाम्॥

जो वाणी के साथ अर्थज्ञान से मित्रता बनाता है अथवा विद्वानों से वाणी के अर्थों को जानता है, उसे वाणी के लाभ को प्राप्त हुआ कहते हैं और जो वाणी के अर्थ को नहीं जानता, वह केवल शब्दरूप बोलता है। वह वाणी के प्रतिरूपक काष्ठ की गौ के समान व्यवहार करता है॥५॥

यस्ति॒त्याज॑ सचि॒विदं॒ सखा॑यं॒ न तस्य॑ वा॒च्यपि॑ भा॒गो अ॑स्ति। यदीं॑ शृ॒णोत्यल॑कं शृणोति न॒हि प्र॒वेद॑ सुकृ॒तस्य॒ पन्था॑म्॥

वेद मानव का सच्चा साथी है। वह विपत्ति और सम्पत्ति दोनों को सुझाता है। जो इसे त्याग देता है, उसके कथन में और सुनने में कुछ सार नहीं है। वह मानव जीवन के मार्ग से विचलित रहता है॥६॥

अ॒क्ष॒ण्वन्तः॒ कर्ण॑वन्तः॒ सखा॑यो मनोज॒वेष्वस॑मा बभूवुः। आ॒द॒घ्नास॑ उपक॒क्षास॑ उ त्वे ह्र॒दा इ॑व॒ स्नात्वा॑ उ त्वे ददृश्रे॥

आँखवाले कानवाले बाहरी आकृति में समान दीखते हुए भी मन के वेगों अर्थात् मानसिक विचारों प्रवृत्तियों में भिन्न-भिन्न होते हैं, भिन्न-भिन्न ज्ञान के कारण जैसे किसी एक जलाशय में किसी मनुष्य के कक्षा तक पानी आता है, किसी के मुख तक, कोई पूरा डूब जाता है भिन्न-भिन्न शरीरों के कारण। इसी प्रकार ज्ञान की भिन्न-भिन्न गतियाँ हैं॥७॥

हृ॒दा त॒ष्टेषु॒ मन॑सो ज॒वेषु॒ यद्ब्रा॑ह्म॒णाः सं॒यज॑न्ते॒ सखा॑यः। अत्राह॑ त्वं॒ वि ज॑हुर्वे॒द्याभि॒रोह॑ब्रह्माणो॒ वि च॑रन्त्यु त्वे॥

वेद का ज्ञान पवित्र मन और तीक्ष्ण बुद्धि द्वारा साक्षात् होता है। जो ऊहा करनेवाले विद्वान् हैं, वे उसमें प्रवेश करते हैं, अन्य अज्ञानी नहीं॥८॥

इ॒मे ये नार्वाङ्न प॒रश्चर॑न्ति॒ न ब्रा॑ह्म॒णासो॒ न सु॒तेक॑रासः। त ए॒ते वाच॑मभि॒पद्य॑ पा॒पया॑ सि॒रीस्तन्त्रं॑ तन्वते॒ अप्र॑जज्ञयः॥

जो मनुष्य इस लोक के शास्त्र को नहीं जानते तथा न परलोकशास्त्र अर्थात् अध्यात्मशास्त्र को जानते हैं, वे न ब्राह्मण हैं, न उपासक हैं, किन्तु अज्ञानरूप पाप से युक्त हुए केवल सन्तान वंश का या अपने शरीर का ही विस्तार करते हैं॥९॥

सर्वे॑ नन्दन्ति य॒शसाग॑तेन सभासा॒हेन॒ सख्या॒ सखा॑यः। कि॒ल्बि॒ष॒स्पृत्पि॑तु॒षणि॒र्ह्ये॑षा॒मरं॑ हि॒तो भव॑ति॒ वाजि॑नाय॥

जो मनुष्य वेदज्ञान के द्वारा विद्वानों की सभा को प्रभावित करता है, अन्य विद्वानों की योग्यता से लाभ उठाता है, अज्ञानरूप पाप से संघर्ष करता है, वह वेदवाणी के ज्ञान में समर्थ होता है॥१०॥

ऋ॒चां त्वः॒ पोष॑मास्ते पुपु॒ष्वान्गा॑य॒त्रं त्वो॑ गायति॒ शक्व॑रीषु। ब्र॒ह्मा त्वो॒ वद॑ति जातवि॒द्यां य॒ज्ञस्य॒ मात्रां॒ वि मि॑मीत उ त्वः॥

वेदों में निष्णात विद्वान् कोई ऋङ्मन्त्रों के ज्ञान का प्रवचन करता है, कोई गाने योग्य मन्त्रों से परमात्मा का गुणगान करता है, कोई मन्त्रों से यज्ञ की सरणि का विधान करता है और कोई चारों वेदों का वेत्ता वेदों की प्रसिद्ध विद्या का व्याख्यान करता है॥११॥

दे॒वानां॒ नु व॒यं जाना॒ प्र वो॑चाम विप॒न्यया॑। उ॒क्थेषु॑ श॒स्यमा॑नेषु॒ यः पश्या॒दुत्त॑रे यु॒गे॥

परमात्मा दिव्य पदार्थों के उत्पत्तिक्रमों को वेदों में उत्तरोत्तर क्रम से जो वर्णन करता है, उनका विद्वान् उपदेश करें॥१॥

ब्रह्म॑ण॒स्पति॑रे॒ता सं क॒र्मार॑ इवाधमत्। दे॒वानां॑ पू॒र्व्ये यु॒गेऽस॑तः॒ सद॑जायत॥

ब्रह्माण्ड का स्वामी परमात्मा अव्यक्त प्रकृति से व्यक्त जगत् को उत्पन्न करता है। प्रथम प्रादुर्भूत होनेवाले परमाणुरूप अङ्कुरों को तपाता है, पुनः दिव्यगुणवाले सूर्यादि पदार्थों को उत्पन्न करता है॥२॥

दे॒वानां॑ यु॒गे प्र॑थ॒मेऽस॑तः॒ सद॑जायत। तदाशा॒ अन्व॑जायन्त॒ तदु॑त्ता॒नप॑द॒स्परि॑॥

अव्यक्त उपादन प्रकृति से व्यक्त विकृतिरूप उत्पन्न होता है, फिर संसार उत्पन्न होता है, पुनः दिशाएँ प्रकट होती हैं, पश्चात् पृथिवीलोक, पृथिवीलोक से कामनावाले प्राणी उत्पन्न होते हैं। इसी प्रकार आरम्भसृष्टि में अखण्ड अग्नि से सूर्य और सूर्य से उषा का प्रकाश होता है॥३,४॥

भूर्ज॑ज्ञ उत्ता॒नप॑दो भु॒व आशा॑ अजायन्त। अदि॑ते॒र्दक्षो॑ अजायत॒ दक्षा॒द्वदि॑तिः॒ परि॑॥

अव्यक्त उपादन प्रकृति से व्यक्त विकृतिरूप उत्पन्न होता है, फिर संसार उत्पन्न होता है, पुनः दिशाएँ प्रकट होती हैं, पश्चात् पृथिवीलोक, पृथिवीलोक से कामनावाले प्राणी उत्पन्न होते हैं। इसी प्रकार आरम्भसृष्टि में अखण्ड अग्नि से सूर्य और सूर्य से उषा का प्रकाश होता है॥३,४॥

अदि॑ति॒र्ह्यज॑निष्ट॒ दक्ष॒ या दु॑हि॒ता तव॑। तां दे॒वा अन्व॑जायन्त भ॒द्रा अ॒मृत॑बन्धवः॥

सूर्योदय होने के पश्चात् आकाश में उषा-पीलिमा प्रथम प्रातःकाल प्रकाशित होती है, पश्चात् प्रकाश करती हुई सूर्य की रश्मियाँ आती हैं, यह प्रातःकाल का स्वरूप है॥५॥

यद्दे॑वा अ॒दः स॑लि॒ले सुसं॑रब्धा॒ अति॑ष्ठत। अत्रा॑ वो॒ नृत्य॑तामिव ती॒व्रो रे॒णुरपा॑यत॥

सूर्य की किरणें जब अन्तरिक्ष में दृढ़ हो जाती हैं, तो सर्वत्र नाचती हुई सी सर्वत्र विचरती हैं, तो इनका प्रभावशाली ताप पृथिवी आदि लोकों पर पड़ता है॥६॥

यद्दे॑वा॒ यत॑यो यथा॒ भुव॑ना॒न्यपि॑न्वत। अत्रा॑ समु॒द्र आ गू॒ळ्हमा सूर्य॑मजभर्तन॥

मेघ परस्पर मिलकर वर्षा से लोकों को सींचते हैं, सूर्य की किरणें सूर्य को प्रकाशित करती हैं॥७॥

अ॒ष्टौ पु॒त्रासो॒ अदि॑ते॒र्ये जा॒तास्त॒न्व१॒॑स्परि॑। दे॒वाँ उप॒ प्रैत्स॒प्तभिः॒ परा॑ मार्ता॒ण्डमा॑स्यत्॥

सृष्टि के आरम्भ में अखण्ड अग्नि से सूर्यादि खण्डरूप गोले उत्पन्न होते हैं। प्रधान गोला मार्तण्ड नाम का है एवं प्रातःकाल की उषा से प्रहरों का विकास होता है॥८॥

स॒प्तभिः॑ पु॒त्रैरदि॑ति॒रुप॒ प्रैत्पू॒र्व्यं यु॒गम्। प्र॒जायै॑ मृ॒त्यवे॑ त्व॒त्पुन॑र्मार्ता॒ण्डमाभ॑रत्॥

आरम्भसृष्टि में अखण्ड अग्नि खण्डरूप मित्रादिनामक सूर्यभेदों से अथवा प्रातःकाल की उषा प्रहरों के साथ आती है, प्रथम-प्रथम सूर्य या प्रहरों को प्रकट करती है॥९॥

जनि॑ष्ठा उ॒ग्रः सह॑से तु॒राय॑ म॒न्द्र ओजि॑ष्ठो बहु॒लाभि॑मानः। अव॑र्ध॒न्निन्द्रं॑ म॒रुत॑श्चि॒दत्र॑ मा॒ता यद्वी॒रं द॒धन॒द्धनि॑ष्ठा॥

राजा प्रतापी स्वात्मगौरववाला अत्यन्त ओजस्वी अपने बल की रक्षा और शत्रुबल का नाश करनेवाला उत्तम सैनिक और सेनाध्यक्षों से युक्त होना चाहिए॥१॥

द्रु॒हो निष॑त्ता पृश॒नी चि॒देवैः॑ पु॒रू शंसे॑न वावृधु॒ष्ट इन्द्र॑म्। अ॒भीवृ॑तेव॒ ता म॑हाप॒देन॑ ध्वा॒न्तात्प्र॑पि॒त्वादुद॑रन्त॒ गर्भाः॑॥

राजा की सेना में सैनिक जन युद्ध में प्रगतिशील शत्रुनाशक होवें। राजा भी प्रजा को संकट से बचाने के लिये तत्पर रहे, इस प्रकार महान् आश्रय पाने से प्रजा सुख से रहती है॥२॥

ऋ॒ष्वा ते॒ पादा॒ प्र यज्जिगा॒स्यव॑र्ध॒न्वाजा॑ उ॒त ये चि॒दत्र॑। त्वमि॑न्द्र सालावृ॒कान्त्स॒हस्र॑मा॒सन्द॑धिषे अ॒श्विना व॑वृत्याः॥

सभावर्ग और सेनावर्ग राष्ट्रपति के राष्ट्र में प्रगति करने के महान् साधन हैं। इनके अन्दर जो सभासद् या सैनिक होते हैं, वे घर के रक्षक प्रहरी कुत्तों के समान या मार्ग में रक्षक सुख के निमित्त होते हैं, उनसे लाभ लेना चाहिए॥३॥

स॒म॒ना तूर्णि॒रुप॑ यासि य॒ज्ञमा नास॑त्या स॒ख्याय॑ वक्षि। व॒साव्या॑मिन्द्र धारयः स॒हस्रा॒श्विना॑ शूर ददतुर्म॒घानि॑॥

राजा संग्राम के लिये सभावर्ग और सेनावर्गों के साथ सहमति और संगति प्राप्त करके विजय पाता है॥४॥

मन्द॑मान ऋ॒तादधि॑ प्र॒जायै॒ सखि॑भि॒रिन्द्र॑ इषि॒रेभि॒रर्थ॑म्। आभि॒र्हि मा॒या उप॒ दस्यु॒मागा॒न्मिहः॒ प्र त॒म्रा अ॑वप॒त्तमां॑सि॥

राजा को अच्छा शासन करने के लिये राज्य के उच्चाधिकारियों के साथ प्रजा के हितार्थ तथा प्रजाओं के साथ भी मन्त्रणा-विचार कर शत्रु पर आक्रमण करना चाहिए तथा अभीष्ट सुखवृष्टि करता हुआ दुःखाऽज्ञानादि को नष्ट करे॥५॥

सना॑माना चिद्ध्वसयो॒ न्य॑स्मा॒ अवा॑ह॒न्निन्द्र॑ उ॒षसो॒ यथानः॑। ऋ॒ष्वैर॑गच्छः॒ सखि॑भि॒र्निका॑मैः सा॒कं प्र॑ति॒ष्ठा हृद्या॑ जघन्थ॥

राजा को चाहिए कि अपने ऊँचे अधिकारियों की सहायता से शत्रुओं को नियन्त्रित तथा शासित करे, जो अधिकारी स्वार्थरहित तथा प्रजाहित राष्ट्रहित रखते हों, उनके साथ अपने हार्दिक भावों को सफल करे॥६॥

त्वं ज॑घन्थ॒ नमु॑चिं मख॒स्युं दासं॑ कृण्वा॒न ऋष॑ये॒ विमा॑यम्। त्वं च॑कर्थ॒ मन॑वे स्यो॒नान्प॒थो दे॑व॒त्राञ्ज॑सेव॒ याना॑न्॥

मननीय उपास्य द्रष्टा परमात्मा के लिए तुझ छलरहित के प्रति दासभावना करता है, हीनभावना रखता है, इस श्रेष्ठकर्म को नष्ट करनेवाले को तू दण्ड देता है तथा विद्वानों का मार्ग परिष्कृत करता है॥७॥

त्वमे॒तानि॑ पप्रिषे॒ वि नामेशा॑न इन्द्र दधिषे॒ गभ॑स्तौ। अनु॑ त्वा दे॒वाः शव॑सा मदन्त्यु॒परि॑बुध्नान्व॒निन॑श्चकर्थ॥

राजा शत्रुओं को नमानेवाले अपने सैन्यबलों की रक्षा करे तथा अपने हाथ में भी शस्त्र अस्त्र धारण करता है, तो विजयाकाङ्क्षी विद्वान् भी उसका साथ देते हैं, फिर वह अति-बलवान् शत्रुओं को भी नष्ट करता है॥८॥

च॒क्रं यद॑स्या॒प्स्वा निष॑त्तमु॒तो तद॑स्मै॒ मध्विच्च॑च्छद्यात्। पृ॒थि॒व्यामति॑षितं॒ यदूधः॒ पयो॒ गोष्वद॑धा॒ ओष॑धीषु॥

राजा का राष्ट्र नदियों नहरों से युक्त हो, इससे राष्ट्र को बल मिलता है। राष्ट्र भूमि में जल को एकत्र तथा बान्ध बनाकर खेतों और ओषधियों में सींचे॥९॥

अश्वा॑दिया॒येति॒ यद्वद॒न्त्योज॑सो जा॒तमु॒त म॑न्य एनम्। म॒न्योरि॑याय ह॒र्म्येषु॑ तस्थौ॒ यतः॑ प्रज॒ज्ञ इन्द्रो॑ अस्य वेद॥

अश्वमेध अर्थात् राष्ट्रसञ्चालन के लिए राजा राजपद पर विराजमान होता है, वह अपने प्रताप से और गुणप्रभाव से राजा बनता है। जितेन्द्रिय और प्रजाहित साधने के लिये॥१०॥

वयः॑ सुप॒र्णा उप॑ सेदु॒रिन्द्रं॑ प्रि॒यमे॑धा॒ ऋष॑यो॒ नाध॑मानाः। अप॑ ध्वा॒न्तमू॑र्णु॒हि पू॒र्धि चक्षु॑र्मुमु॒ग्ध्य१॒॑स्मान्नि॒धये॑व ब॒द्धान्॥

राष्ट्रहितैषी विद्वान् जन शासक से प्रेरणा पाये हुए सर्वत्र ज्ञान का प्रकाश करें, जिससे कि अज्ञानान्धकार दूर हो जावे॥११॥

वसू॑नां वा चर्कृष॒ इय॑क्षन्धि॒या वा॑ य॒ज्ञैर्वा॒ रोद॑स्योः। अर्व॑न्तो वा॒ ये र॑यि॒मन्तः॑ सा॒तौ व॒नुं वा॒ ये सु॒श्रुणं॑ सु॒श्रुतो॒ धुः॥

राजा-प्रजा के व्यवहारों में प्रसिद्ध अधिकारियों को तथा संग्राम में बढ़नेवाले सैनिकों को, जो शत्रु पर विजय पाते हैं, उनको पुरस्कार प्रदान कर शासक सम्मानित करें॥१॥

हव॑ एषा॒मसु॑रो नक्षत॒ द्यां श्र॑वस्य॒ता मन॑सा निंसत॒ क्षाम्। चक्षा॑णा॒ यत्र॑ सुवि॒ताय॑ दे॒वा द्यौर्न वारे॑भिः कृ॒णव॑न्त॒ स्वैः॥

राष्ट्र में सैनिकों का घोष शासक को प्रेरित करनेवाला है। वह आकाश में व्यापनेवाला और पृथिवी को छूनेवाला होना चाहिए तथा विद्वान् लोग राष्ट्र में ज्ञान का प्रकाश ऐसे फैला दें, जैसे सूर्य अपनी किरणों से प्रकाश फैलाता है॥२॥

इ॒यमे॑षाम॒मृता॑नां॒ गीः स॒र्वता॑ता॒ ये कृ॒पण॑न्त॒ रत्न॑म्। धियं॑ च य॒ज्ञं च॒ साध॑न्त॒स्ते नो॑ धान्तु वस॒व्य१॒॑मसा॑मि॥

जीवन्मुक्त विद्वान् अपनी वाणी से सब सुखों को सिद्ध करने का उपदेश करें और मोक्षप्राप्ति के लिए समर्थ बनावें, जो सब धनों में श्रेष्ठ धन है॥३॥

आ तत्त॑ इन्द्रा॒यवः॑ पनन्ता॒भि य ऊ॒र्वं गोम॑न्तं॒ तितृ॑त्सान्। स॒कृ॒त्स्वं१॒॑ ये पु॑रुपु॒त्रां म॒हीं स॒हस्र॑धारां बृह॒तीं दुदु॑क्षन्॥

राजा के राज्य में पृथिवी जलधाराओं से युक्त अन्नफलादि उत्पन्न करनेवाली होवे, तो प्रजाजन सुख  पाते हुए शासक को प्रसन्न करते हैं और गुण गाते हैं॥४॥

शची॑व॒ इन्द्र॒मव॑से कृणुध्व॒मना॑नतं द॒मय॑न्तं पृत॒न्यून्। ऋ॒भु॒क्षणं॑ म॒घवा॑नं सुवृ॒क्तिं भर्ता॒ यो वज्रं॒ नर्यं॑ पुरु॒क्षुः॥

कर्मकर्त्ता राष्ट्र के कर्मठ जन संग्राम के इच्छुक शत्रुओं के दमन करनेवाले अन्य के वश में न आनेवाले विद्वानों और शिल्पियों को राष्ट्र में बसानेवाले प्रजाजनों के लिये अन्नादि की व्यवस्था करनेवाले को राजा बनाना चाहिए॥५॥

यद्वा॒वान॑ पुरु॒तमं॑ पुरा॒षाळा वृ॑त्र॒हेन्द्रो॒ नामा॑न्यप्राः। अचे॑ति प्रा॒सह॒स्पति॒स्तुवि॑ष्मा॒न्यदी॑मु॒श्मसि॒ कर्त॑वे॒ कर॒त्तत्॥

राजा स्वयं बहुत बलवान् और सैन्यबलों का स्वामी शत्रु के बलों का संहार करनेवाला उनके नगरों पर अधिकार करनेवाला होना चाहिए॥६॥

प्र सु व॑ आपो महि॒मान॑मुत्त॒मं का॒रुर्वो॑चाति॒ सद॑ने वि॒वस्व॑तः। प्र स॒प्तस॑प्त त्रे॒धा हि च॑क्र॒मुः प्र सृत्व॑रीणा॒मति॒ सिन्धु॒रोज॑सा॥

अप्तत्त्व पदार्थ तीनों लोकों में सात-सात करके प्रवाहित होते हैं। द्युलोक में सूर्य की किरणें, अन्तरिक्ष में विद्युद्धाराएँ, पृथिवी पर जलप्रवाह, इनका जाननेवाला वैज्ञानिक शिल्पी राजा के राजभवन में या विज्ञानभवन में इनका प्रवचन करे, इनसे लाभ लेने के लिये॥१॥

प्र ते॑ऽरद॒द्वरु॑णो॒ यात॑वे प॒थः सिन्धो॒ यद्वाजाँ॑ अ॒भ्यद्र॑व॒स्त्वम्। भूम्या॒ अधि॑ प्र॒वता॑ यासि॒ सानु॑ना॒ यदे॑षा॒मग्रं॒ जग॑तामिर॒ज्यसि॑॥

परमात्मा की शक्ति से जलप्रवाह पृथिवी के ऊपरी भाग से नीचे को बहते हैं, अन्न औषधि आदि के उत्पत्त्यर्थ तथा मनुष्यादि प्राणियों के सुखसाधनार्थ गति करते हैं॥२॥

दि॒वि स्व॒नो य॑तते॒ भूम्यो॒पर्य॑न॒न्तं शुष्म॒मुदि॑यर्ति भा॒नुना॑। अ॒भ्रादि॑व॒ प्र स्त॑नयन्ति वृ॒ष्टयः॒ सिन्धु॒र्यदेति॑ वृष॒भो न रोरु॑वत्॥

विद्युत् से ताड़ित मेघ का जल शब्द करता हुआ भूमि पर आता है और निम्न स्थान पर दूर तक पहुँचता है, उससे कृषि आदि का लाभ लेना चाहिए॥३॥

अ॒भि त्वा॑ सिन्धो॒ शिशु॒मिन्न मा॒तरो॑ वा॒श्रा अ॑र्षन्ति॒ पय॑सेव धे॒नवः॑। राजे॑व॒ युध्वा॑ नयसि॒ त्वमित्सिचौ॒ यदा॑सा॒मग्रं॑ प्र॒वता॒मिन॑क्षसि॥

नदियाँ पृथिवी पर बहती हैं, पृथिवीपृष्ठ को सींचने के लिये, अन्तरिक्ष का जलसमूह इनका प्रेरक है॥४॥

इ॒मं मे॑ गङ्गे यमुने सरस्वति॒ शुतु॑द्रि॒ स्तोमं॑ सचता॒ परु॒ष्ण्या। अ॒सि॒क्न्या म॑रुद्वृधे वि॒तस्त॒यार्जी॑कीये शृणु॒ह्या सु॒षोम॑या॥

पृथिवीपृष्ठ पर भिन्न-भिन्न रूप और गति से बहनेवाली नदियाँ मानव को लाभ पहुँचानेवाली हैं, उनसे लाभ होना चाहिए॥५॥

तृ॒ष्टाम॑या प्रथ॒मं यात॑वे स॒जूः सु॒सर्त्वा॑ र॒सया॑ श्वे॒त्या त्या। त्वं सि॑न्धो॒ कुभ॑या गोम॒तीं क्रुमुं॑ मेह॒त्न्वा स॒रथं॒ याभि॒रीय॑से॥

थोड़े जलवाली नदी बहुत जलवाली नदी के साथ मिल जाती है, तीव्र गति से बहनेवाली नदी निर्मल-श्वेत जलवाली होती है। वह भयङ्कर गहरी होती है तथा फैलनेवाली नदी और दूर तक जानेवाली नदी भूमि को सींचती हुई बहती हैं, इन सब का आश्रय पार्थिव समुद्र है॥६॥

ऋजी॒त्येनी॒ रुश॑ती महि॒त्वा परि॒ ज्रयां॑सि भरते॒ रजां॑सि। अद॑ब्धा॒ सिन्धु॑र॒पसा॑म॒पस्त॒माश्वा॒ न चि॒त्रा वपु॑षीव दर्श॒ता॥

भाँति-भाँति की जलधाराओं को अन्तरिक्षस्थ जलसमूह धारण करता है, जो पृथिवी पर बरस कर लाभ पहुँचाता है॥७॥

स्वश्वा॒ सिन्धुः॑ सु॒रथा॑ सु॒वासा॑ हिर॒ण्ययी॒ सुकृ॑ता वा॒जिनी॑वती। ऊर्णा॑वती युव॒तिः सी॒लमा॑वत्यु॒ताधि॑ वस्ते सु॒भगा॑ मधु॒वृध॑म्॥

अन्तरिक्षस्थ  जलसमूह एक बड़ी भारी नदी है, सारी पृथिवी की नदियों का आधार है। वह पृथिवी पर बरस कर आती है बड़े वेग से घोड़ों की गति की भाँति, बड़े सुन्दरयान की भाँति आती है और पृथिवी पर वस्त्रसाधन कपास अन्य सुनहरी वस्तुओं बल क्रियाओं, खेती के उपयोगी धान्य को देती हुई और बढ़ाती हुई आती है॥८॥

सु॒खं रथं॑ युयुजे॒ सिन्धु॑र॒श्विनं॒ तेन॒ वाजं॑ सनिषद॒स्मिन्ना॒जौ। म॒हान्ह्य॑स्य महि॒मा प॑न॒स्यतेऽद॑ब्धस्य॒ स्वय॑शसो विर॒प्शिनः॑॥

परमात्मा सुखों को प्रवाहित करनेवाला महान् सिन्धु है। वह हमारे लिए मोक्षानन्द तथा जगत् के सुख को प्रदान करता है, उसकी महिमा महान् है, हमें उसके यश का और गुणों का गान करना चाहिए॥९॥

आ व॑ ऋञ्जस ऊ॒र्जां व्यु॑ष्टि॒ष्विन्द्रं॑ म॒रुतो॒ रोद॑सी अनक्तन। उ॒भे यथा॑ नो॒ अह॑नी सचा॒भुवा॒ सदः॑सदो वरिव॒स्यात॑ उ॒द्भिदा॑॥

विद्वानों के अनुकूल आचरण करने से अन्नादि की प्राप्ति होती है। परमात्मा को जीवन्मुक्त मित्रसम्बन्धी जन भी अपनाते हैं, दिन-रात भी प्रत्येक घर में सुखदायक व्यतीत होते हैं॥१॥

तदु॒ श्रेष्ठं॒ सव॑नं सुनोत॒नात्यो॒ न हस्त॑यतो॒ अद्रिः॑ सो॒तरि॑। वि॒दद्ध्य१॒॑र्यो अ॒भिभू॑ति॒ पौंस्यं॑ म॒हो रा॒ये चि॑त्तरुते॒ यदर्व॑तः॥

परमात्मा की स्तुति में इतना बँध जाऊँ, जैसे घोड़ा बँध जाता है, इस ऐसे श्रेष्ठ अवसर को हम बनावें, वह स्वामी परमात्मा आत्मबल प्रदान करे, जिससे कि प्राप्तव्य पदार्थों को हम प्राप्त कर सकें॥२॥

तदिद्ध्य॑स्य॒ सव॑नं वि॒वेर॒पो यथा॑ पु॒रा मन॑वे गा॒तुमश्रे॑त्। गोअ॑र्णसि त्वा॒ष्ट्रे अश्व॑निर्णिजि॒ प्रेम॑ध्व॒रेष्व॑ध्व॒राँ अ॑शिश्रयुः॥

आत्मा के लिये परमात्मा यह अवसर और कर्मविधान प्रदर्शित करता है कि आनन्दरसपूर्ण मोक्ष कैसे प्राप्त होता है, जो परम्परा से स्तुति करनेवाला प्राप्त करता था। उस ऐसे अभीष्ट आनन्द का अध्यात्मयाजी आश्रय लिया करते हैं॥३॥

अप॑ हत र॒क्षसो॑ भङ्गु॒राव॑त स्कभा॒यत॒ निॠ॑तिं॒ सेध॒ताम॑तिम्। आ नो॑ र॒यिं सर्व॑वीरं सुनोतन देवा॒व्यं॑ भरत॒ श्लोक॑मद्रयः॥

विद्वान् जन जनता को ऐसा उपदेश करें, जिससे कि उनके अन्दर से दुष्ट विचार, अस्थिरता, अज्ञान दूर होकर वे स्वास्थ्य और परमात्मा की प्राप्ति कर सकें॥४॥

दि॒वश्चि॒दा वोऽम॑वत्तरेभ्यो वि॒भ्वना॑ चिदा॒श्व॑पस्तरेभ्यः। वा॒योश्चि॒दा सोम॑रभस्तरेभ्यो॒ऽग्नेश्चि॑दर्च पितु॒कृत्त॑रेभ्यः॥

मन्त्रोपदेष्टा जन सूर्य से भी अधिक प्रतापी, तेजस्वी, आकाश से भी अधिक विद्याओं में व्यापक, वायु से भी अधिक शान्त प्रवाहवाले, अग्नि से भी अधिक ज्ञानान्न के पचानेवाले होने चाहिए और उनकी अर्चना करनी चाहिए॥५॥

भु॒रन्तु॑ नो य॒शसः॒ सोत्वन्ध॑सो॒ ग्रावा॑णो वा॒चा दि॒विता॑ दि॒वित्म॑ता। नरो॒ यत्र॑ दुह॒ते काम्यं॒ मध्वा॑घो॒षय॑न्तो अ॒भितो॑ मिथ॒स्तुरः॑॥

जीवन्मुक्त जन ध्यान करने योग्य परमात्मा के स्वरूप को दिव्यवाणी वेद के द्वारा समझाते हैं, जिस वेदवाणी में ज्ञानमधु भरा हुआ है, यह घोषित करते हुए उसे प्रकट करते हैं॥६॥

सु॒न्वन्ति॒ सोमं॑ रथि॒रासो॒ अद्र॑यो॒ निर॑स्य॒ रसं॑ ग॒विषो॑ दुहन्ति॒ ते। दु॒हन्त्यूध॑रुप॒सेच॑नाय॒ कं नरो॑ ह॒व्या न म॑र्जयन्त आ॒सभिः॑॥

जीवन्मुक्त महानुभाव स्तुतियों के द्वारा अपनी आत्मा में परमात्मा को साक्षात् करते हैं और अन्यों के लिए भी अपने प्रवचनों से उन्हें परमात्मा की ओर प्रेरित करते हैं॥७॥

ए॒ते न॑रः॒ स्वप॑सो अभूतन॒ य इन्द्रा॑य सुनु॒थ सोम॑मद्रयः। वा॒मंवा॑मं वो दि॒व्याय॒ धाम्ने॒ वसु॑वसु वः॒ पार्थि॑वाय सुन्व॒ते॥

जीवन्मुक्त महानुभावों के प्रवचन मोक्षानन्द के लिए तथा सांसारिक सुख के लिए भी होते हैं, उन का सत्सङ्ग करना आवश्यक है॥८॥

अ॒भ्र॒प्रुषो॒ न वा॒चा प्रु॑षा॒ वसु॑ ह॒विष्म॑न्तो॒ न य॒ज्ञा वि॑जा॒नुषः॑। सु॒मारु॑तं॒ न ब्र॒ह्माण॑म॒र्हसे॑ ग॒णम॑स्तोष्येषां॒ न शो॒भसे॑॥

जीवन्मुक्त महानुभावों की प्रशंसा करनी चाहिए, वे अपने अमृतभाषण को बरसाते हैं, जैसे मेघ जल बरसाते हैं॥१॥

श्रि॒ये मर्या॑सो अ॒ञ्जीँर॑कृण्वत सु॒मारु॑तं॒ न पू॒र्वीरति॒ क्षपः॑। दि॒वस्पु॒त्रास॒ एता॒ न ये॑तिर आदि॒त्यास॒स्ते अ॒क्रा न वा॑वृधुः॥

जीवन्मुक्त महानुभावों को आदर देना चाहिए, इनके द्वारा प्राप्त प्रवृत्तियाँ या प्रेरणाएँ मनुष्य को आगे ले जाती हैं, उनसे पार्थिव एवं शारीरिक दोष नहीं बढ़ते हैं॥२॥

प्र ये दि॒वः पृ॑थि॒व्या न ब॒र्हणा॒ त्मना॑ रिरि॒च्रे अ॒भ्रान्न सूर्यः॑। पाज॑स्वन्तो॒ न वी॒राः प॑न॒स्यवो॑ रि॒शाद॑सो॒ न मर्या॑ अ॒भिद्य॑वः॥

जो जीवन्मुक्त महानुभाव भारी आत्मबल से युक्त हों, तीनों लोकों के ज्ञान से युक्त हों, वे प्रशंसा के योग्य हैं, उनकी सङ्गति अपने कल्याण के लिए मनुष्य करें॥३॥

यु॒ष्माकं॑ बु॒ध्ने अ॒पां न याम॑नि विथु॒र्यति॒ न म॒ही श्र॑थ॒र्यति॑। वि॒श्वप्सु॑र्य॒ज्ञो अ॒र्वाग॒यं सु वः॒ प्रय॑स्वन्तो॒ न स॒त्राच॒ आ ग॑त॥

जीवन्मुक्त विद्वानों के द्वारा उनका ज्ञानबोधनप्रवाह हमें प्राप्त होवे, जैसे जलों के प्रवाह से पृथिवी को कोई हानि नहीं होती, ऐसे ही हमारी अन्तःस्थली की कोई हानि नहीं होती। वह तो निर्मल होती चली जाती है। वह विश्वव्यापी ज्ञानयज्ञ हमें प्राप्त होता रहे, एतदर्थ तुम भी प्राप्त होते रहो॥४॥

यू॒यं धू॒र्षु प्र॒युजो॒ न र॒श्मिभि॒र्ज्योति॑ष्मन्तो॒ न भा॒सा व्यु॑ष्टिषु। श्ये॒नासो॒ न स्वय॑शसो रि॒शाद॑सः प्र॒वासो॒ न प्रसि॑तासः परि॒प्रुषः॑॥

विद्वान् जन अपनी ज्ञानस्थलियों में हमें नियुक्त करें, ज्ञान से और शुभाचरण से हमें प्रसाधित करें। जैसे वे यशस्वी हैं, वैसे हमें उपदेशामृत देकर निर्दोष बनाएँ॥५॥

प्र यद्वह॑ध्वे मरुतः परा॒काद्यू॒यं म॒हः सं॒वर॑णस्य॒ वस्वः॑। वि॒दा॒नासो॑ वसवो॒ राध्य॑स्या॒राच्चि॒द्द्वेषः॑ सनु॒तर्यु॑योत॥

विद्वान् जन अपने अध्यात्म उपदेश से मनुष्य को इस योग्य बना देते हैं कि उसके अन्दर की द्वेषभावनाएँ समाप्त हो जाती हैं और वह मोक्षानन्द का अधिकारी बन जाता है॥६॥

य उ॒दृचि॑ य॒ज्ञे अ॑ध्वरे॒ष्ठा म॒रुद्भ्यो॒ न मानु॑षो॒ ददा॑शत्। रे॒वत्स वयो॑ दधते सु॒वीरं॒ स दे॒वाना॒मपि॑ गोपी॒थे अ॑स्तु॥

अध्यात्ममार्गवाले योगाभ्यास तथा परमात्मा की स्तुति के निमित्त मनुष्य जीवन्मुक्त विद्वानों की संगति से मोक्षानन्द पान करने का अधिकारी उत्कृष्ट जीवनवाला बन जाता है॥७॥

ते हि य॒ज्ञेषु॑ य॒ज्ञिया॑स॒ ऊमा॑ आदि॒त्येन॒ नाम्ना॒ शम्भ॑विष्ठाः। ते नो॑ऽवन्तु रथ॒तूर्म॑नी॒षां म॒हश्च॒ याम॑न्नध्व॒रे च॑का॒नाः॥

जीवन्मुक्त विद्वान् ज्ञानयज्ञ में सत्कार करने योग्य हैं, वे मोक्षानन्द के लिए मनुष्यों को प्रेरित करते हैं और अपनी शरण में लेकर बुद्धि तथा ज्ञान को बढ़ाते हैं॥८॥

विप्रा॑सो॒ न मन्म॑भिः स्वा॒ध्यो॑ देवा॒व्यो॒३॒॑ न य॒ज्ञैः स्वप्न॑सः। राजा॑नो॒ न चि॒त्राः सु॑सं॒दृशः॑ क्षिती॒नां न मर्या॑ अरे॒पसः॑॥

जीवन्मुक्त विद्वान् अपने ज्ञानों से लोगों की कामनाओं को पूरा करनेवाले तथा उत्तम कर्मों के द्वारा सुख का अनुभव करानेवाले मनुष्यों के अन्दर विचरण करते रहें॥१॥

अ॒ग्निर्न ये भ्राज॑सा रु॒क्मव॑क्षसो॒ वाता॑सो॒ न स्व॒युजः॑ स॒द्यऊ॑तयः। प्र॒ज्ञा॒तारो॒ न ज्येष्ठाः॑ सुनी॒तयः॑ सु॒शर्मा॑णो॒ न सोमा॑ ऋ॒तं य॒ते॥

जो तेजस्वी ज्ञानवान् मनुष्यों के नेता सुप्रतिष्ठित शान्त सुखप्रद जीवन्मुक्त महानुभाव हैं, उनसे अध्यात्ममार्ग का उपदेश लेना चाहिए॥२॥

वाता॑सो॒ न ये धुन॑यो जिग॒त्नवो॑ऽग्नी॒नां न जि॒ह्वा वि॑रो॒किणः॑। वर्म॑ण्वन्तो॒ न यो॒धाः शिमी॑वन्तः पितॄ॒णां न शंसाः॑ सुरा॒तयः॑॥

जो महानुभाव जीवन देनेवाले, पापों को दूर करनेवाले, आगे बढ़ानेवाले तेजस्वी कर्मठ प्रशंसनीय तथा ज्ञान के देनेवाले हैं, उनकी सङ्गति करनी चाहिए॥३॥

रथा॑नां॒ न ये॒३॒॑ऽराः सना॑भयो जिगी॒वांसो॒ न शूरा॑ अ॒भिद्य॑वः। व॒रे॒यवो॒ न मर्या॑ घृत॒प्रुषो॑ऽभिस्व॒र्तारो॑ अ॒र्कं न सु॒ष्टुभः॑॥

जो जीवन्मुक्त एक उपास्यवाले, पापों पर विजय पानेवाले, तेजस्वी वक्ता हैं, उनकी सङ्गति करनी चाहिए॥४॥

अश्वा॑सो॒ न ये ज्येष्ठा॑स आ॒शवो॑ दिधि॒षवो॒ न र॒थ्यः॑ सु॒दान॑वः। आपो॒ न नि॒म्नैरु॒दभि॑र्जिग॒त्नवो॑ वि॒श्वरू॑पा॒ अङ्गि॑रसो॒ न साम॑भिः॥

जो विद्वान् विद्या में प्रवेशशील, ध्यानवान्, उपासक, अपने शरीररथ के स्वामी अर्थात् संयमी, नम्र विद्या का प्रवाह चलानेवाले, सब मनुष्यों तक प्रवृत्त होते हैं, उनकी सङ्गति करनी चाहिए॥५॥

ग्रावा॑णो॒ न सू॒रयः॒ सिन्धु॑मातर आदर्दि॒रासो॒ अद्र॑यो॒ न वि॒श्वहा॑। शि॒शूला॒ न क्री॒ळयः॑ सुमा॒तरो॑ महाग्रा॒मो न याम॑न्नु॒त त्वि॒षा॥

ज्ञानसमूह को रखनेवाले, जनता में उस की वृष्टि करनेवाले, पापों को सदा विदीर्ण करनेवाले, संसार में मोक्षमार्ग की यात्रा करनेवाले विद्वान् धन्य हैं, उन की संगति करनी चाहिए॥६॥

उ॒षसां॒ न के॒तवो॑ऽध्वर॒श्रियः॑ शुभं॒यवो॒ नाञ्जिभि॒र्व्य॑श्वितन्। सिन्ध॑वो॒ न य॒यियो॒ भ्राज॑दृष्टयः परा॒वतो॒ न योज॑नानि ममिरे॥

जो विद्वान् प्रातर्वेला में किरणों के समान आगे बढ़नेवाले ज्ञान के प्रकाशक, नदियों के समान प्रगतिशील, दूर देशों में भी सफल योजनाओं को सफल बनानेवाले हैं, वे धन्य हैं, उनकी संगति करनी चाहिए॥७॥

सु॒भा॒गान्नो॑ देवाः कृणुता सु॒रत्ना॑न॒स्मान्त्स्तो॒तॄन्म॑रुतो वावृधा॒नाः। अधि॑ स्तो॒त्रस्य॑ स॒ख्यस्य॑ गात स॒नाद्धि वो॑ रत्न॒धेया॑नि॒ सन्ति॑॥

जीवन्मुक्त विद्वानों का सङ्ग कर उनसे प्रार्थना करनी चाहिए कि अपने ज्ञान में भागवाले बनावें, परमात्मा के साथ मित्र-भाव हो जावे, ऐसा उपदेश करें और अध्यात्मरत्न हमारे अन्दर प्रविष्ट हो जावें॥८॥

अप॑श्यमस्य मह॒तो म॑हि॒त्वमम॑र्त्यस्य॒ मर्त्या॑सु वि॒क्षु। नाना॒ हनू॒ विभृ॑ते॒ सं भ॑रेते॒ असि॑न्वती॒ बप्स॑ती॒ भूर्य॑त्तः॥

परमात्मा महान् है, विभु है, इसका महत्त्व समस्त स्थावर जङ्गम वस्तुओं में व्याप्त है। संहारकाल में सब को अपने अन्दर ले लेता है, इस ऐसे उत्पादक, धारक, संहारक को मानना और उस की उपासना करनी चाहिए॥१॥

गुहा॒ शिरो॒ निहि॑त॒मृध॑ग॒क्षी असि॑न्वन्नत्ति जि॒ह्वया॒ वना॑नि। अत्रा॑ण्यस्मै प॒ड्भिः सं भ॑रन्त्युत्ता॒नह॑स्ता॒ नम॒साधि॑ वि॒क्षु॥

मुक्तात्माओं का आश्रययोग्य धाम मोक्ष है, जो मनुष्य उदार भावनाओंवाले स्तुति और  योगाङ्गों का सेवन करके उत्तम कर्म करते हैं, वे मोक्ष के भागी बनते हैं॥२॥

प्र मा॒तुः प्र॑त॒रं गुह्य॑मि॒च्छन्कु॑मा॒रो न वी॒रुधः॑ सर्पदु॒र्वीः। स॒सं न प॒क्वम॑विदच्छु॒चन्तं॑ रिरि॒ह्वांसं॑ रि॒प उ॒पस्थे॑ अ॒न्तः॥

उपासक आत्मा माता परमात्मा के आनन्दधाम मोक्ष का आस्वादन करने के लिए ऐसे प्राप्त होता है, जैसे कोई बालक कर्मानुसार युवति माता के आश्रय में सुखों को प्राप्त करता है॥३॥

तद्वा॑मृ॒तं रो॑दसी॒ प्र ब्र॑वीमि॒ जाय॑मानो मा॒तरा॒ गर्भो॑ अत्ति। नाहं दे॒वस्य॒ मर्त्य॑श्चिकेता॒ग्निर॒ङ्ग विचे॑ताः॒ स प्रचे॑ताः॥

माता-पिता बालक को अनेक दोषों से बचावें या बचाया करते हैं। बालक जन्म से ही माता-पिता के अङ्गों से बढ़ता है तथा उत्पन्न करनेवाला परमात्मा उसे विशेष सावधान करता है संसार में रहने के लिए तथा प्रकृष्टरूप में प्रबुद्ध करता है मोक्षप्राप्ति के लिए। वह उसे भी नहीं जानता है। उसे जानना और मानना चाहिए, इसी में कल्याण है॥४॥

यो अ॑स्मा॒ अन्नं॑ तृ॒ष्वा॒३॒॑दधा॒त्याज्यै॑र्घृ॒तैर्जु॒होति॒ पुष्य॑ति। तस्मै॑ स॒हस्र॑म॒क्षभि॒र्वि च॒क्षेऽग्ने॑ वि॒श्वतः॑ प्र॒त्यङ्ङ॑सि॒ त्वम्॥

जैसे जीवात्मा संसार में जन्म लेता है, उसी समय से तुरन्त ही परमात्मा उसके आहार की व्यवस्था करता है। माता के स्तनों में दूध देता है, वनस्पतियों में रस देता है तथा प्राणों और जीवनप्रद तेज प्रभावों से बढ़ाता है और पुष्ट करता है तथा अपनी अनन्त ज्ञानदृष्टियों से सब कुछ जानता है और सर्वत्र विराजमान है॥५॥

किं दे॒वेषु॒ त्यज॒ एन॑श्चक॒र्थाग्ने॑ पृ॒च्छामि॒ नु त्वामवि॑द्वान्। अक्री॑ळ॒न्क्रीळ॒न्हरि॒रत्त॑वे॒ऽदन्वि प॑र्व॒शश्च॑कर्त॒ गामि॑वा॒सिः॥

परमात्मा जीवन्मुक्त विद्वानों के निमित्त कोई क्रोध या अहित कार्य नहीं करता है। इस बात को अविद्वान् नहीं जान सकता, किन्तु वह जो संसार में जन्मा है, लीलया उसका संहार करके अपने में ले लेता है प्रत्येक अङ्ग का विभाग करके॥६॥

विषू॑चो॒ अश्वा॑न्युयुजे वने॒जा ऋजी॑तिभी रश॒नाभि॑र्गृभी॒तान्। च॒क्ष॒दे मि॒त्रो वसु॑भिः॒ सुजा॑तः॒ समा॑नृधे॒ पर्व॑भिर्वावृधा॒नः॥

आत्मा शरीर के अन्दर प्राणों के साथ प्रसिद्ध हो जन्म लेता है और भोगप्रवृत्तियों में इन्द्रियों को लगाता है, धीरे-धीरे समय पाकर तथा अपने अङ्गों से पूर्ण आयु को प्राप्त होता है॥७॥

अ॒ग्निः सप्तिं॑ वाजम्भ॒रं द॑दात्य॒ग्निर्वी॒रं श्रुत्यं॑ कर्मनि॒ष्ठाम्। अ॒ग्नी रोद॑सी॒ वि च॑रत्सम॒ञ्जन्न॒ग्निर्नारीं॑ वी॒रकु॑क्षिं॒ पुरं॑धिम्॥

परमात्मा मानव को संसार में कार्यसिद्धि के लिए प्राण और मन प्रदान करता है और आज्ञाकारी पुत्र को भी प्रदान करता है। गृहस्थ आश्रम को धारण करने के लिये स्त्री-पुरुषों को प्रेरित करता है और स्त्री को पुत्र को गर्भ में धारण करने के योग्य बनाता है॥१॥

अ॒ग्नेरप्न॑सः स॒मिद॑स्तु भ॒द्राग्निर्म॒ही रोद॑सी॒ आ वि॑वेश। अ॒ग्निरेकं॑ चोदयत्स॒मत्स्व॒ग्निर्वृ॒त्राणि॑ दयते पु॒रूणि॑॥

संसार के रचयिता तथा जीवों के कर्मफलप्रदाता की भेंट भौतिक वस्तु नहीं है, किन्तु आत्मभावभरी स्तुति है, वह द्यावापृथिवीमय जगत् में व्यापक है, वह अकेले मनुष्य को भी विरोधियों को दबाने के लिए बल प्रदान करता है॥२॥

अ॒ग्निर्ह॒ त्यं जर॑तः॒ कर्ण॑मावा॒ग्निर॒द्भ्यो निर॑दह॒ज्जरू॑थम्। अ॒ग्निरत्रिं॑ घ॒र्म उ॑रुष्यद॒न्तर॒ग्निर्नृ॒मेधं॑ प्र॒जया॑सृज॒त्सम्॥

परमात्मा अपनी स्तुति करनेवाले के स्तुति सुनते हुए कान की रक्षा करता है और उस की वाणी को सुरक्षित रखता है, संसार में उसे सन्तानवाला मोक्ष में अमृत प्राण प्रदान करता है॥३॥

अ॒ग्निर्दा॒द्द्रवि॑णं वी॒रपे॑शा अ॒ग्निॠषिं॒ यः स॒हस्रा॑ स॒नोति॑। अ॒ग्निर्दि॒वि ह॒व्यमा त॑ताना॒ग्नेर्धामा॑नि॒ विभृ॑ता पुरु॒त्रा॥

परमात्मा अपने द्रष्टा-दर्शन के इच्छुक के लिए मौक्षैश्वर्य देता है, जो उसके लिए बहुत सुखी वचनों को समर्पित करता है, उन स्तुतियों का विस्तृत फल मोक्षप्राप्ति है॥४॥

अ॒ग्निमु॒क्थैॠष॑यो॒ वि ह्व॑यन्ते॒ऽग्निं नरो॒ याम॑नि बाधि॒तासः॑। अ॒ग्निं वयो॑ अ॒न्तरि॑क्षे॒ पत॑न्तो॒ऽग्निः स॒हस्रा॒ परि॑ याति॒ गोना॑म्॥

कामादि दोषों से पीड़ित जन परमात्मा का स्मरण करें, उन्नति की ओर चलनेवाले जन उसकी उपासना करें, परमात्मदर्शन के इच्छुक महानुभाव वेदवचनों से उस का आमन्त्रण करें, इस प्रकार उन के सहस्रगुणित प्रयोजनों को परमात्मा प्राप्त कराता है॥५॥

अ॒ग्निं विश॑ ईळते॒ मानु॑षी॒र्या अ॒ग्निं मनु॑षो॒ नहु॑षो॒ वि जा॒ताः। अ॒ग्निर्गान्ध॑र्वीं प॒थ्या॑मृ॒तस्या॒ग्नेर्गव्यू॑तिर्घृ॒त आ निष॑त्ता॥

मनुष्यप्रजाएँ परमात्मा की स्तुति करें, बन्धन के छुड़ानेवाले ऋषि के उपदेश से उत्तम प्रजाएँ बनकर परमात्मा को प्राप्त होती हैं तथा उसकी कल्याणकारी वेदवाणी जीवनमार्ग दर्शाती है॥६॥

अ॒ग्नये॒ ब्रह्म॑ ऋ॒भव॑स्ततक्षुर॒ग्निं म॒हाम॑वोचामा सुवृ॒क्तिम्। अग्ने॒ प्राव॑ जरि॒तारं॑ यवि॒ष्ठाग्ने॒ महि॒ द्रवि॑ण॒मा य॑जस्व॥

ज्ञानी और मेधावी जन परमात्मा की बहुत प्रकार से स्तुति करते हैं। वह स्तुति करनेवाले को मोक्ष-ऐश्वर्य प्रदान करता है॥७॥

य इ॒मा विश्वा॒ भुव॑नानि॒ जुह्व॒दृषि॒र्होता॒ न्यसी॑दत्पि॒ता नः॑। स आ॒शिषा॒ द्रवि॑णमि॒च्छमा॑नः प्रथम॒च्छदव॑राँ॒ आ वि॑वेश॥

सर्वज्ञ परमात्मा प्रलयकाल में सारे लोक-लोकान्तरों को अपने में विलीन कर लेता है। इसके उपादानकारण प्रकृति को भी अपने अन्दर छिपा लेता है, पुनः उत्पन्न करता हुआ सब जड-जङ्गमों में अपनी व्याप्ति से प्रविष्ट रहता है॥१॥

किं स्वि॑दासीदधि॒ष्ठान॑मा॒रम्भ॑णं कत॒मत्स्वि॑त्क॒थासी॑त्। यतो॒ भूमिं॑ ज॒नय॑न्वि॒श्वक॑र्मा॒ वि द्यामौर्णो॑न्महि॒ना वि॒श्वच॑क्षाः॥

विश्व को उत्पन्न करते हुए आश्रय कौन था ? कौन होता है ? सृष्टि का मूल पदार्थ क्या है ? जिससे सृष्टि रची है। जिसे कार्यरूप में विकसित किया या परिणत करता है, द्युलोक पृथिवीलोकवाले जगद्रूप में, यह परमात्मा को मनन करने का प्रकार है। जगत् का मूल पदार्थ तथा उसको सृष्टि के रूप में लानेवाला कोई होना चाहिये॥२॥

वि॒श्वत॑श्चक्षुरु॒त वि॒श्वतो॑मुखो वि॒श्वतो॑बाहुरु॒त वि॒श्वत॑स्पात्। सं बा॒हुभ्यां॒ धम॑ति॒ सं पत॑त्रै॒र्द्यावा॒भूमी॑ ज॒नय॑न्दे॒व एकः॑॥

जितनी भी मनुष्य के अन्दर अङ्गों की शक्तियाँ होती हैं, वे एकदेशी हैं, परन्तु परमात्मा की दर्शनशक्ति, वक्तृशक्ति, भुजशक्ति, पादशक्ति ये व्यापक हैं, इसी से वह द्यावापृथिवीमय ब्रह्माण्ड को स्वाधीन करता हुआ यथायोग्य व्यापार करता है॥३॥

किं स्वि॒द्वनं॒ क उ॒ स वृ॒क्ष आ॑स॒ यतो॒ द्यावा॑पृथि॒वी नि॑ष्टत॒क्षुः। मनी॑षिणो॒ मन॑सा पृ॒च्छतेदु॒ तद्यद॒ध्यति॑ष्ठ॒द्भुव॑नानि धा॒रय॑न्॥

तक्षक-बढ़ई का अलङ्कार या रूपक देकर विचार किया गया है। इस द्यावपृथिवीमय जगत् का उपादानकारण कौन है और इसमें वर्तमान लोक-लोकान्तरों का धारण करनेवाला कर्त्ता निमित्तकारण कौन है, यह विचारना चाहिए॥४॥

या ते॒ धामा॑नि पर॒माणि॒ याव॒मा या म॑ध्य॒मा वि॑श्वकर्मन्नु॒तेमा। शिक्षा॒ सखि॑भ्यो ह॒विषि॑ स्वधावः स्व॒यं य॑जस्व त॒न्वं॑ वृधा॒नः॥

परमात्मा तीनों लोकों और वहाँ के समस्त पदार्थों के अन्दर व्यापक है। उन सब का ज्ञान वेद द्वारा देता है। शरीरवृद्धि के लिए अन्न और रस भी प्रदान करता है। वह ऐसा परमात्मा धन्यवाद के योग्य तथा उपासनीय है॥५॥

विश्व॑कर्मन्ह॒विषा॑ वावृधा॒नः स्व॒यं य॑जस्व पृथि॒वीमु॒त द्याम्। मुह्य॑न्त्व॒न्ये अ॒भितो॒ जना॑स इ॒हास्माकं॑ म॒घवा॑ सू॒रिर॑स्तु॥

प्रलयकाल में द्युलोक पृथिवीलोकमय जगत् को सूक्ष्म करके परमात्मा अपनी ग्रहणशक्ति से अपने अन्दर ले लेता है-लीन कर लेता है और जीव मनुष्य आदि प्राणी मूर्छितरूप में रहते हैं। उसके उपासक जीवन्मुक्त उसकी प्रेरणा से मोक्ष का आनन्द लेते रहते हैं॥६॥ 

वा॒चस्पतिं॑ वि॒श्वक॑र्माणमू॒तये॑ मनो॒जुवं॒ वाजे॑ अ॒द्या हु॑वेम। स नो॒ विश्वा॑नि॒ हव॑नानि जोषद्वि॒श्वश॑म्भू॒रव॑से सा॒धुक॑र्मा॥

मानव के जीवनसंग्राम में विश्वरचयिता परमात्मा मन को प्रेरणा देता है, हृदय के भावों को पूरा करता है, उसकी शरण लेनी चाहिए॥७॥

चक्षु॑षः पि॒ता मन॑सा॒ हि धीरो॑ घृ॒तमे॑ने अजन॒न्नन्न॑माने। य॒देदन्ता॒ अद॑दृहन्त॒ पूर्व॒ आदिद्द्यावा॑पृथि॒वी अ॑प्रथेताम्॥

उस सर्वज्ञ परमात्मा ने जैसे ही सूर्य को उत्पन्न कर तेज को ऊपर नीचेवाले प्रदेशों में फैलाया, तो द्युलोक और पृथिवीलोक प्रकाशित और विस्तृत होते हैं॥१॥

वि॒श्वक॑र्मा॒ विम॑ना॒ आद्विहा॑या धा॒ता वि॑धा॒ता प॑र॒मोत सं॒दृक्। तेषा॑मि॒ष्टानि॒ समि॒षा म॑दन्ति॒ यत्रा॑ सप्तऋ॒षीन्प॒र एक॑मा॒हुः॥

परमात्मा विश्व का रचनेवाला उसमें व्यापक सर्वज्ञ है, जीवों के कर्मफलों को देनेवाला इन्द्रियों के विषयों का प्रेरक तथा सुख अनुभव करानेवाला है॥२॥

यो नः॑ पि॒ता ज॑नि॒ता यो वि॑धा॒ता धामा॑नि॒ वेद॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑। यो दे॒वानां॑ नाम॒धा एक॑ ए॒व तं स॑म्प्र॒श्नं भुव॑ना यन्त्य॒न्या॥

परमात्मा संसार के पदार्थों को उत्पन्न करनेवाला, वेद में उनके नाम रखनेवाला, सब का जानने योग्य और आश्रयरूप है, उसको मानना और उसकी उपासना करनी चाहिए॥३॥

त आय॑जन्त॒ द्रवि॑णं॒ सम॑स्मा॒ ऋष॑यः॒ पूर्वे॑ जरि॒तारो॒ न भू॒ना। अ॒सूर्ते॒ सूर्ते॒ रज॑सि निष॒त्ते ये भू॒तानि॑ स॒मकृ॑ण्वन्नि॒मानि॑॥

आरम्भ सृष्टि में साङ्कल्पिक ऋषि परमात्मा की स्तुति करनेवाले अपने समस्त आत्मभाव को समर्पित करनेवाले होते हैं तथा जङ्गम स्थावर और निस्तब्ध के निमित्त सब वस्तुओं को सुखमय बनाते हैं॥४॥

प॒रो दि॒वा प॒र ए॒ना पृ॑थि॒व्या प॒रो दे॒वेभि॒रसु॑रै॒र्यदस्ति॑। कं स्वि॒द्गर्भं॑ प्रथ॒मं द॑ध्र॒ आपो॒ यत्र॑ दे॒वाः स॒मप॑श्यन्त॒ विश्वे॑॥

परमात्मा द्युलोक, पृथिवीलोक, मोक्ष तथा सारी सृष्टि का स्वामी है, विद्वानों अविद्वानों का भी स्वामी है, व्याप्त परमाणुओं का भी स्वामी है, उसी के आश्रय में जीवन्मुक्त विद्वान् अपने आत्मा को अनुभव करते हैं॥५॥

तमिद्गर्भं॑ प्रथ॒मं द॑ध्र॒ आपो॒ यत्र॑ दे॒वाः स॒मग॑च्छन्त॒ विश्वे॑। अ॒जस्य॒ नाभा॒वध्येक॒मर्पि॑तं॒ यस्मि॒न्विश्वा॑नि॒ भुव॑नानि त॒स्थुः॥

परमात्मा में मुक्तात्माएँ आश्रय पाते हैं। जगत् के परमाणु और समस्त जगत् तथा लोक-लोकान्तर सब उसी परमात्मा में आश्रय लेते हैं॥६॥

न तं वि॑दाथ॒ य इ॒मा ज॒जाना॒न्यद्यु॒ष्माक॒मन्त॑रं बभूव। नी॒हा॒रेण॒ प्रावृ॑ता॒ जल्प्या॑ चासु॒तृप॑ उक्थ॒शास॑श्चरन्ति॥

जिस परमात्मा ने सब लोक-लोकान्तरों को रचा है, उसको नहीं जानते हैं-नहीं स्मरण करते हैं, इसलिए कि मनुष्य के अन्दर दोष हैं, अज्ञानान्धकार तथा वासना का कुहरा, अन्यथा जल्पना, असंयत वाणी से मिथ्यास्तुति प्रशंसा किया करते हैं॥७॥

यस्ते॑ म॒न्योऽवि॑धद्वज्र सायक॒ सह॒ ओजः॑ पुष्यति॒ विश्व॑मानु॒षक्। सा॒ह्याम॒ दास॒मार्यं॒ त्वया॑ यु॒जा सह॑स्कृतेन॒ सह॑सा॒ सह॑स्वता॥

मानव के अन्दर स्वाभिमान या आत्मतेज ऐसा होना चाहिए, जो दूसरों को प्रभावित कर सके। जो अपने अन्दर इसे धारण करता है, वह प्राप्त अवसर को अनुकूल बना लेता है। ऐसे आन्तरिक बलवान् सहनशील स्वभाव को धारण करके वह पीड़ा देनेवाले या कृपा करनेवाले के व्यवहार से दुःख या मोह में नहीं पड़ता है॥१॥

म॒न्युरिन्द्रो॑ म॒न्युरे॒वास॑ दे॒वो म॒न्युर्होता॒ वरु॑णो जा॒तवे॑दाः। म॒न्युं विश॑ ईळते॒ मानु॑षी॒र्याः पा॒हि नो॑ मन्यो॒ तप॑सा स॒जोषाः॑॥

मनुष्य के अन्दर आत्मप्रभाव-स्वाभिमान राष्ट्र का शासक विद्युत् जैसा बलशाली बनता है, सूर्य जैसे प्रतापी और विद्वान् बनाता है, हितकारी श्रेष्ठ कर्म का याजक, ऋत्विक् और ब्रह्मा बनाता है, उसे अपने में सात्म्य बनाना चाहिए॥२॥

अ॒भी॑हि मन्यो त॒वस॒स्तवी॑या॒न्तप॑सा यु॒जा वि ज॑हि॒ शत्रू॑न्। अ॒मि॒त्र॒हा वृ॑त्र॒हा द॑स्यु॒हा च॒ विश्वा॒ वसू॒न्या भ॑रा॒ त्वं नः॑॥

आत्मप्रभाव या स्वाभिमान भारी बलवान् है। तप पुरुषार्थ संयम से युक्त होकर काम आदि दोषों को नष्ट करता है, दुर्विचारों-पापभावों रोगों को भी भगाने में समर्थ है, गुणधनों को प्राप्त कराता है॥३॥

त्वं हि म॑न्यो अ॒भिभू॑त्योजाः स्वय॒म्भूर्भामो॑ अभिमातिषा॒हः। वि॒श्वच॑र्षणिः॒ सहु॑रिः॒ सहा॑वान॒स्मास्वोजः॒ पृत॑नासु धेहि॥

आत्मप्रभाव या स्वाभिमान सब के अनुभव में आने योग्य है, जो कि आन्तरिक शत्रुओं को तो दबाता ही है, बाहरी शत्रुओं पर विजय पाने में भी मनुष्य को समर्थ बनाता है॥४॥

अ॒भा॒गः सन्नप॒ परे॑तो अस्मि॒ तव॒ क्रत्वा॑ तवि॒षस्य॑ प्रचेतः। तं त्वा॑ मन्यो अक्र॒तुर्जि॑हीळा॒हं स्वा त॒नूर्ब॑ल॒देया॑य॒ मेहि॑॥

जो मनुष्य आत्मप्रभाव या स्वाभिमान से रहित होता है, वह यथार्थ कर्म या आचरण से गिर जाता है, इसलिए अपने अन्दर स्वाभिमान को भावित करना चाहीए किसी भी कर्म करने को बल पाने के लिए॥५॥

अ॒यं ते॑ अ॒स्म्युप॒ मेह्य॒र्वाङ्प्र॑तीची॒नः स॑हुरे विश्वधायः। मन्यो॑ वज्रिन्न॒भि मामा व॑वृत्स्व॒ हना॑व॒ दस्यूँ॑रु॒त बो॑ध्या॒पेः॥

आत्मप्रभाव या स्वाभिमान शक्तिशाली पदार्थ है, सब कर्मों के करने में समर्थ है, इसका ठीक-ठीक उपयोग करके मनुष्य बहुत कार्य सिद्ध कर सकता है॥६॥

अ॒भि प्रेहि॑ दक्षिण॒तो भ॑वा॒ मेऽधा॑ वृ॒त्राणि॑ जङ्घनाव॒ भूरि॑। जु॒होमि॑ ते ध॒रुणं॒ मध्वो॒ अग्र॑मु॒भा उ॑पां॒शु प्र॑थ॒मा पि॑बाव॥

आत्मप्रभाव या स्वाभिमान दक्षिण अङ्ग की भान्ति सहयोगी साथी है, बाधकों को हटाने के लिए समर्थ है, जीवनरस या जीवनतत्त्व का आनन्द बिना आत्मप्रभाव या स्वाभिमान के नहीं होता है॥७॥

त्वया॑ मन्यो स॒रथ॑मारु॒जन्तो॒ हर्ष॑माणासो धृषि॒ता म॑रुत्वः। ति॒ग्मेष॑व॒ आयु॑धा सं॒शिशा॑ना अ॒भि प्र य॑न्तु॒ नरो॑ अ॒ग्निरू॑पाः॥

आत्मप्रभाव या स्वाभिमान होने पर सैनिकों के साथ तीक्ष्ण शस्त्रास्त्रों से शत्रुओं का नाश किया जा सकता है, बिना आत्मप्रभाव या स्वाभिमान के सैनिक और शस्त्रास्त्र होते हुए भी शत्रुओं पर विजय नहीं पाया जा सकता॥१॥

अ॒ग्निरि॑व मन्यो त्विषि॒तः स॑हस्व सेना॒नीर्नः॑ सहुरे हू॒त ए॑धि। ह॒त्वाय॒ शत्रू॒न्वि भ॑जस्व॒ वेद॒ ओजो॒ मिमा॑नो॒ वि मृधो॑ नुदस्व॥

आत्मप्रभाववाले य स्वाभिमानी जन को अग्नि के समान तेजस्वी सेनानीरूप में स्वीकार करना चाहिये, जो शत्रुओं पर आक्रमण करके उनको विनष्ट कर उनके धन को छीन ले॥२॥

सह॑स्व मन्यो अ॒भिमा॑तिम॒स्मे रु॒जन्मृ॒णन्प्र॑मृ॒णन्प्रेहि॒ शत्रू॑न्। उ॒ग्रं ते॒ पाजो॑ न॒न्वा रु॑रुध्रे व॒शी वशं॑ नयस एकज॒ त्वम्॥

सेनानायक ऐसा होना चाहिए, जो अभिमानी शत्रु को दबा दे, उसके बल पराक्रम को कोई न रोक सके, किन्तु वह ही शत्रु के बल को तथा शत्रु को अपने वश में लेनेवाला हो॥३॥

एको॑ बहू॒नाम॑सि मन्यवीळि॒तो विशं॑विशं यु॒धये॒ सं शि॑शाधि। अकृ॑त्तरु॒क्त्वया॑ यु॒जा व॒यं द्यु॒मन्तं॒ घोषं॑ विज॒याय॑ कृण्महे॥

सेनानायक बहुतेरे शत्रु को अपने वश में करनेवाला हो, प्रत्येक सैनिक को उभारनेवाले ऐसे नायक के साथ विजय प्राप्त किया जा सकता है॥४॥

वि॒जे॒ष॒कृदिन्द्र॑ इवानवब्र॒वो॒३॒॑ऽस्माकं॑ मन्यो अधि॒पा भ॑वे॒ह। प्रि॒यं ते॒ नाम॑ सहुरे गृणीमसि वि॒द्मा तमुत्सं॒ यत॑ आब॒भूथ॑॥

आत्मप्रभाव विद्युत् जैसी शक्ति रखता है, बाधकों को दबाता है, उचित बात सुझाता है, इसका मूल स्रोत परमात्मा है, वह आत्मदा है, उसकी स्तुति प्रशंसा करनी चाहिए, जिससे कि वह उत्कृष्ट विचार सुझावे॥५॥

आभू॑त्या सह॒जा व॑ज्र सायक॒ सहो॑ बिभर्ष्यभिभूत॒ उत्त॑रम्। क्रत्वा॑ नो मन्यो स॒ह मे॒द्ये॑धि महाध॒नस्य॑ पुरुहूत सं॒सृजि॑॥

आत्मप्रभाव या स्वाभिमान आत्मा के साथ जन्मा है, उसका प्रिय करनेवाला है, संग्राम में ऐश्वर्य को जितानेवाला है॥६॥

संसृ॑ष्टं॒ धन॑मु॒भयं॑ स॒माकृ॑तम॒स्मभ्यं॑ दत्तां॒ वरु॑णश्च म॒न्युः। भियं॒ दधा॑ना॒ हृद॑येषु॒ शत्र॑वः॒ परा॑जितासो॒ अप॒ नि ल॑यन्ताम्॥

रजा को परमात्मा का आश्रय तथा सेनानायक का आश्रय लेने से सांसारिक और पारलौकिक ऐश्वर्य मिलता है, दोनों प्रकार के शत्रु भीतर बाहिर के दूर नष्ट हो जावेंगे॥७॥

सूक्तम्

स॒त्येनोत्त॑भिता॒ भूमिः॒ सूर्ये॒णोत्त॑भिता॒ द्यौः। ऋ॒तेना॑दि॒त्यास्ति॑ष्ठन्ति दि॒वि सोमो॒ अधि॑ श्रि॒तः॥

पृथिवी को ठोस बनानेवाला पृथिवी के अन्दर का अग्नि है, जो पृथिवी के सूक्ष्म अंशों को अपनी और खींच रहा है, द्युलोक-नक्षत्र तारामण्डल को सूर्य चमकाता है, किरणें या मास सूर्य को आश्रित करते हैं और सोम गुणवाला उत्पादन धर्म सूर्य को आश्रय बनाता है॥१॥

सोमे॑नादि॒त्या ब॒लिनः॒ सोमे॑न पृथि॒वी म॒ही। अथो॒ नक्ष॑त्राणामे॒षामु॒पस्थे॒ सोम॒ आहि॑तः॥

उत्पादक धर्मवाले पदार्थ से किरणें बलवान् होती हैं, सोम आदि ओषधियों द्वारा पृथिवी जीवन देती है, रेवती आदि नक्षत्रों में गति करता हुआ चन्द्रमा चमकता है॥२॥

सोमं॑ मन्यते पपि॒वान्यत्स॑म्पिं॒षन्त्योष॑धिम्। सोमं॒ यं ब्र॒ह्माणो॑ वि॒दुर्न तस्या॑श्नाति॒ कश्च॒न॥

सोम एक ओषधि है, जो पृथिवी पर होती है, जिसे पीस कर पीते हैं। दूसरे सोम चन्द्रमा को कहते हैं,  ज्योतिषी-खगोलशास्त्री जानते हैं, जो आकाशीय सोम है, वह चन्द्रमा है, उसे कोई मनुष्य नहीं पी सकता॥३॥

आ॒च्छद्वि॑धानैर्गुपि॒तो बार्ह॑तैः सोम रक्षि॒तः। ग्राव्णा॒मिच्छृ॒ण्वन्ति॑ष्ठसि॒ न ते॑ अश्नाति॒ पार्थि॑वः॥

तीसरा सोम वीर्य तथा वीर्यवान् ब्रह्मचारी है, जो संयम सदाचरणों द्वारा रक्षित और वेदविद्या से सम्पन्न गुरुओं द्वारा पालित होता है, जिसकी समानता राजा भी नहीं कर सकता। ब्रह्मचारी को देख कर राजा को मार्ग छोड़ देना चाहिए, यह शास्त्र में विधान है तथा उसका अन्यथा भक्षण भी नहीं कर सकता॥४॥

यत्त्वा॑ देव प्र॒पिब॑न्ति॒ तत॒ आ प्या॑यसे॒ पुनः॑। वा॒युः सोम॑स्य रक्षि॒ता समा॑नां॒ मास॒ आकृ॑तिः॥

जैसे-जैसे चन्द्रमा पूर्व दिशा में सूर्य की ओर बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे सूर्यकिरणों से कृष्णपक्ष में विलीन होने लगता है और शुक्लपक्ष में जैसे अलग होता है, फिर बढ़ता चला जाता है, पूर्ण हो जाता है, इस प्रकार ऋतुओं और महीनों का निर्माण करता है॥५॥

रैभ्या॑सीदनु॒देयी॑ नाराशं॒सी न्योच॑नी। सू॒र्याया॑ भ॒द्रमिद्वासो॒ गाथ॑यैति॒ परि॑ष्कृतम्॥

सुशोभित हुई नववधू को पुरोहित के द्वारा शिक्षा दी जानी चहिये तथा वृद्ध महानुभावों के द्वारा आश्वासन और आशीर्वाद भी देने योग्य है, सुन्दर वस्त्र देने चाहिएँ॥६॥

चित्ति॑रा उप॒बर्ह॑णं॒ चक्षु॑रा अ॒भ्यञ्ज॑नम्। द्यौर्भूमिः॒ कोश॑ आसी॒द्यदया॑त्सू॒र्या पति॑म्॥

सुयोग्य वधू वही कहलाती है, जिसकी विद्या ज्ञान ही मस्तक का भूषण है और उसका स्नेहदर्शन-स्नेहदृष्टि आँख का अञ्जन है, उसकी सम्पत्ति समस्त प्राणिजगत् या माता-पिता का आश्रय है, ऐसी वधू सुख शान्ति को प्राप्त करती है॥७॥

स्तोमा॑ आसन्प्रति॒धयः॑ कु॒रीरं॒ छन्द॑ ओप॒शः। सू॒र्याया॑ अ॒श्विना॑ व॒राग्निरा॑सीत्पुरोग॒वः॥

वधू के उत्तमगुण उसका साथ दिया करते हैं, आचरणीय मनोविचार उसको विश्राम देनेवाले हैं, प्राण-अपान दोनों जिसके ठीक-ठीक चलते हैं, वह सुरक्षित रहती है। परमात्मा को जो अपने सम्मुख आस्तिक भावना से रखती है या विवाहसम्बन्धी अग्नि को पति-पत्नीसम्बन्ध को प्रकाश में बनानेवाली आदर्श समझती है, उसका गृहस्थ सफल है॥८॥

सोमो॑ वधू॒युर॑भवद॒श्विना॑स्तामु॒भा व॒रा। सू॒र्यां यत्पत्ये॒ शंस॑न्तीं॒ मन॑सा सवि॒ताद॑दात्॥

जब कन्या ब्रह्मचर्य और यौवन से पूर्ण हो जाए, पति की इच्छा रखती हुई हो, तो उसका पिता सोम्यगुण ब्रह्मचर्य से सम्पन्न युवा वधू की इच्छा रखते हुए के साथ्विवाह कर दे और पुनः वे दोनों अविरोधी भाव से मिलकर रहें॥९॥

मनो॑ अस्या॒ अन॑ आसी॒द्द्यौरा॑सीदु॒त च्छ॒दिः। शु॒क्राव॑न॒ड्वाहा॑वास्तां॒ यदया॑त्सू॒र्या गृ॒हम्॥

वधू का विवाह हो चुकने पर पति के घर जाने के लिए आन्तरिक दृष्टि से यान-गाड़ी मन है और उसका आवरण या रक्षक पति है, मानसिक और शारीरिक पराक्रम विचार और क्रिया गृहस्थ में प्रवेश कराते हैं, इनके बिना गृहस्थ नहीं चला करता है॥१०॥

ऋ॒क्सा॒माभ्या॑म॒भिहि॑तौ॒ गावौ॑ ते साम॒नावि॑तः। श्रोत्रं॑ ते च॒क्रे आ॑स्तां दि॒वि पन्था॑श्चराचा॒रः॥

गृहस्थ-रथ को स्तुति और शान्त भाव वहन करते हैं, परस्पर एक-दूसरे की स्तुति और शान्ति वर-वधू में होनी चाहिए और परस्पर एक दूसरे के अभिप्राय को सुनना भी आवश्यक है तथा अन्य सामग्री चेतन और जड़ का संग्रह भी होना चाहिए॥११॥

शुची॑ ते च॒क्रे या॒त्या व्या॒नो अक्ष॒ आह॑तः। अनो॑ मन॒स्मयं॑ सू॒र्यारो॑हत्प्रय॒ती पति॑म्॥

तेजस्विनी नव वधू पति के प्रति अपने मन को लगावे, श्रोत्रों से उसके वचन सुने, शुभ गुणकर्मस्वभावपूर्ण विचार किया करे, तो गृहस्थाश्रम सफल हो॥१२॥

सू॒र्याया॑ वह॒तुः प्रागा॑त्सवि॒ता यम॒वासृ॑जत्। अ॒घासु॑ हन्यन्ते॒ गावोऽर्जु॑न्योः॒ पर्यु॑ह्यते॥

यद॑श्विना पृ॒च्छमा॑ना॒वया॑तं त्रिच॒क्रेण॑ वह॒तुं सू॒र्यायाः॑। विश्वे॑ दे॒वा अनु॒ तद्वा॑मजानन्पु॒त्रः पि॒तरा॑ववृणीत पू॒षा॥

नव वधू को विवाह का फल क्या है ? इसकी विवेचना मन में होती है, यही उत्तर सामने आता है−भावी जीवन के रक्षक पुत्र की उत्पत्ति। वैदिक दृष्टि से पुत्रों की उत्पत्ति के लिये विवाह किया जाता है॥१४॥

यदया॑तं शुभस्पती वरे॒यं सू॒र्यामुप॑। क्वैकं॑ च॒क्रं वा॑मासी॒त्क्व॑ दे॒ष्ट्राय॑ तस्थथुः॥

वर वधू का गृहाश्रम के लिये दोनों का मनोभाव या सङ्कल्प किस ओर है, किस विषय में है, तथा परस्पर आत्मदान किस लक्ष्य में है। अर्थात् किसी एक सङ्कल्प या किसी एक लक्ष्य को लेकर विवाह होना चाहिए॥१५॥

द्वे ते॑ च॒क्रे सू॑र्ये ब्र॒ह्माण॑ ऋतु॒था वि॑दुः। अथैकं॑ च॒क्रं यद्गुहा॒ तद॑द्धा॒तय॒ इद्वि॑दुः॥

गृहस्थ के अन्दर आते ही वधू को भोग में लिप्त नहीं होना चहिए, किन्तु समय-समय पर विद्वानों से उपदेश सुनते रहना चाहिए और हार्दिक भावना से परमात्मा का चिन्तन ध्यान भी करना चाहिए॥१६॥

सू॒र्यायै॑ दे॒वेभ्यो॑ मि॒त्राय॒ वरु॑णाय च। ये भू॒तस्य॒ प्रचे॑तस इ॒दं तेभ्यो॑ऽकरं॒ नमः॑॥

गृहपति का कर्तव्य है कि वधू के लिए तथा विद्वानों, मित्र, सम्बन्धियों, सन्तानों, ज्ञान देनेवालों के लिए अन्नादि आवश्यक वस्तु को देता रहे॥१७॥

पू॒र्वा॒प॒रं च॑रतो मा॒ययै॒तौ शिशू॒ क्रीळ॑न्तौ॒ परि॑ यातो अध्व॒रम्। विश्वा॑न्य॒न्यो भुव॑नाभि॒चष्ट॑ ऋ॒तूँर॒न्यो वि॒दध॑ज्जायते॒ पुनः॑॥

वर-वधू गृहस्थजीवन में परस्पर स्नेह से बढ़ते हैं। एक-दूसरे के सहारे गृहस्थ आश्रम को श्रेष्ठ बनाएँ, वर या पति गृहस्थ की आवश्यक वस्तुओं तथा कार्यों पर दृष्टिपात कर उन्हें जुटावे, वधू या पत्नी ऋतु के अनुसार सन्तानों के उत्पादन-रक्षण आदि पर ध्यान दे॥१८॥

नवो॑नवो भवति॒ जाय॑मा॒नोऽह्नां॑ के॒तुरु॒षसा॑मे॒त्यग्र॑म्। भा॒गं दे॒वेभ्यो॒ वि द॑धात्या॒यन्प्र च॒न्द्रमा॑स्तिरते दी॒र्घमायुः॑॥

चन्द्रमा प्रतिरात्रि कृष्णपक्ष में दिनों और उषावेलाओं से प्रथम आकाश में दृष्टिगोचर होता है, उसे देखकर यागों का निर्णय करते हैं देवताओं के प्रति हवि देने के लिए, चन्द्रमा के सदुपयोग से आयु बढ़ता है एवं गृहस्थाश्रम में वर पुत्ररूप से पुनः-पुनः जन्म पाता है। प्रतिदिन प्रति उषावेला में साक्षात् जागृत हो विद्वानों के लिए भोजन-भाग और अग्नि आदि के लिए हविर्भाग उसे देना चाहिए, ऐसा करते रहने से अपने जीवन में प्रसन्न रहते हुए आयु का विस्तार करे॥१९॥

सु॒किं॒शु॒कं श॑ल्म॒लिं वि॒श्वरू॑पं॒ हिर॑ण्यवर्णं सु॒वृतं॑ सुच॒क्रम्। आ रो॑ह सूर्ये अ॒मृत॑स्य लो॒कं स्यो॒नं पत्ये॑ वह॒तुं कृ॑णुष्व॥

गृहस्थाश्रम को प्रकाशमय, पुष्पित पलाश और शाल्मलि के समान सुन्दर पवित्र अमृत के स्थान जैसा सुखमय बनाना गृहिणी का कार्य है। वह ही इसे स्वर्ग बना सकती है॥२०॥

उदी॒र्ष्वातः॒ पति॑वती॒ ह्ये॒३॒॑षा वि॒श्वाव॑सुं॒ नम॑सा गी॒र्भिरी॑ळे। अ॒न्यामि॑च्छ पितृ॒षदं॒ व्य॑क्तां॒ स ते॑ भा॒गो ज॒नुषा॒ तस्य॑ विद्धि॥

भिन्न गोत्र की कन्या से विवाह करना चाहिए, पति के घर में वधू रहेगी, अपने रूप में पुत्र को उत्पन्न करना है॥२१॥

उदी॒र्ष्वातो॑ विश्वावसो॒ नम॑सेळा महे त्वा। अ॒न्यामि॑च्छ प्रफ॒र्व्यं१॒॑ सं जा॒यां पत्या॑ सृज॥

वधू के साथ विवाह करके पति अपने घर में ले जाए, पतिगृह में पहुँच कर वधू पुत्रोत्पत्ति के लिये पति के साथ समागम करने के लिये उससे प्रार्थना करे॥२२॥

अ॒नृ॒क्ष॒रा ऋ॒जवः॑ सन्तु॒ पन्था॒ येभिः॒ सखा॑यो॒ यन्ति॑ नो वरे॒यम्। सम॑र्य॒मा सं भगो॑ नो निनीया॒त्सं जा॑स्प॒त्यं सु॒यम॑मस्तु देवाः॥

विद्वान् जन वर वधू को गृहस्थ का ऐसा मार्ग सुझावें, जो बाधा से रहित हो तथा जिससे वर और उसके पारिवारिक जन ठीक चलें। वृद्धजन पुरोहित आशीर्वाद देवें कि सन्तानोत्पत्ति अच्छी हो॥२३॥

प्र त्वा॑ मुञ्चामि॒ वरु॑णस्य॒ पाशा॒द्येन॒ त्वाब॑ध्नात्सवि॒ता सु॒शेवः॑। ऋ॒तस्य॒ योनौ॑ सुकृ॒तस्य॑ लो॒केऽरि॑ष्टां त्वा स॒ह पत्या॑ दधामि॥

विवाहसंस्कार हो जाने पर वधू को पितृवंश का स्थायी स्नेह-बन्धन त्यागना होता है। शुभकर्मों के करने के लिए पतिगृह है, उसे अच्छा बनाना चाहिए॥२४॥

प्रेतो मु॒ञ्चामि॒ नामुतः॑ सुब॒द्धाम॒मुत॑स्करम्। यथे॒यमि॑न्द्र मीढ्वः सुपु॒त्रा सु॒भगास॑ति॥

विवाहसंस्कार हो जाने पर पितृगृह को तो वधू छोड़ देती है, परन्तु पतिगृह में बसती है। वहाँ सौभाग्य को प्राप्त होई अच्छे पुत्रों वाली बनती है॥२५॥

पू॒षा त्वे॒तो न॑यतु हस्त॒गृह्या॒श्विना॑ त्वा॒ प्र व॑हतां॒ रथे॑न। गृ॒हान्ग॑च्छ गृ॒हप॑त्नी॒ यथासो॑ व॒शिनी॒ त्वं वि॒दथ॒मा व॑दासि॥

विवाह हो चुकने पर पाणिग्रहणकर्ता पति वधू को सम्मान के साथ अच्छे यान में बिठाकर अपने घर ले जावे, वहाँ पहुँचकर वह गृहस्वामिनी बनकर पति के प्रति सुख पहुँचानेवाले वचन को बोले॥२६॥

इ॒ह प्रि॒यं प्र॒जया॑ ते॒ समृ॑ध्यताम॒स्मिन्गृ॒हे गार्ह॑पत्याय जागृहि। ए॒ना पत्या॑ त॒न्वं१॒॑ सं सृ॑ज॒स्वाधा॒ जिव्री॑ वि॒दथ॒मा व॑दाथः॥

स्त्री का अभीष्ट पतिगृह में है, जो सन्तान के साथ पूरा होता है, गृहस्थ संयम से करना चाहिए, वरवधू वृद्ध होने पर भी मीठा हितकर बोलें॥२७॥

नी॒ल॒लो॒हि॒तं भ॑वति कृ॒त्यास॒क्तिर्व्य॑ज्यते। एध॑न्ते अस्या ज्ञा॒तयः॒ पति॑र्ब॒न्धेषु॑ बध्यते॥

वधू के रजस्वला हो जाने पर पति के प्रति इसकी कामवासना जाग जाती है, पुनः सन्तानों का उत्पन्न होना चालू हो जाता है, फिर पति भी सन्तानों के पालन कर्तव्यबन्धनों में बन्ध जाता है॥२८॥

परा॑ देहि शामु॒ल्यं॑ ब्र॒ह्मभ्यो॒ वि भ॑जा॒ वसु॑। कृ॒त्यैषा प॒द्वती॑ भू॒त्व्या जा॒या वि॑शते॒ पति॑म्॥

स्त्री रजस्वला होने पर अशुद्धि दूर करे, अशुद्ध वस्त्र त्याग दे, विद्वानों को धन दान करे, उनसे ज्ञान ग्रहण कर एवं शरीर और मन को पवित्र कर गर्भधारण-पुत्रजनन करने योग्य होकर पति का समागम करे॥२९॥

अ॒श्री॒रा त॒नूर्भ॑वति॒ रुश॑ती पा॒पया॑मु॒या। पति॒र्यद्व॒ध्वो॒३॒॑ वास॑सा॒ स्वमङ्ग॑मभि॒धित्स॑ते॥

रजस्वला का स्पर्श पति को नहीं करना चाहिए, इससे उसकी देह दुःखदायक रोगी बन जाती है॥३०॥

ये व॒ध्व॑श्च॒न्द्रं व॑ह॒तुं यक्ष्मा॒ यन्ति॒ जना॒दनु॑। पुन॒स्तान्य॒ज्ञिया॑ दे॒वा नय॑न्तु॒ यत॒ आग॑ताः॥

वधू के वोढा पति को जो रोग वंश से प्राप्त हो जाते हैं, उनको यज्ञविधि से चिकित्सा करनेवाले शान्त करें और उसके बीजरूप दोष का भी शमन करें॥३१॥

मा वि॑दन्परिप॒न्थिनो॒ य आ॒सीद॑न्ति॒ दम्प॑ती। सु॒गेभि॑र्दु॒र्गमती॑ता॒मप॑ द्रा॒न्त्वरा॑तयः॥

गृहस्थ में पति-पत्नी को गुप्तरोग घेर लेते हैं, उनके मूलकारण को जान करके सदाचरणों से दूर करना चाहिए, अन्यथा वे शरीर के रस-रक्तादि धातुओं को नष्ट कर डालेंगे॥३२॥

सु॒म॒ङ्ग॒लीरि॒यं व॒धूरि॒मां स॒मेत॒ पश्य॑त। सौभा॑ग्यमस्यै द॒त्त्वायाथास्तं॒ वि परे॑तन॥

वधू घर में मङ्गल का सञ्चार करनेवाली है। सम्बन्धी और हितचिन्तक सौभाग्य का आशीर्वाद दें और स्नेह से मिलें॥३३॥

तृ॒ष्टमे॒तत्कटु॑कमे॒तद॑पा॒ष्ठव॑द्वि॒षव॒न्नैतदत्त॑वे। सू॒र्यां यो ब्र॒ह्मा वि॒द्यात्स इद्वाधू॑यमर्हति॥

ज्ञानी मनुष्य ही विवाह को सफल करता है, वह ही वधूपन-भार्या के सम्बन्ध को प्राप्त करने योग्य है। अज्ञानी कामवश विवाह करनेवाले के लिये वह निस्सार भुस के समान दाहवर्धक विष मिले अन्न जैसा है॥३४॥

आ॒शस॑नं वि॒शस॑न॒मथो॑ अधिवि॒कर्त॑नम्। सू॒र्यायाः॑ पश्य रू॒पाणि॒ तानि॑ ब्र॒ह्मा तु शु॑न्धति॥

तेजस्वी नव वधू कदाचित् किसी वस्तु की आशा रखती हो या उनके न प्राप्त होने पर उदास हो-निराश हो या रुष्ट होकर हिंसा करने को उद्यत हो-दुःखी करने को उद्यत हो, ज्ञानी पति इनका यथायोग्य शोधन-समाधान करके उसे अनुकूल बना लेता है, अन्य नहीं॥३५॥

गृ॒भ्णामि॑ ते सौभग॒त्वाय॒ हस्तं॒ मया॒ पत्या॑ ज॒रद॑ष्टि॒र्यथासः॑। भगो॑ अर्य॒मा स॑वि॒ता पुरं॑धि॒र्मह्यं॑ त्वादु॒र्गार्ह॑पत्याय दे॒वाः॥

विवाहसम्बन्ध परमात्मा के आदेशानुसार पुरोहित, पिता, नगराधिकारी इनके साक्षित्व में होना चाहिए। पति-पत्नी का सम्बन्ध गृहस्थ में एक दूसरे को जरापर्यन्त पालन के ढंग का होता है॥३६॥

तां पू॑षञ्छि॒वत॑मा॒मेर॑यस्व॒ यस्यां॒ बीजं॑ मनु॒ष्या॒३॒॑ वप॑न्ति। या न॑ ऊ॒रू उ॑श॒ती वि॒श्रया॑ते॒ यस्या॑मु॒शन्तः॑ प्र॒हरा॑म॒ शेप॑म्॥

विवाह के अनन्तर घर पहुँचकर गर्भाधान के लिये वधू को कामना करनी चाहिये, जिसके अन्दर पुत्र की कामना करते हुए पुरुष सन्तानबीज को प्रक्षिप्त करे और वधू अपने गुप्ताङ्गों को खोल दे॥३७॥

तुभ्य॒मग्रे॒ पर्य॑वहन्त्सू॒र्यां व॑ह॒तुना॑ स॒ह। पुनः॒ पति॑भ्यो जा॒यां दा अ॑ग्ने प्र॒जया॑ स॒ह॥

कन्या का विवाह इसके पितृगण को तब करना चाहिये, जब कन्या प्रजनन शक्ति से पूर्ण सन्तान उत्पन्न करने में योग्य हो। तब पति और उसके सम्बन्धी मित्रों के सम्मुख समारोह करके देना चहिये॥३८॥

पुनः॒ पत्नी॑म॒ग्निर॑दा॒दायु॑षा स॒ह वर्च॑सा। दी॒र्घायु॑रस्या॒ यः पति॒र्जीवा॑ति श॒रदः॑ श॒तम्॥

विवाह में अग्नि के सम्पर्क से कन्या-वधू तेज और आयु से सम्पन्न हो जाती है और जो दीर्घायु सौ वर्षों तक जीने के योग्य हो, ऐसे पति के लिये दी जानी चाहिये॥३९॥

सोमः॑ प्रथ॒मो वि॑विदे गन्ध॒र्वो वि॑विद॒ उत्त॑रः। तृ॒तीयो॑ अ॒ग्निष्टे॒ पति॑स्तु॒रीय॑स्ते मनुष्य॒जाः॥

कन्या की प्रथम स्थिति रजोधर्म की ओर चलती है, फिर उत्तेजना धाराएँ उत्पन्न होती हैं, फिर विवाहसंस्कार में आग्नेय धर्म वाली उत्साहप्रवृत्तियाँ जागती हैं, पश्चात् मनुष्यसम्पर्क प्राप्त हो जाता है, जो अन्तिम कृतकार्य की स्थिति है॥४०॥

सोमो॑ ददद्गन्ध॒र्वाय॑ गन्ध॒र्वो द॑दद॒ग्नये॑। र॒यिं च॑ पु॒त्राँश्चा॑दाद॒ग्निर्मह्य॒मथो॑ इ॒माम्॥

चन्द्र सूर्य अग्नि देवताओं के गुण एक-दूसरे के उत्तरोत्तर करने में आते हैं, पुनः उन गुणों से सम्पन्न कन्या और पुत्रधन पति के लिये नियत हो जाता है॥४१॥

इ॒हैव स्तं॒ मा वि यौ॑ष्टं॒ विश्व॒मायु॒र्व्य॑श्नुतम्। क्रीळ॑न्तौ पु॒त्रैर्नप्तृ॑भि॒र्मोद॑मानौ॒ स्वे गृ॒हे॥

गृहस्थ को परस्पर गृहस्थ का पालन करते हुए परस्पर मेल से रहते हुए पुत्र-पौत्रादि आदि के साथ आनन्द करते हुए अपने घर में रहना चहिये॥४२॥

आ नः॑ प्र॒जां ज॑नयतु प्र॒जाप॑तिराजर॒साय॒ सम॑नक्त्वर्य॒मा। अदु॑र्मङ्गलीः पतिलो॒कमा वि॑श॒ शं नो॑ भव द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे॥

गृहस्थ में पति-पत्नी इस प्रकार सदाचरण से रहें कि सन्तान उत्पन्न हो, दोनों जरापर्यन्त जीवित रहें। पत्नी गृहलक्ष्मी बनी हुई कल्याणसाधक घर में रहे, कुटुम्ब में मेल से रहे, पारिवारिक जन और पशु का हित साधती रहे॥४३॥

अघो॑रचक्षु॒रप॑तिघ्न्येधि शि॒वा प॒शुभ्यः॑ सु॒मनाः॑ सु॒वर्चाः॑। वी॒र॒सूर्दे॒वका॑मा स्यो॒ना शं नो॑ भव द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे॥

वधू प्रियदर्शन पति, देवर तथा वंशजों और अन्य जनों की हितकामना करनेवाली, स्वयं प्रसन्न रहते हुए घर के पशूओं का भी हित चाहनेवाली होनी चाहिए॥४४॥

इ॒मां त्वमि॑न्द्र मीढ्वः सुपु॒त्रां सु॒भगां॑ कृणु। दशा॑स्यां पु॒त्राना धे॑हि॒ पति॑मेकाद॒शं कृ॑धि॥

पति को चाहिए कि पत्नी को सौभाग्यपूर्ण प्रशस्त पुत्रोंवाली बनावे, दस पुत्रों को उत्पन्न करे, अधिक नहीं, अथवा दस बार गर्भाधान करे, अपने को ग्यारहवाँ पालक समझे॥४५॥

स॒म्राज्ञी॒ श्वशु॑रे भव स॒म्राज्ञी॑ श्व॒श्र्वां भ॑व। नना॑न्दरि स॒म्राज्ञी॑ भव स॒म्राज्ञी॒ अधि॑ दे॒वृषु॑॥

वधू का परिवार में व्यवहार ऐसा होना चाहिए कि वह श्वशुर, सास, ननद और देवरों के अन्दर सम्मान और स्नेह महाराणी की भाँति प्राप्त कर सके॥४६॥

सम॑ञ्जन्तु॒ विश्वे॑ दे॒वाः समापो॒ हृद॑यानि नौ। सं मा॑त॒रिश्वा॒ सं धा॒ता समु॒ देष्ट्री॑ दधातु नौ॥

गृहस्थ में वर-वधू के पहुँच जाने पर विद्वान् जन तथा आप्त जीवन्मुक्त उनको परस्पर मेल में रहने के लिये उपदेश दें, परमात्मा भी उनके अन्दर मिलकर रहने की भावना उत्पन्न करे तथा उनके प्राण और शरीररस एक-दूसरे के अनुकूल हो जाएँ॥४७॥

वि हि सोतो॒रसृ॑क्षत॒ नेन्द्रं॑ दे॒वम॑मंसत। यत्राम॑दद्वृ॒षाक॑पिर॒र्यः पु॒ष्टेषु॒ मत्स॑खा॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥

सृष्टि के आरम्भ में विश्व को दृष्ट-प्रकाशित करने के लिये जब किरणें प्रकट हुईं, तो उन्होंने खगोल के आधारभूत उत्तर ध्रुव को अपेक्षित नहीं किया, किन्तु सूर्य को अपना प्रकाशक बनाया। सूर्य से उनका सीधा सम्बन्ध है, परन्तु उत्तर ध्रुव सूर्य आदि सब गोलों का आधार या केन्द्र है। सारे नक्षत्रों की गतिविधि को बतानेवाली व्योमकक्षा का केन्द्र भी उत्तर ध्रुव है॥१॥

परा॒ ही॑न्द्र॒ धाव॑सि वृ॒षाक॑पे॒रति॒ व्यथिः॑। नो अह॒ प्र वि॑न्दस्य॒न्यत्र॒ सोम॑पीतये॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥

ज्योतिर्विद्या की दृष्टि से ध्रुवप्रचलन होता है, जो व्योमकक्षा से प्रतिलोम गति करता है, इसलिये आलंकारिक ढंग से व्योमकक्षा से परे हटता हुआ होने से वह उपालम्भ सा दे रही है कि सूर्यादि को लिये हुए ध्रुव  व्योमकक्षा से परे हटता है॥२॥

किम॒यं त्वां वृ॒षाक॑पिश्च॒कार॒ हरि॑तो मृ॒गः। यस्मा॑ इर॒स्यसीदु॒ न्व१॒॑र्यो वा॑ पुष्टि॒मद्वसु॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥

यह आलङ्कारिक भाषा में कहा जा रहा है, व्योमकक्षा के प्रति या उसकी वस्तुओं के प्रति सूर्य कुछ बिगाड़ करता है, वह बिगाड़ अगले मन्त्र में बताया जा रहा है॥३॥

यमि॒मं त्वं वृ॒षाक॑पिं प्रि॒यमि॑न्द्राभि॒रक्ष॑सि। श्वा न्व॑स्य जम्भिष॒दपि॒ कर्णे॑ वराह॒युर्विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥

ज्योतिर्विद्या के क्षेत्र में सूर्य अपनी एक योगतारा रेवती पर स्थिर न रहकर अन्य ताराओं का स्पर्श करता जाता है।  व्योमकक्षा की समस्त ताराओं को स्पर्श किया, पुनः क्रमशः ऐसी स्थिति में आता है कि चन्द्रमा इसके कोण को ग्रस लेता है, तो सूर्यग्रहण पड़ जाता है। यह वर्णन आलङ्कारिक ढंग से कहा गया है॥४-५॥

प्रि॒या त॒ष्टानि॑ मे क॒पिर्व्य॑क्ता॒ व्य॑दूदुषत्। शिरो॒ न्व॑स्य राविषं॒ न सु॒गं दु॒ष्कृते॑ भुवं॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥

ज्योतिर्विद्या के क्षेत्र में सूर्य अपनी एक योगतारा रेवती पर स्थिर न रहकर अन्य ताराओं का स्पर्श करता जाता है।  व्योमकक्षा की समस्त ताराओं को स्पर्श किया, पुनः क्रमशः ऐसी स्थिति में आता है कि चन्द्रमा इसके कोण को ग्रस लेता है, तो सूर्यग्रहण पड़ जाता है। यह वर्णन आलङ्कारिक ढंग से कहा गया है॥४-५॥

न मत्स्त्री सु॑भ॒सत्त॑रा॒ न सु॒याशु॑तरा भुवत्। न मत्प्रति॑च्यवीयसी॒ न सक्थ्युद्य॑मीयसी॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥

गृहस्थ में पति-पत्नी शुभावसर पर और संग्रामसमय साथ रहते हैं। ज्योतिर्विद्या में उत्तरध्रुव के आधार पर व्योमकक्षा रहती है, वह मरुत् स्तरों आकाशीय वातसूत्रों द्वारा गति करती है॥६-११॥

उ॒वे अ॑म्ब सुलाभिके॒ यथे॑वा॒ङ्ग भ॑वि॒ष्यति॑। भ॒सन्मे॑ अम्ब॒ सक्थि॑ मे॒ शिरो॑ मे॒ वी॑व हृष्यति॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥

गृहस्थ में पति-पत्नी शुभावसर पर और संग्रामसमय साथ रहते हैं। ज्योतिर्विद्या में उत्तरध्रुव के आधार पर व्योमकक्षा रहती है, वह मरुत् स्तरों आकाशीय वातसूत्रों द्वारा गति करती है॥६-११॥

किं सु॑बाहो स्वङ्गुरे॒ पृथु॑ष्टो॒ पृथु॑जाघने। किं शू॑रपत्नि न॒स्त्वम॒भ्य॑मीषि वृ॒षाक॑पिं॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥

गृहस्थ में पति-पत्नी शुभावसर पर और संग्रामसमय साथ रहते हैं। ज्योतिर्विद्या में उत्तरध्रुव के आधार पर व्योमकक्षा रहती है, वह मरुत् स्तरों आकाशीय वातसूत्रों द्वारा गति करती है॥६-११॥

अ॒वीरा॑मिव॒ माम॒यं श॒रारु॑र॒भि म॑न्यते। उ॒ताहम॑स्मि वी॒रिणीन्द्र॑पत्नी म॒रुत्स॑खा॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥

गृहस्थ में पति-पत्नी शुभावसर पर और संग्रामसमय साथ रहते हैं। ज्योतिर्विद्या में उत्तरध्रुव के आधार पर व्योमकक्षा रहती है, वह मरुत् स्तरों आकाशीय वातसूत्रों द्वारा गति करती है॥६-११॥

सं॒हो॒त्रं स्म॑ पु॒रा नारी॒ सम॑नं॒ वाव॑ गच्छति। वे॒धा ऋ॒तस्य॑ वी॒रिणीन्द्र॑पत्नी महीयते॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥

गृहस्थ में पति-पत्नी शुभावसर पर और संग्रामसमय साथ रहते हैं। ज्योतिर्विद्या में उत्तरध्रुव के आधार पर व्योमकक्षा रहती है, वह मरुत् स्तरों आकाशीय वातसूत्रों द्वारा गति करती है॥६-११॥

इ॒न्द्रा॒णीमा॒सु नारि॑षु सु॒भगा॑म॒हम॑श्रवम्। न॒ह्य॑स्या अप॒रं च॒न ज॒रसा॒ मर॑ते॒ पति॒र्विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥

गृहस्थ में पति-पत्नी शुभावसर पर और संग्रामसमय साथ रहते हैं। ज्योतिर्विद्या में उत्तरध्रुव के आधार पर व्योमकक्षा रहती है, वह मरुत् स्तरों आकाशीय वातसूत्रों द्वारा गति करती है॥६-११॥

नाहमि॑न्द्राणि रारण॒ सख्यु॑र्वृ॒षाक॑पेॠ॒ते। यस्ये॒दमप्यं॑ ह॒विः प्रि॒यं दे॒वेषु॒ गच्छ॑ति॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥

सूर्य के बिना उत्तर ध्रुव का कार्य नहीं चलता है, आकाश के सब गोलों में सूर्य का रश्मितेज पहुँचता है॥१२॥

वृषा॑कपायि॒ रेव॑ति॒ सुपु॑त्र॒ आदु॒ सुस्नु॑षे। घस॑त्त॒ इन्द्र॑ उ॒क्षणः॑ प्रि॒यं का॑चित्क॒रं ह॒विर्विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥

आकाश में जिन ग्रहों-उपग्रहों की गति नष्ट होती देखी जाती है, वे पैंतीस हैं। आरम्भ सृष्टि में सारे ग्रह-उपग्रह रेवती तारा के अन्तिम भाग पर अवलम्बित थे, वे ईश्वरीय नियम से गति करने लगे, रेवती तारे से पृथक् होते चले गये। विश्व के उत्तर गोलार्ध और दक्षिण गोलार्ध में फैल गये, यह स्थिति सृष्टि के उत्पत्तिकाल की वेद में वर्णित है॥१३-१४॥

उ॒क्ष्णो हि मे॒ पञ्च॑दश सा॒कं पच॑न्ति विंश॒तिम्। उ॒ताहम॑द्मि॒ पीव॒ इदु॒भा कु॒क्षी पृ॑णन्ति मे॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥

आकाश में जिन ग्रहों-उपग्रहों की गति नष्ट होती देखी जाती है, वे पैंतीस हैं। आरम्भ सृष्टि में सारे ग्रह-उपग्रह रेवती तारा के अन्तिम भाग पर अवलम्बित थे, वे ईश्वरीय नियम से गति करने लगे, रेवती तारे से पृथक् होते चले गये। विश्व के उत्तर गोलार्ध और दक्षिण गोलार्ध में फैल गये, यह स्थिति सृष्टि के उत्पत्तिकाल की वेद में वर्णित है॥१३-१४॥

वृ॒ष॒भो न ति॒ग्मशृ॑ङ्गो॒ऽन्तर्यू॒थेषु॒ रोरु॑वत्। म॒न्थस्त॑ इन्द्र॒ शं हृ॒दे यं ते॑ सु॒नोति॑ भाव॒युर्विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥

रोमवाले अङ्ग का फड़फड़ाना सुखप्रद अङ्ग का सांथलों-योनिमध्य में अवलम्बित होना गृहस्थकर्म पर अधिकार कराता है॥१५-१७॥

न सेशे॒ यस्य॒ रम्ब॑तेऽन्त॒रा स॒क्थ्या॒३॒॑ कपृ॑त्। सेदी॑शे॒ यस्य॑ रोम॒शं नि॑षे॒दुषो॑ वि॒जृम्भ॑ते॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥

रोमवाले अङ्ग का फड़फड़ाना सुखप्रद अङ्ग का सांथलों-योनिमध्य में अवलम्बित होना गृहस्थकर्म पर अधिकार कराता है॥१५-१७॥

न सेशे॒ यस्य॑ रोम॒शं नि॑षे॒दुषो॑ वि॒जृम्भ॑ते। सेदी॑शे॒ यस्य॒ रम्ब॑तेऽन्त॒रा स॒क्थ्या॒३॒॑ कपृ॒द्विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥

रोमवाले अङ्ग का फड़फड़ाना सुखप्रद अङ्ग का सांथलों-योनिमध्य में अवलम्बित होना गृहस्थकर्म पर अधिकार कराता है॥१५-१७॥

अ॒यमि॑न्द्र वृ॒षाक॑पिः॒ पर॑स्वन्तं ह॒तं वि॑दत्। अ॒सिं सू॒नां नवं॑ च॒रुमादेध॒स्यान॒ आचि॑तं॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥

आलङ्कारिक ढंग में कहा जाता है कि जितने मारने के साधन हैं शस्त्र, बन्धन, विष, आग में जलना, ये व्यर्थ हो जाते हैं, जिसका कोई अपराध नहीं होता, उसके लिये ऐसा यहाँ दर्शाया गया है॥१८॥

अ॒यमे॑मि वि॒चाक॑शद्विचि॒न्वन्दास॒मार्य॑म्। पिबा॑मि पाक॒सुत्व॑नो॒ऽभि धीर॑मचाकशं॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥

सर्वसूर्य ग्रहण से मुक्त होकर प्रकाशमान हुआ वसन्तसमाप्त पर दक्षिण से दक्षिणगोलार्ध और उत्तरगोलार्ध को पृथक्-पृथक् करता हुआ तथा कृष्णपक्ष में चन्द्रमा को अपने ओर छिपा लेता है, शुक्लपक्ष में पुनः प्रकाशित कर देता है॥१९॥

धन्व॑ च॒ यत्कृ॒न्तत्रं॑ च॒ कति॑ स्वि॒त्ता वि योज॑ना। नेदी॑यसो वृषाक॒पेऽस्त॒मेहि॑ गृ॒हाँ उप॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥

सूर्य का वसन्तसम्पात बिन्दु निज स्थान है और ध्रुव का उत्तर में तीन राशि परे है। छः राशियों के चाप को शर-बाण तीन राशि पर चाप में खड़ा होता है। जब उधर दृष्ट होगा, दिखाई पड़ेगा, उत्तरी ध्रुव के पास पहुँचता है॥२०॥

पुन॒रेहि॑ वृषाकपे सुवि॒ता क॑ल्पयावहै। य ए॒ष स्व॑प्न॒नंश॒नोऽस्त॒मेषि॑ प॒था पुन॒र्विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥

सूर्य उत्तरध्रुव की ओर तथा वसन्तसम्पात की ओर पुनः-पुनः जाया-आया  करता है, इससे उत्तरायण और दक्षिणायन ग्रीष्मकाल और शीतकाल बनता रहता है॥२१॥

यदुद॑ञ्चो वृषाकपे गृ॒हमि॒न्द्राज॑गन्तन। क्व१॒॑ स्य पु॑ल्व॒घो मृ॒गः कम॑गञ्जन॒योप॑नो॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥

उत्तरध्रुव की ओर उत्तरायण में होकर सूर्य फिर अपने घर सम्पातबिन्दु में पहुँच जाता है। ज्योतिषी विद्वान् उसकी इस गतिविधि पर विचार करते हैं कि यह ऐसा किस कारण से होता है ?॥२२॥

पर्शु॑र्ह॒ नाम॑ मान॒वी सा॒कं स॑सूव विंश॒तिम्। भ॒द्रं भ॑ल॒ त्यस्या॑ अभू॒द्यस्या॑ उ॒दर॒माम॑य॒द्विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः॥

संवत्सर या वर्षचक्र का वसन्तसम्पात एक भाग है, वहाँ पर समस्त ग्रह-उपग्रह सृष्टि के आरम्भ में स्थान ले लेते हैं। वहीं से प्रकट होते हैं और गति प्रारम्भ करते हैं॥२३॥

र॒क्षो॒हणं॑ वा॒जिन॒मा जि॑घर्मि मि॒त्रं प्रथि॑ष्ठ॒मुप॑ यामि॒ शर्म॑। शिशा॑नो अ॒ग्निः क्रतु॑भिः॒ समि॑द्धः॒ स नो॒ दिवा॒ स रि॒षः पा॑तु॒ नक्त॑म्॥

राजा को सेनानायक ऐसा बनाना चाहिये, जो शत्रु को दबाने मारने में पूर्ण समर्थ आग्नेयास्त्र आदि चलानेवाला हो॥१॥

अयो॑दंष्ट्रो अ॒र्चिषा॑ यातु॒धाना॒नुप॑ स्पृश जातवेदः॒ समि॑द्धः। आ जि॒ह्वया॒ मूर॑देवान्रभस्व क्र॒व्यादो॑ वृ॒क्त्व्यपि॑ धत्स्वा॒सन्॥

सेनानायक अवसर को जाननेवाला तीक्ष्ण शस्त्रों से शत्रुओं को अपने अधीन करे तथा ललकारमात्र से उनको भ्रान्त करनेवाला हिंसक शत्रुओं को बन्धन में डालनेवाला होना चाहिये॥२॥

उ॒भोभ॑यावि॒न्नुप॑ धेहि॒ दंष्ट्रा॑ हिं॒स्रः शिशा॒नोऽव॑रं॒ परं॑ च। उ॒तान्तरि॑क्षे॒ परि॑ याहि राज॒ञ्जम्भैः॒ सं धे॑ह्य॒भि या॑तु॒धाना॑न्॥

सेनानायक दोनों ओर शस्त्रास्त्रों से सन्नद्ध हो। वह शत्रुओं को ताड़ित करके भूमि पर लेटा दे और आकाश में भी विमान द्वारा आक्रमण कर शत्रुओं का नाश करे॥३॥

य॒ज्ञैरिषूः॑ सं॒नम॑मानो अग्ने वा॒चा श॒ल्याँ अ॒शनि॑भिर्दिहा॒नः। ताभि॑र्विध्य॒ हृद॑ये यातु॒धाना॑न्प्रती॒चो बा॒हून्प्रति॑ भङ्ध्येषाम्॥

सेनानायक को चाहिये कि वह  किन्हीं स्फोटक पदार्थों और विद्युत् की धाराओं से शस्त्रों को संयुक्त करे, जिनसे शत्रु शस्त्र सहित उल्टे ताड़ित हो सकें॥४॥

अग्ने॒ त्वचं॑ यातु॒धान॑स्य भिन्धि हिं॒स्राशनि॒र्हर॑सा हन्त्वेनम्। प्र पर्वा॑णि जातवेदः शृणीहि क्र॒व्यात्क्र॑वि॒ष्णुर्वि चि॑नोतु वृ॒क्णम्॥

सेनानायक शस्त्रास्त्रों एवं विद्युत्शक्ति के प्रहारों से शत्रुओं के अङ्गों को तोड़-फोड़ दे, त्वचा को छिन्न-भिन्न कर दे, वे भागने के योग्य भी न रहें, उन्हें मांसभक्षक पशु-पक्षी नोच-नोच कर खा डालें॥५॥

यत्रे॒दानीं॒ पश्य॑सि जातवेद॒स्तिष्ठ॑न्तमग्न उ॒त वा॒ चर॑न्तम्। यद्वा॒न्तरि॑क्षे प॒थिभिः॒ पत॑न्तं॒ तमस्ता॑ विध्य॒ शर्वा॒ शिशा॑नः॥

सेनानायक को चाहिये कि जब भी शत्रु को बैठा हुआ, चलता हुआ या आकाश में देखे, उसे तुरन्त शस्त्रास्त्रों से ताड़ित करे॥६॥

उ॒ताल॑ब्धं स्पृणुहि जातवेद आलेभा॒नादृ॒ष्टिभि॑र्यातु॒धाना॑त्। अग्ने॒ पूर्वो॒ नि ज॑हि॒ शोशु॑चान आ॒मादः॒ क्ष्विङ्का॒स्तम॑द॒न्त्वेनीः॑॥

सेनानायक प्राप्त स्वराज्य को स्वाधीनता से सेवन करे और आक्रमणकारी शत्रु से शस्त्रों के बल पर प्राप्त किये गये धन का भी सेवन करे। इस प्रकार तेजस्वी सेनानी शत्रुओं का नाश करे कि घूमते-फिरते भाँति-भाँति शब्द करते हुए वनचर जन्तु उनका भक्षण कर जाएँ॥७॥

इ॒ह प्र ब्रू॑हि यत॒मः सो अ॑ग्ने॒ यो या॑तु॒धानो॒ य इ॒दं कृ॒णोति॑। तमा र॑भस्व स॒मिधा॑ यविष्ठ नृ॒चक्ष॑स॒श्चक्षु॑षे रन्धयैनम्॥

शक्तिसंपन्न युवा सेनानायक उस राष्ट्र के हरनेवाले  तथा प्रजा को पीड़ित करनेवाले दुष्ट मनुष्य को अपने शस्त्रास्त्रों से तापित करे या उसे विद्वानों के समीप दण्ड के लिये उपस्थित करे॥८॥

ती॒क्ष्णेना॑ग्ने॒ चक्षु॑षा रक्ष य॒ज्ञं प्राञ्चं॒ वसु॑भ्यः॒ प्र ण॑य प्रचेतः। हिं॒स्रं रक्षां॑स्य॒भि शोशु॑चानं॒ मा त्वा॑ दभन्यातु॒धाना॑ नृचक्षः॥

सेनानायक सब सैनिकों पर दृष्टि रखे, प्रजाजनों के सुखार्थ राष्ट्र की रक्षा करे, शत्रु से बचावे, शत्रुओं को हिंसित करे॥९॥

नृ॒चक्षा॒ रक्षः॒ परि॑ पश्य वि॒क्षु तस्य॒ त्रीणि॒ प्रति॑ शृणी॒ह्यग्रा॑। तस्या॑ग्ने पृ॒ष्टीर्हर॑सा शृणीहि त्रे॒धा मूलं॑ यातु॒धान॑स्य वृश्च॥

सेनानायक प्रजा में देखे कि कोई राष्ट्र का विरोधी दुष्टजन घुसा हुआ है क्या? उसे और उसको शरण देनेवाले को नष्ट करे॥१०॥

त्रिर्या॑तु॒धानः॒ प्रसि॑तिं त एत्वृ॒तं यो अ॑ग्ने॒ अनृ॑तेन॒ हन्ति॑। तम॒र्चिषा॑ स्फू॒र्जय॑ञ्जातवेदः सम॒क्षमे॑नं गृण॒ते नि वृ॑ङ्धि॥

प्रजागण के पीड़क दुष्ट पापी को और जो अपने पापाचरण द्वारा सदाचरण की हत्या करे, उसे तीन बन्धनियों-हाथ पैर गले में हथकड़ी बेड़ी गलफाँसी में बाँधकर सबके सम्मुख प्राणों से वियुक्त करे॥११॥

तद॑ग्ने॒ चक्षुः॒ प्रति॑ धेहि रे॒भे श॑फा॒रुजं॒ येन॒ पश्य॑सि यातु॒धान॑म्। अ॒थ॒र्व॒वज्ज्योति॑षा॒ दैव्ये॑न स॒त्यं धूर्व॑न्तम॒चितं॒ न्यो॑ष॥

प्रजा के आर्त्तनाद को सुनकर, उनकी अवस्था को देखकर, सूर्य के समान तेज से सत्य के नष्ट करनेवाले मूढ़ को जला दे॥१२॥

यद॑ग्ने अ॒द्य मि॑थु॒ना शपा॑तो॒ यद्वा॒चस्तृ॒ष्टं ज॒नय॑न्त रे॒भाः। म॒न्योर्मन॑सः शर॒व्या॒३॒॑ जाय॑ते॒ या तया॑ विध्य॒ हृद॑ये यातु॒धाना॑न्॥

कटु वचन बोलनेवालों के हृदय में शस्त्र के द्वारा बींध देना चाहिये॥१३॥

परा॑ शृणीहि॒ तप॑सा यातु॒धाना॒न्परा॑ग्ने॒ रक्षो॒ हर॑सा शृणीहि। परा॒र्चिषा॒ मूर॑देवाञ्छृणीहि॒ परा॑सु॒तृपो॑ अ॒भि शोशु॑चानः॥

सेनानायक को चाहिए कि पीड़ा देनेवाले राक्षसवृत्ति के मूढ़ जनों, जो दूसरों को मारने में प्रसन्नता अनुभव करते हैं, ऐसे लोगों को तथा दूसरों के प्राणों से-प्राणों को तृप्त करनेवालों को नष्ट करे॥१४॥

परा॒द्य दे॒वा वृ॑जि॒नं शृ॑णन्तु प्र॒त्यगे॑नं श॒पथा॑ यन्तु तृ॒ष्टाः। वा॒चास्ते॑नं॒ शर॑व ऋच्छन्तु॒ मर्म॒न्विश्व॑स्यैतु॒ प्रसि॑तिं यातु॒धानः॑॥

सैनिकजन या अस्त्र में प्रयुक्त विद्युत् आदि पदार्थ पापी को नष्ट करें, दूसरों के प्रति मर्मभेदी अपशब्द उल्टे उसी का नाश करें, समस्त राष्ट्र को पीड़ा देनेवाले बन्धन में डाले जाएँ॥१५॥

यः पौरु॑षेयेण क्र॒विषा॑ सम॒ङ्क्ते यो अश्व्ये॑न प॒शुना॑ यातु॒धानः॑। यो अ॒घ्न्याया॒ भर॑ति क्षी॒रम॑ग्ने॒ तेषां॑ शी॒र्षाणि॒ हर॒सापि॑ वृश्च॥

तेजस्वी नायक को चाहिए कि जो राष्ट्र में पीड़ा पहुँचानेवाले प्राणी मनुष्य के मांस को खाकर अपने को पुष्ट करते हैं या अच्छे घोड़ों को नष्ट करते हैं, गौवों के दूध छीनते-सुखाते हैं-दूषित करते हैं उनके शिरों और उनके प्रमुख जनों को नष्ट करे॥१६॥

सं॒व॒त्स॒रीणं॒ पय॑ उ॒स्रिया॑या॒स्तस्य॒ माशी॑द्यातु॒धानो॑ नृचक्षः। पी॒यूष॑मग्ने यत॒मस्तितृ॑प्सा॒त्तं प्र॒त्यञ्च॑म॒र्चिषा॑ विध्य॒ मर्म॑न्॥

सबके व्यवहारों को देखनेवाला नायक पीड़ा देनेवाले को गौ का दूध वर्ष भर तक न पीने दे। जो उस अमृतरूप दूध को पीकर अपने को तृप्त करना चाहे, उस ऐसे पीड़क जन को दूसरों के सम्मुख तीक्ष्ण शस्त्र से ताड़ित करे॥१७॥

वि॒षं गवां॑ यातु॒धानाः॑ पिब॒न्त्वा वृ॑श्च्यन्ता॒मदि॑तये दु॒रेवाः॑। परै॑नान्दे॒वः स॑वि॒ता द॑दातु॒ परा॑ भा॒गमोष॑धीनां जयन्ताम्॥

यातना देनेवाले को गौ का दूध न दिया जावे, केवल अन्न मिले, प्रहारकों से दण्ड मिले॥१८॥

स॒नाद॑ग्ने मृणसि यातु॒धाना॒न्न त्वा॒ रक्षां॑सि॒ पृत॑नासु जिग्युः। अनु॑ दह स॒हमू॑रान्क्र॒व्यादो॒ मा ते॑ हे॒त्या मु॑क्षत॒ दैव्या॑याः॥

सेनानायक ऐसा होना चाहिए, जिसे संग्राम में शत्रुजन जीत न सके। ऐसा वैद्युत अस्त्र चलानेवाला हो, जिससे कोई न बच सके॥१९॥

त्वं नो॑ अग्ने अध॒रादुद॑क्ता॒त्त्वं प॒श्चादु॒त र॑क्षा पु॒रस्ता॑त्। प्रति॒ ते ते॑ अ॒जरा॑स॒स्तपि॑ष्ठा अ॒घशं॑सं॒ शोशु॑चतो दहन्तु॥

नायक सब दिशाओं से रक्षा करनेवाला अपने ज्वलन्त प्रहारों से शत्रु को दग्ध करनेवाला होना चाहिए॥२०॥

प॒श्चात्पु॒रस्ता॑दध॒रादुद॑क्तात्क॒विः काव्ये॑न॒ परि॑ पाहि राजन्। सखे॒ सखा॑यम॒जरो॑ जरि॒म्णेऽग्ने॒ मर्ताँ॒ अम॑र्त्य॒स्त्वं नः॑॥

परमात्मा अपने उपासकों की समस्त दिशाओं से रक्षा करता है, जरापर्यन्त जीवन प्रदान करता है॥२१॥

परि॑ त्वाग्ने॒ पुरं॑ व॒यं विप्रं॑ सहस्य धीमहि। धृ॒षद्व॑र्णं दि॒वेदि॑वे ह॒न्तारं॑ भङ्गु॒राव॑ताम्॥

परमात्मा पीड़ा देनेवालों को नष्ट कर रहा है, उसका स्मरण करना चाहिए॥२२॥

वि॒षेण॑ भङ्गु॒राव॑तः॒ प्रति॑ ष्म र॒क्षसो॑ दह। अग्ने॑ ति॒ग्मेन॑ शो॒चिषा॒ तपु॑रग्राभिॠ॒ष्टिभिः॑॥

राष्ट्र में तोड़-फोड़ मचानेवाले दुष्टजनों को तीक्ष्ण जलते हुए शस्त्रों तथा तापक मुखवाले शक्तिशस्त्रों से दग्ध करे, नष्ट-भ्रष्ट करे॥२३॥

प्रत्य॑ग्ने मिथु॒ना द॑ह यातु॒धाना॑ किमी॒दिना॑। सं त्वा॑ शिशामि जागृ॒ह्यद॑ब्धं विप्र॒ मन्म॑भिः॥

राष्ट्र के अन्दर जो पीड़ा देनेवाले तथा जो क्या-क्या हरें, लूटें सोचनेवाले स्त्रीपुरुषों को जला देना चाहिए, प्रजाजन भी शासक को उत्तेजित प्रोत्साहित करते रहें॥२४॥

प्रत्य॑ग्ने॒ हर॑सा॒ हरः॑ शृणी॒हि वि॒श्वतः॒ प्रति॑। या॒तु॒धान॑स्य र॒क्षसो॒ बलं॒ वि रु॑ज वी॒र्य॑म्॥

पीड़ा देनेवाले दुष्ट के बल को राष्ट्र का नायक अपने शस्त्रबल और प्रताप से नष्ट करे॥२५॥

ह॒विष्पान्त॑म॒जरं॑ स्व॒र्विदि॑ दिवि॒स्पृश्याहु॑तं॒ जुष्ट॑म॒ग्नौ। तस्य॒ भर्म॑णे॒ भुव॑नाय दे॒वा धर्म॑णे॒ कं स्व॒धया॑ पप्रथन्त॥

विशेष हवि जो खाने-पीने योग्य आकाश को छूनेवाले, सूर्य को प्राप्त होनेवाले, पहुँचने योग्य को यज्ञाग्नि में होमता है, वह सुख को प्राप्त करता है॥१॥

गी॒र्णं भुव॑नं॒ तम॒साप॑गूळ्हमा॒विः स्व॑रभवज्जा॒ते अ॒ग्नौ। तस्य॑ दे॒वाः पृ॑थि॒वी द्यौरु॒तापोऽर॑णय॒न्नोष॑धीः स॒ख्ये अ॑स्य॥

प्रथम यह सब जगत् अन्धकार से दबा छिपा हुआ था, पुनः परमात्मा ने इसे प्रगट किया, उसके शासन में सब वायुसूर्य द्यौलोक पृथिवीलोक जल औषधि आदि रहते हैं, अपना-अपना कार्य करते हैं॥२॥

दे॒वेभि॒र्न्वि॑षि॒तो य॒ज्ञिये॑भिर॒ग्निं स्तो॑षाण्य॒जरं॑ बृ॒हन्त॑म्। यो भा॒नुना॑ पृथि॒वीं द्यामु॒तेमामा॑त॒तान॒ रोद॑सी अ॒न्तरि॑क्षम्॥

पूजनीय विद्वानों से शिक्षा पाकर महान् परमात्मा की स्तुति करनी चाहिए। जिसने द्युलोक, पृथिवीलोक तथा दोनों के मध्य में अन्तरिक्ष को उत्पन्न किया है॥३॥

यो होतासी॑त्प्रथ॒मो दे॒वजु॑ष्टो॒ यं स॒माञ्ज॒न्नाज्ये॑ना वृणा॒नाः। स प॑त॒त्री॑त्व॒रं स्था जग॒द्यच्छ्वा॒त्रम॒ग्निर॑कृणोज्जा॒तवे॑दाः॥

परमात्मा वृक्षादि जड़ तथा मनुष्य पशु पक्षी जङ्गम सृष्टि का उत्पन्न करनेवाला है, मुमुक्षु जन उसे ध्यानयज्ञ द्वारा अपने में साक्षात् करते हैं॥४॥

यज्जा॑तवेदो॒ भुव॑नस्य मू॒र्धन्नति॑ष्ठो अग्ने स॒ह रो॑च॒नेन॑। तं त्वा॑हेम म॒तिभि॑र्गी॒र्भिरु॒क्थैः स य॒ज्ञियो॑ अभवो रोदसि॒प्राः॥

परमात्मा समस्त संसार में व्याप्त है तथा प्राणिमात्र के ऊपर शासन करता है, उसे मननप्रकारों स्तुति प्रशंसाओं द्वारा प्राप्त किया जाता है॥५॥

मू॒र्धा भु॒वो भ॑वति॒ नक्त॑म॒ग्निस्ततः॒ सूर्यो॑ जायते प्रा॒तरु॒द्यन्। मा॒यामू॒ तु य॒ज्ञिया॑नामे॒तामपो॒ यत्तूर्णि॒श्चर॑ति प्रजा॒नन्॥

वैश्वानर अग्नि दिन-रात सब स्थानों पर कार्य करता है। भिन्न नाम रूपों से रात्रि में अग्नि बनकर, दिन में सूर्य बनकर, वेदि में यज्ञाग्नि होकर याज्ञिकों को ज्ञान का निमित्त बनता है॥६॥

दृ॒शेन्यो॒ यो म॑हि॒ना समि॒द्धोऽरो॑चत दि॒वियो॑निर्वि॒भावा॑। तस्मि॑न्न॒ग्नौ सू॑क्तवा॒केन॑ दे॒वा ह॒विर्विश्व॒ आजु॑हवुस्तनू॒पाः॥

पृथिवीस्थ अग्नि सदा आकाश के सूर्य को उन्मुख हो प्रज्ज्वलित होती है, उसे वेदि में घृतादि होम्य वस्तु देनी चाहिए अपने शरीर की रक्षा करने के लिये॥७॥

सू॒क्त॒वा॒कं प्र॑थ॒ममादिद॒ग्निमादिद्ध॒विर॑जनयन्त दे॒वाः। स ए॑षां य॒ज्ञो अ॑भवत्तनू॒पास्तं द्यौर्वे॑द॒ तं पृ॑थि॒वी तमापः॑॥

विद्वानों को प्रथम मन्त्रसमूह बोलना चाहिए। पुनः अग्न्याधान करना, फिर होमने योग्य वस्तु अग्नि में छोड़ते हैं॥८॥

यं दे॒वासोऽज॑नयन्ता॒ग्निं यस्मि॒न्नाजु॑हवु॒र्भुव॑नानि॒ विश्वा॑। सो अ॒र्चिषा॑ पृथि॒वीं द्यामु॒तेमामृ॑जू॒यमा॑नो अतपन्महि॒त्वा॥

स्तोमे॑न॒ हि दि॒वि दे॒वासो॑ अ॒ग्निमजी॑जन॒ञ्छक्ति॑भी रोदसि॒प्राम्। तमू॑ अकृण्वन्त्रे॒धा भु॒वे कं स ओष॑धीः पचति वि॒श्वरू॑पाः॥

सृष्टि के आरम्भ में सृष्टि प्राण-प्राणतत्त्व बहुसंख्या में प्रकट होते हैं, वे परस्पर संघर्ष करते हैं तो अग्नि पदार्थ उत्पन्न होता है, पुनः उस अग्नि पदार्थ को तीन रूपों में विभक्त करते हैं−सूर्य, विद्युत् और अग्निरूप में; ये तीनों समस्त तीनों लोकों में वर्तमान ओषधितत्त्वों को पकाते हैं, उपयुक्त बनाते हैं॥१०॥

य॒देदे॑न॒मद॑धुर्य॒ज्ञिया॑सो दि॒वि दे॒वाः सूर्य॑मादिते॒यम्। य॒दा च॑रि॒ष्णू मि॑थु॒नावभू॑ता॒मादित्प्राप॑श्य॒न्भुव॑नानि॒ विश्वा॑॥

सृष्टि के प्राण सृष्टि के पदार्थों कणों को संगत करते हुए पृथिवी से संगत हो सूर्य और उषा जोड़े को प्रकट करते हैं, जिन्हें सब प्राणी देखते हैं॥११॥

विश्व॑स्मा अ॒ग्निं भुव॑नाय दे॒वा वै॑श्वान॒रं के॒तुमह्ना॑मकृण्वन्। आ यस्त॒तानो॒षसो॑ विभा॒तीरपो॑ ऊर्णोति॒ तमो॑ अ॒र्चिषा॒ यन्॥

समष्टिप्राण सूर्य को प्रकट करते हैं और उसे किरणें चमकाती हैं, वह अन्धकार को मिटाता है॥१२॥

वै॒श्वा॒न॒रं क॒वयो॑ य॒ज्ञिया॑सो॒ऽग्निं दे॒वा अ॑जनयन्नजु॒र्यम्। नक्ष॑त्रं प्र॒त्नममि॑नच्चरि॒ष्णु य॒क्षस्याध्य॑क्षं तवि॒षं बृ॒हन्त॑म्॥

मुमुक्षु विद्वानों को अपने आत्मा में पूजनीय परमात्मा का साक्षात् करना चाहिए तथा उस स्वामी को प्राप्त करना चाहिए॥१३॥

वै॒श्वा॒न॒रं वि॒श्वहा॑ दीदि॒वांसं॒ मन्त्रै॑र॒ग्निं क॒विमच्छा॑ वदामः। यो म॑हि॒म्ना प॑रिब॒भूवो॒र्वी उ॒तावस्ता॑दु॒त दे॒वः प॒रस्ता॑त्॥

परमात्मा द्यावापृथिवी जगत् को स्वाधीन रखता है, सांसारिक बन्धन में पड़े जीवगण को तथा मोक्ष में मुक्तात्माओं को अपने आधीन रखता है, वह सदा स्तुति करने योग्य है॥१४॥

द्वे स्रु॒ती अ॑शृणवं पितॄ॒णाम॒हं दे॒वाना॑मु॒त मर्त्या॑नाम्। ताभ्या॑मि॒दं विश्व॒मेज॒त्समे॑ति॒ यद॑न्त॒रा पि॒तरं॑ मा॒तरं॑ च॥

संसार में जो माता-पिता के द्वारा जन्म धारण करते हैं, उनमें से संतानोत्पादक सांसारिक मरणधर्मी जनों का पितृयाण तथा मुमुक्षु जीवन्मुक्तों का देवयानमार्ग है॥१५॥

द्वे स॑मी॒ची बि॑भृत॒श्चर॑न्तं शीर्ष॒तो जा॒तं मन॑सा॒ विमृ॑ष्टम्। स प्र॒त्यङ्विश्वा॒ भुव॑नानि तस्था॒वप्र॑युच्छन्त॒रणि॒र्भ्राज॑मानः॥

परमात्मा जो इस द्यावापृथिवीमय जगत् का शासन करता है, सबका उत्पन्नकर्ता सब में व्यापक निरन्तर रहनेवाला दुःख से तारनेवाला ज्ञानदाता है॥१६॥

यत्रा॒ वदे॑ते॒ अव॑रः॒ पर॑श्च यज्ञ॒न्योः॑ कत॒रो नौ॒ वि वे॑द। आ शे॑कु॒रित्स॑ध॒मादं॒ सखा॑यो॒ नक्ष॑न्त य॒ज्ञं क इ॒दं वि वो॑चत्॥

होमयाजी और आत्मयाजी दोनों के मार्ग पृथक् हैं, जो होमयज्ञ और आत्मयज्ञ को करके लाभ उठाते हैं तथा होमयज्ञ के हव्य को पृथिवी का अग्नि सूक्ष्म करता है। मध्यमस्थान का वायु होमे हुए सूक्ष्म को फैलाता है॥१७॥

कत्य॒ग्नयः॒ कति॒ सूर्या॑सः॒ कत्यु॒षासः॒ कत्यु॑ स्वि॒दापः॑। नोप॒स्पिजं॑ वः पितरो वदामि पृ॒च्छामि॑ वः कवयो वि॒द्मने॒ कम्॥

अपने से बड़े विद्वानों से जिज्ञासापूर्वक पूछना चाहिए, अन्यथा स्वज्ञानप्रदर्शनार्थ नहीं, कि अग्नि या सूर्य जल कितने हैं॥१८॥

या॒व॒न्मा॒त्रमु॒षसो॒ न प्रती॑कं सुप॒र्ण्यो॒३॒॑ वस॑ते मातरिश्वः। ताव॑द्दधा॒त्युप॑ य॒ज्ञमा॒यन्ब्रा॑ह्म॒णो होतु॒रव॑रो नि॒षीद॑न्॥

उषावेला तब तक कहलाती है, जब तक सूर्यकिरणें उसे आच्छादित न कर दें, जब ढक दें, तब मनुष्य यज्ञ अग्निहोत्र करना आरम्भ करे, पूर्व नहीं, पूर्व तो ब्रह्मयज्ञ की वेला है॥१९॥

इन्द्रं॑ स्तवा॒ नृत॑मं॒ यस्य॑ म॒ह्ना वि॑बबा॒धे रो॑च॒ना वि ज्मो अन्ता॑न्। आ यः प॒प्रौ च॑र्षणी॒धृद्वरो॑भिः॒ प्र सिन्धु॑भ्यो रिरिचा॒नो म॑हि॒त्वा॥

परमात्मा समस्त प्रकाशवाले आकाशीय गृहतारों को पृथिवी या फैली हुई सृष्टि के प्रदेशों को अपनी व्याप्ति से प्रभावित कर रहा संसार के बन्धनों से पृथक् है, उसकी स्तुति करनी चाहिए॥१॥

स सूर्यः॒ पर्यु॒रू वरां॒स्येन्द्रो॑ ववृत्या॒द्रथ्ये॑व च॒क्रा। अति॑ष्ठन्तमप॒स्यं१॒॑ न सर्गं॑ कृ॒ष्णा तमां॑सि॒ त्विष्या॑ जघान॥

परमात्मा समस्त आकाशीय गोलों-पिण्डों के वेष्टनों-वातावरणों को घुमाता है, अपितु समस्त उत्पन्न जगत् को भी घुमाता है, जीवों के अन्दर से अज्ञानान्धकारों को नष्ट करता है, कर्मनिमित्त शरीरधारण कराता है॥२॥

स॒मा॒नम॑स्मा॒ अन॑पावृदर्च क्ष्म॒या दि॒वो अस॑मं॒ ब्रह्म॒ नव्य॑म्। वि यः पृ॒ष्ठेव॒ जनि॑मान्य॒र्य इन्द्र॑श्चि॒काय॒ न सखा॑यमी॒षे॥

परमात्मा जगत् का स्वामी महान् आत्माओं को जाननेवाला सर्वान्तर्यामी निष्पक्ष है, उसकी स्तुति करनी चाहिए॥३॥

इन्द्रा॑य॒ गिरो॒ अनि॑शितसर्गा अ॒पः प्रेर॑यं॒ सग॑रस्य बु॒ध्नात्। यो अक्षे॑णेव च॒क्रिया॒ शची॑भि॒र्विष्व॑क्त॒स्तम्भ॑ पृथि॒वीमु॒त द्याम्॥

परमात्मा के लिये न रुकनेवाले स्तुतिप्रवाहों को ही प्रेरित करना चाहिए, जो अपनी व्याप्ति से द्युलोक पृथिवी चक्रों के समान चला रहा, सम्भाल रहा है॥४॥

आपा॑न्तमन्युस्तृ॒पल॑प्रभर्मा॒ धुनिः॒ शिमी॑वा॒ञ्छरु॑माँ ऋजी॒षी। सोमो॒ विश्वा॑न्यत॒सा वना॑नि॒ नार्वागिन्द्रं॑ प्रति॒माना॑नि देभुः॥

परमात्मा स्वरूपतः तेजस्वी, शीघ्रप्रहारकर्त्ता, दुःख का शमन करनेवाला, सरल सत्य प्रवृत्तिवालों का प्रेरक है, वह विरोधियों से दबनेवाला नहीं, किन्तु विरोधी उसके अधीन होकर नष्ट हो जाते है, ऐसा परमात्मा शरण्य है॥५॥

न यस्य॒ द्यावा॑पृथि॒वी न धन्व॒ नान्तरि॑क्षं॒ नाद्र॑यः॒ सोमो॑ अक्षाः। यद॑स्य म॒न्युर॑धिनी॒यमा॑नः शृ॒णाति॑ वी॒ळु रु॒जति॑ स्थि॒राणि॑॥

परमात्मा के स्वरूप को संसार का बड़े से बड़ा पदार्थ पा नहीं सकता, केवल शान्त ऊँचा ब्राह्मण उसे जान सकता है॥६॥

ज॒घान॑ वृ॒त्रं स्वधि॑ति॒र्वने॑व रु॒रोज॒ पुरो॒ अर॑द॒न्न सिन्धू॑न्। बि॒भेद॑ गि॒रिं नव॒मिन्न कु॒म्भमा गा इन्द्रो॑ अकृणुत स्व॒युग्भिः॑॥

परमात्मा न केवल अपने उपासकों के साथ योग करता है तथा उनके पापमल और अज्ञानान्धकार को नष्ट करता है, अपितु उनके लिये वेदवाणी को प्रदान करता है॥७॥

त्वं ह॒ त्यदृ॑ण॒या इ॑न्द्र॒ धीरो॒ऽसिर्न पर्व॑ वृजि॒ना शृ॑णासि। प्र ये मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य॒ धाम॒ युजं॒ न जना॑ मि॒नन्ति॑ मि॒त्रम्॥

मूलधन को सूद सहित पानेवाला जैसे आनन्द प्राप्त करता है, ऐसे परमात्मा के प्रति अपने आत्मा को समर्पित करनेवाला ब्रह्मानन्द से अपने को सानन्द बनाता है। तलवार जैसे अङ्गों को काट डालता है, ऐसे परमात्मा उपासक के पापों को नष्ट कर देता है॥८॥

प्र ये मि॒त्रं प्रार्य॒मणं॑ दु॒रेवाः॒ प्र सं॒गिरः॒ प्र वरु॑णं मि॒नन्ति॑। न्य१॒॑मित्रे॑षु व॒धमि॑न्द्र॒ तुम्रं॒ वृष॒न्वृषा॑णमरु॒षं शि॑शीहि॥

जो दुर्व्यवहार करनेवाले दुष्टजन, मित्र, अन्नदाता, ज्ञानदाता, ध्यानी उपासक रक्षक को पीड़ित करते हैं, उन ऐसे जनों के निमित्त परमात्मा तीक्ष्ण वज्र से प्रहार करता है॥९॥

इन्द्रो॑ दि॒व इन्द्र॑ ईशे पृथि॒व्या इन्द्रो॑ अ॒पामिन्द्र॒ इत्पर्व॑तानाम्। इन्द्रो॑ वृ॒धामिन्द्र॒ इन्मेधि॑राणा॒मिन्द्रः॒ क्षेमे॒ योगे॒ हव्य॒ इन्द्रः॑॥

द्युलोक, पृथिवीलोक, अन्तरिक्ष तथा मेघों, महान् आकाश आदि पदार्थों, आयु में बड़ों, मेधावी ऋषियों का स्वामित्व करनेवाला है और हमारे द्वारा रक्षार्थ एवं प्राप्ति के लिये आमन्त्रण करने योग्य उपास्य है॥१०॥

प्राक्तुभ्य॒ इन्द्रः॒ प्र वृ॒धो अह॑भ्यः॒ प्रान्तरि॑क्षा॒त्प्र स॑मु॒द्रस्य॑ धा॒सेः। प्र वात॑स्य॒ प्रथ॑सः॒ प्र ज्मो अन्ता॒त्प्र सिन्धु॑भ्यो रिरिचे॒ प्र क्षि॒तिभ्यः॑॥

परमात्मा इन दिन रातों से महान् है, इनके प्रादुर्भूत होने से पूर्व वर्तमान है, अन्तरिक्ष से महान् है, समुद्र के धरातल या गहनरूप से महान् बड़ा गहनरूप होने से, वायु के विस्तार सञ्चार से भी महान्, पृथिवी के घेरे से महान्, नदियों से, मनुष्यों से अतिरिक्त है॥११॥

प्र शोशु॑चत्या उ॒षसो॒ न के॒तुर॑सि॒न्वा ते॑ वर्ततामिन्द्र हे॒तिः। अश्मे॑व विध्य दि॒व आ सृ॑जा॒नस्तपि॑ष्ठेन॒ हेष॑सा॒ द्रोघ॑मित्रान्॥

मित्रों से द्रोह करनेवालों के ऊपर ज्वलित विद्युत् की तरङ्ग के समान परमात्मा की वज्रशक्ति आकाश से पाषाणवर्षा करती हुई सी गिर कर अपने ताप से ताड़ित करती है॥१२॥

अन्वह॒ मासा॒ अन्विद्वना॒न्यन्वोष॑धी॒रनु॒ पर्व॑तासः। अन्विन्द्रं॒ रोद॑सी वावशा॒ने अन्वापो॑ अजिहत॒ जाय॑मानम्॥

परमात्मा के अधीन मास तथा जलप्रवाह चलते हैं। परमात्मा के शासन में द्युलोक, पृथिवीलोक, पर्वत, वन और ओषधियाँ वर्तमान रहती हैं॥१३॥

कर्हि॑ स्वि॒त्सा त॑ इन्द्र चे॒त्यास॑द॒घस्य॒ यद्भि॒नदो॒ रक्ष॒ एष॑त्। मि॒त्र॒क्रुवो॒ यच्छस॑ने॒ न गावः॑ पृथि॒व्या आ॒पृग॑मु॒या शय॑न्ते॥

पापी राक्षस के प्रति परमात्मा की अस्त्रशक्ति जाती है, मार देती है। जैसे पापी जन के द्वारा गो आदि पशु मारे जाने से पृथिवी पर सो जाते हैं, ऐसे पापी जन मरकर पृथिवी पर सो जाते हैं॥१४॥

श॒त्रू॒यन्तो॑ अ॒भि ये न॑स्तत॒स्रे महि॒ व्राध॑न्त ओग॒णास॑ इन्द्र। अ॒न्धेना॒मित्रा॒स्तम॑सा सचन्तां सुज्यो॒तिषो॑ अ॒क्तव॒स्ताँ अ॒भि ष्युः॑॥

शत्रुता करनेवाले पीड़ा पहुँचानेवाले नीचसङ्घ घने अन्धकार से संगत हो जाते हैं और उनके दिन-रात भी तीक्ष्ण तेज से उन्हें तपाते हैं॥१५॥

पु॒रूणि॒ हि त्वा॒ सव॑ना॒ जना॑नां॒ ब्रह्मा॑णि॒ मन्द॑न्गृण॒तामृषी॑णाम्। इ॒मामा॒घोष॒न्नव॑सा॒ सहू॑तिं ति॒रो विश्वाँ॒ अर्च॑तो याह्य॒र्वाङ्॥

परमात्मा सब होमयाजी जनों के यजनकर्मों को तथा आत्मयाजी जनों के मन्त्रवचनों स्तुतिवचनों को स्वीकार करता है। इस प्रकार सब अर्चना करनेवालों को अन्तर्दृष्टि से साक्षात् होता है॥१६॥

ए॒वा ते॑ व॒यमि॑न्द्र भुञ्जती॒नां वि॒द्याम॑ सुमती॒नां नवा॑नाम्। वि॒द्याम॒ वस्तो॒रव॑सा गृ॒णन्तो॑ वि॒श्वामि॑त्रा उ॒त त॑ इन्द्र नू॒नम्॥

परमात्मा की दी हुई वेदवाणियाँ मनुष्यों के लिये रक्षा करनेवाली कल्याणकारिणी हैं, उसकी कृपा से उन्हें जानें तथा प्रतिदिन स्तुति करते हुए परमात्मा को प्राप्त करें॥१७॥

शु॒नं हु॑वेम म॒घवा॑न॒मिन्द्र॑म॒स्मिन्भरे॒ नृत॑मं॒ वाज॑सातौ। शृ॒ण्वन्त॑मु॒ग्रमू॒तये॑ स॒मत्सु॒ घ्नन्तं॑ वृ॒त्राणि॑ सं॒जितं॒ धना॑नाम्॥

जीवनसंग्राम में अन्नभोगप्राप्ति की आवश्यकता को पूरी करनेवाले प्रसिद्ध नायक प्रतापी तापनाशक परमात्मा का स्मरण करना चाहिए॥१८॥

स॒हस्र॑शीर्षा॒ पुरु॑षः सहस्रा॒क्षः स॒हस्र॑पात्। स भूमिं॑ वि॒श्वतो॑ वृ॒त्वात्य॑तिष्ठद्दशाङ्गु॒लम्॥

जगत् में पूरण पुरुष परमात्मा अनन्त ज्ञानवान्, अनन्तदर्शन शक्तिमान्, अनन्त गतिमान्-विभुगतिमान् है, उसके सम्मुख सारा ब्रह्माण्ड एकदेशी अल्प है। सब स्थूल सूक्ष्म भूतमय ब्रह्माण्ड को व्यापकर अपने अन्दर रख इसके बाहिर भी वर्तमान है॥१॥

पुरु॑ष ए॒वेदं सर्वं॒ यद्भू॒तं यच्च॒ भव्य॑म्। उ॒तामृ॑त॒त्वस्येशा॑नो॒ यदन्ने॑नाति॒रोह॑ति॥

परमपुरुष परमात्मा जीवमात्र का तथा तदर्थ भोग अपवर्ग-मोक्ष का एवं सब उत्पन्न हुए होनेवाले जगत् का स्वामी है, ऐसा मान कर उसकी स्तुति करनी चाहिए॥२॥

ए॒तावा॑नस्य महि॒मातो॒ ज्यायाँ॑श्च॒ पूरु॑षः। पादो॑ऽस्य॒ विश्वा॑ भू॒तानि॑ त्रि॒पाद॑स्या॒मृतं॑ दि॒वि॥

सारा संसार उसके एकदेश में है, वह परमात्मा इससे महान् है, तथा ये सारी जड़-जङ्गम वस्तुएँ उसके एक पादमात्र हैं, उसका अमृतस्वरूप त्रिपाद तो प्रकाशस्वरूप में है॥३॥

त्रि॒पादू॒र्ध्व उदै॒त्पुरु॑षः॒ पादो॑ऽस्ये॒हाभ॑व॒त्पुनः॑। ततो॒ विष्व॒ङ्व्य॑क्रामत्साशनानश॒ने अ॒भि॥

पूर्ण पुरुष परमात्मा अमृतरूप त्रिपाद इस संसार से ऊपर है, यह संसाररूप पाद पुनः-पुनः उत्पन्न होता है। इसके अन्दर भोगनेवाले जीव और न भोगनेवाले जड़ के अन्दर परमात्मा व्याप रहा है॥४॥

तस्मा॑द्वि॒राळ॑जायत वि॒राजो॒ अधि॒ पूरु॑षः। स जा॒तो अत्य॑रिच्यत प॒श्चाद्भूमि॒मथो॑ पु॒रः॥

विविध पदार्थों से युक्त संसार को परमात्मा रचता है, उसके अधीनत्व में लोक-लोकान्तर उससे प्रकट होते हैं तथा लोक पर देह उत्पन्न होते हैं॥५॥

यत्पुरु॑षेण ह॒विषा॑ दे॒वा य॒ज्ञमत॑न्वत। व॒स॒न्तो अ॑स्यासी॒दाज्यं॑ ग्री॒ष्म इ॒ध्मः श॒रद्ध॒विः॥

आदि सृष्टि में वेदप्रकाशक ऋषि अध्यात्मयज्ञ का अनुष्ठान करते हैं। अपने आत्मा में धारण करने योग्य परमात्मा के द्वारा उसका रचा वसन्तऋतु घृतसमान होकर अध्यात्मयज्ञ को प्रबोधित करता है, भिन्न-भिन्न ओषधियों के उत्पन्न होने से परमात्मा है, इस भाव जागृत करता है, पुनः ग्रीष्म ऋतु इसकी समिधा इन्धन बन जाता है, क्योंकि ग्रीष्म ऋतु में ओषधियाँ बढ़ती हैं, तो परमात्मा की आस्तिकता में दृढ़ता आ जाती है, पुनः शरद् ऋतु उसका हव्यपदार्थ हो जाता है, क्योंकि शरद् ऋतु में ओषधियाँ पुष्ट होती हैं, अतः परमात्मा का साक्षात् होने का निमित्त बन जाता है॥६॥

तं य॒ज्ञं ब॒र्हिषि॒ प्रौक्ष॒न्पुरु॑षं जा॒तम॑ग्र॒तः। तेन॑ दे॒वा अ॑यजन्त सा॒ध्या ऋष॑यश्च॒ ये॥

परमात्मा पूर्व से प्रसिद्ध वर्त्तमान है, उस समागम के योग्य को साधनापरायण ऋषिजन हृदयाकाश में आर्द्रभावनाओं, श्रद्धा प्रेम भरी स्तुतियों द्वारा प्रसन्न करते हैं, तो उनके अन्दर वह साक्षात् होकर कल्याण का निमित्त बनता है॥७॥

तस्मा॑द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुतः॒ सम्भृ॑तं पृषदा॒ज्यम्। प॒शून्ताँश्च॑क्रे वाय॒व्या॑नार॒ण्यान्ग्रा॒म्याश्च॒ ये॥

परमात्मा के अन्दर यह सारा जगत् प्रलयकाल में लीन हो जाता है तथा जो सबके द्वारा उपासना करने योग्य है, वह ऐसा परमात्मा अन्न रसमयी ओषधियों को उत्पन्न करता है तथा जङ्गल और नगर के पशु-पक्षियों को उत्पन्न करता है, मानने योग्य है॥८॥

तस्मा॑द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुत॒ ऋचः॒ सामा॑नि जज्ञिरे। छन्दां॑सि जज्ञिरे॒ तस्मा॒द्यजु॒स्तस्मा॑दजायत॥

परमात्मा ने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद उत्पन्न किये हैं॥९॥

तस्मा॒दश्वा॑ अजायन्त॒ ये के चो॑भ॒याद॑तः। गावो॑ ह जज्ञिरे॒ तस्मा॒त्तस्मा॑ज्जा॒ता अ॑जा॒वयः॑॥

परमात्मा ने घोड़े जाति के पशु दोनों ओर दाँतोंवाले पशु तथा गौवें बकरी भेड़ें आदि उत्पन्न करी हैं॥१०॥

यत्पुरु॑षं॒ व्यद॑धुः कति॒धा व्य॑कल्पयन्। मुखं॒ किम॑स्य॒ कौ बा॒हू का ऊ॒रू पादा॑ उच्येते॥

रुपकालङ्कार से समष्टि पुरुष को देह में कल्पित किया है। प्रश्न है कि उसका मुख कौन है, भुजाएँ कौन हैं, जङ्घाएँ कौन सी हैं और पैर कौन से हैं। इसका उत्तर अगले मन्त्र में है॥११॥

ब्रा॒ह्म॒णो॑ऽस्य॒ मुख॑मासीद्बा॒हू रा॑ज॒न्यः॑ कृ॒तः। ऊ॒रू तद॑स्य॒ यद्वैश्यः॑ प॒द्भ्यां शू॒द्रो अ॑जायत॥

मानवसमाज को देह के रूपक में देखना चाहिये। जैसे देह में मुख में गुण होते हैं, ज्ञान तपस्या त्याग ऐसे ब्राह्मण में होना चाहिये, जैसे भुजाओं में शोधन रक्षण त्राण गुण हैं, ऐसे क्षत्रिय में होने चाहिये, जैसे मध्य भाग उदर में अन्नादि का संग्रह और विभाजन होता है, ऐसे वैश्य में होने चाहिये, जैसे पैरों में दौड़ धूप श्रमशीलता होती है, ऐसी शूद्र में होनी चाहिये॥१२॥

च॒न्द्रमा॒ मन॑सो जा॒तश्चक्षोः॒ सूर्यो॑ अजायत। मुखा॒दिन्द्र॑श्चा॒ग्निश्च॑ प्रा॒णाद्वा॒युर॑जायत॥

परमात्मा ने अपनी मननशक्ति से चन्द्रमा को उत्पन्न किया, ज्योतिर्मयस्वरूप से सूर्य को, प्रमुख बल से विद्युत् और अग्नि को और प्राणन शक्ति से वायु को उत्पन्न किया॥१३॥

नाभ्या॑ आसीद॒न्तरि॑क्षं शी॒र्ष्णो द्यौः सम॑वर्तत। प॒द्भ्यां भूमि॒र्दिशः॒ श्रोत्रा॒त्तथा॑ लो॒काँ अ॑कल्पयन्॥

परमात्मा ने अन्तरिक्ष, द्युलोक, भूमि, दिशाएँ और लोक-लोकान्तर अपनी महती व्यापकता से रचकर प्राणियों का कल्याण किया॥१४॥

स॒प्तास्या॑सन्परि॒धय॒स्त्रिः स॒प्त स॒मिधः॑ कृ॒ताः। दे॒वा यद्य॒ज्ञं त॑न्वा॒ना अब॑ध्न॒न्पुरु॑षं प॒शुम्॥

अध्यात्मयज्ञ बाहरी सप्त लोकों के विवेचन में चलता है और उसमें दश प्राण, दश इन्द्रियाँ और मन, जो आत्मा की शक्तियाँ हैं, उन्हें लगाया जाता है-समर्पित किया जाता है, तब आत्मा के अन्दर परमात्मा का साक्षात् होता है॥१५॥

य॒ज्ञेन॑ य॒ज्ञम॑यजन्त दे॒वास्तानि॒ धर्मा॑णि प्रथ॒मान्या॑सन्। ते ह॒ नाकं॑ महि॒मानः॑ सचन्त॒ यत्र॒ पूर्वे॑ सा॒ध्याः सन्ति॑ दे॒वाः॥

आदि विद्वान् परम ऋषिजन अध्यात्मयज्ञ के द्वारा-उपासना के द्वारा अपने अन्दर परमात्मा का साक्षात् किया करते हैं, वे सृष्टि के आरम्भ के कर्म हैं, जो मोक्ष को प्राप्त करानेवाले हैं, जहाँ जीवन्मुक्त पहुँचा करते हैं॥१६॥

सूक्तम्

सं जा॑गृ॒वद्भि॒र्जर॑माण इध्यते॒ दमे॒ दमू॑ना इ॒षय॑न्नि॒ळस्प॒दे। विश्व॑स्य॒ होता॑ ह॒विषो॒ वरे॑ण्यो वि॒भुर्वि॒भावा॑ सु॒षखा॑ सखीय॒ते॥

परमात्मा प्रलयकाल में जगत् को अपने अन्दर ले लेता है, जो उसकी स्तुति करता है, वह उसका मित्र बन जाता है, उसके लिए वह अपना आनन्द प्रदान करता है, सावधान ज्ञानीजनों के द्वारा वह हृदय में साक्षात् होता है॥१॥

स द॑र्शत॒श्रीरति॑थिर्गृ॒हेगृ॑हे॒ वने॑वने शिश्रिये तक्व॒वीरि॑व। जनं॑जनं॒ जन्यो॒ नाति॑ मन्यते॒ विश॒ आ क्षे॑ति वि॒श्यो॒३॒॑ विशं॑विशम्॥

परमात्मा दर्शनीय शोभावाला प्रत्येक के हृदय में और अन्तःकरण में रहता है, वह आकाश के समान व्यापक जनमात्र का हितैषी प्राणिमात्र का कल्याणकारी उदार है, उसकी स्तुति करनी चाहिये॥२॥

सु॒दक्षो॒ दक्षैः॒ क्रतु॑नासि सु॒क्रतु॒रग्ने॑ क॒विः काव्ये॑नासि विश्व॒वित्। वसु॒र्वसू॑नां क्षयसि॒ त्वमेक॒ इद्द्यावा॑ च॒ यानि॑ पृथि॒वी च॒ पुष्य॑तः॥

परमात्मा महान् बलवान्, महती कर्मशक्तिवाला कलाकार और ज्ञानी है, द्युलोक और पृथिवी के बीच में जितने भोग्य धन और साधन मिलते हैं, उनका वह ही उत्पन्न करनेवाला और देनेवाला है॥३॥

प्र॒जा॒नन्न॑ग्ने॒ तव॒ योनि॑मृ॒त्विय॒मिळा॑यास्प॒दे घृ॒तव॑न्त॒मास॑दः। आ ते॑ चिकित्र उ॒षसा॑मि॒वेत॑योऽरे॒पसः॒ सूर्य॑स्येव र॒श्मयः॑॥

जब परमात्मा की कोई स्तोता आर्द्र हावभाव भरे हृदय में स्तुति करता है, तो उषाओं के समान या सूर्यकिरणों के समान उसकी प्रतीतियाँ-दर्शन आभाएँ प्रतीत होने लगती हैं॥४॥

तव॒ श्रियो॑ व॒र्ष्य॑स्येव वि॒द्युत॑श्चि॒त्राश्चि॑कित्र उ॒षसां॒ न के॒तवः॑। यदोष॑धीर॒भिसृ॑ष्टो॒ वना॑नि च॒ परि॑ स्व॒यं चि॑नु॒षे अन्न॑मा॒स्ये॑॥

परमात्मा की दर्शन-आभाएँ विद्युत् की धाराओं के समान या प्रातःकालीन उषाओं की चमकती धाराओं के समान विद्वानों को प्राप्त होती हैं, विद्वान् जनों को वह साक्षात् होता है और उन्हें अपने अन्दर ऐसे धारण करता है, जैसे कोई अभीष्ट अन्न को सुरक्षित रखता है॥५॥

तमोष॑धीर्दधिरे॒ गर्भ॑मृ॒त्वियं॒ तमापो॑ अ॒ग्निं ज॑नयन्त मा॒तरः॑। तमित्स॑मा॒नं व॒निन॑श्च वी॒रुधो॒ऽन्तर्व॑तीश्च॒ सुव॑ते च वि॒श्वहा॑॥

परमात्मा को आप्त संन्यासी जन, वानप्रस्थ और ब्रह्मचारी विशेषरूप से अपने अन्दर धारण किया करते हैं, गृहस्थ जन भी यथासमय धारण करते हैं। उसकी कृपा से गर्भवती सन्तान को जन्म देती है एवं भौतिक अग्नि को अपने अन्दर जलप्रवाह वृक्षादि वनस्पतियाँ बढ़नेवाली लताएँ धारण करती हैं और अन्न को उत्पन्न करती हैं॥६॥

वातो॑पधूत इषि॒तो वशाँ॒ अनु॑ तृ॒षु यदन्ना॒ वेवि॑षद्वि॒तिष्ठ॑से। आ ते॑ यतन्ते र॒थ्यो॒३॒॑ यथा॒ पृथ॒क्छर्धां॑स्यग्ने अ॒जरा॑णि॒ धक्ष॑तः॥

प्राणयाम आदि योगाभ्यास के द्वारा कामना करनेवाले स्तोताओं के प्रति परमात्मा साक्षात् होता है, उसके गुण पराक्रम कल्याणदान के लिए उसके अन्दर शीघ्र प्राप्त होते हैं एवं वायु के द्वारा प्रेरित अग्नि वनस्पतियों के अन्दर जलाने को घुसता चला जाता है उसके दाहक वेग उन्हें शीघ्र प्राप्त करते है॥७॥

मे॒धा॒का॒रं वि॒दथ॑स्य प्र॒साध॑नम॒ग्निं होता॑रं परि॒भूत॑मं म॒तिम्। तमिदर्भे॑ ह॒विष्या स॑मा॒नमित्तमिन्म॒हे वृ॑णते॒ नान्यं त्वत्॥

परमात्मा बुद्धि देनेवाला है और अध्यात्मयज्ञ का साधनेवाला-सफल करनेवाला है, सर्वधिष्ठाता है, सांसारिक भोग सुख तथा महान् मोक्ष सुख देनेवाला है, उससे आदर के साथ उपासक जन अपने कल्याणार्थ प्रार्थना करते हैं, अन्य से नहीं॥८॥

त्वामिदत्र॑ वृणते त्वा॒यवो॒ होता॑रमग्ने वि॒दथे॑षु वे॒धसः॑। यद्दे॑व॒यन्तो॒ दध॑ति॒ प्रयां॑सि ते ह॒विष्म॑न्तो॒ मन॑वो वृ॒क्तब॑र्हिषः॥

बुद्धिमान् उपासक जन परमात्मा को ही अपना कमनीय इष्टदेव मानते हैं। वे गृहस्थ से उपराम होकर अपने को परमात्मा के प्रति समर्पित करने में लगे रहते हैं और परमात्मा की स्तुति करते रहते हैं॥९॥

तवा॑ग्ने हो॒त्रं तव॑ पो॒त्रमृ॒त्वियं॒ तव॑ ने॒ष्ट्रं त्वम॒ग्निदृ॑ताय॒तः। तव॑ प्रशा॒स्त्रं त्वम॑ध्वरीयसि ब्र॒ह्मा चासि॑ गृ॒हप॑तिश्च नो॒ दमे॑॥

अध्यात्मयज्ञ में समस्त ऋत्विजों, समस्त श्रेष्ठ याजकों का पद परमात्मा ही प्राप्त किये हुए है॥१०॥

यस्तुभ्य॑मग्ने अ॒मृता॑य॒ मर्त्यः॑ स॒मिधा॒ दाश॑दु॒त वा॑ ह॒विष्कृ॑ति। तस्य॒ होता॑ भवसि॒ यासि॑ दू॒त्य१॒॑मुप॑ ब्रूषे॒ यज॑स्यध्वरी॒यसि॑॥

जब मनुष्य अमृतत्व पाने के लिए उस अमर परमात्मा के प्रति अध्यात्मयज्ञ में अपनी आत्मा को समिधा बनाकर समर्पित करता है, तो वह परमात्मा उसमें होता बनकर आगे चलता है और उपदेश देता है। वह ऐसा परमात्मा स्तुति करने योग्य है॥११॥

इ॒मा अ॑स्मै म॒तयो॒ वाचो॑ अ॒स्मदाँ ऋचो॒ गिरः॑ सुष्टु॒तयः॒ सम॑ग्मत। व॒सू॒यवो॒ वस॑वे जा॒तवे॑दसे वृ॒द्धासु॑ चि॒द्वर्ध॑नो॒ यासु॑ चा॒कन॑त्॥

मोक्षप्राप्ति के वेदवाणियों का उच्चारण, मनन तथा उसकी स्तुतियाँ प्रेम भरी गीतियाँ परमात्मा को समर्पित करनी चाहिये। वह ऐसे स्तुति करनेवाले को अपनाता है॥१२॥

इ॒मां प्र॒त्नाय॑ सुष्टु॒तिं नवी॑यसीं वो॒चेय॑मस्मा उश॒ते शृ॒णोतु॑ नः। भू॒या अन्त॑रा हृ॒द्य॑स्य नि॒स्पृशे॑ जा॒येव॒ पत्य॑ उश॒ती सु॒वासाः॑॥

परमात्मा नित्य एकरस सर्वहित चाहनेवाला है, उसकी निर्दोष स्तुति करनी चाहिये,  उसके अन्दर प्रविष्ट होने की कामना करनी चाहिये, जैसे पत्नी हृदय से पति की कामना करती है॥१३॥

यस्मि॒न्नश्वा॑स ऋष॒भास॑ उ॒क्षणो॑ व॒शा मे॒षा अ॑वसृ॒ष्टास॒ आहु॑ताः। की॒ला॒ल॒पे सोम॑पृष्ठाय वे॒धसे॑ हृ॒दा म॒तिं ज॑नये॒ चारु॑म॒ग्नये॑॥

परमात्मा ने हमें बलवान् घोड़े वृषभ-साँड सुन्दर कमनीय दूध देनेवाली भेड़ बकरियाँ आवश्यकतानुसार प्रदान किये हैं तथा अन्न और रस जीवन के अन्दर समाने के लिये दिए हैं, उस परमात्मा की हृदय से मन से आस्तिक भाव के साथ स्तुति किया करें॥१४॥

अहा॑व्यग्ने ह॒विरा॒स्ये॑ ते स्रु॒ची॑व घृ॒तं च॒म्वी॑व॒ सोमः॑। वा॒ज॒सनिं॑ र॒यिम॒स्मे सु॒वीरं॑ प्रश॒स्तं धे॑हि य॒शसं॑ बृ॒हन्त॑म्॥

परमात्मा के व्याप्त स्वरूप में अपने आत्मा को समर्पित कर देवे, तो वह परमात्मा उत्तम जीवन यशस्वी सुख शान्ति संतोषरूप स्वात्मस्वरूप को हमारे अन्दर रख देता है॥१५॥

य॒ज्ञस्य॑ वो र॒थ्यं॑ वि॒श्पतिं॑ वि॒शां होता॑रम॒क्तोरति॑थिं वि॒भाव॑सुम्। शोच॒ञ्छुष्का॑सु॒ हरि॑णीषु॒ जर्भु॑र॒द्वृषा॑ के॒तुर्य॑ज॒तो द्याम॑शायत॥

परमात्मा अध्यात्मरथ का चालक, प्रजाओं का पालक, उसके अन्दर प्रवेश करनेवालों को स्वीकार करनेवाला यथावत् कर्मजीवनमार्ग का उपदेष्टा ज्ञानप्रकाशक है तथा वह उपासनापरायण, आर्द्रभावनापूर्ण और आर्द्रभावना से रहित समस्त प्रजाओं में प्रकाशदाता सब संसार में व्याप्त है, उसे ऐसा मानकर उपासना करनी चाहिये॥१॥

इ॒मम॑ञ्ज॒स्पामु॒भये॑ अकृण्वत ध॒र्माण॑म॒ग्निं वि॒दथ॑स्य॒ साध॑नम्। अ॒क्तुं न य॒ह्वमु॒षसः॑ पु॒रोहि॑तं॒ तनू॒नपा॑तमरु॒षस्य॑ निंसते॥

परमात्मा अनायास ही विश्व का पालक है, उसे मुमुक्षु तथा साधारण जन अपना इष्टदेव मानें, उसका आश्रय लें, वह निष्पक्ष सबका कल्याणकारी है॥२॥

बळ॑स्य नी॒था वि प॒णेश्च॑ मन्महे व॒या अ॑स्य॒ प्रहु॑ता आसु॒रत्त॑वे। य॒दा घो॒रासो॑ अमृत॒त्वमाश॒तादिज्जन॑स्य॒ दैव्य॑स्य चर्किरन्॥

स्तुतियोग्य परमात्मा के सत्य नियम और साधन अपने जीवन में अपनाने चाहिए, जिससे उसके दिये हुए भोगपदार्थों का उत्तमता से भोग कर सकें। वह तपस्वियों, ध्यानियों, उपासकों के अन्दर अपने कृपाप्रसाद एवं अमृतानन्द को बरसाता है॥३॥

ऋ॒तस्य॒ हि प्रसि॑ति॒र्द्यौरु॒रु व्यचो॒ नमो॑ म॒ह्य१॒॑रम॑तिः॒ पनी॑यसी। इन्द्रो॑ मि॒त्रो वरु॑णः॒ सं चि॑कित्रि॒रेऽथो॒ भगः॑ सवि॒ता पू॒तद॑क्षसः॥

परमात्मा ने उपादान प्रकृति से दिव्य पदार्थों को उत्पन्न किया है, जो द्युलोक, अन्तरिक्ष, पृथिवी, वायु, जल और सूर्य प्रमुख हैं, ये परमात्मा के शासन के अनुसार चलते हैं और उसे दर्शाते हैं॥४॥

प्र रु॒द्रेण॑ य॒यिना॑ यन्ति॒ सिन्ध॑वस्ति॒रो म॒हीम॒रम॑तिं दधन्विरे। येभिः॒ परि॑ज्मा परि॒यन्नु॒रु ज्रयो॒ वि रोरु॑वज्ज॒ठरे॒ विश्व॑मु॒क्षते॑॥

मेघ के अन्दर विद्युत् उपर से बहनेवाली वृष्टिजलधाराओं के नीचे पृथिवी पर बहा देता है, पृथिवी उनसे घिर जाती है, इस प्रकार वह विद्युत् सबको जल से सींच देता है॥५॥

क्रा॒णा रु॒द्रा म॒रुतो॑ वि॒श्वकृ॑ष्टयो दि॒वः श्ये॒नासो॒ असु॑रस्य नी॒ळयः॑। तेभि॑श्चष्टे॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मेन्द्रो॑ दे॒वेभि॑रर्व॒शेभि॒रर्व॑शः॥

मेघ के आधारभूत वृष्टि के करनेवाले शब्द करते हुए मेघ में वर्त्तमान वायु हैं, जो सब मनुष्यादि प्राणियों, सब अन्नादि खेतियों की पुष्टि के कारण हैं, मेघमण्डल से प्रेरित होते हैं, उन गतिशील वायुओं के द्वारा प्रशस्त विभु गतिमान् सबको वरनेवाला सबका प्रेरक सबका स्वामी परमात्मा सर्वद्रष्टा है॥६॥

इन्द्रे॒ भुजं॑ शशमा॒नास॑ आशत॒ सूरो॒ दृशी॑के॒ वृष॑णश्च॒ पौंस्ये॑। प्र ये न्व॑स्या॒र्हणा॑ ततक्षि॒रे युजं॒ वज्रं॑ नृ॒षद॑नेषु का॒रवः॑॥

परमात्मा ज्ञानप्रकाशक और सुखवर्षक है। जो महानुभाव उसकी प्रशंसा करनेवाले होते हैं, वे उसके रक्षण और आनन्दभोग को प्राप्त करते हैं तथा उसके दर्शन और स्वरूप में निमग्न रहते हैं, सभा सम्मेलन स्थानों में उसकी पूजा प्रशंसा करते हुए उत्तम ओज को प्राप्त होते हैं॥७॥

सूर॑श्चि॒दा ह॒रितो॑ अस्य रीरम॒दिन्द्रा॒दा कश्चि॑द्भयत॒ज तवी॑यसः। भी॒मस्य॒ वृष्णो॑ ज॒ठरा॑दभि॒श्वसो॑ दि॒वेदि॑वे॒ सहु॑रिः स्त॒न्नबा॑धितः॥

परमात्मा के शासन में-नियम में रहता हुआ सूर्य दिशाओं में प्रकाश करता है तथा वायु आदि वेगवान् पदार्थ भी उस अति बलवान् परमात्मा से भय करते हुए से चलते हैं, उस भयंकर बलवान् परमात्मा के शासन से मेघ गरजता हुआ बरसता है, उस ऐसे परमात्मा की स्तुति करनी चाहिए॥८॥

स्तोमं॑ वो अ॒द्य रु॒द्राय॒ शिक्व॑से क्ष॒यद्वी॑राय॒ नम॑सा दिदिष्टन। येभिः॑ शि॒वः स्ववाँ॑ एव॒याव॑भिर्दि॒वः सिष॑क्ति॒ स्वय॑शा॒ निका॑मभिः॥

उपासक प्राणायामादि द्वारा शक्तिसम्पन्न बनानेवाले परमात्मा के लिए आर्द्रभाव से निरन्तर स्तुति करता है तथा जिन लोगों ने परमात्मविज्ञान तथा उसके स्वरूप को साक्षात् किया है, ऐसे विज्ञानियों उपासकों के लिए उनकी कामना के अनुसार आनन्द का सिञ्चन करता है॥९॥

ते हि प्र॒जाया॒ अभ॑रन्त॒ वि श्रवो॒ बृह॒स्पति॑र्वृष॒भः सोम॑जामयः। य॒ज्ञैरथ॑र्वा प्रथ॒मो वि धा॑रयद्दे॒वा दक्षै॒र्भृग॑वः॒ सं चि॑कित्रिरे॥

ज्ञानवर्धक प्रथम से वर्त्तमान शान्तस्वरूप परमात्मा से बन्धुत्व प्राप्त कर मनुष्यों को जनाते हैं, ऐसे अध्यात्मयाजी योगाभ्यासी जनों को परमात्मा विशेषरूप से अपनाता है॥१०॥

ते हि द्यावा॑पृथि॒वी भूरि॑रेतसा॒ नरा॒शंस॒श्चतु॑रङ्गो य॒मोऽदि॑तिः। दे॒वस्त्वष्टा॑ द्रविणो॒दा ऋ॑भु॒क्षणः॒ प्र रो॑द॒सी म॒रुतो॒ विष्णु॑रर्हिरे॥

कुल में या देश में वीर्यशक्तिसम्पन्न स्त्री-पुरुष, प्रशंसनीय चारों वेदों का जाननेवाला जितेन्द्रिय, ब्रह्मचारी, प्रखर बुद्धिमान्, शिल्पी कलाकार, दानीजन, दुःखबाधानिवारक, समय-समय श्रेष्ठ कर्म करानेवाले तथा सर्वव्यापक परमात्मा पूजा के योग्य हैं॥११॥

उ॒त स्य न॑ उ॒शिजा॑मुर्वि॒या क॒विरहिः॑ शृणोतु बु॒ध्न्यो॒३॒॑ हवी॑मनि। सूर्या॒मासा॑ वि॒चर॑न्ता दिवि॒क्षिता॑ धि॒या श॑मीनहुषी अ॒स्य बो॑धतम्॥

जगत् के मूल प्रकृति का अधिकारकर्ता सर्वज्ञ परमात्मा हम कामना करनेवालों की बहुत प्रकार से की हुई स्तुति को स्वीकार करता है तथा सूर्य चन्द्रमा के समान नियम कर्म में बँधे स्त्री-पुरुष ध्यान से परमात्मा को जानें॥१२॥

प्र नः॑ पू॒षा च॒रथं॑ वि॒श्वदे॑व्यो॒ऽपां नपा॑दवतु वा॒युरि॒ष्टये॑। आ॒त्मानं॒ वस्यो॑ अ॒भि वात॑मर्चत॒ तद॑श्विना सुहवा॒ याम॑नि श्रुतम्॥

परमात्मा विद्वानों सूर्य आदि का आश्रयदाता, पोषणकर्त्ता, जङ्गम की इष्टसिद्धिकर्त्ता, जीवनप्रद प्राणों का प्रदानकर्त्ता है, उसका श्रवणज्ञान स्त्री-पुरुषों को करना चाहिये॥१३॥

वि॒शामा॒सामभ॑यानामधि॒क्षितं॑ गी॒र्भिरु॒ स्वय॑शसं गृणीमसि। ग्नाभि॒र्विश्वा॑भि॒रदि॑तिमन॒र्वण॑म॒क्तोर्युवा॑नं नृ॒मणा॒ अधा॒ पति॑म्॥

निर्भय, उपासक, मनुष्यप्रजाओं के अन्दर निवास करनेवाले, स्वाधार, यशस्वी, एकरस, जगत् के स्वामी, उपासकों को चाहनेवाले, उनके साथ सङ्गति करनेवाले परमात्मा की स्तुति करनी चाहिये॥१४॥

रेभ॒दत्र॑ ज॒नुषा॒ पूर्वो॒ अङ्गि॑रा॒ ग्रावा॑ण ऊ॒र्ध्वा अ॒भि च॑क्षुरध्व॒रम्। येभि॒र्विहा॑या॒ अभ॑वद्विचक्ष॒णः पाथः॑ सु॒मेकं॒ स्वधि॑ति॒र्वन॑न्वति॥

परमात्मा जगत् की उत्पत्ति से पूर्व वर्त्तमान तथा जगत् के पदार्थों में रममाण है, परमऋषियों को वेद का उपदेश देता है, ऊँचे विद्वान् इसका साक्षात् करते हैं, वह सर्वद्रष्टा महान् है तथा उत्तम प्रकाशवाले या सुन्दर एक मार्ग को सृष्टि के समय को सूर्य के आश्रित करता है, सूर्य के द्वारा प्रत्येक गतिमान् का मार्ग प्रशस्त होता है, या सृष्टि के पदार्थों का काल निर्धारित होता है॥१५॥

महि॑ द्यावापृथिवी भूतमु॒र्वी नारी॑ य॒ह्वी न रोद॑सी॒ सदं॑ नः। तेभि॑र्नः पातं॒ सह्य॑स ए॒भिर्नः॑ पातं शू॒षणि॑॥

यज्ञ द्वारा आकाश से मेघ बरसता है और भूमि अन्नादि से पूर्ण हो जाती है, जो कि प्राणियों के जीवन के लिये निर्वाहक है। यज्ञ संसार में पीड़ा देनेवाले रोग आदि से भी रक्षा करते हैं॥१॥

य॒ज्ञेय॑ज्ञे॒ स मर्त्यो॑ दे॒वान्त्स॑पर्यति। यः सु॒म्नैर्दी॑र्घ॒श्रुत्त॑म आ॒विवा॑सत्येनान्॥

यज्ञ के द्वारा वायु आदि देवों को संस्कृत करनेवाला मनुष्य सुखों से पूर्ण हो जाता है, इसलिए उन देवों को उपयोगी बना लेता है॥२॥

विश्वे॑षामिरज्यवो दे॒वानां॒ वार्म॒हः। विश्वे॒ हि वि॒श्वम॑हसो॒ विश्वे॑ य॒ज्ञेषु॑ य॒ज्ञियाः॑॥

ऊँचे विद्वानों और दिव्य पदार्थों में बहुत गुण होते हैं, उनसे लाभ लेना चाहिये॥३॥

ते घा॒ राजा॑नो अ॒मृत॑स्य म॒न्द्रा अ॑र्य॒मा मि॒त्रो वरु॑णः॒ परि॑ज्मा। कद्रु॒द्रो नृ॒णां स्तु॒तो म॒रुतः॑ पू॒षणो॒ भगः॑॥

संसार में जो ज्ञानदाता प्रेरक दुःखनिवारक संन्यासी, वक्ता, पोषक, विद्वान्, सौभाग्यवान् जन परमात्मा की स्तुति कर अनश्वर सुखज्ञान के स्वामी बनते हैं, वे धन्य हैं॥४॥

उ॒त नो॒ नक्त॑म॒पां वृ॑षण्वसू॒ सूर्या॒मासा॒ सद॑नाय सध॒न्या॑। सचा॒ यत्साद्ये॑षा॒महि॑र्बु॒ध्नेषु॑ बु॒ध्न्यः॑॥

ज्ञानधनवाले अध्यापक और उपदेशक विद्वानों के बोधस्थानों में जो रहते हैं, वे सुख के वर्षक और बसानेवाले दिनरात प्राप्त होते रहें, बोध देने योग्य पात्र को बोध देते रहें॥५॥

उ॒त नो॑ दे॒वाव॒श्विना॑ शु॒भस्पती॒ धाम॑भिर्मि॒त्रावरु॑णा उरुष्यताम्। म॒हः स रा॒य एष॒तेऽति॒ धन्वे॑व दुरि॒ता॥

कल्याणचिन्तक उत्तम प्रेरक और स्नेह में वरनेवाले अध्यापक और उपदेशक अपने-अपने विद्याङ्गों के द्वारा मनुष्यों की रक्षा करते हैं, जो उनकी सङ्गति में आता है, वह महान् धनों से सम्पन्न हो जाता है और दुःखों को तर जाता है॥६॥

उ॒त नो॑ रु॒द्रा चि॑न्मृळताम॒श्विना॒ विश्वे॑ दे॒वासो॒ रथ॒स्पति॒र्भगः॑। ऋ॒भुर्वाज॑ ऋभुक्षणः॒ परि॑ज्मा विश्ववेदसः॥

अध्यापक और उपदेशक, अन्य विद्वान्, स्वस्थ रखनेवाला वैद्य, अच्छे छात्रों को वास देनेवाले संन्यासी और धनसम्पन्न जन लोगों को सुख देनेवाले हों॥७॥

ऋ॒भुॠ॑भु॒क्षा ऋ॒भुर्वि॑ध॒तो मद॒ आ ते॒ हरी॑ जूजुवा॒नस्य॑ वा॒जिना॑। दु॒ष्टरं॒ यस्य॒ साम॑ चि॒दृध॑ग्य॒ज्ञो न मानु॑षः॥

परमात्मा महान् ज्ञान से प्रकाशमान है। उस विधाता का आनन्द भी ज्ञान से भरा हुआ है, उसके कर्मानुसार दण्ड और प्रसाद संसार मोक्षफलवाले हैं, उसकी प्राप्ति के लिये अध्यात्मयज्ञ किया जाता है॥८॥

कृ॒धी नो॒ अह्र॑यो देव सवितः॒ स च॑ स्तुषे म॒घोना॑म्। स॒हो न॒ इन्द्रो॒ वह्नि॑भि॒र्न्ये॑षां चर्षणी॒नां च॒क्रं र॒श्मिं न यो॑युवे॥

उत्पादक परमात्मा सर्वविद्याओं में व्याप्त तथा विद्वान् मनुष्यों के मध्य में सङ्गत कर देता है, उनकी श्रेणी में नियुक्त कर देता है रथ में चक्र और प्रग्रह-लगाम की भाँति, वह ऐसा परमात्मा स्तुति करने योग्य है॥९॥

ऐषु॑ द्यावापृथिवी धातं म॒हद॒स्मे वी॒रेषु॑ वि॒श्वच॑र्षणि॒ श्रवः॑। पृ॒क्षं वाज॑स्य सा॒तये॑ पृ॒क्षं रा॒योत तु॒र्वणे॑॥

समाज और राष्ट्र के स्त्री पुरुष युवक जनों में सर्वजनहितकर ज्ञान को प्रसारित करें तथा बल की प्राप्ति के लिए अपना सम्पर्क स्थापित करें। धनैश्वर्य से शत्रु के नाशार्थ सहयोग सम्पर्क बनावें॥१०॥

ए॒तं शंस॑मिन्द्रास्म॒युष्ट्वं कूचि॒त्सन्तं॑ सहसावन्न॒भिष्ट॑ये। सदा॑ पाह्य॒भिष्ट॑ये मे॒दतां॑ वे॒दता॑ वसो॥

परमात्मा हमें चाहता है, हमारे कल्याण के लिए कहीं भी स्तुति करनेवाले मनुष्य को उसकी सांसारिक अभीष्ट सिद्धि के लिए और सदा अध्यात्मयज्ञ के लिए रक्षा करता है। परमात्मा से जो स्नेह करनेवाले हैं, उनमें से प्रत्येक को वह बोध देता है॥११॥

ए॒तं मे॒ स्तोमं॑ त॒ना न सूर्ये॑ द्यु॒तद्या॑मानं वावृधन्त नृ॒णाम्। सं॒वन॑नं॒ नाश्व्यं॒ तष्टे॒वान॑पच्युतम्॥

परमात्मा के प्रति स्तुति करनेवाले स्तुतिसमूह को निन्दित दृष्टि से न देखें, किन्तु उसे प्रोत्साहन दें, बढ़ावें। सूर्य की किरणें जैसे सूर्यमण्डल को बढ़ाती हैं या जैसे रथकार शिल्पी घोड़े के उपयुक्त रथ को चलने योग्य बनाता है, अलंकृत करता है, वैसे विद्वान् जन अपने प्रशंसित वचनों से बढ़ावा दें, अलंकृत करें॥१२॥

वा॒वर्त॒ येषां॑ रा॒या यु॒क्तैषां॑ हिर॒ण्ययी॑। ने॒मधि॑ता॒ न पौंस्या॒ वृथे॑व वि॒ष्टान्ता॑॥

विद्वानों के ज्ञानोपदेशानुसार की हुई स्तुति निरन्तर परमात्मा को प्राप्त होती है॥१३॥

प्र तद्दुः॒शीमे॒ पृथ॑वाने वे॒ने प्र रा॒मे वो॑च॒मसु॑रे म॒घव॑त्सु। ये यु॒क्त्वाय॒ पञ्च॑ श॒तास्म॒यु प॒था वि॒श्राव्ये॑षाम्॥

जिन हितैषी विद्वानों द्वारा ज्ञानप्रदान क्रम से हमारे मन आदि को पाँच सौ गुणित शक्तिवाले बना करके परमात्मज्ञान प्रदान करते हैं, उसका विशेषरूप से विषयों में रत हुए दुःख से सोनेवाले जनसमुदाय में तथा धन के लोलुप जनों में उपदेश करना चाहिये॥१४॥

अधीन्न्वत्र॑ सप्त॒तिं च॑ स॒प्त च॑। स॒द्यो दि॑दिष्ट॒ तान्वः॑ स॒द्यो दि॑दिष्ट पा॒र्थ्यः स॒द्यो दि॑दिष्ट माय॒वः॥

परमात्मा शरीरोत्पत्ति के साथ उसके अन्दर नाड़ियों हड्डियों के विभागों स्तरों और वाणी के उच्चारणस्थानों तथा क्रमों को नियुक्त करता है॥१५॥

प्रैते व॑दन्तु॒ प्र व॒यं व॑दाम॒ ग्राव॑भ्यो॒ वाचं॑ वदता॒ वद॑द्भ्यः। यद॑द्रयः पर्वताः सा॒कमा॒शवः॒ श्लोकं॒ घोषं॒ भर॒थेन्द्रा॑य सो॒मिनः॑॥

वैदिक विद्वानों से नियमपूर्वक पढ़ना चाहिये, उनसे स्वयं पढ़ें और दूसरों को पढ़वायें। शीघ्र ज्ञान करनेवाले वैदिक विद्वान् राजा तथा उसके राष्ट्र के हित के लिए सर्वत्र अपने ज्ञान को प्रसारित करें॥१॥

ए॒ते व॑दन्ति श॒तव॑त्स॒हस्र॑वद॒भि क्र॑न्दन्ति॒ हरि॑तेभिरा॒सभिः॑। वि॒ष्ट्वी ग्रावा॑णः सु॒कृतः॑ सुकृ॒त्यया॒ होतु॑श्चि॒त्पूर्वे॑ हवि॒रद्य॑माशत॥

सैकड़ों सहस्रों विद्वान् मिलकर सुमधुर मुख से तथा सुन्दर क्रिया कलाप से प्रवचन और मन्त्रोच्चारण घर-घर और राष्ट्र में किया करें, उनके भोजन की समुचित व्यवस्था गृहस्थों और शासकों की ओर से की जानी चाहिये॥२॥

ए॒ते व॑द॒न्त्यवि॑दन्न॒ना मधु॒ न्यू॑ङ्खयन्ते॒ अधि॑ प॒क्व आमि॑षि। वृ॒क्षस्य॒ शाखा॑मरु॒णस्य॒ बप्स॑त॒स्ते सूभ॑र्वा वृष॒भाः प्रेम॑राविषुः॥

विद्वान् जन जैसे ही परमात्मा को जानते हैं, तुरन्त उसका उपदेश किया करते हैं। पुष्पित फलित वृक्ष के अन्दर जैसे रस का आस्वादन-भोजन करते हैं, ऐसे ही प्रकाशमान परमात्मा के ज्ञानफल को ज्ञानी जन सेवन करते हैं और अन्य को उपदेश देते हैं॥३॥

बृ॒हद्व॑दन्ति मदि॒रेण॑ म॒न्दिनेन्द्रं॒ क्रोश॑न्तोऽविदन्न॒ना मधु॑। सं॒रभ्या॒ धीराः॒ स्वसृ॑भिरनर्तिषुराघो॒षय॑न्तः पृथि॒वीमु॑प॒ब्दिभिः॑॥

विद्वान् जन परमात्मा के आनन्दमधु को प्राप्त कर उसकी स्तुति करते हैं, उसके ध्यान में रत होकर गुणगान करते हुए आनन्द से नृत्य किया करते हैं॥४॥

सु॒प॒र्णा वाच॑मक्र॒तोप॒ द्यव्या॑ख॒रे कृष्णा॑ इषि॒रा अ॑नर्तिषुः। न्य१॒॑ङ्नि य॒न्त्युप॑रस्य निष्कृ॒तं पु॒रू रेतो॑ दधिरे सूर्य॒श्वितः॑॥

सूर्य के समान तेजस्वी ज्ञानी जन अपने ज्ञान से अन्य जनों को ज्ञानपूर्ण बनाते हैं, अपनी स्तुतियों को दिव्य परमात्मा में समर्पित करते हैं, उसके गुणों का आकर्षण करते हुए और उसकी कामना करते हुए आनन्द से नृत्य किया करते हैं तथा संसार से उपरत नियममुक्त परमात्मा को अपने अन्दर प्राप्त करके अध्यात्मबलों को धारण करते हैं॥५॥

उ॒ग्रा इ॑व प्र॒वह॑न्तः स॒माय॑मुः सा॒कं यु॒क्ता वृष॑णो॒ बिभ्र॑तो॒ धुरः॑। यच्छ्व॒सन्तो॑ जग्रसा॒ना अरा॑विषुः शृ॒ण्व ए॑षां प्रो॒थथो॒ अर्व॑तामिव॥

विद्वान् जन मानवसमाज का वहन करते हैं, जैसे अच्छे घोड़े रथ को वहन करते हैं, मानवसमाज को नियमित ठीक चलते देखकर वे प्रसन्न होते हुए उत्तमोत्तम उपदेश किया करते हैं, जैसे अच्छे चलते हुए रथ को देखकर घोड़े प्रसन्नता से हिनहिनाना शब्द करते हैं॥६॥

दशा॑वनिभ्यो॒ दश॑कक्ष्येभ्यो॒ दश॑योक्त्रेभ्यो॒ दश॑योजनेभ्यः। दशा॑भीशुभ्यो अर्चता॒जरे॑भ्यो॒ दश॒ धुरो॒ दश॑ यु॒क्ता वह॑द्भ्यः॥

राष्ट्र के संचालन में पाँच राष्ट्र के अधिकारी प्रतिनिधि-राज्यमन्त्री, गृहमन्त्री, अर्थमन्त्री, सैन्यमन्त्री, विदेशमन्त्री और प्रजा के प्रतिनिधि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र निषाद-वनवासी प्रत्येक के मुख्य जन होने चाहिए॥७॥

ते अद्र॑यो॒ दश॑यन्त्रास आ॒शव॒स्तेषा॑मा॒धानं॒ पर्ये॑ति हर्य॒तम्। त ऊ॑ सु॒तस्य॑ सो॒म्यस्यान्ध॑सों॒ऽशोः पी॒यूषं॑ प्रथ॒मस्य॑ भेजिरे॥

उत्तम कलाकार, जो अपने दोनों हाथों से निरन्तर कर्म करते हुए अपने लिए तथा जनहित कलाओं का निर्माण करते हैं, एवं वे विद्वान् धन्य हैं, जो चारों वेदों और छैः अङ्गों का अध्ययन करते तथा अन्यों को पढ़ाकर अपना समय सार्थक करते हैं और मन को पवित्र और संयत बनाकर परमात्मा का ध्यान कर अनन्त आनन्दामृत का आस्वादन करते हैं॥८॥

ते सो॒मादो॒ हरी॒ इन्द्र॑स्य निंसतें॒ऽशुं दु॒हन्तो॒ अध्या॑सते॒ गवि॑। तेभि॑र्दु॒ग्धं प॑पि॒वान्त्सो॒म्यं मध्विन्द्रो॑ वर्धते॒ प्रथ॑ते वृषा॒यते॑॥

परमात्मा के आनन्दरस को भोगनेवाले विद्वान् योगभूमि में स्थिर होकर उस आनन्दरस को निर्झरित करते हैं, इनके द्वारा अन्य जन भी लाभ लेते हैं, आत्मा उस आनन्दरस का पान करके हर्षित, विकसित और बलिष्ठ हो जाता है, पुनः उसके ज्ञान और कर्म दुःखनाशक सुखकारक हो जाते हैं, जिन्हें उसके प्राण-इन्द्रियाँ प्राप्त करती हैं। एवम् सोमरस का पान करनेवाले शुद्ध भूमि पर विराजमान होकर सोमरस निकालते हैं, जिसे वे स्वयं भी पान करते हैं, अन्य जन भी करते हैं, पीकर हृष्ट पुष्ट और बलिष्ठ बन जाते हैं और उसके ज्ञान और कर्म दुःख दूर करनेवाले और सुख प्राप्त करानेवाले बन जाते हैं, उन्हें प्राण इन्द्रियाँ प्राप्त करती हैं॥९॥

वृषा॑ वो अं॒शुर्न किला॑ रिषाथ॒नेळा॑वन्तः॒ सद॒मित्स्थ॒नाशि॑ताः। रै॒व॒त्येव॒ मह॑सा॒ चार॑वः स्थन॒ यस्य॑ ग्रावाणो॒ अजु॑षध्वमध्व॒रम्॥

विद्वान् लोग परमात्मा के अध्यात्मयज्ञ का सेवन करते हैं, तब महान् आनन्दप्रवाह प्राप्त होता है। उससे वे हिंसित नहीं होते, अपितु धनवालों की धनवत्ता के समान महती अध्यात्मसम्पत्ति से युक्त होकर महान् आनन्द को प्राप्त होते हैं॥१०॥

तृ॒दि॒ला अतृ॑दिलासो॒ अद्र॑योऽश्रम॒णा अशृ॑थिता॒ अमृ॑त्यवः। अ॒ना॒तु॒रा अ॒जराः॒ स्थाम॑विष्णवः सुपी॒वसो॒ अतृ॑षिता॒ अतृ॑ष्णजः॥

जो उत्तम विद्वान् पापदुःखनाशक, अहिंसनीय, ज्ञानवक्ता, न भ्रान्त होनेवाले, कर्मठ, अशिथिल, मृत्युभयरहित, अव्याकुल-शान्त, जरारहित, प्रवचनकुशल, स्वस्थ, वासनारहित, जितेन्द्रिय होते हैं, वे आदर योग्य हैं॥११॥

ध्रु॒वा ए॒व वः॑ पि॒तरो॑ यु॒गेयु॑गे॒ क्षेम॑कामासः॒ सद॑सो॒ न यु॑ञ्जते। अ॒जु॒र्यासो॑ हरि॒षाचो॑ ह॒रिद्र॑व॒ आ द्यां रवे॑ण पृथि॒वीम॑शुश्रवुः॥

विद्वान् महानुभाव गृहस्थों की कल्याणकामना करनेवाले घर के सदस्यों के समान समय-समय पर घरों में अपना समागम लाभ दें, उपदेश करें, पुरुष स्त्रियों को ज्ञानपूर्ण बनावें॥१२॥

तदिद्व॑द॒न्त्यद्र॑यो वि॒मोच॑ने॒ याम॑न्नञ्ज॒स्पा इ॑व॒ घेदु॑प॒ब्दिभिः॑। वप॑न्तो॒ बीज॑मिव धान्या॒कृतः॑ पृ॒ञ्चन्ति॒ सोमं॒ न मि॑नन्ति॒ बप्स॑तः॥

मन्त्रप्रवचन करनेवाले विद्वान् मोक्षमार्ग का उपदेश किया करते हैं, साधारण उपदेशक सांसारिक मार्ग का उपदेश करते हैं। जैसे किसान लोग खेत में बीज बोते हैं-भावी अन्नलाभ के लिए, ऐसे ध्यानीजन भावी अध्यात्मलाभ के लिए शान्तस्वरूप परमात्मा को अपने आत्मा में संगत करते हैं। सांसारिक जन हो या आध्यात्मिक जन हो, उत्तम सुखभोग करने के हेतु साधारण कर्म और अध्यात्म कर्म का लोप नहीं करते हैं॥१३॥

सु॒ते अ॑ध्व॒रे अधि॒ वाच॑मक्र॒ता क्री॒ळयो॒ न मा॒तरं॑ तु॒दन्तः॑। वि षू मु॑ञ्चा सुषु॒वुषो॑ मनी॒षां वि व॑र्तन्ता॒मद्र॑य॒श्चाय॑मानाः॥

पूजनीय मन्त्रप्रवचन करनेवाले परमात्मा को स्तुति द्वारा प्रेरित करते हैं कि वह अपने आनन्दरस को उन्हें पान कराये, जैसा कि छोटे बच्चे दुग्धपान के लिए  माता को प्रेरित करते हैं। परमात्मा की स्तुति इसलिए भी करनी चाहिये कि परमात्मा को अपने अन्दर धारण कर लिया जावे॥१४॥

ह॒ये जाये॒ मन॑सा॒ तिष्ठ॑ घोरे॒ वचां॑सि मि॒श्रा कृ॑णवावहै॒ नु। न नौ॒ मन्त्रा॒ अनु॑दितास ए॒ते मय॑स्कर॒न्पर॑तरे च॒नाह॑न्॥

युवक युवति का विवाह हो जावे, युवक भावी स्नेह के लिये सन्तान-विषयक विचार का प्रस्ताव करता है एवं रजा राज्याभिषेक के पश्चात् अधिक दृढ़ सम्बन्ध के विचार प्रस्तुत करता है॥१॥

किमे॒ता वा॒चा कृ॑णवा॒ तवा॒हं प्राक्र॑मिषमु॒षसा॑मग्रि॒येव॑। पुरू॑रवः॒ पुन॒रस्तं॒ परे॑हि दुराप॒ना वात॑ इवा॒हम॑स्मि॥

गुप्त मन्त्रणा की आवश्यकता नहीं होती है, जबकि विवाह हो जाने के बाद पत्नी पति की बन जाती है, प्रजा राष्ट्रपति की बन जाती है। प्रातः-काल की उषा जैसे सूर्य के साथ चलती है, ऐसे पत्नी पति के आदेश में और प्रजा राष्ट्रपति के आदेश में चला करती है। अपनी पत्नी और अपनी प्रजा अन्य पुरुष या अन्य राजा से प्राप्त करने योग्य नहीं हुआ करती॥२॥

इषु॒र्न श्रि॒य इ॑षु॒धेर॑स॒ना गो॒षाः श॑त॒सा न रंहिः॑। अ॒वीरे॒ क्रतौ॒ वि द॑विद्युत॒न्नोरा॒ न मा॒युं चि॑तयन्त॒ धुन॑यः॥

भार्या या राजा प्रजा के सहयोग के बिना तुणीर या बाणकोश से निकला हुआ बाण विजयलक्ष्मी प्राप्त कराने में समर्थ नहीं होता और बलवान् शत्रुभूमि को भोगनेवाला बहुत धन को भोगनेवाला नहीं बनता है बिना पत्नी और प्रजा के सहयोग के, यज्ञकर्म में और संग्रामकर्म में बिना पत्नी और प्रजा के शासन प्रकाशित नहीं होता है तथा शत्रुओं को कंपानेवाले सैनिक भी आदेश को नहीं मानते हैं पत्नी और प्रजा के सहयोग के बिना, इसलिए राजा को पत्नी और प्रजा का अनादर न करके सहयोगिनी बनाना चाहिए॥३॥

सा वसु॒ दध॑ती॒ श्वशु॑राय॒ वय॒ उषो॒ यदि॒ वष्ट्यन्ति॑गृहात्। अस्तं॑ ननक्षे॒ यस्मि॑ञ्चा॒कन्दिवा॒ नक्तं॑ श्नथि॒ता वै॑त॒सेन॑॥

यौवनसम्पन्न स्त्री तथा प्रजा यदि व्यभिचारी जार या दस्यु को घर या राष्ट्र में वास या भोजन दे, तो वह जार व्यभिचारी दस्यु स्त्री या प्रजा को कामदृष्टि से देखता है और दिनरात कामवश अपनी गुप्तेन्द्रिय से स्त्री या प्रजा को हिंसित या ताड़ित करता है। अतः अज्ञात परपुरुष घर में स्त्री तथा दस्यु को-शत्रु को घर राष्ट्र में प्रजा वास और भोजन न दे॥४॥

त्रिः स्म॒ माह्नः॑ श्नथयो वैत॒सेनो॒त स्म॒ मेऽव्य॑त्यै पृणासि। पुरू॑र॒वोऽनु॑ ते॒ केत॑मायं॒ राजा॑ मे वीर त॒न्व१॒॑स्तदा॑सीः॥

किसी भी घर में या राष्ट्र में व्यभिचारी या दस्यु को घुसने न दिया जावे, अन्यथा पत्नी को और प्रजा को बलात् सम्भोग से बारम्बार पीड़ित करेगा, अनुकूल पत्नी तथा प्रजा को सदा प्रसन्न तृप्त रखे, पति या राजा पत्नी या प्रजा का आत्मीय साथी है॥५॥

या सु॑जू॒र्णिः श्रेणिः॑ सु॒म्नआ॑पिर्ह्र॒देच॑क्षु॒र्न ग्र॒न्थिनी॑ चर॒ण्युः। ता अ॒ञ्जयो॑ऽरु॒णयो॒ न स॑स्रुः श्रि॒ये गावो॒ न धे॒नवो॑ऽनवन्त॥

पत्नी या प्रजा शीघ्र कार्य करनेवाली, आश्रय देनेवाली, सुख में प्रेरित करनेवाली, गम्भीर दृष्टिवाली, कार्यों की योजना बनानेवाली, व्यवहारकुशल, तेजस्वी, कमनीय, प्रसन्नमुख, समृद्धि में यत्नशील होनी चाहिये, वे दूध देनेवाली गौऔं के समान सुखदायी हैं, वे ही पति या राजा को प्रशंसित करती हैं॥६॥

सम॑स्मि॒ञ्जाय॑मान आसत॒ ग्ना उ॒तेम॑वर्धन्न॒द्यः१॒॑ स्वगू॑र्ताः। म॒हे यत्त्वा॑ पुरूरवो॒ रणा॒याव॑र्धयन्दस्यु॒हत्या॑य दे॒वाः॥

विवाह संस्कार में जब स्त्री का पति बन जाता है अथवा राजसूययज्ञ में प्रजापति बन जाता है तो उसे पारिवारिक स्त्रियाँ या राष्ट्र की प्रजाएँ सङ्गत होकर नदियों के समान-नदियाँ जैसे राष्ट्र को समृद्ध करती हैं-बढ़ावा देती हैं-इसी प्रकार पुरोहित और ऋत्विक् घर में घुसनेवाले या राष्ट्र में घुसनेवाले नाशकारी व्यभिचारी तथा दस्यु को हनन करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिये॥७॥

सचा॒ यदा॑सु॒ जह॑ती॒ष्वत्क॒ममा॑नुषीषु॒ मानु॑षो नि॒षेवे॑। अप॑ स्म॒ मत्त॒रस॑न्ती॒ न भु॒ज्युस्ता अ॑त्रसन्रथ॒स्पृशो॒ नाश्वाः॑॥

बलात् सम्भोग करनेवाले व्यभिचारी या दस्यु घरों में राष्ट्र में घुसे देखकर पवित्र स्त्रियाँ या प्रजाएँ भय से जब भागने लगें, तो पति और राजा पूर्ण आश्वासन देकर उनकी रक्षा करे और घर में राष्ट्र में स्थिर रहने का प्रबन्ध करे, उन दुष्टों को दण्ड दे॥८॥

यदा॑सु॒ मर्तो॑ अ॒मृता॑सु नि॒स्पृक्सं क्षो॒णीभिः॒ क्रतु॑भि॒र्न पृ॒ङ्क्ते। ता आ॒तयो॒ न त॒न्वः॑ शुम्भत॒ स्वा अश्वा॑सो॒ न क्री॒ळयो॒ दन्द॑शानाः॥

स्त्रियाँ या प्रजाएँ अमृत सुख देनेवाली होती हैं, पति या राजा नियमित रक्षा करता हुआ मधुर शब्दों या भूभागों से श्रेष्ठ रक्षा कर्म द्वारा उनसे सम्पर्क करता है, तो वे भी मधुरभाषी पक्षी के समान मधुर बोलती हुईं अपने शरीरों को सुशोभित करती हैं या आत्मभाव को प्रकट करती हैं और सुन्दर हिनहिनाते घोड़े के समान हँसती और खेलती हैं, ऐसी स्त्रियों और प्रजाओं की रक्षा करनी चाहिये॥९॥

वि॒द्युन्न या पत॑न्ती॒ दवि॑द्यो॒द्भर॑न्ती मे॒ अप्या॒ काम्या॑नि। जनि॑ष्टो अ॒पो नर्यः॒ सुजा॑तः॒ प्रोर्वशी॑ तिरत दी॒र्घमायुः॑॥

आदर्श पत्नी बहुत सुख भोगों को भोगने और भोगानेवाली होती है। घर में सुख की वृष्टि करती है और अपने गुणों से प्रकाशमान होती है, ऐसी पत्नी पति के कर्म द्वारा प्राप्त होती है, मानव के अन्दर जो जीवनरस है, उससे पुत्र की प्राप्ति कराती है। अच्छी पत्नी परिवार में दीर्घायु का विस्तार करती है एवं अच्छी प्रजा सुख भोगने और भोगानेवाली होती है, राष्ट्र में सुख का संचार करती है, गुणों से प्रकाशमान होती है, ऐसी प्रजा राजा के अच्छे शासन से बनती है। योग्य राजा प्रजा की ओर से अभिषिक्त किया जाता है, तब प्रजा को दुःखों से बचाता है, अच्छी प्रजा भी राष्ट्र में दीर्घायु का विस्तार करती है॥१०॥

ज॒ज्ञि॒ष इ॒त्था गो॒पीथ्या॑य॒ हि द॒धाथ॒ तत्पु॑रूरवो म॒ ओजः॑। अशा॑सं त्वा वि॒दुषी॒ सस्मि॒न्नह॒न्न म॒ आशृ॑णोः॒ किम॒भुग्व॑दासि॥

सच्ची सदाचारिणी पत्नी पति को गृहस्थ जीवन की मर्यादा बतावे-सुझावे कि गृहस्थ आश्रम केवल भोग का आश्रम नहीं है, सन्तानोत्पत्ति के लिये है, केवल कामवासना पूरी करने के पीछे न पड़ना चाहिये। ठीक है, पति भोग का भूखा है, परन्तु पुत्र का इच्छुक होने से कामवासना दुःख का निमित्त नहीं, केवल कामवासना दुःखदायक है॥११॥

क॒दा सू॒नुः पि॒तरं॑ जा॒त इ॑च्छाच्च॒क्रन्नाश्रु॑ वर्तयद्विजा॒नन्। को दम्प॑ती॒ सम॑नसा॒ वि यू॑यो॒दध॒ यद॒ग्निः श्वशु॑रेषु॒ दीद॑यत्॥

पुत्र उस पिता को चाहता है, जो पुत्र की कामना से उसे उत्पन्न करता है, उसके पास रोता हुआ शान्त हो जाता है। केवल व्यभिचारी कामातुर से अकस्मात्-उत्पन्न हुए को वह स्नेह नहीं करता है, पुनः पुत्र उसे कैसे चाहे ? अतः पुत्र की इच्छा से गृहस्थ जीवन या गृहस्थाश्रम निभाना चाहिए॥१२॥

प्रति॑ ब्रवाणि व॒र्तय॑ते॒ अश्रु॑ च॒क्रन्न क्र॑न्ददा॒ध्ये॑ शि॒वायै॑। प्र तत्ते॑ हिनवा॒ यत्ते॑ अ॒स्मे परे॒ह्यस्तं॑ न॒हि मू॑र॒ मापः॑॥

कामुक जार मनुष्य के पास उससे उत्पन्न पुत्र न ठहरेगा, क्योंकि उसने पुत्रभाव से उसे उत्पन्न नहीं किया, उसके लिये पुत्रस्नेह न होगा। ऐसे जार व्यभिचारी के साथ कुमारी को सम्बन्ध न जोड़ना चाहिए, वह कभी सच्चा स्नेह नहीं कर सकता है, सद्गृहस्थ रहने की प्रेरणा दे, बिना सद्गृहस्थ के उसका साथ न करे॥१३॥

सु॒दे॒वो अ॒द्य प्र॒पते॒दना॑वृत्परा॒वतं॑ पर॒मां गन्त॒वा उ॑। अधा॒ शयी॑त॒ निॠ॑तेरु॒पस्थेऽधै॑नं॒ वृका॑ रभ॒सासो॑ अ॒द्युः॥

अन्यथा मोह करनेवाले निराश्रित होकर किसी भी देश या दिशा में भूमि के गहन स्थान में आत्महत्या कर जाते हैं अथवा निराश होकर ऐसे निष्क्रिय हो जाते हैं कि उन जीते हुओं को भी मांसभक्षक खा जाते हैं, इसलिए अन्यथा मोह करना उचित नहीं है। शास्त्रविधि से धर्मानुसार पति-पत्नी सम्बन्ध होना चाहिए॥१४॥

पुरू॑रवो॒ मा मृ॑था॒ मा प्र प॑प्तो॒ मा त्वा॒ वृका॑सो॒ अशि॑वास उ क्षन्। न वै स्त्रैणा॑नि स॒ख्यानि॑ सन्ति सालावृ॒काणां॒ हृद॑यान्ये॒ता॥

मनुष्य कामी बनकर आत्महत्या कर लेते हैं, अपने को मांस खानेवाले पशुओं तक समर्पित कर देते हैं, ऐसा नहीं करना चाहिए, यह जीवन की सफलता नहीं और स्त्रियों में आसक्ति से कामवश स्नेह स्थायी नहीं होते हैं, अपितु आक्रमणकारी भेड़ियों के हृदय जैसे जीवन नष्ट करानेवाले होते हैं, किन्तु  सद्गृहस्थ बनकर पुत्र उत्पत्ति-पुत्रोत्पादन का लक्ष्य रखें॥१५॥

यद्विरू॒पाच॑रं॒ मर्त्ये॒ष्वव॑सं॒ रात्रीः॑ श॒रद॒श्चत॑स्रः। घृ॒तस्य॑ स्तो॒कं स॒कृदह्न॑ आश्नां॒ तादे॒वेदं ता॑तृपा॒णा च॑रामि॥

कुमारी ब्रह्मचारिणीरूप को छोड़कर गृहिणी के रूप में आती हैं या आया करती हैं, पुरुषों के सम्पर्क में किसी एक की पत्नी बनकर रहती हैं-रहना होता है, पतिसङ्ग केवल शीतकाल चार रात्रियों का होता है, तीन रजोधर्म की पति के सङ्ग रहने की और चौथी गर्भाधान की, केवल एक बार मानव बीज-वीर्य का अल्प भाग सन्तानार्थ लेकर सन्तान की उत्पत्ति तक तृप्त रहना चाहिये-संयम से रहना चाहिये॥१६॥

अ॒न्त॒रि॒क्ष॒प्रां रज॑सो वि॒मानी॒मुप॑ शिक्षाम्यु॒र्वशीं॒ वसि॑ष्ठः। उप॑ त्वा रा॒तिः सु॑कृ॒तस्य॒ तिष्ठा॒न्नि व॑र्तस्व॒ हृद॑यं तप्यते मे॥

पत्नी पति की आत्मा को तृप्त करती है, रञ्जनीय गृहस्थसुख निर्माण करती है, कमनीय है, अतः पति उसके अन्दर अत्यन्त राग से बसा रहता है, वह संयम से यथावत् पालित ब्रह्मचर्य के फलरूप वीर्य को पत्नी को समर्पित करता है, जो उसके अन्दर उपस्थित हो गर्भ-पुत्ररूप में पुष्ट होता है। गर्भस्थित हो जाने पर पत्नी को पतिगृह से पिता भ्राता आदि के यहाँ चला जाना चाहिए, जिससे कि गर्भ की रक्षा पुत्रोत्पत्ति के योग्य हो जावे। पति के पास न रहे, पास रहने से पति कामभाव से पीड़ित होता है, उसके द्वारा गर्भपात करने की सम्भावना है॥१७॥

इति॑ त्वा दे॒वा इ॒म आ॑हुरैळ॒ यथे॑मे॒तद्भव॑सि मृ॒त्युब॑न्धुः। प्र॒जा ते॑ दे॒वान्ह॒विषा॑ यजाति स्व॒र्ग उ॒ त्वमपि॑ मादयासे॥

मनुष्य गृहस्थ से विरक्त होकर विद्वानों के सत्कार का पात्र बन जाता है और मृत्यु भी उसका मित्र बन जाता है, जो अपने विकराल स्वरूप को छोड़ देता है, पीड़ा नहीं पहुँचाता है, मोक्ष में स्थिर आनन्द को भोगता है, उसकी सन्तान अच्छा कर्म करते हुए संसार में उसके यश को स्थिर रखती हैं, यह गृहस्थ आश्रम का परम फल है॥१८॥

प्र ते॑ म॒हे वि॒दथे॑ शंसिषं॒ हरी॒ प्र ते॑ वन्वे व॒नुषो॑ हर्य॒तं मद॑म्। घृ॒तं न यो हरि॑भि॒श्चारु॒ सेच॑त॒ आ त्वा॑ विशन्तु॒ हरि॑वर्पसं॒ गिरः॑॥

परमात्मा के महत्त्वपूर्ण अज्ञानदोषनाशक और ज्ञानगुणप्रसारक कृपाप्रसाद प्रशंसनीय हैं, जिनके द्वारा उसका कमनीय आनन्द याचनीय है, जिसे वह सींच देता है, जबकि स्तुतियाँ उसे प्राप्त होती हैं॥१॥

हरिं॒ हि योनि॑म॒भि ये स॒मस्व॑रन्हि॒न्वन्तो॒ हरी॑ दि॒व्यं यथा॒ सदः॑। आ यं पृ॒णन्ति॒ हरि॑भि॒र्न धे॒नव॒ इन्द्रा॑य शू॒षं हरि॑वन्तमर्चत॥

स्तुति करनेवाले विद्वान् जन आनन्दसदन मोक्ष है, ऐसा घोषित करते हैं, उसे प्राप्त करना चाहिये, उसकी प्राप्ति के साधन हैं स्तुति और उपासना, इसलिए स्तुतियों द्वारा और उपासना द्वारा परमात्मा की अर्चना करनी चाहिये॥२॥

सो अ॑स्य॒ वज्रो॒ हरि॑तो॒ य आ॑य॒सो हरि॒र्निका॑मो॒ हरि॒रा गभ॑स्त्योः। द्यु॒म्नी सु॑शि॒प्रो हरि॑मन्युसायक॒ इन्द्रे॒ नि रू॒पा हरि॑ता मिमिक्षिरे॥

परमात्मा का वज्र तेजस्वी दुःख, अज्ञान शत्रुओं को नष्ट करनेवाला है। उसमें परमात्मा का मन्युरूप वाण लगा हुआ है, परमात्मा में मनोहर गुण धर्म स्वतः ही रखे हैं, उसकी उपासना करनी चाहिए॥३॥

दि॒वि न के॒तुरधि॑ धायि हर्य॒तो वि॒व्यच॒द्वज्रो॒ हरि॑तो॒ न रंह्या॑। तु॒ददहिं॒ हरि॑शिप्रो॒ य आ॑य॒सः स॒हस्र॑शोका अभवद्धरिम्भ॒रः॥

परमात्मा कमनीय है, उसे उपासक अपने आत्मा में सूर्य के समान साक्षात् करते हैं, वह मनोहर स्वरूपवाला बहुत तेजस्वी दुःख हरनेवाले गुणों से पूर्ण है, अनन्त प्रयत्नवान् है, उसका ओज जगत् में व्याप्त हो रहा है॥४॥

त्वंत्व॑महर्यथा॒ उप॑स्तुतः॒ पूर्वे॑भिरिन्द्र हरिकेश॒ यज्व॑भिः। त्वं ह॑र्यसि॒ तव॒ विश्व॑मु॒क्थ्य१॒॑मसा॑मि॒ राधो॑ हरिजात हर्य॒तम्॥

परमात्मा के रचे वेद अज्ञान का नाश करनेवाले हैं तथा यह पुरातन अग्नि आदि परम ऋषियों के द्वारा तथा नवीन ऋषियों द्वारा भी उपासना करने योग्य है, वह उपासना को चाहता है, उपासना से मनुष्यों के अन्दर साक्षात् होता है, इसलिये उसकी उपासना करनी चाहिये॥५॥

ता व॒ज्रिणं॑ म॒न्दिनं॒ स्तोम्यं॒ मद॒ इन्द्रं॒ रथे॑ वहतो हर्य॒ता हरी॑। पु॒रूण्य॑स्मै॒ सव॑नानि॒ हर्य॑त॒ इन्द्रा॑य॒ सोमा॒ हर॑यो दधन्विरे॥

परमात्मा आनन्द के देनेवाला स्तुति योग्य है, उसका श्रवण करने करानेवाले अपने मन में उसे धारण करते हैं, पुनः मनन करके साक्षात् करते हैं॥६॥

अरं॒ कामा॑य॒ हर॑यो दधन्विरे स्थि॒राय॑ हिन्व॒न्हर॑यो॒ हरी॑ तु॒रा। अर्व॑द्भि॒र्यो हरि॑भि॒र्जोष॒मीय॑ते॒ सो अ॑स्य॒ कामं॒ हरि॑वन्तमानशे॥

उपासक मनुष्य परमात्मा की कामना करने में लगे रहते हैं, उसे अपने अन्दर धारण करते हैं, पूर्णरूप से अन्दर बिठाने के लिये पुनः-पुनः उसकी  स्तुति उपासना किया करते हैं, जिससे प्रीतिभाव उत्पन्न करके परमात्मा के ज्ञानप्रकाश को प्राप्त करते हैं॥७॥

हरि॑श्मशारु॒र्हरि॑केश आय॒सस्तु॑र॒स्पेये॒ यो ह॑रि॒पा अव॑र्धत। अर्व॑द्भि॒र्यो हरि॑भिर्वा॒जिनी॑वसु॒रति॒ विश्वा॑ दुरि॒ता पारि॑ष॒द्धरी॑॥

परमात्मा अज्ञाननाशक प्रमुख ज्ञानभण्डार वेदवाला दुःखनाशक ज्ञानप्रकाशवाला तेजस्वी उपासनाप्रसङ्ग में शीघ्रकारी उपासना करनेवालों के अन्दर साक्षात् होता है, ज्ञानदीप्ति का प्रकाश करता है, उसके उपदेश को सुनने-सुनानेवालों को दुःख से पार कर देता है॥८॥

स्रुवे॑व॒ यस्य॒ हरि॑णी विपे॒ततुः॒ शिप्रे॒ वाजा॑य॒ हरि॑णी॒ दवि॑ध्वतः। प्र यत्कृ॒ते च॑म॒से मर्मृ॑ज॒द्धरी॑ पी॒त्वा मद॑स्य हर्य॒तस्यान्ध॑सः॥

परमात्मा के रचे सूर्य और चन्द्रमा जगत् में प्रकाश फेंकते हैं, मनुष्यादि प्रजाओं के जबड़े परमात्मा के दिये अन्न के लिए चलते हैं या उसके आकाशमण्डल या भूमण्डल दोनों गति करते हैं, जब जगत् उत्पन्न हो जाता है, तो उपासकों के उपासनारस को परमात्मा स्वीकार कर अपने दुःखनाशक व सुखकारक कृपाप्रसाद को प्राप्त कराता है॥९॥

उ॒त स्म॒ सद्म॑ हर्य॒तस्य॑ प॒स्त्यो॒३॒॑रत्यो॒ न वाजं॒ हरि॑वाँ अचिक्रदत्। म॒ही चि॒द्धि धि॒षणाह॑र्य॒दोज॑सा बृ॒हद्वयो॑ दधिषे हर्य॒तश्चि॒दा॥

परमात्मा मोक्षधाम और संसार दोनों के अन्दर व्यापता है, घोड़ा जैसे संग्राम में व्यापता है, वह उपासक की स्तुति को अपने प्रभाव से चाहता है, उपासक के लिए प्रतिकाल में महान् या महत्त्वपूर्ण जीवन-मोक्ष की आयु को प्राप्त कराता है, धारण कराता है॥१०॥

आ रोद॑सी॒ हर्य॑माणो महि॒त्वा नव्यं॑नव्यं हर्यसि॒ मन्म॒ नु प्रि॒यम्। प्र प॒स्त्य॑मसुर हर्य॒तं गोरा॒विष्कृ॑धि॒ हर॑ये॒ सूर्या॑य॥

द्युलोक से लेकर पृथ्वीलोकपर्यन्त संसार को अपने महत्त्व से अधीन रखनेवाला परमात्मा प्रत्येक प्रशंसनीय व रोचक विचार को या स्तुति को चाहता है-जिसके प्रतिकार में जो विद्वान् उपासक के लिए गो के दूध की भाँति मोक्ष को आविष्कृत करता है-सम्पादित करता है, देता है॥११॥

आ त्वा॑ ह॒र्यन्तं॑ प्र॒युजो॒ जना॑नां॒ रथे॑ वहन्तु॒ हरि॑शिप्रमिन्द्र। पिबा॒ यथा॒ प्रति॑भृतस्य॒ मध्वो॒ हर्य॑न्य॒ज्ञं स॑ध॒मादे॒ दशो॑णिम्॥

परमात्मा प्राणायामादि योगाभ्यासों के सेवन से तथा इन्द्रियों के विषय से रहित ध्यान द्वारा हृदय में साक्षात् होता है, उपासक के समस्त दुःखों एवं दोषों को दूर कर देता है॥१२॥

अपाः॒ पूर्वे॑षां हरिवः सु॒ताना॒मथो॑ इ॒दं सव॑नं॒ केव॑लं ते। म॒म॒द्धि सोमं॒ मधु॑मन्तमिन्द्र स॒त्रा वृ॑षञ्ज॒ठर॒ आ वृ॑षस्व॥

उपासक मनुष्यों का इष्टदेव पूर्व उपासकों के उपासनारस को स्वीकार करता है तथा उपासक को हर्षित करता तथा अपने आनन्द को उसके आत्मा में सींच देता है-भरपूर कर देता है, उसकी उपासना अवश्य करनी चाहिए॥१३॥

या ओष॑धीः॒ पूर्वा॑ जा॒ता दे॒वेभ्य॑स्त्रियु॒गं पु॒रा। मनै॒ नु ब॒भ्रूणा॑म॒हं श॒तं धामा॑नि स॒प्त च॑॥

सृष्टि के आरम्भ से लेकर भौतिक देवों-सूर्य चन्द्र आदि की शक्ति को लेकर उत्पन्न ओषधियों के उत्पत्तिक्रम स्थानों, उनके प्राणिशरीरों में प्रयोगस्थानों को वैद्य जाने, किस स्थान के रोग को दूर करती हैं, किस अङ्ग को पुष्ट करती हैं॥१॥

श॒तं वो॑ अम्ब॒ धामा॑नि स॒हस्र॑मु॒त वो॒ रुहः॑। अधा॑ शतक्रत्वो यू॒यमि॒मं मे॑ अग॒दं कृ॑त॥

ओषधियाँ जीवन का निर्माण करनेवाली होती हैं, इनके उत्पत्तिस्थानों तथा उगने के प्रकारों को जानकर रोगी को स्वस्थ करना चाहिये॥२॥

ओष॑धीः॒ प्रति॑ मोदध्वं॒ पुष्प॑वतीः प्र॒सूव॑रीः। अश्वा॑ इव स॒जित्व॑रीर्वी॒रुधः॑ पारयि॒ष्ण्वः॑॥

खाद्याधिकारी, वैद्य एवं वनविभाग के अधिकारी ऐसा यत्न निरन्तर करते रहें, जिससे औषधियाँ, वनस्पतियाँ अन्न फल देनेवाली, रोगनिवृत्त करनेवाली, सदा फलती-फूलती रहें॥३॥

ओष॑धी॒रिति॑ मातर॒स्तद्वो॑ देवी॒रुप॑ ब्रुवे। स॒नेय॒मश्वं॒ गां वास॑ आ॒त्मानं॒ तव॑ पूरुष॥

ओषधियों को तथा औषधियों से बने हुए वटी-आदि योगों को वैद्य ऐसे तैयार करें, जिससे उनमें दिव्य गुण और शरीर को निर्माण करने की शक्तियाँ आजावें तथा वैद्य चिकित्सा करने में ऐसे कुशल हों, जो रोगी को स्वस्थ बना सकें, रोगी भी अपने रोग को दूर कराने में वैद्य के समर्पित बहुमूल्य-पदार्थ को दे, कुछ न होने पर उसकी सेवा के लिए अपने को अर्पित कर दे॥४॥

अ॒श्व॒त्थे वो॑ नि॒षद॑नं प॒र्णे वो॑ वस॒तिष्कृ॒ता। गो॒भाज॒ इत्किला॑सथ॒ यत्स॒नव॑थ॒ पूरु॑षम्॥

वैद्य के कथनानुसार औषधियाँ रोगों को दूर करनेवाली सिद्ध होनी चाहिये, उनका देह में जिस स्थान पर रोग हो, प्रयोग किया जावे, जब स्वस्थ हो जावे तो उनका प्रभाव मन में बस जावे॥५॥

यत्रौष॑धीः स॒मग्म॑त॒ राजा॑नः॒ समि॑ताविव। विप्रः॒ स उ॑च्यते भि॒षग्र॑क्षो॒हामी॑व॒चात॑नः॥

राजा को आश्रय बनाकर राजसभासद् सभा में मिलकर जैसे कार्य करते हैं, ऐसे ही ओषधियाँ रोगी जन में वैद्य को आश्रय बनाकर अपने गुणों का प्रकाश करती हैं, इसलिए वैद्य को ओषधियों का गुणज्ञ और रोगों का निदानवेत्ता होना चाहिये॥६॥

अ॒श्वा॒व॒तीं सो॑माव॒तीमू॒र्जय॑न्ती॒मुदो॑जसम्। आवि॑त्सि॒ सर्वा॒ ओष॑धीर॒स्मा अ॑रि॒ष्टता॑तये॥

कुछ ओषधियाँ मानसिक रोग को दूर करनेवाली, कुछ शरीर में रस रक्त का सञ्चार करनेवाली और कुछ प्राणशक्ति देनेवाली और कुछ वीर्यप्रद वाजीकरण ओषधियाँ होती हैं, उन सबका ज्ञान और उपयोग करना वैद्य को आना चाहिये॥७॥

उच्छुष्मा॒ ओष॑धीनां॒ गावो॑ गो॒ष्ठादि॑वेरते। धनं॑ सनि॒ष्यन्ती॑नामा॒त्मानं॒ तव॑ पूरुष॥

समस्त सेवन करने योग्य ओषधियों के प्रत्यग्र बलवान् रस रोगी को देने चाहिएँ, उससे रोगी के शिथिल रक्त आदि धातु बढ़कर उसके आत्मा मन शरीर को तृप्त व तेजस्वी बना देते हैं॥८॥

इष्कृ॑ति॒र्नाम॑ वो मा॒ताथो॑ यू॒यं स्थ॒ निष्कृ॑तीः। सी॒राः प॑त॒त्रिणीः॑ स्थन॒ यदा॒मय॑ति॒ निष्कृ॑थ॥

औषधियों की भूमि परिष्कृत होनी चाहिये, तो औषधियाँ भी निर्दोष उत्पन्न हुई रोगों को शरीर से बाहर निकालनेवाली होती हैं, वे सेवन की हुई नदियों की भाँति शरीर में फैलकर रोगी को निर्दोष-स्वस्थ कर देती हैं॥९॥

अति॒ विश्वाः॑ परि॒ष्ठा स्ते॒न इ॑व व्र॒जम॑क्रमुः। ओष॑धीः॒ प्राचु॑च्यवु॒र्यत्किं च॑ त॒न्वो॒३॒॑ रपः॑॥

चोर जैसे गौशाला में गुप्त रूप से तोड़-फोड़ कर गौ को बाहर निकाल देते हैं, ऐसे ही ओषधियाँ शरीर में घुसकर रोगस्थानों को खोलकर उनमें से रोगों को बाहर निकाल ले आती हैं, ऐसी प्रभावशाली ओषधियाँ सेवन करने योग्य हैं॥१०॥

यदि॒मा वा॒जय॑न्न॒हमोष॑धी॒र्हस्त॑ आद॒धे। आ॒त्मा यक्ष्म॑स्य नश्यति पु॒रा जी॑व॒गृभो॑ यथा॥

वैद्य चिकित्सा करने में ऐसे कुशल हों तथा प्रसिद्ध हों कि जैसे ही ओषधियों को चिकित्सा के लिए प्रयोग करें, रोगी को यह अनुभव हो कि ओषधी सेवन से पहले ही मेरा रोग भाग रहा है तथा वैद्य भी ओषधी देने के साथ-साथ उसे आश्वासन दे कि तेरा रोग तो अब जा रहा है॥११॥

यस्यौ॑षधीः प्र॒सर्प॒थाङ्ग॑मङ्गं॒ परु॑ष्परुः। ततो॒ यक्ष्मं॒ वि बा॑धध्व उ॒ग्रो म॑ध्यम॒शीरि॑व॥

ओषधियों के अन्दर बड़ी भारी शक्ति है, जैसे विद्युत् के अन्दर बड़ी भारी शक्ति होने से मेघ के जलों को बाहर निकाल देती है, ऐसे ही ओषधियाँ अङ्ग-अङ्ग में और जोड़-जोड़ में बैठे रोग को बाहर निकाल देती हैं, वैद्य जन इस रीति और अनुपात से चिकित्सा करें॥१२॥

सा॒कं य॑क्ष्म॒ प्र प॑त॒ चाषे॑ण किकिदी॒विना॑। सा॒कं वात॑स्य॒ ध्राज्या॑ सा॒कं न॑श्य नि॒हाक॑या॥

राजयक्ष्मा रोग को नष्ट करने के लिये वमन लानेवाली ओषधि खिलाकर या कड़वी ओषधि खिला-पिलाकर कुरले कराकर या अपानवायु लाकर या खङ्खङ्कार थूकने-लानेवाली ओषधि खिलाकर दूर करना चाहिये॥१३॥

अ॒न्या वो॑ अ॒न्याम॑वत्व॒न्यान्यस्या॒ उपा॑वत। ताः सर्वाः॑ संविदा॒ना इ॒दं मे॒ प्राव॑ता॒ वचः॑॥

वैद्य ऐसे युक्ति का विचारकर चिकित्सा करें कि एक दी हुई ओषधि दूसरी दी हुई ओषधि के प्रतिकूल न जावे, अपितु गुणवृद्धि करे तथा एक ओषधि से अधिक गुणकारी हो, सब ओषधियाँ मिलाकर दी जानेवाली रोगी अच्छा करने में वैद्य की प्रसिद्धि का निमित्त बनें॥१४॥

याः फ॒लिनी॒र्या अ॑फ॒ला अ॑पु॒ष्पा याश्च॑ पु॒ष्पिणीः॑। बृह॒स्पति॑प्रसूता॒स्ता नो॑ मुञ्च॒न्त्वंह॑सः॥

फलवाली या फलरहित फूलवाली या फूलरहित अथवा फल फूलरहित केवल पत्तेवाली या मात्र काण्डवाली भी ओषधियाँ हों, वे सब महाविद्वान् वैद्य द्वारा प्रयुक्त की गई रोग से छुड़ा सकती हैं॥१५॥

मु॒ञ्चन्तु॑ मा शप॒थ्या॒३॒॑दथो॑ वरु॒ण्या॑दु॒त। अथो॑ य॒मस्य॒ पड्बी॑शा॒त्सर्व॑स्माद्देवकिल्बि॒षात्॥

किसी को अपशब्द कहने, श्रेष्ठों का अपमान करने, वातरोग से उन्माद, इन्द्रियविषयों के अतिसेवन से विकार व्याकुलता आदि मानसिक रोग भी ओषधियों से दूर किये जाने चाहिये॥१६॥

अ॒व॒पत॑न्तीरवदन्दि॒व ओष॑धय॒स्परि॑। यं जी॒वम॒श्नवा॑महै॒ न स रि॑ष्याति॒ पूरु॑षः॥

ओषधियाँ यद्यपि पृथिवी पर उत्पन्न होती हैं, तब जबकि आकाश से जल पृथ्वी पर गिरता है-बरसता है, एक प्रकार से बीजरूप में आकाश से प्राप्त हुईं ओषधियाँ समझनी चाहिए, आकाश का जल अमृतसमान होता है, उस ऐसे जल से उत्पन्न ओषधियाँ अमृतरूप होकर जिस पुरुष के सेवन में आती हैं, वह पीड़ा से बचा रहता है॥१७॥

या ओष॑धीः॒ सोम॑राज्ञीर्ब॒ह्वीः श॒तवि॑चक्षणाः। तासां॒ त्वम॑स्युत्त॒मारं॒ कामा॑य॒ शं हृ॒दे॥

रोग को निवृत्त करके तुरन्त जीवनीय शक्ति लानेवाली रसायन ओषधी है, जो प्रत्यक्ष प्रभाव तुरन्त दिखाती है, हृदय में शान्ति देती है, ऐसी ओषधी को नित्य सेवन करना चाहिये॥१८॥

या ओष॑धीः॒ सोम॑राज्ञी॒र्विष्ठि॑ताः पृथि॒वीमनु॑। बृह॒स्पति॑प्रसूता अ॒स्यै सं द॑त्त वी॒र्य॑म्॥

अमृत गुणवाली ओषधियाँ, जो पृथिवी पर मिलती हैं, वे सुयोग्य वैद्य के द्वारा रोगनाशक बल रोगी के देह में देती हैं॥१९॥

मा वो॑ रिषत्खनि॒ता यस्मै॑ चा॒हं खना॑मि वः। द्वि॒पच्चतु॑ष्पद॒स्माकं॒ सर्व॑मस्त्वनातु॒रम्॥

ओषधियों के अन्दर परमात्मा ने ऐसा रोगनाशक गुण दिया है, उन्हें उखाड़ते-उखाड़ते ही रोग दूर हो जाता है-अथवा रोग नहीं होता और रोगों का रोग भी उनके सेवन से दूर हो जाता है, न केवल मनुष्य ही, किन्तु पशु पक्षी भी ओषधियों से नीरोग हो जाते हैं॥२०॥

याश्चे॒दमु॑पशृ॒ण्वन्ति॒ याश्च॑ दू॒रं परा॑गताः। सर्वाः॑ सं॒गत्य॑ वीरुधो॒ऽस्यै सं द॑त्त वी॒र्य॑म्॥

ओषधियों के गुणधर्म परम्परा से सुने जाते हैं कि इस ओषधि में ये गुण हैं, वह समीप में हो या दूर देश में, उन्हें लाकर सबको यथोचित मिलाकर रोगी को देने से रोगनाशक बल प्राप्त होता है, अतः कई ओषधियों को मिलाकर भी देना चाहिये॥२१॥

ओष॑धयः॒ सं व॑दन्ते॒ सोमे॑न स॒ह राज्ञा॑। यस्मै॑ कृ॒णोति॑ ब्राह्म॒णस्तं रा॑जन्पारयामसि॥

उत्तम गुणवाली रसायनरूप प्रधान ओषधी के साथ रोगनिवारक ओषधियाँ भी रोगी को रोगरूप दुःखसागर से पार करती हैं॥२२॥

त्वमु॑त्त॒मास्यो॑षधे॒ तव॑ वृ॒क्षा उप॑स्तयः। उप॑स्तिरस्तु॒ सो॒३॒॑ऽस्माकं॒ यो अ॒स्माँ अ॑भि॒दास॑ति॥

लतारूप ओषधियों के वृक्ष सहारे हैं, जिनके ऊपर लताएँ चढ़ती हैं और फैलती हैं, ऐसे ही रोगियों का सहारा वैद्य होता है, जिसके सहारे वे स्वस्थ होते हैं और पुष्ट होते हैं॥२३॥

बृह॑स्पते॒ प्रति॑ मे दे॒वता॑मिहि मि॒त्रो वा॒ यद्वरु॑णो॒ वासि॑ पू॒षा। आ॒दि॒त्यैर्वा॒ यद्वसु॑भिर्म॒रुत्वा॒न्त्स प॒र्जन्यं॒ शंत॑नवे वृषाय॥

वेदवाणी का स्वामी परमात्मा समस्त देवों का प्रतिरूपक होकर देह के सुख की कामना करनेवाले-प्राणिमात्र के सुख की कामना करनेवाले के लिए सुख की वृष्टि करता है। समस्त देवों को प्राप्त करनेवाला विद्वान् परमात्मा की वेदवाणी को प्राप्त करता है सुख की वृष्टि कराने के लिए एवं मेघ में वर्त्तमान गर्जना का स्वामी समस्त देवताओं के गुणों को लेकर पृथिवी की अन्नोत्पादक ऊष्मा शक्ति के लिए जल को बरसाने के हेतु आकाशीय विद्युत् रूपवाली-मेघ को ताड़ित करनेवाली को देता है और जल बरसाता है॥१-२॥

आ दे॒वो दू॒तो अ॑जि॒रश्चि॑कि॒त्वान्त्वद्दे॑वापे अ॒भि माम॑गच्छत्। प्र॒ती॒ची॒नः प्रति॒ मामा व॑वृत्स्व॒ दधा॑मि ते द्यु॒मतीं॒ वाच॑मा॒सन्॥

वेदवाणी का स्वामी परमात्मा समस्त देवों का प्रतिरूपक होकर देह के सुख की कामना करनेवाले-प्राणिमात्र के सुख की कामना करनेवाले के लिए सुख की वृष्टि करता है। समस्त देवों को प्राप्त करनेवाला विद्वान् परमात्मा की वेदवाणी को प्राप्त करता है सुख की वृष्टि कराने के लिए एवं मेघ में वर्त्तमान गर्जना का स्वामी समस्त देवताओं के गुणों को लेकर पृथिवी की अन्नोत्पादक ऊष्मा शक्ति के लिए जल को बरसाने के हेतु आकाशीय विद्युत् रूपवाली-मेघ को ताड़ित करनेवाली को देता है और जल बरसाता है॥१-२॥

अ॒स्मे धे॑हि द्यु॒मतीं॒ वाच॑मा॒सन्बृह॑स्पते अनमी॒वामि॑षि॒राम्। यया॑ वृ॒ष्टिं शंत॑नवे॒ वना॑व दि॒वो द्र॒प्सो मधु॑माँ॒ आ वि॑वेश॥

परमात्मा ज्ञान दीप्तिवाली पापविनाशक सुख की प्रेरक वेदवाणी को धारण करता है, ज्ञानमय वेद से-मधुर हर्षित करनेवाला ज्ञानरस राष्ट्र में या जनता में प्रवाहित होता है एवं स्तनयित्नु गर्जना का स्वामी दुःख को दूर करनेवाली गर्जनावाली को प्रेरित करता है, जिससे मेघमण्डल का रस बरसकर पृथिवी पर फैल जाता है, अन्न की उत्पत्ति का कारण बनता है॥३॥

आ नो॑ द्र॒प्सा मधु॑मन्तो विश॒न्त्विन्द्र॑ दे॒ह्यधि॑रथं स॒हस्र॑म्। नि षी॑द हो॒त्रमृ॑तु॒था य॑जस्व दे॒वान्दे॑वापे ह॒विषा॑ सपर्य॥

देवों की प्राप्ति करनेवाला राजपुरोहित बहुमूल्य जलवृष्टि को होमयज्ञ द्वारा राष्ट्र में जल बरसाता है एवं आकाशीय विद्युत् मीठे जलप्रवाह को बहुमूल्य गोधन के समान होमयज्ञ करने से वर्षा द्वारा प्रवाहित करती है॥४॥

आ॒र्ष्टि॒षे॒णो हो॒त्रमृषि॑र्नि॒षीद॑न्दे॒वापि॑र्देवसुम॒तिं चि॑कि॒त्वान्। स उत्त॑रस्मा॒दध॑रं समु॒द्रम॒पो दि॒व्या अ॑सृजद्व॒र्ष्या॑ अ॒भि॥

शक्तिशाली सेनायुक्त राजा का पुरोहित अन्य ऋत्विक् विद्वानों की सहमति को प्राप्त कर विशेष यज्ञ करके आकाशीय जल समुद्र से नीचे पृथिवी के समुद्र तक जल की वृष्टि कराये एवं आकाश के अन्दर मरुतों-वात-स्तरों का रक्षक विद्युदग्नि अन्य भौतिक देवों के योग से सम्पन्न होकर ऊपर से नीचे पृथिवी तक जल को बरसा देता है॥५॥

अ॒स्मिन्त्स॑मु॒द्रे अध्युत्त॑रस्मि॒न्नापो॑ दे॒वेभि॒र्निवृ॑ता अतिष्ठन्। ता अ॑द्रवन्नार्ष्टिषे॒णेन॑ सृ॒ष्टा दे॒वापि॑ना॒ प्रेषि॑ता मृ॒क्षिणी॑षु॥

आकाश के जल समुद्र में-मेघ में जल रुके होते हैं, उन्हें पुरोहित यज्ञविधि से नीचे भूभागों पर बरसा लिया करता है-बरसा लिया करे एवं विद्युत् अग्नि मेघ में रुके हुए जलों को ताड़ना द्वारा नीचे भूमियों पर बरसा दिया करती है, इस विज्ञान को जानना चाहिये और काम में लाना चाहिए॥६॥

यद्दे॒वापिः॒ शंत॑नवे पु॒रोहि॑तो हो॒त्राय॑ वृ॒तः कृ॒पय॒न्नदी॑धेत्। दे॒व॒श्रुतं॑ वृष्टि॒वनिं॒ ररा॑णो॒ बृह॒स्पति॒र्वाच॑मस्मा अयच्छत्॥

पुरोहित वृष्टिविज्ञानवेत्ता जन राष्ट्र में-प्राणिमात्र के कल्याणचिन्तक अन्नभोगाधिकारी मनुष्य के लिये वृष्टियज्ञ के निमित्त पुरोहित बनकर वृष्टिविषयक ज्ञान करता है, उस ऐसे वृष्टि चाहनेवाले को परमात्मा वृष्टिज्ञान देने के हेतु वृष्टिविज्ञानविषयक वाणी को देता है-दिया है, उससे वृष्टि का लाभ लेना चाहिये एवं विद्युत् अग्नि भौमोष्मा, जो अन्न देनेवाला है, उसका पूर्ववर्ती बन जाता है, तो उसे स्तनयित्नु आकाशीय देवता गर्जनारूप वाणी देता है, वह कड़क कर नीचे वृष्टि कर देती है॥७॥

यं त्वा॑ दे॒वापिः॑ शुशुचा॒नो अ॑ग्न आर्ष्टिषे॒णो म॑नु॒ष्यः॑ समी॒धे। विश्वे॑भिर्दे॒वैर॑नुम॒द्यमा॑नः॒ प्र प॒र्जन्य॑मीरया वृष्टि॒मन्त॑म्॥

ज्ञान और शस्त्रास्त्रशक्तिसम्पन्न विद्वान् पुरोहित राजा को जैसे तेजस्वी बनाता है, ऐसे ही समस्त विद्वानों की सहमति से वैज्ञानिक प्रयोग द्वारा राष्ट्र में जलवृष्टि करनेवाले मेघ को नीचे प्रेरित कर लेता है॥८॥

त्वां पूर्व॒ ऋष॑यो गी॒र्भिरा॑य॒न्त्वाम॑ध्व॒रेषु॑ पुरुहूत॒ विश्वे॑। स॒हस्रा॒ण्यधि॑रथान्य॒स्मे आ नो॑ य॒ज्ञं रो॑हिद॒श्वोप॑ याहि॥

पुरातन वैदिक महर्षियों ने इसकी स्तुतियों के द्वारा उसे तथा उसके वेदज्ञान को प्राप्त किया, अन्य अर्वाचीन सब ऋषि भी भिन्न-भिन्न यज्ञों में उसे आमन्त्रित करते हैं, वह मोक्षसम्बन्धी रमणीय भोगों को प्रदान करता है॥९॥

ए॒तान्य॑ग्ने नव॒तिर्नव॒ त्वे आहु॑ता॒न्यधि॑रथा स॒हस्रा॑। तेभि॑र्वर्धस्व त॒न्वः॑ शूर पू॒र्वीर्दि॒वो नो॑ वृ॒ष्टिमि॑षि॒तो रि॑रीहि॥

मानव के जीवनसम्बन्धी सांसारिक वर्ष शास्त्रीय दृष्टि से सौवें वर्ष में मृत्यु हो जाने पर निन्यानवें वर्ष रह जाते हैं, वे रमणीय मोक्षसम्बन्धी असंख्य अनन्त गुणित निन्यानवें बन जाते हैं अर्थात् अनन्त निन्यानवें वर्ष बन जाते हैं, जो परमात्मा के आश्रय में होते हैं, वे अलौकिक ब्राह्म-ब्रह्म के आधार पर देहों में-शरीरों में परमात्मा द्वारा पुष्ट होते हैं॥१०॥

ए॒तान्य॑ग्ने नव॒तिं स॒हस्रा॒ सं प्र य॑च्छ॒ वृष्ण॒ इन्द्रा॑य भा॒गम्। वि॒द्वान्प॒थ ऋ॑तु॒शो दे॑व॒याना॒नप्यौ॑ला॒नं दि॒वि दे॒वेषु॑ धेहि॥

परमात्मा मोक्ष के अधिकारी अपने संवरण करनेवाले उपासक को मोक्षधाम में पहुँचाता है, जिन मार्गों से मुक्त आत्माएँ जाते हैं-जाया करते हैं॥११॥

अग्ने॒ बाध॑स्व॒ वि मृधो॒ वि दु॒र्गहापामी॑वा॒मप॒ रक्षां॑सि सेध। अ॒स्मात्स॑मु॒द्राद्बृ॑ह॒तो दि॒वो नो॒ऽपां भू॒मान॒मुप॑ नः सृजे॒ह॥

परमात्मा मुमुक्ष उपासक के पीड़कों गहन कष्टों और बाधकों को नष्ट करता है, मोक्षधाम के आनन्दरसों को उसकी ओर बढ़ाता है, उसे प्रदान करता है॥१२॥

कं न॑श्चि॒त्रमि॑षण्यसि चिकि॒त्वान्पृ॑थु॒ग्मानं॑ वा॒श्रं वा॑वृ॒धध्यै॑। कत्तस्य॒ दातु॒ शव॑सो॒ व्यु॑ष्टौ॒ तक्ष॒द्वज्रं॑ वृत्र॒तुर॒मपि॑न्वत्॥

परमात्मा अद्भुत श्रवण करने योग्य सुखद वेदज्ञान का उपदेश करता है, हमें बोध देकर उन्नतिपथ पर ले जाता है, यह ज्ञानदान अज्ञान का नाश करता है, अमृतरूपी इस ज्ञान को हमारे अन्दर सींचता है॥१॥

स हि द्यु॒ता वि॒द्युता॒ वेति॒ साम॑ पृ॒थुं योनि॑मसुर॒त्वा स॑साद। स सनी॑ळेभिः प्रसहा॒नो अ॑स्य॒ भ्रातु॒र्न ऋ॒ते स॒प्तथ॑स्य मा॒याः॥

आत्मा की विशेष दीप्तिमत्ता और तेजस्विता से परमात्मा विस्तृत शान्तिपद मोक्ष को प्राप्त कराता है, वह मोक्ष में लम्बी आयु को प्रदान करता है, उपासकों द्वारा उपासित हुआ परमात्मा उनके हृदय में साक्षात् होता है, भूः, भुवः, आदि सप्तलोकों में स्थित परमात्मा के बुद्धिकौशल उपादान-कारण प्रकृति में वर्त्तमान होकर जगत् में दृष्टिगोचर होते हैं॥२॥

स वाजं॒ याताप॑दुष्पदा॒ यन्त्स्व॑र्षाता॒ परि॑ षदत्सनि॒ष्यन्। अ॒न॒र्वा यच्छ॒तदु॑रस्य॒ वेदो॒ घ्नञ्छि॒श्नदे॑वाँ अ॒भि वर्प॑सा॒ भूत्॥

परमात्मा उपासक को अमृतान्नभोग कराता है, दुष्टों के धन का हरण करता है, व्यभिचारियों चरित्रहीनों को दण्ड देता है, इस प्रकार कर्मफलों को भुगाता है, सारे संसार में व्यापक होकर स्वाधार वर्त्तमान है॥३॥

स य॒ह्व्यो॒३॒॑ऽवनी॒र्गोष्वर्वा जु॑होति प्रध॒न्या॑सु॒ सस्रिः॑। अ॒पादो॒ यत्र॒ युज्या॑सोऽर॒था द्रो॒ण्य॑श्वास॒ ईर॑ते घृ॒तं वाः॥

उपासक आत्मा अनेक आन्तरिक वासनाओं को परमात्मा की स्तुतियों में विलीन कर देता है और जिनसे प्रकृष्ट मोक्षधन प्राप्त होता है, उन उपासनाओं के अन्दर रमण करनेवाला हो जाता है। वह परमात्मा का सच्चा उपासक, जो परमात्मा के ध्यान में कर्मेन्द्रियों के व्यवहारों से रहित विषयों में जानेवाली ज्ञानेन्द्रियों की वृत्तियों से रहित होकर व्यापनेवाली अन्तःकरणवृत्तियों में अन्तर्मुख उपासक वरणीय ब्रह्म तेज को प्राप्त करते हैं॥४॥

स रु॒द्रेभि॒रश॑स्तवार॒ ऋभ्वा॑ हि॒त्वी गय॑मा॒रेअ॑वद्य॒ आगा॑त्। व॒म्रस्य॑ मन्ये मिथु॒ना विव॑व्री॒ अन्न॑म॒भीत्या॑रोदयन्मुषा॒यन्॥

आत्मा स्वरूप से निष्पाप है, परन्तु वासनावश परमात्मा का आश्रय छोड़ कर पाप में प्रवृत्त हो जाता है, प्राणों-इन्द्रियों के सङ्ग से त्यक्त विषयों का पुनः-पुनः वमन की भाँति सेवन करता है, तो संसार में माता-पिताओं को प्राप्त हो रोया करता है बन्धन में आये चोर की भाँति॥५॥

स इद्दासं॑ तुवी॒रवं॒ पति॒र्दन्ष॑ळ॒क्षं त्रि॑शी॒र्षाणं॑ दमन्यत्। अ॒स्य त्रि॒तो न्वोज॑सा वृधा॒नो वि॒पा व॑रा॒हमयो॑अग्रया हन्॥

स्थूल सूक्ष्म कारण शरीरों को प्राप्त होनेवाला आत्मा इन्द्रियों और मन से व्यक्त होनेवाले लोभ, राग, मोहपरायण, निकृष्टभोजी, शूकर की भाँति कामभाव को दमन करता हुआ, वश करता हुआ नष्ट करता है तथा कामभाव को नष्ट करके परमात्मा को प्राप्त करता है॥६॥

स द्रुह्व॑णे॒ मनु॑ष ऊर्ध्वसा॒न आ सा॑विषदर्शसा॒नाय॒ शरु॑म्। स नृत॑मो॒ नहु॑षो॒ऽस्मत्सुजा॑तः॒ पुरो॑ऽभिन॒दर्ह॑न्दस्यु॒हत्ये॑॥

परमात्मा अपने गुणों से सर्वोत्तम है। वह अन्य पर अन्यथा आक्रमणकारी दुष्टजन को घर नगर सहित नष्ट कर देता है॥७॥

सो अ॒भ्रियो॒ न यव॑स उद॒न्यन्क्षया॑य गा॒तुं वि॒दन्नो॑ अ॒स्मे। उप॒ यत्सीद॒दिन्दुं॒ शरी॑रैः श्ये॒नोऽयो॑पाष्टिर्हन्ति॒ दस्यू॑न्॥

कृषक जन मेघ के समान उपकारी होकर कृषि भूमि द्वारा जीवनरक्षणार्थ अन्न को उत्पन्न करता है, वह प्रशंसनीय महानुभाव दुष्काल चोर आदि की वृद्धि नहीं होने देता और स्वयं परमात्मा का प्रिय बनता है॥८॥

स व्राध॑तः शवसा॒नेभि॑रस्य॒ कुत्सा॑य॒ शुष्णं॑ कृ॒पणे॒ परा॑दात्। अ॒यं क॒विम॑नयच्छ॒स्यमा॑न॒मत्कं॒ यो अ॑स्य॒ सनि॑तो॒त नृ॒णाम्॥

परमात्मा विरोधियों को महान् बलों से परास्त करता है, अपने उपासकों से शोषणबलों को दूर रखता है। जो मनुष्य उसका उपासक होता है, वह उस व्यापक परमात्मा को अपने अन्दर साक्षात् करता है॥९॥

अ॒यं द॑श॒स्यन्नर्ये॑भिरस्य द॒स्मो दे॒वेभि॒र्वरु॑णो॒ न मा॒यी। अ॒यं क॒नीन॑ ऋतु॒पा अ॑वे॒द्यमि॑मीता॒ररुं॒ यश्चतु॑ष्पात्॥

परमात्मा ऋतुसंचार करता है, दर्शनीय और वरने के योग्य है, दुष्ट जन को प्राणों से वियुक्त करता है, उपासक ज्ञाता द्वारा चार अवस्थाओं के रूप में साक्षात् होता है, अर्थात् स्थूल जगत् को देखकर, सूक्ष्मजगत् को देखकर प्रकृति को लक्ष्य कर और अपनी आत्मा को लक्ष्य करके जाना जाता है॥१०॥

अ॒स्य स्तोमे॑भिरौशि॒ज ऋ॒जिश्वा॑ व्र॒जं द॑रयद्वृष॒भेण॒ पिप्रोः॑। सुत्वा॒ यद्य॑ज॒तो दी॒दय॒द्गीः पुर॑ इया॒नो अ॒भि वर्प॑सा॒ भूत्॥

ज्ञानादि गुणों को प्राप्त हुआ ज्ञानप्रकाश से सम्पन्न स्तुतिवचनों के द्वारा परमात्मा की स्तुति करता है, तो पुनः-पुनः पालनीय शरीर के इन्द्रियसमूह को चित्तवृत्तिनिरोधरूप सुखवर्षक धर्म से क्षीण सा कर देता है, तब यह समागमकर्ता आत्मा मन बुद्धि चित अहंकार को अपने अनुकूल बना लेता है॥११॥

ए॒वा म॒हो अ॑सुर व॒क्षथा॑य वम्र॒कः प॒ड्भिरुप॑ सर्प॒दिन्द्र॑म्। स इ॑या॒नः क॑रति स्व॒स्तिम॑स्मा॒ इष॒मूर्जं॑ सुक्षि॒तिं विश्व॒माभाः॑॥

भोगों को पुनः-पुनः भोगनेवाला जीवात्मा योगाङ्गों के द्वारा परमात्मा की ओर जाता है, परमात्मा इसे प्राप्त होता हुआ इसके लिये अन्न, रस, निवास और कल्याण तथा सब वस्तु अपने व्यापार पर देता है, इसकी पूर्ण तृप्ति करता है॥१२॥

सूक्तम्

इन्द्र॒ दृह्य॑ मघव॒न्त्वाव॒दिद्भु॒ज इ॒ह स्तु॒तः सु॑त॒पा बो॑धि नो वृ॒धे। दे॒वेभि॑र्नः सवि॒ता प्राव॑तु श्रु॒तमा स॒र्वता॑ति॒मदि॑तिं वृणीमहे॥

परमात्मा समस्त धन ऐश्वर्यों का स्वामी है, वह उपासक आत्मा को सुखभोग के लिए  बढ़ाता है और श्रवण किये ज्ञान की रक्षा करता है, उस जगद्विस्तारक अनश्वर परमात्मा को अपनाना मानना चाहिये॥१॥

भरा॑य॒ सु भ॑रत भा॒गमृ॒त्वियं॒ प्र वा॒यवे॑ शुचि॒पे क्र॒न्ददि॑ष्टये। गौ॒रस्य॒ यः पय॑सः पी॒तिमा॑न॒श आ स॒र्वता॑ति॒मदि॑तिं वृणीमहे॥

परमात्मा पोषणकर्त्ता ज्ञानरस का पिलानेवाला जीवनप्रद है, जो उपासक स्तुति में रत है, यथासमय उपासना करता है, उसके उपासनारस को स्वीकार करता है, उस जगद्विस्तारक अविनाशी का मानना उसकी स्तुति करना अवश्य चाहिए॥२॥

आ नो॑ दे॒वः स॑वि॒ता सा॑विष॒द्वय॑ ऋजूय॒ते यज॑मानाय सुन्व॒ते। यथा॑ दे॒वान्प्र॑ति॒भूषे॑म पाक॒वदा स॒र्वता॑ति॒मदि॑तिं वृणीमहे॥

उत्पादक परमात्मा सरल उपासक आत्मा के लिए ऐसा विज्ञान प्राप्त करता है, जिससे इन्द्रियों को संस्कृत तथा शुभफल भोगवाली बनाया जा सके, उस सर्वजगद्विस्तारक अविनाशी परमात्मा को मानना- अपनाना चाहिये॥३॥

इन्द्रो॑ अ॒स्मे सु॒मना॑ अस्तु वि॒श्वहा॒ राजा॒ सोमः॑ सुवि॒तस्याध्ये॑तु नः। यथा॑यथा मि॒त्रधि॑तानि संद॒धुरा स॒र्वता॑ति॒मदि॑तिं वृणीमहे॥

परमात्मा की स्तुति करने से मन अच्छा बनता है और उसके प्रति किये हुए स्तुतिवचन परमात्मा में संस्थापित कर देते हैं, उस जगद्विस्तारक अविनाशी परमात्मा को मानना और अपनाना चाहिये॥४॥

इन्द्र॑ उ॒क्थेन॒ शव॑सा॒ परु॑र्दधे॒ बृह॑स्पते प्रतरी॒तास्यायु॑षः। य॒ज्ञो मनुः॒ प्रम॑तिर्नः पि॒ता हि क॒मा स॒र्वता॑ति॒मदि॑तिं वृणीमहे॥

परमात्मा शरीर के जोड़ों को जोड़ता है, आयु को बढ़ाता है, सदा समागम के योग्य तथा पितासमान रक्षक है, उस जगद्विस्तारक अनश्वर को मानना और उसकी उपासना करना चाहिए॥५॥

इन्द्र॑स्य॒ नु सुकृ॑तं॒ दैव्यं॒ सहो॒ऽग्निर्गृ॒हे ज॑रि॒ता मेधि॑रः क॒विः। य॒ज्ञश्च॑ भूद्वि॒दथे॒ चारु॒रन्त॑म॒ आ स॒र्वता॑ति॒मदि॑तिं वृणीमहे॥

परमात्मा का ज्ञानबल जीवन्मुक्त विद्वानों के लिए अत्यन्त सुखसम्पादक है, वह उसके साक्षात् करने योग्य हृदय घर में दोषों को नष्ट करनेवाला मेधाप्रद विद्यमान है, उनके द्वारा सङ्गमनीय जीवन में धारण करने योग्य है, उस जगद्विस्तारक अविनाशी को अपनाना चाहिए॥६॥

न वो॒ गुहा॑ चकृम॒ भूरि॑ दुष्कृ॒तं नाविष्ट्यं॑ वसवो देव॒हेळ॑नम्। माकि॑र्नो देवा॒ अनृ॑तस्य॒ वर्प॑स॒ आ स॒र्वता॑ति॒मदि॑तिं वृणीमहे॥

विद्या आदि से बसानेवाले विद्वानों के प्रति दुर्व्यवहार या पाप बाहर या भीतर मन में पापचिन्तन तथा उसका अनादर नहीं करना चाहिए और न कभी असत्य के अपराधी बनें, किन्तु उस जगद्विस्तारक अविनाशी परमात्मा का स्मरण करें॥७॥

अपामी॑वां सवि॒ता सा॑विष॒न्न्य१॒॑ग्वरी॑य॒ इदप॑ सेध॒न्त्वद्र॑यः। ग्रावा॒ यत्र॑ मधु॒षुदु॒च्यते॑ बृ॒हदा स॒र्वता॑ति॒मदि॑तिं वृणीमहे॥

उत्पन्न करनेवाला परमात्मा रोग को अलग करता है, ओषधियों को उत्पन्न करके उपदेशक जन अन्दर से बढ़े-चढ़े पाप को निकालते हैं, परमात्मा की उपासना करनेवाला विद्वान् कहलाता है, उस महान् जगद्विस्तारक अविनाशी परमात्मा को मानना अपनाना चाहिए॥८॥

ऊ॒र्ध्वो ग्रावा॑ वसवोऽस्तु सो॒तरि॒ विश्वा॒ द्वेषां॑सि सनु॒तर्यु॑योत। स नो॑ दे॒वः स॑वि॒ता पा॒युरीड्य॒ आ स॒र्वता॑ति॒मदि॑तिं वृणीमहे॥

ऊँचा विद्वान् वह ही है, जो अपने को परमात्मा में स्थिर करता है और द्वेषभावों को अपने अन्दर ही विलीन कर देता है, परमात्मदेव हमारा स्तुति करने योग्य है, उस जगद्विस्तारक अनश्वर को अपनाना और मानना चाहिये॥९॥

ऊर्जं॑ गावो॒ यव॑से॒ पीवो॑ अत्तन ऋ॒तस्य॒ याः सद॑ने॒ कोशे॑ अ॒ङ्ग्ध्वे। त॒नूरे॒व त॒न्वो॑ अस्तु भेष॒जमा स॒र्वता॑ति॒मदि॑तिं वृणीमहे॥

स्तुतियाँ सत्यस्वरूप परमात्मा के सदन हृदय में एकाङ्ग हो जाती हैं मिल जाती हैं, ऐसे ही आत्मा परमात्मा में मिलकर सुख प्राप्त करता है, उस जगद्विस्तारक अनश्वर को मानना अपनाना चाहिये॥१०॥

क्र॒तु॒प्रावा॑ जरि॒ता शश्व॑ता॒मव॒ इन्द्र॒ इद्भ॒द्रा प्रम॑तिः सु॒ताव॑ताम्। पू॒र्णमूध॑र्दि॒व्यं यस्य॑ सि॒क्तय॒ आ स॒र्वता॑ति॒मदि॑तिं वृणीमहे॥

परमात्मा महाकारवाले पदार्थों को भी जीर्ण करनेवाला उपासकों का रक्षक है, उसकी प्रकृष्ट मति कल्याण करनेवाली, वह उपासकों के लिये अमृत आनन्दपूर्ण महान् पात्र को रखता है, उपासक आत्मा को सिञ्चित करने के लिये उस जगद्विस्तारक अविनाशी को मानना अपनाना चाहिये॥११॥

चि॒त्रस्ते॑ भा॒नुः क्र॑तु॒प्रा अ॑भि॒ष्टिः सन्ति॒ स्पृधो॑ जरणि॒प्रा अधृ॑ष्टाः। रजि॑ष्ठया॒ रज्या॑ प॒श्व आ गोस्तूतू॑र्षति॒ पर्यग्रं॑ दुव॒स्युः॥

परमात्मा की शक्ति का प्रकाश करनेवाले को परमात्मा कर्मफल से भर देता है, उसकी इच्छाएँ  स्तुति करनेवाले को कामनाओं से पूर्ण कर देती हैं, किन्तु स्तुति करनेवाले की स्तुति अति सरल होने पर वह परमात्मा को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है, जैसे गौ की सेवा करनेवाला कोमल डोरी से गौ को अपनी ओर खींच लेता है॥१२॥

उद्बु॑ध्यध्वं॒ सम॑नसः सखायः॒ सम॒ग्निमि॑न्ध्वं ब॒हवः॒ सनी॑ळाः। द॒धि॒क्राम॒ग्निमु॒षसं॑ च दे॒वीमिन्द्रा॑व॒तोऽव॑से॒ नि ह्व॑ये वः॥

जलवृष्टि कराने के लिये बहुत से विद्वान् एक मन एक परमात्मा के आश्रय और एक भावना से एक उच्चध्वनि से मन्त्रोच्चारण करते हुए परमात्मा का ध्यान करें तथा आकाश में मेघों को उड़ाये ले जाते हुए वायु तथा पृथिवी की अग्नि और उषावेला में उनका नियम से उपयोग करें॥१॥

म॒न्द्रा कृ॑णुध्वं॒ धिय॒ आ त॑नुध्वं॒ नाव॑मरित्र॒पर॑णीं कृणुध्वम्। इष्कृ॑णुध्व॒मायु॒धारं॑ कृणुध्वं॒ प्राञ्चं॑ य॒ज्ञं प्र ण॑यता सखायः॥

मनुष्यों को चाहिये कि परमात्मा की स्तुति करते हुए साथ में शिल्प कार्यों को सांसारिक कार्यसिद्धि के लिए, नौकाओं को नदी समुद्र के पार जाने के लिए, शस्त्रास्त्रों के यथावसर संग्राम के लिए, अपने शरीर को समाजसेवा के लिए, यज्ञ को परोपकार के लिए करें॥२॥

यु॒नक्त॒ सीरा॒ वि यु॒गा त॑नुध्वं कृ॒ते योनौ॑ वपते॒ह बीज॑म्। गि॒रा च॑ श्रु॒ष्टिः सभ॑रा॒ अस॑न्नो॒ नेदी॑य॒ इत्सृ॒ण्यः॑ प॒क्वमेया॑त्॥

हल चलाकर भूमि-खेत की क्यारी को तैयार करके बीज बोना पुनः सिञ्चन आदि करके जब अन्न का पौधा बढ़ जावे और बाल अन्न के दानों से भर जाये और पक जाये, तब उसे दराँती से काटकर अन्न प्राप्त करना चाहिये॥३॥

सीरा॑ युञ्जन्ति क॒वयो॑ यु॒गा वि त॑न्वते॒ पृथ॑क्। धीरा॑ दे॒वेषु॑ सुम्न॒या॥

खेती करने में कुशल किसान हलादियों को बैलों के साथ जोड़कर चर्मपट्टियों से बाँधकर खेती जोतें, वे बुद्धिमान् वर्षा के निमित्त वायु में मेघादि देवों के योग का चिन्तन खेती सम्पन्न होने के निमित्त करें, बोने और काटने में इनका ध्यान रखें॥४॥

निरा॑हा॒वान्कृ॑णोतन॒ सं व॑र॒त्रा द॑धातन। सि॒ञ्चाम॑हा अव॒तमु॒द्रिणं॑ व॒यं सु॒षेक॒मनु॑पक्षितम्॥

खेत को सींचने के लिए जलस्थानों को बनाना, उनके जल को रोकने के लिए चारो ओर बाँध बाँधना और ऐसे जलकूप बनाना, जिनका जल ऊपर आता जाये और क्षीण न हो, ऐसे साधनों से खेत को सींचना चाहिये॥५॥

इष्कृ॑ताहावमव॒तं सु॑वर॒त्रं सु॑षेच॒नम्। उ॒द्रिणं॑ सिञ्चे॒ अक्षि॑तम्॥

प्रत्येक किसान को अपने-अपने खेत में जल सींचने के लिये अच्छे जलाशय की व्यवस्था करनी चाहिए॥६॥

प्री॒णी॒ताश्वा॑न्हि॒तं ज॑याथ स्वस्ति॒वाहं॒ रथ॒मित्कृ॑णुध्वम्। द्रोणा॑हावमव॒तमश्म॑चक्र॒मंस॑त्रकोशं सिञ्चता नृ॒पाण॑म्॥

घास आदि से घोड़े आदि पशुओं को तृप्त करना-काष्ठमय पात्रवाले चक्र या व्याप्त गतिवाले चक्र से युक्त कुएँ को बनाना, गतिमय चक्रयन्त्रों से गुप्त स्थान को बनाना खेत सींचना चाहिये॥७॥

व्र॒जं कृ॑णुध्वं॒ स हि वो॑ नृ॒पाणो॒ वर्म॑ सीव्यध्वं बहु॒ला पृ॒थूनि॑। पुरः॑ कृणुध्व॒माय॑सी॒रधृ॑ष्टा॒ मा वः॑ सुस्रोच्चम॒सो दृंह॑ता॒ तम्॥

मनुष्यों को मिलकर देश बसाना और उन्नत बनाना चाहिये। उसके चारों ओर प्रकोटे बनाना तथा उसमें नगरों को बसाना और वस्तुओं का निर्माण करना, भोजनागार तथा अन्नभण्डार भी दृढरूप में बनाना रखना चाहिये॥८॥

आ वो॒ धियं॑ य॒ज्ञियां॑ वर्त ऊ॒तये॒ देवा॑ दे॒वीं य॑ज॒तां य॒ज्ञिया॑मि॒ह। सा नो॑ दुहीय॒द्यव॑सेव ग॒त्वी स॒हस्र॑धारा॒ पय॑सा म॒ही गौः॥

विद्वानों से उपदेशवाणी का श्रवण करना चाहिये, अपनी जीवनरक्षा के लिए बारम्बार उसको स्मरण करना और अपने जीवन में घटाना चाहिये, वह दूध देनेवाली गौ की भाँति अमृत को प्रदान करती है॥९॥

आ तू षि॑ञ्च॒ हरि॑मीं॒ द्रोरु॒पस्थे॒ वाशी॑भिस्तक्षताश्म॒न्मयी॑भिः। परि॑ ष्वजध्वं॒ दश॑ क॒क्ष्या॑भिरु॒भे धुरौ॒ प्रति॒ वह्निं॑ युनक्त॥

प्राण रक्तधाराओं के बहने के स्थान शरीर में हृदय के अन्दर तापहारक परमात्मा के आनन्दरस को सींचना चाहिये तथा स्तुतिवाणियों द्वारा उसका साक्षात् करना चाहिये। पाँच ज्ञानेन्द्रियों, वाणी, और अन्तःकरण-चतुष्टय द्वारा सबको वहन करनेवाले परमात्मा को संसार और मोक्ष में आश्रित करे॥१०॥

उ॒भे धुरौ॒ वह्नि॑रा॒पिब्द॑मानो॒ऽन्तर्योने॑व चरति द्वि॒जानिः॑। वन॒स्पतिं॒ वन॒ आस्था॑पयध्वं॒ नि षू द॑धिध्व॒मख॑नन्त॒ उत्स॑म्॥

परमात्मा संसार और मोक्षधाम दोनों का अधिनायक स्वामी है, उसकी स्तुति प्रार्थना और उपासना करने से संसार का सच्चा सुख और मोक्ष का आनन्द प्राप्त होता है तथा अपने आत्मा का वननीय आश्रय है, हृदय में साक्षात् होनेवाला है॥११॥

कपृ॑न्नरः कपृ॒थमुद्द॑धातन चो॒दय॑त खु॒दत॒ वाज॑सातये। नि॒ष्टि॒ग्र्यः॑ पु॒त्रमा च्या॑वयो॒तय॒ इन्द्रं॑ स॒बाध॑ इ॒ह सोम॑पीतये॥

सुख चाहनेवाला मनुष्य सुखपूर्ण करनेवाले परमात्मा को उत्कृष्ट भावना से अपने अन्दर धारण करें, उसके अन्दर रमण करें, वह परमात्मा निष्पापजन का रक्षक, पीड़ा से बचानेवाला आनन्दरस का देनेवाला है॥१२॥

प्र ते॒ रथं॑ मिथू॒कृत॒मिन्द्रो॑ऽवतु धृष्णु॒या। अ॒स्मिन्ना॒जौ पु॑रुहूत श्र॒वाय्ये॑ धनभ॒क्षेषु॑ नोऽव॥

राजा का संग्राम में विजय करानेवाला रथ-यान-सांग्रामिकयान विद्युत् अग्नि से चलनेवाला योग्य शिल्पी द्वारा बनाया हुआ होना चाहिए, जिससे शत्रुओं पर विजय पा सकें॥१॥

उत्स्म॒ वातो॑ वहति॒ वासो॑ऽस्या॒ अधि॑रथं॒ यदज॑यत्स॒हस्र॑म्। र॒थीर॑भून्मुद्ग॒लानी॒ गवि॑ष्टौ॒ भरे॑ कृ॒तं व्य॑चेदिन्द्रसे॒ना॥

सांग्रामिक रथयान में विद्युत् की तरङ्गशक्ति काम करती है, जो एक यन्त्र की कीली में निहित होती है, उससे यन्त्र संग्राम में गति करता है, तब यान में स्थित वायु उसके आच्छादनपात्र को उभार देता है, तो शत्रु के बहुत बलों को प्रभावित करता है, जीतता है॥२॥

अ॒न्तर्य॑च्छ॒ जिघां॑सतो॒ वज्र॑मिन्द्राभि॒दास॑तः। दास॑स्य वा मघव॒न्नार्य॑स्य वा सनु॒तर्य॑वया व॒धम्॥

मारने की इच्छा रखनेवाले सामने से आकर क्षीण करनेवाले के शस्त्रास्त्र को अपने अधीन कर तथा स्वदेश में बसनेवाले स्वाधीन के या स्वतन्त्र देश में बसनेवाले शत्रु के वधसाधन को विलीन करना-क्षीण करना चाहिये॥३॥

उ॒द्नो ह्र॒दम॑पिब॒ज्जर्हृ॑षाणः॒ कूटं॑ स्म तृं॒हद॒भिमा॑तिमेति। प्र मु॒ष्कभा॑रः॒ श्रव॑ इ॒च्छमा॑नोऽजि॒रं बा॒हू अ॑भर॒त्सिषा॑सन्॥

वृषभ की आकृतिवाला विद्युत्प्रयुक्त यान तीव्र गति को प्राप्त हुआ, जो बहुत बड़े जलभण्डार को पी जाता है और जिसका पीछे का भाग भारी होता है, अपनी शक्ति वेग से पर्वत के शिखर को तोड़ देता है, जो बिजली की दो तरङ्गों को धारण करता है, शत्रु के प्रति भारी आक्रमण करता है, ऐसा यान बनाना चाहिये॥४॥

न्य॑क्रन्दयन्नुप॒यन्त॑ एन॒ममे॑हयन्वृष॒भं मध्य॑ आ॒जेः। तेन॒ सूभ॑र्वं श॒तव॑त्स॒हस्रं॒ गवां॒ मुद्ग॑लः प्र॒धने॑ जिगाय॥

वृषभाकृतिवाले यान के ऊपर सैनिक जन बैठते हैं और उससे घोष कराते हुए भाप की वर्षा कराते हैं, उसमें शतगुणित सहस्रगुणित वृषभों का बल होता है, संग्राम में उसके द्वारा शत्रु के बहुत से धन को जीता जाता है॥५॥

क॒कर्द॑वे वृष॒भो यु॒क्त आ॑सी॒दवा॑वची॒त्सार॑थिरस्य के॒शी। दुधे॑र्यु॒क्तस्य॒ द्रव॑तः स॒हान॑स ऋ॒च्छन्ति॑ ष्मा नि॒ष्पदो॑ मुद्ग॒लानी॑म्॥

गर्वित शत्रु के प्रति वृषभाकृति यान बनाना चाहिये और इसकी विद्युत् सारथि बनकर शत्रु के लिए घोषणा करावे, तीव्र गति से बिजली की तरङ्ग मालाओं को प्राप्त कराना चाहिये, शत्रु पर फेंकना चाहिये॥६॥

उ॒त प्र॒धिमुद॑हन्नस्य वि॒द्वानुपा॑युन॒ग्वंस॑ग॒मत्र॒ शिक्ष॑न्। इन्द्र॒ उदा॑व॒त्पति॒मघ्न्या॑ना॒मरं॑हत॒ पद्या॑भिः क॒कुद्मा॑न्॥

वृषभ आकृतिवाले यान के मुख्य अङ्ग को चालक प्रेरणा करता है, तो विद्युत् अग्नि अपने तरङ्गों के रक्षक पात्र को उत्तेजित करता है, तो वह गतिमान् वृषभयान चलनेवाले गतिचक्रों से चला करता है॥७॥

शु॒नम॑ष्ट्रा॒व्य॑चरत्कप॒र्दी व॑र॒त्रायां॒ दार्वा॒नह्य॑मानः। नृ॒म्णानि॑ कृ॒ण्वन्ब॒हवे॒ जना॑य॒ गाः प॑स्पशा॒नस्तवि॑षीरधत्त॥

वृषभाकृति यान विद्युत् की डोरी में काष्ठ जैसे साधन द्वारा बान्धकर भयङ्कर घोष करता हुआ डाढ़ों के समान लोह कीलवाले चक्रवाला भलीभाँति चलता है, विद्युत् तरङ्गों के योग से बल प्रदर्शित करता हुआ॥८॥

इ॒मं तं प॑श्य वृष॒भस्य॒ युञ्जं॒ काष्ठा॑या॒ मध्ये॑ द्रुघ॒णं शया॑नम्। येन॑ जि॒गाय॑ श॒तव॑त्स॒हस्रं॒ गवां॒ मुद्ग॑लः पृत॒नाज्ये॑षु॥

वृषभ आकृतिवाले यान में एक लघु यन्त्र जिसके अन्दर होता है, उसमें सौ गुणित या सहस्रगुणित साँडों के समान शत्रु के बल को जीतने का सामर्थ्य होता है, उसे चालक चलाया करता है॥९॥

आ॒रे अ॒घा को न्वि१॒॑त्था द॑दर्श॒ यं यु॒ञ्जन्ति॒ तम्वा स्था॑पयन्ति। नास्मै॒ तृणं॒ नोद॒कमा भ॑र॒न्त्युत्त॑रो धु॒रो व॑हति प्र॒देदि॑शत्॥

ऐसा वृषभ आकृतिवाला यान बनाया जाना चाहिये, जिसको देखकर आश्चर्य होता हो, वही जुड़ने का काम करता है, वही यान का काम करता है, उसमें ही बैठा जाता है, उसे अन्य वृषभों की भाँति न घास दिया जाता है खाने को, न पानी दिया जाता है पीने को, किन्तु सङ्केत या प्रेरणा के अनुसार ऊपर उछलता है, यान की धुराओं को चला देता है, चला कर ऊपर ले जाता है॥१०॥

प॒रि॒वृ॒क्तेव॑ पति॒विद्य॑मान॒ट् पीप्या॑ना॒ कूच॑क्रेणेव सि॒ञ्चन्। ए॒षै॒ष्या॑ चिद्र॒थ्या॑ जयेम सुम॒ङ्गलं॒ सिन॑वदस्तु सा॒तम्॥

वृषभ आकृतिवाले यान में गतिक्रमों को आगे-आगे प्रेरित करनेवाली विद्युत्तरङ्ग-माला होती है, वह निरन्तर बढ़ती चली जाती है, जैसे विवाहकाल के अनन्तर स्त्री बढ़ती चली जाती है तथा जैसे रहट से पानी को खेतों में सींचा जाता है, ऐसे वृषभ आकृति यान यन्त्र में शत्रु के क्षेत्र में शस्त्र गिराये जाएँ-गिराये जाते हैं, अन्नादि भोग उत्तम-उत्तम भाग शत्रु के जीते जाते हैं या जीत लिये जावें॥११॥

त्वं विश्व॑स्य॒ जग॑त॒श्चक्षु॑रिन्द्रासि॒ चक्षु॑षः। वृषा॒ यदा॒जिं वृष॑णा॒ सिषा॑ससि चो॒दय॒न्वध्रि॑णा यु॒जा॥

विद्युद्रूप अग्नि समस्त जगत् के नेत्र का-नेत्रज्ञान का दर्शक ज्ञान-विज्ञान को सुझानेवाला और अभीष्ट का वर्षक है, जब यह डोरी के बन्धन में आ जाता है, तो इसकी दो धाराएँ जुड़कर शस्त्रवर्षक हो जाती हैं, युद्ध जीत लिया जाता है॥१२॥

आ॒शुः शिशा॑नो वृष॒भो न भी॒मो घ॑नाघ॒नः क्षोभ॑णश्चर्षणी॒नाम्। सं॒क्रन्द॑नोऽनिमि॒ष ए॑कवी॒रः श॒तं सेना॑ अजयत्सा॒कमिन्द्रः॑॥

राष्ट्र में राजा वह होना चाहिये, जो शीघ्र कार्य करनेवाला प्रतापी वृषभ के समान बल में भयङ्कर शत्रुओं को हताहत करनेवाला, उनको घबरा देनेवाला, संग्राम में हाहाकार मचा देनेवाला, आलस्य प्रमाद से रहित, वीरता में असमान, बहुत सी सेनाओं को एक साथ जीत सकता हो॥१॥

सं॒क्रन्द॑नेनानिमि॒षेण॑ जि॒ष्णुना॑ युत्का॒रेण॑ दुश्च्यव॒नेन॑ धृ॒ष्णुना॑। तदिन्द्रे॑ण जयत॒ तत्स॑हध्वं॒ युधो॑ नर॒ इषु॑हस्तेन॒ वृष्णा॑॥

जो राजा या शासक स्वयं संग्राम में लड़नेवाले शत्रुओं में रोने की गूँज मचा देनेवाला, आलस्यरहित, जयशील, युद्धकुशल, अडिग, शत्रुओं को दबानेवाला शस्त्रधारक, शस्त्रचालक होता है, उसके योद्धा सैनिक युद्ध को जीतते हैं और उस पर अधिकार करते हैं॥२॥

स इषु॑हस्तैः॒ स नि॑ष॒ङ्गिभि॑र्व॒शी संस्र॑ष्टा॒ स युध॒ इन्द्रो॑ ग॒णेन॑। सं॒सृ॒ष्ट॒जित्सो॑म॒पा बा॑हुश॒र्ध्यु१॒॑ग्रध॑न्वा॒ प्रति॑हिताभि॒रस्ता॑॥

राजा ऐसा होना चाहिये, जो विविध शस्त्रास्त्रों से युक्त सैनिकों के द्वारा शत्रु के बल का वश करनेवाला, संग्राम में लड़नेवाला, शत्रु के सैनिक गण से झूझनेवाला, बाहुबल से युक्त, स्वयं उग्र शस्त्रधारी, शस्त्रों को फेंककर शत्रु को विचलित करनेवाला, सम्पर्क में आये शत्रुओं को जीतनेवाला, सोम आदि ओषधियों के सात्त्विक रसादि का सेवन करनेवाला हो॥३॥

बृह॑स्पते॒ परि॑ दीया॒ रथे॑न रक्षो॒हामित्राँ॑ अप॒बाध॑मानः। प्र॒भ॒ञ्जन्त्सेनाः॑ प्रमृ॒णो यु॒धा जय॑न्न॒स्माक॑मेध्यवि॒ता रथा॑नाम्॥

राजा को चाहिये कि भारी सेना को रखे, यान से राष्ट्र में सर्वत्र भ्रमण करे, दुष्टों का नाश करे, शत्रुओं का पीडन करे, शत्रुसेनाओं का मर्दन करते हुए युद्ध द्वारा जीतते हुए प्रजा के रथों-रमणसाधनों की रक्षा करे॥४॥

ब॒ल॒वि॒ज्ञा॒यः स्थवि॑रः॒ प्रवी॑रः॒ सह॑स्वान्वा॒जी सह॑मान उ॒ग्रः। अ॒भिवी॑रो अ॒भिस॑त्वा सहो॒जा जैत्र॑मिन्द्र॒ रथ॒मा ति॑ष्ठ गो॒वित्॥

राजा या शासक राष्ट्रभूमि को प्राप्त करके विमान आदि यान पर यात्रा कर, सेन्यबलों को सम्पन्न करे, राजधर्म में कुशल हो, प्रतापी साहसवान् युद्धकुशल सैनिक से समृद्ध होवे॥५॥

गो॒त्र॒भिदं॑ गो॒विदं॒ वज्र॑बाहुं॒ जय॑न्त॒मज्म॑ प्रमृ॒णन्त॒मोज॑सा। इ॒मं स॑जाता॒ अनु॑ वीरयध्व॒मिन्द्रं॑ सखायो॒ अनु॒ सं र॑भध्वम्॥

शत्रुओं का वंशोच्छेदकर्ता शस्त्रधारी संग्रामजेता प्रहारक राजा होना चाहिए तथा सैनिक जन राष्ट्रिय समृद्धि कार्यों में प्रसिद्ध परस्पर मित्र राजा के अनुसार वीरता दिखाने-वाले उसके अनुशासन को मानते हुए शिविर में तैयार रहने चाहिये॥६॥

अ॒भि गो॒त्राणि॒ सह॑सा॒ गाह॑मानोऽद॒यो वी॒रः श॒तम॑न्यु॒रिन्द्रः॑। दु॒श्च्य॒व॒नः पृ॑तना॒षाळ॑यु॒ध्यो॒३॒॑ऽस्माकं॒ सेना॑ अवतु॒ प्र यु॒त्सु॥

शासक या सेनाध्यक्ष को चाहिये कि युद्ध के अवसर पर शत्रु के सम्बन्ध में दया न करे, किन्तु वीरता दिखाये, बहुत ओजस्वी होकर अपने सभी प्रकार के बल से शत्रु के सैन्य वर्गों पर प्रभाव डालता हुआ विलोडन करे-छिन्न-भिन्न करे, संग्राम में डटनेवाला हो, अन्य को उसके सम्मुख युद्ध करने का साहस न हो, ऐसा युद्धों में लड़नेवाला सेनाओं की रक्षा करे॥७॥

इन्द्र॑ आसां ने॒ता बृह॒स्पति॒र्दक्षि॑णा य॒ज्ञः पु॒र ए॑तु॒ सोमः॑। दे॒व॒से॒नाना॑मभिभञ्जती॒नां जय॑न्तीनां म॒रुतो॑ य॒न्त्वग्र॑म्॥

जिस राष्ट्र में विजय चाहनेवाली, शत्रु का विभञ्जन करनेवाली, जय प्राप्त करने की शक्तिवाली सेनाएँ हों और उसका नेता शासक या सेनापति विद्युत्शक्ति जैसा वीर विद्वान् परोपकारी शान्तस्वभाव हो, तो सैनिक जन युद्ध में आगे बढ़ते चले जाते हैं और अन्त में युद्ध में विजय पाते हैं॥८॥

इन्द्र॑स्य॒ वृष्णो॒ वरु॑णस्य॒ राज्ञ॑ आदि॒त्यानां॑ म॒रुतां॒ शर्ध॑ उ॒ग्रम्। म॒हाम॑नसां भुवनच्य॒वानां॒ घोषो॑ दे॒वानां॒ जय॑ता॒मुद॑स्थात्॥

जो शासक धनैश्वर्यसम्पन्न शस्त्रवर्षक सेनारक्षक होता है तथा जिसके सैनिक संयमी उत्साहवाले प्राणिमात्र को स्वाधीन करनेवाले विजय चाहनेवाले शत्रु पर विजय पाते हुए-पानेवाले होते हैं, उनका बल और उनका जयघोष संग्राम में बढ़ता है और ऊँचे जाता है॥९॥

उद्ध॑र्षय मघव॒न्नायु॑धा॒न्युत्सत्व॑नां माम॒कानां॒ मनां॑सि। उद्वृ॑त्रहन्वा॒जिनां॒ वाजि॑ना॒न्युद्रथा॑नां॒ जय॑तां यन्तु॒ घोषाः॑॥

संग्राम के लिये शासक को चाहिये कि वह शस्त्रों को तीक्ष्ण रखे-तीक्ष्ण बनाये और बलवाले सैनिकों के मन को उभारे, घोड़ों तथा घोड़ेवाले सवारों के बल को पौष्टिक भोजन तथा युद्धशिक्षा देकर बढ़ावे, रथयानों के घोष चलने सम्बन्धी तथा अस्त्र फेंकने सम्बन्धी घोषशब्द आकाश में गूँजें॥१०॥

अ॒स्माक॒मिन्द्रः॒ समृ॑तेषु ध्व॒जेष्व॒स्माकं॒ या इष॑व॒स्ता ज॑यन्तु। अ॒स्माकं॑ वी॒रा उत्त॑रे भवन्त्व॒स्माँ उ॑ देवा अवता॒ हवे॑षु॥

ऐसा प्रयत्न राजा या प्रजा को मिलकर करना चाहिये, जिससे भिन्न-भिन्न देशों या राष्ट्रों की ध्वजाओं में अपनी ध्वजा ऊँची प्रसिद्ध हो, वाणशस्त्र भी अपने सफलरूप में चलें, अपने वीर सैनिक अन्य राष्ट्र के सैनिकों के ऊपर रहें युद्ध करने में, तथा संग्रामों में अपने ही अग्नि विद्युत् आदि देव अस्त्र में प्रयुक्त होकर उनके विद्या के जाननेवाले विद्वान् रक्षा करें॥११॥

अ॒मीषां॑ चि॒त्तं प्र॑तिलो॒भय॑न्ती गृहा॒णाङ्गा॑न्यप्वे॒ परे॑हि। अ॒भि प्रेहि॒ निर्द॑ह हृ॒त्सु शोकै॑र॒न्धेना॒मित्रा॒स्तम॑सा सचन्ताम्॥

संग्राम में शत्रुओं के प्रति ऐसा ओषधियों का अस्त्रप्रयोग धूमरूप या वायुरूप-गैस फेंकना चाहिये, जो मानसिक रोग या भय को उत्पन्न कर दे, उनके मन आदि को दूषित तथा अन्य अङ्गों को निष्क्रिय-शिथिल बना दे, हृदयों को जलादे और घने अन्धकार में हुए जैसे बना दे॥१२॥

प्रेता॒ जय॑ता नर॒ इन्द्रो॑ वः॒ शर्म॑ यच्छतु। उ॒ग्रा वः॑ सन्तु बा॒हवो॑ऽनाधृ॒ष्या यथास॑थ॥

सैनिक जनों को युद्ध के लिए जाने में कोई सङ्कोच नहीं करना चाहिये, किन्तु जाकर विजय पाना चाहिये। सैनिकों की भुजाएँ बलवाली हों और शत्रुओं से वे दबाने जानेवाले-हराये जानेवाले न बनें, राजा को शासक को उनके लिए सब प्रकार के सुख की व्यवस्था करनी चाहिये॥१३॥

असा॑वि॒ सोमः॑ पुरुहूत॒ तुभ्यं॒ हरि॑भ्यां य॒ज्ञमुप॑ याहि॒ तूय॑म्। तुभ्यं॒ गिरो॒ विप्र॑वीरा इया॒ना द॑धन्वि॒र इ॑न्द्र॒ पिबा॑ सु॒तस्य॑॥

जो परमात्मा की उपासना करता है या परमात्मा के लिये उपासनारस समर्पित करता है, परमात्मा अपने कृपाप्रसाद के द्वारा उसका दुःख हरण करता हुआ प्राप्त होता है तथा उसके लिये जो स्तुति करते हैं, वह स्वीकार करता है॥१॥

अ॒प्सु धू॒तस्य॑ हरिवः॒ पिबे॒ह नृभिः॑ सु॒तस्य॑ ज॒ठरं॑ पृणस्व। मि॒मि॒क्षुर्यमद्र॑य इन्द्र॒ तुभ्यं॒ तेभि॑र्वर्धस्व॒ मद॑मुक्थवाहः॥

प्राणायामों के द्वारा प्रेरित मुमुक्षुजनों के द्वारा सम्पादित उपासनारस को परमात्मा स्वीकार करता है और अन्तःकरण को तृप्त करता है तथा स्तुति करनेवाले उपासनारस को परमात्मा में सींचते हैं तो परमात्मा उनके लिये आनन्द को बढ़ाता है॥२॥

प्रोग्रां पी॒तिं वृष्ण॑ इयर्मि स॒त्यां प्र॒यै सु॒तस्य॑ हर्यश्व॒ तुभ्य॑म्। इन्द्र॒ धेना॑भिरि॒ह मा॑दयस्व धी॒भिर्विश्वा॑भिः॒ शच्या॑ गृणा॒नः॥

सब पदार्थों को अपने में रखने के गुणवाला परमात्मा सुखवर्षक है, उसकी तीव्र भावना से सच्ची स्तुति करनी चाहिये, इस प्रकार स्तुति में लाया हुआ परमात्मा उपासक को हर्षित करता है॥३॥

ऊ॒ती श॑चीव॒स्तव॑ वी॒र्ये॑ण॒ वयो॒ दधा॑ना उ॒शिज॑ ऋत॒ज्ञाः। प्र॒जाव॑दिन्द्र॒ मनु॑षो दुरो॒णे त॒स्थुर्गृ॒णन्तः॑ सध॒माद्या॑सः॥

परमात्मा की कर्मशक्ति का अनुभव कर तथा सत्य को समझकर जो स्तुति करनेवाले उस परमात्मा को अपनाते हैं, वे तेरी रक्षा और प्रताप को पाकर पुत्रादि से सम्पन्न घर में रहते हैं॥४॥

प्रणी॑तिभिष्टे हर्यश्व सु॒ष्टोः सु॑षु॒म्नस्य॑ पुरु॒रुचो॒ जना॑सः। मंहि॑ष्ठामू॒तिं वि॒तिरे॒ दधा॑ना स्तो॒तार॑ इन्द्र॒ तव॑ सू॒नृता॑भिः॥

जो मनुष्य सब सुखों के भण्डार ज्ञानप्रकाशक स्तुति करने योग्य की रक्षा-दया के पात्र होकर उसके लिए मधुर वाणियों से गुणगान और स्तुतियों से मान करते हैं, वे संसारसागर को पार करने में समर्थ होते हैं॥५॥

उप॒ ब्रह्मा॑णि हरिवो॒ हरि॑भ्यां॒ सोम॑स्य याहि पी॒तये॑ सु॒तस्य॑। इन्द्र॑ त्वा य॒ज्ञः क्षम॑माणमानड्दा॒श्वाँ अ॑स्यध्व॒रस्य॑ प्रके॒तः॥

वैदिक वचनों द्वारा परमात्मा की स्तुति प्रार्थना करनी चाहिए। वह अपने कृपाप्रसाद से स्वीकार करके हररूप में अपना आनन्द प्रदान करता है॥६॥

स॒हस्र॑वाजमभिमाति॒षाहं॑ सु॒तेर॑णं म॒घवा॑नं सुवृ॒क्तिम्। उप॑ भूषन्ति॒ गिरो॒ अप्र॑तीत॒मिन्द्रं॑ नम॒स्या ज॑रि॒तुः प॑नन्त॥

परमात्मा बहुत बलवान्, अभिमानी को दबानेवाला, किसी से आक्रमण अयोग्य, प्रेरणारहित है, स्तुति करनेवाले अपनी स्तुतियों से उसे प्रसिद्ध करते हैं, वह स्तुति के योग्य है, उसकी स्तुति करनी चाहिए॥७॥

स॒प्तापो॑ दे॒वीः सु॒रणा॒ अमृ॑क्ता॒ याभिः॒ सिन्धु॒मत॑र इन्द्र पू॒र्भित्। न॒व॒तिं स्रो॒त्या नव॑ च॒ स्रव॑न्तीर्दे॒वेभ्यो॑ गा॒तुं मनु॑षे च विन्दः॥

परमात्मा आप्त मनुष्यों के मन आदि को वृत्तिरहित करके छिन्न-भिन्न कर देता है, जीवन्मुक्तों को संसारसागर से पार करता है और आत्मशक्ति को झिरानेवाली पाँच ज्ञानेन्द्रियों की वृत्ति और चार मन बुद्धि चित्त अहङ्कार बहती नदी के समान इन नौ वृत्तियों से भी पार कराता है तथा जीवन्मार्ग को प्राप्त कराता है॥८॥

अ॒पो म॒हीर॒भिश॑स्तेरमु॒ञ्चोऽजा॑गरा॒स्वधि॑ दे॒व एकः॑। इन्द्र॒ यास्त्वं वृ॑त्र॒तूर्ये॑ च॒कर्थ॒ ताभि॑र्वि॒श्वायु॑स्त॒न्वं॑ पुपुष्याः॥

परमात्मा आप्त जनों-जीवन्मुक्त उपासक जनों को मृत्यु से बचाता है और उन्हें अज्ञान नष्ट करने को समर्थ करता है, उन्हें पदे पदे सावधान करता है-जगाता है, आयुपर्यन्त शरीर को समृद्ध करता है॥९॥

वी॒रेण्यः॒ क्रतु॒रिन्द्रः॑ सुश॒स्तिरु॒तापि॒ धेना॑ पुरुहू॒तमी॑ट्टे। आर्द॑यद्वृ॒त्रमकृ॑णोदु लो॒कं स॑सा॒हे श॒क्रः पृत॑ना अभि॒ष्टिः॥

परमात्मा प्राणपोषक सर्वकर्मसमर्थ है, उसके स्वरूप को वेदवाणी वर्णन करती है, वह अज्ञाननाशक और ज्ञानप्रकाशक और विरोधी प्रवृत्तियों पर अधिकार करनेवाला है॥१०॥

शु॒नं हु॑वेम म॒घवा॑न॒मिन्द्र॑म॒स्मिन्भरे॒ नृत॑मं॒ वाज॑सातौ। शृ॒ण्वन्त॑मु॒ग्रमू॒तये॑ स॒मत्सु॒ घ्नन्तं॑ वृ॒त्राणि॑ सं॒जितं॒ धना॑नाम्॥

जीवनसंग्राम में अन्नभोगप्राप्ति की आवश्यकता को पूरी करनेवाले प्रसिद्ध नायक प्रतापी तापनाशक परमात्मा का स्मरण करना चाहिए॥१८॥

क॒दा व॑सो स्तो॒त्रं हर्य॑त॒ आव॑ श्म॒शा रु॑ध॒द्वाः। दी॒र्घं सु॒तं वा॒ताप्या॑य॥

संसार में और मोक्ष में बसानेवाले परमात्मा से स्तुतिवचनों द्वारा प्रार्थना करनी चाहिए कि जो शरीर में वीर्य का स्तम्भन करनेवाली नाड़ी से जो अलौकिक बल प्राप्त होता है, उससे सुखदर्शन कभी न कभी देने की कृपा करे, निश्चय वह दर्शन देगा॥१॥

हरी॒ यस्य॑ सु॒युजा॒ विव्र॑ता॒ वेरर्व॒न्तानु॒ शेपा॑। उ॒भा र॒जी न के॒शिना॒ पति॒र्दन्॥

स्तुति को परमात्मा चाहता है, उसके कृपा प्रसाद दो गुण स्तुति करनेवाले के लिये मनोरञ्जकरूप में उसे प्राप्त होते हैं, परमात्मा अपने दर्शन स्तुतिकर्त्ता को देता है ॥२॥

अप॒ योरिन्द्रः॒ पाप॑ज॒ आ मर्तो॒ न श॑श्रमा॒णो बि॑भी॒वान्। शु॒भे यद्यु॑यु॒जे तवि॑षीवान्॥

परमात्मा पापी जन के लिए क्रोध करता हुआ भय देनेवाला हानिकारक होता है, शुभ कर्मकर्ता के लिये बल देता और उसके साथ योग करता है॥३॥

सचा॒योरिन्द्र॒श्चर्कृ॑ष॒ आँ उ॑पान॒सः स॑प॒र्यन्। न॒दयो॒र्विव्र॑तयोः॒ शूर॒ इन्द्रः॑॥

स्तुति करनेवाले जन का परमात्मा समीपवर्ती है तथा उसके दिए वेद के वक्ता श्रोता मनुष्यों के दोषों का पुनः-पुनः शोधन करने के लिए जो यात्न करते हैं, उनको भी प्रगति देनेवाला है॥४॥

अधि॒ यस्त॒स्थौ केश॑वन्ता॒ व्यच॑स्वन्ता॒ न पु॒ष्ट्यै। व॒नोति॒ शिप्रा॑भ्यां शि॒प्रिणी॑वान्॥

जैसे सूर्य और चन्द्रमा प्रकाशवाले पदार्थ वस्तुओं को व्यक्त करते हैं, ऐसे ही परमात्मा के उत्पादन और धारण धर्म संसार को प्रकट करने में निमित्त हैं, परमात्मा व्यापन शक्तिवाला इन दो व्यापन धर्मों को संसार की वृद्धि के लिए अधिकृत कर रहा है॥५॥

प्रास्तौ॑दृ॒ष्वौजा॑ ऋ॒ष्वेभि॑स्त॒तक्ष॒ शूरः॒ शव॑सा। ऋ॒भुर्न क्रतु॑भिर्मात॒रिश्वा॑॥

महान् ओजस्वी परमात्मा अपने महान् गुणों से स्तुत किया जाना चाहिए, वह अपने बल से जगत् को रचता है और विविध कर्मों द्वारा महान् आकाश में भी व्यापनेवाला परमात्मा भासित होता है॥६॥

वज्रं॒ यश्च॒क्रे सु॒हना॑य॒ दस्य॑वे हिरीम॒शो हिरी॑मान्। अरु॑तहनु॒रद्भु॑तं॒ न रजः॑॥

परमात्मा दुःख हरण गुणवाला तेजस्वी अनन्त आकाश जैसा व्यापक शक्तिवाला अबाध्य शस्त्रवाला दुष्टजन को सुगमता से नष्ट करनेवाला  है, उसका भय कर पाप न करना चाहिये॥७॥

अव॑ नो वृजि॒ना शि॑शीह्यृ॒चा व॑नेमा॒नृचः॑। नाब्र॑ह्मा य॒ज्ञ ऋध॒ग्जोष॑ति॒ त्वे॥

परमात्मा की उपासना करनेवाले पापों से बचे रहते हैं और वे मन्त्ररहितों को मन्त्र का उपदेश करें तथा यज्ञ भी स्वयं तथा अन्य को मन्त्रों द्वारा करना-कराना चाहिये, मन्त्ररहित केवल यज्ञ शुष्क भोजन के समान होता है-ऐसे यज्ञ करनेवाले को परमात्मा अपना कृपापात्र नहीं बनाता॥८॥

ऊ॒र्ध्वा यत्ते॑ त्रे॒तिनी॒ भूद्य॒ज्ञस्य॑ धू॒र्षु सद्म॑न्। स॒जूर्नावं॒ स्वय॑शसं॒ सचा॒योः॥

अध्यात्मयज्ञ की स्तुति, प्रार्थना, उपासना प्रक्रियात्रयी परमात्मा को धारण करनेवाले उपासकों के हृदय में उत्कृष्टरूप में बैठ जाती है, उपासक के लिए संसारसागर से पार जाने को नौका के समान है, जो उसका साथी हो जाती है॥९॥

श्रि॒ये ते॒ पृश्नि॑रुप॒सेच॑नी भूच्छ्रि॒ये दर्वि॑ररे॒पाः। यया॒ स्वे पात्रे॑ सि॒ञ्चस॒ उत्॥

परमात्मा ने संसार की समृद्धि के लिए समृद्ध करनेवाला जलवर्षक मेघयुक्त द्युलोक को बनाया तथा कृषि करने के लिए विदीर्ण करने योग्य जलसिञ्चन के पात्रभूत तथा लोकसमृद्धि के लिए पृथिवी को सींचता है, उसको मानना चाहिये, गुणगान करना चाहिये॥१०॥

श॒तं वा॒ यद॑सुर्य॒ प्रति॑ त्वा सुमि॒त्र इ॒त्थास्तौ॑द्दुर्मि॒त्र इ॒त्थास्तौ॑त्। आवो॒ यद्द॑स्यु॒हत्ये॑ कुत्सपु॒त्रं प्रावो॒ यद्द॑स्यु॒हत्ये॑ कुत्सव॒त्सम्॥

परमात्मा प्राणधारी जीव के लिए हितकर है। यद्यपि परमात्मा स्नेहकर्ता आस्तिक स्तोता में और न स्नेह करनेवाले नास्तिक दिखावे की स्तुति करनेवाले में इस प्रकार दोनों में पापी के नष्ट करने का प्रसङ्ग आता है, तो वह अत्यन्त स्तुति करनेवाले की रक्षा करता है, यह उसका स्वभाव है॥११॥

उ॒भा उ॑ नू॒नं तदिद॑र्थयेथे॒ वि त॑न्वाथे॒ धियो॒ वस्त्रा॒पसे॑व। स॒ध्री॒ची॒ना यात॑वे॒ प्रेम॑जीगः सु॒दिने॑व॒ पृक्ष॒ आ तं॑सयेथे॥

सुशिक्षित स्त्री-पुरुष गृहस्थ में या अध्यापक-उपदेशक विद्याप्रचार में लगे हुए संतानों या शिष्यों का विस्तार करते हुए भोजन या ज्ञान को संस्कृत करते हुए यात्रा करते हुए भी परमात्मा की स्तुति प्रार्थना करते रहें॥१॥

उ॒ष्टारे॑व॒ फर्व॑रेषु श्रयेथे प्रायो॒गेव॒ श्वात्र्या॒ शासु॒रेथः॑। दू॒तेव॒ हि ष्ठो य॒शसा॒ जने॑षु॒ माप॑ स्थातं महि॒षेवा॑व॒पाना॑त्॥

सुशिक्षित स्त्री-पुरुषों को चाहिए कि विषय-काम दाह से बचने के लिए अध्यात्म चर्चावाले महात्माओं के आश्रम में आश्रय लें, सन्तानधन से पूर्ण हुए गृहस्थधर्म के उपदेशक के पास जाएँ,  गृहस्थ चलाने का उपदेश लें, अपने सद्गुणों के यश से मानव समाज के प्रिय बनें और जहाँ ज्ञानामृत का पान मिले, वहाँ आश्रय लें॥२॥

सा॒कं॒युजा॑ शकु॒नस्ये॑व प॒क्षा प॒श्वेव॑ चि॒त्रा यजु॒रा ग॑मिष्टम्। अ॒ग्निरि॑व देव॒योर्दी॑दि॒वांसा॒ परि॑ज्मानेव यजथः पुरु॒त्रा॥

गृहस्थ में सुशिक्षित स्त्री-पुरुष एक मनवाले यज्ञकर्म का आचरण करनेवाले मिलकर गृहस्थकार्य सञ्चालन करनेवाले होवें॥३॥

आ॒पी वो॑ अ॒स्मे पि॒तरे॑व पु॒त्रोग्रेव॑ रु॒चा नृ॒पती॑व तु॒र्यै। इर्ये॑व पु॒ष्ट्यै कि॒रणे॑व भु॒ज्यै श्रु॑ष्टी॒वाने॑व॒ हव॒मा ग॑मिष्टम्॥

द्युलोक पृथिवलोक माता पिता के समान अन्न भोजनरस भोजन देनेवाले हैं, उनसे ऐसा लाभ लेना चाहिये, सूर्य और चन्द्रमा पुत्र के समान रक्षक और प्रियकारी हैं, उनसे लाभ लेना चाहिये, दिन-रात राजा-रानी के समान इष्ट सिद्धि करनेवाले हैं, उनसे लाभ लेना चाहिये, प्राण-अपान जीवन पुष्टि देनेवाले हैं, अन्न के आधार पर अच्छा पौष्टिक भोजन करना चाहिये, सभापति और सेनापति सेना प्रजा का पालन करनेवाले होते हैं शुक्लभा और कृष्णभा किरणों के समान, उनसे लाभ लेना चाहिये अनुकूल आचरण करके, शीघ्र मार्गव्यापन करनेवाले घोड़ों के समान ऋत्विक् व पुरोहित हैं यज्ञ करनेवाले इनसे लाभ लेना चाहिये यज्ञ में बुलाकर॥४॥

वंस॑गेव पूष॒र्या॑ शि॒म्बाता॑ मि॒त्रेव॑ ऋ॒ता श॒तरा॒ शात॑पन्ता। वाजे॑वो॒च्चा वय॑सा घर्म्ये॒ष्ठा मेषे॑वे॒षा स॑प॒र्या॒३॒॑ पुरी॑षा॥

अध्यापक और उपदेशक ज्ञान की वृद्धि करानेवाले, सुख का प्रवाह बहानेवाले, ज्ञानवान् बहुत ज्ञानदाता, बहुत स्तुति, प्रशंसायोग्य, ज्ञानबल से उत्कृष्ट, योग में स्थित सेवनीय और पोषणीय हैं, उनका सङ्ग करना चाहिये॥५॥

सृ॒ण्ये॑व ज॒र्भरी॑ तु॒र्फरी॑तू नैतो॒शेव॑ तु॒र्फरी॑ पर्फ॒रीका॑। उ॒द॒न्य॒जेव॒ जेम॑ना मदे॒रू ता मे॑ ज॒राय्व॒जरं॑ म॒रायु॑॥

मनुष्यों के बीच में दो प्रकार के वैद्य होने चाहिए, एक शल्यचिकित्सक और दूसरा ओषधिचिकित्सक, जैसे खेत को काटने के लिये दो दराँती होती हैं, एक प्रतिकूल वस्तु को काट कर फेंक देनेवाली और दूसरी अनकूल-उपादेय वस्तु को काटकर लेनेवाली होती है, ऐसे ही दोनों वैद्य प्रहारक शस्त्र दूसरे शरीर के दोष को उखाड़कर बाहर फेंक देता है व दूसरा ओषधि से स्वास्थ्यगुणों को अन्दर ले आता है, ये दोनों बहुमूल्य सामुद्रिक रत्न की भाँति हैं, जो शरीर को जरा से दूर करते हैं॥६॥

प॒ज्रेव॒ चर्च॑रं॒ जारं॑ म॒रायु॒ क्षद्मे॒वार्थे॑षु तर्तरीथ उग्रा। ऋ॒भू नाप॑त्खरम॒ज्रा ख॒रज्रु॑र्वा॒युर्न प॑र्फरत्क्षयद्रयी॒णाम्॥

शरीर क्षणभङ्गुर जरा को प्राप्त होनेवाला मरणधर्मी है, फिर इन्द्रियों के विषय में ऐसा पड़ा रहता है, जैसे जलों में डूबने को कोई पड़ा रहता है, इसे अध्यात्म-चिकित्सक और अध्यात्म-उपदेशक याद कराते हैं तथा शरीर-चिकित्सक वैद्य इसे रथ के पुनः मरम्मत करनेवाले शिल्पियों के समान स्वस्थ करते हैं॥७॥

घ॒र्मेव॒ मधु॑ ज॒ठरे॑ स॒नेरू॒ भगे॑विता तु॒र्फरी॒ फारि॒वार॑म्। प॒त॒रेव॑ चच॒रा च॒न्द्रनि॑र्णि॒ङ्मन॑ऋङ्गा मन॒न्या॒३॒॑ न जग्मी॑॥

सभापति और सेनापति राष्ट्र में प्रजाजनों के लिये अन्नादि खाद्य पदार्थों की उचित व्यवस्था करनेवाले राष्ट्रवैभव के रक्षक, शत्रु के लिए शस्त्रधारण करने में समर्थ, राष्ट्र की राजनीति के मनन करने में सफल तथा सर्वत्र प्रगति करने योग्य हों॥८॥

बृ॒हन्ते॑व ग॒म्भरे॑षु प्रति॒ष्ठां पादे॑व गा॒धं तर॑ते विदाथः। कर्णे॑व॒ शासु॒रनु॒ हि स्मरा॒थोंऽशे॑व नो भजतं चि॒त्रमप्नः॑॥

समाज के अन्दर अध्यापक उपदेशक गम्भीर जलों में जैसे ऊँचे व्यक्ति प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं, ऐसे विद्याविषयों  में प्रतिष्ठा प्राप्त करनेवाले हों और अन्तिम लक्ष्य ब्रह्म को जाननेवाले हों, सर्वशासक परमात्मा के आदेश का प्रचार करनेवाले हों तथा हमारे सेवाकर्म या उपहारकर्म को सेवन करके हमें उपदेश देते रहें॥९॥

आ॒र॒ङ्ग॒रेव॒ मध्वेर॑येथे सार॒घेव॒ गवि॑ नी॒चीन॑बारे। की॒नारे॑व॒ स्वेद॑मासिष्विदा॒ना क्षामे॑वो॒र्जा सू॑यव॒सात्स॑चेथे॥

अध्यापक उपदेशक अपने मधुर अध्यापन मधुरभाषण शब्दों द्वारा मानवसमाज को तृप्त करते हैं, मधुमक्खियाँ जैसे मधु से तृप्त करती हैं और वे अध्यापन प्रवचन करने में श्रमिक जनों की भाँति अपने को श्रान्त कर देवें, पृथिवी जैसे अन्न की खेती से हरी-भरी हो जाती है, ऐसे ही अध्यापक उपदेशक मानवप्रजा को ज्ञानामृत से हरी-भरी कर देवें॥१०॥

ऋ॒ध्याम॒ स्तोमं॑ सनु॒याम॒ वाज॒मा नो॒ मन्त्रं॑ स॒रथे॒होप॑ यातम्। यशो॒ न प॒क्वं मधु॒ गोष्व॒न्तरा भू॒तांशो॑ अ॒श्विनोः॒ काम॑मप्राः॥

मनुष्य ज्ञान के स्तर को बढ़ावें, आत्मबल तथा कार्यबल को जीवन में घटावें, इसके लिए अध्यापक और उपदेशकों को ज्ञानसदन सम्मलेन में बुलाकर उनके पके हुए अन्न की भाँति मन आदि में वह सर्वविषयक ज्ञानसार सब कमनीय क्रियाओं का साधनेवाला है, उसे ग्रहण करें॥११॥

आ॒विर॑भू॒न्महि॒ माघो॑नमेषां॒ विश्वं॑ जी॒वं तम॑सो॒ निर॑मोचि। महि॒ ज्योतिः॑ पि॒तृभि॑र्द॒त्तमागा॑दु॒रुः पन्था॒ दक्षि॑णाया अदर्शि॥

सूर्य जब उदय होता है, रश्मियों का प्रकाश प्रकट होता है, अन्धकार से प्रत्येक वस्तु निर्मुक्त हो जाती है, सूर्योदय के अनन्तर ही यज्ञ किया जाता है और दक्षिणा दी जाती है एवं राजा जब राजसूययज्ञ करके राजारूप में प्रसिद्ध होता है, तो सभासदों द्वारा राजपद घोषित किया जाता है, प्रजाजन अन्याय अन्धकार से मुक्त हो जाता है और राजसूययज्ञ में पुरोहितों तथा अधिकारियों को दक्षिणा तथा अधिकार दक्षिणा दी जाती है॥१॥

उ॒च्चा दि॒वि दक्षि॑णावन्तो अस्थु॒र्ये अ॑श्व॒दाः स॒ह ते सूर्ये॑ण। हि॒र॒ण्य॒दा अ॑मृत॒त्वं भ॑जन्ते वासो॒दाः सो॑म॒ प्र ति॑रन्त॒ आयुः॑॥

दक्षिणा देनेवालों का आत्मा ऊँचा हो जाता है, यात्रा के साधनों को देनेवाले परमात्मा की प्रेरणा पाते हैं, ज्ञानामृत के प्रदान करनेवाले मोक्षप्रद को प्राप्त होते हैं, वस्त्र मकान शरण देनेवाले अपना और अन्यों के जीवन को बढाते हैं॥२॥

दैवी॑ पू॒र्तिर्दक्षि॑णा देवय॒ज्या न क॑वा॒रिभ्यो॑ न॒हि ते पृ॒णन्ति॑। अथा॒ नरः॒ प्रय॑तदक्षिणासोऽवद्यभि॒या ब॒हवः॑ पृणन्ति॥

यज्ञ आदि शुभकर्म प्रवचन श्रवण करके पुरोहित आदि विद्वानों को दक्षिणा अवश्य देनी चाहिए, परमात्मदेव संगति का स्थूल साधन है, कामना पूर्ण करनेवाली दैवी शक्ति है, जो अपने धन से अन्य का हित नहीं साधते, वे तो पापी हैं, उनकी कामना पूर्ण नहीं करती है, निन्दा के भय से देना भी श्रेष्ठ है, न देनेवालों से अच्छे हैं॥३॥

श॒तधा॑रं वा॒युम॒र्कं स्व॒र्विदं॑ नृ॒चक्ष॑स॒स्ते अ॒भि च॑क्षते ह॒विः। ये पृ॒णन्ति॒ प्र च॒ यच्छ॑न्ति संग॒मे ते दक्षि॑णां दुहते स॒प्तमा॑तरम्॥

भौतिकविज्ञानवेत्ता जन जानते हैं कि जगत् में जीवनरस के नायक वायु और सूर्य हैं, जो शरीरस्थ नाड़ियों में प्रगति तथा उत्तेजना देनेवाले हैं। उनको उपयोगी बनाने के लिए अग्नि में होमद्रव्य से होम करना चाहिए तथा विद्वानों के उपदेशश्रवण के प्रसङ्ग में उनको अच्छे भोजन से तृप्त करना धन आदि देना चाहिए। यह ऐसी दक्षिणा रस रक्त आदि सप्त धातुओं की निर्माण करनेवाली शक्ति मानो दान दी जाती है ॥४॥

दक्षि॑णावान्प्रथ॒मो हू॒त ए॑ति॒ दक्षि॑णावान्ग्राम॒णीरग्र॑मेति। तमे॒व म॑न्ये नृ॒पतिं॒ जना॑नां॒ यः प्र॑थ॒मो दक्षि॑णामावि॒वाय॑॥

अधिकारी पात्र को दक्षिणा देनेवाला सर्वप्रथम दक्षिणा देकर मनुष्यों द्वारा आमन्त्रित किया जाता है-सम्मनित किया जाता है। ग्राम नगर में  नेता बनकर अग्रासन होता है, वह मनुष्यों का पालक होकर लोगों के हृदय में बैठ जाता है, अतः पात्र को दक्षिणा देनी चाहिए॥५॥

तमे॒व ऋषिं॒ तमु॑ ब्र॒ह्माण॑माहुर्यज्ञ॒न्यं॑ साम॒गामु॑क्थ॒शास॑म्। स शु॒क्रस्य॑ त॒न्वो॑ वेद ति॒स्रो यः प्र॑थ॒मो दक्षि॑णया र॒राध॑॥

जो यजमान यज्ञ में दक्षिणा देकर विद्वान् की कामना को पूरा करता है, मानो वह यज्ञ का ब्रह्मा है, अध्वर्यु है, उद्गाता है, होता है, उसकी दक्षिणा द्वारा ही ये चारों ऋत्विज् यज्ञ का कार्य करते हैं। वह ऐसा दानी ‘ओम्’ नाम के परमात्मा की अवस्थाओं को जो अ, उ, म् एवं इति मात्राएँ कहलाती हैं, उन्हें जानता है, जानने में समर्थ होता है॥६॥

दक्षि॒णाश्वं॒ दक्षि॑णा॒ गां द॑दाति॒ दक्षि॑णा च॒न्द्रमु॒त यद्धिर॑ण्यम्। दक्षि॒णान्नं॑ वनुते॒ यो न॑ आ॒त्मा दक्षि॑णां॒ वर्म॑ कृणुते विजा॒नन्॥

दक्षिणा में घोड़ा, गौ, चाँदी, सोना अन्न देना श्रेयस्कर है, इस प्रकार दक्षिणा देनेवाला अन्य जनों का आत्मा बन जाता है, उसे कोई पीड़ा नहीं पहुँचाता है तथा उसको दक्षिणा देना उसके लिए पापनिवारक कवच बन जाता है॥७॥

न भो॒जा म॑म्रु॒र्न न्य॒र्थमी॑यु॒र्न रि॑ष्यन्ति॒ न व्य॑थन्ते ह भो॒जाः। इ॒दं यद्विश्वं॒ भुव॑नं॒ स्व॑श्चै॒तत्सर्वं॒ दक्षि॑णैभ्यो ददाति॥

दूसरों को पालनेवाले जन दक्षिणा आदि देकर के नहीं मरते हैं, जैसे अन्य धनी चोरादि द्वारा मारे जाते हैं। उनका नाम संसार में देर तक रहता है, वे दरिद्रता को प्राप्त नहीं होते, आवश्यकता के अनुसार उन्हें सब कुछ मिल जाता है। दक्षिणा दक्षिणा देनेवालों के लिए सब कुछ सांसारिक व पारलौकिक सुख दे देती है॥८॥

भो॒जा जि॑ग्युः सुर॒भिं योनि॒मग्रे॑ भो॒जा जि॑ग्युर्व॒ध्वं१॒॑ या सु॒वासाः॑। भो॒जा जि॑ग्युरन्तः॒पेयं॒ सुरा॑या भो॒जा जि॑ग्यु॒र्ये अहू॑ताः प्र॒यन्ति॑॥

अन्यों का दक्षिणा से पालन करनेवाले जन अच्छे सुरम्य सुगन्धयुक्त सदन को प्राप्त होते हैं, सुन्दर वस्त्रादियुक्त वधू को विवाहते हैं। पत्नी के अन्तर्भाव का या एकान्त समागम का आनन्द प्राप्त करते हैं, बिना बुलाये हुओं का हृदय जीतते हैं॥९॥

भो॒जायाश्वं॒ सं मृ॑जन्त्या॒शुं भो॒जाया॑स्ते क॒न्या॒३॒॑ शुम्भ॑माना। भो॒जस्ये॒दं पु॑ष्क॒रिणी॑व॒ वेश्म॒ परि॑ष्कृतं देवमा॒नेव॑ चि॒त्रम्॥

अन्यों का पालन करने के लिये सवारी करने को सुसज्जित घोड़ा, सुन्दर यौवनसम्पन्न कुमारी विवाह करने को, कमल जलस्थली के समान गृह दर्शनीय होता है रहने को॥१०॥

भो॒जमश्वाः॑ सुष्ठु॒वाहो॑ वहन्ति सु॒वृद्रथो॑ वर्तते॒ दक्षि॑णायाः। भो॒जं दे॑वासोऽवता॒ भरे॑षु भो॒जः शत्रू॑न्त्समनी॒केषु॒ जेता॑॥

जो राजा पालनकर्त्ता होता है, उसे घोड़े अच्छी सवारी देते हैं। अच्छी दक्षिणा शिल्पियों को देनी चाहिये, जिससे अच्छा यान बनाएँ। संग्रामों में सैनिक पालन करनेवाले राजा की रक्षा करते हैं, पालन करनेवाले ही परस्पर लड़नेवालों में शत्रुओं को जीतने का शील रखता है॥११॥

किमि॒च्छन्ती॑ स॒रमा॒ प्रेदमा॑नड्दू॒रे ह्यध्वा॒ जगु॑रिः परा॒चैः। कास्मेहि॑तिः॒ का परि॑तक्म्यासीत्क॒थं र॒साया॑ अतरः॒ पयां॑सि॥

वैज्ञानिक वृष्टिविज्ञान के वेत्ता को विचार करना चाहिए कि मेघ के अन्दर गर्जना मेघधारा के-जलों को पार करती हुई चली जाती है। इसका लक्ष्य क्या है? यह गर्जना क्यों होती है? इसमें मानवों का हित क्या है?॥१॥आध्यात्मिकयोजना−एक देह से दूसरे देह में सरणशील-गमनशील चेतना-चेतनाशक्ति आत्मा कुछ चाहती हुई-मोक्ष चाहती हुई-शरीर में प्राप्त हुई, उसका मार्ग विषयभोगों से दूर है। शरीर में प्राणों का हित क्या है? चेतना के प्राप्त होने पर माता के रस रक्त नदी को पार करके प्रकट हुई गर्भाशय को पार करके बाहर आई है॥१॥

इन्द्र॑स्य दू॒तीरि॑षि॒ता च॑रामि म॒ह इ॒च्छन्ती॑ पणयो नि॒धीन्वः॑। अ॒ति॒ष्कदो॑ भि॒यसा॒ तन्न॑ आव॒त्तथा॑ र॒साया॑ अतरं॒ पयां॑सि॥

मेघों की गर्जना विद्युद्देव के द्वारा प्रेरित हुई मेघधारा को चीरती हुई चलती है, मेघों के अन्दर वर्तमान सूर्य की रश्मियों में साथ में जल छिपे रहते हैं, उसके बाहर निकल जाने के लिये गर्जना होती है॥२॥

की॒दृङ्ङिन्द्रः॑ सरमे॒ का दृ॑शी॒का यस्ये॒दं दू॒तीरस॑रः परा॒कात्। आ च॒ गच्छा॑न्मि॒त्रमे॑ना दधा॒माथा॒ गवां॒ गोप॑तिर्नो भवाति॥

शक्तिशाली विद्युत् की प्रेरित गर्जना है, विद्युत् को शक्तशाली सिद्ध करती है, जो मेघों में गृहरश्मियों जलों को बाहिर कर सकता है॥३॥

नाहं तं वे॑द॒ दभ्यं॒ दभ॒त्स यस्ये॒दं दू॒तीरस॑रं परा॒कात्। न तं गू॑हन्ति स्र॒वतो॑ गभी॒रा ह॒ता इन्द्रे॑ण पणयः शयध्वे॥

विद्युत् में इतनी शक्ति है कि उसकी ताड़ना से जल भरे मेघ जल बरसाते हुए लीन हो जाते हैं॥४॥

इ॒मा गावः॑ सरमे॒ या ऐच्छः॒ परि॑ दि॒वो अन्ता॑न्त्सुभगे॒ पत॑न्ती। कस्त॑ एना॒ अव॑ सृजा॒दयु॑ध्व्यु॒तास्माक॒मायु॑धा सन्ति ति॒ग्मा॥

अधिकार में आई वस्तु को बिना संघर्ष करे कोई त्यागता नहीं, यह बात यहाँ आलङ्कारिक संवाद में दर्शायी गई है॥५॥

अ॒से॒न्या वः॑ पणयो॒ वचां॑स्यनिष॒व्यास्त॒न्वः॑ सन्तु पा॒पीः। अधृ॑ष्टो व॒ एत॒वा अ॑स्तु॒ पन्था॒ बृह॒स्पति॑र्व उभ॒या न मृ॑ळात्॥

सेना शस्त्र आदि बल से रहित वचन विजय प्राप्त नहीं कराते हैं। विशेषतः अपरहण करनेवाले पापी जनों को बचाने य भागने का कोई मार्ग नहीं, परमात्मा इनके वचन व  शरीर को निःसत्त्व कर देता है॥६॥

अ॒यं नि॒धिः स॑रमे॒ अद्रि॑बुध्नो॒ गोभि॒रश्वे॑भि॒र्वसु॑भि॒र्न्यृ॑ष्टः। रक्ष॑न्ति॒ तं प॒णयो॒ ये सु॑गो॒पा रेकु॑ प॒दमल॑क॒मा ज॑गन्थ॥

मेघों के अन्दर जो जल निहित हैं, वे बहुमूल्य हैं, बहुत गौवों, घोड़ों, धनों के तुल्य अनायास प्राप्त हैं, प्राणिमात्र के लिये हितकर हैं, इनके अन्दर सदा रुके रहेंगे, ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये। वृष्टिविज्ञानवेत्ता इस बात को जानते हैं और जानना चाहिए, मेघ बरसेंगे और बरसकर रहेंगे॥७॥

एह ग॑म॒न्नृष॑यः॒ सोम॑शिता अ॒यास्यो॒ अङ्गि॑रसो॒ नव॑ग्वाः। त ए॒तमू॒र्वं वि भ॑जन्त॒ गोना॒मथै॒तद्वचः॑ प॒णयो॒ वम॒न्नित्॥

मेघों में घिरे जलों को पुरुवात तथा पृथ्वी की वायुएँ ओषधिरस लेकर ऊपर आकाश में जाती हैं, तो मेघों के प्रतिबन्धक को छिन्न-भिन्न कर देती हैं, नीचे जल बरसने लगते हैं॥८॥

ए॒वा च॒ त्वं स॑रम आज॒गन्थ॒ प्रबा॑धिता॒ सह॑सा॒ दैव्ये॑न। स्वसा॑रं त्वा कृणवै॒ मा पुन॑र्गा॒ अप॑ ते॒ गवां॑ सुभगे भजाम॥

स्वार्थी लोग अनुचित धन पर अधिकार करनेवाले मध्य में किसी समझानेवाले को भी फुसलाया करते हैं, तू भी इसमें से भाग ले ले और हमारे पक्ष में रह॥९॥

नाहं वे॑द भ्रातृ॒त्वं नो स्व॑सृ॒त्वमिन्द्रो॑ विदु॒रङ्गि॑रसश्च घो॒राः। गोका॑मा मे अच्छदय॒न्यदाय॒मपात॑ इत पणयो॒ वरी॑यः॥

अनाधिकृत वस्तु को अपने अधिकार में लेनेवाले समझाने के लिये कोई जावें, तो उनके प्रलोभन में न आकर उचित बात ही समझाया करें॥१०॥

दू॒रमि॑त पणयो॒ वरी॑य॒ उद्गावो॑ यन्तु मिन॒तीॠ॒तेन॑। बृह॒स्पति॒र्या अवि॑न्द॒न्निगू॑ळ्हाः॒ सोमो॒ ग्रावा॑ण॒ ऋष॑यश्च॒ विप्राः॑॥

मेघों के अन्दर रुके हुए जल सदा नहीं रह सकते, वे कभी न कभी वृष्टि के रूप में बाहर  निकल जाते हैं तथा आकाशविद्या जाननेवाला, ओषधियों का ज्ञान रखनेवाला, मेघों को समझनेवाला तत्त्वदर्शक और मेधावी विद्वान् अपने प्रयोगों के द्वारा जलों को मेघों से वृष्टिरूप में प्राप्त कर लेवें॥११॥

ते॑ऽवदन्प्रथ॒मा ब्र॑ह्मकिल्बि॒षेऽकू॑पारः सलि॒लो मा॑त॒रिश्वा॑। वी॒ळुह॑रा॒स्तप॑ उ॒ग्रो म॑यो॒भूरापो॑ दे॒वीः प्र॑थम॒जा ऋ॒तेन॑॥

सृष्टि में प्रथम उत्पन्न देव आदित्य वायु, अङ्गिरा, अग्नि, तथा व्याप्त जल अपनी रचना से परमात्मा को दर्शाते हैं तथा आरम्भ सृष्टि में प्रथम उत्पन्न आदित्य, वायु, अङ्गिरा, अग्नि वेदप्रकाशक परमर्षि और ब्रह्मा आदि आप्त ऋषि कैसे अज्ञान पाप से बच सकते हैं, ऐसे परमात्मा द्वारा वेदज्ञान के विषय में उपदेश करते हैं, लेते हैं॥१॥

सोमो॒ राजा॑ प्रथ॒मो ब्र॑ह्मजा॒यां पुनः॒ प्राय॑च्छ॒दहृ॑णीयमानः। अ॒न्व॒र्ति॒ता वरु॑णो मि॒त्र आ॑सीद॒ग्निर्होता॑ हस्त॒गृह्या नि॑नाय॥

ब्रह्म से उत्पन्न हुई वेदत्रयी या ब्रह्मचारी की जायारूप वेदत्रयी को वायु ऋषि देता है, ब्रह्मा के लिए आदित्य ऋषि देता है, अङ्गिरा देता है, अग्नि ऋषि देता है, वह ब्रह्मा चतुर्वेदवेत्ता बन जाता है॥२॥

हस्ते॑नै॒व ग्रा॒ह्य॑ आ॒धिर॑स्या ब्रह्मजा॒येयमिति॒ चेदवो॑चन्। न दू॒ताय॑ प्र॒ह्ये॑ तस्थ ए॒षा तथा॑ रा॒ष्ट्रं गु॑पि॒तं क्ष॒त्रिय॑स्य॥

वेद का अध्ययन स्वयं साक्षात् करने से प्रकाशित होता है, प्रतिनिधि द्वारा नहीं। राजा का राष्ट्र भी स्वयं ज्ञानी होने से सुरक्षित होता है॥३॥

दे॒वा ए॒तस्या॑मवदन्त॒ पूर्वे॑ सप्तऋ॒षय॒स्तप॑से॒ ये नि॑षे॒दुः। भी॒मा जा॒या ब्रा॑ह्म॒णस्योप॑नीता दु॒र्धां द॑धाति पर॒मे व्यो॑मन्॥

वेदत्रयी का उपदेश अग्नि आदि परम ऋषियों द्वारा मिलता है, ब्रह्मचर्य का पालन करनेवाले ब्रह्मचर्यनिष्ठ होकर मन्त्रार्थों को जाननेवाले ऋषि इसे जानते हैं और जनाते हैं, यह ब्रह्मचारी के पाप नष्ट करनेवाली उपनयन संस्कार द्वारा गुरु से प्राप्त होती है, उसे वह परमात्मा में या मोक्ष में पहुँचाती है॥४॥

ब्र॒ह्म॒चा॒री च॑रति॒ वेवि॑ष॒द्विषः॒ स दे॒वानां॑ भव॒त्येक॒मङ्ग॑म्। तेन॑ जा॒यामन्व॑विन्द॒द्बृह॒स्पतिः॒ सोमे॑न नी॒तां जु॒ह्वं१॒॑ न दे॑वाः॥

ब्रह्मचारी ब्रह्मयज्ञ में प्रविष्ट होने को परमात्मा की स्तुति करता हुआ विद्वानों की दृष्टि में एकाङ्ग होता है, पुनः गुरु से अध्ययन करके वेदवाणीरूप जाया को प्राप्त करता है, पुनः ब्रह्मयज्ञ करने में सफल हो जाता है, जैसे होमयज्ञ करने में पत्नी के साथ सफल हो जाता है॥५॥

पुन॒र्वै दे॒वा अ॑ददुः॒ पुन॑र्मनु॒ष्या॑ उ॒त। राजा॑नः स॒त्यं कृ॑ण्वा॒ना ब्र॑ह्मजा॒यां पुन॑र्ददुः॥

मुमुक्षु विद्वज्जन दुसरे शासकजन तथा साधारण मनुष्यजन स्वयं वेदवाणी को ग्रहण करके अन्यों को देते हैं और देते रहना चाहिए, यह परम्परा जीवन को सफल बनाने के लिए आवश्यक है॥६॥

पु॒न॒र्दाय॑ ब्रह्मजा॒यां कृ॒त्वी दे॒वैर्नि॑किल्बि॒षम्। ऊर्जं॑ पृथि॒व्या भ॒क्त्वायो॑रुगा॒यमुपा॑सते॥

विद्वान् जन वेदवाणी को ग्रहण करके दूसरों को ग्रहण कराया करते हैं, इससे वह-अपने  को निष्पाप अथवा परमात्मा के वेदज्ञान में अपने को निविष्ट करके सृष्टि के अन्नरस का सेवन करते हैं और महान् स्तोतव्य परमात्मा की उपासना करते हैं॥७॥

समि॑द्धो अ॒द्य मनु॑षो दुरो॒णे दे॒वो दे॒वान्य॑जसि जातवेदः। आ च॒ वह॑ मित्रमहश्चिकि॒त्वान्त्वं दू॒तः क॒विर॑सि॒ प्रचे॑ताः॥

अग्नि उत्पन्न होते ही जाना जाता है, उसके प्रकाश से सब पदार्थ जाने जाते हैं, गृहस्थजन के घर में यजन कराता है, ऋत्विजों द्वारा उपयुक्त होता है, जीवों को प्रगति देता है एवं परमात्मा-सब उत्पन्न करता है, सब में विद्यमान मननशील जन के हृदय में साक्षात् होता है, स्तुति करनेवालों के द्वारा स्तुतियोग्य प्रेरणाप्रद है॥१॥

तनू॑नपात्प॒थ ऋ॒तस्य॒ याना॒न्मध्वा॑ सम॒ञ्जन्त्स्व॑दया सुजिह्व। मन्मा॑नि धी॒भिरु॒त य॒ज्ञमृ॒न्धन्दे॑व॒त्रा च॑ कृणुह्यध्व॒रं नः॑॥

यज्ञ में प्रयुक्त अग्नि शोभन ज्वालावाला यज्ञ करनेवाले यजमानपरिवार को स्वस्थ रखता है और उनके गृहसम्बन्धी जीवनमार्गों को मधुर बना देता है, गृहस्थकर्मों से उनके यज्ञ और अन्तःकरणों को समृद्ध करता है, अहिंसनीय यथार्थ आचरण को इन्द्रियों में चरितार्थ कर देता है एवं वेदवाणी से सम्पन्न परमात्मा स्तुति करनेवाले जनों को गिरने नहीं देता है, पतित नहीं होने देता है, उनके ब्रह्मयज्ञ के प्रकारों को मधुर बनाता है, कर्मों से अध्यात्मयज्ञ तथा अन्तःकरणों को समृद्ध करता है और अहिंसनीय-अहिंसा आदि व्रत को इन्द्रियों में चरितार्थ करा देता है, जो विषयों से विरक्त हो जाती हैं॥२॥

आ॒जुह्वा॑न॒ ईड्यो॒ वन्द्य॒श्चा या॑ह्यग्ने॒ वसु॑भिः स॒जोषाः॑। त्वं दे॒वाना॑मसि यह्व॒ होता॒ स ए॑नान्यक्षीषि॒तो यजी॑यान्॥

ऋत्विजों के द्वारा अग्नि यज्ञ में नियुक्त की हुई अपने ज्वलनधर्मों से वायु आदि देवों के प्रति हव्य पदार्थ पहुँचाती है, उन्हें उपयुक्त बनाती है एवं परमात्मा अध्यात्मयज्ञ में आमन्त्रित हुआ अपने अन्दर बसनेवाले उपासकों के साथ प्रीतिभाव बनाता हुआ समागम करता है॥३॥

प्रा॒चीनं॑ ब॒र्हिः प्र॒दिशा॑ पृथि॒व्या वस्तो॑र॒स्या वृ॑ज्यते॒ अग्रे॒ अह्ना॑म्। व्यु॑ प्रथते वित॒रं वरी॑यो दे॒वेभ्यो॒ अदि॑तये स्यो॒नम्॥

वेदि में अग्नि प्रज्वलित होकर हव्य पदार्थ को वायु आदि देवताओं में फैला देता है और पृथिवी पर भी हव्य का प्रभाव डालता है एवं परमात्मा विस्तृत सृष्टि के अन्दर व्यापक हुआ जीवन्मुक्तों व साधारण पृथिवीस्थ प्रजाओं के लिये सुख पहुँचाता है॥४॥

व्यच॑स्वतीरुर्वि॒या वि श्र॑यन्तां॒ पति॑भ्यो॒ न जन॑यः॒ शुम्भ॑मानाः। देवी॑र्द्वारो बृहतीर्विश्वमिन्वा दे॒वेभ्यो॑ भवत सुप्राय॒णाः॥

होमयज्ञ में अग्नि की ज्वालाएँ वायु आदि देवों का आलिङ्गन सा करती हुईं शोभायमान प्रतीत होती हैं, वे उदार बनी हुई अपने को देवों के प्रति समर्पित कर रही हैं एवं अध्यात्मयज्ञ में परमात्मा की व्याप्तियाँ या विभूतियाँ स्तुति करनेवालों के लिये आकर्षक सुख प्राप्त करानेवाली बन जाती हैं॥५॥

आ सु॒ष्वय॑न्ती यज॒ते उपा॑के उ॒षासा॒नक्ता॑ सदतां॒ नि योनौ॑। दि॒व्ये योष॑णे बृह॒ती सु॑रु॒क्मे अधि॒ श्रियं॑ शुक्र॒पिशं॒ दधा॑ने॥

यज्ञकुण्ड में प्रातः-सायं प्रयुक्त हुई दो अग्नियाँ कुछ हँसती हुई-जागृति देती हुई तथा सुलाती हुई सी अच्छी रोचमान गृहलक्ष्मी के समान विराजती हैं। अध्यात्मदृष्टि से−ध्यानयज्ञ में परमात्मा का आश्रय प्रातः-सायं दोनों समय की उपासनाएँ उपासक को प्राप्त होती हैं, वे कुछ हँसाती और सुलाती हुई सी उपासक के साथ मिश्रण धर्मवाली होती हैं॥६॥

दैव्या॒ होता॑रा प्रथ॒मा सु॒वाचा॒ मिमा॑ना य॒ज्ञं मनु॑षो॒ यज॑ध्यै। प्र॒चो॒दय॑न्ता वि॒दथे॑षु का॒रू प्रा॒चीनं॒ ज्योतिः॑ प्र॒दिशा॑ दि॒शन्ता॑॥

दो याजकों के समान भौतिक देवों में अग्नि और वायु हैं। ये ही मनुष्य के शरीरयज्ञ का निर्माण करते हैं तथा संसार के शिल्परूप यज्ञों में ही शिल्पी का कार्य करते हैं। ये ही पूर्व दिशा में वर्तमान ज्योति सूर्य को सङ्केतित करते हैं ये उसके आधार पर हैं। अध्यात्मदृष्टि से−परमात्मा के ज्ञानप्रेरक और कर्मप्रेरक दो गुण हैं अथवा वेद और संसार दो उसके शिल्प हैं-कार्य हैं, ये अध्यात्मयज्ञ का निर्माण करते हैं, समस्त यज्ञकार्यों-श्रेष्ठ आचरणों में पुरातन ज्योतिरूप परमात्मा को सुझाते हैं, बतलाते हैं॥७॥

आ नो॑ य॒ज्ञं भार॑ती॒ तूय॑मे॒त्विळा॑ मनु॒ष्वदि॒ह चे॒तय॑न्ती। ति॒स्रो दे॒वीर्ब॒र्हिरेदं स्यो॒नं सर॑स्वती॒ स्वप॑सः सदन्तु॥

सूर्य की ज्योति, विद्युत्, अग्नि ये तीन यज्ञसदन, कलाभवन, विज्ञानमन्दिर में उपयुक्त होती हैं, शीघ्र कार्यसाधक सिद्धिप्रद हैं, सुखकर हैं, एवं ब्रह्मयज्ञ में स्तुति, प्रार्थना, उपासना आवश्यक है परमात्मा की प्राप्ति के लिये॥८॥

य इ॒मे द्यावा॑पृथि॒वी जनि॑त्री रू॒पैरपिं॑श॒द्भुव॑नानि॒ विश्वा॑। तम॒द्य हो॑तरिषि॒तो यजी॑यान्दे॒वं त्वष्टा॑रमि॒ह य॑क्षि वि॒द्वान्॥

यज्ञ करनेवाला मनुष्य होमयज्ञ करता है, परन्तु होमयज्ञ करनेवाले तू गर्व न कर, ऊपर-नीचे के लोकों में अपने-अपने या भिन्न-भिन्न रूपों से सारी वस्तुओं का रचयिता है, यह महान् यज्ञ है, उस महान् यज्ञ करनेवाले को अपने आत्मा में सङ्गत करना चाहिये, आत्मयाजी बनना श्रेयस्कर है॥९॥

उ॒पाव॑सृज॒ त्मन्या॑ सम॒ञ्जन्दे॒वानां॒ पाथ॑ ऋतु॒था ह॒वींषि॑। वन॒स्पतिः॑ शमि॒ता दे॒वो अ॒ग्निः स्वद॑न्तु ह॒व्यं मधु॑ना घृ॒तेन॑॥

अग्नि जब काष्ठों द्वारा प्रकट हो जाती है, तो वाय्वादि देवों का अन्न मधुघृत से मिश्रित हव्य पदार्थ उनको पहुँचाता है, इससे अग्नि विद्युन्मय वायु और सूर्य मानव के लिये हितकर होकर सुख पहुँचाते हैं। अध्यात्मदृष्टिसे−मानव समय-समय पर अपने को परमात्मा से सङ्गत करता हुआ आध्यात्मिक अन्न का सम्पादन करता है, जैसे भोज्य ओषधियों का स्वामी अग्नि रोगों का शमन करनेवाला विद्युन्मय वायु और द्युस्थान का सूर्य मधुघृत मिश्रित हव्य का भक्षण करके उपकारी होते हैं॥१०॥

स॒द्यो जा॒तो व्य॑मिमीत य॒ज्ञम॒ग्निर्दे॒वाना॑मभवत्पुरो॒गाः। अ॒स्य होतुः॑ प्र॒दिश्यृ॒तस्य॑ वा॒चि स्वाहा॑कृतं ह॒विर॑दन्तु दे॒वाः॥

काष्ठों में अग्नि प्रज्वलित होते ही होमयज्ञ का प्रारम्भ कर देती है, यह वायु आदि देवों की अग्रगामी बनती है, इसके प्रज्वलित प्रदेश में डाले हुए हव्य पदार्थ को वायु आदि देव ले लेते हैं, इसलिये वायु आदि देवों को स्वास्थ्यप्रद बनाने के लिये अग्नि में उत्तम-उत्तम ओषधियाँ होमनी चाहिये। अध्यात्मदृष्टि से−आत्मा शरीर में जन्मते ही शरीर का निर्माण आरम्भ कर देता है, इन्द्रियों का अग्रगामी बन जाता है, इसके लिये शरीर के एकदेश मुख में डाला हुआ आहार इन्द्रियों तक पहुँचता है। यदि इस आत्मा को आध्यात्मिक चर्चा का आहार मिले तो इन्द्रियाँ भी पवित्र और संयत रहती हैं॥११॥

मनी॑षिणः॒ प्र भ॑रध्वं मनी॒षां यथा॑यथा म॒तयः॒ सन्ति॑ नृ॒णाम्। इन्द्रं॑ स॒त्यैरेर॑यामा कृ॒तेभिः॒ स हि वी॒रो गि॑र्वण॒स्युर्विदा॑नः॥

मेधावी योगी स्तुति करनेवाले जनों की जो-जो कामनाएँ होती हैं, परमात्मा पूरी करता है, सद्विचारों, सत्यभाषणों व सदाचरणों से परमात्मा अपनाया हुआ मनुष्यों के हृदयों में वर्त्तमान रहता है॥१॥

ऋ॒तस्य॒ हि सद॑सो धी॒तिरद्यौ॒त्सं गा॑र्ष्टे॒यो वृ॑ष॒भो गोभि॑रानट्। उद॑तिष्ठत्तवि॒षेणा॒ रवे॑ण म॒हान्ति॑ चि॒त्सं वि॑व्याचा॒ रजां॑सि॥

परमात्मा वेद तथा ब्रह्माण्ड का धारक स्वयं प्रकाशक स्वरूप है, वह वृषभ के समान बलवान् या मेघ के समान सुखवर्षक, स्तुति करनेवालों में व्याप्त, वेद के उपदेश से उनके अन्दर उत्कृष्टरूप में व्याप्त और लोक-लोकान्तर में व्याप्त है॥२॥

इन्द्रः॒ किल॒ श्रुत्या॑ अ॒स्य वे॑द॒ स हि जि॒ष्णुः प॑थि॒कृत्सूर्या॑य। आन्मेनां॑ कृ॒ण्वन्नच्यु॑तो॒ भुव॒द्गोः पति॑र्दि॒वः स॑न॒जा अप्र॑तीतः॥

परमात्मा स्तुतिकर्त्ता उपासक की स्तुति सुनकर उसकी कामना पूर्ण करता है, आकाश के सूर्य जैसे महान् पिण्ड के लिये मार्ग बनाता है, वेदवाणी का प्रकाशक, पृथिवीलोक और सूर्यलोक का पालक स्वामी है॥३॥

इन्द्रो॑ म॒ह्ना म॑ह॒तो अ॑र्ण॒वस्य॑ व्र॒तामि॑ना॒दङ्गि॑रोभिर्गृणा॒नः। पु॒रूणि॑ चि॒न्नि त॑ताना॒ रजां॑सि दा॒धार॒ यो ध॒रुणं॑ स॒त्यता॑ता॥

परमात्मा अपने महत्त्व से परमाणुसमुद्र के चञ्चल कर्मों को नष्ट करता है, अग्निकणों को संयुक्त करता है, आकाशमण्डल को धारण करता है, लोक-लोकान्तरों को नियतरूप से फैलाता है॥४॥

इन्द्रो॑ दि॒वः प्र॑ति॒मानं॑ पृथि॒व्या विश्वा॑ वेद॒ सव॑ना॒ हन्ति॒ शुष्ण॑म्। म॒हीं चि॒द्द्यामात॑नो॒त्सूर्ये॑ण चा॒स्कम्भ॑ चि॒त्कम्भ॑नेन॒ स्कभी॑यान्॥

परमात्मा महान् नक्षत्र तारायुक्त गगनमण्डल को सूर्य द्वारा थामता है, चमकाता है, द्युलोक पृथिवीलोक का अधिष्ठान है, सब लोकों को जानता है, शोषकता को जलवर्षा कर नष्ट करता है॥५॥

वज्रे॑ण॒ हि वृ॑त्र॒हा वृ॒त्रमस्त॒रदे॑वस्य॒ शूशु॑वानस्य मा॒याः। वि धृ॑ष्णो॒ अत्र॑ धृष॒ता ज॑घ॒न्थाथा॑भवो मघवन्बा॒ह्वो॑जाः॥

परमात्मा अज्ञानादि आवरक बाधक को नष्ट करता है, बढ़े हुए पापी के कुटिल व्यवहारों को भी नष्ट करता है॥६॥

सच॑न्त॒ यदु॒षसः॒ सूर्ये॑ण चि॒त्राम॑स्य के॒तवो॒ राम॑विन्दन्। आ यन्नक्ष॑त्रं॒ ददृ॑शे दि॒वो न पुन॑र्य॒तो नकि॑र॒द्धा नु वे॑द॥

जैसे प्रभातवेलाएँ सूर्य के साथ सङ्गत होकर उसकी किरणों को-प्रकाशधाराओं को प्राप्त हो जाती हैं, वैसे ही स्तुति करनेवाले जन परमात्मा से सङ्गत होकर विचित्र रमणीय आनन्दमयी आभा को प्राप्त कर लेते हैं-और जैसे आकाश में दिन के समय नक्षत्र को कोई देख नहीं पाता है, ऐसे ही परमात्मा में उपासना द्वारा प्राप्त हुए उपासक को तत्त्व से कोई नहीं जान पाता॥७॥

दू॒रं किल॑ प्रथ॒मा ज॑ग्मुरासा॒मिन्द्र॑स्य॒ याः प्र॑स॒वे स॒स्रुरापः॑। क्व॑ स्वि॒दग्रं॒ क्व॑ बु॒ध्न आ॑सा॒मापो॒ मध्यं॒ क्व॑ वो नू॒नमन्तः॑॥

सृष्टिरचना में परमात्मा ने परमाणुओं में से किन्हीं परमाणुओं को ऊँचा फेंका, किन्हीं को नीचे आधार बनाया, किन्हीं को मध्य में, किन्हीं को अन्त में दूर-दूर तक फेंका है एवं आप्त मनुष्यों को किन्हीं को जगत् से दूर मोक्ष में, किन्हीं को जीवन्मुक्त, किन्हीं को मुमुक्षुरूप में, किन्हीं को उपासक स्तुतिकर्ता के रूप में अपनाया है, जो प्राप्त करते हैं॥८॥

सृ॒जः सिन्धूँ॒रहि॑ना जग्रसा॒नाँ आदिदे॒ताः प्र वि॑विज्रे ज॒वेन॑। मुमु॑क्षमाणा उ॒त या मु॑मु॒च्रेऽधेदे॒ता न र॑मन्ते॒ निति॑क्ताः॥

जैसे मेघों से घिरे हुए जलों को सूर्य अपने ताप से बाहर निकाल देता है और वे वेग से बहने लगते हैं, इसी प्रकार अज्ञान से घिरे हुए मनुष्यों को परमात्मा वेदज्ञान द्वारा बाहर निकालता है, पुनः वे ज्ञानों में प्रवेश कर मोक्ष चाहते हुए शान्त हुए जगत् में रमण नहीं करते, मुक्त हो जाते हैं॥९॥

स॒ध्रीचीः॒ सिन्धु॑मुश॒तीरि॑वायन्त्स॒नाज्जा॒र आ॑रि॒तः पू॒र्भिदा॑साम्। अस्त॒मा ते॒ पार्थि॑वा॒ वसू॑न्य॒स्मे ज॑ग्मुः सू॒नृता॑ इन्द्र पू॒र्वीः॥

जैसे जलधाराएँ समुद्र को प्राप्त होती हैं, वैसे आप्त मनुष्यप्रजाएँ परमात्मा को प्राप्त होती हैं, परमात्मा उनके शरीरों को जीर्ण कर देता है, पुनः-पुनः शरीर धारण करने से हटा देता है, मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार आत्मा के साथ मोक्ष में चले जाते हैं॥१०॥

इन्द्र॒ पिब॑ प्रतिका॒मं सु॒तस्य॑ प्रातःसा॒वस्तव॒ हि पू॒र्वपी॑तिः। हर्ष॑स्व॒ हन्त॑वे शूर॒ शत्रू॑नु॒क्थेभि॑ष्टे वी॒र्या॒३॒॑ प्र ब्र॑वाम॥

मनुष्य अपनी कामना के अनुरूप जैसी वह कामना करता है, वैसी उसके अनुरूप उसकी स्तुति उपासना करता है और करनी चाहिये, विशेषरूप से अपने अन्दर के कामादि दोषों को दूर करने के लिये प्रशस्त वचनों द्वारा परमात्मा को स्मरण करे॥१॥

यस्ते॒ रथो॒ मन॑सो॒ जवी॑या॒नेन्द्र॒ तेन॑ सोम॒पेया॑य याहि। तूय॒मा ते॒ हर॑यः॒ प्र द्र॑वन्तु॒ येभि॒र्यासि॒ वृष॑भि॒र्मन्द॑मानः॥

परमात्मा का रमणीय आनन्दधर्म मन से भी अधिक वेगवान् है, जो उपासक में क्षण से भी पहले विद्यमान हो जाता है, परन्तु जब कि उपासक उसके प्रति आत्मभाव से उपासनारस समर्पित करता है, तो वह उसके हृदय में बस जाता है॥२॥

हरि॑त्वता॒ वर्च॑सा॒ सूर्य॑स्य॒ श्रेष्ठै॑ रू॒पैस्त॒न्वं॑ स्पर्शयस्व। अ॒स्माभि॑रिन्द्र॒ सखि॑भिर्हुवा॒नः स॑ध्रीची॒नो मा॑दयस्वा नि॒षद्य॑॥

उपासक लोग जब परमात्मा की उपासना करते हैं, तो वह उनके आत्मा को अपने श्रेष्ठ तेजस्वी रूपों से सम्पृक्त करता है और उनके हृदय में प्रविष्ट होकर उन्हें आनन्दित करता है॥३॥

यस्य॒ त्यत्ते॑ महि॒मानं॒ मदे॑ष्वि॒मे म॒ही रोद॑सी॒ नावि॑विक्ताम्। तदोक॒ आ हरि॑भिरिन्द्र यु॒क्तैः प्रि॒येभि॑र्याहि प्रि॒यमन्न॒मच्छ॑॥

संसार के परिधिरूप ऊपर नीचे के दो स्तर तेरे प्रताप को रिक्त-खाली या तुझसे अलग नहीं कर सकते हैं, तेरे हर्षों के निमित्त आनन्दरसों में उपासक योगियों के द्वारा तू प्रिय उपासनारस को लक्ष्य करके उनके हृदय में साक्षात् होता है॥४॥

यस्य॒ शश्व॑त्पपि॒वाँ इ॑न्द्र॒ शत्रू॑ननानुकृ॒त्या रण्या॑ च॒कर्थ॑। स ते॒ पुरं॑धिं॒ तवि॑षीमियर्ति॒ स ते॒ मदा॑य सु॒त इ॑न्द्र॒ सोमः॑॥

जिस उपासक के निरन्तर उपासनारस को परमात्मा स्वीकार करता है, उसके कामादि शत्रुओं को अपनी अतुलित शक्ति से नष्ट करता है, पुनः उपासक भी उसकी महती स्तुति करता है-उपासनारस समर्पित करता है॥५॥

इ॒दं ते॒ पात्रं॒ सन॑वित्तमिन्द्र॒ पिबा॒ सोम॑मे॒ना श॑तक्रतो। पू॒र्ण आ॑हा॒वो म॑दि॒रस्य॒ मध्वो॒ यं विश्व॒ इद॑भि॒हर्य॑न्ति दे॒वाः॥

परमात्मा बहुत कृपा करनेवाला है, उसे अपने उपासनारस को समर्पित करने के लिये हृदय में आह्वान करना चाहिये-बुलाना चाहिये, हृदय ही उसके उपासनारस के पान करने का स्थान है॥६॥

वि हि त्वामि॑न्द्र पुरु॒धा जना॑सो हि॒तप्र॑यसो वृषभ॒ ह्वय॑न्ते। अ॒स्माकं॑ ते॒ मधु॑मत्तमानी॒मा भु॑व॒न्त्सव॑ना॒ तेषु॑ हर्य॥

परमात्मा सुखों का वर्षक है, वह उत्तम उपासनारस समर्पित करनेवाले उपासकों के प्रार्थनावचनों को पूरा करता है, चाहता है, स्वीकार करता है॥७॥

प्र त॑ इन्द्र पू॒र्व्याणि॒ प्र नू॒नं वी॒र्या॑ वोचं प्रथ॒मा कृ॒तानि॑। स॒ती॒नम॑न्युरश्रथायो॒ अद्रिं॑ सुवेद॒नाम॑कृणो॒र्ब्रह्म॑णे॒ गाम्॥

परमात्मा के बल कार्य पूर्व से चले आये हैं, उनका प्रवचन करना चाहिये, वह शान्त तेजवाले वेदवक्ता को हमारे लिये भेजता है तथा चतुर्वेदवक्ता के लिये सुज्ञान देनेवाले ब्राह्मण के लिये भी प्रकाशित करता है॥८॥

नि षु सी॑द गणपते ग॒णेषु॒ त्वामा॑हु॒र्विप्र॑तमं कवी॒नाम्। न ऋ॒ते त्वत्क्रि॑यते॒ किं च॒नारे म॒हाम॒र्कं म॑घवञ्चि॒त्रम॑र्च॥

स्तोता प्रार्थी और उपासक जनों का पालक परमात्मा है, वह उनके अन्दर साक्षात् होता है, समस्त मेधावी विद्वानों को मेधा देनेवाला है, उसके बिना दूर या निकट कोई कर्म नहीं होता, वह कर्माध्यक्ष है, उसके लिये महान् प्रशस्त विचार समर्पित करना चाहिये॥९॥

अ॒भि॒ख्या नो॑ मघव॒न्नाध॑माना॒न्त्सखे॑ बो॒धि व॑सुपते॒ सखी॑नाम्। रणं॑ कृधि रणकृत्सत्यशु॒ष्माभ॑क्ते चि॒दा भ॑जा रा॒ये अ॒स्मान्॥

परमात्मा में जो बसने के अधिकारी हैं, उनकी वह रक्षा करता और उन्हें अपना मित्र मान करके बोध देता है-ज्ञान देता है और देखता है, उनके अन्दर के कामादि शत्रुओं को नष्ट करता है और जो अलौकिक उसका आनन्दरूप धन है, उसे संसारीजन को नहीं देता, किन्तु उपासक को उसका भागी बनाता है॥१०॥

सूक्तम्

तम॑स्य॒ द्यावा॑पृथि॒वी सचे॑तसा॒ विश्वे॑भिर्दे॒वैरनु॒ शुष्म॑मावताम्। यदैत्कृ॑ण्वा॒नो म॑हि॒मान॑मिन्द्रि॒यं पी॒त्वी सोम॑स्य॒ क्रतु॑माँ अवर्धत॥

राजा के शासन के अनुसार ज्ञानप्रधान राजगण और श्रमप्रधान प्रजागण चाहिये तथा राष्ट्र के नीतिनिष्णात विद्वानों के साथ राष्ट्र की समृद्धि के लिये प्रगति करें। राजा भी राष्ट्र का पालन करके ही समृद्ध और यशस्वी होता है॥१॥

तम॑स्य॒ विष्णु॑र्महि॒मान॒मोज॑सां॒शुं द॑ध॒न्वान्मधु॑नो॒ वि र॑प्शते। दे॒वेभि॒रिन्द्रो॑ म॒घवा॑ स॒याव॑भिर्वृ॒त्रं ज॑घ॒न्वाँ अ॑भव॒द्वरे॑ण्यः॥

मधुर, सुखप्रद राष्ट्र के राजपद को प्राप्त करके राजा उसे अपने बल से उन्नत करता है और युद्ध को जीतने की इच्छा रखनेवाले सैनिकों के साथ युद्ध में जाकर शत्रु का हनन कर सकता है, ऐसा व्यक्ति राजा बनने के योग्य है॥२॥

वृ॒त्रेण॒ यदहि॑ना॒ बिभ्र॒दायु॑धा स॒मस्थि॑था यु॒धये॒ शंस॑मा॒विदे॑। विश्वे॑ ते॒ अत्र॑ म॒रुतः॑ स॒ह त्मनाव॑र्धन्नुग्र महि॒मान॑मिन्द्रि॒यम्॥

राजा जब आक्रमणकारी मारने योग्य शत्रु के लिये शस्त्रों को धारण करता हुआ अपने बल को प्रदर्शित करते हुए तैयार होता है, तो सारे सैनिक लोगों को भी उसके साथ तैयार होना चाहिये राष्ट्र की समृद्धि के लिये॥३॥

ज॒ज्ञा॒न ए॒व व्य॑बाधत॒ स्पृधः॒ प्राप॑श्यद्वी॒रो अ॒भि पौंस्यं॒ रण॑म्। अवृ॑श्च॒दद्रि॒मव॑ स॒स्यदः॑ सृज॒दस्त॑भ्ना॒न्नाकं॑ स्वप॒स्यया॑ पृ॒थुम्॥

राजा जब राजसूय यज्ञ द्वारा प्रसिद्ध हो जाता है, तो स्पर्धाशील संघर्ष करनेवाले शत्रुओं को पीड़ित करे और अपने बल का निरीक्षण करे, पर्वतसदृश दृढ़ शत्रु को भी छिन्न-भिन्न करने में समर्थ हो, भागते हुए शत्रुओं को भूमि पर सुलानेवाला हो, अपने उत्तम शक्तिसम्पन्न कर्म करने की इच्छा से विस्तृत राष्ट्र को सम्भाले, वह राजा होता है॥४॥

आदिन्द्रः॑ स॒त्रा तवि॑षीरपत्यत॒ वरी॑यो॒ द्यावा॑पृथि॒वी अ॑बाधत। अवा॑भरद्धृषि॒तो वज्र॑माय॒सं शेवं॑ मि॒त्राय॒ वरु॑णाय दा॒शुषे॑॥

राजा के पास बलवती सेना होनी चाहिये, इस प्रकार उस पर स्वामित्व करते हुए राजा के दोनों गण ज्ञानप्रकाशकगण और श्रमिकगण राष्ट्रहित के लिये राजा इनको प्रेरणा करता रहे और राजा भी तीक्ष्ण लोहे के बने या लोहचूर्णयुक्त शस्त्रास्त्र सुरक्षित रखे और ज्ञानप्रकाशकगण तथा श्रमिकगण एवं अन्य सहयोग देनेवाले के लिये सुख पहुँचावे॥५॥

इन्द्र॒स्यात्र॒ तवि॑षीभ्यो विर॒प्शिन॑ ऋघाय॒तो अ॑रंहयन्त म॒न्यवे॑। वृ॒त्रं यदु॒ग्रो व्यवृ॑श्च॒दोज॑सा॒पो बिभ्र॑तं॒ तम॑सा॒ परी॑वृतम्॥

युद्ध के अवसर पर महैश्वर्यवान् शत्रुओं को नष्ट करनेवाले राजा के सैनिक शासन का पालन करने के लिये वेग से आगे बढ़ते हैं, जब कि प्रतापी राजा प्रजा को स्वाधीन करनेवाले शत्रु को नष्ट करता है॥६॥

या वी॒र्या॑णि प्रथ॒मानि॒ कर्त्वा॑ महि॒त्वेभि॒र्यत॑मानौ समी॒यतुः॑। ध्वा॒न्तं तमोऽव॑ दध्वसे ह॒त इन्द्रो॑ म॒ह्ना पू॒र्वहू॑तावपत्यत॥

दो संघर्ष करनेवाले युद्ध में अपने-अपने वीरों के द्वारा युद्ध जीतने का प्रयत्न करते हैं, परन्तु ऐश्वर्यवान् राजा प्रजाहितकर श्रेष्ठ कर्त्तव्यों को निभाता हुआ संग्राम में-आक्रमणकारी को नष्ट कर देता है, उसके नष्ट हो जाने पर अन्याय अन्धकार भी नष्ट हो जाता है, फिर ऐसा प्रतापी पुण्यवान् राजा सत्कारार्थ अपने राज्यैश्वर्य पर स्वामित्व करता है॥७॥

विश्वे॑ दे॒वासो॒ अध॒ वृष्ण्या॑नि॒ तेऽव॑र्धय॒न्त्सोम॑वत्या वच॒स्यया॑। र॒द्धं वृ॒त्रमहि॒मिन्द्र॑स्य॒ हन्म॑ना॒ग्निर्न जम्भै॑स्तृ॒ष्वन्न॑मावयत्॥

आक्रमणकारी शत्रु के मारे जाने पर राजा के वर्षक बलों की सब विद्वान् प्रशंसा करते हैं बड़ा आदर करते हैं, राजा के हननसाधन से मरे हुए आक्रमणकारी शत्रु को पृथिवी अन्न बनाकर भक्षण करती है विलीन करती है और अग्नि भी अपनी ज्वालाओं से अन्न बना लेती है॥८॥

भूरि॒ दक्षे॑भिर्वच॒नेभि॒ॠक्व॑भिः स॒ख्येभिः॑ स॒ख्यानि॒ प्र वो॑चत। इन्द्रो॒ धुनिं॑ च॒ चुमु॑रिं च द॒म्भय॑ञ्छ्रद्धामन॒स्या शृ॑णुते द॒भीत॑ये॥

प्रजाजनों को चाहिये कि राजा से अपने दुःख दूर करने के लिये बलवान् विचारयुक्त मित्रभावपूर्ण वचनों द्वारा प्रार्थनाएँ करें, प्रजा के दुःख के कारणरूप जो कम्पानेवाला शत्रु दस्यु और चुराकर खानेवाले चोर को नष्ट करने के लिये मनोयोग से उनकी सुनता है और उनके दुःख दूर करता है, वह राजा होने योग्य है॥९॥

त्वं पु॒रूण्या भ॑रा॒ स्वश्व्या॒ येभि॒र्मंसै॑ नि॒वच॑नानि॒ शंस॑न्। सु॒गेभि॒र्विश्वा॑ दुरि॒ता त॑रेम वि॒दो षु ण॑ उर्वि॒या गा॒धम॒द्य॥

राजा के राजपद पर प्रतिष्ठित होते समय प्रजा के प्रतिनिधि जन और विद्वान् राजा को प्रेरित करें, अच्छे घोड़े आदि यान्त्रिक संग्रामसाधनों से बल और धन का उपार्जन करें, उन्हें देखकर प्रशंसा करें और राजपद पर भलीभाँति प्रतिष्ठित हों, ऐसी आशा और आशीर्वाद के वचन बोलें॥१०॥

घ॒र्मा सम॑न्ता त्रि॒वृतं॒ व्या॑पतु॒स्तयो॒र्जुष्टिं॑ मात॒रिश्वा॑ जगाम। दि॒वस्पयो॒ दिधि॑षाणा अवेषन्वि॒दुर्दे॒वाः स॒हसा॑मानम॒र्कम्॥

ब्रह्मचर्य के पालन से तेजस्वी बने अध्यापक और उपदेशक या स्त्री-पुरुष वेदत्रयी से युक्त तथा स्तुति प्रार्थना उपासना करनेवाले होने चाहिये, उनसे ज्ञान के इच्छुक श्रोता और विद्यार्थी जन सामसहित मन्त्रभाग को ज्ञानपूर्वक ग्रहण करें॥१॥

ति॒स्रो दे॒ष्ट्राय॒ निॠ॑ती॒रुपा॑सते दीर्घ॒श्रुतो॒ वि हि जा॒नन्ति॒ वह्न॑यः। तासां॒ नि चि॑क्युः क॒वयो॑ नि॒दानं॒ परे॑षु॒ या गुह्ये॑षु व्र॒तेषु॑॥

वेदत्रयी का अध्ययन बहुत काल तक कर चुकनेवाले यथार्थ ज्ञान को प्राप्त होते हैं और वे ही अपने आत्मा में परिपुष्ट कर दूसरों के लिये ज्ञान देते हैं, अध्यात्मविषयसम्बन्धी विद्याएँ उत्कृष्ट हैं, उन्हें अध्यात्मकर्मों एवं सदाचरणों के द्वारा जीवन में ढाला जाता है, उनके मूलकारण परमात्मा को अध्यात्मदर्शी जाना करते हैं॥२॥

चतु॑ष्कपर्दा युव॒तिः सु॒पेशा॑ घृ॒तप्र॑तीका व॒युना॑नि वस्ते। तस्यां॑ सुप॒र्णा वृष॑णा॒ नि षे॑दतु॒र्यत्र॑ दे॒वा द॑धि॒रे भा॑ग॒धेय॑म्॥

ऋग् यजुः साम और अथर्व ज्ञानरूप ऊँची शिखासमान स्थिति अथवा धर्मार्थ काम मोक्ष ये चार सुख को बतानेवाले जिसमें हैं, ऐसी वेदवाणी अजर अमर तेज देनेवाली, परमात्मा से मिलानेवाली ज्ञान के भण्डाररूप में जीवात्मा परमात्मा का वर्णन है तथा अध्यापक और अध्येता जिसको पढ़ते रहते हैं, विद्वान् लोग ज्ञान का भाग लेते हैं, ऐसी वेदवाणी पढ़नी-पढ़ानी चाहिये॥३॥

एकः॑ सुप॒र्णः स स॑मु॒द्रमा वि॑वेश॒ स इ॒दं विश्वं॒ भुव॑नं॒ वि च॑ष्टे। तं पाके॑न॒ मन॑सापश्य॒मन्ति॑त॒स्तं मा॒ता रे॑ळ्हि॒ स उ॑ रेळ्हि मा॒तर॑म्॥

परमात्मा विशाल संसार में व्याप्त है और प्राणिमात्र के कर्मों को जानता है, उसे सुपक्व निरुद्ध मन से जीवात्मा अपने अन्दर देखता है और ऐसे देखता है कि वे दोनों परस्पर माता-पुत्र के समान स्नेह कर रहे हैं॥४॥

सु॒प॒र्णं विप्राः॑ क॒वयो॒ वचो॑भि॒रेकं॒ सन्तं॑ बहु॒धा क॑ल्पयन्ति। छन्दां॑सि च॒ दध॑तो अध्व॒रेषु॒ ग्रहा॒न्त्सोम॑स्य मिमते॒ द्वाद॑श॥

परमात्मा के स्वरूप को अपने अन्दर धारण करनेवाले मेधावी स्तोता जन उस एक परमात्मा को अनेक प्रकार से या अनेक नामों से वर्णित करते हैं या मानते हैं, गायत्र्यादि छन्द यज्ञों में उसका वर्णन करते हैं, चन्द्रमा जैसे चैत्र आदि बारह मासों में ग्रहण किया जाता है, ऐसे ही सोमरूप परमात्मा के ग्रहणपात्र स्मरण करने के स्थान बारह हैं, जो कि आत्मा, मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ वाणी और प्राण हैं॥५॥

ष॒ट्त्रिं॒शाँश्च॑ च॒तुरः॑ क॒ल्पय॑न्त॒श्छन्दां॑सि च॒ दध॑त आद्वाद॒शम्। य॒ज्ञं वि॒माय॑ क॒वयो॑ मनी॒ष ऋ॑क्सा॒माभ्यां॒ प्र रथं॑ वर्तयन्ति॥

हेमन्त के चालीस दिनों में गायत्री आदि सात छन्दों और पाँच अतिछन्दों को मिलाकर बारह छन्दों से ऋग्वेदमन्त्रों और सामवेदमन्त्रों की गीतियों से सोमौषधियज्ञ तथा स्तुति उपासना द्वारा ब्रह्मयज्ञ करना चाहिये॥६॥

चतु॑र्दशा॒न्ये म॑हि॒मानो॑ अस्य॒ तं धीरा॑ वा॒चा प्र ण॑यन्ति स॒प्त। आप्ना॑नं ती॒र्थं क इ॒ह प्र वो॑च॒द्येन॑ प॒था प्र॒पिब॑न्ते सु॒तस्य॑॥

भूः, भुवः आदि प्राणकेन्द्र शरीर के सात हैं, जो प्राणायामवाले मन्त्र में कहे गये हैं तथा सात लोकस्तर भूः, भुवः आदि संसार में हैं। ये दोनों चौदह उसकी महिमारूप हैं, इनके द्वारा बुद्धिमान् ध्यानी योगीजन उस परमात्मा को अपने अन्दर बिठाते हैं, वह संसारसागर से तरानेवाला है, उपासकजन उसका आनन्दरसपान करते हैं॥७॥

स॒ह॒स्र॒धा प॑ञ्चद॒शान्यु॒क्था याव॒द्द्यावा॑पृथि॒वी ताव॒दित्तत्। स॒ह॒स्र॒धा म॑हि॒मानः॑ स॒हस्रं॒ याव॒द्ब्रह्म॒ विष्ठि॑तं॒ ताव॑ती॒ वाक्॥

परमात्मा की महिमाएँ अनन्त हैं, जो ब्रह्माण्ड में और पिण्ड शरीर में काम कर रही हैं। प्राणियों के शरीरों में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण तथा जितने परिमाणवाला द्यावापृथिवीमय-ब्रह्माण्ड है, इतने शरीर परिमाणवाला है, क्योंकि जो ब्रह्माण्ड में है, सो पिण्ड में है, तथा जितना ब्रह्माण्ड है, उतनी उसे वर्णन करनेवाली वाणी है-विद्या है, इसलिये शरीर और ब्रह्माण्ड के विज्ञान को जानने के लिये विद्या पढ़नी चाहिये॥८॥

कश्छन्द॑सां॒ योग॒मा वे॑द॒ धीरः॒ को धिष्ण्यां॒ प्रति॒ वाचं॑ पपाद। कमृ॒त्विजा॑मष्ट॒मं शूर॑माहु॒र्हरी॒ इन्द्र॑स्य॒ नि चि॑काय॒ कः स्वि॑त्॥

वेद के मन्त्रों के अर्थ तथा तदनुसार उपयोग को कोई विरला-ज्ञानवान् बुद्धिमान् जान सकता है तथा वेदवाणी में कही स्तुति की फलसिद्धि को कोई विरला ही प्राप्त कर सकता है तथा छन्दों के मध्य में प्रमुख सुखस्वरूप ‘ओ३म्’ को कहते हैं, उसे भी कोई विरला जानता है तथा ऐश्वर्यवान् परमात्मा की स्तुति उपासना को अपने अन्दर ढालनेवाला विरला ही होता है, इसलिये मनुष्य को विशेष ज्ञानी होना चाहिये॥९॥

भूम्या॒ अन्तं॒ पर्येके॑ चरन्ति॒ रथ॑स्य धू॒र्षु यु॒क्तासो॑ अस्थुः। श्रम॑स्य दा॒यं वि भ॑जन्त्येभ्यो य॒दा य॒मो भव॑ति ह॒र्म्ये हि॒तः॥

जैसे कुशल सारथि के रथ में जुड़े हुए घोड़े पृथिवी पर चलते हैं, घूमते हैं, श्रम करते हैं, उनके श्रमप्रतीकार के लिये घास आदि दिया जाता है, ऐसे ही हृदय में वर्त्तमान आत्मा सारथि के समान संयमी हुआ प्राणरूप घोड़ों को देह में चलते हुओं को श्रमप्रतीकार के लिये यथायोग्य आहार देता है, देता रहे॥१०॥

चि॒त्र इच्छिशो॒स्तरु॑णस्य व॒क्षथो॒ न यो मा॒तरा॑व॒प्येति॒ धात॑वे। अ॒नू॒धा यदि॒ जीज॑न॒दधा॑ च॒ नु व॒वक्ष॑ स॒द्यो महि॑ दू॒त्यं१॒॑ चर॑न्॥

प्रशंसनीय नित्य युवा अग्रणेता परमात्मा का महान् प्रताप है, संसार को जो वहन करता है, यद्यपि द्यावापृथिवी द्युलोक और पृथिवीलोक इतर संसार की माताएँ हैं, परन्तु परमात्मा की माताएँ नहीं हैं, स्वयं ही परमात्मा उनका मातृभूत उत्पन्न करनेवाला है, इसलिये विश्वविज्ञान में परमात्मा को प्रमुखता देनी चाहिये॥१॥

अ॒ग्निर्ह॒ नाम॑ धायि॒ दन्न॒पस्त॑मः॒ सं यो वना॑ यु॒वते॒ भस्म॑ना द॒ता। अ॒भि॒प्र॒मुरा॑ जु॒ह्वा॑ स्वध्व॒र इ॒नो न प्रोथ॑मानो॒ यव॑से॒ वृषा॑॥

अग्रणायक प्रशस्त कर्मवाला परमात्मा उपासकों को सुख देता है, वह अपनी तेजस्विता से शोभन अध्यात्मयज्ञ में स्तुतिवाणी को लक्ष्य कर वह व्यापक स्वामी अन्नोत्पत्ति के लिये जैसे मेघवर्षा करता है, ऐसे आध्यात्मिक अन्न की वृष्टि करता है॥२॥

तं वो॒ विं न द्रु॒षदं॑ दे॒वमन्ध॑स॒ इन्दुं॒ प्रोथ॑न्तं प्र॒वप॑न्तमर्ण॒वम्। आ॒सा वह्निं॒ न शो॒चिषा॑ विर॒प्शिनं॒ महि॑व्रतं॒ न स॒रज॑न्त॒मध्व॑नः॥

मनुष्यों को चाहिये कि स्नेहकर्त्ता व्यापक ज्ञान के बीज को देनेवाले संसार के अधिष्ठाता मोक्षमार्ग के सृजन करनेवाले परमात्मा की स्तुति करें॥३॥

वि यस्य॑ ते ज्रयसा॒नस्या॑जर॒ धक्षो॒र्न वाताः॒ परि॒ सन्त्यच्यु॑ताः। आ र॒ण्वासो॒ युयु॑धयो॒ न स॑त्व॒नं त्रि॒तं न॑शन्त॒ प्र शि॒षन्त॑ इ॒ष्टये॑॥

उपासक जन अजर विभूतिवाले तीनों लोकों में वर्त्तमान तथा जिसकी व्याप्तियाँ सारे संसार में फैली हुईं हैं, उस परमात्मा की अपनी अभीष्टसिद्धि के लिये अनेक प्रकार से स्तुति प्रार्थना उपासना करते हैं॥४॥

स इद॒ग्निः कण्व॑तमः॒ कण्व॑सखा॒र्यः पर॒स्यान्त॑रस्य॒ तरु॑षः। अ॒ग्निः पा॑तु गृण॒तो अ॒ग्निः सू॒रीन॒ग्निर्द॑दातु॒ तेषा॒मवो॑ नः॥

परमात्मा अत्यन्त मेधावी स्तुति करनेवालों का मित्र और स्वामी है। वह दूसरे के प्रति किये हुए अपने अन्दर के पाप को नष्ट करता है और स्तुति करनेवाले की रक्षा करता है॥५॥

वा॒जिन्त॑माय॒ सह्य॑से सुपित्र्य तृ॒षु च्यवा॑नो॒ अनु॑ जा॒तवे॑दसे। अ॒नु॒द्रे चि॒द्यो धृ॑ष॒ता वरं॑ स॒ते म॒हिन्त॑माय॒ धन्व॒नेद॑विष्य॒ते॥

परमात्मा पिता के समान सत्करणीय महाबलवान् सब ज्ञान प्रज्ञानों का आगार महामहिमावाला रक्षक सदा वर्त्तमान है तथा जलरहित शुष्क देश में सङ्कट में भी सङ्कटनाशक अपने सामर्थ्य से सङ्कट का निवारण करनेवाला है, उस ऐसे परमात्मा को स्तुतियों द्वारा अपने अन्दर बिठाना धारण करना चाहिये॥६॥

ए॒वाग्निर्मर्तैः॑ स॒ह सू॒रिभि॒र्वसुः॑ ष्टवे॒ सह॑सः सू॒नरो॒ नृभिः॑। मि॒त्रासो॒ न ये सुधि॑ता ऋता॒यवो॒ द्यावो॒ न द्यु॒म्नैर॒भि सन्ति॒ मानु॑षान्॥

अध्यात्मबल के प्रेरक बसानेवाले परमात्मा की अध्यात्मयज्ञ के चाहनेवाले स्तोता जन स्तुति करते हैं। वे परमात्मा के मित्र बन जाते हैं और अपने यशों से अन्य मनुष्यों को प्रभावित करते हैं॥७॥

ऊर्जो॑ नपात्सहसाव॒न्निति॑ त्वोपस्तु॒तस्य॑ वन्दते॒ वृषा॒ वाक्। त्वां स्तो॑षाम॒ त्वया॑ सु॒वीरा॒ द्राघी॑य॒ आयुः॑ प्रत॒रं दधा॑नाः॥

परमात्मा अध्यात्मबल को बढ़ानेवाला, साहस दिलानेवाला है, उपासक की वाणी उसके गुणों का प्रकाश करती है, उससे संयुक्त होकर अच्छे प्राणवाले होकर मनुष्य दीर्घ आयु को प्राप्त करते हैं॥८॥

इति॑ त्वाग्ने वृष्टि॒हव्य॑स्य पु॒त्रा उ॑पस्तु॒तास॒ ऋष॑योऽवोचन्। ताँश्च॑ पा॒हि गृ॑ण॒तश्च॑ सू॒रीन्वष॒ड्वष॒ळित्यू॒र्ध्वासो॑ अनक्ष॒न्नमो॒ नम॒ इत्यू॒र्ध्वासो॑ अनक्षन्॥

परमात्मा आवश्यक सब भोग्य पदार्थों की वृष्टि करता है, उसके गुणों का वर्णन करनेवाले ऋषिजन उसके पुत्रसमान हैं। वह स्तुति करनेवालों की रक्षा करता है, उसकी स्तुति करना नितान्त सत्य है और उसका आध्यात्मिक यज्ञ करना मनुष्यों को ऊँचा उठाता है और परमात्मा को प्राप्त कराता है॥९॥

पिबा॒ सोमं॑ मह॒त इ॑न्द्रि॒याय॒ पिबा॑ वृ॒त्राय॒ हन्त॑वे शविष्ठ। पिब॑ रा॒ये शव॑से हू॒यमा॑नः॒ पिब॒ मध्व॑स्तृ॒पदि॒न्द्रा वृ॑षस्व॥

बलवान् राजा राजसूय यज्ञ में सोमरस का पान करके या निष्पन्न राष्ट्र को ग्रहण करके शत्रु को नष्ट करने में समर्थ होता है और प्रजा के लिये सुख की वृष्टि करता है-एवं आत्मा सोम ओषधी रस को पीकर आत्मबल को प्राप्त होकर पाप एवं कामभावना को जीतता है-नष्ट करता है और अपने जीवन में सुख को आपूर भरपूर करता है॥१॥

अ॒स्य पि॑ब क्षु॒मतः॒ प्रस्थि॑त॒स्येन्द्र॒ सोम॑स्य॒ वर॒मा सु॒तस्य॑। स्व॒स्ति॒दा मन॑सा मादयस्वार्वाची॒नो रे॒वते॒ सौभ॑गाय॥

राजा या आत्मा प्रशस्त प्राप्त सोमरस, जो कल्याणदायक है, उसका पान करे, सुरापान नहीं करे, ये सौभाग्य के लिये और पुष्टि के लिये है तथा मानसिक तृप्ति के लिये है॥२॥

म॒मत्तु॑ त्वा दि॒व्यः सोम॑ इन्द्र म॒मत्तु॒ यः सू॒यते॒ पार्थि॑वेषु। म॒मत्तु॒ येन॒ वरि॑वश्च॒कर्थ॑ म॒मत्तु॒ येन॑ निरि॒णासि॒ शत्रू॑न्॥

राजा को चार प्रकार के सोमों का सेवन करना चाहिये, जो हर्ष के कारण हैं, प्रथम, आकाश का सोम-चन्द्रमा है, उसका सेवन करना चाहिये, वह मानसिक हर्ष को देता है, दूसरे-पृथिवी के ओषधिरूप सोम का रसपान करना चाहिये, तीसरे-राज्यैश्वर्य का सुचारुरूप से सेवन करना चाहिये और राष्ट्र को चलाना चाहिये, चौथे-वीर्य को शरीर में सुरक्षित रखना चाहिये, ऐसे ही आत्मा को चारों सोमों का सेवन करना चाहिये, हर्ष के लिये॥३॥

आ द्वि॒बर्हा॑ अमि॒नो या॒त्विन्द्रो॒ वृषा॒ हरि॑भ्यां॒ परि॑षिक्त॒मन्धः॑। गव्या सु॒तस्य॒ प्रभृ॑तस्य॒ मध्वः॑ स॒त्रा खेदा॑मरुश॒हा वृ॑षस्व॥

राजा विद्या और पुरुषार्थ के द्वारा बढ़ा हुआ तथा गुणशक्ति में अतुल हुआ राजपद पर अभिषिक्त होता है, प्रजा को दुःखहरण और सुखाहरण गुणों से राजपद पर सुशोभित होता है। रसस्वादपूर्ण पके हुए फल की भाँति राजपद का यथार्थ लाभ ले और दुःखी प्रजा के दुःख को दूर करनेवाला बने एवं आत्मा विद्यापुरुषार्थ से बढ़ा हुआ गुण और शक्तिपूर्ण स्नातक पद को प्राप्त करे। अध्यापक उपदेशकों द्वारा अज्ञान को-नष्ट कर ज्ञान को ग्रहण कर स्नातक पद प्राप्त करे, रसस्वादपूर्ण पके फल की भाँति सत्य तत्त्व को प्राप्त करे और दुःखितों के दुःख का नाशक बने॥४॥

नि ति॒ग्मानि॑ भ्रा॒शय॒न्भ्राश्या॒न्यव॑ स्थि॒रा त॑नुहि यातु॒जूना॑म्। उ॒ग्राय॑ ते॒ सहो॒ बलं॑ ददामि प्र॒तीत्या॒ शत्रू॑न्विग॒देषु॑ वृश्च॥

राजा सङ्ग्राम में जलते हुए दृढ़ वज्रास्त्रों को निरन्तर चलावे, पीड़ा देनेवाले शत्रुओं को नीचे गिरावे।  सङ्ग्रामों में शत्रु के सामने डटकर उन्हें छिन्न-भिन्न कर डाले॥५॥

व्य१॒॑र्य इ॑न्द्र तनुहि॒ श्रवां॒स्योजः॑ स्थि॒रेव॒ धन्व॑नो॒ऽभिमा॑तीः। अ॒स्म॒द्र्य॑ग्वावृधा॒नः सहो॑भि॒रनि॑भृष्टस्त॒न्वं॑ वावृधस्व॥

राजा को चाहिये कि वह राष्ट्र का स्वामी होकर धन अन्न की वृद्धि करे और शत्रुओं पर दृढ़ शस्त्रों से प्रहार करने के लिये उनका विस्तार करे और प्रजाओं को लक्ष्य करके राष्ट्र को समृद्ध करे एवं आत्मा शरीर का-स्वामी होकर उसके निर्वाह के लिये आवश्यक धन अन्न आदि वस्तुओं का उपार्जन करे और अन्दर के दबानेवाले काम आदि दोषों के दबाने के लिये दृढ़ शिवसङ्कल्पों का विस्तार करे और अपने शरीर को बढ़ावे॥६॥

इ॒दं ह॒विर्म॑घव॒न्तुभ्यं॑ रा॒तं प्रति॑ सम्रा॒ळहृ॑णानो गृभाय। तुभ्यं॑ सु॒तो म॑घव॒न्तुभ्यं॑ प॒क्वो॒३॒॑ऽद्धी॑न्द्र॒ पिब॑ च॒ प्रस्थि॑तस्य॥

राजा जब राजसूययज्ञ में राजपद को प्राप्त होता है-राजा बनता है तब उसके लिये उपहार भेंट दी जानी चाहिये, उसके लिये पीने को सोमरस और खाने को पौष्टिक पकवान भेंट करने चाहिये एवं जब आत्मा वेदारम्भ संस्कार से संस्कृत हो जावे, तब उसे प्राशन के लिये रस, दूध, दही आदि और पके हुए मिष्ठान्न आदि देना चाहिये॥७॥

अ॒द्धीदि॑न्द्र॒ प्रस्थि॑ते॒मा ह॒वींषि॒ चनो॑ दधिष्व पच॒तोत सोम॑म्। प्रय॑स्वन्तः॒ प्रति॑ हर्यामसि त्वा स॒त्याः स॑न्तु॒ यज॑मानस्य॒ कामाः॑॥

जितेन्द्रिय राजा का जब राजसूय यज्ञ हो, तब उसे अनेक प्रकार के भोजन के स्वादु पक्वान्न भोजन-फल रस भेंट देने चाहिये और साथ उसकी कामनाएँ पूर्ण हों, ऐसी भावनाएँ प्रकट करनी चाहिये एवं इन्द्रियों के स्वामी आत्मा जब किसी संस्कार से संस्कृत हो, तब पारिवारिक जन उसे विविध पक्वान्न और पके फलों के रस प्रदान करें और उसे आशीर्वाद दें कि उसकी कामनाएँ सफल हों॥८॥

प्रेन्द्रा॒ग्निभ्यां॑ सुवच॒स्यामि॑यर्मि॒ सिन्धा॑विव॒ प्रेर॑यं॒ नाव॑म॒र्कैः। अया॑ इव॒ परि॑ चरन्ति दे॒वा ये अ॒स्मभ्यं॑ धन॒दा उ॒द्भिद॑श्च॥

जैसे यन्त्रप्रयुक्त वायु और अग्नि के द्वारा नौका नदी या समुद्र में प्रेरित की जाती है, वैसे मन्त्रों शुद्धविचारों के द्वारा राजा की प्रशंसा और आत्मा की आशीर्वादरूप वाणी को राजा के लिये और आत्मा के लिये प्रेरित की जानी चाहिये, राजा को प्राप्त होनेवाले सभासद् और आत्मा को प्राप्त होनेवाले पारिवारिक जन सेवा करें उसे प्रसन्न करें और ज्ञानधन देनेवाले विद्वान् अज्ञान दुःख का छेदन करें॥९॥

न वा उ॑ दे॒वाः क्षुध॒मिद्व॒धं द॑दुरु॒ताशि॑त॒मुप॑ गच्छन्ति मृ॒त्यवः॑। उ॒तो र॒यिः पृ॑ण॒तो नोप॑ दस्यत्यु॒तापृ॑णन्मर्डि॒तारं॒ न वि॑न्दते॥

भूखा ही मरता है अन्न के अभाव से, ऐसी बात नहीं, किन्तु भरे पेट बहुत अन्न धन सम्पत्ति रखते हुए के पास मृत्युवें अनेक प्रकार से जाती हैं अर्थात् मृत्युवें होती हैं, अन्न के अधिक खाने से रोगी होकर, अध्यशन-खाने पर खाना खाने से, विषमिश्रित, अन्न के अधिक खाने से और चोरादि के द्वारा हो जाती हैं, दूसरे को तृप्त करने से अन्नधन क्षीण नहीं होता है, अवसर पर फिर प्राप्त हो जाता है और जो दूसरों को तृप्त नहीं करता है, वह सुख देनेवाले परमात्मा को नहीं प्राप्त कर सकता है॥१॥

य आ॒ध्राय॑ चकमा॒नाय॑ पि॒त्वोऽन्न॑वा॒न्त्सन्र॑फि॒तायो॑पज॒ग्मुषे॑। स्थि॒रं मनः॑ कृणु॒ते सेव॑ते पु॒रोतो चि॒त्स म॑र्डि॒तारं॒ न वि॑न्दते॥

अन्नवाला होकर के मनुष्य दरिद्र के लिये, भूखे के लिये, पीड़ित के लिये, शरणागत के लिये अवश्य भोजन दे, जो इनको न देकर स्वयं खाता है, वह पापी है, वह सुख देनेवाले परमात्मा को प्राप्त नहीं करता है॥२॥

स इद्भो॒जो यो गृ॒हवे॒ ददा॒त्यन्न॑कामाय॒ चर॑ते कृ॒शाय॑। अर॑मस्मै भवति॒ याम॑हूता उ॒ताप॒रीषु॑ कृणुते॒ सखा॑यम्॥

भोजन खानेवाला, खिलानेवाला या पालक वह ही है, उसे ही कहना चाहिये, जो अन्न के ग्राहक, अन्न के चाहनेवाले-विचरण करते हुए आगन्तुक और कृश शरीर के लिये देता है, इस ऐसे दाता के लिये समय की पुकार पर पर्याप्त हो जाता है, मिल जाता है, उसके पास कमी नहीं रहती, दूसरे विरोधी जनों का भी वह मित्र बन जाता है, सब उसकी प्रशंसा करते हैं॥३॥

न स सखा॒ यो न ददा॑ति॒ सख्ये॑ सचा॒भुवे॒ सच॑मानाय पि॒त्वः। अपा॑स्मा॒त्प्रेया॒न्न तदोको॑ अस्ति पृ॒णन्त॑म॒न्यमर॑णं चिदिच्छेत्॥

जो मित्र अपने को कहता है, वह सहयोगी सेवा करनेवाले मित्र के लिये नहीं देता है, तो वह मित्र नहीं कहलाता है, वह रहने का स्थान नहीं, ऐसा समझकर उसका मित्र साथ छोड़ देता है। अन्य तृप्त करनेवाले के पास चला जाता है, फिर बिना मित्र के असहाय रह जाता है, इसलिये सम्पन्न जन को अपने मित्र की सहायता करनी चाहिये॥४॥

पृ॒णी॒यादिन्नाध॑मानाय॒ तव्या॒न्द्राघी॑यांस॒मनु॑ पश्येत॒ पन्था॑म्। ओ हि वर्त॑न्ते॒ रथ्ये॑व च॒क्रान्यम॑न्य॒मुप॑ तिष्ठन्त॒ रायः॑॥

धनसम्पन्न मनुष्य अपने अन्न धन सम्पत्ति से अधिकार माँगनेवाले को तृप्त करे, इस प्रकार उदारता के मार्ग को अनुभव करे, क्योंकि धन सम्पत्तियाँ सदा एक के पास नहीं रहती हैं, वे तो गाड़ी के पहियों की भाँति घूमा करती हैं, आती-जाती रहती हैं॥५॥

मोघ॒मन्नं॑ विन्दते॒ अप्र॑चेताः स॒त्यं ब्र॑वीमि व॒ध इत्स तस्य॑। नार्य॒मणं॒ पुष्य॑ति॒ नो सखा॑यं॒ केव॑लाघो भवति केवला॒दी॥

जो मनुष्य अन्न धन सम्पत्ति का स्वामी बनकर उससे किसी ज्ञान देनेवाले विद्वान् का पोषण नहीं करता न किसी वंशीय सम्बन्धी का पोषण करता है, उसका अन्नधन सम्पत्ति पाना व्यर्थ है-घातक है, वह केवल अकेले खाकर पापी बनकर संसार से चला जाता है॥६॥

कृ॒षन्नित्फाल॒ आशि॑तं कृणोति॒ यन्नध्वा॑न॒मप॑ वृङ्क्ते च॒रित्रैः॑। वद॑न्ब्र॒ह्माव॑दतो॒ वनी॑यान्पृ॒णन्ना॒पिरपृ॑णन्तम॒भि ष्या॑त्॥

हल आदि साधन रखनेवाला किसान खेत जोतता हुआ खेती करता हुआ अपने को अन्न का भोक्ता बनाता है। हलादि साधन होते हुए खेती न करता हुआ किसान अपने को अन्नवान् नहीं बनाता है, चलने के साधन रखता हुआ-उनसे मार्ग को तै करता है-पार करता है न कि चलने के साधन होते हुए न चलते हुए पार करता है, विद्वान् प्रवचन करता हुआ न प्रवचन करनेवाले से श्रेष्ठ और सत्सङ्ग करने योग्य है, इसी प्रकार सम्बन्धी समीपी-जन अपने अन्नादि से तृप्त करता हुआ, न तृप्त करनेवाले के ऊपर हो जाता है-सम्मान का पात्र बन जाता है-अर्थात् अन्न धनादि होते हुए उससे दूसरों को तृप्त करना चाहिये॥७॥

एक॑पा॒द्भूयो॑ द्वि॒पदो॒ वि च॑क्रमे द्वि॒पात्त्रि॒पाद॑म॒भ्ये॑ति प॒श्चात्। चतु॑ष्पादेति द्वि॒पदा॑मभिस्व॒रे स॒म्पश्य॑न्प॒ङ्क्तीरु॑प॒तिष्ठ॑मानः॥

धनादि साधन का एक भाग रखनेवाला मनुष्य उसका सदुपयोग करता हुआ द्विगुण साधनवाले से अधिक विक्रम और सफलता प्राप्त करता है, दो भाग साधनवाला उसका उपयोग करता हुआ तीन भाग साधनवाले को पीछे ढकेल देता है। चार भाग साधनवाला केवल बैठा हुआ कुछ न करता हुआ दो भाग साधनवाले उपयोग करते हुए मनुष्यों की पादरेखाओं को देखता हुआ उनके आदेश पर चलता है-चला करता है॥८॥

स॒मौ चि॒द्धस्तौ॒ न स॒मं वि॑विष्टः सम्मा॒तरा॑ चि॒न्न स॒मं दु॑हाते। य॒मयो॑श्चि॒न्न स॒मा वी॒र्या॑णि ज्ञा॒ती चि॒त्सन्तौ॒ न स॒मं पृ॑णीतः॥

मनुष्य के हाथ समान हैं, पर किसी कार्य में समान प्रवेश नहीं करते। बालक को पालनेवाली दो धाइयाँ बालक को समान दूध नहीं पिलाती, माता से उत्पन्न हुए जुडवाँ दो मनुष्यों के समान बल नहीं होते। वंशवाले दो बड़े मनुष्य अपने अन्न धनादि से किसी अधिकारी को समानरूप से तृप्त नहीं करते हैं, इसलिये दान को स्पर्धा या तुलना पर न छोड़ना चाहिये, किन्तु श्रद्धा से देना ही चाहिये॥९॥

अग्ने॒ हंसि॒ न्य१॒॑त्रिणं॒ दीद्य॒न्मर्त्ये॒ष्वा। स्वे क्षये॑ शुचिव्रत॥

परमात्मा ज्ञानप्रकाश करता हुआ मनुष्यों के हृदयों में प्रकाशित होकर-प्राप्त होकर आत्मतेज को खानेवाले काम भाव को नष्ट करता है एवं ज्वलन कर्मवाला अग्नि हव्यस्थान यज्ञकुण्ड में जलता हुआ रक्तभक्षक कृमि को नष्ट करता है तथा परमात्मा की उपासना और हवन करना चाहिये॥१॥

उत्ति॑ष्ठसि॒ स्वा॑हुतो घृ॒तानि॒ प्रति॑ मोदसे। यत्त्वा॒ स्रुचः॑ स॒मस्थि॑रन्॥

परमात्मा प्रार्थना द्वारा आमन्त्रित किया हुआ साक्षात् होता है, तो मुमुक्षुजनों के कर्मों को लक्ष्य करके उन्हें आनन्दित करता है और उनकी स्तुतियाँ उसमें सङ्गत हो जाती हैं एवं होम द्वारा आधान को प्राप्त हुआ अग्नि उद्दीप्त हो जाता है, तब घृतादि हव्य द्रव्यों को लेकर सुगन्ध से आनन्दित कर देता है, जब कि जुहू आदि पात्र सम्यक् वर्त्तमान होते हैं॥२॥

स आहु॑तो॒ वि रो॑चते॒ऽग्निरी॒ळेन्यो॑ गि॒रा। स्रु॒चा प्रती॑कमज्यते॥

परमात्मा स्तुति करने योग्य है। वह स्तुति के द्वारा आमन्त्रित किया हुआ साक्षात् होता है और आत्मा में प्राप्त होता है एवं अग्नि मन्त्रवाणी से यज्ञकुण्ड में आधान को प्राप्त हुआ प्रकाशित होता है और घृतभरी स्रुवा से प्रदीप्त होता है॥३॥

घृ॒तेना॒ग्निः सम॑ज्यते॒ मधु॑प्रतीक॒ आहु॑तः। रोच॑मानो वि॒भाव॑सुः॥

परमात्मा विशेष दीप्ति से बसानेवाला प्रकाशमान है। वह मुमुक्षुचर्या से साक्षात् होता है, वह मधुसुख की प्रतीति का निमित्त है एवं अग्नि विशिष्ट ज्योति से बसानेवाला प्रकाशमान घृत की आहुति से प्रज्ज्वलित होता है और मधुमय गन्ध की प्रतीति-कराता है, उससे प्रतिदिन होम करना चाहिये॥४॥

जर॑माणः॒ समि॑ध्यसे दे॒वेभ्यो॑ हव्यवाहन। तं त्वा॑ हवन्त॒ मर्त्याः॑॥

परमात्मा आवश्यक वस्तुओं को प्राप्त करानेवाला है, वह स्तुति में लाया हुआ मुमुक्षुओं के लिये साक्षात् होता है, उसकी स्तुति प्रार्थना सब मनुष्यों को करनी चाहिये एवं अग्नि होम करने योग्य वस्तु को सूक्ष्म करती है और वायु आदि देवों के लिये पहुँचा देती है, इसलिये वायु आदि देवों को अनुकूल बनाने के लिये मनुष्यों को अग्नि में होम करना चाहिये॥५॥

तं म॑र्ता॒ अम॑र्त्यं घृ॒तेना॒ग्निं स॑पर्यत। अदा॑भ्यं गृ॒हप॑तिम्॥

मनुष्यों अहिंसनीय अमर परमात्मा हृदयगृह के स्वामी को ब्रह्मचर्य, शम, दमादि के द्वारा अपने अन्दर साक्षात् करें एवं पृथिवी जलादि के समान कणशः नष्ट न होनेवाले यज्ञगृह के स्वामी अग्नि को होम के द्वारा प्रतिदिन सेवन करें॥६॥

अदा॑भ्येन शो॒चिषाग्ने॒ रक्ष॒स्त्वं द॑ह। गो॒पा ऋ॒तस्य॑ दीदिहि॥

परमात्मा रक्षक है, दुष्टजन को अपने प्रबल तेज से दग्ध कर देता है और अध्यात्मयज्ञ को प्रकाशित करता है एवं अग्नि अपने प्रबल ताप से रोग को दग्ध कर देती है जब कि वह होमयज्ञ को प्रकाशित करती है॥७॥

स त्वम॑ग्ने॒ प्रती॑केन॒ प्रत्यो॑ष यातुधा॒न्यः॑। उ॒रु॒क्षये॑षु॒ दीद्य॑त्॥

अग्रणेता परमात्मा दुःख देनेवाली प्राणिजातियों को अपने प्रताप से नष्ट करता है मनुष्यों के हृदय में प्रकाशित होकर, या अग्नि दुःख देनेवाली रोगजातियों को होमयज्ञों में ज्वलित हुआ जलता हुआ अपनी लपट से नष्ट करता है॥८॥

तं त्वा॑ गी॒र्भिरु॑रु॒क्षया॑ हव्य॒वाहं॒ समी॑धिरे। यजि॑ष्ठं॒ मानु॑षे॒ जने॑॥

परमात्मा के आश्रय में स्तुति करनेवाले जन रहते हैं, वह उनकी स्तुतियों को स्वीकार करता है, स्तुतियों द्वारा अपने अन्दर प्रकाशित करते हैं एवं अग्नि के आश्रय मनुष्य अपने सब कार्य चलाते हैं, वे अपने होम आदि स्थानों में अग्नि को प्रकाशित करते हैं॥९॥

इति॒ वा इति॑ मे॒ मनो॒ गामश्वं॑ सनुया॒मिति॑। कु॒वित्सोम॒स्यापा॒मिति॑॥

उपासक मनुष्य जब परमात्मा के आनन्दरस को पी लेता है या पीता है, ग्रहण करता है, तो सांसारिक वस्तुओं में उसे राग नहीं रहता है, न रहना चाहिये, वह अपनी बहुमूल्य वस्तु को भी दूसरे को दान दे दिया करता है॥१॥

प्र वाता॑ इव॒ दोध॑त॒ उन्मा॑ पी॒ता अ॑यंसत। कु॒वित्सोम॒स्यापा॒मिति॑॥

परमात्मा का आनन्दरस बहुत पीने से उपासक को वायु के झौकों की भाँति वे आनन्दरस झुलाते हैं-झुमाते हैं॥२॥

उन्मा॑ पी॒ता अ॑यंसत॒ रथ॒मश्वा॑ इवा॒शवः॑। कु॒वित्सोम॒स्यापा॒मिति॑॥

परमात्मा के आनन्दरस का बहुत पान करनेवाले उपासक आत्मा को ऐसे ऊपर ले जाते हैं, जैसे शीघ्रगामी घोड़े रथ को उड़ाये ले जाते हैं॥३॥

उप॑ मा म॒तिर॑स्थित वा॒श्रा पु॒त्रमि॑व प्रि॒यम्। कु॒वित्सोम॒स्यापा॒मिति॑॥

परमात्मा के आनन्दरस का बहुत पान करनेवाले की मानसिक शक्ति या बुद्धि उसको ऐसे सङ्गत हो जाती है, जैसे प्रिय पुत्र को चाहती हुयी माता सङ्गत होती है॥४॥

अ॒हं तष्टे॑व व॒न्धुरं॒ पर्य॑चामि हृ॒दा म॒तिम्। कु॒वित्सोम॒स्यापा॒मिति॑॥

शिल्पी जैसे रथस्वामी के बैठने के स्थान को परिष्कृत करता है, ऐसे ही उपासक को अपनी मानसिक शक्ति को हृदय से श्रद्धा से-परिष्कृत करना चाहिये॥५॥

न॒हि मे॑ अक्षि॒पच्च॒नाच्छा॑न्त्सुः॒ पञ्च॑ कृ॒ष्टयः॑। कु॒वित्सोम॒स्यापा॒मिति॑॥

परमात्मा के आनन्दरस का बहुत पान करनेवाले के नेत्रसञ्चार-दर्शनव्यवहार को कोई रोक नहीं सकता॥६॥

न॒हि मे॒ रोद॑सी उ॒भे अ॒न्यं प॒क्षं च॒न प्रति॑। कु॒वित्सोम॒स्यापा॒मिति॑॥

जो परमात्मा के आनन्दरस का पान कर चुकता है, उसे सारा जगत् भी परमात्मा की ओर से हटा नहीं सकता॥७॥

अ॒भि द्यां म॑हि॒ना भु॑वम॒भी॒३॒॑मां पृ॑थि॒वीं म॒हीम्। कु॒वित्सोम॒स्यापा॒मिति॑॥

परमात्मा के रस का बहुत पान करनेवाला द्युलोक और पृथिवीलोक को भी अपने ज्ञान में रखता है॥८॥

हन्ता॒हं पृ॑थि॒वीमि॒मां नि द॑धानी॒ह वे॒ह वा॑। कु॒वित्सोम॒स्यापा॒मिति॑॥

परमात्मा के आनन्दरस को बहुत पी चुकनेवाला विचार किया करता है कि अपनी इस देह को इस लोक में या योगभूमि में अभी रखूँ या मोक्ष में या योगभूमि में रखूँ, इस प्रकार उसका अधिकार हो जाता है॥९॥

ओ॒षमित्पृ॑थि॒वीम॒हं ज॒ङ्घना॑नी॒ह वे॒ह वा॑। कु॒वित्सोम॒स्यापा॒मिति॑॥

परमात्मा के आनन्दरस का बहुत पान करनेवाला प्रखर तापवाले सूर्य को इस अन्तरिक्ष में यहाँ इच्छानुसार उपयोग में लाता है या ध्यान द्वारा भी उपयोग में लाता है॥१०॥

दि॒वि मे॑ अ॒न्यः प॒क्षो॒३॒॑ऽधो अ॒न्यम॑चीकृषम्। कु॒वित्सोम॒स्यापा॒मिति॑॥

परमात्मा के आनन्दरस को जो बहुत पी लेता है, उसका एक स्वरूप मुक्त होना मोक्ष में है और दूसरा संसार में बद्धरूप से होता है। इन दोनों का विवेचन वह करता है॥११॥

अ॒हम॑स्मि महाम॒हो॑ऽभिन॒भ्यमुदी॑षितः। कु॒वित्सोम॒स्यापा॒मिति॑॥

परमात्मा के आनन्दरस का बहुत पान करनेवाला उपासक अन्तरिक्ष में उठे सूर्य की भाँति मोक्ष में पहुँचा हुआ महादीर्घ जीवन प्राप्त करता है॥१२॥

गृ॒हो या॒म्यरं॑कृतो दे॒वेभ्यो॑ हव्य॒वाह॑नः। कु॒वित्सोम॒स्यापा॒मिति॑॥

परमात्मा के आनन्दरस का बहुत पान कर चुकनेवाला ऊँची-ऊँची भूमियों को प्राप्त होता हुआ मोक्ष के दीर्घ जीवन को भोगकर पुनः शरीर में देह में इन्द्रियों के भोगों को प्राप्त कराने के लिये सामर्थ्ययुक्त हुआ फिर देह में आता है-पुनर्जन्म धारण करता है, मुक्ति से पुनरावृत्त होता है॥१३॥

तदिदा॑स॒ भुव॑नेषु॒ ज्येष्ठं॒ यतो॑ ज॒ज्ञ उ॒ग्रस्त्वे॒षनृ॑म्णः। स॒द्यो ज॑ज्ञा॒नो नि रि॑णाति॒ शत्रू॒ननु॒ यं विश्वे॒ मद॒न्त्यूमाः॑॥

परमात्मा उत्पन्न हुए पदार्थों में पूर्व से वर्त्तमान महान् है, उससे तीक्ष्ण तेजवाला सूर्य और ज्ञानी जीवात्मा प्रादुर्भूत होते हैं, सूर्य अपने तीक्ष्ण ताप से विरोधी अन्धकारादि को नष्ट करता है और जीवात्मा ज्ञान से विरोधी को अनुकूल बनाता है, इनको लक्ष्य करके सब हर्षित होते हैं॥१॥

वा॒वृ॒धा॒नः शव॑सा॒ भूर्यो॑जाः॒ शत्रु॑र्दा॒साय॑ भि॒यसं॑ दधाति। अव्य॑नच्च व्य॒नच्च॒ सस्नि॒ सं ते॑ नवन्त॒ प्रभृ॑ता॒ मदे॑षु॥

परमात्मा अपने आत्मबल से बढ़ा हुआ पापीजन को नष्ट करनेवाला है, उपासकों को क्षीण करनेवाले विरोधी को भय देता है-दण्ड देता है, प्राण लेनेवाली या न प्राण लेनेवाली वस्तु उपासकों के लिये शुद्ध और निर्दोष हो जाती है, सब प्राणी उससे पालित होते हुए उसके दिये हुए सुख हर्षों में अपने को सङ्गत करते हैं॥२॥

त्वे क्रतु॒मपि॑ वृञ्जन्ति॒ विश्वे॒ द्विर्यदे॒ते त्रिर्भव॒न्त्यूमाः॑। स्वा॒दोः स्वादी॑यः स्वा॒दुना॑ सृजा॒ सम॒दः सु मधु॒ मधु॑ना॒भि यो॑धीः॥

परमात्मा के सब मनुष्य रक्षणीय हैं, रक्षा चाहनेवाले हैं, वे सब रक्षणीय बन जाते हैं, जबकि अपने कर्त्तव्य कर्म को परमात्मा के प्रति समर्पित कर देते हैं, निष्काम बन जाते हैं, वे ब्रह्मचारी हों या विवाहित-पति पत्नी हों या सन्तानसहित परिवारवाले हों। इस प्रकार संसार में जो लोग सुख स्वाद पाते हैं, उससे भी अधिक सुख स्वादवाला परमात्मा उसकी उपासना यदि इनमें चलती रहे, तो उसका उत्तम स्वादरूप उस सांसारिक स्वाद में मिल जाये, तो सांसारिक जीवन भी स्वादवाला हो जाता है और पतन से बच जाता है॥३॥

इति॑ चि॒द्धि त्वा॒ धना॒ जय॑न्तं॒ मदे॑मदे अनु॒मद॑न्ति॒ विप्राः॑। ओजी॑यो धृष्णो स्थि॒रमा त॑नुष्व॒ मा त्वा॑ दभन्यातु॒धाना॑ दु॒रेवाः॑॥

परमात्मा अत्यन्त आत्मबलवाला है, उसका न्यायशस्त्र सबल है, प्राणियों को पीड़ा देनेवाले कुटिलगामी नास्तिक दुष्ट जन उसके न्यायदण्ड से बच नहीं सकते, समस्त तृप्त करनेवाली वस्तुओं के अधिष्ठाता परमात्मा के आश्रय में रहनेवाले विद्वान् उपासक प्रत्येक आनन्द उत्सव में उसकी स्तुति किया करते हैं॥४॥

त्वया॑ व॒यं शा॑शद्महे॒ रणे॑षु प्र॒पश्य॑न्तो यु॒धेन्या॑नि॒ भूरि॑। चो॒दया॑मि त॒ आयु॑धा॒ वचो॑भिः॒ सं ते॑ शिशामि॒ ब्रह्म॑णा॒ वयां॑सि॥

जितना भी कोई शस्त्रचालक हो, उसे परमात्मा के सहाय्य से युद्ध में शस्त्र चलाकर शत्रु पर जय पाने की प्रार्थना करनी चाहिये। अपने शस्त्रों को तीक्ष्ण बनाना, विजय पाना चाहिये॥५॥

स्तु॒षेय्यं॑ पुरु॒वर्प॑स॒मृभ्व॑मि॒नत॑ममा॒प्त्यमा॒प्त्याना॑म्। आ द॑र्षते॒ शव॑सा स॒प्त दानू॒न्प्र सा॑क्षते प्रति॒माना॑नि॒ भूरि॑॥

सत्सङ्ग के लिये प्राप्तव्य विद्वानों का भी जो प्राप्तव्य, गुरुओं का गुरु, स्तुतियोग्य अनन्त गुणरूप सर्वेश्वर परमात्मा इन्द्रियों को बहिर्मुख खोलता है, जिनके लिये बहुत विषयों को प्राप्त कराता है, उपासनीय है॥६॥

नि तद्द॑धि॒षेऽव॑रं॒ परं॑ च॒ यस्मि॒न्नावि॒थाव॑सा दुरो॒णे। आ मा॒तरा॑ स्थापयसे जिग॒त्नू अत॑ इनोषि॒ कर्व॑रा पु॒रूणि॑॥

परमात्मा ने विशाल ब्रह्माण्ड बनाया, जिसमें प्रकाशात्मक पिण्ड और अप्रकाशात्मक प्रकाश्य पिण्ड स्थापित किये, उनमें जड़ जङ्गम-वृक्ष और मनुष्यादि योनियाँ नियत कीं, उनके लिये वैसे-वैसे अन्न आहार की व्यवस्था करी, इस प्रकार बहुत कर्मकलापों को करा॥७॥

इ॒मा ब्रह्म॑ बृ॒हद्दि॑वो विव॒क्तीन्द्रा॑य शू॒षम॑ग्रि॒यः स्व॒र्षाः। म॒हो गो॒त्रस्य॑ क्षयति स्व॒राजो॒ दुर॑श्च॒ विश्वा॑ अवृणो॒दप॒ स्वाः॥

वेदविद्या का विद्वान् अपने सुख के लिये परमात्मा की स्तुति प्रार्थना करता है, जो परमात्मा वेदज्ञान का स्वामी है और वेदज्ञान को प्राप्त करके अपने मन आदि द्वारों को खोलता है॥८॥

ए॒वा म॒हान्बृ॒हद्दि॑वो॒ अथ॒र्वावो॑च॒त्स्वां त॒न्व१॒॑मिन्द्र॑मे॒व। स्वसा॑रो मात॒रिभ्व॑रीररि॒प्रा हि॒न्वन्ति॑ च॒ शव॑सा व॒र्धय॑न्ति च॥

महान् विद्वान् अपनी स्तुति प्रार्थना को जब परमात्मा के प्रति अर्पित करता है, तो निष्पाप स्तुतियाँ परमात्मा में आश्रय लेकर उसे प्रभावित करती हैं और स्तुति करनेवाले के अन्दर साक्षात् कराती हैं॥९॥

हि॒र॒ण्य॒ग॒र्भः सम॑वर्त॒ताग्रे॑ भू॒तस्य॑ जा॒तः पति॒रेक॑ आसीत्। स दा॑धार पृथि॒वीं द्यामु॒तेमां कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥

परमात्मा जगत् से पूर्व वर्त्तमान था और है, सूर्यादि प्रकाशमान पिण्डों को अपने अन्दर रखता हुआ सारे जगत् का स्वामी पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युलोक को धारण करता है, उस परमात्मा की आत्मभाव से उपासना करनी चाहिये॥१॥

य आ॑त्म॒दा ब॑ल॒दा यस्य॒ विश्व॑ उ॒पास॑ते प्र॒शिषं॒ यस्य॑ दे॒वाः। यस्य॑ छा॒यामृतं॒ यस्य॑ मृ॒त्युः कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥

परमात्मा संसार में भेजकर आत्मबोध देता है, अपनी सङ्गति से बल देता है, उसका नियम सब सेवन करते हैं, कोई तोड़ नहीं सकता, उसकी शरण लेने से अमृत हो जाता है, अन्यथा मृत्यु को प्राप्त होता रहता है, उस सुखस्वरूप प्रजापति को उपहाररूप से अपने आत्मा का समर्पण करना चाहिये॥२॥

यः प्रा॑ण॒तो नि॑मिष॒तो म॑हि॒त्वैक॒ इद्राजा॒ जग॑तो ब॒भूव॑। य ईशे॑ अ॒स्य द्वि॒पद॒श्चतु॑ष्पदः॒ कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥

परमात्मा स्थावर जङ्गम जगत् का तथा दो पैर और चार पैरवाले प्राणी का स्वामी है, उस सुखस्वरूप प्रजापति के लिये उपहाररूप से अपनी आत्मा को समर्पित करना चाहिये॥३॥

यस्ये॒मे हि॒मव॑न्तो महि॒त्वा यस्य॑ समु॒द्रं र॒सया॑ स॒हाहुः। यस्ये॒माः प्र॒दिशो॒ यस्य॑ बा॒हू कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥

नदियों के साथ समुद्र, हिमालय पर्वत और समस्त दिशाएँ परमात्मा के महत्त्व को दर्शा रही हैं, उस ऐसे सुखरूप प्रजापति के लिये उपहाररूप में अपनी आत्मा को समर्पित करना चाहिये॥४॥

येन॒ द्यौरु॒ग्रा पृ॑थि॒वी च॑ दृ॒ळ्हा येन॒ स्व॑ स्तभि॒तं येन॒ नाकः॑। यो अ॒न्तरि॑क्षे॒ रज॑सो वि॒मानः॒ कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥

परमात्मा तेजस्वी द्युमण्डल को और कठोर पृथिवी को, मध्य स्थान को और लोकमात्र को तथा मोक्षधाम को सम्भाले हुए है, उस ऐसे सुखस्वरूप प्रजापति के लिये उपहाररूप से अपनी आत्मा को समर्पित करना चाहिये॥५॥

यं क्रन्द॑सी॒ अव॑सा तस्तभा॒ने अ॒भ्यैक्षे॑तां॒ मन॑सा॒ रेज॑माने। यत्राधि॒ सूर॒ उदि॑तो वि॒भाति॒ कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥

परमात्मा ने द्युमण्डल पृथिवीमण्डल को आमने-सामने स्थिर किया है-रखा है और अपने शासन में उन्हें चला रहा है, सूर्य भी उसी के आधार पर उदय होता है, ऐसे सुखस्वरूप प्रजापति के लिये उपहाररूप से अपने आत्मा को समर्पित करना चाहिये॥६॥

आपो॑ ह॒ यद्बृ॑ह॒तीर्विश्व॒माय॒न्गर्भं॒ दधा॑ना ज॒नय॑न्तीर॒ग्निम्। ततो॑ दे॒वानां॒ सम॑वर्त॒तासु॒रेकः॒ कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥

सृष्टि के आरम्भ में परमाणु प्रवाह आग्नेय तत्त्व को अपने अन्दर धारण करता हुआ प्रकट होता है, तब स्वामीरूप से वर्त्तमान सब देवों का देव परमात्मा वर्तमान था, उस सुखस्वरूप प्रजापति के लिये उपहारस्वरूप अपने आत्मा को समर्पित करना चाहिये॥७॥

यश्चि॒दापो॑ महि॒ना प॒र्यप॑श्य॒द्दक्षं॒ दधा॑ना ज॒नय॑न्तीर्य॒ज्ञम्। यो दे॒वेष्वधि॑ दे॒व एक॒ आसी॒त्कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥

परमात्मा अपने महत्त्व से सृष्टियज्ञ के प्रारम्भ करनेवाले परमाणुओं को भलीभाँति जानता है, जो सब देवों के ऊपर अधिष्ठाता होकर वर्त्तमान है, उस सुखस्वरूप प्रजापति के लिये उपहाररूप से अपनी आत्मा को समर्पित करना चाहिये॥८॥

मा नो॑ हिंसीज्जनि॒ता यः पृ॑थि॒व्या यो वा॒ दिवं॑ स॒त्यध॑र्मा ज॒जान॑। यश्चा॒पश्च॒न्द्रा बृ॑ह॒तीर्ज॒जान॒ कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥

जिस परमात्मा ने पृथिवीलोक, द्युलोक, चन्द्रताराओं से भरा मन भानेवाला अन्तरिक्ष उत्पन्न किया है, उस सुखस्वरूप प्रजापति के लिये उपहाररूप में अपने आत्मा का समर्पण करना चाहिये॥९॥

प्रजा॑पते॒ न त्वदे॒तान्य॒न्यो विश्वा॑ जा॒तानि॒ परि॒ ता ब॑भूव। यत्का॑मास्ते जुहु॒मस्तन्नो॑ अस्तु व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम्॥

जो वस्तुएँ पूर्व उत्पन्न हुईं या वर्तमान में होती हैं, उन सबका परमात्मा अधिष्ठाता है, अन्य नहीं, जिस-जिस कामना को लेकर मनुष्य भावना प्रस्तुत करते हैं, वह पूरी होती है, मनुष्य आवश्यक धनों के स्वामी बन जाते हैं॥१०॥

वसुं॒ न चि॒त्रम॑हसं गृणीषे वा॒मं शेव॒मति॑थिमद्विषे॒ण्यम्। स रा॑सते शु॒रुधो॑ वि॒श्वधा॑यसो॒ऽग्निर्होता॑ गृ॒हप॑तिः सु॒वीर्य॑म्॥

जो परमात्मा ज्ञानप्रकाश में बसानेवाला सुखस्वरूप, सर्वत्र व्याप्त, सबको स्नेह करनेवाला, सब शरीरों हृदयगृह का स्वामी, भूख और रोग को मिटानेवाली ओषधियों तथा बल का दाता है उसकी स्तुति करनी चाहिये॥१॥

जु॒षा॒णो अ॑ग्ने॒ प्रति॑ हर्य मे॒ वचो॒ विश्वा॑नि वि॒द्वान्व॒युना॑नि सुक्रतो। घृत॑निर्णि॒ग्ब्रह्म॑णे गा॒तुमेर॑य॒ तव॑ दे॒वा अ॑जनय॒न्ननु॑ व्र॒तम्॥

परमात्मा अपने तेज से स्तुति करनेवाले को निर्मल-निर्दोष बनाता है, उसके प्रार्थनावचन को प्रसन्न हुआ स्वीकारता है और सत्यमार्ग पर प्रेरित करता है, विद्वान् जन उसके सङ्ग से अपने को सफल बनाते हैं॥२॥

स॒प्त धामा॑नि परि॒यन्नम॑र्त्यो॒ दाश॑द्दा॒शुषे॑ सु॒कृते॑ मामहस्व। सु॒वीरे॑ण र॒यिणा॑ग्ने स्वा॒भुवा॒ यस्त॒ आन॑ट् स॒मिधा॒ तं जु॑षस्व॥

परमात्मा अमर है, वह सात लोकों में व्याप्त है, आत्मसमर्पी जन को अपना आनन्द देता है, स्तुति करनेवाले को प्रबल प्राण देकर तृप्त करता है॥३॥

य॒ज्ञस्य॑ के॒तुं प्र॑थ॒मं पु॒रोहि॑तं ह॒विष्म॑न्त ईळते स॒प्त वा॒जिन॑म्। शृ॒ण्वन्त॑म॒ग्निं घृ॒तपृ॑ष्ठमु॒क्षणं॑ पृ॒णन्तं॑ दे॒वं पृ॑ण॒ते सु॒वीर्य॑म्॥

अध्यात्मयज्ञ के प्रेरक जगत् के प्रथम से धारक, मोक्ष में अमृतान्न के देनेवाले, प्रार्थना स्वीकार करनेवाले, तेजस्विरूप शोभन बलदायक तृप्तिकारक परमात्मा की मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार, श्रोत्र, नेत्र और वाणी द्वारा स्तुति करनी चाहिये॥४॥

त्वं दू॒तः प्र॑थ॒मो वरे॑ण्यः॒ स हू॒यमा॑नो अ॒मृता॑य मत्स्व। त्वां म॑र्जयन्म॒रुतो॑ दा॒शुषो॑ गृ॒हे त्वां स्तोमे॑भि॒र्भृग॑वो॒ वि रु॑रुचुः॥

परमात्मा वरने योग्य और प्रेरक है, अध्यात्मयाजी तेजस्वी महानुभाव उसे प्राप्त करते हैं, वह आत्मसमर्पी के हृदयघर में साक्षात् होता है॥५॥

इषं॑ दु॒हन्त्सु॒दुघां॑ वि॒श्वधा॑यसं यज्ञ॒प्रिये॒ यज॑मानाय सुक्रतो। अग्ने॑ घृ॒तस्नु॒स्त्रिॠ॒तानि॒ दीद्य॑द्व॒र्तिर्य॒ज्ञं प॑रि॒यन्त्सु॑क्रतूयसे॥

परमात्मा जगद्रचनादि शोभनकर्म करनेवाला है, अध्यात्मयज्ञ को करनेवाले यजमान के लिये वेदवाणी को प्रदान करता है, उसकी स्तुति, प्रार्थना, उपासना सफल करता है, ऐसा ईश्वर आश्रय लेने योग्य है॥६॥

त्वामिद॒स्या उ॒षसो॒ व्यु॑ष्टिषु दू॒तं कृ॑ण्वा॒ना अ॑यजन्त॒ मानु॑षाः। त्वां दे॒वा म॑ह॒याय्या॑य वावृधु॒राज्य॑मग्ने निमृ॒जन्तो॑ अध्व॒रे॥

प्रातःकाल के उषा वेला में मनुष्य परमात्मा की स्तुतिपूर्वक यज्ञ करे तथा मुमुक्षुजन भी मोक्षार्थ, स्तुतियों द्वारा अध्यात्मयज्ञ रचावे, अपने चित्त को निर्मल निर्दोष निरुद्ध करें॥७॥

नि त्वा॒ वसि॑ष्ठा अह्वन्त वा॒जिनं॑ गृ॒णन्तो॑ अग्ने वि॒दथे॑षु वे॒धसः॑। रा॒यस्पोषं॒ यज॑मानेषु धारय यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॥

परमात्मा में अत्यन्त बसानेवाले उपासक उसकी स्तुति से आमन्त्रित करते हैं, अमृतभोग चाहते हुए विविध धन आदि वस्तुओं के सार लाभ यश आदि को प्राप्त करते हैं सदुपयोग करके॥८॥

अ॒यं वे॒नश्चो॑दय॒त्पृश्नि॑गर्भा॒ ज्योति॑र्जरायू॒ रज॑सो वि॒माने॑। इ॒मम॒पां सं॑ग॒मे सूर्य॑स्य॒ शिशुं॒ न विप्रा॑ म॒तिभी॑ रिहन्ति॥

परमात्मा ब्रह्माण्ड का रक्षक है, लोकनिर्माणस्थान महाकाश में परमाणुओं को प्रेरित करता है, सूक्ष्म के सङ्गमन-समागम समय-प्रातरेव विद्वान् स्तुति करते हैं एवं विद्युद्देव मेघ का रक्षक है, वर्षा समय उसकी प्रशंसा करते हैं॥१॥

स॒मु॒द्रादू॒र्मिमुदि॑यर्ति वे॒नो न॑भो॒जाः पृ॒ष्ठं ह॑र्य॒तस्य॑ दर्शि। ऋ॒तस्य॒ साना॒वधि॑ वि॒ष्टपि॒ भ्राट् स॑मा॒नं योनि॑म॒भ्य॑नूषत॒ व्राः॥

कमनीय परमात्मा ने जीवात्मा के लिये वेद का ज्ञान दिया, जीवात्मा परमात्मा के स्वरूप को हृदय में देखता है और अन्य जन उसकी स्तुति करते हैं, एवं विद्युत्-चमकनेवाली अच्छी लगती है, वह जल देती है, जल मेघ में होता है, जल बरस जाने पर जन उसकी प्रशंसा करते हैं॥२॥

स॒मा॒नं पू॒र्वीर॒भि वा॑वशा॒नास्तिष्ठ॑न्व॒त्सस्य॑ मा॒तरः॒ सनी॑ळाः। ऋ॒तस्य॒ साना॒वधि॑ चक्रमा॒णा रि॒हन्ति॒ मध्वो॑ अ॒मृत॑स्य॒ वाणीः॑॥

वेदवाणियाँ शाश्वत हैं, नित्य हैं, सब एक परमात्मा का वर्णन करती हैं, उस अमृतस्वरूप मधुर परमात्मा का आनन्द चखाती हैं, अतः परमात्मा के ज्ञानार्थ वेदवाणी का अध्ययन आवश्यक है॥३॥

जा॒नन्तो॑ रू॒पम॑कृपन्त॒ विप्रा॑ मृ॒गस्य॒ घोषं॑ महि॒षस्य॒ हि ग्मन्। ऋ॒तेन॒ यन्तो॒ अधि॒ सिन्धु॑मस्थुर्वि॒दद्ग॑न्ध॒र्वो अ॒मृता॑नि॒ नाम॑॥

मेधावी विद्वान् परमात्मा के स्वरूप को जानते हुए उसकी स्तुति करते हैं, उसके ज्ञान की घोषणा करनेवाले वेद को प्राप्त होते हैं और यथार्थ आचरण करते हुए आनन्दसिन्धु में स्थिर होते हैं। वेदवाणी को धारण करता हुआ मनुष्य उसके अमृत नामों को प्राप्त करता है॥४॥

अ॒प्स॒रा जा॒रमु॑पसिष्मिया॒णा योषा॑ बिभर्ति पर॒मे व्यो॑मन्। चर॑त्प्रि॒यस्य॒ योनि॑षु प्रि॒यः सन्त्सीद॑त्प॒क्षे हि॑र॒ण्यये॒ स वे॒नः॥

आप्त पुरुषों में प्राप्तव्य स्तुति हृदय के अन्दर स्तुति करने योग्य दुःखहर्त्ता परमात्मा को धारण कराती है, जो आत्मा का घर है, जैसे मित्र के घरों में मित्र प्राप्त होता है, ऐसे परमात्मा जीवात्मा के घर में प्राप्त होता है॥५॥

नाके॑ सुप॒र्णमुप॒ यत्पत॑न्तं हृ॒दा वेन॑न्तो अ॒भ्यच॑क्षत त्वा। हिर॑ण्यपक्षं॒ वरु॑णस्य दू॒तं य॒मस्य॒ योनौ॑ शकु॒नं भु॑र॒ण्युम्॥

स्तुति करनेवाले जन मोक्ष पाने के निमित्त अपने हृदय में तुझे प्राप्त होते हुए-साक्षात् होते हुए पके हुए अमृत फल को देनेवाले कामादि को दूर करनेवाले संसार में पालन करनेवाले शक्तिमान् तुझ-परमात्मा को साक्षात् करते हैं॥६॥

ऊ॒र्ध्वो ग॑न्ध॒र्वो अधि॒ नाके॑ अस्थात्प्र॒त्यङ्चि॒त्रा बिभ्र॑द॒स्यायु॑धानि। वसा॑नो॒ अत्कं॑ सुर॒भिं दृ॒शे कं स्व१॒॑र्ण नाम॑ जनत प्रि॒याणि॑॥

परमात्मा पृथिवी आदि लोकों को धारण कर रहा है, स्वरूपतः मोक्षधाम साक्षात् होता है, इसके शस्त्र विचित्र हैं, सुगन्धयुक्त मीठे वज्र को गुप्तरूप में रखता है, सुख दिखाने के लिये उत्पन्न करता है॥७॥

द्र॒प्सः स॑मु॒द्रम॒भि यज्जिगा॑ति॒ पश्य॒न्गृध्र॑स्य॒ चक्ष॑सा॒ विध॑र्मन्। भा॒नुः शु॒क्रेण॑ शो॒चिषा॑ चका॒नस्तृ॒तीये॑ चक्रे॒ रज॑सि प्रि॒याणि॑॥

परमात्मा उपासक के हृदय में प्राप्त होता है। जब वो उसे विशेष ध्यान में संलग्न देखता, अपनी ज्ञानप्रज्योति से मोक्ष में प्रिय सुख देता है॥८॥

इ॒मं नो॑ अग्न॒ उप॑ य॒ज्ञमेहि॒ पञ्च॑यामं त्रि॒वृतं॑ स॒प्तत॑न्तुम्। असो॑ हव्य॒वाळु॒त नः॑ पुरो॒गा ज्योगे॒व दी॒र्घं तम॒ आश॑यिष्ठाः॥

जाठर अग्नि प्राण इन्द्रियों में आधार पृथिवी आदि भूत से सङ्गृहीत तीन वात पित्त कफ में वर्तमान सात रस रक्त मांसादि धातुओं के घर-शरीर में आत्मा चालक स्वामी है, पर वह घने अन्धकार में है, उसे बाहिरी दृष्टि से कोई देख नहीं सकता है॥१॥

अदे॑वाद्दे॒वः प्र॒चता॒ गुहा॒ यन्प्र॒पश्य॑मानो अमृत॒त्वमे॑मि। शि॒वं यत्सन्त॒मशि॑वो॒ जहा॑मि॒ स्वात्स॒ख्यादर॑णीं॒ नाभि॑मेमि॥

आत्मा मृत्यु से भय करता हुआ रक्षा चाहता, कहीं गुप्त स्थान में छिप जाऊँ, अमर पद प्राप्त हो जाए, यह आकाङ्क्षा रहती है, संसार के भोगों में रहते यह आकाङ्क्षा पूरी नहीं होती, परन्तु नित्य स्थिर कल्याणस्वरूप परमात्मा प्राप्त होता है, जिसके साथ इसका स्वाभाविक स्नेहसम्बन्ध है, उसे प्राप्त कर अमरपन को प्राप्त करता है॥२॥

पश्य॑न्न॒न्यस्या॒ अति॑थिं व॒याया॑ ऋ॒तस्य॒ धाम॒ वि मि॑मे पु॒रूणि॑। शंसा॑मि पि॒त्रे असु॑राय॒ शेव॑मयज्ञि॒याद्य॒ज्ञियं॑ भा॒गमे॑मि॥

सृष्टिरूप भोगमयी शाखा को छोड़कर मुक्तिरूप स्थिर जीवन देनेवाली शाखा में अमृत भोग है, वहाँ सङ्कल्पात्मक अभौतिक अङ्गों से सुख भोगा जाता है, अपने जैसे चेतन परमात्मा के आश्रय उसे प्राप्त करना चाहिये॥३॥

ब॒ह्वीः समा॑ अकरम॒न्तर॑स्मि॒न्निन्द्रं॑ वृणा॒नः पि॒तरं॑ जहामि। अ॒ग्निः सोमो॒ वरु॑ण॒स्ते च्य॑वन्ते प॒र्याव॑र्द्रा॒ष्ट्रं तद॑वाम्या॒यन्॥

इस शरीर के अन्दर जीवात्मा बहुत वर्षों से वास करता चला आ रहा है, अब तो पालक परमात्मा को वरने के हेतु इसे त्याग देना होगा, बन्धन के कर्म नहीं करना है। शरीर में जाठर अग्नि इन्द्रियगण और प्राण च्युत हो जाते हैं, हो जावें, चिन्ता नहीं, परन्तु स्वतन्त्रतापूर्ण मोक्ष स्वराष्ट्र बहुत काल के पश्चात् मिलता है, उसको पाना है, ऐसी आध्यात्मिक जीवन्मुक्त की इच्छा होनी चाहिये॥४॥

निर्मा॑या उ॒ त्ये असु॑रा अभूव॒न्त्वं च॑ मा वरुण का॒मया॑से। ऋ॒तेन॑ राज॒न्ननृ॑तं विवि॒ञ्चन्मम॑ रा॒ष्ट्रस्याधि॑पत्य॒मेहि॑॥

शरीर में काम सांसारिक भोग नहीं चाहते हैं, मोक्ष को चाहते हैं, जहाँ आत्मा का स्वतन्त्र राज्य है, साङ्कल्पिक शरीर है॥५॥

इ॒दं स्व॑रि॒दमिदा॑स वा॒मम॒यं प्र॑का॒श उ॒र्व१॒॑न्तरि॑क्षम्। हना॑व वृ॒त्रं नि॒रेहि॑ सोम ह॒विष्ट्वा॒ सन्तं॑ ह॒विषा॑ यजाम॥

मोक्ष का इच्छुक जीवन्मुक्त जन अपने इन्द्रियगण को शरीर से बाहिर अपने साथ निकलने की प्रेरणा करता है, मोक्ष में उनके लिये साङ्कल्पिक स्थिर सुख मिलते हैं, आत्मा के साथ इन्द्रियशक्ति भी जाती है, ऐसा आया है॥६॥

क॒विः क॑वि॒त्वा दि॒वि रू॒पमास॑ज॒दप्र॑भूती॒ वरु॑णो॒ निर॒पः सृ॑जत्। क्षेमं॑ कृण्वा॒ना जन॑यो॒ न सिन्ध॑व॒स्ता अ॑स्य॒ वर्णं॒ शुच॑यो भरिभ्रति॥

मोक्ष में परमात्मा आत्मा के अन्दर अपने आनन्द को भर देता है, साङ्कल्पिक प्राण की प्रवृत्तियाँ भी अपनी विभूति से प्रवृत्तियों को चालू कर देती हैं, जो इस आत्मा की कामनाओं को पूरा करती हैं, इसके रूप को चमकाती हैं॥७॥

ता अ॑स्य॒ ज्येष्ठ॑मिन्द्रि॒यं स॑चन्ते॒ ता ई॒मा क्षे॑ति स्व॒धया॒ मद॑न्तीः। ता ईं॒ विशो॒ न राजा॑नं वृणा॒ना बी॑भ॒त्सुवो॒ अप॑ वृ॒त्राद॑तिष्ठन्॥

कामवृत्तियाँ कुछ आत्मा का आश्रय लेती आत्मा से अनुभूत होती हैं, कुछ मन के साथ संगत होती हैं, कुछ आत्मा को आनन्द देतीं, कुछ देह के भय से पृथक्-पृथक् रहती हैं॥८॥

बी॒भ॒त्सूनां॑ स॒युजं॑ हं॒समा॑हुर॒पां दि॒व्यानां॑ स॒ख्ये चर॑न्तम्। अ॒नु॒ष्टुभ॒मनु॑ चर्चू॒र्यमा॑ण॒मिन्द्रं॒ नि चि॑क्युः क॒वयो॑ मनी॒षा॥

पाप से भय करनेवाली मोक्षविषयक कामनाओं-भावनाओं का साथ देनेवाला मित्रता करनेवाला अपनानेवाला परमात्मा है, स्तुतिकर्ता मेधावी जन स्तुति से जानते अनुभव करते हैं॥९॥

अ॒हं रु॒द्रेभि॒र्वसु॑भिश्चराम्य॒हमा॑दि॒त्यैरु॒त वि॒श्वदे॑वैः। अ॒हं मि॒त्रावरु॑णो॒भा बि॑भर्म्य॒हमि॑न्द्रा॒ग्नी अ॒हम॒श्विनो॒भा॥

परमेश्वर की प्रतिनिधि मैं पारमेश्वरी ज्ञानशक्ति पृथिवी आदि आठ वस्तुओं, प्राणरूप ग्यारह रुद्रों, बारह मासों, अग्नि, विद्युत्, दिन रातों और द्युलोक पृथिवीलोक को धारण करती हूँ॥१॥

अ॒हं सोम॑माह॒नसं॑ बिभर्म्य॒हं त्वष्टा॑रमु॒त पू॒षणं॒ भग॑म्। अ॒हं द॑धामि॒ द्रवि॑णं ह॒विष्म॑ते सुप्रा॒व्ये॒३॒॑ यज॑मानाय सुन्व॒ते॥

पारमेश्वरी ज्ञानशक्ति चन्द्रमा सूर्य वायु और यज्ञ को धारण करती है तथा होम करनेवाले विद्वानों को तृप्त करनेवाले और उनके लिये सोमरस निकालनेवाले के लिये यजमान आत्मा के लिये धन को धारण करती है॥२॥

अ॒हं राष्ट्री॑ सं॒गम॑नी॒ वसू॑नां चिकि॒तुषी॑ प्रथ॒मा य॒ज्ञिया॑नाम्। तां मा॑ दे॒वा व्य॑दधुः पुरु॒त्रा भूरि॑स्थात्रां॒ भूर्या॑वे॒शय॑न्तीम्॥

पारमेश्वरी ज्ञानशक्ति जगद्रूप राष्ट्रस्वामिनी है, धनों की प्राप्ति भी वह कराती है, यज्ञसम्बन्धी कर्मों का विधान बतानेवाली है। बहुत विद्यास्थानवाली सब पदार्थों में प्रविष्ट को विद्वान् जन बहुत रूपों में वर्णन करें जानें॥३॥

मया॒ सो अन्न॑मत्ति॒ यो वि॒पश्य॑ति॒ यः प्राणि॑ति॒ य ईं॑ शृ॒णोत्यु॒क्तम्। अ॒म॒न्तवो॒ मां त उप॑ क्षियन्ति श्रु॒धि श्रु॑त श्रद्धि॒वं ते॑ वदामि॥

जो खानेवाली-देखनेवाली, सुननेवाली पारमेश्वरी ज्ञानशक्ति को नहीं मानते, तदनुसार आचरण नहीं करते, वे क्षीण हो जाते हैं, यह सत्य है॥४॥

अ॒हमे॒व स्व॒यमि॒दं व॑दामि॒ जुष्टं॑ दे॒वेभि॑रु॒त मानु॑षेभिः। यं का॒मये॒ तंत॑मु॒ग्रं कृ॑णोमि॒ तं ब्र॒ह्माणं॒ तमृषिं॒ तं सु॑मे॒धाम्॥

पारमेश्वरी ज्ञान शक्ति ही देवों और साधारण मनुष्यों के द्वारा सत्सङ्ग में आये मनुष्य को तेजस्वी बनाती है, ब्रह्मा बनाती है, ऋषि बनाती है, अच्छी मेधावाला बनाती है॥५॥

अ॒हं रु॒द्राय॒ धनु॒रा त॑नोमि ब्रह्म॒द्विषे॒ शर॑वे॒ हन्त॒वा उ॑। अ॒हं जना॑य स॒मदं॑ कृणोम्य॒हं द्यावा॑पृथि॒वी आ वि॑वेश॥

पारमेश्वरी ज्ञानशक्ति ब्राह्मण के प्रति द्वेष करनेवाले क्रूर हिंसक जन को हनन करने के लिये धनुषशस्त्र को सिद्ध करना चाहिये और संग्राम में चलाना चाहिये। वह द्यावापृथिवीमय सब जगत् में आविष्ट होकर वर्त्तमान है॥६॥

अ॒हं सु॑वे पि॒तर॑मस्य मू॒र्धन्मम॒ योनि॑र॒प्स्व१॒॑न्तः स॑मु॒द्रे। ततो॒ वि ति॑ष्ठे॒ भुव॒नानु॒ विश्वो॒तामूं द्यां व॒र्ष्मणोप॑ स्पृशामि॥

पारमेश्वरी ज्ञानशक्ति जगत् के ऊपर वर्त्तमान पालक सूर्य को उत्पन्न करती है और वह परमाणुओं तथा महान् आकाश के अन्दर व्याप्त है, सब लोक-लोकान्तरों में निविष्ट है, द्युलोक से मेघमण्डल से वर्षा कराती है॥७॥

अ॒हमे॒व वात॑ इव॒ प्र वा॑म्या॒रभ॑माणा॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑। प॒रो दि॒वा प॒र ए॒ना पृ॑थि॒व्यैताव॑ती महि॒ना सं ब॑भूव॥

पारमेश्वरी ज्ञानशक्ति लोक-लोकान्तरों को उत्पन्न करने के हेतु वायुवेग के समान वेग से गति करती है, द्युलोक से परे और पृथिवीलोक से परे अपनी महिमा से विराजमान है॥८॥

न तमंहो॒ न दु॑रि॒तं देवा॑सो अष्ट॒ मर्त्य॑म्। स॒जोष॑सो॒ यम॑र्य॒मा मि॒त्रो नय॑न्ति॒ वरु॑णो॒ अति॒ द्विषः॑॥

सूर्य मुख्य प्राण, परमात्मा, वायु, अध्यापक तथा जल, अपान, उपदेशक जिसकी रक्षा करते हैं अर्थात् जो मनुष्य इन्हें अनुकूल बना लेता है, उससे द्वेष करनेवाले जन द्वेष नहीं करते और न उसे पाप व रोग प्राप्त होता है॥१॥

तद्धि व॒यं वृ॑णी॒महे॒ वरु॑ण॒ मित्रार्य॑मन्। येना॒ निरंह॑सो यू॒यं पा॒थ ने॒था च॒ मर्त्य॒मति॒ द्विषः॑॥

मनुष्य को चाहिये कि अध्यापक आदि चेतन देवों और सूर्य आदि जड़ देवों के अनुकूल सेवन से जीवनयात्रा ऐसे करनी चाहिए, जिससे पाप से बच सकें और अपना अभीष्ट साध सकें॥२॥

ते नू॒नं नो॒ऽयमू॒तये॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा। नयि॑ष्ठा उ नो ने॒षणि॒ पर्षि॑ष्ठा उ नः प॒र्षण्यति॒ द्विषः॑॥

पूर्व कहे हुए मित्रादि रक्षार्थ गन्तव्य मार्ग पर ले जाते हैं और विरोधियों को हटाकर अभीष्ट-उद्देश्य तक पहुँचाते हैं, उनकी अनुमति या अनुकूलता से आचरण करें॥३॥

यू॒यं विश्वं॒ परि॑ पाथ॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा। यु॒ष्माकं॒ शर्म॑णि प्रि॒ये स्याम॑ सुप्रणीत॒योऽति॒ द्विषः॑॥

उन्हीं पूर्वोक्त मित्रादियों की अनुकूलता में सदाचारी बने हुए द्वेष करनेवाले विरोधियों से बचकर सुरक्षित रहें॥४॥

आ॒दि॒त्यासो॒ अति॒ स्रिधो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा। उ॒ग्रं म॒रुद्भी॑ रु॒द्रं हु॑वे॒मेन्द्र॑म॒ग्निं स्व॒स्तयेऽति॒ द्विषः॑॥

वरुण, मित्र अर्यमा, ग्रहण करनेवाले प्राणों के साथ तथा प्रतापवान् रोग को द्रवित करनेवाले रोग को वायु को और अग्नि को कल्याण के लिए उपयोग में लावें, तो द्वेष करनेवाले विरोधियों से बचे रहते हैं॥५॥

नेता॑र ऊ॒ षु ण॑स्ति॒रो वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा। अति॒ विश्वा॑नि दुरि॒ता राजा॑नश्चर्षणी॒नामति॒ द्विषः॑॥

वरुण, मित्र, अर्यमा, मनुष्यों के राजमान रक्षक हैं, सारे दुःखों को तिरस्कृत करते हैं, हम द्वेष करनेवालों का अतिक्रमण करके स्थित होवें॥६॥

शु॒नम॒स्मभ्य॑मू॒तये॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा। शर्म॑ यच्छन्तु स॒प्रथ॑ आदि॒त्यासो॒ यदीम॑हे॒ अति॒ द्विषः॑॥

वरुण, मित्र, अर्यमा हमारे लिये सुख देते हैं, इन स्वीकार करनेवालों को जब हम वरते हैं, तो विस्तृत शरण देते हैं, द्वेष करनेवाले विरोधी हमारा कुछ नहीं कर सकते॥७॥

यथा॑ ह॒ त्यद्व॑सवो गौ॒र्यं॑ चित्प॒दि षि॒ताममु॑ञ्चता यजत्राः। ए॒वो ष्व१॒॑स्मन्मु॑ञ्चता॒ व्यंहः॒ प्र ता॑र्यग्ने प्रत॒रं न॒ आयुः॑॥

शरीर में बसानेवाले बसाने के कारणभूत श्रेष्ठमार्ग देवयानमार्ग में सङ्गत कराने-कराने के निमित्तभूत देवगण इस शरीर-बन्धन से छुड़ा सकते हैं, मोक्ष में विचरण करने के लिये पाप से बचने पर, वैराग्य होने पर॥८॥

रात्री॒ व्य॑ख्यदाय॒ती पु॑रु॒त्रा दे॒व्य१॒॑क्षभिः॑। विश्वा॒ अधि॒ श्रियो॑ऽधित॥

रात्रि जब आती है, तो आकाश के नक्षत्रों के द्वारा अपने को दर्शाती है, समस्त शोभाओं को अपने अन्दर धारण करती है अर्थात् समस्त शोभाओं को रात्रि पुष्ट करती है, आकाश की शोभा नक्षत्रों द्वारा रात्रि को ही दिखाई देती है, मनुष्यों की दिन में थकान की ग्लानि स्वस्थता के रूप में भासित होती है, वृक्षों के फूल भी रात्रि में ही विकसित होते हैं॥१॥

ओर्व॑प्रा॒ अम॑र्त्या नि॒वतो॑ दे॒व्यु१॒॑द्वतः॑। ज्योति॑षा बाधते॒ तमः॑॥

रात्रि शाश्वत है, आरम्भ सृष्टि से चली आती है, ऊँचे स्थानों और नीचे स्थानों को व्यापती है, उन्हें एकरूप में दिखाती है, नक्षत्रसमूह की ज्योति से अन्धकार को हटाती है तथा सुलाकर-निद्रा लाकर मन में विद्यमान अन्धकार व जड़ता को विश्राम देकर हटाती है, रात्रि को शयन ही करना चाहिये॥२॥

निरु॒ स्वसा॑रमस्कृतो॒षसं॑ दे॒व्या॑य॒ती। अपेदु॑ हासते॒ तमः॑॥

रात्रि आती है तो उसके पीछे चलती हुई भगिनी जैसी उषा के आने पर रात्रि का अन्धकार भाग जाता है, उषा की शोभा रात्रि के आश्रय पर है॥३॥

सा नो॑ अ॒द्य यस्या॑ व॒यं नि ते॒ याम॒न्नवि॑क्ष्महि। वृ॒क्षे न व॑स॒तिं वयः॑॥

रात्रि मनुष्यों के लिए कल्याणकारी आती है, जिसके आने पर मनुष्य निविष्ट हो जाते हैं, जैसे पक्षी अपने घौंसले में निविष्ट हो जाता है॥४॥

नि ग्रामा॑सो अविक्षत॒ नि प॒द्वन्तो॒ नि प॒क्षिणः॑। नि श्ये॒नास॑श्चिद॒र्थिनः॑॥

रात्रि में मनुष्य पशु पक्षी शान्तिप्रयोजन साधने के लिए शयन करें॥५॥

या॒वया॑ वृ॒क्यं१॒॑ वृकं॑ य॒वय॑ स्ते॒नमू॑र्म्ये। अथा॑ नः सु॒तरा॑ भव॥

रात्रि में मनुष्य सो जाते हैं। सो जाने पर भेड़िये आदि जङ्गली पशु एवं चोरों के आक्रमण की सम्भावना रहती है। मानव की भावना है कि वे हमारे ऊपर आक्रमण न करें और सो जावें, या हम ऐसे गहरे न सोएँ, जिससे वे सता सकें॥६॥

उप॑ मा॒ पेपि॑श॒त्तमः॑ कृ॒ष्णं व्य॑क्तमस्थित। उष॑ ऋ॒णेव॑ यातय॥

प्रभातवेला उषा जब आती है, रात्रि के अन्धकार को चूर्ण करती हुई आती है तथा हमारे मानस अन्धकार से ऋण की भाँति विमुक्त कराती है, ज्ञान जागृति देती है॥७॥

उप॑ ते॒ गा इ॒वाक॑रं वृणी॒ष्व दु॑हितर्दिवः। रात्रि॒ स्तोमं॒ न जि॒ग्युषे॑॥

रात्रि सूर्य की पुत्री के समान है उसका स्वागत करना चाहिए, होम द्वारा सायं होम करके, रोगादि विरोध पर विजय पाने के लिये॥८॥

ममा॑ग्ने॒ वर्चो॑ विह॒वेष्व॑स्तु व॒यं त्वेन्धा॑नास्त॒न्वं॑ पुषेम। मह्यं॑ नमन्तां प्र॒दिश॒श्चत॑स्र॒स्त्वयाध्य॑क्षेण॒ पृत॑ना जयेम॥

राजा का सेनाध्यक्ष तेजस्वी चारों दिशाओं में रहनेवाले शत्रु पर विजय पानेवाला हो एवं उसका पुरोहित महान् विद्वान् अपने शब्दों से प्रोत्साहित करनेवाला होना चाहिये॥१॥

मम॑ दे॒वा वि॑ह॒वे स॑न्तु॒ सर्व॒ इन्द्र॑वन्तो म॒रुतो॒ विष्णु॑र॒ग्निः। ममा॒न्तरि॑क्षमु॒रुलो॑कमस्तु॒ मह्यं॒ वातः॑ पवतां॒ कामे॑ अ॒स्मिन्॥

राष्ट्र के अन्दर भाँति-भाँति के शस्त्रधारी संग्राम में विजय पानेवाले होने चाहिये तथा राष्ट्र भी सुखों से पूर्ण दर्शनीय अच्छे वातावरणवाला होना चाहिये एवं ऋत्विक् विद्वान् अनेक विद्याओं के जाननेवाले, बहुत दर्शनीय यज्ञ को रचानेवाले, यज्ञस्थान सुगन्धवायु से परिपूर्ण होना चाहिये॥२॥

मयि॑ दे॒वा द्रवि॑ण॒मा य॑जन्तां॒ मय्या॒शीर॑स्तु॒ मयि॑ दे॒वहू॑तिः। दैव्या॒ होता॑रो वनुषन्त॒ पूर्वेऽरि॑ष्टाः स्याम त॒न्वा॑ सु॒वीराः॑॥

यज्ञ में आये विद्वान् के द्वारा ज्ञान धन को प्राप्त करना चाहिये और अपनी कामनाओं की पूर्ति के साधन जानना चाहिये, परमात्मसम्बन्धी उपदेश के अपने को भागी बनावें तथा शरीर से स्वस्थ अच्छे प्राणवाले यज्ञ के सेवन से होना चाहिये॥३॥

मह्यं॑ यजन्तु॒ मम॒ यानि॑ ह॒व्याकू॑तिः स॒त्या मन॑सो मे अस्तु। एनो॒ मा नि गां॑ कत॒मच्च॒नाहं विश्वे॑ देवासो॒ अधि॑ वोचता नः॥

मानव के पास जितनी वस्तुएँ हों, आवश्यक हों, अनावश्यक संग्रह न हो, सङ्कल्पधारा यथार्थ सफलवाली अयथार्थ निष्फल न उठे, पाप को कभी न करे, विद्वानों से उपदेश सुनते रहना चाहिये॥४॥

देवीः॑ षळुर्वीरु॒रु नः॑ कृणोत॒ विश्वे॑ देवास इ॒ह वी॑रयध्वम्। मा हा॑स्महि प्र॒जया॒ मा त॒नूभि॒र्मा र॑धाम द्विष॒ते सो॑म राजन्॥

छः वस्तुएँ या पृथिवी जल अग्नि वायु दिन रात बहुत अन्नादिसम्पन्न करनेवाले हों, ऐसा प्रयत्न राष्ट्र के विद्वान् जन करते हैं, मेघादि भी अनुकूल वर्षा कर ऐसा उपचार करते रहें, सन्तान से अपने अङ्गों से फलते-फूलते रहें, शत्रु के वश में भी कभी न आवें, यह यत्न करना चाहिये॥५॥

अग्ने॑ म॒न्युं प्र॑तिनु॒दन्परे॑षा॒मद॑ब्धो गो॒पाः परि॑ पाहि न॒स्त्वम्। प्र॒त्यञ्चो॑ यन्तु नि॒गुतः॒ पुन॒स्ते॒३॒॑ऽमैषां॑ चि॒त्तं प्र॒बुधां॒ वि ने॑शत्॥

सेनानायक शत्रुओं के क्रोध व तेज को नष्ट करता हुआ स्वयं अहिंसित हुआ और अपनों की रक्षा करता हुआ शत्रुओं पर ऐसा प्रहार करे कि वे मलविसर्जन करते हुए भय से उल्टे मुँह भाग जाएँ और जो प्रमुख बुद्धिमान् हैं, उनके चित्त को नष्ट कर दें॥६॥

धा॒ता धा॑तॄ॒णां भुव॑नस्य॒ यस्पति॑र्दे॒वं त्रा॒तार॑मभिमातिषा॒हम्। इ॒मं य॒ज्ञम॒श्विनो॒भा बृह॒स्पति॑र्दे॒वाः पा॑न्तु॒ यज॑मानं न्य॒र्थात्॥

परमात्मा पृथिवी सूर्य आदि धारक पिण्डों का भी धारण करनेवाला है, वह दुःखों से त्राण करनेवाला और दुःखद अभिमानियों को दबानेवाला है, उसके रचे दिन, रात, सूर्य और अन्य देव या अध्यापक, उपदेशक या आचार्य ये भी रक्षा करनेवाले हैं॥७॥

उ॒रु॒व्यचा॑ नो महि॒षः शर्म॑ यंसद॒स्मिन्हवे॑ पुरुहू॒तः पु॑रु॒क्षुः। स नः॑ प्र॒जायै॑ हर्यश्व मृळ॒येन्द्र॒ मा नो॑ रीरिषो॒ मा परा॑ दाः॥

परमात्मा बहुव्यापी अनन्त अनेक प्रकार से आमन्त्रण करने योग्य बहुत अन्नभोग देनेवाला है, वह सन्तानप्राप्ति के द्वारा सुखी करता है, वह न हमें पीड़ा देता है, न त्यागता है, उस ऐसे परमात्मा की स्तुति करनी चाहिए॥८॥

ये नः॑ स॒पत्ना॒ अप॒ ते भ॑वन्त्विन्द्रा॒ग्निभ्या॒मव॑ बाधामहे॒ तान्। वस॑वो रु॒द्रा आ॑दि॒त्या उ॑परि॒स्पृशं॑ मो॒ग्रं चेत्ता॑रमधिरा॒जम॑क्रन्॥

शत्रु दूर रहें, उन्हें विद्युदग्नि शक्ति सम्पन्न अस्त्रों द्वारा संग्राम में पीड़ित करना चाहिये, वसानेवाले, उपदेश देनेवाले, स्वीकार करनेवाले जन तेजस्वी अधिकारी को राजा बनावें एवं जो अन्य प्राणियों को पीड़ा देते हैं, वे दूर हों, उन्हें यज्ञ में अग्नि और वायु होमे हुए पदार्थ द्वारा नष्ट करें, वायुएँ, ऋतुएँ, रश्मियाँ मनुष्य को स्वस्थ बनाती हैं॥९॥

सूक्तम्

नास॑दासी॒न्नो सदा॑सीत्त॒दानीं॒ नासी॒द्रजो॒ नो व्यो॑मा प॒रो यत्। किमाव॑रीवः॒ कुह॒ कस्य॒ शर्म॒न्नम्भः॒ किमा॑सी॒द्गह॑नं गभी॒रम्॥

सृष्टि से पूर्व न शून्यमात्र अत्यन्त अभाव था, परन्तु वह जो था, प्रकटरूप भी न था, न रञ्जनात्मक कणमय गगन था, न परवर्ती सीमावर्ती आवर्त घेरा था, जब आवरणीय पदार्थ या जगत् न था, तो आवर्त भी क्या हो, वह भी न था, कहाँ फिर सुख शरण किसके लिये हो एवं भोग्य भोक्ता की वर्तमानता भी न थी, सूक्ष्मजलपरमाणुप्रवाह या परमाणुसमुद्र भी न था, कहने योग्य कुछ न था, पर था, कुछ अप्रकटरूप था॥१॥

न मृ॒त्युरा॑सीद॒मृतं॒ न तर्हि॒ न रात्र्या॒ अह्न॑ आसीत्प्रके॒तः। आनी॑दवा॒तं स्व॒धया॒ तदेकं॒ तस्मा॑द्धा॒न्यन्न प॒रः किं च॒नास॑॥

सृष्टि से पूर्व मृत्यु नहीं था, क्योंकि मरने योग्य कोई था नहीं, तो मृत्यु कैसे हो ? मृत्यु के अभाव में अमृत हो, सो अमृत भी नहीं, क्योंकि मृत्यु की अपेक्षा से अमृत की कल्पना होती है, अतः अमृत के होने की कल्पना भी नहीं, दिन रात्रि का पूर्वरूप भी न था, क्योंकि सृष्टि होने पर दिन रात्रि का व्यवहार होता है, हाँ एक तत्त्व वायु द्वारा जीवन लेनेवाला नहीं, किन्तु स्वधारणशक्ति से स्वसत्तारूप जीवन धारण करता हुआ जीता जागता ब्रह्म था, उससे अतिरिक्त और कुछ न था॥२॥

तम॑ आसी॒त्तम॑सा गू॒ळ्हमग्रे॑ऽप्रके॒तं स॑लि॒लं सर्व॑मा इ॒दम्। तु॒च्छ्येना॒भ्वपि॑हितं॒ यदासी॒त्तप॑स॒स्तन्म॑हि॒नाजा॑य॒तैक॑म्॥

सृष्टि से पूर्व अन्धकार से आच्छादित अन्धकारमय था, जलसमान अवयवरहित न जानने योग्य “आभु” नाम से परमात्मा के सम्मुख तुच्छरूप में एकदेशी अव्यक्त प्रकृतिरूप उपादान कारण था, जिससे सृष्टि आविर्भूत होती है, उसके ज्ञानमय तप से प्रथम महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ॥३॥

काम॒स्तदग्रे॒ सम॑वर्त॒ताधि॒ मन॑सो॒ रेतः॑ प्रथ॒मं यदासी॑त्। स॒तो बन्धु॒मस॑ति॒ निर॑विन्दन्हृ॒दि प्र॒तीष्या॑ क॒वयो॑ मनी॒षा॥

आरम्भ सृष्टि में भोगों के लिए कामभाव वर्त्तमान होता है, जो मानव की बीजशक्तिरूप में प्रकट होता है, क्रान्तदर्शी विद्वान् आत्मा के अन्दर शरीर का बाँधनेवाला है, उसे समझ कर वैराग्य को प्राप्त होते हैं॥४॥

ति॒र॒श्चीनो॒ वित॑तो र॒श्मिरे॑षाम॒धः स्वि॑दा॒सी३दु॒परि॑ स्विदासी३त्। रे॒तो॒धा आ॑सन्महि॒मान॑ आसन्त्स्व॒धा अ॒वस्ता॒त्प्रय॑तिः प॒रस्ता॑त्॥

भोगों की कामनारूप मानवबीजशक्ति को धारण करनेवाले आत्मा सृष्टि से पहले थे और वे असंख्यात थे, इनका पूर्वकर्मकृत संस्कार डोरी या लगाम के समान शरीर में खींच कर लाता है, वह निकृष्टयोनिसम्बन्धी और उत्कृष्टयोनिसम्बन्धी होता है, शरीर के अवरभाग में जन्म है और परभाग में प्रयाण मृत्यु है॥५॥

को अ॒द्धा वे॑द॒ क इ॒ह प्र वो॑च॒त्कुत॒ आजा॑ता॒ कुत॑ इ॒यं विसृ॑ष्टिः। अ॒र्वाग्दे॒वा अ॒स्य वि॒सर्ज॑ने॒नाथा॒ को वे॑द॒ यत॑ आब॒भूव॑॥

यह विविध सृष्टि किस निमित्तकारण से और किस उपादानकारण से उत्पन्न होती है, इस बात को कोई बिरला विद्वान् ही यथार्थरूप में जान सकता है, क्योंकि सभी विद्वान् सृष्टि उत्पन्न होने के पश्चात् होते हैं-अर्थात् कोई तत्त्ववेत्ता योगी ही इसको समझ सकता है और कह सकता है॥६॥

इ॒यं विसृ॑ष्टि॒र्यत॑ आब॒भूव॒ यदि॑ वा द॒धे यदि॑ वा॒ न। यो अ॒स्याध्य॑क्षः पर॒मे व्यो॑म॒न्त्सो अ॒ङ्ग वे॑द॒ यदि॑ वा॒ न वेद॑॥

यह विविध सृष्टि जिस उपादान-कारण से उत्पन्न होती है, उस उपादान कारण अव्यक्त प्रकृति का वह परमात्मा स्वामी-अध्यक्ष है, वह उससे सृष्टि को उत्पन्न करता है और उसका संहार भी करता है। प्रकृति को जब लक्ष्य करता है, तो उसे सृष्टि के रूप में ले आता है, नहीं लक्ष्य करता है, तो प्रलय बनी रहती है, इस प्रकार सृष्टि और प्रलय परमात्मा के अधीन हैं॥७॥

यो य॒ज्ञो वि॒श्वत॒स्तन्तु॑भिस्त॒त एक॑शतं देवक॒र्मेभि॒राय॑तः। इ॒मे व॑यन्ति पि॒तरो॒ य आ॑य॒युः प्र व॒याप॑ व॒येत्या॑सते त॒ते॥

सृष्टियज्ञ और शरीरयज्ञ परमाणुओं द्वारा तथा परमात्मा के रचनाकर्मों द्वारा सौ वर्ष की आयुवाला मुक्तिसम्बन्धी ब्राह्मशरीर तथा भौतिक मनुष्यशरीर होता है, ऋतुएँ या प्राण निर्माण करते हैं, ताने-बाने के समान ये सृष्टि में या शरीर में रहते हैं॥१॥

पुमाँ॑ एनं तनुत॒ उत्कृ॑णत्ति॒ पुमा॒न्वि त॑त्ने॒ अधि॒ नाके॑ अ॒स्मिन्। इ॒मे म॒यूखा॒ उप॑ सेदुरू॒ सदः॒ सामा॑नि चक्रु॒स्तस॑रा॒ण्योत॑वे॥

परमात्मा ब्राह्मयज्ञ और शरीरयज्ञ को रचता है और वही उसको समाप्त कर देता है, मोक्ष में ब्राह्मयज्ञ संसार में शरीरयज्ञ का विस्तार करता है और मोक्ष में परमात्मा के ज्ञान प्रकाशादि गुण से प्रकाशित होता है और संसार में सूर्य की रश्मियों से ये उसका रक्षण करते हैं॥२॥

कासी॑त्प्र॒मा प्र॑ति॒मा किं नि॒दान॒माज्यं॒ किमा॑सीत्परि॒धिः क आ॑सीत्। छन्दः॒ किमा॑सी॒त्प्रउ॑गं॒ किमु॒क्थं यद्दे॒वा दे॒वमय॑जन्त॒ विश्वे॑॥

उक्त ब्राह्मयज्ञ या शरीरयज्ञ की क्या प्रमारीति या रूपरेखा थी, क्या निदानहेतु या लक्ष्य था, क्या दीप्ति का साधन क्या परिधि या आवर्त्त था, छन्द कौन-प्रउग कौन-उक्थ कौन था, जबकि सारे देव इष्टदेव का यजन करते थे॥३॥

अ॒ग्नेर्गा॑य॒त्र्य॑भवत्स॒युग्वो॒ष्णिह॑या सवि॒ता सं ब॑भूव। अ॒नु॒ष्टुभा॒ सोम॑ उ॒क्थैर्मह॑स्वा॒न्बृह॒स्पते॑र्बृह॒ती वाच॑मावत्॥

वि॒राण्मि॒त्रावरु॑णयोरभि॒श्रीरिन्द्र॑स्य त्रि॒ष्टुबि॒ह भा॒गो अह्नः॑। विश्वा॑न्दे॒वाञ्जग॒त्या वि॑वेश॒ तेन॑ चाकॢप्र॒ ऋष॑यो मनु॒ष्याः॑॥

उपर्युक्त देवताओं के साथ दिये हुए छन्द सङ्गत होते हैं॥५॥

चा॒कॢ॒प्रे तेन॒ ऋष॑यो मनु॒ष्या॑ य॒ज्ञे जा॒ते पि॒तरो॑ नः पुरा॒णे। पश्य॑न्मन्ये॒ मन॑सा॒ चक्ष॑सा॒ तान्य इ॒मं य॒ज्ञमय॑जन्त॒ पूर्वे॑॥

ब्राह्मयज्ञ और शरीरयज्ञ सदा से चले आ रहे हैं, ऋषि, मनुष्य और हमारे पुरातन रक्षक इनका सेवन करते रहे हैं, यह कर्म मन से और साक्षात् दर्शन से जाना जाता है कि पुरातन महानुभाव इन यज्ञों को करते चले आये हैं॥६॥

स॒हस्तो॑माः स॒हछ॑न्दस आ॒वृतः॑ स॒हप्र॑मा॒ ऋष॑यः स॒प्त दैव्याः॑। पूर्वे॑षां॒ पन्था॑मनु॒दृश्य॒ धीरा॑ अ॒न्वाले॑भिरे र॒थ्यो॒३॒॑ न र॒श्मीन्॥

स्तुतिवचनों से युक्त छन्दों से युक्त यज्ञ के सेवन करनेवाले प्रमाण के अनुसार सात स्वाभाविक ऋषि ज्ञान दर्शानेवाले, प्राण मस्तिष्क के सात, मनबुद्धिचित्तअहङ्कार श्रोत्र नेत्र वाणी ये स्वाभाविक ऋषि जिन मुक्तों के मार्ग का अनुभव करके ध्यानी जन इनको घोड़ों का प्रग्रह बना कर मार्ग को पार करते हैं॥७॥

अप॒ प्राच॑ इन्द्र॒ विश्वाँ॑ अ॒मित्रा॒नपापा॑चो अभिभूते नुदस्व। अपोदी॑चो॒ अप॑ शूराध॒राच॑ उ॒रौ यथा॒ तव॒ शर्म॒न्मदे॑म॥

परमात्मा के सुखशरण में जो पहुँच जाता है, उसके समस्त ओर के शत्रुओं को परमात्मा दूर कर देता है एवं शासक राजा ऐसा होना चाहिए, जो प्रजाजनों को पीड़ित करनेवाले समस्त ओर के शत्रुओं को नष्ट कर सके या उसे नष्ट करना चाहिए॥१॥

कु॒विद॒ङ्ग यव॑मन्तो॒ यवं॑ चि॒द्यथा॒ दान्त्य॑नुपू॒र्वं वि॒यूय॑। इ॒हेहै॑षां कृणुहि॒ भोज॑नानि॒ ये ब॒र्हिषो॒ नमो॑वृक्तिं॒ न ज॒ग्मुः॥

जैसे किसान अनुक्रम से पके अन्न को काटते हैं, एवं प्रजाजन के लिये अनुक्रम से श्रेष्ठ राष्ट्रसंचालक भाग पृथक्-पृथक् यथायोग्य भाग दें, यह प्रशंसनीय कार्य है॥२॥

न॒हि स्थूर्यृ॑तु॒था या॒तमस्ति॒ नोत श्रवो॑ विविदे संग॒मेषु॑। ग॒व्यन्त॒ इन्द्रं॑ स॒ख्याय॒ विप्रा॑ अश्वा॒यन्तो॒ वृष॑णं वा॒जय॑न्तः॥

घोड़े से रहित गाड़ी यात्रा नहीं करा सकती, न सङ्ग्राम जिता सकती है, ऐसे ही विद्वान् सुखवर्षक परमात्मा या राजा की शरण बिना वेदज्ञान मानस सुख अमृतान्न आदि नहीं प्राप्त कर सकते हैं॥३॥

यु॒वं सु॒राम॑मश्विना॒ नमु॑चावासु॒रे सचा॑। वि॒पि॒पा॒ना शु॑भस्पती॒ इन्द्रं॒ कर्म॑स्वावतम्॥

सुशिषित स्त्री-पुरुष परस्पर मिलकर उत्तम अलङ्कार से सुभूषित हुए अपनी अन्तरात्मा के निमित्त रमणीय सुख का आनन्द लेने के निमित्त गृहस्थकर्मों में परमात्मा को चाहें-उसकी प्रार्थना करें॥४॥

पु॒त्रमि॑व पि॒तरा॑व॒श्विनो॒भेन्द्रा॒वथुः॒ काव्यै॑र्दं॒सना॑भिः। यत्सु॒रामं॒ व्यपि॑बः॒ शची॑भिः॒ सर॑स्वती त्वा मघवन्नभिष्णक्॥

सुशिक्षित स्त्री-पुरुष अपने गृहस्थजीवन में उत्तम स्तुतिवचनों और कर्मों द्वारा परमात्मा को प्रसन्न करें एवं राजा को भी सुशिक्षित स्त्री-पुरुष प्रजाजन अच्छे मधुर वचनों और कर्मों द्वारा प्रसन्न रखें॥५॥

इन्द्रः॑ सु॒त्रामा॒ स्ववाँ॒ अवो॑भिः सुमृळी॒को भ॑वतु वि॒श्ववे॑दाः। बाध॑तां॒ द्वेषो॒ अभ॑यं कृणोतु सु॒वीर्य॑स्य॒ पत॑यः स्याम॥

परमात्मा या राजा अच्छी रक्षा करनेवाला वा सामर्थ्यवान् होता है, विविध रक्षणों से उत्तम सुखप्रद शत्रुओं का नाशक अभय देनेवाला होता है या हो। सुपराक्रम और ब्रह्मचर्ययुक्त शरीर सदा बनाये रखना चाहिये॥६॥

तस्य॑ व॒यं सु॑म॒तौ य॒ज्ञिय॒स्यापि॑ भ॒द्रे सौ॑मन॒से स्या॑म। स सु॒त्रामा॒ स्ववाँ॒ इन्द्रो॑ अ॒स्मे आ॒राच्चि॒द्द्वेषः॑ सनु॒तर्यु॑योतु॥

उपासकजनों को चाहिये कि वह परमात्मा की कल्याणकारी वेदवाणी के अनुसार आचरण करते हुए जीवन व्यतीत करें, तो दुःखदायी शत्रु भी उनसे दूर हो जाते हैं एवं प्रजाजन राजा की न्यायव्यवस्था या शासनव्यवस्था में रहने से शत्रुओं से सुरक्षित रहते हैं॥७॥

ई॒जा॒नमिद्द्यौर्गू॒र्ताव॑सुरीजा॒नं भूमि॑र॒भि प्र॑भू॒षणि॑। ई॒जा॒नं दे॒वाव॒श्विना॑व॒भि सु॒म्नैर॑वर्धताम्॥

यज्ञ करनेवाले को द्युमण्डल से पुष्ट जल वृष्टि मिलती है, यज्ञ करनेवाले को पृथिवी अच्छी उपज देती है, यज्ञ करनेवाले को दिन-रात सुख सुगन्धवाले होकर समृद्ध करते हैं॥१॥

ता वां॑ मित्रावरुणा धार॒यत्क्षि॑ती सुषु॒म्नेषि॑त॒त्वता॑ यजामसि। यु॒वोः क्रा॒णाय॑ स॒ख्यैर॒भि ष्या॑म र॒क्षसः॑॥

अध्यापक उपदेशक या प्राण अपान मनुष्यों को ज्ञानप्रदान कर या जीवनप्रदान कर धारण करनेवाले सुष्ठु सुख पहुँचानेवाले इष्टसिद्धि के निमित्त हैं, उनके द्वारा पाप अज्ञान पर या दुष्ट रोग आदि पर विजय पा सकते हैं, अतः वे पूजनीय और उपयोजनीय हैं॥२॥

अधा॑ चि॒न्नु यद्दिधि॑षामहे वाम॒भि प्रि॒यं रेक्णः॒ पत्य॑मानाः। द॒द्वाँ वा॒ यत्पुष्य॑ति॒ रेक्णः॒ सम्वा॑र॒न्नकि॑रस्य म॒घानि॑॥

मनुष्य धनादि वस्तुओं के स्वामी होते हुए अध्यापक उपदेशकों के ज्ञानधन को प्राप्त करते हैं, साथ ही उन्हें उपहारधन देना चाहिए, इस प्रकार देने से धन समाप्त नहीं होता है एवं प्राण और अपानों से जो जीवनधन मिलता है, उनके लिए आहार देना चाहिए, इससे वह समाप्त नहीं होता है॥३॥

अ॒साव॒न्यो अ॑सुर सूयत॒ द्यौस्त्वं विश्वे॑षां वरुणासि॒ राजा॑। मू॒र्धा रथ॑स्य चाक॒न्नैताव॒तैन॑सान्तक॒ध्रुक्॥

अज्ञान को हटानेवाला अध्यापक या दोष को हटानेवाला प्राण द्युलोक के समान प्रकाशदाता या कान्तिदाता है और उपदेशक तथा अपान राजा के समान आश्रय देनेवाला है, इस प्रकार रमणीय जनसमूह का मूर्धारूप सत्कार करने योग्य प्रत्येक अध्यापक और उपदेशक प्रत्येक प्राण और अपान मृत्यु के विरोधी हैं॥४॥

अ॒स्मिन्त्स्वे॒३॒॑तच्छक॑पूत॒ एनो॑ हि॒ते मि॒त्रे निग॑तान्हन्ति वी॒रान्। अ॒वोर्वा॒ यद्धात्त॒नूष्ववः॑ प्रि॒यासु॑ य॒ज्ञिया॒स्वर्वा॑॥

शक्ति साधनों से जब ब्रह्मचारी पवित्र हो जाता है, तो पाप अन्तर्हित गुणों को नष्ट करता है, तो उसके रक्षक अध्यापक उपदेशक प्राण और अपान हो जाते हैं, शिष्य प्रजाओं में ज्ञान प्राप्त कराता है और नाड़ियों में जीवन प्राप्त कराता है॥५॥

यु॒वोर्हि मा॒तादि॑तिर्विचेतसा॒ द्यौर्न भूमिः॒ पय॑सा पुपू॒तनि॑। अव॑ प्रि॒या दि॑दिष्टन॒ सूरो॑ निनिक्त र॒श्मिभिः॑॥

ज्ञान द्वारा विशेषरूप से चेतानेवाले अध्यापक और उपदेशक होते हैं, उन्हें वेदविद्या या श्रुति योग्य बनाती है, वे द्युलोक और पृथिवीलोक की भाँति ज्ञान और आनन्दरस का सञ्चार करते हैं और मनुष्य के दोषों को शोधते हैं, सूर्य जैसे अपनी रश्मियों से जगत् को शोधता है एवं विशेष चेतानेवाले प्राण और अपान जीवनरस प्रदान करते हैं, हृदयस्थ प्राणशक्ति उनका निर्माण करती है, वह दोनों द्युलोक और पृथिवीलोक की भाँति जीवन और रसप्रदान करते हैं और शरीर का शोधन करते हैं॥६॥

यु॒वं ह्य॑प्न॒राजा॒वसी॑दतं॒ तिष्ठ॒द्रथं॒ न धू॒र्षदं॑ वन॒र्षद॑म्। ता नः॑ कणूक॒यन्ती॑र्नृ॒मेध॑स्तत्रे॒ अंह॑सः सु॒मेध॑स्तत्रे॒ अंह॑सः॥

अध्यापक और उपदेशक मनुष्यों के कर्मों का प्रकाश करनेवाले हैं, जैसे रथ पर रथस्वामी बैठते हैं, ऐसे प्रवचनस्थान विद्यापीठ पर बैठते हैं। ज्ञान, अध्ययन या ज्ञानप्राप्ति के लिए प्रार्थना करती हुई मानवप्रजाओं को अध्यापक उन्हें अज्ञान पाप से बचावें, अपनी सङ्गति से दूसरा उपदेशक मेधा देकर अज्ञान पाप से बचावे॥७॥

प्रो ष्व॑स्मै पुरोर॒थमिन्द्रा॑य शू॒षम॑र्चत। अ॒भीके॑ चिदु लोक॒कृत्सं॒गे स॒मत्सु॑ वृत्र॒हास्माकं॑ बोधि चोदि॒ता नभ॑न्तामन्य॒केषां॑ ज्या॒का अधि॒ धन्व॑सु॥

सङ्ग्राम में राजा के साङ्ग्रामिक रथ के आगे सैनिकबल रहे, सामने आये शत्रुदल पर शस्त्रप्रहार करे, शत्रुओं के धनुषास्त्रों की डोरियाँ टूट जावें, शत्रु परास्त हो जावें॥१॥

त्वं सिन्धूँ॒रवा॑सृजोऽध॒राचो॒ अह॒न्नहि॑म्। अ॒श॒त्रुरि॑न्द्र जज्ञिषे॒ विश्वं॑ पुष्यसि॒ वार्यं॒ तं त्वा॒ परि॑ ष्वजामहे॒ नभ॑न्तामन्य॒केषां॑ ज्या॒का अधि॒ धन्व॑सु॥

राजा इतना बलवान् हो कि शत्रु उसके सम्मुख न ठहर सके, शत्रुओं को नीचे धकेलता जावे, प्रजा की आवश्यक वस्तुओं की रक्षा वृद्धि करे, प्रजा का स्नेहपात्र बना रहे॥२॥

वि षु विश्वा॒ अरा॑तयो॒ऽर्यो न॑शन्त नो॒ धियः॑। अस्ता॑सि॒ शत्र॑वे व॒धं यो न॑ इन्द्र॒ जिघां॑सति॒ या ते॑ रा॒तिर्द॒दिर्वसु॒ नभ॑न्तामन्य॒केषां॑ ज्या॒का अधि॒ धन्व॑सु॥

आक्रमणकारी शत्रु नष्ट हो जावें, ऐसा राजा को यत्न करना चाहिए, प्रजा भी उसका पूरा सहयोग दे, जिससे कि राजा शत्रुओं पर प्रहार करके उन्हें नष्ट कर दे और प्रजा के लिए सुख सम्पत्ति का दान करे॥३॥

यो न॑ इन्द्रा॒भितो॒ जनो॑ वृका॒युरा॒दिदे॑शति। अ॒ध॒स्प॒दं तमीं॑ कृधि विबा॒धो अ॑सि सास॒हिर्नभ॑न्तामन्य॒केषां॑ ज्या॒का अधि॒ धन्व॑सु॥

जो जंगली पशु भेड़िये के समान शस्त्रों से आक्रमण करनेवाला शत्रु है, उसे पराक्रमी राजा कुचल डाले॥४॥

यो न॑ इन्द्राभि॒दास॑ति॒ सना॑भि॒र्यश्च॒ निष्ट्यः॑। अव॒ तस्य॒ बलं॑ तिर म॒हीव॒ द्यौरध॒ त्मना॒ नभ॑न्तामन्य॒केषां॑ ज्या॒का अधि॒ धन्व॑सु॥

स्ववंश का या परवंश का कोई अत्याचारी दुष्ट प्रजा का विनाश करे, तो राजा उसे अपने प्रताप से नष्ट कर दे॥५॥

व॒यमि॑न्द्र त्वा॒यवः॑ सखि॒त्वमा र॑भामहे। ऋ॒तस्य॑ नः प॒था न॒याति॒ विश्वा॑नि दुरि॒ता नभ॑न्तामन्य॒केषां॑ ज्या॒का अधि॒ धन्व॑सु॥

प्रजा सदा राजा की मित्रता की कामना करती रहे और उसके बताये सत्यमार्ग नियम से चले॥६॥

अ॒स्मभ्यं॒ सु त्वमि॑न्द्र॒ तां शि॑क्ष॒ या दोह॑ते॒ प्रति॒ वरं॑ जरि॒त्रे। अच्छि॑द्रोध्नी पी॒पय॒द्यथा॑ नः स॒हस्र॑धारा॒ पय॑सा म॒ही गौः॥

राजा प्रजा को वेदोक्त आदेशरूप वेदवाणी दे, जो अभीष्ट सुखों को देनेवाली हो, जैसे गौ या पृथिवी अपने दूध या अन्नरस से पूर्ण करती है-तृप्त करती है॥७॥

उ॒भे यदि॑न्द्र॒ रोद॑सी आप॒प्राथो॒षा इ॑व। म॒हान्तं॑ त्वा म॒हीनां॑ स॒म्राजं॑ चर्षणी॒नां दे॒वी जनि॑त्र्यजीजनद्भ॒द्रा जनि॑त्र्यजीजनत्॥

राजा राजशासन पर विराजकर राज-प्रजाव्यवहारों को पूर्ण करता है, वह राजसभा उसे प्रकाशित-प्रसिद्ध करती है-उसके शासन को चलाती है॥१॥

अव॑ स्म दुर्हणाय॒तो मर्त॑स्य तनुहि स्थि॒रम्। अ॒ध॒स्प॒दं तमीं॑ कृधि॒ यो अ॒स्माँ आ॒दिदे॑शति दे॒वी जनि॑त्र्यजीजनद्भ॒द्रा जनि॑त्र्यजीजनत्॥

दुःख देकर मारनेवाले मनुष्य के बल को नीचे करना चाहिए और उसे पैरों के नीचे कुचल देना चाहिए, जो शस्त्रास्त्रों से आक्रमण करता है॥२।

अव॒ त्या बृ॑ह॒तीरिषो॑ वि॒श्वश्च॑न्द्रा अमित्रहन्। शची॑भिः शक्र धूनु॒हीन्द्र॒ विश्वा॑भिरू॒तिभि॑र्दे॒वी जनि॑त्र्यजीजनद्भ॒द्रा जनि॑त्र्यजीजनत्॥

शत्रुनाशक समर्थ राजा समस्त आह्लादकारी सुख देनेवाली सम्पत्तियों को शत्रु से छीनकर अपनी प्रजा को बाँट दे॥३॥

अव॒ यत्त्वं श॑तक्रत॒विन्द्र॒ विश्वा॑नि धूनु॒षे। र॒यिं न सु॑न्व॒ते सचा॑ सह॒स्रिणी॑भिरू॒तिभि॑र्दे॒वी जनि॑त्र्यजीजनद्भ॒द्रा जनि॑त्र्यजीजनत्॥

बहुत कर्मशक्तिवाला राजा समस्त धनों को अपने अधीन करे, राज्यशुल्क देनेवाले के लिए धन का भाग देवे॥४॥

अव॒ स्वेदा॑ इवा॒भितो॒ विष्व॑क्पतन्तु दि॒द्यवः॑। दूर्वा॑या इव॒ तन्त॑वो॒ व्य१॒॑स्मदे॑तु दुर्म॒तिर्दे॒वी जनि॑त्र्यजीजनद्भ॒द्रा जनि॑त्र्यजीजनत्॥

तीक्ष्ण शस्त्र शत्रुओं के प्रति बरसाने चाहिए, जिससे कि शत्रु छिन्न-भिन्न होकर नष्ट हो जावें॥५॥

दी॒र्घं ह्य॑ङ्कु॒शं य॑था॒ शक्तिं॒ बिभ॑र्षि मन्तुमः। पूर्वे॑ण मघवन्प॒दाजो व॒यां यथा॑ यमो दे॒वी जनि॑त्र्यजीजनद्भ॒द्रा जनि॑त्र्यजीजनत्॥

राजा को चाहिए कि दीर्घ, तीक्ष्ण अङ्कुश की भाँति शक्ति को धारण करे और अपने प्रथम आक्रमण से शत्रु को स्वाधीन करे, जैसे बकरा शाखा को अपने अगले पैरों से अपने वश करता है॥६॥

नकि॑र्देवा मिनीमसि॒ नकि॒रा यो॑पयामसि मन्त्र॒श्रुत्यं॑ चरामसि। प॒क्षेभि॑रपिक॒क्षेभि॒रत्रा॒भि सं र॑भामहे॥

राष्ट्रवासी जन राष्ट्र के अन्दर रहते हुए-किसी की हिंसा न करें, न वैदिक आचरणों का लोप करें, किन्तु साथियों और पुत्रादि के सहित राष्ट्र में कर्तव्यसंलग्न रहें, राष्ट्र की सुख शान्ति के लिए॥७॥

यस्मि॑न्वृ॒क्षे सु॑पला॒शे दे॒वैः स॒म्पिब॑ते य॒मः। अत्रा॑ नो वि॒श्पतिः॑ पि॒ता पु॑रा॒णाँ अनु॑ वेनति॥

मानव संसार में जन्म लेते हैं, जो उसके कर्म करने का विशाल क्षेत्र है, कर्मों के फल भोगने के लिए आत्मा इन्द्रियों के साथ सङ्गत होता है , सबका पालक पिता परमात्मा पूर्व कर्मों के अनुसार फलप्रदान करता है॥१॥

पु॒रा॒णाँ अ॑नु॒वेन॑न्तं॒ चर॑न्तं पा॒पया॑मु॒या। अ॒सू॒यन्न॒भ्य॑चाकशं॒ तस्मा॑ अस्पृहयं॒ पुनः॑॥

मानव पूर्व कर्मों के अनुसार पापकर्मों का दुष्फल भोगता है और पश्चात्ताप करता है, निन्दा करता है, फिर भी पापवासना-दूषित वासना के कारण फिर दूषित कर्म करने लगता है, यह साधारणजन की स्थिति है॥२॥

यं कु॑मार॒ नवं॒ रथ॑मच॒क्रं मन॒साकृ॑णोः। एके॑षं वि॒श्वतः॒ प्राञ्च॒मप॑श्य॒न्नधि॑ तिष्ठसि॥

आत्मा अमर है, तो भी अज्ञानवश शरीर के बन्धन में आता है, जो शरीर नया-नया धारण करना पड़ता है, जिसकी गतिभोग प्रवृत्ति ही है, उस पर यह अधिष्ठित हुआ अपने को भूला हुआ शरीर को समझ कर व्यवहार करता है, यह सामान्य जन की स्थिति है॥३॥

यं कु॑मार॒ प्राव॑र्तयो॒ रथं॒ विप्रे॑भ्य॒स्परि॑। तं सामानु॒ प्राव॑र्तत॒ समि॒तो ना॒व्याहि॑तम्॥

जीवात्मा विद्वानों से ज्ञान प्राप्त करके अध्यात्मिक सुख मिले, इस ढंग से नौका में रखे रथ के समान नदी पार करने को जैसे होता है, ऐसे संसारसागर को पार करने के लिए देह को अध्यात्ममार्ग में चलाता है॥४॥

कः कु॑मा॒रम॑जनय॒द्रथं॒ को निर॑वर्तयत्। कः स्वि॒त्तद॒द्य नो॑ ब्रूयादनु॒देयी॒ यथाभ॑वत्॥

अमर आत्मा को कोई उत्पन्न नहीं करता, आत्मा तो नित्य है, इसके शरीररथ को कौन मनुष्य घड़ता है ? कोई मनुष्य नहीं। कौन कह सके ? पर हाँ अनुग्रहकर्ता परमात्मा इसे शरीर में भेजता है, वह इस शरीर को रचता है॥५॥

यथाभ॑वदनु॒देयी॒ ततो॒ अग्र॑मजायत। पु॒रस्ता॑द्बु॒ध्न आत॑तः प॒श्चान्नि॒रय॑णं कृ॒तम्॥

परमात्मा अनुग्रहकर्ता जैसे प्रथम से वर्तमान है, नित्य है, वैसे ही आत्मा भी नित्य है, इसके शरीर को मूलाधार संस्कार जैसा होता है, वैसा शरीर बन जाता है॥६॥

इ॒दं य॒मस्य॒ साद॑नं देवमा॒नं यदु॒च्यते॑। इ॒यम॑स्य धम्यते ना॒ळीर॒यं गी॒र्भिः परि॑ष्कृतः॥

शरीर मृत्यु का सदन घर है, पृथिवि आदि देवों से बना हुआ कहा जाता है, इसकी प्राणनाड़ी चलती है, उसे देख जीता हुआ समझा जाता है, इस नवजात को पारिवारिक जन अपनी वाणियों से प्रशंसित करते हैं॥७॥

के॒श्य१॒॑ग्निं के॒शी वि॒षं के॒शी बि॑भर्ति॒ रोद॑सी। के॒शी विश्वं॒ स्व॑र्दृ॒शे के॒शीदं ज्योति॑रुच्यते॥

सूर्य रश्मिमान् है, अग्नि को धारण करता है, अन्य पिण्डों को प्रकाशित करता है, आकाश में जल को धारण करता है, द्युलोक पृथिवीलोक को धारण करता है, सब जगत् को दिखाने के लिए यह एक महान् ज्योति है॥१॥

मुन॑यो॒ वात॑रशनाः पि॒शङ्गा॑ वसते॒ मला॑। वात॒स्यानु॒ ध्राजिं॑ यन्ति॒ यद्दे॒वासो॒ अवि॑क्षत॥

सूर्य के अतिरिक्त अन्य पिण्ड आकाश में वातसूत्रों से खिंचे हुए सुनहरे चमचमाते हुए अन्धकार को मिटाते हुए वायु के वेग के समान गति करते हुए ग्रहतारे आकाश में वर्तमान हैं, उनका ज्ञान करना चाहिये॥२॥

उन्म॑दिता॒ मौने॑येन॒ वाताँ॒ आ त॑स्थिमा व॒यम्। शरी॒रेद॒स्माकं॑ यू॒यं मर्ता॑सो अ॒भि प॑श्यथ॥

आलङ्कारिक भाषा में आकाश के ग्रह बोलते हैं-मननीय सूर्य के द्वारा ग्रह प्रकाशित होते हैं, गतिप्रद वातसूत्रों के आश्रित आकाश में गति करते हैं, मनुष्य केवल उन बाहिरी रूप को देखते हैं, परन्तु अन्दर के स्वरूप को नहीं जानते हैं॥३॥

अ॒न्तरि॑क्षेण पतति॒ विश्वा॑ रू॒पाव॒चाक॑शत्। मुनि॑र्दे॒वस्य॑देवस्य॒ सौकृ॑त्याय॒ सखा॑ हि॒तः॥

सूर्य आकाश में प्राप्त होता है, तो प्रत्येक ग्रह के सब रूपों को प्रकाशित करता है उनके सुन्दर गतिकार्य के लिये सखा बना हुआ॥४॥

वात॒स्याश्वो॑ वा॒योः सखाथो॑ दे॒वेषि॑तो॒ मुनिः॑। उ॒भौ स॑मु॒द्रावा क्षे॑ति॒ यश्च॒ पूर्व॑ उ॒ताप॑रः॥

सूर्य आकाश में वातसूत्र द्वारा गति करता है, विद्युत् के समान प्रतापवान् परमात्मा से प्रेरित हुआ पूर्व पश्चिम में वर्तमान होता है, उसे जानना उससे लाभ उठाना चाहिये॥५॥

अ॒प्स॒रसां॑ गन्ध॒र्वाणां॑ मृ॒गाणां॒ चर॑णे॒ चर॑न्। के॒शी केत॑स्य वि॒द्वान्त्सखा॑ स्वा॒दुर्म॒दिन्त॑मः॥

द्युलोक में वर्तमान अन्तरिक्ष में तथा पृथिवी पर वर्तमान किरणों के प्रसार के निमित्त सूर्य अपने प्रकाश या अग्नि को साक्षात् करता है, स्वादवाली वस्तु में स्वादप्रेरक हर्षप्रद सूर्य है, उसका यथोचित लाभ लेना चाहिये॥६॥

वा॒युर॑स्मा॒ उपा॑मन्थत्पि॒नष्टि॑ स्मा कुनन्न॒मा। के॒शी वि॒षस्य॒ पात्रे॑ण॒ यद्रु॒द्रेणापि॑बत्स॒ह॥

सूर्य अपनी किरणों से तथा अग्नि ताप से जल को ऊपर खींचता है, वायु उसको विलोडित करता है, घुमाता है तथा विद्युत् अवयवों में छिन्न-भिन्न करता है और बरसा देता है॥७॥

उ॒त दे॑वा॒ अव॑हितं॒ देवा॒ उन्न॑यथा॒ पुनः॑। उ॒ताग॑श्च॒क्रुषं॑ देवा॒ देवा॑ जी॒वय॑था॒ पुनः॑॥

कोई मनुष्य यदि चरित्र से गिर जावे, तो विद्वान् लोग दया करके उसे चरित्रवान् बनावें और यदि कोई अपथ्य करके अपने को रोगी बना लेवे, तो विद्वान् वैद्य उसके रोग को दूर कर उसमें जीवनसंचार करें॥१॥

द्वावि॒मौ वातौ॑ वात॒ आ सिन्धो॒रा प॑रा॒वतः॑। दक्षं॑ ते अ॒न्य आ वा॑तु॒ परा॒न्यो वा॑तु॒ यद्रपः॑॥

मनुष्य के अन्दर दो वायु काम करती हैं, उनमें से श्वासरूप वायु प्राणाशय हृदय में आती है और जीवनबल को लाती है, दूसरी प्रश्वासरूप वायु बाहर जाती है और रोग को बाहर निकालती है, इसलिए श्वास को धीरे-धीरे लेना चाहिए और प्रश्वास को शीघ्र निकाल देना चाहिए॥२॥

आ वा॑त वाहि भेष॒जं वि वा॑त वाहि॒ यद्रपः॑। त्वं हि वि॒श्वभे॑षजो दे॒वानां॑ दू॒त ईय॑से॥

शरीर के अन्दर रहनेवाला वायु स्वास्थ्यप्रद गुण को लाता है और शरीर से बाहर निकलनेवाला रोग को बाहर ले जाता है, इस प्रकार वायु ही सब-ओषधवाला दिव्य-गुणों का लानेवाला है॥३॥

आ त्वा॑गमं॒ शंता॑तिभि॒रथो॑ अरि॒ष्टता॑तिभिः। दक्षं॑ ते भ॒द्रमाभा॑र्षं॒ परा॒ यक्ष्मं॑ सुवामि ते॥

रोगी को चिकित्सक औषध प्रदान करता हुआ आश्वासन भी दे कि मैं ऐसी औषध दे रहा हूँ, जो शान्ति देनेवाली रोग को हटानेवाली हैं, उनके द्वारा बल और कल्याण तेरे अन्दर भरता हूँ और रोग को हरता हूँ॥४॥

त्राय॑न्तामि॒ह दे॒वास्त्राय॑तां म॒रुतां॑ ग॒णः। त्राय॑न्तां॒ विश्वा॑ भू॒तानि॒ यथा॒यम॑र॒पा अस॑त्॥

इस परिवार में रोगी की सूर्यकिरणें रक्षा करें, वायुएँ रक्षा करें, सब पृथिवी आदि रक्षा करें, जिससे यह रोगरहित हो जावे॥५॥

आप॒ इद्वा उ॑ भेष॒जीरापो॑ अमीव॒चात॑नीः। आपः॒ सर्व॑स्य भेष॒जीस्तास्ते॑ कृण्वन्तु भेष॒जम्॥

जल स्नान और पान के द्वारा सब रोगों के ओषध हैं, स्वास्थ्यकर रसायनरूप हैं॥६॥

हस्ता॑भ्यां॒ दश॑शाखाभ्यां जि॒ह्वा वा॒चः पु॑रोग॒वी। अ॒ना॒म॒यि॒त्नुभ्यां॑ त्वा॒ ताभ्यां॒ त्वोप॑ स्पृशामसि॥

रोगी को यथोचित वाणी से अच्छे होने का आश्वासन दे, साथ में दोनों पूरे अँगुलियों सहित हाथों को यथोचित स्पर्श करते जावें, ऐसे जैसे इनसे रोग दूर होता हुआ प्रतीत हो रोगी को लाभ पहुँचाता है॥७॥

तव॒ त्य इ॑न्द्र स॒ख्येषु॒ वह्न॑य ऋ॒तं म॑न्वा॒ना व्य॑दर्दिरुर्व॒लम्। यत्रा॑ दश॒स्यन्नु॒षसो॑ रि॒णन्न॒पः कुत्सा॑य॒ मन्म॑न्न॒ह्य॑श्च दं॒सयः॑॥

मेघों को वहन करनेवाली हवाएँ जल को धारण करने के हेतु मेघ को अत्यन्त विदीर्ण करती हैं, उसमें विद्युत् अपनी तरङ्गों को फेंकता हुआ जल को नीचे स्रवित करता हुआ किसान के मनोरथ के निमित्त मेघ निपातनकर्म में प्रवृत्त होते हैं, तो वर्षा होने लगती है एवं राष्ट्र के कार्यभार को वहन करनेवाले यथार्थ-विधान को समझते हुए आक्रमणकारी शत्रु को विदीर्ण करते हैं, तब राजा अपने तेजों, तीक्ष्ण शस्त्रास्त्रों को फेंकता हुआ फैले हुए शत्रुदल को नीचे गिराता है, सब प्रशंसक प्रजागण के लिए मनोरथसिद्धि के निमित्त शत्रुवधसम्बन्धी विविध कर्म प्रवृत्त हो जाते हैं॥१॥

अवा॑सृजः प्र॒स्वः॑ श्व॒ञ्चयो॑ गि॒रीनुदा॑ज उ॒स्रा अपि॑बो॒ मधु॑ प्रि॒यम्। अव॑र्धयो व॒निनो॑ अस्य॒ दंस॑सा शु॒शोच॒ सूर्य॑ ऋ॒तजा॑तया गि॒रा॥

मेघ से जल बरसते हैं तो ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं, राष्ट्र में प्रशस्त प्रजाएँ उत्पन्न होनी चाहिये, पर्वतसदृश शत्रुओं को चलित करना चाहिये, मेघों के गिर जाने से सूर्य प्रकाशित हो जाता है, राष्ट्र में अज्ञान के दूर होने से ज्ञानसूर्य उदित हो जाता है, मेघ से अभीष्ट मधुर जल पीने को मिलता है, राष्ट्र में अनुकूल मधुर ज्ञानरस पिया जाता है, वनाश्रित वृक्षों को या जलवाले तडाग आदि को वर्षाजल बढ़ाते हैं, राष्ट्र में राजा अपने सम्भक्तों को बढ़ाता है, परमात्मरूप-यज्ञ से उत्पन्न वाणी द्वारा सुखसंचार होता है॥२॥

वि सूर्यो॒ मध्ये॑ अमुच॒द्रथं॑ दि॒वो वि॒दद्दा॒साय॑ प्रति॒मान॒मार्यः॑। दृ॒ळ्हानि॒ पिप्रो॒रसु॑रस्य मा॒यिन॒ इन्द्रो॒ व्या॑स्यच्चकृ॒वाँ ऋ॒जिश्व॑ना॥

कर्मोपक्षय करनेवाले मेघ के लिए या दुष्ट शत्रु के लिए प्रगतिशील विद्युदग्नि या श्रेष्ठ राजा प्रतिकारूप में प्रहार किया करता है, तब सूर्य आकाश में अपने प्रकाशमण्डल को प्रकाशित करता है तथा विद्यासूर्य विद्वान् ज्ञान का प्रसार करता है, जल से भरा मेघ जल बरसाता है, दूसरे के भोजन से भरे पेट दुष्ट मनुष्य का पतन होता है, विद्युत् या राजा मेघ या दुष्टजनों के बलों को निःसत्त्व कर देता है॥३॥

अना॑धृष्टानि धृषि॒तो व्या॑स्यन्नि॒धीँरदे॑वाँ अमृणद॒यास्यः॑। मा॒सेव॒ सूर्यो॒ वसु॒ पुर्य॒मा द॑दे गृणा॒नः शत्रूँ॑रशृणाद्वि॒रुक्म॑ता॥

राजा धर्षणशील हो, अहिंसित शस्त्रों से न थकता हुआ शत्रुओं को मारे-बल धनकोषों को वश में करे, सूर्य जैसे रश्मि से रस ले लेता है, सब कुछ शत्रु को स्ववश में ले लेवे, तेजस्वी शस्त्र से शत्रु को मारे॥४॥

अयु॑द्धसेनो वि॒भ्वा॑ विभिन्द॒ता दाश॑द्वृत्र॒हा तुज्या॑नि तेजते। इन्द्र॑स्य॒ वज्रा॑दबिभेदभि॒श्नथः॒ प्राक्रा॑मच्छु॒न्ध्यूरज॑हादु॒षा अनः॑॥

राजा की सेना सबल, स्वयं शक्तियों से पूर्ण तीक्ष्ण शस्त्रों को चलानेवाला हो, उसके शस्त्रप्रहार से शत्रु भय करे, संग्राम में शत्रुओं का सफाया करनेवाली सेना भी संग्राम में डट जानेवाली होनी चाहिए॥५॥

ए॒ता त्या ते॒ श्रुत्या॑नि॒ केव॑ला॒ यदेक॒ एक॒मकृ॑णोरय॒ज्ञम्। मा॒सां वि॒धान॑मदधा॒ अधि॒ द्यवि॒ त्वया॒ विभि॑न्नं भरति प्र॒धिं पि॒ता॥

राजा का बड़ा यश होता है, जो दुष्ट नास्तिक शत्रु को मारता है, मानो राजा उस अपने यश को सूर्य के द्युलोक में स्थापित करता है, जिस सूर्य को परमात्मा द्युलोक में धारण करता है॥६॥

सूर्य॑रश्मि॒र्हरि॑केशः पु॒रस्ता॑त्सवि॒ता ज्योति॒रुद॑याँ॒ अज॑स्रम्। तस्य॑ पू॒षा प्र॑स॒वे या॑ति वि॒द्वान्त्स॒म्पश्य॒न्विश्वा॒ भुव॑नानि गो॒पाः॥

परमात्मा की व्याप्ति सारे जगत् में सूर्यप्रकाश के समान व्याप्त है, वह अज्ञान को नष्ट करनेवाला सृष्टि से पूर्व निरन्तर ज्योतिस्वरूप है, उसके शासन में बलवान् वायु जैसे पदार्थ वर्तमान हैं, वह सब प्राणियों के कर्मों को जानता है एवं सूर्य व्याप्त तेजवाला अन्धकारनाशक पूर्व-दिशा में उदय होनेवाला अक्षीणज्योति वायु का प्रेरक सब वस्तुओं का प्रकाशक है॥१॥

नृ॒चक्षा॑ ए॒ष दि॒वो मध्य॑ आस्त आपप्रि॒वान्रोद॑सी अ॒न्तरि॑क्षम्। स वि॒श्वाची॑र॒भि च॑ष्टे घृ॒ताची॑रन्त॒रा पूर्व॒मप॑रं च के॒तुम्॥

परमात्मा कर्म करनेवाले मनुष्यों का द्रष्टा या साक्षी है, ज्ञानानन्दमय मोक्ष में प्राप्त होता है, द्युलोक पृथिवीलोक अन्तरिक्ष में भरा हुआ है-व्याप्त है, सारी दिशाओं को प्रकाशित करता है एवं सूर्य मनुष्यों के द्वारा देखा जानेवाला द्युलोक में वर्तमान तीनों लोकों को प्रकाश से भरनेवाला सब दिशाओं को प्रकाशित करता है॥२॥

रा॒यो बु॒ध्नः सं॒गम॑नो॒ वसू॑नां॒ विश्वा॑ रू॒पाभि च॑ष्टे॒ शची॑भिः। दे॒व इ॑व सवि॒ता स॒त्यध॒र्मेन्द्रो॒ न त॑स्थौ सम॒रे धना॑नाम्॥

परमात्मा वेदवाणियों के ज्ञान का दाता सत्यगुणकर्मस्वभाववाला समस्त निरूपणीय वस्तुओं का देनेवाला और प्राणदाता है एवं सूर्य अपने प्रकाश से वस्तुओं का दिखानेवाला प्राणसंचार करानेवाला है, समस्त रूपवाली वस्तुओं का बतानेवाला है, उससे लाभ लेना चाहिये॥३॥

वि॒श्वाव॑सुं सोम गन्ध॒र्वमापो॑ ददृ॒शुषी॒स्तदृ॒तेना॒ व्या॑यन्। तद॒न्ववै॒दिन्द्रो॑ रारहा॒ण आ॑सां॒ परि॒ सूर्य॑स्य परि॒धीँर॑पश्यत्॥

परमात्मा विश्व में बसा हुआ व्यापक पृथिवी आदि लोकों का धारण करनेवाला है, उसे आप्त प्रजाएँ देखती हैं, साक्षात् करती हैं और जो उनमें से विषयभोगों से विरक्त हो जाता है, उसे अपने अन्दर अनुभव करता है, वह सूर्यकिरणों द्वारा परमात्मा के पास पहुँचता है॥४॥

वि॒श्वाव॑सुर॒भि तन्नो॑ गृणातु दि॒व्यो ग॑न्ध॒र्वो रज॑सो वि॒मानः॑। यद्वा॑ घा स॒त्यमु॒त यन्न वि॒द्म धियो॑ हिन्वा॒नो धिय॒ इन्नो॑ अव्याः॥

परमात्मा विश्व को बसानेवाला मोक्षधाम का अधिपति, वेदवाणी का धारण करनेवाला, लोकमात्र का निर्माणकर्ता है, उससे सत्य ज्ञान व जिस बात को हम न जानते हों, उस बात का उपदेश लेने और बुद्धि की रक्षा करने की प्रार्थना करनी चाहिये॥५॥

सस्नि॑मविन्द॒च्चर॑णे न॒दीना॒मपा॑वृणो॒द्दुरो॒ अश्म॑व्रजानाम्। प्रासां॑ गन्ध॒र्वो अ॒मृता॑नि वोच॒दिन्द्रो॒ दक्षं॒ परि॑ जानाद॒हीना॑म्॥

परमात्मा ज्ञानों से भरे वेद को धारण करता है और उपदेश द्वारा द्वारों को खोलता है, इन मन्त्रवाणियों के ज्ञानामृतों का प्रवचन करता है, अज्ञान या पापों को मिटाने के लिए मनुष्य को बल प्राप्त करना चाहिये॥६॥

अग्ने॒ तव॒ श्रवो॒ वयो॒ महि॑ भ्राजन्ते अ॒र्चयो॑ विभावसो। बृह॑द्भानो॒ शव॑सा॒ वाज॑मु॒क्थ्यं१॒॑ दधा॑सि दा॒शुषे॑ कवे॥

परमात्मा विशेष ज्ञानदीप्ति से बसनेवाला है, उसका श्रवण करने योग्य वेद और विज्ञान है, उसकी ज्ञानदीप्तियाँ संसार के पदार्थों में प्रकाशित हैं, वह आत्मसमर्पी उपासक के लिए प्रशंसनीय मोक्ष का अमृतान्नभोग देता है॥१॥

पा॒व॒कव॑र्चाः शु॒क्रव॑र्चा॒ अनू॑नवर्चा॒ उदि॑यर्षि भा॒नुना॑। पु॒त्रो मा॒तरा॑ वि॒चर॒न्नुपा॑वसि पृ॒णक्षि॒ रोद॑सी उ॒भे॥

परमात्मा पवित्रकारक दीप्तिवाला, शुभ्र तेजवाला, पूर्ण तेजवाला उपासक के अन्दर प्रकाशित होता है, माता पिता के प्रति पुत्र जैसे रक्षा करता है, वैसे द्युलोक और पृथिवीलोक को तू पालता है॥२॥

ऊर्जो॑ नपाज्जातवेदः सुश॒स्तिभि॒र्मन्द॑स्व धी॒तिभि॑र्हि॒तः। त्वे इषः॒ सं द॑धु॒र्भूरि॑वर्पसश्चि॒त्रोत॑यो वा॒मजा॑ताः॥

परमात्मा बल को न गिरानेवाला है, सबका ज्ञाता है, जो उत्तम स्तुतियों सदाचरणों द्वारा तथा श्रेष्ठ गुणों से प्रसिद्ध जन हैं, उन्हें हर्षित करता है, ऐसे बहुत सुन्दर रूपों से युक्त रक्षाओं से युक्त हो उनकी कामनाओं को पूरा करता है॥३॥

इ॒र॒ज्यन्न॑ग्ने प्रथयस्व ज॒न्तुभि॑र॒स्मे रायो॑ अमर्त्य। स द॑र्श॒तस्य॒ वपु॑षो॒ वि रा॑जसि पृ॒णक्षि॑ सान॒सिं क्रतु॑म्॥

अमर परमात्मा पदार्थों को उत्पन्न करके उन पर स्वामित्व करता है, मनुष्यों के लिए धनादि भोग्य वस्तुओं का विस्तार करता है, कर्मों के अनुसार फलप्रदान करता है॥४॥

इ॒ष्क॒र्तार॑मध्व॒रस्य॒ प्रचे॑तसं॒ क्षय॑न्तं॒ राध॑सो म॒हः। रा॒तिं वा॒मस्य॑ सु॒भगां॑ म॒हीमिषं॒ दधा॑सि सान॒सिं र॒यिम्॥

आध्यात्मयज्ञ को सुन्दर रूप देनेवाला परमात्मा है, वह महान् धन का स्वामी सदा सावधान कमनीय धन सौभाग्य को देनेवाली दान दया से धन प्रदान करता है, वह स्तुति करने योग्य है॥५॥

ऋ॒तावा॑नं महि॒षं वि॒श्वद॑र्शतम॒ग्निं सु॒म्नाय॑ दधिरे पु॒रो जनाः॑। श्रुत्क॑र्णं स॒प्रथ॑स्तमं त्वा गि॒रा दैव्यं॒ मानु॑षा यु॒गा॥

परमात्मा महान् और सत्य ज्ञानवाला है, सब मनुष्यों के द्वारा अध्यात्मदृष्टि से देखने योग्य है, सुखप्राप्ति के लिए सब कार्यों के प्रथम परमात्मा का ध्यान या स्तवन करते हैं, जीवन्मुक्त आत्माओं के हितकर परमात्मा की सब स्त्री-पुरुषों को स्तुति करनी चाहिये॥६॥

अग्ने॒ अच्छा॑ वदे॒ह नः॑ प्र॒त्यङ्नः॑ सु॒मना॑ भव। प्र नो॑ यच्छ विशस्पते धन॒दा अ॑सि न॒स्त्वम्॥

परमात्मा से अच्छे ज्ञान का उपदेश प्रेरित करने और उसके साक्षात् करने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, वह अच्छे मन का बनानेवाला और जीवनार्थ साधनों का देनेवाला तथा धनदाता है॥१॥

प्र नो॑ यच्छत्वर्य॒मा प्र भगः॒ प्र बृह॒स्पतिः॑। प्र दे॒वाः प्रोत सू॒नृता॑ रा॒यो दे॒वी द॑दातु नः॥

राष्ट्र में रहनेवाले प्रजाजनों के लिए न्यायाधीश न्याय दे और धन-सम्पत्तिशाली जन केवल अपने लिए ही नहीं, अपितु प्रजाजनों के लिए उस सम्पत्ति का यथोचित भाग दें, विद्वान् जन प्रजा को ज्ञान शरण प्रदान करें, अन्नादि की व्यवस्था करनेवाली समिति या राजनीति प्रजा के लिए अन्न आदि देती रहे॥२॥

सोमं॒ राजा॑न॒मव॑से॒ऽग्निं गी॒र्भिर्ह॑वामहे। आ॒दि॒त्यान्विष्णुं॒ सूर्यं॑ ब्र॒ह्माणं॑ च॒ बृह॒स्पति॑म्॥

राष्ट्र के प्रजाजनों को अपनी रक्षा के लिए सोम्यगुणवाले राजा को, अग्रणेता मुख्य जन को, सकल गुणव्यापक महात्मा को, विद्यासूर्य आचार्य को, अखण्डित ब्रह्मचर्यवाले ब्रह्मचारी को ब्रह्मज्ञानी को, ज्ञानवक्ता को रक्षा के लिए आमन्त्रित करके रक्षा के उपायों पर विचार करना चाहिये॥३॥

इ॒न्द्र॒वा॒यू बृह॒स्पतिं॑ सु॒हवे॒ह ह॑वामहे। यथा॑ नः॒ सर्व॒ इज्जनः॒ संग॑त्यां सु॒मना॒ अस॑त्॥

प्रजाजन सभाध्यक्ष और सेनाध्यक्षों को तथा प्रजा के पालक वैश्य को आमन्त्रित करें और सब परस्पर संगति में होकर प्रसन्न रहें, ऐसे उपाय पर विचार करें॥४॥

अ॒र्य॒मणं॒ बृह॒स्पति॒मिन्द्रं॒ दाना॑य चोदय। वातं॒ विष्णुं॒ सर॑स्वतीं सवि॒तारं॑ च वा॒जिन॑म्॥

आदित्य, बृहस्पति-आकाश की विद्युत् अन्तरिक्ष की वायु, पृथिवी की वायु, पृथिवी के अन्दर के विष्णु-व्यापक अग्नि तत्त्व, नदी और प्रातःकाल उदय होनेवाले सूर्य को अपने-अपने लाभ देने के लिए प्रेरित करता है, वह स्तुति करने योग्य है॥५॥

त्वं नो॑ अग्ने अ॒ग्निभि॒र्ब्रह्म॑ य॒ज्ञं च॑ वर्धय। त्वं नो॑ दे॒वता॑तये रा॒यो दाना॑य चोदय॥

परमात्मा विद्वानों के द्वारा ब्रह्मयज्ञ और श्रेष्ठकर्म को बढ़ाता है तथा विद्वानों को देने के लिए धनों को बढ़ाता है॥६॥

अ॒यम॑ग्ने जरि॒ता त्वे अ॑भू॒दपि॒ सह॑सः सूनो न॒ह्य१॒॑न्यदस्त्याप्य॑म्। भ॒द्रं हि शर्म॑ त्रि॒वरू॑थ॒मस्ति॑ त आ॒रे हिंसा॑ना॒मप॑ दि॒द्युमा कृ॑धि॥

परमात्मा का स्तुति करनेवाला उसके अन्दर निमग्न हो जाता है, परमात्मा से भिन्न उसकी कोई प्राप्तव्य वस्तु नहीं होती, परमात्मा की शरण कल्याणकारी है और तीन दुखों-अर्थात् आध्यात्मिक, अधिदैविक और अधिभौतिक दुखों का निवारक है, हिंसकों के शस्त्रास्त्र को दूर फेंकता है॥१॥

प्र॒वत्ते॑ अग्ने॒ जनि॑मा पितूय॒तः सा॒चीव॒ विश्वा॒ भुव॑ना॒ न्यृ॑ञ्जसे। प्र सप्त॑यः॒ प्र स॑निषन्त नो॒ धियः॑ पु॒रश्च॑रन्ति पशु॒पा इ॑व॒ त्मना॑॥

परमात्मा का साक्षात्कार साथी के समान है योग्य बनाने के लिए, मनुष्यों की स्तुतियाँ उसे घेर लेती हैं, आत्मभाव से प्रेरित की हुई उसके सम्मुख वर्तमान रहती हैं, पशुपालकों की भाँति जैसे पशुपालक पशुओं के सामने रहते हैं॥२॥

उ॒त वा उ॒ परि॑ वृणक्षि॒ बप्स॑द्ब॒होर॑ग्न॒ उल॑पस्य स्वधावः। उ॒त खि॒ल्या उ॒र्वरा॑णां भवन्ति॒ मा ते॑ हे॒तिं तवि॑षीं चुक्रुधाम॥

परमात्मा स्वाधार ज्ञानप्रकाशक है, वह कोमल तृण के समान ढाँपनेवाले अज्ञान या पाप को नष्ट कर देता है, जबकि उपासक में अपना ज्ञानप्रकाश भरता है और जिसकी श्रेष्ठ भूमि आन्तरिक स्थिति होती है, उसके खण्ड-खण्ड या भिन्न-भिन्न अङ्ग परमात्मा के प्रसाद से सुसम्पन्न हो जाते हैं, प्रतिकूल-आचरण से उसकी बलवती प्रहरशक्ति को क्रोधित न करें॥३॥

यदु॒द्वतो॑ नि॒वतो॒ यासि॒ बप्स॒त्पृथ॑गेषि प्रग॒र्धिनी॑व॒ सेना॑। य॒दा ते॒ वातो॑ अनु॒वाति॑ शो॒चिर्वप्ते॑व॒ श्मश्रु॑ वपसि॒ प्र भूम॑॥

परमात्मा अपने प्रकाश से ऊँचों-नीचों को प्रकाशित करता हुआ संसार में व्याप्त है, युद्ध की आकाङ्क्षा करती हुई सेना की भाँति व्याप्त हुआ पृथक्-पृथक् सबको स्वाधीन करता है, तो उसके अज्ञानों को नाई के समान छिन्न-भिन्न कर देता है॥४॥

प्रत्य॑स्य॒ श्रेण॑यो ददृश्र॒ एकं॑ नि॒यानं॑ ब॒हवो॒ रथा॑सः। बा॒हू यद॑ग्ने अनु॒मर्मृ॑जानो॒ न्य॑ङ्ङुत्ता॒नाम॒न्वेषि॒ भूमि॑म्॥

परमात्मा के उपासक आत्माएँ उसके आश्रय में वर्तमान होते हैं, वह उन्हें अच्छी यात्रा कराता है, उनके भुजाओं को एकड़ मानो ले जाता है, नीचे भूमि से ऊँची भूमि पर पहुँचता है, वह दयालु उपास्य है॥५॥

उत्ते॒ शुष्मा॑ जिहता॒मुत्ते॑ अ॒र्चिरुत्ते॑ अग्ने शशमा॒नस्य॒ वाजाः॑। उच्छ्व॑ञ्चस्व॒ नि न॑म॒ वर्ध॑मान॒ आ त्वा॒द्य विश्वे॒ वस॑वः सदन्तु॥

परमात्मा स्तुति में लाया जाता है, तो स्तुति करनेवाले के अन्दर पाप अज्ञान के शोषण करनेवाले बलगुण उद्भूत होते हैं उठते हैं, उसका प्रकाश भी उदय होता है, अमृत अन्नभोग प्राप्त होते हैं, परमात्मा स्वयं साक्षात् होता है, उसे उत्पन्न करता है, स्तुति करनेवालों को अपना आश्रय देता है॥६॥

अ॒पामि॒दं न्यय॑नं समु॒द्रस्य॑ नि॒वेश॑नम्। अ॒न्यं कृ॑णुष्वे॒तः पन्थां॒ तेन॑ याहि॒ वशाँ॒ अनु॑॥

यह शरीर इन्द्रिय विषयों का नियत स्थान है और मन का निवासस्थान है, इन्द्रियों के विषयों और मन की वासनाओं से घिरा हुआ है, इसलिए उपासक इससे भिन्न-अध्यात्ममार्ग का अवलम्बन करके स्ववशवर्ती आनन्दों को प्राप्त करे॥७॥

आय॑ने ते प॒राय॑णे॒ दूर्वा॑ रोहन्तु पु॒ष्पिणीः॑। ह्र॒दाश्च॑ पु॒ण्डरी॑काणि समु॒द्रस्य॑ गृ॒हा इ॒मे॥

वैराग्यवान् उपासक का जब तक शरीर है, अन्य शरीरों की भाँति विषयवासनाओं का घर ना बना रहे, किन्तु हरी-हरी दूबों और फूलोंवाली लताओं के समान भावनाएँ तथा इन्द्रिय और मन स्रोतों और कमल के समान आत्मा को हर्षित करनेवाले स्थान बनें॥८॥

त्यं चि॒दत्रि॑मृत॒जुर॒मर्थ॒मश्वं॒ न यात॑वे। क॒क्षीव॑न्तं॒ यदी॒ पुना॒ रथं॒ न कृ॑णु॒थो नव॑म्॥

आत्मा शरीर में आकर भोग भोगकर जरा अवस्था को प्राप्त हो जाता है, परन्तु ये शारीरिक इष्टसिद्धि के लिए नहीं है, घोड़ा जैसे कक्षीबन्धन में बँधा होता है, उस ऐसे को दो शिल्पियों की भाँति जो रथ को नया बना देते हैं, उसकी भाँति अध्यापक और उपदेशक द्वारा अध्यापन और उपदेश सुनता है, तो नया बन जाता है॥१॥

त्यं चि॒दश्वं॒ न वा॒जिन॑मरे॒णवो॒ यमत्न॑त। दृ॒ळ्हं ग्र॒न्थिं न वि ष्य॑त॒मत्रिं॒ यवि॑ष्ठ॒मा रजः॑॥

घोड़े के समान बलवान् आत्मा जब भोक्ता बन जाता है, तो उसके अन्दर वर्तमान वासनाएँ ऐसे अपने ताने बने में फँसा लेती हैं-आकर्षित कर लेती हैं, फिर यह दृढ़ बन्धन में फँस जाता है, ऐसे उपासक और उपदेशक अपने अध्यात्मप्रवचनों द्वारा इसके राग को छिन्न-भिन्न करके छुड़ाते हैं, निर्बन्धन बना देते हैं॥२॥

नरा॒ दंसि॑ष्ठा॒वत्र॑ये॒ शुभ्रा॒ सिषा॑सतं॒ धियः॑। अथा॒ हि वां॑ दि॒वो न॑रा॒ पुन॒ स्तोमो॒ न वि॒शसे॑॥

अत्यन्त दर्शनीय निर्मल ज्ञानवाले अध्यापक और उपदेशक भोक्ता जीवात्मा के लिए अध्यात्मबुद्धियों को उपजाते हैं और अध्यात्मकर्मों का आचरण करवाते हैं, ऐसे तुम लोगों को ज्ञान से द्योतमान परमात्मा के स्तुतिसमूह या प्रशंसाप्रवाह उस परमात्मा की विशेष प्रशंसा करने को प्रवृत्त होता है-प्राप्त होता है॥३॥

चि॒ते तद्वां॑ सुराधसा रा॒तिः सु॑म॒तिर॑श्विना। आ यन्नः॒ सद॑ने पृ॒थौ सम॑ने॒ पर्ष॑थो नरा॥

ज्ञानधन देनेवाले अध्यापक और उपदेशकों का मनुष्य के लिए ज्ञान देना सुमति प्रदान करना चालू रहना चाहिए, उससे ज्ञानसदन अन्तःकरण को भरना चाहिये॥४॥

यु॒वं भु॒ज्युं स॑मु॒द्र आ रज॑सः पा॒र ई॑ङ्खि॒तम्। या॒तमच्छा॑ पत॒त्रिभि॒र्नास॑त्या सा॒तये॑ कृतम्॥

अध्यात्मविषय के अध्यापक और उपदेशक रञ्जनात्मक भोगविलास के समुद्र में झकोले खाते हुए-दोलायमान होते हुए भोगी जन को प्राप्त होते हो और अध्यात्मसाधनों श्रवणादि के द्वारा मोक्षप्राप्ति के लिए पार करते हो॥५॥

आ वां॑ सु॒म्नैः शं॒यू इ॑व॒ मंहि॑ष्ठा॒ विश्व॑वेदसा। सम॒स्मे भू॑षतं न॒रोत्सं॒ न पि॒प्युषी॒रिषः॑॥

अध्यापक और उपदेशक अत्यन्त ज्ञान देनेवाले कल्याणकारी होते हैं, वे साधुप्रवचनों से लोगों को संस्कृत करते हैं और ज्ञान से भरते हैं, जैसे वृष्टि के जल जलाशय को भरा करते हैं॥६॥

अ॒यं हि ते॒ अम॑र्त्य॒ इन्दु॒रत्यो॒ न पत्य॑ते। दक्षो॑ वि॒श्वायु॑र्वे॒धसे॑॥

मनुष्य के अन्दर एक तत्त्व मानवबीज या वीर्य-ब्रह्मचर्य नाम से प्रसिद्ध है, जो मृत्यु से-मृत्यु के दुःख के बचानेवाला है, ऐसा बल या बलप्रद तथा पूर्णायु को भुगानेवाला है, उसकी रक्षा करनी चाहिए॥१॥

अ॒यम॒स्मासु॒ काव्य॑ ऋ॒भुर्वज्रो॒ दास्व॑ते। अ॒यं बि॑भर्त्यू॒र्ध्वकृ॑शनं॒ मद॑मृ॒भुर्न कृत्व्यं॒ मद॑म्॥

ब्रह्मचर्य मनुष्य को मेधावी बनाता है, आयु देता है, ऊँचा हर्षकारक रोगनाशक है, उसको धारण करना चाहिये॥२॥

घृषुः॑ श्ये॒नाय॒ कृत्व॑न आ॒सु स्वासु॒ वंस॑गः। अव॑ दीधेदही॒शुवः॑॥

ब्रह्मचर्य मनुष्य को कर्मठ पराक्रमी श्रेष्ठ व्यवहारवाला बनाता है, शरीर की नाड़ियों में प्राणों को उत्तेजित करता है, बल देता है॥३॥

यं सु॑प॒र्णः प॑रा॒वतः॑ श्ये॒नस्य॑ पु॒त्र आभ॑रत्। श॒तच॑क्रं॒ यो॒३॒॑ऽह्यो॑ वर्त॒निः॥

ब्रह्मचर्य मानव की सौ वर्ष आयु पूर्णायु करनेवाला है, इसे परमात्मा से प्रेरित आत्मा का शिवसंकल्प धारण करता है-शिवसंकल्प से धारण किया जाता है, यह जीवन में धारण करने योग्य है, जीवन का सच्चा मार्ग बनाता है॥४॥

यं ते॑ श्ये॒नश्चारु॑मवृ॒कं प॒दाभ॑रदरु॒णं मा॒नमन्ध॑सः। ए॒ना वयो॒ वि ता॒र्यायु॑र्जी॒वस॑ ए॒ना जा॑गार ब॒न्धुता॑॥

मनुष्य जो अन्न खाता है, उससे शरीर का निर्माण करने योग्य तेज, सुन्दर शरीर धारण करने योग्य न नष्ट करने योग्य वीर्य पदार्थ को जीवात्मा संयम से ब्रह्मचर्यरूप आचरण से धारण करता है, जो आयु को बढ़ाता है, जीवन में तेज देता है, परमात्मा के साथ मित्रता को जागृत करता है॥५॥

ए॒वा तदिन्द्र॒ इन्दु॑ना दे॒वेषु॑ चिद्धारयाते॒ महि॒ त्यजः॑। क्रत्वा॒ वयो॒ वि ता॒र्यायुः॑ सुक्रतो॒ क्रत्वा॒यम॒स्मदा सु॒तः॥

आत्मा संयम से वीर्य की रक्षा करके द्वारा इन्द्रियों में तेज धारण करता है, जीवन और आयु को बढ़ाता है, सुरक्षित वीर्य द्वारा अभीष्ट कर्मफल सिद्ध होता है॥६॥

इ॒मां ख॑ना॒म्योष॑धिं वी॒रुधं॒ बल॑वत्तमाम्। यया॑ स॒पत्नीं॒ बाध॑ते॒ यया॑ संवि॒न्दते॒ पति॑म्॥

कामवासना को मिटानेवाली उपनिषद् अध्यात्मविद्या को निष्पादित करना चाहिए तथा जो कामवासना को मिटाकर विश्वपति परमात्मा को प्राप्त कराती है॥१॥

उत्ता॑नपर्णे॒ सुभ॑गे॒ देव॑जूते॒ सह॑स्वति। स॒पत्नीं॑ मे॒ परा॑ धम॒ पतिं॑ मे॒ केव॑लं कुरु॥

जीवन्मुक्तों के द्वारा अध्यात्मविद्या या उसकी निमित्तभूत सोम ओषधि सेवन की जाती है, जो कामवासना को मिटाती है, परमात्मा का सङ्ग कराती है॥२॥

उत्त॑रा॒हमु॑त्तर॒ उत्त॒रेदुत्त॑राभ्यः। अथा॑ स॒पत्नी॒ या ममाध॑रा॒ साध॑राभ्यः॥

जैसे ओषधियों में सोम उत्कृष्ट है, ऐसे अध्यात्मविद्या सब विद्याओं में उत्कृष्ट है, कामवासना नीच है सब नीच भावनाओं में, अतः कामवासना को स्थान अधिक न देना चाहिए॥३॥

न॒ह्य॑स्या॒ नाम॑ गृ॒भ्णामि॒ नो अ॒स्मिन्र॑मते॒ जने॑। परा॑मे॒व प॑रा॒वतं॑ स॒पत्नीं॑ गमयामसि॥

जिस मनुष्य के अन्दर अध्यात्मविद्या बस जाती है, उसमें कामवासना नहीं रहती है, अपितु वह कामवासना का नाम तक नहीं लेता,उससे कामवासना दूर हो जाती है॥४॥

अ॒हम॑स्मि॒ सह॑मा॒नाथ॒ त्वम॑सि सास॒हिः। उ॒भे सह॑स्वती भू॒त्वी स॒पत्नीं॑ मे सहावहै॥

अध्यात्मविद्या बहुत बल रखती है कामवासना को दबाने के लिए और सोम ओषधि भी बल रखती है कामवासना को दबाने के लिए, दोनों का सेवन कामवासना से बचाता है॥५॥

उप॑ तेऽधां॒ सह॑मानाम॒भि त्वा॑धां॒ सही॑यसा। मामनु॒ प्र ते॒ मनो॑ व॒त्सं गौरि॑व धावतु प॒था वारि॑व धावतु॥

अध्यात्मविद्या का सहायक सोम ओषधि है, उसे भी अध्यात्मप्रेमी सेवन करे, अध्यात्मविद्या के प्रति अनुराग ऐसा होना चाहिए, जैसे गौ का बछड़े के प्रति, जैसे जल निम्न मार्ग के प्रति बह जाता है॥६॥

अर॑ण्या॒न्यर॑ण्यान्य॒सौ या प्रेव॒ नश्य॑सि। क॒था ग्रामं॒ न पृ॑च्छसि॒ न त्वा॒ भीरि॑व विन्दती३ँ॥

दिव्यगुणवाले प्राकृतिक पदार्थों में जैसे-सूर्य, चन्द्र, पर्वत, समुद्र, नदी अपने-अपने गुणों से मनुष्य को अपनी ओर खींचनेवाले होते हैं और उपयोग देनेवाले होते हैं, ऐसे ही अरण्यों का समूह अरण्यानी सामूहिक नाम-जैसे सैनिकों का समूह सेना नाम से प्रसिद्ध होता है, वैसे इस सूक्त में अरण्यों का समूह अरण्यानी नाम से प्रसिद्ध किया गया है, उसे आलङ्कारिक रूप देकर कहा गया है कि तू अरण्यों की पृष्ठगामिनी अरण्यों में व्याप रही है अरण्यों की शोभारूप में, तू ग्राम की शोभा ग्राम को शोभित क्यों नहीं कर रही? तुझे भय नहीं लगता ? अरण्यानी की शोभा अरण्यों में है, ग्राम में नहीं है, न वहाँ उसके लिए भय का अवसर है, क्योंकि वह अरण्यों में ही रहती है॥१॥

वृ॒षा॒र॒वाय॒ वद॑ते॒ यदु॒पाव॑ति चिच्चि॒कः। आ॒घा॒टिभि॑रिव धा॒वय॑न्नरण्या॒निर्म॑हीयते॥

मन में सुख वर्षानेवाले मेघवर्षण के समान मधुर ध्वनि करनेवाला झिङ्गुर और उसका अनुपोषण शब्द करनेवाला चिच् चिक् वृक्ष से लिपटा हुआ सूक्ष्म जन्तु सस्वर गाने जैसे उच्चारण करनेवाला सूक्ष्म जन्तु जहाँ इस प्रकार गाना बजाना कर रहे होते हैं, वह अरण्यानी है, जो जङ्गल में घूमनेवालों के लिए बहुत रुचिकर है॥२॥

उ॒त गाव॑ इवादन्त्यु॒त वेश्मे॑व दृश्यते। उ॒तो अ॑रण्या॒निः सा॒यं श॑क॒टीरि॑व सर्जति॥

अरण्यों के समूह अरण्यानी का यह भी एक दृश्य है, उनमें नीलगाय आदि वन्य पशु घास खाते हुए विचरते हैं और वहीं पर गुल्म तरु आदियों से छाया हुआ घर जैसा दिखलाई पड़ता है और सायंकाल के समय तीव्र वायु के झोंके लगते हैं, जैसे गाड़ियाँ चलती हों॥३॥

गाम॒ङ्गैष आ ह्व॑यति॒ दार्व॒ङ्गैषो अपा॑वधीत्। वस॑न्नरण्या॒न्यां सा॒यमक्रु॑क्ष॒दिति॑ मन्यते॥

अरण्यानी में यह भी दृश्य देखा जाता है कि गौवाला गौओं को चराकर सायंकाल हाँकने के लिए गौओं को पुकारता है और लकड़ी काटनेवाला लकड़ी काटता है, रात्रि में कोई मनुष्य या मनुष्यगण गाता बजाता है और परमात्मा की स्तुति करता हुआ अपने को धन्य मानता है॥४॥

न वा अ॑रण्या॒निर्ह॑न्त्य॒न्यश्चेन्नाभि॒गच्छ॑ति। स्वा॒दोः फल॑स्य ज॒ग्ध्वाय॑ यथा॒कामं॒ नि प॑द्यते॥

अरण्यानी किसी को मारती नहीं है अर्थात् उसमें रहनेवाले जंगली पशु किसी को नहीं मारते हैं, यदि कोई उन पर आक्रमण नहीं करे। अरण्यानी में वन्य फल भी खाने को मिलते हैं॥५॥

आञ्ज॑नगन्धिं सुर॒भिं ब॑ह्व॒न्नामकृ॑षीवलाम्। प्राहं मृ॒गाणां॑ मा॒तर॑मरण्या॒निम॑शंसिषम्॥

अरण्यानी में रसाञ्जन गन्ध और अन्य सुगन्धवाले पत्ते फूलवाले वृक्ष होते हैं और विना किसानों के बोए बहुत प्रकार के खाद्य पदार्थ-अन्न होते हैं, भाँति-भाँति के जंगली पशु भी उसमें होते हैं, ऐसे गुणोंवाली अरण्यानी प्रशंसनीय है॥६॥

श्रत्ते॑ दधामि प्रथ॒माय॑ म॒न्यवेऽह॒न्यद्वृ॒त्रं नर्यं॑ वि॒वेर॒पः। उ॒भे यत्त्वा॒ भव॑तो॒ रोद॑सी॒ अनु॒ रेज॑ते॒ शुष्मा॑त्पृथि॒वी चि॑दद्रिवः॥

परमात्मा भी बड़ा बलवान् है, मेघ को छिन्न-भिन्न करके नीचे पानी बहाता है, द्युलोक पृथिवीलोक तेरी अधीनता में रहते हैं, अन्तरिक्ष में कम्पन विद्युत्सञ्चार, वायुप्रचार परमात्मा के शासन से होता है॥१॥

त्वं मा॒याभि॑रनवद्य मा॒यिनं॑ श्रवस्य॒ता मन॑सा वृ॒त्रम॑र्दयः। त्वामिन्नरो॑ वृणते॒ गवि॑ष्टिषु॒ त्वां विश्वा॑सु॒ हव्या॒स्विष्टि॑षु॥

परमात्मा अनिन्दनीय है, उसके प्रति नास्तिकभाव नहीं रखना चाहिये, वह प्राणियों के लिए अन्न की उत्पत्ति हो, वृद्धि हो, इसलिए मेघ का हनन करता है जल बरसाने के लिए, वह अध्यात्मसुखविशेष की प्राप्ति की इच्छावाले अध्यात्मप्रसङ्गों में तथा होमने योग्य जनव्यवहारों में मनुष्य उसकी स्तुति करते हैं या मनुष्यों को उसकी स्तुति करनी चाहिये॥२॥

ऐषु॑ चाकन्धि पुरुहूत सू॒रिषु॑ वृ॒धासो॒ ये म॑घवन्नान॒शुर्म॒घम्। अर्च॑न्ति तो॒के तन॑ये॒ परि॑ष्टिषु मे॒धसा॑ता वा॒जिन॒मह्र॑ये॒ धने॑॥

परमात्मा बहुत प्रकार से आमन्त्रण करने योग्य है, वह अपनी स्तुति करनेवालों के अन्दर साक्षात् होता है, उसकी स्तुति करनेवाले धनों से समृद्ध हो जाते हैं और सङ्गमनीय अवसरों का लाभ लेते हैं। उस महान् ऐश्वर्यवान् बलवान् परमात्मा की निःसङ्कोच धनप्राप्ति के लिए स्तुति करनी चाहिये॥३॥

स इन्नु रा॒यः सुभृ॑तस्य चाकन॒न्मदं॒ यो अ॑स्य॒ रंह्यं॒ चिके॑तति। त्वावृ॑धो मघवन्दा॒श्व॑ध्वरो म॒क्षू स वाजं॑ भरते॒ धना॒ नृभिः॑॥

जो परमात्मा के स्वरूप को जानता है, वह सुपुष्ट अन्न को प्राप्त करता है और जो दूसरों के लिए अभयदान देता है, वह अपने कर्मों द्वारा अमृतान्नभोग और लौकिक धन को प्राप्त करता है॥४॥

त्वं शर्धा॑य महि॒ना गृ॑णा॒न उ॒रु कृ॑धि मघवञ्छ॒ग्धि रा॒यः। त्वं नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो॒ न मा॒यी पि॒त्वो न द॑स्म दयसे विभ॒क्ता॥

परमात्मा दर्शनीय है और ऐश्वर्यशाली है, बहुत स्तुति करने योग्य है, बलदायक है, धनों को प्रदान करनेवाला है, संसार में कर्म करने के लिए प्रेरणा करनेवाला और मोक्ष के लिए वरनेवाला यथायोग्य भोज्य पदार्थ को देनेवाला है॥५॥

सु॒ष्वा॒णास॑ इन्द्र स्तु॒मसि॑ त्वा सस॒वांस॑श्च तुविनृम्ण॒ वाज॑म्। आ नो॑ भर सुवि॒तं यस्य॑ चा॒कन्त्मना॒ तना॑ सनुयाम॒ त्वोताः॑॥

उपासक परमात्मा के गुणों का अत्यन्त वर्णन करता हुआ उससे मोक्षसम्बन्धी भोगों को माँगता हुआ उससे रक्षा और शरण की कामना करे॥१॥

ऋ॒ष्वस्त्वमि॑न्द्र शूर जा॒तो दासी॒र्विशः॒ सूर्ये॑ण सह्याः। गुहा॑ हि॒तं गुह्यं॑ गू॒ळ्हम॒प्सु बि॑भृ॒मसि॑ प्र॒स्रव॑णे॒ न सोम॑म्॥

परमात्मा शूरवीर महान् है, सूर्य के समान प्रतापी है, उसे अपनी आत्मा को समर्पित करनेवाली उपासक प्रजाएँ प्रिय हो जाती हैं, तू उनकी बुद्धि में और प्राणों में रहता है, जैसे स्रोतों में जल होता है॥२॥

अ॒र्यो वा॒ गिरो॑ अ॒भ्य॑र्च वि॒द्वानृषी॑णां॒ विप्रः॑ सुम॒तिं च॑का॒नः। ते स्या॑म॒ ये र॒णय॑न्त॒ सोमै॑रे॒नोत तुभ्यं॑ रथोळ्ह भ॒क्षैः॥

परमात्मा मोक्षपद में सदा वर्तमान, नित्यमुक्त, स्वामी, सर्वज्ञ और तृप्त करनेवाला है, ऋषियों की स्तुति का स्वागत करनेवाला है, जो भजनीय स्तुतियों से तेरे अन्दर रमण करते हैं, वे तेरे हो जाते हैं॥३॥

इ॒मा ब्रह्मे॑न्द्र॒ तुभ्यं॑ शंसि॒ दा नृभ्यो॑ नृ॒णां शू॑र॒ शवः॑। तेभि॑र्भव॒ सक्र॑तु॒र्येषु॑ चा॒कन्नु॒त त्रा॑यस्व गृण॒त उ॒त स्तीन्॥

परमात्मा की वेदवचनों द्वारा स्तुति करना चाहिए, अन्यथा नहीं, जो परमात्मा की स्तुति करते हैं, उनके संकल्प के अनुसार परमात्मा उनकी कामना पूरी करता है तथा उनके सहयोगियों की परमात्मा रक्षा करता है॥४॥

श्रु॒धी हव॑मिन्द्र शूर॒ पृथ्या॑ उ॒त स्त॑वसे वे॒न्यस्या॒र्कैः। आ यस्ते॒ योनिं॑ घृ॒तव॑न्त॒मस्वा॑रू॒र्मिर्न निम्नैर्द्र॑वयन्त॒ वक्वाः॑॥

परमात्मा समस्त फैली हुए हुई प्रजा के प्रार्थनावचनों को सुनता है और वेदमन्त्रों से जो उसकी स्तुति करता है, उसकी वह विशेषरूप से प्रार्थना स्वीकार करता है, उसके तेजस्वी स्वरूप को जो ध्याया करता है, उसकी भी प्रार्थना सुनता है। गुणों के वक्ता या गायक-जनों के नम्र स्तुतिवचनों द्वारा उसकी और जल की भाँति दौड़ते हैं, उनकी भी स्तुति को सुनता है॥५॥

स॒वि॒ता य॒न्त्रैः पृ॑थि॒वीम॑रम्णादस्कम्भ॒ने स॑वि॒ता द्याम॑दृंहत्। अश्व॑मिवाधुक्ष॒द्धुनि॑म॒न्तरि॑क्षम॒तूर्ते॑ ब॒द्धं स॑वि॒ता स॑मु॒द्रम्॥

परमात्मा या सूर्य अपने नियन्त्रणसामर्थ्यों से निरालम्बन आकाश में पृथ्वी को रखता है या द्युलोक को तानता है, मेघ को आन्दोलित करता है बरसने के लिए॥१॥

यत्रा॑ समु॒द्रः स्क॑भि॒तो व्यौन॒दपां॑ नपात्सवि॒ता तस्य॑ वेद। अतो॒ भूरत॑ आ॒ उत्थि॑तं॒ रजोऽतो॒ द्यावा॑पृथि॒वी अ॑प्रथेताम्॥

परमात्मा के आश्रय आकाश का जलाशय वायु के द्वारा सम्भला हुआ है, वही भूमि पर बरसता है, वह कैसे बनता और कैसे स्थिर रहता है, उसको वायु नहीं जानता, किन्तु परमात्मा जानता है, उस परमात्मा से महत्तत्त्व से लेकर पञ्च तन्मात्राओं तक सूक्ष्म सृष्टि उत्पन्न होती है, वहीं से अन्तरिक्षलोक भी उत्पन्न होता है, और द्युलोक पृथ्वीलोक भी उसी के द्वारा फैलाये हुए हैं॥२॥

प॒श्चेदम॒न्यद॑भव॒द्यज॑त्र॒मम॑र्त्यस्य॒ भुव॑नस्य भू॒ना। सु॒प॒र्णो अ॒ङ्ग स॑वि॒तुर्ग॒रुत्मा॒न्पूर्वो॑ जा॒तः स उ॑ अ॒स्यानु॒ धर्म॑॥

अमर सत्तावाले परमात्मा की महिमा उसके पश्चादनुगमन करनेवाला, उससे भिन्न चेतनतत्त्व बोलने की शक्ति रखनेवाला, उत्तम कर्म करनेवाला, पूर्व से प्रसिद्ध परमात्मा का गुणानुरूप चेतन ज्ञानवान् जीव है, जो नित्य है॥३॥

गाव॑ इव॒ ग्रामं॒ यूयु॑धिरि॒वाश्वा॑न्वा॒श्रेव॑ व॒त्सं सु॒मना॒ दुहा॑ना। पति॑रिव जा॒याम॒भि नो॒ न्ये॑तु ध॒र्ता दि॒वः स॑वि॒ता वि॒श्ववा॑रः॥

बाहर से चरकर गौवें जैसे ग्राम को प्राप्त होती हैं, योद्धा घोड़ों को, दुहने योग्य अच्छे मनवाली गौ जैसे बछड़े को, पति पत्नी को प्राप्त होता है, ऐसे ही विश्व को वरनेवाला मोक्ष को धारण करनेवाला परमात्मा उपासकों को अवश्य प्राप्त होता है॥४॥

हिर॑ण्यस्तूपः सवित॒र्यथा॑ त्वाङ्गिर॒सो जु॒ह्वे वाजे॑ अ॒स्मिन्। ए॒वा त्वार्च॒न्नव॑से॒ वन्द॑मानः॒ सोम॑स्येवां॒शुं प्रति॑ जागरा॒हम्॥

प्राणायामाभ्यासी प्राणविद्या का जाननेवाला जीवन्मुक्त परमात्मा की उपासना करता है, मोक्ष-विषयक अमृतान्नभोग प्राप्त करने के लिए वन्दन स्वभाववाला होकर सोमरस के पान करने के लिए सदा जागरूक रहता है या अपने को सोमरस की भाँति परमात्मा के प्रति समर्पित करने को जागता है॥५॥

समि॑द्धश्चि॒त्समि॑ध्यसे दे॒वेभ्यो॑ हव्यवाहन। आ॒दि॒त्यै रु॒द्रैर्वसु॑भिर्न॒ आ ग॑हि मृळी॒काय॑ न॒ आ ग॑हि॥

परमात्मा स्तुति करनेवाले विद्वानों की तृप्ति के लिए उनके अन्तःकरणों में प्रकाशित होता है, वे स्तुति करनेवाले विद्वान् अड़तालीस वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य धारण करने-वाले, चवालीस वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य करनेवाले, चौबीस वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य करनेवाले हैं, ऐसा परमात्मा मनुष्यों की स्तुति में लाया जाय, वह उनके सुख के लिए प्राप्त हो तथा अग्नि वायु आदि की शुद्धि के लिए प्रदीप्त किया जाता है जो सूर्यकिरणों से, विद्युत् की तरङ्गों से और काष्ठ आदि इन्धन से दीप्त किया जाता है, वह प्रत्येक मनुष्य के घर में होमने तथा सुख के लिए सिद्ध किया जाता रहे॥१॥

इ॒मं य॒ज्ञमि॒दं वचो॑ जुजुषा॒ण उ॒पाग॑हि। मर्ता॑सस्त्वा समिधान हवामहे मृळी॒काय॑ हवामहे॥

परमात्मा अध्यात्मयज्ञ को और प्रार्थनावचन को स्वीकार करता है, जब मनुष्य उसका आह्वान करते हैं सुखप्राप्ति के लिए, तो वह उन्हें प्राप्त होता है एवं अग्नि होम यज्ञ को स्वाहावचन को प्रसिद्ध करती है उस सुख के लिए, वेदी में मनुष्य प्रदीप्त करते हैं होम के लिए॥२॥

त्वामु॑ जा॒तवे॑दसं वि॒श्ववा॑रं गृणे धि॒या। अग्ने॑ दे॒वाँ आ व॑ह नः प्रि॒यव्र॑तान्मृळी॒काय॑ प्रि॒यव्र॑तान्॥

परमात्मा उत्पन्नमात्र को जाननेवाला, सबका रक्षक, अच्छे कर्म करनेवालों को प्रेरित करनेवाला है, उसकी स्तुति करनी चाहिए एवं अग्नि उत्पन्न होते ही जानने योग्य अन्धकार को मिटानेवाला, अच्छे कर्म करनेवालों का समागम करानेवाला हमारे सुख के लिए उपयोग में लेना चाहिए॥३॥

अ॒ग्निर्दे॒वो दे॒वाना॑मभवत्पु॒रोहि॑तो॒ऽग्निं म॑नु॒ष्या॒३॒॑ ऋष॑यः॒ समी॑धिरे। अ॒ग्निं म॒हो धन॑साताव॒हं हु॑वे मृळी॒कं धन॑सातये॥

परमात्मा उपासक विद्वानों का पूर्व से हितसाधक है, मनुष्य तथा तत्त्वदर्शी अपने अन्दर साक्षात् करते हैं, अध्यात्मधन की प्राप्ति के लिए उसकी प्रार्थना करते हैं, एवं अग्नि वायु आदि देवों का पूर्ववर्ती प्रेरक हैं, मनुष्य और तत्त्वदर्शी अपने घर में एवं कार्य में भौतिक धन की प्राप्ति के लिए इसका उपयोग करें॥४॥

अ॒ग्निरत्रिं॑ भ॒रद्वा॑जं॒ गवि॑ष्ठिरं॒ प्राव॑न्नः॒ कण्वं॑ त्र॒सद॑स्युमाह॒वे। अ॒ग्निं वसि॑ष्ठो हवते पु॒रोहि॑तो मृळी॒काय॑ पु॒रोहि॑तः॥

परमात्मा काम, क्रोध, लोभ से रहित जीवन्मुक्त स्तुतिपरायण सूक्ष्मदर्शी धारण करने योग्य परमात्मानन्द के अनुभवी विद्वानों की तथा हमारे वाणी, मन, श्रोत्र, नेत्र और बुद्धि की रक्षा करता है, हमारे उपासक होने पर उपासक परमात्मा में अधिक बसा हुआ होता है तथा सुख के लिए परमात्मा की प्रार्थना करता है, वह उसे स्वीकार करता है॥५॥

श्र॒द्धया॒ग्निः समि॑ध्यते श्र॒द्धया॑ हूयते ह॒विः। श्र॒द्धां भग॑स्य मू॒र्धनि॒ वच॒सा वे॑दयामसि॥

श्रद्धा-श्रत्-धा, सत्य धारणा या यथावत् धारणा शास्त्रानुसार होती है, शास्त्रानुसार अग्नि चयन करने पर ही अग्नि प्रदीप्त होती है, शास्त्रपद्धति से हव्य द्रव्य भली प्रकार होमा जाता है, ऐश्वर्य के ऊँचे-उत्कृष्ट अङ्ग पर अर्थात यथावद् प्राप्त ऐश्वर्य पर श्रद्धा प्रदर्शित होती है, यह घोषित करना चाहिये, इसीलिए बुरे धन पर श्रद्धा का कार्य नहीं होता है॥१॥

प्रि॒यं श्र॑द्धे॒ दद॑तः प्रि॒यं श्र॑द्धे॒ दिदा॑सतः। प्रि॒यं भो॒जेषु॒ यज्व॑स्वि॒दं म॑ उदि॒तं कृ॑धि॥

श्रद्धा ऐश्वर्य के ऊँचे स्थान पर बैठती है, इसलिए श्रद्धायुक्त मेरे ये घोषित वचन सफल हों, दान देते हुए का और दान देने की इच्छा रखते हुए का कल्याण हो और दान का भोग करनेवालों का भी कल्याण हो और यज्ञ की दक्षिणा लेते ऋत्विजों का भी कल्याण हो, इस प्रकार श्रद्धा से देनेवाले श्रद्धा से यज्ञ करानेवाले, श्रद्धा से खानेवाले और श्रद्धा से दक्षिणा लेनेवाले ये सब श्रद्धायुक्त हों॥२॥

यथा॑ दे॒वा असु॑रेषु श्र॒द्धामु॒ग्रेषु॑ चक्रि॒रे। ए॒वं भो॒जेषु॒ यज्व॑स्व॒स्माक॑मुदि॒तं कृ॑धि॥

जीवन्मुक्त ऊँचे विद्वानों को चाहिये कि वे अपनी दैवी शक्ति का उपयोग उपदेश आदि द्वारा क्रूर दुष्ट जनों के प्रति प्रेरित करें, उनको यथार्थ मार्ग पर लावें, ऐसा करने में वे सफल हों, इसी प्रकार भोजन खिलानेवाले और यज्ञ करानेवाले यजमानों के प्रति अपना हार्दिक आशीर्वाद देकर उनका कल्याण साधें॥३॥

श्र॒द्धां दे॒वा यज॑माना वा॒युगो॑पा॒ उपा॑सते। श्र॒द्धां हृ॑द॒य्य१॒॑याकू॑त्या श्र॒द्धया॑ विन्दते॒ वसु॑॥

मुमुक्षु जन हृदयस्थ संकल्पवृत्ति से अपनी सदिच्छा को पूरा कर सकते हैं, यज्ञ करनेवाले सुगन्धित वायु को लेते हुए स्वास्थ्यसम्बन्धी इच्छा को पूरा करते हैं और सदिच्छा से आवश्यक वसानेवाले धन को भी प्राप्त किया जा सकता है॥४॥

श्र॒द्धां प्रा॒तर्ह॑वामहे श्र॒द्धां म॒ध्यंदि॑नं॒ परि॑। श्र॒द्धां सूर्य॑स्य नि॒म्रुचि॒ श्रद्धे॒ श्रद्धा॑पये॒ह नः॑॥

मानव को परमात्मा के प्रति आस्तिकभावना या परमात्मप्रीति प्रातःकाल और सायंकाल-उपासना की दृष्टि या अध्यात्म की दृष्टि से रखने के साथ दिन भर के लोकव्यवहार में भी आस्तिकता और परमात्मप्रीति होनी चाहिए, उसके विपरीत लोकव्यवहार नहीं हो, अपितु दिनचर्या के अतिरिक्त सारा जीवन आस्तिकतापूर्ण बनाना चाहिये॥५॥

सूक्तम्

शा॒स इ॒त्था म॒हाँ अ॑स्यमित्रखा॒दो अद्भु॑तः। न यस्य॑ ह॒न्यते॒ सखा॒ न जीय॑ते॒ कदा॑ च॒न॥

यह बात सत्य है कि परमात्मा महान् शासक है और उपासक के कामादि शत्रुओं का नाशक है तथा परमात्मा का जो मित्र-उपासक है, वह अन्यथा हनन को प्राप्त नहीं होता, पूर्ण आयु को भोगता है, न कामादि से परास्त होता अर्थात् कामादि उसे दबा नहीं सकते, यह भी सत्य है कि जो प्रजाहितैषी राजा होता है, उसका सहयोगी कभी मार नहीं खा सकता है और न जीता जा सकता है॥१॥

स्व॒स्ति॒दा वि॒शस्पति॑र्वृत्र॒हा वि॑मृ॒धो व॒शी। वृषेन्द्रः॑ पु॒र ए॑तु नः सोम॒पा अ॑भयंक॒रः॥

परमात्मा कल्याण का देनेवाला, उपासक प्रजा का रक्षक, उपासक के विरोधियों को नष्ट करनेवाला, संघर्ष करनेवाली प्रवृत्तियों का वशकर्ता, सुखवर्षक, उत्पन्न पदार्थों का रक्षक, अभयदाता रूप में साक्षात् होता है एवं राजा कल्याणदाता, प्रजा का रक्षक, आक्रमणकारी शत्रुसेनाओं को वश में करनेवाला, सोमरस का पान करनेवाला, संकट के अवसर पर आगे बढ़नेवाला हो॥२॥

वि रक्षो॒ वि मृधो॑ जहि॒ वि वृ॒त्रस्य॒ हनू॑ रुज। वि म॒न्युमि॑न्द्र वृत्रहन्न॒मित्र॑स्याभि॒दास॑तः॥

परमात्मा या राजा संग्रामकर्ताओं का विनाशक, आक्रमणकारी शत्रु के मुख के ऊपर नीचे दोनों अङ्गों को भग्न करनेवाला, आक्रमणकारी का हननकर्ता सामने आकर नाशकारी शत्रु के क्रोध को विलीन करनेवाला होता है॥३॥

वि न॑ इन्द्र॒ मृधो॑ जहि नी॒चा य॑च्छ पृतन्य॒तः। यो अ॒स्माँ अ॑भि॒दास॒त्यध॑रं गमया॒ तमः॑॥

राजा प्रजा के शत्रुओं को विनष्ट करे, संग्राम करनेवाले को नीचा मुखकर वश करे और जो आक्रमण करे, उसे भी नीचे अन्धकार में पहुँचाये, उस पर तामस अस्त्र फेंके॥४॥

अपे॑न्द्र द्विष॒तो मनोऽप॒ जिज्या॑सतो व॒धम्। वि म॒न्योः शर्म॑ यच्छ॒ वरी॑यो यवया व॒धम्॥

राजा शत्रु के मन को भ्रान्त करे और वयोहानि चाहते हुए के वधकसाधन को भी नष्ट-भ्रष्ट और अस्त-व्यस्त करे, क्रोधी और अभिमानी शत्रु के सुख-साधन को प्रजा में बाँट देना चाहिये॥५॥

ई॒ङ्खय॑न्तीरप॒स्युव॒ इन्द्रं॑ जा॒तमुपा॑सते। भे॒जा॒नासः॑ सु॒वीर्य॑म्॥

स्वयंसिद्ध शोभन बलवाले परमात्मा को कर्तव्यकर्मपरायण उपासक प्रजाएँ कर्म का शुभ फल मिले, ऐसी प्रेरणा करती हुई परमात्मा का आश्रय लेती हैं एवं राजसूययज्ञ में प्रसिद्ध हुए बलवान् राजा को सुख फल देने की प्रेरणा करती हुई उसे आश्रित करती हैं-उसका आश्रय लेती हैं॥१॥

त्वमि॑न्द्र॒ बला॒दधि॒ सह॑सो जा॒त ओज॑सः। त्वं वृ॑ष॒न्वृषेद॑सि॥

परमात्मा सभी बलों से युक्त है, कर्माध्यक्षता में प्रसिद्ध सदा सुखवर्षक है, इसी प्रकार राजा को समस्त बलों से युक्त होना चाहिये और प्रजा के लिये सुखवर्षक होना चाहिये॥२॥

त्वमि॑न्द्रासि वृत्र॒हा व्य१॒॑न्तरि॑क्षमतिरः। उद्द्याम॑स्तभ्ना॒ ओज॑सा॥

परमात्मा पापनाशक है, अपने आत्मबल से अन्तरिक्ष को नक्षत्रों द्वारा विकसित करता है, सजाता है, द्युलोक को ऊपर सम्भालता है, उसी प्रकार राजा आक्रमणकारी को नष्ट करनेवाला, प्रजाओं को गुणों से विकसित करनेवाला, राजसभा को उत्पन्न करनेवाला होना चाहिए॥३॥

त्वमि॑न्द्र स॒जोष॑सम॒र्कं बि॑भर्षि बा॒ह्वोः। वज्रं॒ शिशा॑न॒ ओज॑सा॥

परमात्मा प्रीतियुक्त प्रशंसनीय ओजरूप वज्र को तीक्ष्ण करता हुआ अपने पराक्रमगुणों से पापी पर प्रहार करता है, इस प्रकार राजा विरोधी को प्राणों से वियुक्त करने के लिये अपने भुजाओं से शस्त्र को छोड़नेवाला हो॥४॥

त्वमि॑न्द्राभि॒भूर॑सि॒ विश्वा॑ जा॒तान्योज॑सा। स विश्वा॒ भुव॒ आभ॑वः॥

परमात्मा सब उत्पन्न हुई वस्तुओं पर अधिकार करता है और सब लोकभूमियों को अपने अधीन रखता है और चलाता है, इसी प्रकार राजा राष्ट्र की समस्त खनिज वस्तुओं पर अधिकार करे तथा बढ़ी-चढ़ी शत्रु की सेना पर भी अपना प्रभाव रखे॥५॥

सोम॒ एके॑भ्यः पवते घृ॒तमेक॒ उपा॑सते। येभ्यो॒ मधु॑ प्र॒धाव॑ति॒ ताँश्चि॑दे॒वापि॑ गच्छतात्॥

ब्रह्मचारी को चाहिए कि अपने अन्दर परमात्मा के आनन्दरस को- अध्यात्मतेज को लाने के लिए सामवेद के अध्यापक, यजुर्वेद के अध्यापक, अथर्ववेद के अध्यापक से तथा सभी गुणों की प्राप्ति के लिए ऋग्वेद के अध्यापक से मन्त्रों का अध्ययन करे॥१॥

तप॑सा॒ ये अ॑नाधृ॒ष्यास्तप॑सा॒ ये स्व॑र्य॒युः। तपो॒ ये च॑क्रि॒रे मह॒स्ताँश्चि॑दे॒वापि॑ गच्छतात्॥

ब्रह्मचर्यसेवन से कामवासना सता नहीं सकती, ब्रह्मचर्य से गृहस्थसुख विशेषरूप से भोग जा सकता है, ब्रह्मचर्य से वानप्रस्थ का पालन हो सकता है॥२॥

ये युध्य॑न्ते प्र॒धने॑षु॒ शूरा॑सो॒ ये त॑नू॒त्यजः॑। ये वा॑ स॒हस्र॑दक्षिणा॒स्ताँश्चि॑दे॒वापि॑ गच्छतात्॥

ब्रह्मचारी चाहे तो युद्ध में लड़नेवाले अपने को राष्ट्र के लिए समर्पित करनेवाले क्षत्रियों को प्राप्त हो या बहुत दक्षिणा देनेवाले वैश्यों को प्राप्त हो॥३॥

ये चि॒त्पूर्व॑ ऋत॒साप॑ ऋ॒तावा॑न ऋता॒वृधः॑। पि॒तॄन्तप॑स्वतो यम॒ ताँश्चि॑दे॒वापि॑ गच्छतात्॥

ब्रह्मचारी को श्रेष्ठ महानुभाव अमृतभोगी तपस्वी जीवन्मुक्तों को प्राप्त करना चाहिए उनसे लाभ लेने के लिये या उन जैसा बनने के लिये॥४॥

स॒हस्र॑णीथाः क॒वयो॒ ये गो॑पा॒यन्ति॒ सूर्य॑म्। ऋषी॒न्तप॑स्वतो यम तपो॒जाँ अपि॑ गच्छतात्॥

ब्रह्मचारी को चाहिए कि बहुत ज्ञान नेत्रवाले मेधावी जन, जो वेद को अपने अन्दर धारण किये हैं, उन ऐसे ऋषियों के पास पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए या उन जैसा बनने के लिए प्राप्त हो॥५॥

अरा॑यि॒ काणे॒ विक॑टे गि॒रिं ग॑च्छ सदान्वे। शि॒रिम्बि॑ठस्य॒ सत्व॑भि॒स्तेभि॑ष्ट्वा चातयामसि॥

दुर्भिक्ष लोगों को खाना न देनेवाली एक आपत्ति है, जिसमें विद्वान् को भी भोजन नहीं मिलता, जनता में हाहाकार करानेवाली है, केवल सम्पन्न लोग ही खा पी सकते हैं, सामान्य जन नहीं, उसे होम के सूक्ष्म तत्त्वों से मेघ को बरसा कर मिटाना चाहिए॥१॥

च॒त्तो इ॒तश्च॒त्तामुतः॒ सर्वा॑ भ्रू॒णान्या॒रुषी॑। अ॒रा॒य्यं॑ ब्रह्मणस्पते॒ तीक्ष्ण॑शृण्गोदृ॒षन्नि॑हि॥

दुर्भिक्षरूप आपत्ति पास से, दूर से अर्थात् सभी स्थनों से हटे-नष्ट होवे, मेघवर्षण की विद्या जाननेवाला मेघ वर्षा कर उसे दूर करे॥२॥

अ॒दो यद्दारु॒ प्लव॑ते॒ सिन्धोः॑ पा॒रे अ॑पूरु॒षम्। तदा र॑भस्व दुर्हणो॒ तेन॑ गच्छ परस्त॒रम्॥

जब अपने देश में दुर्भिक्ष-आपत्ति हो जावे, तो दूर देशों से अन्न लाने के लिए समुद्र के पार जाने को यन्त्रचालित नौका-जहाज से अन्न लाना चाहिये॥३॥

यद्ध॒ प्राची॒रज॑ग॒न्तोरो॑ मण्डूरधाणिकीः। ह॒ता इन्द्र॑स्य॒ शत्र॑वः॒ सर्वे॑ बुद्बु॒दया॑शवः॥

जब मेघ बरसने पर नाले मेंढकोंवाले नदी तालाब आदि सामने बहने लगें, तब दुर्भिक्ष आदि शत्रु पानी के बुद्बुदों की भाँति नष्ट हो जानेवाले होते हैं॥४॥

परी॒मे गाम॑नेषत॒ पर्य॒ग्निम॑हृषत। दे॒वेष्व॑क्रत॒ श्रवः॒ क इ॒माँ आ द॑धर्षति॥

जब वर्षा हो जाती है, तो किसान लोग बैलों से खेत जोतते हैं, खेतों में अन्न उत्पन्न होने पर अग्नि में भोजन बनाकर खाते हैं, विद्वानों के निमित्त अन्न प्रदान करते हैं और यज्ञ में भी होमते हैं, इस प्रकार अकेले अन्न नहीं खाना चाहिये, इस प्रकार करने पर दुर्भिक्ष पीड़ित नहीं करता॥५॥

अ॒ग्निं हि॑न्वन्तु नो॒ धियः॒ सप्ति॑मा॒शुमि॑वा॒जिषु॑। तेन॑ जेष्म॒ धनं॑धनम्॥

सैनिक तथा प्रजाजन राजा को संग्रामों में इस प्रकार अपने कर्मों द्वारा प्रेरित करें-साहस दिलाएँ कि वह शत्रु के प्रत्येक धन पर अधिकार कर सके॥१॥

यया॒ गा आ॒करा॑महे॒ सेन॑याग्ने॒ तवो॒त्या। तां नो॑ हिन्व म॒घत्त॑ये॥

जिस सेना के द्वारा शत्रु की भूमियों-भूभागों को जीता जाये, उनसे लाभ लेने के लिए सेना उसको सँभाले-रक्षा करे॥२॥

आग्ने॑ स्थू॒रं र॒यिं भ॑र पृ॒थुं गोम॑न्तम॒श्विन॑म्। अ॒ङ्धि खं व॒र्तया॑ प॒णिम्॥

राजा को चाहिए कि महान् पोषण पदार्थ यशोवर्धक-यश का विस्तारक गौवोंवाले घोड़ेवाले धन से राष्ट्र को भरपूर करे, जहाँ-जहाँ इसकी कमी हो, उसे सर्वप्रथम पूर्ण करे तथा राष्ट्र में उसका व्यापार करे॥३॥

अग्ने॒ नक्ष॑त्रम॒जर॒मा सूर्यं॑ रोहयो दि॒वि। दध॒ज्ज्योति॒र्जने॑भ्यः॥

राजा को चाहिए कि प्रजाजनों में जीवनज्योति भरने के लिए अपने आत्मा को आकाश व सूर्य के समान ऊँचा उठावे-अपने को उन्नत करे॥४॥

अग्ने॑ के॒तुर्वि॒शाम॑सि॒ प्रेष्ठः॒ श्रेष्ठ॑ उपस्थ॒सत्। बोधा॑ स्तो॒त्रे वयो॒ दध॑त्॥

राजा जब राजपद पर विराजमान हो जावे, तो अपने को प्रजाओं के बीच में या प्रजाओं का अत्यन्त प्रिय तथा अत्यन्त प्रशंसनीय चेतानेवाला बने तथा राष्ट्र के सम्बन्ध में राज्यशासन की जो अच्छी बात कहे, उससे बोध प्राप्त करे उसकी आजीविका का प्रबन्ध करे॥५॥

इ॒मा नु कं॒ भुव॑ना सीषधा॒मेन्द्र॑श्च॒ विश्वे॑ च दे॒वाः॥

राष्ट्र के प्रजाजन समस्त प्राणियों से उचित लाभ लें और राजा तथा विद्वानों को भी यथायोग्य आचरण से अनुकूल बनाकर लाभ लें॥१॥

य॒ज्ञं च॑ नस्त॒न्वं॑ च प्र॒जां चा॑दि॒त्यैरिन्द्रः॑ स॒ह ची॑कॢपाति॥

राजा न्यायाधीश के सहयोग से राष्ट्र की प्रजाओं के श्रेष्ठ धर्मकृत्यों, शरीरों, उनके पुत्रादि को अन्न और शिक्षा आदि द्वारा योग्य बनावें॥२॥

आ॒दि॒त्यैरिन्द्रः॒ सग॑णो म॒रुद्भि॑र॒स्माकं॑ भूत्ववि॒ता त॒नूना॑म्॥

राजा अपने सभ्यगण न्यायाधीशों और सैनिकों सहित प्रजाजनों की रक्षा किया करें॥३॥

ह॒त्वाय॑ दे॒वा असु॑रा॒न्यदाय॑न्दे॒वा दे॑व॒त्वम॑भि॒रक्ष॑माणाः॥

विजय के इच्छुक सैनिक दुष्ट शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर जब आते हैं, तब वे विजयशील पुरुष-सैनिक देवपदवी को प्राप्त होकर सब प्रजा के अभिनन्दनीय होते हैं॥४॥

प्र॒त्यञ्च॑म॒र्कम॑नय॒ञ्छची॑भि॒रादित्स्व॒धामि॑षि॒रां पर्य॑पश्यन्॥

विद्वान् जन राजा को राजसूययज्ञ द्वारा राजपद पर प्रतिष्ठित कर देते हैं, तो उन्हें अभीष्ट पुष्कल स्थिर जीविका मिलनी चाहिए॥५॥

सूर्यो॑ नो दि॒वस्पा॑तु॒ वातो॑ अ॒न्तरि॑क्षात्। अ॒ग्निर्नः॒ पार्थि॑वेभ्यः॥

सूर्य, वायु, अग्निलोकों के प्रमुख देव क्रमशः द्युलोक, अन्तरिक्ष-लोक, पृथिवीलोकों के पदार्थ मानव की रक्षा करने के लिये हैं, ऐसा वर्तना और करना चाहिए॥१॥

जोषा॑ सवित॒र्यस्य॑ ते॒ हरः॑ श॒तं स॒वाँ अर्ह॑ति। पा॒हि नो॑ दि॒द्युतः॒ पत॑न्त्याः॥

परमात्मा का तेज-प्रताप आकाश के अनन्त चन्द्र आदि पिण्डप्रदेशों को अपने वश में रखता है और आकाश से नीचे गिरती हुई विद्युत् से रक्षा करने में समर्थ है, अतः उसके प्रति आस्तिक भाव रखना चाहिए॥२॥ 

चक्षु॑र्नो दे॒वः स॑वि॒ता चक्षु॑र्न उ॒त पर्व॑तः। चक्षु॑र्धा॒ता द॑धातु नः॥

दर्शनशक्ति साक्षात् सूर्य से-सूर्य के प्रकाश से मिलती है, परन्तु प्रातःकाल कुछ सूर्य को देखने को मिलती है, हरे पर्वत को देखने से भी नेत्रशक्ति बढ़ा करती है, परमात्मा का ध्यान करने से नेत्रों में बल आता है॥३॥

चक्षु॑र्नो धेहि॒ चक्षु॑षे॒ चक्षु॑र्वि॒ख्यै त॒नूभ्यः॑। सं चे॒दं वि च॑ पश्येम॥

मानव की आँख में दर्शनशक्ति रहे तथा अन्यों के नेत्रों में भी दर्शनशक्ति रहे, पास भी देखें-दूर भी देखें॥४॥

सु॒सं॒दृशं॑ त्वा व॒यं प्रति॑ पश्येम सूर्य। वि प॑श्येम नृ॒चक्ष॑सः॥

मानव उदयकाल से लेकर अस्तसमय तक सूर्य को देख सकें, नेत्रों की दर्शनशक्ति नष्ट न हो, ऐसा आहार, व्यवहार, विचार रखें तथा समदृष्टि रखें, पक्षपातदृष्टि न हो॥५॥

उद॒सौ सूर्यो॑ अगा॒दुद॒यं मा॑म॒को भगः॑। अ॒हं तद्वि॑द्व॒ला पति॑म॒भ्य॑साक्षि विषास॒हिः॥

सूयर उदय होने से स्त्रियों में सौभाग्य की भावना जाग जाती है या जाग जानी चाहिये, उस अवस्था में जैसे सूर्य पृथ्वी के ऊपर, प्राणी और वनस्पति को उत्पन्न होने की शक्ति देता है, ऐसे ही पति के प्रति आदरभावना होनी चाहिए कि यह मेरा सौभाग्य का दाता है॥१॥

अ॒हं के॒तुर॒हं मू॒र्धाहमु॒ग्रा वि॒वाच॑नी। ममेदनु॒ क्रतुं॒ पतिः॑ सेहा॒नाया॑ उ॒पाच॑रेत्॥

विदुषी गुणवती स्त्री को अपनी विद्वत्ता और गुणवत्ता पर विश्वास या गर्व होना चाहिए, घर में सब मेरे संकेत पर चलते हैं, पति भी मेरे संकल्प के अनुसार व्यवहार करता है, ऐसे कहनेवाली नारी सौभाग्यशालिनी है॥२॥

मम॑ पु॒त्राः श॑त्रु॒हणोऽथो॑ मे दुहि॒ता वि॒राट्। उ॒ताहम॑स्मि संज॒या पत्यौ॑ मे॒ श्लोक॑ उत्त॒मः॥

सद्गृहस्थ के लोग सभी प्रशंसा के पात्र होने चाहिए, पुत्र बाहरी भीतरी शत्रुओं के नाशक हों-कन्याएँ ज्योति के समान घर में कुरूढ़ि और अज्ञान को हटानेवाली हों, पत्नी धर्म की थूणी और पति यश और प्रशंसा के भागी हों॥३॥

येनेन्द्रो॑ ह॒विषा॑ कृ॒त्व्यभ॑वद्द्यु॒म्न्यु॑त्त॒मः। इ॒दं तद॑क्रि देवा असप॒त्ना किला॑भुवम्॥

परिवार में पति के श्रेष्ठ कर्मों और यशस्वी गुणों का अनुसरण पत्नी के द्वारा भी होना चाहिए॥४॥

अ॒स॒प॒त्ना स॑पत्न॒घ्नी जय॑न्त्यभि॒भूव॑री। आवृ॑क्षम॒न्यासां॒ वर्चो॒ राधो॒ अस्थे॑यसामिव॥

श्रेष्ठ कर्मवती गुणसम्पन्ना कुलवधू कुलदेवी की कोई विरोधी स्त्री नहीं होती, अपितु विरोधी स्त्री के तेज वैभव नष्ट हो जाते हैं, जो उससे विरोध करती है॥५॥

सम॑जैषमि॒मा अ॒हं स॒पत्नी॑रभि॒भूव॑री। यथा॒हम॒स्य वी॒रस्य॑ वि॒राजा॑नि॒ जन॑स्य च॥

अपने पति और पति के परिवारिक जन मात्र के अन्दर ऐसे अपने गुण कर्म से विराजमान रहूँ, कोई विरोधी स्त्री न बन सके॥६॥

ती॒व्रस्या॒भिव॑यसो अ॒स्य पा॑हि सर्वर॒था वि हरी॑ इ॒ह मु॑ञ्च। इन्द्र॒ मा त्वा॒ यज॑मानासो अ॒न्ये नि री॑रम॒न्तुभ्य॑मि॒मे सु॒तासः॑॥

राजा को चाहिए, राष्ट्र को सब अन्न-धन से सम्पन्न बनावे, रक्षा करे, बल पराक्रम से प्रजा के दुखों को नष्ट करे, प्रजाजन विरुद्ध न हो सके, अतः उसको प्रसन्न रखे॥१॥

तुभ्यं॑ सु॒तास्तुभ्य॑मु॒ सोत्वा॑स॒स्त्वां गिरः॒ श्वात्र्या॒ आ ह्व॑यन्ति। इन्द्रे॒दम॒द्य सव॑नं जुषा॒णो विश्व॑स्य वि॒द्वाँ इ॒ह पा॑हि॒ सोम॑म्॥

राष्ट्र के प्रजाजन उत्पन्न हुए और उत्पन्न होनेवाले राजा के शासन में रहनेवाले और सहायक होते हैं और उन्हें राजा के स्तुतिवचनों द्वारा आमन्त्रण करना चाहिए कि राजा राष्ट्र की भलीभाँति रक्षा करे॥२॥

य उ॑श॒ता मन॑सा॒ सोम॑मस्मै सर्वहृ॒दा दे॒वका॑मः सु॒नोति॑। न गा इन्द्र॒स्तस्य॒ परा॑ ददाति प्रश॒स्तमिच्चारु॑मस्मै कृणोति॥

जो पुरोहित राजा की कामना करनेवाला उसके राष्ट्र को समुन्नत करने का उपदेश देता है, राजा को चाहिए कि उसके उपदेश का पालन करे-उल्ल्ङ्घन न करे अपितु उसके लिए अच्छी भेंट समर्पित करे॥३॥

अनु॑स्पष्टो भवत्ये॒षो अ॑स्य॒ यो अ॑स्मै रे॒वान्न सु॒नोति॒ सोम॑म्। निर॑र॒त्नौ म॒घवा॒ तं द॑धाति ब्रह्म॒द्विषो॑ ह॒न्त्यना॑नुदिष्टः॥

धनवान् जन राष्ट्र को समुन्नत करता है, तो राजा अपने हाथ में रक्षण लेता है, विद्वानों से द्वेष करनेवाले को नष्ट करना चाहिए॥४॥

अ॒श्वा॒यन्तो॑ ग॒व्यन्तो॑ वा॒जय॑न्तो॒ हवा॑महे॒ त्वोप॑गन्त॒वा उ॑। आ॒भूष॑न्तस्ते सुम॒तौ नवा॑यां व॒यमि॑न्द्र त्वा शु॒नं हु॑वेम॥

प्रजाजनों को घोड़ों, गौओं और अन्नादि पदार्थों की आवश्यकता होती है, इस प्रयोजन के लिए राजा से वे प्रार्थना करें और राजा उन्हें इन वस्तुओं से संपन्न बनावे, प्रजाजन भी उसकी प्रशंसनीय कल्याणी नीति पर चलें॥५॥

मु॒ञ्चामि॑ त्वा ह॒विषा॒ जीव॑नाय॒ कम॑ज्ञातय॒क्ष्मादु॒त रा॑जय॒क्ष्मात्। ग्राहि॑र्ज॒ग्राह॒ यदि॑ वै॒तदे॑नं॒ तस्या॑ इन्द्राग्नी॒ प्र मु॑मुक्तमेनम्॥

रोगी को यदि जन्म से माता-पिता से आया हुआ रोग हो अथवा राजयक्ष्मा भारी रोग हो, मानसिक वातव्याधि रोग हो तो होम द्वारा दूर हो सकते हैं, उनका और कोई ओषध नहीं है॥१॥

यदि॑ क्षि॒तायु॒र्यदि॑ वा॒ परे॑तो॒ यदि॑ मृ॒त्योर॑न्ति॒कं नी॑त ए॒व। तमा ह॑रामि॒ निॠ॑तेरु॒पस्था॒दस्पा॑र्षमेनं श॒तशा॑रदाय॥

रोगी घने रोग में पड़ जावे, तो चकित्सक ओषधि से चिकित्सा करता हुआ होमचिकित्सा करता हुआ साथ-साथ बलवान् शब्दों में आश्वासन दे कि मैं तुझे मृत्यु के समीप गये हुए को भी पूर्ण बलवान् बनाता हूँ॥२॥

स॒ह॒स्रा॒क्षेण॑ श॒तशा॑रदेन श॒तायु॑षा ह॒विषाहा॑र्षमेनम्। श॒तं यथे॒मं श॒रदो॒ नया॒तीन्द्रो॒ विश्व॑स्य दुरि॒तस्य॑ पा॒रम्॥

उतम वैद्य होम द्रव्य के द्वारा सौ वर्ष तक समस्त रोग दुःख से पार कर देता है, कर दिया करता है, कर दे॥३॥

श॒तं जी॑व श॒रदो॒ वर्ध॑मानः श॒तं हे॑म॒न्ताञ्छ॒तमु॑ वस॒न्तान्। श॒तमि॑न्द्रा॒ग्नी स॑वि॒ता बृह॒स्पतिः॑ श॒तायु॑षा ह॒विषे॒मं पुन॑र्दुः॥

शरद् आदि ऋतुएँ, अग्नि, वायु, सूर्य आदि सौ वर्ष की आयु प्रदान करें, ऐसे चिकित्सा करनी चाहिए॥४॥

आहा॑र्षं॒ त्वावि॑दं त्वा॒ पुन॒रागाः॑ पुनर्नव। सर्वा॑ङ्ग॒ सर्वं॑ ते॒ चक्षुः॒ सर्व॒मायु॑श्च तेऽविदम्॥

रोगी अच्छे वैद्य द्वारा चिकित्सा होने पर रोग से मुक्त होकर नवजीवन सर्वाङ्गपूर्ण हो पूरी आयु को प्राप्त हो जाता है॥५॥

ब्रह्म॑णा॒ग्निः सं॑विदा॒नो र॑क्षो॒हा बा॑धतामि॒तः। अमी॑वा॒ यस्ते॒ गर्भं॑ दु॒र्णामा॒ योनि॑मा॒शये॑॥

स्त्री के योनिस्थान या गर्भस्थान में बहुत बुरा रोगक्रिमि मानवबीज अथवा कुछ बढ़े हुए गर्भ को खा जाया करता है, उसको नष्ट करने के लिए उदुम्बरवृक्ष का फल और चित्रक दोनों की गोली वटी बनाकर खाना चाहिए, दोनों के क्वाथ से योनिस्थान का प्रक्षालन करना चाहिए॥१॥

यस्ते॒ गर्भ॒ममी॑वा दु॒र्णामा॒ योनि॑मा॒शये॑। अ॒ग्निष्टं ब्रह्म॑णा स॒ह निष्क्र॒व्याद॑मनीनशत्॥

स्त्री के योनि व गर्भ के क्रिमिरोग के नष्ट करने का एकमात्र साधन उदुम्बर के साथ चित्रक ही है॥२॥

यस्ते॒ हन्ति॑ प॒तय॑न्तं निष॒त्स्नुं यः स॑रीसृ॒पम्। जा॒तं यस्ते॒ जिघां॑सति॒ तमि॒तो ना॑शयामसि॥

स्त्री के अन्दर गर्भ के अन्दर प्राप्त वीर्य को या उससे बने गर्भ को या फिर उत्पन्न हुए बालक को जो नष्ट करता है, उस रोगरूप कृमि को पूर्वोक्त प्रकार से नष्ट करना चाहिए॥३॥

यस्त॑ ऊ॒रू वि॒हर॑त्यन्त॒रा दम्प॑ती॒ शये॑। योनिं॒ यो अ॒न्तरा॒रेळ्हि॒ तमि॒तो ना॑शयामसि॥

जो रोगकृमि स्त्री को संकोचित नहीं होने देता या उसके बीच में रेंगता है, जो पति-पत्नी दोनों के समागम के अवसर पर आ घुसता है, योनिस्थान को चाट लेता है, खा लेता है, उस रोगकृमि को नष्ट करना चाहिये॥४॥

यस्त्वा॒ भ्राता॒ पति॑र्भू॒त्वा जा॒रो भू॒त्वा नि॒पद्य॑ते। प्र॒जां यस्ते॒ जिघां॑सति॒ तमि॒तो ना॑शयामसि॥

स्त्री के अन्दर रोगकृमि भ्राता के समान जन्म के साथ आ गया है या पति के समान पति के वीर्य के साथ घुस जाता है या कौमारावस्था को नष्ट करता है, उसे नष्ट करना चाहिए॥५॥

यस्त्वा॒ स्वप्ने॑न॒ तम॑सा मोहयि॒त्वा नि॒पद्य॑ते। प्र॒जां यस्ते॒ जिघां॑सति॒ तमि॒तो ना॑शयामसि॥

स्त्री को अपस्मार हिस्टीरिया आदि करनेवाला रोगकृमि आक्रान्ता है, जो गर्भाशय में गर्भशिशु को मार देता है, उसे चिकित्सा से नष्ट करना चाहिए॥६॥

अ॒क्षीभ्यां॑ ते॒ नासि॑काभ्यां॒ कर्णा॑भ्यां॒ छुबु॑का॒दधि॑। यक्ष्मं॑ शीर्ष॒ण्यं॑ म॒स्तिष्का॑ज्जि॒ह्वाया॒ वि वृ॑हामि ते॥

आँख, कान, नाक और मुख के रोगों को तथा मस्तक और शिर के प्रधान रोगों को दूर करना चाहिए॥१॥

ग्री॒वाभ्य॑स्त उ॒ष्णिहा॑भ्यः॒ कीक॑साभ्यो अनू॒क्या॑त्। यक्ष्मं॑ दोष॒ण्य१॒॑मंसा॑भ्यां बा॒हुभ्यां॒ वि वृ॑हामि ते॥

रोगी के भिन्न-भिन्न अङ्गों नाड़ीसंस्थानों अस्थिसंस्थानों में जो वातरोगादि बैठ जाता है, उसे भिन्न-भिन्न उपचारों और ओषधियों से दूर करना चाहिये॥२॥

आ॒न्त्रेभ्य॑स्ते॒ गुदा॑भ्यो वनि॒ष्ठोर्हृद॑या॒दधि॑। यक्ष्मं॒ मत॑स्नाभ्यां य॒क्नः प्ला॒शिभ्यो॒ वि वृ॑हामि ते॥

रोगी के आँतों, गुदा, मूल आँत, हृदय, गुर्दों, यकृत्, प्लीहा में होनेवाले रोग को दूर करना चाहिये॥३॥

ऊ॒रुभ्यां॑ ते अष्ठी॒वद्भ्यां॒ पार्ष्णि॑भ्यां॒ प्रप॑दाभ्याम्। यक्ष्मं॒ श्रोणि॑भ्यां॒ भास॑दा॒द्भंस॑सो॒ वि वृ॑हामि ते॥

मन्त्रों में कहे उक्त अङ्गों से रोग को हटाना चाहिये॥४॥

मेह॑नाद्वनं॒कर॑णा॒ल्लोम॑भ्यस्ते न॒खेभ्यः॑। यक्ष्मं॒ सर्व॑स्मादा॒त्मन॒स्तमि॒दं वि वृ॑हामि ते॥

बालों और नखों के स्थानों से, गुप्तेन्द्रिय से, सारे शरीर से रोगों को दूर करना चाहिये॥५॥

अङ्गा॑दङ्गा॒ल्लोम्नो॑लोम्नो जा॒तं पर्व॑णिपर्वणि। यक्ष्मं॒ सर्व॑स्मादा॒त्मन॒स्तमि॒दं वि वृ॑हामि ते॥

कुशल वैद्य को प्रत्येक अङ्ग, प्रत्येक जोड़, प्रत्येक लोमस्थान तथा सारे शरीर से रोग को बाहर निकाल देना चाहिये॥६॥

अपे॑हि मनसस्प॒तेऽप॑ क्राम प॒रश्च॑र। प॒रो निॠ॑त्या॒ आ च॑क्ष्व बहु॒धा जीव॑तो॒ मनः॑॥

रोगी को निराश नहीं होना चाहिए, किन्तु रोग दूर करने के अनेक औषधोपचार करते हुए मानसिक संकल्प से रोग बढ़ने या मृत्यु तक को भगाने के लिये साहस धारण करना चाहिए॥१॥

भ॒द्रं वै वरं॑ वृणते भ॒द्रं यु॑ञ्जन्ति॒ दक्षि॑णम्। भ॒द्रं वै॑वस्व॒ते चक्षु॑र्बहु॒त्रा जीव॑तो॒ मनः॑॥

मनुष्य को कल्याणकर वस्तु को चाहना, कल्याणकर शक्ति वैभव आत्मा में सात्म्य करना, धारण करना और अपने जीवनकाल के लिए कल्याणकर दर्शन प्रतीक्षारूप में रखना चाहिए, यह जीवित रहनेवाले का मन होना चाहिए॥२॥

यदा॒शसा॑ निः॒शसा॑भि॒शसो॑पारि॒म जाग्र॑तो॒ यत्स्व॒पन्तः॑। अ॒ग्निर्विश्वा॒न्यप॑ दुष्कृ॒तान्यजु॑ष्टान्या॒रे अ॒स्मद्द॑धातु॥

परमात्मा की स्तुति उपासना करने से जो मानसिक पाप कर्म में न आए हुए केवल मन में ही हैं, वे इच्छापूर्वक हों या अनिच्छा से या पूर्व की वासना से प्रथम ही नष्ट हो जाया करते हैं, अतः शिवसंकल्प के साथ परमात्मा की स्तुति उपासना करनी चाहिए॥३॥

यदि॑न्द्र ब्रह्मणस्पतेऽभिद्रो॒हं चरा॑मसि। प्रचे॑ता न आङ्गिर॒सो द्वि॑ष॒तां पा॒त्वंह॑सः॥

मनुष्य के अन्दर विरोधी जन के प्रति द्रोहभाव या हिंसाभाव उत्पन्न हो जाता है, उसे अन्तर्यामी सर्वज्ञ परमात्मा ही जानता है तथा विरोधी द्वेष करनेवाले हमारे प्रति जो पाप भाव रखते हैं, वह सर्वज्ञ परमात्मा उनसे रक्षा करे। न हमारे अन्दर द्रोह हो और न विरोधी के अन्दर द्रोह हो॥४॥

अजै॑ष्मा॒द्यास॑नाम॒ चाभू॒माना॑गसो व॒यम्। जा॒ग्र॒त्स्व॒प्नः सं॑क॒ल्पः पा॒पो यं द्वि॒ष्मस्तं स ऋ॑च्छतु॒ यो नो॒ द्वेष्टि॒ तमृ॑च्छतु॥

मनुष्य यदि पापरहित हो जावे, तो अपने विरोधियों पर विजय पा सकता है और सुखद वस्तुओं का सम्भाजक सम्यक् सेवन करनेवाला बन सकता है, अन्य मनुष्य का पापसंकल्प उसी को प्राप्त होता है, जो द्वेष करता है॥५॥

देवाः॑ क॒पोत॑ इषि॒तो यदि॒च्छन्दू॒तो निॠ॑त्या इ॒दमा॑ज॒गाम॑। तस्मा॑ अर्चाम कृ॒णवा॑म॒ निष्कृ॑तिं॒ शं नो॑ अस्तु द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे॥

संग्राम को जीतने के इच्छुक विद्वान् लोग संग्राम से पूर्व परराष्ट्र भूमि से आये दूत को अपने राष्ट्र की भूमि से प्रस्थान करनेवाले दूत को, जो किसी विशेष सन्देश को सुनाने के लिए आता है या सुनाने के लिए जाता है, उसका सत्कार करना चाहिये॥१॥

शि॒वः क॒पोत॑ इषि॒तो नो॑ अस्त्वना॒गा दे॑वाः शकु॒नो गृ॒हेषु॑। अ॒ग्निर्हि विप्रो॑ जु॒षतां॑ ह॒विर्नः॒ परि॑ हे॒तिः प॒क्षिणी॑ नो वृणक्तु॥

आये हुए दूत का सत्कार भोजनादि से करना चाहिए, यह हमारे पास आता है। परपक्ष की प्रहारक सेना अपने प्रहार हमारे ऊपर न छोड़े॥२॥

हे॒तिः प॒क्षिणी॒ न द॑भात्य॒स्माना॒ष्ट्र्यां प॒दं कृ॑णुते अग्नि॒धाने॑। शं नो॒ गोभ्य॑श्च॒ पुरु॑षेभ्यश्चास्तु॒ मा नो॑ हिंसीदि॒ह दे॑वाः क॒पोतः॑॥

परराष्ट्र का दूत अपनी भोजनशाला में साथ भोजन करके और होम यज्ञ में साथ यज्ञ करके मैत्री करने के लिए या मित्रता करने के लिए इस प्रकार सहयोग करता है और उसका सहयोग प्राप्त हो जाता है, तब परराष्ट्र की सेना द्वारा प्रहार का भय नहीं रहता, इसलिए दूत के साथ स्वागतपूर्वक अच्छा व्यवहार करना चाहिए॥३॥

यदुलू॑को॒ वद॑ति मो॒घमे॒तद्यत्क॒पोतः॑ प॒दम॒ग्नौ कृ॒णोति॑। यस्य॑ दू॒तः प्रहि॑त ए॒ष ए॒तत्तस्मै॑ य॒माय॒ नमो॑ अस्तु मृ॒त्यवे॑॥

यदि परराष्ट्र का भेजा हुआ दूत पूर्वोक्त मित्रता न करे, किन्तु स्पष्ट न कहकर या मन्त्रणा न करके व्यर्थ-संग्राम अग्नि में पैर रखता है, भेद से वर्तालाप करके चला जाता है, जिसका वह दूत है, उस शासक अन्य को मारने के इच्चुक के लिए हमारे पास भी वज्र शस्त्रास्त्र बल है, भय करने की आवश्यकता नहीं अर्थात् जिस राष्ट्र के शासक में मित्रता की इच्छा नहीं, संग्राम पर तुला है, तो उसके साथ बड़े-बड़े शस्त्रास्त्रों से संग्राम करना चाहिए॥४॥

ऋ॒चा क॒पोतं॑ नुदत प्र॒णोद॒मिषं॒ मद॑न्तः॒ परि॒ गां न॑यध्वम्। सं॒यो॒पय॑न्तो दुरि॒तानि॒ विश्वा॑ हि॒त्वा न॒ ऊर्जं॒ प्र प॑ता॒त्पति॑ष्ठः॥

दूत को स्तुति प्रशंसा के साथ वापस भेजना चाहिए, अपने अन्न गवादि पशु को परिपुष्ट बनाना चाहिये, अपनी समस्त कमियों को गुप्त रखना या उनको पूरा करना चाहिए, अपने शासनबल को भी दूत न जान सके, वह ऐसे ही वापस जावे॥५॥

ऋ॒ष॒भं मा॑ समा॒नानां॑ स॒पत्ना॑नां विषास॒हिम्। ह॒न्तारं॒ शत्रू॑णां कृधि वि॒राजं॒ गोप॑तिं॒ गवा॑म्॥

राजा को समान गुण कर्मवालों के मध्य श्रेष्ठ होना चाहिए, विरोधियों का दबानेवाला, शत्रुओं का नाशक, राष्ट्रभूमियों का स्वामी व प्रजाओं का रक्षक होना चाहिये॥१॥

अ॒हम॑स्मि सपत्न॒हेन्द्र॑ इ॒वारि॑ष्टो॒ अक्ष॑तः। अ॒धः स॒पत्ना॑ मे प॒दोरि॒मे सर्वे॑ अ॒भिष्ठि॑ताः॥

राजा शत्रुओं का नाशक, अहिंसित और क्षयरहित हुआ सब शत्रुओं को अपने अधीन करनेवाला होना चाहिये॥२॥

अत्रै॒व वोऽपि॑ नह्याम्यु॒भे आर्त्नी॑ इव॒ ज्यया॑। वाच॑स्पते॒ नि षे॑धे॒मान्यथा॒ मदध॑रं॒ वदा॑न्॥

शत्रु जब पकड़ लिये जावें, तो उन्हें बन्दीघर में हाथ पैरों से बाँधकर रखा जावे और फिर उन्हें अपने अनुकूल बनाया जावे॥३॥

अ॒भि॒भूर॒हमाग॑मं वि॒श्वक॑र्मेण॒ धाम्ना॑। आ व॑श्चि॒त्तमा वो॑ व्र॒तमा वो॒ऽहं समि॑तिं ददे॥

राजा के अन्दर शत्रुओं को दबाने का आत्मबल और युद्ध करने को अङ्गों का बल होना चाहिये तथा शत्रुओं के मनों को स्वाधीन करने का मनोबल और उनके कर्म को और समिति को स्वाधीन करने के लिए शस्त्रबल होना चाहिए॥४॥

यो॒ग॒क्षे॒मं व॑ आ॒दाया॒हं भू॑यासमुत्त॒म आ वो॑ मू॒र्धान॑मक्रमीम्। अ॒ध॒स्प॒दान्म॒ उद्व॑दत म॒ण्डूका॑ इवोद॒कान्म॒ण्डूका॑ उद॒कादि॑व॥

राजद्रोही प्रजा के उद्दण्ड लोगों को राजा ठीक मार्ग का उपदेश दे, यदि वे ठीक मार्ग पर न आवें, तो उनकी मासिक या वार्षिक वृत्ति को बन्द करना तथा पूर्व से चली आई सम्पत्ति भूभाग और क्षेत्रभाग को छीनकर स्वाधीन कर लेना चाहिये और उन्हें दण्ड देकर अपने वश में करना चाहिये॥५॥

तुभ्ये॒दमि॑न्द्र॒ परि॑ षिच्यते॒ मधु॒ त्वं सु॒तस्य॑ क॒लश॑स्य राजसि। त्वं र॒यिं पु॑रु॒वीरा॑मु नस्कृधि॒ त्वं तपः॑ परि॒तप्या॑जयः॒ स्वः॑॥

राजा को राजसूययज्ञ में मधुर पानक पिलाना चाहिये, पुनः वह सारी कलाओं से पूर्ण राष्ट्र का स्वामी बनता है और बहुत वीरोंवाले पोषण को प्रजा के लिए प्रदान करता है और भारी परिश्रम कर राष्ट्र का उत्तम सुख भी प्रजा के लिये प्राप्त कराता है॥१॥

स्व॒र्जितं॒ महि॑ मन्दा॒नमन्ध॑सो॒ हवा॑महे॒ परि॑ श॒क्रं सु॒ताँ उप॑। इ॒मं नो॑ य॒ज्ञमि॒ह बो॒ध्या ग॑हि॒ स्पृधो॒ जय॑न्तं म॒घवा॑नमीमहे॥

राजा गुणों बलों में महान् संग्राम जीतनेवाला प्रजाजनों द्वारा सत्करणीय होता है, प्रजा का महान् शरण है, शरणीय है॥२॥

सोम॑स्य॒ राज्ञो॒ वरु॑णस्य॒ धर्म॑णि॒ बृह॒स्पते॒रनु॑मत्या उ॒ शर्म॑णि। तवा॒हम॒द्य म॑घव॒न्नुप॑स्तुतौ॒ धात॒र्विधा॑तः क॒लशाँ॑ अभक्षयम्॥

युवराज जब राजसूययज्ञ द्वारा अभिषिक्त किया जावे और राष्ट्र का धारण करनेवाला चलानेवाला बने, तो उसके इस प्रशंसापद पर जनप्रतिनिधिगण द्वारा निर्वाचन तथा राजसभा द्वारा अनुमोदन हो जाने के पश्चात् प्रजा के गणों या वर्णों को भेदभाव के बिना राष्ट्र के सुखभोगों का समान अधिकार होना चाहिये॥३॥

प्रसू॑तो भ॒क्षम॑करं च॒रावपि॒ स्तोमं॑ चे॒मं प्र॑थ॒मः सू॒रिरुन्मृ॑जे। सु॒ते सा॒तेन॒ यद्याग॑मं वां॒ प्रति॑ विश्वामित्रजमदग्नी॒ दमे॑॥

राजसूययज्ञ को ब्रह्मा और पुरोहित संपन्न करें, इनके सम्मुख प्रजा द्वारा दिया गया राज्याधिकार राजा स्वीकार करे और परमविद्वान् परम ब्रह्मा परमात्मा के आदेशानुसार उससे बल माँगता हुआ उसे चलाये, उसकी स्तुति करे॥४॥

वात॑स्य॒ नु म॑हि॒मानं॒ रथ॑स्य रु॒जन्ने॑ति स्त॒नय॑न्नस्य॒ घोषः॑। दि॒वि॒स्पृग्या॑त्यरु॒णानि॑ कृ॒ण्वन्नु॒तो ए॑ति पृथि॒व्या रे॒णुमस्य॑न्॥

वात अन्धड़ का स्वरूप है, वेग से जानेवाला वृक्षों को भग्न करता हुआ और गूँजता हुआ चलता है, आकाश में जाता हुआ इधर-उधर की दिशाओं को लालवर्ण की बना देता है, पृथिवी की धूल को फेंकता हुआ चलता है॥१॥

सं प्रेर॑ते॒ अनु॒ वात॑स्य वि॒ष्ठा ऐनं॑ गच्छन्ति॒ सम॑नं॒ न योषाः॑। ताभिः॑ स॒युक्स॒रथं॑ दे॒व ई॑यते॒ऽस्य विश्व॑स्य॒ भुव॑नस्य॒ राजा॑॥

पृथिवी में स्थित होकर पृथिवी पर पुष्ट होकर ओषधि-वनस्पतियाँ वायु के साथ गति करती हैं, काँपती हैं, जैसे स्त्रियाँ एक मन होकर किसी आश्रयस्थान को प्राप्त-होती हैं, पृथिवीलोक की सारी वस्तुएँ इसका अनुगमन करती हैं॥२॥

अ॒न्तरि॑क्षे प॒थिभि॒रीय॑मानो॒ न नि वि॑शते कत॒मच्च॒नाहः॑। अ॒पां सखा॑ प्रथम॒जा ऋ॒तावा॒ क्व॑ स्विज्जा॒तः कुत॒ आ ब॑भूव॥

वात-प्रचण्ड वायु या अन्धड़ आकाश में गतिमार्गों से गति करता हुआ कभी नहीं ठहरता है, चलता रहता है, उसके साथ जलवर्षा होती है, यह कहीं से उठता है और कहीं-कहीं होकर घूमता है, यह वर्षा के लिए हितकर है॥३॥

आ॒त्मा दे॒वानां॒ भुव॑नस्य॒ गर्भो॑ यथाव॒शं च॑रति दे॒व ए॒षः। घोषा॒ इद॑स्य शृण्विरे॒ न रू॒पं तस्मै॒ वाता॑य ह॒विषा॑ विधेम॥

प्रचण्ड वात के अन्दर पृथिवी, जल, अग्नि, वायु के कण होते हैं, वह जलों का जन्म देनेवाला और आश्रय के अनुसार गति करनेवाला होता है, इस चलते हुए के शब्द सुनाई पड़ते हैं, रूप नहीं दिखाई देता है, इसे हवन के द्वारा अनुकूल बनाना चाहिये॥४॥

म॒यो॒भूर्वातो॑ अ॒भि वा॑तू॒स्रा ऊर्ज॑स्वती॒रोष॑धी॒रा रि॑शन्ताम्। पीव॑स्वतीर्जी॒वध॑न्याः पिबन्त्वव॒साय॑ प॒द्वते॑ रुद्र मृळ॥

पुरोवात के चलने से मेघ बरसता है, ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं, गौवें उन्हें खाती हैं और खाकर के मनुष्यों को दूध पिलाती हैं। इस प्रकार वर्षा से अन्न खेती और घास होकर मनुष्यों का पालन होता है॥१॥

याः सरू॑पा॒ विरू॑पा॒ एक॑रूपा॒ यासा॑म॒ग्निरिष्ट्या॒ नामा॑नि॒ वेद॑। या अङ्गि॑रस॒स्तप॑से॒ह च॒क्रुस्ताभ्यः॑ पर्जन्य॒ महि॒ शर्म॑ यच्छ॥

गौवें एक रंगवाली भिन्न-भिन्न रंगवाली होती हुई भी जाति से सब एक ही हैं, वे सब अपने-अपने गुणों से प्रसिद्ध की जाती हैं, उनके घृत के होम से और उपयोग से ऋत्विक् जन और ब्रह्मा उनके नाम रखते हैं और उन्हें अलंकृत करते हैं, यजमान उनको अपने घर में स्वागत के साथ रखें और उपयोगी आहार प्रदान कर सुखी करें॥२॥

या दे॒वेषु॑ त॒न्व१॒॑मैर॑यन्त॒ यासां॒ सोमो॒ विश्वा॑ रू॒पाणि॒ वेद॑। ता अ॒स्मभ्यं॒ पय॑सा॒ पिन्व॑मानाः प्र॒जाव॑तीरिन्द्र गो॒ष्ठे रि॑रीहि॥

गौवों का दूध विद्वानों के लिए अत्यन्त हितकर है, सोम्यस्वभाव ब्रह्मचारी दूध पीकर ही अपने को पुष्ट बनाता है, गौवें दूध से सभी को तृप्त करती हैं, इनकी रक्षार्थ राजकीय गोरक्षासदन होने चाहिये॥३॥

प्र॒जाप॑ति॒र्मह्य॑मे॒ता ररा॑णो॒ विश्वै॑र्दे॒वैः पि॒तृभिः॑ संविदा॒नः। शि॒वाः स॒तीरुप॑ नो गो॒ष्ठमाक॒स्तासां॑ व॒यं प्र॒जया॒ सं स॑देम॥

परमात्मा मनुष्यमात्र के लिए गौवों को प्रदान करता है, विद्वानों के लिए पालकजनों के लिए और सर्वसाधारण जनों के लिए भी, इसलिए कि ये सबके लिए कल्याणकारी हैं, इन्हें अपने-अपने गोसदन में रखकर रक्षा करनी चाहिये॥४॥

वि॒भ्राड्बृ॒हत्पि॑बतु सो॒म्यं मध्वायु॒र्दध॑द्य॒ज्ञप॑ता॒ववि॑ह्रुतम्। वात॑जूतो॒ यो अ॑भि॒रक्ष॑ति॒ त्मना॑ प्र॒जाः पु॑पोष पुरु॒धा वि रा॑जति॥

सूर्य दीप्यमान पदार्थ है, महान् जीवनरस वनस्पतियों और प्राणियों में देता है, यज्ञ करनेवाले के निमित्त नीरोग आयु को देता है, वातसूत्रसमूहों से प्रेरित हुआ संसार की रक्षा करता है और प्रकाशित होता है॥१॥

वि॒भ्राड्बृ॒हत्सुभृ॑तं वाज॒सात॑मं॒ धर्म॑न्दि॒वो ध॒रुणे॑ स॒त्यमर्पि॑तम्। अ॒मि॒त्र॒हा वृ॑त्र॒हा द॑स्यु॒हन्त॑मं॒ ज्योति॑र्जज्ञे असुर॒हा स॑पत्न॒हा॥

आकाश में सूर्य की महज्ज्योति है, जो अन्धकार को नष्ट करती है, द्युलोक के धारक प्रतिष्ठान में वर्त्तमान है, अन्न की उत्पत्ति का हेतु है, वह सूर्य मेघ का नाशक, मनुष्य के शत्रुओं का नाशक, दुष्टों तथा विरोधी गणों का नाशक है, ऐसे सूर्य का सेवन करना चाहिये॥२॥

इ॒दं श्रेष्ठं॒ ज्योति॑षां॒ ज्योति॑रुत्त॒मं वि॑श्व॒जिद्ध॑न॒जिदु॑च्यते बृ॒हत्। वि॒श्व॒भ्राड्भ्रा॒जो महि॒ सूर्यो॑ दृ॒श उ॒रु प॑प्रथे॒ सह॒ ओजो॒ अच्यु॑तम्॥

आकाश में सूर्य सब ज्योतियों का ज्योति, श्रेष्ठ और महान् है, यह जगत् को दिखाने के लिए बड़ा तेजस्वी प्रतापवान् प्रसिद्ध है॥३॥

वि॒भ्राज॒ञ्ज्योति॑षा॒ स्व१॒॑रग॑च्छो रोच॒नं दि॒वः। येने॒मा विश्वा॒ भुव॑ना॒न्याभृ॑ता वि॒श्वक॑र्मणा वि॒श्वदे॑व्यावता॥

सूर्य अपनी ज्योति से प्रकाशमान, द्युलोक का प्रकाशनिमित्त सबको दृष्टिगोचर होता है, सब कर्मसामर्थ्य और सब दिव्य गुणवाले प्रभाव से सब लोक-लोकान्तरों को धारण करता है, वह सूर्य है॥४॥

त्वं त्यमि॒टतो॒ रथ॒मिन्द्र॒ प्रावः॑ सु॒ताव॑तः। अशृ॑णोः सो॒मिनो॒ हव॑म्॥

परमात्मा के प्रति जानेवाले और उसकी उपासना करनेवाले के मनोरथ की परमात्मा रक्षा करता है, उसके प्रार्थनावचनों को सुनता है, कामना पूरी करता है॥१॥

त्वं म॒खस्य॒ दोध॑तः॒ शिरोऽव॑ त्व॒चो भ॑रः। अग॑च्छः सो॒मिनो॑ गृ॒हम्॥

परमात्मा यज्ञ जैसे श्रेष्ठ कर्म के ध्वंस करनेवाले की मूर्धा को नीचे गिरा देता है और अपने उपासक के हृदयघर को प्राप्त होता है॥२॥

त्वं त्यमि॑न्द्र॒ मर्त्य॑मास्त्रबु॒ध्नाय॑ वे॒न्यम्। मुहुः॑ श्रथ्ना मन॒स्यवे॑॥

कामादि पाप को नष्ट करनेवाले मनस्वी जन के बन्धक-बाँधनेवाले को परमात्मा पुनः-पुनः पीड़ित करता है॥३॥

त्वं त्यमि॑न्द्र॒ सूर्यं॑ प॒श्चा सन्तं॑ पु॒रस्कृ॑धि। दे॒वानां॑ चित्ति॒रो वश॑म्॥

परमात्मा सूर्य को पश्चिम में अस्त करता है सायंकाल के समय और प्रातःकाल पृथिवी को घुमाकर पूर्व दिशा में उदित करता है, इसी प्रकार विद्वानों के कमनीय विद्यासूर्य को ज्ञान प्रदान कराने के लिए जन्म देता है॥४॥

आ या॑हि॒ वन॑सा स॒ह गावः॑ सचन्त वर्त॒निं यदूध॑भिः॥

विवाह के अनन्तर पति नववधू को घर ले जाते हुए घर के दृश्यों को दिखाता है, घर में दूध भरे हुए अङ्गोंवाली गौवें बड़े बर्तन को भर देती हैं। दूध का उपयोग मक्खन निकालना आदि का कृत्य गृहिणी के सुपुर्द कर देना चाहिये॥१॥

आ या॑हि॒ वस्व्या॑ धि॒या मंहि॑ष्ठो जार॒यन्म॑खः सु॒दानु॑भिः॥

पत्नी घर में आ जाने पर धनैश्वर्य की प्राप्ति के निमित्त अपनी कर्मप्रवृत्ति रखे, पति अत्यधिक धन कमानेवाला और दानी-दान प्रवृत्तिवाला पत्नी एवं अन्यों के लिये हो। शास्त्रमर्यादानुसार गृहस्थयज्ञ को चलाये, जब तक सन्तान के सन्तान हो जाये॥२॥

पि॒तु॒भृतो॒ न तन्तु॒मित्सु॒दान॑वः॒ प्रति॑ दध्मो॒ यजा॑मसि॥

गृहस्थ लोग अन्न कमानेवाले हों, ऐसे ही वे-अच्छे दानी भी हों, जैसे दानी निरन्तर कमाते जाते हैं और दान देते हैं, ऐसे सन्तानों का क्रम भी चलाते रहना चाहिये, अपने समस्त कार्यों को ठीक जोड़ना चाहिये, संगति से करना चाहिए॥३॥

उ॒षा अप॒ स्वसु॒स्तमः॒ सं व॑र्तयति वर्त॒निं सु॑जा॒तता॑॥

गृहदेवी सास की प्रेरणा प्राप्त करे, पुत्रादि उत्पन्न कर सास के शोक को दूर करे और दोनों परस्पर मेल से रहें और घर में प्रतिष्ठित होकर व्यवहार को भली प्रकार चलावें, प्रत्येक कार्य की पूर्ति करें॥४॥

आ त्वा॑हार्षम॒न्तरे॑धि ध्रु॒वस्ति॒ष्ठावि॑चाचलिः। विश॑स्त्वा॒ सर्वा॑ वाञ्छन्तु॒ मा त्वद्रा॒ष्ट्रमधि॑ भ्रशत्॥

पुरोहित राजा को राजसूययज्ञ में वेदी पर प्रतिष्ठित करता है और सारी प्रजाएँ उसे चाहें, राजा को इस प्रकार शासन करना चाहिये कि प्रजाएँ सब सुखी रहें, प्रसन्न रहें और राष्ट्र विपत्ति को प्राप्त न हो॥१॥

इ॒हैवैधि॒ माप॑ च्योष्ठाः॒ पर्व॑त इ॒वावि॑चाचलिः। इन्द्र॑ इवे॒ह ध्रु॒वस्ति॑ष्ठे॒ह रा॒ष्ट्रमु॑ धारय॥

राजा को चाहिये कि वह राष्ट्र को दृढ़ता से सँभाले, पर्वत के समान दृढ़ अविचलित रहे, प्रजा का कल्याण सिद्ध करे॥२॥

इ॒ममिन्द्रो॑ अदीधरद्ध्रु॒वं ध्रु॒वेण॑ ह॒विषा॑। तस्मै॒ सोमो॒ अधि॑ ब्रव॒त्तस्मा॑ उ॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑॥

परमेश्वर ने अपनी कृपा से राज्याधिकार दिया है, जिससे कि पुरोहित राज करने की अनुमति देता है और राजसूय का ब्रह्मा भी उसे राज्य करने की आज्ञा देता है॥३॥

ध्रु॒वा द्यौर्ध्रु॒वा पृ॑थि॒वी ध्रु॒वासः॒ पर्व॑ता इ॒मे। ध्रु॒वं विश्व॑मि॒दं जग॑द्ध्रु॒वो राजा॑ वि॒शाम॒यम्॥

सब वस्तुओं का आधार जगत् नियम में ध्रुव है, स्थिर है, नक्षत्र एवं ग्रहमण्डल का आधार द्युलोक ध्रुव है, मनुष्य पशु पक्षी वृक्ष एवं पाषाणादि का आधार पृथिवी ध्रुव है, ऐसे ही प्रजाओं का आधार राजा भी ध्रुव नियम में रहना चाहिये॥४॥

ध्रु॒वं ते॒ राजा॒ वरु॑णो ध्रु॒वं दे॒वो बृह॒स्पतिः॑। ध्रु॒वं त॒ इन्द्र॑श्चा॒ग्निश्च॑ रा॒ष्ट्रं धा॑रयतां ध्रु॒वम्॥

राजा के साथ पुरोहित, ब्रह्मा, सेनाध्यक्ष और  सभाध्यक्ष राजसूययज्ञ में यज्ञ को पूर्ण करते हैं और सदा राजा का साथ देनेवाले होते हैं॥५॥

ध्रु॒वं ध्रु॒वेण॑ ह॒विषा॒भि सोमं॑ मृशामसि। अथो॑ त॒ इन्द्रः॒ केव॑ली॒र्विशो॑ बलि॒हृत॑स्करत्॥

राजसूययज्ञ में जब राजा को अभिषिक्त कर दिया जाता है, तो उसे स्थिर उपहार दिया जाना चाहिये और विद्वान् लोग अपने आशीर्वाद का हाथ उस पर रखते हैं, परमात्मा उसके लिए भक्त प्रजा कर देनेवाली उपहार देनेवाली बनाता है॥६॥

अ॒भी॒व॒र्तेन॑ ह॒विषा॒ येनेन्द्रो॑ अभिवावृ॒ते। तेना॒स्मान्ब्र॑ह्मणस्पते॒ऽभि रा॒ष्ट्राय॑ वर्तय॥

पुरोहित को चाहिये कि राजा शत्रु पर आक्रमण कर सके और प्रगति कर सके, उसे गुप्त प्रयोग धूम देनेवाला बताना चाहिये, जो अवसर पर काम आ सके॥१॥

अ॒भि॒वृत्य॑ स॒पत्ना॑न॒भि या नो॒ अरा॑तयः। अ॒भि पृ॑त॒न्यन्तं॑ तिष्ठा॒भि यो न॑ इर॒स्यति॑॥

राजा को इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि शत्रु कौन है, परसेना क्या-क्या अपहरण कर रही है और संग्राम करता हुआ शत्रुगण कितना है और कौन-कौन राष्ट्र के अन्दर इर्ष्या करनेवाले हैं, उन सबको अपने अधीन करे॥२॥

अ॒भि त्वा॑ दे॒वः स॑वि॒ताभि सोमो॑ अवीवृतत्। अ॒भि त्वा॒ विश्वा॑ भू॒तान्य॑भीव॒र्तो यथास॑सि॥

इस गन्धकयुक्त धूमप्रयोग को अग्नि प्रज्वलित करता है और वायु फैलाता है, उसका प्रभाव सभी वस्तुओं तक जाता है, ये साधन संग्राम में सफल होने के लिए हैं॥३॥

येनेन्द्रो॑ ह॒विषा॑ कृ॒त्व्यभ॑वद्द्यु॒म्न्यु॑त्त॒मः। इ॒दं तद॑क्रि देवा असप॒त्नः किला॑भुवम्॥

विषगन्धकयुक्त प्रयोग धुँआ देनेवाला बड़ा प्रभावकारी है, इस प्रयोग को करके राजा यशस्वी अन्न धन सम्पत्तिवाला बन जाता है और शत्रुरहित हो जाता है॥४॥

अ॒स॒प॒त्नः स॑पत्न॒हाभिरा॑ष्ट्रो विषास॒हिः। यथा॒हमे॑षां भू॒तानां॑ वि॒राजा॑नि॒ जन॑स्य च॥

राजा को शत्रुनाशक या स्वयं शत्रुरहित राष्ट्र का संचालन करनेवाला, शत्रुओं का अभिभव करनेवाला तथा अपने राष्ट्र के जनगण में ऊँचे रूप में विराजवान होनेवाला प्रभावशाली होना चाहिये॥५॥

प्र वो॑ ग्रावाणः सवि॒ता दे॒वः सु॑वतु॒ धर्म॑णा। धू॒र्षु यु॑ज्यध्वं सुनु॒त॥

राजा के आदेशानुसार प्रत्येक विषय के या प्रत्येक क्षेत्र के विद्वान् अपने विभागों में ठीक-ठीक लगें और राष्ट्र को ऐश्वर्यशाली बनावें॥१॥

ग्रावा॑णो॒ अप॑ दु॒च्छुना॒मप॑ सेधत दुर्म॒तिम्। उ॒स्राः क॑र्तन भेष॒जम्॥

प्रजा तथा सेना के विद्वान् दुःखदायक शत्रु-सेना को पछाड़ें, उसकी बुरी नीति को नष्ट करें, राष्ट्र की गौवों के लिए सुख देवें॥२॥

ग्रावा॑ण॒ उप॑रे॒ष्वा म॑ही॒यन्ते॑ स॒जोष॑सः। वृष्णे॒ दध॑तो॒ वृष्ण्य॑म्॥

राष्ट्र के विद्वान् परस्पर प्रेम से संगठित होकर राजा को अपना यथायोग्य सहयोग और बल दें, तो ऊँचे अधिकारपदों पर सम्मानित होते हैं,उन्हें ऊँचा सम्मान देना चाहिये॥३॥

ग्रावा॑णः सवि॒ता नु वो॑ दे॒वः सु॑वतु॒ धर्म॑णा। यज॑मानाय सुन्व॒ते॥

राजा राष्ट्र को बढ़ानेवाले प्रजाजन के लिए स्वयं कर्तव्यपरायण रहे और राष्ट्र के अधिकारी विद्वानों को भी कर्तव्यपरायण रहने का आदेश दे॥४॥

प्र सू॒नव॑ ऋभू॒णां बृ॒हन्न॑वन्त वृ॒जना॑। क्षामा॒ ये वि॒श्वधा॑य॒सोऽश्न॑न्धे॒नुं न मा॒तर॑म्॥

किरणें संसार में उत्पत्ति शक्ति देनेवाली जगत् को धारण करती हैं, वे पृथिवी को प्राप्त होती हैं, जैसे दूध देनेवाली गौ को बछड़े प्राप्त करते हैं एवं मेधावी विद्वान् ज्ञान को उत्पन्न करनेवाले ज्ञानबल का प्रचार करते हैं, पृथ्वी की जनता को ज्ञान देने के लिए प्राप्त होते हैं॥१॥

प्र दे॒वं दे॒व्या धि॒या भर॑ता जा॒तवे॑दसम्। ह॒व्या नो॑ वक्षदानु॒षक्॥

विद्वान् जन वेदवाणी द्वारा परमात्मा की स्तुति प्रार्थना करें और विद्वान् लोग सूर्य का ज्ञान-विज्ञान प्रक्रिया से करें और साधारण जनों के लिए आवश्यक ज्ञानविषयों तथा वस्तुओं का आविष्कार कर  सकते हैं॥२॥

अ॒यमु॒ ष्य प्र दे॑व॒युर्होता॑ य॒ज्ञाय॑ नीयते। रथो॒ न योर॒भीवृ॑तो॒ घृणी॑वाञ्चेतति॒ त्मना॑॥

परमात्मा मनुष्य के लिए दिव्य भोगों की कामना करता है, वह हृदय में साक्षात् होता है, अपने तेजस्वी स्वरूप से चेताता भी है, ऐसे ही सूर्य अपनी किरणों से संगत करता है और प्रकाश प्रदान करके चेताता है॥३॥

अ॒यम॒ग्निरु॑रुष्यत्य॒मृता॑दिव॒ जन्म॑नः। सह॑सश्चि॒त्सही॑यान्दे॒वो जी॒वात॑वे कृ॒तः॥

परमात्मा मोक्ष प्रदान करके आत्मा को अमर बनाता है, वह सब बलवानों का बलवान् है, उससे अमर जीवन पाने के लिए उसकी उपासना करनी चाहिए तथा सूर्य भी बड़ा बलवान् है, उसका सेवन भी दीर्घ जीवन प्रदान करता है॥४॥

प॒तं॒गम॒क्तमसु॑रस्य मा॒यया॑ हृ॒दा प॑श्यन्ति॒ मन॑सा विप॒श्चितः॑। स॒मु॒द्रे अ॒न्तः क॒वयो॒ वि च॑क्षते॒ मरी॑चीनां प॒दमि॑च्छन्ति वे॒धसः॑॥

परमेश्वर की व्यवस्था से जन्म-जन्मान्तर में गति करनेवाले जीवात्मा को ध्यानी, ज्ञानी जन चित्तवृत्तियों के ऊपर उसके अधिष्ठाता जीवात्मा को परमात्मा के आश्रित जीवात्मा को साक्षात् करते हैं, जीवात्मा परमात्मा के बिना नहीं रह सकता है, परमात्मा का साक्षात्कार होने पर जीवात्मा का साक्षात्कार होता है॥१॥

प॒तं॒गो वाचं॒ मन॑सा बिभर्ति॒ तां ग॑न्ध॒र्वो॑ऽवद॒द्गर्भे॑ अ॒न्तः। तां द्योत॑मानां स्व॒र्यं॑ मनी॒षामृ॒तस्य॑ प॒दे क॒वयो॒ नि पा॑न्ति॥

जीवात्मा अपनी मननशक्ति से वाणी को धारण करता है, ध्यान में लाता है, पुनः प्राण वायु उसका अन्दर से उत्थान करता है, जब यह बाहर प्रकट होती है, तो मेधावी जन ज्ञान से स्वरवाले पद पर उसे सुरक्षित रखते हैं अर्थात् ज्ञान के उपयोग में लाते हैं॥२॥

अप॑श्यं गो॒पामनि॑पद्यमान॒मा च॒ परा॑ च प॒थिभि॒श्चर॑न्तम्। स स॒ध्रीचीः॒ स विषू॑ची॒र्वसा॑न॒ आ व॑रीवर्ति॒ भुव॑नेष्व॒न्तः॥

आत्मा इन्द्रियों का स्वामी नित्य है तथापि अच्छी बुरी वासनाओं के वश शरीर में आता है और जाता है तथा मोक्ष तक पहुँचता है, लोकों के जन्मों में योनियों में बार-बार जन्मधारण करता रहता है, जब तक कि यह मुक्त न हो जावे॥३॥

त्यमू॒ षु वा॒जिनं॑ दे॒वजू॑तं स॒हावा॑नं तरु॒तारं॒ रथा॑नाम्। अरि॑ष्टनेमिं पृत॒नाज॑मा॒शुं स्व॒स्तये॒ तार्क्ष्य॑मि॒हा हु॑वेम॥

विद्युत् से युक्त वायु अन्न के निमित्त जल भरे मेघों को ताड़ित करके नीचे गिरा देता है, उसे सुखदायक बनाने के लिए होम द्वारा सुसम्पन्न करना चाहिये, जिससे वृष्टि-जल गुणवाला बरसे॥१॥

इन्द्र॑स्येव रा॒तिमा॒जोहु॑वानाः स्व॒स्तये॒ नाव॑मि॒वा रु॑हेम। उर्वी॒ न पृथ्वी॒ बहु॑ले॒ गभी॑रे॒ मा वा॒मेतौ॒ मा परे॑तौ रिषाम॥

विद्युन्मय वायु की प्रेरणा से मेघ का जल मिलता है-पृथ्वी पर गिरता है वह कल्याण देने के लिए, जैसे नौका पर चढ़कर सुख का अनुभव करते हैं, ऐसे ही विद्युन्मय वायु को आश्रित करके भूमि से आकाश को और आकाश से भूमि पर विमान द्वारा आने-जाने में पीड़ित नहीं होते हैं, इस प्रकार से विमानयात्रा करनी चाहिये॥२॥

स॒द्यश्चि॒द्यः शव॑सा॒ पञ्च॑ कृ॒ष्टीः सूर्य॑ इव॒ ज्योति॑षा॒पस्त॒तान॑। स॒ह॒स्र॒साः श॑त॒सा अ॑स्य॒ रंहि॒र्न स्मा॑ वरन्ते युव॒तिं न शर्या॑म्॥

विद्युद्युक्त वायु मेघों को पृथिवी पर बिखेर देता है, जो सभी मनुष्यों के लिए हितकर है, उसकी गतिशक्ति सभी स्थानों पर काम करती है या सैकड़ों सहस्रों घोड़ों जितनी बलवाली है, वह होम से पुष्ट होकर अच्छी हितकारी वर्षा करता है॥३॥

उत्ति॑ष्ठ॒ताव॑ पश्य॒तेन्द्र॑स्य भा॒गमृ॒त्विय॑म्। यदि॑ श्रा॒तो जु॒होत॑न॒ यद्यश्रा॑तो मम॒त्तन॑॥

मनुष्यों को चाहिए कि वे कर्मपरायण बने रहें, विशेषतः खेती करने और बगीचे लगाने में अधिक ध्यान दें। राजा या भूस्वामी को ऋतु पर पके अन्न का भाग दें, यदि उद्यान है, तो उसके रसीले फल प्रदान करने चाहिये॥१॥

श्रा॒तं ह॒विरो ष्वि॑न्द्र॒ प्र या॑हि ज॒गाम॒ सूरो॒ अध्व॑नो॒ विम॑ध्यम्। परि॑ त्वासते नि॒धिभिः॒ सखा॑यः कुल॒पा न व्रा॒जप॑तिं॒ चर॑न्तम्॥

अच्छे राजा के लिये उसके प्रजाजन कृषि आदि का कर उपहार, अन्न देने के लिये उत्सुक रहते हैं और रहना चाहिये, वे इस प्रकार प्रतीक्षा करते और उत्सुक रहते हैं, जैसे गृहपति वृद्धजन को भोजन देने के लिए उसके पुत्रादि उत्सुक रहते हैं॥२॥

श्रा॒तं म॑न्य॒ ऊध॑नि श्रा॒तम॒ग्नौ सुश्रा॑तं मन्ये॒ तदृ॒तं नवी॑यः। माध्यं॑दिनस्य॒ सव॑नस्य द॒ध्नः पिबे॑न्द्र वज्रिन्पुरुकृज्जुषा॒णः॥

गौ के ऊधस् में दूध भी पके अन्न के समान निकलता हुआ सेवन करने योग्य है, अग्नि में पका हुआ सुपक्व कहलाता है, वह सेवन करने योग्य है, खेती का कठोर अन्न अग्नि में पका हुआ सेवन करने योग्य है, खेती का अत्यन्त मृदु अन्न भी गोदुग्ध की भाँति सेवन करने योग्य है, वसन्त ऋतु के दिनों में फलों के रस द्रव पदार्थ खाने योग्य हैं, इस प्रकार राजा पकी हुई कठोर वस्तु और द्रव वस्तु उपहार में प्राप्त करने का अधिकारी है॥३॥

प्र स॑साहिषे पुरुहूत॒ शत्रू॒ञ्ज्येष्ठ॑स्ते॒ शुष्म॑ इ॒ह रा॒तिर॑स्तु। इन्द्रा भ॑र॒ दक्षि॑णेना॒ वसू॑नि॒ पतिः॒ सिन्धू॑नामसि रे॒वती॑नाम्॥

राजा शत्रुओं को अभिभव करनेवाला-दबानेवाला हो, उसका बल महान् हो, वह प्रजाओं के लिए यथायोग्य धन आदि देनेवाला हो॥१॥

मृ॒गो न भी॒मः कु॑च॒रो गि॑रि॒ष्ठाः प॑रा॒वत॒ आ ज॑गन्था॒ पर॑स्याः। सृ॒कं सं॒शाय॑ प॒विमि॑न्द्र ति॒ग्मं वि शत्रू॑न्ताळ्हि॒ वि मृधो॑ नुदस्व॥

राजा को शत्रुओं के लिए पर्वतीय सिंह की भाँति भयंकर होना चाहिये, संग्राम में किसी भी दिशा और किसी भी दूर देश से आकर फैलानेवाले तीक्ष्ण वज्र को शत्रुओं पर फैंके और संग्राम को विजय करना चाहिये॥२॥

इन्द्र॑ क्ष॒त्रम॒भि वा॒ममोजोऽजा॑यथा वृषभ चर्षणी॒नाम्। अपा॑नुदो॒ जन॑ममित्र॒यन्त॑मु॒रुं दे॒वेभ्यो॑ अकृणोरु लो॒कम्॥

राजा को मनुष्यों में बलवान्, उनको सुख देनेवाला, आघात से बचानेवाला, धन ज्ञान देनेवालों के लिए सुखपूर्ण स्थान करनेवाला और शत्रुओं को नष्ट करनेवाला होना चाहिये॥३॥

प्रथ॑श्च॒ यस्य॑ स॒प्रथ॑श्च॒ नामानु॑ष्टुभस्य ह॒विषो॑ ह॒विर्यत्। धा॒तुर्द्युता॑नात्सवि॒तुश्च॒ विष्णो॑ रथंत॒रमा ज॑भारा॒ वसि॑ष्ठः॥

परमेश्वर की वेदवाणी, जो सारे ज्ञान-विज्ञानों का भण्डार है, उसका अध्ययन और अध्यापन प्रारम्भ सृष्टि से चला है,  अग्नि वायु आदित्य और अङ्गिरा ये चार ऋषि वेदवाणी के प्रथम गुरु, इनसे अध्ययन करनेवाला ब्रह्मा, जो इनका अध्ययन करके अपने अन्दर धारण करता है, वह इनका शिष्य हुआ, पुनः ब्रह्मा से गुरु-शिष्यपरम्परा चालू हुई॥१॥

अवि॑न्द॒न्ते अति॑हितं॒ यदासी॑द्य॒ज्ञस्य॒ धाम॑ पर॒मं गुहा॒ यत्। धा॒तुर्द्युता॑नात्सवि॒तुश्च॒ विष्णो॑र्भ॒रद्वा॑जो बृ॒हदा च॑क्रे अ॒ग्नेः॥

अग्नि आदि चार ऋषि इस गुप्त वेदज्ञान को ग्रहण करते हैं, जो अध्यात्मयज्ञ के स्थान मन में रखा है, जिसे प्रथम अग्नि आदि से ब्रह्मा अध्ययन करता है॥२॥

ते॑ऽविन्द॒न्मन॑सा॒ दीध्या॑ना॒ यजुः॑ ष्क॒न्नं प्र॑थ॒मं दे॑व॒यान॑म्। धा॒तुर्द्युता॑नात्सवि॒तुश्च॒ विष्णो॒रा सूर्या॑दभरन्घ॒र्ममे॒ते॥

अग्नि आदि ऋषि बुद्धि से प्रकाशमान थे, यजुर्वेद-परमात्मा से संगतिकरणपद्धति से अध्यात्मयज्ञ किया, सूर्योदय के समय वेदज्ञान को प्राप्त किया॥३॥

बृह॒स्पति॑र्नयतु दु॒र्गहा॑ ति॒रः पुन॑र्नेषद॒घशं॑साय॒ मन्म॑। क्षि॒पदश॑स्ति॒मप॑ दुर्म॒तिं ह॒न्नथा॑ कर॒द्यज॑मानाय॒ शं योः॥

परमात्मा सारे ब्रह्माण्ड का स्वामी गहन दुःख का नष्ट करनेवाला है, अन्य के अहितचिन्तक दुष्ट मनुष्य को वह नष्ट करता है, सद्भावरहित को भी दूर फैंकता है-नष्ट करता है, अपने उपासक का कल्याण करता है॥१॥

नरा॒शंसो॑ नोऽवतु प्रया॒जे शं नो॑ अस्त्वनुया॒जो हवे॑षु। क्षि॒पदश॑स्ति॒मप॑ दुर्म॒तिं ह॒न्नथा॑ कर॒द्यज॑मानाय॒ शं योः॥

स्तुतियोग्य परमेश्वर गृहस्थों के गर्भाधान कार्य में कल्याणकारी हो तथा उसकी कृपा से गर्भपोषण भी कल्याणकारी हो॥२॥

तपु॑र्मूर्धा तपतु र॒क्षसो॒ ये ब्र॑ह्म॒द्विषः॒ शर॑वे॒ हन्त॒वा उ॑। क्षि॒पदश॑स्ति॒मप॑ दुर्म॒तिं ह॒न्नथा॑ कर॒द्यज॑मानाय॒ शं योः॥

तेजस्वी प्रतापी मनुष्य दुष्ट राक्षसों को तापित करे तथा ब्राह्मणों से द्वेष करनेवालों को हनन करने लिए हिंसक साधन से हिंसित करना चाहिये॥३॥

अप॑श्यं त्वा॒ मन॑सा॒ चेकि॑तानं॒ तप॑सो जा॒तं तप॑सो॒ विभू॑तम्। इ॒ह प्र॒जामि॒ह र॒यिं ररा॑णः॒ प्र जा॑यस्व प्र॒जया॑ पुत्रकाम॥

विवाह के लिए प्रथम प्रस्ताव वधू की ओर से होना चाहिए, वर ब्रह्मचर्य से सम्पन्न पुष्ट हुआ सन्तान की कामना करनेवाला हो और पत्नी के समस्त व्यय का भार अपने ऊपर रखने में समर्थ हो॥१॥

अप॑श्यं त्वा॒ मन॑सा॒ दीध्या॑नां॒ स्वायां॑ त॒नू ऋत्व्ये॒ नाध॑मानाम्। उप॒ मामु॒च्चा यु॑व॒तिर्ब॑भूयाः॒ प्र जा॑यस्व प्र॒जया॑ पुत्रकामे॥

विवाहसम्बन्धी वधू के प्रस्ताव को वर स्वीकार करे, यौवनसम्पन्न तेजस्विनी वधू के साथ विवाह करना चाहिये, विवाह सन्तानोत्पत्ति के लिए करने का आदेश है तथा गृहस्थधर्म ऋतुकाल में किया जाना चाहिए, अन्यथा नहीं॥२॥

अ॒हं गर्भ॑मदधा॒मोष॑धीष्व॒हं विश्वे॑षु॒ भुव॑नेष्व॒न्तः। अ॒हं प्र॒जा अ॑जनयं पृथि॒व्याम॒हं जनि॑भ्यो अप॒रीषु॑ पु॒त्रान्॥

ओषधियों, प्राणियों, अन्य योनियों की सृष्टि में जो भी उत्पन्न होता है, परमेश्वर ही उत्पन्न करता है, वह ही सर्वोत्पादक है, उसे मानना चाहिए॥३॥

विष्णु॒र्योनिं॑ कल्पयतु॒ त्वष्टा॑ रू॒पाणि॑ पिंशतु। आ सि॑ञ्चतु प्र॒जाप॑तिर्धा॒ता गर्भं॑ दधातु ते॥

होम यज्ञ से स्त्रीयोनि का विकास होता है, गर्भधारण करने योग्य बनती है, सूर्य के द्वारा अङ्गों के आकार-रूप बनते हैं, अप्तत्त्व से बढ़ते हैं, पृथिवी-पार्थिव रस वातावरण से गर्भ पुष्ट होता है॥१॥

गर्भं॑ धेहि सिनीवालि॒ गर्भं॑ धेहि सरस्वति। गर्भं॑ ते अ॒श्विनौ॑ दे॒वावा ध॑त्तां॒ पुष्क॑रस्रजा॥

स्त्री में गर्भधारण कराने और बढ़ाने के निमित्त अमावास्या का पूर्वभाग और उत्तरभाग ये निमित्त बनें तथा घर में रहनेवाली बल सहायता देनेवाली सेविका तथा ज्ञानवृद्धा सास आदि ज्ञान देनेवाली होती हैं तथा सूर्य चन्द्रमा भी उनके उचित प्रकाश और चाँदनी का सेवन सहायक होते हैं॥२॥

हि॒र॒ण्ययी॑ अ॒रणी॒ यं नि॒र्मन्थ॑तो अ॒श्विना॑। तं त॒त गर्भं॑ हवामहे दश॒मे मा॒सि सूत॑वे॥

आकाश के सूर्य और चन्द्रमा ये दो अरणियाँ हैं, संसार की वस्तुओं के उत्पन्न होने में निमित्त हैं, इसी प्रकार पुरुष और स्त्री के वीर्य और रज ये दो अरणियों के समान गर्भ को उत्पन्न करती हैं और दशवें मास में पूर्णाङ्ग हो जाता है बाहर प्रसव होने के लिए, उसे यत्न से प्रसूत करना चाहिये॥३॥

महि॑ त्री॒णामवो॑ऽस्तु द्यु॒क्षं मि॒त्रस्या॑र्य॒म्णः। दु॒रा॒धर्षं॒ वरु॑णस्य॥

प्रेरक, प्राण, श्वास; अध्यापक, वरनेवाले अपान, प्रश्वास, उपदेशक और हृदयस्थ प्राण, विद्यासूर्य विद्वान् इन तीनों का रक्षण मिले, तो मनुष्य स्वस्थ दीर्घजीवी और ऊँचा विद्वान् बन सकता है॥१॥

न॒हि तेषा॑म॒मा च॒न नाध्व॑सु वार॒णेषु॑। ईशे॑ रि॒पुर॒घशं॑सः॥

प्राण, अपान, मुख्यप्राण, अध्यापक, उपदेशक, विद्यासूर्य विद्वान् के घर का सम्पर्क में रहने से अहितचिन्तक रोग या शत्रु मनुष्य पर प्रभावकारी नहीं हो सकता॥२॥

यस्मै॑ पु॒त्रासो॒ अदि॑तेः॒ प्र जी॒वसे॒ मर्त्या॑य। ज्योति॒र्यच्छ॒न्त्यज॑स्रम्॥

प्राणों के द्वारा जीवनज्योति और विद्वान् द्वारा ज्ञानज्योति मनुष्य को मिलती रहे, तो रोग या अज्ञान शत्रु उस पर प्रभावकारी नहीं हो सकता है॥३॥

वात॒ आ वा॑तु भेष॒जं श॒म्भु म॑यो॒भु नो॑ हृ॒दे। प्र ण॒ आयूं॑षि तारिषत्॥

वायु मनुष्य के हृदय के लिए शान्तिदायक है, रोग का शमन करनेवाला कल्याणकारक महौषध है, ठीक रीति से वायु का सेवन करने पर वह आयु को बढ़ाता है॥१॥

उ॒त वा॑त पि॒तासि॑ न उ॒त भ्रातो॒त नः॒ सखा॑। स नो॑ जी॒वात॑वे कृधि॥

वायु पालक है, रक्षक है, पोषण कर्ता है, जीवन का साथी है, जीवन के लिए समर्थ बनाता है, उसका उचित रीति से सेवन करना चाहिये॥२॥

यद॒दो वा॑त ते गृ॒हे॒३॒॑ऽमृत॑स्य नि॒धिर्हि॒तः। ततो॑ नो देहि जी॒वसे॑॥

वायु के अन्दर जीवन देनेवाला बड़ा भारी कोष है, उस कोष का थोड़ा भी भाग ठीक से ढंग से अन्दर धारण किया जाय, तो स्वस्थ और दीर्घजीवन मिल सकता है॥३॥

प्राग्नये॒ वाच॑मीरय वृष॒भाय॑ क्षिती॒नाम्। स नः॑ पर्ष॒दति॒ द्विषः॑॥

परमेश्वर मनुष्यों का सुखवर्षक-सुख देनेवाला है और हमारे शत्रुओं को हमसे दूर भगानेवाला है, उसकी स्तुति अवश्य करनी चाहिये॥१॥

यः पर॑स्याः परा॒वत॑स्ति॒रो धन्वा॑ति॒रोच॑ते। स नः॑ पर्ष॒दति॒ द्विषः॑॥

परमात्मा के लिए कोई दिशा या देश दूर नहीं है, वह हृदयाकाश में अत्यन्त प्रकाशित रहता है, द्वेष करनेवाले शत्रुओं को दूर रखता है॥२॥

यो रक्षां॑सि नि॒जूर्व॑ति॒ वृषा॑ शु॒क्रेण॑ शो॒चिषा॑। स नः॑ पर्ष॒दति॒ द्विषः॑॥

परमेश्वर सुख को वर्षानेवाला दुष्ट जनों का नाशक है, उसकी स्तुति करनी चाहिए॥३॥

यो विश्वा॒भि वि॒पश्य॑ति॒ भुव॑ना॒ सं च॒ पश्य॑ति। स नः॑ पर्ष॒दति॒ द्विषः॑॥

परमेश्वर सब लोकलोकान्तरों प्राणियों को बाहिर भीतर से जानता है, दुष्टों को दूर करता है, स्तुति करने योग्य है॥४॥

यो अ॒स्य पा॒रे रज॑सः शु॒क्रो अ॒ग्निरजा॑यत। स नः॑ पर्ष॒दति॒ द्विषः॑॥

परमेश्वर इस महान् आकाश के भी ऊपर स्वामी रूप से प्रकाशमान अग्रणायक है, दुष्टों को दूर करता है, वह स्तुति करने योग्य है॥५॥

प्र नू॒नं जा॒तवे॑दस॒मश्वं॑ हिनोत वा॒जिन॑म्। इ॒दं नो॑ ब॒र्हिरा॒सदे॑॥

उत्पन्नमात्र वस्तु को जाननेवाले तथा उसकी कृपा से धन भोग प्राप्त किया जाता है, उस व्यापक अमृतान्नभोग देनेवाले परमात्मा को स्तुति द्वारा प्रसन्न कर अपने हृदय में आमन्त्रित करना चाहिये एवं जो अपने प्रकाश और ताप से उत्पन्न होते ही जाना जाता है और जिससे किसी यन्त्रयान में प्रयुक्त करने पर धन अन्न प्राप्त होता है, उसे यन्त्रयान में प्रयुक्त करके अश्व घोड़े की भाँति चलानेवाले अग्नि को प्रयुक्त करना चाहिये॥१॥

अ॒स्य प्र जा॒तवे॑दसो॒ विप्र॑वीरस्य मी॒ळ्हुषः॑। म॒हीमि॑यर्मि सुष्टु॒तिम्॥

मेधावी द्वारा प्राप्त होनेवाले सुखवर्षक परमात्मा की महती स्तुति करनी चाहिए तथा अग्नि का उपयोग कर लाभ लेना चाहिये॥२॥

या रुचो॑ जा॒तवे॑दसो देव॒त्रा ह॑व्य॒वाह॑नीः। ताभि॑र्नो य॒ज्ञमि॑न्वतु॥

परमात्मा की विद्वानों में आनन्द को पहुँचानेवाली ज्ञानदीप्तियाँ हैं, उनके द्वारा अध्यात्मयज्ञ को प्राप्त होता है और अग्नि की वायु आदि समस्त देवों में ज्वालाएँ हैं, जिनके द्वारा शिल्पयज्ञ को सम्पन्न करता है॥३॥

आयं गौः पृश्नि॑रक्रमी॒दस॑दन्मा॒तरं॑ पु॒रः। पि॒तरं॑ च प्र॒यन्त्स्वः॑॥

पृथिवी पूर्व की ओर घूमती है और सूर्य के चारों ओर आकाश में गति करती है॥१॥

अ॒न्तश्च॑रति रोच॒नास्य प्रा॒णाद॑पान॒ती। व्य॑ख्यन्महि॒षो दिव॑म्॥

उदय से लेकर अस्तपर्यन्त सूर्य की दीप्ति पृथिवी और द्युलोक के बीच में फैलती है, महान् सूर्य जबकि आकाश में प्रकाशमान होता है॥२॥

त्रिं॒शद्धाम॒ वि रा॑जति॒ वाक्प॑तं॒गाय॑ धीयते। प्रति॒ वस्तो॒रह॒ द्युभिः॑॥

पृथिवी पर दिन-रात में तीस मुहूर्त घड़ियों के रूप में होते हैं, पृथिवी के सूर्य पर आश्रित होने पर॥३॥

ऋ॒तं च॑ स॒त्यं चा॒भी॑द्धा॒त्तप॒सोऽध्य॑जायत। ततो॒ रात्र्य॑जायत॒ ततः॑ समु॒द्रो अ॑र्ण॒वः॥

सृष्टि उत्पत्ति से पूर्व उत्पत्ति, स्थितिविषयक मूलज्ञान वेद तथा उपादानकारण प्रकृतिरूप अव्यक्त सृष्टिकर्ता परमेश्वर के ज्ञानमय तप से उसके सम्मुख आते हैं। दोनों के संसर्ग से महाप्रलय का अन्त प्रलयरूप रात्रि बनती है, उससे गतिवाला हलचल करता हुआ परमाणुओं का समुद्र प्रकट हो जाता है, यह हलचल सृष्टिप्रवाह को चालू करती है॥१॥

स॒मु॒द्राद॑र्ण॒वादधि॑ संवत्स॒रो अ॑जायत। अ॒हो॒रा॒त्राणि॑ वि॒दध॒द्विश्व॑स्य मिष॒तो व॒शी॥

गतिमान् परमाणुसमुद्र के पश्चात् विश्व का काल नियत होता है, फिर गति करते हुए प्रत्येक पिण्ड के दिन-रात परमात्मा नियत करता है॥२॥

सू॒र्या॒च॒न्द्र॒मसौ॑ धा॒ता य॑थापू॒र्वम॑कल्पयत्। दिवं॑ च पृथि॒वीं चा॒न्तरि॑क्ष॒मथो॒ स्वः॑॥

संसार को धारण करनेवाले विधाता परमात्मा ने सूर्य चन्द्रमा द्युलोक पृथिवीलोक अन्तरिक्षलोक और अन्य लोक-लोकान्तरों को पूर्व सृष्टि में जैसे रचा था, वैसे ही इस सृष्टि में रचा है, आगे भी रचता रहेगा॥३॥

संस॒मिद्यु॑वसे वृष॒न्नग्ने॒ विश्वा॑न्य॒र्य आ। इ॒ळस्प॒दे समि॑ध्यसे॒ स नो॒ वसू॒न्या भ॑र॥

परमात्मा सुख की वर्षा करानेवाला स्वामी है, साड़ी जड़ जङ्गम वस्तुओं को सम्प्राप्त है, वह देह के विशिष्ट स्थान हृदय में या स्तुति के स्थान आध्यात्मयज्ञ में साक्षात् होता है, तब मनुष्यों के लिये बसानेवाले धनों को प्रदान करता है॥१॥

सं ग॑च्छध्वं॒ सं व॑दध्वं॒ सं वो॒ मनां॑सि जानताम्। दे॒वा भा॒गं यथा॒ पूर्वे॑ संजाना॒ना उ॒पास॑ते॥

मनुष्यों में अलग-अलग दल न होने चाहिए, किन्तु सब मिलकर एक सूत्र में बँधें, मिलकर रहें, इसलिए मिलें कि परस्पर संवाद कर सकें, एक-दूसरे के सुख-दुःख और अभिप्राय को सुन सकें और इसलिए संवाद करें कि मन सब का एक बने-एक ही लक्ष्य बने और एक लक्ष्य इसलिये बनना चाहिये कि जैसे श्रेष्ठ विद्वान् एक मन बनाकर मानव का सच्चा सुख प्राप्त करते रहे, ऐसे तुम भी करते रहो॥२॥

स॒मा॒नो मन्त्रः॒ समि॑तिः समा॒नी स॑मा॒नं मनः॑ स॒ह चि॒त्तमे॑षाम्। स॒मा॒नं मन्त्र॑म॒भि म॑न्त्रये वः समा॒नेन॑ वो ह॒विषा॑ जुहोमि॥

मनुष्यों के समान विचार, कार्यप्रवृत्ति समान, मन और चित्त समान होने चाहिये तथा स्तुति, प्रार्थना, उपासना समान होनी चाहिये॥३॥

स॒मा॒नी व॒ आकू॑तिः समा॒ना हृद॑यानि वः। स॒मा॒नम॑स्तु वो॒ मनो॒ यथा॑ वः॒ सुस॒हास॑ति॥

मनुष्यों की अहम्मन्यता एक जैसी हो, हृदय में संकल्पित व्यवहार एक जैसे हों, मन समान होना चाहिये, यह परस्पर सहयोग में आवश्यक है, मनुष्यों का परस्पर सहयोग में रहना ही मानवता है, यह जानना चाहिए॥४॥॥इति॥